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Couple Goal: पति की मनमानी कब तक करें बर्दाश्त?

Couple Goal: पति और पत्नी का रिश्ता निहायत ही लोकतांत्रिक होता है जिस में किसी एक की भी मनमानी रिश्ते में खटास घोल सकती है और उसे तोड़ भी सकती है. अब वह दौर गया जब पत्नियां पति की मनमानी को खामोशी से हजम कर लिया करती थीं. शिक्षित, जागरूक और आत्मनिर्भर होने के चलते वे पति की मनमानियां ज्यादा बर्दाश्त नहीं कर पाती हैं.

पति की मनमानियों को पत्नियां कब तक बर्दाश्त करें? इस सवाल का सीधा सा और सटीक जवाब तो यह है कि तब तक कि जब तक सब्र जवाब न दे जाए और जीना मुहाल न हो जाए लेकिन इस के बाद क्या? इस सवाल का भी सीधा और सटीक जवाब यह है कि जब सब्र जवाब देने लगे और पति लाख कोशिशों के बाद भी मनमानी से बाज न आए तो तलाक ही इकलौता रास्ता बचता है पर यह आखिरी विकल्प उसी हालत में कहा जा सकता है जब यह तय या साबित हो जाए कि क्या वाकई मनमानी नाकाबिले बर्दाश्त थी और क्या पति को समझने-बुझने के सारे तौर-तरीके आजमाए जा चुके थे.

कुछ उदाहरणों से यह बात समझें कि मनमाने पति को कब तक बर्दाश्त करें, जिस से यह समस्या हल हो सकती है.

अब से कुछ दिनों पहले आगरा का एक दिलचस्प मामला देशभर में सुर्खियों में रहा था. एक महिला ने इस आधार पर तलाक चाहा था कि उसका पति नहाता नहीं है, जिस से उस के शरीर से काफी गंदी बदबू आती है. इस शादी को महज 40 दिन ही हुए थे कि महिला ने आगरा के परिवार परामर्श केंद्र में शिकायत की. उस का रोना यह था कि पति महीने में केवल एक या दो बार ही नहाता है जिस से उस में से असहनीय दुर्गंध आती है. जवाब में पति ने यह नहीं कहा कि वह रोज नहाता है बल्कि यह सफाई दी कि वह रोज शरीर पर गंगाजल छिड़कता है जिस से उस की शुद्धि हो जाती है. इस के बाद भी पत्नी के कहने पर वह एक महीने में 6 बार नहाया है.

मामला अभी अदालत में चल रहा है और उस का फैसला जो भी आए लेकिन यह सच है कि गंदे व मैले-कुचैले पति के साथ जिंदगी काटना किसी भी पत्नी के लिए आसान नहीं, खासतौर से उस वक्त जब वह इस बारे में सुनने और समझने को तैयार ही न हो. आगरा वाले पति ने परिवार परामर्श केंद्र के अधिकारियों की समझाइश पर यह वादा किया था कि वह रोज नहाएगा लेकिन पत्नी ने उस के वादे पर एतबार नहीं किया.

यह ठीक है कि पति की मनमानी का यह मामला लगभग अपवाद था लेकिन इस में भी कोई शक नहीं कि बड़े पैमाने पर पत्नियां पतियों की जिन मनमानियों से परेशान रहती हैं उन में से गंदगी की हिस्सेदारी भी कम नहीं, मसलन कई पति वाकई हफ्तों तक नहीं नहाते, दाढ़ी नहीं बनाते, बगलों के, प्राइवेट पार्ट के आसपास के बाल नहीं हटाते और कई दिनों तक कपड़े नहीं बदलते. इस से पत्नियां तंग आ जाती हैं लेकिन सभी तलाक के लिए अदालत का दरवाजा नहीं खटखटातीं बल्कि अधिकतर पति को सुधारने की कोशिश करती हैं, अपनी घर-गृहस्थी बनाए रखने के लिए उसे साफसफाई के लिए प्रेरित करती हैं.

लेकिन भोपाल की 23 वर्षीया आरती (बदला नाम) इस में कामयाब नहीं हो पाई तो आगरा वाली पत्नी की तरह अदालत जा पहुंची. यह दिलचस्प मामला अप्रैल 2021 का है. आरती की शिकायत थी कि अरविंद (बदला नाम) सप्ताह-भर नहाता नहीं और न ही शेव करता. शरीर से बदबू उठती है तो वह खूब सा परफ्यूम छिड़क लेता है.

मामला राज्य महिला आयोग भी पहुंचा था जहां आयोग ने अरविंद को हिदायत दी थी कि वह 2 महीने में अपनी ये गंदी आदतें सुधारे और साफ-सफाई से रहना शुरू करे लेकिन जिस ने अपनी 25 साला जिंदगी में अपने घर वालों और दोस्तों की न सुनी हो वह भला कैसे आयोग के निर्देशों पर अमल करता.

भोपाल फैमिली कोर्ट के जज आर एन चंडोक ने आरती की परेशानी समझते पति-पत्नी को 6 महीने अलग-अलग रहने का हुक्म, जिसे कानून की भाषा में कूलिंग पीरियड कहते हैं, सुनाते इस के बाद तलाक की डिग्री पारित करने की बात कही. दरअसल, यह आरती और अरविंद को सलाह और सहूलियत दोनों थे कि वे हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13 (बी) के तहत परस्पर सहमति से तलाक ले लें और ऐसा ही हुआ भी कि अदालत ने इस आदत को पत्नी के प्रति मानसिक क्रूरता माना लेकिन सुधार की पहल के तहत कोर्ट ने अरविंद को सुधरने का मौका भी दिया था.

क्रूरता है गंदगी

हालांकि साफ-सफाई सीधे-सीधे तलाक का आधार कानूनन नहीं होती लेकिन अगर यह पत्नी का जीना दूभर कर दे तो इसे मानसिक क्रूरता की श्रेणी में गिना जा सकता है क्योंकि इस से पत्नी मानसिक व भावनात्मक रूप से प्रभावित होती है. इस पर हिंदू मैरिज एक्ट 1955 की धारा 13 (1) (आई-ए) के तहत पति-पत्नी एक-दूसरे पर मुकदमा दायर कर सकते हैं. इस में गंदगी से रहने के अलावा गाली-गलौच, बार-बार बेइज्जत करना, मानसिक तनाव देना, आत्मसम्मान व प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना और अनदेखी करना आदि शामिल हैं, यानी वे कृत्य जो सीधे-सीधे हिंसा और शारीरिक क्रूरता की श्रेणी में न आते हों जैसे मारपीट, दहेज के लिए शारीरिक प्रताड़ना व घरेलू हिंसा वगैरह. इन के लिए अलग से भी कई कानून हैं.

गंदगी सहित दूसरे छोटे-मोटे घरेलू विवाद, जिसमें पति अपनी मरजी और जिद के चलते पत्नी की एक नहीं सुनता, से भारत ही क्या पूरी दुनिया के कपल्स की बड़ी समस्या है. खासतौर से पत्नी के लिए जो पति की मनमानी सिर्फ इसलिए बरदाश्त करती रहती है कि घर न टूटे और बच्चे अगर हों तो उन्हें अलगाव का तनाव व दर्द न झेलना पड़े.

धार्मिक मनमानी

42 वर्षीया शुचि एक प्राइमरी स्कूल में टीचर हैं. अब से कोई 14 साल पहले उन की शादी सौरभ से हुई थी जो उन्हीं की तरह सरकारी स्कूल में टीचर थे. सौरभ व उस के घर वाले अच्छे थे और शुचि जल्द ही ससुराल में घुलमिल गई थी. उसे वहां कोई तकलीफ नहीं थी लेकिन शादी के कोई डेढ़ साल बाद सौरभ के कोई कुलगुरु घर आए तो परिवार में उत्सव सा माहौल था. शुचि ने सौरभ व सास-ससुर के मुंह से सुन रखा था कि गुरुजी बहुत पहुंचे हुए संत हैं, हिमालय पर कहीं रहते हैं और उन की उम्र 400 साल के करीब है. वे हर 100 साल में चोला यानी रूपरंग बदलते रहते हैं, पांच पीढ़ियों से उन की हमारे परिवार पर असीम कृपा और आशीर्वाद है.

शुचि खुद आस्तिक और आस्थावान थी लेकिन इस हद तक नहीं कि कुछ भी उलटासुलटा सच मान ले. घर में किसी की भावना को ठेस न पहुंचे, इसलिए उस ने ज्यादा तर्क-कुतर्क गुरुजी की बाबत नहीं किए और घर वालों के साथ उन के स्वागत-सत्कार की तैयारियों में जुट गई. दिक्कत तब खड़ी हो गई जब पूरे परिवार ने गुरुजी के पांव छुए पर शुचि ने नहीं छुए क्योंकि उस का मन गंवारा नहीं कर रहा था. सास और सौरभ ने कई बार इशारा किया लेकिन शुचि ने पैर नहीं छुए तो बाद में सौरभ बिफर पड़ा कि पैर तो तुम्हें गुरुजी के छूने पड़ेंगे, वे हमारे भगवान हैं, पूजनीय हैं वगैरह-वगैरह.

गुरुजी तो चले गए लेकिन सौरभ और शुचि को बिना मांगे कलह का आशीर्वाद दे गए. नाराज सौरभ ने शुचि से बातचीत करना लगभग बंद कर दिया और बात-बात में उस पर ताने कसने लगा. सास-ससुर भी खफा थे, इसलिए बेटे को कुछ नहीं बोले. शुचि ने समझदार पत्नी की तरह कई बार सौरभ से माफी मांगते हुए कहा कि मैं आपके पैर छू सकती हूं, ससुर जी के तो हर तीज-त्योहार पर छूती ही हूं क्योंकि वे पिता तुल्य हैं. उन के प्रति मेरे मन में स्वाभाविक आदर-सम्मान है लेकिन किसी गुरुजी के पैर मैं नहीं छू सकती.

पर सौरभ ने अपना रवैया नहीं बदला तो शुचि दुखी मन से मायके आ गई और पेरेंट्स को सब कुछ सच-सच बता दिया. उन्होंने बेटी का साथ दिया इस उम्मीद के साथ कि आज नहीं तो कल बात बन जाएगी लेकिन 2 साल बीतने के बाद भी बात नहीं बनी तो शुचि ने वकील के जरिए तलाक का नोटिस भिजवा दिया. जवाब में सास-ससुर खुद आए और शुचि सहित उसके मां-बाप से बात की. शुचि ने वही बातें दोहराईं जो वह सौरभ से कह चुकी थी.

कुछ दिनों की मीटिंग्स के बाद हालांकि बात बन गई लेकिन शुचि अपनी इस जिद पर कायम रही कि वह किसी गुरुजी-शुरुजी के पैर नहीं छुएगी. ‘‘शादी के बाद का लंबा वक्त मैं ने उन गुरुजी के चलते तनाव में गुजारा,’’ शुचि बताती है, ‘‘इस घटना को अब 12 साल हो चुके हैं. हम पति-पत्नी के संबंध सहज होने में लंबा वक्त लग गया. अब सबकुछ ठीक है पर इस दौरान मैं ने महसूस किया है कि पत्नी को पति की बेजा मनमानी के सामने सिर नहीं झकाना चाहिए लेकिन इस के लिए जरूरी है कि वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो और स्वाभिमानी हो.’’

धार्मिक मनमानियों के ज्यादातर मामलों में पत्नियां पति के सामने घुटने टेक देती हैं और जिंदगी-भर गिल्ट और घुटन से भरी रहती

हैं लेकिन आत्मसम्मानी और स्वाभिमानी पत्नियां कोर्ट जाने में नहीं हिचकतीं. ऐसे ही एक मामले (अरुण के आर बनाम अरुणिमा टी एस) में केरल हाईकोर्ट की जस्टिस देवन रामचंद्रन और जस्टिस एम बी स्नेहलता की बेंच ने पत्नी के पक्ष में फैसला सुनाते तलाक की डिक्री इसी साल 25 मार्च को पारित की थी.

इस मामले में शादी 23 अक्टूबर, 2016 को हुई थी. पति निहायत ही धार्मिक व्यक्ति था. पत्नी की शिकायत के मुताबिक वह अंधविश्वासी था और नियमित मंदिर व आश्रम जाता था और पत्नी को भी ऐसा करने को मजबूर करता था जो शुचि की तरह केरल की इस पत्नी को भी गवारा न था. पेशे से आयुर्वेद इस डाक्टर पत्नी ने तलाक के अपने वाद-पत्र में दूसरे कुछ आरोपों के साथ यह उल्लेख भी किया था कि पति बच्चा भी पैदा नहीं करना चाहता और पारिवारिक जीवन में भी उदासीन है. उस ने 2019 में तलाक की अर्जी दी जिस पर फैमिली कोर्ट ने माना कि यह मानसिक क्रूरता है, इसलिए तलाक की डिक्री दी जाती है.

क्या था आदेश?

पति इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट गया लेकिन उसे कोई राहत वहां से भी नहीं मिली. केरल हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को यथावत रखते यह टिप्पणी की कि आत्मिक या धार्मिक मान्यताओं को जबरन थोपना मानसिक क्रूरता है. एक वैवाहिक संबंध किसी साथी को दूसरे की व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं को जबरन स्वीकार करने का अधिकार नहीं देता.

लेकिन अगर कोई इसे न केवल स्वीकृति देता बल्कि थोपता भी है तो वह धर्म है जिस का एक और नाम और काम स्त्री शोषण रखा जा सकता है. पौराणिक ग्रंथ इस तरह के किस्से-कहानियों से भरे पडेत हैं कि पति जैसा भी हो, हर हाल में पत्नी को उस से निभाना चाहिए वरना उसे पाप लगेगा, वह विधवा हो जाएगी वगैरह-वगैरह. सनातनियों का संविधान ‘मनुस्मृति’ तो ऐसी बेहूदी बातों के बारे में कुछ यों कहता है-

पति चाहे झूठा हो, कठोर हो, लालची हो, बीमार हो, नपुंसक हो या निहसंतान हो स्त्री को फिर भी उसे त्यागना नहीं चाहिए. (अध्याय 5, श्लोक 151)

ऐसे ढेरों आदेशों को पुख्ता करती हुई कहानियों की भी भरमार है कि पत्नियां पतियों की मनमानी सहती रहीं लेकिन उसे छोड़ कर सुकून की जिंदगी जीने की हिम्मत नहीं जुटा पाईं. एक कहानी की मानें तो पत्नी को पति से सहवास करने का आग्रह करने का भी अधिकार नहीं था. यह कहानी कश्यप ऋषि और दिति की है. दिति चाहती थी कि वह ऐसे बेटों की मां बने जो देवताओं के राजा इंद्र को हरा पाएं. एक शाम उस ने कश्यप से सहवास का आग्रह किया तो उन्होंने यह कहते इनकार कर दिया कि यह संध्याकाल है, देवताओं के पूजा-पाठ का समय है. अगर इस वक्त हम सहवास करेंगे तो तुम्हारे गर्भ से असुर टाइप के पुत्र पैदा होंगे.

दिति का मन उसी वक्त सहवास करने का कर रहा था, इसलिए वह भी जिद पर अड़ गई (बकौल कहानी की सीख, यह इच्छा नहीं बल्कि कामवासना, क्रोध और असंयम था जो औरतों को शोभा नहीं देता) लिहाजा कश्यप ऋषि तैयार हो गए लेकिन उनके इस संसर्ग से पैदा हुए 2 राक्षस जिन के नाम हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप पड़े. इस कहानी का सीधा सा मैसेज यह है कि पत्नी इच्छा होने पर अगर पति से सहवास के लिए कहेगी तो संतान अपराधी किस्म की पैदा होगी. इतना ही नहीं, अगर पत्नी किसी गैर मर्द को नजर उठा कर देख भी ले तो पति तिलमिला कर उसे श्राप दे देते थे जिस से दूसरी औरतें जमीन में नजरें गड़ाए चलें. परशुराम का नाम अब हर कोई जानता है क्योंकि उन की जयंती बड़ी धूमधाम से मनाई जाने लगी है. इन्हीं परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि थे और मां रेणुका थीं जिन के पतिव्रत और पति सेवा की मिसाल दी जाती थी कि वे कच्ची मिट्टी का घड़ा बनाती हैं तो वह गिर कर टूटता नहीं.

एक दिन रेणुका ने नदी में एक गंधर्व को अपनी पत्नियों के साथ जलक्रीड़ा यानी नदी में रोमांस करते देखा तो उन का मन भी सैक्स के लिए मचल उठा जो निहायत ही स्वाभाविक बात है. इधर, अपनी कुटिया में बैठे जमदग्नि ने अपने योगबल की ताकत से देख लिया रेणुका का मन पतिव्रत से डोल रहा है जिस के चलते वह पापिन हो गई है तो वे गुस्सा हो उठे और अपने बेटों को हुक्म दिया कि वे मां का सिर कलम कर दें. बड़े बेटे ने मां की हत्या करने से मना कर दिया तो जमदग्नि ने उन्हें नपुंसक होने का श्राप दे दिया. उन के सबसे छोटे बेटे परशुराम ने मां की हत्या कर दी. इस कहानी में छिपा मैसेज समझें तो-

बिना किसी वजह के पत्नी पर शक करने का हक पति को था.

उसे घोर और कठोर सजा देने का अधिकार भी मिला हुआ था.

बेटों की नजर में उस ने मां को व्यभिचारिणी ठहरा दिया.

अपना हुक्म न मानने वाले बेटों को नामर्द बना डाला.

और सजा भी मौत की बेटे से ही दिलवाई.

घरेलू हिंसा को स्थापित करती ऐसी सैकड़ों कहानियां पत्नियों को डराने की मंशा से गढ़ी गई हैं जिस से कि वे पति की मनमानी सहते उस की गुलामी ढोती रहें वरना उन का अंजाम रेणुका और दिति जैसा होगा.

कब बर्दाश्त करें मनमानी?

पति की मनमानी अगर मामूली या स्वभावगत है तो उसे बर्दाश्त किया जा सकता है और समझाया व सुधारा भी जा सकता है. हर समझदार पत्नी की पहली कोशिश यही होनी चाहिए. छोटी-मोटी मनमानियों पर बवाल मचाना या अदालत, थाने जाना ठीक नहीं. आए-दिन ऐसे मामले मीडिया की सुर्खियां बनते रहते हैं कि पति ने आइसक्रीम या चाट खिलाने से इनकार किया तो पत्नी थाने और परिवार परामर्श केंद्र जा पहुंची. अब इस में मनमानी कौन कर रहा था पति या पत्नी, यह कतई सोचने की बात नहीं.

यह और ऐसी कई रोज-मर्राई बातें मनमानी की श्रेणी में नहीं रखी जा सकतीं जिन से पत्नी के आत्मसम्मान और स्वाभिमान को ठेस न पहुंच रही हो. अगर पति नहाने के बाद गीला टौवेल बिस्तर पर पटक देता हो और पत्नी के बार-बार कहने पर भी न माने तो कलह-विवाद या कोर्ट-थाना इस का इलाज नहीं, इलाज है टौवेल को बिस्तर पर ही पड़े रहने देना या फिर खुद उठा कर सुखाने के लिए टांग देना. मुमकिन है इस से कभी पति को अक्ल आए और न भी आए तो यह कोई रोने-झंकने वाली बात या मुद्दा नहीं.

मैला-कुचैला पति, ज्यादा धार्मिक और अंधविश्वासी पति, नशैला पति अगर न माने तो कोर्ट जाना हर्ज की बात नहीं क्योंकि बर्दाश्त करने की भी हदें होती हैं और पत्नी कब तक ऐसे पतियों के साथ निभाए. यह तो पत्नी को ही तय करना होता है कि घुटन-भरी जिंदगी से बेहतर है आजादी, जिस में किसी का कोई दबाव न हो. Couple Goal.

Hindi Satire Story: कुर्सी से इस्तीफा- यहां इमोशन नहीं, इलेक्शन चलते हैं

Hindi Satire Story: लेखक: हनुमान मुक्त – राजनीति भी क्या अजीब नखरे वाली प्रेमिका है. जो दिल से चाहो, वही धोखा दे जाती है. यहां इमोशन नहीं, इलैक्शन चलते हैं.

21वीं सदी की राजनीति में अगर कोई चीज सब से स्थायी है तो वह है कुरसी से चिपकाव, जिसे मेडिकल साइंस में अब ‘पोस्ट-पोल कुरसी सिंड्रोम’ कहा जाने लगा है.

परंतु जब अचानक उन्होंने चुपचाप इस्तीफा दे दिया और स्थिति की वजह अपना खराब स्वास्थ्य बताया तो सुन कर पूरा राष्ट्र हतप्रभ रह गया. भला कोई खराब स्वास्थ्य की वजह से इतनी बड़ी कुर्सी से इस्तीफा देता है?

कदापि नहीं.

बल्कि, उस कुर्सी पर बैठने मात्र से ही खराब से खराब स्वास्थ्य भी अच्छा हो जाता है.

यह कारण कुछ समझ नहीं आया.

इस से भी ज्यादा हैरान वे लोग हुए जो वर्षों से उन से इस्तीफा मांग रहे थे लेकिन वे दे नहीं रहे थे और आज अचानक बिना मांगे ही दे दिया. बात कुछ हजम नहीं हो रही.

उन के अचानक इस्तीफा देने से मैं भी बहुत दुखी हूं. दुखी होने का कारण यह भी है कि वे मेरे ही प्रांत से हैं. कभी-कभार मैं दूसरे प्रांत के लोगों को उन की धौंस दे दिया करता था. अब मैं कैसे दूंगा, इस की मुझे चिंता सता रही है.

मुझे उन्हें ऐसा करते देख कर रोना आ रहा है. मैं जानता हूं, वे अपने मन से इस्तीफा नहीं दे सकते. निश्चित रूप से उन पर कोई दबाव डाला गया है. उन्होंने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दिया है, यह बात मुझे हजम नहीं हो रही थी. सो, मैं इस्तीफे की वजह पूछने उन के पास चला गया.

मेरे पूछने पर  उन्होंने बहुत ही संयमित शब्दों में  कहा-

‘राजनीति में हाथी के दांत दिखाने के अलग होते हैं और खाने के अलग. भला मैं इस्तीफा देने और नहीं देने का निर्णय करने वाला कौन होता हूं. जिन्होंने मुझे यहां तक पहुंचाया उन के सिवा यह निर्णय करने का अधिकार अन्य किसी के पास नहीं हो सकता. निश्चित रूप से मैं उन की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर रहा था. इसलिए अचानक मेरा स्वास्थ्य खराब हो गया और मुझे इस्तीफा देना पड़ा.’

यह बात उन्होंने माइक के सामने खड़े हो कर नहीं, बल्कि बंद दरवाजे में अपने घर पर कही, जहां पीछे स्क्रीन पर ‘संविधान की गरिमा बनाम गरमी की बहस’ का स्लाइड शो चल रहा था.

दरअसल वे पिछले कुछ समय से परेशान चल रहे थे. जितनी बार भी वे ‘शांति बनाए रखें’ कहते, उतनी ही बार कोई  पंखा चला देता या माइक तोड़ देता. इस अहिंसात्मक उथल-पुथल से वे बहुत दुखी थे. उन को समझ नहीं आ रहा था. यह सब कौन कर रहा है? कौन उन्हें फेल करने पर उतारू है. यहां कौन अपना है और कौन पराया, किस की आवाज सुनें और किस की नहीं. लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें कभी-कभी परायों की आवाज भी सुनाई देने लगी थी. उन की इस हरकत से उन के अपने परेशान हो रहे थे. वे लाख कोशिश करते कि उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपनों की आवाज सुनाई दे लेकिन करें तो क्या करें.

उन का दिल उन्हें धिक्कार रहा था. उन्हें दिल की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी. आज जाने क्या हुआ?

उन्होंने दिल की आवाज सुन ली और वे अपने व पराए का भेद भूल गए.

यह दिल बड़ा धोखेबाज है. अच्छे-अच्छों को मरवा देता है, उन्हें भी मरवा दिया. भला राजनीति में दिल की आवाज पर निर्णय लिए जाते हैं क्या?

उन्होंने भावुकता में ले लिया. उन से बहुत बड़ी गलती हो गई.

प्रत्येक गलती सजा मांगती है. जो गलती करता है उसे दंड भोगना ही पड़ता है. उन्हें दंड मिल गया.

राजनीति में हर किसी का एक मॉडल होता है. कोई केजरीवाल मॉडल के चक्कर में बिजली-पानी बांटता है, कोई योगी मॉडल में बुलडोजर चलाता है.  उन्होंने भी अपना अलग मॉडल अपनाया था : किसानों के प्रति सदाशयता. जमीन से जुड़ाव.

हम ने तो कसम खा ली है, कभी भी दिल की आवाज नहीं सुननी है. सुननी है तो सिर्फ अपने आका की आवाज, सिर्फ आका की आवाज. Hindi Satire Story.

Hindi Social Story: मकसद- लता को क्यों लगने लगा खालीपन?

Hindi Social Story: जिंदगी में जब फुरसत के क्षण नहीं मिलते तो हम उस के लिए तरसते हैं और जब यही फुर्सत मिलती है तो हमें खालीपन खलने लगता है. लता के साथ ऐसा ही हो रहा था.

आज सब काम जल्दी खत्म हो गया. क्या रह गया, बस, खिड़की के किनारे खड़े हो कर आते-जाते लोगों को निहारना. आज सोच ही लिया बाहर जाना ही है, यह भी कोई बात है इतनी दूर, परदेस में कोई दो पल बात करने को भी नहीं. कल ही एक देसी लड़की दिखी थी. आसपास ही रहती होगी. यह सोच कर लता घर से निकल गई. सामने वही लड़की आती दिखी. लता मन ही मन सोच रही थी, कैसे बात करूं. यहां विदेशी लोग तो फिर भी मुसकरा कर ‘हैलो’ कह देते हैं लेकिन देसी लोग तो देख कर भी बिना देखे एक तटस्थ भाव से आगे बढ़ जाते हैं.

जैसे ही वह लड़की पास से गुजरी, लता ने एक मधुर मुस्कान फेंकी. उधर से जवाब में मुस्कान मिली. अरे भई, जो दोगे वही तो मिलेगा. लता का दिल गुनगुना उठा. लड़की चली जा रही थी. अरे, थोड़ी देर ठहर तो, लता ने सोचा.

‘‘कहां से हो?’’ लता ने पीछे मुड़ कर पूछा.

लड़की रुकी और हंस कर बोली, ‘‘दिल्ली से.’’

‘‘अरे, यह क्या इत्तेफाक है, मैं भी दिल्ली से हूं.’’

‘‘यहां कहां रहती हो?’’ लता ने अगला सवाल दागा.

लड़की ने थोड़ा हिचकते हुए बताया, ‘‘इस सामने वाली बिल्डिंग के पीछे एच ब्लॉक में.’’

‘‘तुम तो मेरी पड़ोसी निकलीं.’’

और फिर वहीं पर खड़े-खड़े दोनों ने अपने घरों की खिड़कियां दिखा दीं. लड़की ने अपना नाम रुचि बताया.

इस छोटी सी मुलाकात ने लता का दिन गुलजार कर दिया. उसे पता लगा कि रुचि यहां अपने पति के साथ रहती है और उस का पति ओहियो यूनिवर्सिटी में पढ़ता है. वह कोई काम नहीं करती, घर पर ही रहती है. लता को लगा एक सहेली मिल गई. उम्र में जरूर वह उस की बहू के बराबर है लेकिन बात करने के लिए एक हमउम्र की नहीं, हमदिल की जरूरत होती है.

लता ऐसे ही जहां भी जाती, कोई न कोई सहेली बना ही लेती. यों तो उस का भी एक घर है दिल्ली में. इलाहाबाद में खेती भी है लेकिन उस की समझ में ही नहीं आता कि वह कहां रहे? जिंदगी ने सब कुछ दिया. एक बेटा और एक बेटी जिन पर वह अपनी ममता लुटाती है. लता को किसी से कोई शिकायत नहीं है लेकिन अपना बेटा और अपनी बेटी कहां अपने होते हैं जब उन का अपना परिवार बस जाता है. लता के पति तो 15 वर्षों पहले ही उस का साथ छोड़ गए थे.

परिवार में अपने बच्चों को पालने व उन को पढ़ाने-लिखाने के लिए उस ने हजारों संघर्ष किए. इस संघर्ष ने उसे मान-सम्मान दिया और उस के चेहरे पर खरे सोने सी चमक आ गई. उस के बच्चे भी अच्छे निकले और पढ़-लिख कर अच्छी नौकरियों पर लग गए. यह लता के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी. आज सब कुछ था उस के पास. काश, उस के पति राकेश आज यहां होते तो देखते कैसे उस ने सब कुछ संभाल लिया है लेकिन यह भी क्या, इतनी खुशी लेकिन कोई बांटने वाला ही नहीं. बच्चों की शादियां हुईं और रह गई लता अकेली.

उस के बच्चे तो हमेशा ही जिद कर के उसे अपने पास बुलाते लेकिन वह कहां जाए, उस की समझ में ही नहीं आता था. बेटी के घर जाए तो समाज और दामाद का डर सताता था. कभी कोई गलती हो जाए तो दामाद जी तो कह देंगे, जाओ अपने बेटे के पास. बेटे के पास जाती है तो बहू से यह डर लगता है कि कहीं कोई बात बुरी न लग जाए.

वैसे, दामाद और बहू दोनों ही भले थे. उस के साथ कभी भी किसी ने कहासुनी नहीं की लेकिन उस के साथ रहने की खुशी और दुख भी नहीं जताया तो उन के भावों को लता कभी समझ नहीं पाई. अगर वह वहां है तो भी कोई परेशानी नहीं है अगर वह वहां नहीं है तो भी नहीं. अरे, यह भी कोई बात हुई. यही सोचते हुए लता 6 महीने बेटी के घर चली जाती है और 6 महीने अमेरिका अपने बेटे के पास.

कभी-कभी लता सोचती कि काश, उस की बहू उसे ताने कस के उस का दिल छलनी कर देती या कुछ बुरा-भला ही कहती तो वह कुछ आंसू बहा कर अपनी बहू की बुराई ही कर लेती. कुछ दिन इसी बहाने कट जाते लेकिन यहां तो सब ठीक है लेकिन जैसे कुछ ठीक नहीं है. उसे हमेशा लगता है कि बेटे और बेटी के घर में उस का कोई अस्तित्व ही नहीं है. किसी को न कोई परवाह है, न कोई परेशानी और न ही कोई परेशान करने वाला. उसे अपना जीवन महत्वहीन लगने लगा. किसी को उस की जरूरत नहीं है. यही खालीपन और सूनापन भरने के लिए वह हमेशा ही बाहरी लोगों से दोस्ती करती फिरती. संघर्ष के दिनों में कितना मजा होता है, यह उस ने अब ही जाना.

पहले बच्चों को सुबह-सुबह तैयार कर के वह दौड़ती-भागती आफिस पहुंच जाती थी. कितने लोग उस के साथ काम करते थे. उन के साथ दुख-सुख की बातें कर के और काम की आपाधापी में दिन गुजर जाता था. शाम को घर जाते ही बच्चों के साथ बतियाने और कल के सपने देखते उस के दिन मजे से कट रहे थे. बच्चे भी बिना किचकिच किए अपना सब काम निबटा देते थे. इस से उसे आस-पड़ोस में भी आने-जाने का मौका मिल जाता. दिल की साफ लता हमेशा ही दूसरों के कामों में सहायता करती जिस से लोग उसे बहुत इज्जत देते थे.

लेकिन आज बुढ़ापे में वह लोगों से बात करने को तरस गई है और अमेरिका में इस कमबख्त इंग्लिश ने उस का रास्ता रोक दिया है. पिछले साल जब वह अमेरिका आई थी तो उस ने लौरा से दोस्ती बढ़ानी चाही तो बात ‘हैलोहाय’ से आगे नहीं बढ़ पाई क्योंकि लौरा के लिए हिंदी समझना बेहद मुश्किल था. लौरा को घी के बारे में समझते हुए उस की जबान सूख गई और शायद ही लौरा के पल्ले कुछ पड़ा हो. इस के बाद तो लता ने सोच लिया कि देसी लोगों से ही बात करेगी, चाहे हिंदीभाषी हो या न.

आज रुचि से हुई मुलाकात उसे बहुत अच्छी लगी. वह सारा दिन हलका-हलका महसूस कर रही थी. अगले दिन जैसे ही बेटा-बहू औफिस के लिए रवाना हुए, लता ने नाश्ता कर के रसोई की झटपट सफाई कर दी. सारे बर्तन तरतीब से लगा दिए. 3 ही तो कमरे थे, उस ने सब कमरों में बिस्तर झड़ कर वैक्यूम करने का निश्चय किया. बेटे के कमरे में जैसे ही उस ने तकिया हटाया तो कंडोम के पैकेट्स मिले. उस का तो जैसे दिमाग ही सुन्न हो गया, कहां तो वह पोते-पोतियां खिलाने का सपना पाल रही थी और कहां उस के बच्चे इस बारे में सोच भी नहीं रहे थे. क्या हो गया है इस पीढ़ी को? जिंदगी में स्वतंत्रता की कितनी चाह है इस पीढ़ी को, लेकिन वास्तव में वे समझते ही नहीं कि बच्चे पति-पत्नी के लिए बंधन नहीं बल्कि जुड़ाव होते हैं.

अब वह क्या करे, अपने बेटे से साफ-साफ कह भी नहीं सकती, बहू से तो कहने का सवाल ही नहीं उठता, पता नहीं क्या सोच बैठे. अपनी इस व्यथा को किस से बांटे. यही सोचते-सोचते उस की नजर खिड़की पर गई. सामने रुचि अपने पति के साथ कहीं जा रही थी. उन दोनों को वहीं बैठी-बैठी हाथों से गालों को दबाए वह देखती रही, गुलाबी स्कर्ट और सफेद ब्लाउज रुचि के गहरे सांवले रंग पर फब रहे थे. हंसती-चहकती वह अपने पति से बात करती जा रही थी. लता उन को देर तक देखती रही जब तक वे दोनों आंखों से ओझल न हो गए. थोड़ी देर और ऐसे ही बैठी रही तो सुस्ती घेर लेगी और यों ही दोपहर हो जाएगी, यह सोचते ही वह उठी और बेटे का कमरा ज्यों का त्यों छोड़ दिया. मन ही मन निर्णय भी ले लिया कि कुछ नहीं बोलेगी. आखिर उन को अपनी जिंदगी के फैसले लेने का पूरा अधिकार है.

मन कड़ा कर उस ने बाकी के काम निबटाए. ये सभी काम उसे बहुत प्रिय हैं और वह बड़ी खुशी से करती है लेकिन गानों के साथ. उस के बेटे ने कंप्यूटर में दुनियाभर के पुराने गाने भर दिए हैं. लता गानों की आवाज तेज कर के सभी काम फटाफट निबटाती जाती है लेकिन आज उसे कुछ भी उतना अच्छा नहीं लग रहा है. वह थोड़ी देर बैठ कर सुस्ताने लगी. तभी दरवाजे पर दस्तक हुई. सामने रुचि थी. दरवाजा खुलते ही बोली, ‘‘नमस्ते आंटी. आप कैसी हैं? मैं ने कहीं आप को डिस्टर्ब तो नहीं किया?’’

लता ने हंसते हुए उस के सिर पर हाथ रखा और बोली, ‘‘नहीं बेटा, अंदर आओ. आज मैं तुम्हें स्पेशल चाय पिलाती हूं, तुलसी वाली.’’

‘‘क्या,’’ रुचि की आंखें फटी की फटी रह गईं. यहां तुलसी कहां मिलती है?

‘‘अरे बेटा, मैं ही कुछ तुलसी के बीज अपने पर्स में रख के इंडिया से ले आई थी. यहां गमले में बो दिए और देखो, वे जी गए.’’

रुचि की ललचाई आंखें देख कर वह भांप गई कि अभी भी उस में अपनी भारतीयपन जिंदा है. चाय पी कर दोनों ने ढेर सारी बातें कीं. फिर रुचि अपने घर चली गई.

लता को बहुत अच्छा लगा कि चलो, रुचि खुद ही उस के घर आई है, अब वह भी उस से बेतकल्लुफी से मिल सकेगी. यहां आए 10 दिन हो गए थे और लता को कोई साथी नहीं मिला था.

अगले दो-तीन दिनों तक रुचि दिखी नहीं तो लता को लगा जरूर कोई बात हो गई है. लता रुचि के घर पहुंच गई. रुचि ने उसे अदरक की चाय और गुजिया खिलाई. बातों-बातों में रुचि रोंआसी हो कर बोली, ‘‘अच्छा हुआ आंटी आप आ गईं, मेरे पास तो आप का फोन नंबर भी नहीं था. इधर कुछ दिनों से उदास थी क्योंकि मेरी मम्मी को आना था लेकिन उन को वीजा नहीं मिला.’’

लता ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं, तुम्हारी मम्मी अगली बार आ जाएंगी.’’

रुचि ने कहा, ‘‘मैं बहुत दिनों से सोच रही थी कुछ काम करूं. बहुत बोर हो गई हूं लेकिन मेरा वीजा इस की इजाजत नहीं देता.’’

लता ने नौकरी से सेवानिवृत्ति के बाद काम के बारे में सोचा भी नहीं. उस ने रुचि से कहा, ‘‘आज कहीं बाहर घूमने चलें?’’

‘‘कहां?’’

‘‘फार्मर्स मार्केट चलते हैं.’’

‘‘वहां क्या है?’’ रुचि ने पूछा.

अभी तक तुम कभी फार्मर्स मार्केट नहीं गईं. अरे, फिर तो तैयार हो जाओ, मैं तुम को वहां ले चलती हूं. पास ही है. रुचि जल्दी से तैयार हो गई. दोनों साथ-साथ निकल पड़ीं. सच में ज्यादा दूर नहीं था. वहां लोकल किसानों ने बहुत सारी सब्जियां बेचने के लिए सजा रखी थीं. पहली बार रुचि ने ताजी हल्दी और अदरक को उस के पत्तों सहित देखा था. दोनों ने बहुत थोड़ी सी सब्जियां खरीदीं क्योंकि वे दुकान से जरा ज्यादा ही महंगी थीं. बाजार के आखिरी छोर पर कुछ दुकानें खाने-पीने की थीं. पिज्जा, बर्गर, बरीतो, पीता हम्मस से ले कर, शिकंजी और जूस के स्टॉल लगे थे. दोनों ने बर्गर और शिकंजी ली.

दोनों ने एक-साथ ही कहा, ‘‘अगर समोसा और चाय होता तो मजा आ जाता. यह बर्गर भी कोई खाने की चीज है.’’

दोनों हंस पड़ीं.

‘‘क्यों न हम दोनों ही समोसे और चाय का स्टौल लगाएं,’’ लता ने यों ही कह दिया.

‘‘मैं ने मास्टर्स की है वह भी साइंस में, मैं तो ऐसा करने की सोच भी नहीं सकती. लोग क्या कहेंगे. भारत में लोग मेरा मजाक उड़ाएंगे कि अमेरिका दुकान खोलने गई थी,’’ रुचि बोली.

लता ने कहा, ‘‘हां, तुम ठीक कहती हो. भारत में तो सब के काम से ही उस की पहचान होती. कौन छोटा कौन बड़ा, यह उस का काम ही बताता है लेकिन यह तो सोचो, समय और स्थिति के साथ बदलना चाहिए या नहीं.’’

रुचि ने कहा, ‘‘बदलना तो चाहिए लेकिन यहां अपने मन पर भी चोट लगेगी.’’ लता को खुद ही बहुत अजीब लग रहा था इस बारे में बात कर के लेकिन उस ने रुचि को मनाने की कोशिश की. उस ने कहा, ‘‘अच्छा, हम इस मार्केट में अगली बार चाय और समोसे का स्टॉल लगाएंगे, अगर अच्छा न लगेगा तो बंद कर देंगे.’’

रुचि को लगा कि चलो थोड़े से मजे के लिए ही कर लेते हैं, कौन सा यह असली काम है. दोनों बर्गर के स्टॉल पर गईं और पूछा, ‘‘स्टौल लगाने के लिए क्या-क्या करना पड़ता है?’’ पता चला कि ज्यादा कुछ नहीं, बस, 10 डॉलर देने होते हैं और एक मेज पर स्टॉल लगा सकते हैं. दोनों को बात जंच गई. रुचि ने कहा, ‘‘समोसे और चाय मेरे घर पर ही बनेंगे.’’ रुचि के पति को भी कोई दिक्कत नहीं थी. वह भी चाहता था कि बस पत्नी व्यस्त रहे. रात को ही पति-पत्नी समोसे और चाय का सारा सामान खरीद लाए. अगले दिन लता ने घर का काम जल्दी ही निबटाया और रुचि के घर पहुंच गई.

रुचि ने पहले ही आलू उबाल लिए थे. लता आलू छीलने बैठ गई और रुचि को मिर्च व धनिया काटने का निर्देश देने लगी. काम जल्दी होने लगा. लता ने आलू का मसाला तैयार कर उसे मटर और अदरक के छौंके के साथ भून दिया. अब बारी थी समोसे को बेलने, भरने और तलने की. दोनों ने गाने चला दिए और बातें करती रहीं. इस तरह पता भी नहीं चला कब समोसे बन गए. करीब सौ समोसे और चाय के साथ वे दोनों तैयार हो गईं. रुचि ने कार निकाली और सब सामान उस में डाल कर फार्मर्स मार्केट की ओर चल दीं.

थोड़ा-थोड़ा डर भी था दोनों को. पता नहीं क्या होगा. आज कोई आएगा भी या नहीं. खैर, वहां पहुंच कर उन्होंने एक मेज के पैसे दे कर चाय व समोसे सजा कर रख दिए. थोड़ी देर में एक औरत आई और समोसे को देख कर बोली, ‘‘व्हाट इज दिस?’’ रुचि ने बताया कि इस में आलूमटर है और इसे समोसा कहते हैं. औरत ने एक समोसा खरीदा और चली गई. लता को एक बात सूझ और उस ने एक कागज पर समोसे की सामग्री और दाम लिख कर मेज पर लटका दिया, जिस से लोगों को समझने में आसानी हो. थोड़ी देर में पहले वाली औरत वापस आई और बोली, ‘‘इट वाज वैरी टेस्टी, कैन आई हेव वन मोर?’

लता ने उसे समोसा दिया. उस को समोसा खाते देख बहुत से और लोग भी वहां आ गए, समोसा और चाय खरीदने लगे. सभी सिर्फ यही कहते जा रहे थे, ‘‘इंडियन फूड इज वैरी टेस्टी.’ देखते ही देखते सब समोसे खत्म हो गए और चाय भी थोड़ी ही बची थी. रुचि और लता को विश्वास नहीं हुआ कि इतनी जल्दी सब सामान खत्म हो जाएगा. तभी कुछ और लोग भी आए लेकिन लता और रुचि को अफसोस के साथ बताना पड़ा कि सारे समोसे और चाय खत्म हो गई है. रुचि ने आधे पैसे लता को दे दिए और आधे खुद रख लिए. रुचि और लता को इस काम में बहुत मजा आया. सब से ज्यादा मजा तो इस बात में आया कि वे दोनों अपने भारत के खाने को दुनिया के सामने ला रही हैं. भारत की तारीफ वह भी विदेश में. दोनों बहुत व्यस्त हो गईं, साथ ही, उन्हें आमदनी और जीने का एक मकसद भी मिल गया. जिंदगी मजे के साथ एक पटरी पर आ गई. Hindi Social Story.

Hindi Family Story: अब सब ठीक है- मोनिका ने खुद ही अपने पैरों पर मारी कुल्हाड़ी

Hindi Family Story: सबकुछ मिल गया था मोनिका को. अच्छी ससुराल, शुभम जैसा प्यार करने वाला पति. मां से बढ़ कर खयाल रखने वाली वंदना जैसी सास लेकिन कभीकभी इंसान अपने पैरों पर खुद ही कुल्हाड़ी मार लेता है. मोनिका ने कुछ ऐसा ही कर डाला.

कई दिनों से देख रही थी वंदना, उस के बेटेबहू शुभम और मोनिका के बीच किसी बात को ले कर अनबन चल रही थी. पता नहीं क्या बात थी कि हरदम दोनों का मूड उखड़ा सा रहता है. उन के बीच बात लड़ाई से शुरू होती तो लड़ाई पर ही खत्म होती थी.

एकदूसरे से इतना प्यार करने वाले ये दोनों अब हर छोटीछोटी बात पर एकदूसरे से उलझ पड़ते थे और अपनी गलती मानने के लिए दोनों ही तैयार न होते. इस कारण झगड़ा ज्यों का त्यों बना रहता.  वंदना को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर दोनों लड़ किस बात पर रहे हैं. कुछ पता चले तो समझए भी उन्हें लेकिन फिर सोचती कि यह मियांबीवी के बीच की बात है, वे खुद ही सुलझ लेंगे. लेकिन इन के झगड़े तो दिनप्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे थे.

उस रात फिर दोनों के बीच किसी बात को ले कर बहसबाजी शुरू हो गई.  कुछ ही देर में उन की आवाजें इतनी लाउड हो गईं कि वंदना को मजबूरन उन के बीच, बीचबचाव के लिए आना ही पड़ा.

‘‘अरे, क्या हो गया तुम दोनों को, क्यों लड़ रहे हो इस तरह से? बहू, तुम बताओ, क्या हुआ?’’ अपनी बहू मोनिका के करीब जा कर वंदना ने पूछा लेकिन वह यह बोल कर कमरे से बाहर निकल गई कि उस से क्या पूछ रही हैं, अपने बेटे से पूछें न. अपनी बहू के ऐसे रूखे व्यवहार से वंदना हिल गई क्योंकि आज से पहले कभी भी उस ने उस से इस तरह से बात नहीं की थी.

‘‘शुभम, तुम्हीं बता दो बेटा, क्या हुआ, क्यों लड़ रहे हो तुम दोनों? कोई समस्या है तो बताओ मुझे. मिलबैठ कर सुलझ लेंगे.  बोलो न, औफिस की कोई टैंशन है क्या,’’ वंदना ने शुभम के सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा लेकिन वह भी यह बोल कर घर से बाहर निकल गया, ‘‘कोई जरूरी काम है, थोड़ी देर में आता हूं.’’

‘‘अरे, पर सुनो तो बेटा,’’ पीछे से वंदना बोलती रही लेकिन शुभम गाड़ी स्टार्ट कर जाने कहां चला गया. घंटेभर बाद वापस लौटा और आते ही अपने कमरे में चला गया. वंदना को सब पता है वह कहां गया होगा. इसलिए उस ने कुछ पूछा नहीं और बाहर से दरवाजा भिड़का कर अपने कमरे में चली आई.

शुभम की शुरू से आदत रही है, जब भी उसे किसी बात को ले कर टैंशन होती है, वह बाहर जा कर सिगरेट का कश लगा आता है. वह कहते हैं न, ‘हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया…’ लेकिन अपनी मां को अपना दर्द कभी नहीं बताता, क्योंकि वह अपनी मां से बहुत प्यार करता है और उन्हें किसी बात की टैंशन नहीं देना चाहता लेकिन वंदना भी तो अपने बेटे से उतना ही प्यार करती है तो कैसे वह उसे टैंशन में देख सकती थी भला. इसलिए जानना चाहती थी कि आखिर क्या बात है जो दोनों इस तरह से लड़ रहे हैं पर शुभम कैसे और क्या बताए अपनी मां से कि वह दो चक्की के पाटों के बीच में पिस रहा है.

नहीं सोचा था उस ने कि उस से इतना प्यार करने वाली, उस के घर को अपना घर और उस की मां को अपनी मां की तरह प्यार करने का दावा करने वाली मोनिका एक दिन इस तरह से बदल जाएगी और उस से ऐसी मांग रखेगी जिसे वह कभी पूरा कर ही नहीं सकता.

जिस मां ने उसे जिंदगी दी, इस दुनिया में लाई,  उसे लायक इंसान बनाने के लिए रातदिन एक कर दिया, उसी मां को वह अपनी जिंदगी से, अपने घर से बाहर निकाल दे इसलिए कि मोनिका ऐसा चाहती है?

नहीं, वह कभी भी ऐसा नहीं कर सकता. भले ही मोनिका इस के लिए उसे और इस घर को छोड़ कर क्यों न चली गई पर वह अपनी मां को इस घर से जाने के लिए कभी नहीं कह सकता. अपने मन में सोच शुभम फफक कर रो पड़ा लेकिन पीछे से वंदना का स्पर्श पा कर जल्दी से उस ने अपने बहते आंसू पोंछ डाले और झठी मुसकराहट चेहरे पर लाते हुए पलट कर बोला, ‘‘अरे, मां, आप सोईं नहीं अब तक?’’

‘‘तू भी तो नहीं सोया अब तक,’’ उस के करीब बैठती हुई वंदना ने गौर से बेटे का चेहरा देखा. पता है उसे शुभम रो रहा था और उसे देखते ही उस ने अपने आंसू पोंछ डाले. ‘‘क्या बात है बेटा, बता न मुझे. किस बात की टैंशन है तुझे? औफिस में कुछ हुआ है क्या? या फिर मोनिका बहू ने कुछ?’’

‘‘अरे नहीं मां, कोई बात नहीं है. आप बेकार में टैंशन मत लो. जाओ, सो जाओ आप भी.’’ भले ही शुभम ने कह दिया कि कोई टैंशन नहीं है पर एक मां की नजरों से क्या अपने बच्चे की परेशानी छिपी रह सकती है कभी? बच्चे की एक सांस से मां समझ लेती है कि वह परेशान है या खुश. तो क्या अपने जिगर के टुकड़े की परेशानी महसूस नहीं कर सकती वंदना? आखिर उसी में तो उस की जान बसती है, उस के लिए ही तो वह जी रही है.

याद है उसे जब शुभम 3 साल का था, तभी उस के सिर से पिता का साया उठ गया था. वंदना के पति फौज में थे. जम्मूकश्मीर के कारगिल युद्ध में वे शहीद हो गए थे. 527 जवानों में एक जवान वंदना के पति भी थे जो अपने देश के लिए शहीद हो गए थे. तब वंदना मात्र 26 साल की थी. वंदना के मातापिता, नातेरिश्तेदारों ने उस से कितना कहा था कि अभी उस की उम्र ही क्या हुई है, वह दूसरी शादी कर ले. शुभम को भी पिता मिल जाएगा लेकिन वंदना ने किसी की बात नहीं मानी और कहा कि अब उस की जिंदगी सिर्फ उस के बेटे के लिए है.  अब वह उस के लिए ही जिएगी.

पढ़ीलिखी वंदना को जल्द ही एक स्कूल में टीचर की नौकरी मिल गई, जिस से वह बेटे का पालनपोषण करने लगी. वक्त के साथ शुभम बड़ा होने लगा. उस ने बचपन से ही अपनी मां को संघर्ष करते देखा था, इसलिए वह अपनी पढ़ाई पूरी कर जल्द से जल्द नौकरी पाना चाहता था ताकि वह अपनी मां को सुख का जीवन दे सके. अपने पापा की तरह शुभम भी देश की सेवा करना चाहता था मगर वंदना इस बात के लिए कतई राजी नहीं थी.

नहीं, देश की सेवा करना गर्व की बात है, लेकिन अब वंदना में इतनी हिम्मत नहीं बची थी कि वह अपने एकलौते बेटे को फौज में भेज सके. सो, उस ने शुभम को फौज में जाने से मना कर दिया.  अपनी मां की बात रखते हुए शुभम ने बैंक की नौकरी चुनी. हैदराबाद में बैंक की ट्रेनिंग के दौरान शुभम और मोनिका एकदूसरे से टकराए. दोनों की आंखें चार हुईं जो एक दिन प्यार में बदल गईं. दोनों एकदूसरे के इतने करीब आ गए कि ट्रेनिंग के दौरान ही दोनों ने एकदूसरे से अपने प्यार का इजहार कर दिया.  वैसे, मोनिका का सपना शुरू से ही बैंक में जाने का था.

3 साल तक रिलेशनशिप में रहने के बाद शुभम ने बड़ी हिम्मत कर के अपनी मां को बताया था कि वह एक दूसरी जाति की लड़की से प्यार करता है और उसी से शादी करना चाहता है लेकिन अगर वंदना नहीं चाहेगी तो वह उसे भूल जाएगा. बेटे का अपने प्रति इतना सम्मान देख कर वंदना ने भी इस रिश्ते के लिए हामी भर दी थी और दिल से उस ने मोनिका को अपनी बहू स्वीकार कर लिया था. बेटे की खुशी में ही तो वंदना की खुशी छिपी थी.

जब मोनिका इस घर में दुलहन बन कर आई थी तब वंदना ने खानदानी जड़ाऊ कंगन उस के हाथों में पहनाते हुए कहा था कि अब यह घर उस का भी है. वंदना ने कभी उसे इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि यह उस की ससुराल है, मायका नहीं. बल्कि, उस ने उसे अपने तरीके से जीने की पूरी आजादी दी. जो चाहा, करने दिया. मोनिका भी अपनी सास वंदना की बहुत इज्जत करती थी.  उसे सम्मान देती थी, उस की खुशियों का खयाल रखती थी.

जब वंदना किचन में काम कर रही होती तो वह आ कर काम में उस की मदद करने लग जाती और कहती कि वे आराम करें, वह सब कर लेगी लेकिन वंदना कहती कि वह भी तो शुभम की तरह औफिस से थकीमांदी घर आती है. और वैसे भी, वह पूरे दिन घर में आराम ही तो करती रहती है.

अपनी मां और पत्नी का आपस में मांबेटी जैसा प्यार देख कर शुभम सोचता कि मोनिका से शादी का उस का फैसला बिलकुल सही था. जहां वंदना अपनी बहू के सुख व आराम का पूरा खयाल रखती थी, वहीं मोनिका भी अपनी सास के मानसम्मान में कोई कमी नहीं रखती थी.  वह अपनी मां की तरह ही वंदना का खयाल रखती थी.

वंदना को हाई बीपी की शिकायत थी, इसलिए मोनिका इस बात का पूरा ध्यान रखती कि वह समय से दवाई ले. कभी भूल जाती तो मोनिका अपने हाथों से उसे दवाई खिलाती, प्यार की झिड़की देते हुए कहती कि वंदना तो सब का खयाल रखती है सिवा अपने लेकिन अब वही मोनिका सपनी सास से सीधे मुंह बात तक नहीं करती थी. एक बार पूछने भी नहीं आती कि वह कैसी है और उस ने दवा ली या नहीं. बल्कि, वह उस की हर बात का उलटा जवाब देती.

औफिस से आने के बाद मोनिका का ज्यादा समय अपनी मांबहनों से फोन पर बातें करते ही निकल जाता था. वंदना ही खाना बनाती और परोसती भी थी.  मोनिका अब घर के कामों में उस की कोई मदद नहीं करती थी. अगर शुभम कुछ कहता तो पलट कर जबाव देती कि, तो वही क्यों नहीं मदद कर देता मां के कामों में? आखिर, वह भी तो औफिस से आतेआते थक कर चूर हो जाती है.  घर में कोई क्लेश न हो, इस के लिए वंदना इशारे से शुभम को ही चुप रहने को बोलती.

मगर वह देख रही थी मोनिका की जिंदगी में उस की मांबहनों का दखल कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था. छोटी से छोटी बात वह अपनी मां से पूछ कर करने लगी थी और अगर वंदना कुछ कहती तो ऐंठ कर कहती कि वह कोई बच्ची नहीं है, जो वह उसे समझ रही है. अपनी मां से प्यार और मां समान सास से उसे इतनी नफरत क्यों होने लगी थी, यह बात वंदना समझ नहीं पा रही थी. बल्कि, पहले तो वह हर बात उस से पूछ कर ही करती थी.

रोज की तरह आज भी वंदना ने बेटेबहू का नाश्ता टेबल पर लगा दिया और फिर जल्दीजल्दी उन का लंच पैक करने लगी. शुभम को लंच का डब्बा पकड़ाते हुए उस ने हिदायत देते हुए कहा कि वह ठीक से खाना खा लिया करे, क्योंकि रोज ही डब्बे में खाना बचा रह जाता है. उस पर शुभम ने मां के हाथ से लंच का डब्बा लेते हुए कहा, ‘हां, खा लेगा. वह चिंता न करे.’

‘‘बहू, यह तुम्हारे खाने का डब्बा है.  इस में मैं ने तुम्हारी पसंद की भिंडी की सूखी सब्जी रख दी है, खा लेना.’’ लेकिन मोनिका ने खाने का डब्बा टेबल पर लगभग पटकते हुए कहा कि इस की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि वह उधर से ही अपनी मां के घर जाने वाली है और एकदो दिन वहीं रुकेगी. ‘‘अरे, पर बेटा,’’ वंदना आगे और कुछ कहती रही, पर मोनिका अपना पर्स उठा कर चलती बनी.

मोनिका का मायका इसी शहर में है.  मोनिका 3 बहनें ही हैं जिन में मोनिका सब से बड़ी है. उस की एक बहन जौब की तैयारी कर रही है और छोटी बहन अभी स्कूल में पढ़ रही है. मोनिका के पापा एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करते थे लेकिन कोरोना में उन की नौकरी छूट गई तो अभी वे किसी दूसरी कंपनी में नौकरी कर रहे हैं. मोनिका की मां घर संभालती है.

मोनिका के पापा तो सीधेसाधे इंसान लगे थे वंदना को मगर उस की मां जरा तेजतर्रार लगी. पति बच्चों को अपनी मुट्ठी में रखने वाली औरत टाइप. सुना था उस के घर में मोनिका की मां की ही चलती है. खैर, इस बात से वंदना को क्या लेनादेना. उसे तो अपने बेटे के सुख से मतलब था और इसीलिए उस ने इस शादी के लिए हां की थी लेकिन आज उसे लग रहा है कि लड़की के साथ उस के परिवार को भी देखना जरूरी होता है, खासकर मां को, क्योंकि मां ही तो बेटी की पहली शिक्षिका होती है. वही तो उसे दुनियादारी का पाठ पढ़ाती है. मोनिका जो वंदना के साथ ऐसा व्यवहार कर रही थी उस में उस की कोई गलती नहीं थी, बल्कि रेखा, उस की मां उसे जैसाजैसा करने को कहती जा रही थीं, वह कर रही थी.

रोज का यही नियम था, मोनिका को उस के औफिस छोड़ कर शुभम उधर से ही फिर अपने औफिस चला जाता था और आते समय उसे उस के औफिस से पिकअप कर लेता था लेकिन अब दोनों अपनीअपनी गाड़ी से औफिस जाने लगे थे, जो इस बात की ओर इशारा कर रहा था कि उन के बीच जरूर किसी बात को ले कर झगड़ा चल रहा है.

कल रात फिर दोनों के बीच भयंकर झगड़ा हुआ और सुबहसुबह ही मोनिका अपने मायके चली गई. मोनिका के चढ़े तेवर देख कर वंदना ने डर से उस से कुछ पूछा भी नहीं कि वह इतनी सुबहसुबह क्यों जा रही है. शुभम भी काफी चिढ़ा हुआ दिख रहा था, इसलिए वंदना ने उस से भी कुछ नहीं पूछा. उसे लगा, एकदो दिनों में सब ठीक हो जाएगा अपनेआप.  मगर ऐसा नहीं हुआ.

मोनिका को अपने मायके गए आज 10 दिनों से ज्यादा का समय हो चुका था. वंदना ने कई बार टोका भी शुभम को कि वह कब आएगी लेकिन उस का एक ही जवाब होता कि आ जाएगी, खुद ही. चिंता न करें.

‘‘क्या चिंता न करूं? अरे, बहू को गए इतने दिन हो चुके हैं और तू कहता है मैं चिंता न करूं.’’

‘पता नहीं क्या चल रहा है इन दोनों के बीच, कुछ बोलते भी तो नहीं हैं,’ वंदना खुद में ही भुनभुनाई.

‘‘सुन, कल जा कर तू बहू को ले आ,’’ वंदना की बात पर शुभम ने धीरे से सिर हिला दिया, जैसे उसे पता हो, वह नहीं आने वाली, इसलिए जाने का कोई फायदा नहीं है. ‘‘मुंडी क्या हिला रहा है, कुछ बोल तो?’’ शुभम की प्लेट में एक और रोटी डालते हुए वंदना बोली.

‘‘हां, मां, चला जाऊंगा,’’ जरा खीझते हुए शुभम बोला, ‘‘अब और रोटी मत देना, खाया नहीं जा रहा मुझ से.’’ शुभम को अनमने ढंग से रोटी तोड़ते देख एकाएक वंदना का हाथ बेलन पर रुक गया.

औफिस के लिए निकलते समय एक बार फिर वंदना ने शुभम से कहा कि वह शाम को बहू को लेता आए.

लेकिन शाम को उसे अकेले घर आया देख, वंदना ने पूछा, ‘‘बहू नहीं आई?’’

‘‘नहीं, वह मुझे जाने का समय नहीं मिला,’’ इतना ही बोल कर वह अपने कमरे में जा कर लेट गया. वंदना उसे खाने के लिए बुलाने गई तो देखा, वह छत को टकटकी लगाए देख रहा था. कुछ नहीं पूछा उस ने फिर. सोच लिया उसे ही अब कुछ करना होगा.

सुबह शुभम औफिस जाते हुए बोल गया था उसे आज औफिस से आने में देर लगेगी, इसलिए वंदना खाना खा ले. शाम के 5 बजे ही वंदना घर से निकल गई और सीधे मोनिका के घर पहुंच गई.  सोच लिया उस ने कि वह खुद ही अपनी बहू को घर वापस ले कर आएगी. दरवाजा मोनिका की मां रेखा ने खोला.

‘‘जी, आप यहां कैसे?’’ बड़े ही रूखे अंदाज में रेखा ने पूछा और अनमने ढंग से उसे घर के अंदर आने के लिए बोला.

वंदना सोफे पर आ कर बैठ गई और पूरे घर में एक नजर दौड़ाते हुए पूछा, ‘‘बहू अभी औफिस से नहीं आई है क्या?’’

‘‘देख तो रही हैं आप,’’ पानी का गिलास वंदना के सामने रखते हुए रेखा ने व्यंग्य से कहा, ‘‘वैसे, बताया नहीं, क्यों आई हैं आप यहां?’’

‘‘बहनजी, आप से एक जरूरी बात पूछनी थी,’’ बड़े अपनेपन से रेखा का हाथ अपने हाथों में लेते हुए वंदना बोली, ‘‘आप को कुछ पता है बहनजी, ये शुभम और मोनिका बहू किस बात को ले कर तनाव में हैं? मुझे तो कुछ बताते नहीं, सोचा आप को शायद पता हो?’’

‘‘पूछ रही हैं तो सुनिए,’’ अपना हाथ बड़ी बेदर्दी से वंदना के हाथ से छुड़ाते हुए रेखा बोली, ‘‘उन के तनाव का कारण आप हैं, आप.’’

‘‘मैं?’’ वंदना अवाक रह गई.

‘‘हां, आप. आप के रहते दोनों खुल कर जी नहीं पा रहे हैं. मैं पूछती हूं, चली क्यों नहीं जातीं आप उन की जिंदगी से? क्यों कुंडली मार कर बैठी हैं इस घर में? सिर्फ आप की वजह से दोनों के बीच शीतयुद्ध छिड़ा है और आप कहती हैं आप को कुछ पता ही नहीं है,’’ बोल कर रेखा अजीब तरह से हंसी और फिर बोली, ‘‘कैसी मां हैं आप कि अपने ही बेटेबहू को एकसाथ हंसीखुशी जीने देना नहीं चाहती हैं.’’

रेखा की बातें सुन कर वंदना स्तब्ध रह गई. उस के पैर जहां थे वहीं जम गए.  काठ मर गया उसे. वंदना को चुप देख कर रेखा ने फिर बोलना शुरू किया,  ‘‘मुझे तो समझ नहीं आ रहा कि आप यहां कर क्या रही हैं? अरे, गांव जा कर क्यों नहीं रहतीं, ताकि ये लोग सुकून से जी सकें लेकिन नहीं, आप क्यों जाएंगी गांव. आप तो बस डटे रहिए, भले ही फिर बहूबेटे के बीच तलाक ही क्यों न हो जाए.’’

‘‘क-क्या मतलब आप का?’’

‘‘मतलब यह कि मोनिका अब शुभम से तलाक लेगी, क्योंकि आप का श्रवण बेटा अपनी बीवी को छोड़ने के लिए तैयार है पर अपनी मां को नहीं. अरे, तो फिर शादी ही क्यों की उस ने? रहता अपनी मां के पल्लू में बंध कर,’’ रेखा के इतने कड़वे बाण सुन कर वंदना को लगा किसी ने उस के कानों में गरम पिघला सीसा डाल दिया हो. वह सोफे पर से उठी और जाने लगी लेकिन उसे यह भी होश नहीं रहा कि जिस गिलास में वह पानी पी रही थी उसे भी हाथ में लिए घर से बाहर निकल गई. ‘‘अरे, ओ, गिलास तो रखती जाओ, उसे ले कर कहां चली.’’

पीछे से रेखा की कर्कश आवाज से वह रुकी, अपने हाथ में पकड़े गिलास को देखा, पलट कर उसे टेबल पर रखा, फिर सीढि़यां उतरती हुई आगे बढ़ने लगी.  पीछे से रेखा ने अपना अधर टेढ़ा कर कहा, ‘‘हुम्म, बड़ी आईं बहू पर लाड़ जताने वाली, नौटंकीबाज औरत.’’

जैसेतैसे वंदना घर पहुंची, देखा, शुभम हौल में बैठा लैपटौप पर कोई काम कर रहा था. ‘‘अरे, मां, कहां गई थीं आप? और अपना फोन क्यों नहीं उठा रही थीं?’’

वंदना ने उस की बातों का कोई जवाब नहीं दिया.

‘‘अच्छा मां, सुनिए न, एक कप अदरक वाली चाय पिला दीजिए, सिर जोरों से दुख रहा है.’’

वंदना यंत्रवत सी किचन में गई और शुभम के लिए एक कप चाय बना लाई. ‘‘आप नहीं पिएंगी?’’ शुभम ने पूछा तो वंदना ने सिर्फ इतना ही कहा कि उस का मन नहीं है और वह कमरे में चली गई.  वंदना को समझ नहीं आ रहा था कि कैसे वह शुभम से इस बारे में बात करेगी   लेकिन करनी तो पड़ेगी और वह भी अभी, इसी वक्त करनी होगी, वरना, कहीं देर न हो जाए.

‘‘शुभम बेटा, एक बात करनी थी तुम से?’’

‘‘हां, मां बोलिए न,’’ लैपटौप पर नजरें गड़ाए ही शुभम बोला.

‘‘मैं गांव जाना चाहती हूं.  कल का टिकट करा दो मेरा.’’

‘‘गांव, अचानक से आप को गांव क्यों जाना है, मां?’’

‘‘क्योंकि वहां भी तो हमारी जरूरत है न बेटा. गांव में पूर्वजों का मकान है, थोड़ीबहुत जमीन भी है तो उस की देखभाल भी जरूरी है.’’

‘‘हां, तो वहां देखने वाले लोग हैं न.  नहींनहीं, कोई जरूरत नहीं आप को वहां जाने की.’’

‘‘नहीं बेटा, जाना पड़ेगा अब. मेरा मतलब है कि ऐसे ही किसी के भरोसे तो हम घरजमीन नहीं छोड़ सकते न. और अचानक से कहां, बल्कि मैं तो कब से वहां जाने की सोच रही थी पर तू ही है कि मुझे जाने नहीं देता. कब तक अपनी मां को अपने पास रोक कर रखेगा रे,’’ बोलतेबोलते वंदना की आंखें भर आईं जिसे उस ने झटके से पोंछ डाला.

शुभम को समझ में आ गया था कि बात जरूर कुछ हुई है, वरना, मां अचानक गांव जाने की बात क्यों करती.

‘‘मां, सच बताओ, आप से किसी ने कुछ कहा क्या? मोनिका ने कुछ कहा आप से? आप को मेरी कसम मां, बताओ क्या बात है,’’ शुभम ने अपनी कसम दे कर पूछा तो न चाहते हुए भी वंदना को उसे सारी बात बतानी पड़ी.

‘‘नहीं बेटा, गुस्सा मत हो. एक मां होने के नाते रेखाजी अपनी जगह सही हैं और एक बार मोनिका के दिल से सोच कर देखो, उसे भी तो लगता होगा वह अपने पति के साथ एक छत के नीचे अपने हिसाब से जिए, जहां तुम दोनों के सिवा और कोई न हो? तो इस में गलत क्या है बेटा? और मेरा क्या है, मैं तो आतीजाती रहूंगी न.’’

शुभम ने लाख कहा कि उसे यहां से जाने की कोई जरूरत नहीं है और वह अपनी मां के बिना नहीं रह सकता.  मगर वंदना ने उस की एक न सुनी और गांव रहने चली गई. वंदना के जाते ही मोनिका अपने घर रहने आ गई और कुछ दिनों बाद मोनिका की मां और दोनों बहनें भी अपना बोरियाबिस्तर ले कर यहां जम गईं.

शुभम और मोनिका को बैंक की तरफ से रहने के लिए बड़ा घर और गाड़ी मिली हुई थी. घर के काम और खाना बनाने के लिए घर में दोदो बाई आती थीं. रेखा और उन की बेटियों के मजे के दिन कट रहे थे. रोज घर में छप्पन भोग बनता, हंसीठहाके चलते, बाहर से कभी कपड़े तो कभी कुछ का और्डर होता रहता था और पैसे मोनिका के क्रैडिट कार्ड से पे किए जाते लेकिन इस बात के लिए वह जरा भी उफ न करती थी. इस बात का उसे कोई अफसोस भी नहीं था कि वंदना के गांव चले जाने से शुभम कितना दुखी है.

रेखा ने मोनिका का ऐसा ब्रेनवाश किया था कि वह जो कहती, वह वही करती थी. शुभम ने भी अब रिऐक्ट करना छोड़ दिया था. वह तो औफिस से आ कर खाना खाते ही सीधा अपने कमरे में चला जाता और थोड़ी देर फोन पर अपनी मां से बात कर के सो ही जाता.

कितनी बार शुभम ने अपनी मां से कहा था कि उसे खाना पकाने की क्या जरूरत है. कुक आ कर बना जाया करेगी, वह आराम करे लेकिन वंदना कहती कि उसे खाना पकाना अच्छा लगता है और जो बात अपने हाथों से बनाए खाने में है वह दूसरों के हाथों से बने खाने में कहां. लेकिन देखो, वंदना के जाते ही मोनिका ने तुरंत कुक रख लिया ताकि उस की मांबहनों को कोई काम न करना पड़े. मंजु कुक तीनों टाइम का नाश्ताखाना बना जाती थी लेकिन वह भी अब इन से खिंचने लगी थी क्योंकि तीनों मांबेटी अपनीअपनी फरमाइशों का खाना बनवातीं और मंजु को डांटती भी थीं तो कौन भला यहां काम करना चाहेगा?

पापी पेट ही है जिस के कारण बेचारी मंजु यहां टिकी हुई थी.  झड़ूपोंछा करने वाली बाई भी रोज बड़बड़ कर के जाती कि ये लोग घर को कबाड़ा बना कर रखते हैं लेकिन ये सब मोनिका को कहां दिखाई पड़ता था. उसे तो अपनी मांबहन इतनी अच्छी लगती थीं कि अपनी सास को ही उस ने घर से बाहर निकाल दिया.

जब भी शुभम फोन पर अपनी मां से कुछ बात कर रहा होता, रेखा, उस की सास, के कान खड़े हो जाते कि वह अपनी मां से क्या बात कर रहा है. यह देखता था शुभम. पूरे घर पर मोनिका के मायके वालों ने कब्जा जमा रखा था.  यहां रह कर ये लोग आराम से खापी और मौज कर रहे थे और वह अपने ही घर में मेहमान बन कर रह गया था.

मन तो करता शुभम का कि चिल्ला कर पूछे मोनिका से कि क्या अब उस की प्राइवेसी भंग नहीं हो रही है? उस की मांबहन जो यहां रह रही हैं उस से उसे उकताहट नहीं हो रही है? और उस की मां के रहते उसे बहुत तकलीफ हो रही थी? लेकिन वह कह न पाया क्योंकि वंदना ने उसे अपनी कसमों से बांध जो दिया था. वंदना का कहना था कि अपने बेटेबहू की खुशी में ही उस की खुशी है.

अगर वे यहां सुखशांति और प्रेम से रहेंगे तो वह भी वहां सुकून और चैन से जी पाएगी. इसलिए ही शुभम खून का घूंट पी कर सब बरदाश्त कर रहा था. दुख तो उसे इस बात का हो रहा था कि वंदना ने मोनिका को बेटी की तरह प्यार दिया और बदले में मोनिका ने उसे उस के बेटे से ही दूर कर दिया, ताकि वह अपने मायके वालों को यहां बुला कर रख सके? कैसी साजिश रची इन मांबेटी ने उस की मां के खिलाफ.

खैर, अब जो भी है, बस यही और इसी माहौल में उसे इन्हीं लोगों के साथ जीना होगा, रो कर चाहे हंस कर. शुभम ने एक गहरी सांस लेते हुए अपने मन को समझया कि मोनिका से समझता कर लेने में ही उस की भलाई है. कम से कम रिश्ते तो बचे रहेंगे उन के.

रात में मोनिका सोने जाने से पहले बोली थी कि कल यानी आज उस के बैंक में औडिट आने वाला है तो उसे बैंक जल्दी जाना पड़ेगा.  मगर 8 बजने को थे और अब तक वह सोई हुई थी.  ‘‘मोनिका, आज तुम्हें बैंक जल्दी जाना है, तो उठो.’’ लेकिन मोनिका कहने लगी कि उस की तबीयत ठीक नहीं लग रही है. ‘‘क्या हुआ तुम्हारी तबीयत को?’’

‘‘रात से पेट में दर्द है’’ पेट पर हाथ रख मोनिका कहने लगी कि रात में उसे एकदो बार उलटी और दस्त जैसा हुआ.  अभी भी पेट में ऐंठन लग रही है, इसलिए वह बैंक नहीं जा पाएगी शायद.

‘‘तो तुम ने मुझे उठाया क्यों नहीं? अच्छा, तुम आराम करो. और एक काम करो, फोन कर के बैंक से 2 दिन की छुट्टी ले लो. मैं कोशिश करूंगा घर जल्दी आने की,’’ बोल कर शुभम अपने बैंक तो चला गया लेकिन उस का ध्यान मोनिका पर ही अटका हुआ था. उस ने उसे फोन करने की सोची पर फिर लगा शायद वह दवा खा कर सो रही होगी. जब उस ने रेखा को फोन लगा कर मोनिका की तबीयत के बारे में पूछा तो पता चला कि तीनों मांबेटी ‘टाइगर 3’ फिल्म देखने गई हुई हैं.

शुभम को बहुत गुस्सा भी आया कि वहां मोनिका की तबीयत खराब है और इन लोगों को देखो, फिल्म देखने चली गईं. अपने सीनियर को बोल कर शुभम तुरंत अपने घर जाने को निकल गया. रास्ते में उस ने मोनिका को कई बार फोन लगाया पर उस ने उस का फोन नहीं उठाया तो शुभम को उस की चिंता होने लगी कि वह ठीक तो है. घर आया तो देखा मोनिका बिछावन पर बेसुध पड़ी थी और उस का शरीर बुखार से तप रहा है. जल्दी से वह उसे डाक्टर के पास ले गया, जहां पता चला कि मोनिका को डायरिया हुआ है. डाक्टर कहने लगा कि वैसे तो डायरिया कोई बहुत बड़ी बीमारी नहीं है मगर लापरवाही से आदमी की जान भी जा सकती है.  पूछने पर डाक्टर कहने लगा कि डायरिया  किसी संक्रमण के कारण या फिर खानेपीने में लापरवाही बरतने या गंदगी के कारण हो सकता है.

जब से वंदना यहां से गई है, लगभग रोज ही बाहर से खाना आ रहा है. बाहर के खाने में पैसे तो जाते ही हैं, सेहत भी बिगड़ती है. अब लो, बीमारी, डाक्टर और दवाइयों पर भी हजारों रुपए खर्च होंगे लेकिन शुभम यह बात बोल भी तो नहीं सकता किसी से, वरना, घर में बेवजह क्लेश होगा और मोनिका कहेगी कि उस की मांबहनों का यहां रहना उसे अच्छा नहीं लग रहा है लेकिन आज झेलना तो शुभम को ही पड़ रहा है न.  बैंक से छुट्टी ले कर वह घर और अस्पताल की दौड़ लगा रहा है.

2 दिन अस्पताल में रहने के बाद मोनिका को छुट्टी दे दी गई, क्योंकि उस ने कहा कि वह पहले से बेहतर फील कर रही है.  दवा की परची लिखते हुए डाक्टर ने उसे हिदायत देते हुए कहा कि वह अपने खानेपीने का पूरा ध्यान रखे और जहां तक हो सके, तरल पदार्थ ज्यादा ले, जैसे नारियल पानी, नीबूपानी वगैरह. लेकिन घर आने के बाद मोनिका फिर लापरवाह हो गई जिस से उस की तबीयत फिर बिगड़ गई. उसे बारबार दस्त और उलटी होने लगी.

शुभम ने उसे फिर अस्पताल में भरती करवा दिया. 2 सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद मोनिका घर आई तो सही पर वह शरीर से बहुत कमजोर हो गई थी. जब मोनिका को पता चला कि दोनों बाई काम छोड़ कर जा चुकी हैं तो उस ने अपना माथा पकड़ लिया कि अब घर का सारा काम कैसे होगा?

‘‘अरे, क्या कैसे होगा, मम्मीजी हैं न, और तुम्हारी दोनों बहनें भी तो हैं. सब संभाल लेंगी, क्यों मम्मीजी?’’ रेखा की तरफ देखते हुए शुभम बोला.

रेखा ने भले ही हां, में सिर हिला दिया लेकिन वह अब यहां नहीं रह सकती, क्योंकि वे यहां घर का काम या मोनिका की सेवा करने थोड़े ही आई थीं? वे तो बेटी के घर मजे करने आई थी, बेटी की कमाई पर राज करने आई थीं. तभी तो उस ने मोनिका को उस की सास के खिलाफ कर दिया था ताकि वह इस घर में आराम से रह सके.

लेकिन आज जब मोनिका बिस्तर पर पड़ी थी तो कैसे वह यह बोल कर चली गई कि वहां उस के पति को उस की जरूरत है, इसलिए वह अब यहां नहीं रह सकती. यह भी नहीं सोचा उस ने कि उस की प्यारी बेटी मोनिका अभी इतनी कमजोर है और उसे उस की सब से ज्यादा जरूरत है. दोनों बहनें भी जो दीदी-दीदी कह कर मोनिका से महंगीमहंगी चीजें झटकती थीं, वे भी अपनी पढ़ाई का बहाना बना कर यहां से चलती बनीं. कितना रोका उस ने अपनी मां को कि वह कुछ दिन बस रुक जाए, वह जब ठीक हो जाए तो चली जाना पर रेखा नहीं रुकी, स्वार्थी औरत.

जैसेतैसे कर के घर के काम तो हो ही रहे थे मगर बारबार मोनिका की आंखों से यह सोच कर आंसू गिर पड़ते कि उस की मांबहन ने ऐसी हालत में उस का साथ छोड़ दिया और यहां से चली गईं.

शुभम आज थोड़ा जल्दी ही बैंक के लिए निकल गया लेकिन जाने से पहले उस ने मोनिका को दवा और ब्रैड सेंक कर दे दी और कुकर में उस के लिए खिचड़ी भी बना गया ताकि वह दोपहर में खा सके. दवा खाते ही मोनिका को नींद आ गई. जब उठी तो उस का मन एकदम खालीखाली सा लगने लगा. मन किया खूब रोए.

आज उसे अपनी सास की बहुत याद आ रही थी कि कैसे वह उस का और पूरे घर का खयाल रखती थी. उसे कोई टैंशन लेने नहीं देती थी लेकिन उस ने उन्हें क्या दिया, बेइज्जती और तिरस्कार. यहां तक कि उन्हें उन के बेटे से भी अलग कर दिया उस ने. उन्हें गांव में टूटीफूटी झेपड़ी में रहने को मजबूर कर दिया ताकि वह अपनी मांबहन को बुला कर अपने घर में रख सके. ओह, कितनी गंदी और स्वार्थी है वह. तभी पीछे से किसी का स्पर्श पा कर जब वह पलटी तो देखा, सामने वंदना खड़ी उस के बालों को सहला रही है. ‘‘मां’’ बोल कर मोनिका उन से लिपट कर फूटफूट कर रोने लगी.

‘‘बस, बेटा बस, मैं आ गई हूं न, अब,’’ उस के बगल में बैठती हुई वंदना बोली.

‘‘मां, मुझे माफ कर दो, मां.  मुझ से गलती हो गई,’’ वंदना की गोद में सिर रख मोनिका फिर सिसक पड़ी.

‘‘मां भी कहती हो और माफी भी मांग रही हो? नहीं बेटा, तुम ने कुछ नहीं किया, इसलिए खुद को दोष मत दो. और कहा न मैं ने, अब सब ठीक है,’’ यह  बोल कर वंदना हंसी तो मोनिका ने उन्हें कस कर पकड़ लिया और हंस कर बोली, ‘‘हां, अब सब ठीक है, मां.’’

वहां, दरवाजे के पास खड़ा शुभम, सासबहू को प्यार से एकदूसरे को गले लगाते देख मंदमंद मुसकराया और अपने मन में ही बोला, ‘हां, अब सब ठीक है’ मोनिका को बिना बताए ही वह सुबहसुबह वंदना को लेने गांव निकल पड़ा था और मोनिका को लगा वह बैंक गया है.  खैर, जो भी हो, पर अब सब ठीक है.

 

भारत के 70 फीसदी युवा तनाव और डिप्रैशन से जूझ रहे

जोश, उमंग और उत्साह ये तीनों युवाओं की पहचान होते हैं. किसी भी देश में युवा ही बदलाव लाते हैं लेकिन जहां 70 फीसदी युवा तनाव और अवसादों का शिकार हों, उस देश का भविष्य उज्ज्वल भला कैसे हो?

एसआरएम यूनिवर्सिटी आंध्र प्रदेश और अन्य संस्थानों ने युवाओं पर एक चौंकाने वाला शोध किया है. यह एक्सपैरिमैंट अक्तूबर 2025 में क्रौस-सैक्शनल स्टडीज में प्रकाशित हुआ है. इस शोध में 1,628 युवाओं को शामिल किया गया जो देश के 9 बड़े शहरों

के कालेज छात्र थे. इस अध्ययन में

70 फीसदी युवा एंग्जाइटी से प्रभावित थे. तकरीबन 60 फीसदी युवाओं में डिप्रैशन के लक्षण पाए गए. 70.3 फीसदी युवा तनाव का सामना कर रहे हैं. अध्ययन के अनुसार, भारतीय युवा कैरियर के दबाव में एंग्जायटी और डिप्रैशन जैसी मानसिक स्थिति का शिकार हो रहे हैं.

सिंगापुर विश्वविद्यालय के मैंटल हैल्थ एक्सपर्ट डा. जोन वोंग के मुताबिक युवाओं में एजुकेशन और कैरियर को ले कर मानसिक दबाव बेहद ज्यादा है. ग्रेड और कैरियर में आगे बढ़ने का दबाव अकसर इमोशंस पर हावी हो जाता है. ऐसे में यूनिवर्सिटीज को स्टूडैंट्स की मैंटल हैल्थ को ले कर काउंसलिंग करने पर ध्यान देना चाहिए.

इस एक्सपैरिमैंट को देखते हुए भारत की बड़ी यूनिवर्सिटीज अपने स्टूडैंट्स की मैंटल हैल्थ को बेहतर बनाने के लिए कदम उठा रही हैं. इस में आईआईटी खड़गपुर ने सेतु ऐप बनाया है. जहां स्टूडैंट्स को तनाव से निकलने में मदद मिल रही है. आईआईटी गुवाहाटी ने फर्स्ट ईयर के छात्रों के लिए काउंसलिंग की शुरुआत की है. वहीं आईआईटी कानपुर में आउटरीच, आईआईटी दिल्ली में मैंटल हैल्थ पर चर्चाएं कराना और आईआईटी बौम्बे ने डाक्टरों के साथ साझेदारी की पहल की है ताकि छात्रों को स्ट्रैस से मुक्ति मिल सके.

युवा भारत का भविष्य हैं. यदि

70 फीसदी तनावग्रस्त हैं तो विकास कैसे संभव है? इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए लेकिन सरकारें युवाओं को सिर्फ वोटबैंक की तरह देखती हैं. व्यर्थ के राजनीतिक मुद्दों में युवाओं को फंसाया जा रहा है. सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया युवाओं में तनाव को बढ़ा रहे हैं. युवाओं के अंदर जहर भरा जा रहा है. इस से सांप्रदायिक और जातीय नफरत तो बढ़ ही रही है, युवाओं का भविष्य भी खराब हो रहा है. Hindi Family Story.

Hindi Family Story: आओ समधिन- मिश्राइन ताई के सामने एक ही रास्ता रह गया था

Hindi Family Story: सविताजी अपने व्यवहार से पूरी सोसाइटी की ‘मिश्राइन ताई’ बन गई थीं. अड़ोसीपड़ोसी सब उन्हें बहुत पूछते थे. लेकिन बेटेबहू को उन की यही नेकनीयती एक आंख न सुहाई. ऐसे में मिश्राइन ताई के सामने एक ही रास्ता रह गया था.

मिश्राइन ताई अकसर कहा करती थीं कि, ‘हम न जाएंगे कभी वृद्धाश्रम. यह हमारा घर है, हम काहे निकलेंगे. घर से ऊं निकलते हैं जिन का अपना घर नहीं होता. हम ने अपनी मेहनत के पैसों से ई घर खरीदा है तो हम कहीं नहीं जावेंगे.’

‘बिलकुल सही. क्यों जाएंगी आप कहीं,’ पड़ोसिन राजश्री ने हंस कर उन का समर्थन किया था.

राजश्री ने जब ‘अपना घर वृद्धाश्रम’ के डाटा में मिश्राइन ताई का नाम सविताजी का देखा तो वह दृश्य उस की आंखों के सामने नाच गया.

प्राइमरी स्कूल की शिक्षिका राजश्री उसी दिन से मिश्राइन ताई के प्रति समर्पित हो गई थी जिस दिन रात के करीब ढाई बजे उस के पति राकेश को हार्टअटैक आया था. उस के सभी रिश्तेदारों ने रात ज्यादा होने का हवाला दे कर साथ न दिया था तब किस तरह मिश्राइन ताई ने रातदिन एक कर के उस की मदद की थी और राकेश के हौस्पिटल ले जाने से घर आने तक, खाना बनाने से ले कर हौस्पिटल ड्यूटी तक सबकुछ मिश्राइन ताई ने संभाल लिया था. आज उन के साथ बुरा हो रहा था तो राजश्री कैसे चुप बैठ सकती थी. खून का रिश्ता न सही, हमदर्दी का रिश्ता तो था ही. उसी रिश्ते के नाते शाम के वक्त राकेश को साथ ले कर वह मिश्राइन ताई के बेटे हरिअंश के पास पहुंची.

‘‘बेटा हरि, ऐसी क्या नौबत आ गई कि तुम्हें ताई को वृद्धाश्रम भेजना ही सही लगा.’’

‘‘मैं ने नहीं भेजा, वे खुद चली गईं. वे भी हम से बिना पूछे, बिना बताए,’’ हरि ने एक ही सांस में सारी बात कह डाली थी, जिस से चोर की दाढ़ी में तिनका साफ नजर आ रहा था. ‘‘आप को पता है, जब से मिताली इस घर में आई है, मां ने कभी घर में शांति न रहने दी.’’

उसी वक्त मिताली अपने कमरे से बाहर आई, ‘‘वैसे, आप लोगों को इस विषय में बोलने की क्या जरूरत आन पड़ी, आप लगते कौन हैं? दूसरों के घर के मामले में दखल देना कहां की समझादारी है?’’

मिताली जिस अंदाज में बोल रही थी राजश्री को समझाते देर न लगी कि पूरे महल्ले से किसी के लिए लड़ लेने वाली मिश्राइन ताई ने क्यों चुपचाप यहां से चले जाने के फैसले को स्वीकार कर लिया होगा. मिताली देखने में खूबसूरत तो थी ही, साथ ही, 25 लाख रुपए के पैकेज का जौब कर रही थी जोकि हरिअंश के पैकेज का दोगुना था.

राजश्री को सवालजवाब करते देख मिताली ने दोटूक कह दिया कि, ‘‘चाय पी लीजिए और चलते बनिए और जितनी हमदर्दी है वह अपने घर में दिखाइए, यहां नहीं.’’

रास्ते में राकेश ने राजश्री को ही डांटा, ‘‘क्या जरूरत थी उन के घर के मामलों में बोलने की, बहू उन की, बेटा उन का, जैसे रखना चाहे रखें.’’

राजश्री दोनों तरफ से इतना डांट खा चुकी थी कि अब और कुछ बोलने की इच्छा उस में बाकी न थी. आज उसे अपना निसंतान होना कहीं सुकूनभरा लग रहा था. जिस के लिए वह हर रोज प्रकृति से लड़ रही थी कि दुनिया में इतने अनाथ बच्चे हैं, एक उस की गोद में आ जाता तो किसी का क्या बिगड़ जाता लेकिन आज मिश्राइन ताई की हालत देख कर उस के हृदय के किसी कोने में संतोष महसूस हो रहा था. चुपचाप करवट बदल कर सो गई.

जब से बड़े शहरों में सोसाइटी परंपरा शुरू हुई है तब से गांव परंपरा जैसे एक बार फिर जीवित हो चुकी है. ए ब्लौक यानी ए टोला, बी ब्लौक यानी बी टोला. अपने ब्लौक को ले कर जन्मदिन मना लेना या फिर किट्टी का आयोजन कर लेना. आपस में बैठ कर दूसरी सोसाइटी की बुराई करना, कौन किस के साथ आ रहा है, कौन देर रात गए आ रहा है पर चर्चा करना आम बात होती है. सोसाइटी में प्रतियोगिता आयोजित कर लोगों को व्यस्त रखना.

जो सोसाइटी अपने लोगों को ज्यादा व्यस्त रखती है वही सोसाइटी सब से ज्यादा चर्चित और उसी सोसाइटी के बाकी फ्लैट खरीदने की होड़ भी लग जाती है. आजकल यही सब इंदौर के महेशपुरी इलाके की ‘स्वर्ग सोसाइटी’ में भी चल रहा था. इसी सोसाइटी में रहने वाली फ्लैट नंबर 56 की मिश्राइन ताई बड़ी बेबाक महिला थीं. पति के छोड़ कर जाने के बाद बड़ी कठिनाइयों का सामना करते हुए अपने बेटे हरिअंश को पढ़ायालिखाया और जिस दिन बेटे ने अपनी पहली तनख्वाह ला कर हाथों में रखी थी उसी दिन उन्होंने अपनी नौकरी से रिजाइन कर दिया था और पूरी तरह से सोसाइटी की ‘मिश्राइन ताई’ बन गई थीं.

उस रात उन्होंने अपने फ्लैट पर पार्टी दी और घोषणा की कि आज के बाद किसी के घर में कोई भी समस्या हो तो वह उन के पास बेहिचक आए. वे सब की मदद के लिए हमेशा तैयार रहेंगी और अब से उन के जीवन का उद्देश्य भी यही है. लोगों ने तालियां बजा कर उन की इस घोषणा का स्वागत किया. कइयों ने उसी वक्त अपनी छोटीमोटी जिम्मेदारियां थमा भी दीं. धीरेधीरे मिश्राइन ताई सब की चहेती बन गई थीं. कइयों के घर के छोटेमोटे झागड़े यों ही सुलझा देती थीं. हां, उसे सुलझाने के लिए अपना वकील, जोकि उन का अपना कोई पड़ोसी या रिश्तेदार होता था, लाने के लिए कहती थीं.

मिश्राइन ताई को अब हरिअंश के विवाह की चिंता सताने लगी. बात आगे बढ़ती, उस से पहले ही हरिअंश ने अपनी ही कंपनी की सीनियर मैनेजिंग डायरैक्टर मिताली से अपने प्रेमसंबंध को मां के सामने रख दिया. मिताली हरिअंश से उम्र में बड़ी थी जो कि मां को खटक रही थी लेकिन जहां दिल का मामला हो वहां उम्र की क्या बिसात. काफी धूमधाम से बरात निकली थी और उस से दोगुने धूम के साथ मिताली हरिअंश के घर आ गई. मिताली अकेले नहीं आई थी, उस के साथ आई थीं उस के मां के फोनकौल और पिता की अशेष नसीहतें.

बुढ़ापे की दहलीज पर खड़ी मिश्राइन ताई बहू के हाथ की केवल खीर ही चख पाई थीं जिसे बनाया भी उन्होंने ही था, बस, रस्म के नाम पर मिताली ने केवल ड्राईफ्रूट्स डाल कर चलाया था. उस के बाद कटोरियों में परोसा भी था. पूरा कमरा पड़ोसियों से भरा था. मिश्राइन ताई जिन की भी मदद करती थीं वही उन का सगा बन जाता था. उस की एक वजह यह भी थी कि पति के छोड़ कर जाने के बाद सभी रिश्तेदारों ने मुंह मोड़ लिया था, कारण चाहे जो भी रहे हों.

मिताली ने सुहागरात के कमरे में आते ही पूछा, ‘हरि बेबी, तुम ने तो कहा था कि तुम्हारे घर में तुम्हारी मां के अलावा कोई नहीं है, फिर इतनी खीर किन के बीच बांटी गई?’

‘वे सोसाइटी के लोग थे,’ हरिअंश ने शेरवानी उतारते हुए कहा.

तभी कौलिंग बेल बजी. दूल्हादुलहन सजग हो गए.

मिताली कमरे से बाहर आ गई थी.

दरवाजे पर एक नवयौवना खड़ी थी. उस की गोद में एक बच्चा था जिस का रोना बंद ही नहीं हो रहा था.

‘ताई, आप मुन्ना को जरा संभालिए, मुझे इस के पापा को हौस्पिटल ले कर जाना है,’ उस नवयौवना ने सुबकते हुए कहा.

‘फिर से पेट में दर्द हो रहा है?’ बच्चे को गोद में लेते हुए सहानुभूति जताई.

‘हां, ताई.’

‘लेकिन इतनी रात को अकेली कैसे जाओगी, मैं भी चलती हूं तुम्हारे साथ,’ ताई ने आगे बढ़ कर कहा.

‘नहीं, इस की आवश्यकता नहीं है. बस, आप,’ कहते हुए तेज कदमों से चली गई.

मिश्राइन ताई बच्चे को चुप कराने की कोशिश अकेले ही करती रहीं.

बच्चे की आवाज से दोनों की नींद में खलल पड़ चुका था. मिताली ने गुस्से में आ कर हरि को कमरे से बाहर निकाल दिया.

‘मां, क्या जरूरत थी ये सब करने की, कम से कम आज की रात,’ हरिअंश ने ऊंची आवाज में कहा.

‘बेटा, मैं उन की मदद नहीं करूंगी तो और कौन करेगा. आखिर उन का है ही कौन,’ ताई बच्चे को चुप कराने की नाकाम कोशिश करते हुए बोलीं.

‘आप से तो बात करना बेकार होता है,’ हरि पैर पटकता दूसरे कमरे में चला गया.  मिताली ने अपना कमरा बंद कर

लिया था.

रात के 2 बजे कौलिंग बेल फिर बजी. इस बार वही नवयौवना आई और सोते हुए बच्चे को ले गई.

मिश्राइन ताई हर चीज के लिए समय निकाल लेती थीं. मिताली के साथ ऐसा कभी न हुआ कि उसे लंच या डिनर समय पर न मिला हो, फिर भी उसे शिकायत होती थी.

‘मैं कैसी ससुराल में आ गई हूं, कभी शांति नहीं मिलती.’ फोन पर अपनी मां को बताते हुए मिताली ने कहा. हरेक जानकारी अपनी मां तक पहुंचाना उसे सब से जरूरी लगता था और मां भी हमेशा आम को खास बना देती थी, जिस से घर में तनाव का माहौल बन जाता था.

एक शाम मिताली के मातापिता उसी वक्त आ धमके जब मिश्राइन ताई का दरबार सजा हुआ था.

‘समधिन, यह क्या तरीका है. मेरी बेटी अभीअभी औफिस से आई है और आप घर में शोर मचा रही हैं?’ मिताली के पिता ने दरवाजे से ही चिल्लाते हुए कहा.

‘ओह भाईसाहब, आइएआइए, अंदर तो आइए,’ ताई ने पल्लू संभालते हुए हाथ जोड़ कर कहा.

‘उस पर काम का कितना दबाव है, आप को पता भी है?’ मिताली के पिता आवाज और ऊंची कर के बोले.

‘ड्यूटी तो ड्यूटी होती है,’ ताई ने भी मोरचा संभाला.

‘आप के मामूली एक्जीक्यूटिव बेटे जैसे दस उस के आगेपीछे घूमते रहते हैं. पता नहीं आप के बेटे में उस ने क्या देख लिया,’ यह स्वर मिताली की मां का था.

‘यह सब बंद कीजिए अभी के अभी,’ मिताली के पिता ने कड़े स्वर में कहा.

‘आप लोग आए हैं, अच्छी बात है लेकिन मैं अपने घर में क्या करूंगी, क्या नहीं, यह मेरा फैसला होगा,’ मिश्राइन ताई जो किचन में से पानी लाने गई थीं वहीं से चिल्लाईं.

‘आप का मामला कैसे हो सकता है भला, हमारी बेटी रहती है इस घर में?’ मिताली की मां ने कहा.

इस बात पर मिश्राइन ताई चुप रह गईं क्योंकि यही बात मिताली अपने तरीके से कह सकती थी. घर के मामले को घर में ही सुलझा सकती थी. वह सोचने लगी.

‘ठीक है समधिन, मैं इस बात का खयाल रखूंगी. आगे से आप की बेटी कोई शिकायत नहीं करेगी, यह मेरा वादा है.’ अब तक मिश्राइन ताई हथियार डाल चुकी थीं.

लेकिन जिस घर में दहेज के साथ मातापिता के विचार आते हैं वहां न घर बसता है न घर के लोग. यह शाश्वत सत्य है.

शादी के अभी 2 महीने भी नहीं हुए थे कि मिताली अपने घर लौट गई.

मां ने बहू को मना कर लाने के लिए बेटे को भेजा तो बेटा वहीं का हो कर रह गया.

‘बहू, घर चलो. तुम दोनों के बगैर घर घर नहीं, वीरान लगता है.’ एक दिन मिश्राइन ताई बहू को मनाने उस के घर चली गईं.

‘क्यों, वहां है न आप के अपने छोटू की अम्मा, निशि के पापा, बंटी के चाचा, रहिए उन के साथ,’ मिताली के मातापिता ने जवाब दिया था.

‘बेटी, तुम दोनों के बगैर कुछ भी अच्छा नहीं लगता. बस, तुम चलो मेरे साथ,’ मिश्राइन ताई ने हाथ जोड़ लिए थे.

‘नहीं, मैं अब वहां कभी नहीं जाऊंगी, अपने बेटे को ले जाइए.’

‘तुम्हारे बगैर मैं वहां क्या करूंगा?’ हरिअंश ने मुंह बनाते हुए कहा.

मिश्राइन ताई खाली हाथ लौट आईं.

कुछ दिन यों ही बीते. अब वे उदास रहने लगी थीं. उन्हें यह लगने लगा कि कमी उन्हीं में है. पहले पति ने घर छोड़ा, अब बेटे ने. आखिरकार उन्होंने अपनेआप फैसला ले लिया.

‘हैलो, हरि बेटा.’

‘क्या है मां, जल्दी बोलो.’

‘शाम को घर आ कर पड़ोस की शालिनी आंटी से फ्लैट की चाबी ले लेना,’ मिश्राइन ताई ने रुंधे गले से कहा.

‘फ्लैट की चाबी, लेकिन क्यों, तुम कहां जा रही हो?’

फोन कटने की आवाज आई.

‘हैलोहैलो मां,’ फोन डिस्कनैक्ट हो चुका था.

मिश्राइन आंटी सोसाइटी छोड़ कर चली गईं. कुछ दिनों तक यहांवहां ढूंढ़ना लगा रहा. अंत में सभी थकहार कर शांत बैठ गए लेकिन राजश्री चुप न बैठ सकी. उस ने अपने पति राकेश और दोस्त सोहम की मदद से आसपास के सभी वृद्धाश्रम, अनाथालय में दाखिल होने वाले नए नामों का आंकड़ा निकलवाया और जैसे ही सुराग मिला, उन के पास पहुंच गई.

मिश्राइन ताई ने वहां भी अपना साम्राज्य बना लिया था. बस, फर्क इतना था कि वहां का वादविवाद थोड़ा अलग था.

‘‘जज साहिबा, मैं जब से घर में आया हूं, वहीं बैठता था,’’ एक निश्चित जगह की ओर इशारा करते हुए एक वृद्ध ने कहा, ‘‘लेकिन जब से यह खांसू बूढ़ा दिनेश आया है, यह मुझे बैठने नहीं देता.’’

‘‘क्यों दिनेश भाई, ऐसा क्यों?’’ मिश्राइन ताई, जिन्होंने काली साड़ी काले कोट की तरह लपेट रखी थी, कड़क कर बोलीं.

‘‘जज साहिबा, ऐसा है कि पूरब की दिशा में मेरी महबूबा का घर है. पत्नी तो मर चुकी है, महबूबा जिंदा है. सो, मुझे लगता है, मैं उसी को देख रहा हूं.’’

सभी बूढ़ेबुजुर्ग एकसाथ हंस पड़े.

मिश्राइन ताई ने फैसला सुनाया-

‘‘ठीक है, हर 10 मिनट पर दोनों जगह बदलोगे. इस से कसरत भी होगी और झागड़ा खत्म भी होगा. बोलो, मंजूर?’’ जज साहिबा ने टेबल पीटते हुए कहा.

‘‘मंजूरमंजूर’’ दोनों ने एकसाथ कहा.

सभी वृद्ध तालियां बजाने लगे.

‘‘ताई आप से मिलने कोई आया है,’’ तभी एक कर्मचारी ने सूचना दी.

‘‘मुझे किसी से नहीं मिलना,’’ ताई ने बड़े रूखे स्वर में कहा.

‘‘अपनी बेटी से भी नहीं,’’ यह राजश्री की आवाज थी, पीछे उस का पति राकेश खड़ा था. दोनों की आंखें नम थीं. ताई की आंखें भी भर आईं.

ताई ने आगे बढ़ कर दोनों को गले लगा लिया, ‘‘वादा करो, मेरे यहां होने की खबर किसी को नहीं बताओगी.’’

‘‘ताई, आप यहां क्यों आ गईं?’’ राजश्री ने पूछा.

‘‘बेटा, जिंदगी में खुश रहना ज्यादा जरूरी है. वहां रहती तो मैं बेशक अपने घर में रहती लेकिन उदास रहती. उस से अच्छा तो मुझे यहां रहने में लगता है. कम से कम अपनी मरजी से सांस तो ले पा रही हूं,’’ मिश्राइन ताई फफक कर रोने लगीं.

‘‘बस ताई, बस, ठीक है, हम नहीं बताएंगे. आप अगर यहां खुश हैं तो यही सही लेकिन हम जब भी मिलने आएंगे तब आप हमें रोकेंगी नहीं,’’ राजश्री ने ताई से गले लगते हुए कहा.

उस दिन के बाद राजश्री और राकेश हर महीने मिलने आते रहे. राजश्री से ही पता लगा कि मिताली को लड़का हुआ है. ताई का जी चाहा कि जा कर पोते को गोद में उठा ले लेकिन अपने जज्बात पर काबू रखा और उस की लंबी आयु की इच्छा करती रहीं. यह सिलसिला 2 सालों तक चलता रहा.

‘‘ताई, पता है, आज मिताली के भाई की शादी है,’’ राजश्री ने बताया.

‘‘अच्छा, अच्छी बात है,’’ ताई ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘अच्छा, हरि से कहना उन के घर कपड़ेमिठाई ले कर जाए, यह रिवाज होता है,’’ ताई ने समधिन होने का कर्तव्य निभाया.

‘‘ताई, आप अभी भी उन की चिंता करती हैं जो सबकुछ जानते हुए भी आप से मिलने तक नहीं आए,’’ राकेश ने सेब काट कर खिलाते हुए कहा.

‘‘वह उन का व्यवहार है,’’ ताई ने आंचल से आंसू पोंछते हुए कहा.

धीरेधीरे सभी ताई से परिचित हो चुके थे. ताई हर नए आने वाले का स्वागत करती थीं. कुछ दिनों तक उन के साथ रहतीं ताकि उन्हें अजनबी सा न लगे. एक दिन किसी वृद्ध पतिपत्नी के आश्रम में आने की खबर ताई को मिली. ताई अपने स्वभाव के अनुसार हर नए आने वाले को यह समझाने के लिए दौड़ कर जाती

थीं कि-

‘‘यही नियति है. बेटेबहू को शांति से रहने दो. अपन यहां पर मस्ती से रहेंगे.’’ हर बार की तरह उस वृद्ध पतिपत्नी को दिलासा देने के लिए ताई आगंतुक वाले कमरे में पहुंची. जहां मिताली के मातापिता बैठे दिखाई दिए. दोनों बड़े ही कमजोर और बूढ़े लग रहे थे. अमूमन ताई किसी आगंतुक को देख कर उदास हो जाती थी लेकिन आज वह उदास नहीं थी. उस के मन से निकला-

‘आओ समधिन, आओ न.’ Hindi Family Story.

Hindi Family Story: जीवनज्योति- ज्योति को आत्महत्या करने से किसने रोका?

Hindi Family Story: सरिता, बीस साल पहले, नवंबर (द्वितीय) 2005 – लेखक: मनोज सिन्हा – गरीबी के बोझ तले दबे पिता रामप्यारे सहाय द्वारा एक दिन डांटे जाने के कारण ज्योति आत्महत्या करने को उद्यत हो गई. तभी ‘जीवन’ की पुकार ने उस के कदम रोक लिए. कौन था यह जीवन?

‘‘इस घर में रुपए के पेड़ नहीं लगा रखे हैं मैं ने कि जब चाहूं नोट तोड़तोड़ कर तुम सब की हर इच्छा पूरी करता रहूं. जूतियों के नीचे दब कर मुनीमगीरी करता हूं उस सेठ की 12 घंटे, तब जा कर एक दिन का अनाज इस परिवार के पेट में डाल पाता हूं और उस पर से रोजरोज की फरमाइशें- आज किताब नहीं है, कल कौपियां खत्म हो गईं, किसी की यूनिफौर्म फट गई तो किसी का स्कूलबैग. तंग आ गया हूं इन सब की पढ़ाईलिखाई से.’’

वर्षों से दरक रही किसी वेदना का बांध अचानक आज ध्वस्त हो गया था. चोट खाए शेर की भांति दहाड़ उठे थे मुंशी रामप्यारे सहाय.

आंखों से चिनगारियां बरसने लगी थीं. मन के अंदर फूट पड़े ज्वालामुखी का खौलता लावा शब्दों के रूप में बाहर आ कर सब को झलसानेजलाने लगा था.

सुमित्रा इस घटना से हतप्रभ थीं. उन्होंने आत्मीयता के शीतल जल से इस धधकती ज्वाला को शांत करने की भरसक कोशिश की थी.

‘‘सब जानते हैं जी, और समझते भी हैं कि किस मुसीबत से आप इस घर का…’’

‘‘खाक समझते हैं. एक साधारण मुनीम की औलाद होने का उन्हें जरा भी एहसास है. नखरे तो ऐसे हैं इन के जैसे इन का बाप मैं नहीं, कोई कलैक्टर या गवर्नर है.’’

‘‘छिछि, अब इन बच्चों के साथसाथ आप मुझे भी गाली दे रहे हैं जी, कहां जाएंगे ये? अब आप से अपनी जरूरतों को नहीं कहेंगे तो क्या दूसरे से कहेंगे?’’

‘‘तो क्या करूं मैं? चोरी करूं, डाका डालूं या आत्महत्या कर लूं इन की जरूरतों की खातिर? यह सब तुम्हारी शह का नतीजा है. बच्चे अच्छे स्कूलकालेज में पढ़ेंगे, बड़े आदमी बनेंगे, सिर ऊंचा कर के जिएंगे? कुछ नहीं करेंगे ये तीनों. बस, मुझे बेमौत मारेंगे.’’

एक पल को पसर आए सन्नाटे के बाद दूसरे ही पल यह बवंडर ज्योति की ओर बढ़ चला था, ‘‘और तू, किस ने कहा था तुझ से हर महीने फौर्म भरने, परीक्षा देने के नाम पर पैसे उड़ाने को? कभी रिटेन, कभी पीटी तो कभी इंटरव्यू, हर महीने मेमसाहब की सवारी तैयार, कभी दिल्ली, कभी पटना, कभी कोलकाता.’’

तिरस्कार का यह अपदंश बिलकुल नया था ज्योति के लिए. बाबूजी का यह विकराल रूप उसे पहले कभी देखने को नहीं मिला था. बड़ीबड़ी आंखों में पानी की एक परत उमड़ आई थी जिसे पलकों पर ही संभाल लिया था ज्योति ने.

भावनाओं की यह उमड़घुमड़ सुमित्रा की नजरों से छिप न सकी थी. कचोट उठा था मां का दिल, ‘‘देखिए, जो कहना है आप मुझ से कहिए. ज्योति अब बच्ची नहीं रही. बड़ी हो गई है. एक जवान बेटी को भला इस तरह दुत्कारना क्या ठीक है.’’

‘‘हांहां, जवान हो गई है तभी तो कह रहा हूं कि क्यों बोझ बन कर जिंदा है मेरी जिंदगी में. किसी नदी, तालाब में जा कर डूब क्यों नहीं मरती. कम से कम एक दायित्व से तो मुझे मुक्ति मिलती.’’

सर्वस्व झनझना उठा था ज्योति का. आहत भावनाएं इस से पहले कि रुदन बन कर बाहर आतीं, दुपट्टे से भींच कर दबा दिया था उस ने अपने मुंह को.

स्वयं को रोकतेथामते सुमित्रा भी बिफर उठी थीं, ‘‘कुछ होश भी है आप को?’’

‘‘होश है, तभी तो बोल रहा हूं कि आज अगर इस की जगह घर में बेटा होता तो कमा कर लाता. परिवार का सहारा होता. मगर यह लड़की तो अभिशाप है, एक अभिशाप.’’

‘‘हद करते हैं आप भी, अगर यह लड़की है तो क्या यह इस का दोष है.’’

‘‘हां, यह लड़की है. यही दोष है इस का. मुझ गरीब की कुटिया में सांसें ले कर इतनी जल्दी जवान हो गई, यह दोष है इस का और इस घर में तीनतीन लड़कियां ही पैदा कीं तुम ने. यह दोष है तुम्हारा,’’ कहतेकहते मुंशीजी का स्वर रुंधने लगा था.

‘‘आज पता नहीं क्या हो गया है आप को. आप जैसा धैर्यवान और समझदार इंसान भी ऐसी घटिया बात सोच सकता है, इस मानसिकता के साथ बोल सकता है, मैं ने तो कभी कल्पना तक न की थी.’’

‘‘तो मैं ने कब कल्पना की थी कि सीमित आय की जरूरतें इतनी असीमित हो जाएंगी. तुम्हीं बताओ कि खानेदाने के लिए अपनी पगार खर्च करूं या पेट पर पत्थर बांध कर इस के ब्याह के लिए रोकड़े जमा करूं. उस पर से इस लड़की के यह चोंचले कि बड़ी औफिसर ही बनना है. कंगले की ड्योढ़ी पर बैठ कर आसमान झकाने चली है. जब तक जिंदा रहेगी, इस बाप की छाती पर बैठ कर मूंग ही तो दलेगी.’’ और इसी के साथ फफक पड़े थे स्वयं मुंशीजी भी.

मुंशीजी की यह हुंकार आर्तनाद बन इस कमरे में पसर गई थी और वहां खड़ा हर व्यक्ति सन्नाटे की चादर को ओढ़ कर खुद को इस हादसे का कारण मान बैठा था.

ज्योति इस बार दिल्ली से सिविल सर्विसेज का साक्षात्कार दे आई थी. संतुष्ट तो थी ही इस परीक्षा से, मगर उस के भरोसे ही बैठ जाना, संघर्षों की इतिश्री करना न तो बुद्धिमानी थी न ही उस की मानसिकता. बैंक प्रोबेशनरी औफिसर का फौर्म भरना था, कल 150 रुपए का ड्राफ्ट बनवाना है उसे, बस, इतना ही तो मां से बाबूजी को कहलवाया था कि वे हत्थे से उखड़ गए थे. क्याक्या नहीं कह डाला उन्होंने.

नीतू और पिंकी ने भी बाबूजी का ऐसा रौद्र रूप पहले कभी नहीं देखा था. दोनों अब तक भीतर ही भीतर कांप रही थीं.

इस हादसे ने ज्योति की हर आकांक्षा, हर उम्मीद का गला घोंट दिया था. सकते का आवरण ढीला पड़ते ही मनोबल और धैर्य भी साथ छोड़ गए थे. अचानक टीसने लगा उस का अंतर्मन. सुबकती, सिसकती ज्योति एक चीत्कार के साथ रो पड़ी थी और इन असह्य परिस्थितियों का बोझ उठाए सरपट वह अपने कमरे की ओर भागी थी.

‘‘चैन मिल गया आप को. दूर हो गया सारा पागलपन, क्याक्या नहीं कह डाला आप ने ज्योति को?

‘‘एक छोटी सी बात पर इतना बड़ा कुहराम. जवान बेटी है, इतना भी नहीं सोचा आप ने. यदि उस ने कुछ ऊंचनीच कर लिया तो कहीं मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहेंगे हम,’’ सुमित्रा के रुंधते गले ने शब्दों का दामन छोड़ दिया था. टपकते आंसुओं को पोंछती हुई वे भी कमरे से निकल गई थीं. नीतू और पिंकी भी मां के पीछेपीछे चल पड़ी थीं.

इस कमरे में अकेले मुंशीजी ठगे से रह गए थे. एक ऐसा दावानल जिस की तपिश में झलस कर सभी अपने उन से दूर हो गए थे. आंखें अब भी नम थीं, मुंशीजी खुदबखुद ही बुदबुदा उठे थे, ‘ताना मारेगी, दुनिया मुझ पर थूकेगी. एक मैं ही तो बचा हूं सारी दुनिया में अकेला. सब का दोषी है यह मुंशी रामप्यारे सहाय. ढाई हजार पगार पाने वाला, तीनतीन लड़कियों का गरीब, लाचार बाप.’

उधर कमरे में कुहनियों के बीच मुंह छिपा कर ज्योति रोती ही जा रही थी. मां का स्नेहिल स्पर्श भी आज उसे ममताविहीन लग रहा था. उसे लग रहा था जैसे वह सचमुच एक लाश है, एक चेतनाशून्य देह. कोई बाहरी स्पर्श, कोई अनुभूति, कोई संवेदना, कोई सांत्वना उसे अर्थहीन लग रही थी. बस, कलेजे में रहरह कर एक हूक सी उठती थी और अविरल अश्रुधार निकल पड़ती थी.

सुमित्रा ने खूब सहलायासमझया था उसे. वस्तुस्थिति के इस पीड़ादायक धरातल पर बाबूजी की मनोदशा विश्लेषित करती हुई सुमित्रा ने यह जताने की कोशिश की थी कि किसी भी व्यक्ति के लिए इस तरह अचानक बरस पड़ना कोई असामान्य बात नहीं थी. नीतू और पिंकी ने भी दीदी को बहलाने, गुदगुदाने, रिझने की बहुत कोशिश की थी, मगर सब व्यर्थ.

जिज्ञासावश नीतू ने मां से एक संजीदा सा सवाल पूछ ही लिया, ‘‘मां, लड़की होना क्या सच में सामाजिक अभिशाप है?’’

‘‘नहीं, बेटी, इस संसार में लड़की हो कर पैदा होना बड़ी खुशी की बात है. हां, ‘औरत’ जात नहीं नीतू, ‘गरीबी’ अभिशाप है, गरीबी?’’ यह वाक्य सुमित्रा का सिर्फ उत्तर ही नहीं, बल्कि भोगा हुआ यथार्थ था.

शरद की सर्द रात. घर में एक अजीब सी खामोशी थी. नीतू और पिंकी तो गहरी नींद में थीं मगर ज्योति, सुमित्रा और मुंशीजी की बंद आंखों में शाम की घटना का असर अब तक भरा था. मुंशीजी बारबार करवट बदल रहे थे. सुमित्रा ने जानबूझ कर उन्हें छेड़ना उचित नहीं समझ था.

कहने को तो मुंशीजी सबकुछ कह गए थे मगर अब अवसादों ने उन्हें धिक्कारना शुरू कर दिया था. उन के मुंह से निकला एकएक शब्द उन्हें नागफनी के बड़ेबड़े झड़ में तबदील हो कर उन की आत्मा तक को छलनी कर रहा था.

मुंशीजी की आंखों के सामने ज्योति का रोताबिलखता चेहरा जितनी बार घूम जाता उतनी बार वे कलप उठते थे.

ज्योति तो उन के दिल का टुकड़ा थी, उसे मर जाने तक को कह दिया उन्होंने. कैसे निकली यह बात उन की जबान से. खुद को धिक्कारते हुए बिस्तर से उतर कर विक्षिप्तों की तरह टहलने लगे थे मुंशीजी. बारबार एक ही यक्षप्रश्न, आखिर कैसे हुआ यह हादसा?

आत्मग्लानि की आग से पसीज उठा था उन का सर्वस्व. यह सोच कर अपने कमरे से निकल गए थे कि ज्योति बिटिया को सारा अंतर्द्वंद्व, सारी व्यथा सुना कर पश्चात्ताप कर लेंगे.

इस बार मुंशीजी की व्यथा सुमित्रा नहीं सह सकी. लौट कर बिस्तर पर उन के लेटते ही धीरे से उन के सीने पर हाथ रखा था सुमित्रा ने. करवट बदल कर मुंशीजी ने भी देखा था. सुमित्रा की बंद पलकों से सहानुभूति की बूंदें अब भी लुढ़क रही थीं.

उधर, आंख लगी ही थी कि अचानक चिहुंक कर जाग गई ज्योति.

बाबूजी का क्रोध व आवेश में फुंफकारता चेहरा अवचेतन से निकल कर बारबार उसे डरा रहा था. प्रतिध्वनित हो रही थी वही सारी दिल दरकाती बातें जो उस के अंतस से बहुत दूर जा कर धंस गई थीं. इस पीड़ा से मुक्ति पाने के लिए ज्योति कई प्रयास कर चुकी थी पर सब बेकार.

अचानक ही उस का चेहरा सख्त हो गया. आंखों में बेगानेपन का एक ऐसा मरुस्थल उतर आया था जहां मोहमाया, वेदनासंवेदना, मानअपमान के न तो झड़झंखाड़ थे और न ही आंसूअवसाद का कोई अस्तित्व. एक निर्णय ने उस के भय के सारे अंतर्द्वंद्वों को धो डाला था. दरवाजे का सांकल खोल, अमावस की इस काली निशा में वह गुम हो गई थी.

वह अपने घर से जितनी दूर होती जा रही थी, बाबूजी का स्वर अनुगूंज अंतस में और अधिक शोर मचाने लगा था. वह जल्द से जल्द उस पुल पर पहुंच जाना चाहती थी जहां नदी का अथाह पानी उसे इन तमाम पीड़ाओं से मुक्ति दिला कर अपनी आगोश में बहा ले जाता. दूर, बहुत दूर.

इस धुन में उस की तेज चाल और तेज होती जा रही थी. बाहर गूंजते बाबूजी के शब्द ‘मरती क्यों नहीं, नदीतालाब में डूब क्यों नहीं जाती, बोझ है, अभिशाप है.’ और अंदर जान दे देने की, खुद को मिटा देने की एक खीझभरी जिद.

अचानक ज्योति को लगा कि बाबूजी की आवाज के साथसाथ कहीं से कोई दूसरा स्वर भी घुलमिल कर आ रहा है. उस ने थोड़ा थम कर उस आवाज को गौर से सुननेसमझने की चेष्टा की थी. हां, कोई तो था जो दबे स्वर में उसे बारबार पुकार रहा था, ‘ज्योति, ज्योति, ज्योति…’

एक पल को ठिठक गईर् ज्योति. पलट कर उस ने चारों ओर देखा तो कोई नहीं था दूरदूर तक. तो फिर कौन है इस निर्जन वन में जो उसे आवाज दे रहा था.

‘‘आत्महत्या करने जा रही हो, ज्योति,’’ करीब आता स्वर सुनाई दिया ज्योति को.

ज्योति ने खीझ कर पूछा था, ‘‘देखो, तुम जो भी हो, सामने आ कर बात करो. मुझे डराने की कोशिश मत करो. आखिर कौन हो तुम.’’ ज्योति ने अपना मन कड़ा किया था.

‘‘मौत के जिस रास्ते पर तुम जा रही हो उसी रास्ते में मैं तुम्हारे सामने हूं, ज्योति.’’

कानों पर तो यकीन हो रहा था मगर कहीं आंखें तो धोखा नहीं दे रही हैं उसे. पलकों को कस कर भींचा और झपकाया था ज्योति ने. विस्फारित नेत्रों से इस अंधेरे की खाक छान रही थी वह. कुछ भी तो नहीं था आसपास.

‘‘सामने खड़े हो तो दिखाई क्यों नहीं देते?’’

‘‘इसलिए कि तुम मुझे देखना नहीं चाहतीं. देखो, मैं ठीक तुम्हारे सामने आ कर खड़ा हो गया हूं, देख रही हो मुझे?’’

‘‘नहीं. मगर तुम चाहते क्या हो, कौन हो तुम?’’ गहराते रहस्य ने ज्योति की व्यग्रता को और उत्प्रेरित किया था.

‘‘मुझे अनदेखा कर रही हो, तुम. जरा दिल की गहराइयों में मन की आंखों से देखो, ज्योति, मैं जीवन हूं.’’

‘‘जीवन, कौन जीवन? मैं किसी जीवन को नहीं जानती.’’

‘‘तुम जैसी समझदार लड़की के मुंह से इस तरह की बातें अच्छी नहीं लगतीं. मुझे पहचानो, मैं जीवन हूं, तुम्हारा जीवन.’’

‘‘बकवास बंद करो और हट जाओ मेरे रास्ते से.’’

अदृश्य तत्त्व का स्वर फिर ज्योति के कानों से टकराया था, ‘‘ठीक है, तुम्हारे रास्ते से हट जाऊंगा मगर मुझे बता दो कि क्या तुम सचमुच आत्महत्या करने जा रही हो या…’’

‘‘जी हां, मैं सच में आत्महत्या ही करने जा रही हूं. पुल से नदी में कूद कर जान दे दूंगी. और कुछ?’’

एक क्षण की खामोशी और फिर, ‘‘अरे हां, सुनो ज्योति, जब तक तुम मर नहीं जातीं, तब तक क्या मैं तुम्हारे साथ चल सकता हूं? इस बीच बातें करते हुए तुम्हारा यह अंतिम सफर भी अच्छे से कट जाएगा. तो, चलूं तुम्हारे साथ?’’

‘‘तुम आओ या जाओ, मेरी बला से,’’ एकदम से भन्ना कर बोली ज्योति.

और एक झटके के साथ आगे बढ़ी तो अनजान रास्ता और उस पर से किसी अदृश्य रहस्य की उपस्थिति का आभास. इसी घबराहट में वह किसी कटे पड़े ठूंठ से जा टकराई और दर्द से बिलबिला उठी थी.

फिर वही आवाज, ‘‘चोट लग गई न. बिना सोचेसमझे तुम कितने दुर्गम रास्ते पर निकल पड़ी हो, ज्योति.’’

‘मर नहीं जाऊंगी इन छोटीमोटी ठोकरों से,’ कोध के मनोवेग से चीखती हुई बड़बड़ाने लगी थी, ‘बहुत चोटें

सही हैं मैं ने अपने कलेजे पर. मर तो नहीं गई मैं. हां, मरूंगी. आत्महत्या करूंगी. मुझे चोट लगे, तुम्हें इस से क्या मतलब?’

‘‘नहीं, कोई मतलब नहीं. मगर मैं नहीं चाहता कि मरने से पहले तुम्हारे शरीर पर  कोईर् चोट लगे क्योंकि तुम्हारे चोट से मैं भी आहत होता हूं. जानती हो ज्योति, आत्महत्या में ऐसा भी होता है कि कई बार आदमी मर नहीं पाता. टूटफूट कर एक लंगड़ेलूले, अपंगता की जिंदगी जीता है. तब वह दोबारा आत्महत्या का प्रयास भी नहीं करता क्योंकि एक बार के प्रयास का कठोर एहसास जो उसे होता है.’’

खामोश रहना ही उचित समझ था उस ने. कदम और तेज हो गए थे उस के संकल्पित लक्ष्य की ओर. तभी जीवन ने फिर पूछा, ‘‘तुम आत्महत्या क्यों करना चाहती हो?’’

इस तरह चुप रह कर आखिर कब तक वह इस आफत को टालती. गरज उठी थी, ‘‘क्या बताऊं मैं, क्या दुखड़ा रोऊं मैं, तुम जैसे अनजान, अदृश्य गैर के सामने? यह बताऊं कि एक गरीब मुनीम के घर हम 3 बेटियां अभिशाप हैं, एक बोझ हैं हम. सब से बड़ी बोझ मैं, ज्योति सहाय, एमए फर्स्ट, क्लास फर्स्ट. मगर नौकरी के लिए मुहताज.’’

‘‘मगर बेरोजगारी की समस्या तो सिर्फ तुम्हारे अकेले की समस्या नहीं है. यह तो एक आम सामाजिक बीमारी है जिस से हरकोई जूझ रहा है.’’

‘‘हां, बेरोजगारी मेरे अकेले की समस्या नहीं. मगर मैं एक समस्या हूं, गरीब बाप के सिर पर पड़ी एक बोझ, क्या तुम नहीं जानते कि समाज में मध्यवर्गीय लड़कियों के लिए कई वर्जनाएं हैं. बातबात में मातापिता की पगडि़यां उछलती हैं. हर वक्त खानदान की इज्जत और भविष्य के सामने बदनामी, लोकलज्जा, मुंह चिढ़ाता समाज नजर आता है और वैसे भी लोग एक मजबूर, जरूरतमंद, गरीब और जवान लड़की को सिर्फ दिखते ही नहीं, बल्कि निर्वस्त्र कर के महसूस भी करते रहते हैं लेकिन तुम हो कौन, जो परतदरपरत मुझ से सबकुछ जान लेना चाहते हो?’’

‘‘मैं ने कहा न, मैं जीवन हूं, तुम्हारा जीवन. बिलकुल सत्य और संघर्षों से भरा हूं. कोई मुझे प्यार का गीत समझ कर गुनगुनाता है तो कोई पहेली, कोई जंग समझता है. मैं तो एक सच हूं, ज्योति, मगर इतना कमजोर कि स्वयं अपनी रक्षा नहीं कर सकता. मौत के क्रूर पंजे एक झटके में मुझे शरीर से अलग कर देते हैं, मेरी भौतिकता ही खत्म कर देते हैं और जबजब अपने अस्तित्व पर मुझे खतरा महसूस होता है, लोगों के सामने आता हूं, बातें करता हूं, खुद को तसल्ली देता हूं, आज भी तो इसीलिए आया हूं तुम्हारे पास, मेरी रक्षा करोगी न.’’

विचारों की इस उमड़घुमड़ में ज्योति इतना गुम हो गई कि जंगल कब खत्म हो गया, पता तक नहीं चला. सड़क पर और तेज कदमों से उस पुल की दिशा में बढ़ गई थी वह जो अब ज्यादा दूर नहीं था. अचानक एक झटका सा लगा ज्योति को कि इतनी देर से जीवन ने कुछ कहा नहीं, कहां गया वह? इतना चुप तो रहने वाला नहीं था वह. कहीं चला तो नहीं गया अचानक. सुनसान रात में जिस भय की उपस्थिति से भी नहीं घबराई थी ज्योति, अचानक उस के न होने की कल्पना मात्र से कांप गई थी वह. एक हांक लगाई थी ज्योति ने, ‘‘ज…ज… जीवन? मिस्टर जीवन, चले गए क्या?’’

‘‘गलत सोच रही हो, ज्योति. मैं तो तुम्हारा जीवन हूं और तुम्हारी खातिर मौत से भी लड़ने को तैयार हूं. मगर तुम मेरा साथ दो तो मैं तो तुम्हें तभी छोड़ूंगा जब मुझे यह विश्वास हो जाएगा कि मौत की गोद में तुम गहरी नींद सो

गई हो.’’

‘‘अच्छा, फिर तुम गायब कहां हो गए थे?’’

‘‘गायब तो नहीं, हां चुप जरूर हो गया था. क्यों मेरा चुप हो जाना तुम्हें अच्छा नहीं लगा?’’ अब क्या जवाब दे ज्योति इस प्रश्न का. एकदम से कोई बहाना नहीं सूझ रहा था उसे.

‘‘ऐ ज्योति, सच क्यों नहीं कहतीं कि तुम्हें मुझ से यानी अपने इस जीवन से प्रेम हो गया है.’’

अचानक ठठा कर हंस पड़ी ज्योति. कुछ ऐसा कि एक क्षण तक कुछ बोल नहीं पाई. किसी तरह खिलखिलाते हुए एकएक शब्द जोड़तोड़ कर बोल पड़ी वह, ‘‘तुम्हारा मतलब प्यार,’’ और इसी के साथ हंसती हुई वह दोहरी होती जा रही थी.

‘‘हंसो ज्योति, इतना हंसो कि अवसाद का अधेरा छंट जाए, निराशाभरी इस दिशा का अंत हो जाए. आशा की एक नई सुबह आए, उम्मीदों की किरणें फूटें, उमंग और उत्साह के पक्षी चहचहाने लगें.’’

हांफती हुई ज्योति ने स्वयं को कुछ नियंत्रित किया और आंखों की नमी को पोंछती हुई कह उठी थी, ‘‘पता नहीं मैं इतना क्यों हंसने लगी?’’

‘‘इसलिए कि तुम्हारा जीवन बहुत प्यारा है. वह तुम्हें हंसाना चाहता है. जिंदा देखना चाहता है क्योंकि जीवन ही हंसी है, खुशी है, आशा है, प्रेम है और मौत निराशा है, खामोशी है.’’

ज्योति ने गंभीरता ओढ़ ली थी लेकिन जीवन गंभीर नहीं था. उस ने एक के बाद एक कई सवाल कर डाले.

‘‘अच्छा ज्योति, यह तो बता दो कि तुम ने अपने घर वालों के नाम कोई संदेश, कोई चिट्ठी छोड़ी है या नहीं? तुम्हारे इस तरह चले जाने से क्या बीतेगी तुम्हारे मांबाप पर, बहनें क्या सोचेंगी, इस बारे में भी तुम ने कुछ सोचा है? वह बेचारा मुनीम, क्या तुम्हारी मौत और समाज की उठती उंगलियों को एकसाथ झेल पाएगा?’

सच के एकएक बड़े पत्थर बारबार जीवन व्यावहारिकता के उस तालाब में फेंक रहा था जिस की ऊपरी परत पर बर्फ का एक बड़ा आवरण पसर गया था. ऐसा भी नहीं था कि बर्फ के नीचे का पानी हिलोरें नहीं ले रहा था, क्षोभ की तरंगें उठ रही थीं ज्योति के अंतस में भी पर सोच लिया था उस ने अब किसी बात की कोई सफाईर् नहीं देगी वह.

‘‘वाह, ज्योति वाह, जिंदगीभर तुम्हारी खुशी के लिए जीतेमरते तुम्हारे बाप ने अपने दिल का बोझ कम करने के लिए दो कड़वे बोल बोल दिए जो तुम्हें इतने चुभ गए कि अब आत्महत्या कर के यह जताना चाहती हो कि बेटी के बाप को हर वक्त पश्चात्ताप की आग में ही जलते रहना चाहिए. अरे, वह तो एडि़यां घिसघिस कर तुम तीनों बहनों की शादी करने और गृहस्थी बसा देने के बाद ही मरेगा मगर तुम अभी से ही उसे जीतेजी क्यों मारना चाहती हो.

‘‘सोच लो ज्योति, तुम्हारी मौत की खबर पा कर जमाने के ताने सुन कर तो तुम्हारे पिताजी किसी सेठ की ड्योढ़ी पर मुनीमगीरी के लायक भी नहीं रहेंगे. फिर क्या तुम्हारा बाप, मुंशी रामप्यारे सहाय, किसी मंदिर या रेलवे स्टेशन की सीढि़यों पर बैठ कर भीख मांगेगा?

क्या तुम्हारी मां, सुमित्रा इस बुढ़ापे में पेट के लिए घरघर जा कर झड़ूबरतन, चूल्हेचौके का काम करेंगी? नीतू और पिंकी अपनी तमन्नाओं का गला घोंट कर किसी नाचनेगाने वाली गली के कोठे की जीनत बनेंगी.’’

ऐसे सख्त पत्थरों की वार से दरक गया था ज्योति का मन. बर्फ का आवरण था, कोई लोहे की चादर नहीं. बिलबिला कर बाहर आ गया था भीतर का सारा गुबार, झल्ला कर चीख पड़ी थी ज्योति अपना फैसला सुनाते हुए, ‘‘तो जहन्नुम में जाएं? कोई जिए या मरे मुझे क्या? मैं सिर्फ इतना जानती हूं कि लड़की होना अभिशाप है और मैं अपनी जीवनलीला समाप्त कर खुद को इस अभिशाप से मुक्त करना चाहती हूं, सुन रहे हो तुम? मैं खुद को मार देना चाहती हूं.’’

और इसी झल्लाहट में पुल के आखिरी किनारे पर अपना कदम बढ़ा गई थी ज्योति.

जीवन भी चुप नहीं था. जताना चाहता था कि सचमुच जिंदगी की आखिरी सांस तक वह उस के साथ है. उस की आवाज अब भी गूंज रही थी, ‘‘ज्योति, जीवन एक जंग है. इस से भागने वाले कायर कहलाते है. जिन में विश्वास, उत्साह, साहस और लगन होती है वह मौत को धता बता कर जीवन को गले लगाते हैं. वैसे, तुम आत्महत्या कर रही हो तो करो, मगर मुझे यकीन है कि अनिश्चितताओं और हताशा के अंधेरे में भी राह दिखाने के लिए एक ज्योति जरूर जगमगाती रहेगी. याद रखना इस रात की भी एक सुबह जरूर होगी, इस निशा का अंत होगा, ज्योति.’’

हर रात की सुबह होती है. उस रात की भी सुबह हुई और सूर्य भी कब सिर पर चढ़ आया. पता नहीं चला. मुंशीजी के घर में व्याप्त खामोशी को किसी ने झंझड़ा था, सांकल पीटपीट कर खटखट खट्टाक.

आंखों पर चश्मा चढ़ाते मुंशीजी ने थके कदमों से चल कर दरवाजा खोला था. पोस्टमैन लिफाफा थामे बड़बड़ाया, ‘‘रजिस्ट्री डाक है, लीजिए और यहां दस्तखत कर दीजिए.’’

लिफाफे में से कागज निकाल कर पढ़ते ही मुंशी रामप्यारे सहाय की आंखें आश्चर्य से फैलती चली गईं. सहसा विश्वास नहीं हो पा रहा था मुंशीजी को, उस आशय पर जो इस पत्र में लिखा था. झरझरी ले कर स्वयं को सामान्य किया तो आंखें बरस पड़ीं. रुंधे गले से भावातिरेक में उन्होंने पुकारा, ‘‘अजी सुनती हो, सुमित्रा, नीतू, पिंकी. जानता था मैं कि ज्योति एक न एक दिन जरूर कुछ न कुछ ऐसा करेगी. अरे, सुनती हो, सुमित्रा.’’

बाबूजी का इस तरह सुबहसुबह चिल्लाना सब को एक घबराहट दे गया था. बदहवासी के कुछ ऐसे ही आलम में सभी दौड़तेकूदते बाबूजी के पास आ गए थे. सुमित्रा, नीतू, पिंकी सब की आंखों में एक सवालिया निशान और मन में बेचैनी कि आखिर हुआ क्या?

बाबूजी, बच्चों की भांति बिलखते हुए बोले, ‘‘कितना गलत कहा था मैं ने सुमित्रा, काश, इतनी कड़वी बातें उसे कल न कहता तो इतनी आत्मग्लानि, इतना पछतावा तो मुझे न होता, ज्योति, ज्योति, कहां हो ज्योति?’’

‘‘जी, मैं यहां हूं, बाबूजी,’’ कमरे के अंदर, दरवाजे की ओट से लगी, ज्योति सामने आ कर खड़ी हो गई थी. बाबूजी के बचेखुचे शब्द ज्योति के करीब आते ही तरलता में परिवर्तित हो कर मुंह के अंदर ही उमड़ने लगे थे. क्या कहें, कैसे कहें, बाबूजी की इस भावविह्वलता को देख कर ज्योति की आंखें अपनेआप छलक आई थीं.

‘‘मैं ने सब सुन लिया है, बाबूजी. आप मन में ग्लानि क्यों लाते हैं. आप की जगह कोई भी होता तो वही कहता जो आप ने कहा था. दरअसल, गलती हमें समझने में हुई, बाबूजी.’’

खुशी से चहक उठे थे मुंशीजी, ‘‘अरे, गोली मार अगली गलती को. सुमित्रा, तीनतीन बेटियों का बाप, यह मुनीम रामप्यारे सहाय ग्लानि क्या करेगा? सीना ठोक कर चलेगा जमाने के सामने, सीना ठोक कर.’’

पत्र दिखाते हुए ज्योति के ठीक सामने तन कर खड़े हो गए थे बाबूजी, ‘‘यह देख, तेरा नियुक्तिपत्र. पढ़ न? पुलिस की सब से बड़ी औफिसर की नौकरी मिल गई है तुझे, ज्योति सहाय, आईपीएस, जयहिंद, मैडम.’’

जमीन पर पांव धमका कर एक जोरदार सैल्यूट दिया था मुंशीजी ने अपनी ज्योति बिटिया को.

पुलक उठी थी सुमित्रा, नीतू और पिंकी भी. सचमुच कंगले की ड्योढ़ी पर आसमान भी झक गया था आज. और इस आसमान को झका लाई थी एक बेटी, ज्योति.

कुछ खुशियां ऐसी भी होती हैं जिन्हें सब के साथ बांटा तो जा सकता है मगर उन्हें महसूस करने, आत्मसात करने के लिए किसी एकांत की आवश्यकता होती है. एक ऐसा एकांत जहां आंखें मूंद कर गुजरे वक्त के एकएक क्षण का हिसाबकिताब तो होता ही है, आने वाले समय के गर्भ में छिपे कई पहलुओं को सजायासंवारा भी जाता है.

ज्योति भाग कर अपने कमरे में चली गई. कभी हंसतेहंसते रोई तो कभी रोतेरोते हंसती रही. मनोभावों का प्रवाह कम हुआ तो वह आईने के पास आ खड़ी हुई जहां अब ज्योति नहीं, बल्कि आईपीएस ज्योति सहाय का अक्स उभर आया था. भरेपूरे गोरे बदन पर कसी खाकी वरदी, कंधे पर चमचमाता अशोक स्तंभ, सिर पर आईपीएस बैज लगा हैट, चौड़े लाल बैल्ट में लटका रिवौल्वर, लाल बूट और चेहरे पर शालीनता से भरा एक अद्वितीय रोब.

शायद इसी अक्स को देख कर किसी ने बहुत करीब आ कर कहा था उस से, ‘‘बधाई हो, ज्योति.’’

मनप्राण में रचबस गई इस आवाज को अंतस में महसूस किया था ज्योति ने. आंखें बंद कर के वह अपने मन के अंदर झंक आई थी. जहां सचमुच मुसकराता हुआ उस का प्यारा जीवन था और जहां जल रही थी एक जीवनज्योति.

इन्हें आजमाइए:

गलती से सफेद कपड़ा रंगीन कपड़े के साथ धुल गया और उस पर रंग चढ़ गया और ब्लीच नहीं है तो हाइड्रोजन पेरौक्साइड वाले पानी में सफेद कपड़ा डुबो कर आधाएक घंटा रख दें. रंग निकल जाएगा.

अपनी अलमारी, डैस्क, ड्रौर को साफ और फुजूल की चीजों से भरने से बचने के लिए हर हफ्ते उसे साफ और सैट करें.

अपनी क्रिएटिविटी बढ़ाने और पर्सनल ग्रोथ के लिए खुद को बुक रीडिंग चैलेंज दें. महीने में 1-2 नई किताब पढ़ें.

पढ़ाई और काम में फोकस बढ़ाने के लिए डैडलाइन को गेम मान कर, समय को चुनौती मान कर काम तेज करें.

नोट्स को रंगीन बनाएं. हाईलाइट्स और कलर कोड से याद्दाश्त तेज होती है.

लंबे समय तक बैठने से बौडी स्टिफ हो जाती है इसलिए हर घंटे के बाद बौडी को स्ट्रैच करते रहें.

अपने वर्क डैस्क पर छोटेछोटे सुंदर पौधे रखने से मूड फ्रैश और काम में फोकस बढ़ता है.

घर में एक कोना ऐसा बनाइए जहां आप शांति से बैठ और रिलैक्स  हो कर सोच सकें.

अपने अलार्म को प्रेरक या फेवरेट म्यूजिक पर सैट करें. Hindi Family Story.

Hindi Social Story: फोन- पति का कॉपीराइट वाला प्रेम

Hindi Social Story: पति का प्रेम भी बड़ा अनोखा होता है, जब तक पत्नी उस की सेवा करे तब तक संस्कारी. वहीं अगर पत्नी अपने लिए थोड़ा जी तो तोबातोबा. नीरजा को लग रहा था जैसे जीजाजी ने सुमिता जीजी पर अपना कौपीराइट लगा दिया है.

नीरजा जल्दीजल्दी तैयार हो रही थी कालेज के लिए. सुबह का समय तो ऐसे भागता है जैसे मैराथन रेस चल रही हो. इसी बीच फोन की घंटी, नहीं, नहीं ले सकती अभी फोन. मगर देखा तो नया नंबर था, उसे लेना जरूरी था.

‘‘हैलो भाभी,’’ सुमिता जीजी की आवाज थी.

2 दिन से लगातार उन का फोन नो रिप्लाई आ रहा था. चिंता थी मन में, सब ठीक तो है न, जीजाजी बीमार चल रहे हैं और घर में ही हैं साल भर से. ऐसे में फोन का जवाब न मिले तो चिंता होना स्वाभाविक है. काम करतेकरते ही इयरप्लक कान में लगाया और बोली, ‘‘सब ठीक है न, जीजी?’’

‘‘भाभी, कुछ भी ठीक नहीं है,’’ और रोने लगी.

‘‘अरे हुआ क्या जीजी, अच्छा पहले यह बताओ कि सब का स्वास्थ्य तो ठीक है?’’

‘‘हां, वह तो ठीक है. मैं अभी दवा लेने बाहर आई तो आप से बात कर रही हूं. यह बताना जरूरी था आप को कि वहां से कोई मुझे फोन मत करना. जब मौका लगेगा, मैं खुद ही करूंगी. आप यह बात भैया को भी बता देना.’’

नीरजा कुछ पूछती, उस से पहले ही लाइन काट दी उन्होंने. खटका सा हुआ पर आगे की बात अभी नहीं हो सकती थी. इसी नंबर पर मैं वापस फोन कर लेती लेकिन बाहर के शोर में सुमिता जीजी की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी.

शाम को वरुण को बताया तो वे बोले कि 2 दिन पहले मेरे पास जीजू का फोन आया था. शिकायतों का पिटारा खोल दिया था उन्होंने. मैं ने कहा भी कि आप की बीमारी अब कुछ सुधार पर आई है, ऐसे में क्यों तनाव लेते हैं, फिर कभी बात करेंगे लेकिन वे उलटे मुझा पर ही आगबबूला हो गए और बोले, ‘आप और भाभी बड़े हैं, उसे कुछ समझाने की जगह मुझे ही कहने से रोक रहे हैं.’

अब क्या बताएं यार, कोई समझाने जैसी बात तो हो. फालतू में तिल का ताड़ बनाने की पुरानी आदत है उन की. शादी के 40 वर्षों के बाद भी ससुराल वालों से पत्नी की शिकायत करते हैं.

उसे सुधारने की सलाह हम से दिलवाने का यह मामला नया नहीं था. हम देररात तक इस विषय पर बात करते रहे. कल छुट्टी थी.

सुबह बिस्तर छोड़ने का मन नहीं था पर घर के सैकड़ों अधूरे काम निबटाने थे, लिहाजा, नींद का मोह छोड़ उठना जरूरी था. वरुण सुबह की सैर कर के और घर का सामान ले कर आए तब तक मैं खासे  काम निबटा चुकी थी और इस का संतोष था कि अब इत्मीनान से चायनाश्ता किया जा सकता है. वरुण की पसंद के ओट्स के पेनकेक बनाए और चाय कपों में छानी.

सर्दी की गुनगुनी धूप में बरामदे में मैं ने नाश्ता लगाया. अखबार लाने को मुड़ी कि वरुण का फोन घनघना उठा.

मैं ने कहा, ‘‘जरूरी न हो तो अभी जाने दो, पहले नाश्ता कर लेते हैं.’’

फोन जीजू का था, इसलिए लेना ही था. जोरजोर से गरजने की आवाज  रिसीवर फाड़ कर बाहर आने लगी और वरुण की ‘हां हूं हां हूं’ करने की मियाद भी बढ़ती जा रही थी. इधर चायनाश्ता ठंडा हो रहा था और उधर से ऐलान हुआ कि ‘भाभी को दीजिए.’

वरुण ने जान छुड़ाते हुए फोन मुझे पकड़ा दिया.

न दुआ न सलाम, बस शुरू हो गए श्रीमान-

‘‘भाभीजी, अपनी ननद को जरा सा समझातीं क्यों नहीं?’’

‘‘क्या अपराध हो गया जीजाजी, पहले पता तो चले?’’

‘‘क्यों, आप को वरुण भैया ने नहीं बताया? मैं ने 2 दिन पहले सारी बात बताई थी उन्हें.

मैं ने टालने की गरज से कहा, ‘‘हम  बाद में बात करें, जीजाजी?’’

वे जोर से गरजे, ‘‘बाद में क्यों, अभी क्यों नहीं? आज तो छुट्टी का दिन है.’’ बड़े रोब से वे बोले, जमाई होने का यह फायदा तो लेना ही था.

‘‘ठीक है, कहिए?’’

‘‘देखिए, मैं सालभर से घर में बीमार पड़ा हूं, मेरी देखभाल करने, मेरे पास बैठने की जगह हर वक्त फोन पर लगी रहती है आप की दुलारी ननद. आवाज देदे कर थक जाता हूं पर इस के कान पर जूं तक नहीं रेंगती. कितनी बार फोन हाथ से ले कर अंदर भी रखा. अब देखिए इस ने नया फोन मंगवा लिया, इस की हिम्मत देखिए.’’

उन की आवाज का ताप मेरे कानों से हो कर दिमाग तक पहुंच रहा था. रात को हम दोनों ने इस मसले पर खूब बातें की थीं, सो, मुझे होमवर्क करना नहीं पड़ा.

‘हिम्मत तो देखिए’ सुन कर मेरे धैर्य ने भी जवाब दे दिया.

‘‘जीजाजी, हिम्मत ही तो नहीं है उन में, नहीं तो क्या कुछ नहीं कर लेतीं.’’ वरुण ने आवेश से थरथराते हाथ पर अपना हाथ रख कर संयत रहने का संकेत दिया. मैं मन ही मन बड़बड़ा रही थी कि आप जैसे बददिमाग और काहिल आदमी को ढो रही है बेचारी.

‘‘आप ने कोई कामवाली को रख लिया है क्या घर के कामों के लिए और अपनी देखभाल के लिए नर्स रखी है क्या?’’

‘‘क्या कह रही हैं आप, वह सब तो हमेशा सुमि ही करती है. 2 लोगों का काम ही कितना है?’’

‘‘जीजाजी, सुमिता जीजी भी अब

60 से ऊपर हो गई हैं. आप से 2 वर्ष ही तो छोटी हैं. जिस तरह आप का शरीर सेवाटहल मांगता है उन का भी तो मांगता होगा न.  वे भी थकती  होंगी. रोजमर्रा के पूरे काम निबटा कर वे फोन पर अपने भाईबहनों, संगीसहेलियों से थोड़ाबहुत बोलबतला लेती हैं तो कौन सा अपराध करती हैं जिस के लिए आप ने हम तक गुहार मचाई. वे भी तो हम से कभी कह सकती थीं कि अब मैं थक गई हूं भैयाभाभी, तन से भी और मन से भी.’’

‘‘यह आप कह क्या रही हैं, यह उस ने कहा?’’

‘‘उन की आदत नहीं है अपने दुखडे़ रोने की. हमें क्या दिखता नहीं है. आप की गृहस्थी की गाड़ी  खींचने में जुटी रही हमेशा. आप ने तो गहना, कपड़ा,  घूमनाफिरना तो दूर, कभी उन की हारीबीमारी के लिए भी पैसा खर्च नहीं किया. वे घरेलू उपचारों से ही अपना काम चलाती रहीं जबकि आप का इलाज अच्छे डाक्टर से करवा रही हैं. कभी सोचा कि वह सारा जुगाड़ कहां से करती होंगी. घरखर्च के पैसे से और यह कितना मुश्किल काम है, आप को क्या पता?

‘‘यह तो सभी औरतें करती हैं, करना पड़ता है.’’

‘‘करना पड़ता है, वाह, तो फिर आप पुरुषों के लिए क्यों जरूरी नहीं है उस के एवज में उन्हें बहुत शानोशौकत न सही पर चिंताओं से मुक्त जिंदगी तो जीने दें. नौकरी उन्होंने करनी चाही, उस की इजाजत आप ने दी नहीं यह कह कर कि 2 जनों का खर्च ही कितना होता है, क्या जरूरत है.’’

‘‘तो क्या गलत कहा था मैं ने?’’

‘‘नहीं, गलत आप कैसे हो सकते हैं लेकिन इस की जगह आप को कहना था कि मेरा खर्चा ही कितना है उतना तो मैं कमाता ही हूं. जीजी तो आप के घर के काम करने के एवज में सिर्फ रोटी ही खाती रही हैं. उन के लिए कभी किसी भी चीज का पैसा भी खर्च किया है तो बताइए? अपनी छोटीमोटी त्योहार उत्सव से मिली पूंजी से पहली बार खुद के लिए एक फोन क्या खरीदा कि आप हत्थे से ही उखड़ गए.

‘‘हम  सबकुछ जानते हुए भी, सुमि जीजी के साथ भरपूर हमदर्दी रखते हुए भी, कभी बीच में नहीं पड़े कि आप का पतिपत्नी का मामला है. जीजी के आत्मसम्मान को क्यों आहत करें. करने को थोड़ीबहुत सहायता कर भी सकते थे पर उन्होंने कभी स्वीकारा नहीं क्योंकि वह आप का सम्मान ससुराल में बनाए रखना चाहती हैं लेकिन यह आप के समझा में आने वाली बात है नहीं.’’

‘‘आप क्या कह रही हैं, भाभी? आप से ऐसी उम्मीद नहीं थी कभी. परिवार में सब से समझादार मानी जाती रही हैं पर.’’

‘‘जीजाजी, औरत जब तक मुंह नहीं खोलती वह समझादार ही मानी जाती है और जैसे ही उस ने आप पुरुषों की कारगुजारी बताने के लिए मुंह खोला या थोड़ी मनमानी की नहीं कि आप नाग की भांति फुंफकारने लगते हैं. यहां तो मनमानी भी नहीं है, अपने बचाए पैसे से एक फोन क्या ले लिया, कहर टूट पड़ा. आप के औफिस से आने के बाद आप ही के सामने वे दोचार फोन कर लेती हैं तो वह आप को गवारा नहीं. इस की जगह आप ही कभी सोचते कि घर का काम निबटा कर थोड़ी देर वह भी तो किसी से बात करना चाहती होगी. सो, आप ही उस के लिए एक अदद फोन ला देते. पर नहीं, घड़ी, चूड़ी, साड़ी और बिंदी भी जो व्यक्ति कभी लाया नहीं, वह पत्नी को फोन क्या ला कर देगा.

‘‘अब आप को डर होगा कि वह आप से बात करने, आप की जरूरतों को पूरा करने के लिए एक टांग पर खड़ी नहीं रहेंगी तो क्या होगा. आप का किंगसाइज  का मैन ईगो कैसे संतुष्ट होगा कि देखो, एक हाड़मांस का जीताजागता इंसान पुतले की तरह मेरे आदेश मानने को 24 घंटे एक टांग पर खड़ा रहता है.’’ उत्तेजना से नीरजा का चेहरा तमतमा रहा था.

‘‘आप से ऐसी उम्मीद न थी. आप मेरे बारे में ऐसा सोचती हैं. आप लोगों की शह ने ही उस का दिमाग खराब किया है. दिनभर फोन पर यही सब तो बातें चलती रहती हैं.’’

‘‘फिर आप कह रहे हैं कि दिनभर, आप क्या उस के लिए फोन घर पर छोड़ कर चले जाते थे औफिस जाते समय.  आप जरा आंख खोल कर देखिए, दुनिया कहां से कहां चली गई और आप आज भी पतिपरमेश्वर के स्वर्ण सिंहासन को छोड़ना ही नहीं चाहते.’’

‘‘तो आप लोग इस मामले में उसे कुछ नहीं समझाएंगे?’’

नीरजा के हाथ से फोन वरुण ने ले लिया, ‘‘यदि जरूरत होती तो जरूर समझाते, जीजाजी. हम सुमि जीजी को जानते हैं. वे अपने घर और अपने पति के प्रति कर्तव्य से विमुख हो कर कुछ नहीं करेंगी. हमारी सुमि चाहती तो घरगृहस्थी के साथसाथ अपने हुनर से अपनी एक पहचान बना लेती. वे आप के आदेश पर चलीं, जिस के लिए शुक्रगुजार होने या फिर अपने अंदर कोई पछतावा रखने की जगह उसी को दोषी ठहरा रहे हैं आप. ऊपर से तुर्रा यह कि आप हम से चाहते हैं कि हम अपनी बहन को गलत करार दें. हां, गलती तो हुई है उन से जो उन्होंने पहली बार पति के आदेश को नहीं माना. काश, यह पहले ही किया होता या फिर थोड़ा हम ने ही उन को साहस दिया होता तो बात कुछ और ही होती.’’

यह सब कहने के बाद वरुण का कंठ अवरुद्ध हो गया. नीरजा ठंडे पानी का गिलास ले कर आई. पूरा दिन बरबाद हो गया. दिनभर  सुबह की मनहूस बहस की छाया घर में डोलती रही.

‘‘इस बार उन्होंने फिर शिकायतों का पिटारा खोला तो मैं वह कह बैठूंगा जो मुझे कहना नहीं चाहिए.’’

‘‘यह आप क्या कह रहे हैं, वरुण. यह  सुमि जीजी के साथ विश्वासघात नहीं होगा क्या?’’

‘‘तो क्या करूं, नीरजा. मेरे अंदर का अपराधबोध, उन का उतरा चेहरा देख कर कोड़े मारता है. मैं कुछ नहीं कर पाया उन के लिए.’’

‘‘अब छोड़ो, जो बीत गई उस की बात करने और पछतावा करने का कोई अर्थ नहीं है. हम ने तो कोशिश भी की थी. गलत का विरोध करने का साहस हम ही कहां जुटा पाए और सुमि जीजी नहीं चाहती थीं कि जीजाजी से कोई बात करे उस विषय पर. तभी तो हम ने उस विषय को छोड़ दिया. अब आप नहाने जाओ.’’

सुमि जीजी की शादी को 5 वर्ष हो गए. गोद नहीं भरी उन की तो अम्माजी ने नीरजा के साथ उन्हें डाक्टर के पास भेजा था. डाक्टर की सलाह पर उन के सारे टैस्ट हुए और कोई रुकावट उन की तरफ से नहीं है, यह तय हो गया. डाक्टर ने पति को भी परीक्षण करवाने को कहा और जीजी ने डरतेडरते यह बात साहस जुटा कर जीजाजी को बताई तो उस दिन उन के घर में भीषण घमासान मच गया.  जीजाजी परीक्षण के लिए मानना तो दूर, अपनी तरफ उठी उंगली को जड़ से उखाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी. क्रोधी तो पहले से ही थे, बाद में तो दुर्वासा का अवतार बन गए.

नीरजा ने बहुत कुरेदा तब उन्होंने बताया और हाथ जोड़ कर वचन लिया कि उस बात को कोई कभी नहीं उठाएगा यदि उन के जीवन में शांति चाहते हैं तो, बहनबेटी के जीवन में शांति कौन सा बापभाई नहीं चाहता. सब चुप हो गए. अनाथ आश्रम से बच्चा लाने या रिश्तेदार के बच्चे को गोद लेने के विकल्प खुले थे. चिकित्सा विज्ञान में नितनए आविष्कारों में से भी किसी एक को चुना जा सकता था. सामान्य सी बात थी लेकिन स्थिति को समझादारी से स्वीकार कर के, थोड़ी उदारता बरती होती तो जीवन में संतुलन आ जाता.

जीजाजी अपनी तरफ फेंका किसी का भी प्रश्न बरदाश्त करने की जगह पत्नी को ही जिम्मेदार ठहराने की सनातन-पुरातन लीक पर चले. भरपूर जीवंतता से लबरेज सुमि जीजी पतझाड़ के पत्ते की तरह मुरझाती चली गईं.

पेड़ तो बसंत आते ही फिर भी हरिया जाता है परंतु जीजी के जीवन की तो जड़ ही सूख गई थी. यह सच्चाई सिर्फ नीरजा और वरुण को ही पता थी और उन्होंने इसे अपने तक रखा. शुरू में तो कई बार वरुण का खून खौलता और वह जीजाजी को खरीखरी सुनाने के लिए बावला हो उठता. मगर गोपनीयता का जीजी से किया वादा आड़े आ जाता. Hindi Social Story.

Sheikh Hasina Extradition : भारत के प्रभाव से पूरा निकलता बांग्लादेश

Sheikh Hasina Extradition : बांग्लादेश एक बार फिर से सुलग उठा है. बांग्लादेश में गृहयुद्ध जैसे हालात बने हुए हैं. पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के लिए मृत्युदंड का फैसला आने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार की फौज और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के समर्थक राजधानी ढाका की सड़कों पर आमने सामने हैं. हसीना समर्थकों को गोली मारने के आदेश यूनुस सरकार ने जारी किये हैं. बांग्लादेश भयानक हिंसा के दौर में है.

गौरतलब है कि पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना, जिन्हे भारत ने पनाह दी हुई है, को 17 नवंबर 2025 को मानवता-विरुद्ध अपराधों के एक मामले में बांग्लादेश की इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल ने मौत की सजा सुनाई है. शेख हसीना के साथ उनकी सरकार में गृहमंत्री रहे असदुज्जमान खान कमाल को भी मौत की सजा सुनाई गई है. इस फैसले को ढाका में बड़े स्क्रीन पर बकायदा लाइव दिखाया गया और उसके बाद बांग्लादेश के तमाम शहरों में हिंसा, आगजनी और प्रदर्शन हुए.

गौरतलब है कि 2009 में सत्ता संभालने के बाद शेख हसीना ने बांग्लादेश को एक आर्थिक रूप से पिछड़े और राजनीतिक अस्थिर राष्ट्र की छवि से निकालकर एक ऐसे देश में बदलने की दिशा में कार्य किया, जिसके चलते बांग्लादेश दक्षिण एशिया में तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो गया. बीते एक दशक में बांग्लादेश का जीडीपी लगातार बढ़ता गया और वह कपड़ा उद्योग (रेडीमेड गारमेंट) के सहारे दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक बनकर उभरा. कपड़ा उद्योग में लाखों महिलाओं को रोजगार मिला, जिनकी मेहनत और प्रतिबद्धता ने देश की उत्पादन क्षमता को नई ऊँचाइयों पर पहुंचाया.

शेख हसीना के नेतृत्व में महिला सशक्तिकरण को बढ़ावा मिला और शिक्षा, स्वास्थ्य, राजनीति, पुलिस, सेना, प्रशासन और उद्योग – हर जगह महिलाओं की भागीदारी बढ़ी. ग्रामीण इलाकों में माइक्रो फाइनेंस मॉडल ने लाखों महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया. गर्ल्स एजुकेशन स्कॉलरशिप और सीएमएचएस योजनाओं से लड़कियों के स्कूल ड्रॉपआउट में भारी कमी आयी. पहली बार बड़ी संख्या में महिलाएं पायलट, इंजीनियर, डॉक्टर, जज और एथलीट के रूप में आगे आईं.

यही नहीं शेख हसीना के कार्यकाल में देश का बुनियादी ढांचा भी काफी मजबूत हुआ. इस दौरान पद्मा ब्रिज जैसी परियोजनाएँ देश की परिवहन क्षमता में क्रांतिकारी बदलाव लायीं. ‘डिजिटल बांग्लादेश मिशन’ ने आईटी स्टार्टअप और टेक-सेवा क्षेत्र को नई पहचान दी. बिजली, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास में बड़े निवेश के कारण बांग्लादेश ने मानव विकास सूचकांक में उल्लेखनीय उछाल दर्ज किया. बांग्लादेश की इस सफलता का आधार केवल आर्थिक सुधार नहीं, बल्कि समावेशी विकास मॉडल है, जिसमें महिलाओं को बराबर का अवसर, सम्मान और नेतृत्व मिला. इसका पूरा श्रेय शेख हसीना को जाता है जिन्हें दुनिया की सबसे प्रभावशाली महिला नेताओं में गिना गया. उनकी सरकार ने चरमपंथ और आतंकवाद पर कड़ा रुख अपनाकर देश में स्थिरता की नींव रखी. मगर पाकिस्तान और अन्य बाहरी ताकतों के षड्यंत्र ने बांग्लादेश में तख्तापलट कर दिया और हसीना को देश से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा.

बांग्लादेश आज जिस स्थिति में है उसके पीछे तीन मुख्य कारण हैं. पहला – कट्टर धार्मिक विचारों वाली राजनीतिक पार्टी जैसे जमात-ए-इस्लामी को मजबूती मिलना. जिसके लिए लम्बे समय से पाकिस्तान और उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई की मदद ली जा रही थी. दूसरा –  धर्मनिरपेक्ष लोकतान्त्रिक ताकतों को कमजोर करना, जिसके लिए अमेरिकन इंटरनेशनल रिपब्लिकन इंस्टीट्यूट की मदद ली गई और जिसमें आरक्षण को लेकर चले छात्र आंदोलन ने उत्प्रेरक का काम किया. और तीसरा शेख हसीना को सत्ता और देश छोड़ने के लिए मजबूर करना.

आज अगर शेख हसीना को कोर्ट ने फांसी की सजा सुनाई है तो यह बदले की राजनीति से प्रेरित तो है ही, देश को कट्टरपंथ की तरफ धकेलने की कोशिश भी है. इसके पीछे उसी सिंडिकेट का हाथ है जो 1971 में बांग्लादेश की आजादी के खिलाफ था. जमात-ए-इस्लामी जैसी कट्टरपंथी पार्टियों को पाकिस्तान के समर्थन से बांग्लादेश को भी धार्मिक राष्ट्र बनाने की कोशिशों में जुटी हैं. इसके साथ ही बाहरी ताकतें जैसे चीन और अमेरिका इन राजनीतिक पार्टियों की संकीर्ण सोच  और कट्टरता का फायदा उठा कर देश को अस्थिर रखना चाहती हैं.ताकि सत्ता शीर्ष पर बैठा व्यक्ति उनके इशारे पर नाचता रहे. इसका नमूना पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल जैसे देशों में देख चुके हैं. किसी भी  देश में राजनीतिक अस्थिरता और उथल पुथल से कट्टरवादी ताकतें मजबूत होती हैं और धर्म की जंजीरें औरतों पर कसती जाती हैं.

हालांकि बांग्लादेश की बागडोर इस वक्त मोहम्मद यूनुस के हाथों में है जिन्हें बड़ा उदारवादी नेता माना जाता है मगर उनकी कार्यवाहक सरकार में जितने भी सलाहकार बनाये गए हैं वे सभी संकीर्ण और कट्टरवादी सोच रखने वाले लोग हैं. कार्यवाहक यूनुस सरकार के मंत्रालयों, विश्वविद्यालयों, स्थानीय प्रशासन के महत्वपूर्ण पदों पर कट्टरवादी मानसिकता के लोग काबिज हैं.

आखिर एक उदारवादी लोकतांत्रिक देश में कट्टरपंथ को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है? दरअसल इसके पीछे पाकिस्तान की भूमिका खुल कर सामने आ चुकी है. युनूस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार और पाकिस्तान के आर्मी चीफ आसिम मुनीर के बीच भारत के खिलाफ किसी बहुत बड़ी प्लानिंग भनक भारत को मिल चुकी है. इन दिनों बांग्लादेश की राजधानी ढाका में पाकिस्तान समेत दुनियाभर के मौलाना जुटे हुए हैं. सभी ईशनिंदा कानून को बांग्लादेश समेत हर जगह लागू करने की मांग कर रहे हैं. कट्टरपंथियों की मॉर्डन लेबोरेट्री बन चुके बांग्लादेश के सोहरावर्दी गार्डन में जो भीड़ जुटी, उसमें तीन दर्जन यानी करीब 36 मौलाना तो अकेले पाकिस्तान से आये हैं. ढाका के मौलवी सम्मेलन में पाकिस्तान का कट्टरपंथी मौलाना फजुर्रहमान उर्फ डीजल भी पहुंचा और उसने अपने भाषण में पाकिस्तान को बांग्लादेश का भाई कहा.

दरअसल पाकिस्तान 1971 की अपनी हार को भूला नहीं है और वह इसका बदला चाहता है. वह भारत की पूर्वी सीमा पर लघु पाकिस्तान बनाना चाहता है. पाकिस्तान, बांग्लादेश के जरिए भारत में आतंक फैलाना चाहता है. इनमें उसे अमेरिका की मदद मिल रही है. वाइट हाउस की नीति रही है कि जहाँ उसके रणनीतिक हित साधते हैं वहां वह कट्टरपंथ को बढ़ावा देने या गैर-जम्हूरी ताकतों को मजबूत करने से परहेज नहीं करता है. पाकिस्तान से लेकर बांग्लादेश तक उसने यही रणनीति अपनाई है. और इस वक्त दोनों ही देशों में कट्टरपंथ अपने उभार पर है.

भारत पर इससे दोतरफा संकट उभर आया है. अभी तक हम पश्चिमी मोर्चे से आतंकी गतिविधियों का सामना कर रहे थे मगर अब पूर्वी सीमा भी बेहद संवेदनशील हो गई है. शेख हसीना ने अपने शासनकाल में चरमपंथियों को उखाड़ फेंका था, मगर अब वे फिर पूरी ताकत से सक्रीय हैं.

बांग्लादेश द्वारा भारत से शेख हसीना का प्रत्यर्पण मांगना टकराव का नया बिंदु है. शेख हसीना को फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद यूनुस सरकार उनकी गिरफ़्तारी के लिए पहले इंटरपोल की शरण में गई, ताकि वे हसीना के लिए रेड कार्नर नोटिस जारी करें. बांग्लादेश ने प्रत्यर्पण की मांग के साथै यह चेतावनी भी जारी की है कि “इन्हें कोई देश शरण न दे”. भारत-बांग्लादेश के बीच “भारत-बांग्लादेश प्रत्यर्पण संधि (2013)” मौजूद है, जिसका हवाला बांग्लादेश ने इस मामले में दिया है. उसके बाद उसने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) से संपर्क कर हसीना के प्रत्यर्पण के लिए दबाव बनाया है. हालांकि यूएन ने हसीना की फांसी को पूरी तरह गलत बताया है.

भारत वैधानिक रूप से बांग्लादेश की प्रत्यर्पण मांग स्वचालित रूप से स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं है. संधि तथा भारतीय घरेलू कानून में कुछ अपवाद और सुरक्षा प्रावधान हैं, जिनके जरिये हसीना को आगे भी शरण दी जा सकती है.

प्रमुख अपवादों में शामिल हैं – यदि प्रत्यर्पण मांग में राजनीतिक अपराध या मृत्यु दंड जैसी सजा का मामला हो, तो भारत तय कर सकता है कि दंड की प्रकृति, मानवाधिकार स्थिति आदि का ध्यान रखते हुए प्रत्यर्पण स्वीकार करना है या नहीं.

भारत ने अभी तक इस मामले में स्पष्ट “हाँ” या “ना” नहीं की है. भारत ने कहा है कि वह “सभी पक्षों के साथ सहयोगपूर्ण तरीके से विचार करेगा”. दरअसल यह मामला सिर्फ एक कानूनी प्रत्यर्पण विवाद नहीं है – इसमें राजनीतिक, मानवाधिकार, दूतावासीय/कूटनीतिक और क्षेत्रीय-सुरक्षा आयाम को देखना जरूरी है. बांग्लादेश में आगामी चुनाव, दलों का भविष्य और स्थायित्व इस घटना से प्रभावित हो सकते हैं.

भारत-बांग्लादेश संबंधों में यह सबसे नाजुक घड़ी है. यदि भारत शेख हसीना का प्रत्यर्पण करता है तो इसके कई गंभीर और दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं. शेख हसीना भारत की सबसे भरोसेमंद पड़ोसी सहयोगी रही हैं. उन्होंने आतंकवाद-विरोधी नीतियों में भारत का खुले तौर पर समर्थन किया है. उन्होंने भारत विरोधी उग्रवादी संगठनों को बांग्लादेश से बाहर निकाला और सुरक्षा-सहयोग को मजबूत किया.

ऐसे में यदि भारत उन्हें प्रत्यर्पित करता है तो बांग्लादेश में मौजूदा सत्ता समूह भारत-विरोधी माहौल को भड़कायेगा. इससे दोनों देशों के बीच विश्वास की इमारत बुरी तरह हिल सकती है. इससे भारत की क्षेत्रीय छवि और रणनीतिक हितों पर भी असर पड़ेगा.

उल्लेखनीय है कि शेख हसीना दक्षिण एशिया में भारत की रणनीतिक नीति का अहम स्तंभ रही हैं. उनके प्रत्यर्पण से भारत की “विश्वसनीय मित्र” वाली छवि कमजोर हो जाएगी और अन्य पड़ोसी राष्ट्र भारत पर भरोसा करने में हिचकेंगे. इससे शरण और मानवीय संरक्षण के मुद्दे पर भी गंभीर बहस खड़ी हो सकती है.

शेख हसीना की गिरफ्तारी या प्रत्यर्पण के बाद बांग्लादेश में व्यापक हिंसा और गृह राजनीति में अराजकता बढ़ सकती है. वहां लोकतांत्रिक संस्थाओं का ढांचा और कमजोर हो सकता है और चरमपंथी शक्तियाँ मजबूत हो सकती हैं.

शेख हसीना के प्रत्यर्पण को लेकर भारत जिस भी निर्णय पर पहुँचे, वह केवल कानूनी नहीं बल्कि रणनीतिक और मानवीय दृष्टिकोण से भी अत्यंत संवेदनशील है. प्रत्यर्पण का निर्णय भारत-बांग्लादेश रिश्तों की दिशा तय करने वाला ऐतिहासिक मोड़ होगा. इसलिए भारत को अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवीय दृष्टि और क्षेत्रीय शांति, इन सभी पहलुओं को संतुलित करके अत्यधिक सावधानी से आगे बढ़ना होगा. Sheikh Hasina Extradition.

Social Story In Hindi: नारायण बन गया जैंटलमैन

Social Story In Hindi: कंप्यूटर साइंस में बीटैक के आखिरी साल के ऐग्जाम्स हो चुके थे और रिजल्ट आजकल में आने वाला था. कालेज में प्लेसमैंट के लिए कंपनियों के नुमाइंदे आए हुए थे. अभी तक की बैस्ट आईटी कंपनी ने प्लेसमैंट की प्रक्रिया पूरी की और नाम पुकारे जाने का इंतजार करने के लिए छात्रों से कहा. थोड़ी देर बाद कंपनी के मैनेजर ने सीट ग्रहण की और हौल में एकत्रित सभी छात्रों को संबोधित करते हुए प्लेसमैंट हुए छात्रों की लिस्ट पढ़नी शुरू की.

‘‘पहला नाम है जैंटलमैन नारायण का. नारायण स्टेज पर आएं और कंपनी में सेवाएं देने के लिए अपना फौर्म भरें. अगला नाम है…’’ कहते हुए उन्होंने कई नाम लिए. नारायण अपना नाम सुनते ही फूला न समाया. जब उस का नाम पुकारा गया तो हौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. कारण था नारायण को जैंटलमैन कह कर पुकारा जाना. दरअसल, नारायण सभी छात्रों का प्यारा और टीचर्स का पसंदीदा टौप करने वाला छात्र था. साथ ही इंटरव्यू के दौरान उस ने कंपनी वालों को बता दिया था कि वह जैंटलमैन बनने के लिए आईटी कंपनी जौइन करना चाहता है, सो उन्होंने भी उसे जैंटलमैन कह कर पुकारा.

नारायण स्टेज पर गया और फौर्म ले कर एक कोने में लगे डैस्क पर बैठ कर उसे भरने लगा. उस का तो जैसे सपना साकार हो गया था. उसे लाखों का सालाना पैकेज मिला था. फौर्म भरते हुए वह वर्तमान से अतीत में खो गया. उस की नजरों के सामने अचानक वह दिन घूमने लगा जब उस ने पापा से स्मार्टफोन लेने की जिद की थी. उस दिन पापा ने सरसरी तौर पर पूछा, ‘‘परसों तुम्हारा जन्मदिन है. क्या गिफ्ट चाहिए?’’

बस, पापा का पूछना था और नारायण का कहना, ‘‘मुझे आप के जैसा स्मार्टफोन चाहिए. क्लास में सब के पास स्मार्टफोन है, मेरे पास नहीं.’’

‘‘पर बेटा, स्कूल में तो मोबाइल अलाउड ही नहीं होता. हम तुम्हें कालेज जाने पर ले देंगे,’’ पापा ने कहा तो वह नाराज हो गया और बोला, ‘‘कालेज जाने पर तो मैं बाइक लूंगा, अभी मुझे फोन चाहिए, वह भी बिलकुल आप के फोन जैसा.’’

मम्मी ने भी समझाया, ‘‘बेटा, अभी तो तेरे स्कूल की फीस गई है. फिर घर के खर्च भी काफी हैं. अगर थोड़ा रुक जाता तो…’’ इस पर नारायण भड़क गया, तो मम्मीपापा ने अपने खर्च में कटौती कर उसे बिलकुल वैसा फोन ले दिया जैसा पापा के पास था. स्मार्टफोन पा कर नारायण फूला न समाया. वह अगले दिन जल्दी तैयार हुआ और स्कूल चल दिया. स्कूल जा कर वह सभी दोस्तों को अपना फोन दिखा रहा था कि तभी उसे दूर से गायत्री आती दिखी तो वह उस की तरफ भागा और उसे स्मार्टफोन दिखाता हुआ बोला, ‘‘देखो, अब तो मेरे पास भी स्मार्टफोन है. मिलाओ हाथ, लगो गले.’’

‘‘हूं,’’ गायत्री ने नाकमुंह सिकोड़ा, ‘‘सिर्फ स्मार्टफोन रख कर कोई स्मार्ट नहीं बन जाता. पहले अपना हुलिया तो ठीक करो. स्मार्टफोन तो मम्मीपापा ने ले दिया, लेकिन यह नहीं सिखाया कि स्कूल कैसे बन कर जाते हैं. न तुम ने कंघी की, न ड्रैस प्रैस कर के पहनी. तिस पर हमेशा गुटका खाते रहते हो. जैसे उठे वैसे ही आ जाते हो. मुझे तो लगता है तुम नहाते भी नहीं होगे. पता है तुम जब बात करते हो तो मुंह से गुटके के टुकड़े गिरते हैं.

‘‘क्लास मौनिटर नीता भी कई बार तुम्हें यह बात समझा चुकी हैं कि जैंटलमैन बन कर रहा करो. हमेशा साफसुथरे बन कर स्कूल आया करो पर तुम्हारे कानों तो जूं नहीं रेंगती. हाथ भी मिलाऊंगी और गले भी लगा लूंगी, पहले जैंटलमैन बन कर दिखाओ.’’ गायत्री की बातें नारायण को गहरा आघात कर गईं. कहां तो वह सोच रहा था गायत्री उसे मिल कर खुश होगी. उस का फोन देखेगी पर उस ने तो उलटा डांट दिया. वह भी क्या करे, कई बार गुटका छोड़ने की कोशिश की पर नहीं छूटा. पापा भी कई बार समझाते हैं साफसुथरे जैंटलमैन बन कर रहो, पढ़ाई करो. अब तुम्हारी दाढ़ी आ गई है तो शेव कर के रहा करो पर मैं तो निखद ही रहा. कई बार पापा यह भी कहते कि पढ़ाई के साथ कोई काम करो, चार पैसे जेब में आएंगे तो आत्मविश्वास भी बढ़ेगा व तरक्की भी करोगे. लेकिन नारायण तो बस खाली समय भी घर पर सो कर बिताता, इसी कारण कक्षा के अन्य छात्रछात्राएं भी उस से कतराते हैं. गायत्री की बातों से रुष्ट नारायण स्कूल से घर आया तो औंधेमुंह लेट गया. उस ने खाने को भी मना कर दिया. अगले दिन संडे था. पापा को आज भी औफिस जाना था. उन का फोन चार्जिंग पर लगा हुआ था. नारायण ने उन का फोन चार्जिंग से हटाया और अपना फोन चार्जिंग पर लगा दिया.

नारायण 12वीं कक्षा का छात्र था. स्कूल में हमेशा लेट जाना, पान, गुटका आदि खाना और बिना कंघी, बिना साफ कपड़े पहने जाने के कारण छात्र उस से कटते थे. वह मन ही मन गायत्री को प्यार करता था, लेकिन उस की गंदी आदतों के कारण गायत्री भी उसे भाव न देती. नारायण के पापा एक प्राइवेट कंपनी में जौब करते थे. आज संडे के दिन भी उन्हें जाना पड़ रहा था. उन का वेतन भी बहुत कम था. किसी तरह घर चला रहे थे व जुगाड़ कर नारायण को पढ़ा रहे थे. उन की मनशा थी कि नारायण कंप्यूटर, सौफ्टवेयर इंजीनियर बने, लेकिन नारायण को इस से कोईर् लेनादेना न था. वह देर तक सोता रहता. फिर उठ कर स्कूल भागता. घर की आर्थिक मंदी से भी उसे कोई लेनादेना न था. बिस्तर पर पड़े नारायण को बाय कह उस के पापा ने फोन चार्जिंग से हटाया और जेब में डाल कर चल पड़े औफिस. थोड़ी देर बाद मम्मी भी बाजार सामान लेने चल दीं. तभी फोन बजा तो नारायण ने फोन स्क्रीन पर देखा किसी अभिनव का फोन था.

यह क्या नारायण चकराया, ‘ओह, उस ने चार्जिंग से पापा का फोन हटा कर अपना फोन लगा दिया था. लेकिन एकसा फोन होने के कारण पापा मेरा फोन ले गए.’ उस ने सोचा, फिर सोचा, ‘फोन अटैंड कर बता देता हूं कि पापा फोन घर भूल गए हैं. सो जैसे ही उस ने फोन उठाया, उधर से आवाज आई, ‘‘प्रदीपजी, आप अपने बेटे नारायण की चिंता छोडि़ए, आप के बेटे नारायण की पढ़ाई के लिए लोन मिल जाएगा. मैं आप को पर्सनल लोन आप के कहे मुताबिक दिलवा दूंगा. ब्याज की डिटेल मैं ने आप के व्हाट्सऐप पर डाल दी हैं, देख लीजिएगा,’’ जब तक नारायण अभिनव को बताता कि पापा फोन भूल गए हैं, उधर से फोन कट गया. नारायण को उत्सुकता हुई कि जाने क्या डिटेल हैं लोन की, सो उस ने उत्सुकतावश पापा व अभिनव के बीच हुई चैटिंग पढ़ी. उसे पढ़ कर नारायण को बड़ी हैरानी हुई, पापा ने लिखा था, ‘मैं नारायण की इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए लोन लेना चाहता हूं.’

अभिनव का जवाब था, ‘आजकल ऐजुकेशन लोन मिल जाता है, जिस का भुगतान बच्चे की पढ़ाई के बाद नौकरी लगने पर बच्चे द्वारा ही किया जाता है.’

पापा ने कहा था, ‘नहींनहीं, मैं नारायण पर कोई बोझ नहीं डालना चाहता, फिर जब नारायण की नौकरी लगेगी और उसे अपनी पढ़ाई के खर्च का लोन चुकाना पड़ेगा तो वह क्या सोचेगा कि मांबाप ने पढ़ाई भी करवाईर् तो मेरे ही कंधे पर बंदूक रख कर. मुझे पर्सनल लोन दिलवा दो. किसी तरह नारायण की बीटैक हो जाए. बस, फिर तो नारायण ही संभालेगा घर को.’

अभिनव का जवाब था, ‘ठीक है, कोशिश करता हूं.’

फिर आज के मैसेज में अभिनव ने पर्सनल लोन की डिटेल भेजी थीं जो काफी महंगा था. ‘ऐसा लोन लेना शायद पापा की तनख्वाह के हिसाब से संभव भी न होगा. फिर उसे चुकाएंगे कहां से,’ नारायण ने सोचा. मैसेज पढ़ कर नारायण की आंखें भर आईं. ‘पापा मेरे लिए कितना सोचते हैं. मेरे सैटल होने के बाद भी वे नहीं चाहते कि मैं लोन चुकाऊं या मुझ पर भार पड़े,’ नारायण सोच में पड़ा था. ‘ठीक कहती है गायत्री भी, मुझे घर के लिए, मातापिता के लिए सोचना चाहिए और एक मैं हूं इतनी महंगी डिमांड कर फोन लिया और अभी बाइक की इच्छा भी रखता हूं.’ वह खुद को धिक्कारने लगा, फिर कुछ सोच कर वह उठा और नहाने चल दिया. जब तक नारायण नहा कर आया मम्मी बाजार से आ चुकी थीं. मम्मी ने नारायण का बदला रूप देखा तो हैरान रह गईं. कहां तो वह 12 बजे तक उठता ही न था और कहां नहाधो कर तैयार था. उन्होंने नारायण से पूछा, ‘‘कहां जा रहे हो?’’ नारायण ने इतना ही कहा, ‘‘जैंटलमैन बनने,’’ और घर से निकल गया.

वह सीधा अपने दोस्त लक्ष्मण के घर गया जिस के बड़े भैया अखबार का काम करते थे. उस ने उन से अखबार बांटने का काम मांगा तो वे बोले, ‘‘हां, हमें तो एक लड़के की जरूरत है ही. हम तुम्हें 1,100 रुपए महीना देंगे. कल साइकिल ले कर सैंटर पहुंच जाओ.’’ लक्ष्मण के भैया को ‘थैंक्स’ कह कर नारायण खुशीखुशी घर लौटा और अपनी पुरानी साइकिल निकाल कर उस में तेल डालने व साफसफाई करने लगा. उस में यह परिवर्तन देख कर मां भी हैरान थीं. कहां बाइक की डिमांड करने वाला नारायण आज साइकिल साफ कर रहा था. अगले दिन सुबह से उस ने 4 बजे उठ कर अखबार डालने का काम शुरू कर दिया. वह सुबह 7 बजे तक अखबार बांटता और वापस आ कर नहाधो कर प्रैस किए कपड़े पहन स्कूल जाता.

मम्मीपापा हैरान थे, 5 मिनट… 5 मिनट… कह कर स्कूल के लिए लेट उठने वाला नारायण अब सुबह न केवल जल्दी उठता बल्कि काम भी करता. साथ ही वह साइकिल से ही स्कूल जाता, जिस से वैन का किराया भी बचने लगा था. अखबार के काम से मिलने वाले पैसे उस ने अपने पास इकट्ठे करने शुरू कर दिए. साथ ही वह स्कूल से आ कर इंजीनियरिंग के ऐंट्रैंस टैस्ट की तैयारी करता व शाम को 10वीं के 5 बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाता. अपनी मेहनत के बल पर 12वीं में नारायण ने 80त्न अंक ले कर क्लास में टौप किया. आगे की पढ़ाई के लिए जहां नीता उस की क्लास मौनिटर विमन कालेज चली गईं, वहीं गायत्री ने वोकेशनल कालेज में कंपनी सैक्रेटरी के कोर्स के लिए ऐडमिशन लिया. नारायण ने इंजीनियरिंग के ऐंट्रैंस टैस्ट में अच्छी रैंक ला कर टौप आईटी कालेज में इंजीनियरिंग में ऐडमिशन लिया. आईटी में ऐडमिशन की फौरमैलिटीज पूरी होने पर फीस भरने के लिए हफ्ते का समय मिला. नारायण के पापा अपने दोस्त अभिनव को फोन कर बोले, ‘‘अभिनवजी, लोन की कार्यवाही जल्दी पूरी करवा दो ताकि नारायण की फीस भरी जा सके.’’

‘‘हां, करता हूं,’’ अभिनव से जवाब मिला तो नारायण के पापा प्रदीपजी ने फोन रखा. तभी नारायण आया और पापा के हाथ में नोट रखते हुए बोला, ‘‘पापा, आप को लोन लेने की आवश्यकता नहीं है, यह लीजिए पैसे. बस, बैंक से ड्राफ्ट बनवाइए ताकि फीस भरी जा सके. यह पैसे मैं ने अखबार का काम करने व ट्यूशन पढ़ाने से कमाए हैं. हां, कुछ कम हों तो अवश्य आप की सहायता की जरूरत होगी.’’ पापा ने नोट पकड़े तो उन की आंखों से आंसू छलक आए, उन्होंने नारायण को गले लगा लिया. सभी नारायण में अचानक आए इस बदलाव से अचंभित थे. अब उस ने गुटका खाना भी छोड़ दिया था और सदा टिपटौप हो कर रहता. रोज शेव बनाता, अपने कपड़े खुद प्रैस कर पहनता. वह सचमुच जैंटलमैन बन गया था. लेकिन कोई नहीं जानता था कि यह हृदय परिवर्तन पापा के फोन पर पढ़े मैसेज का नतीजा है. धीरेधीरे 4 साल बीत गए. गायत्री तब तक बीए कर एक कंपनी में कंपनी सैक्रेटरी बन गई थी. नीता की शादी हो गई और वह अपने पति के बिजनैस में उन की सहायता करने लगी. इधर नारायण ने मेहनत से पढ़ाई की व साथसाथ 10वीं व 12वीं के बच्चों की ट्यूशन ले कर न केवल अपनी पढ़ाई का खर्च निकाला बल्कि घर में भी आर्थिक सहायता करने लगा.

नारायण की सहपाठी पारुल, रविंद्र, हरीश व विकास तो उसे अभी से जैंटलमैन कह कर पुकारने लगे थे. घरबाहर सभी उसे प्यार करते. कालेज में टीचर्स का तो वह चहेता था, क्योंकि पढ़ाई के साथ वह शिष्टता में भी आगे बढ़ गया था. आज टिपटौप नारायण जब कालेज आया तो पारुल ने उसे स्पष्ट कह दिया, ‘‘पढ़ाई के कारण तुम्हें कंपनी वाले प्लेसमैंट दें न दें, लेकिन तुम्हारी पर्सनैलिटी को देख यानी इस जैंटलमैन को अवश्य देंगे प्लेसमैंट.’’ और फिर हुआ भी यही, रविंद्र व हरीश का नाम बाद में लिया गया जबकि नारायण का नाम पहले, वह भी जैंटलमैन संबोधित करते हुए. ‘‘अगर फौर्म भर गए हों तो दे दें,’’ कंपनी मैनेजर की आवाज से नारायण की तंद्रा भंग हुई और वह वर्तमान में आया. उस ने जल्दी से फौर्म भर कर मैनेजर को दिया और वह हौल से बाहर निकलने को था कि तभी विकास ने आ कर बताया, ‘‘इंटरनैट पर रिजल्ट घोषित हो गया है. मैं ने सब का रिजल्ट देख लिया है और हमारे जैंटलमैन ने तो टौप किया है टौप.’’

नारायण सुनते ही खुशी से झूम उठा. पारुल, हरीश व रविंद्र के साथ वह कंप्यूटर रूम की ओर भागा रिजल्ट देख कर नारायण बहुत उत्साहित था अब वह अपने घर के, मातापिता के आर्थिक उन्मूलन में सहायक बन सकता है. पढ़ाई भी पूरी हुई और बेहतर प्लेसमैंट भी मिली. नारायण ज्यों ही कंप्यूटर रूम से बाहर निकल गेट की ओर बढ़ा सामने गायत्री बांहें फैलाए खड़ी थी. वह अचानक उसे यहां देख अचंभित हुआ.

‘‘आओ, जैंटलमैन. यह हुई न बात. मातापिता का सपना भी पूरा और साथ ही मेरा इंतजार भी खत्म,’’ और उस ने नारायण को सीने से लगा लिया. तभी नीता का फोन आया. उस ने भी नारायण को उस की कामयाबी पर बधाई दी. नारायण ने सब की बधाई ली और चल पड़ा घर की ओर मातापिता को अपनी इंजीनियरिंग पूरी होने व टौप करने के साथसाथ टौप आईटी कंपनी में प्लेसमैंट की खुशखबरी देने. अब वह न केवल जैंटलमैन बन गया था बल्कि घर के आर्थिक उन्मूलन में भी सहायक बन सकता था.

घर पहुंच मातापिता को उस ने खुशखबरी दी तो उन्होंने उसे अश्रुपूरित नेत्रों से सीने से लगा लिया. अब नारायण वास्तव में जैंटलमैन बन गया था. Social Story In Hindi.

Hindi Social Story: कशमकश- दो जिगरी दोस्त क्यों मजबूर हुए गोलियां बरसाने के लिए?

Hindi Social Story: मई 1948, कश्मीर घाटी, शाम का समय था. सूरज पहाड़ों के पीछे धीरेधीरे अस्त हो रहा था और ठंड बढ़ रही थी. मेजर वरुण चाय का मग खत्म कर ही रहा था कि नायक सुरजीत उस के सामने आया, और उस ने सैल्यूट मारा.

 ‘‘सर, हमें सामने वाले दुश्मन के बारे में पता चल गया है. हम ने उन की रेडियो फ्रीक्वैंसी पकड़ ली है और उन के संदेश डीकोड कर रहे हैं. हमारे सामने वाले मोरचे पर 18 पंजाब पलटन की कंपनी है और उस का कमांडर है मेजर जमील महमूद.’’

नायक सुरजीत की बात सुनते ही वरुण को जोर का धक्का लगा और चंद सैकंड के लिए वह कुछ बोल नहीं सका. फिर उस ने अपनेआप को संभाला और बोला, ‘‘शाबाश सुरजीत, आप की टीम ने बहुत अच्छा काम किया. आप की दी हुई खबर बहुत काम आएगी. आप जा सकते हैं.’’

सुरजीत ने सैल्यूट मारा और चला गया. उस के जाने के बाद वरुण सोचने लगा, ‘18 पंजाब-मेरी पलटन. मेजर जमील महमूद-मेरा जिगरी दोस्त. क्या मैं उस की जान ले लूं जिस ने कभी मेरी जान बचाई थी. यह कहां का इंसाफ होगा?’

वरुण अतीत में खो गया…

देश के बंटवारे के पहले, लाहौर में उन दोनों के घर आसपास थे. दोनों खानदानों में अच्छा मेलमिलाप था. उन दोनों के पिता एक ही दफ्तर में काम करते थे.

दोनों तरफ के सब बच्चों में दोस्ती थी पर जमील और वरुण के बीच खास लगाव था. दोनों लंगोटिया यार थे. इस की वजह थी कि दोनों न सिर्फ हमउम्र थे, दोनों महाबदमाश भी थे. शैतानी करने में माहिर थे, पर साथसाथ पढ़ाई करने में भी काफी तेज थे. क्लास में दोनों बहुत अच्छे नंबर पाते थे, इसलिए शैतानी करने पर आमतौर पर उन्हें केवल डांट ही पड़ती थी.

स्कूली शिक्षा हासिल कर लेने के बाद दोनों एक ही कालेज में पढ़ने लगे. तब तक दूसरा महायुद्ध शुरू हो गया था. कालेज की पढ़ाई पूरी होने पर दोनों ने तय किया कि वे सेना में अफसर बनेंगे. जमील के अब्बा को उस का इरादा काफी नेक लगा और उन्होंने फौरन अपनी रजामंदी दे दी. उस की मां ने कुछ नहीं कहा, पर सब देख सकते थे कि वे खुश नहीं थीं. वरुण के मातापिता दोनों ही उस के फौजी बनने के खिलाफ थे. वे कहते थे, ‘यह तो अंगरेजों की सेना है. हमारा बेटा क्यों उन की लड़ाई में लड़े और उन के लिए अपनी जान खतरे में डाले.’

बड़ी मुश्किल से वरुण ने उन को मनाया. फिर दोनों दोस्तों ने अफसर बनने के लिए इंटरव्यू दिए. दोनों चुन लिए गए. अफसर ट्रेनिंग स्कूल में 6 महीने की शिक्षा पा कर उन को कमीशन मिल गया, और वे अफसर बन गए. वह समय था दिसंबर, 1943. जमील और वरुण दोनों की पोस्टिंग एक ही पलटन में हुई- ‘18 पंजाब’. उन की पलटन उस समय देश की पूर्वी सीमा पर थी. वह जापानी सेना का सामना कर रही थी. जब जमील और वरुण पलटन में पहुंचे तो पता चला कि उन पर हमला होने की आशंका थी. वैसे तो पिछले 18 महीने से जापानी सेना शांत बैठी थी. पूरे बर्मा पर कब्जा करने के बाद लगता था कि अब वह आगे नहीं बढ़ेंगी. पर जासूसों ने बताया कि वह किसी बड़े हमले की तैयारी कर रही है. 18 पंजाब पलटन को कोहिमा का मोरचा मिला था.

अप्रैल 1944 के पहले हफ्ते में जापानी सेना ने धावा बोल दिया. पूरी ताकत से जापानी सेना कोहिमा और उस के आसपास के इलाके पर टूट पड़ी. उस का जोश इतना था कि 18 पंजाब पलटन और उन की साथी पलटनों को पीछे हटना पड़ा. पर उन्होंने जल्द ही स्थिति पर काबू पा लिया. उन को मालूम था कि उन के पीछे बहुत ही कम सेना थी. सो, अगर जापानी उन का मोरचा तोड़ कर आगे निकल गए तो पूरे भारत को खतरा हो जाएगा.

कई दिनों तक घमासान युद्ध चलता रहा. एक मोरचे पर दोनों जमील और वरुण तकरीबन साथसाथ ही लड़ रहे थे. वरुण की नजर सामने आते जापानी सैनिकों पर थी. जमील ने देखा कि दाहिनी ओर से कुछ और जापानी उन की तरफ बढ़ रहे थे जिन में से एक सैनिक वरुण को निशाना बना रहा था.

‘वरुण बच के,’ जमील चिल्लाया और कूद कर उस ने वरुण को धक्का दे दिया. वरुण नीचे गिरा और जापानी सिपाही की गोली जमील के कंधे में लगी. फिर जापानी सिपाही उन तक पहुंच गए और दोनों गुटों में हाथापाई होने लगी. आखिर 18 पंजाब पलटन के बहादुर सैनिकों ने जापानियों को खदेड़ दिया. उस के बाद ही वे जमील को डाक्टर के पास ले जा सके.

जमील का समय अच्छा था कि गोली केवल मांस को छू कर निकल गई थी. हड्डी बच गई थी. इसलिए वह जल्दी ही ठीक हो गया.

वरुण उस से मिलने डाक्टरी तंबू में गया. उस ने कहा, ‘यार जमील, तू ने मेरी जान बचाई है.’

‘उल्लू के पट्ठे,’ (दोनों दोस्त एकदूसरे को ऐसे प्यारभरे शब्दों में अकसर बुलाया करते थे), ‘अगर तुझे नहीं बचाता तो किस को बचाता, दुश्मनों को,’ जमील ने जवाब दिया.

आखिर लड़ाई समाप्त हुई. जापानी हार गए. 18 पंजाब पलटन मेरठ छावनी में वापस आई.

समय बीता और 15 अगस्त, 1947 का महत्त्वपूर्ण दिन आया. हिंदुस्तान को आजादी मिल गई पर देश का बंटवारा हो गया. जमीन बंटी, आजादी बंटी, सामान बंटा और फौज भी बंटी.

18 पंजाब पलटन पाकिस्तान के हिस्से में आई. वरुण की पोस्टिंग किसी और पलटन में हो गई. जाने से पहले वह जा कर जमील से गले मिला.

‘अब हम अलगअलग मुल्कों के बाशिंदे हो गए हैं,’ जमील ने कहा.

‘पर फिर भी हम दोस्त रहेंगे, हमेशाहमेशा के लिए,’ वरुण ने जवाब दिया.

तभी वरुण की तंद्रा भंग हुई और वह वर्तमान में लौट आया. वरुण कशमकश में फंसा हुआ था कि महज 8 महीने बाद ही दोनों दुश्मन बन कर, एकदूसरे का सामना कर रहे थे.

उस रात वरुण को नींद नहीं आई. वैसे तो जब लड़ाई में विराम होता, जैसे अब था, वरुण रात को 2 बार उठ कर संत्रियों को जांचता था. उस रात वह केवल एक बार गया. बाकी समय वह इस सोच में डूबा था कि कैसे वह जमील से मिले.

देर रात उस के दिमाग में एक खयाल आया और वरुण ने उस पर अमल करने का पक्का इरादा तय किया. खतरनाक तरीका था पर वरुण को कोई और रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था.

सुबह होते ही उस ने नायक सुरजीत को बुलवाया. सुरजीत उस के सामने आया, सैल्यूट मारा और उस ने पूछा, ‘‘जी सर?’’

‘‘सुरजीत, क्या तुम हमारे सामने वाले दुश्मन की टोली से रेडियो द्वारा संपर्क कर सकते हो?’’ वरुण ने उस से पूछा.

सुरजीत थोड़ा चौंका, फिर बोला, ‘‘कर सकते हैं, सर. हमें उन की रेडियो की फ्रीक्वैंसी मालूम है.’’

‘‘तो अभी जा कर उन को यह संदेश भेजो,’’ वरुण ने एक कागज पर लिखा-

‘‘मेजर जमील महमूद, मैं तुम से थोड़ी देर के लिए मिलना चाहता हूं. अगर तुम्हें मंजूर है तो आज दोपहर 3 बजे दोनों मोरचों के बीच चिनार के पेड़ के नीचे मिलो. पौने 3 बजे से 2 घंटे के लिए मैं अपनी तरफ से गोली चलाना बंद करवा दूंगा.’’

सुरजीत ने संदेश पढ़ा. यह स्पष्ट था कि वह कुछ पूछना चाह रहा था, पर फौज के सीनियर अफसर से कोई भी सवाल नहीं करता है. उस ने सैल्यूट मारा और आज्ञा का पालन करने के लिए वहां से चला गया.

2 घंटे बाद वह वरुण के पास वापस आया, ‘‘सर, मेजर जमील आप की बात मान गए गए हैं. वे 3 बजे आप को चिनार के पेड़ के पास मिलेंगे. उन की तरफ से भी 2 घंटे के लिए गोलाबारी बंद रहेगी,’’ उस ने बताया.

ठीक 3 बजे वरुण चिनार के पेड़ के पास पहुंचा. जमील उस का इंतजार कर रहा था. वरुण को देखते ही वह बोल उठा, ‘‘अबे उल्लू के…सौरी मेजर वरुण, मैं भूल गया कि अब हम दुश्मन हैं.’’

‘‘हां यार,’’ वरुण ने जवाब दिया. ‘‘दो दोस्त, बिना चाहे, एकदूसरे पर गोलियां बरसाने जा रहे हैं. हाय रे इंसान की मजबूरियां.’’

‘‘यह दुनिया है कठोर, बेरहम और मतलबी,’’ जमील बोला, ‘‘अगर हमें इस दुनिया में रहना है तो सबकुछ सहना पड़ेगा. पर अब बातें खत्म करो. अगर हमारे सीनियर अफसरों को पता चलेगा कि हम मिले हैं, तो हम दोनों के कोर्ट मार्शल हो जाएंगे. दुश्मन से संपर्क करना गद्दारी मानी जाती है. वैसे, मैं कोशिश करूंगा कि लड़ाई के दौरान तुम मेरे सामने न आओ.’’

‘‘मैं भी ऐसा ही चाहता हूं कि हम दोनों को एकदूसरे पर गोलियां न बरसानी पड़े,’’ वरुण ने जवाब दिया.

‘‘पर जाने से पहले मेरी तुम से एक विनती है,’’ जमील ने आगे कहा, ‘‘अगर मैं तुम से पहले मर जाऊं और हमारे मुल्कों के बीच सुलह हो जाए, तो तुम मेरी कब्र पर आ कर मुझे बता देना कि मुबारक हो जमील, अब हम फिर दोस्त बन सकते हैं.’’

‘‘मैं जरूर ऐसा ही करूंगा,’’ वरुण ने वादा किया, ‘‘काश, मैं भी तुम से ऐसा करने को कह सकता, पर मेरी तो कब्र ही नहीं होगी. अलविदा मेरे दोस्त.’’

‘‘अलविदा मेरे भाई,’’ जमील ने जवाब दिया. और दोनों मेजर घूम कर, बिना पीछे देखे, अपने अपने मोरचे को लौट गए. Hindi Social Story.

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