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Senco Teej Special: तीज के मौके पर पत्नी को दें ये खास गिफ्ट

पति पत्नी के रिश्तों में त्योहार सबसे बड़ा महत्व रखता है. इन्ही त्योहार में से एक तीज का त्योहार है, जिसे बड़े धूमधाम से सेलिब्रेट किया जाता है. इस त्योहार में महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं और अपने पति के लिए व्रत रखती है. लेकिन क्या पति को भी अपनी पत्नियों को तोहफा देकर शुक्रिया अदा नहीं करना चाहिए. इसीलिए सेन्को लाया है तीज के मौके पर लेटेस्ट गोल्ड एंड डायमंड्स सेट का कलेक्शन, जिसे आप गिफ्ट करके अपनी खूबसूरत पत्नी का दिल जीत सकते हैं.

सेन्को के इस खास कलेक्शन में आपको मिलेंगे एक से बढ़कर एक गोल्ड एंड डायमंड के हैवी नेकलेस, ईयरिंग और झुमके, कंगन, रिंग्स और बहुत कुछ…

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सेन्को तीज स्पेशल कॉन्टेस्ट…

आपकी तीज को डबल स्पेशल बनाने के लिए इस बार सेन्को लाया है एक खास मौका, जहां आपको मिल सकते हैं सेन्को की तरफ से खूबसूरत तोहफे, बस आपको लेना होगा सेन्को तीज स्पेशल कॉन्टेस्ट में हिस्सा और देनें होंगे कुछ सवालों के सही जवाब…

सही जवाब देनें वाले चुनिंदा यूजर्स को मिलेगा एक स्पेशल सरप्राइज तो फिर देर किस बात की, नीचे दिए बैनर पर क्लिक कीजिए और बनिए इस कॉन्टेस्ट का हिस्सा और शानदार ईनाम के साथ अपनी तीज को बनाएं यादगार…

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किसकी लड़ाई: नानी की बात सुनकर सब क्यों रो पड़े?

‘‘राजीव का अहमदाबाद से फोन आया है…’’

सेवानिवृत्त विंग कमांडर यशपाल ने किताब पर से नजर हटाए बिना बात काटी, ‘‘तुम्हारा मतलब है संजीव का?’’

‘‘जी नहीं, मेरा मतलब है हमारे बेटे कैप्टन राजीव पाल का,’’ लतिका ने चिढ़े स्वर में कहा.

‘‘हमारा बेटा वैलिंगटन से अहमदाबाद कैसे चला गया?’’

‘‘अगर तुम गोल्फ खेलने और उपन्यास पढ़ने के बजाय टीवी, समाचारपत्र और पत्रिकाओं में रुचि लो तो तुम्हें पता चले कि दुनिया में क्या हो रहा है और तुम्हारा बेटा अहमदाबाद कब और क्यों गया है?’’

‘‘जानेमन, दुनिया में जो हो रहा है उसे जानने के बाद दुनिया छोड़ने को मन करता है, सो इसलिए…’’

‘‘तुम अब सिवा मनोरंजन के और किसी चीज में रुचि नहीं लेते हो. अच्छा सुनो, राजीव ने कहा है कि…’’

‘‘पहले यह बताओ, जब अहमदाबाद में इतनी गड़बड़ चल रही है तो राजीव वहां क्यों गया है?’’

‘‘क्योंकि उसी गड़बड़ यानी सांप्रदायिक दंगों से निबटने के लिए सेना बुलाई गई है, सो सेनाधिकारी होने के नाते हमारा बेटा भी गया है.’’

यशपाल को जैसे किसी ने करंट छुआ दिया, तेज स्वर में बोल उठे, ‘‘अब पुलिस का काम भी सेना करेगी? मैं ने अपने बेटे को देश की सीमा का प्रहरी बनने सेना में भेजा था, सिरफिरे लोगों की आपसी रंजिशों से होने वाले दंगेफसाद रोकने के लिए नहीं.’’

लतिका  झुं झला गई, ‘‘राजीव ने क्यों फोन किया था, पहले वह तो सुन लो.’’

‘‘सुनाओ, यशपाल के स्वर में भी उतनी ही  झुं झलाहट थी.’’

‘‘पुष्पा बहनजी, प्रेम जीजाजी और संजीव को राजीव कल सुबह के जहाज से यहां भेज रहा है. उस का कहना है कि जब तक अहमदाबाद में हालात सामान्य न हो जाएं यानी दुकानें न खुलने लगें तब तक हम जीजाजी और संजीव को यहीं रखें.’’

‘‘ठीक कहता है, अब कैसे भी सही, जब फुरसत मिली है तो हमारे साथ गुजारें,’’ फिर कुछ क्षण रुक कर उन्होंने कहा, ‘‘मां को बताया?’’

‘‘मांजी अभी सैर कर के नहीं लौटीं.’’

‘‘उम्र के साथसाथ मां की सैर भी लंबी होने लगी है.’’

‘‘सैर तो ज्यादा नहीं करतीं मगर पार्क में बच्चों के साथ अंताक्षरी जरूर खेलती हैं,’’ लतिका हंसी, ‘‘फिल्मी गानों की नहीं, भौगोलिक या ऐतिहासिक जगहों अथवा किसी क्षेत्र के जानेमाने लोगों के नामों की. इस से बच्चों का सामान्य ज्ञान भी बढ़ता है और मां का समय भी गुजर जाता है.’’

‘‘मानना पड़ेगा, मां हैं जीवट वाली.’’

‘‘अगर जीवट वाली न होतीं तो अकेले आप सब भाईबहनों को पढ़ालिखा कर उच्चाधिकारी कैसे बनातीं?’’ कह कर लतिका तो बाहर चली गई लेकिन यश को उस का संघर्षों से भरा बचपन याद करवा गई.

मीरपुर, जम्मू के पास छोटा सा शहर था. जहां उस के पिता वकालत करते थे. मां स्कूल में पढ़ाती थीं. सुखीसमृद्ध परिवार था कि एक रोज पाकिस्तानी कबायलियों के हमले ने समूचा मीरपुर ही तहसनहस कर डाला. उस के पिता की कबायलियों ने बेहरमी से हत्या कर दी. मां किसी तरह अपने बच्चों और बूढ़ी सास को ले कर जम्मू पहुंची थीं. मां को स्कूल में नौकरी मिलने के बाद शरणार्थी शिविर छोड़ कर वे सब घुटनभरे एक कमरे में घर में आ गए थे और शुरू हुई थी एक अभावग्रस्त लेकिन प्रेरणाओं से भरी जिंदगी.

दादी रातदिन पोते को जीवन में फिर उसी मुकाम पर पहुंचने को कहती थीं जो उसे विरासत में तो मिला था पर उस से जबरन छिन गया था और मां का सपना था कि वह सेनाधिकारी बन कर देश के मानसम्मान की रक्षा करे.

मां ने अपनी अल्प आय में बेटियों को पढ़ायालिखाया था और फिर दोनों की शादी कर दी थी. यश के पायलट बनने के बाद अभावों की जिंदगी तो पीछे छूट गई थी पर मां ने अपनी कर्मठता नहीं छोड़ी थी.

अगली सुबह पुष्पा पति और बेटे के साथ आ गई. सभी बेहद दुखी और बु झेबु झे से लग रहे थे.

‘‘अच्छा किया राजीव ने हमें जबरदस्ती यहां भेज दिया. वरना वहां तो चारों तरफ नृशंसता और क्रूरता का नंगा नाच देखदेख कर हम पागल हो जाते,’’ संजीव बोला.

‘‘बस, देख कर ही? अरे, हम तो  झेल कर भी न पागल हुए, न मरे,’’ नानी नाती की ओर देख कर मुसकराई.

‘‘आप जैसा धैर्य हम में कहां है, मांजी,’’ प्रेम ने कहा, ‘‘आप ने तो राख से नवनिर्माण किया था, मगर हमारे लिए तो किसी ने राख भी नहीं छोड़ी.’’

‘‘क्या मतलब? आप लोगों को भी लूटपाट से नुकसान उठाना पड़ा?’’

संजीव और प्रेम एक गहरी सांस ले कर रह गए लेकिन पुष्पा विह्वल स्वर में बोली, ‘‘लूटपाट तो खैर नहीं हुई लेकिन दुकान लगभग 2 महीने से बंद पड़ी है, वह नुकसान तो हो ही रहा है और फिर समाज के जिस वर्ग के पास शौक के लिए और खाड़ी देशों का पैसा था हमारा सामान खरीदने को, वह तो तबाह हो गया. अब बाजार खुल भी जाएं तो भी ग्राहक नहीं आने के.’’

‘‘अपनी जाति की साख या भरोसा सब खलास हो गया, मां,’’ प्रेम ने कहा.

‘‘नानी को बताओ न कि मेरी दुनिया बसने से पहले ही कैसे उजड़ गई,’’ संजीव ने व्यथित स्वर में कहा.

सब ने हैरानी से संजीव की ओर देखा.

‘‘हमारे एक पड़ोसी थे, नासिर भाई…’’

‘‘थे का क्या मतलब?’’ लतिका ने चौंक कर पूछा, ‘‘कहां गए वे लोग?’’ तो संजीव ने आंसूभरी आंखों से आसमान की ओर उंगली उठा दी.

‘‘उन की बेटी शबाना तो आप ने देखी ही थी, भाभी…’’

‘‘देखी क्या? आप से ज्यादा वह मेरे साथ रही थी अहमदाबाद में.’’ शबाना और संजीव ने ही तो मु झे घुमायाफिराया था,’’ लतिका ने कहा, ‘‘बहुत ही प्यारी बच्ची है.’’

‘‘है नहीं, थी, मामी. शिकार हो गई वहशीपन और सियासत की,’’ संजीव ने भर्राए स्वर में कहा.

‘‘जैसा आप ने अभी कहा, भाभी, शबाना बहुत ही प्यारी बच्ची थी, सो संजीव का उस से लगाव देख कर हम ने दोनों की शादी करने का फैसला किया था. शबाना की एमए की परीक्षा के बाद सगाई और शादी की तारीख तय होनी थी लेकिन उस से पहले ही एक रात उन के बंगले में आग लगा कर वहशियों ने उन के पूरे कुनबे को जिंदा जला डाला.’’

‘‘मगर जीजाजी, उन का बंगला तो आप के बिलकुल सामने था. आप को आग की लपटें नजर नहीं आईं, क्या आप ने आग बु झाने या उन लोगों को बचाने की कोशिश नहीं की?’’ यश ने पूछा.

‘‘हम ने फायर ब्रिगेड और पुलिस को एक बार नहीं, कई बार फोन किए. शिकायत दर्ज करने के बावजूद कोई नहीं आया. खुद जा कर बचाना तो नामुमकिन था. न जाने दरिंदों को इतना पैट्रोल या मिट्टी का तेल कहां से मिला था कि उन्होंने कोठी ही नहीं, बगीचे और पूरी चारदीवारी को भी आग लगा दी थी. सिवा आग की लपटों के कुछ दिखाई ही नहीं देता था,’’ प्रेम ने बताया.

‘‘अगर फायर ब्रिगेड वाले आ भी जाते तो कुछ कर नहीं सकते थे. आग लगा कर असामाजिक तत्त्व वहीं सड़क पर खड़े हो कर चिल्ला रहे थे, ‘हम से जो टकराएगा चूरचूर हो जाएगा.’ मैं पूछती हूं, चूरचूर करना था तो टकराने वालों को करते, नासिर भाई जैसे भले आदमी के संभ्रांत परिवार को क्यों?’’ पुष्पा के स्वर में रोषमिश्रित व्यथा थी, ‘‘या हुसैन भाई को क्यों, जिन के होटल के अधिकांश कर्मचारी राजस्थानी थे?’’

‘‘हुसैन भाई, वही न जिन की बीवी अपने होटल में बचा हुआ खाना रोज रात को गरीबों में बांटती थी?’’ लतिका ने पूछा.

‘‘हां, भाभी, जिन्हें वह खाना बांटती थी उन्हीं लोगों ने बेरहमी से चाकू गोदगोद कर हुसैन भाई को जख्मी किया और फिर उन के होटल में आग लगा कर उन्हें उसी में  झोंक दिया. रोज गरीबों को खाना बांटने वाली उन की बीवी खुद दानेदाने को मुहताज हो गई है.’’

अब तक चुप बैठे संजीव ने नानी की ओर देखा, ‘‘है कि नहीं यह सब पागल कर देने वाली बर्बरता?’’

‘‘बर्बरता या जनून खुद में ही एक पागलपन है, बेटा जिसे चाह कर भी तुम कभी भूल नहीं सकते.’’

लतिका ने हैरानी से सास की ओर देखा, ‘‘तो क्या आप को अभी भी मीरपुर में जो हुआ वह याद है, मां?’’

‘‘बिलकुल, जैसे कल की ही बात हो. उस सब को पीछे छोड़ने को ही तो मैं हर समय कुछ न कुछ करती रहती हूं.’’

लतिका चौंक पड़ी. सोचने लगी तो यह वजह थी मां के आराम के नाम से घबराने की. वह हमेशा खुद को व्यस्त रखती थी. तभी मांजी और उमर सैर से लौट आए.

‘‘मीरपुर में ऐसा क्या हुआ था नानी, मु झे भी बताओ न,’’ संजीव बोला.

‘‘हां, मां, जब आप वह सब भूली ही नहीं हैं तो मैं भी जानना चाहूंगी कि पापा और बूआजी की हत्या अचानक क्यों और कैसे हुई थी?’’ लतिका ने कहा.

‘‘अचानक तो नहीं कह सकते पर हां, सीमावर्ती इलाका होने की वजह से वहां लूटपाट का खतरा तो बना ही रहता था. छोटीमोटी वारदातें भी होती ही रहती थीं, लेकिन उस रात तो सैकड़ों की तादाद में कबायलियों ने हमला किया था. मारकाट से ज्यादा उन की दिलचस्पी औरतों में थी. अपने घर के पास शोर सुन कर तुम्हारे पापा ने हम सब को परछत्ती पर छिपा दिया और खुद यह कह कर नीचे उतर गए थे कि अपनी पिस्तौल ले कर आता हूं, लेकिन जब वे कुछ देर तक पुकारने पर भी नहीं आए तो तुम्हारी बूआजी उन्हें बुलाने चली गईं.

तभी दरवाजा तोड़ कर हमलावर घर में घुस आए. तुम्हारी बूआजी बहुत सुंदर थीं और सगाई के बाद तो उन का रूप और भी निखर आया था.

‘‘हमारे घर पर हमला करने वाले कबायली तो उन्हें देखते ही पागल हो गए और उन पर लपके. तुम्हारे पापा ने पिस्तौल तान कर हमलावरों को ललकारा मगर इस से पहले कि वे गोली चला पाते, एक पठान ने लपक कर उन से पिस्तौल छीन ली और उन्हें बूट से ठोकरें मारमार कर गिरा दिया. फिर उन्हीं की पिस्तौल से उन्हें गोलियों से भून डाला. तभी किसी तरह दूसरे दरिंदों की गिरफ्त से छूट कर तुम्हारी बूआ अपने भाई के शरीर पर गिर कर रोने लगीं. 2 मुस्टंडों ने उन्हें पकड़ कर सीधा कर के तुम्हारे पापा के शरीर पर लिटा दिया. एक ने वहीं सब के सामने उन के साथ बलात्कार किया और दूसरों को बताया कि यार, इस मोटे की लाश तो गद्दे का काम कर रही है, मजा आ गया. बस, फिर क्या था, फिर तो एक के बाद एक सभी ने अपना मुंह काला किया.

‘‘फिर घर में से जो भी ले कर जा सकते थे, उसे समेटा. तुम्हारी बूआ बेहोश हो चुकी थीं, सो उन्हें एक ने कंधे पर डाल लिया और फिर तुम्हारे पापा की लाश को यह कह कर घसीटते हुए ले गए कि इस गद्दे को भी ले चलो, दोबारा काम आएगा.

‘‘अब तुम लोग खुद ही सोच लो, क्या गुजरी होगी तुम्हारी दादी पर, जिस ने अपनी आंखों से अपने बेटे का कत्ल होते और कुंआरी बेटी की इज्जत लुटते हुए देखी या मु झ पर, जिस ने अपने पति को तड़पतड़प कर दम तोड़ते और फिर उन की लाश को घसीटते हुए ले जाते देखा.

‘‘फिर भी तुम्हारी दादी की जिद थी कि हमें कैसे भी अपने कुल का नाम चलाना है. खानदान के चिराग यश को पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बनाना है, सो, हम सेवा समिति के लोगों के साथ जम्मू के शरणार्थी शिविर में आ गए. मु झे बच्चों के साथ शिविर में छोड़ कर तुम्हारी दादी ने शिविर की एक समाजसेविका के घर का काम करना शुरू कर दिया ताकि हाथखर्च को कुछ पैसा मिल जाए.’’

‘‘एक रोज जब वे अपनी मालकिन के साथ सब्जी मंडी गई थीं तो मीरपुर में हमारे घर में बरतन मांजने वाला कहार छज्जू उन्हें मिल गया. छज्जू से यह सुन कर कि मांजी का बेटा वकील था और बहू मास्टरनी, उस समाजसेविका ने मु झे स्कूल में नौकरी दिलवा दी. मांजी को भी घर में अन्य नौकरों पर नजर रखने और बच्चों की देखभाल करने पर लगा दिया. कुछ उन की सहायता से, कुछ अपनी मेहनत से जिंदगी किसी तरह आज के मुकाम तक पहुंच ही गई.’’

लतिका और संजीव तो यह कहानी सुन कर जैसे सहम गए. अन्य सब भी जैसे कहीं गहरे तक हिल गए थे. लेकिन यश फूटफूट कर रो रहा था. कुछ देर पुष्पा ने उसे चुपचाप रोने दिया, फिर चिढ़े स्वर में बोली, ‘‘यह कहानी तू दादी से पच्चीसों बार सुन चुका है और आज तो मां ने पापा या बूआ का आर्तनाद या छज्जू का विलाप नहीं दोहराया है, जिसे सुन कर तू पहले तो कभी नहीं रोया था, फिर आज क्यों रो रहा है?’’

‘‘आज इसलिए रो रहा हूं पुष्पा बहन कि 50-55 साल पहले जो बर्बरता हुई थी, उस की कोई वजह थी. पाकिस्तान को और जमीन की हवस थी. कबायलियों को, ध्यान बंटाने के लिए, उस ने जम्मूकश्मीर में लूटपाट करने को भेज दिया था. वे हमें अपना दुश्मन सम झने वाले अनपढ़, वहशी, हैवान थे,’’ यश ने संयत होने के बाद कहा, ‘‘मगर जो कुछ प्रेम ने बताया है उन हृदयविदारक, शर्मनाक हरकतों को करने वालों को न तो जमीन चाहिए, न ही उन का ध्यान बंटाने की जरूरत है और न ही वे अनपढ़, जाहिल, वहशी दरिंदे हैं. मरने वाले और मारने वाले सभी तो अपने भाईबंद हैं. फिर यह सब अमानवीय हरकतें क्यों हो रही हैं? यह किस की लड़ाई है?’’ कहतेकहते यश फिर रो पड़ा.

यश के प्रश्न को कोई न तो  झुठला सकता था, न उस का उत्तर दे सकता था और न ही उस के आंसू पोंछ सकता था.

कैसे अधिकार कैसे कर्तव्य

आजकल हमारे शासक संविधान के दिए गए अधिकारों की बात करते हुए उत्तरदायित्व और कर्त्तव्यों की बात भी करने लगते हैं. 1945 से 1950 के बीच जो संविधान तैयार किया गया वह इस आधार पर किया गया कि देश के शासक नेता वे ही लोग होंगे जो देश की जनता की सेवा करने के लिए चुनावी राजनीति से चुने जाएंगे पर हुआ कुछ और ही.

संविधान के बनने के तुरंत बाद उन्हीं लोगों, जिन में संविधान में अधिकार दिए थे, को कुरसियां मिलने पर जनता को मिले वे अधिकार अखरने लगे.

संविधान में बारबार संशोधन किए गए और हर संशोधन में कोई न कोई अधिकार छीना गया लेकिन फिर भी अभी भी इतने अधिकार आमजन के पास हैं कि देश के गृहमंत्री अमित शाह जैसे को भी याद दिलाना पड़ रहा है कि संवैधानिक अधिकारों के साथ संवैधानिक कर्तव्य भी पूरे संविधान और संविधान के अंतर्गत बने कानूनों में बिखरे हैं.

उन्होंने अपने भाषण में शासकों के कर्तव्यों की बात नहीं की, शासकों की जवाबदेही की बात नहीं की. यही नहीं, गलत निर्णय लेने पर शासकों को दंड मिलने की बात भी उन्होंने नहीं की क्योंकि 1947 के बाद से ही संवैधानिक अधिकार छीनने की जो आदत पड़ी है वही नरेंद्र मोदी की मौजूदा सरकार भी कर रही है.

जनता को जो संवैधानिक अधिकार दिए गए हैं, वे उस को सरकार से कुछ दिलाते नहीं हैं, वे सरकार को जनता के प्रति कुछ बुरा करने से रोकते मात्र हैं.

संविधान के तहत जनता के पास न रोजीरोटी, न चिकित्सा, न शिक्षा, न मनोरंजन, न सम्मान का जीवन, न साफ शहरों में रहने, न अपराधरहित जीवन जीने का हक है. संविधान तो सिर्फ सरकार को जनता से ये सब चीजें, जो जनता खुद जुटा रही है, छीनने से रोकता है वह भी आधाअधूरा. हर संवैधानिक अधिकार को पाने के लिए नागरिक को वर्षों सड़कों पर, विधानमंडलों में, अदालतों में, अखबारों में, टीवी में, लड़ाई लड़नी पड़ती है.

हाल यह है कि सरकार एक लाइन का आदेश पारित कर के जनता की सारी जमापूंजी रातोंरात नष्ट कर दे और गृहमंत्री जनता को कर्तव्यों की याद दिलाए? सरकार मनचाही कमेटी बना कर न्यू एजुकेशन पौलिसी के नाम पर शिक्षा का ढांचा बदल दे और छात्रों व अध्यापकों को कर्तव्यों की याद दिलाए.

अधिकारों और कर्तव्यों का यह कैसा खेल है? असल में जनता तो कठपुतली है, जो सरकारी इशारे पर नाच रही है. जनता को खुश करने के लिए संविधान में अधिकार बताए गए हैं जो असल में खोखले हो चुके हैं.

Rakhi 2022: त्यौहार पर बनाएं पनीर के कोफ्ते

कोफ्ते के स्वाद तो लजीज होते ही होते है पर पनीर के कोफ्ते की स्वाद की बात ही कुछ और है तो आइए आज इसकी रेसीपी बताते है. तो इस भाई-बहन के त्यौहार पर ये स्पेशल डिश जरूर बनाएं.

सामग्री

– थोड़ा सा पनीर कसा हुआ

– 2 बड़े चम्मच कौर्नफ्लौर

– 1 हरीमिर्च कटी

– 1/2 कप लाल पीली व हरी शिमलामिर्च कटी हुई

– 1 प्याज कटा

– 1 बड़ा चम्मच पनीर चिली मसाला

– 1/2 कप पानी

– 1 बड़ा चम्मच तेल तलने के लिए

– नमक (स्वादानुसार)

बनाने की विधि

– पनीर में नमक व कौर्नफ्लौर डाल कर छोटीछोटी बौल्स बना कर गरम तेल में सुनहरा होने तक तल लें.

– कड़ाही में तेल गरम कर प्याज, लाल, पीली व हरी शिमलामिर्च भूनें.

– इस में हरीमिर्च, पनीर, चिली मसाला व 1/2 कप पानी डाल पकने दें.

– गाढ़ा होने पर पनीर के कोफ्ते डाल कर

– 1 मिनट पकाएं और गरमगरम परोसें.

भगोड़ी: सलिल ने माता-पिता के खिलाफ जाकर क्यों शादी की?

सालों बाद वह उस शहर में आई थी. उस का अपना शहर, जिस की गलियां, सड़कें और बाजार उसे उंगलियों पर याद थे. उस दिन बाजार में अचानक बगल वाले अमित अंकल मिल गए थे. औफिस के काम से इस शहर में आए थे. दुनिया सचमुच गोल है, सलिल और लता यही सोच कर इस बड़े शहर में आए थे कि उन्हें यहां कोई नहीं पहचानता. इन बड़ेबड़े शहरों की बड़ीबड़ी इमारतों में एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी को नहीं जानता. उन के लिए अच्छा ही तो है कोई यह जानने की कोशिश नहीं करेगा कि वे कहां से आए हैं पर चाहने और सोचने में हमेशा फर्क होता है.

उस दिन बाजार में अचानक अमित अंकल से मुलाकात हो गई थी. उन की बेटी रोहिणी उसी की उम्र की थी. स्कूल से ले कर कालेज तक का साथ था उन का. अच्छे पड़ोसी थे वे. एकदूसरे के सुखदुख में हमेशा खड़े होने वाले. उन्होंने ही यह दुखद खबर दी थी कि बाबूजी नहीं रहे. उसे विश्वास नहीं हो रहा था बाबूजी उस से बिना मिले, बिना कुछ कहे, बिना कोसे इस दुनिया से कैसे जा सकते थे पर उस ने भी तो उन्हें इस बात का मौका ही कहां दिया था. वह तो चली आई थी सलिल के साथ अपनी नई दुनिया को बसाने के लिए. जानती थी बाबूजी इस रिश्ते के लिए कभी तैयार नहीं होंगे पर सलिल का प्रेम उस के सिर चढ़ कर बोल रहा था.

बचपन में सूई लगवाने पर घंटों रोने वाली लता इतनी कठोर हो सकती है, उस ने खुद भी न सोचा था. मां के जाने के बाद बाबूजी ने ही तो उसे और उस के भाईबहन को मां और बाप दोनों बन कर पाला था. सब ने कितना कहा था, ‘अभी उम्र ही क्या है तुम्हारी, दूसरी शादी कर लो,’ पर बाबूजी ने लता के सिर पर हाथ रख कर कहा था, ‘मैं अपने बच्चों के लिए सौतेली मां नहीं लाना चाहता. अब ये ही मेरी दुनिया हैं, मैं इन्हें देख कर ही जी लूंगा.’

जिन बाबूजी ने बच्चों का मुंह देख कर अपनी जिंदगी उन पर कुरबान कर दी, उस ने उन के बारे में एक बार भी नहीं सोचा. लता उन की सब से बड़ी संतान थी, नाजों से पाला था बाबूजी ने. बचपन में खाना खाते वक्त वह कितना तंग करती थी.

‘बाबूजी, मां कहां चली गईं?’

‘तेरी मां तारा बन कर आसमान में रह रही है और तू ने खाना नहीं खाया न, तो वह कभी लौट कर नहीं आएगी.’

और वह डर के मारे फटाफट सारा खाना खत्म कर देती. वे जानते थे मां अब कभी लौट कर नहीं आएगी. लेकिन बाबूजी ने मां की कमी कभी नहीं होने दी. लता इतनी एहसानफरामोश कैसे हो सकती थी? लता ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा ही था कि एक नजर में उसे सलिल से प्यार हो गया था. रातदिन उसी के सपनों में खोई रहती. उस ने बाबूजी के प्रेम और त्याग को पलभर में भुला दिया. सलिल दूसरी जाति का लड़का था. जानती थी कि बाबूजी

उसे कभी भी शादी करने की अनुमति

नहीं देंगे.

ऐसी स्थिति में उस के पास सिर्फ एक ही रास्ता था भाग जाना. उस दिन से ले कर आज तक वह भाग ही तो रही थी. कभी अपने अतीत से, कभी अपनी यादों से तो कभी अनदेखे आरोपों से. लकड़ी का दरवाजा उसे अपिरिचितों की तरह देख रहा था. मां के हाथों से लगाया हुआ तुलसी का चौरा अपनी जीवनदायिनी के जाने से सूखने लगा था पर बाबूजी के प्रेम और अपनत्व से वह फिर से लहलहा उठा था.

मां तो उन की जिंदगी से जा चुकी थीं पर उन की इस अंतिम निशानी को वे अपने से दूर नहीं होने देना चाहते थे. आज उस चौरे को देख कर मां के साथसाथ बाबूजी की छवि भी साथ ही उभर आई थी. कहते हैं, एक लंबा समय साथ गुजारने के बाद पतिपत्नी एकजैसे दिखने लगते हैं. बाबूजी कुछकुछ मां की तरह लगने लगे थे.

गेट खुलने की आवाज को सुन कर लता की छोटी बहन नंदिनी दरवाजे तक आ गई. लता को देख कर वह ठिठक गई. उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था.

‘‘दीदी, तुम यहां? क्या करने आई हो? अब तो बाबूजी भी नहीं रहे.’’

‘‘मु झे पता है बाबूजी अब…’’ शब्द उस के गले में अटक कर रह गए.

‘‘सारी बातें यहीं कर लोगी नंदिनी, अंदर नहीं बुलाओगी?’’

अपने ही घर में अंदर आने के लिए अनुमति लेनी पड़ेगी, लता ने कभी सोचा नहीं था. नंदिनी दरवाजे के सामने से हट गई. लता की आंखें तेजी से कुछ ढूंढ़ रही थीं.

‘‘विपुल नहीं दिख रहा है?’’

‘‘कालेज गया है.’’

‘‘कालेज?’’

हाफ पैंट पहन कर दिनभर इधर से उधर डोलने वाला विपुल, बातबात पर नंदिनी से लड़ने वाला विपुल इतना बड़ा हो गया, लता ने गहरी सांस ली. अच्छा ही था, भाई छोटा हो या बड़ा, भाई तो भाई ही होता है. पता नहीं उसे देख कर वह कैसे व्यवहार करता. लता जब घर से भागी थी तब वह बहुत छोटा था. तब उसे यह बात सम झ में नहीं आती थी लेकिन वक्त के साथ लोगों ने उस की बहन के कृत्यों से परिचित करा दिया था. बड़ी बहन के लिए नफरत दिलोदिमाग पर बस चुकी थी.

चिलचिलाती धूप में चल कर आने से उस का गला सूख रहा था. कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ था. पंखे की आवाज के अलावा कोई आवाज नहीं आ रही थी. लता को बैठेबैठे काफी देर हो चुकी थी.

‘‘क्या एक गिलास पानी मिलेगा?’’

जिस घर में रिकशे वाले और मजदूरों को भी पानी और गुड़ दिए बिना जाने नहीं दिया जाता था, उस घर में पानी के लिए भी आग्रह करना पड़ा था. नंदिनी रसोई से पानी ले आई. लता अपने ही घर में मेहमानों की तरह बैठी थी. पंखे की तेज हवा से परदे उड़ रहे थे. लता का बहुत मन हो रहा था कि परदे के पीछे की वह दुनिया एक बार  झांक ले.  झांक ले उस बचपन को जो इस घर के आंगन में बिताया था.  झांक ले उस कमरे को जहां बाबूजी की गोदी में लेट कर वह घंटों उन से बातें करती थी. छू ले उस कुरसी को जिस पर बैठ कर बाबूजी घंटों अखबार पढ़ते थे. छू ले उस तकिए को जिस पर लेट कर न जाने कितनी ही रातें बाबूजी मां को याद कर अपनी आंखें और तकिया भिगो लिया करते थे. कितनी सारी यादें जुड़ी हुई थीं इस घर से पर वे यादें हाथ छुड़ा कर न जाने किस बियाबान जंगल में छिप गई थीं.

चाहती तो वह बहुत थी पर न जाने हिम्मत नहीं हुई. बाबूजी की तसवीर बैठक में लगी थी. उस तसवीर की ओर देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी. जानती थी कि पिता के चेहरे पर फैली नाराजगी की तहरीर को पढ़ना इतना आसान न होगा पर ऐसी नाराजगी होगी, कभी सोचा भी न था.

अपनी लाड़ली की जीतेजी शक्ल भी न देखी बाबूजी ने. बाबूजी की आंखें तसवीर से  झांक रही थीं. कितना सोच कर आई थी कि जब भी मिलेगी, जीभर कर देखेगी पर उन्होंने तो वह मौका न दिया. लकड़ी के फ्रेम में वे मुसकरा रहे थे. इन 5 सालों में अचानक से कितने बूढ़े लगने लगे थे वे. ऐसा लगा मानो वे कह रहे हों, ‘यहां क्या करने आई है तू, जा तेरे लिए इस घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं.’

और फिर उन के खांसने की आवाज कमरे में भर गई. जैसा हमेशा होता था. बाबूजी जब बहुत गुस्से में होते तब उन्हें खांसी आने लगती. क्या आज भी ऐसा ही होता?

‘‘कैसी है तू?’’

‘‘ठीक हूं,’’ नंदिनी ने रूखा जवाब दिया.

‘‘विपुल कैसा है?’’

‘‘वह भी ठीक है.’’

‘‘तेरी शादी नहीं हुई?’’

‘‘शादी…’’

नंदिनी ने उसे ऊपर से नीचे तक कुछ ऐसी निगाहों से देखा मानो वह उसे खड़ेखड़े भस्म कर देगी.

‘‘दीदी, तुम ने अपना घर बसाया इस घर को उजाड़ कर. तुम ने सपने देखे इस घर के सपनों को तोड़ कर, तुम ने अरमानों को जिया इस घर के अरमानों को कुचल कर. जिस घर की लड़कियां भाग जाती हैं उस घर की और लड़कियों की शादी नहीं हो पाती. सिर्फ उस घर की ही क्यों, उस महल्ले की भी.’’

लता छोटी बहन के आरोपों से तिलमिला उठी, ‘‘कहना क्या चाहती हो?’’

‘‘तुम्हारे जाने के बाद कितना होहल्ला हुआ. न जाने कितनी बार पुलिस ने हमारे घर के चक्कर लगाए. सलिल के घर वालों ने.’’

‘‘जीजाजी, सलिल तुम्हारे जीजा हैं, नंदिनी, यह बात मत भूलो और उन के घर वाले तुम्हारी बहन की ससुराल वाले हैं,’’ लता ने सख्ती से कहा.

नंदिनी का चेहरा भावहीन था, फिर भी बोली, ‘‘जिस रिश्ते को बाबूजी ने स्वीकार नहीं किया वह मेरा कुछ भी नहीं. तुम तो चली गईं अपनी दुनिया बसाने पर बाबूजी को न जाने कितने आरोप  झेलने पड़े. बिन मां की बच्ची थी, कोई देखने वाला नहीं था. क्या कालेज में आजकल यही पढ़ाते हैं? तुम्हारे जाने के बाद इस महल्ले की जितनी भी लड़कियां थीं उन की जल्दीजल्दी शादी कर दी गई. सभी को डर था कि जब लता इस तरह का कदम उठा सकती है तो उन की बेटियां भी कुछ भी कर सकती हैं. रोहिणी दीदी की भी शादी हो गई.’’

‘‘रोहिणी, वह तो नकुल से शादी करना चाहती थी. वह तो उसी की बिरादरी का था?’’

‘‘अमित अंकल ने उन की एक नहीं सुनी. अंकलजी ने पास के ही शहर में उन की शादी कर दी. दीदी, जो लड़कियां अपने घरों से भाग जाती हैं वे सिर्फ अकेले नहीं भागतीं, वे भागती हैं अपनी मांओं के सुकून और संस्कार को ले कर. वे भागती हैं अपने पिता के सम्मान और परवरिश को ले कर, अपनी छोटी बहनों और आसपड़ोस की लड़कियों के अनदेखे भविष्य को ले कर. वे भागती हैं परिवार में उन के प्रति विश्वास और आजादी को ले कर, वे भागती हैं अपने भाई, परिवार और कुल की इज्जत को ले कर.

‘‘दीदी, तुम्हें याद है जब भी मां नानी के घर से लौटती थीं, तब नानी उन के आंचल में खोचा भरती थीं और उन के उज्ज्वल भविष्य की कामना करती थीं और बदले में मां भी चुटकीभर चावल अपने आंचल से निकाल कर उस घर में बिखेर देतीं. वे यह चाहती थीं कि उन के घर के साथसाथ यह घर भी आबाद रहे पर तुम इस घर से निकलीं तो इस परिवार को क्या दे कर गईं? मां को अपमान, पिता को दुनिया के आरोप और हमें लज्जा से  झुके सिर.

‘‘विपुल का क्या दोष था? वह तो इन बातों को ठीक से सम झता भी नहीं था पर वक्त ने उसे भी सम झा दिया. नन्हे विपुल के लिए राखी के धागे गले की फांस बन कर रह गए. मु झे अगर कहीं से आने में देर हो जाती है तो वह छटपटाने लगता है. जानता है, वह सब से छोटा है पर भाई तो है. मुंह से तो कुछ भी नहीं कहता पर उस की आंखें कुछ न कह कर भी बहुतकुछ कह जाती हैं.

‘‘दीदी, औरत एक नदी की तरह है. जब तक वह मर्यादा में रहती है तब तक वह खुशहाली लाती है पर जब वह मर्यादा को तोड़ती है तब हर जगह तबाही ही तबाही लाती है.’’

घर से निकलते वक्त उस ने सोचा था यह घर, गली और महल्ला हाथ पसारे उस का स्वागत करेगा पर आज वह शर्मिंदा थी. लता चुप थी, उस के पास नंदिनी की किसी भी बात का कोई जवाब नहीं था. जानती थी आज वह कुछ भी कहेगी तो उस की बातों पर कोई विश्वास नहीं करेगा. उस ने अपने साथसाथ नंदिनी और विपुल के भविष्य को भी दांव पर लगा दिया था. बाबूजी तो आज मरे थे पर जीतेजी तो वे कब के मर चुके थे. जीतेजी वे आरोप और अपमान का जहर पीते रहे. जहर का भी अपना हिसाबकिताब होता है, मरने के लिए थोड़ा सा और जीने के लिए ज्यादा पीना पड़ता है.

सलिल के साथ भागते हुए सोचा तो यही था कि वे कहीं दूर चले जाएं, दूर… इतनी दूर जहां पर दुनिया का कोई गम न हो पर आज वह दुनिया के लिए लता नहीं बल्कि भगोड़ी थी.

पर क्या सलिल के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा? क्या उस के घर और महल्ले वालों ने भी उसे माफ नहीं किया होगा? क्या उस के साथ के हमउम्र लड़कों की भी शादियां कर दी गई होंगी? क्या किसी ने सलिल के पापा को भी दुत्कारा होगा कि जब सलिल भाग कर शादी कर सकता है तब महल्ले का कोई भी लड़का ऐसा कदम उठा सकता है?

Satyakatha: प्यार और प्रौपर्टी में अंधी हुईं बहनें

सौजन्य: सत्यकथा

सोनू और ऊषा की शादी 2 सगे भाइयों अशोक और राजू के साथ हुई थी. ससुराल में दोनों ही बहनों का अलगअलग युवकों से चक्कर चलने लगा.हरियाणा के पानीपत में शहर के बीचोबीच जाटल रोड के पास एक हनुमान मंदिर है. उस के ठीक सामने दिल्ली पैरलल नहर है. बीते साल 21 दिसंबर को दिन में नहर के किनारे लोगों की भीड़ जुटी हुई थी. कारण, नहर में कहीं दूर से बहती हुई एक लाश आ रही थी.

ज्योंज्यों वह निकट आ रही थी, त्योंत्यों लोग उसे देख कर तरहतरह के अनुमान लगा रहे थे. कोई नवयुवक की लाश बता रहा था तो कोई उस के नहर में कूद कर आत्महत्या करने की आशंका जता रहा था. भीड़ में हर चेहरे पर कई सवाल उभरे हुए थे. साथ ही एक अहम सवाल था कि लाश किस की होगी?

लाश जब काफी नजदीक आई तो लोगों ने देखा कि वह किसी पुरुष की थी. उस का चेहरा काफी काला पड़ चुका था, जिस से उसे पहचानना मुश्किल था.

इस की सूचना पानीपत पुलिस को भी मिल गई थी. पुलिस मौके पर अपने साथ गोताखोरों को भी साथ ले आई. लाश बाहर निकलवाई तो देखा उस का चेहरा काफी झुलसा हुआ था. पुलिस ने चेहरा देखते ही अंदाजा लगा लिया कि यह आत्महत्या का नहीं, बल्कि हत्या का मामला है. लाश की पहचान मिटाने के लिए ही चेहरे को जला दिया गया था.

गला घोंटे जाने के निशान भी साफ नजर आ रहे थे. ये निशान बेल्ट या मोटी रस्सी के थे. लाश की एक कलाई पर अशोक और सोनू नाम का टैटू बना था.

नहर से लाश मिलने की सूचना पा कर पानीपत के पुराना औद्योगिक थाने के प्रभारी बलराज यादव भी अपने दलबल के साथ तुरंत मौके पर पहुंच गए.

उन्होंने आसपास खड़े लोगों से लाश की पहचान करवानी चाही, मगर ऐसा कोई भी नहीं था, जो उसे पहचान पाए.

जब देर तक मृतक की पहचान नहीं हो पाई तब बलराज यादव ने एसआई राजपाल सिंह को लाश का पंचनामा कर पोस्टमोर्टम के लिए भेजने के आदेश दे दिए.

पुलिस कई दिनों तक लाश की पहचान की कोशिश में लगी रही. जब कोई सफलता नहीं मिली, तब एक सामाजिक संस्था की मदद से लाश का दाह संस्कार करवा दिया गया.

पोस्टमोर्टम रिपोर्ट से पुलिस को पता चला कि युवक की हत्या बेल्ट या मोटी रस्सी से गला घोंट कर की गई थी. हत्या के बाद उस की पहचान छिपाने की नीयत से उसे जलाने की कोशिश की गई थी, जिस से उस का चेहरा झुलस गया था.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार गला घोंटने से पहले युवक के साथ मारपीट की गई थी. उस के शरीर पर अनेक घाव और कटे के निशान थे.

इस से अनुमान लगाया गया कि उसे कई लोगों ने मिल कर पीटा होगा. आशंका जताई गई कि पिटाई से अधमरा होने के बाद ही उस का गला घोंट दिया होगा.

अज्ञात लाश के दाह संस्कार के बाद एक महीना गुजर गया. पुलिस शिनाख्त की कोशिश में लगी रही. शिनाख्त के लिए पुलिस ने सोशल मीडिया पर जानकारी अपलोड कर दी थी. पहनावे और हाथ पर गुदे टैटू का हवाला देते हुए पैंफ्लेट छपवा कर चिपकवाए गए थे.

14 जनवरी, 2022 को थानाप्रभारी बलराज यादव फाइलें निपटाने में व्यस्त थे. दिन के 11 बजे थे. तभी एक  युवती थाने आई और अपना परिचय दे कर बोली, ‘‘सर, मेरा नाम सोनू है. मैं भारत नगर काबड़ी रोड के रहने वाले अशोक की पत्नी हूं. मेरा पति अशोक 19 दिसंबर, 2021 से ही लापता है. मुझे कल ही मालूम हुआ है कि उस की हत्या हो गई है.’’

यादव अचानक एक युवती की बात सुन कर चौंक पड़े. बोले, ‘‘पति की हत्या के बारे में तुम्हें कैसे पता?’’

‘‘जी हुजूर, जिस ने उसे मारा उसी ने मुझे हत्या करते हुए वीडियो दिखाया है,’’ सोनू बोली.

‘‘गजब बात है, जिस ने मारा वही कहने आया कि उस ने तुम्हारे पति को मार डाला,’’ यादव एक बार फिर चौंके.

‘‘हैरानी हो रही है न हुजूर? जब हत्यारे ने मुझे वीडियो दिखाया है, तब मैं भी हैरान हो गई थी,’’ सोनू बोली.

‘‘जिस ने हत्या की है वह तुम्हें और तुम्हारे पति को पहले से जानता था? क्या नाम है उस का?’’ यादव ने पूछा.

‘‘जी, उस का नाम दीपक है. उस की मेरे पति से पुरानी दोस्ती भी थी,’’ सोनू बोली.

‘‘तुम तो हर बात में मुझे झटके पर झटका दे रही हो. जो भी तुम्हें मालूम है, पूरी बात विस्तार से बताओ.’’ थानाप्रभारी यादव सोनू को सामने की कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए बोले. उस के बाद सोनू ने उन्हें जो कहानी सुनाई, उस में और भी कई झटके थे.

सोनू ने थानप्रभारी यादव के कहने पर अपने पति के लापता होने से ले कर उस की हत्या किए जाने की बात इस तरह से सुनाई—

32 वर्षीय अशोक पानी के भारत नगर में रहता था. उस का एक दोस्त था दीपक, जो जींद जिले में सफीदों के करसिंधु गांव का रहने वाला है.

सोनू ने बताया कि दीपक 19 दिसंबर की रात अशोक को अपने साथ ले गया था. किस काम के लिए ले गया नहीं मालूम. इस से पहले उन दोनों ने बैठ कर शराब पी थी. दीपक ने बताया कि वह थोड़ी देर में आ जाएंगे.

उस के बाद से ही अशोक का कोई पता नहीं चल रहा था. जब वह घर नहीं लौटा तो दीपक को फोन किया, लेकिन उस का फोन बंद आ रहा था. इस से घर वालों की चिंता बढ़ गई.

इस के बाद घर के सभी लोग अशोक को इधरउधर ढूंढने लगे. जब उस का कहीं पता न चला तो थकहार कर उन्होंने सोचा कहीं यूं ही कहीं चला गया होगा. लेकिन चिंता हो रही थी कि वह बगैर बताए कहां जा सकता है?

उस के 3-4 सप्ताह बाद दीपक 13 जनवरी को सोनू के घर आया. जब सोनू ने उस से कहा कि जिस दिन से अशोक तुम्हारे साथ गया, आज तक नहीं लौटा है. यह सुनते ही वह भड़क गया और सोनू से झगड़ना शुरू कर दिया.

गालीगलौज करने लगा. बात इतनी बढ़ गई कि हाथापाई की नौबत आ गई. गालीगलौज करते हुए एक झटके में उस के मुंह से निकल गया कि उस ने अशोक का काम तमाम कर दिया है.

यह सुन कर सोनू एकदम से अवाक रह गई. उसे उस की बातों पर पहले तो विश्वास नहीं हुआ, लेकिन उस ने जब अशोक की हत्या के सबूत दिखाए तो वह एकदम से पत्थर बन गई. इस के बाद सोनू की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे.

सोनू को एक तरफ पति अशोक की मौत का गहरा सदमा लगा था, तो वहीं दूसरी तरफ वह गुस्से से पागल हुए जा रही थी. पति का हत्यारा उस के सामने ही था और उसे भी जान से मारने की धमकी दे रहा था. उस ने यह भी कहा कि उसे यहां आने से कोई रोक नहीं सकता. अगर किसी ने रोका तो वह उस का भी वही हाल करेगा, जो अशोक का किया है.

सोनू ने बताया कि दीपक उस की देवरानी ऊषा से प्यार करता है. वह उस से शादी करना चाहता है. ऊषा रिश्ते में उस की छोटी बहन भी है. दोनों बहनों की शादी एक ही घर में 2 भाइयों से हुई थी. अशोक का छोटा भाई राजू उस की छोटी बहन का पति है.

सोनू ने थानाप्रभारी को आगे बताया कि दीपक ने उस की बहन को अपने प्रेमजाल में फंसा लिया है. अशोक को इस बात की जानकारी हो गई थी. इस का उस ने मेरे सामने ही विरोध करते हुए दीपक को समझाया था.

अशोक ने दीपक से यह भी कहा था कि ऐसा करने से राजू और ऊषा की जिंदगी तबाह हो जाएगी. उन का बसाबसाया घर उजड़ जाएगा. अशोक ने दीपक को इतना तक कहा था कि इस से उन दोनों की दोस्ती पर भी असर पड़ेगा, पर दीपक ने ऊषा से मिलना नहीं छोड़ा.

सोनू अपने दिल की बात धाराप्रवाह बोले जा रही थी. बीच में ही थानाप्रभारी यादव ने टोकते हुए पूछा, ‘‘दीपक ने अशोक की हत्या का तुम्हें क्या सबूत दिया?’’

‘‘दिया नहीं साहबजी, मुझे उस की हत्या करते हुए वीडियो दिखाया. अशोक को मारते हुए उस के मोबाइल में वीडियो था,’’ सोनू बोली.

‘‘वीडियो तुम्हारे पास है?’’ यादव ने पूछा.

‘‘नहीं, वह तो उसी के मोबाइल में है. दीपक ने बताया कि उस ने अशोक की गला घोंट कर हत्या करने के बाद उस की लाश नहर में फेंक दी थी.’’

अशोक की लाश के नहर में फेंकने की बात सुन कर थानाप्रभारी बलराज यादव एक बार फिर चौंक गए. क्योंकि उन्होंने 3 हफ्ते पहले ही नहर से झुलसे हुए चेहरे वाली एक अज्ञात लाश बरामद की थी.

उन्होंने अपनी दराज से एक लिफाफा निकाल कर उस में से कुछ तसवीरें सोनू के सामने फैला दीं और पूछा, ‘‘इसे पहचानती हो?’’

सोनू उन तसवीरों को हाथों में ले कर गौर से निहारने लगी. कुछ देर बाद बोली, ‘‘लगता तो अशोक की ही लाश है. जिस दिन घर से निकला था उस दिन वैसे ही कपड़े पहने हुए था, जैसा इस में दिख रहा है.’’

‘‘वीडियो में ऐसा कोई सीन दिखाई दिया था, जिस में उस का चेहरा जलाने जैसी बात हो?’’ यादव ने पूछा.

‘‘हां, उस के चेहरे पर कुछ डालते हुए दिख रहा था,’’ सोनू बोली.

‘‘अशोक से दीपक का कोई पुराना झगड़ा या किसी तरह का विवाद हुआ हो तो बताओ,’’ यादव बोले.

‘‘झगड़ा तो हुआ था. बात थाने तक जा पहुंची थी, लेकिन बाद में थाने में सुलह हो गई थी,’’ सोनू ने बताया.

‘‘और कोई बात बताओ.’’

‘‘…और तो अशोक के मन में दीपक का मेरी बहन के साथ प्रेम संबंध को ले कर ही तकलीफ थी. उसे जरा भी नहीं पसंद था कि उस के भाई की पत्नी किसी गैर मर्द के साथ संबंध बनाए,’’ सोनू बोली.

‘‘झगड़े वाली बात कब की है?’’

‘‘दीपक का अशोक के साथ झगड़ा पिछले साल जून महीने में ही हुआ था. ठीक से तारीख याद नहीं है. दोनों के बीच मारपीट तक हो गई थी. इस की शिकायत अशोक ने  मौडल टाउन थाने में की थी.

‘‘उस के बाद दीपक अशोक के साथ दुश्मनी की भावना रखने लगा था, लेकिन शिकायत दर्ज होने के कुछ दिन बाद ही वह फिर अशोक का दोस्त बन गया था.

‘‘इस बात को ले कर सोनू ने अपने पति का विरोध भी किया था, मगर अशोक ने कहा था कि उस ने दीपक को माफ कर दिया है. उस के बाद दोनों अकसर साथ बैठ कर शराब भी पीते थे.’’

सोनू की बातें सुनने के बाद थनाप्रभारी यादव ने सोनू को थाने से घर भेज दिया और कह दिया कि जरूरत होने पर उसे बाद में बुलाया जाएगा, इसलिए शहर से कहीं और नहीं जाए.

जातेजाते सोनू बोलती गई कि उस की जान को दीपक से खतरा है. क्योंकि उस ने उसे भी मारने की धमकी दी है. बलराज यादव ने सोनू की बातों को गौर से सुना. उस के जाने के बाद थानाप्रभारी ने एसआई राजपाल सिंह के साथ मिल कर इस केस के संबंध में विचारविमर्श किया, तब सोनू की कहानी से कई सवाल भी खड़े हो गए.

राजपाल सिंह ने थानाप्रभारी से कहा कि अगर अशोक 19 दिसंबर, 2021 में ही लापता हुआ था तो उस की गुमशुदगी की सूचना अभी तक किसी ने क्यों नहीं लिखवाई? अगर दीपक ने अशोक की हत्या की है तो उस ने यह राज 25 दिन बाद आ कर उस की ही पत्नी सोनू के सामने क्यों खोला? उसे हत्या का वीडियो क्यों दिखाया? इस के पीछे उस की मंशा क्या थी? ऐसा कर के उस ने खुद के पैर पर कुल्हाड़ी क्यों मार ली?

इस पर थानाप्रभारी यादव ने कहा कि इन सवालों के जवाब अब दीपक से ही मिलेगा. इसलिए उसे जल्द से जल्द हिरासत में लिया जाना जरूरी है.

इसी के साथ थानाप्रभारी यादव ने एसआई राजपाल सिंह के नेतृत्व में तुरंत एक टीम बनाई और उसे दीपक के घर भेज दिया. दीपक अपने घर पर ही मिल गया. पुलिस उसे थाने ले आई.

थाने में सब से पहले उस का मोबाइल फोन चैक किया गया. उस में अशोक की हत्या का वीडियो आसानी से तुरंत मिल गया. उस वीडियो में साफसाफ दिख रहा था कि दीपक पहले अशोक को नहर किनारे ले गया. नहर किनारे 2 युवक पहले से ही बैठे शराब पी रहे थे. दीपक ने अशोक को भी शराब पीने को कहा, मगर अशोक ने मना कर दिया. उस के बाद दीपक ने उस से शराब पीने की जबरदस्ती की.

अशोक दीपक की जबरदस्ती का विरोध करते हुए दिखा. अशोक बोल रहा था कि उसे घर जाना है. उस के बच्चे उस का इंतजार कर रहे होंगे. फिर भी किसी तरह दीपक ने अशोक को शराब पिला दी.

उस के बाद दीपक के पास एक युवक आया. उन के आने पर दीपक ने अशोक के गले में अचानक अपने पैंट की बेल्ट डाल दी और पीछे की ओर घसीट लिया. एक युवक उस के साथ मारपीट करने लगा.

मारपीट के दौरान अशोक के मुंह से खून बहने लगा. उस वक्त रात हो चुकी थी. वीडियो पर दिखने वाले टाइम के अनुसार 11 बजे के बाद का समय था.

वीडियो में उस की बेरहमी से पिटाई करने का सीन आ गया था. वीडियो अस्थिर था. थोड़ी देर में मृत अशोक की मौत का सीन दिखा. मौत हो जाने के बाद हत्यारों ने बाइक से पैट्रोल निकाल कर उस के चेहरे पर डाल दिया.

यह सीन काफी स्पष्ट था, लेकिन इस काम को करने वाले का चेहरा नहीं दिख रहा था. जलता हुआ, फिर काफी झुलसा हुआ चेहरा ही दिखाई दिया था. बाद में शव को 2-3 लोगों ने मिल कर नहर में ले जा कर फेंक दिया था.

इस वीडियो को देखने के बाद पुलिस ने दीपक की गिरफ्तारी की औपचारिकताएं पूरी कर सीधे लौकअप में डाल दिया.

कुछ समय बाद उस से जब पूछताछ की, तब बेहद चौंकाने वाली कहानी का रहस्योद्घाटन हुआ. ऐसी कहानी सामने आई, जो सोनू द्वारा बताई गई कहानी से बिलकुल ही उलट थी.

उस में अपना बचाव करते हुए एकदूसरे को फंसाने की साजिश, प्रेम प्रसंग और संपत्ति हासिल करने का लालच भी शमिल था.

दीपक ने बताया कि यह सच है कि अशोक की हत्या में उस का और उस के साथियों का हाथ है, जैसा वीडियो में दिख रहा है, लेकिन ऐसा उस ने अशोक की पत्नी सोनू और उस की बहन ऊषा के कहने पर ही किया था. अब ये दोनों बहनें उसे ही फंसाने की कोशिश कर रही हैं. इस तरह से अशोक मर्डर की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार है—

दीपक का मुंह खुलने के बाद दोनों बहनों की खौफनाक साजिश भी उजागर हो गई थी. पुलिस ने आननफानन में सोनू और ऊषा को भी गिरफ्तार कर लिया. उन के साथ ही दीपक और उन के दोस्तों को भी गिरफ्तार कर लिया गया, जो अशोक की हत्या में शामिल थे.

दरअसल, हत्या का यह पूरा मामला जमीनजायदाद और नाजायज संबंधों से जुड़ा हुआ था. दोनों बहनें सोनू और ऊषा की शादी एक ही घर में 2 भाइयों अशोक और राजू से हुई थी. दोनों भाइयों के नाम एक एक आवासीय प्लौट और कुछ अन्य प्रौपर्टी थी. अशोक की पत्नी सोनू चाहती थी कि वह उस प्लौट को बेच दे. लेकिन अशोक इस के लिए तैयार नहीं था.

उस के बाद दोनों बहनों ने मिल कर तय किया कि वे अशोक को रास्ते से हटा देंगी. उन्होंने अशोक और राजू के खास दोस्त दीपक से इस बारे में बात की. दीपक के नाजायज संबंध राजू की पत्नी ऊषा से थे. वह ऊषा के हुस्न का दीवाना था.

इस का फायदा उठाते हुए दोनों बहनों ने अशोक को मरवाने के लिए दीपक को अपने प्लान में शामिल कर लिया. बदले में ऊषा ने दीपक को भरोसा दिलाया कि अशोक की मौत के बाद वह उस से शादी कर लेगी और सोनू छोटे भाई से शादी कर लेगी. इस तरह से अशोक के हिस्से की संपत्ति उन्हें हाथ लग जाएगी.

ऊषा का दीवाना दीपक शादी और अशोक के हिस्से की जायदाद मिलने के लालच में हत्या के लिए राजी हो गया. उस ने इस काम के लिए अपने 2 अन्य दोस्तों सोमबीर और अजीत को भी तैयार कर लिया.

अशोक को मारने की पूरी प्लानिंग सोनू और ऊषा ने बनाई थी. प्लान के मुताबिक दीपक को शराब पार्टी का बहाना बना कर अशोक को घर से ले जाना था. वहीं उसे शराब के नशे में मार डालना था. उस के घर नहीं लौटने पर सोनू को रोनेधोने और पति को ढूंढने का नाटक करना था.

किंतु सोनू और ऊषा चाहती थीं कि अशोक की हत्या का प्रमाण भी मिले. इस के लिए उन्होंने दीपक से अशोक की हत्या का वीडियो बनाने के लिए भी कहा था. सब कुछ तय योजना के मुताबिक हुआ. दीपक ने दोनों बहनों के इशारे पर हत्या भी की और उस का पूरा वीडियो भी बनवाया.

अशोक की हत्या के बाद दीपक ऊषा पर शादी का दबाव बनाने लगा. मगर ऊषा अपने पति राजू के होते उस से शादी कैसे करती? राजू को इस बात की भनक भी नहीं लगी थी और घर के दूसरे सदस्य अशोक के लापता होने को ले कर परेशान भी थे.

ऊषा के मन में यह भी खयाल आया कि अशोक के मरने के बाद उस प्लौट और प्रौपर्टी पर राजू का हक खुदबखुद बन गया था. ऊषा को यह भी मालूम था कि वह किसी भी कीमत पर प्लौट न तो बेचेगा और न ही किसी को बेचने देगा.

कुल मिला कर बात घूमफिर कर वहीं आ गई, जो पहले थी. अशोक की हत्या के बाद भी दीपक के हाथ कुछ नहीं आया. इस का मलाल दोनों बहनों को भी हुआ. उस के बाद  सोनू और ऊषा ने दीपक से राजू को भी खत्म करने के लिए कहा. यह विचार मन में आने पर धनसंपत्ति के लालच में वे भूल गईं कि दोनों ब्याहता हैं. एक की मौत तो हो चुकी है, दूसरे की मौत के बाद उन का भविष्य क्या होगा?

दूसरी तरफ दीपक भी दोनों बहनों का नया प्रस्ताव सुन कर काफी परेशान हो गया. वह पहले से ही एक की हत्या कर डरा हुआ था और अब वह दूसरी हत्या के लिए उकसाया गया था.

सच तो यही था कि वह दूसरी हत्या नहीं करना चाहता था. इस कारण उस ने साफ इनकार कर दिया. यही नहीं, उस ने सोनू और ऊषा को धमकाया भी कि अगर ऊषा ने उस से शादी नहीं की तो वह जा कर पुलिस को सारी बातें बता देगा.

दीपक की इस धमकी से सोनू और ऊषा डर गईं. इस खतरे के बारे में तो उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था. अगर दीपक ने पुलिस के सामने कुछ बोल दिया तो पुलिस सोनू और ऊषा को दबोच लेगी. इसलिए उन्होंने एक प्लान बनाया. इस से पहले कि दीपक उन्हें फंसाए, दोनों बहनों ने ही दीपक को पुलिस के हवाले करने की योजना बनाई.

योजना के अनुसार ही सोनू ने अपने पति के लापता होने और उस की हत्या के सबूत के बारे में जानकारी दी. अशोक की हत्या की कहानी सुना कर दीपक को उस का हत्यारा बताया.

दोनों बहनों की चाल एक बार फिर उलटी पड़ गई. अशोक मर्डर के मामले में उस का हत्यारा खुद कानून के शिकंजे में आ गया. साथ ही साजिशकर्ता बहनें भी पकड़ में आ गईं.

दोनों बहनों के खिलाफ भी साजिश रचने की धाराएं लगा कर आपराधिक मुकदमा दर्ज कर लिया गया. दीपक के मुंह खोलने से दोनों बहनों को भी हत्या के मामले में जेल जाना पड़ा और अशोक के बेगुनाह भाई राजू की जिंदगी बालबाल बच गई.

मूलरूप से करनाल के दाहा बछिदा का निवासी अशोक पानीपत के भारत नगर में रहता था. 3 भाइयों में वह सब से छोटा था. अशोक के परिवार में बड़ा भाई बिजेंद्र, मंझला राजू, बेटा रवि, बेटी अंजलि व बेटा ईशू हैं. पिता अशोक की हत्या और मां सोनू के जेल चले जाने के बाद तीनों बच्चे अब अकेले पड़ गए हैं.

5 साल पहले राजू जिस फैक्ट्री में काम करता था, उसी फैक्ट्री में करसिंधू निवासी दीपक भी मालिक का ड्राइवर था. दोनों की दोस्ती हुई और दीपक राजू के घर आनेजाने लगा. यहां उस की अशोक से भी दोस्ती हो गई.

दीपक की नजर जब राजू की पत्नी ऊषा पर पड़ी तो वह उस का दीवाना हो गया. राजू की गैरमौजूदगी में वह ऊषा से मिलने आने लगा और जल्दी ही दोनों का रिश्ता काफी करीब होता चला गया.

दूसरी ओर अशोक की पत्नी सोनू के भी किसी अन्य युवक के साथ अवैध संबंध थे. इन दोनों बहनों की नजर अशोक के एक प्लौट पर थी.

इस मामले की तेजी से जांच करने और निपटाने में पुराना औद्योगिक थाने के थानाप्रभारी बलराज यादव समेत एसआई राजपाल सिंह, बंसीलाल, एएसआई सुरेंद्र और हैडकांस्टेबल टिंकू की भूमिका सराहनीय रही.

हत्या से जुड़े सभी सबूतों और गवाहों के बयानों को दर्ज कर मामले को इतना मजबूत बना दिया गया कि आरोपियों का कानून के शिकंजे से बच पाना मुश्किल हो जाए. आरोपियों ने वारदात में इस्तेमाल बेल्ट को नहर में फेंक दिया था. वह कथा लिखे जाने तक बरामद नहीं हो पाई थी.

हत्यारोपी दीपक, जोशी गांव के अजीत और सोमबीर की निशानदेही पर पुलिस ने वारदात में इस्तेमाल बाइक व 3 मोबाइल फोन बरामद कर लिए गए. सभी आरोपियों ने अपना जुर्म भी कुबूल लिया. पुलिस ने सभी आरोपियों को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मेरी एक्स गर्लफ्रेंड सेक्स करना चाहती है, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं सरकारी सेवा में हूं, शादीशुदा हूं और 2 बच्चों का पिता हूं. शादी से पहले मेरी गर्लफ्रैंड थी जिस से मेरा फिजिकल रिलेशन भी था. गर्लफ्रैंड की शादी हुए 8 साल हो चुके हैं. लेकिन उस का कोई बच्चा नहीं हुआ. उस ने चैकअप करवाया तो पता चला कि कमी उस के पति में है. वह अब मु?ो बारबार फोन करती है और चाहती है कि मैं उस से फिजिकल रिलेशन बना कर उसे प्रैग्नैंट कर दूं. वह कहती है कि पति के साथ सैक्स तो होता ही है. क्या पता चलेगा कि वह प्रैंग्नैंट मुझसे हुई है, क्योंकि अभी उस के पति को अपनी मैडिकल रिपोर्ट के बारे में कुछ पता नहीं है. आप ही बताएं, क्या करूं? बड़ी उलझन में फंस गया हूं.

जवाब

हम भी नहीं चाहते कि आप किसी मुसीबत में पड़ें. जितना आसान आप की गर्लफ्रैंड को लग रहा है, उतना आसान है नहीं. बात कभी भी खुल सकती है. आप की अपनी अच्छीखासी गृहस्थी है, क्यों उसे तबाह करना चाहते हैं. देरसवेर आप की पत्नी को यह बात पता चल गई तो वह आप को कभी माफ नहीं करेगी.

आप एक बार सोच कर देखिए कि आप को पता चले कि आप की पत्नी किसी गैरपुरुष के साथ संबंध बना कर आई है तो आप को यह गवारा होगा? नहीं न. तो फिर आप कैसे सोच सकते हैं कि अपनी गर्लफ्रैंड के साथ शादीशुदा हो कर शारीरिक संबंध बनाएं. चाहे आप का मकसद सिर्फ अपनी गर्लफ्रैंड की मदद करने का हो लेकिन यह बिलकुल भी नैतिक नहीं.

आजकल बहुत सी मैडिकल तकनीकें आ गई हैं जिन से आप की गर्लफ्रैंड मां बन सकती है लेकिन उस में उस के पति की रजामंदी होगी. आप इस सब पचड़े में मत पड़ें, बेहतर यही है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

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रणवीर सिंह के न्यूड फोटो: आखिर इतना हंगामा क्यों है बरपा ?

2010 में ‘यशराज फिल्मस’’ की फिल्म ‘‘बैंड बाजा बारात’’ से अभिनय कैरियर की शुरूआत करने वाले रणवीर सिंह फिल्मी परदे पर ही नहीं बल्कि निजी जीवन में भी हरफन मौला व मस्तमौला ही नजर आते हैं. मैं अपने 40 वर्ष के फिल्म पत्रकारिता के कैरियर में रणवीर सिंह जैसा सुलझे और विनम्र इंसान कलाकार से नहीं मिला. मुझे अच्छी तरह से याद है, जब एक बार फिल्म के पी आर ओ की गलती के लिए भी रणवीर सिंह ने खुद मुझसे माफी मांगी थी. वह हमेशा अपनेपन के भाव से मिलते रहे हैं.लेकिन कोविड के बाद ‘83’ और ‘जयेशभाई जोरदार’ के बाक्स आफिस पर बुरी तरह से पिटने के बाद रणवीर सिंह इन दिनों एक सिंगापुर की पत्रिका के लिए ‘न्यूड फोटो’/नग्न तस्वीरें खिंचवाने को लेकर सूर्खियों में है. मीडिया के अनुसार सिंगापुर की पत्रिका के लिए फोटोग्राफर आशीष शाह ने रणवीर सिंह की नग्न तस्वीरे मुंबई के महबूब स्टूडियो में महज तीन घंटे के अंदर खींची और इस बात का पूरा ख्याल रखा कि यह सभी तस्वीरें कलात्मक हों.

मगर कुछ लोगों की राय में अब रणवीर सिंह अपनी असफलता को पचा नहीं पा रहे हैं. तो कुछ लोग मानते हैं कि अपनी असफलता से हर किसी का, खासकर अपने प्रशंसकों का ध्यान हटाने के लिए एक नया शगूफा रचते हुए रणवीर सिंह ने ‘न्यूड फोटो सेशन’ करवाकर उसकी फोटो सोषल मीडिया पर वायरल कर दी. जबकि रणवीर सिंह कैंप ने चिल्लाना शुरू कर दिया कि यह रणवीर सिंह जैसा साहसी कलाकार ही कर सकता है.मतलब यह कि बौलीवुड के कई कलाकार और टीवी इंडस्ट्री से जुड़े कई कलाकार आगे बढ़कर रणवीर सिंह की प्रशंसा मे कसीदें पढ़ते नजर आ रहे हैं.

मतलब बौलीवुड में जितने कैंप उतने तरह की बातें हो रही हैं.तो वहीं धर्म आदि को लेकर असहि-ुनवजयणु हो रहे भारत में रणवीर सिंह के इस कृत्य को कुछ अलग नजरिए से देखा जा रहा है. इसी वजह से मुंबई की एक एनजीओ से जुड़े भाजपा नेता अखिलेश चौबे ने रणवीर सिंह के इस कृत्य के खिलाफ आईपीसी की धाराओं 292,293, 509 व आईटीएक्ट 67 ए के तहत एफआई आर दर्ज करा दी है. तो वहीं मुजफ्फरपुर,बिहार के सामाजिक कार्यकर्ता एम राजू नैय्यर ने स्थानीय कोर्ट में रणवीर के खिलाफ भावनाओं को ठेस पहुंचाने और महिलाओं की मर्यादा के अपमान करने की शिकायत दर्ज करवाई. सूत्रों की माने तो राजू के वकील मनोज कुमार ने बताया कि अदालत पांच अगस्त को इस मामले पर सुनवाई करेगी.

मगर अहम सवाल है कि रणवीर सिंह के इस कृत्य से किसे नुकसान हुआ?अभिनेता रणवीर सिंह ने अपने कपड़े उतारें हैं.किसी को पैसे या धमकी देकर उसके कपड़े नहीं उतरवाए हैं.यदि रणवीर सिंह की इन ‘नग्न तस्वीरे’ पर गौर फरमाया जाए तो इसमें न अश्लीलता है और न ही यह असामाजिक. कृत्य है. रणवीर सिंह के न्यूड फोटो में उनके गुप्तांग व अति नाजुक अंग छिपे हुए हैं.जिन अंगों को सेक्स क प्रतीक माना जाता है, वह किसी भी तस्वीर में नजर नही आते. जब कुंभ मेले या कुंभ स्नान में सभी नागा साधु पूरी तरह से नग्न और अपने ‘गुप्तांगो’ का प्रदर्शन करते हुए सड़क पर आम लोगों के बीच से गुजरते हैं,तब तो उन पर अश्लीलता फैलाने या महिलाओं की भावनाएं आहत करने का आरोप नहीं लगता.,

क्या रणवीर सिंह ने अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर या इंटरनेट पर किसी भी इंसान से कपड़े उतारने का आव्हान किया है? क्या उन्होंने इन तस्वीरों को बीस व-साल से छोटे बच्चों को अपनी यह तस्वीरें बेची हैं? ऐसा कुछ भी नहीं है.रणवीर की इन नग्न तस्वीरों में किसी भी कोण से कामुकता नही उभरती,जिससे लोगों की सेक्स भावना भड़के.रणवीर सिंह ने पुरूष या महिला किसी से उनका कोई हक भी नही छीना. यदि इस कृत्य से रणवीर सिंह को सिंगापुरकी पत्रिका से धनराशि मिली है, तो वह भी गुनाह नही है. हमारा संविधान हर इंसान को अपनी सोच, समझ, ज्ञान व ताकत के अनुसार काम कर धन कमाने का हक देता है.

क्या हम इस बात से इंकार कर सकते हैं कि भारत जैसे देश में हर फैशन शो में हिस्सा लेने वाला मॉडल,फिर चाहे व पुरूष हो या महिलाए, सभी अति कामुक प्रदर्शन करते नजर आते है और वहां मौजूद हर शख्स तालियां बजाता है. तो यह दोहरा मापदंड नही है?जबकि रणवीर सिंह की तस्वीरों में कामुकता नही है.

इन नग्न तस्वीरों में रणवीर सिंह को एक कालीन और गुलाब की पंखुड़ियों के बिस्तर पर लेटे हुए देखा गया है. कुछ श्वेतृश्याम तस्वीरों में रणवीर सिंह काले रंग की पोशाक पहने हुए मूर्तियों की मुद्रा में प्रहार करते नजर आते हैं, जैसे कि प्राचीन भारतीय मूर्तिकला से प्रेरणा ले रहे हों. मगर हर तस्वीर कलात्मक है और वह अंग छिपे हुए हैं, जिन्हें छिपाने के लिए ही मूलतः लोग कपड़े पहनते हैं.तभी तो उनकी इन तस्वीरों को उनके इंस्टाग्राम पेज पर 25 लाख से भी अधिक बार पसंद किया जा चुका है.

हकीकत में इन नग्न तस्वीरों में भी रणवीर सिंह को गहन मनोदशा में दिखाया गया है. यह उसी तरह से है, जैसे उसने कुछ कलात्मक बनाने के विचार के लिए खुद का आत्मसमर्पण कर दिया हो. वास्तव में रावीर सिंह ने इस कृत्य से अमरीकी सेक्स सिंबल बर्ट रेनॉल्ड्स के रिकार्ड को तोड़ते हुए इस धारणा को भी तोड़ा है कि सिर्फ पुरूष वर्ग महिलाओं की नगन तस्वीरे देखने का इच्छुक होता है. इतना ही नही रणवीर सिहं के ‘न्यूड फोटो सेशन’/नग्न तस्वीर खिंचवाने के घटनाक्रम को सम-हजयने के लिए लोगो को रणवीर सिंह व उनके व्यक्तित्व को भी समझना होगा.

न्यूड मूज और न्यूड मॉडल का रहा है चलन

भारत ही नहीं पूरे विश्व में ‘न्यूड मूज’ का चलन रहा है.लगभग हर बड़े पेंटर ने न्यूड फोटो पेंटिंग्स बनायी हैं और यह पेंटर तस्वीरों को कागज पर उतारते समय अपने सामने नग्न महिला या नग्न पुरूष को बैठाते रहे हैं,जिन्हे ‘न्यूड म्यूज’ की ‘न्यूड मंडल’ की संज्ञा दी जाती रही हैं. उन पर कभी अश्लीलता का आरोप नहीं लगा. क्योंकि इसे ‘कला’ का एक फार्म माना जाता है.इसी तरह कुछ फोटोग्राफर भी न्यूड माडल को सामने बैठाकर न्यूड फोटो खींचते हैं

नग्न तस्वीरों के पीछे की सोच

2010 में फिल्म ‘बैंड बाजा बारात’’ से बौलीवुड में कदम रखने वाले अभिनेता रणवीर सिंह कभी भी प्रयोग करने से नहीं कतराते. वह अपने किरदार के पहनावे से लेकर फिल्मो से जुड़े विविध कार्यक्रमों का हिस्सा बनते समय भी अक्सर अजीबो गरीब पोषाक पहनते रहे हैं. हालिया प्रदर्षित असफल फिल्म ‘‘जयेशभाई जोरदार’’ के ट्रेलर लांच फंक्शन में वह अजीबो गरीब तरह का पायजमा व कुर्ता पहनकर पहुंचे थे.पायजामा का नाड़ा लटकता नजर आ रहा था.

तो वहीं फिल्म ‘‘लाइगर’’ के ट्रेलर लांच के अवसर पर स्पेशल मेहमान की

हैसियत से रणवीर सिंह जिस तरह की पोषाक पहनकर पहुंचे और स्टेज पर जिस तरह की हरकतें की,वह हर कलाकार के वष की बात नहीं है. मगर रणवीर सिंह खुद को हरफनमौला व मस्त मौला इंसान व कलाकार मानते हैं.

आत्मविश्वासी रणवीर सिंह अपनी कामुकता को लेकर सदैव सहज रहे हैं.अपनी -रु39याादी के दौरान वह एक खूबसूरत अनारकली पोषाक में खु-रु39याी से -हजयूम उठे थे,उसमें उनकी खूबसूरत दुल्हन व अभिनेत्री दीपिका पादुकोण भी दिखीं थीं.तो वहीं ‘कॉफी विद करण’ के नए सीजन के शुरूआती एपिसोड में उन्होंने सह कलाकार आलिया भट्ट के साथ जिस तरह से चंचल व नाटकीय नजर आए थे, उसे देखकर भी कुछ लोगो ने कहा था कि वह तेजी से ब-सजय़ते असहि-ुनवजयणु भारतीय समाज की हैकिंग कर रहे हैं.

नग्न तस्वीरें खिंचवाना किसी भी इंसान के लिए कभी भी सहज कार्य नहीं हो सकता. हर इंसान अपने षरीर को लेकर काफी चैकन्ना रहता है.दूसरों के सामने अपने शरीर को सुडौल बनाए रखने के लिए वह कई तरह के कर्म करता है.

अपने शरीर की कमियों को छिपाने वाली पोषाकें पहनना पसंद करता है.कोई भी इंसान अपने शरीर के कपड़े परिवार के सदस्यों के सामने भी निकालने में हिचकिचाता है.ऐसे में पूर्ण नग्न होकर तस्वीरें खिंचवाना कभी भी सहज या आसान काम नही माना जा सकता.इतना ही नही धर्म जनित सोच के कारण भेड़चाल में चलना कोई अद्भुत बात नहीं है. अद्भुत तो अलग रास्ता अपनाना है. और अभिनेता रणवीर सिंह ने उस अद्भुत राह को अपनाने के साथ ही समाज को चुनौती देने का साहस भी दिखाया है.और उनके इस साहस की खुले मन से सराहा जाना चाहिए.

सिंगापुर की पत्रिका के लिए अभिनेता रणवीर सिंह की इन नग्न /न्यूड तस्वीरें खींचने वाले फोटोग्राफर आ-रु39याी-ुनवजया -रु39यााह ने फोटो-रु39याूट करने का अपना अनुभव कुछ अंग्रेजी के अखबारों के साथ साझा किया है. उन्होंने खुलासा किया कि रणवीर सिंह के ही कहने पर उन्होंने यह लगभग तीन घंटे के अंदर खींचे थे. और वह -रु39याुरू से ही एक-ंउचयदूसरे के साथ सहज थे. आषी-ुनवजया षाह ने कहा है-ंउचय“रणवीर -रु39यार्मीले नहीं हैं.हमारे बीच एक दूसरे के लिए बड़ा और स्वस्थ आपसी सम्मान था.मु-हजये लगता है कि वह मेरे काम से परिचित थे.

ईमानदारी से कहूं तो मैं किसी सेलेब्रिटी को तब तक शूट करना पसंद नहीं करता,जब तक कि हम दोनों एक-दूसरे के बारे में सुनिश्ति न हों.रणवीर अपनीबॉडी को लेकर काफी कंफर्टेबल थे.यह बहुत अच्छा था कि रणवीर जैसा बहुमुखी अभिनेता मुझे अपनी दृ-िुनवजयट के अनुरूप -रु39याूटिंग करने की अनुमति दे रहा था.जब सेलिब्रिटी की बात आती है,तो अक्सर यह सब सेलिब्रिटी के बारे में होता है.जब आप उनके आस-पास होते हैं तो एक निशिचत तरीका होता है कि आपको होना चाहिए.लेकिन जब मैं रणवीर के साथ था तो ऐसा नहीं था.हमने वास्तव में रणवीर सिंह के साथ उनके द्वारा अभिनीत फिल्मों के बारे में भी बातकी.हमने जो भी किया,उसमें कहीं कोई अष्लीलता नही है.मगर हमारे देष का

एक वर्ग हमेशा हर बात पर उंगली उठाता ही है.’’

नग्न तस्वीर खिंचवाने का निर्णय आनन फानन में किया गया कृत्य नहीं

रणवीर सिंह की आलोचना कर रहे लोगों को पता होना चाहिए कि रणवीर सिंह के लिए इस कदम को उठाना आसान कदापि नही रहा होगा.इसकी कई वजहें हैं.पहली बात तो उन्हे पता है कि यदि यह ‘अष्लील’ हुआ,तो उन्हे ही सबसे अधिक आर्थिक नुकसान होगा. उनके पास जितने ब्रांड हैं,जिनसे उन्हे हर वर्ष कई करोड़ की कमायी होती है, वह सारे ब्रांड उनके हाथ से छिन जाएंगे.

कटु सत्य यह है कि कोई भी इंसान कभी भी आर्थिक नुकसान नहीं उठाना चाहता. इसके अलावा रणवीर सिंह ‘यषराज फिल्मस’ के टैलेंट मनेजमेंट का हिस्सा हैं.ऐसे में उन्हें अपने इस कदम को लेकर ‘यशराज फिल्मस’ के टैलेंट मैनेजमेंट से जुड़े लोगों व ‘यशराज फिल्मस’ के कर्ताधर्ता आदित्य चोपड़ा को भी विश्वास में लेना पड़ा होगा. कहने का अर्थ यह कि ‘नग्न’ फोटो खिंचवाने से यदि किसी को नुकसान होना है,तो सिर्फ अकेले रणवीर सिंह को ही होना है.मगर उन्होने इस चुनौती को स्वीकार किया.रणवीर सिंह को भी इस बात का अहसास रहा होगा कि इस वक्त दो का मूड़ जिस तरह का है,उसके चलते कई लोग उनके खिलाफ खड़े हो जाएंगे.इसके बावजूद रणवीर सिंह ने समाज को चुनौती दी.जब हम यह मानते हैं कि हर इंसान को अपनी पसंद की पोषाक पहनने का हक है तो हर इंसान का यह अपना निजी मसला है कि वह अपने शरीर के कपड़े उतारे या न उतारे. महज शरीर के कपड़े उतारने में कोई अष्लीलता नही है. एक इंसान उपर से नीचे कपड़ों से सजयंका रहकर भी अपनी हरकतों से अष्लीलता को परोस सकता है.

नग्न तस्वीरें: रणवीर ने तोड़ा पचास साल पहले का अमरीकी सेक्स सिम्बॉल बर्ट रेनॉल्ड्स का रिकार्ड

सिंगापुर की पत्रिका के लिए नग्न तस्वीरें खिंचवाकर रणवीर सिंह ने कुछ भी नया नहीं किया है. बल्कि उन्होंने अमरीकी सेक्स सिम्बॉल बर्ट रेनॉल्ड्स के रिकार्ड को तोड़ा है. जी हां! लगभग आधी सदी पहले कॉस्मोपॉलिटन पत्रिका के अप्रैल 1972 के अंक के अंदर मध्य पृ-ुनवजयठ के लिए अमरीकी सेक्स सिंबल बर्ट रेनॉल्ड्स ने नग्न तस्वीर खिंचवाई थी. उस वक्त पत्रिका के तत्कालीन संपादक हेलेन गुरली ब्राउन ने बर्ट रेनॉल्ड्स की नग्न तस्वीरों को पत्रिका के अंदर के मध्य पृ-ुनवजयठों /सेंट्ल स्पे्रड में छापने का निर्णय इस प्रचलित धारणा को तोड़ने के लिए लिया था कि केवल पुरु-ुनवजया, महिलाओं के नग्न -रु39यारीर की तस्वीरें देखना चाहते हैं.इस तरह की धारणा ने महिलाओं की इच्छा को दरकिनार कर दिया और पुरु-ुनवजयावादी दृ-िुनवजयट से परे नहीं गई. उन्होंने संदेश दिया था कि महिलाएं भी पुरूष के नग्न षरीर को देखना पसंद करती हैं. अमरीकी सेक्स सिंबल बर्ट रेनॉल्ड्स ने तो पत्रिका के अंदर के पृष्ठ के लिए ‘नग्न’ तस्वीर खिंचवायी थी,मगर रणवीर सिंह ने पत्रिका के कवर पेज/मुख्य पृष्ठ के लिए खिंचवा कर अदम्य साहस का पचिय दिया है.

रणवीर सिंह का विरोध करने वाले यह क्यों भूल जाते हैं कि नग्नता हमारी कलात्मक अभिव्यक्ति और नवीनता का केंद्र रही है, जैसा कि सदियों से मंदिर की वास्तुकला में देखा गया है. फिर चाहे वह खजुराहों की गुफाओं में मौजूद शिल्प हो अथवा अजंटा एलोरा की गुफाओं मौजूद शिल्प हो. कला को ‘नग्नता’ की सीमाओं में कैद कर देखने की भारतीय परंपरा कभी नहीं रही है.

नग्न तस्वीरों को लेकर हंगामा उठनाः कुछ भी अनूठा नहीं

बौलीवुड से जुड़ी कुछ हस्तियों ने रण्वीर सिंह के ‘न्यूड फोटो सेशन’ को ‘‘साहसी‘‘ और ‘‘हॉट‘‘ की संज्ञा दी है.जबकि रणवीर सिंह ने कोई अभूतपूर्व कदम पनही उठाया है. क्या हम इस बात को भूल गए कि भारतीय पुरुष हस्तियों ने दशकों से कैमरे के लिए कपड़े उतारे हैं. मिलिंद सोमन ने 1990 में एक जूता ब्रांड की बिक्री बढ़ाने के लिए ऐसा किया था,जिसके लिए उन पर अदालती काररवाही पर अंततः अदालत ने उन्हे सारे आरोपों से बरी कर दिया था.

नवंबर 2020 में अपना 55 वां जन्मदिन मनाने के लिए मॉडल व अभिनेता मिलिंद सोमण ने गोवा के एक समुद्र तट पर नग्न दौड़े और उसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल की थी.लोकप्रिय अभिनेता जैकी श्रॉफ और अनिल कपूर को उनके जन्मदिन के सूट में फोटो खिंचवाया गया, हालांकि उनके निजी अंगों को क्रमश एक सर्फिंग बोर्ड और एक अखबार से -सजयंका गया था. 2014 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘पीके’’ एलियन की भूमिका में आमिर खान बिना कपड़ों के धरती पर उतरते हैं और अपने गुप्त अंगों को सजयंकने के लिए एक ट्रांजिस्टर -सजयूं-सजयते हैं.उनकी इस नग्न तस्वीर को फिल्म के प्रचार पोस्टर का हिस्सा बनाया गया था,तब किसी को तकलीफ नही हुई थी.

फिल्म‘डर्टी पिक्चर्स’ में सिल्क स्मिता के किरदार को निभाने पर विद्या बालन के खिलाफ एफआई आर दर्ज हुई थी.इसका क्या हुआ कुछ पता नही. 2007 में नव वर्ष के जश्न में अष्लील परफार्मेंस के लिए मल्लिका शेरावत पर मुकदमा दर्ज हुआ था. 2011 मंे सेषन कोर्ट ने उन्हे बरी कर दिया था.2006 में एक पत्रिका में छपी तस्वीरों को लेकर शिल्पा षेट्टी पर मदुराई में मुकदमा हुआ था,पर अदालत ने 2008 में उन्हे बरी कर दिया था.फिल्म ‘रोग’ के कुछ दृष्यों को लेकर पूजा भट्ट पर जुलाई 2005 में मुकदमा दर्ज हुआ था,अदालत ने नवंबर 2012 में उन्हे बरी कर दिया था.

बौलीवुड कलाकार उतरे समर्थन में

रणवीर सिंह के साथ फिल्म ‘‘गली ब्वॉय’’ में अभिनय कर चुकी तथा करण जोहर निर्देशित फिल्म ‘‘रौकी और रानी की प्रेम कहानी’’ में अभिनय कर रही आलिया भट्ट ने रणवीर सिंह के न्यूड फोटो पर कहा-ंउचय‘‘इसमें कुछ भी नकारात्मकता नही है.’’तो वहीं फिल्मकार राम गोपाल वर्मा ने सवाल उठाया-

‘‘यदि लड़कियां /औरतें वस्त्र उतार सकती हैं,तो रणवीर सिंह क्यों नहीं?’

अर्जुन कपूर भी रणवीर सिंह के समर्थन में बयानबाजी कर रहे हैं.विज्ञापन फिल्म बनाने वाले प्रह्लाद कक्कड़ के अनुसार रणवीर सिंह ने विदेषी पत्रिका के लिए फोटो शूट करवाया है, इसलिए भी कोई मामला नही बनता.

फिल्मकार ओनीर का मानना है कि सिर्फ भारत ही नही पूरे विश्व में नग्न शरीर की सुंदरता का जश्न मनाया जाता रहा है,तो फिर रणवीर सिंह के न्यूड फोटो को लेकर इतना हंगामा क्यों?

बहरहाल,रणवीर सिंह के नग्न/न्यूड फोटो को लेकर जबरदस्त हंगामा मचा हुआ है.मामला पुलिस से अदालत तक भी पहुंच रहा है.अब इस अदालत क्या निर्णय लेती है,यह तो वक्त बताएगा.मगर इस सच से इंकार नही किया जा सकता कि रणवीर सिंह की इन नग्न तस्वीरों में कामुकता की बजाय ‘कला’ का एक फार्म है.और अब तक कला को नग्नता के चष्मे से नही देख गया.इसके अलावा रणवीर सिंह ने इन तस्वीरों को बीस वर्ष से कम उम्र के बच्चे को बेचा भी नही है.वह किसी से जबरन इन तस्वीरों को देखने के लिए नही कह रहे हैं.बल्कि रधवीर सिंह ने विपरीत धारा में बहने का साहस जरुर दिखाया है.

क्या है अश्लीलता कानून

भारतीय दंड संहिता की धारा 292 में अश्लीलता को परिभाषित किया गया है. जिसमें अश्लीलता उस कृत्य को माना गया है जिसके जरिए लोगों की सेक्स को लेकर भावना भड़क जाए. अश्लीलता किसी किताब में, किसी अखबार में, किसी आकार में, किसी कैनवास पर, या किसी फोटो में किसी वीडियो में हो सकती है. इसके अलावा अश्लीलता शब्दों में भी हो सकती है.यहां तक कि वाट्स ऐप चैट के जरिए ऐसे कंटेट भेजना अशलीलता के दायरे में आ सकता है. हालांकि अगर कोई ऐसा काम किसी धर्म से जुड़ा है, किसी विज्ञान से जुड़ा है और किसी कला से जुड़ा है,तो उसे अश्लील नहीं माना जाएगा.

धारा 293 के तहत 20 वर्ष से कम आयु के किसी युवा व्यक्ति को अश्लील वस्तुओं को विक्रय करना भारतीय दंड सहिंता की धारा 293 के अंतर्गत दंडनीय अपराध है.

धारा 509 में महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से -रु39याब्द कहना, इ-रु39याारा करना या किसी कृत्य को अंजाम देने के आधार पर कार्रवाई की जाती है.

इसी तरह सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 (ए) के तहत अ-रु39यलील सामग्री को सोशल मीडिया पर पोस्ट करने पर कार्रवाई की जाती है.

बाक्स आयटमःदो

कितनी सजा का प्रावधान

अलग-अलग धाराओं के लिए आरोप सिद्ध होने पर अलग-अलग सजा का प्रावधान है.धारा 292 के तहत पहली बार यह अपराध करने पर दो साल तक की सजा हो सकती है फिर दूसरी बार फिर अपराध करने पर पांच साल तक की सजा सुनाई जा सकती है और पांच हजार का जुर्माना भी लगाया जा सकता है.

धारा 509 का उल्लंघन करने पर तीन साल तक सजा हो सकती है. जबकि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 67 (ए) के तहत अपराध सिद्ध होने पर 7 साल की सजा और 10 लाख तक का जुर्माना हो सकता है.

बाक्स आइटमः तीन ‘‘समाज को रोजाना महिलाओं की न्यूड तस्वीरें खिलाई जाती हैं और…

-स्वाती मालीवाल,अध्यक्ष, दिल्ली महिला आयोग

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने अभिनेता रणवीर सिंह के न्यूड फोटोशूट का समर्थन करते हुए ट्वीट किया है-  ‘‘समाज में हर दिन महिलाओं की नग्न तस्वीरें दिखाई जाती हैं और किसी को कोई आपत्ति नहीं होती है. एक अभिनेता, जो खुद को सबसे अच्छी तरह से जानता है, नग्न होने का फैसला करता है और प्राइम टाइम बहस का विषय बन जाता है.क्या हम वहाँ हैं, जहां देश में कोई वास्तविक मुद्दा नहीं है?‘‘

बाक्स आइटमः चार

रणवीर सिंह: मानसिक कचरा

धर्म जनित सोच व असहि-ुनवजयणुता की ओर ब-सजय़ते समाज के नजारे के चलते रणवीर सिंह के न्यूड फोटो का विरोध सोषल मीडिया से अब सड़कों के साथ ही पुलिस स्टेशन तक पहॅंच गया है. मध्य प्रदेश के इंदौर षहर में जरुरत मर्दों को कपड़े व अन्य चीजें मुहैया कराने वाली सामाजिक संस्था ‘‘नेकी की दीवार’’ ने इंदौर के आदर्ष रोड पर एक कचरे का बड़ा डिब्बा रखा है.इस डिब्बे को नाम दिया गया है-ंउचय ‘‘मानसिक कचरा.’’ और इस डिब्बे के चारों तरफ रणवीर सिंह द्वारा वायरल की गयी उनकी न्यूड फोटो लगायी गयी हैं. और लिखा  मेरे स्वच्छ इंदौर ने ठाना है देश से मानसिक कचरा भी हटाना है.’’

इतना ही नहीं इस संस्था ने लोगों से आव्हान किया है कि लोग अपने नए पुराने कपड़े रणवीर सिंह तक पहुंचाने के लिए दान करें.

बाक्स आयटम. पांच

क्या कहते है कानून के जानकार

कानून के जानकारों की माने तो रणवीर सिंह ने कोई अपराध नहीं किया है.पत्रिका/ मीडिया ने रणवीर सिंह की नग्न तस्वीरें खीची हैं.जिन्हे रणवीर सिंह ने मुफ्त में सोशल मीडिया पर पोस्ट किया है.जहां इन तस्वीरों को देखना किसी की भी बाध्यता /अनिवार्यता नहीं है.

बाक्स अयाटम: छह

‘‘हमें भी अपनी आंखें सेंकने दें..’’

-विद्या बालन

रणवीर सिंह के नग्न तस्वीरो के मसले पर एक कार्यक्रम में पत्रकारों से बातें करते हुए विद्या बालन ने कहा- ‘‘अरे क्या प्रॉब्लम है? पहली बार कोई आदमी ऐसा कर रहा है, ह म लोगो को भी आंखें सेंकने दीजिए ना (क्या समस्या है. एक आदमी इसे पहली बार कर रहा है, आइए हम भी इसका आनंद लें.)‘‘

रणवीर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के बारे में पूछे जाने पर विद्या ने कहा- ‘‘ अगर किसी को तस्वीरों से ठेस पहुंची है, तो उन्हें इन तस्वीरों को नहीं देखना चाहिए.हो सकता है कि उनके (एफआईआर दर्ज करने वाले लोगों) के पास करने के लिए ज्यादा काम नहीं है, इसलिए वह इन चीजों पर अपना समय बर्बाद कर रहे हैं. अगर आपको यह पसंद नहीं है, तो पेपर बंद करें या इसे फेंक दें,जो आप चाहते हैं वह करें एफआईआर में क्यों पड़ते हैं?”

‘अनुपमा’ के सेट पर पारस कलनावत हुए पॉलिटिक्स के शिकार, पढ़ें खबर

टीवी शो ‘अनुपमा’ से पारस कलनावत की छुट्टी हो गई है. ये खबर फैंस के लिए कॉफी शॉकिंग  है. बताया जा रहा है कि अनुपमा के सेट पर पारस कलनावत  के साथ साजिश चल रही थी. आइए बताते हैं, क्या है पूरा मामला…

पारस कलनावत जल्द ही रियलिटी टीवी शो ‘झलक दिखला जा’ सीजन 10 में बतौर कंटेस्टेंट नजर आएंगे. एक इंटरव्यू के अनुसार पारस कलानवत ने बताया है कि सेट पर उनके साथ अलग तरह का व्यवहार किया जाता था, जो वह कैमरे के सामने बता भी नहीं सकते हैं.

 

सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया है, जिसमें पारस कलनावत ने बताया, पूरी कास्ट में मैं इकलौता ऐसा इंसान था जिसके फॉलोअर्स 1 मिलियन से भी ज्यादा हो गए थे. ये सब कास्ट में बहुत सहजता से नहीं लिया गया. उन्होंने आगे कहा कि कई सारे लोगों को ये बहुत ऑफेंसिव लगा कि हम इतने सालों से काम कर रहे हैं और ये 24 साल की उम्र में 10 लाख फॉलोअर्स सेलिब्रेट कर रहा है.

 

सेट पर पारस कलानवत के साथ एक अलग ही तरह का पॉलिटिक्स किया जाता था. एक्टर ने कहा कि मैं किसी के बारे में बुरा या गलत नहीं बोलना चाहता. क्योंकि हर किसी की अपनी जिंदगी, अपना तरीका होता है. उन्होंने ये भी बताया कि सीरियल में मेरे सीन्स भी कम किए गए थे.

 

महाराष्ट्र में उठा सियासी तूफान

रोहित

बीते दिनों महाराष्ट्र में सियासी घमासान मचने से उद्धव ठाकरे की राकांपा और कांग्रेस के साथ बनी महा विकास अघाड़ी सरकार गिर गई. सरकार गिराने का कंधा भले बागी शिंदे गुट का रहा पर बंदूक बेशक भाजपा की रही. इस सियासी उठापटक का अंत जरूर हो गया पर नई उठापटक शुरू हो गई है.

30 जून, गुरुवार का दिन, वह घड़ी जब महाराष्ट्र के सियासी बादल लगभग छंट गए. उद्धव ठाकरे ने एक दिन पहले ही अपने 31 महीने के मुख्यमंत्रित्व कार्यकाल से इस्तीफा दे दिया था. न्यूज चैनलों ने शाम के प्राइम टाइम में अपने कार्यक्रम की तयशुदा स्क्रिप्ट तैयार कर रखी थी, जिस में बागी विधायकों का एकनाथ गुट भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस के साथ मिल कर सा?ा सरकार बनाता दिख रहा था.

उसी शाम भाजपा और शिंदे मिल कर प्रैस कौन्फ्रैंस करते हैं. माथे पर लाल टीका, हमेशा की तरह उजले सफेद कमीज में शिंदे गंभीर और आत्मविश्वासी दिख रहे थे. कौन्फ्रैंस टेबल पर न्यूज चैनलों के दर्जनों माइक थे. काले माइक पर पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बोलना शुरू किया.

बोलते हुए उन्होंने महा विकास अघाड़ी सरकार, जिस में एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना का गठबंधन था, के बारे में कुछ पुरानी बातें कहीं और फिर ऐलान किया, ‘‘एकनाथ शिंदे होंगे महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री. भाजपा सरकार में उन का समर्थन करेगी पर मैं सरकार में नहीं रहूंगा.’’ फडणवीस के इस बयान से सब हैरान हो गए. इस बयान में 2 बातें अहम थीं, एक, पत्रकारों और आम दर्शकों के लिए शिंदे का सीएम पद का चौंकाने वाला ऐलान. दूसरी, फडणवीस का सरकार में न होने का उन का व्यक्तिगत फैसला.

खैर, वजह जो भी हो, महाराष्ट्र में 106 विधानसभा सीटों वाली भाजपा के सब से बड़े नेता देवेंद्र फडणवीस का यह निजी फैसला नाराजगीभरा था, जो उन्होंने व्यक्त भी किया. उस के तुरंत बाद भाजपा अध्यक्ष ने उन्हें सम?ाते हुए शांत किया कि बीजेपी केंद्रीय नेतृत्व ने देवेंद्र फडणवीस से अनुरोध किया है कि वे सरकार का हिस्सा हों और राज्य के डिप्टी सीएम बनें, जिस के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने भी ट्वीट किया, ‘‘फडणवीस सरकार में शामिल होने के लिए मान गए हैं.’’ अब डिप्टी सीएम के पद पर फडणवीस खुद को कितना संतुष्ट महसूस कर पा रहे हैं, यह तो पता नहीं पर इस से भाजपा ने एक तीर से कई शिकार एकसाथ कर दिए, जिन की चर्चा आगे की जाएगी.

11-दिन का सियासी संग्राम

महाराष्ट्र के सियासी ड्रामे पर बात करनी जरूरी है जिस पर कई अटकलों, संभावनाओं और पूर्वअनुमानों के 11वें दिन बाद आखिरकार एक दिन पूर्णविराम लग गया.

इस कहानी का यह क्लाइमैक्स जितना रोमांचभरा रहा, उतना ही रोमांच बीते 11 दिनों में देखने को मिला. इस प्रकरण में यह जरूर फिर से साबित हुआ कि भारतीय प्रतिनिधिक लोकतंत्र में जनता और नेता एकदूसरे से बिलकुल जुदा रहते हैं. इस ने यह भी बताया कि अगर ‘मनी, मसल और मैनुपुलेशन’ की ताकत आप के पास हो तो आप सबकुछ ताक पर रख कर कुछ भी कर सकते हैं.

इस की शुरुआत 20 जून को हुई जब शिवसेना के विधायक एकनाथ शिंदे 25 अन्य विधायकों के साथ गुजरात के सूरत पहुंचे, जिस के बाद उन्होंने उद्धव ठाकरे पर हिंदुत्व की विचारधारा से सम?ाता करने और एनसीपी व कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के प्रति नाराजगी जताई.

22 जून को शिंदे के साथ 40 विधायक असम के गुवाहाटी पहुंचे. हर साल बाढ़ में डूबने वाले असम का समय पहली बार अच्छा इसलिए रहा कि बाढ़ के मौके पर मीडिया की नजर बाढ़ पर नहीं बल्कि इन बागी विधायकों पर टिकी थी.

जवाब में उद्धव सरकार को शिवसेना की तरफ से 16 विधायकों को अयोग्य घोषित करने की मांग हुई. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. कोर्ट ने सुनवाई 11 जुलाई के लिए टाल दी पर पेंच राज्यपाल के फ्लोर टैस्ट कराने के बाद और फंसता चला गया.

1 जुलाई का शपथ ग्रहण समारोह यह बताने के लिए काफी था कि सूरत से ले कर गुवाहाटी, गोवा के पांचसितारा होटलों का पैसा और चार्टर्ड प्लेनों का फ्यूल कहां से आ रहा था?

‘बे’मेल गठबंधन

क्या वजह बनी

बात नवंबर 2019 की, जब शिवसेना को ठाकरे परिवार से पहला सीएम उद्धव ठाकरे के रूप में मिला था. उद्धव ठाकरे तीसरे शिव सैनिक थे जो मनोहर जोशी और नारायण राणे के बाद सीएम पद पर बैठे थे पर इस पद पर बैठने के लिए उन्हें 35 साल पुरानी अपनी सहयोगी पार्टी भाजपा से आखिरकार नाता तोड़ना पड़ा.

भाजपा से नाता तोड़ने के बाद हिंदुत्व के रास्ते पर चलने वाली शिवसेना ने नया गठबंधन बनाया. उस ने अपने से अलग विचारधारा रखने वाली कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) से गठबंधन किया.

यह पहली बार था कि कट्टर हिंदुत्व की छवि वाली शिवसेना ने ऐसी 2 पार्टियों के साथ गठजोड़ कर सरकार बनाई जिन के सैकुलर विचारों के खिलाफ शिवसेना संस्थापक बाला साहेब ठाकरे के विचार थे. अब मसला यह कि सरकार के टूटने में जिस तरह की उठापटक वाले घटनाक्रम से महाराष्ट्र को इस समय गुजरना पड़ा, ऐसी ही उठापटक के साथ महा विकास अघाड़ी सरकार की शुरुआत भी हुई थी.

2019 के विधानसभा चुनावों में कुल 288 विधानसभा सीटों वाले महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना ने गठजोड़ कर चुनाव लड़ा था, जिस में भाजपा 106 सीटें जीती व शिवसेना 56 सीटें जीत पाई. इस से पहले 2014 में दोनों ने अलगअलग चुनाव लड़ा जिस में भाजपा 122 और शिवसेना 63 सीटें जीती. वहीं 19 के विधानसभा चुनावों में राकांपा

54 और कांग्रेस 44 सीटें जीतीं.

मुख्यमंत्री की दावेदारी पर पेंच फंसने से भाजपा-शिवसेना का न सिर्फ गठबंधन टूटा बल्कि भाजपा को सत्ता से भी दूर रहना पड़ा. उस दौरान यह सवाल चर्चा में था कि सरकार में तारतम्य कैसे बैठ पाएगा? आज 31 महीने बाद एमवीए की सरकार गिरने के बाद इस का जवाब सब को मिल तो गया. अब आगे क्या होगा?

भाजपा-शिवसेना गठबंधन

बीजेपी-शिवसेना का पहली बार गठबंधन 1989 में हुआ था. तब भाजपा नेता प्रमोद महाजन के प्रस्ताव पर कहते हैं बाल ठाकरे ने मुंह से कुछ न बोल कर एक कागज पर लिख दिया, ‘शिवसेना 200 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और जो सीटें बचती हैं, उन पर बीजेपी लड़ ले.’ आधे घंटे से भी कम समय में फाइनल हुए इस गठबंधन में बात इस नोट पर खत्म हुई कि 1990 के विधानसभा चुनाव में शिवसेना 183 और बीजेपी 104 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. इस चुनाव व आने वाले चुनावों में भले शिवसेना की सीटें भाजपा के मुकाबले ज्यादा आईं पर जीतने के प्रतिशत में वह भाजपा से लगातार पिछड़ती ही रही.

यह वह समय था जब महाराष्ट्र में बीजेपी शिवसेना की जूनियर पार्टी थी. आगे आने वाले कई चुनावों में, 2009 तक, भाजपा जूनियर ही रही.

कुल मिला कर पिछले 33 सालों में भाजपा न्यूनतम 42 से 106 सीटों पर पहुंच गई, जबकि शिवसेना अधिकतम 73 से घट कर 56 सीटों पर आ गई.

आगे की राह मुश्किल

महाराष्ट्र के इस पूरे सियासी प्रकरण में कांग्रेस और राकांपा की भी सत्ता से बेदखली हुई. देश का फाइनैंशियल पावरहाउस कहे जाने वाले महाराष्ट्र से इन दोनों पार्टियों का कंट्रोल खत्म हुआ पर जिस पार्टी को सब से ज्यादा हानि हुई वह शिवसेना है. ठाकरे सत्ता से बेदखल हुए, पार्टी में भारी टूटफूट मची और पार्टी अध्यक्ष ठाकरे का रुतबा शिव सैनिकों के बीच कमजोर होने के साथ शिवसेना पर उन की पकड़ ढीली हो गई.

भाजपा और शिंदे गुट ने जिस तरह इन 11 दिनों में हिंदुत्व के मोरचे पर ठाकरे सरकार को घेरा, उस ने पार्टी कैडरों के बीच असमंजस की स्थिति ला खड़ी कर दी है. इस में कोई शक नहीं कि भाजपा इस पूरे घटनाक्रम की बड़ी मास्टरमाइंड साबित हुई. उस ने एक तीर से कई निशाने साधे. बड़ा दिल दिखाते उस ने मुख्यमंत्री पद शिंदे को सौंपा. इस से उस की दूरदर्शी सोच ?ालक गई.

भाजपा ने यह भी साफ किया है कि वह शिंदे का समर्थन हिंदुत्व के मुद्दे के चलते कर रही है. यानी शिवसैनिकों को यह साफ मैसेज देने की कोशिश की गई कि शिंदे ही हिंदुत्व के मुद्दे को आगे बढ़ा रहे हैं और ठाकरे भटक गए हैं.

लोकतंत्र का मजाक

इन 11 दिनों में शिवसेना के अलावा जिसे सब से ज्यादा चोट पहुंची वह भारत का लोकतंत्र रहा. यह हौर्स ट्रेडिंग ‘लोकतंत्र ट्रेडिंग’ है.

शर्मनाक यह कि एक समय पर जब इस तरह की ट्रेडिंग हुआ करती थी, तब इसे लोकतंत्र पर घात माना जाता था, हौर्स ट्रेडिंग करने वाली पार्टी की फजीहत होती थी. लेकिन इस तरह की घटिया राजनीति को औपरेशन का नाम दे कर महिमामंडन किया जा रहा है. द्य

महाराष्ट्र के नए सीएम एकनाथ शिंदे

महाराष्ट्र की राजनीति में इस समय जिन नेता का नाम सब से ज्यादा लिया जा रहा है वे एकनाथ शिंदे हैं, जो 58 वर्ष के हैं. शिवसेना में उथलपुथल मचाने और 11 दिनों की अफरातफरी में ये नेता केंद्र में रहे हैं. सवाल यह कि शिवसेना, जिसे कट्टर कार्यकर्ताओं का दल कहा जाता है, में एकनाथ कैसे इतनी बड़ी ताकत बन गए कि दोतिहाई से अधिक शिवसेना विधायकों को अपने नियंत्रण में कर लिया और पार्टी अध्यक्ष व सीएम उद्धव ठाकरे को कानोंकान खबर न लगी.

महाराष्ट्र के सातारा में जन्मे एकनाथ शिंदे का परिवार 1970 में ठाणे पहुंचा जहां शिंदे ने अपनी पढ़ाई की. घर की आर्थिक तंगी के चलते पढ़ाई बीच में छोड़ वे औटो चलाने लगे. 1980 में वे शिवसेना के बालासाहेब ठाकरे से प्रभावित हुए थे, जिस के चलते वे शिवसेना पार्टी में शामिल हो गए. वे ठाणे-पालघर क्षेत्र में एक प्रमुख सेना नेता के रूप में उभरे और अपने आक्रामक दृष्टिकोण के लिए जाने गए. यही कारण है कि आगे जा कर उन्हें ठाणे का ठाकरे कह कर पुकारा गया. एकनाथ ने कई आंदोलनों में भाग लिया, जैसे कि बेलगौवी की स्थिति को ले कर महाराष्ट्र-कर्नाटक आंदोलन, जिस के लिए वे जेल में भी डाले गए.

कभी औटोचालक के रूप में काम करने वाले एकनाथ शिंदे ने 1997 में ठाणे नगरनिगम का पहला चुनाव लड़ा था और उन्हें जीत हासिल हुई. उस समय ठाणे पार्टी के अध्यक्ष आनंद दीघे थे जिन के एकनाथ शिंदे काफी करीबी माने जाते थे. उस बीच, 26 अगस्त, 2001 को शिंदे के राजनीतिक गुरु व सहारादाता आनंद दीघे का एक हादसे में निधन हो गया था. उन की मौत को आज भी कई लोग हत्या मानते हैं. कहा जाता है कि दीघे के निधन से शिवसेना के लिए ठाणे में खालीपन आ गया था और पार्टी का वर्चस्व कम होने लगा था. फिर समय रहते शिवसेना ने एकनाथ शिंदे को मौका दिया, उन्हें वहां की कमान सौंप दी और एकनाथ ने पार्टी से मिली जिम्मेदारी से ठाणे में शिवसेना का परचम लहराया. एकनाथ पर ठाणे की जनता ने भरोसा भी जताया और वे 2004, 2009, 2014 और 2019 के लिए लगातार 4 बार महाराष्ट्र विधानसभा के लिए चुने गए.

वर्ष 2014 के चुनावों के बाद उन्हें शिवसेना के विधायक दल के नेता और बाद में महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता के रूप में चुना गया. एक महीने के भीतर जैसे ही शिवसेना ने राज्य सरकार में शामिल होने का फैसला किया, उन्होंने लोक निर्माण विभाग (सार्वजनिक उपक्रम) के मंत्री के रूप में शपथ ली और जनवरी 2019 में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी संभाली.

इस समय वे राज्य के मुख्यमंत्री हैं. एकनाथ शिंदे खुद को सच्चा बालासाहेब का विचारक मानते हैं. इस समय उन के कारण शिवसेना अगरमगर की स्थिति में आ खड़ी हुई है. भविष्य में शिवसेना किस रूप में रहेगी, इस पर संशय है. वह बचेगी या खत्म होगी, बचेगी तो किस के हाथ रहेगी और रहेगी तो किस के दबाव में, यह सवाल खड़ा है.

कौन से हिंदुत्व के लिए

एकनाथ शिंदे के मुख्यमंत्री बनने के तुरंत बाद भगवा खेमे से यह ताबड़तोड़ प्रचार शुरू हो गया था कि उन्होंने हिंदुत्व की खातिर यह यानी तोड़फोड़ वाला कदम उठाया. दोयम दर्जे के भाजपा नेताओं ने तो बहुत स्पष्ट कहा कि यह हनुमान चालीसा न पढ़ने देने की सजा है. कहा यह भी गया कि हनुमानजी ने अपना हिसाबकिताब चुकता कर लिया.

त्रेता युग के बाद ऐसा पहली बार हुआ कि हनुमान को एक साधारण मानव से बदला लेने के लिए सैकड़ों लोगों की बुद्धि हरनी पड़ी. देवीदेवताओं का काम एक राज्य की सत्ताहरण तक सिमटा देने वाले ये लोग दरअसल कह यह भी रहे हैं कि एकनाथ सरकार को महाराष्ट्र के विकास से कोई लेनादेना नहीं है, लिहाजा आम महाराष्ट्रियन को उस से कोई उम्मीद नहीं रखनी चाहिए. वे तो सुग्रीव की तरह हैं जो जिंदगीभर राम की गुलामी ढोता रहेगा. रामराज्य की स्थापना और हिंदू राष्ट्र निर्माण के लिए बाली अर्थात उद्धव को आज भी छल से मारने को मजबूर होना पड़ा. असली राम तो नागपुर और दिल्ली में बैठे हैं जिन के इशारे पर सत्ताहरण की यह लीला रची गई क्योंकि उद्धव वर्णव्यवस्था को बहाल करने और दलित  मुसलमानों को प्रताडि़त करने की मुहिम में उन का साथ नहीं दे रहे थे.

भला उस का हिंदुत्व मेरे हिंदुत्व से ज्यादा धारदार और विध्वंसक कैसे, यह सोचने के लिए उद्धव ठाकरे के पास वक्त ही वक्त है लेकिन इस के भी पहले उन्हें ईडी और आईटी जैसी सरकारी एजेंसियों के जरिए घेरा व परेशान किया जा सकता है. यह देशभर के विपक्षी नेताओं के साथ महाराष्ट्र में भी शरद पवार और संजय राउत जैसे दर्जनों नेताओं के उदाहरण से साबित होता रहा है. भगवा गैंग इन लोगों से डरता है क्योंकि इस किस्म के नेता सनातनी एजेंडे के नुकसान जानतेसम?ाते हैं कि ये तो उस सवर्ण के हित के भी नहीं जो दिनरात इन की माला जपता रहता है. आज नहीं तो कल वह शुभ दिन जरूर आएगा जब शूद्र यानी दलित पहले से हमारी गुलामी ढो रहा होगा और मुसलमान हम से रहम की भीख मांग रहा होगा.

एकनाथ का इकलौता काम अब राम दरबार के ऋषिमुनियों से मिले हुक्मों की तामील करना रह जाएगा. इस सत्ताहरण का न तो नगरनिगम चुनावों से कोई संबंध है और न ही 2024 के लोकसभा चुनावों पर इस का कोई असर पड़ने वाला. जरूरी यह भी नहीं कि भाजपा को दूसरे राज्यों की तरह इस गैरजरूरी तोड़फोड़ से कोई फायदा हो, उलटे, नुकसान अगर हुआ तो उस की भरपाई जरूर मुश्किल हो जाएगी क्योंकि शिंदे सैनिक भी, जो जमीन से जुड़े हैं, कभी वर्णव्यवस्था से सहमत नहीं होंगे. इन में से अधिकांश दलित, पिछड़े आदिवासी ही हैं.

बाल ठाकरे की बादशाहत इन्हीं गरीब और आम लोगों ने खड़ी की थी जिसे एक अलग संभ्रांत किस्म का नक्सलवाद कहा जा सकता है. इस में कोई हिंसा नहीं थी. बस, निचले तबके के लोगों ने एकजुट हो कर शिवसेना जौइन की थी. यह तबका कतई नास्तिक या अनास्थावादी नहीं है लेकिन ऊंची जातियों की गुलामी लोकतंत्र में ढोने से सख्ती से इनकार करता है. महाराष्ट्र तो अंबेडकरवादियों का गढ़ है जहां खासतौर से विदर्भ इलाके में भगवा गमछे वाले कम,  नीली टोपी वाले युवा ज्यादा नजर आते हैं. ऐसे में भाजपा नव मुट्ठीभर शिंदे सैनिकों के दम पर अपनी जमीन बना पाएगी, इस में शक है.

अपने कदम को सही ठहराने के लिए भगवा गैंग यह प्रचार भी कर रहा है कि उद्धव ठाकरे अपनी विचारधारा से कट गए थे, इसलिए दुर्गति का शिकार हुए. ये लोग बाल ठाकरे के कुछ बयानों का हवाला दे रहे हैं, मसलन यह कि अगर अमरनाथ यात्रा में अड़ंगा डाला गया तो याद रखना, हज की उड़ानें मुंबई हो कर ही जाती हैं. इस में कोई शक नहीं कि बाल ठाकरे इसलामिक आतंकवाद के खिलाफ थे लेकिन इस से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि वे इसलाम के भी खिलाफ थे. उन्होंने कभी किसी पैगंबर पर अभद्र बात नहीं कही और न ही कभी इसलाम पर उंगली उठाई. उद्धव भी अपने पिता की तरह संतोंमहंतों के चरणों में लोट नहीं लगाते और न ही दूसरे कर्मकांड ज्यादा करते हैं. वे कभी मनु स्मृति के मुताबिक बात नहीं करते, इसलिए उन का हिंदुत्व भगवा गैंग के हिंदुत्व से तो अलग है. हिंदू इतिहास तो ऐसे प्रसंगों से भरा पड़ा है. इसलिए उन्होंने मुगलों और अंगरेजों की गुलामी भी भुगती. अब पहले की तरह ब्राह्मणों की गुलामी कर रहे हैं तो हिंदुत्व पर हायहाय क्यों?

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