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धार्मिक अंधता, जलता लोकतंत्र

उदयपुर में 2 युवाओं द्वारा एक दर्जी की खुलेआम, दिनदहाड़े हत्या कर देना और फिर हत्या का वीडियो सोशल मीडिया पर डाल देना यह साबित करता है कि धर्म इस तरह पागल बना देता है कि लोग न आगापीछा देखते हैं, न परिणामों की चिंता करते हैं.

नूपुर शर्मा के बयानों का समर्थन करने वाले इस दर्जी को मार डालने के लिए ये 2 युवा किसी बड़ी संस्था द्वारा भेजे गए हों, कोईर् बड़ी योजना बनाई गई हो, ऐसा भी नहीं है. दर्जी का काम करने वाले इस कट्टरपंथी ने नूपुर शर्मा का समर्थन किया तो हिंदू धर्म के बहकावे में और जवाब में उस की हत्या कर दी गई तो वह दूसरे इसलाम धर्म के बहकावे की वजह से.

घरों, शहरों और देशों को उजाड़ने में, समाज को तोड़ने में, लोगों के बीच बेबात की दुश्मनी खड़ी करने में जो भूमिका धर्म की है वह जर, जमीन, जोरू की भी नहीं. लोग स्वभाववश एकदूसरे का सहयोग चाहते हैं और एकदूसरे को सहयोग करते भी हैं. लेकिन यह धर्म ही है जो कहता है कि अपने धर्म वाला हो या विधर्मी, दुश्मन हो सकता है.

हर धर्म कहता है कि पूजा करो, दान दो, कुरबानी करो. जो यह नहीं करता वह दुश्मन है. इस दर्जी ने कट्टर कथावाचकों की मुरीद नूपुर शर्मा का समर्थन किया क्यों? क्योंकि उसे सिखाया गया है कि दूसरे धर्म का हर जना दुश्मन है.

यह सोचने की बात है कि आखिर दाढ़ी बढ़ाए ये 2 युवक जब दर्जी की दुकान में घुसे तो उन्होंने कहा, कपड़े सिलाने हैं और दर्जी ने सुन ली. उन के विधर्मी होने पर कोई एतराज नहीं किया क्योंकि वे ग्राहक थे. जब तक संबंध ग्राहक और दुकानदार का था, ठीक रहा, लेकिन बीच में दोनों के दो धर्म घुस गए जिन्होंने एक तरफ दर्जी का दिमाग खराब कर रखा था तो दूसरी तरफ इन 2 युवकों का.

इस हत्या के लिए जिम्मेदार दोनों धर्म हैं और दोनों धर्मों के वे हजारों प्रचारक जो ऊंचे मंदिरोंमसजिदों में बैठ कर प्रवचन करते हैं, अपनेअपने धर्मभक्तों को उकसाते हैं कि जो धर्म का आदेश न माने, मार डालो चाहे वह शंबूक हो, एकलव्य हो या उदयपुर का कन्हैयालाल तेली हो.

ओसामा बिन लादेन ने पहले अफगानिस्तान की गुफाओं में छिप कर अमेरिका पर हमला कराया, फिर पाकिस्तान में छिप कर रहने लगा. उस में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह सामने रह कर जिसे दुश्मन मान रहा है, उस से लड़ सके. उस ने लाखों घरों को बरबाद करा दिया, अफगानिस्तान को तहसनहस करा दिया. उस ने जो बीज बोए उस से सीरिया से लाखों शरणार्थी मारेमारे फिर रहे हैं पर उस का धर्म वहीं का वहीं है.

भारत में धर्म के शीरे में सत्ता की गरमागरम जलेबी मिलती रहे, इसलिए शीरे के नीचे आग को सुलगाए रखा जा रहा है.

नूपुर शर्मा भी, कन्हैयालाल तेली भी और ये 2 युवक भी जो हत्या की मात्र आग और लकडि़यां हैं, खुद को जला कर धर्म के शीरे को खौला कर रखती हैं.

पकती जलेबी का रसपान कर धर्मों के पंडे, पादरी, मुल्ला, ग्रंथी मौज मनाते हैं, पीढ़ी दर पीढ़ी. इन लकडि़यों से मकान बन सकते हैं, घरों के चूल्हे जल सकते हैं, दवाएं बन सकती हैं मगर धर्म के नाम पर सब स्वाह हो रहा है. आज नूपुर शर्मा जैसी ने हिंदूमुसलिम विवाद को उस मोड़ पर ला खड़ा किया है जिस का अंत भीषण वैमनस्य में हो सकता है.

15 August Special: ऐतिहासिक धरोहरों का संगम बिहार

बिहार का मतलब ही भ्रमण करना है. ऐसे में इस राज्य में घुमक्कड़ों के लिए कई मनोहारी पर्यटन स्थल हैं जहां आ कर सैलानी सुंदरता की दुनिया में खो जाते हैं. आधुनिकता के तमाम विकल्पों के साथसाथ इतिहास के अमूल्य तोहफों से वाकिफ कराते बिहार की खूबियां जरा आप भी जानिए.
भारत के पर्यटन मानचित्र में बिहार का अहम मुकाम है. यहां सालभर देशविदेश से पर्यटक आते रहते हैं. गंगा नदी के किनारे और सोन एवं गंडक नदी के संगम पर लंबी पट्टी के रूप में बसा हुआ है बिहार. बिहार की राजधानी पटना है. आजादी के बाद इसे बिहार की राजधानी बनाया गया. तब और अब के पटना में काफी बदलाव आ चुका है. पहले पटना के लोगों को ‘पटनिया’ कहा जाता था, पर बदलते जमाने के पटनावासी अब खुद को ‘पटनाइट्स’ कहलाने पर फख्र महसूस करते हैं.
बुद्घ स्मृति पार्क 
यह पटना का नवीनतम दर्शनीय स्थल है. पटना रेलवे स्टेशन के मुख्य निकासद्वार से बाहर निकलते ही जिस विशाल और चमचमाते स्तूप पर नजर टिक जाती है वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर का बना नया पर्यटन स्थल बुद्ध स्मृति पार्क है. उस जगह पर बांकीपुर जेल के नाम से पटना का सैंट्रल जेल हुआ करता था. 22 एकड़ जमीन पर 125 करोड़ रुपए की लागत से बने इस पार्क में बना शांति स्तूप 200 फुट ऊंचा है. पार्क का 80 फीसदी हिस्सा खुला छोड़ा गया है जहां रंगबिरंगे फौआरों और स्पैशल लाइटिंग का मनोहारी इंतजाम है. यहां बांकीपुर जेल के वाच टावर और दीवार के एक हिस्से को ऐतिहासिक धरोहर के रूप में संजो कर रखा गया है. इस में ट्रैडिशनल और मौडर्न शिल्प का संगम देखने को मिलता है. पार्क को बनाने में बोधगया महाबोधि के अलावा जापान, थाईलैंड, म्यांमार, दक्षिण कोरिया और तिब्बत के महाविहारों की भी भागीदारी रही है. बुद्ध स्मृति पार्क में बौद्ध स्तूप, मैडिटेशन सैंटर, पार्क औफ मैमोरी, म्यूजियम और बांकीपुर जेल अवशेष के अलगअलग खंड बनाए गए हैं.
बौद्ध स्तूप
200 फुट ऊंचा स्तूप बौद्ध वास्तुशिल्प का नायाब नमूना है. स्तूप की बाहरी और भीतरी दीवारों पर की गई नक्काशी इतिहास को नए अंदाज में करीब से देखने का मौका देती है. इस स्तूप की सब से बड़ी खासीयत यह है कि पर्यटक इस के भीतर जा सकते हैं, जबकि दूसरी जगहों पर बने स्तूपों में अंदर जाने की व्यवस्था नहीं होती है. इस के अंदर एक बुलेटप्रूफ शीशे का कमरा बनाया गया है, जिस में कई देशों से मंगाए गए बौद्ध अवशेषों को सहेज कर रखा गया है.
म्यूजियम
पार्क के भीतर बनाया गया बुद्ध म्यूजियम सहसा राजगीर के बराबर की गुफाओं की याद दिला देता है. इसे बड़ी ही खूबसूरती से गुफानुमा बनाया गया है जिस में बुद्ध और बौद्ध धर्म से जुड़ी चीजें प्रदर्शन के लिए रखी गई हैं. इसे सिंगापुर के म्यूजियम की तर्ज पर विकसित किया गया है. बुद्ध और बौद्ध धर्म से जुड़ी चीजों को औडियोवीडियो के जरिए प्रदर्शित किया जाता है.
पार्क औफ मैमोरी
यह बुद्ध पार्क का सब से महत्त्वपूर्ण हिस्सा है. इस के जरिए पर्यटक यह आसानी से जान सकेंगे कि किस तरह से बुद्धिज्म बिहार में पनपा और कब व किस तरह से चीन, जापान, कोरिया, थाईलैंड, श्रीलंका समेत कई देशों में फैला. इस के लिए जगहजगह पर चीनी, कोरियाई, थाईलैंडी नाम वाले पगोडा बनाए गए हैं, जहां पर बैठ कर ध्यान लगाया जा सकता है.
मैडिटेशन सैंटर
यहां बौद्धकालीन इमारतों की याद दिलाता मैडिटेशन सैंटर बनाया गया है. यह प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय से प्रेरित है. इस में कुल 5 ब्लौक और 60 कमरे हैं. सभी कमरों के सामने के हिस्सों में पारदर्शी शीशे लगाए गए हैं ताकि ध्यान लगाने वाले सामने बौद्ध स्तूप को देख कर ध्यान लगा सकें.
पटना दियारा
पटना और हाजीपुर के बीच गंगा नदी के 2 धाराओं में बंट जाने से गंगा के बीच करीब 4 वर्ग किलोमीटर का दियारा इलाका टापू की शक्ल ले चुका है. इस इलाके में रेत और पानी के बीच समुद्र तट के जैसा नजारा और मजा मिलता है. दियारा को पर्यटन स्पौट के रूप में विकसित कर दियारा पर्यटन का नाम दिया गया है.
पटना के इंजीनियरिंग कालेज घाट (काली घाट) से नाव और स्टीमर के जरिए 5 से 10 मिनट में दियारा तक पहुंचा जा सकता है. नाव से जाने पर प्रति सवारी 10 रुपए और एमवी-गंगा स्टीमर से जाने पर प्रति सवारी 75 रुपए किराया लगता है. स्टीमर से जाने पर आधे घंटे तक गंगा भ्रमण और डौल्फिन देखने का आनंद लिया जा सकता है. रोजाना 2 से 3 हजार लोग दियारा पर्यटन पर मौजमस्ती के लिए पहुंचते हैं. टापू पर बांस और फूस की 5 कलात्मक झोंपडि़यां बनाई गई हैं, जिन में पर्यटकों के बैठने व सुस्ताने का पूरा इंतजाम है. इतना ही नहीं, चाइनीज और साउथ इंडियन फूड के साथसाथ देसी व्यंजन लिट्टीचोखा, चाट, गोलगप्पे का भी मजा ले सकते हैं.
इस के लिए एक फूड प्लाजा भी खोला गया है, जिस के मेन्यू कार्ड में 60 तरह के आइटम हैं. इस के अलावा धमाचौकड़ी मचाने और खेलनेकूदने का भी मुकम्मल इंतजाम है. पर्यटक वौलीबौल, फ्लाइंग डिस्क और रिंग जैसे खेल का आनंद उठा सकते हैं. मकर संक्रांति के मौके पर दियारा में पतंगबाजी के मुकाबले का भी आयोजन किया जाता है.
ईको पार्क
पटना के लोगों और पर्यटकों की तफरीह के लिए बने नएनवेले ईको पार्क में हरियाली और कला का अनोखा संगम देखने को मिलता है. पटना के दर्शनीय स्थलों में नया नगीना है ईको पार्क. पटना की बेली रोड पर पुनाईचक इलाके में अक्तूबर 2011 में ईको पार्क को पर्यटकों के लिए खोला गया. इसे राजधानी वाटिका भी कहा जाता है.
पार्क में बनी झील में नौकाविहार का आनंद लिया जा सकता है. इस में बच्चों के खेलने और मनोरंजन करने का खासा इंतजाम किया गया है, वहीं बड़ों के लिए आधुनिक मशीनों से लैस जिम भी बनाया गया है. 9.18 हेक्टेअर क्षेत्र में फैले इस पार्क में 1,191 मीटर का जौगिंग ट्रैक भी है. पार्क में गुलाब, कमल, डहेलिया, गेंदा, रजनीगंधा आदि फूल पार्क को कलरफुल लुक देते हैं.
सुबह 8 बजे से 10 बजे तक इस में प्रवेश के लिए कोई शुल्क नहीं है क्योंकि इस दौरान मौर्निंग वाकर्स और जौगर्स पार्क में आते हैं.
10 बजे दिन के बाद से पार्क में प्रवेश के लिए 5 रुपए का टिकट लगता है. याद रहे गुरुवार को पार्क बंद रहता है.
पटना म्यूजियम
पटना म्यूजियम देशविदेश के पर्यटकों को हमेशा ही लुभाता रहा है. इतिहास से रूबरू होने के साथ इस के पार्क में बैठने का आनंद लिया जा सकता है. पटना रेलवे स्टेशन से आधा किलोमीटर दूर बुद्ध मार्ग पर बने इस म्यूजियम ने प्राचीन सभ्यता और संस्कृति को संजो कर रखा है.
प्राकृतिक कक्ष में जीवजंतुओं के पुतलों को रखा गया है जबकि वास्तुकला कक्ष में खुदाई में मिली मूर्तियों को रखा गया है, जिन में विश्वप्रसिद्ध यक्षिणी की मूर्ति भी शामिल है. इस के अलावा सिक्का कक्ष, टेराकोटा कक्ष, अष्टधातु कक्ष, आर्ट एवं पेंटिंग कक्ष, आदिवासी कक्ष और डा. राजेंद्र प्रसाद कक्ष भी दुर्लभ ऐतिहासिक चीजों से भरे हुए हैं.
जैविक उद्यान
पटना का यह चिडि़याघर शहर वालों का पसंदीदा पिकनिक स्पौट है. रेलवे स्टेशन से 4 किलोमीटर और एअरपोर्ट से 2 किलोमीटर की दूरी पर बने चिडि़याघर में विभिन्न प्रजातियों के पशु, पक्षी और औषधीय पौधे हैं जो इस की सुंदरता में चार चांद लगाते हैं. बच्चों की रेलगाड़ी में सैर करने का लुत्फ बच्चे, बूढ़े और जवान सभी उठाते हैं. उद्यान में विकसित झील में नौकाविहार का भी आनंद लिया जा सकता है. सांपघर और मछलीघर भी पर्यटकों को लुभाते हैं.
कुम्हरार
प्राचीन पटना का भग्नावशेष यहीं मिला था. पटना जंक्शन से 5 किलोमीटर पूरब में पुरानी बाईपास रोड पर स्थित कुम्हरार प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल है. यह पिकनिक स्पौट और लवर्स पौइंट के रूप में मशहूर हो चुका है. यहां मौर्यकालीन सभाभवन के अवशेषों के बीच खूबसूरत पार्क बनाया गया है. शहर की भीड़भाड़ से दूर छुट्टियों के दिन, पटना वालों को यहां गुजारना काफी रास आता है.
गोलघर
गंगा नदी के किनारे बना गोलघर ऐतिहासिक और स्थापत्यकला का उत्कृष्ट नमूना है. 1770 के भीषण अकाल के बाद 1786 में अंगरेजों ने इसे अनाज रखने के लिए बनाया था. 29 मीटर ऊंचे इस गोलाकार भवन के ऊपर चढ़ने के लिए 100 से ज्यादा सीढि़यां हैं. इस के शिखर से पटना शहर के खूबसूरत नजारों का लुत्फ उठाया जा सकता है.
इन सब के अलावा जलान म्यूजियम, अगमकुआं, मनेर का मकबरा, सदाकत आश्रम, बिहार विद्यापीठ, गांधी संग्रहालय, तख्त हरमंदिर, शहीद स्मारक, गांधी मैदान तारामंडल, पटनदेवी, पत्थर की मसजिद, पादरी की हवेली आदि भी पटना के नामचीन पर्यटन स्थल हैं.
5वीं सदी ईसापूर्व से ले कर गुप्तकाल और फिर मौर्यकाल तक वैशाली, नालंदा और राजगीर देश की मुख्य गतिविधियों का केंद्र रहे और इस दौरान वहां स्थापत्यकला खूब फलीफूली. बड़े पैमाने पर इमारतें और स्मारक बने जिन की कलात्मकता का डंका आज भी दुनियाभर में बज रहा है. कहा जाता है कि भारतीय कला का इतिहास बिहार से ही शुरू होता है. ईसापूर्व छठी सदी से ही स्थापत्यकला के बेजोड़ नमूने बनने शुरू हो गए थे और इस तरह की गतिविधियों का केंद्र राजगीर रहा.
राजगीर
यहां वेणुवन, मनियार, मठ, पिप्पल नामक पत्थर का महल है, जिसे पहरा देने का भवन या मचान भी कहते हैं. वैभारगिरी पहाड़ी के दक्षिणी छोर पर सोनभद्र गुफा, जरासंध का बैठकखाना, स्वर्ण भंडार, बिंबिसार का कारागार, जीवक आम्रवन और पत्थरों की उम्दा कारीगरी से बनाई गई सप्तपर्णी गुफा की कलात्मकता देखते ही बनती है.
पटना से 109 किलोमीटर दक्षिणपूर्व में और नालंदा से 19 किलोमीटर की दूरी पर स्थित राजगीर हिंदू, बौद्ध और जैनियों का महत्त्वपूर्ण व ऐतिहासिक स्थल है. पहाड़ पर बने विश्व शांति स्तूप स्थापत्यकला के बेहतरीन नमूनों में से एक है. रोप वे (रज्जू मार्ग) के जरिए पर्यटक वहां आसानी से पहुंच सकते हैं.
वायुमार्ग से : पटना एअरपोर्ट से 102 किलोमीटर और गया एअरपोर्ट से 60 किलोमीटर की दूरी पर है.
रेलमार्ग से : हावड़ापटना मुख्य रेलमार्ग पर स्थित बख्तियारपुर रेलवे स्टेशन सब से नजदीकी स्टेशन है.
सड़क मार्ग से : पटना के मीठापुर बस अड्डे से हरेक घंटे पर गया के लिए बस चलती है.
नालंदा
शिक्षा और ज्ञानविज्ञान के अंतर्राष्ट्रीय केंद्र के रूप में नालंदा मशहूर था. नालंदा महाविहार या विश्वविद्यालय में दुनिया भर से छात्र पढ़ने आते थे. सम्राट अशोक ने यहां मठ की स्थापना की थी. जैन धर्म के प्रवर्तक महावीर ने यहां काफी समय गुजारा. प्रसिद्ध बौद्ध सारिपुत्र का जन्म यहीं हुआ था. महाविहार के सामने विशाल स्तूप आज भी मौजूद है. यहां बुद्ध काल की बनी हुई धातु, पत्थर और मिट्टी की मूर्तियां मिली हैं.
नालंदा में 14 हेक्टेअर क्षेत्र में हुई खुदाई में विशाल सीढि़यां, धातु गलाने का बरतन, बुद्ध की अभयमुद्रा वाली मूर्ति, मठ, आश्रम, लैक्चर हौल, होस्टल, सभाकक्ष, प्राचीन बौद्ध पांडुलिपियां, चीनी यात्री ह्वेनसांग की खोपड़ी भी मिली है.
सड़क मार्ग से : नालंदा पटना से 90 किलोमीटर की दूरी पर है. पटना के मीठापुर बस अड्डे से हर समय नालंदा के लिए बस मिल जाती है.
वायुमार्ग से : पटना का जयप्रकाशनारायण इंटरनैशनल एअरपोर्ट सब से नजदीक है.
रेलमार्ग से : हावड़ापटना मुख्य रेलमार्ग पर स्थित बख्तियारपुर रेलवे स्टेशन सब से नजदीकी स्टेशन है.
बोधगया
ईसा से 500 साल पहले बोधगया में ही गौतम बुद्ध को पीपल के पेड़ के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था. गया शहर से 15 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बोधगया निरंजन नदी के किनारे बसा हुआ है.  इस के आसपास कई तिब्बती मठ हैं. जापान, चीन, श्रीलंका, म्यांमार और थाईलैंड द्वारा यहां बनाए गए विशाल बौद्ध स्तूप पर्यटकों को लुभाते हैं.
बिहार में सब से ज्यादा विदेशी पर्यटक बोधगया ही आते हैं. गया शहर में भी कई पर्यटन स्थल हैं. पटना से 94 किलोमीटर की दूरी पर गया फल्गु नदी के किनारे बसा हुआ है. बराबर की गुफाओं में मौर्यकालीन स्थापत्यकला का बेहतरीन नमूना देखने को मिलता है.
सड़क मार्ग से : बोधगया पटना एअरपोर्ट से 109 किलोमीटर की दूरी पर है. गया एअरपोर्ट से इस की दूरी
8 किलोमीटर है.  दिल्लीहावड़ा रेलमार्ग पर गया रेलवे स्टेशन नजदीकी रेलवे स्टेशन है.
वैशाली
इस को विश्व का सब से पुराना गणतंत्र होने का गौरव प्राप्त है. प्राचीन वैशाली के अवशेष वैशाली जिला के बसाढ़ नामक गांव में पाए गए हैं.
यहां कई ऐतिहासिक और कलात्मक इमारतें हैं. राजा विशाल का किला, अशोक स्तंभ, बौद्ध स्तूप समेत कई इमारतें अपने बुलंद दिनों की गवाह बनी आज भी सीना ताने खड़ी हैं. वैशाली के कोल्हुआ गांव में स्थित अशोक स्तंभ को स्थानीय लोग ‘भीमसेन की लाठी’ भी कहते हैं. स्तंभ के ऊपर उत्तर की ओर मुंह किए हुए समूचे सिंह की मूर्ति बनी हुई है. यह अशोक स्तंभ आज भी भारतीय लोकतंत्र का प्रतीक चिह्न बना हुआ है.
स्तंभ से 50 फुट की दूरी पर एक तालाब है जिस के पास गोलाकार बौद्ध स्तूप बना हुआ है, जिस के ऊपर के भवन में बुद्ध की मूर्ति है. वैशाली की कला काफी उच्चकोटि की थी और विश्वविख्यात नर्तकी आम्रपाली ने यहीं अपनी कला का जौहर दिखा कर दुनियाभर के कलाप्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया था.
सड़क मार्ग से : वैशाली से पटना एअरपोर्ट से 60 किलोमीटर और पटना रेलवे स्टेशन से 54 किलोमीटर की दूरी पर है.
नजदीकी रेलवे स्टेशन हाजीपुर और मुजफ्फरपुर हैं.
गया एअरपोर्ट सेवैशाली की दूरी तकरीबन169 किलोमीटर है.

मेरे एक दोस्त ने 10 साल पहले पढ़ाई छोड़ दी थी, अब उस के पास क्या स्कोप है?

सवाल

मेरे एक दोस्त को 10 साल पहले अपनी फैमिली प्रौब्लम की वजह से 12वीं की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी. मेरे फ्रैंड की स्ट्रीम कौमर्स थी. वह अभी नौकरी कर के अपनी फैमिली की मदद करता है. अब अगर उसे अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू करनी हो तो उस के पास क्या स्कोप है जिस से कि वह पढ़ाई भी कर सके और अपनी फैमिली को फाइनैंशियली सपोर्ट भी करता रहे?

जवाब

10 साल के बाद अगर आप का फ्रैंड अपनी पढ़ाई पुन: शुरू करने का इच्छुक है तो यह खुशी की बात है. आप का मित्र जहां रहता है, उस क्षेत्र की डिस्टैंस ऐजुकेशन प्रोवाइड करवाने वाली यूनिवर्सिटी से सारी औपचारिकताएं हासिल करें. अच्छी शिक्षा से जहां अच्छी नौकरी मिलने के चांसेज बढ़ते हैं वहीं अच्छी नौकरी से व्यक्ति स्वयं भी फाइनैंशियली स्ट्रौंग बनता है और परिवार के सदस्यों का अच्छे से पालन पोषण भी कर सकता है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

‘ए होली कांसीपरेंसी’: इंसानी सोच कटघरे में’

रेटिंग: तीन स्टार

निर्माताः इंडो अमेरिकन प्रोडक्शन ,वालजेन

मीडिया ओर एएमसी मीडिया

निर्देशक: सैबल मित्रा

कलाकारः नसिरूद्दीन शाह, सौमित्र

चटर्जी,कौशिक सेन,अमृता चट्टोपाध्याय,श्रमण चटर्जी

अवधि: दो घंटे 23 मिनट

कहां देखेंः नजदीकी सिनेमाघरों में 29 जुलाई से

सिनेमा समाज का दर्पण होता है. सिनेमा का काम है लोगों का मनोरंजन करते हुए सामाजिक मुद्दों को पूरी मुखरता के साथ उठाना. अफसोस इस कसौटी पर बौलीवुड का कमर्शियल सिनेमा पूरी तरह से असफल है और शायद यही वजह है कि अब धीरे धीरे बौलीवुड सिनेमा से लोग दूर भागने लगे हैं.इन दिनों देश व समाज में जिस तरह से धार्मिक कट्टरता को बल मिल रहा है,जिस तरह से अपरोक्ष रूप से ही सही पर इंसानी सोच व उसके बोलने पर बंदिशे लग रही हैं, उस दौर में लेखक व निर्देशक सैबल मित्रा बंगला भाषा में फिल्म ‘ए होली कांसीपरेंसी’ लेकर आए हैं. यह फिल्म बंगला भाषा में है, मगर इसके कुछ संवाद हिंदी व अंग्रेजी भाषा में भी हैं और फिल्म में अंग्रेजी भाषा में भी सब टाइटल्स दिए गए हैं. इस फिल्म को कलकत्ता स्थित फिल्म प्रमाणन बोर्ड ने पारित किया है. फिल्म ‘‘ए होली कांसीपरेंसी’ देखते वक्त अगर दर्शक को ‘ भीमा कोरेगांव’ जैसे कई मामले बरबस याद आ जाएं, तो कुछ भी गलत नहीं होगा.

यूं तो सैबल मित्रा की फिल्म ‘‘ए होली ’’ एक अमरीकन नाटक ‘‘‘इनहेरिट द विंड’’’ और अमरीकन फिल्म ‘‘ पर आधारित है. 1925 में अमेरीका में एक -िरु39याक्षक को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया था, क्योंकि वह जीवन की उत्पत्ति और क्रमिक विकास के बारे में प-सजय़ा रहा था. उसके  बाद मामला अदालत में चला था.लंबी बहस हुई थी. इसे ‘मंकी ट्रायल’ की संज्ञा दी गयी थी. लेकिन जीवन के विकास सबंधी वैज्ञानिक सिद्धांत और मान्यताओं के बीच जो बहस एक सदी से ज्यादा पुरानी हो गई, आज भी जारी है.

यह मुकदमा उन दिनों दुनियाभर में खूब चर्चित हुआ था. इसी वि-ुनवजयाय पर अमेरिका का चर्चित नाटक ‘इनहेरिट द विंड’ लिखा गया. मगर वर्तमान परिस्थितियों में यह फिल्म आवष्यक हो गयी थी. इस फिल्म में नसिरूद्दीन शाह के साथ बंगला कलाकार सौमित्र चटर्जी की भी समानांतर भूमिका है, जिनकी 2020 में कोविड के दौरान मृत्यू हो गयी थी. पर इस फिल्म के प्रदर्शन में दो वर्षों से अधिक का समय लग गया, जिसकी वजह पता नहीं चली फिल्म में स्थानीय आदिवासियों पर सवर्ण हिंदुओं के उत्पीड़न से लेकर धार्मिक नेताओं को बहुसंख्यकवादी ताकतों द्वारा मजबूर किए जाने सहित कई मुद्दे उठाए गए हैं. इसलिए फिल्म देखते समय हर इंसान को पूरी संवेदनशील होने की जरुरत है.

कहानीः

फिल्म की कहानी बंगाल में हिलोलगंज गांव की है, जहां संथाल जनजाति के लोगों की बहुतायत है, जो ईसाई धर्म में परिवर्तित हो गए हैं. फिल्म की कहानी के केंद्र में स्थानीय चर्च द्वारा वित्त पो-िुनवजयात हिलोलगंज क्रिष्चियन हाई स्कूल के षिक्षक मूलतः संथाल आदिवासी कुणाल जोसेफ बस्के हैं.

जिनके पिता ने आर्थिक व अन्य सहूलियतें पाने के लिए क्रिश्चियन धर्म अपना लिया था. कुणाल की शिक्षा भी क्रिश्चियन स्कूल में ही हुई. पर कुणाल (श्रमण चटर्जी ) सोच विचार करने वाला शिक्षक है.वह धार्मिक कट्टरता से परे है.

कुणाल (एक ईसाई होने के बावजूद) अपनी जीवविज्ञान /बायोलौजी की कक्षा में डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत से पहले उत्पत्ति की पुस्तक को पढ़ाने से इंकार कर देता है. स्थानीय पादरी के साथ उंच स्थानीय समुदाय इसे कुणाल का ‘ई-रु39यानिंदा‘ वाला कार्य मानता है. कुणाल दावा करते हैं कि वह बाइबल का अपमान नहीं कर रहे थे.एक उग्र पत्रकार हरि (कौ-िरु39याक सेन) कुणाल की तुलना रोहित वेंमुला से करता है, क्योंकि वह अपने गोत्र संथाल के बारे में भी बात करता है.जबकि चर्चा के पादरी की बेटी रेशमी (अमृता चट्टोपाध्याय) कुणाल को स्कूल से निकालने के साथ ही उन पर कई तरह के मनग-सजयंत आरोप लगाकर जेल भेज दिया जाता है. कहानी आगे बढ़ती है,तो पता चलता है हिंदुत्ववादी ताकतों के प्रतीक राजनीतिक नेता बाबू सोरेन के इशारे पर ही स्थानीय पुलिस, चर्च का पादरी, स्कूल के प्रिंसिपल व अदालत के जज काम करते हैं.

कुणाल को बाबू सोरेन के इषारे पर ही यह सजा मिली है.क्योंकि कुणाल ने वैदिक युग की वैज्ञानिक उपलब्धियों के बारे में स्कूल को भेजी गयी ‘‘सं-रु39याोधित‘‘ पाठ्यपुस्तक को पढ़ाने से इंकार कर दिया था.यह पुस्तक दावा करती है कि 14वीं -रु39याताब्दी में हिंदू संतों ने हवाई जहाज की खोज की थी या कैसे गणे-रु39या प्लास्टिक सर्जरी में पहला प्रयोग किया गया. कुणाल के जेल जाने के बाद उन्हें एक विचाराधीन कैदी के रूप में लंबे समय तक कारावास का सामना करना पड़ता है. अंततः तमाम प्रयासों के बाद अदालत में कुणाल पर लगे आरोपों की सुनवायी शुरू होती हैं. चर्च व स्कूल की तरफ से सांसद व सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील बसंत कुमार चटर्जी (सौमित्र चटर्जी) तथा कुणाल के बचाव के रूप में सुप्रीम कोर्ट के ही दिग्गज वकील एंटोन डिसूजा (नसीरुद्दीन -रु39यााह) बहस करते हैं.एंटोन डिसूजा का दे-रु39या में ब-सजय़ते धार्मिक ध्रुवीकरण से मोहभंग हो गया है. यूं तो अदालत में बहस का मूल मुद्दा धर्म और विज्ञान है, मगर दोनों वकीलों की आपसी बहस के बीच यह मुद्दा भी आता है कि उंची जाति व धर्म से जुड़े लोग किस तरह नीची जाति वालों को दबाने व खत्म करने का रच रहे हैं. नीची जाति व आदिवासियों की बोलने व सोचने की आजादी भी छीनी जा रही है. सवाल उठाए जाते हैं कि क्या पौराणिक कथा विज्ञान पर हावी है?  क्या आस्था के नाम पर ताकतवर एजेंडें के तहत काम कर रहे हैं..बहस इस बात पर भी होती है कि सोचने का अधिकार परीक्षण पर है अथवा एक इंसान पर मुकदमा चल रहा है?पूरी बहस,जज के रवैए व अदालत में बाबू सोरेन की मौजूदी से दर्शक को लगता है कि अदालत का निर्णय शिक्षक कुणाल के पक्ष में नहीं जाएगा. मगर अदालत कुणाल को निर्दो-ुनवजया करार देती है.

लेखन व निर्देशनः

लेखक व निर्देशक सैबल मित्रा अपने वि-ुनवजयाय की तरह भारी संवादों और भाषाओं के बजाय तथ्यों और वारंटियों परटिके रहते हैं.वह दूसरे को चमकदार बनाने के लिए किसी विचार का उपहास नहीं करते. कटघरे में खड़ा इंसान हर आम इंसान का प्रतिनिधित्व करता है. दर्शक महसूस करता है कि ‘जज’ की कुर्सी पर बैठा इंसान भी -रु39याक्ति षाली लोगों द्वारा उत्पीड़ित है.इसे रेखांकित करना आसान नहीं था. फिल्म इस बात पर जोर देती है कि हर इंसान को सोचने और वि-रु39यवासों का पालन करने का अधिकार है.लेकिन यह सब उस पर थोपा नहीं जाना चाहिए. लेकिन अगर यह बुनियादी कानून जनता की सम-हजय में आ जाए, तो राजनीति नहीं चलेगी,एजेंडा नहीं चलेगा और हमारे बीच सद्भाव होगा जो अब तक सिर्फ एक रु39याब्द है.फिल्मकार ने एक बहुत बड़े मुद्दे का उठा तो लिया, मगर उसे कहा कैसे खत्म किया जाए, यह उन्हें पता नहीं. इसी वजह से कुणाल के निर्दो-ुनवजया साबित होने की बाद भी फिल्म 15 मिनट तक आगे खींची गयी है. इसी तरह फिल्म की शुरूआत भी काफी नीरस व धीमी गति से होती है. फिल्मकार ने सड़कों पर, अदालत के अंदर, अदालत के बाहर भगवान राम की वेषभूषा पहने हुए एक इंसान नजर आता रहता है,पर इस पर फिल्म में कोई टिप्पणी नही है. शायद इस इंसान के माध्यम से फिल्मकार यह कहना चाहते हैं कि ईश्वर ने कभी भी सुरक्षा की मांग नहीं की. कोर्ट रूम ड्रामा वाली यह फिल्म दे-रु39या के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिदृ-रु39यय पर भी कटाक्ष करती है.

फिल्मकार ने बड़ी चतुराई से धर्म की राजनीति के बारे में बात करती है कि जिसके चलते एक निर्दो-ुनवजया व्यक्ति को बिना सुनवाई के महीनों जेल में बिताने के लिए मजबूर किया जा सकता है.

फिल्म को काफी यथार्थपरक -सजयंग से फिल्माया गया है.मसलन-ंउचय जज के बैठने के स्थान पर अदालत की टूटी हुई छत, या आदिवासी लोग अपने रिश्तेदारों से मिलने के लिए चिलचिलाती गर्मी में जेल के बाहर इंतजार कर रहे हैं, जबकि एक उच्च वर्ग का व्यक्ति आसानी से कुछ ही मिनटों में जेल में चला जाता है और अपनी एसी कार में बैठ जाता है. यहां तक कि वह परिदृ-रु39यय जहां हर भगवान को इस तरह दिखाया गया है कि वह जमीन पर अपनी प्राथमिकता साबित करने को कर रहे हैं.

फिल्म भारत के इतिहास को मिटाए जाने और स्कूल की पाठ्यपुस्तकों को एक निश्चित दल की सोच के अनुरूप बदलने पर भी रोशनी डालती है. यह फिल्म महाधर्म बनाम विज्ञान या आधुनिक -िरु39याक्षा बनाम छद्म विज्ञान की कहानी नहीं है, बल्कि किसी व्यक्ति या पूरे समुदाय की आवाज दबाने की भी बात करती है.

फिल्म कहीं न कहीं इस तथ्य को भी स्वीकार करती है कि ईसाई वास्तव में अल्पसंख्यक हैं, लेकिन इससे गलतियाँ कम नहीं होती हैं.यह फिल्म छद्म हिंदू राजनेताओं के ‘घरवापसी‘ के जुनून और वोट बैंक से इसके सीधे संबंध के बारे में बात करती हैं?कुल मिलाकर फिल्मकार ने बहुत कुछ कहने के अदम्य साहस का परिचय दिया है.

अभिनयः

फिल्म के दोनों मुख्य कलाकारों नसिरूद्दीन षाह व सौमित्र चटर्जी की अभिनय क्षमता पर कोई सवाल नही उठाया जा सकता. दोनों का अभिनय उच्च श्रेणी का है.बाइबल पर अंध भक्ति वाले बसंत चटर्जी का किरदार जिस -सजयंग से उन्होंने निभाया, वह हर कलाकार के वष की बात नही है. पिता के विचारों और प्रेमी कुणाल के विचारों के बीच दुविधा में जी रही रेशमी व प्रेमी को बचाने की बेबसी के किरदार को अमृता चट्टोपाध्याय ने जीवंतता प्रदान की है.

पूरी फिल्म में कुणाल के हिस्से बहुत कम संवाद आए हैं, मगर अपने विचारों की दृ-सजय़ता,न -हजयुकने के इरादे सहित हर भाव को उन्होने अपने चेहरे से व्यक्त कर खुद को बेहतरीन अभिनेता साबित करने में सफल रहे हैं. वह अपने चेहरे के भावों से इस बात को रेखांकित करने में सफल रहते हैं कि वह स्थानीयन राजनेताओं के लिए अपना वोट बैंक भरने के लिए बलि का बकरा है. पत्रकार हरी के किरदार में कौशिक सेन अपनी छाप छोड़ जाते हैं.

65 साल की उम्र में महाभारत के ‘नंद’ ने ली अंतिम सांस, पढ़ें खबर

टीवी इंडस्ट्री से बुरी खबर सामने आ रही है. दरअसल महाभारत के नंद यानी रसिक दवे (Rasik Dave) का निधन हो गया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक 65 वर्षीय रसिक दवे का किडनी फेलियर की वजह से निधन हो गया.

रसिक दवे टीवी इंडस्ट्री के मशहूर एक्टर थे. उन्होंने कई बड़े शोज में काम किया है. रसिक दवे ‘महाभारत’ में वह ‘नंदा’ के किरदार में नजर आए थे. आखिरी बार  उन्हें ‘एक महल हो सपनों का’ में देखा गया था.

 

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रसिक दवे की पत्नी एक्ट्रेस केतकी दवे टीवी और बॉलीवुड की जानी मानी एक्ट्रेस हैं. केतकी दवे स्टार प्लस के सुपरहिट शो ‘क्योंकि सास भी कभी बहू’ में नजर आ चुके हैं. रसिक ने हिंदी और गुजराती फिल्मों में काम किया.

 

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रसिक अपने पीछे पत्नी केतकी, एक बेटे और एक बेटी को छोड़ गए हैं. साल 2006 में केतकी और रसिक एक साथ रियलिटी टीवी शो ‘नच बलिए’ में नजर आए थे. रसिक के निधन पर फैंस और सेलिब्रिटी  सोशल मीडिया पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं.

 

 

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आधारशिला- भाग 4: किस के साथ सफलता बांटनी चाहती थी श्वेता

श्वेता के संदर्भ में उस चिडि़या का याद आना मुझे बड़ा अजीब लगा. मैं ने स्कूल में पुनीत को फोन किया. मेरी कंपकंपाहटभरी आवाज सुन कर शायद वे मेरी दुश्चिंता भांप गए और बोले, ‘धीरज रखिए, मैं आधे दिन की छुट्टी ले कर आप के घर आऊंगा.’

निश्चित समय पर पुनीत आए. मैं जितनी बेचैन थी, वे उतने ही शांत लग रहे थे.

मैं ने कहा, ‘आप को सुन कर अवश्य आश्चर्य होगा, पर मैं आज कुछ अलग ही तरह की बात कहने जा रही हूं,’ मैं ने अपनेआप को स्थिर कर के कहा, ‘आप श्वेता से शादी कर लीजिए, कहीं वह प्रेम में पागल हो कर आत्महत्या न कर ले.’ यह कहतेकहते फफकफफक कर रो पड़ी.

‘अपनेआप को संभालिए. श्वेता अभी बच्ची है मेरी छोटी बहन के समान. उस की उम्र अभी शादी की नहीं, सुनहरे भविष्य के निर्माण की है, जिस की आधारशिला हमें अपने हाथों से रखनी होगी.’

‘वह तो ठीक है, लेकिन आज उस ने पत्र लिखा है, जिस में…’

‘वह पत्र उस ने मुझे दिया है, आप घबराएं नहीं. जब तक मैं उसे नकारात्मक उत्तर नहीं दूंगा, तब तक कुछ नहीं होगा. अभी तक मैं ने उस के प्रेम को स्वीकारा नहीं है, तो नकारा भी नहीं है.’

‘लेकिन यह स्थिति कब तक कायम रहेगी?’ मैं ने पूछा.

‘अधिक दिन नहीं,’ वे बोले, ‘यह तो हम जान ही चुके हैं कि श्वेता का ऐसी हरकतें करना कुछ तो उस की किशोर उम्र का परिणाम है और कुछ फिल्मों का मायावी संसार उसे यह सबकुछ करने को उकसाता रहा है, क्योंकि वह फिल्में देखने की बहुत शौकीन है.’

‘जी हां, मगर फिल्म और वास्तविकता के बीच का फर्क उसे समझाएं तो कैसे. और समझ में आने पर भी क्या प्यार का भूत उस के सिर से उतर जाएगा?’

पुनीत कहीं और देख रहे थे, जैसे उन्होंने मेरा प्रश्न सुना ही न हो, फिर एकाएक बोल पड़े, ‘अब आप निश्चिंत रहिए. उस का यह फिल्मी तिलिस्म फिल्मी ढंग से ही टूटेगा.’ और वे चले गए.

मेरे मन में आया कि पति से इतनी गंभीर बात छिपा कर मैं कहीं गलती तो नहीं कर रही हूं. मगर जब औफिस से लौटने पर इन का थकाहारा चेहरा देखती तो बस, यही लगता कि इन के सामने ऐसी गंभीर समस्या न ही रखूं. यदि मैं अपने स्तर पर यह समस्या सुलझा सकूं तो बहुत अच्छा होगा और फिर पुनीत का पूरा साथ है ही. दूसरी बात, इन के गुस्से का भी क्या ठिकाना. यदि गुस्से में आ कर इन्होंने कोई कठोर कदम उठाया तो श्वेता न जाने क्या कर बैठे.

गनीमत यही थी कि पुनीत बहुत चरित्रवान थे. यदि वे छिछोरे युवकों जैसे होते तो हम कहीं के न रहते.

अगले दिन पुनीत हमारे घर फिर आए. श्वेता हमेशा की तरह बेहद खुश हुई. अब वे अकसर ही हमारे घर आने लगे. शायद श्वेता को इस बात से विश्वास हो चला था कि वे भी उसे चाहते हैं.

जब भी वे आते, अपने बारे में कुछ न कुछ ऊलजलूल बोलते चले जाते.

श्वेता कहती, ‘सर, यह चश्मा आप पर बहुत फबता है,’ तो कहते, ‘जानती हो, इस का नंबर है माइनस फाइव. 35 की उम्र तक पहुंचतेपहुंचते मैं अंधा हो जाऊंगा.’

श्वेता भी उन की बातों से कुछ ऊबती हुईर् नजर आती.

एक रोज वे घर पर आए. ठीक उसी वक्त फ्यूज उड़ जाने से बिजली चली गई. श्वेता उन से बोली, ‘मैं फ्यूज वायर ला देती हूं, आप जोड़ दीजिए.’

‘मैं और फ्यूज?’ वे इस तरह घबराए, जैसे कोई अनोखी बात सुन ली हो, ‘श्वेता, फ्यूज तो दूर, मैं बिजली का मामूली से मामूली काम भी नहीं जानता. करंट लगने से मैं बेहद डरता हूं.’

श्वेता ने उन की ओर आश्चर्य से देखा, ‘सर, फ्यूज तो मैं भी जोड़ लेती हूं. बस, मीटर बोर्ड कुछ ऊंचा होने के कारण आप से कह रही हूं.’

श्वेता ने मेज पर स्टूल रखा और फ्यूज ठीक कर दिया. पुनीत यह सब खामोशी से देख रहे थे.

रात को खाना खाते समय श्वेता हंसतेहंसते यह घटना अपने पिताजी को सुना रही थी. इतना लंबाचौड़ा युवक और फ्यूज सुधारने जैसा साधारण काम नहीं कर सकता. उस की हीरो वाली छवि को इस घटना से बड़ा धक्का लगा था.

पर उस रोज मैं न हंस पाई. मैं जानती थी कि पुनीत ने जानबूझ कर ऐसी हरकत की थी.

एक रोज उन्होंने एक और मनगढ़ंत घटना सुनाई कि जब वे कालेज में पढ़ते थे, एक चोर घर के अंदर घुस आया. वे चुपचाप सांस रोके लेटे रहे. चोर अलमारी में रखे 5-7 सौ रुपए ले कर भाग गया.

श्वेता उन की ओर अविश्वास से ताकती रही, फिर बोली, ‘कुछ भी हो, आप को उसे पकड़ने की कोशिश तो करनी ही चाहिए थी. आप के साथसाथ समाज का भी कुछ भला हो जाता.’

‘समाज के लिए मरमिटूं, मैं ऐसा बेवकूफ नहीं हूं,’ वे बोले. फिर कुछ क्षण ठहर कर कहने लगे, ‘समाज हमारे लिए क्या करता है? यों तो लोग दहेज विरोधी बातें भी खूब करते हैं, पर मैं क्यों न लूं दहेज? क्या समाज मेरी बहनों की मुफ्त में शादी करवा देगा?’

श्वेता कुछ नहीं बोली, अपने सपनों के राजकुमार की खंडित प्रतिमा को वह किसी तरह जोड़ नहीं पा रही थी.

उस के कुछ दिन बड़ी मानसिक ऊहापोह में गुजरे. फिर एक रोज उस ने शायद अपने कमजोर मन पर विजय पा ही ली.

एक दिन वह बोली, ‘मां, कुछ लोग ऐसे क्यों होते हैं?’

‘कैसे?’ मैं उस के प्रश्न का रुख समझ रही थी, फिर भी पूछ लिया.

‘देखने में बड़े आदर्शवादी, समाज सुधारक और बड़ीबड़ी बातें करने वाले और अंदर से धोखेबाज, मक्कार और झूठे हैं. जैसे, जैसे पुनीत सर.’ आंसू छिपाती हुई वह अपने कमरे में चली गई. मुझे उस के दिए हुए ये विशेषण बिलकुल अच्छे नहीं लगे. मैं सोच रही थी कि मेरी बेटी को सही राह पर लाने वाला व्यक्ति सिर्फ महान, समझदार और व्यवहारकुशल हो सकता है और कुछ नहीं.

मैं ने उसे समझाया, ‘बेटी, दुनिया में कई तरह के लोग होते हैं. सभी हमारी आकांक्षाओं के अनुरूप  नहीं होते. वे जैसे भी होते हैं, अपनी जगह पर सही होते हैं. इसलिए उन्हें बुराभला कहना ठीक नहीं.’

श्वेता ने मुझ से बहस नहीं की, पर धीरेधीरे उस का पुराना रूप लौटने लगा. मैं खुश थी.

एक दिन पुनीत का फोन आया कि श्वेता अब उन्हें पत्र नहीं लिखती, उन से दूसरी छात्राओं की तरह  ही पेश आती है. तब मैं ने उन्हें दिल से धन्यवाद दिया.

जिस तरह नाजुक हाथों से उलझे हुए रेशम को सुलझाया जाता है, उसी तरह नफासत से उन्होंने श्वेता के दिल की गुत्थी को सुलझाया था.

उस वर्ष वह जैसेतैसे द्वितीय श्रेणी ही पा सकी, जोकि स्वाभाविक ही था. लगभग पूरा वर्ष उस ने प्रेमवर्ष के रूप में ही तो मनाया था. पर उस के बाद वह पूरी तरह पढ़ाई में जुट गई. और अब उस का सपना भी पूरा हो गया.

श्वेता के डाक्टर बन जाने की खबर मैं पुनीत को देना चाहती थी, मगर देती कैसे? एक वर्ष पहले ही वे नौकरी छोड़ कर कहीं दूसरी जगह जा चुके थे. शायद महान व्यक्ति ऐसे ही होते हैं, किसी तरह के श्रेय  या जयजयकार की कामना से दूर, खामोशी से हर कहीं सुगंध बिखेरने वाले.

पतझड़ में वसंत- भाग 2: सुषमा और राधा के बनते बिगड़ते हालात

‘मुझे भूल तो न जाएगी?’ सुषमा ने पूछा.

‘नहीं, कभी नहीं. जब जी करे, फोन कर लेना. मैं यहीं हूं, यहीं रहूंगी. यह तेरी सहेली, तेरे वापस आने का इंतजार करेगी,’ राधा ने उसे गले लगाते हुए कहा.

जाने के बाद राधा सोच रही थी, क्यों उस ने सुषमा से कहा, ‘तेरे वापस आने का इंतजार करूंगी. कहीं बुरा न मान गई हो. इस बात को 10 साल हो गए, लगता है सुषमा से मिले सदियां गुजर गईं. क्या उसे आज भी वे पुरानी बातें याद होंगी? आएगी, तो पूछूंगी. वैसे उस की खनकती हंसी और मुसकराती आंखें आज भी उस की उपस्थिति का उसे एहसास कराती हैं.

वक्त कभीकभी कितने सितम ढाता है, कौन जानता है? एक ऐक्सिडैंट में राधा के पति की अचानक मृत्यु हो गई. उस की तो दुनिया ही लुट गई. बच्चों ने एक बार फिर दोहराया, ‘मम्मी, यहां कैसे अकेली रहोगी, हमारे साथ अमेरिका में रहना ठीक होगा.’

‘नहीं, तुम्हारे पापा मुझे यहीं बैठा गए हैं. इस घर में आज भी तुम्हारे पापा हैं, उन के साथ जुड़ी यादें है. मुझे अभी यहीं रहने दो.’

‘बेटे अनिल और सुनील मां के मन की दशा को समझते थे. सो, चुप रहे. हां, एक पुरानी कामवाली व उस के बेटे से कहा, ‘आज से, तुम दोनों हमारे घर में ही रहोगे. कोई तो हो जो मां के साथ हो.’ कामवाली कमला और उस के बेटे बौबी को, अनिल और सुनील अच्छी तरह जानते थे, सो, तसल्ली थी.

ऐसे समय पर राधा को सुषमा की बड़ी याद आई. वक्त से बढ़ कर मरहम भी कोई नहीं है. फिर भी बच्चों ने सलाह दी कि मम्मी को कोई काम पकड़ना चाहिए. काम में व्यस्त रहेंगी तो मन लगा रहेगा.

राधा ने एक एनजीओ जौइन कर लिया. वक्त आसानी से कट जाता. लेकिन कई बार उसे लगता, 5 कमरों के इस दोमंजिले घर का ऊपरी हिस्सा तो बंद ही रहता है. साफसफाई के साथ आएदिन मरम्मत की जरूरत भी मुंहबाए खड़ी रहती है. कई लोगों ने बच्चों को सलाह दी, ‘इस मकान को बेच दो, अच्छे पैसे मिल जाएंगे? बदले में मां को एक छोटा फ्लैट खरीद दो. आधे दाम में एवन सोसायटी में बड़ा अच्छा फ्लैट मिल सकता है.’

‘वक्त की दौड़ में शामिल होना समझदारी हो सकती है. पर मेरे घर को ले कर ऐसा कुछ सोचना, समझदारी न होगी. नहीं, इस घर में हमारा बचपन बीता है, हमारे बचपन की मीठी यादें इस से जुड़ी हैं. यह घर हमारे दादीदादा की धरोहर है. इस का कोई मोल नहीं है.’ बेटों के मुंह से पति की भाषा सुन कर राधा को बड़ी खुशी हुई.

‘क्यों न हम ऊपर की मंजिल को किराए पर चढ़ा दें?’ बेटों ने प्रस्ताव रखा.

‘यह ठीक रहेगा, चहलपहल भी रहेगी और आमदनी भी होगी,’ राधा को बात पसंद आई. ऊपर की मंजिल में एक लाइब्रेरी है जिसे एक ट्रस्ट चलाता है. किराया भी अच्छा मिल जाता है. यह बच्चों की सूझबूझ से हुआ है. इस बीच, आसमान में बदलों के गरजने की जोरदार आवाज आई तो राधा के विचारों का सफर खत्म हुआ.

आज जब राधा को, सुषमा का मेल आया तो वह लाइब्रेरी में ही थी. ट्रस्ट के मैनेजर कई बार उस से कह चुके हैं ‘मैडम, हमें कोई लाइब्रेरियन बताएं. हमारे पास कोई लाइब्रेरियन नहीं है.’ वह सोच रही थी, ‘काश, आज सुषमा होती…’ ईमेल फिर से पढ़ कर सोचने लगी, ‘क्या जवाब दूं?’

‘प्रिय सुषमा

‘तेरी तरह मैं भी तुझे कभी नहीं भूली. यह दिल, घर का यह दरवाजा हमेशा ही तेरे स्वागत में खुला है. यह हिंदुस्तान है, यहां लोग किसी के घर पूछबता कर नहीं आते. फिर तू ने क्यों पूछा? शायद, विदेशी सभ्यता में ढल गई है. आएगी तो कान खींचूंगी, भला अपनी सभ्यता क्यों भूली.

‘तेरी अपनी राधा.’

एक दिन सुबहसुबह दरवाजे पर सुषमा को देख राधा चौंक पड़ी

‘‘अरे, यह कैसा सुखद संयोग.’’

‘‘लो, तूने ही तो मुझे याद दिलाया था कि यह हिंदुस्तान है. बस, मुंह उठाए चली आई. कोई शक?’’

‘‘नहीं, कोई शक नहीं,’’ राधा ने देखा, दोनों के मिलनसुख में सुषमा के नयन कटोरे छलछला रहे हैं. राधा भी अपने को रोक न सकी. दोनों सहेलियां बहुत देर तक अनकहे दुख से एकदूसरे को भिगोती रहीं. पतियों की बातें, उन की मृत्यु का दुखद आगमन, फिर बच्चे. बच्चों की बात पर सुषमा चुप हो गई. राधा को कुछ अजीब सा लगा.

सो, आगे कुछ भी न बोली. सोचा, थकी है शायद, जैटलैग उतरेगा, तभी सामान्य हो पाएगी. बच्चों की बातें फिर कभी.

सुषमा को आए डेढ़ महीना गुजर गया था. पर चेहरे की उदासी न गई. हंसताखिलखिलाता चेहरा जैसे वह अमेरिका में ही छोड़ आई थी.

‘‘क्या तुझे यहां मेरे घर में कुछ परेशानी है?’’ राधा के मन में कहीं अपराधबोध भी था.

‘‘अरे नहीं, बस यों ही,’’ सुषमा बात को टालना चाहती थी.

एक दिन एनजीओ से लौटी तो देखा सुषमा फूटफूट कर रो रही थी.

उसे रोता देख राधा घबरा गई, ‘‘क्या हुआ? बताती क्यों नहीं. मुझ से तो कहती है, मैं तेरी सहेली हूं. फिर क्यों अंदर ही अंदर घुट रही है?’’

यह सुन कर सुषमा का रोना और तेज हो गया.

राधा ने उसे झकझोर कर कहा, ‘‘मैं जो समझ पा रही हूं वह शायद यह है कि कोई ऐसी बात तो जरूर है जो तू मुझ से छिपा रही है. वैसे, मैं होती कौन हूं यह सब पूछने वाली? मैं तेरी कलीग ही तो हूं. बहुत बदल गईर् है, तू.’’

द्रौपदी मुर्मू: “राष्ट्रपति- राष्ट्रपत्नी” विवाद और “संसद”

देश को विकास के जिस रास्ते पर दौड़ पड़ना चाहिए उसकी जगह  “संसद” में राष्ट्रपति और राष्ट्रपत्नी का प्रयोजित विवाद, देश के लिए दुर्भाग्य जनक है. वस्तुत: संसद से बाहर कहे गए राष्ट्रपत्नी शब्द के लिए संसद के भीतर बवाल सत्ता पक्ष की देश के प्रति जवाबदेही पर प्रश्न चिन्ह है. जिस संसद का एक-एक मिनट देश के हित और भले के लिए खर्च होना चाहिए वहां सत्ता पक्ष जान समझ कर अगर वोट की राजनीति करने लगे राष्ट्रपति के आदिवासी समुदाय से जुड़े होने को लेकर के यह संदेश प्रसारित करने लगे कि कांग्रेस तो आदिवासी विरोधी है, यह कहने लगे कि जिस ने गलती की है उसकी जगह कांग्रेस आलाकमान सोनिया गांधी माफी मांगनी चाहिए तो यह क्या कुतर्क नहीं है, गलत नहीं है.

कांग्रेस के एक नेता अधीर रंजन चौधरी द्वारा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के लिए ‘राष्ट्रपत्नी’ शब्द का प्रयोग कर देने के जिस तरह संसद में जमकर हंगामा हुआ.वह देश की गिरती राजनीति का परिणाम है. भारतीय जनता पार्टी के मंत्री और सांसदों ने आखिर अपने  दिशा निर्देशक के संकेत पर इस मामले को पूरे देश में फैला देने का अपराध  किया है. दरअसल भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि कांग्रेस और उसकी नेता श्रीमती सोनिया गांधी  आदिवासी समुदाय के साथ कैसा व्यवहार कर रहे हैं और हम तो भाई आदिवासी समाज को सर आंखों पर बैठा रहे हैं. वस्तुतः देखा जाए तो एक छोटे से मसले को देशव्यापी बनाने का अपराध भारतीय जनता पार्टी और उसके नेताओं ने किया है उसके लिए भाजपा को देश से माफी मांगी चाहिए.

क्या यह दुखद नहीं है कि बेवजह

हंगामे की वजह से राज्यसभा और लोकसभा में कोई कामकाज नहीं हुआ और दोनों सदनों को दो बार स्थगित करना पड़ा. इसके बाद भी हंगामा शांत नहीं हुआ तो पहले लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और बाद में राज्यसभा के अध्यक्ष एम वेंकैया नायडू ने सदन के जरूरी दस्तावेज पेश कराकर सदन को  स्थगित कर दिया. इस मौके का फायदा उठा कर के

भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस को आदिवासी, महिला और गरीब विरोधी करार देते हुए कहा कि इस मामले में मुख्य विपक्षी दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी को माफी मांगनी चाहिए.उधर कांग्रेस ने दावा किया कि लोकसभा में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और कई भाजपा नेताओं ने सोनिया गांधी के साथ अपमानजनक व्यवहार किया, जिसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को माफी मांगनी चाहिए.

सच्चाई तो यह है कि

अधीर रंजन चौधरी ने अपनी सफाई में कहा कि चूकवश उनके मुंह से एक शब्द निकल गया था, जिसका भाजपा तिल का ताड़ बना रही है. रंजन ने संसद में कहा कि वे राष्ट्रपति मुर्मू से मुलाकात कर माफी मांगेंगे.

मामले को ट्विस्ट करते हुए संसद परिसर में स्मृति ईरानी ने कहा कि इस मामले में सोनिया गांधी को भी माफी मांगनी चाहिए. जब इस मामले में सोनिया गांधी से पूछा गया कि क्या वे चौधरी से माफी मांगने के लिए कहेंगी, तो उन्होंने कहां की अधीर रंजन पहले ही माफी मांग चुके हैं .

देखा जाए तो इसके बाद मामला खत्म हो जाना चाहिए मगर भाजपा इसे देश के गांव-गांव तक पहुंचाना चाहती है और इसे अपने पक्ष में वोटों में तब्दील करना चाहती है भाजपा की यही रीति नीति उसे क्या रसातल में नहीं ले जाएगी. छोटा सा मामला गलती या चूक क्या इतना बड़ा विषय है कि संसद ठप हो जाए?

सदन से बाहर, सदन के अंदर

सदन के बाहर अगर कोई आपत्तिजनक बात कही जाती है तो उसके लिए कई संवैधानिक संस्थाएं हैं जहां संज्ञान लेकर के उन्हें दंडित किया जा सकता है. जैसा कि राष्ट्रपति राष्ट्र पत्नी मामले में भी महिला आयोग ने संज्ञान लिया है. ऐसे में संसद में एक जिम्मेदार मंत्री के रूप में स्मृति ईरानी का मामले को तूल देना यह सिद्ध करता है कि भारतीय जनता पार्टी की मंशा क्या है संसद में आप स्वयं उन शब्दों का उपयोग कर रहे हैं बोल रहे हैं जो संसद से बाहर बोले गए हैं. संसद में बोल कर के आप उन्हें रिकॉर्ड में लेने का या देश के जन जन तक पहुंचाने का अपराध नहीं कर रहे हैं.

देखिए लोकसभा में भाजपा की वरिष्ठ नेता स्मृति ईरानी ने कहा कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने सदन से बाहर देश की पहली महिला आदिवासी राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के लिए ‘राष्ट्रपत्नी’ शब्द का प्रयोग कर के उनका अपमान किया है. स्मृति ने कहा कि यह इस देश का गौरव है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 75 साल की आजादी में पहली बार किसी गरीब आदिवासी महिला को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया.  कांग्रेस के पुरुष नेताओं ने द्रौपदी मुर्मू को ‘कठपुतली’ और ‘अमंगल का प्रतीक’ तक कहा.

संसद से बाहर हुई बेफिजूल की बातों को संसद में दोहराना सीधे-सीधे भारतीय जनता पार्टी और उसकी प्रिय नेता स्मृति ईरानी की मंशा के स्पष्ट कर गया है.

गौर करने की बात यह है कि स्मृति ईरानी ने फिर वहीं, ऐसी ऐसी बातें कहीं जो भाजपा और उसके नेता पहले  संसद के बाहर बोल चुके  हैं.

उन्होंने कहा कांग्रेस पार्टी आदिवासी महिला का यह सम्मान पचा नहीं पा रही है. वह गरीब परिवार की बेटी का देश की राष्ट्रपति बनना बर्दाश्त नहीं कर पा रही. स्मृति ईरानी के साथ भाजपा के अनेक सांसदों ने इस टिप्पणी का विरोध किया और ‘माफी मांगो’ का नारा लगाते हुए अपनी सीट पर खड़े हो गए. हंगामे के बीच लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने बाद में सदन को दिनभर के लिए स्थगित कर दिया .

मैं अपने पति के साथ फिजिकल रिलेशन बनाना चाहती हूं, पर वो थके होने के कारण जल्दी सो जाते हैं, मैं क्या करूं?

सवाल

मेरी शादी को 2 साल हो गए हैं. मेरे पति बहुत व्यस्त रहते हैं जिस कारण रात में अकसर थके हुए होते हैं. थकावट के चलते वे खाना खा कर सीधा सो जाते हैं. मेरा मन सैक्स करने का होता है पर उन के थके होने के कारण हम सैक्स नहीं कर पाते. मैं क्या करूं जिस से मेरी यह परेशानी हल हो?

जवाब

सैक्स जीवन की प्रक्रिया है और इस में कोई दोराय नहीं कि सैक्स पतिपत्नी के बीच प्यार को और मजबूत बनाता है. यदि आप के पति रात को थक कर जल्दी सो जाते हैं तो इस में टैंशन लेने की कोई जरूरत नहीं है. सैक्स करने का कोई टाइम नहीं होता. जब समय मिले, आप पति के साथ जम कर सैक्स का लुत्फ उठाइए बशर्ते कि आप के पति को सैक्स में रुचि होनी चाहिए. इस के लिए आप को पहल करनी पड़ेगी. आप उन्हें दिन में या सुबह में ही सैक्स के लिए उकसाएं या फिर जब भी वक्त मिले. रात का चक्कर ही न पालें. ऐसा करने से धीरेधीरे इस समस्या से आप बाहर निकल आएंगी और पति से कोई शिकायत भी नहीं रहेगी.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

कार्डियक एरीथिमिया के संकेतों को समझें

सोनल एक दिन औफिस में एअरकंडीशंड हौल में काम कर रही थी. अचानक उसे पसीना आने लगा, चक्कर आया और वह थोड़ी देर के लिए बेहोश हो गई. पिछले कुछ हफ्तों के दौरान उस ने कभीकभी चक्कर आना महसूस किया था पर इस का कारण समझ में नहीं आया. उसे लगा कि काम पूरा करने की चिंता और काम की अधिकता में ऐसा हुआ होगा. उस ने इन घटनाओं को नजरअंदाज कर दिया. सप्ताहभर बाद उसे मृत पाया गया. नींद में ही उस की मौत हो गई थी. सवाल उठता है कि क्या उसे दिल का दौरा पड़ा था या फिर जानलेवा एरीथिमिया का हिस्सा था?

विशेषज्ञ कहते हैं कि कार्डियक एरीथिमिया के समय महिलाएं जो कुछ महसूस करती हैं उस की बात हो तो हमें वक्षस्थल में दर्द से आगे तक सोचने की जरूरत है. यह तथ्य कि महिलाओं का हृदय पुरुषों की तुलना में अलग है, आश्चर्य के रूप में नहीं लिया जाना चाहिए. सांस लेने में असुविधा, थकान, अचानक पसीना आना, चक्कर आना, धड़कन बढ़ जाना और जी मिचलाना जैसे संकेतों को हर किसी को होने वाली चीज मान कर नजरअंदाज करने के बजाय इस पर दोबारा विचार करने की जरूरत है. हृदय की धड़कन अनियमित होने से हर साल बड़ी संख्या में महिलाओं की मौत हो जाती है. हर साल होने वाली ऐसी घटनाओं की बढ़ती संख्या के कारण यह समझना जरूरी है कि महिलाओं में कार्डियक एरीथिमिया के लक्षण के रूप में किस चीज की तलाश की जाए. ठंड में भी अचानक पसीना आना, धड़कन बढ़ जाना, सोने में गड़बड़ी, लंबे समय तक असामान्य थकान और याददाश्त की समस्या कुछ असामान्य लक्षणों में हैं और महिलाएं आसन्न कार्डियक एरीथिमिया की शुरुआती चेतावनी के रूप में प्राप्त करती हैं.

समय के साथसाथ अपने हृदय की धड़कन पर नजर रखना आप को अपने हृदय के स्वास्थ्य की स्थिति तय करने और तदनुसार उपचार कराने में सहायता कर सकता है. एक्सटर्नल लूप रिकौर्डर यानी ईएलआर जैसे उपकरण हृदय की धड़कन को लंबे समय तक (7 से 30 दिन) स्क्रीन और रिकौर्ड करने में सहायता कर सकते हैं और इस से स्थिति का सही अनुमान लगाने में सहायता मिल सकती है. ईएलआर के बारे में : एक्सटर्नल लूप रिकौर्डर यानी ईएलआर एंबुलैटरी कार्डियक मौनिटर है और इस से कार्डियक एरीथिमिया के संदिग्ध मामलों का पता लगाने में सहायता मिलती है. इस के लिए कार्डियक एरीथिमिया के संदिग्ध मरीजों में रिमोट टैक्नोलौजी का उपयोग किया जाता है. इस सिस्टम में एक चैस्टपैच शामिल है जिसे मरीज के सीने पर पट्टी की तरह लगा दिया जाता है. यह नहाने जैसी मरीज की दैनिक गतिविधियों में किसी को भी बाधित नहीं करता है. मरीज को अपने साथ एक ट्रांसमीटर रखना होता है जो देखने में सैलफोन जैसा है. पैच इलैक्ट्रौनिक होता है जिसे इस तरह प्रोग्राम किया जाता है कि वह मरीज का ईसीजी रिकौर्ड करता है.

पैच को जब एरीथिमिया का पता चलता है तो यह एरीथिमिया की घटना का ईसीजी ट्रांसमीटर के जरिए एक निगरानी केंद्र को भेजता है. वहां प्रमाणित ईसीजी तकनीशियन रहते हैं. निगरानी केंद्र में प्रशिक्षित कार्डियक तकनीशियन ईसीजी का विश्लेषण करते हैं और निगरानी अवधि के अंत में एक व्यापक रिपोर्ट भेजते हैं. गंभीर एरीथिमिया को ‘अर्जेंट एपिसोड’ के रूप में वर्गीकृत किया जाता है. जैसे ही ऐसी एरीथिमिया का पता चलता है, एक रिपोर्ट भेज दी जाती है. जरूरी नहीं है कि हृदय की धड़कन से संबंधित समस्या, जिस में अचानक मौत का खतरा हो, बहुत ही नाटकीय तौर पर सामने आए. कभीकभी व्यक्ति को सिर्फ चक्कर आ सकता है या धुंधला लग सकता है या यह भी संभव है कि एक क्षण के लिए सबकुछ गायब हो जाए या कुछ समय के लिए उस का संतुलन खत्म हो जाए. हृदय की धड़कन तेज हो जाना इस के साथ का लक्षण हो सकता है. हालांकि, ऐसा अगर डाक्टर की उपस्थिति में न हो तो इसे समझना और इस का पता लगाना बेहद मुश्किल हो जाता है. ईएलआर जैसा रोग निदान का नया साधन तब बेहद सहायक होता है, समस्या को सही ढंग से समझा जा सकता है और एक बहुमूल्य जान बचाई जा सकती है.

वैसे तो एकदूसरे से जुड़ी जटिल हृदय प्रणाली को स्वस्थ रखना मुख्यरूप से आप के नियंत्रण में है पर हृदय की कुछ समस्याएं स्वस्थ रहने के तमाम प्रयासों के बावजूद हो सकती हैं. इसलिए हमेशा कहा जाता है कि स्थिति को नियंत्रण में रखिए और अनजानी परिस्थिति आने से रोकिए.            

(लेखक फोर्टिस एस्कोर्ट्स हार्ट इंस्टिट्यूट, नई दिल्ली में कार्डियोलौजी विभाग के एग्जीक्यूटिव डायरैक्टर और डीन हैं)

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