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Hindi Story : कृष्णिमा

Hindi Story : ऐसा नहीं था कि सोमेश्वर अपने बेटे केदार तथा बहू केतकी के जीवन में वात्सल्य सुख की कामना नहीं करते थे पर अनाथालय से बच्चा गोद लेने का केदार का फैसला उन्हें किसी भी नजरिए से सही नजर नहीं आ रहा था.

‘‘आखिर इस में बुराई क्या है बाबूजी?’’ केदार ने विनीत भाव से बात को आगे बढ़ाया.

‘‘पूछते हो बुराई क्या है? अरे, तुम्हारा तो यह फैसला ही बेहूदा है. अस्पतालों के दरवाजे क्या बंद हो गए हैं जो तुम ने अनाथालय का रुख कर लिया? और मैं तो कहता हूं कि यदि इलाज करने से डाक्टर हार जाएं तब भी अनाथालय से बच्चा गोद लेना किसी भी नजरिए से जायज नहीं है. न जाने किसकिस के पापों के नतीजे पलते हैं वहां पर जिन की न जाति का पता न कुल का…’’

‘‘बाबूजी, यह आप कह रहे हैं. आप ने तो हमेशा मुझे दया का पाठ पढ़ाया, परोपकार की सीख दी और फिर बच्चे किसी के पाप में भागीदार भी तो नहीं होते…इस संसार में जन्म लेना किसी जीव के हाथों में है? आप ही तो कहते हैं कि जीवनमरण सब विधि के हाथों होता है, यह इनसान के वश की बात नहीं तो फिर वह मासूम किस दशा में पापी हुए? इस संसार में आना तो उन का दोष नहीं?’’

‘‘अब नीति की बातें तुम मुझे सिखाओगे?’’ सोमेश्वर ने माथे पर बल डाल कर प्रश्न किया, ‘‘माना वे बच्चे निष्पाप हैं पर उन के वंश और कुल के बारे में तुम क्या जानते हो? जवानी में जब बच्चे के खून का रंग सिर चढ़ कर बोलेगा तब क्या करोगे? रक्त में बसे गुणसूत्र क्या अपना असर नहीं दिखाएंगे? बच्चे का अनाथालय में पहुंचना ही उन के मांबाप की अनैतिक करतूतों का सुबूत है. ऐसी संतान से तुम किस भविष्य की कामना कर रहे हो?’’

‘‘बाबूजी, आप का भय व संदेह जायज है पर बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण में केवल खून के गुण ही नहीं बल्कि पारिवारिक संस्कार ज्यादा महत्त्वपूर्ण होते हैं,’’ केदार बाबूजी को समझाने का भरसक प्रयास कर रहा था और बगल में खामोश बैठी केतकी निराशा के गर्त में डूबती जा रही थी.

केतकी को संतान होने के बारे में डाक्टरों को उम्मीद थी कि वह आधुनिक तकनीक से बच्चा प्राप्त कर सकती है और केदार काफी सोचविचार के बाद इस नतीजे पर पहुंचा था कि लाखों रुपए क्या केवल इसलिए खर्च किए जाएं कि हम अपने जने बच्चे के मांबाप कहला सकें. यह तो केवल आत्मसंतुष्टि तक सोचने वाली बात होगी. इस से बेहतर है कि किसी अनाथ बच्चे को अपना कर यह पैसा उस के भविष्य पर लगा दें. इस से मांबाप बनने का गौरव भी प्राप्त होगा व रुपए का सार्थक प्रयोग भी होगा.

‘केतकी, बस जरूरत केवल बच्चे को पूरे मन से अपनाने की है. फर्क वास्तव में खून का नहीं बल्कि अपनी नजरों का होता है,’ केदार ने जिस दिन यह कह कर केतकी को अपने मन के भावों से परिचित कराया था वह बेहद खुश हुई थी और खुशी के मारे उस की आंखों से आंसू बह निकले थे पर अगले ही क्षण मां और बाबूजी का खयाल आते ही वह चुप हो गई थी. केदार का अनाथालय से बच्चा गोद लेने का फैसला उसे बारबार आशंकित कर रहा था क्योंकि मांबाबूजी की सहमति की उसे उम्मीद नहीं थी और उन्हें नाराज कर के वह कोई कार्य करना नहीं चाहती थी. केतकी ने केदार से कहा था, ‘बाबूजी से पहले सलाह कर लो उस के बाद ही हम इस कार्य को करेंगे.’

लेकिन केदार नहीं माना और कहने लगा, ‘अभी तो अनाथालय की कई औपचारिकताएं पूरी करनी होंगी, अभी से बात क्यों छेड़ी जाए. उचित समय आने पर मांबाबूजी को बता देंगे.’

केदार और केतकी ने आखिर अनाथालय जा कर बच्चे के लिए आवेदनपत्र भर दिया था. लगभग 2 माह के बाद आज केदार ने शाम को आफिस से लौट कर केतकी को यह खुशखबरी दी कि अनाथालय से बच्चे के मिलने की पूर्ण सहमति प्राप्त हो चुकी है. अब कभी भी जा कर हम अपना बच्चा अपने साथ घर ला सकते हैं. भावविभोर केतकी की आंखें मारे खुशी के बारबार डबडबाती और वह आंचल से उन्हें पोंछ लेती. उसे लगा कि लंबी प्रतीक्षा के बाद उस के ममत्व की धारा में एक नन्ही जान की नौका प्रवाहित हुई है जिसे तूफान के हर थपेडे़ से बचा कर पार लगाएगी. उस नन्ही जान को अपने स्नेह और वात्सल्य की छांव में सहेजेगी….संवारेगी.

केदार की धड़कनें भी तो यही कह रही हैं कि इस सुकोमल कोंपल को फूलनेफलने में वह तनिक भी कमी नहीं आने देगा. आने वाली सुखद घड़ी की कल्पना में खोए केतकी व केदार ने सुनहरे सपनों के अनेक तानेबाने बुन लिए थे. आज बाबूजी के हाथ से एक तार खिंचते ही सपनों का वह तानाबाना कितना उलझ गया. केतकी अनिश्चितता के भंवर में उलझी यही सोच रही थी कि मांजी को मुझ से कितना स्नेह है. क्या वह नहीं समझ सकतीं मेरे हृदय की पीड़ा? आज बाबूजी की बातों पर मां का इस तरह से चुप्पी साधे रहना केतकी के दिल को तीर की तरह बेध रहा था.

केदार लगातार बाबूजी से जिरह कर रहा था, ‘‘बाबूजी, क्या आप भूल गए, जब मैं बचपन में निमोनिया होने से बहुत बीमार पड़ा था और मेरी जान पर बन आई थी, डाक्टरों ने तुरंत खून चढ़ाने के लिए कहा था पर मेरा खून न आप के खून से मेल खा रहा था न मां से, ऐसे में मुझे बचाने के लिए आप को ब्लड बैंक से खून लेना पड़ा था. यह सब आप ने ही तो मुझे बताया था. यदि आप तब भी अपनी इस जातिवंश की जिद पर अड़ जाते तो मुझे खो देते न?

‘‘शायद मेरे प्रति आप के पुत्रवत प्रेम ने आप को तब तर्कवितर्क का मौका ही नहीं दिया होगा. तभी तो आप ने हर शर्त पर मुझे बचा लिया.’’

‘‘केदार, जिरह करना और बात है और हकीकत की कठोर धरा पर कदम जमा कर चलना और बात. ज्यादा दूर की बात नहीं, केवल 4 मकान पार की ही बात है जिसे तुम भी जानते हो. त्रिवेदी साहब का क्या हश्र हुआ? बेटा लिया था न गोद. पालापोसा, बड़ा किया और 20 साल बाद बेटे को अपने असली मांबाप पर प्यार उमड़ आया तो चला गया न. बेचारा, त्रिवेदी. वह तो कहीं का नहीं रहा.’’

केदार बीच में ही बोल पड़ा, ‘‘बाबूजी, हम सब यही तो गलती करते हैं, गोद ही लेना है तो उन्हें क्यों न लिया जाए जिन के सिर पर मांबाप का साया नहीं है कुलवंश, जातबिरादरी के चक्कर में हम इतने संकुचित हो जाते हैं कि अपने सीमित दायरे में ही सबकुछ पा लेना चाहते हैं. संसार में ऐसे बहुत कम त्यागी हैं जो कुछ दे कर भूल जाएं. अकसर लोग कुछ देने पर कुछ प्रतिदान पा लेने की अपेक्षाएं भी मन में पाल लेते हैं फिर चाहे उपहार की बात हो या दान की और फिर बच्चा तो बहुत बड़ी बात होती है. कोई किसी को अपना जाया बच्चा देदे और भूल जाए, ऐसा संभव ही नहीं है.

‘‘माना अनाथालय में पल रहे बच्चों के कुल व जात का हमें पता नहीं पर सब से पहले तो हम इनसान हैं न बाबूजी. यह बात तो आप ही ने हमें बचपन में सिखाई थी कि इंसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है. अब आप जैसी सोच के लोग ही अपनी बात भुला बैठेंगे तब इस समाज का क्या होगा?

‘‘आज मैं अमेरिका की आकर्षक नौकरी और वहां की लकदक करती जिंदगी छोड़ कर यहां आप के पास रहना चाहता हूं और आप दोनों की सेवा करना चाहता हूं तो यह क्या केवल मेरे रक्त के गुण हैं? नहीं बाबूजी, यह तो आप की सीख और संस्कार हैं. मैं ने बचपन में आप को व मांजी को जो करते देखा है वही आत्मसात किया है. आप ने दादादादी की अंतिम क्षणों तक सेवा की है. आप के सेवाभाव स्वत: मेरे अंदर रचबस गए, इस में रक्त की कोई भूमिका नहीं है और ऐसे उदाहरणों की क्या कमी है जहां अटूट रक्त संबंधों में पनपी कड़वाहट आखिर में इतनी विषाक्त हो गई कि भाई भाई की जान के दुश्मन बन गए.’’

‘‘देखो, मुझे तुम्हारे तर्कों में कोई दिलचस्पी नहीं है,’’ सोमेश्वर बोले, ‘‘मैं ने एक बार जो कह दिया सो कह दिया, बेवजह बहस से क्या लाभ? और हां, एक बात और कान खोल कर सुन लो, यदि तुम्हें अपनी अमेरिका की नौकरी पर लात मारने का अफसोस है तो आज भी तुम जा सकते हो. मैं ने तुम्हें न तब रोका था न अब रोक रहा हूं, समझे? पर अपने इस त्याग के एहसान को भुनाने की फिराक में हो तो तुम बहुत बड़ी भूल कर रहे हो.’’

इतना कह कर सोमेश्वर अपनी धोती संभालते हुए तेज कदमों से अपने कमरे में चले गए. मांजी भी चुपचाप आदर्श भारतीय पत्नी की तरह मुंह पर ताला लगाए बाबूजी के पीछेपीछे कमरे में चली गईं.

थकेहारे केदार व केतकी अपने कमरे में बिस्तर पर निढाल पड़ गए.

‘‘अब क्या होगा?’’ केतकी ने चिंतित स्वर में पूछा.

‘‘होगा क्या, जो तय है वही होगा. सुबह हमें अपने बच्चे को लेने जाना है, और मैं नहीं चाहता कि इस तरह दुखी और उदास मन से हम उसे लेने जाएं,’’ अपने निश्चय पर अटल केदार ने कहा.

‘‘पर मांबाबूजी की इच्छा के खिलाफ हम बच्चे को घर लाएंगे तो क्या उन की उपेक्षा बच्चे को प्रभावित नहीं करेगी? कल को जब वह बड़ा व समझदार होगा तब क्या घर का माहौल सामान्य रह पाएगा?’’

अपने मन में उठ रही इन आशंकाओं को केतकी ने केदार के सामने रखा तो वह बोला, ‘‘सुनो, हमें जो कल करना है फिलहाल तुम केवल उस के बारे में ही सोचो.’’

सुबह केतकी की आंख जल्दी खुल गई और चाय बनाने के बाद ट्रे में रख कर मांबाबूजी को देने के लिए बाहर लौन में गई, मगर दोनों ही वहां रोज की तरह बैठे नहीं मिले. खाली कुरसियां देख केतकी ने सोचा शायद कल रात की बहसबाजी के बाद मां और बाबूजी आज सैर पर न गए हों लेकिन उन का कमरा भी खाली था. हो सकता है आज लंबी सैर पर निकल गए हों तभी देर हो गई. मन में यह सोचते हुए केतकी नहाने चली गई. घंटे भर में दोनों तैयार हो गए पर अब तक मांबाबूजी का पता नहीं था. केदार और केतकी दोनों चिंतित थे कि आखिर वे बिना बताए गए तो कहां गए?

सहसा केतकी को मांजी की बात याद आई. पिछले ही महीने महल्ले में एक बच्चे के जन्मदिन के समय अपनी हमउम्र महिलाओं के बीच मांजी ने हंसी में ही सही पर कहा जरूर था कि जिस दिन हमारा इस सांसारिक जीवन से जी उचट जाएगा तो उसी दिन हम दोनों ही किसी छोटे शहर में चले जाएंगे और वहीं बुढ़ापा काट देंगे. सशंकित केतकी ने केदार को यह बात बताई तो वह बोला, ‘‘नहीं, नहीं, केतकी, बाबूजी को मैं अच्छी तरह से जानता हूं. वे मुझ पर क्रोधित हो सकते हैं पर इतने गैरजिम्मेदार कभी नहीं हो सकते कि बिना बताए कहीं चले जाएं. हो सकता है सैर पर कोई परिचित मिल गया हो तो बैठ गए होंगे कहीं. थोड़ी देर में आ जाएंगे. चलो, हम चलते हैं.’’

दोनों कार में बैठ कर नन्हे मेहमान को लेने चल दिए. रास्ते भर केतकी का मन बच्चा और मांबाबूजी के बीच में उलझा रहा. लेकिन केदार के चेहरे पर कोई तनाव नहीं था. उमंग और उत्साह से भरपूर केदार के होंठों पर सीटी की गुनगुनाहट ही बता रही थी कि उसे अपने निर्णय पर जरा भी दुविधा नहीं है. केतकी का उतरा हुआ चेहरा देख कर वह बोला, ‘‘यार, क्या मुंह लटकाए बैठी हो? चलो, मुसकराओ, तुम हंसोगी तभी तो तुम्हें देख कर हमारा नन्हा मेहमान भी हंसना सीखेगा.’’

नन्ही जान को आंचल में छिपाए केतकी व केदार दोनों ही कार से उतरे. घर का मुख्य दरवाजा बंद था पर बाहर ताला न देख वे समझ गए कि मां और बाबूजी घर के अंदर हैं. केदार ने ही दरवाजे की घंटी बजाई तो इसी के साथ केतकी की धड़कनें भी तेज हो गई थीं. नन्ही जान को सीने से चिपटाए वह केदार को ढाल बना कर उस के पीछे हो गई.

दरवाजा खुला तो सामने मांजी और बाबूजी खडे़ थे. पूरा घर रंगबिरंगी पताकों, गुब्बारों तथा फूलों से सजा हुआ था. यह सबकुछ देख कर केदार और केतकी दोनों विस्मित रह गए.

‘‘आओ बहू, अंदर आओ, रुक क्यों गईं?’’ कहते हुए मांजी ने बडे़ प्रेम से नन्हे मेहमान को तिलक लगाया. बाबूजी ने आगे बढ़ कर बच्चे को गोद में लिया.

‘‘अब तो दादादादी का बुढ़ापा इस नन्हे सांवलेसलौने बालकृष्ण की बाल लीलाओं को देखदेख कर सुकून से कटेगा, क्यों सौदामिनी?’’ कहते हुए बाबूजी ने बच्चे के माथे पर वात्सल्य चिह्न अंकित कर दिया.

बाबूजी के मुख से ‘बालकृष्ण’ शब्द सुनते ही केदार और केतकी ने एक दूसरे को प्रश्न भरी नजरों से देखा और अगले ही पल केतकी ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘लेकिन बाबूजी, यह बेटा नहीं बेटी है.’’

‘‘तो क्या हुआ? कृष्ण न सही कृष्णिमा ही सही. बच्चे तो प्रसाद की तरह हैं फिर प्रसाद चाहे लड्डू के रूप में मिले चाहे पेडे़ के, होगा तो मीठा ही न,’’ और इसी के साथ एक जोरदार ठहाका सोमेश्वर ने लगाया.

केदार अब भी आश्चर्यचकित सा बाबूजी के इस बदलाव के बारे में सोच रहा था कि तभी वह बोले, ‘‘क्यों बेटा, क्या सोच रहे हो? यही न कि कल राह का रोड़ा बने बाबूजी आज अचानक गाड़ी का पेट्रोल कैसे बन गए?’’

‘‘हां बाबूजी, सोच तो मैं यही रहा हूं,’’ केदार ने हंसते हुए कहा.

‘‘बेटा, सच कहूं तो आज मैं ने बहुत बड़ी जीत हासिल की है. मुझे तुझ पर गर्व है. यदि आज तुम अपने निश्चय से हिल जाते तो मैं टूट जाता. मैं तुम्हारे फैसले की दृढ़ता को परखना चाहता था और ठोकपीट कर उस की अटलता को निश्चित करना चाहता था क्योंकि ऐसे फैसले लेने वालों को सामाजिक जीवन में कई अग्नि परीक्षाएं देनी पड़ती हैं.’’

‘‘समाज में तो हर प्रकार के लोग होते हैं न. यदि 4 लोग तुम्हारे कार्य को सराहेंगे तो 8 टांग खींचने वाले भी मिलेंगे. तुम्हारे फैसले की तनिक भी कमजोरी भविष्य में तुम्हें पछतावे के दलदल में पटक सकती थी और तुम्हारे कदमों का डगमगाना केवल तुम्हारे लिए ही नहीं बल्कि आने वाली नन्ही जान के लिए भी नुकसानदेह साबित हो सकता था. बस, केवल इसीलिए मैं तुम्हें जांच रहा था.’’

‘‘देखा केतकी, मैं ने कहा था न तुम से कि बाबूजी ऐसे तो नहीं हैं. मेरा विश्वास गलत नहीं था,’’ केदार ने कहा.

‘‘बेटा, तुम लोगों की खुशी में ही तो हमारी खुशी है. वह तो मैं तुम्हारे बाबूजी के कहने पर चुप्पी साधे बैठी रही, इन्हें परीक्षा जो लेनी थी तुम्हारी. मैं समझ सकती हूं कि कल रात तुम लोगों ने किस तरह काटी होगी,’’ इतना कह कर सौदामिनी ने पास बैठी केतकी को अपनी बांहों में भर लिया.

‘‘वह तो ठीक है मांजी, पर यह तो बताइए कि सुबह आप लोग कहां चले गए थे. मैं तो डर रही थी कि कहीं आप हरिद्वार….’’

‘‘अरे, पगली, हम दोनों तो कृष्णिमा के स्वागत की तैयारी करने गए थे,’’ केतकी की बातों को बीच में काटते हुए सौदामिनी बोली, ‘‘और अब तो हमारे चारों धाम यहीं हैं कृष्णिमा के आसपास.’’

सचमुच कृष्णिमा की किलकारियों में चारों धाम सिमट आए थे, जिस की धुन में पूरा परिवार मगन हो गया था. Hindi Story

Education Loan के नीचे दबी जिंदगी

Education Loan: तेजी से बदलते सामाजिक आर्थिक परिदृश्य में बच्चों की परवरिश भावनात्मक से अधिक आर्थिक निर्णय बन गई है. भारत में उच्च शिक्षा की बढ़ती लागत, शिक्षा लोन का बढ़ता बोझ और युवा बेरोजगारी ने मध्यवर्गीय परिवारों को संकट में डाल दिया है, जहां सपने पलते तो हैं, पर अकसर कर्ज में दब कर टूट भी जाते हैं.

आज के तेजी से बदलते समाज में, बच्चे पैदा करने और उन्हें पालने का फैसला सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि आर्थिक भी होता जा रहा है. खासकर भारत जैसे विकासशील देश में, जहां जनसंख्या बड़ी है और संसाधन सीमित, युवा बच्चे मातापिता के लिए एक बड़ा सवाल बन गए हैं. भारत में एक बच्चे को जन्म से 18 साल तक पालने की औसत लागत 30 लाख रुपए से 1.2 करोड़ तक हो सकती है, जो ग्रामीण या शहरी क्षेत्र पर निर्भर करता है.

साल 2025 में यह आंकड़ा और बढ़ गया है, जहां शहरी भारत में एक बच्चे को पालने की लागत लगभग रुपए 45 लाख हो गई है. एक रिपोर्ट के अनुसार, जन्म से शादी तक की कुल लागत रुपए 1 करोड़ तक पहुंच सकती है, जिस में शिक्षा, स्वास्थ्य और रहनसहन शामिल हैं. आज कल भविष्य में बड़ी स्पर्धा को देखते हुए लोग प्राइमरी स्तर से ही पढ़ाई पर ध्यान देने लगते हैं. महानगरों में तो प्राइमरी एजुकेशन पर ही एक साल में लाखों रुपए का खर्च आता है.

मध्यमवर्गीय शहरों में प्राइमरी एजुकेशन पर रुपए 5.5 लाख, मिडिल स्कूल पर रुपए 1.6-1.8 लाख प्रति वर्ष, और कुल स्कूली शिक्षा पर रुपए 25-50 लाख खर्च हो सकता है. उच्च शिक्षा के लिए रुपए 15-50 लाख अतिरिक्त लग सकते हैं, और अगर विदेशी शिक्षा हो तो यह आंकड़ा रुपए 5-6 करोड़ तक पहुंच जाता है.

भारतीय समाज में शिक्षा को हमेशा से ही जीवन की आधारशिला माना जाता है. मातापिता अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए हर संभव प्रयास करते हैं, जिस में कर्ज ले कर उन्हें उच्च शिक्षा दिलाना भी शामिल है. लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि “कर्ज ले कर बच्चे पढ़ाए, पर कमाई कोरी” जैसी स्थिति कई परिवारों की सच्चाई बन गई है. यह वाक्यांश उस दर्दनाक सत्य को उजागर करता है जहां मातापिता अपनी संपत्ति गिरवी रख कर या बैंक से लोन ले कर बच्चों को इंजीनियरिंग, मैडिसिन या एमबीए जैसी डिग्रियां दिलाते हैं, लेकिन स्नातक होने के बाद युवा बेरोजगारी या कम वेतन वाली नौकरियों में फंस जाते हैं. परिणामस्वरूप, लोन की किस्तें चुकाने का बोझ परिवार पर पड़ता है, और सपने टूट जाते हैं.

आज कल हर मातापिता अपने बच्चों को डाक्टर या इंजीनियर ही बनाना चाहते हैं. इंजीनियरिंग में तो फिर भी अगर आईआईटी या एमएनआईटी में कठिन प्रतियोगिता के बाद भी प्रवेश नहीं मिला तो तमाम रास्ते निकल आते हैं. सरकारी सीटें भले ही अभ्यर्थी के अनुपात में कम हों, लेकिन प्राइवेट इंजीनियरिंग कालेज की फीस परिवार के बजट के अनुकूल होती है. ऐसे उदाहरण कम ही मिलते हैं जब किसी छात्र का चयन आईआईटी में हो जाए और वह समय पर फीस न जमा कर सके, जैसा कि एक दलित छात्र के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दखल दे कर अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग करते हुए, आईआईटी धनबाद को निर्देश दिया कि वे छात्र को बीटेक कोर्स में प्रवेश दें और उसे उसी बैच में शामिल करें. लेकिन इस के उलट एमबीबीएस में सरकारी मैडिकल कालेजों में सीटें अभ्यर्थियों के अनुपात में बहुत कम होती है और प्राइवेट मैडिकल कॉलेजों की फीस एक करोड़ से ज्यादा होती है. जो आम भारतीय के बस की बात नहीं होती है. ऐसे में अभिभावक बच्चों को विदेश जार्जिया, रुस, बंग्लादेश, फिलिपिंस, उज़्बेकिस्तान, किर्गिस्तान, अर्मेनिया, ईरान, मलेशिया, चीन, बारबेडास आदि कम बजट वाले देशों में एमबीबीएस की डिग्री लेने भेजते हैं.

हांलांकि इन देशों का बजट भी कोर्स पूरा होने तक 25 से 55 लाख तक पहुंच जाता है. ऐसे में लोगों को बैंकों से लोन लेना पड़ता है. यहां तक तो ठीक है लेकिन विदेशी एमबीबीएस की डिग्री के बाद भारत में एफएमजीई (फ़ोरेन मैडिकल ग्रेजुएट्स एग्जामिनेशन) परीक्षा पास करना अनिवार्य होता है. जिस को सब के लिए पास करना मुश्किल होता है. एफएमजीई परीक्षा का उत्तीर्ण प्रतिशत हर बार अलगअलग होता है, लेकिन आम तौर पर यह कम रहता है.

उदाहरण के लिए, जून 2025 के एफएमजीई के लिए उत्तीर्ण प्रतिशत केवल 18.61% था, जिस में 36,034 उम्मीदवारों में से केवल 6,707 ही सफल हुए. कुल मिला कर, यह परीक्षा अपनी कठोरता और मजबूत चिकित्सा ज्ञान की आवश्यकता के कारण कठिन मानी जाती है, और सफलता दर अकसर 16% से 24% के बीच रहती है. हर साल इस में असफल बच्चों की संख्या भी जुड़ जाती है. एक बच्चे को एमबीबीएस की डिग्री के बाद केवल 3-4 अवसर का समय ही बच पाता है. भारत में हर साल ऐसे हजारों मैडिकल ग्रेजुएट रह जाते हैं जो एफएमजीई परीक्षा पास करने का अवसर खो देते हैं. फिर वह बिना मैडिकल काउंसिल में रजिस्ट्रेशन के कम वेतन पर छोटे या गांव के अस्पतालों में काम करने को मजबूर होते हैं. ऐसे वह लाखों रुपए का लोन और उस का ब्याज अदा नहीं कर पाते हैं. जिस से मातापिता को उन के कर्ज का बोझ उठाना पड़ता है.

आज देश की बढ़ती अर्थव्यवस्था में शिक्षा लोन की मांग बढ़ रही है, लेकिन रोजगार की कमी इस निवेश को जोखिम भरा बना रही है. बैंक की ऊंची ब्याज दर और सरकार की अनदेखी से ये बड़ा जोखिम भी साबित हो रहा है.

शिक्षा लोन की वर्तमान स्थिति

भारत में उच्च शिक्षा की लागत लगातार बढ़ रही है, जिस के कारण शिक्षा लोन एक आवश्यकता बन गया है. आरबीआई की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले वर्ष छात्र लोन का कुल कर्ज 90,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है, जिस में सालाना 15% की वृद्धि दर दर्ज की गई है. 2023-24 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 28,699 करोड़ रुपये के शिक्षा लोन वितरित किए. अप्रैल से सितंबर 2024 तक बकाया शिक्षा लोन लगभग अरबों भारतीय रुपये तक पहुंच गया.

सन 2025 में शिक्षा लोन के रुझान बताते हैं कि विदेश में पढ़ाई के लिए लोन की मांग बढ़ रही है. एक रिपोर्ट के अनुसार, साल 2025 के अंत तक भारतीय छात्र विदेशी शिक्षा पर लगभग 70 अरब डौलर खर्च करेंगे. बाजार का आकार 130 अरब डौलर तक पहुंचने का अनुमान है, जिस में 12% की वार्षिक मुद्रास्फीति दर है. स्टेट बैंक औफ इंडिया जैसे बैंक विदेशी शिक्षा के लिए 9.15% से 11.65% की ब्याज दरों पर लोन प्रदान कर रहे हैं. हालांकि, ये लोन मुख्य रूप से मध्यम और निम्न वर्ग के परिवारों द्वारा लिए जाते हैं, जहां मातापिता गारंटर बनते हैं.

एक अध्ययन से पता चलता है कि शिक्षा लोन गरीब और एससी/एसटी समुदायों पर सकारात्मक प्रभाव डालते हैं, लेकिन अनौपचारिक रूप से कुछ बैंक छात्रों से सुरक्षा मांगते हैं. ऐसे तमाम उदाहरण हैं जब शिक्षा कर्ज के बोझ तले उम्मीदें दफ्न हो गई. लोगों की छत तक छिन गई और किराए के मकान में जिंदगी बसर करने के लिए विवश होना पड़ा. बिजनेस भी डूबते देखा है, लेकिन फिर मिडिल क्लास के लिए बच्चों की उच्च शिक्षा का सपना आज भी कर्ज ही है. इस में सरकार की भूमिका कहीं राहत भरी नहीं दिखाई देती है. सरकार धन कुबेरों, बड़े उद्योगपतियों और बड़े कर्जदार के लिए नियम बना कर राहत देती है यहां तक अरबों के कर्ज माफ भी हो जाते हैं. लेकिन शिक्षा कर्ज ले कर देश और समाज की सेवा करने का सपना देखने वालों के सपने आसानी से कुचल जाते हैं और किसी के कान पर जूं तक नहीं रेंगती है. क्या यही दुरुस्त व्यवस्था है?

मध्य प्रदेश के रीवा शहर के एक परिवार ने बच्ची को यूक्रेन में एमबीबीएस की पढ़ाई के लिए लोन लिया था. रूस से जंग होने के बाद वहां से वापस आना पड़ा, अभी तक उस का और परिजनों का डाक्टर बनने का सपना पूरा नहीं हो सका है. कर्ज की किश्तों का बोझ अलग है.

युवा बेरोजगारी: सपनों का हत्यारा

शिक्षा लोन का उद्देश्य बेहतर रोजगार सुनिश्चित करना है, लेकिन भारत में युवा बेरोजगारी एक बड़ी समस्या है. वैसे बेरोजगारी के अधिकृत आंकड़े अब कम ही उपलब्ध कराए जाते हैं. फिर भी एक आंकड़े के अनुसार जुलाई 2025 में बेरोजगारी दर 5.2% दर्ज की गई, जो जून से कम है. हालांकि, 15-24 वर्ष की आयु वर्ग में युवा बेरोजगारी दर 10.2% है, जो वैश्विक औसत 13.3% से कम है लेकिन अभी भी चिंताजनक है.

अप्रैल 2025 में 15-29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी दर 13.8% थी, जिस में शहरी क्षेत्रों में 17.2% और ग्रामीण में 12.3%.पीएलएफएस (पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे) के जून 2025 के आंकड़ों से पता चलता है कि बेरोजगारी दर 5.6% तक बढ़ गई. मई 2025 में यह 5.6% थी, जो अप्रैल से बढ़ी. केरल जैसे राज्यों में युवा बेरोजगारी 25.7% तक है. तेजी से बढ़ती जनसंख्या, अपर्याप्त शिक्षा, कौशल की कमी, वित्तीय सीमाएं और प्रणालीगत मुद्दे इस के मुख्य कारण हैं. इस स्थिति में, डिग्रीधारी युवा या तो बेरोजगार रहते हैं या कम वेतन वाली नौकरियों में काम करते हैं, जिस से लोन चुकाना मुश्किल हो जाता है.

मातापिता पर पड़ने वाला प्रभाव

शिक्षा लोन का सब से बड़ा बोझ मातापिता पर पड़ता है, जो अकसर सह-आवेदक या गारंटर बनते हैं. यदि छात्र ईएमआई समय पर नहीं चुका पाता, तो मातापिता का क्रेडिट स्कोर प्रभावित होता है. बैंक आरबीआई से अनुरोध कर रहे हैं कि मातापिता के अन्य लोन डिफौल्ट होने पर शिक्षा लोन को एनपीए न माना जाए.

एक अध्ययन के अनुसार, लोन चुकाने का पैटर्न छात्रों या माता-पिता पर बोझ बन जाता है. हालांकि, लाभ भी हैं जैसे लोन पुस्तकालय शुल्क, प्रयोगशाला शुल्क, ट्यूशन, परीक्षा लागत, हौस्टल शुल्क आदि कवर करता है. मातापिता लोन के दौरान ब्याज भुगतान पर 1% की छूट पा सकते हैं यदि समय पर चुकाया जाए. फिर भी, कई परिवार कर्ज के जाल में फंस जाते हैं. सूदखोरों से उधार लेना आसान लगता है, लेकिन उच्च ब्याज दरें (बैंकिंग विशेषज्ञों के अनुसार) स्थिति बिगाड़ देती हैं. मध्यम वर्ग का जाल यही है जहां कमाई बढ़ाने की बजाय खर्च बढ़ जाते हैं.

इस समस्या के कारण

शिक्षा की गुणवत्ता और कौशल की कमी, कई कालेज डिग्री तो देते हैं, लेकिन बाजार की मांग के अनुरूप कौशल नहीं. परिणामस्वरूप, स्नातक रोजगार योग्य नहीं होते. रोजगार बाजार की स्थिति, तेज आर्थिक विकास के बावजूद नौकरियां सीमित हैं. आईएलओ के अनुसार, युवा बेरोजगारी वैश्विक समस्या है, लेकिन भारत में जनसंख्या दबाव अधिक है. उच्च शिक्षा लागत, निजी कालेजों में फीस लाखों में है, जिस से लोन अनिवार्य हो जाता है. सामाजिक दबाव, मातापिता बच्चों को डाक्टर या इंजीनियर बनाने के लिए कर्ज लेते हैं, बिना बाजार की वास्तविकता पर विचार किए.

समाधान के रास्ते

ऐसा नहीं है कि इस के समाधान के रास्ते भी हैं. इस के लिए कौशल-आधारित शिक्षा सरकार और संस्थान व्यावहारिक कौशल पर जोर दें, जैसे वोकेशनल ट्रेनिंग. सरकारी योजनाएं शिक्षा लोन पर सब्सिडी बढ़ाएं, जैसे मेरिटोरियस छात्रों के लिए कोलेटरल-फ्री लोन. रोजगार सृजन के लिए स्टार्टअप और एमएसएमई को प्रोत्साहन दे कर नौकरियां बढ़ाएं. वित्तीय साक्षरता के लिए मातापिता और छात्रों को लोन के जोखिमों के बारे में शिक्षित करें.

यदि मातापिता फीस वहन कर सकते हैं, तो लोन सोचसमझ कर लें. साथ ही विकल्प के तौर पर स्कौलरशिप और पार्ट-टाइम जौब्स को प्रोत्साहित करें. भारतीय समाज में शिक्षा को हमेशा से ही जीवन की आधारशिला माना जाता है. मातापिता अपने बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए हर संभव प्रयास करते हैं, जिस में कर्ज ले कर उन्हें उच्च शिक्षा दिलाना भी शामिल है. लेकिन आज की वास्तविकता यह है कि “कर्ज ले कर बच्चे पढ़ाए, पर कमाई कोरी” जैसी स्थिति कई परिवारों की सच्चाई बन गई है.

यह वाक्यांश उस दर्दनाक सत्य को उजागर करता है जहां मातापिता अपनी संपत्ति गिरवी रख कर या बैंक से लोन ले कर बच्चों को इंजीनियरिंग, मैडिसिन या एमबीए जैसी डिग्रियां दिलाते हैं, लेकिन स्नातक होने के बाद युवा बेरोजगारी या कम वेतन वाली नौकरियों में फंस जाते हैं. परिणामस्वरूप, लोन की किस्तें चुकाने का बोझ परिवार पर पड़ता है, और सपने टूट जाते हैं. बेशक “कर्ज ले कर बच्चे पढ़ाए, पर कमाई कोरी” की स्थिति भारतीय परिवारों के लिए एक चेतावनी है. शिक्षा निवेश है, लेकिन बिना योजना के यह बोझ बन सकती है.

2025 में, जब अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, तो शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई को पाटना जरूरी है. मातापिता को सतर्क रहना चाहिए, और सरकार को नीतियां बनानी चाहिए ताकि शिक्षा सपनों को साकार करे, न कि कर्ज का जाल बने. युवा बेरोजगारी अभी भी एक चुनौती है.

मातापिता को सतर्क रहना चाहिए, और सरकार को नीतियां बनानी चाहिए ताकि शिक्षा सपनों को साकार करे, न कि कर्ज का जाल बने. शिक्षा और कमाई अलग नहीं हैं सही दिशा में प्रयास से दोनों संभव हैं. Education Loan

Banking Law: चैक बाउंस केसों में अब होगा सुधार ?

Banking Law: हमारे देश की सब से बड़ी विडंबना यह है कि पूरा सिस्टम कोर्ट पर निर्भर होता जा रहा है. हमारी न्याय व्यवस्था की सब से बड़ी खासियत यह है कि जब कोई उस के पास पहुंच जाता है तो उस की बात को सुनती है और जरूरत पड़ने पर कानून के अनुसार उस की व्याख्या भी करती है. इस का परिणाम यह हुआ कि जो काम दूसरी संस्थाओं को करना चाहिए उस के लिए भी लोग सुप्रीम कोर्ट तक आ जाते हैं. इस तरह का एक काम है चैक बांउस होने के बाद पैसों की वापसी का. यह काम बैंक या ज्यादा से ज्यादा जिलों में बनी अदालतों में हो जाना चाहिए. यह मसले भी सुप्रीम कोर्ट तक आने लगे हैं.

नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट यानी परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 138 के अनुसार अगर कोई चैक बाउंस हो जाए तो प्राप्तकर्ता यानि वह व्यक्ति जिसे चैक दिया गया था, बैंक से चैक वापसी मेमो प्राप्त करने के बाद चैक जारीकर्ता यानी चैक काटने वाले व्यक्ति, को कानूनी नोटिस भेज सकता है. इस नोटिस में भुगतान के लिए 15 दिनों का समय दिया जाता है. यदि 15 दिनों के बाद भी भुगतान नहीं मिलता है, तो प्राप्तकर्ता को मजिस्ट्रेट के पास नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट के तहत शिकायत दर्ज करानी होगी. यह एक दंडनीय अपराध है जिस के लिए जारीकर्ता को जुर्माना या जेल की सजा हो सकती है.

पूरे देश में इस तरह के मामले बढ़ गए. कई मामले सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंचने लगे. सुप्रीम कोर्ट ने मई, 2022 में अपने आदेश में एक पायलट प्रोग्राम बनाने को कहा था. जिस के तहत पांच राज्यों महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात, उत्तर प्रदेश और राजस्थान में सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों की सहायता से 25 विशेष अदालतें गठित करने का निर्देश दिया गया था. इन का काम चैक बाउंस से होने वाले विवादों को हल करने का था जिस से यह काम जल्दी हो जाए. मामले कोर्ट पर बोझ न बने जिस से दूसरे जरूरी मुकदमों को निपटाने का समय मिल सके.

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चैक बाउंस मामलों के निपटारे में तेजी लाने के लिए उठाए गए कदमों पर 6 सप्ताह के भीतर आवश्यक स्थिति रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है. यह रिपोर्ट नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट की धारा 138 खाते में धनराशि की कमी आदि के कारण चैक का भुगतान नहीं होने से संबंधित है. अब सुप्रीम कोर्ट 5 राज्यों में पायलेट प्रोजेक्ट के परिणामों को देखते हुए इस को पूरे देश में लागू कर सकती है. इस से चैक बाउंस केसों को निपटाने में मदद मिलेगी. कोर्ट ने बैंकों से नए तरह से काम करने को कहा है.

क्या कम हो सकेंगे कोर्ट के चक्कर

इस का पहला लाभ यह होगा कि बारबार कोर्ट जाने की झंझट खत्म हो जाएगा. पहले चैक बाउंस होने पर शिकायत दर्ज करवाने के लिए पीड़ित को कई बार अदालत में पेश होना पड़ता था. तारीख पर तारीख मिलती थी, दस्तावेजों की जांच होती थी और वकीलों की फीस अलग से देनी पड़ती थी. पूरी प्रक्रिया महीनों या सालों तक खिंच जाती थी. अब केवल बैंक से प्राप्त मूल दस्तावेज और रिटर्न रिपोर्ट के आधार पर ही मामला दर्ज किया जा सकेगा. इससे न्याय प्रक्रिया तेज होगी और पीड़ित को कोर्ट के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे.

अब डिजिटल दस्तावेजों को भी मान्यता मिल गई है. शिकायतकर्ता अब औनलाइन दस्तावेज अपलोड कर के भी केस दर्ज कर सकता है. यह सुविधा खासकर उन लोगों के लिए उपयोगी है जो दूर दराज के इलाकों में रहते हैं या जिन के पास बारबार कोर्ट आने का साधन नहीं है. डिजिटल प्रक्रिया से समय और पैसा दोनों की बचत होगी. साथ ही पूरी प्रक्रिया पारदर्शी और सरल बनेगी.

व्यापारियों के लिए चैक का उपयोग बहुत आम है. लेकिन जब चैक बाउंस होता है तो उन्हें आर्थिक नुकसान के साथ साथ कानूनी परेशानियों का भी सामना करना पड़ता है. लंबे समय तक कोर्ट के चक्कर लगाने से उन का व्यापार प्रभावित होता है. अब व्यापारी आसानी से डिजिटल तरीके से शिकायत दर्ज करा सकते हैं. अब चैक बाउंस का मामला दर्ज करने के लिए स्पष्ट और वैध बैंक दस्तावेज जरूरी होंगे. इससे फर्जी या झूठे मामलों की संभावना कम होगी. साथ ही आरोपी पक्ष पर भी समय पर भुगतान करने का दबाव रहेगा.

आरोपियों के लिए भी चेतावनी है. अब वे यह सोचकर भुगतान टाल नहीं पाएंगे कि केस अदालत में सालों तक चलेगा. डिजिटल प्रमाणों के आधार पर तुरंत केस दर्ज होगा और त्वरित सुनवाई भी होगी. इस से आरोपी पर समयबद्ध भुगतान का दबाव बनेगा और वित्तीय लेन देन में अनुशासन बढ़ेगा.

शिकायत दर्ज करने की प्रक्रिया

सब से पहले बैंक से चैक की रिटर्न रिपोर्ट प्राप्त करें. सभी जरूरी दस्तावेज इकट्ठा करें. औनलाइन पोर्टल या न्यायिक वेबसाइट पर जा कर डिजिटल तरीके से शिकायत दर्ज करें. दस्तावेज अपलोड करें और केस दर्ज हो जाएगा. इस प्रक्रिया में आप को बारबार कोर्ट जाने की जरूरत नहीं होगी. डिजिटल माध्यम से केस दर्ज करने की सुविधा उपलब्ध होगी. छोटे व्यापारियों को बड़ा सहारा मिलेगा. आरोपी पर समय पर भुगतान करने का दबाव रहेगा. अदालतों पर केसों का बोझ कम होगा. आम लोगों को त्वरित और आसान न्याय मिलेगा. Banking Law

Dark Cinema: सिनेमाई अंधेरे की चमक – डार्क फिल्मों का बढ़ता असर

Dark Cinema: आदर्शवादी फिल्मों का दौर बहुत समय पहले खत्म हो गया, जिन में हीरोहीरोइन एकदूसरे की मोहब्बत में जान तक दे देते थे. उस तरह की फिल्म में प्रेम में जकड़ा प्रेमी अपनी प्रेमिका को पाने के लिए सारी दुनिया से टकरा जाता था. वह सरहदें तोड़ कर अपने प्रेम को वापस ले आता था. उन फिल्मों में विलेन हीरो के हाथों पिटता था और कभीकभी अंत में मारा जाता था. उस दौर में ऐसी फिल्में भी आईं जिन में देशप्रेम जबरदस्त तरीके से मौजूद था, जिन में जवान (हीरो) देश की खातिर जान की बाजी लगा देता और तिरंगे में लिपट कर अपने गांव वापस लौटता था. तब गांव वालों की छाती गर्व से चौड़ी हो जाती थी. आदर्शवादी फिल्मी कलमकारों ने परिवार की एकजुटता और प्रेम को भी खूब गढ़ा. फिल्म में हीरो या हीरोइन के मातापिता, बड़ा भाई या बहन उन के लिए आदर्श थे. उन का कहा पत्थर की लकीर होती थी. सच्चाई, प्रेम, आदर्श, कठोर श्रम, दुख के भावों से ओतप्रोत आदर्श फिल्मों का दौर अब शायद ही कभी लौट कर आए.

अब जमाना डार्क फिल्मों का है. ऐसी फिल्में जिन में कुछ भी खालिस नहीं है. कुछ भी आदर्श नहीं है. कुछ भी खरा नहीं है. सचझूठ, अच्छाबुरा, खराखोटा, हीरोविलेन सब गड्डमड्ड है. जिन में गलत काम करने वाला भी हीरो बन जाता है. जिन में जेल में बंद क़ैदी के प्रति सहानुभूति पैदा कराई जा रही है. जिन में कालेधंधे में सिर से नख तक डूबा व्यक्ति फिल्म का हीरो है. जनता के बीच गोली चलाने वाला वीर है. कुल जमा यह कि आज की ‘डार्क फिल्में’ वे हैं जिन की कहानियां सामान्य मनोरंजन, हीरोहीरोइन के प्रेम या हीरोविलेन की सीधी लड़ाई से हट कर, गहरे और असहज विषयों को छूती हैं, जैसे हिंसा, अपराध, मानसिक अंधकार, सामाजिक सड़न, नैतिक द्वंद्व, झूठ और इंसानी कमजोरी आदि.

डार्क हिंदी फिल्में वो मानी जाती हैं जिन में माहौल उदास, रहस्यमय, हिंसक या मनोवैज्ञानिक तौर पर भारी हो. इन में अपराध, धोखा, मानसिक तनाव, अस्तित्व का संकट और समाज का काला पहलू दिखाया जाता है. ये फिल्में पसंद भी खूब की जा रही हैं क्योंकि समाज का स्वरूप ही अब कुछ वैसा सा है. फिल्में समाज का आईना होती हैं. आज का समाज पहले से ज्यादा तनावपूर्ण और जटिल है, इसलिए फिल्में भी वैसी ही हैं.

जिन दिनों आदर्शवादी, कलात्मक फिल्में बना करती थीं, समाज का रंगरूप भी कुछ वैसा ही था. आज जिन के पास दो नंबर का पैसा नहीं है, उन की कोई पूछ नहीं है. लिहाजा, फिल्मों में भी इस बात को कुछ गलत नहीं समझा जाता है. जैसेजैसे समाज में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, हिंसा, असमानता, रिश्तों का टूटना और अकेलापन बढ़ा है, तो दर्शक भी अब ‘मीठे झूठ’ यानी हैप्पी एंडिंग के बजाय कड़वा सच स्क्रीन पर देखना चाहते हैं.

पहले लोग ज्यादा मनोरंजन, गाने और रोमांस देखने के लिए थिएटर का रुख करते थे. अब वे ‘रियलिस्टिक कंटैंट’ चाहते हैं, जहां इंसानी मनोविज्ञान, अंधेरा पक्ष और ग्रे शेड्स दिखाई दें. ओटीटी प्लेटफौर्म्स जैसे नेटफ्लिक्स, प्राइम, हौटस्टार ने भी डार्क कंटैंट को लोकप्रिय बना दिया है. क्राइम, थ्रिलर और मिस्ट्री वाले जौनर आज के लोगों को ज्यादा खींचते हैं क्योंकि लोग अपने आसपास ऐसी ही चीजें होती देख रहे हैं. जब वे उन चीजों को स्क्रीन पर देखते हैं तो खुद को उस से कनैक्ट कर पाते हैं. डार्क फिल्में सस्पैंस और रोमांच से भरपूर होती हैं.

हिंदी फिल्मों पर ग्लोबल सिनेमा का असर भी बहुत पड़ा है. हौलीवुड और कोरियन सिनेमा जैसे जोकर, पैरासाइट, स्क्विड गेम का असर हिंदी फिल्मों में दिखता है. वहां की डार्क और रियलिस्टिक स्टोरीज को देख कर भारतीय मेकर्स भी उसी तरह के प्रयोग करने लगे हैं. वहीं कलात्मक और आदर्श फिल्मों के जमाने में जहां एकएक सेट तैयार करने में लाखों रुपए खर्च हो जाते थे, फिल्म पूरी करने में लंबा वक्त लगता था, रातोंदिन शूटिंग होती थी और तब कहीं जा कर करोड़ों की फिल्म रंगीन परदे पर उतरती थी. कई निर्देशक-प्रोड्यूसर तो इस चक्कर में कंगाल हो गए और अपना सबकुछ लुटा बैठे. वहीं आज की डार्क फिल्में छोटे बजट में, कम समय में बन कर अच्छा बिजनैस कर लेती हैं. न कोई बड़ा सेट लगाना, न कोई बड़ा तामझाम. कुछ फिल्में तो ऐसी हैं जो एक कमरे के अंदर ही पूरी शूट हो गईं. अनेक फिल्में ऐसी हैं जिन में एक भी गीत नहीं है. इन फिल्मों को ‘फैस्टिवल सिनेमा’ और ‘क्रिटिक्स’ दोनों का अच्छा सपोर्ट भी मिलता है. कहा जा सकता है कि डार्क फिल्में आज के दौर की हकीकत और दर्शकों की मानसिकता दोनों का नतीजा हैं, इसलिए सफल हैं.

कुछ बेहतरीन डार्क फिल्मों की बात करें तो 1998 में आई राम गोपाल वर्मा की फिल्म ‘सत्या’ ने खूब धमाल मचाया था. मुंबई अंडरवर्ल्ड पर बनी इस फिल्म का हीरो क्रिमिनल होते हुए भी सब का चहेता बन गया. भीखू महात्रे को भी लोगों ने खूब पसंद किया जबकि वह एक हार्डकोर क्रिमिनल था, दूसरी तरफ उस का परिवार भी था, वह अपनी पत्नी को खूब प्यार करता था, पार्टियों में जम कर डांस करता था. वहीं फिल्म का हीरो ‘सत्य’ एक हत्यारा होते हुए भी प्रेम के रस में डूबा हुआ ऐसा प्रेमी था जो अपनी प्रेयसी को सबकुछ सचसच बता देना चाहता था. दरअसल, उस फिल्म में अच्छाईबुराई का कोई साफ फर्क नहीं था. अंत में भीखू महात्रे भी अपने ही गैंग के हाथों मारा जाता है और सत्या भी पुलिस के हाथों मारा जाता है. मगर ये क्रिमिनल्स दर्शकों के दिलों में हीरो के तौर पर चस्पां हो जाते हैं.

इसी तरह 1999 में आई ई. निअवास की फिल्म ‘शूल’ एक डार्क फिल्म है, जिस में राजनीति और अपराध का काला खेल देखने को मिलता है. विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘मकबूल’ 2003 में आई थी. शेक्सपियर के नौवेल ‘मेकबेथ’ पर आधारित यह फिल्म अपराध और लालच की अंधेरी दुनिया को उजागर करती है. ब्लौकबस्टर फिल्म ‘ओमकारा’ 2006 में आई जिस को विशाल भारद्वाज ने डायरैक्ट किया. इस की कहानी ‘ओथेलो’ पर आधारित, जलन और धोखे से जन्मी बरबादी की कहानी है.

2007 में अनुराग कश्यप की ‘ब्लैक फ्राइडे’ आई, जो 1993 मुंबई बम धमाकों पर आधारित, बेहद यथार्थवादी और कठोर फिल्म थी. इस ने भी बौक्स औफिस पर तहलका मचाया. अनुराग कश्यप ने ही 2009 में एक और डार्क फिल्म दी ‘देव डी’ जो देवदास का नया वर्जन थी, जिस का हीरो नशे में डूबा मगर एक आत्मविश्वासी व्यक्ति था.

‘गैंग्स औफ वासेपुर’ जैसी धमाकेदार फिल्म को कौन भूल सकता है. इस फिल्म को भी अनुराग कश्यप ने डायरैक्ट किया. 2012 में आई यह फिल्म झारखंड के कोयला माफिया और गैंगवार पर दो भाग में बनी मल्टीस्टारर डार्क सागा थी, जिस में जम कर खूनखराबा, गालीगलौच, बदला और सत्ता की राजनीति को दर्शाया गया. नकारात्मक रोल में भी इस फिल्म के कलाकारों- मनोज बाजपेई, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, पियूष मिश्रा, ऋचा चड्ढा, हुमा कुरैशी, पंकज त्रिपाठी, राजकुमार राव आदि ने दर्शकों के दिल पर गहरी छाप छोड़ी.

2018 में श्रीराम राघवन की फिल्म ‘अंधाधुन’ ब्लैक कौमेडी और थ्रिलर का डार्क मिश्रण थी, तो 2015 में मेघना गुलजार ने बहुचर्चित आरुषि हत्याकांड पर फिल्म ‘तलवार’ बनाई जिस में सच और झूठ की सीमाएं धुंधली हो जाती हैं. जातिवाद और सामाजिक अंधकार को उजागर करने वाली डार्क फिल्म ‘आर्टिकल 15’ 2019 में आई. इस फिल्म को अनुभव सिन्हा ने बनाया. जातिवाद और सामाजिक अंधकार को उजागर करने वाली यह एक डार्क फिल्म थी. हौरर व सुपरनैचुरल डार्क सिनेमा की बात करें तो 2018 में आई परिणीति चोपड़ा अभिनीत फिल्म ‘परी’ पारंपरिक हौरर से हट कर डार्क और विचलित करने वाली फिल्म थी.

वहीं 2018 में ही फिल्म ‘तुम्बाड’ रिलीज हुई जो लालच, भय और लोककथा का डार्क फैंटेसी रूप था. घरेलू हिंसा और बदले की ब्लैक कौमेडी 2022 में फिल्म ‘डार्लिंग्स’ में प्रदर्शित हुई. और इसी वर्ष आई फिल्म ‘मोनिका, ओ माय डार्लिंग’ जो क्राइम और ब्लैक ह्यूमर से भरी हुई थी.

डार्क फिल्मों की ख़ास बात यह है कि इन में कहानी का टोन थोड़ा भारी, गंभीर और निराशाजनक होता है. इस की विषयवस्तु में अपराध, भ्रष्टाचार, मानसिक बीमारियां, हिंसा, सैक्स, नशा आदि का मिश्रण होता है, जो समाज के कुरूप चेहरे को सामने लाता था. इन फिल्मों के पात्र न तो पूरी तरह हीरो हैं, और न पूरी तरह विलेन, बल्कि ये पात्र इंसानी कमजोरियों से भरे हुए हैं जैसा कि हमारे समाज में लोग हैं. डार्क फिल्मों का अंत कई बार अधूरा, कड़वा या नकारात्मक होता है, यानी इन में हैपी एंडिंग नहीं होती और इसीलिए दर्शक भारी मन के साथ थियेटर से बाहर आता है और देर तक उन दृश्यों के बारे में सोचता रहता है, जो उस की अपनी जिंदगी से काफी मेल खाते हैं. Dark Cinema

India China Relations: चीन से संबंध दुश्मनी और दोस्ती क्या दोनों चलेंगी

India China Relations : अमेरिका और भारत की खींचतान अब नहीं बल्कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने से ही शुरू हो गई थी. वही ट्रंप जो कभी प्रधानमंत्री मोदी के जिगरी दोस्त कहे जाते थे. बेशक यह दो देशों की नहीं बल्कि उन के शीर्ष नेताओं की अकड़ है जिसे दोनों देशों की जनता भुगत रही है. मगर इस का त्वरित अंजाम भारत का चीन के करीब आने का दांव समझ से परे है. यह वही चीन है जिसे हमारा प्रतियोगी माना जाता है. आखिर चीन के करीब जा कर भारत क्या हासिल कर पाएगा?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर असर डाला है. ट्रंप के टैरिफरूपी बम ने वैश्विक व्यापार को तो अस्थिर किया ही है, कई देशों के सामने एकदूसरे के नजदीक आने की मजबूरी भी पैदा की है, जो पहले कई मसलों पर एकदूसरे के विरोधी रहे हैं. अमेरिकी टैरिफ नीति के चलते भारत अपने प्रतिद्वंद्वी चीन के आगे दोस्ती का हाथ बढ़ाने के लिए मजबूर दिख रहा है. मोदी सरकार को लग रहा है कि यदि वे चीन के साथ सहयोग बढ़ाएंगे तो शायद वे अमेरिकी दबाव को संतुलित कर लेंगे लेकिन शायद वे भूल गए कि चीन के साथ हमारा भू-राजनीतिक तनाव, सुरक्षा चुनौतियां और एशिया में रणनीतिक वर्चस्व की होड़ लंबे समय से जारी है.

दोनों देशों में एकदूसरे के प्रति घोर अविश्वास भी है और चीन की हमारे दुश्मन देश पाकिस्तान से नजदीकियां भी हमारे लिए नुकसानदायक साबित होती रही हैं. ऐसे में भारत ट्रंप के टैरिफ से डर कर चीन से गलबहियां करने लगे तो यह कोई अच्छी सम?ा की निशानी नहीं है. इस ‘दोस्ती’ से जहां अमेरिका के साथ हमारी बात पूरी तरह बिगड़ जाएगी वहीं व्यापार के मामले में चीन को फायदा होगा जबकि भारत को नुकसान ही होगा. भारत और चीन के रिश्तों में मजबूती और विश्वास पैदा होना बिलकुल अविश्वसनीय बात है. सवाल यह भी है कि क्या चीन ने पूर्वी लद्दाख में 5 साल से कब्जाए क्षेत्र को खाली कर दिया है? जवाब है नहीं. तो फिर, बीजिंग के साथ नई दिल्ली का व्यवहार सामान्य और मजबूत कैसे हो सकता है?

किसी भी स्थिति में पाकिस्तान का सदाबहार साथी चीन भारत के लिए कभी भी इतना उदार नहीं होगा कि वह अमेरिका से होने वाले भारतीय निर्यात के नुकसान की भरपाई कर सके. केवल यूरोपीय संघ ही ऐसा कर सकता है, लेकिन उस में भी अच्छाखासा वक्त लगेगा और मोदी ब्रुसेल्स के साथ आर्थिक संबंधों को उस स्तर पर ले जाने के करीब भी नहीं हैं.

अमेरिका है भारत का बड़ा ट्रेड पार्टनर

गौरतलब है कि पिछले 4 सालों से अमेरिका भारत का सब से बड़ा ट्रेड पार्टनर रहा है. 2024-25 में भारत का अमेरिका के साथ द्विपक्षीय व्यापार 131.84 अरब डौलर का था. मगर अब अमेरिका में प्रवेश करने वाले भारतीय सामान पर 50 फीसद का टैरिफ भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा झटका है. मोदी सरकार ने इस बाबत पहले से कोई तैयारी नहीं की थी जबकि राष्ट्रपति के रूप में अपने पहले कार्यकाल के दौरान ट्रंप के अनिश्चित व्यवहार को देखते हुए कई देशों ने अपने निर्यात में विविधता लानी शुरू कर दी थी और उन्होंने नए बाजार देख लिए थे. मोदी को ऐसी कोई युक्ति नहीं सू?ा क्योंकि वे तो ट्रंप के साथ कभी खत्म न होने वाली दोस्ती के सपने में खोए हुए थे.

अब अगर अमेरिका के साथ इतना बड़ा व्यापार बाधित होता है तो भारत की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ना लाजिमी है. ऐसे में भारत के सामने 2 विकल्प हैं, पहला कि वह अमेरिका के साथ संबंध सुधारे और दूसरा, वह नए बाजार की तलाश करे. फिलहाल मोदी सरकार ने दूसरे विकल्प को चुना है. उस ने अमेरिका से संबंध सुधारने के बजाय चीन की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा दिया है.

ब्लूमबर्ग ने अपनी एक रिपोर्ट में लिखा है, ‘‘अमेरिका दुनिया की सब से बड़ी अर्थव्यवस्था है और चीन दूसरे पायदान पर है. भारत भी एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है. ऐसे में अमेरिका और चीन दोनों से भारत को अच्छे संबंध रखने चाहिए. भारत अगर डिप्लोमैसी के बदले अमेरिका के सामने ?ाकने से इनकार करना चुनता है तो उसे अपना सब से बड़ा ट्रेड पार्टनर और दुनिया का सब से बड़ा कंज्यूमर मार्केट खोना पड़ सकता है.

‘‘चीन के साथ भाईचारा बढ़ाना या देश में आर्थिक सुधार जैसे कदम अच्छे हैं लेकिन इस से अमेरिका की जगह की भरपाई नहीं हो पाएगी.’’ अमेरिका की अर्थव्यवस्था 35 से 40 ट्रिलियन डौलर है, चीन की 19 से 20 और भारत की 4 ट्रिलियन डौलर के आसपास. ट्रंप की नाराजगी

ट्रंप की नाराजगी दरअसल निजी है और उन का निशाना मोदी हैं लेकिन इस का असर भारत देश पर पड़ा है. ट्रंप इस बात से नाराज हैं कि मोदी सितंबर 2024 में अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान उन से मिलने नहीं गए. इस साल फरवरी में ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति चुने जाने पर पहले तो मोदी को इनविटेशन ही नहीं मिला, बाद में मोदी ने दोस्ती निभाने की कोशिश की और वे व्हाइट हाउस भी गए, लेकिन इस का कोई फायदा नहीं हुआ. इस के बाद पाकिस्तान के साथ हुई सैन्य ?ाड़प के बाद जब मोदी ने संघर्ष विराम कराने में अमेरिकी राष्ट्रपति की भूमिका होने की बात नहीं मानी तो ट्रंप का अहं आहत हो गया.

ट्रंप ने 2 दर्जन से ज्यादा बार यह कहा कि भारत व पाक युद्ध उन के कारण रुका, मगर मोदी ने एक बार भी यह बात स्वीकार नहीं की. जबकि, पाकिस्तान ने मोदी द्वारा ‘प्रदान’ किए गए अवसर का फायदा उठाया और अमेरिका के साथ अपने पुराने सैन्य संबंधों को फिर से जीवित करते हुए औपरेशन सिंदूर रुकवाने के लिए ट्रंप का हार्दिक धन्यवाद किया. यही नहीं, मोदी और भारत को चिढ़ाने के लिए पाकिस्तान ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित भी किया.

12 अगस्त को अमेरिकी विदेश विभाग की प्रवक्ता टैमी ब्रूस ने कहा, ‘‘हम ने महसूस किया कि भारत और पाकिस्तान का संघर्ष काफी भयानक रूप ले सकता था. यह चिंता का विषय था और उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति और विदेश मंत्री ने तत्काल कार्रवाई की. हम ने फोनकौल की प्रकृति, हमलों को रोकने के लिए किए गए हमारे काम और फिर सभी पक्षों को एकसाथ लाने के बारे में बताया, ताकि हम एक स्थायी परिणाम प्राप्त कर सकें. यह एक बहुत ही गर्व का क्षण है और इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि हमारे विदेश मंत्री रुबियो और उपराष्ट्रपति वेंस इस बात के लिए प्रतिबद्ध हैं. इस देश के शीर्ष नेता उस संभावित तबाही को रोकने में शामिल थे.’’

उधर, मोदी ने वेंस के फोनकौल की बात तो स्वीकार की मगर इस बात से इनकार किया कि उन्होंने किसी दबाव में आ कर औपरेशन सिंदूर को खत्म किया. मोदी ने इस सच से कन्नी इसलिए भी काटी कि कहीं उन की सरकार पर बट्टा न लगे, उन की 56 इंच की छाती और लाल आंखों पर विपक्ष सवाल न उठाए. हकीकत यही है कि उन्होंने दबाव में आ कर औपरेशन सिंदूर को रोका और यह सच दुनिया से छिप भी न सका.

युद्ध रुकवाने का क्रैडिट किसे

गौरतलब है कि तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को स्वीकार करना तकनीकी रूप से 1972 के इंदिरा गांधी और जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच हुए शिमला सम?ाते का उल्लंघन है, जो भारत और पाकिस्तान को अपने मतभेदों को द्विपक्षीय रूप से सुल?ाने के लिए प्रतिबद्ध करता है. इस सम?ाते का उल्लंघन भारत और पाकिस्तान दोनों ने किया परंतु पाकिस्तान ने जहां ट्रंप की भूमिका को स्वीकार कर अमेरिका के साथ संबंध कुछ ठीक कर लिए, वहीं मोदी ने इस बात से इनकार कर संबंध बिगाड़ लिए.

भारत के लिए और भी असुविधाजनक बात यह रही कि बू्रस ने यह भी खुलासा कर दिया कि हाल ही में इसलामाबाद में ‘अमेरिका व पाकिस्तान आतंकवादरोधी बातचीत’ हुई. उन्होंने कहा कि इस मौके पर ‘अमेरिका और पाकिस्तान ने आतंकवादी खतरों से निबटने के लिए सहयोग बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा की.’ दूसरे शब्दों में, अमेरिका ने पाकिस्तान को आतंकवाद फैलाने वाला देश मानने के बजाय उसे आतंकवाद से लड़ने में एक सहयोग देने वाला बताया. साफ है, पाकिस्तान के बारे में मोदी की बातें वाशिंगटन ने पूरी तरह अनसुनी कर दीं.

चीन से नजदीकियों के मायने

अब चीन के साथ भारत की जो गलबहियां चल रही हैं उस ने आग में घी डालने का ही काम किया है. इस में दोराय नहीं कि मोदी सरकार के इस रवैए का खमियाजा भारतीय किसान और व्यापारियों को बहुत बुरा भुगतना पड़ेगा. इस के अलावा इंडो-पैसिफिक रणनीति पर भी इस का बुरा असर होगा क्योंकि अमेरिका भारत को चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने वाला सा?ोदार मानता रहा है. भारत अगर चीन के करीब जाएगा तो अमेरिका की इस रणनीति को ?ाटका लगेगा और वह उस का बदला भारत से जरूर लेगा. बड़ी बात यह है कि अमेरिका और चीन के बीच ‘ठंडी जंग’ जैसी स्थिति बन रही है. ऐसे में भारत का ?ाकाव चीन की तरफ होने पर अमेरिका को यह अपने खिलाफ एक कदम लगेगा.

भारत व चीन की नजदीकी ‘क्वाड’ की मजबूती को भी कमजोर करेगी. अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया और भारत मिल कर क्वाड के जरिए चीन को चुनौती देते हैं. भारत का चीन की तरफ ?ाकाव इस मंच की एकजुटता को कमजोर कर देगा. भारत और अमेरिका के बीच हाल के वर्षों में कई रक्षा सम?ाते, हथियारों की खरीद और टैक्नोलौजी सा?ोदारी भी तेज हुई थी, मगर अब चीन से दोस्ती होने पर अमेरिका इन सम?ातों को धीमा कर सकता है.

इस के अतिरिक्त अमेरिका भारत में भारी निवेश करता है और टैक्नोलौजी क्षेत्र में वह हमारा बड़ा सहयोगी है. अगर भारत चीन की तरफ ज्यादा ?ाकेगा तो अमेरिका निवेश व व्यापार नीतियों में सख्ती ला सकता है. इन तमाम संकटों की तरफ से मोदी सरकार आंखें मूंदे हुए है.

अमेरिका से मनमुटाव के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चीन के तियानजिन में 31 अगस्त से एक सितंबर तक आयोजित एससीओ यानी शंघाई कोऔपरेशन और्गनाइजेशन समिट में शामिल हुए. प्रधानमंत्री मोदी 7 साल बाद चीन गए. मोदी का यह दौरा ऐसे माहौल में हुआ जब पूर्वी लद्दाख में अप्रैल 2020 से पहले की यथास्थिति बहाल नहीं हो पाई है. चीन ने 2020 के बाद कई बार अरुणाचल प्रदेश के कई इलाकों का मंदारिन में नामकरण किया है. चीन अरुणाचल प्रदेश को दक्षिणी तिब्बत कहता है. फिर 2022 में जब भारत में जी-20 समिट हुआ तो उस में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग शामिल नहीं हुए. इन सब मुद्दों को मोदी नजरअंदाज कर रहे हैं. इसलिए मोदी की चीन यात्रा को अमेरिका के साथ भारत के खराब होते संबंधों से जोड़ कर ही देखा जा रहा है.

हालांकि, इस समय भारत को रणनीतिक संतुलन बनाए रखने की बहुत जरूरत है. यानी, बढ़े टैरिफ के बावजूद अमेरिका के साथ सा?ोदारी और चीन के साथ सीमित सहयोग, ताकि किसी एक देश को पूरी तरह न नाराज किया जाए. सच तो यह है कि इन तीनों देशों के रिश्तों की नींव रणनीतिक हितों और आर्थिक जरूरतों पर टिकी है, न कि भावनात्मक या गहरी वैचारिक निकटता पर.

मतलबपरस्ती के संबंध

अमेरिका और चीन दोनों के साथ ही भारत के संबंधों में गरमजोशी नहीं है. जो है वह खालिस मतलबपरस्ती है. ऐसा तब है जब अमेरिका और चीन दोनों ही भारत के शीर्ष के कारोबारी सा?ोदार हैं. ऐसे में भारत को अपनी कूटनीति में यह संतुलन बनाए रखना चाहिए ताकि आर्थिक फायदे भी मिलते रहें और सुरक्षा के मोरचे पर भी कोई बड़ा खतरा न खड़ा हो.

अमेरिका को नाराज कर के चीन से दोस्ती दिखाना भारत को भारी आर्थिक मुसीबत में डालने वाला कदम है. चीन के लिए भारत बहुत बड़ा बाजार है, जबकि भारत ऐसी वस्तुएं बहुत कम बनाता है जो चीन के बाजारों में खप सकें. इस असंतुलन का सीधा फायदा चीन को होगा. इस कारण भारत हमेशा कमजोर स्थिति में रहेगा. यह अंधी दोस्ती भविष्य में भारतीय व्यापारियों और उद्योगों के लिए खतरा बन जाएगी. माल न खपने पर मांग कम होगी, बड़ी संख्या में उद्योगधंधे बंद हो जाएंगे और लोग अपनी नौकरियां खो देंगे.

चीन के साथ अविश्वास से भरा इतिहास

थोड़ा ही पीछे जाएं तो हम देखेंगे कि भारत व चीन संबंधों का इतिहास संघर्षों और अविश्वास से भरा रहा है. 1962 का युद्ध, सीमा विवाद और गलवान जैसी घटनाएं हमारे सामने हैं. चीन राजनीतिक और सैन्य दबाव बनाने में माहिर है. 1947 में भारत की आजादी और 1949 में चीन की साम्यवादी क्रांति के बाद दोनों देशों ने ‘हिंदी चीनी भाईभाई’ का नारा अवश्य दिया था पर सीमा विवाद और तिब्बत का मुद्दा दोनों के रिश्तों में तनाव का कारण बन गया. भारत व चीन संबंधों में सब से बड़ा मोड़ 1962 का युद्ध रहा. यह युद्ध सीमा विवाद, अक्साई चिन और अरुणाचल प्रदेश को ले कर हुआ और भारत को हार का सामना करना पड़ा. इस के बाद दोनों देशों के रिश्तों में गहरी दरार पड़ गई.

भारत व चीन सीमा पर वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर अकसर तनाव देखने को मिलता है. 2017 का डोकलाम विवाद और 2020 की गलवान घाटी की ?ाड़प हमारे समक्ष बड़े उदाहरण हैं और अब पाकिस्तान से चीन की दोस्ती भारत को लगातार परेशान कर रही है. हालिया भारत व पाक युद्ध में पाकिस्तान को चीन की मदद मिली. चीन ने भारत से लड़ने के लिए पाकिस्तान को अपने हथियार दिए.

चीन का ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ और पाकिस्तान से उस की निकटता किसी से छिपी नहीं है. चीन लगातार सीमा पर सड़कें, हवाई पट्टियां और सैन्य ठिकाने बना रहा है, जिस से भारत की सुरक्षा संकट में है. चीन का पाकिस्तान-चीन आर्थिक कौरिडोर (सीपीईसी), जो पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) से गुजरता है, भारत की संप्रभुता को चुनौती देता है. पाकिस्तान को चीन की सैन्य और परमाणु तकनीक मदद भारत के लिए दोहरा खतरा है.

गौरतलब है कि चीन ‘स्ंिट्रग औफ पर्ल्स’ रणनीति के तहत श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव और बंगलादेश में बंदरगाह बना रहा है. इस से हिंद महासागर में भारत की पारंपरिक बढ़त को चुनौती मिलती है. चीन संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा रहता है, जैसे कश्मीर के मुद्दे पर. चीन का उद्देश्य भारत को एशिया में संतुलित शक्ति बनने से रोकना है.

कहना गलत न होगा कि सीमा सुरक्षा, आर्थिक प्रतिस्पर्धा, समुद्र्री घेराबंदी और कूटनीतिक दबाव के अंतर्गत भारत के लिए चीन एक बहुआयामी चुनौती है. ऐसे में सिर्फ टैरिफ के डर से अमेरिका से दूरी और चीन से निकटता बनाना भारत के दीर्घकालिक हित में नहीं है. जो दोस्ती भरोसे की नींव पर नहीं बल्कि आर्थिक मजबूरी के कारण बनाई जा रही है उस दोस्ती का दूर तक निभना मुश्किल है. ऐसे में भारत को संतुलित रणनीति अपनानी चाहिए. अमेरिका और यूरोप जैसे बड़े बाजारों को बनाए रखना और चीन पर निर्भरता कम करना ही ज्यादा उचित होगा.

भारत का किस के साथ फायदा

गौरतलब है कि चीन भारत को इलैक्ट्रौनिक्स, मशीनरी, दवाओं के कच्चे पदार्थ आदि निर्यात करता है, जबकि भारत चीन को लौहअयस्क, कपास और केवल कच्चा माल भेजता है. वहीं, टैक्नोलौजी, रक्षा, निवेश, आईटी सैक्टर को ले कर भारत व अमेरिका के संबंध मजबूत हैं. अमेरिका आईटी, रक्षा, ऊर्जा और उच्च तकनीक में सब से बड़ा सहयोगी बन सकता है. क्वाड यानी भारत, अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया सहयोग के जरिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन को बैलेंस कर के रखा जा सकता है.

अमेरिका के साथ मजबूत रिश्ते से भारत की अंतर्राष्ट्रीय स्थिति और कूटनीतिक ताकत भी बढ़ती है. जबकि, चीन पाकिस्तान का सब से बड़ा सहयोगी है, वह पाकिस्तान के हित में भारत पर किसी भी प्रकार का दबाव बना सकता है. सो, भारत की चिंताएं और बढ़ सकती हैं. चीन से व्यापार घाटा बहुत बड़ा है. भारत की इंडस्ट्री चीनी सामान पर और ज्यादा निर्भर हो सकती है. इस के इतर मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री व तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था में हम चीन से काफी पीछे हैं. इस के कई कारण हैं. सब से बड़ा कारण चीनी नागरिकों की सोच है.

चीनी युवा कुशल, कर्मठ और राष्ट्रवादी

भारत और चीन दोनों देशों के युवा आबादी का बड़ा हिस्सा हैं और भविष्य की दिशा तय करते हैं. लेकिन ये युवा कई मामलों में काफी अलग हैं. यह फर्क मुख्य रूप से समाज, शिक्षा, राजनीति, रोजगार, संस्कृति, सोच और धर्म के क्षेत्र में है.

भारत में शिक्षा का स्तर असमान है. आईआईटी और आईआईएम जैसे टौप संस्थान तो विश्वस्तरीय हैं लेकिन ग्रामीण व सामान्य सरकारी शिक्षा का ढांचा बहुत कमजोर है. युवाओं में प्रतियोगी परीक्षाओं का दबाव बहुत है. वहीं चीन की शिक्षा प्रणाली बेहद अनुशासित और कठोर है. वहां ‘गोओकाओ एग्जाम’ बहुत कठिन माना जाता है. चीन के युवा तकनीक और विज्ञान शिक्षा में आगे हैं.

रोजगार और कैरियर के क्षेत्र में भारतीय युवा नौकरी की कमी से जू?ा रहे हैं क्योंकि सरकार नौकरी देने में सक्षम नहीं है. लिहाजा, युवाओं का सारा ध्यान जानबू?ा कर धर्म की ओर मोड़ा जा रहा है. वे कांवड़ यात्राओं को प्रोत्साहित करते हैं. कांवडि़यों पर पुष्पवर्षा करते हैं, उन के चरण पखारते हैं, मानो वे कोई अंतरिक्षयान उड़ाने जा रहे हों. धार्मिक पर्यटन को महिमामंडित किया जाता है जबकि हर साल सैकड़ों घटनाओं में धार्मिक यात्री अपनी जान से हाथ धो रहे हैं. युवाओं के पास करने को कामधंधा नहीं है तो वे कर्ज ले कर नए स्टार्टअप खोल रहे हैं और सालदोसाल में सारी पूंजी गंवा कर बड़े कर्जे में डूब रहे हैं. कौशल की कमी के कारण अवसाद बढ़ रहा है, आत्महत्या के मामले बढ़ रहे हैं. दूसरी ओर चीन में राज्य नियंत्रित औद्योगिक ढांचा बहुत मजबूत है.

मैन्युफैक्चरिंग और टैक्नोलौजी कंपनियां ज्यादा हैं. वहां स्किल की कमी नहीं है. बचपन से ही बच्चों को पढ़ाई के साथ किसी न किसी स्किल में माहिर बना दिया जाता है. इस के अलावा उन की सेहत पर पूरा ध्यान दिया जाता है. वे ऊर्जावान हैं. आशावादी हैं. कोई भी समस्या हो उस का समाधान ढूंढ़ते हैं, हमारे युवाओं की तरह भगवान को दोष नहीं देते, न ही व्रत, पूजा, आरती कर भगवान को खुश करने की कोशिश करते हैं. न ही काम बनाने के लिए भगवान को रिश्वत की पेशकश करते हैं. भारतीय युवा समाज, परिवार और परंपराओं से बंधे हुए हैं. शादी, बच्चे, धर्म और जाति का असर हम पर इतना गहरा है कि हम इस से इतर कुछ सोच ही नहीं पाते जबकि चीन में परंपराओं की तुलना में आधुनिकता, स्किल डैवलपमैंट और ‘राज्यनिष्ठा’ ज्यादा है. युवाओं पर ‘कंपनी और देश के प्रति वफादारी’ का दबाव ज्यादा है. चीनी युवा काफी प्रैक्टिकल और अनुशासित हैं. वे सामूहिक सफलता को व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं से ऊपर रखते हैं.

भारतीय युवा परंपराओं और धर्म से जुड़े हैं. उन का अधिकांश समय, रुपया और ऊर्जा धार्मिक कर्मकांडों, ?ाड़पों और दिखावों में बीतता है, जबकि चीनी युवा अधिक अनुशासित, कर्मठ, टैक्नोलौजी उन्मुख और राष्ट्रवादी हैं. उधर, अमेरिका चीन के बढ़ते वर्चस्व से हमेशा खार खाता है, खासकर, कोरोना महामारी के बाद तो वह चीन से खासा नाराज है और उस को औकात में रखना चाहता है. अतीत के वर्षों में शंघाई और अन्य बंदरगाहों में अमेरिका की कोलोनियल चौकियां भी रही हैं.

अमेरिका सदियों से चीनी गतिविधियों पर गहरी नजर जमाए हुए है. कोलोनियल चौकियों में अमेरिकी व्यापारियों और सैनिकों को वहां विशेषाधिकार प्राप्त थे और ये क्षेत्र चीनी संप्रभुता से बाहर हो कर विदेशी शक्तियों के नियंत्रण में चलते थे. इसे इतिहास में ‘चीन में अमेरिकी कोलोनियल चौकियां’ भी कहा जाता है. 1844 की वांग्हिया संधि के बाद अमेरिका को चीन में व्यापार करने का अधिकार मिल गया था तब अमेरिका के व्यापारियों और मिशनरियों ने चीन के कई बंदरगाहों- कैंटन, शंघाई, टियानजिन आदि में अपनी कोलोनियल चौकियां स्थापित कर ली थीं. उन में वहां अमेरिकी व्यापारी, मिशनरी और सैनिक मौजूद रहते थे और यह इलाका चीनी कानून से बाहर था और वहां विदेशी पुलिस व प्रशासन चलता था. यानी, अमेरिकी नागरिक चीन में चीनी कानून के बजाय अमेरिकी कानून के अधीन रहते थे. अमेरिकी कौंसुलेट ही उन के लिए न्याय और प्रशासन का केंद्र था.

वर्ष 1900 के बौक्सर विद्रोह के समय अमेरिका ने अन्य औपनिवेशिक शक्तियों के साथ मिल कर चीन में सैनिक भेजे. बाद में भी अमेरिकी मैरीन शंघाई और अन्य बंदरगाहों में लंबे समय तक तैनात रहे. इस तरह अमेरिका काफी लंबे समय से चीन की निगरानी कर रहा है. वह चीन की ताकत को समझता है और उसे संतुलित रखने के लिए भारत को इस्तेमाल करता है. अब जबकि भारत खुद चीन की तरफ ?ाक रहा है तो अमेरिका का उत्तेजित और गुस्सा होना सम?ा जा सकता है.

अमेरिका को भारत से बड़ा निर्यात

अमेरिका में भारतीय उत्पादों की खपत अच्छी है. अमेरिका भारतीय आईटी कंपनियों, जैसे इनफोसिस, टीसीएस, विप्रो आदि का सब से बड़ा ग्राहक है. भारतीय कपड़े, रैडीमेड गारमैंट्स और होम टैक्सटाइल की मांग अमेरिका में काफी ज्यादा है. हीरे और अन्य रत्न अमेरिका में भारत से सब से अधिक आयात किए जाने वाले उत्पादों में शामिल हैं. अमेरिका में इस्तेमाल होने वाली जेनेरिक दवाओं का बड़ा हिस्सा भारत से जाता है. भारत अमेरिका को औटोमोबाइल पार्ट्स, स्टील उत्पाद और अन्य इंजीनियरिंग गुड्स भी निर्यात करता है. भारतीय मसाले, चाय, कौफी और रेडी टू ईट फूड्स अमेरिकी उपभोक्ताओं में लोकप्रिय हैं. ये सब काम चौपट हो जाएंगे यदि अमेरिका से भारत ने अपने रिश्ते नहीं सुधारे. दो महामानवों का अहं लाखोंकरोड़ों परिवारों की रोजीरोटी छीन लेगा.

अगर दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच अहं और टकराव रिश्तों को खत्म करते हैं तो इस का नुकसान सिर्फ कूटनीतिक स्तर पर नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर भी होगा जब कंपनियों की कमाई घटेगी, नौकरियां जाएंगी और उद्योग ठप हो जाएंगे. इतिहास भी यही बताता है कि जबजब भारत और अमेरिका ने मिल कर काम किया, तबतब भारत को निवेश, तकनीक और निर्यात बाजार के रूप में भारी फायदा हुआ है. दूरी बढ़ने पर सब से पहले आम जनता प्रभावित होती है.

ये बातें प्रधानमंत्री मोदी की सम?ा में आती हैं तो ठीक है वरना भारत की आम जनता को बड़ी आर्थिक आपदा का सामना करने के लिए तैयार रहना होगा. अमेरिका को टैरिफ से कोई फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि भारत से अमेरिका में कुल 3 प्रतिशत मूल्य का सामान जाता है. अमेरिकियों को परेशानी यूरोप, कनाडा, मैक्सिको पर टैरिफ से है, भारत से नहीं. चीन और रूस मिल कर भी अमेरिकी बाजार की कमी पूरी नहीं कर सकते. India China Relations 

Film Story: एक और एजेंडापरस्त फिल्म – “द बंगाल फाइल्स”?

Film Story : 15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ. देश के 2 टुकड़े हुए. हिंदुस्तान और पाकिस्तान बना. इस विभाजन में हजारों लोग मारे गए. कइयों का कत्ल किया गया, लोग घरबार छोड़ कर शरणार्थियों की तरह रहने लगे. ट्रेनों में भरभर कर लोगों की लाशें एक जगह से दूसरी जगह भेजी गईं. पाकिस्तान के मोहम्मद अली जिन्ना और भारत के महात्मा गांधी की गलतियों के कारण इतिहास को दुर्दिन देखने पड़े थे. इतिहास की यह सब से दुखद घटना थी. ठीक इसी तरह विभाजन से एक साल पहले 1946 में कलकत्ता में मुसलिमों द्वारा बंगाल के नोआखाली जिले के कई शहरों में हिंदुओं का नरसंहार किया गया. उस में 5,000 लोगों के मरने की बात कही गई. यह घटना भी भारतपाक विभाजन की घटना की तरह सदियों तक याद की जाती रहेगी. वैसे, आज भी बंगाल के जिले नोआखाली की हालत अत्यंत दयनीय है. युवाओं को इस तरह की घटनाओं की जानकारी होनी चाहिए.

दंगों की मूल ऊर्जा कहां से आती है. आप हिंसा का इतिहास उठा कर देखिए कि कभी कोई नेता या गुंडा नहीं मरता. ‘द बंगाल फाइल्स’ विवेक अग्निहोत्री की आधुनिक भारतीय इतिहास पर आधारित ‘द फाइल्स ट्रिलौजी’ की तीसरी और अंतिम किस्त है जो ‘द ताशकंद फाइल्स’ (2019) और ‘द कश्मीर फाइल्स’ (2022) के बाद की है. 204 मिनट की यह सब से लंबी भारतीय फिल्मों में से एक है. यह सांप्रदायिक दंगों पर है.

‘द बंगाल फाइल्स’ 16 अगस्त, 1946 को प्रत्यक्ष कार्रवाई में जुड़ी दुखद घटनाओं को बर्बर तरह से दर्शाती है. 1946 में बंगाली हिंदुओं की यह हिंसा जल्द ही बंगाल प्रैसिडैंसी के आसपास के इलाकों में फैल गई. जिस में नोआखाली दंगों की घटनाएं शामिल थीं. 1946 में उपमहाद्वीप के कई हिस्सों में तनावपूर्ण माहौल था. अंगरेजों ने अपने उपनिवेश को आजादी देने का वादा किया था लेकिन सत्ता हस्तांतरण कैसे की जाए, इस पर कोई ठोस फैसला नहीं हो पाया था. मुसलिम लीग एक अलग मुसलिम राज्य पाकिस्तान की मांग कर रही थी, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस पर सहमत नहीं थी. इसी तनाव के कारण जगहजगह छिटपुट दंगे हो रहे थे. फलस्वरूप, ‘ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स’ शुरू हुआ. बंगाली हिंदुओं को निशाना बनाया गया. अनुमान है कि इन दंगों में 5,000 हिंदू मारे गए और हजारों का धर्मपरिवर्तन कराया गया, कई महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया. संपत्ति को लूटा गया. महात्मा गांधी ने अहिंसा का संदेश फैलाने और दंगाइयों से दंगा रोकने के लिए अशांत क्षेत्रों का दौरा किया, लेकिन असफल रहे. दंगे के बाद कई लोग बेघर हुए.

नोआखाली की दुखद घटनाओं को दर्शाने वाली घटनाओं को सिनेमाई कथा के माध्यम से दिखाया गया है जो न तो डौक्यूमैंट्री बन पाई है न ही फीचर फिल्म. यह कहानी वास्तविक घटनाओं को एजेंडे के रूप में बताती है. इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के साथ कहानी एक आपराधिक अन्वेषक की भी है जो एक गुमशुदा व्यक्ति के मामले पर काम करते हुए भ्रष्टाचार के एक नैटवर्क का परदाफाश करता है. फिल्म की कहानी सच्ची घटनाओं पर आधारित बताई गई है जिसे कलकत्ता किलिंग्स के नाम से भी जाना जाता है.कहानी 2 समानांतर टाइमलाइन में आगे बढ़ती है. इतिहास के इन पन्नों को दर्शाने के साथ विवेक अग्निहोत्री ने यह बताने की कोशिश की है कि विभाजन के 78 साल बाद भी बंगाल के हालात कमोबेश वैसे ही हैं. उन की यह फिल्म पिछली 2 फिल्मों ‘द ताशकंद फाइल्स’ और ‘द कश्मीर फाइल्स’ से बहुत कमजोर नजर आती है.

शुरुआत लौर्ड माउंटबेटन, जवाहरलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना की बहस से होती है जब अंगरेज मुसलमानों के लिए एक अलग देश बनाने की बात करते हैं. महात्मा गांधी इस का विरोध करते हैं. कहानी वर्तमान में आती है. बंगाल के मुर्शिदाबाद में एक दलित लड़की के गायब होने का आरोप स्थानीय विधायक सरदार हुसैन (शाश्वत चटर्जी) पर लगता है, जो बंगलादेशी प्रवासियों को अवैध रूप से पश्चिम बंगाल में आने में मदद करता है, जिस का मुर्शिदाबाद में वोटबैंक बनाने पर भी प्रभाव पड़ता है. दिल्ली से सीबीआई अधिकारी शिवा पंडित (दर्शन कुमार) को मामले की जांच के लिए भेजा जाता है. मामले में करीब 100 साल की बूढ़ी मां भारती (पल्लवी जोशी) को शामिल बताया जाता है. कश्मीरी पंडित शिवा का भी अतीत है. वहां पहुंचने पर उसे पता चलता है कि बंगाल में 2 संविधान चलते हैं. आजादी से पहले और बाद के हालात कमोबेश एकसमान हैं. वह एक ऐसी फाइल पर जा पहुंचता है जिस में 1946 की उस त्रासदी के असली तथ्य दर्ज हैं जो अब तक जनता से छिपाए गए थे.

‘बंगाल फाइल्स’ भाजपा की राजनीति को सूट करती फिल्म है. यह इतिहास के उन पहलुओं में ?ांकने की नाकाम कोशिश है जहां से सिर्फ नफरत और तनाव पैदा होते हैं. पल्लवी जोशी व नमाशी चक्रवर्ती का अभिनय ठीकठाक है. विवेक अग्निहोत्री अपनी धुन का डायरैक्टर है. फिल्म में दिब्येंदु ने कैमियो रोल किया है. अनुपम खेर ने महात्मा गांधी का किरदार निभाया है. फिल्म सामाजिक मुद्दे के नाम पर सिर्फ हिंसा दिखाती है. इस फिल्म को देखने वाला हिंसा वाली मानसिकता ले कर ही बाहर आएगा. यह पैटर्न विवेक अग्निहोत्री का पहले भी रहा है. फिल्म का तकनीकी पक्ष भी कमजोर है. संवाद उबाऊ हैं.

संगीत विषय के अनुरूप है. ‘किचुदिन मोनेमोने…’ गाना दर्दनाक है. हताश, शराबी और कटी जबान वाले किरदार में मिथुन ने छाप छोड़ी है. सिनेमैटोग्राफी अच्छी है.

परम सुंदरी??

अकसर डेटिंग करने वाले युवकयुवतियां अपने मोबाइल पर जब देखो लेफ्टराइट स्वाइप करते रहते हैं. ऐसे प्यार का इजहार भला थोड़े होता है. प्यार लेफ्टराइट से कहीं आगे की चीज है. प्यार को दिल ही महसूस कर सकता है, आंखें भी प्यार की भाषा सम?ाती हैं. भारत में 10 डेटिंग ऐप्स पर युवा सब से ज्यादा ऐक्टिव हैं. डेटिंग ऐप द्वारा आप को पार्टनर तो मिल सकता है मगर इस में धोखे भी बहुत हैं, बहुत सोचसम?ा कर डेटिंग ऐप को इस्तेमाल करना चाहिए. एंड्रौयड ऐप पर लोगों की शौर्ट प्रोफाइल होती है. अगर आप को किसी की प्रोफाइल पसंद है तो राइट स्वाइप कर सकते हैं वरना आप लेफ्ट स्वाइप करें. इस फिल्म में भी नायक और नायिका डेटिंग ऐप की सहायता से आपस में मिलते हैं. फिर तो दोनों की बल्लेबल्ले हो जाती है, प्यार परवान चढ़ता जाता है. आखिरकार, दोनों एकदूसरे के हो जाते हैं. फिल्म में डेटिंग ऐप के महत्त्व को बताया गया है.

‘परम सुंदरी’ में मशहूर ऐक्ट्रैस श्रीदेवी की बेटी जाह्नवी कपूर ने अपनी सुंदरता से दर्शकों को मोहित किया है. शीर्षक के मुताबिक उस का रंगरूप खिल कर निखरा है. यह एक रोमांटिक फिल्म है. इस फिल्म को हिंदी के साथसाथ दक्षिण भारतीय भाषाओं में भी रिलीज किया गया है. इस तरह की फिल्म में कहानी न के बराबर होती है.

जिस तरह दक्षिण भारत के, खासकर कोकण, इलाके में फिल्माई गई 12 साल पहले आई ‘चेन्नई ऐक्सप्रैस’ दर्शकों को अच्छी लगी, फिल्म के बैकग्राउंड में बहते ?ारने उन के मन को भाए ठीक उसी प्रकार ‘परम सुंदरी’ के खूबसूरत चित्रण को खूब सराहा गया है. केरल की खूबसूरती को दिलकश तरीके से दिखाया गया है. फिल्म में हलकाफुलका मनोरंजन है जो दर्शकों को मुसकराने पर मजबूर करता है. इस फिल्म की तुलना ‘चेन्नई ऐक्सप्रैस’ से की जा रही है, लेकिन यह चेन्नई ऐक्सप्रैस जैसी बिलकुल नहीं है. उस फिल्म में काफी एलिमैंट थे परंतु यहां फिल्ममेकर्स ने ज्यादा मेहनत नहीं की है. इस फिल्म की कहानी 3 लोगों ने लिखी है. तीनों मिल कर भी इसे बेहतर बनाने वाली फिल्म नहीं बना पाए हैं. इस की कहानी प्रिडिक्टिबल हो गई है.

इस फिल्म की कहानी है परम (सिद्धार्थ मल्होत्रा) की, जो हमेशा से ही बिजनैस में नाकाम रहा है. पिता (संजय कपूर) उसे एक और पैसा कमाने का मौका देता है वरना सब खत्म. परम एक सोलमेट ऐप में निवेश करता है. ऐप से उसे पता चलता है कि उस की सोलमेट सुंदरी (जाह्नवी कपूर) केरल में है. परम दिल्ली से केरल पहुंचता है और पहली नजर में ही सुंदरी पर दिल हार बैठता है. लेकिन सुंदरी सोशल मीडिया से दूर रहने वाली आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी लड़की है. दोनों एकदूसरे के करीब आते हैं. उन दोनों के प्यार में कई बाधाएं आती हैं परंतु वे सारी बाधाओं को पार कर एकदूसरे का हाथ थाम लेते हैं.

फिल्म का फर्स्ट हाफ धीमा है, मध्यांतर के बाद फिल्म कुछ रफ्तार पकड़ती है. क्लाइमैक्स मजेदार है. फिल्म का तकनीकी पक्ष भी अच्छा है. कहानी में कोई नयापन तो नहीं है परंतु जाह्नवी कपूर जैसा चेहरा देख कर ताजगी महसूस होती है. सिद्धार्थ मल्होत्रा से उस की कैमिस्ट्री जमी है. सचिन जिगर का ‘परदेसिया…’ गाया गया गाना खूबसूरती से गूंजता है. इस की कोरियोग्राफी भी बढि़या है. फिल्म में किरदारों के कौस्ट्यूम्स का खास ध्यान रखा गया है. संथाना कृष्णन रविचंद्रन की सिनेमेटोग्राफी कमाल की है जो केरल प्रदेश को एक लैंडस्कैप के रूप में दिखाती है.

सिद्धार्थ मल्होत्रा हैंडसम लगा है. मलयाली सुंदरी की भूमिका में जाह्नवी कपूर ने बैस्ट परफौर्मेंस दी है. मनजोत दर्शकों को हंसा पाने में सफल है. संजय कपूर औसत है.

तेहरान??

तेहरान ईरान की राजधानी और सब से बड़ा शहर है, जौन अब्राहम की यह फिल्म तेहरान शहर के बारे में नहीं है, न ही इस में तेहरान शहर को एक्सप्लोर किया गया है. इजराइल ने ईरान से दुश्मनी मोल ली है, उस ने तेहरान शहर पर जम कर बम बरसाए हैं. एक तरह से इतने सुंदर शहर को उस ने नेस्तनाबूद कर दिया है. अमेरिका भी ईरान को तबाह करना चाहता है. वह ईरान के अन्य शहरों के साथसाथ तेहरान पर खुद बम न बरसा कर इजराइल से बमबारी करा रहा है.

‘तेहरान’ फिल्म सच्ची घटना पर आधारित है. जौन अब्राहम ने देशभक्ति के साथसाथ कई ऐक्शन फिल्में भी बनाई हैं, ‘मद्रास कैफे’, ‘धूम’, ‘न्यूयौर्क’  ‘रेस-2’, ‘शूट आउट एड वडाला’ इस के अलावा उस ने ‘परमाणु : द स्टोरी औफ पोखरण’ और ‘सत्यमेव जयते’ जैसी तारीफ के काबिल फिल्में भी बनाईं. ईरान और इजराइल सालों से आपस में लड़ रहे हैं और इस का खमियाजा दोनों ने भुगता है. लेकिन 13 साल पहले दिल्ली में इजराइली दूतावास के बाहर हुए बम धमाके से भारत भी इस की चपेट में आ गया था. यह फिल्म उसी घटना का परदाफाश करती है. कैसे दिल्ली पुलिस का एक अफसर साजिश का पता लगातेलगाते ईरान के शहर तेहरान पहुंच जाता है, यह फिल्म यही तहकीकात करती है.

नई दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित इजराइली दूतावास के बाहर हुए बम धमाके का पता लगाने की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस के अफसर राजीव कुमार (जौन अब्राहम) को सौंपी जाती है जिस में उस की मदद एसआई दिव्या राणा (मानुषी छिल्लर) और शैलजा (नीरू बाजवा) करती हैं. तेहरान में इंटरनैशनल लैवल पर बड़े दांवपेंच का खेल खेला जा रहा है. इस बम धमाके में कई मासूम लोग घायल हो गए थे और एक छोटी सी बच्ची की जान चली गई थी. मामला तब और गंभीर हो जाता है जब पता चलता है कि मारी गई फल बेचने वाली बच्ची राजीव के लिए सिर्फ एक केस फाइल ही नहीं, एक निजी जुड़ाव भी थी. तहकीकात करते हुए राजीव कुमार अपनी टीम के साथ जांच मिशन पर जाता है. तब पता चलता है कि कार बम ब्लास्ट के तार इजराइल और भारत के साथसाथ ईरान की कूटनीति से भी जुड़े हैं. भारत और इजराइल के बीच गैस डील होने वाली है और राजीव कुमार अगर इजराइल के षड्यंत्र का परदाफाश करेगा तो डील कैंसिल हो जाएगी.

दूसरी ओर, भारत के कूटनीतिज्ञ चाहते हैं कि राजीव और उस के साथी मिशन अधूरा छोड़ कर वापस लौट आएं. राजीव के न मानने पर अपना देश राजीव को त्याग देता है. इस मिशन में राजीव को दिव्या को खोना पड़ जाता है.  मगर घर में पत्नी व बेटी उस का इंतजार कर रहे हैं. आखिरकार, वह अपना मिशन पूरा कर वापस लौटता है. भारत में उसे सम्मानित किया जाता है. आजादी के मौके पर देशभक्ति से ओतप्रोत फिल्मों का आना एक परंपरा सी रही है. फिल्म थ्रिलर अंदाज में चलती है. पूरी फिल्म में टैंशन बना रहता है. मूड के मुताबिक कहानी उल?ा हुई है. ईरानी और इजरायली भाषा राजनीतिक गतिरोध पैदा करते हैं. तेहरान की गलियों, हलचलभरे बाजारों और रहस्यमयी अंधेरी जगहों को खूबसूरती से फिल्माया गया है. ऐक्शन और चैजिंग सीन बढि़या हैं.

राजीव कुमार की भूमिका में जौन अब्राहम जंचता है. दिव्या की भूमिका में मानुषी छिल्लर भी जंची है. नीरू बाजवा याद रह जाती है. आतंकी के किरदार में हादी खानजानपोर क्रूर लगा है. कहानी बिना शोरशराबा किए अपनी बात कह देती है. निर्देशन अच्छा है. पार्श्व संगीत ठीकठाक है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है.

जोरा??

‘जोरा’ एक क्राइम बेस्ड फिल्म है. ‘गुप्त’, ‘मोहरा’, ‘विश्वात्मा’, ‘त्रिदेव’ जैसी सस्पैंस थ्रिलर बना कर अपनी साख बनाने वाले राजीव राय ने जिस किरदार जोरा के इर्दगिर्द कहानी बुनी है वह फिल्म की शुरूआत में तो सस्पैंस पैदा करती है मगर अंत आतेआते चरमोत्कर्ष जगाने में सफल नहीं हो पाती. नाम बड़े दर्शन छोटे जैसी दिखाई पड़ती है. राजीव राय 2 दशकों पुराने सिनेमाई जादू की उम्मीद ले कर परदे पर लौटे हैं, मगर अफसोस उस ने साबित कर दिया है कि समय के साथ खुद को न बदलना अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है. ‘जोरा’ दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी है. पुरानी और बेढंगी कहानी को आउटडेटेड अंदाज में पेश किया गया है. पिछले 21 वर्षों में फिल्म इंडस्ट्री ही नहीं, दुनिया में तकनीकी स्तर पर काफी बदलाव हुए हैं. ‘जोरा’ को देख कर लगता है कि निर्देशक समय के साथ पीछे रह गया है, वह अपना पुराना जादू जगा पाने में असफल रहा है.

कहानी 2003 में जयपुर से शुरू होती है. ईमानदार इंस्पैक्टर विराट सिंह (विकास गोस्वामी) नकली स्टैंपपेपर छापने वाले एक गिरोह को पकड़ता है लेकिन जोरा नाम की महिला उसे मार देती है. जोरा ने टोपी और मास्क पहन कर अपनी पहचान छिपा रखी है. विराट का बेटा इंस्पैक्टर रंजीत अपने सामने पिता की हत्या होते देखता है. सबइंस्पैक्टर रंजीत (रविंदर कुहरा) एक अवैध ड्रग रैकेट का भंडाफोड़ करने के लिए कानून को अपने हाथ में लेता है. यह बात उस के वरिष्ठ अधिकारी इकबाल (करणवीर) को पसंद नहीं आती. दोनों के बीच मतभेद हो जाता है. रंजीत को जब पता चलता है कि उस के पिता की हत्या जोरा ने की है तो वह उस तक पहुंचना चाहता है और पुलिस अफसर बन अपने पिता की मौत का सच सामने लाने की कसम खाता है. वह अपराधियों का सफाया एनकाउंटर के जरिए करता है. उस का ऐसा करना उस के सीनियर अफसर इकबाल (करणवीर) को खटकता है.

अब यह जोरा कौन है? सारा सस्पैंस इसी पर टिका हुआ है. जोरा की तलाश शुरू हो जाती है. जांच के दौरान उसे कुछ सुराग मिलते हैं जो उसे उसी रहस्यमयी जोरा की ओर ले जाते हैं. दूसरी ओर जोरा उसे तलाशने वालों को मौत के घाट उतार देती है. आखिरकार, रंजीत जोरा की सच्चाई की पहचान उजागर करता है, तो दर्शक चौंक जाते हैं. पूरा सिस्टम, परिवार और खुद रंजीत भी हिल कर रह जाता है.

फिल्म की यह कहानी अंत तक सस्पैंस को बनाए रखने में असफल हुई है. कई जगह कहानी गड़बड़ हुई है. फिल्म की प्रोडक्शन वैल्यू कमजोर है. ऐक्शन सीन भी घिसेपिटे हैं. म्यूजिक भी कमजोर है. पलक मुच्छल का गाया टाइटल सौंग कुछ राहत देता है. निर्देशन और संपादन खराब है. सभी कलाकारों ने निराश किया है.

 

RSS : बयानबाजी व सफाई देने से कब आगे बढ़ेगा संघ

RSS : आरएसएस संगठन को बने 100 साल पूरे हो चुके हैं. वह खुद को दुनिया का सब से बड़ा संगठन बताता है और समाजसेवी भी. लेकिन 100 सालों में उस का ऐसा कोई काम नजर नहीं आता जिस से देश या समाज प्रगति की ओर अग्रसर हुआ हो. न ही उस ने सामाजिक बुराई को खत्म करने में कोई भूमिका निभाई. हां, कई मौकों पर धार्मिक और जातिगत विवाद पैदा करते वह जरूर दिखा है.

देश को इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आरएसएस भाजपा के कामों में दखल रखता है या नहीं. देश भाजपा को संघ परिवार का हिस्सा मानता है. सरसंघचालक मोहन भागवत को बारबार इस की सफाई देने की जरूरत नहीं है. देश यह सम?ाने की कोशिश कर रहा है कि आरएसएस के 100 साल पूरे होने के बाद भी हिंदू इतना गरीब क्यों है? आज बड़ी संख्या में हिंदू अंगरेजी पढ़ने को मिशनरी स्कूलों में जाने को विवश क्यों है? आज भी हिंदू ?ाग्गी?ांपड़ी में रहने को मजबूर क्यों है? जिन कामों को कर के हिंदू रोजगार पा रहा था, आज भी उन की प्रगति क्यों नहीं हुई?

‘हर मंदिर के नीचे मसजिद देखने की सोच बदलनी होगी’ मोहन भागवत के बारबार यह कहने के बाद भी यह हो रहा है. इस को देख कर रहीम दास की यह बात याद आती है कि ‘कह रहीम कैसे निभे केर बेर के संग, वो डोलत रस आप ने ताको फाटत अंग’. समाज में जिस तरह से भेदभाव का बीज बो दिया गया है उस के बीच अब केला और बेर एकसाथ कैसे रह सकते हैं?

सरसंघचालक कहते हैं कि संघ का हर सरकार के साथ अच्छा संबंध रहा है. चाहे वह प्रदेश की सरकार हो या देश में अलगअलग पार्टियों की सरकारें रही हों. ऐसे में यह बात भी सामने है कि आरएसएस की बात सभी सुनते रहे हैं. इस के बाद भी हिंदू समाज में मजबूरी को खत्म करने की दिशा में काम क्यों नहीं हुआ? संघ खुद को सांस्कृतिक और सामाजिक संगठन कहता है, इस के बाद भी देश में असमानता क्यों है? दहेज जैसी तमाम कुरीतियां खत्म क्यों नहीं हुईं? क्या संघ का काम केवल प्रवचन देने तक ही सीमित नहीं रह गया है? संघ से जुड़े लोग हर क्षेत्र में हैं तो वहां चारित्रिक सुधार क्यों नहीं हुआ?

आरएसएस व भाजपा का रिश्ता

आजादी की लड़ाई के समय हिंदू महासभा कांग्रेस को अपने मुख्य दुश्मन के तौर पर देखती थी. हिंदू महासभा अंगरेजों से दोस्ती करने को तैयार थी. इस के बाद भी हिंदू महासभा वाले अपने को राष्ट्रवादी बताने से चूकते नहीं थे. आजादी के 52 सालों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा तिरंगा ?ांडा फहराने से इनकार किया जाता रहा. आरएसएस ने ?ांडा तब फहराया जब 1998 में भाजपा की केंद्र में सरकार बनी. आरएसएस का गठन 1925 में के बी हेडगेवार द्वारा किया गया था. 1925 से 1947 तक इस ने कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी या समूह द्वारा चलाए गए किसी अभियान या आंदोलन में भागीदारी नहीं की. न ही अंगरेजों के खिलाफ इस ने खुद से ही कोई आंदोलन चलाया.

वे राष्ट्रवाद को अपना धर्म बताते हैं. उन के राष्ट्रवाद का अर्थ वास्तव में हिंदू राष्ट्रवाद रहता है. मुसलिमों के वर्चस्व के खतरे के खिलाफ वे हिंदू समाज को लामबंद करने का काम करते हैं. आरएसएस के संस्थापक हेडगेवार नागपुर में कांग्रेस के नेता भी थे. असहयोग आंदोलन के दौरान जेल भी गए थे. इस के बावजूद वे वीडी सावरकर की किताब ‘हिंदुत्व’ से प्रभावित थे. जो प्रकाशित तो 1923 में हुई थी, लेकिन प्रसार में इस से पहले से थी. उस में सावरकर ने हिंदुत्व की विचारधारा का मूल विचार दिया था.

1925 की विजयदशमी के दिन हेडगेवार और हिंदू महासभा के चार नेताओं- बी एस मुंजे, गणेश सावरकर, एल वी परांजपे और बीबी ठोलकर- के बीच एक बैठक हुई थी. सावरकर के बड़े भाई गणेश सावरकर भी उस बैठक में मौजूद थे जिस में आरएसएस की स्थापना हुई थी. इस के बाद उन्होंने अपने संगठन तरुण भारत संघ का विलय आरएसएस में कर दिया था. आरएसएस के गठन के 2 साल बाद देशभर में साइमन कमीशन विरोधी प्रदर्शन हो रहे थे लेकिन इन में आरएसएस कहीं नहीं था. दिसंबर 1929 में जवाहरलाल नेहरू ने लाहौर में कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन में पार्टी अध्यक्ष के तौर पर भारत के राष्ट्रीय ध्वज को फहराया और पूर्ण स्वराज को पार्टी का मकसद घोषित किया.

कांग्रेस ने 26 जनवरी, 1930 को स्वतंत्रता दिवस के तौर पर मनाने का भी फैसला लिया. हेडगेवार ने दावा किया कि चूंकि आरएसएस पूर्ण स्वराज में यकीन करता है इसलिए यह स्वतंत्रता दिवस तो मनाएगा, लेकिन यह तिरंगे की जगह भगवा ?ांडा फहराएगा. 1930 के दशक में आरएएस और हिंदू महासभा के बीच सावरकर को ले कर टकराव हुआ. इस के बाद भी दोनों संगठनों के बीच संबंध बने रहे. इस के बाद सावरकर हिंदू महासभा के अध्यक्ष भी बने. वे 6 साल तक पद पर बने रहे. 30 जनवरी को गांधीजी की हत्या के तुरंत बाद उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में सरदार पटेल के नेतृत्व में भारत सरकार ने आरएसएस को प्रतिबंधित कर दिया और इस के 25,000 सदस्यों को जेल भेज दिया. प्रतिबंध लगाए जाने पर हिंदू महासभा ने खुद को भंग करने का फैसला किया.

इस के प्रमुख नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की. इस के बाद से इसे हिंदू सांप्रदायिक विचारों का मुख्य राजनीतिक वाहक, इस की सर्वप्रमुख राजनीतिक पार्टी होना था. 1977 में आपातकाल के बाद इस का जनता पार्टी में विलय हो गया और बाद में 1980 में इस ने भाजपा के रूप में नया अवतार लिया. इस तरह से भाजपा और आरएसएस के बीच गहरा रिश्ता है. सरसंघचालक के कहने की बात नहीं है, देश के लोग इस सच को जानते हैं. संघ को बारबार सफाई देने की जरूरत नहीं है.

मुसलिमविरोध बना एजेंडा

1920 में बालगंगाधर तिलक के निधन के बाद नागपुर में तिलक के समर्थकों की ही तरह से डाक्टर हेडगेवार भी महात्मा गांधी द्वारा अपनाए गए कुछ कार्यक्रमों के विरोधी थे. भारतीय मुसलिम विरोध मुद्दे पर गांधी का रुख हेडगेवार के लिए चिंता का विषय था. इस में एक और कारण था- ‘गौरक्षा’ का कांग्रेस के एजेंडे में होना. इस कारण हेडगेवार और अन्य तिलक समर्थकों ने गांधी से नाता तोड़ लिया. 1921 में हेडगेवार को कटोल और भरतवाड़ा में दिए गए उन के भाषणों के लिए ‘राजद्रोह’ के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया. उन को एक वर्ष की जेल की सजा सुनाई गई.

जुलाई 1922 में उन्हें रिहा कर दिया गया. 1922 और 1924 के बीच उन्होंने नागपुर में प्रमुख राजनीतिक हस्तियों के साथ बैठकें कीं. 1924 में वे पास के वर्धा में गांधीजी के आश्रम गए और कई मुद्दों पर चर्चा की. इस बैठक के बाद, वे अकसर विरोधी हिंदू समूहों को एक सा?ा राष्ट्रवादी आंदोलन में एकजुट करने की योजना बनाने के लिए वर्धा से चले गए. यही दौर था जब हिंदू व मुसलिम एकदूसरे के खिलाफ दिखने लगे थे. महात्मा गांधी चाहते थे कि हिंदू और मुसलिम एकजुट रहें. अगस्त 1921 में मोपला विद्रोह इस की शुरुआत मानी जाती है. 1923 में नागपुर में दंगे हुए जिन्हें हेडगेवार ने ‘मुसलिम दंगे’ कहा था.

अब हेडगेवार का प्रयास हिंदुओं को संगठित करने के साथ ही साथ उन को मजबूत करने का भी था. इस के लिए संगठन में लोगों को मजबूत करने के लिए ट्रेनिंग देने की योजना शुरू की गई. 1927 में हेडगेवार ने प्रमुख कार्यकर्ताओं की एक टुकड़ी बनाने के उद्देश्य से ‘अधिकारी प्रशिक्षण शिविर’ का आयोजन किया, जिस को प्रचारक कहा गया. इस के लिए स्वयंसेवकों से पहले ‘साधु’ बनने, पेशेवर और पारिवारिक जीवन को त्यागने व आरएसएस के लिए अपना जीवन समर्पित करने को कहा गया. इस के बाद शाखाओं का एक नैटवर्क विकसित किया गया. प्रचारक को अधिक से अधिक शाखाएं तैयार करने के लिए कहा गया.

पहले नागपुर में फिर पूरे महाराष्ट्र में और आखिरकार शेष भारत में भी इस की शुरुआत की गई. इस में कालेज और विश्वविद्यालयों को भी जोड़ना शुरू किया गया. बनारस से इस काम के लिए प्रचारकों को अलगअलग प्रदेशों में भेजा गया.  आरएसएस ने अपने हिसाब से संगठन को बनाने के लिए अलगअलग हिस्सों में बांटा. इस को प्रांत का नाम दिया गया. हर प्रांत में प्रांत प्रचारक को जिम्मेदारी दी गई कि वह शाखा और संगठन को मजबूत करे, धीरधीरे इस काम को विस्तार दे. अपने खर्चों को चलाने के लिए आरएसएस से गुरुदक्षिणा लेनी शुरू की. हर साल गुरुपूर्णिमा के अवसर पर इस का आयोजन होता है.

फ्रांसीसी राजनीतिक वैज्ञानिक क्रिस्टोफ जैफ्रेलो का कहना है कि आरएसएस का उद्देश्य हिंदुत्व की विचारधारा का प्रचार करना और बहुसंख्यक समुदाय को ‘नई शारीरिक शक्ति’ प्रदान करना था. 1927 में आरएसएस में लगभग 100 स्वयंसेवकों को शामिल करने के बाद गणेश पूजा के लिए मुसलिम क्षेत्र में ले जाया गया. गणेश के लिए हिंदू धार्मिक जुलूस का नेतृत्व इन लोगों ने किया. पहले जुलूस मसजिद के सामने से नहीं गुजरता था. इस को तोड़ते हुए न केवल जुलूस निकाला गया बल्कि ढोल बजाए गए.

4 सितंबर को लक्ष्मी पूजा के दिन, मुसलमानों ने जवाबी कार्रवाई की. जब हिंदू जुलूस नागपुर के महल क्षेत्र में एक मसजिद में पहुंचा तो मुसलमानों ने इसे रोक दिया. दोपहर में उन्होंने महल क्षेत्र में हिंदू आवासों पर हमला किया. दंगे 3 दिनों तक जारी रहे और हिंसा को शांत करने के लिए सेना को बुलाना पड़ा.

आरएसएस ने हिंदू प्रतिरोध का आयोजन किया और हिंदू परिवारों की रक्षा का दावा किया. इस घटना से आरएसएस की पहचान बनी. क्रिस्टोफ जैफ्रेलो ने आरएसएस की विचारधारा में आर्य समाज और हिंदू महासभा जैसे अन्य हिंदू राष्ट्रवादी आंदोलनों के साथ ‘कलंक और अनुकरण’ के विषय की तरफ इशारा किया है. मुसलमानों, ईसाइयों और अंगरेजों को हिंदू राष्ट्र में ‘विदेशी निकाय’ माना गया. जो हिंदुओं के बीच फूट और वीरता की कमी का फायदा उठा कर उन्हें अपने अधीन करने में सक्षम थे.

आरएसएस और हिंदू महासभा

हिंदू महासभा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर से अलग हुए गुट ने बनाई. इस के ऊपर आरएसएस का प्रभाव था. 1923 में मदन मोहन मालवीय जैसे प्रमुख हिंदू नेता इस मंच पर एकत्र हुए और ‘हिंदू समुदाय में विभाजन’ पर अपनी चिंता व्यक्त की. हिंदू महासभा में अपने भाषण में मालवीय ने कहा, ‘दोस्ती बराबरी के लोगों के बीच हो सकती है. अगर हिंदू खुद को मजबूत बनाते हैं और मुसलमानों के बीच उपद्रवी वर्ग को यह विश्वास हो जाता है कि वे सुरक्षित रूप से हिंदुओं को लूट और अपमानित नहीं कर सकते हैं

तो एक स्थिर आधार पर एकता स्थापित होगी. वे चाहते थे कि कार्यकर्ता सभी लड़केलड़कियों को शिक्षित करें, अखाड़े स्थापित करें, लोगों को हिंदू महासभा के निर्णयों का पालन करने के लिए राजी करने के लिए स्वयंसेवी दल स्थापित करें.

हिंदू महासभा के नेता वी डी सावरकर की ‘हिंदुत्व’ विचारधारा का भी आरएसएस की ‘हिंदू राष्ट्र’ वाली सोच पर गहरा प्रभाव था. 1931 में अकोला में हिंदू महासभा की वार्षिक बैठक के आयोजन में आरएएस ने अलग संस्था के रूप में हिस्सा लिया था. गणेश सावरकर ने स्थानीय नेताओं के साथ संपर्क शुरू कर के महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली और दूसरी रियासतों में आरएसएस की शाखाओं को फैलाने का काम किया. इसी के साथ सावरकर ने अपने युवा संगठन तरुण हिंदू सभा का आरएसएस में विलय कर इस के विस्तार में मदद की. 1937 में रिहा होने के बाद वी डी सावरकर आरएसएस के प्रसार में उस के साथ शामिल हो गए और समर्थन में भाषण दिए.

100 साल में मुद्दे जस के तस

आरएसएस का जन्म ही मुसलिम विरोध को ले कर हुआ. उस दौर में जितने भी हिंदूवादी विचारों के लोग थे सब ने आरएसएस का साथ दिया. इस के बाद आरएसएस ने अपना प्रभाव बनाना शुरू किया. अलगअलग सरकारों के साथ उस के संबंध रहे हैं. आजादी के बाद संघ ने अपना राजनीतिक संगठन भारतीय जनसंघ बनाया. 1977 में यह जनता पार्टी में विलय हो गया. इस के बाद 1980 में जनता पार्टी से अलग हो कर जनसंघ के लोगों ने भारतीय जनता पार्टी बनाई. इस के बाद 1989 में भाजपा पहली बार सत्ता में शामिल हुई. विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री बने. एक साल में ही भाजपा ने खुद को अलग कर लिया. 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई में भाजपा ने सरकार बनाई.

2014 में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तब से अब तक भाजपा का राज है. परोक्ष रूप से यह माना जाता है कि भाजपा के पीछे आरएसएस की ही ताकत है. आरएसएस इस बात से इनकार करता रहता है. संघ के 100 साल पूरे होने पर सरसंघचालक मोहन भागवत ने भाजपा और आरएसएस के संबंधों को ले कर कहा, ‘आरएसएस बीजेपी को नियंत्रित नहीं करता है. आरएसएस सु?ाव देता है, लेकिन बीजेपी अपने फैसले खुद लेती है. आरएसएस और सरकार के बीच कोई ?ागड़ा नहीं है.

‘अगर कोई व्यक्ति कुरसी पर बैठा है और वह हमारे लिए 100 फीसदी है तो भी उसे पता है कि क्या दिक्कतें हैं. हमें उसे आजादी देनी होगी. हमारी हर सरकार के साथ अच्छी बातचीत होती है, चाहे वह राज्य सरकार हो या केंद्र सरकार. सिर्फ इस सरकार के साथ ही नहीं, बल्कि हर सरकार के साथ आरएसएस के अच्छे रिश्ते रहे हैं. सिस्टम में कुछ कमियां हैं. यह सिस्टम अंगरेजों ने बनाया था ताकि वे राज कर सकें. हमें इस में कुछ बदलाव करने की जरूरत है.’

सवाल उठता है कि आरएसएस ने जो सपने देखे थे वे कितने पूरे हुए? समाज में अभी भी छुआछूत कायम है. हिंदूमुसलिम के बीच तनाव कायम है. दंगे होते हैं. वैसे, आरएसएस वाले हिंदूमुसलिम संबंधों को ले कर भी एकता की बात करते हैं. इस के बाद भी उसे वोट 80 बनाम 20 का बंटवारा करने पर ही मिलता है. भाजपा सरकार और संगठन दोनों में ही मुसलिमों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है. चुनाव लड़ने के लिए भाजपा उन को टिकट नहीं देती है. यह बात और है कि आरएसएस के कुछ लोगों ने भारतीय मुसलिम मंच बनाया है. मोहन भागवत मुसलिमों के साथ बातचीत भी करते हैं. दिल्ली के हरियाणा भवन में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने मुसलिम धर्मगुरुओं के साथ बैठक की. उस में 70 से ज्यादा मुसलिम धर्मगुरुओं, बुद्धिजीवियों, मौलानाओं, स्कौलर के बीच करीब 3 घंटे बातचीत हुई.

इस से पहले सितंबर 2022 में मोहन भागवत ने कई मुसलिम धर्मगुरुओं से मुलाकात की थी. बैठक में ज्ञानवापी विवाद, हिजाब विवाद और जनसंख्या नियंत्रण जैसे मुद्दों पर भी चर्चा हुई थी. उस दौरान भागवत दिल्ली की एक मसजिद में भी गए थे. संघ अपनी सहयोगी संस्था मुसलिम राष्ट्रीय मंच के जरिए मुसलिम मौलवियों, धर्मगुरुओं और समुदाय के प्रमुख लोगों के साथ बातचीत करता है. इस के बाद भी देश में मुसलिम विरोध पर ही भाजपा राजनीति कर रही है.

सामाजिक सुधारों में नाकाम आरएसएस

आज भी देश में गैरबराबरी है. हर शहर में गरीबों की बस्तियां हैं. अगर आरएसएस ने सही तरह से काम किया होता तो यह गैरबराबरी का दौर खत्म हो गया होता. सरकारी अस्पतालों में आरएसएस ने सेवाभाव से काम किया होता तो वहां गरीबों को सही इलाज मिल जाता. यही नहीं, आज सरकारी स्कूल बदहाल हैं. वहां पढ़ाई का माहौल नहीं है. ऐसे में आरएसएस को इन क्षेत्रों में काम करना चाहिए था. आरएसएस के लोग जो चाहते हैं वह करते हैं, चाहे मंदिर में पूजा हो, गणेश यात्रा, कांवड़ यात्रा जैसे धार्मिक आयोजन हों. उन्हें बजट की चिंता नहीं होती है.

आरएसएस बयान देने में आगे रहता है. उस की नजर में दलितों की कोई समस्या नहीं है. उसे लगता है कि हिंदूमुसलिम में कोई अलगाव नहीं है. मूल रूप से जो हालात हैं, उसे वह सम?ा नहीं रहा है. आरएसएस की विचारधारा हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र की है, जिस में दलित और मुसलिम दोनों के लिए कोई जगह नहीं है. ऐसे में बारबार संघ प्रमुख की बातें सवालों के घेरे में आती हैं. संघ प्रमुख की बातें हाथी के दांत जैसी हैं, जो खाने के और दिखाने के और होते हैं. भाजपा आज भी अपने मुद्दे संभल जैसे पुराने विवाद में तलाश रही है. मोहन भागवत कितना भी कहें कि हर मंदिर के नीचे मसजिद तलाशने की जरूरत नहीं है लेकिन काशी, मथुरा और संभल जैसी तमाम जगहों पर हो वही रहा है.

आरएसएस की स्वयंसेविकाओं के अधिकारों, उन की शिक्षा, उन की सुरक्षा, उन के रीतिरिवाजों के बोझ की चिंता नहीं है और न ही जातियों के बीच बढ़ती खाई की. आरएसएस तो वोटों की खातिर छोटीछोटी जातियों को उन के अपने देवी, देवता या महापुरुष खोज कर दे रहा है ताकि एक जाति का दूसरी में विलय न हो सके और वे ब्राह्मणों व सवर्णों के खिलाफ अपनी जनसंख्या के अनुपात में हकों की मांग करने के लिए एक मंच पर न आएं. RSS

Wealthy Indians: देश में बढ़ी अमीरों की संख्या, हुए दोगुने

Wealthy Indians: भारत में पिछले 4 सालों के दौरान करोड़पति परिवारों की संख्या में काफी तेजी से वृद्धि हुई है. हुरून इंडिया वेल्थ रिपोर्ट के अनुसार 2021 में देश में करोड़पति परिवारों की संख्या 4.58 लाख थी, जो 2025 तक बढ़ कर 8.71 लाख हो गई है. हालांकि अभी यह संख्या चीन और अमेरिका के करोड़पतियों के मुकाबले अभी कम है. रिपोर्ट साथ में यह भी कहती है कि आने वाले 10 सालों में यह संख्या 17.20 लाख तक पहुंच सकती है.

देश के राज्यों में महाराष्ट्र सब से आगे है जहां 1.78 लाख से अधिक परिवार ऐसे हैं जिन की संपत्ति 8.5 करोड़ रूपए से अधिक है. दूसरा नंबर दिल्ली का है जहां 79,800 ऐसे परिवार हैं. उस के बाद तमिलनाडु 72,600 परिवारों के साथ है. रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि देश में अमीर परिवारों की संपत्ति में काफी बढ़ोत्तरी हुई है.

बेशक देश में अमीरों की संख्या बढ़ रही है जिस पर कोई अतिराष्ट्रवादी गर्व कर सकता है पर हकीकत यह है कि इसी देश में गरीबों की हालत बेहद खस्ता है. अमीरों की लंबी लिस्ट बनाने में भले हम अमेरिका चीन का मुकाबला कर रहे हों पर हमारी प्रति व्यक्ति आय 2800 डौलर है जो अमेरिका के 75,000 डौलर और चीन के 14,000 डौलर से कई गुना कम है. जिस का मुकाबला हम करने में झिझक रहे हैं.

हकीकत यह है कि देश में आर्थिक असमानता काफी बढ़ी है. 80 करोड़ लोग सरकारी राशन पर अपना जीवन गुजरबसर कर रहे हैं और सरकारी सब्सिडी के मोहताज हैं. यह दिखाता है कि सरकार देश की आर्थिक नीतियां ऊपरी तबके के अनुसार बना रही हैं. Wealthy Indians

Japan Lifestyle: क्यों कहा जाता है जापान को सब से उम्रदराज लोगों का घर

Japan Lifestyle: जापान को सब से अधिक उम्रदराज लोगों का घर कहा जाता है. वहां जीवन प्रत्याशा दुनिया के किसी भी कोने में रह रहे लोगों से कहीं ज्यादा है. हाल ही में जापान ने घोषणा की कि वहां 100 साल से अधिक उम्र वाले बुजुर्गों की संख्या एक लाख के पार हो गई है. इस में महिलाओं की संख्या सब से अधिक 88 फीसदी है. जापान में सब से उम्रदराज शख़्स नारा शहर के उपनगर यामातोकोरियामा की 114 वर्षीय महिला शिगेको कागावा हैं. वहीं सब से उम्रदराज पुरुष तटीय शहर इवाता के 111 वर्षीय कियोताका मिज़ूनो हैं.

जापान 15 सितम्बर को वृद्धजन दिवस मनाता है और उस दिन देश में राष्ट्रीय अवकाश होता है. इस दिन देश के प्रधानमंत्री 100 साल पूरे करने वाले लोगों को बधाई पत्र और चांदी का कप भेंट करते हैं.

गौरतलब है कि 1960 के दशक तक जापान की कुल आबादी में 100 साल से अधिक आयु के लोगों की संख्या किसी भी जी-7 देश की तुलना में सब से कम थी लेकिन उस के बाद के दशकों में इस में उल्लेखनीय परिवर्तन आया. जब जापान की सरकार ने 1963 में 100 साल या उस से अधिक की आयु के लोगों का सर्वे शुरू किया तो उन की संख्या सिर्फ 153 थी.

यह आंकड़ा 1981 में बढ़ कर 1,000 और 1998 में बढ़ कर 10,000 हो गया. इस के बाद मात्र ढाई दशक में इस ने एक लाख का आंकड़ा छू लिया. आज जापान को सब से तेजी से उम्रदराज हो रहे समाज के तौर पर जाना जाता है. हालांकि यहां जन्म दर कम है.

इंसान अधिकतम कितने वर्ष इस धरती पर जीवित रह सकता है? इस सवाल का कोई सटीक जवाब नहीं है. हिंदू ग्रंथों में तो ऋषियों-तपस्वियों की आयु 200-300 साल तक बताई गई है. दरअसल मनुष्य का जीवन अनेक कारकों से प्रभावित होता है, जैसे – खानपान, प्रदूषण, बीमारियां, प्राकृतिक आपदाएं, तनाव, दुख आदि.

एक समय था जब भारत में लोग 45 से 55 साल तक ही जीवित रहते थे. बीमारियां उन्हें खत्म कर देती थीं क्योंकि अनेकों बीमारियों का इलाज तब तक नहीं मिल पाया था. मैडिकल साइंस ने तरक्की की तो लाइलाज कही जाने वाली बीमारियों का इलाज होने लगा. लिहाजा आज भारत में 80-90 साल तक भी लोग जी रहे हैं. मगर दुनिया के कई देशों जैसे लेसोथो और सोमानिया में इंसान की औसत आयु अभी भी 50-55 साल ही है. दूसरी ओर जापान जैसा देश है जिस में लोग जीवन जीने में न सिर्फ 100 का आंकड़ा पार करते दिख रहे हैं बल्कि बिलकुल स्वस्थ हालत में भी हैं. इतनी उम्र के बावजूद वे चलफिर रहे हैं, अपने रोजमर्रा के काम स्वयं कर रहे हैं.

जापानियों की लंबी उम्र का राज कई परतों में छुपा है. यह केवल आनुवंशिकी की वजह से नहीं है, बल्कि उन की जीवनशैली, खानपान और सामाजिक सोच का भी बड़ा योगदान है. दरअसल स्वस्थ और लम्बे जीवन के लिए जिन चीजों की आवश्यकता है उन्हें जापान ने बखूबी समझा और अपनाया. लम्बा और स्वस्थ जीवन के लिए तीन चीजें बहुत जरूरी हैं – संतुलित भोजन, व्यायाम और अनुशासन. जापानी लोग सेहत के लिहाज से स्वास्थ्य वर्धक खाना खाते हैं. जापानी लोग ज्यादातर हल्का, पौष्टिक और संतुलित भोजन करते हैं. मछली, समुद्री शैवाल, हरी सब्ज़ियां, सोया उत्पाद (टोफू, मिसो), हरी चाय उन की डाइट का अहम हिस्सा हैं.

वे कम तेल और कम चीनी का सेवन करते हैं, इसलिए मोटापा और हृदय रोग जैसी बीमारियां कम होती हैं. वे “हारा हाची बु” का सिद्धांत मानते हैं यानी पेट सिर्फ़ 80% भरने तक खाना खाना चाहिए.

दुनियाभर में दिल की बीमारियों और कुछ इस तरह के कैंसर से काफी मौतें होती हैं. इन कैंसर में मुख्य रूप से ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर शामिल हैं. अगर किसी देश में इन बिमारियों से ज्यादा मौतें नहीं होतीं या ये बीमारियां किसी देश में ज्यादा नहीं होतीं तो वहां ज्यादा लाइफ एक्सपेक्टेंसी यानी उच्च जीवन प्रत्याशा होती है.

जापान में मोटापे की दर बेहद कम है जो कि इन दोनों तरह की बीमारियों की मुख्य वजहों में से एक है. इस के साथ ही खाने में कम रेड मीट और अधिक मछली-सब्जियों का इस्तेमाल भी एक अहम वजह है. मोटापे की दर महिलाओं में विशेष रूप से कम है, जो इस बात को समझाने में मददगार हो सकती है कि जापानी महिलाओं की जीवन प्रत्याशा उन के पुरुष समकक्षों की तुलना में अधिक क्यों है.

दुनिया के बाकी हिस्सों में जैसेजैसे चीनी और नमक की मात्रा बढ़ती गई, जापान ने दूसरी ही दिशा को चुना. सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेशों के जरिए लोगों को नमक का सेवन कम करने के लिए सफलतापूर्वक राजी किया गया. लिहाजा हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज, तनाव और इन से उत्पन्न अन्य बीमारियां जापानी समाज में बहुत कम हैं.

जापान में सामान्य बीमारियों का प्रचलन कम है और देश में ग्रुप एक्सरसाइज की संस्कृति है. साल 1928 से एक डेली ग्रुप एक्सरसाइज रेडियो टाइसो जापानी संस्कृति का हिस्सा है. इसे सामुदायिक भावना के साथसाथ सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रोत्साहित करने के लिए बनाया गया था. 3 मिनट की यह रूटीन एक्सरसाइज टीवी पर प्रसारित की जाती है और पूरे देश में छोटेछोटे समूहों में इस का अभ्यास किया जाता है. गांव और छोटे कस्बों में लोग बागबानी और खेतीबाड़ी करते हैं, जो शरीर को सक्रिय रखता है.

जापान की यूनिवर्सल हैल्थकेयर प्रणाली सब के लिए सुलभ है. यहां नागरिकों की नियमित स्वास्थ्य जांच और रोकथाम पर जोर दिया जाता है. इस के अलावा जापानी समाज में साफसफाई, अनुशासन और संतुलित दिनचर्या की आदतें काफी गहरी हैं. पैदल चलना, साइकिल चलाना और ताई-ची जैसी हल्की गतिविधियां बुज़ुर्गों में भी आम हैं. बुजुर्गों को समाज में सम्मान और सक्रिय भूमिका दी जाती है, जिस से तनाव कम और मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है. “इकिगाई” यानी जीवन का उद्देश्य की अवधारणा भी उन्हें लंबे समय तक सक्रिय रखती है.

लेकिन लम्बी उम्र की वजह में सिर्फ खाने की बात ही शामिल नहीं है. जापान के उम्रदराज लोगों ने अपनी बाकी की जिंदगी में सक्रिय रहने को चुना. वे अमेरिका और यूरोप के बुजुर्ग लोगों की तुलना में अधिक पैदल चलते हैं और सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते हैं. इस से एक तरफ उन का शरीर चुस्तदुरुस्त रहता है और सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल कर वे प्रदूषण को कम रखने में भी मदद करते हैं. प्रदूषण, जो स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक है.

जापान का पर्यावरण अपेक्षाकृत प्रदूषण मुक्त है. वहां अपराध दर भी बहुत कम है, जिस से मानसिक तनाव और असुरक्षा भी कम होती है. यही वजह है कि जापान दुनिया में सब से लंबी जीवन प्रत्याशा वाले देशों में गिना जाता है.

जापानी समाज में परिवार और समुदाय से जुड़ाव मजबूत है. बुजुर्ग अकेले नहीं रहते, उन का सम्मान और देखभाल होता है, जिस से मानसिक तनाव कम रहता है. वे काम, रिश्ते और शौक में संतुलन बना कर जीते हैं. सादगी और प्रकृति के नजदीक रहना तनाव कम करता है.

इस के विपरीत लेसोथो, सोमालिया या इथोपिया जैसे देशों में इंसान 5 दशक से ज्यादा नहीं जीता है. इन देशों में बीमारियां, कुपोषण, अपराध, झगड़े, तनाव जैसी नकारात्मक तत्वों ने इंसान से उस की आयु छीन ली है.

लेसोथो में एचआईवी संक्रमण दर बहुत ज़्यादा है, विशेष कर वयस्कों में (15-49 वर्ष आयु वर्ग), यह बीमारी मृत्यु दर बढ़ाती है और जीवन प्रत्याशा को घटाती है. एचआईवी-एड्स से जुड़े रोग जैसे कि टीबी भी व्यापक हैं और ये लोगों की बीमारी और मृत्यु का मुख्य कारण है.

इन देशों में स्वास्थ्य सेवाओं की कम पहुंच और संसाधनों की बेतरह कमी समयपूर्व ही लोगों की जान ले लेती है. अस्पतालों, दवाओं, वैक्सीनेशन कार्यक्रमों आदि में कमी है. लोगों के पास पर्याप्त खाना, स्वच्छ पानी, स्वच्छता सुविधाएं नहीं है. हर तरफ गरीबी और अपराध का बोलबाला है जो जीवन प्रत्याशा को प्रभावित करता है. Japan Lifestyle

Hindi Kahani: लावारिस – सुनयना और प्रमोद की अय्याशी क्या रंग लाई

Hindi Kahani: ‘‘तुम्हें गोली लेने को कहा था,’’ प्रमोद ने शिकायत भरे लहजे में कहा.

‘‘मैं ने जानबूझ कर नहीं ली,’’ सुनयना ने कहा.

‘‘पागल हो गई हो,’’ अपने कपड़े पहन चुके और बालों में कंघी करते हुए प्रमोद ने कहा.

‘‘बच्चा जिंदगी में खुशियां लाता है, घर में चहलपहल हो जाती है और बुढ़ापे का सहारा भी बनता है,’’ सुनयना ने प्रमोद को समझाया.

‘‘बंद करो अपनी बकवास. मैं तुम से बच्चा कैसे चाह सकता हूं. मेरी तो सोशल लाइफ ही खत्म हो जाएगी,’’ गुस्से से चिल्लाते हुए प्रमोद ने कहा.

‘‘तो आप को खुद ध्यान रखना चाहिए था. मैं ने आप से कंडोम का इस्तेमाल करने को कहा था.’’

‘‘मुझे मजा नहीं आता. आजकल तो औरतों के कंडोम भी आते हैं, तुम्हें इस्तेमाल करने चाहिए.’’

‘‘जो भी हो, इस बार मैं बच्चा नहीं गिरवाऊंगी,’’ सुनयना ने दोटूक कहा.

‘‘तो तुम पछताओगी,’’ धमकता हुआ प्रमोद बोला. फिर दरवाजा खोल वह बाहर चला गया.

प्रमोद कारोबारी था. उस के पास खूब दौलत थी. घर में खूबसूरत पत्नी थी और 3 बच्चे थे. प्रमोद ने अपना दिल बहलाने के लिए एक रखैल सुनयना रखी हुई थी. उस को फ्लैट ले कर दिया हुआ था. मिलने के लिए वह हफ्ते में 2-3 दफा वहां आता था. कभीकभी वह उसे बिजनैस टूर पर भी ले जाता था.

सुनयना तकरीबन 3 साल से प्रमोद के साथ थी. बीचबीच में 3-4 बार वह पेट से भी हुई थी, लेकिन चुपचाप पेट साफ करवा आई थी.

एक रात मेकअप करते समय सुनयना की नजर अपने चेहरे पर उभरती झुर्रियों और सिर में 3-4 सफेद बालों पर पड़ी. उसे चिंता हो गई कि अगर उस का ग्लैमर खत्म हो गया, तब क्या होगा?

प्रमोद को कोई और जवान रखैल मिल जाएगी. ऐसी औरतों को बुढ़ापे में कौन पूछता है.

सुनयना के पास प्रमोद द्वारा दिए गए जेवर काफी थे. बैंक के लौकर में जमापूंजी भी काफी थी. अपने मातापिता को पैसे भेजने के बाद भी उस के पास अच्छीखासी रकम बच जाती थी.

उसी रात सुनयना ने सोचा कि अगर उसे प्रमोद से एक बच्चा हो जाए, तो वह उस के बुढ़ापे का सहारा बन जाएगा.

इस के बाद से सुनयना ने पेट से न होने वाली गोलियों को खाना बंद कर दिया था. प्रमोद भी कंडोम का इस्तेमाल कम ही करता था. नतीजतन, सुनयना पेट से हो गई.

प्रमोद गुस्से से लालपीला हो रहा था. कल को सुनयना उसे ब्लैकमेल कर सकती थी.

3-4 दिन बाद प्रमोद सुनयना से मिलने आया और उस से पूछा, ‘‘बच्चा गिरवाया कि नहीं?’’

‘‘मैं ने तुम से कहा था न कि मैं बच्चा चाहती हूं.’’

‘‘तुम से मेरा बच्चा कैसे हो सकता है?’’

‘‘क्यों नहीं हो सकता? यह बच्चा मेरे बुढ़ापे का सहारा बनेगा.’’

उस शाम को प्रमोद सुनयना के पास जैसे आया था, वैसे ही चला गया. उस के मन में एक ही सवाल उठ रहा था कि अगर सुनयना उस के बच्चे को जन्म देगी, तो क्या होगा?

‘‘मेरे पेट में पल रहे बच्चे के पीछे आप क्यों पड़े हैं? आप मुझे जवाब दे दें, तो कहीं और मैं चली जाती हूं,’’ अगली बार प्रमोद के आने पर सुनयना ने पूछा.

‘‘बच्चा मुझ से है. नाजायज है, मेरे लिए वह परेशानी खड़ी कर सकता है.’’

‘‘क्या परेशानी खड़ी कर सकता है वह?’’

‘‘मेरा वारिस बनने का दावा कर सकता है.’’

‘‘ऐसा कैसे हो सकता है? मैं बताऊंगी तभी न.’’

‘‘बच्चा कल को पूछ भी तो सकता है कि उस का पिता कौन है?’’

‘‘लेकिन, मैं एक बच्चा चाहती हूं.’’

‘‘इस को गिरवा कर तुम किसी और से बच्चा गोद ले लो.’’

‘‘फर्ज करो कि वह आप से नहीं किसी और से है तब?’’

‘‘बकवास मत करो. मैं जानता हूं कि यह मुझ से है.’’

‘‘मैं आप की वफादार हूं और वफादारी का यह इनाम है.’’

यह सुन कर प्रमोद दनदनाता हुआ वहां से चला गया. वह कानूनी और सामाजिक पचड़े के बारे में सोच रहा था कि कल को अगर मैडिकल रिपोर्ट का सहारा ले कर सुनयना बच्चे को उस का बच्चा साबित कर के उस की जायदाद में से हिस्सा मांग सकती है.

प्रमोद की कशमकश को सुनयना बखूबी समझ रही थी. उस ने चुपचाप अपना सामान समेटना शुरू कर दिया.

एक दिन वह फ्लैट छोड़ कर चली गई. 2 दिन बाद प्रमोद ने फ्लैट का चक्कर लगाया. उस को वहां सन्नाटा मिला. सुनयना कहां गई? धरती निगल गई या आसमान?

प्रमोद कुछ दिनों तक बेचैन रहा, फिर खाली फ्लैट को आबाद करने के लिए एक नई उम्र की कालगर्ल को ला कर बसा दिया.

प्रमोद को यह डर बराबर सता रहा था कि सुनयना उस के सामने उस की नाजायज औलाद को वारिस के तौर पर न ले आए.

एक दिन कार से गुजरते समय प्रमोद की नजर एक नर्सिंगहोम के बाहर रिकशे से उतरती एक औरत पर पड़ी. उस का पेट फूला हुआ था. गौर से देखने पर पता चला कि वह तो सुनयना ही थी. वह जल्दी ही बच्चा जनने वाली थी.

प्रमोद ने कार सड़क की एक तरफ रोक दी और सुनयना के बाहर निकलने का इंतजार करने लगा. लेकिन वह काफी देर तक बाहर नहीं निकली.

तब प्रमोद ने अपना मोबाइल फोन निकाला और नर्सिंगहोम के बाहर लगे बोर्ड पर लिखा मोबाइल फोन नंबर पढ़ कर उस पर फोन किया.

‘‘हैलो, यह अस्पताल का रिसैप्शन है?’’ प्रमोद ने पूछा.

‘जी हां, बोलिए.’

‘‘अभी थोड़ी देर पहले मिसिज सुनयना ने डिलीवरी के लिए विजिट किया था, क्या उन को एडमिट किया गया है?’’

‘जी हां, उन को मैटरनिटी वार्ड में एडमिट कर लिया गया है.’

‘‘थैक्यू,’’ प्रमोद ने इतना कह कर फोन काट दिया.

अब प्रमोद को सुनयना और उस के बच्चे को खत्म करना था. वह अपनी फैक्टरी पहुंचा. अभी तक उस की जिंदगी बिना रुकावट वाली रही थी. उस का अब तक किसी से पंगे वाला वास्ता नहीं पड़ा था.

प्रमोद की फैक्टरी का मैनेजर अरुण बड़ा ही धूर्त था. मालिक के कई उलझे मामले उस ने सुलझाए थे, लेकिन ऐसा पंगा कभी नहीं निबटाया था.

‘‘साहब, आप को सुनयना और उस का बच्चा क्या परेशानी दे सकता है?’’ अरुण ने पूछा.

‘‘कल को वह मेरा वारिस होने का दावा कर सकता है.’’

‘‘क्या सुनयना ने कभी ऐसा इरादा जाहिर किया है?’’

‘‘नहीं. वह तो कहती है कि बच्चा बुढ़ापे का सहारा बनेगा. वह उस बच्चे को पैदा करना चाहती है.’’

‘‘तो इस में आप को क्या परेशानी है?’’

‘‘अरे भाई, कल को वह बच्चा बड़ा हो कर मेरे सामने आ कर खड़ा हो सकता है. मेरी सोशल लाइफ खराब हो सकती है.’’

‘‘वह बच्चा आप से ही है, क्या यह बात सच है?’’

‘‘वह तो यही कहती है. मेरा भी यही विश्वास है कि वह वफादार है.’’

‘‘आप क्या चाहते हैं?’’

‘‘बच्चे और मां को खत्म करना है, खासकर बच्चे को.’’

‘‘ऐसा काम मैं ने कभी नहीं किया. फिर भी देखता हूं कि क्या हो सकता है,’’ अरुण ने कहा.

अरुण सुनयना को पहचानता था. वह नर्सिंगहोम पहुंचा. जच्चाबच्चा वार्ड में सुनयना एक बिस्तर पर लेटी थी.

‘‘एक रिश्तेदार को देखना है. एक मिनट के लिए अंदर जाने दें,’’ अरुण ने वार्ड के बाहर बैठी एक औरत से कहा. इजाजत मिलने के बाद वह अंदर गया और कुछ ही पलों में लौट आया.

सुभाष और अर्जुन सुपारी किलर थे. उन्हें सुनयना को खत्म करने की सुपारी दी गई थी. वे दोनों एक कार में बैठ कर बारीबारी से नर्सिंगहोम की निगरानी करने लगे थे.

‘‘आप यहां अकेली आई हैं? आप के साथ कोई नहीं है?’’ लेडी डाक्टर ने मुआयना करने के बाद सुनयना से पूछा.

‘‘जी, मेरी मजबूरी है,’’ इस पर लेडी डाक्टर समझ गईं.

सुनयना कुंआरी मां बनने वाली थी. ऐसे मामले नर्सिंगहोम में आते रहते थे, लेकिन कानूनी औपचारिकता अपनी जगह थी. इलाज, डिलीवरी या औपरेशन के दौरान मरीज की मौत हो सकती थी, इसलिए किसी जिम्मेदार आदमी के फार्म पर दस्तखत कराना जरूरी था.

‘‘आप की जिम्मेदारी के फार्म पर दस्तखत कौन करेगा?’’

‘‘मैं खुद ही करूंगी.’’

‘‘ऐसा नहीं हो सकता.’’

तभी सुनयना को दर्द शुरू हो गया. चंद मिनटों के बाद उस ने एक खूबसूरत बच्चे को जन्म दिया. सारी औपचारिकताएं धरी की धरी रह गईं.

4 दिन बाद सुनयना को छुट्टी मिल गई. बच्चे को गोद में उठाए वह नर्सिंगहोम से बाहर आई. आटोरिकशे में बैठी. उस के पीछे किराए के हत्यारों की कार लग गई.

इंस्पैक्टर मधुकर लोकल थाने के एसएचओ थे. वे चुस्त और मुस्तैद पुलिस अफसर थे. दोपहर का खाना खाने के बाद वे चंदू पनवाड़ी के यहां पान खाते थे. इस बहाने से वे इलाके का दौरा भी कर लेते थे.

नर्सिंगहोम से आटोरिकशे में बैठी सुनयना के पीछे किराए के हत्यारों की कार लगी थी. उन की यह हरकत जीप पर सवार एसएचओ मधुकर की निगाह में आ गई. उन के एक इशारे पर ड्राइवर ने जीप कार के पीछे लगा दी.

आटोरिकशा एक बस्ती में पहुंचा. सुनयना उतरी, भाड़ा चुकाया और अपने किराए के कमरे की तरफ बढ़ी. पीछे आ रही कार थमने लगी. तभी सुभाष की नजर पीछे से आ रही जीप पर पड़ी.

‘‘अर्जुन, कार मत रोकना. पीछे एसएचओ आ रहा है,’’ सुभाष ने कहा, तो अर्जुन ने कार की रफ्तार बढ़ा दी.

एचएचओ मधुकर ने जीप में सादा कपड़ों में बैठे एक पुलिस वाले को इशारे से कुछ समझाया. वह पुलिस वाला सुनयना की निगरानी करने लगा. कार का नंबर नोट कर मधुरकर ने पुलिस कंट्रोल रूम को भेज दिया.

चंद मिनटों में शहर के खासखास इलाकों में तैनात पुलिस की गाडि़यों को उस कार के बारे में हिदायतें मिल गईं. एक चौराहा पार करते समय एक कार उस कार के पीछे लग गई. उस कार में सादा ड्रैस में मुखबिर थे.

एसएचओ मधुकर थाने पहुंचे. थोड़ी देर में उन का मोबाइल फोन बजा, ‘सर, उस कार में 2 लोग हैं, जो अपराधी नहीं दिख रहे हैं,’ मुखबिर ने खबर दी.

‘‘ठीक है, तुम उन पर निगाह रखो,’’ इंस्पैक्टर मधुकर बोले.

थोड़ी देर बाद एक बस्ती में तैनात मुखबिर का फोन आया, ‘‘साहब, खतरा है.’’

‘‘क्या खतरा है?’’

‘‘जान जाने का. और क्या खतरा हो सकता है?’’

‘‘तू उन मवालियों को पहचानता है क्या?’’

‘‘नहीं. पर मेरा अंदाजा है कि इस इलाके का खबरिया राम सिंह भी नहीं पहचानता होगा.’’

‘‘तब हम क्या करें?’’

‘‘इस बाई की हिफाजत और निगरानी.’’

‘‘खतरे की वजह?’’

‘‘इस का बच्चा.’’

‘‘क्या…’’

‘‘तेरी इस क्या का जवाब फिलहाल मेरे पास नहीं है.’’

सुनयना नहीं जानती थी कि वह पुलिस के जासूसों की नजर में आ चुकी है.

‘‘सेठ की माशूका और उस के बच्चे के ठिकाने का पता हम ने लगा लिया है. जल्दी ही वे दोनों को मार देंगे,’’ प्रमोद के मैनेजर अरुण को सुपारी लेने वाले ने बताया.

‘‘ठीक है. मेरा और सेठ का नाम नहीं आना चाहिए,’’ अरुण ने कहा.

‘‘आप तसल्ली रखें.’’

बच्चे के जन्म के बाद सुनयना ने अपनी एक सहेली मीरा को फोन किया, जो उस के बारे में सबकुछ जानती थी.

‘‘अरी, तेरे और तेरे बच्चे को मरवाने का ठेका दिया है सेठ ने,’’ उस की सहेली मीरा ने बताया.

‘‘क्या? उस को कैसे पता चला?’’

‘‘वह तेरे पीछे शुरू से ही लगा है.’’

‘‘तुझे किस ने बताया?’’

‘‘तेरी जगह फ्लैट में आई उस नई लड़की ने.’’

‘‘अब मैं क्या करूं?’’ सुनयना ने पूछा.

‘‘अपना ठिकाना बदल ले.’’

‘‘ठीक है,’’ सुनयना बोली.

दोनों सुपारी किलर सुभाष और अर्जुन आपस में सलाह कर रहे थे.

‘‘बाई इस बस्ती में है. कल उस का घर ढूंढ़ कर उसे खत्म कर देते हैं,’’ सुभाष ने कहा.

सुबह सुनयना बच्चे को कुनकुने पानी से नहला कर साफ कपड़े में लपेट चुकी थी. वह सोच रही थी कि कहां जाए? तभी उस को अपनी पुरानी सहेली प्रेमलता का ध्यान आया. वह एक अनाथालय की मैनेजर थी. सुनयना बच्चे को गोद में ले कर बाहर आई. उस ने एक आटोरिकशा किया. आटोरिकशे के चलते ही मवालियों की कार पीछे लगी. उस की खबर पुलिस कंट्रोल रूम को भी हो गई.

आटोरिकशा अनाथालय के बाहर रुका. ‘‘थोड़ी देर इंतजार करो. मैं अभी आई,’’ सुनयना ने आटोरिकशे वाले से कहा.

सुनयना को देखते ही प्रेमलता मुसकराई, ‘‘अरे सुनयना, तुम यहां कैसे आई?’’

‘‘मैं मुसीबत में फंस गई हूं. जरा यह बच्चा संभाल. मैं थोड़ा ठहर कर आऊंगी,’’ बच्चा देते हुए सुनयना ने कहा.

‘‘यह किस का बच्चा है?’’ प्रेमलता ने पूछा.

‘‘मेरा है,’’ सुनयना बोली.

‘‘तेरा है? तू ने शादी कर ली क्या?’’ प्रेमलता ने पूछा.

‘‘फिर बताऊंगी. शाम को आऊंगी. कुछ दिक्कत है.’’

प्रेमलता ने बच्चा थामा. सुनयना आटोरिकशे में बैठ रेलवे स्टेशन की ओर चली गई.

‘‘उस्ताद, बाई यतीमखाने में गई थी. वहां अपना बच्चा दे आई है, अब क्या करें?’’ सुभाष ने अर्जुन से पूछा.

‘‘सेठ कहता है कि बच्चे को पहले खत्म करना है. यतीम खाने में चलते हैं. बाई को फिर मारेंगे.’’

कार एक तरफ खड़ी कर वे दोनों सुपारी किलर अनाथालय में घुस गए. सुनयना के बच्चे को एक पालने में लिटा कर प्रेमलता मुड़ी ही थी कि 2 बदमाश नौजवानों को देख कर वह चौंकी, ‘‘क्या बात है?’’

‘‘अभी एक बाई तुझे बच्चा दे कर गई है. वह कौन सा है?’’ सुभाष ने कमरे में नजर डालते हुए पूछा. दर्जनों पालनों में नवजात बच्चे अठखेलियां करते दूध पी रहे थे.

‘‘बाई, कौन बाई?’’

‘‘जो अभीअभी यहां आई थी,’’ अर्जुन ने कहा.

‘‘यहां कोई बाई नहीं आई,’’ प्रेमलता बोली.

‘‘सीधी तरह मान जा. बता वह बच्चा कौन सा है,’’ अर्जुन ने चाकू निकालते हुए कहा.

तभी अनाथालय के दरवाजे पर एसएचओ मधुकर ने कदम रखा.

प्रेमलता पुलिस को देखते ही चीखी, ‘‘इंस्पैक्टर साहब, चोरबदमाश…’’

सिपाहियों ने घेरा डाल कर दोनों बदमाशों को पकड़ लिया. थाने में उन्होंने सब सचसच उगल दिया. मैनेजर अरुण के काबू में आते ही सेठ प्रमोद भी टूट गया.

‘‘आप या तो बच्चे और उस की मां को अपना लें, अन्यथा 10 साल की सजा भुगतें. बच्चा आप का वारिस फिर भी माना जाएगा,’’ इंस्पैक्टर मधुकर ने समझाते हुए कहा.

मरता क्या न करता, सेठ प्रमोद ने सुनयना को अपनी पत्नी और बच्चे को वारिस मान लिया. Hindi Kahani

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