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कुहनी और घुटने में कालापन बहुत ज्यादा है, कैसे हटाएं?

सवाल

मेरी उम्र 16 साल है. मेरे हाथपैरों के मुकाबले कुहनी और घुटने में कालापन बहुत ज्यादा है. इस वजह से मैं शौर्ट ड्रैसेज नहीं पहनती. घरेलू उपाय बताएं ताकि यह कालापन दूर हो सके.

जवाब

कुहनी और घुटने की ऊपरी त्वचा थोड़ी मोटी और खुरदरी होती है जिस कारण से वहां मैल तेजी से जमने लगता है और इसे साफ करना आसान नहीं होता. लेकिन कुछ उपाय अपना कर इस समस्या से काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है.

दूध और हलदी का लेप कुहनी और घुटने पर लगाएं. थोड़ा सूखने पर रगड़ कर साफ करें. एलोवेरा का गूदा निकाल कर कुहनी और घुटने पर रोजाना लगाएं. नीबू के छिलकों के पाउडर में थोड़ा नीबू का रस व शहद मिला कर कुहनी और घुटनों पर उस का लेप लगाएं. कुछ दिनों बाद आप को फर्क नजर आएगा.

कौफी का इस्तेमाल चेहरे व आंखों के नीचे के कालेपन को दूर करने के लिए किया जाता है. कुहनी और घुटनों के कालेपन दूर करने में भी इस से मदद मिल सकती है. कौफी के साथ एलोवेरा मिला कर उस का लेप लगाना भी फायदेमंद हो सकता है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

Rakhi 2022: मुंहबोले भाई बहन को समय की जरूरत

स्नेहा अपने मातापिता की एकलौती संतान होने के कारण बहुत लाड़ली थी. स्कूल में उस के दोस्त भी बहुत थे लेकिन इस के बाद भी स्नेहा को अपने भाई की कमी महसूस होती थी. खासकर रक्षाबंधन पर तो वह अपने भाई की कमी बहुत महसूस करती. जैसेजैसे स्नेहा बड़ी हो रही थी उसे भाई की कमी काफी खलने लगी थी.

जब वह कक्षा 8 में पढ़ रही थी तभी उस के पड़ोस में सुरेश और नेहा का परिवार आ कर रहने लगा. पड़ोस में रहने के कारण स्नेहा का उन के घर आनाजाना होने लगा, वहां स्नेहा को अपना हमउम्र राकेश मिल गया. राकेश स्नेहा से एक क्लास आगे था. उस ने स्नेहा के स्कूल में ही ऐडमिशन ले लिया. अब स्नेहा और राकेश के बीच मुंहबोले भाईबहन का रिश्ता बन गया. दोनों एकसाथ पढ़ने जाते थे. स्कूल में भी ज्यादातर एकसाथ रहते थे. स्नेहा को अब लगने लगा जैसे उस का कोई बड़ा भाई भी है. स्नेहा पहले से अधिक खुश रहने लगी. दूसरी ओर राकेश भी स्नेहा का साथ पा कर खुश रहने लगा था. दोनों का मन अब पढ़ने में लगने लगा था. इस से उन के पेरैंट्स भी खुश थे.

यह बात केवल स्नेहा और राकेश की ही नहीं है, आज कई ऐसे बच्चे हैं जो अकेले होते हैं. कई बच्चों को अकेलापन परेशान करने लगता है, जिस से वे मानसिक रूप से परेशान हो जाते हैं. ऐसे में मुंहबोले भाईबहन जैसे रिश्ते समय की जरूरत बन जाते हैं. मुंहबोले भाईबहन के रिश्ते दोस्ती से अधिक मजबूत होते हैं, क्योंकि इन में एकदूसरे की भावनाओं का ज्यादा खयाल रखा जाता है.

समाजशास्त्री डाक्टर रेखा सचान कहती हैं, ‘‘मुंहबोले भाईबहन के रिश्ते बहुत जरूरी होते हैं. यह समय की जरूरत बनते जा रहे हैं. वैसे तो ऐसे रिश्ते इतिहास में भी मिलते हैं. मुगल बादशाह हुमायूं और चित्तौड़गढ़ की महारानी कर्णवती की कहानी ऐसे रिश्तों की पुष्टि करती है. कर्णवती राजा राणासांगा की पत्नी थी. वह हुमायूं को राखी बांधती थी. दोनों के बीच मुंहबोले भाईबहन का रिश्ता था. एक बार युद्ध के समय कर्णवती ने हुमायूं से मदद मांगी तो हुमायूं ने अपनी सेना सहित उन की मदद की.’’

एकल परिवार बने वजह

समाज में पहले संयुक्त परिवार का चलन था. जहां बच्चों को तमाम भाईबहन मिल जाते थे, जो सगे भाईबहन की कमियों को पूरा करते थे. छुट्टियों में बच्चे अपने नातेरिश्तेदारों के यहां रहते थे जिस से उन के बीच बेहतर रिश्ते बन जाते थे. अब यह चलन करीबकरीब बंद हो गया है. बच्चों पर पढ़ाई का इतना बोझ पड़ने लगा है कि वे छुट्टियों को तो भूल ही गए हैं. केवल बच्चे ही नहीं बल्कि उन के पेरैंट्स को भी छुट्टी नहीं मिलती. ऐसे में मुंहबोले भाईबहन समय की जरूरत बन गए हैं. कई बार बच्चे अपनी जो बातें मातापिता, सगे भाईबहन से नहीं कह पाते वे बातें मुंहबोले भाईबहन से कह देते हैं.

दिल्ली की रहने वाली पुनीता शर्मा कहती हैं, ‘‘मुंहबोले भाईबहन में यह जरूरी नहीं होता कि वे एक ही जाति या धर्म के हों. अलगअलग जाति और धर्म वाले भी मुंहबोले भाईबहन का रिश्ता बेहतर निभा सकते हैं. यह समय की ही नहीं समाज की भी जरूरत है. ऐसे रिश्तों से बेहतर भविष्य और समाज की संरचना हो सकती है. समाज में ऐसे तमाम रिश्ते दिखते हैं जहां मुंहबोले भाईबहन के बीच बेहतर कमिटमैंट और सहयोग होता है. कई बार तो यह रिश्ते सगे रिश्तों से भी अधिक कारगर साबित होते हैं. ’’

दोस्ती से ज्यादा भरोसा

किशोरावस्था में दोस्ती के रिश्ते बहुत बनते हैं. मुंहबोले भाईबहन के रिश्ते दोस्ती से कहीं अधिक जिम्मेदारी भरे होते हैं. दोस्ती बनतीबिगड़ती रहती है पर ऐसे रिश्ते आसानी से टूटते नहीं हैं. दोस्ती में जहां कई तरह की परेशानियां आ जाती हैं वहीं मुंहबोले भाईबहन के रिश्तों में हमेशा एक बंधन होता है. मुंहबोले भाईबहन के रिश्तों में परिवार भी जुड़ा होता है. ऐसे में यहां पर भरोसा दूसरे रिश्तों के मुकाबले ज्यादा होता है. परिवार के साथ होने से यह रिश्ते ज्यादा समय तक और भरोसे के साथ चलते हैं. मुंहबोले भाईबहन के रिश्ते में दोनों ही तरफ से जिम्मेदारियां ज्यादा होती हैं. परिवार के साथ होने से ऐसे रिश्तों में कोई परेशानी या तनाव आता है तो उस को दूर करना सरल होता है.

लखनऊ के लालबाग गर्ल्स इंटर कालेज में पढ़ने वाली रितिका अग्निहोत्री कहती है, ‘‘आज के समय में ज्यादातर किशोर उम्र के बच्चे ऐसे रिश्तों और उन की जरूरतों को कम समझ पाते हैं. समाज को ऐसे रिश्तों की बहुत जरूरत है. ऐसे रिश्तों से समाज में बेहतर माहौल बनता है. मुंहबोले भाईबहन के रिश्ते दोस्ती से ज्यादा गंभीर होते हैं. इन को समझ कर सहेजने की जरूरत है.’’

तालमेल बैठाना जरूरी

कोई भी रिश्ता हो उस में तालमेल और खुलेपन का होना जरूरी होता है. जब तक आप उस रिश्ते को सही से समझेंगे नहीं, उसे निभा नहीं पाएंगे. मुंहबोले भाईबहन के रिश्ते के प्रति यह समझना जरूरी होता है कि यह प्रेम और खून के रिश्ते जैसा नहीं होता. कभीकभी इस में दूरी भी आती है. यह दूरी कई वजहों से आ सकती है. जब ऐसे रिश्तों में दूरी आए तो परेशान होने की जरूरत नहीं होती, बल्कि आपसी तालमेल से गलतफहमियों को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए.

संजोली श्रीवास्तव कहती हैं, ‘‘मुंहबोले भाईबहन के रिश्ते किशोर उम्र में ही बनते हैं. इस के बाद भी इन का एहसास जीवनभर बना रहता है. ऐसे रिश्ते आगे चल कर पारिवारिक रिश्तों की तरह बन जाते हैं और सगे रिश्तों से भी अधिक गहरे हो जाते हैं. हर रिश्ते की तरह मुंहबोले भाईबहन का रिश्ता भी बहुत कमिटमैंट के साथ निभाने की जरूरत होती है. इस रिश्ते में विश्वास और ईमानदारी का होना बहुत जरूरी होता है. आज जहां समाज में लड़कियों के अनुकूल माहौल बनाने की बात की जा रही है वहीं ऐसे रिश्तों की भी बहुत जरूरत महसूस होती है.’’

रिश्तों का अपनापन

मुंहबोले भाईबहन के रिश्ते में कोई बड़ी मजबूरी नहीं होती. यह दिल से बनते हैं और हंसीखुशी निभाए जाते हैं. लखनऊ के लामार्टिनियर गर्ल्स स्कूल में पढ़ने वाली दिया मनशा कहती है, ‘‘मुंहबोले भाईबहन के रिश्ते में अपनापन होता है. उस में एक भरोसा होता है. कैरियर के बारे में किशोरावस्था में तमाम तरह के सवाल मन में चलते रहते हैं. ऐसे में आपस में सलाह कर सही दिशा मिल जाती है.

‘‘यह बात सही है कि नए दौर में यह रिश्ते गुम से होते जा रहे हैं लेकिन इस के बाद भी ऐसे रिश्तों की जरूरत खत्म नहीं होती. इन को बनाए रखना समाज की जरूरत हो गई है.’’

अनुपम तिवारी कहता है, ‘‘मुंहबोले भाईबहन एकदूसरे की बेहतर मदद कर सकते हैं. इन को आपस में एकदूसरे के परिवार और घर की भी जानकारी होती है. ऐसे में यह घरपरिवार को सामने रख कर सलाह देते हैं जो ज्यादा बेहतर साबित होती है. हम इन रिश्तों के साथ खुद को ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं. ऐसे में इन रिश्तों को सहेजने और बनाए रखने की भरपूर जरूरत है.’’

Anupamaa: पाखी मांगेगी अनुपमा से माफी! वनराज करेगा ये काम

टीवी सीरियल ‘अनुपमा’ में  इन दिनों लगातार ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. जिससे दर्शकों का फुल एंटरटेनमेंट हो रहा है. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि अनुपमा शाह हाउस में न आने का वादा करती है तो दूसरी तरफ बापूजी पाखी और वनराज को बददुआ देते हैं. शो के आने वाले एपिसोड में खूब धमाल होने वाला है. आइए बताते हैं शो के नए एपिसोड के बारे में.

शो के आने वाले एपिसोड में आप देखेंगे कि शाह हाउस से जाने के बाद अनुपमा फूटफूट कर रोएगी. अनुज उसे सहारा देगा. दूसरी तरफ बापूजी अपने परिवार को खरी-खोटी सुनाएंगे.

 

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बापूजी वनराज को बददुआ भी देंगे. वह कहेंगे कि तुम इतने दिनों से नौकरी ढूंढ रहे हो, लेकिन तुम्हें नौकरी मिली, नहीं. क्योंकि तुम लोग बार-बार घर की लक्ष्मी का अपमान करते हो. तेरी यह बेटी बार-बार अपनी मां का अपमान करती रही, लेकिन तू चुप रहा.

 

काव्या भी बापूजी का साथ देते है. वह पाखी से कहती है कि बदतमीज लड़की को तो खींचकर एक थप्पड़ लगाना चाहिए. शो में आप ये भी देखेंगे कि पाखी वनराज से कहती है कि जब वह अपनी मां का अपमान कर रही थी तो किसी ने उसे रोका क्यों नहीं, या किसी ने उसे चांटा क्यों नहीं मारा. वह अपनी मम्मी से माफी मांगना चाहती है.

 

तो वहीं वनराज उसे रोक देता है और कहता है कि जो हुआ सो हुआ, लेकिन अब तू  कपाड़िया हाउस में कभी नहीं जाएगी. शो में अब ये देखना होगा कि पाखी और अनुपमा के रिश्ते का दरार कैसे खत्म होगा?

कोविड के बाद कम न हो आयरन

सेहत के लिए आयरन जरूरी है. कोविडकाल में लोगों को स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याओं से गुजरना पड़ा है. ऐसे में जरूरी है कि स्वास्थ्य पर ध्यान दिया जाए और सही मात्रा में शरीर में आयरन की जरूरत पूरी की जाए.

आयरन हमारे शरीर के लिए एक अत्यावश्यक मिनरल है. इस की आवश्यकता शरीर को लाल रक्त कणिकाओं में पाए जाने वाले हीमोग्लोबीन के निर्माण के लिए होती है, जो शरीर के विभिन्न अंगों पर ऊतकों में औक्सीजन पहुंचाने का काम करता है. शरीर में आयरन की कमी से लाल रक्त कणिकाओं और हीमोग्लोबीन का निर्माण प्रभावित होता है. हीमोग्लोबीन का निर्माण प्रभावित होने से खून की कमी हो जाती है जिस से थोड़ा सा काम करने में ही थकान महसूस होने लगती है. ऐसी स्थिति में सीढि़यां चढ़ने में सांस फूलना, हृदय की धड़कनों का असामान्य हो जाना, सिरदर्द, एकाग्रता में कमी, मांसपेशियों में दर्द जैसी समस्याएं हो सकती हैं.

स्वस्थ बालों, त्वचा और नाखूनों के लिए भी आयरन जरूरी है. अगर गर्भवती महिलाओं में आयरन की कमी होती है तो समय से पहले प्रसव का खतरा बढ़ जाता है.

आयरन की कितनी मात्रा है जरूरी

आप को प्रतिदिन कितनी मात्रा में आयरन की आवश्यकता है, यह उम्र, लिंग और स्वास्थ्य पर निर्भर करता है. नवजात शिशुओं और छोटे बच्चों को आयरन की आवश्यकता अधिक होती है. एक तो उन का शरीर विकसित हो रहा होता है, दूसरा उन की इम्यूनिटी कमजोर होती है. इसलिए उन में इन्फैक्शन का खतरा अधिक होता है.

4-8 वर्ष के बच्चे के लिए

10 मिलिग्राम प्रतिदिन.

9-13 साल के बच्चे के लिए

8 मिलिग्राम प्रतिदिन.

14-50 वर्ष की महिलाओं के लिए

18 मिलिग्राम प्रतिदिन.

14-50 वर्ष के पुरुष के लिए

8 मिलिग्राम प्रतिदिन.

पुरुष और महिलाएं दोनों

गर्भवती महिलाओं को आयरन की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है. इस दौरान महिलाओं को अपने भोजन में आयरन की मात्रा 10-20 मिलिग्राम प्रतिदिन के हिसाब से बढ़ा देनी चाहिए.

कोविड के 2 माह बाद आयरन होमियोस्टेसिस रह सकता है जिस का शरीर के अंगों पर असर होता है. ऐसी स्थिति में कई तरह का एनीमिया हो सकता है, इसलिए डाक्टर के निरंतर संपर्क में रहना जरूरी है. कोविड लंग्स में ही कई और जगहों पर अपने निशान छोड़ जाता है.

आयरन की मात्रा पर दें ध्यान

संतुलित भोजन लें जिस में मांस, अंडे, साबुत अनाज, सूखे मेवे, फल और हरी पत्तेदार सब्जियां भरपूर मात्रा में हों.

अगर किसी महिला को मासिकधर्म के दौरान रक्तस्राव अधिक हो तो तुरंत डाक्टर को दिखाएं क्योंकि इस से शरीर में तेजी से आयरन की कमी हो सकती है.

अगर कोई महिला मां बनने वाली है या वह मां बनना चाहती है तो डाक्टर की सलाह से आयरन के सप्लीमैंट जरूर लें.

समय से पहले जन्मे बच्चों में आयरन की कमी हो जाती है. ऐसे बच्चों के खानपान पर विशेष ध्यान दें.

आयरन से भरपूर भोजन का सेवन करें.

आयरन सही तरह से शरीर में एब्जौर्ब हो सके, इस के लिए विटामिन सी की पर्याप्त मात्रा जरूरी है.

आयरन की कमी से होने वाली स्वास्थ्य समस्याएं

एनीमिया : आयरन की कमी से एनीमिया हो जाता है. यह शरीर से अधिक मात्रा में रक्त निकलने के कारण होता है. आयरनयुक्त भोजन या आयरन के सप्लीमैंट्स ले कर इसे दूर किया जा सकता है.

हृदय की धड़कनों का आसामान्य हो जाना- आयरन की कमी के कारण औक्सीजन की पूर्ति करने के लिए हृदय को अधिक रक्त पंप करना पड़ता है, जिस से हृदय की धड़कनें सामान्य हो जाती हैं. अगर आयरन की अत्यधिक कमी है तो हृदय का आकार बड़ा हो सकता है या हार्ट फेल भी हो सकता है.

गर्भावस्था में समस्याएं : गर्भावस्था के दौरान जिन महिलाओं में आयरन की अत्यधिक कमी होती है उन के बच्चे का विकास प्रभावित होता है और बच्चे का जन्म भी समय से पहले हो सकता है.

रिस्क फैक्टर्स : महिलाओं में आयरन की कमी ज्यादा होती है. विशेषरूप से उन महिलाओं में जो धूम्रपान करती हैं या जिन्हें मासिकधर्म के दौरान अधिक रक्तस्त्राव होता है, शाकाहारी लोगों को भी आयरन की कमी होने की आशंका अधिक होती है. बच्चे के विकास के कारण गर्भवती महिलाओं में भी आयरन की कमी हो जाती है. कैंसर के कारण छोटी आंत में दरार आने से और पेट में अल्सर होने से भी आयरन के अवशोषण में कमी आ जाती है. इस के अलावा बवासीर और हर्निया से पीडि़त लोगों में भी आयरन की कमी होने की आशंका ज्यादा रहती है.

कितने कारगर हैं सप्लीमैंट्स

वैसे हमें अपने पोषक तत्त्व खाद्य पदार्थों से ही प्राप्त करने चाहिए लेकिन अगर आप के शरीर में आयरन की अत्यधिक कमी है तो आप आयरन के सप्लीमैंट्स ले सकते हैं. लेकिन सप्लीमैंट्स लेने से पहले डाक्टर की सलाह अवश्य ले लें.

आयरन के सप्लीमैंट्स लेने के कई साइड इफैक्ट्स भी होते हैं, जैसे पेट खराब हो जाना, जी मिचलाना, उलटी होना, डायरिया, मल का रंग गहरा हो जाना, कब्ज आदि. अगर आप आयरन के सप्लीमैंट्स ले रहे हैं तो अपने भोजन में फाइबर की मात्रा बढ़ा दें.

समानांतर चलती कहानियां: आरुषि और सुरुचि का क्या किरदार था

आरुषि ने अपनी जुड़वां बहन सुरुचि से हमदर्दी जताते कहा कि तुम इतने सालों से इस नरक में अपनी जिंदगी कैसे गुजार रही हो? पापा ने तुम्हारी सहायता नहीं की, तो इस गंद के खिलाफ तुम्हें ही आवाज उठानी चाहिए थी. जब तुम ने अपने लिए कुछ नहीं किया तो किसी और से उम्मीद कैसे कर सकती हो? और हां…

जिंदगी में हर कहानी के समानांतर एक कहानी चलती है, जिस का लेखक उस कहानी से जुड़ा मुख्य किरदार स्वयं होता है. उसी के व्यवहार और क्रियाकलाप के अनुसार कहानी अपने रंग बदलती है. इन दोनों कहानियों के इर्दगिर्द ढेरों किरदार अपनीअपनी भूमिका जीवंत करने में जुटे रहते हैं. उन किरदारों का व्यवहार और नजरिया समानांतर चल रहे उन दोनों कथानकों के मुख्य किरदार के प्रति मौके और मतलब के अनुसार बदलते रहते हैं.

अपने इर्दगिर्द चल रहे उन किरदारों के बदलते रवैए को आरुषि और सुरुचि मौसी की जिंदगी ने बखूबी समझा. ये दोनों मम्मी की सहेलियां थीं, जुड़वा बहनें. जमींदार परिवार की आनबान मानी जाती हैं बेटियां, क्योंकि शान माने जाने का अधिकार तो बेटों के ही पास रहा.

मम्मी अकसर उन की चर्चा किया करती थी, ‘आरुषि के परिवार में बेटियों की शादी में पैसे, सोनेचांदी के अलावा ढेरों गाय, बैल, भैंस, घोड़े देने की परंपरा सालों से चलती आ रही थी. उन के घर में बेटियों पर दिल खोल कर खर्च किया जाता था सिवा उन की पढ़ाई के.’

आरुषि की शादी तय हो चुकी थी, मेहमान आ चुके थे. सारा घर मेहमानों से भरा था. शादी के 2 दिनों पहले काफी देर होने पर जब आरुषि ने कमरे का दरवाजा नहीं खोला तो उस की छोटी चाची ने जा कर दरवाजा खटखटाया. दरवाजा अंदर से बंद नहीं था, इसलिए खुल गया. भीतर जाने पर पता चला कि आरुषि कमरे में नहीं है.

यह खबर पूरे घर में बिजली की भांति कौंध गई. जांचपड़ताल करने पर पता चला कि आरुषि के पिता रघुवीर चाचा के एक दोस्त कनक बाबू का बेटा हेमांग भी गायब है. वे लोग बोकारो से इसी शादी में शामिल होने आए थे. इसी गांव के थे और रघुवीर चाचा से उन की पुरानी दोस्ती थी सालों पहले उन का परिवार बोकारो में बस गया था. लेकिन संबंध अभी भी उसी तरह कायम था. इन लोगों का एकदो साल में आनाजाना और मिलना हो जाता था. जब भी वे लोग गांव आते थे तो रघुवीर चाचा के घर पर ही रुकते थे क्योंकि उन का अपना पुश्तैनी घर सालों से बंद था. इतने भरेपूरे परिवार में कभी किसी को यह शक नहीं हुआ कि आरुषि का हेमांग से कोई संबंध है.

अगर दोनों बच्चों ने यह बात अपने परिवार वालों को बताई होती तो शायद वे अपनी दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने के लिए तैयार भी हो जाते लेकिन उस वक्त कोई मातापिता बच्चों को इतना हक देते कहां थे कि वे अपनी पसंद और शादी की बात उन से कर सकें.

आरुषि के पिता दबंग किस्म के इंसान थे. उन की सोच में घर की औरतें पैरों में पहनी जाने वाली खुबसूरत मोजरी के समान हुआ करती हैं. उन तक आरुषि के गायब होने की खबर पहुंचते ही वे सीधे आंगन में आए और बिना कुछ बोले चाची को कमरे में ले गए. दरवाजा बंद हुआ और अंदर से तब तक चीखनेचिल्लाने की आवाजें आती रहीं जब तक वे पीटते हुए थक नहीं गए.

पति के सामने हमेशा चुप रहने वाली चाची भी आज रोते हुए चिल्ला रही थीं, “मार डालो मुझे, कम से कम आज मेरी एक बेटी तो इस कैद से आजाद हो गई. 2 दिनों बाद इस कैद से आजाद हो कर तुम्हारी ही तरह किसी और भेड़िए के हाथों की कठपुतली बन कर रह जाती.” थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला और चाचा दनदनाते हुए बाहर चले गए.

कुछ देर बाद आरुषि के छोटे चाचा ने आ कर घर के मालिक का फरमान सुनाया, “आरुषि की जगह अब सुरुचि की शादी की तैयारी शुरू करो.”

सुरुचि शादी के लिए तैयार थी या नहीं, किसी ने उस से पूछना जरूरी नहीं समझा. अकेले में चाची ने उसे जा कर समझाया, “बेटा, मेरी जिंदगी तो बीत गई. तुम्हारे सामने तुम्हारी पूरी जिंदगी पड़ी है. अभी बस तुम इस घर से चली जाओ. आगे जैसी तुम्हारी मरजी. अपने फैसले अगर खुद ले सको तो जरूर लेना. अपनी खुशियां हासिल करने का हक हर किसी को है. मेरी तरह घुटन में अपनी जिंदगी बरबाद मत करना. मेरा आशीर्वाद हर कदम पर तुम्हारे साथ रहेगा.”

धूमधाम से शादी संपन्न हो गई. सुरुचि उस घर की छोटी दुलहन और मधुर की पत्नी के रूप में ससुराल पहुंच गई.

विदाई के अगले ही दिन एक सुसाइड नोट लिख कर सुरुचि की मां ने फांसी लगा ली. ‘मैं अब तक अपने पति की ज्यादती बरदाश्त करती रही, बिना रीढ़ की हड्डी वाली अपनी जिंदगी व्यतीत करती रही पर अब और बरदाश्त नहीं होता. मेरी बेटियां अब इस घर से चली गई हैं. अब मैं अपनी वजूदहीन जिंदगी के बोझ को और बरदाश्त नहीं कर सकती. मैं अपनी मरजी से आत्महत्या कर रही हूं, इस के लिए किसी और को जिम्मेदार न माना जाए.’

बिना पुलिस को इस की खबर किए आननफानन चाची का अंतिम संस्कार कर दिया गया.

उधर आरुषि कनक बाबू के बेटे हेमांग के साथ बोकारो नहीं जा कर कहीं और चली गई. हेमांग के परिवार वालों ने पता लगाने की कोशिश की, लेकिन कुछ पता नहीं चलने पर वे लोग भी शांत बैठ गए.

करीब 10 वर्षों बाद हेमांग और आरुषि अचानक से बोकारो आए, साथ में अपने 9 साल के जुड़वां बच्चों हृदयंश और हिमांगी को ले कर. परिवार वालों ने हेमांग और आरुषि को कुछ यों अपनाया, जैसे कभी कुछ हुआ ही न हो.

पता चला कि वे दोनों घर छोड़ने के बाद सीधे बड़ौदा गए जहां कुछ दिन हेमांग अपने एक दोस्त के घर पर ठहरा. उसी की मदद से एक प्राइवेट फर्म में नौकरी की शुरुआत की और कुछ दिन बाद उन्होंने कोर्ट मैरिज कर ली. 2 साल बाद हेमांग ने अपने अनुभव के आधार पर कैमिकल लाइन में अपनी नई शुरुआत की.

मेहनत और लगन के योगदान से काम अच्छा चला और दोनों को समय ने मनचाही खुशियां दीं. पूरी तरह स्थापित होने के बाद अब उन दोनों ने घरवालों से मिलने का यह प्रोग्राम बनाया था.

कहते हैं सफलता और पैसा गुनाहों पर भी परदा डालने में सफल होता है, फिर ये दोनों तो बस अपनी खुशियां तलाशने निकले थे. और साथ ले कर आए थे रिश्तेदारों के लिए ढ़ेर सारी उम्मीदें. इन की अच्छीखासी संपत्ति के माध्यम से उन की चाहत पूरी हो सकती थी.

हेमांग के परिवार वाले आरुषि, हृदयंश और हिमांगी को ले कर रघुवीर चाचा के घर पहुंचे. कुछ देर की की चुप्पी के बाद चाचा बोले, “अब तो जो होना था हो चुका, अब पहले की तरह सामान्य हो कर तुम लोग अपना जीवन जियो.”

आंसूभरी आंखों से बस इतना ही बोल पाई आरुषि, “सबकुछ पहले की तरह सामान्य कैसे, क्या मां अब वापस आ पाएंगी?” यह कहतेकहते उस की आवाज भर्रा गई. हेमांग ने उसे थाम लिया और आरुषि फूटफूट कर रो पड़ी.

सुरुचि भी अपने हिस्से की जिंदगी को सहेजने की चाहत में उसे काटे जा रही थी. ससुराल आने के कुछ ही दिनों बाद उसे पता चला कि उस का पति मधुर अपनी विधवा भाभी के प्रेम में बुरी तरह जकड़ा हुआ है. इसे प्रेम कहना भी प्रेम का अपमान होगा क्योंकि अगर प्रेम होता तो मधुर ने उन के संग शादी की हिम्मत दिखाई होती. किसी लड़की की जिंदगी बरबाद करने बरात ले कर न जाता.

शुरूशुरू में सुरुचि अपने अंदर की उम्मीदों को सिंचित करती रही. उसे लगता था कि वह अपने व्यवहार से मधुर को सही रास्ते पर ले आएगी. जब तक सासससुर जिंदा थे, मधुर भाभी के कमरे में मौका देख कर जाता था. थोड़ा लिहाज बाकी था उस में. मातापिता को सब जानकारी थी, पर हर मांबाप की तरह वे भी किसी और की बेटी को अपने बिगड़ैल बेटे को सुधारने का मोह संवरण नहीं कर पाए थे.

उन्होंने एक लड़की की जिंदगी नरक में धकेलने के गुनाह की भरपाई की चाहत में अपनी आधी संपत्ति अपनी उस बहू के नाम पर कर दी जिस ने कभी पति का सुख पाया ही नहीं.

मायके वाले तो शादी कर के अपनी जिम्मेदारी की इतिश्री मान बैठे थे. एक बार मायके जाने पर सुरुचि के उतरे चेहरे को देख कर उस की चाची ने उस के दांपत्य जीवन की खोजबीन की थी. जब सुरुचि ने उन्हें हकीकत बताई तो उन्होंने एक संस्कारी महिला की तरह नसीहत दे डाली कि लड़की की डोली ससुराल जाती है और अर्थी ही वहां से बाहर निकलती है. इस के बाद नियति मान कर सुरुचि अपनी जिंदगी काटती जा रही थी.

मातापिता के निधन के बाद मधुर ने अपनी बचीखुची लोकलाज भी बेच खाई. अब वह दिन में भी भाभी वंदना के कमरे में जाने लगा था. सुरुचि की हैसियत अब उस घर की बस एक नौकरानी के समान रह गई थी.

अपने मायके वालों से मिलने के बाद आरुषि अपनी जुड़वां छोटी बहन से मिलने उस की ससुराल आई. जिस वक्त वह वहां पहुंची, मधुर घर पर नहीं था.

सुरुचि के उतरे चेहरे को देख कर जब उस ने उस से पूछा तो सुरुचि ने उसे सारी आपबीती बयां कर दी.

“तुम इतने सालों से इस नरक में अपनी जिंदगी कैसे गुजार रही हो? पापा ने तुम्हारी सहायता नहीं की, फिर भी इस गंद के खिलाफ तुम्हें आवाज उठानी चाहिए थी. जब तुम ने अपने लिए कुछ नहीं किया तो किसी और से उम्मीद कैसे कर सकती हो? चलो मेरे साथ, जो होगा देखा जाएगा और हां, यहां जो जमीन तुम्हारे नाम की गई है, उसे किसी को सौंपने का ख़याल भी मत लाना. उस पर तुम्हारे सासससुर ने बस तुम्हारा हक सौंपा है.”

आरुषि की बातों से हेमांग के चेहरे पर सहमति के भाव परिलक्षित हो रहे थे.

मधुर बाहर से आ कर सीधे अपनी भाभी वंदना के कमरे में गया. वहां उसे पता चला कि सुरुचि की बहन आई हुई है.

आरुषि ने सुरुचि से उस के बैग संभालने को कह कर उस से अपने साथ चलने को कहा.

वे लोग निकलने ही वाले थे कि सामने से मधुर आता हुआ दिखा, बेशर्म की तरह दांत निपोरते हुए बोला, “जितना ज्यादा दिन हो सके, अपनी इस बहन के साथ ही रहना. कुछ दिन मैं भी अपनी जिंदगी सुकून से जी सकूंगा. और हां, साली साहिबा, मेरा समय अच्छा था कि आप शादी के पहले ही साढ़ू जी के साथ भाग गईं. थोड़ीबहुत जिंदगी जो मैं जी रहा हूं, उस का मजा भी किरकिरा हो जाता क्योंकि आप की खुबसूरती देख मैं खुद को 2 नावों में सवार होने से नहीं रोक पाता और मैं एकसाथ 2 नावों पर पैर रख कर गिरने का खतरा मोल नहीं लेना चाहता.”

हेमांग गुस्से में मुट्ठी भींच कर मधुर की तरफ बढ़ा. मगर आरुषि ने उस के हाथ पकड़ लिए और जातेजाते यह कह कर गई, “सुरुचि अब तुम्हें जल्दी ही पूरी तरह आजाद कर देगी, जा कर तलाक के कागजात भिजवाती हूं. बस, उस संपत्ति की उम्मीद मत करना जो तुम्हारे पेरैंट्स ने सुरुचि के नाम किया है.”

समय अपनी निर्बाध गति से बढ़ता रहा. सुरुचि और मधुर का तलाक हो गया. कुछ वर्षों बाद ही हेमांग का एक विधुर दोस्त धवल ने सुरुचि के सामने शादी का प्रस्ताव रखा. धवल एक सुलझा हुआ इंसान था. सुरुचि ने इस शादी के लिए हामी भर दी और अपनी बची जिंदगी के लिए खुशियों के कुछ कतरे सहेजने में जुट गई. 2 साल बाद बेटी आन्या ने उन की जिंदगी में आ कर उसे और भी खुबसूरत बना दिया.

समय बीतता रहा. बच्चे बड़े हो गए. हृदयंश और हिमांगी ने हेमांग के बिजनैस में अपना सहयोग देते हुए उसे और बढ़ाया. दोनों ने मातापिता का आशीर्वाद ले कर अपनी पसंद की जीवनसाथी चुना और कुछ समय बाद अपनाअपना घर ले कर एक ही शहर में रिश्ते की मिठास को सहेजे खुशहाल जिंदगी का आनंद लेने लगे.

वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता, करवट लेना उस का स्वभाव है. 2020 में पूरे विश्व में कोरोना का प्रकोप फैला. लौकडाउन लगा. तमाम बंदिशों के बीच पता नहीं कैसे हेमांग, आरुषि और उन के 2 नौकर कोविड पौजिटिव पाए गए.

कोरेंटाइन और फिर हौस्पिटल के तमाम इंतजामों के बावजूद हेमांग को बचाया नहीं जा सका. दोनों बच्चों और सुरुचि के परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. उस की जिंदगी को सहेजने वाला हेमांगरूपी एक खंभा धराशायी हो चुका था और दूसरा खंभा जिंदगी और मौत के बीच जंग लड़ रहा था. आरुषि की हालत के मद्देनजर डाक्टर ने उसे हेमांग के बारे में बताने को मना किया था. बारबार वह हेमांग की हालत के बारे में पूछती, “कैसे हैं हेमांग?”

“ठीक हैं, सुधार हो रहा है,” कह कर उस की बात को टाल दिया जाता. ऐसा कहते वक्त परिवार का वह सदस्य किस मानसिक जद्दोजहेद को झेल रहा होता, इस का सही से शाब्दिक बयान कर पाना किसी के वश का नहीं.

आरुषि कहती, “हम दोनों को एक ही कमरे में क्यों नहीं रखवा देते?”

जवाब मिलता, “डाक्टर ने कहा है कि 2 बीमार एक कमरे में नहीं रह सकते.”

अपनी जंग में आरुषि भी वैंटिलेटर पर आ गई. 5 दिन वह वैंटिलेटर पर रही. इन्फैक्शन लिवर तक पहुंच गया था. आखिरकार एक और जिंदगी हार गई, मौत जीत गई.

हेमांग को गुजरे 11 दिन हो चुके थे. अगले दिन उन की बारहवीं थी. देररात आरुषि की तबीयत ज्यादा बिगड़ने लगी और सुबह 4 बजे उस ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया, बिना यह जाने कि अब उस का सुहाग भी इस दुनिया में नहीं है. आरुषि के चले जाने से हेमांग की बारहवीं भी उस दिन नहीं हो पाई. उन दोनों के बारहवीं की रस्म आरुषि के जाने के बारह दिनों बाद एकसाथ ही की गई.

कहते हैं, रिश्ता ऊपर से बन कर आता है पर इन दोनों ने अपना रिश्ता खुद बनाया, सामाजिक नियमों और परंपराओं के परे जा कर अपनी हिम्मत और कर्मों से निर्धारित किया. इस दुनिया को अलविदा कहते हुए अपने पीछे छोड़ गए अपने बच्चों के लिए गहरा दर्द और सामाजिक उसूलों व संस्कारों की दुहाई देने वाले लोगों के लिए ये वाक्य- ‘हेमांग और आरुषि एकदूसरे के लिए ही बने थे. हेमांग के बिना आरुषि जिंदा नहीं रह पाती. उस के जाने की खबर बरदाश्त नहीं कर पाती. इसलिए हेमांग अपने साथ आरुषि को भी ले गए.’

साथसाथ जिंदगी जीने के बाद इन दोनों ने अपनी मौत भी ऊपर वाले से एकसाथ ही मांग ली थी. जो लोग इन के घर छोड़ कर जाने से नाराज थे उन लोगों के लिए इन का प्रेम अब एक मिसाल बन चुका था, जो जिंदगी के साथ भी और जिंदगी के बाद भी एकदूसरे के ही बन कर रहेंगे. यह प्रेम लोगों के लिए एक शाब्दिक मिसाल बन चुका था, जो कुछ समय बाद उन की सोच में सामान्य हो जाएगा. लेकिन इन के अपने बच्चों और सुरुचि के परिवार पर इन के जाने का सचमुच फर्क पड़ा था और बहुत फर्क पड़ा था, जिस से उबरने में उन्हें काफी समय लगेगा. समानांतर चलती दोनों कहानियां अपनाअपना समय ले कर आई थीं.

भगोड़ी: आखिर क्या हुआ लता के साथ?

कितने सालों बाद वह उस शहर में आई थी, उस का अपना शहर जिस की गलियां, सड़कें और बाजार उसे उंगलियों पर याद थे. उस दिन बाजार में अचानक बगल वाले अमित अंकल मिल गए थे. औफिस के काम से इस शहर में आए थे. दुनिया सचमुच गोल है, सलिल और लता यही सोच कर इस बड़े शहर में आए थे कि उन्हें यहां कोई नहीं पहचानता. इन बड़ेबड़े शहरों की बड़ीबड़ी इमारतों में एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी को नहीं जानता. उन के लिए अच्छा ही तो है कोई यह जानने की कोशिश नहीं करेगा कि वह कहां से आए हैं पर चाहने और सोचने में हमेशा बहुत फर्क होता है.

उस दिन बाजार में अचानक अमित अंकल से मुलाकात हो गई थी. उन की बेटी रोहणी उसी की उम्र की थी.स्कूल से ले कर कालेज तक का साथ था उन का…अच्छे पड़ोसी थे वे. एकदूसरे के सुखदुख में हमेशा खड़े होने वाले. उन्होंने ही यह दुखद खबर दी थी कि बाबूजी नहीं रहे. उसे विश्वास नहीं हो रहा था बाबूजी उस से बिना मिले, बिना कुछ कहे, बिना कोसे इस दुनिया से कैसे जा सकते थे पर उस ने भी तो उन्हें इस बात का मौका ही कहां दिया था. वह तो चली आई थी सलिल के साथ अपनी नई दुनिया को बसाने के लिए. जानती थी बाबूजी इस रिश्ते के लिए कभी तैयार नहीं होंगे पर सलिल का प्रेम उस के सिर चढ़ कर बोल रहा था.

बचपन में सुई लगवाने पर घंटों रोने वाली लता इतनी कठोर हो सकती है, उस ने खुद भी न सोचा था. मां के जाने के बाद बाबूजी ने ही तो उसे और उस के भाईबहन को मां और बाप दोनों बन कर पाला था. सब ने कितना कहा था,”अभी उम्र ही क्या है तुम्हारी, दूसरी शादी कर लो,” पर बाबूजी ने लता के सिर पर हाथ रख कर कहा था,”मैं अपने बच्चों के लिए सौतेली मां नहीं लाना चाहता. अब ये ही मेरी दुनिया हैं, मैं इन्हें देख कर ही जी लूंगा.”

जिन बाबूजी ने बच्चों का मुंह देख कर अपनी जिंदगी उन पर कुरबान कर दी, उस ने उन के बारे में एक बार भी नहीं सोचा. लता उन की सब से बड़ी संतान थी, नाजो से पाला था बाबूजी ने… बचपन में खाना खाते वक्त वह कितना तंग करती थी.

“बाबूजी, मां कहां चली गईं?”

“तेरी मां तारा बन के आसमान में रह रही है और तू ने खाना नहीं खाया न तो वह कभी लौट कर नहीं आएगी.”

और वह डर के मारे फटाफट सारा खाना खत्म कर देती. वे जानते थे मां अब कभी लौट कर नहीं आएगी. लेकिन बाबूजी ने मां की कमी कभी नहीं होने दी. लता इतनी एहसानफरामोश कैसे हो सकती थी? लता ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा ही था कि एक नजर में उसे सलिल से प्यार हो गया था. रातदिन उसी के सपनों में खोई रहती. उस ने बाबूजी के प्रेम और त्याग को पलभर में भुला दिया. सलिल दूसरी जाति का लड़का था. जानती थी कि बाबूजी उसे कभी भी शादी करने की अनुमति नहीं देंगे.

ऐसी स्थिति में उस के पास सिर्फ एक ही रास्ता था… भाग जाना. उस दिन से ले कर आज तक वह भाग ही तो रही थी. कभी अपने अतीत से, कभी अपनी यादों से तो कभी अनदेखे आरोपों से…लकड़ी का दरवाजा उसे अपिरिचितों की तरह देख रहा था. मां के हाथों से लगाया हुआ तुलसी का चौरा अपने जीवनदायिनी के जाने से सूखने लगा था पर बाबूजी के प्रेम और अपनत्व से वह फिर से लहलहा उठा था.

मां तो उन की जिंदगी से जा चुकी थीं पर उन की इस अंतिम निशानी को वे अपने से दूर नहीं होने देना चाहते थे. आज उस चौरे को देख कर मां के साथसाथ बाबूजी की छवि भी साथ ही उभर आई थी. कहते हैं, एक लंबा समय साथ गुजारने के बाद पतिपत्नी एकजैसे दिखने लगते हैं. बाबूजी कुछकुछ मां की तरह लगने लगे थे.

गेट खुलने की आवाज को सुन कर लता की छोटी बहन नंदिनी दरवाजे तक आ गई. लता को देख कर वह ठिठक गई. उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था.

“दीदी, तुम यहां? क्या करने आई हो? अब तो बाबूजी भी नहीं रहे.”

“मुझे पता है बाबूजी अब…” शब्द उस के गले में अटक कर रह गए.

“सारी बातें यही कर लोगी नंदिनी, अंदर नहीं बुलाओगी?”

अपने ही घर में अंदर आने के लिए अनुमति लेनी पड़ेगी, लता ने कभी सोचा नहीं था. नंदिनी दरवाजे के सामने से हट गई. लता की आंखें तेजी से कुछ ढूंढ़ रही थीं.

“विपुल…विपुल नहीं दिख रहा है?”

“कालेज गया है.”

“कालेज…”

हाफ पैंट पहन कर दिनभर इधर से उधर डोलने वाला विपुल, बातबात पर नंदिनी से लड़ने वाला विपुल इतना बड़ा हो गया, लता ने गहरी सांस ली.अच्छा ही था, भाई छोटा हो या बड़ा भाई तो भाई ही होता है. पता नहीं उसे देख कर वह कैसे व्यवहार करता. लता जब घर से भागी थी तब वह बहुत छोटा था. तब उसे यह बात समझ में नहीं आती थी लेकिन वक्त के साथ लोगों ने उस की बहन की कृत्यों से परिचित करा दिया था. बड़ी बहन के लिए नफरत दिलोदिमाग पर बस चुकी थी.

चिलचिलाती धूप में चल कर आने से उस का गला सूख रहा था. कमरे में सन्नाटा पसरा हुआ था. पंखे की आवाज के अलावा कोई आवाज नहीं आ रही थी. लता को बैठेबैठे काफी देर हो चुकी थी.

“क्या एक गिलास पानी मिलेगा?”

जिस घर में रिकशेवाले और मजदूरों को भी पानी और गुड़ दिए बिना जाने नहीं दिया जाता था, उस घर में पानी के लिए भी आग्रह करना पड़ा था. नंदिनी रसोई से पानी ले आई, लता अपने ही घर में मेहमानों की तरह बैठी थी. पंखे की तेज हवा से परदे उड़ रहे थे. लता का बहुत मन हो रहा था कि परदे के पीछे की वह दुनिया एक बार झांक ले. झांक ले उस बचपन को जो इस घर के आंगन में बिताया था. झांक ले उस कमरे को जहां बाबूजी की गोदी में लेट कर वह घटों उन से बातें करती थी. छू ले उस कुरसी को जिस पर बैठ कर बाबूजी घंटों अखबार पढ़ते थे. छू ले उस तकिए को जिस पर लेट कर न जाने कितनी ही रातें बाबूजी मां को याद कर अपनी आंखें और तकिया भिगो लिया करते थे. कितनी सारी यादें जुड़ी हुई थीं इस घर से पर वे यादें  हाथ छुड़ा कर न जाने किस बियाबान जंगल मे छिप गए थे.

चाहती तो वह बहुत थी पर न जाने हिम्मत नहीं हुई. बाबूजी की तसवीर बैठक में लगी थी. उस तसवीर की ओर देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी. जानती थी कि पिता के चेहरे पर फैली नाराजगी की तहरीर को पढ़ना इतना आसान न होगा पर ऐसी नाराजगी होगी कभी सोचा भी न था.

अपनी लाड़ली की जीतेजी शक्ल भी न देखी बाबूजी ने. बाबूजी की आंखें तसवीर से झांक रही थीं. कितना सोच कर आई थी कि जब भी मिलेगी जीभर कर देखेगी पर उन्होंने तो वह मौका भी न दिया. लकड़ी के फ्रेम में वे मुसकरा रहे थे. इन 5 सालों में अचानक से कितने बूढ़े लगने लगे थे वे… ऐसा लगा मानों वे कह रहे हों,”यहां क्या करने आई है तू… जा तेरे लिए इस घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं.”

और फिर उन के खांसने की आवाज कमरे में भर गई. जैसा हमेशा होता था. बाबूजी को जब बहुत गुस्से में होते तब उन्हें खांसी आने लगती. क्या आज भी ऐसा ही होता?

“कैसी है तू?”

“ठीक हूं…” नंदिनी ने बड़ा रूखा जवाब दिया.

“विपुल कैसा है?”

“वह भी ठीक है.”

“तेरी शादी नहीं हुई?”

“शादी…”

नंदिनी ने उसे ऊपर से नीचे तक कुछ ऐसी निगाहों से देखा मानों वह उसे खड़ेखड़े भस्म कर देगी.

“दीदी, तुम ने अपना घर बसाया, इस घर को उजाड़ कर. तुम ने सपने देखे इस घर के सपनों को तोड़ कर, तुम ने अरमानों को जिया इस घर के अरमानों को कुचल कर. जिस घर की लड़कियां भाग जाती हैं उस घर की और लड़कियों की शादी नहीं हो पाती. सिर्फ उस घर की ही क्यों उस मोहल्ले की भी,”लता छोटी बहन के आरोपों से तिलमिला उठी.

“कहना क्या चाहती हो?” लता ने छटपटा कर कहा.

“तुम्हारे जाने के बाद कितना होहल्ला हुआ. न जाने कितनी बार पुलिस ने हमारे घर के चक्कर लगाए. सलिल के घर वालों ने…

“जीजाजी, सलिल तुम्हारे जीजा हैं.नंदिनी यह बात मत भूलो और उन के घर वाले तुम्हारी बहन के ससुराल वाले हैं,”लता ने सख्ती से कहा. नंदिनी का चेहरा भावहीन था.

“जिस रिश्ते को बाबूजी ने स्वीकार नहीं किया वह मेरा कुछ भी नहीं…तुम तो चली गईं अपनी दुनिया बसाने पर बाबूजी को न जाने कितने आरोप झेलने पड़े. बिन मां की बच्ची थी, कोई देखने वाला नहीं था. क्या कालेज में आजकल यही पढ़ाते हैं? तुम्हारे जाने के बाद इस मोहल्ले की जितनी भी लड़कियां थीं उन की जल्दीजल्दी शादी कर दी गई. सभी को डर था कि जब लता इस तरह का कदम उठा सकती है तो उन की बेटियां भी कुछ भी कर सकती हैं.रोहिणी दीदी की भी शादी हो गई.”

“रोहिणी, वह तो नकुल से शादी करना चाहती थी. वह तो उसी की बिरादरी का था?

“अमित अंकल ने उन की एक नहीं सुनी. अंकलजी ने पास के ही शहर में उन की शादी कर दी. दीदी, जो लड़कियां अपने घरों से भाग जाती हैं वे सिर्फ अकेले नहीं भागतीं वे भागती हैं अपनी मांओं के सुकून और संस्कार को ले कर, वे भागती हैं अपने पिता के सम्मान और परवरिश को ले कर, अपनी छोटी बहनों और आसपड़ोस की लड़कियों के अनदेखे भविष्य को ले कर. वे भागती हैं परिवार में उन के प्रति विश्वास और आजादी को ले कर, वे भागती हैं अपने भाई, परिवार और कुल की इज्जत को ले कर.

“दीदी, तुम्हें याद है जब भी मां नानी के घर से लौटती थीं, तब नानी उन के आंचल में खोएचा भरती थीं और उन के उज्जवल भविष्य की कामना करती थीं और बदले में मां भी चुटकीभर चावल अपने आंचल से निकाल कर उस घर में बिखेर देतीं. वे यह चाहती थीं कि उन के घर के साथसाथ यह घर भी आबाद रहे पर तुम इस घर से निकलीं तो इस परिवार को क्या दे कर गई? मरी हुई को मां को अपमान, पिता को दुनिया के आरोप और हमें लज्जा से झुके सिर…

“विपुल का क्या दोष था? वह तो इन बातों को ठीक से समझता भी नहीं था पर वक्त ने उसे भी समझा दिया.नन्हें विपुल के लिए राखी के धागे गले की फांस बन कर रह गए. मुझे अगर कहीं से आने में देर हो जाती है तो वह छटपटाने लगता है. जानता है, वह सब से छोटा है पर भाई तो है. मुंह से तो कुछ भी नहीं कहता पर उस की आंखें कुछ न कह कर भी बहुत कुछ कह जाती हैं.

“दीदी, औरत एक नदी की तरह है. जब तक वो मर्यादा में रहती है तब तक वह खुशहाली लाती है पर जब वह मर्यादा को तोड़ती है तब हर जगह तबाही ही तबाही लाती है.”

घर से निकलते वक्त उस ने सोचा था यह घर, गली और मोहल्ला हाथ पसारे उस का स्वागत करेगा पर आज वह शर्मिंदा थी. लता चुप थी, उस के पास नंदिनी की किसी भी बात का कोई जवाब नहीं था. जानती थी आज वह कुछ भी कहेगी तो उस की बातों पर कोई विश्वास नहीं करेगा. उस ने अपने साथसाथ नंदिनी और विपुल के भविष्य को भी दांव पर लगा दिया था. बाबूजी तो आज मरे थे पर जीतेजी तो वे कब के मर चुके थे. जीतेजी वे आरोप और अपमान का जहर पीते रहे. जहर का भी अपना हिसाबकिताब होता है, मरने के लिए थोड़ा सा और जीने के लिए ज्यादा पीना पड़ता है.

सलिल के साथ भागते हुए सोचा तो यही था कि वे कहीं दूर चले जाएं, दूर… इतने दूर जहां पर दुनिया का कोई गम न हो पर आज वह दुनिया के लिए लता नहीं भगोड़ी थी.

पर क्या सलिल के साथ भी ऐसा ही हुआ होगा? क्या उस के घर और मोहल्ले वालों ने भी उसे माफ नहीं किया होगा? क्या उस के साथ के हमउम्र लड़कों की भी शादियां कर दी गई होंगी? क्या किसी ने सलिल के पापा को भी दुत्कारा होगा कि जब सलिल भाग कर शादी कर सकता है तब मोहल्ले का कोई भी लड़का ऐसा कदम उठा सकता है?

शायद, शायद…

मैं मैरिड हूं लेकिन किसी और को पसंद करती हूं, क्या करूं?

सवाल

मैं 40 साल की शादीशुदा महिला हूं. घर में सबकुछ ठीक है. मेरे पति भी अच्छे हैं. अच्छे से रखते हैं. मेरे घर में मैं और मेरी बेटी और पति रहते हैं. पिछले साल हमारे यहां किराए पर एक कालेजगोइंग लड़का आया. उस से मुझे प्यार हो गया और मैं उस के साथ फिजिकल रिलेशन में आ गई. यह बात अभी किसी को नहीं पता. मैं क्या करूं?

जवाब

कैसी महिला हैं आप? एक तो कह रहीं हैं कि आप के शादीशुदा जीवन में सबकुछ ठीक चल रहा है, फिर भी किसी गैरपुरुष से शारीरिक संबंध बना रही हैं. खुद सोचिए अगर आप के पति को पता चलेगा तो क्या वे सहन कर पाएंगे? आप की बेटी को पता चलेगा तो वह क्या सीखेगी आप से? कल को वह भी ऐसा कुछ करेगी तो क्या कह पाएंगी आप उसे?

पति की सज्जनता का गलत फायदा मत उठाइए. अच्छा घरपरिवार मिला है तो उस की इज्जत करिए. जितनी जल्दी हो सके इस रिश्ते को खत्म कर दें. यही सभी के लिए फायदे की बात है. कल को अगर किसी को पता चलता है तो वह लड़का भी आप को स्वीकारने की कंडीशन में नहीं रहेगा. कोशिश करें कि उस लड़के को किराए के कमरे से हटा दें ताकि आगे कोई बवाल खड़ा न हो.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

एक छोटी सी गलतफहमी- समीर अपनी बहन के बारे में क्या जानकर हैरान हुआ

भारत और पाकिस्तान के बीच पुन: एक दोस्ती का पैगाम. एक बार फिर से दिल्लीलाहौर बस सेवा शुरू होने जा रही है. जैसे ही रात के समाचारों में यह खबर सुनाई दी, रसोई में काम करतेकरते मेरे हाथ अचानक रुक गए. दिल में उठी हूक के साथ मां की ओर देखा तो उन का सपाट व शांत चेहरा थोड़ी देर के लिए हिला और फिर पहले जैसा शांत हो गया. आज के समाचार ने मुझे 2 साल पीछे धकेल दिया. वे सारी घटनाएं, जिन्होंने इस परिवार की दुनिया ही बदल दी, मेरी आंखों के सामने सिनेमा की तसवीर की तरह घूमने लगीं.

हम 2 बहन और 1 भाई थे. मातापिता का लाड़प्यार हर पल हमें मिलता रहता था. मैं सब से छोटी थी. भैया व दीदी जुड़वां थे. दीदी मात्र 4 मिनट भैया से बड़ी थीं. बचपन से ही वे आपस में काफी घुलेमिले थे पर झगड़े भी दोनों में खूब होते थे.

मैं उन दोनों से 7 साल छोटी होने के कारण दोनों की लाड़ली थी. मुझे तो शायद याद भी नहीं कि मेरी लड़ाई उन दोनों से कभी हुई हो. संजय भैया पढ़ाई में काफी होशियार थे. यद्यपि दीदी भी पढ़ने में तेज थीं किंतु उन का मन खेलकूद की ओर अधिक लगता था. जिला स्तर पर खेलतेखेलते कई बार उन का चुनाव राज्य स्तर पर भी हुआ जोकि मां को कभी अच्छा नहीं लगा क्योंकि मुझे व दीदी को ले कर मां की सोच पापा से थोड़ी संकरी थी. खासकर तब जब दीदी को खेलने के लिए अपने शहर से बाहर जाने की बात होती थी, तब भैया का साथ ही मां और पापा के प्रतिरोध को हटा पाता था और इस तरह दीदी को बाहर जा कर खेलने का मौका मिलता था.

मलयेशिया की राजधानी क्वालालम्पुर में कई देशों की टीमें आई थीं. वहीं पर दीदी की मुलाकात अनुपम से हुई जो किसी पाकिस्तानी खिलाड़ी का रिश्तेदार था और उस के साथ ही क्वालालम्पुर आया था. दोनों की मुलाकात काफी दिलचस्प थी. दिन में दोनों एकसाथ कौफी पीने जाया करते थे. चेहरे के नैननक्श अपने जैसे होने के कारण दोनों ने एकदूसरे से बात करने में दिलचस्पी दिखाई. धीरेधीरे दोनों ने ही महसूस किया कि उन में दोस्ती के अलावा कुछ और भी है. इसी तरह 7 दिन की मुलाकात में ही उन का प्यार परवान चढ़ने लगा था. दीदी जब लौट कर आईं तो कुछ बदलीबदली सी थीं. मां की अनुभवी आंखों को समझते देर न लगी कि दीदी के मन में कुछ उथलपुथल मची है. मां के थोड़े से प्रयासों से पता चला कि दीदी जिसे चाहती हैं वह पाकिस्तानी हिंदू है. यद्यपि लड़का पाकिस्तान में इंजीनियर है पर वह पाकिस्तान से बाहर किसी अच्छी नौकरी की तलाश में है. कुल मिला कर लड़का किसी भी तरफ से अनदेखा करने योग्य न था. बस, उस का पाकिस्तानी होना ही सब के लिए चुभने वाली बात थी.

यहां भी भैया ने दीदी का साथ दिया. आखिर एक दिन हम सब को छोड़ कर दीदी अपने ससुराल चली गई. हालांकि पाकिस्तान के नाम से दीदी के मन में भी थोड़ा अलग विचार आया था लेकिन वहां ऐसा कुछ नहीं था. अनुपम के परिवार ने दीदी का खुले दिल से स्वागत किया. एक खिलाड़ी के रूप में दीदी की शोहरत वहां पर भी थी, तो तालमेल बैठाने में दीदी को कोई परेशानी नहीं हुई.

दीदी के जाते ही पूरा घर सूना हो गया. भैया का मन नहीं लगता तो दीदी के घर का चक्कर लगा आते थे. मां कहतीं कि बेटी के घर इतनी जल्दीजल्दी जाना ठीक नहीं, पर भैया का यही उत्तर होता कि देखो न मां, दीदी के ससुराल जाते ही हमारी सरकार ने भारतपाकिस्तान के बीच बस सेवा शुरू कर दी है.

पढ़ाई समाप्त कर भैया ने भी नौकरी की तलाश शुरू कर दी. हमारा मध्यवर्गीय परिवार था. घर की आर्थिक स्थिति को देखते हुए भैया को नौकरी की जरूरत महसूस होने लगी. उन के प्रथम श्रेणी में पास होने के प्रमाणपत्र भी उन्हें कोई नौकरी नहीं दिला सके तो उन्होंने सोचा, जब तक नौकरी नहीं मिलती क्यों न राजनीति में ही हाथपांव मारे जाएं. कालिज में 2 बार उपाध्यक्ष पद पर रह चुके थे. ऐसे में उन्हें अपने दोस्त समीर की याद आई, जोकि उन के साथ कालिज में अध्यक्ष पद के लिए चुना गया था.

समीर हमारे घर भी काफी आताजाता था. उस के पिता विधायक थे. भैया को लगा, वे शायद कुछ मदद कर सकते हैं. पर भैया ने एक बात नोट नहीं की, वह थी कि दीदी की शादी होते ही समीर ने भैया के साथ अपनी दोस्ती काफी सीमित कर ली थी.

समीर के पिता ने आश्वासन दिया कि अच्छी नौकरी में वे भैया की मदद करेंगे, यदि कोई बात नहीं बनी तो राजनीति में तो शामिल कर ही लेंगे. इसी दौरान किसी काम के सिलसिले में भैया को दीदी के घर जाना पड़ा. इस बार समीर भी उन के साथ पाकिस्तान गया. दीदी के ससुराल वाले बड़ी आत्मीयता के साथ समीर से मिले. केवल बाबूजी यानी दीदी के ससुर से समीर की ज्यादा बातचीत नहीं हो सकी क्योंकि वे उस दौरान सरहदी मामलों को ले कर काफी व्यस्त थे और 2 ही दिन बाद भैया व समीर को वापस भारत आना था.

वापस आ कर भैया जब समीर के घर गए तो उस के पिता ने घुसते ही उन से सीधे सवाल पूछा, ‘संजय, क्या तुम बता सकते हो कि तुम्हारी बहन क्या जासूसी करती है?’

उन के मुंह से यह सवाल सुन कर भैया सन्न रह गए. उन्हें सपने में भी इस तरह के सवाल की उम्मीद नहीं थी. अत: वह पूछ बैठे, ‘अंकल, आप के इस तरह सवाल पूछने का मतलब क्या है?’

‘बड़े भोले हो तुम, संजय,’ वह बोले, ‘तुम्हारी बहन की शादी को 2 साल हो गए. अभी तक तुम वास्तविकता से अनजान हो. अरे, उस पाकिस्तानी ने जानबूझ कर तुम्हारी बहन को फंसाया है ताकि पत्नी के सहारे वह भारत की सारी गतिविधियों की खबर लेता रहेगा. यही नहीं उस का ससुर सेना में अधिकारी है. इसलिए उस ने तुम्हारी बहन को अपने घर की बहू बनाना स्वीकार किया ताकि देश के अंदर की जानकारी उसे हो सके.’

‘यह सब बेबुनियाद बातें हैं,’ इतना कह कर भैया घर वापस आ गए. पर जासूस वाली बात उन के दिल में कहीं चुभ गई. भैया ने नोट किया कि दीदी अपने ससुर से काफी हिलीमिली हैं. लगता ही नहीं कि दीदी उन की बहू हैं. वह उन के आफिस भी आतीजाती हैं. बाबूजी भी दीदी से काफी प्यार जताते हैं और जब भी मैं दीदी से मिलने जाता हूं तो मुझ से बात करने का भी उन के पास समय नहीं रहता. शक का छोटा बुलबुला जब कुछ बड़ा हुआ तो भैया दीदी से फोन पर घर के हालचाल से ज्यादा भारत के अंदर की खबरों के बारे में बात करते. दीदी सिर्फ सुनतीं और हां हूं में ही जवाब देतीं तो भैया को लगता कि दीदी पहले जैसी नहीं रहीं, सिर्फ पाकिस्तानी बन कर रह गई हैं.

पिछली बार जब समीर घर आया तो भैया से कहने लगा कि देख संजय, पिताजी की बातों में कुछ तो दम है. जब मैं तेरे साथ दीदी के घर गया था तो शायद तू ने ध्यान नहीं दिया हो, किंतु मैं ने ऐसी कई बातें नोट कीं जोकि मुझे शक करने को मजबूर कर रही थीं. जैसे तेरी दीदी के साथ उन के ससुराल वालों का हमेशा हिंदुस्तानी खबरों पर बात करना. और हमारे देश में भी उतारचढ़ाव होते रहे हैं, उन के बारे में विस्तार से चर्चा करना.

भैया उस की बातें चुपचाप सुनते रहे थे. एक बार भैया ने दीदी को फोन किया व जानबूझ कर अपनी नौकरी व देश के माहौल के बारे में बात करने लगे. थोड़ी देर तक दीदी उन की बातें सुनती रहीं फिर एकाएक भैया की बात काट कर वह बीच में ही बोल पड़ीं, ‘संजय, मैं तुम से रात में बात करती हूं, अभी मुझे कुछ जरूरी काम के सिलसिले में बाहर जाना है.’

अब तो भैया के मन में शक के बीज पनपने लगे. उन्होंने गौर किया कि आमतौर पर दीदी मेरा फोन नहीं काटतीं पर आज जब मैं ने थोड़ी अपने देश के अंदर की कुछ बातें उन्हें बताईं तो मेरा फोन काट कर फौरन अपने बाबूजी को खबर देने चली गईं.

इस दौरान जीजाजी को अमेरिका में नौकरी मिल गई. पतिपत्नी अमेरिका चले गए. वहां पर पाकिस्तानी ग्रुप एसोसिएशन के कारण काफी पाकिस्तानी लोग मिले. इन सब से वहां पर दीदी का मन लगने लगा. पिछली बार फोन कर के जब दीदी ने इस गु्रप के बारे में भैया को बताया तो वह बीच में ही बोल पड़े, ‘तुम कोई इंडियन ग्रुप क्यों नहीं ज्वाइन करतीं? ऐसा तो है नहीं कि अमेरिका में इंडियन नहीं हैं.’

भैया की यह बात सुन कर दीदी बोली थीं, ‘क्या फर्क पड़ता है…मात्र एक दीवार से दिल नहीं बंटते. वैसे भी बाहर आ कर सब एक ही लगते हैं…क्या हिंदुस्तानी क्या पाकिस्तानी.’

अब भैया का शक अंदर ही अंदर साकार रूप लेने लगा. इधर हम सब इन बातों से काफी अनजान थे. भैया परेशान दिखते तो हम सब को यही लगता कि नौकरी को ले कर परेशान हैं. वह जब भी दीदी से बात करते तो दीदी जानबूझ कर चिढ़ाने के लिए पाकिस्तानी ग्रुप की बातें ज्यादा किया करती थीं. पर उन्हें क्या पता कि यही सब बातें एक दिन उन की जान की दुश्मन बन जाएंगी.

समीर व उस के पिता की बातें सुनतेसुनते भैया के अंदर एक कट्टर विचारधारा ने जन्म ले लिया था. दीदी कुछ दिनों के लिए घर आ रही थीं. उन्हें पहले अपनी ससुराल पाकिस्तान जाना था फिर मायके यानी हिंदुस्तान आना था. उन का प्लान कुछ ऐसा बना कि वह पहले मायके आ गईं और एक हफ्ते रह कर अपनी ससुराल चली गईं.

‘देखा संजय, तुम्हारी बहन पहले अपनी ससुराल जाने वाली थी फिर यहां हिंदुस्तान आती पर नहीं, यदि वह ऐसा करती तो यहां की ताजा खबरें कैसे अपने ससुर को दे पाती? वाह, मान गए तुम्हारी बहन को,’ ऐसा कह कर समीर के पिता ने जोर से ठहाका लगाया.

इस घटना के दूसरे ही दिन भैया मां से बोले, ‘मैं दीदी से मिलने पाकिस्तान जा रहा हूं. हो सका तो साथ ले कर आऊंगा.’

‘अभी तो हफ्ते भर रह कर गई है. थोड़ा उसे अपने ससुराल वालों के साथ भी रहने दे. वरना वे क्या सोचेंगे?’ मां बोलीं.

भैया ने मां की बात अनसुनी कर दी. मां को लगा शायद भाईबहन का प्यार उमड़ रहा है.

दीदी के घर पहुंच कर उन के घर वालों से भैया बोले कि घर पर पापा की तबीयत अचानक खराब हो गई है इसलिए कुछ दिनों के लिए दीदी को ले कर जा रहा हूं. जल्दी ही वापस छोड़ जाऊंगा.

जीजाजी तो नहीं आए पर भैया दीदी को ले कर लाहौर से दिल्ली वाली बस पर बैठ गए. बस में ही भैया ने दीदी से उलटेसीधे सवाल करने शुरू कर दिए. दीदी को लगा, यों ही पूछ रहा है पर उन के चेहरे पर गुस्सा व ऊंची होती आवाज से दीदी हैरान रह गईं. फिर भी उन्होंने भैया से यही कहा, ‘इस बस में तो ऐसी बातें मत करो, संजय, और भी पाकिस्तानी बैठे हैं.’

भैया को उस समय किसी की परवा नहीं थी. उन्हें सिर्फ अपने ढेरों सवालों के जवाब चाहिए थे. किसी तरह दीदी, भैया को धीरे बोलने के लिए राजी कर पाईं.

‘सुनो संजय, मुझे अपना घर सब से प्यारा है. भले ही वह पाकिस्तान में क्यों न हो और सब से ज्यादा घर वाले, ससुराल वाले प्यारे हैं,’ इतना कह दीदी चुप हो कर खिड़की से बाहर की ओर देखने लगीं. भैया भी चुपचाप बैठ गए.

लाहौर से निकलने के बाद विश्राम के लिए एक स्थान पर बस रुकी. सभी यात्री नीचे उतर कर सड़क पार करने लगे. भैया व दीदी दूसरे यात्रियों से थोड़ा पीछे थे क्योंकि दोनों का मूड खराब था. वे एकदूसरे से बात भी नहीं कर रहे थे. जैसे ही दीदी व भैया सड़क पार करने लगे कि सामने से दूसरी बस को आती देख वे रुक गए.

सामने से आती बस उन्हें क्रास करने वाली थी कि जाने कहां से भैया के हाथों में हैवानी शक्ति आ गई और पूरे जोर से उन्होंने दीदी को बस के सामने धकेल दिया पर दीदी ने बचाव के लिए भैया की बांह भी जोर से थाम ली, दोनों एकसाथ बीच सड़क पर बस के आगे जा गिरे और दोनों को रौंदती हुई बस आगे चली गई. इस हादसे को देख कर सारे यात्री सन्न रह गए. आननफानन में एंबुलेंस बुलाई गई. दोनों में प्राण अभी बाकी थे.

‘यह क्या किया मेरे भैया, अपनी बहन पर इतना विश्वास नहीं,’ दीदी रोरो कर, अटकअटक कर बोलती रहीं मानो जाने से पहले सारी गलतफहमी दूर कर देना चाहती थीं, ‘यह तुम्हारा ही दिया संस्कार है न मां कि पति का घर ही शादी के बाद अपना घर होता है व उस के घर वाले अपने. बोलो न मां, मेरी क्या गलती है? अरे, मैं तो बाबूजी को खाना देने उन के आफिस जाया करती थी. उन के कोई बेटी नहीं थी इसी से वह मुझे बेटी बना कर रखते थे. वे लोग तो बहुत ही सीधे हैं मेरे भैया. हमेशा मुझे मानसम्मान देते रहे हैं.’

‘मुझे माफ करना, दीदी, मैं लोगों की बातों में न आ कर काश, अपने दिल की सुनता,’ इतना कह कर भैया भी अटकअटक कर रोने लगे.

कुछ ही पल बाद दोनों भाईबहन शांत हो गए. एकसाथ ही इस दुनिया में आए थे और साथ ही चले गए.

मांपापा को तो जैसे होश ही नहीं रहा. उन की आंखों के सामने ही उन की 2 संतानों ने अपनी जान गंवा दी, महज एक गलतफहमी के कारण. मैं पागलों की भांति कभी मां को देखती, कभी पापा को चुप कराती. एक ही पल में सबकुछ बिखर गया.

दूसरे दिन समाचार की सुर्खियों में छाया रहा, ‘देश की भूतपूर्व खिलाड़ी की उस के भाई के साथ बस दुर्घटना में दर्दनाक मौत.’

तब से समीर हमारे घर नहीं आया. आता भी क्यों, उस की मनोकामना जो पूरी हो चुकी थी. उजड़ा तो हमारा घर था.

घड़ी ने 10 बजने का अलार्म दिया, मेरी तंद्रा भंग हुई. अभी तक मम्मीपापा ने खाना नहीं खाया है. उन्होंने अपने को बंद कमरे में समेट लिया है. वहीं उन की सुबह होती है, वहीं रात होती है. उन्हें अपनी परवा नहीं है किंतु मुझे तो है. आखिर, मेरे अलावा उन्हें देखने वाला और कौन है?

‘अनुपमा’ के सेट पर हुई नये समर की एंट्री, देखें Photos

स्टार प्लस का सीरियल ‘अनुपमा’ में इन दिनों लगातार ट्विस्ट दिखाया जा रहा है. कुछ दिन पहले ही खबर आई थी कि शो से पारस कलनावत यानी समर शाह की छुट्टी हो गई है.  जिससे फैंस कॉफी नाराज थे. अब खबर आ रही है कि शो के मेकर्स ने नये समर की तलाश कर ली है.

‘अनुपमा’ का नया समर शाह टीवी एक्टर सागर पारेख हैं. एक्टर ने समर शाह बनकर शो की शूटिंग भी शुरू कर दी है. उन्होंने सेट पर पहुंचने के बाद एक्टर गौरव खन्ना संग फोटोज क्लिक कराईं. सागर पारेख ने सोशल मीडिया हैंडल पर शेयर किया है.

 

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सागर पारेख ने इन फोटोज को शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा, मुस्कान… सागर पारेख ने इंस्टाग्राम स्टोरी पर भी कुछ तस्वीरें साझा की थीं, जो कॉफी तेजी से वायरल हो गई थीं.

 

सागर पारेख ने इन फोटोज को  शेयर करते हुए लिखा था, नया सफर शुरू हो गया है और यह बड़ा है.  एक इंटरव्यू के अनुसार, सागर ने बताया कि पारस के फैंस उनसे नाराज थे और वे लगातार उन्हें ट्रोल भी कर रहे थे. पारस के फैंस का कहना था कि समर का किरदार केवल पारस के लिए ही है.

 

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Anupamaa फेम रूपाली गांगुली अगले साल बनेंगी मां? पढ़ें खबर

अनुपमा की लीड एक्ट्रेस रूपाली गांगुली सोशल मीडिया पर कॉफी एक्टिव रहती है. वह आए दिन सोशल मीडिया पर अपनी फोटोज और वीडियोज शेयर करती रहती हैं.

हाल ही में रूपाली गांगुली का नया वीडियो सामने आया है जो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है. जिसमें कॉमेडियन भारती सिंह भी नजर आ रही हैं. वीडियो में भारती मस्ती भरे अंदाज में कहते हुए नजर आ रही है कि रूपाली गांगुली अगले साल मां बनने वाली हैं. आइए बताते हैं क्या है पूरा मामला…

 

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दरअसल रूपाली और भारती ने यह वीडियो स्टार प्लस के पॉपुलर वीकेंड शो रविवार विद स्टार परिवार के सेट पर बनाया है. वीडियो में रूपाली गांगुली और भारती सिंह की मस्ती देखते ही बन रही है. वीडियो में भारती सिंह मस्ती भरे अंदाज में कहते हुए नजर आ रही हैं कि रूपाली अगले साल मां बनने वाली हैं.

 

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रूपाली गांगुली इस वीडियो को इंस्टाग्राम पर शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा है, ‘बस यूं ही मम्मियों की बातें…भारती तुम बहुत ही क्यूट हो और काफी इंस्पायरिंग भी. जिस तरह से तुम काम और बच्चे को मैनेज कर रही हो…तुम्हे सलाम… अगले साल लक्ष्य के भाई/बहन का इंतजार रहेगा.’

 

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