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Kissing History: इंसानों ने चुंबन करना कब सीखा? मिले सबूत

Kissing History: किसी के प्रति प्यार, खुशी, स्नेह और परवाह को व्यक्त करने के लिए चुंबन या किस करना इंसानों के व्यवहार में स्वाभाविक तौर पर शामिल है. अक्सर लोग खुशी और प्यार का इजहार किस से करते हैं. यह मनुष्य की भावनाओं की अभिव्यक्ति का एक खूबसूरत तरीका है. मांबाप अपने बच्चोँ का चुंबन करते हैं तो दो घनिष्ठ दोस्तों के बीच भी चुंबन का आदानप्रदान होता है लेकिन अपनेपन और स्नेह के इस चुंबन से अलग दो प्रेम करने वालों का आपसी चुंबन बेहद अलग होता है. दो प्रेमियों के इस चुंबन में होंठ, जीभ और मुंह के अंदर का तरल पदार्थ शेयर होता है. ऐसे में एक अहम सवाल उठता है कि आखिर अपनी भावनाओं को किस या चुंबन के जरिए व्यक्त करना इंसानों ने कैसे और कब सीखा?

आइए सब से पहले जानते हैं की मनुष्यों ने कैसे किसी को किस करना सीखा. आज से 50 हजार पहले मनुष्य चुंबन लेना नहीं जानते थे. अपने प्यार और स्नेह को व्यक्त करने के लिए उन्हें यह तरीका मालूम नहीं था.

डेली मेल की एक रिपोर्ट के मुताबिक, वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि 50,000 साल पहले प्राचीन मानवों ने अपने निकटम संबंधी निएंडरथल मानवों से किस करना सीखा था. अध्ययन से पता चलता है कि निएंडरथल मानवों ने जब मनुष्यों को चूमा, तो होमोसेपियेंस भी उन्हें कौपी करते हुए ऐसा करने लगे और यहीं से चूमने की आदत इंसानों में विकसित हुई.

औक्सफोर्ड विश्वविद्यालय और फ्लोरिडा इंस्टीट्यूट औफ टेक्नोलौजी के शोधकर्ताओं ने इस बात के प्रमाण इकट्ठा किए हैं कि प्राचीन मानव लगभग 50,000 वर्ष पहले चुंबन करना सीख गए थे. निएंडरथल मानव हमारे सब से निकटम पूर्वज थे, जो लगभग 4 लाख साल से 40 हजार साल पहले तक यूरोप और पश्चिमी एशिया में रहते थे. हमारी प्रजाति, होमो सेपिंस, ने निएंडरथल के साथ संबंध बनाए थे. क्योंकि निएंडरथल डीएनए आज भी लोगों में मौजूद हैं.

फ्लोरिडा इंस्टीट्यूट औफ टेक्नोलौजी की प्रोफेसर और इस स्टडी की लेखिका कैथरीन टैलबोट ने कहा कि चुंबन करना एक साधारण बात लगती है लेकिन आश्चर्य की बात है की यह दुनिया के केवल 46 प्रतिशत इंसानी कल्चर में ही पाया जाता है. दुनिया भर में बहुत से ट्राइब्स ऐसे हैँ जिन में चुंबन का आदानप्रदान बिलकुल नहीं होता.

गाल पर किस करना चुंबन का सब से सरल और सहज तरीका है लेकिन किसी के साथ रोमांटिक रिलेशन बनाते वक्त वाला चुंबन सब से अलग होता है. इस रोमांटिक चुंबन को शोधकर्ता ‘एक विकासवादी पहेली’ कहते हैं. क्योंकि इस चुंबन में बड़ी मात्रा में एक दूसरे के बैक्टिरिया शेयर होते हैँ जिस से रोग संक्रमण का जोखिम होता है. वहीं इस चुंबन से रिप्रोडक्शन प्रोसेस में कोई लाभ भी नहीं मिलता. वैसे तो चुंबन के इतिहास को देखना मुश्किल है क्योंकि आरकियोलौजी से इस के सबूत ढूंढना असम्भव है. शोधकर्ताओं ने मनुष्य के सब से करीबी प्रजाति चिम्पांजी, बोनोबोस और ओरांगुटान के व्यवहार में शामिल चुंबन पर स्टडी की और यही से डेटा इकट्ठा किया.

विशेषज्ञों ने चुंबन को मुंह से मुंह का ऐसा संपर्क बताया जिस में भोजन का आदानप्रदान नहीं होता. प्राइमेट फैमिली ट्री की शाखाओं में चुंबन के विकास को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने बेयसियन मौडलिंग का इस्तेमाल किया. इस मौडल को 10 मिलियन बार चलाया गया, ताकि हमारे पूर्वजों के बारे में ठोस अनुमान लगाया जा सके जिन में लाखों वर्षो के दौरान चुंबन का विकास हुआ.

इस शोध के परिणामों से पता चलता है कि चुंबन की कला वानरों के पूर्वजों में 21.5 मिलियन से 16.9 मिलियन वर्ष पूर्व के बीच विकसित हो चुकी थी लेकिन इंसानों में लिप्स टू लिप्स वाले किस की शुरुआत 50 हजार साल पहले ही हुई है.

परिणामों से यह भी पता चला कि निएंडरथल अपने अस्तित्व के दौरान चुंबन करते थे यानी आधुनिक मानवों के सब से नजदीकी रिश्तेदार निएंडरथल प्रजाति कई लाख साल पहले से चुंबन करना जानते थे. निएंडरथल  के जिनोम में होमोसेपियंस के बैक्टिरिया मिले हैं जिस से यह साबित होता है की तकरीबन 50 हजार साल पहले मनुष्य और निएंडरथल ने रोमांटिक चुंबन के दौरान लार के माध्यम से बैक्टिरिया को साझा किया था.

यह सबूत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि मानव और निएंडरथल संबंध बनाने के दौरान एक दूसरे को चूमते थे. तभी से चुंबन इंसान सहित बड़े वानर प्रजातियों के व्यवहार में बरकरार है. साथ ही इससे यह भी स्पष्ट होता है कि इंसानों में निएंडरथल से किस करने की प्रवृति ट्रांसफर हुई.

पिछले साल ही वारविक विश्वविद्यालय के विकासवादी मनोवैज्ञानिक प्रोफेसर एड्रियानो लामीरा ने मानव चुंबन की विकासवादी शुरुआत को रेखांकित करते हुए एक रिसर्च पब्लिश किया था. उन्होंने कहा कि होठों को सिकोड़कर हल्के से चूसने की क्रिया एक समय में एकदूसरे के बालों से जूं को हटाने की तकनीक थी, लेकिन बाद में यह प्रक्रिया एक दूसरे से संबंध बनाने के दौरान स्वाभाविक रूप से इस्तेमाल होने लगी.

होमो सेपियंस और निएंडरथल के बीच चुंबन का आदानप्रदान भी ठीक ऐसे ही हुआ होगा. फिर होमोसेपिएंस ने अपनी प्रजाति के साथियों के साथ संबंध बनाने के दौरान चुंबन की शुरुआत की और ऐसे में यह प्रवृति निएंडरथल से हम इंसानों तक पहुंच गई. Kissing History.

Abortion Law India: गर्भपात कानून- कई सहूलियतों के बाद भी कायम हैं कुछ दुश्वारियां

Abortion Law India: यह उन मुकदमों में से एक था जो अदालतों का ध्यान कानूनी खामियों की तरफ खींचते हैं और उन में सुधार के लिए अदालतों को मजबूर कर देते हैं. सुप्रीम कोर्ट के इस एक फैसले ने खासतौर से कैसे गर्भपात को अविवाहिताओं के लिए आसान बनाया और कैसे कई सहूलियतों के बाद भी कुछ दुश्वारियां कायम हैं इस के लिए इस मामले को थोड़े से में समझना जरूरी है.

इस मामले में याचिकाकर्ता एक 25 वर्षीय युवती काल्पनिक नाम मान लें सीमा था जिसे 22-23 सप्ताह की प्रेगनैंसी थी. हर कभी साथ जीनेमरने की कसमे खाने वाला, सुखदुःख में साथ निभाने का वादा करते रहने वाला सीमा का प्रेमी उसे छोड़ कर गायब हो गया था जिस से वह परेशान थी. पार्टनर के साथ छोड़ देने के बाद पेट में पल रहा बच्चा उसे भार लगने लगा था. यह कोई नई बात नहीं थी क्योंकि ऐसा अक्सर होता है कि प्रेमिका या गर्लफ्रेंड के प्रेग्नैंट होते ही प्रेमी के हाथपांव फूलने लगते हैं. हाथपांव युवती के भी फूलते हैं क्योंकि एक अनचाही स्थिति उसके सामने भी होती है. ऐसे में प्रेमी साथ दे तो वह हिम्मत कर भी लेती है अबार्शन की भी और बच्चे को जन्म देने की भी बशर्ते वक्त रहते शादी हो जाएयह और बात है कि सहमती अक्सर अबार्शन पर ही बनती है.

सीमा के साथ जो हुआ उससे उसका टूट जाना स्वभाविक बात थी ऐसी हालत में युवतियों की सामने ज्यादा विकल्प नहीं होते सिवाय इस के कि वे दुनिया से छिप छिपाकर बच्चे को जन्म दे कर उसे किसी की मदद से यहांवहां कहीं देदे और फिर इसे बुरा सपना मानते छुटकारा पाकर सामान्य जिंदगी जीने की कोशिश करें.

इसके लिए भी कोई साथ देने तैयार न हो तो आत्महत्या कर लें.सीमा ने तीसरा रास्ता चुना वह था गर्भपात का चुना वह था लेकिन यह कोई आसान काम नहीं था क्योंकि इस में कानून आड़े आ रहा था.

इसके लिए वह सरकारी अस्पताल गई और मान्यता प्राप्त नर्सिंग होम्स भी गई. लेकिन दोनों ही जगह डाक्टरों ने यह कहते हाथ खड़े कर दिए कि चूंकि प्रेगनेंसी को 20 सप्ताह से ज्यादा का वक्त हो चुका है इसलिए कानून के मुताबिक वे अबार्शन नहीं कर सकते.लेकिन सीमा ने हार नहीं मानी उसने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया और अबार्शन की गुहार लगाई लेकिन हाई कोर्ट ने भी गर्भपात के कानून एमटीपी एक्ट का हवाला देते उसकी मांग ठुकरा दी.यह मामला एक्स बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी हेल्थ एंड वेलफेयर डिपार्टमेंट गवर्नमेंट आफ एनसीटी औफ दिल्ली के नाम से चला था. गोपनीयता के मद्देनजर पीड़िता की जगह एक्स लिखा गया था.

अपने 15 जुलाई 2022 के फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि चूंकि एमटीपी एक्ट नियम 3 बी ( सी ) में वैवाहिक स्थिति में बदलाव को केवल विधवा या तलाकशुदा के मामले में माना गया है. इसलिए अविवाहित महिला को 20 – 24 सप्ताह की बीच अबार्शन की इजाजत नहीं दी जा सकती.

पीड़ा एक अविवाहिता की

प्रेगनेंसी का यह मामला तकनीकी तौर पर कितना पेचीदा था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अपनी अपील में सीमा ने कहा था कि वह 15 जुलाई 2022 तक अबार्शन की इजाजत चाहती है. क्योंकि तब तक प्रेगनेंसी लगभग 24 सप्ताह की हो चुकी होगी. दिल्ली हाई कोर्ट ने सीमा की मानसिक तकलीफ और दूसरी आने वाली परेशानियों से कोई वास्ता न रखते सीधे एमटीपी एक्ट के नियम के मुताबिक लकीर का फकीर स्टाइल में फैसला दिया. साथ ही एक हास्यास्पद सुझाव सीमा को यह दे डाला कि अगर वह बच्चे को जन्म देना चाहती है तो उसे बच्चे को किसी को गोद दे देना चाहिए क्योंकि बच्चा गोद लेने वालों की लाइन लगी है. हाई कोर्ट इस बात पर अड़ा रहा कि कानूनी अनुमति नियमों के भीतर ही होनी चाहिए.

सीमा तुरंत सुप्रीम कोर्ट जा पहुंची. इस बार उसके साथ काबिल, तजुर्बेकार,जोशीले और होनहार वकीलों की टीम थी जिसकी अगुवाई संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ अपर गुप्ता ने की इस टीम में नामी मानवाधिकार महिला अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर के साथ आकांक्षा मेहरोत्रा, कृतिका अग्रवाल और अपूर्वा अग्रवाल शामिल थीं. इन सभी ने सीमा को उस गुनाह के लिएइंसाफ दिलाने में मदद की जो उसने किया ही नहीं था.

सीमा की पहली दलील यह थी कि यह फैसला करना उसका हक है कि बच्चे को जन्म दे या नहीं. इसके लिए उसने संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला देते यह भी जोड़ा कि उसकी प्राइवेसी और शारीरिक अखंडता यानी मेरा शरीर मेरा हक को ध्यान में रखा जाए. बकौल सीमा अविवाहित होने का यह मतलब नहीं कि उसे अबार्शन का हक न मिले. वैवाहिक बदलाव की स्थिति इतनी संकीर्ण नहीं होनी चाहिए कि वह सिर्फ तलाकशुदा और विधवा महिलाओं तक सीमित रहे.

सीमा की इस दलील में भी दम था कि यह भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है जो समानता का अधिकार देता है. यहां तो वैवाहिक स्थिति की बिना पर उससे अलग बर्ताव किया जा रहा है. तकनीकी खामियों की तरफ सुप्रीम कोर्ट का ध्यान खींचते उसने दलील दी कि साल 2021 में एमटीपी एक्ट में जो बदलाव हुआ वह यह दिखाता है कि संसद ने लिव इन या अविवाहित महिलाओं को भी इस कानून में शामिल करने का इरादा रखा था. नियमों की व्याख्या की जानी चाहिए बजाय इसके कि उसका शाब्दिक यानी ज्यों का त्यों का पालन किया जाए.

इसके बाद सीमा ने इस बात पर जोर दिया कि एक कुंवारी लड़की का प्रेग्नैंट होना कितना बड़ा सामाजिक कलंक माना जाता है. पार्टनर ने छोड़ दिया जिसके चलते वह अकेली मातृत्व की जिम्मेदारी नहीं उठा सकती. मानसिक भावनात्मक और सामाजिक रूप से अकेली हो गई युवती के लिए यह सब झेलना मुश्किल है. अगर यह प्रेगनेंसी जारी रही तो उसकी दिमागी सेहत के लिए यह खतरनाक साबित हो सकता है. अगर इसमें देरी हुई तो और अदालती कार्रवाई लंबी चली तो प्रेगनेंसी बढ़ती जाएगी और फिर नियमों के मुताबिक अबार्शन नहीं हो पाएगा. बकौल सीमा वह सुरक्षित गर्भपात चाहती है अबार्शन के लिए कोई नाजायज या गैरकानूनी तरीका नहीं अपनाना चाहती.

सुप्रीम कोर्ट ने समझा दर्द

यह एक नहीं बल्कि लाखों सीमाओं की दास्तां है जो वजह कुछ भी हों के चलते वक्त पर अबार्शन नहीं करा पातीं और बाद में कई दिक्कतों से घिर जाती हैं.इनकी तकलीफ जस्टिस डीवाय चन्द्रचूड़, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस जेबी पड़ीवाला की बेंच ने समझी और इन दिक्कतों का आंशिक हल सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का आदेश रद्द करते सीमा को दी गई राहत और सहूलियतों की शक्ल में दिया.

उसने सीमा की हरेक दलील से इत्तफाक रखते पहले तो एम्स दिल्ली को आदेश दिया कि वह तुरंत एक मेडिकल बोर्ड का गठन करे और अबार्शन अगर सुरक्षित हो तो उसे तुरंत करे जिस से गर्भ और न बढ़े.

आननफानन में 22 जुलाई 2022 को एम्स के 9 विशेषज्ञ डाक्टरों का बोर्ड गठित हुआ जिसने तय पाया कि सीमा के अबार्शन में मां और बच्चे को कोई खतरा नहीं तो जल्द ही सीमा को अनचाहे हो चले गर्भ से मुक्ति मिल गई. सुप्रीम कोर्ट का विस्तृत फैसला 29 सितंबर 2022 को आया जिसे नजीर माना जाता है. इस फैसले ने एमटीपी की नए सिरे से व्याख्या भी कर डाली. बकौल सुप्रीम कोर्ट –

अविवाहित महिला के साथ अलग व्यवहार असंवैधानिक है. कानून सभी महिलाओं पर समान रूप से लागू होगा. एमटीपी एक्ट के नियम 3 बी की व्याख्या मकसद के मुताबिक होना चाहिए नियम किसी को रोकने नहीं बल्कि सुरक्षा देने के लिए बनाए गए हैं. इस फैसले में अहम और दिलचस्प बात बात एमटीपी एक्ट 2021 में हसबेंड की जगह पार्टनर शब्द का जिक्र होना थी इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि लिव इन, बौयफ्रेंड या किसी भी तरह का संबंध मान्य है संसद का इरादा साफ़ है कि अविवाहित महिलाओं को भी संरक्षण मिले.

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि महिला का मानसिक स्वास्थ और सामाजिक दबावदोनों मेडिकल ग्राउंड हैं. अविवाहित प्रेगनेंसी सामाजिक कलंक होती है जिसे कानून अनदेखा नहीं कर सकता. इसीलिए प्रेगनेंसी में देरी से भी कोर्ट ने सहमति जताते तुरंत मेडिकल बोर्ड बनाने का आदेश दिया था. किसी भी महिला को गर्भ रखने मजबूर नहीं किया जा सकता यह संवैधानिक तौर पर मंजूर नहीं.सुरक्षित और कानूनी अबार्शन देने को राज्य की जिम्मेदारी भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में ठहराया.

इस सब के बावजूद कोर्ट अबार्शन के मामलों में अपनी यानी अदालतों की भूमिका से पर कुछ नहीं बोला. अगर पहला और आखिरी फैसला मेडिकल बोर्ड ने ही लेना है तो अदालती और कानूनी दखल की जरूरत और माने क्या. क्यों सीमा जैसी युवतियों को अदालत जाने मजबूर होना पड़ता है इस पर दोबारा विचार किए जाने की जरूरत है. कोई युवती या महिला सीधे सरकारी अस्पताल या रजिस्टर्ड क्लीनिक वगैरह में जाए तो फैसला लेने का हक भी सिर्फ डाक्टरों को होना चाहिएक्योंकि वही बेहतर समझते और तय करते हैं कि अबार्शन कितना सुरक्षित और कितना असुरक्षित है और इस से जच्चाबच्चा की जान को खतरा तो नहीं.

सीमा को अगर यह सहूलियत या फायदा पहले ही मिल गया होता तो उसे भटकना नहीं पड़ता इसे एमटीपी एक्ट के मद्देनजर देखें तो तस्वीर कुछ यों बनती है कि आजादी के बाद तक भारत में गर्भपात दंडनीय अपराध हुआ करता था. भारतीय दंड संहिता की धारा 312 -316 के मुताबिक अबार्शन करना, कराना और इसकी कोशिश करना कराना भी जुर्म था.

केवल वही गर्भपात क़ानूनी था जिस में डाक्टर यह साबित कर दे कि मां की जान बचाने के लिए यह करना जरूरी था. नतीजतन, अनचाहा गर्भ जो आमतौर पर बलात्कार से ठहरता था से बचने महिलाएं नीमहकीमी, अप्रिशिक्षित दाइयों और दूसरे देसी तरीकों जो अवैज्ञानिक ही होते थे का सहारा लेने मजबूर होती थीं जो जानलेवा ज्यादा साबित होते थे.

देर से मिली थी अबार्शन की सहूलियत

60 के दशक में सरकार का ध्यान बढ़ती मातृ मृत्युओं और अवैध तरीको से होने वाले गर्भपात पर गया तो उसने 1964 में डाक्टर शांतिलाल शाह की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया 2 साल बाद 1966 में इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट पेश की जिसमें सिफारिश की गई थी कि गर्भपात को नियंत्रित और सुरक्षित ढंग से जायज किया जाए. महिलाओं के स्वास्थ और जीवन को केंद्र में रखते प्रशिक्षित डाक्टरों को गर्भपात की इजाजत दी जाए. इस रिपोर्ट की बिना पर साल 1971 में कानून बना जिसे नाम दिया गया मेडिकल टर्मिनेशन आफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971 जो देश भर में 1 अप्रेल 1972 से लागू हुआ.

इस अधिनियम के मसौदे पर संसद में गर्मागर्म बहस हुई थी जिसका दकियानूसी कट्टरपंथी हिंदूवादी सांसदों ने जमकर विरोध किया था ( देखें बोक्स ). उस वक्त प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी थीं लिहाजा महिलाओं को एक और अधिकार देने का श्रेय उन्हें मिला . इसके पहले उनके पिता पंडित जवाहरलाल नेहरु 1956 में ही महिला हित और अधिकारों के कानून लागू कर चुके थे जिनसे पहली दफा महिलाओं को वोट देने का हक मिला था, मर्जी से दूसरी जाति और धर्म में शादी करने के साथ तलाक का भी अधिकार मिला था, पहली बार महिलाओं को जायदाद पर हक मिला था और बच्चा गोद लेने का हक भी हासिल हुआ था.

ऐसे कई कानूनी अधिकार पहली दफा महिलाओं को मिले थे जो धर्म के राज और मनमानी पर प्रहार थे और जिन्होंने पितृ सत्तात्मक व्यवस्था को कमजोर करते औरतों को बराबरी के हक दिए थे.

महिलाओं का जो अहम अधिकार गर्भपात का रह गया था वह मेडिकल टर्मिनेशन औफ प्रेगनेंसी एक्ट 1971 के जरिए मिला तो रूढ़िवादियों को एक और झटका लगा था जिनकी मंशा गर्भ की आड़ में भी महिलाओं को पारिवारिक और सामाजिक तौर पर दबाए रखने की थी. यह वह दौर था जब महिलाएं शिक्षित होकर नौकरियों में आ रही थीं अपने अधिकार और फैमिली प्लानिंग की अहमियत भी जानने समझने लगीं थीं. लेकिन प्रेगनैंसी और अबार्शन के मामले में पुरुषों की मोहताज थीं काफी कुछ हासिल हो जाने के बाद भी उन्हें यह अधिकार नहीं मिला था कि वे अपनी मर्जी से बच्चे पैदा करें या इच्छा सेहत और हिम्मत न होने पर बच्चे को जन्म देने से मना कर सकें. कुलजमा इस दौर में भी वे पैसे कमाने और घर गृहस्थी की जिम्म्मेदारियां सँभालने के साथसाथ बच्चा पैदा करने की मशीन थीं.

इस एक्ट में औपचारिक तौर पर महिलाओं को अबार्शन का हक दिया था लेकिन इसे जायज करार देना भी किसी चैलेंज से कम काम समाज के लिहाज से नहीं था. इसकी धारा 3 सबसे अहम थी जिसमें समय समय पर संशोधन भी हुए. शुरू में कहा गया था कि अबार्शन कोई भी एमबीबीएस डाक्टर करा सकता है बशर्ते वह यह महसूस करे कि मां की जिंदगी बचाने और उसके मानसिक व शारीरिक स्वास्थ के लिए यह जरूरी हो. एक्ट की धारा 3 ( 2 ) में यह प्रावधान था कि 12 सप्ताह का गर्भ गिराने एक डाक्टर की ही राय काफी है. धारा 3 ( 2 ) ( बी ) में यह अनिवार्यता कर दी गई कि गर्भ अगर 12 सप्ताह से ज्यादा का हो तो अबार्शन का फैसला 2 डाक्टर लेंगे.

एक अच्छी और जरूरी बात धारा 3 ( 3 ) में जोड़ी गई थी कि नाबालिगों को भी अबार्शन का हक रहेगा. लेकिन इसके लिए उसके क़ानूनी गार्जियंस की लिखित सहमति जरूरी रहेगी. धारा 3 (4) में प्रावधान था कि कोई भी वयस्क महिला अपनी लिखित सहमति दे कर अबार्शन करा सकती है. इस धारा में यह प्रावधान भी बतौर स्पष्टीकरण किया गया था कि बलात्कार के मामलों से हुई प्रेगनैंसी को महिला के मानसिक स्वास्थ के लिए गंभीर कष्ट माना जाएगा और शादीशुदा महिलाओं के मामले में यदि गर्भ निरोधक फेल हो जाता है तो उसे भी मानसिक कष्ट की श्रेणी में गिना जाएगा.

यह सहूलियत विरोधाभासी थी क्योंकि यह स्पष्ट नहीं हो रहा था कि अगर अविवाहित महिला गर्भ निरोधक की विफलता के चलते प्रेग्नैंट हो गई तो उसे यह अधिकार मिलेगा या नहीं. इससे सवाल खड़े होना शुरू हो गए थे कि अविवाहित महिला को इस स्थिति में अबार्शन का अधिकार क्यों नहीं.क्या शादी न करना कोई गुनाह है और क्यों इस कानून के जरिए नैतिकताथोपी जा रही है.

अविवाहित महिलाओं के साथ बड़ी दिक्कत यह थी कि डाक्टर्स कानून का हवाला देते उन्हें टरका देते थे. हकीकत में वे इसी एक्ट की धारा 5 ( 2 ) से डरते थे जो यह कहती थी कि अगर कोई भी इस एक्ट के नियमों की अनदेखी करते अबार्शन करता है तो यह भारतीय दंडसंहिता के मुताबिक 2 से लेकर 7 साल तक की कड़ी सजा का हकदार होगा.

यह भेदभाव हैरतअंगेज तरीके से लंबे समय तक बना रहा जिसे 2021 में संशोधित कर ठीक किया गया. विवाहित महिला को महिला और पति की जगह पार्टनर शब्द इस्तेमाल किया गया जिसका जिक्र सीमा ने अपनी याचिका में किया था. क्योंकि अब तक लिवइन के चलते प्रेगनैंसी के मामले अदालत जाने लगे थे. इस बदलाव से अबार्शन कराने वाली महिलाओं और इसे करने वाले डाक्टरों का डर दूर हुआ.

इसी संशोधन में यह प्रावधान भी किया गया कि अगर प्रेगनैंसी 24 सप्ताह से ज्यादा हो तो भी मेडिकल बोर्ड की इजाजत से अबार्शन किया जा सकता है. सीमा का मामला इसका भी उदाहरण ही है. एक अच्छा इंतजाम इस बदलाव में यह भी किया गया कि महिला की पहचान मेडिकल रिकार्ड और अबार्शन का विवरण किसी तीसरे व्यक्ति को नहीं बताया जाएगा. इसके लिए धारा 5 ( ए ) बनाई गई जिसमें एक साल की सजा का प्रावधान भी किया गया.

लेकिन यह सब यूं ही नहीं हो गया था बल्कि इसके लिए सरकार पर चौतरफा दबाव थे सामाजिक संगठन तो मांग कर ही रहे थे लेकिन कई हाई कोर्ट्स ने विवेक का इस्तेमाल करते हुए 20 सप्ताह से ज्यादा की प्रेगनैंसी को अबार्शन की इजाजत दी थी. सुप्रीम कोर्ट की 2016 से लेकर 2019 तक की गई टिप्पणियों ने भी सरकार को इस बारे में सोचने मजबूर कियाथा कि एमटीपी एक्ट अब बासी और आउटडेटेड हो चला है और 20 सप्ताह की समय सीमा वैज्ञानिक नहीं है.

जब अदालतों ने बलात्कार पीड़िताओं नाबालिगो और फीटल अब्नार्मिलटी वाले मामलों में मेडिकल बोर्ड की राय पर अबार्शन की इजाजत देना शुरू कर दी तो केंद्र सरकार को इसमें बदलाव करने मजबूर होना ही पड़ा.

इसके पहलेसाल 2003 में जो संशोधन इस एक्ट में किए गए थे उनमें अहम था सरकारी अस्पतालों के अलावा प्राइवेट क्लीनिकों को भी अबार्शन के लिए लाइसेंस देना इसी वक्त में ट्रेंड डाक्टरों के मापदंड निर्धारित किए गए.

एमपीटी एक्ट के बनने का ही नतीजा है कि देश में हर साल औसतन 1.56 करोड़ रजिस्टर्ड अबार्शन होते हैं जबकि एक साल में पैदा होने वाले बच्चों की तादाद 2.52 करोड़ है. यह तब है जब तरहतरह के कंट्रासेप्टिव उपलब्ध हैं और महिलाएं इनका इस्तेमाल बिना किसी हिचक के कर रही हैं.और जो पार्टनर के शादी के और दूसरे वादों पर एतवार करते वक्त गुजार देती हैं उनकी हालत सीमा सरीखी हो जाती है जिन्हें सुप्रीम कोर्ट तक जाने का रास्ता तो पता होता है लेकिन गर्भ निरोधकों के इस्तेमाल से जाने क्यों हिचकती हैं जबकि वे बहुत आसानी से हर कहीं गांवदेहातों तक में मिल रहे हैं.

इसके बाद भी यह सोचा जाना बेमानी नहीं कि हालात कुछ भी हों कोई भी महिला अबार्शन के लिए अदालत की मोहताज क्यों. जहां जा कर उस का तनाव  भागादौड़ी और दुश्वारियां और बढ़ जाते हैं. अदालत भी बिना मेडिकल बोर्ड की सलाह के कोई फैसला नहीं ले सकती इसलिए यह अधिकार मेडिकल बोर्डों और डाक्टरों को दिया जाना कोई हर्ज की बात तो नहीं.

इन्होंने किया था विरोध

शांतिलाल शाह कमेटी की रिपोर्ट के बाद जब संसद की बारी आई तो इस बिल पर बहस अगस्त 1971 में हुई थी लेकिन अच्छी बात यह थी कि इसका विरोध करने वाले सांसदों की संख्या दहाई का भी आंकड़ा नहीं छू पाई थी क्योंकि हर कोई देख और समझ रहा था कि देश भर की महिलाएं अबार्शन का अधिकार चाहती हैं.

ऐसे में बिल का विरोध करने का मतलब होगा महिलाओं के वोट गंवाना. इसके बाद भी कुछ सांसद खुद को विरोध करने से रोक नहीं पाए इनमें हैरत की बात है सत्तारूढ़ कांग्रेस के भी सांसद शामिल थे. जाहिर ये सभी सिरे से दकियानूसी और संकीर्ण धार्मिक मानसिकता वाले थे जिनकी नजर में औरत गुलाम और पांव की जूती होती है.

आरएसएस की विचारधारा से प्रभावित भारतीय जनसंघ के सांसद वसंत राव ओक ने इस बिल के विरोध में कहा था कि गर्भ में शिशु की हत्या अधर्म है. भारतीय संस्कृति में गर्भस्थ की रक्षा को धार्मिक – नैतिक कर्तव्य माना गया है इसलिए कानून द्वारा गर्भपात को जायज बनाना सांस्कृतिक धार्मिक मूल्यों के विरुद्ध होगा. अनचाहे गर्भ के नाम पर कानून का दायरा बढ़ता जायेगा और समाज में नैतिक पतन बढ़ेगा.

दूसरे कुछ हिंदूवादी सांसदों ने संसद के बाहर वसंत राव का समर्थन किया था लेकिन इस बहस से साबित हो गया था कि धर्म कोई भी हो महिलाओं को यह राहत नहीं देना चाहता. इसाई पृष्ठभूमि वाले निर्दलीय सांसद पीडी स्टीफन ने वसंत राव की बात इन शब्दों में की थी, कि इसाई धर्म शास्त्र के अनुसार गर्भाधान से ही जीवन आरम्भ हो जाता है इसलिए गर्भपात को मेडिकल टर्मीनेशन कहना गलत है यह तो टेकिंग अलाइफ है. अपनी बात में दम लाने स्टीफन ने बाइबिल का भी हवाला दिया था. जब इससे बात नहीं बनी तो वे कूदकर भारतीय सभ्यता की दुहाई यह कहते नजर आए थे कि भारतीय सभ्यता गर्भस्थ जीवन की पवित्रता को मानती है फिर चाहे वह हिंदू हो इसाई.

पेशे से वकील कांग्रस सांसद केपी उन्नीकृष्णन ने भी धार्मिक भाषा और विचारों को महिला हितों से उपर रखा उन्होंने कहा था कि भारत की सभ्यता चाहे हिंदूबौद्ध जैन परंपरा देखें गर्भस्थ जीवन को पवित्र मानती है इसलिए गर्भपात को चिकित्सीय प्रक्रिया कहना उचित नहीं. यह समाज की नैतिक दशा पर असर डालेगा इसे केवल स्वास्थ का प्रश्न मानना गलत है.धर्म शास्त्र गर्भस्थ जीवन को जीव मानते हैं.

आजादी के बाद माहौल बदला था इसलिए यह बिल लगभग सर्वसम्मति से पारित हो गया था फिर भी धर्म की बिना पर जिंदगी जीने वाले सांसदों ने अपनी भड़ास तो निकाल ही ली थी जो नक्कारखाने में तूती की आवाज सरीखी साबित हुई थी. Abortion Law India.

Smart Eating Habits: समझदारी से खाएं, बुद्धिमान कहलाएं

Smart Eating Habits: आप क्या खाते हैं, आप की लाइफस्टाइल कैसी है, आप की उम्र क्या है, आप के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य व सोचने से ले कर आप के महसूस करने तक आप को जो प्रभावित करता है वह है आप का खाना यानी आप के पोषण संबंधी विकल्प, जो पेट और मस्तिष्क के स्वास्थ्य को बेहतर करते हैं.

यदि आप शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से बेहतर महसूस करना चाहते हैं तो हर दिन समझदारी से खाएं और बेहतर महसूस करें. इस के लिए अच्छा खाएं. इस में शामिल करें पर्याप्त अनाज, फल और सब्जियां, पर्याप्त प्रोटीन व कैल्शियम लेकिन ध्यान दें, स्वास्थ्यवर्धक तेल चुनें, जिस्म को हाइड्रेटेड रखें, सेल्फ केयर करें.

हमारा खाना कार्य करने, चलने, सोचने, बढ़ने और हमारे शरीर की मरम्मत करने के लिए ईंधन का काम करता है लेकिन स्वस्थ रहने और महसूस करने के लिए बुद्धिमानी से खाना एक कला है. इस के लिए खाने की सही मात्रा, गुणवत्ता और प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज और विटामिन, अच्छे कार्बोहाइड्रेट-बुरे कार्बोहाइड्रेट, अच्छे वसा व बुरे वसा के संयोजन के बीच सही संतुलन बनाना आवश्यक है. इस के लिए बैलेंस डाइट (संतुलित आहार) लेना एक बेहतर विकल्प हो सकता है.

तो आखिर क्या है संतुलित आहार? संतुलित आहार दरअसल एक ऐसा आहार है जो समग्र स्वास्थ्य के लिए आवश्यक पोषक तत्व, जैसे विटामिन, खनिज, एंटीऑक्सिडेंट और मैक्रोन्यूट्रिएंट प्रदान करता है जिस में कार्ब्स, प्रोटीन, वसा, विटामिन, खनिज और फाइबर शामिल होते हैं. अपनी डाइट में ताजे फलों और सब्जियों को शामिल करें जबकि प्रोसेस्ड व जंक फूड्स से दूरी बनाएं. बैलेंस डाइट का उद्देश्य शरीर को ऊर्जावान बनाए रखना, उस की ग्रोथ में सहायता करना, इम्यूनिटी पावर को बढ़ाना और बीमारियों से शरीर को रोकना होता है.

कैसा हो संतुलित आहार?

संतुलित आहार के लिए अपने भोजन में प्रचुर मात्रा में फाइबर, मिनरल्स, विटामिन्स शामिल करना चाहिए. खाने में शकर और वसायुक्त पदार्थ कम से कम लें. फाइबर युक्त आहार के लिए अंकुरित अनाज, मोटे अनाज, कच्ची सब्जियां शामिल करें. खूब पानी पिएं ताकि आप के शरीर से विषैले पदार्थ बाहर निकल सकें. संतुलित आहार के लिए खाने में दूध, दही, एंटीऑक्सीडेंट फूड को शामिल करना चाहिए. शरीर को स्वस्थ रखने में विटामिन सी और डी, बी12 की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है. विटामिन डी कैल्शियम को शरीर में अवशोषित करता है. इस से हमारे नाखून, त्वचा की चमक आदि पर अच्छा असर पड़ता है.

कितनी कैलोरी?

आप को कितनी कैलोरी की आवश्यकता है, यह इस बात पर निर्भर है कि आप की दिनचर्या और उम्र क्या है? आप पुरुष हैं या महिला? पुरुषों को महिलाओं के मुकाबले ज्यादा कैलोरी की आवश्यकता होती है. यदि आप की फिजिकल एक्टिविटी कम है तो कम कैलोरी युक्त खाना खाएं. यदि हमें खुद के शरीर को स्वस्थ और सुडौल रखना है तो याद रहे कि हम जितना खाएं उतनी एक्टिविटी भी करें यानी कि जितनी कैलोरी लें उतनी बर्न भी करें. उम्र के हर पड़ाव में न्यूट्रियस और बैलेंस डाइट का शरीर पर अलग-अलग असर पड़ता है.

संतुलित आहार के फायदे

वजन प्रबंधन में मदद: संतुलित भोजन अतिरिक्त कैलोरी के बिना हमारे शरीर को आवश्यक पोषक तत्व प्रदान करता है, जिस से वजन नियंत्रण में रहता है.

बीमारियों से दूर रहते हैं: पोषक तत्वों से भरपूर भोजन का सेवन कार्डियोवैस्कुलर डिजीज, टाइप 2 डायबिटीज, हाइपरटेंशन जैसे रोगों व कुछ अन्य प्रकार के जोखिम को कम करता है.

ऊर्जा स्तर को बढ़ाता है: संतुलित आहार शरीर को उचित पोषण देता है और ऊर्जा स्तर को बढ़ाता है, जिस से कार्य करने की क्षमता बढ़ती है

तनाव को कम करता है: न्यूट्रियस आहार लेने से मानसिक स्वास्थ्य बेहतर रहता है, जिस से मूड स्विंग, अवसाद, चिंता और संज्ञानात्मक गिरावट का जोखिम कम होता है.

पाचन तंत्र बेहतर रहता है: न्यूट्रियस आहार जिस में प्रोटीन, आयरन, विटामिन खासकर सी, ए, और ई, ओमेगा-3 फैटी एसिड, जिंक और सेलेनियम हो, पूरे शरीर को स्वस्थ रखता है.

बच्चों के लिए संतुलित आहार के फायदे

बचपन से ही बच्चों में संतुलित आहार कई फायदे प्रदान करता है जो शरीर के समग्र स्वास्थ्य और विकास में सहायक होता है. इस के लिए बैलेंस डाइट लेना एक बेहतर विकल्प हो सकता है क्योंकि शरीर के सर्वांगीण विकास या ग्रोथ के लिए जिन पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है वे हमें संतुलित भोजन से ही मिलते हैं. पोषक तत्वों से भरपूर यह खाना इम्यून सिस्टम को मजबूती देता है जिस से बच्चों को संक्रमण और बीमारियों से लड़ने में मदद मिलती है.

उचित पोषण संज्ञानात्मक (कॉग्निटिव) कार्य का समर्थन करता है, जिस से बेहतर एकाग्रता, स्मृति और अकादमिक प्रदर्शन में सुधार होता है. संतुलित आहार बनाए रखने के लिए कुछ खाद्य पदार्थों से बचना आवश्यक है, जैसे प्रोसेस्ड फूड्स, जंक फूड, मीठे जूस, कोल्ड ड्रिंक, अतिरिक्त शर्करा, अत्यधिक सोडियम या नमक और कैलोरी से भरे मॉकटेल्स. वहीं, तले हुए और प्रोसेस्ड फूड्स में ट्रांस फैट पाए जाते हैं जो हृदय रोग के जोखिम को बढ़ाते हैं, इन से भी बचना चाहिए.

महिलाओं के लिए संतुलित भोजन

महिलाओं को घर से लेकर ऑफिस तक की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है. इस के लिए आवश्यक है कि वे खुद पूरी तरह से फिट और स्ट्रांग रहें. इस के लिए उन के खानपान का सही व न्यूट्रियस होना अति आवश्यक है.

अपनी उम्र के अनुसार आहार चुनें: 20 से 35 वर्ष की उम्र ग्रोथ की होती है, इस उम्र में प्रोटीनयुक्त, कार्बोहाइड्रेट्स जैसे गेहूं, चावल, रागी, ज्वार, बाजरा, ड्राई फ्रूट्स, नट्स, घी आदि को अपनी डाइट में शामिल करें.

40 से 50 वर्ष की उम्र में महिलाओं के शरीर में हार्मोनल बदलाव आते हैं. उन के इंसुलिन लेवल में बदलाव आता है और हड्डियों से संबंधित मेनोपॉज व और भी कई तरह की समस्याएं शुरू होने लगती हैं. इस के लिए ज्यादा फाइबर युक्त

हरी सब्जियां, कैल्शियम युक्त डेयरी प्रोडक्ट और नट्स अपने भोजन में शामिल करना चाहिए.

उम्र चाहे कोई भी हो, शरीर के जरूरी कार्य के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्त्वों को सुनिश्चित करना, ऊर्जा स्तर को बनाए रखना, वजन को नियंत्रण में रख कर रोगों से शरीर को दूर रखना और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में बैलेंस डाइट का महत्त्वपूर्ण रोल होता है.

खाएं सीजनल और लोकल फूड

कोशिश करें कि हमेशा सीजनल फल व सब्जियां ही अपने आहार में शामिल करें. ध्यान रहे कि वे लोकल हों क्योंकि हर जगह का तापमान, जल और वायु सब कुछ अलग-अलग होते हैं और उसी वातावरण के हिसाब से ही हमारा शरीर ढल जाता है. लोकल और सीजनल फल व सब्जियां सस्ती व हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती हैं. बेमौसम की चीजें खाने से बचें क्योंकि उन को उगाने के लिए काफी रासायनिक और कीटनाशक पदार्थों का उपयोग करना पड़ता है जोकि कहीं न कहीं हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाती हैं. कोशिश करें कि आप की थाली कलरफुल और सीजनल हो ताकि हर प्रकार के न्यूट्रिएंट्स शरीर को मिल सकें.

इस तरह आप अपने भोजन में पोषक तत्वों को शामिल कर के एक अच्छा स्वास्थ्य पा सकते हैं. बस, इस के लिए आवश्यकता है हर दिन आप समझदारी से खाएं और बेहतर महसूस करें. Smart Eating Habits.

Dual Insurance Planning: आधुनिक जीवनशैली में डुअल इंश्योरेंस प्लानिंग क्यों ज़रूरी है?

Dual Insurance Planning:  आधुनिक जीवनशैली कई तरह के जोखिम और चुनौतियां साथ लाती है. ये बढ़ते स्वास्थ्य खर्च से लेकर कई अनिश्चित परिस्थितियों से जुड़े हो सकते हैं. ज्यादातर लोग बीमा की अहमियत तो समझते हैं. लेकिन वे अक्सर यह तय करने में उलझ जाते हैं कि लाइफ इंश्योरेंस ज्यादा जरूरी है या हेल्थ इंश्योरेंस.

दरअसल दोनों ही बहुत अहम हैं. ये अलग अलग होते हुए भी एक दूसरे के पूरक बने रहते हैं. जानिए क्यों डुअल इंश्योरेंस प्लानिंग बेहद जरूरी है यानी लाइफ और हेल्थ दोनों का बीमा रखना एक सुरक्षित और संतुलित जीवन के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होता है.

आधुनिक जीवनशैली में लाइफ और हेल्थ इंश्योरेंस दोनों रखने के 6 बड़े कारण 

कई ऐसे कारण हैं जो किसी व्यक्ति के लिए दोनों हेल्थ और लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसियां रखना अनिवार्य बना देते हैं. नीचे दिए गए 6 मुख्य कारण इसकी स्पष्ट व्याख्या करते हैं –

  1. आधुनिक जोखिमों से व्यापक सुरक्षा प्रदान करता है.

आज के समय में जोखिम कई प्रकार के हो चुके हैं. जैसे क्रॉनिक बीमारियाँ, लाइफस्टाइल डिज़ीज़, एक्सीडेंट और परिवार के मुख्य कमाने वाले के खोने से आर्थिक असर. हेल्थ इंश्योरेंस किसी भी मेडिकल इमरजेंसी में आर्थिक सुरक्षा देता है. यह अस्पताल में भर्ती, इलाज और दवाओं का खर्च कवर करता है.
वहीं लाइफ इंश्योरेंस आपके न रहने की स्थिति में परिवार को आर्थिक स्थिरता प्रदान करता है. अगर पॉलिसीधारक का निधन हो जाए तो तयशुदा रकम परिवार या नामांकित व्यक्ति को मिल जाती है.
ये दोनों बीमा एक दूसरे के विकल्प नहीं हैं बल्कि पूरक हैं. हेल्थ इंश्योरेंस आपके वर्तमान जीवन के स्वास्थ्य से जुड़े खर्च संभालता है. जबकि लाइफ इंश्योरेंस परिवार के भविष्य को सुरक्षित रखता है.
कुछ बीमा कंपनियां आजकल लाइफ और हेल्थ दोनों कवरेज को मिलाकर कस्टमाइज्ड विकल्प देती हैं. ये बदलती जीवनशैली के अनुरूप होते हैं. इससे आप एक मजबूत दोहरी सुरक्षा कवच तैयार कर पाते हैं.

  1. आपके परिवार को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करता है.

लाइफ इंश्योरेंस मुख्य रूप से पॉलिसीधारक के परिवार के लिए सुरक्षा जाल का काम करता है. किसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति में अगर आपकी मृत्यु हो जाए तो परिवार को एकमुश्त रकम मिलती है. इससे वे अपने जीवनस्तर को बनाए रख सकते हैं. कर्ज चुका सकते हैं और बच्चों की शिक्षा या शादी जैसी जरूरतें पूरी कर सकते हैं.
यह खासकर उन परिवारों के लिए अहम है जहां सिर्फ एक व्यक्ति कमाता है. या जहां दोनों पति पत्नी की आमदनी से गृह ऋण, बच्चों की पढ़ाई जैसी जिम्मेदारियां पूरी होती हैं.
हेल्थ इंश्योरेंस केवल इलाज का खर्च वहन करता है. लेकिन खोई हुई आमदनी की भरपाई या परिवार के लंबे समय के आर्थिक भविष्य की गारंटी नहीं देता. यहीं पर लाइफ इंश्योरेंस की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है.

  1. स्वास्थ्य खर्चों को संभालता है, बचत को सुरक्षित रखता है.

तेजी से बढ़ते स्वास्थ्य खर्चों के कारण आज एक बार अस्पताल में भर्ती होना भी सालों की बचत मिटा सकता है. हेल्थ इंश्योरेंस आपको इन अनपेक्षित खर्चों से बचाता है. यह सर्जरी, गंभीर बीमारियों और अन्य मेडिकल आपात स्थितियों में आर्थिक सहायता देता है.
जिन परिवारों के पास पर्याप्त स्वास्थ्य बीमा नहीं होता उन्हें अक्सर एफडी तोड़नी पड़ती है. या संपत्ति बेचनी पड़ती है. इससे उनकी दीर्घकालिक वित्तीय योजनाएं प्रभावित हो जाती हैं.
अगर आपके पास हेल्थ इंश्योरेंस है तो आप निश्चिंत रह सकते हैं. आपकी बचत और निवेश अन्य जीवन लक्ष्यों के लिए सुरक्षित रहेंगे. जबकि बीमा आपके चिकित्सा खर्च का ध्यान रखेगा.

  1. सम्पूर्ण कल्याण के लिए दोहरी सुरक्षा देता है.

डुअल इंश्योरेंस प्लानिंग आपको किसी भी गंभीर बीमारी या अनपेक्षित जीवन घटनाओं से मजबूती से लड़ने में मदद करती है. लाइफ इंश्योरेंस आपके परिवार के भविष्य के लिए ढाल का काम करता है. वहीं हेल्थ इंश्योरेंस आपके इलाज के खर्चों में मददगार साबित होता है.
कुछ बीमा कंपनियाँ ऐसे डुअल बेनिफिट प्रोडक्ट्स भी देती हैं. जिनमें लाइफ और हेल्थ दोनों बीमे एक ही प्लान में शामिल होते हैं. इससे प्रक्रिया आसान हो जाती है. और आपको पूर्ण सुरक्षा मिलती है.
ऐसे एकीकृत समाधान आपके शारीरिक और आर्थिक दोनों स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं. इससे आपको मानसिक शांति और सुविधा मिलती है.

  1. बीमा कवरेज में मौजूद कमियों को पूरा करता है.

कोई भी एकल बीमा पॉलिसी हर तरह के जोखिम को पूरी तरह कवर नहीं कर सकती. कई बार आपके हेल्थ इंश्योरेंस में कुछ सीमाएं होती हैं. जैसे किसी विशेष इलाज पर कैप लगना या कुछ बीमारियों का एक्सक्लूज़न.
ऐसे में आप अतिरिक्त पॉलिसियां लेकर इन कमियों को पूरा कर सकते हैं. उदाहरण के तौर पर अपने बेस हेल्थ प्लान के साथ एक्सीडेंट कवर या क्रिटिकल इलनेस पॉलिसी जोड़ सकते हैं.
इसी तरह लाइफ इंश्योरेंस को भी अपने विशेष लक्ष्यों के अनुसार ढाला जा सकता है. जैसे टर्म प्रोटेक्शन, इनकम रिप्लेसमेंट या लोन कवरेज. इससे दावे के समय किसी अस्वीकृति का जोखिम घटता है. और आपको उचित समय पर पर्याप्त आर्थिक सहायता मिलती है.

  1. मानसिक शांति प्रदान करता है.

जीवन की अनिश्चितताएं चाहे स्वास्थ्य संबंधी आपात स्थिति हो दुर्घटना या समय से पहले मृत्यु. ये मानसिक तनाव और चिंता का कारण बन सकती हैं. डुअल इंश्योरेंस प्लानिंग आपको यह भरोसा देती है कि आप और आपका परिवार हर परिस्थिति में सुरक्षित हैं.
सही तरह से चुने गए लाइफ और हेल्थ इंश्योरेंस के संयोजन से आप निश्चिंत होकर अपने सपनों को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं. परिवार का ख्याल रखने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं. और जीवन का आनंद लेने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं. बिना इस डर के कि अगर कुछ हो गया तो.
लाइफ और हेल्थ इंश्योरेंस दोनों के उद्देश्य अलग हैं. लेकिन दोनों समान रूप से आवश्यक हैं. हेल्थ इंश्योरेंस आपके मेडिकल खर्चों से बचत की रक्षा करता है. जबकि लाइफ इंश्योरेंस आपके न रहने पर परिवार को आर्थिक सुरक्षा देता है.
दोनों मिलकर एक मजबूत वित्तीय आधार तैयार करते हैं. जिससे आप आधुनिक जीवन की जटिलताओं और जोखिमों से आत्मविश्वास के साथ निपट सकते हैं.
डुअल इंश्योरेंस प्लानिंग अपनाना यानी कई बीमा योजनाएँ लेना. यह आपके परिवार के भविष्य, आपकी मानसिक शांति और हर चुनौती का सामना करने की क्षमता में निवेश है. आज की अनिश्चित दुनिया में यह एक ऐसा निवेश है जिसे आप नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते.

. Dual Insurance Planning.

Readers’ Problems: “नौकरानी के तंग कपड़े”, “बदलता बड़ा भाई” और “शादी के बाद दोस्ती”

Readers’ Problems: पाठकों की समस्याएं:

 

मेरी नौकरानी तंग कपड़े पहन कर मेरे घर आती है.

मैं 32 वर्ष की गृहिणी हूं. वह अपने काम में बहुत अच्छी है, समय पर आती है, साफसुथरा काम करती है और घर के सभी सदस्य उसे पसंद करते हैं. लेकिन मुझे एक बात बहुत खटकती है, वह काम करते समय बहुत गहरे गले और तंग कपड़े पहनती है. मेरे पति घर से काम करते हैं. कई बार मुझे असहज महसूस होता है कि उन की नजर अनजाने में उस पर पड़ सकती है. मैं नहीं चाहती कि घर का माहौल बिगड़े, पर उस से सीधेसीधे कहना भी अजीब लगता है. मैं उसे कैसे समऊं कि वह थोड़ा सादे कपड़े पहना करे, बिना उसे बुरा लगे?

आप की असहजता पूरी तरह स्वाभाविक है. आप किसी के कपड़ों पर टिप्पणी करना नहीं चाहतीं लेकिन घर का वातावरण भी आपके लिए सुरक्षित और सहज रहना चाहिए. ऐसे मामलों में सीधी परंतु शालीन बातचीत ही सबसे सही रास्ता है. सही समय और लहजा चुनें. एक दिन जब घर में कोई और न हो तो उससे धीरे से कहें, ‘‘तुम बहुत अच्छा काम करती हो, हम तुम्हारे काम से खुश हैं. बस, एक छोटी सी बात है, अगर तुम घर पर काम करते समय थोड़ा साधारण कपड़े पहन लो तो मुझे अच्छा लगेगा. हमारे घर में सब लोग रहते हैं तो थोड़ा ध्यान रखना. तुम चाहो तो मैं तुम्हारे लिए एक एप्रन रख दूं ताकि काम करते समय आराम रहे.’’ आप का लहजा आरोप लगाने वाला नहीं, बल्कि स्नेहपूर्ण होना चाहिए. सीधे पति का नाम न लाएं. इससे उसे शर्म या झिझक महसूस हो सकती है. बात को घर के माहौल या परिवार के नियम के रूप में रखें. अगर आप स्नेह और मर्यादा के साथ बात करेंगी तो वह आप की बात समझेगी.

 

मेरा बड़ा भाई अब पहले से बहुत ज्यादा बदल गया है.

बचपन में हम बहुत करीब थे- खेलना, पढ़ना, हर बात साकरना लेकिन अब जब वह नौकरी करने बाहर चला गया है तो हमारे बीच दूरी बढ़ गई है. वह अब ज्यादा बात नहीं करता, कभीकभी फोन भी नहीं उठाता. जब मैं शिकायत करती हूं तो कह देता है कि ‘मैं व्यस्त हूं.’ मुझे बहुत दुख होता है, लगता है जैसे मेरा भाई अब पहले जैसा नहीं रहा. क्या यह स्वाभाविक है या मैं ने ही कुछ गलत किया है?

भाई-बहन का रिश्ता बचपन की यादों से जुड़ा होता है, इसलिए जब उस में बदलाव आता है तो दिल को चोट पहुंचती है. लेकिन याद रखिए, जिंदगी के अलगअलग पड़ाव रिश्तों की अभिव्यक्ति भी बदल देते हैं. आप का भाई अब जिम्मेदारियों में व्यस्त है, शायद मानसिक दबाव भी झेल रहा हो. इस का यह मतलब नहीं कि उस के मन में आप के लिए अपनापन कम हो गया है. बस, उस का तरीका बदल गया है. उस से नाराज होने के बजाय प्यार से बात करें. अपने जीवन में भी कुछ नया जोड़ें- कोई हौबी, पढ़ाई या काम. इस से मन का खालीपन कम होगा. त्योहार या जन्मदिन पर उसे छोटा सा उपहार या पत्र भेजें. शब्दों में अपनापन झलकता है. समय और स्नेह दोनों सब से बड़े सेतु हैं. थोड़ा धैर्य रखें. भाईबहन का रिश्ता कभी टूटता नहीं. बस, कभीकभी धूल जम जाती है, जिसे हमें खुद साफ करना पड़ता है.

 

क्या दोस्ती भी किसी रिश्ते की तरह बदल जाती है.

मेरी सब से अच्छी दोस्त रिया शादी के बाद बदल गई है. पहले हम हर बात शेयर करते थे, हर पल साथ बिताते थे लेकिन अब वह मुझे कम फोन करती है, बातें औपचारिक रह गई हैं और हमारी मुलाकातें भी कम हो गई हैं. मुझे उस की खुशी चाहिए लेकिन लगता है जैसे मैं अब उस के जीवन में पहले की तरह अहम नहीं रही. कभी जो मेरी ताकत थी, अब वही दूरी बन गई है. क्या दोस्ती शादी के बाद भी वैसे ही बनी रह सकती है, क्या मैं फिर से उसके जीवन में पहले जैसी जगह पा सकती हूं?

रिया की शादी के बाद जो बदलाव आया है, वह स्वाभाविक है. हर इंसान के जीवन में एक समय आता है जब जिम्मेदारियां, वातावरण व प्राथमिकताएं नई दिशा ले लेती हैं. वह अब एक नई दुनिया में है जहां उसे नए रिश्तों को निभाने, खुद को साबित करने और संतुलन बनाए रखने की जरूरत है. शादी के बाद चीजें बदलती ही हैं क्योंकि लड़की नए घर में जाती है. भले ही वह आप से कम बात करती हो या मेलजोल कम कर रही हो तो इस का मतलब यह नहीं कि आप को वह अहमियत नहीं दे रही. इस स्थिति को छोड़ दिए जाने की तरह न देखिए. कभीकभी हमें अपने रिश्तों को सांस लेने की जगह देनी पड़ती है ताकि वे खुद से लौटें, मजबूरी से नहीं, अपनत्व से. रिया से बात कीजिए लेकिन शिकायत के लहजे में नहीं बल्कि सहजता से. चूंकि वह नए घर में गई है तो थोड़ा समय उसे सैटल होने में लगेगा ही. सच्ची दोस्ती कभी नहीं खोती. बस, कभीकभी खामोश हो जाती है. समय, अपनापन और थोड़ा धैर्य देने से रिया फिर से वही बन जाएगी जो आप के हर सुखदुख में पहले थी. दोस्ती की खूबसूरती यह है कि जब लौटे तो वहीं से शुरू हो जहां छोड़ा था.

-कंचन

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RA Studio Mumbai Case: ऑडिशन के नाम पर अपहरण, माता-पिता के लालच पर उठते सवाल

RA Studio Mumbai Case: मुंबई के आर ए स्टूडियो में ऑडिशन के नाम पर 17 बच्चों का अपहरण किया जाना सिर्फ एक आपराधिक घटना ही नहीं है बल्कि इस ने माता-पिता, सिस्टम और फिल्म इंडस्ट्री की ऑडिशन प्रक्रिया पर गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या बच्चों की सुरक्षा का जिम्मा सिर्फ पुलिस का है या फिल्मी ग्लैमर के पीछे अभिभावकों की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है?

हाल ही में मुंबई के पवई इलाके में स्थित ‘आर ए स्टूडियो’ में रोहित आर्या ने 17 नाबालिग बच्चों को एक वेब सीरीज के लिए बाल कलाकारों के चयन के नाम पर औडिशन लेने के बहाने बंधक बना लिया था. मुंबई पुलिस पूरी मुस्तैदी से हरकत में आई और महज 2 घंटे के अंदर सभी 17 बच्चों के साथ ही एक वयस्क पुरुष और एक वयस्क महिला को छुड़ा लिया पर इस कार्यवाही के दौरान पुलिस की गोली रोहित आर्या के सीने में लगी, अस्पताल में रोहित आर्या को मृत घोषित कर दिया गया. इस पूरे घटनाक्रम के दौरान सभी 17 बच्चों के माता-पिता और कुछ स्थानीय निवासी आम दर्शक बने इमारत के बाहर खड़े रहे और अब प्रत्यक्षदर्शी अपनी पहचान छिपा कर कह रहे हैं कि यह सब किसी फिल्म की शूटिंग जैसा ही उन्हें लग रहा था.

सभी 17 बच्चे सकुशल अपने माता-पिता के साथ अपने-अपने घर पहुंच गए. पुलिस अपना काम कर चुकी. एक वकील ने अदालत का रुख कर मांग की है कि पुलिस बल पर रोहित आर्या की हत्या करने का मुकदमा चलाया जाए. अदालत व पुलिस व प्रशासन क्या करेगा, यह तो वक्त की बात है लेकिन इस घटनाक्रम ने कई सवाल जरूर छोड़े हैं, जिन पर कोई विचार नहीं करना चाहता.

माना कि रोहित आर्या ने अक्षम्य अपराध किया था लेकिन एक बैंकर से समाजसेवी बने रोहित आर्या 2013 से सामाजिक कार्य करते आ रहे थे. वे कोई आतंकवादी नहीं थे. रोहित आर्या ने बच्चों को छोड़ने के लिए किसी भी तरह की फिरौती की रकम की मांग नहीं की थी. वे कुछ बात करना चाहते थे. घटना वाले दिन से पहले भी रोहित आर्या ने कुछ वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किए थे. उन सभी पर नजर दौड़ाई जाए तो सिस्टम, प्रशासन, महाराष्ट्र सरकार व पुलिस पर कई तरह के सवाल उठते हैं जिन का शायद नाटकीय अंदाज में पटाक्षेप कर दिया गया.

हमें लगता है कि इस पूरे घटनाक्रम के लिए सिस्टम, प्रशासन व सरकार को कटघरे में खड़ा करने या रोहित आर्या को दोषी बताने के साथ इस पूरे घटनाक्रम के लिए बच्चों के माता-पिता व फिल्म इंडस्ट्री में मौजूद ऑडिशन प्रक्रिया को भी कटघरे में खड़ा किया जाना चाहिए. रोहित आर्या की कार्य-शैली को देख कर हमें फिल्म ‘अ थर्सडे’, ‘द वेडनेसडे’, ‘पोशमपा’, सेक्टर 36, ‘तथास्तु’ और इरफान खान की फिल्म ‘मदार’ सहित कई फिल्मों की याद आती है.

वेब सीरीज में काम करने का अवसर देने के लिए ऑडिशन का एंगल समाज, बच्चों के माता-पिता तथा फिल्म इंडस्ट्री के ऑडिशन सिस्टम पर भी कई सवाल खड़े करता है.

प्रत्यक्षदर्शियों के हवाले से जो खबर आई है उस के अनुसार पवई की 27 मंजिली इमारत में यह स्टूडियो पहली मंजिल पर स्थित एक फ्लैट में बना हुआ था. कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि इसे एक सप्ताह पहले ही रोहित आर्या ने किराए पर लिया था और इसे ‘आर ए स्टूडियो’ नाम दिया था. इस इमारत में निर्माण कार्य चल रहा था.

बताया जा रहा है कि इस फ्लैट को किराए पर लेने से पहले ही रोहित आर्या ने सोशल मीडिया पर एक वेब सीरीज के लिए बाल कलाकारों की जरूरत व उन के ऑडिशन का विज्ञापन दिया था. यह अलग बात है कि हम ने काफी खोजा पर हमें ऐसा कोई विज्ञापन किसी भी सोशल मीडिया पर नहीं मिला. शायद बच्चों को बंदी बनाते ही यह विज्ञापन हटा दिया गया हो. अब लोग दावा कर रहे हैं कि रोहित आर्या मुंबई के बजाय महाराष्ट्र के दूरदराज इलाकों, मसलन ज्यादातर बच्चे नांदेड़ व उस के आसपास के इलाके के स्कूलों, से ले कर आया था. सभी बच्चे 14 साल की उम्र से कम थे. बच्चों की संख्या को ले कर भी प्रत्यक्षदर्शी और मीडिया रिपोर्ट्स भ्रामक हैं. कहा जा रहा है कि 25 बच्चों को ऑडिशन के लिए लाया गया था पर छुड़ाए तो 17 ही गए.

ऑडिशन प्रक्रिया भी सवालों के घेरे में

अमूमन फिल्म या टीवी सीरियल या किसी भी एड फिल्म के लिए कलाकारों के चयन के ऑडिशन बंद कमरों में नहीं होते. मुंबई के अंधेरी इलाके में आराम नगर में कम से 25 से 40 ऑडिशन सेंटर हैं, जहां हर दिन ऑडिशन चलते ही रहते हैं. इस के लिए कलाकार खुले मैदान में कतार लगा कर खड़े होते हैं और जिस कमरे में नए कलाकार का ऑडिशन होता है, उसे कोई भी इंसान बड़ी आसानी से देख सकता है. कुछ कास्टिंग कंपनियां ऑडिशन कमरे के अंदर लेती हैं, पर उन के कमरे के दरवाजे बंद नहीं होते. ऐसे में सवाल उठता है कि रोहित आर्या ने 17 बच्चों को एक-साथ ऑडिशन के लिए कमरे में कैद क्यों किया था और इन के माता-पिता इस के लिए तैयार क्यों हुए?

दूसरा अहम सवाल यह है कि ऑडिशन के लिए कैमरा व अन्य सामग्री उस फ्लैट में मौजूद थी या नहीं, इस पर पुलिस खामोश है. 17 बच्चों के साथ एक पुरुष और एक वयस्क महिला को भी छुड़ाया गया तो ये कौन थे, इन के बारे में भी कोई जानकारी नहीं है. 14 साल से कम उम्र के बच्चों को ऑडिशन या अभिनय करने के लिए भेजना भी कानूनन जुर्म है. ऐसे में पुलिस ने बच्चों के माता-पिता से पूछ-ताछ क्यों नहीं की?

बॉलीवुड में इन दिनों 2 चीजें धड़ल्ले से हो रही हैं. पहला नैपोकिड को बिना किसी ऑडिशन के घर बैठे फिल्मों में काम करने का अवसर मिल रहा है तो दूसरी तरफ ऑडिशन के नाम पर एक बहुत बड़ा रैकेट चल रहा है. कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा एक फिल्म के लिए कास्टिंग करने के लिए निर्माता से कई करोड़ रुपए लेते हैं. इस से फिल्म का बजट बढ़ जाता है. फिल्म के मुख्य कलाकारों का चयन निर्माता या निर्देशक खुद करते हैं. जी हां, सलमान खान या अक्षय कुमार या शाहरुख खान या अजय देवगन का चयन कोई कास्टिंग डायरेक्टर नहीं करता. फिल्म में मुख्य भूमिकाओं से इतर भूमिकाओं के लिए कलाकारों का चयन कास्टिंग डायरेक्टर करते हैं, जिन के ऑफिस के सामने ऑडिशन देने वालों की कतार लगी रहती है.

पहले राज कपूर, राज खोसला, ऋषिकेश मुखर्जी सहित सभी निर्देशक कलाकर को देख कर ही समझ जाते थे कि उस के अंदर प्रतिभा है या नहीं.

बालश्रम कानून व अन्य निर्देश

भारत में बालश्रम (निषेध और विनियमन) संशोधन अधिनियम 2016 के तहत बाल कलाकारों को संरक्षण प्राप्त है. नाबालिगों से जुड़े प्रोडक्शन हाउस को सख्त नियमों का पालन करना होता है. इन में काम के घंटे सीमित करना, यह सुनिश्चित करना कि शैक्षिक प्रतिबद्धताओं से समझता न हो, सुरक्षित परिवहन और स्वच्छ वातावरण प्रदान करना आदि शामिल होते हैं. वहीं, माता-पिता का कर्तव्य होता है कि वे प्रोडक्शन हाउस से इन नियमों के अनुपालन के बारे में सवाल करें. क्या आर ए स्टूडियो में इन का पालन हो रहा था? अगर नहीं, तो सवाल उठता है कि पालकों ने अपने बच्चों को ऐसी जगह क्यों भेजा?

कानूनन नाबालिग बच्चे को किसी भी ऑडिशन, टीवी के रियलिटी शो का हिस्सा बनने या अभिनय करने के लिए किसी भी एग्रीमेंट पर साइन करने का हक नहीं है, यह सारा काम बच्चों के लिए उन के माता-पिता करते हैं.

21वीं सदी में पूरा समाज बदला हुआ है. हर जगह मटेरियलिस्टिक दुनिया की ही मांग है. हर इंसान कम समय में ज्यादा से ज्यादा धन कमाने के साथ ही समाज में शोहरत व नाम चाहता है. इसी वजह से हम अपने 6 माह के बच्चे से ले कर किशोरवय बच्चों के साथ कास्टिंग एजेंसियों के दफ्तरों के चक्कर लगाते हुए देखते हैं.

बच्चे बन रहे सीढ़ी

आखिर ऐसा क्यों होता है? क्या माता-पिता अपने बच्चों के प्रति निष्ठुर होते हैं? जी नहीं. हर मां-बाप अपने बच्चों से बहुत प्यार करते हैं. मगर बदले हुए समाज में प्राथमिकताएं बदल गई हैं. आज हर माता-पिता की पहली प्राथमिकता यही होती है कि पड़ोसी या परिवार से जुड़ा कोई शख्स हो या कोई रिश्तेदार, उन सभी के सामने उन का अपना बच्चा हर मामले में बीस साबित होना चाहिए. दूसरी बात, सभी चाहते हैं कि उन के पास जो मान-सम्मान या शोहरत है वह उन के बच्चे के काम से रातों-रात आसमान पर पहुंच जाए.

कहने का मतलब यह कदापि नहीं है कि हर माता-पिता महज पैसे के लालच में अपने बच्चों को ऑडिशन के लिए या अपने अधूरे सपनों को बच्चों के माध्यम से पूरा करने के लिए उन्हें भेजते हैं. यह एक जटिल मुद्दा है जिस के कई कारण हो सकते हैं. कुछ माता-पिता वास्तव में अपने बच्चे की प्रतिभा को आगे बढ़ाने के लिए ऑडिशन में भेजते हैं.

हम एक बाल कलाकार से पांच-छह सालों से परिचित हैं. इस बाल कलाकार के पिता देश के एक राज्य के हाईकोर्ट में नौकरी कर रहे थे. उस वक्त उन की सैलरी करीबन एक लाख रुपए थी पर अपने बेटे के टैलेंट को देख कर उस के अधूरे सपनों को पूरा करने के लिए उसे ले कर मुंबई पहुंचे. मेन मुंबई से काफी दूर उपनगर में किराए के मकान में रहना शुरू किया. बेटे को ले कर सुबह से देर शाम तक ऑडिशन दिलाने के लिए भटकते रहते पर उन्होंने उस की पढ़ाई पर भी खास ध्यान दिया.

यह बाल कलाकार पढ़ाई में भी अव्वल है. यह बाल कलाकार कई बड़े बजट की फिल्मों के साथ ही दो-तीन फिल्मों में हीरो बन कर आ चुका है. अच्छा नाम कमा रहा है पर उस के पिता ने उस के सपनों को पूरा करने, उस के अंदर की प्रतिभा को निखारने के लिए अपना व्यवस्थित करियर दांव पर लगा दिया. तो वहीं हम देख रहे हैं कि कई माता-पिता खुद अभिनेता या गायक नहीं बन पाए. वे अपने ही टूटे सपनों को अपने बच्चे के माध्यम से पूरा करने की उम्मीद लगाए हुए उसे उकसाते रहते हैं. तो कुछ लोग अपनी संतान के माध्यम से सिर्फ धन कमाने पर ही अपना ध्यान केंद्रित रखते हैं, ऐसे ही माता-पिता की कमजोर नस को रोहित आर्या जैसे लोग दबा कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं पर इस तरह के कार्य में लिप्त माता-पिता का जमीर भी इन से इस सच को कबूल नहीं करवा पाता.

जल्दी शोहरत पाने का जरिया

कुछ माता-पिता अपने बच्चों के लिए ऐसे करियर की तलाश करते हैं जो स्थिर और सुरक्षित हो, जैसे कि उच्च वेतन वाले क्षेत्र, ताकि उन के बच्चों के पास एक सुदृढ़ और सफल भविष्य हो. लेकिन ग्लैमर व शानो-शौकत के दीवाने तो सभी हैं.

जी हां, सिनेमा की चमक-दमक और शानो-शौकत के साथ ही अटूट धन कमाने के लालच में कई माता-पिता यह उम्मीद करते हैं कि उन का बच्चा जल्दी से टीवी या फिल्म में अभिनय कर अच्छा पैसा कमा कर परिवार को वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने के साथ समाज में एक रुतबा दिलाए.

इस तरह के माता-पिता धन पाने की लालसा में इस कदर अंधे होते हैं कि वे सही या गलत का फैसला नहीं करते और रोहित आर्या जैसे लोगों के जाल में बड़ी आसानी से फंस कर अपने बच्चे की सुरक्षा को भी दांव पर लगा देते हैं. इस तरह के माता-पिता यह भूल जाते हैं कि अगर ऑडिशन या एक्टिंग के लिए बहुत कम उम्र में ही बच्चे पर दबाव डाला जाए तो यह उस के बचपन के आनंद को छीन सकता है और उसे एक मशीन की तरह महसूस करा सकता है.

हर माता-पिता को यह याद रखना चाहिए कि अगर वे अपने बच्चे पर उस क्षेत्र के लिए दबाव बना रहे हैं जिस में बच्चे की रुचि नहीं है तो फिर बच्चे पर जब माता-पिता की उम्मीदों का बोझ पड़ता है तो उसे मानसिक दबाव और निराशा का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे बच्चे के मन में असुरक्षा और हीन भावना का आना स्वाभाविक है.

जिम्मेदारियां समझनी जरूरी

ऐसा नहीं है कि हर माता-पिता स्वार्थी होते हैं. बदले वक्त व बदले हुए समाज में कई माता-पिता अलग सोच या उद्देश्य के चलते भी अपने बच्चों को औडिशन या एक्टिंग के लिए भेजते हैं. ऐसे में यदि उन का अपने बच्चे के साथ स्वस्थ संवाद न हो और आपसी समझ की कमी हो तो कई बार तनावपूर्ण हालात बनते देर नहीं लगते. ऐसे ही हालात रोहित आर्या जैसे लोगों को आपराधिक कृत्य में सहयोगी बन जाते हैं.

पिछले दिनों एक बाल कलाकार के पिता ने कहा  कि सपनों को पूरा करने के लिए कीमत चुकानी पड़ती है. जबकि उन की पत्नी यानी कि बाल कलाकार की मां का कहना था कि जब बच्चा खुद यह न समझे कि अपने सपनों को पाने के लिए उसे खुद प्रयास करना होगा, तब तक उस पर कुछ भी थोपना गलत है.

देश के हर नागरिक (माता-पिता, अभिभावक आदि) का कर्तव्य है कि वह बच्चों को हर तरह के दुर्व्यवहार से बचाते हुए सुनिश्चित करें कि बच्चे बालश्रम में शामिल न हों.

अफसोस की बात यह है कि सामाजिक रूप से खुद को बड़ा दिखाने व अन्य स्वार्थवश हर इंसान अपने बच्चे के प्रति अपने सही दायित्व व कर्तव्य का निर्वाह जाने-अनजाने नहीं कर रहा है. इसी का फायदा रोहित आर्या जैसे लोग अपने मकसद के लिए करने में सफल हो जाते हैं पर इस तरह के घटनाक्रमों का बालमन पर जो मनोवैज्ञानिक असर होता है, वह कब सामने आएगा, कोई नहीं बता सकता. RA Studio Mumbai Case.

Healthy Ageing Tips: लंबी उम्र का राज और जापानी मॉडल

Healthy Ageing Tips: जापान में वृद्धों को बोझ नहीं समझा जाता बल्कि उन्हें औनर की तरह लिया जाता है. यही कारण है कि जापान में जीवन प्रत्याशा बाकी देशों के मुकाबले काफी अधिक है. क्या है जापानी मॉडल, जानिए आप भी.

जापान को सब से अधिक उम्रदराज लोगों का घर कहा जाता है. वहां जीवन प्रत्याशा दुनिया के किसी भी कोने में रह रहे लोगों से कहीं ज्यादा है. हाल ही में जापान ने घोषणा की कि वहां 100 साल से अधिक उम्र वाले बुजुर्गों की संख्या एक लाख के पार हो गई है. इन में महिलाओं की संख्या 88 फीसदी है. जापान में सब से उम्रदराज शख्स नारा शहर के उपनगर यामातोकोरियामा की 114 वर्षीया महिला शिगेको कागावा हैं. वहीं, सब से उम्रदराज पुरुष तटीय शहर इवाता के 111 वर्षीय कियोताका मिज़ूनो हैं.

जापान 15 सितंबर को वृद्धजन दिवस मनाता है और उस दिन देश में राष्ट्रीय अवकाश होता है. उस दिन देश के प्रधानमंत्री 100 साल पूरे करने वाले लोगों को बधाई पत्र और चांदी का कप भेंट करते हैं.

गौरतलब है कि 1960 के दशक तक जापान की कुल आबादी में 100 साल से अधिक आयु के लोगों की संख्या किसी भी जी-7 देश की तुलना में सब से कम थी लेकिन उस के बाद के दशकों में इस में उल्लेखनीय परिवर्तन आया. जापान की सरकार ने 1963 में 100 साल या उस से अधिक की आयु के लोगों का सर्वे शुरू किया तो उन की संख्या सिर्फ 153 थी.

यह आंकड़ा 1981 में बढ़ कर 1,000 और 1998 में बढ़ कर 10,000 हो गया. इस के बाद मात्र ढाई दशकों में इस ने एक लाख का आंकड़ा छू लिया. आज जापान को सब से तेजी से उम्रदराज हो रहे समाज के तौर पर जाना जाता है. हालांकि, यहां जन्म दर कम है.

इंसान अधिकतम कितने वर्ष इस धरती पर जीवित रह सकता है? इस सवाल का कोई सटीक जवाब नहीं है. हिंदू ग्रंथों में तो ऋषियों-तपस्वियों की आयु 200-300 साल तक बताई गई है. दरअसल मनुष्य का जीवन अनेक कारकों से प्रभावित होता है, जैसे खान-पान, प्रदूषण बीमारियां, प्राकृतिक आपदाएं तनाव, दुख आदि.

एक समय था जब भारत में लोग 45 से 55 साल तक ही जीवित रहते थे. बीमारियां उन्हें खत्म कर देती थीं क्योंकि अनेक बीमारियों का इलाज तब तक नहीं मिल पाया था. मेडिकल साइंस ने तरक्की की. लाइलाज कही जाने वाली बीमारियों का इलाज होने लगा. लिहाजा, आज भारत में 80-90 साल तक भी लोग जी रहे हैं. मगर दुनिया के कई देशों, जैसे लेसोथो और सोमानिया में इंसान की औसत आयु अभी भी 50-55 साल ही है, दूसरी ओर जापान ऐसा देश है जिस में लोग जीवन जीने में न सिर्फ 100 का आंकड़ा पार करते दिख रहे हैं बल्कि बिलकुल स्वस्थ हालत में भी हैं. इतनी उम्र के बावजूद वे चल-फिर रहे हैं, अपने रोजमर्रा के काम खुद कर रहे हैं. है न आश्चर्य की बात.

जीवन शैली और खान-पान असरदार

जापानियों की लंबी उम्र का राज कई परतों में छिपा है. यह केवल आनुवंशिकी की वजह से नहीं है, बल्कि उन की जीवनशैली, खानपान और सामाजिक सोच का भी बड़ा योगदान है. दरअसल स्वस्थ और लंबे जीवन के लिए जिन चीजों की आवश्यकता है उन्हें जापान ने बखूबी समझ और अपनाया. लंबे और स्वस्थ जीवन के लिए 3 चीजें बहुत जरूरी हैं – संतुलित भोजन, व्यायाम और अनुशासन. जापानी लोग सेहत के लिहाज से स्वास्थ्यवर्धक खाना खाते हैं. जापानी लोग ज्यादातर हलका, पौष्टिक और संतुलित भोजन करते हैं. मछली, समुद्री शैवाल, हरी सब्जियां, सोया उत्पाद (टोफू, मिसो), हरी चाय उन की डाइट का अहम हिस्सा हैं. वे कम तेल और कम चीनी का सेवन करते हैं, इसलिए उन में मोटापा और हृदय रोग जैसी बीमारियां कम होती हैं. वे ‘हारा हाची बु’ का सिद्धांत मानते हैं यानी पेट सिर्फ 80 फीसदी भरने तक खाना खाना चाहिए.

जापान में मोटापे की दर बेहद कम है जोकि इन दोनों तरह की बीमारियों की मुख्य वजहों में से एक है. इस के साथ ही खाने में कम रेड मीट और अधिक मछली व सब्जियों का इस्तेमाल भी एक अहम वजह है. मोटापे की दर महिलाओं में विशेष रूप से कम है, जो इस बात को समझने में मददगार हो सकती है कि जापानी महिलाओं की जीवन प्रत्याशा उन के पुरुष समकक्षों की तुलना में अधिक क्यों है.

दुनिया के बाकी हिस्सों में चीनी और नमक की मात्रा बढ़ती गई जबकि जापान ने दूसरी ही दिशा को चुना. सार्वजनिक स्वास्थ्य संदेशों के जरिए लोगों को नमक का सेवन कम करने के लिए सफलतापूर्वक राजी किया. लिहाजा, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट डिजीज, तनाव और इन से उत्पन्न अन्य बीमारियां जापानी समाज में बहुत कम हैं.

लेकिन लंबी उम्र की वजह में सिर्फ खाने की बात ही शामिल नहीं है. जापान के उम्रदराज लोगों ने अपनी बाकी की जिंदगी में सक्रिय रहने को चुना. वे अमेरिका और यूरोप के बुजुर्ग लोगों की तुलना में अधिक पैदल चलते हैं और सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करते हैं. इस से एक तरफ उन का शरीर चुस्त-दुरुस्त रहता है और सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल कर वे प्रदूषण को कम रखने में भी मदद करते हैं. प्रदूषण स्वास्थ्य के लिए बहुत हानिकारक होता है.

जापानी समाज में परिवार और समुदाय से जुड़ाव मजबूत है. बुजुर्ग अकेले नहीं रहते, उन का सम्मान और देखभाल होती है, जिस से उन में मानसिक तनाव कम रहता है. वे काम, रिश्ते और शौक में संतुलन बना कर जीते हैं. सादगी और प्रकृति के नजदीक रहना तनाव कम करता है.

जापान में सामान्य बीमारियों का प्रचलन कम है और देश में ग्रुप एक्सरसाइज की संस्कृति है. साल 1928 से एक डेली ग्रुप एक्सरसाइज रेडियो टाइसो जापानी संस्कृति का हिस्सा है. इसे सामुदायिक भावना के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य को प्रोत्साहित करने के लिए बनाया गया था.

3 मिनट की यह रूटीन एक्सरसाइज टीवी पर प्रसारित की जाती है और पूरे देश में छोटे-छोटे समूहों में इस का अभ्यास किया जाता है. गांव और छोटे कस्बों में लोग बागवानी और खेती-बाड़ी करते हैं, जो शरीर को सक्रिय रखता है.

दुनियाभर में दिल की बीमारियों और कुछ तरह के कैंसर से काफी मौतें होती हैं. इन कैंसर में मुख्य रूप से ब्रैस्ट और प्रोस्टेट कैंसर शामिल हैं. अगर किसी देश में इन बीमारियों से ज्यादा मौतें नहीं होतीं या ये बीमारियां किसी देश में ज्यादा नहीं होतीं तो वहां ज्यादा लाइफ एक्सपेक्टेंसी (उच्च जीवन प्रत्याशा) होती है.

जीवन प्रत्याशा के सिद्धांत

जापान की यूनिवर्सल हेल्थ केयर प्रणाली सब के लिए सुलभ है. यहां नागरिकों की नियमित स्वास्थ्य जांच और रोकथाम पर जोर दिया जाता है. इस के अलावा जापानी समाज में साफ-सफाई, अनुशासन और संतुलित दिनचर्या की आदतें काफी गहरी हैं. पैदल चलना, साइकिल चलाना और ताई-ची जैसी हलकी गतिविधियां बुजुर्गों में भी आम हैं. बुजुर्गों को समाज में सम्मान और सक्रिय भूमिका दी जाती है, जिस से तनाव कम और मानसिक स्वास्थ्य अच्छा रहता है. ‘इकिगाई’ की अवधारणा भी उन्हें लंबे समय तक सक्रिय रखती है.

जापान का पर्यावरण अपेक्षाकृत प्रदूषण मुक्त है. अपराध दर बहुत कम है, जिस से मानसिक तनाव और असुरक्षा भी कम होती है. यही वजह है कि जापान दुनिया में सब से लंबी जीवन प्रत्याशा वाले देशों में गिना जाता है.

इस के विपरीत लेसोथो,  सोमालिया या इथियोपिया जैसे देशों में इंसान 5 दशक से ज्यादा नहीं जीता है. इन देशों में बीमारियां, कुपोषण, अपराध, झगड़े, तनाव जैसे नकारात्मक तत्वों ने इंसान से आयु छीन ली है.

लेसोथो में एचआईवी संक्रमण दर बहुत ज्यादा है, विशेषकर वयस्कों में (15-49 वर्ष आयु वर्ग). यह बीमारी मृत्यु दर बढ़ाती है और जीवन प्रत्याशा को घटाती है. एचआईवी-एड्स से जुड़े रोग, जैसे टीबी, भी व्यापक हैं और ये लोगों की बीमारी व मृत्यु का मुख्य कारण हैं.

इन देशों में स्वास्थ्य सेवाओं की कम पहुंच और संसाधनों की बेतरह कमी समयपूर्व ही लोगों की जान ले लेती है. अस्पतालों, दवाओं, वैक्सीनेशन कार्यक्रमों आदि की कमी है. लोगों के पास पर्याप्त खाना, स्वच्छ पानी, स्वच्छता सुविधाएं नहीं हैं. हर तरफ गरीबी और अपराध का बोलबाला है जो जीवन प्रत्याशा को प्रभावित करता है. Healthy Ageing Tips.

Cooking With Love: किचन में खाना ही नहीं बल्कि प्यार भी पकाएं

Cooking With Love: किचन में रोमांस का अपना एक अलग रोमांच और मजा है लेकिन तभी जब पति कुकिंग में भी पत्नी का सहयोग करें. नए दौर के कपल्स किचन रोमांस से अछूते नहीं हैं क्योंकि अब यह परदे पर भी दिखता है और पन्नों पर भी नजर आने लगा है. इसे और बेहतर कैसे बनाया जा सकता है, आइए देखें.

भाभी जी घर पर हैं टीवी सीरियल आमतौर फूहड़ कौमेडी के लिए कुख्यात है. यह और बात है कि इस में अकसर बौद्धिक कौमेडी के दृश्य और संवाद भी रहते हैं. इस धारावाहिक की लोकप्रियता की एक बड़ी वजह इस का रोमांटिक होना भी है जिस के 2 मुख्य पात्र विभु और अनीता रोमांस में नएनए प्रयोग करते रहते हैं. घर का कोई कोना ऐसा न होगा जिस में ये रोमांस करते न दिखाए गए हों. किचन इस का अपवाद नहीं है. विभु चूंकि नल्ला यानी बेरोजगार दिखाया गया है, इसलिए घर के सारे कामकाज उसे ही करने पड़ते हैं. झाड़ूपोंछा और कपड़े धोने से ले कर खाना भी वही बनाता है. एक तरह से वह हाउस हसबैंड है. किचन रोमांस टीवी धारावाहिकों में अब बेहद आम है और कुछ हिंदी फिल्मों में, प्रतीकात्मक तौर पर ही सही, दिखाया गया है.

इन फिल्मों में अकसर नायिका सुबह उठ कर खुले और गीले बालों में रसोई में चाय, नाश्ता या खाना बना रही होती है और पीछे से नायक आ कर उसे गुदगुदाने लगता है या बांहों में समेट कर बेडरूम में ले जाता है.

हौलीवुड की कई फिल्मों में खुलेआम न सिर्फ किचन में रोमांस दिखाया गया है बल्कि कुछ फिल्मों में तो सहवास के दृश्य भी दिखाए गए हैं. मसलन, 1987 में नायक माइकल डगलस और नायिका ग्लेन क्लोज अभिनीत फिल्म `फैटल अट्रैक्शन` में दोनों किचन में ही अंतरंग हो जाते हैं. हिंदी फिल्म निर्माता कभी इतनी हिम्मत नहीं कर पाए क्योंकि धर्म और संस्कृति के चलते दर्शक तो दर्शक, सैंसर बोर्ड भी शायद इस जुर्रत को बरदाश्त न करता और कट लगा ही देता.

भारतीय समाज से संयुक्त परिवारों का रिवाज अभी भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है लेकिन अब हो रहा है, तो किचन में रोमांस को स्वीकृति मिलने लगी है. ‘भाभीजी घर पर हैं’ के अलावा ‘तारक मेहता का उलटा चश्मा’ में केंद्रीय पात्र जेठालाल भी पत्नी दया से किचन में छेड़छाड़ और रोमांस किया करता है. ‘चेन्नई एक्सप्रेस’, ‘बधाई हो’, ‘चीनी कम’, ‘बागबान’ और ‘लंचबौक्स’ सरीखी दर्जनभर फिल्मों में इसी तरह का हलकाफुलका किचन रोमांस दिखाया गया है तो साफतौर पर यह सामाजिक बदलाव का भी संकेत है.

दरअसल, सिनेमा, साहित्य और पत्रिकाएं अहम इसलिए होते हैं कि वे आप के अंदर की उन इच्छाओं को सामाजिक स्वीकृति दिलवाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करते हैं जिन्हें पूरा करने में आप कोई दबाव महसूस कर रहे होते हैं. पारिवारिक जीवन में किचन रोमांस इन में से एक है.

शायद ही नहीं, बल्कि तय है इसीलिए दबाव से उबरते भारतीय कपल्स बेडरूम से निकल कर भी रोमांस करने लगे हैं क्योंकि घर के इस हिस्से यानी किचन में रोमांस का रोमांच ही अलग है. जहां अपनापन है, खाने की खुशबू है और रोमांस की अपनी सीमाएं भी हैं. हालांकि, नए दौर में किसी भाईभाभी, बहन या मांबाप के किचन में आने का खटका खत्म हो गया है. इस के बाद भी आमतौर पर कपल्स हदें पार नहीं करते और जब खुद पर काबू नहीं रख पाते तो बेडरूम का रुख कर लेते हैं. काबू न भी रख पाएं तो भी किचन में प्यार पकाना कतई हर्ज की बात नहीं. यानी, किचन स्वस्थ और हलकेफुलके से ले कर भारी रोमांस के लिए एक आदर्श जगह है जिस में रोमांस का एहसास और अनुभव ही अलग है जो ड्राइंगरूम और बाथरूम रोमांस से अलग है. इसे और अलग बनाता है पक रहा खाना और खाना बनाने में व्यस्त पत्नी जिस की झिड़कन और आमंत्रण में फर्क करना मुश्किल हो जाता है. यह एक पत्नी के अंदर की दबी इच्छा होती है कि पति किचन में उस के सामने रहे, उस का हाथ बंटाए, उस से बतियाए और साथसाथ रोमांस भी करता जाए. क्योंकि उस का अनुभव तो यही रहता है कि पिछली पीढ़ी तक के पति किचन में झांकना भी गुनाह समझते थे. वे सिर्फ और्डर चलाते थे और खाना खाना जानते थे. उस के बननेबनाने को एंजौय नहीं करते थे. फिर हाथ बंटाना तो उन के लिए तौहीन वाली बात होती थी. इस बदलते ट्रैंड में पति का रोल अहम हो चला है जो कुछ इस तरह से किचन रोमांस को परवान चढ़ा सकता है-

– रसोई पकाना अब सिर्फ पत्नी की जिम्मेदारी नहीं है बल्कि पति की भी है, इसलिए वह किचन में पर्याप्त समय गुजारे.

– आजकल बड़ी तादाद में पतिपत्नी दोनों कामकाजी होते हैं, इसलिए आमतौर पर घर में कुक भी होता है और जिन घरों में नहीं होता वहां पति नाममात्र का भी काम करते नजर नहीं आता.

– सुबह की अपनी व्यस्तताएं होती हैं, भागादौड़ी रहती है, इसलिए किचन रोमांस और शेयरिंग का मुनासिब वक्त शाम का ही रहता है. वीकैंड इस के लिए और बेहतर साबित होगा क्योंकि अगले दिन काम और औफिस की चिंता नहीं रहेगी और बच्चे अगर हों तो उन के स्कूल जाने का झंझट भी न रहेगा.

– अगर आप की मंशा किचन में जा कर पत्नी को सिर्फ बांहों में उठा लेने, कमर में चिकोटी काट लेने, उसे किस कर लेने या हग करने की है तो यकीन मानें आप उस के लिए परेशानियां और झल्लाहट ही पैदा करेंगे. इसलिए पहले उस के काम में हाथ बंटाइए या एकाधदो कामों की जिम्मेदारी लीजिए और फिर इसी दौरान ये सब शरारतें करिए तो आप को बराबर रिस्पौंस मिलेगा.

– हाथ बंटाने का यह मतलब नहीं कि आप को कोई कुदाली-फावड़ा चलाना है बल्कि किचन के प्लेटफौर्म पर बैठ कर या फिर कुरसी डाल कर पत्नी की आंखों में आंखें डाले सब्जी काटना है और उस की खूबसूरती की तारीफ करते रहना है. इस दौरान आप को आटा गूंथने या सब्जी काटने जैसा कोई काम जो भी आता हो उसे करते रहना है. इस से काम तो आसान हो ही जाएगा, साथ ही, रोमांस में भी नईनई फीलिंग्स आप महसूस करेंगे.

– किचन में रोमांस के दौरान हलका रोमांटिक गीतसंगीत का भी तड़का लगाएं. इस से दोनों का मूड और बनेगा. मोबाइल फोन का साउंड अच्छा हो तो यूट्यूब पर गाने सुने जा सकते हैं नहीं तो आजकल बाजार में बजट वाले ब्लूटूथ स्पीकर इफरात से उपलब्ध हैं.

– किचन में कुछ वक्त गुजार कर ही किचन की परेशानियों और जरूरतों को समझा जा सकता है जैसे गरमी में वहां पंखा या एसी हो तो काम करने के साथसाथ रोमांस करने में भी आनंद आएगा.

– अपनेपन, लगाव और छुअन सहित जो दूसरे एहसास किचन में होंगे वे घर के किसी दूसरे हिस्से में नहीं होते क्योंकि ड्राइंगरूम में टीवी व मोबाइल में ध्यान बंटा रहता है. लिविंगरूम बड़ा होने के चलते रुकावटें पैदा करता है तो बाथरूम रोमांस की मियाद बेहद कम होती है. तो देर किस बात की, आज से ही किचन रोमांस शुरू करें जिस का सब से बड़ा फायदा पतिपत्नी में नजदीकियां बढ़ने का होगा. पत्नी को यह महसूस होगा कि नए दौर का पति किचन में भी उस का हाथ बंटाना चाहता है. खाना बनाना एक अलग अनुभव है, समझदार और बीवी को वाकई में प्यार करने वाले पति सारा भार पत्नी पर नहीं डालते. फिर, यहां तो कुकिंग के साथ रोमांस फ्री मिल रहा है. Cooking With Love:

Migration Crisis India: पलायन की त्रासदी क्यों झेल रहे हैं कुछ खास राज्य?

Migration Crisis India: जमींदार और जातिवाद ने बोए पलायन के बीज – बिहार के विधानसभा चुनाव में हर बार की तरह इस बार भी पलायन का मुद्दा गायब रहा. सभी दलों ने गाहेबगाहे इस पर बात तो की मगर इस मुद्दे को जोरशोर से किसी दल ने अपनी मुहिम का हिस्सा नहीं बनाया. पलायन आज की समस्या नहीं बल्कि अंगरेजी हुकूमत के समय से है, जो आज भी ठीक नहीं हो पाई. इस समस्या की जड़ में सिर्फ बेरोजगारी नहीं है. यहां पेश है बिहार से बिहारियों के पलायन के पीछे की हकीकत की पड़ताल करती एक विश्लेषणात्मक रिपोर्ट.

बिहार का नाम असल में बौद्ध विहारों से निकला हुआ शब्द है. सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म का प्रचार सब से अधिक बिहार में किया था. विहार, बौद्ध मठों को कहा जाता था. उस समय बिहार राज्य बौद्ध धर्म का केंद्र था. इसी वजह से विहार नाम प्रचलन में आया, जो समय के साथ बदल कर बिहार बन गया. समय के साथ बिहार में बहुतकुछ बदला लेकिन पलायन की जो समस्या 1830 से शुरू हुई वह अभी तक जारी है. पहले गिरमिटिया मजदूर मौरिशस, फिजी, गुयाना कमाई के लिए गए थे और आज लोग दिल्ली, मुंबई, सऊदी अरब और दुबई वगैरह जा रहे हैं.

बिहार को बुद्ध और महावीर की धरती कहा जाता है. सम्राट अशोक ने इसी भूमि से पूरे भारत को जोड़ा था. मौर्यकाल से ले कर हर्षवर्धन के समय तक इन हजार वर्षों के बीच भारत की राजनीति के केंद्र में बिहार ही रहा. मुगलकाल में भी बिहार की सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक स्थिति मजबूत रही. इतने उन्नत और समृद्ध इतिहास के बावजूद बिहार आज सब से बीमार राज्य कैसे बन गया? इस से भी अहम बात यह कि पलायन बिहार से ही ज्यादा क्यों होता है? इस समस्या को समझने के लिए बिहार के अतीत से होते वर्तमान तक का सफ़र करें तो समझ आता है कि पलायन हमेशा से ही बिहारियों की नियति रहा है.

पलायन का मुद्दा बहुत गुत्थमगुत्था सा है. आज देश का कोई भी राज्य या शहर ऐसा नहीं है जहां बिहार के लोग न हों. बेरोजगारी देश के सभी राज्यों में है और अवसरों की तलाश में सभी राज्यों के लोग अपने राज्य को छोड़ कर इधर से उधर जाते हैं. यही कारण है कि नौर्थईस्ट के लोग साउथ में मिल जाएंगे और साउथ के लोग नौर्थईस्ट में. लेकिन बिहार की बात अलग है जो हर मोरचे पर पिछड़ा हुआ है.

पंजाब खेती में आगे है तो गुजरात इंडस्ट्री में अव्वल है लेकिन बिहार ऐसा राज्य है जो पूरे देश को सस्ते मजदूर मुहैया करवाने में नंबर वन है. यही कारण है कि पलायन बिहार की सब से बड़ी त्रासदी बन गई है. सवाल यह है कि बिहार में पलायन की यह त्रासदी क्यों है? (भारतीय संविधान में किस नियम के तहत पलायन का अधिकार है, देखें बौक्स 1).

बिहार को जमींदारी प्रथा ने बरबाद किया

बिहार से पलायन करने की दास्तान के पीछे जमींदारी प्रथा का बहुत बड़ा योगदान है. इस से ऊंची जातियां जमीन की मालिक बनीं और निचली जातियां भूमिहीन बन कर दरदर भटकने को मजबूर कर दी गईं. बिहार में जमींदारी प्रथा तो मुगलों के दौर से चली आ रही थी लेकिन तब जमींदारों का काम अपने इलाके से लगान वसूल कर दरबार तक पहुंचाना होता था. यह सिलसिला 1793 के स्थाई बंदोबस्त तक यों ही चलता रहा.

परमानैंट सैटलमैंट इस फसाद की जड़ नजर आता है जिसे ब्रिटिश सरकार ने साल 1793 में लागू किया था. इस के लागू होने के बाद जमींदारों को भूमि का लगभग मालिकाना हक मिल गया. इस के तहत सरकार और जमींदार के बीच भूमि राजस्व का स्थाई निर्धारण कर दिया गया था.

हुआ यह भी कि जमींदार भूमि स्वामी हो गया और किसान उस के किराएदार बन गए. मुगलों के समय से ही जमींदारी प्रथा चल रही थी. लेकिन इस की जड़ में थी वर्णव्यवस्था जो मनु स्मृति की देन है. मनसबदारी ऊंची जातियों के पास थी. मुगलों को बिहार के इस हिंदू जातीय वर्चस्ववाद से कोई सरोकार नहीं था. उन्हें सिर्फ और सिर्फ अपने लगान से मतलब था और लगान वसूलने के लिए दबंग जातियों की जरूरत थी, इसलिए बिहार की उच्च जातियां मुगलकाल में ताकतवर हुईं.

यही कारण है कि बिहार में मुगलकाल से ही राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण और कायस्थ ही जमींदार रहे. कई इलाकों में जागीरदारी मुसलिमों के पास भी थी. ये मुसलिम जमींदार अशरफ मुसलमान थे. सामाजिक तौर पर जो जाति जितना ऊपर थी, प्रशासन में भी उस जाति का उतना ही वर्चस्व था. यही कारण है कि बिहार में जमींदारी प्रथा के दौरान आर्थिक शोषण और सामाजिक शोषण का आधार जाति ही थी. जमींदारों ने अपनी उच्च जाति को हथियार बना कर निचली जातियों पर नियंत्रण कायम किया. बिहार के सब से बड़े जमींदार दरभंगा राज, बेतिया राज, हथवा राज ये सभी राजपूत परिवारों से थे. वे खुद को ‘भूमि का स्वामी’ कहते थे. पटना, गया, शाहबाद और टिकारी राज के जमींदार भूमिहार जाति के थे और बिहार के कुछ जमींदार ब्राह्मण भी थे. बिहार में कायस्थ समाज की भूमिका प्रशासनिक सेवा में अहम रही.

दीघाघाट जैसे इलाकों के जमींदार कायस्थ थे. डुमरांव राज के जमींदार मुसलिम थे जो मुसलिम की अशरफ जाति शेख परिवार से आते थे. बिहार में उच्च जातियों के इस वर्चस्व ने निचली जातियों को खेतिहर मजदूर और बंटाईदार बना कर छोड़ दिया. बिहार में गांवों में जातिगत पंचायतों ने भी निचली जातियों के शोषण में कोई कमी नहीं छोड़ी. इन पंचायतों में ऊंची जातियों के यानी धार्मिक नियम चलते थे जिस से निचली जातियों के साथ उत्पीड़न, सामाजिक बहिष्कार, हत्याएं और बलात्कार लगातार होते रहे. इन सब के कारण भी लोग पलायन को मजबूर हुए.

जाति व्यवस्था का असर यह रहा कि जमीन का मालिक केवल ऊंची जाति का व्यक्ति ही हो सकता था. निचली जाति के लोग ऊंची जाति की जमीनों पर आश्रय ले कर उन के रहमोकरम पर जिंदा रह सकते थे. इस तरह बिहार का बहुसंख्यक वर्ग भूमिहीन हो कर रह गया. बिहार लैंड रिफौर्म्स रिपोर्ट के अनुसार, 1930 के दशक में 90 फीसदी से अधिक जमींदार उच्च जाति के थे. हालांकि 10 प्रतिशत छोटे जमींदार कुर्मी, यादव और तेली जैसी पिछड़ी जातियों से भी थे लेकिन इन की सामाजिक हैसियत उच्च जातियों जैसी नहीं थी.

ऊंची जाति के जमींदारों की जमीनों पर यादव, कुर्मी, कोइरी जैसी पिछड़ी जातियां सिर्फ बटाईदार थीं. ये बटाईदार ही अपनी मेहनत से खेतों को सींचते और फसल उगाते लेकिन इस श्रम के बदले इन्हें हासिल कुछ न होता था. सूखे और बाढ़ के चलते फसलें बरबाद होने पर इन्हें कोई मुआवजा नहीं मिलता था. सारा मुनाफा जमींदार हड़प जाते थे और बटाईदार मुंह ताकते रह जाते थे. वर्णव्यवस्था के बाहर की दलित जातियां ज्यादातर बंधुआ मजदूरी करती थीं. कर्ज न चुका पाने के कारण पिछड़ी शूद्र जातियों के कई लोग जीवनभर बंधुआ मजदूर बन कर रह जाते थे या बेगारी खटते थे. बेगारी प्रथा में निचली जातियां मुफ्त में काम करने को मजबूर की जाती थीं. निचली जातियों पर जातिगत हिंसा आम बात थी.

आजादी के बाद जवाहरलाल नेहरू की केंद्र सरकार ने सभी राज्यों में 1950 में जमींदारी उन्मूलन अधिनियम लागू कराए जिस से कागजों पर तो जमींदारी खत्म हुई लेकिन सामाजिक तौर पर जातिगत असमानता बनी रही. इस बदलते दौर में उच्च जातियों के जमींदार बन गए ‘मालिक किसान’ और निचली जातियां मजदूर हो कर रह गईं. यही मजदूर बिहार से बाहर निकलने पर मजबूर हुए क्योंकि बिहार में उन्हें मेहनत के मुताबिक पैसा नहीं मिलता था, तिस पर आएदिन की हिंसा और प्रताड़ना से भी इतने त्रस्त थे कि उन्हें अपना देश, अपनी जमीन, अपना गांव और घरबार सब छोड़ कर भागना फायदे का सौदा नजर आने लगा. अफ़सोस इस बात का भी कि यह सिलसिला आज तक कायम है.

आज के बिहार की भी जमीनी हकीकत यही है कि भूमिहार-राजपूत अभी भी बड़े भूस्वामी हैं. और दलित व महादलित आज भी भूमिहीन ही हैं. यह बात कृषि जनगणना के आंकड़ों से उजागर भी होती है जो साल 2021 में जारी किए गए थे. इन के मुताबिक, भूमिहारों के पास कुल जमीन का लगभग 25 फीसदी, क्षत्रिय राजपूतों के पास 20 फीसदी, ब्राह्मणों और कायस्थों के पास लगभग 10 फीसदी जमीनें हैं. कुर्मियों के पास 10 और यादवों के पास 15 फीसदी जमीनें हैं. दलितों के पास महज 5 फीसदी जमीने हैं और लगभग इतनी ही मुसलमानों के पास हैं

जमींदारों ने जाति को हथियार बना कर निचली जातियों को गुलाम बनाया और इस शोषण को धार्मिक व सामाजिक तौर पर मान्यता दी. स्वतंत्रता के बाद कानूनी रूप से जाति आधारित शोषण तो खत्म हुआ लेकिन इस शोषण के पीछे की सामाजिक जड़ें बेहद गहरी हैं जिन्हें खत्म करना आसान नहीं है.

पलायन के पीछे की दूसरी ऐतिहासिक वजहें

बिहार में पलायन की त्रासदी के पीछे की एक ऐतिहासिक वजह यह भी रही कि मुसलिम शासकों ने बिहारबंगाल की नीची जातियों के लोगों को सेना में शामिल नहीं किया. मुगलों या नवाबों का मानना था की नीची जाति के लोग बुद्धि और शरीर से कमजोर होते हैं, इसलिए सेना या प्रशासन में उन की जरूरत नहीं. यही कारण था कि अंगरेजी राज से पहले भी सेना और प्रशासनिक सेवाओं में भारत की ऊंची जातियां हावी रहीं.

ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी ब्राह्मणों और राजपूतों को ही सेना के योग्य समझा जिस की वजह से ब्रिटिश काल में ऊंची जाति से डेढ़दो लाख लोग सेना में पहुंच गए. ये ट्रेंड किए सिपाही जमींदारों के साथ भी काम करने लगे. सामाजिक तौर पर वर्चस्व रखने वाली जातियों को मुगलों, नवाबों और अंगरेजों के प्रशासन में भारी वर्चस्व हासिल हुआ जिस से सामाजिक तौर पर अग्रणी जातियां आर्थिक तौर पर और मजबूत स्थिति में बनी रहीं लेकिन साधारण लोग, पिछड़े और जमीन जोतने वाले अंगरेजों की बेगारी करने को मजबूर रहे.

यही लोग गिरमिटिया मजदूर बने और पहले समुद्र पर अनजाने देशों में और फिर दिल्ली, मुंबई, पंजाब जाने लगे. पलायन के पीछे भूख और कमजोर बदन भी एक महत्त्वपूर्ण कारण रहा है. भूख और कमजोर बदन के पीछे भी जातिवाद छिपा था.

बिहार की मिट्टी हमेशा से उपजाऊ रही है, इसी कारण प्राचीन काल से ही बिहार की अर्थव्यवस्था खेती पर आधारित थी. शेरशाह सूरी (1540-1545) के 5 साल के शासन ने बिहार को एक मजबूत प्रशासनिक केंद्र बनाया, जिस का असर मुगलकाल में भी रहा. मुगल शासकों ने बिहार में जागीरदारी और मनसबदारी की शुरुआत की. अकबर के शासनकाल में बिहार में टैक्स जमा करने के लिए टोडरमल की राजस्व प्रणाली लागू की गई.

18वीं सदी में मुगल साम्राज्य के कमजोर होने पर बिहार में स्थानीय शासकों और नवाबों का प्रभाव बढ़ा. 1757 तक बिहार के ज्यादातर सूबे बंगाल के नवाब सिराजुददौला के अधीन थे. ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1757 में रौबर्ट क्लाइव के नेतृत्व में 2,500 से 3,000 की फौज ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की 50 हजार से 2 लाख की फौज को हराया और मीर जाफर को नवाब बनाया. इस से ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और ओडिशा में टैक्स कलैक्शन के अधिकार मिल गए. यहीं से बिहार के और ज्यादा बुरे दिन शुरू हो गए. बंगाल, बिहार और ओडिशा से टैक्स कलैक्शन बढ़ाने के लिए कंपनी ने जमींदारों पर दबाव बनाना शुरू किया. इस का असर आम किसानों पर पड़ा.

22 अक्टूबर, 1764 को बक्सर युद्ध में कंपनी की जीत के बाद ही इलाहाबाद की संधि हुई जिस में दिल्ली से साम्राज्य चला रहे मुगल बादशाह शाहआलम ने कंपनी को बंगाल-बिहार-ओडिशा की दिवानी सौंप दी. ईस्ट इंडिया कंपनी की इस ऐतिहासिक जीत ने बिहार की जमींदारी व्यवस्था पर गहरा असर डाला. जमींदार और जमीन जोतने वाले जमींदार अब पूरी तरह कंपनी के अधीन हो गए. वे पहले नवाबों को खिराज देते थे लेकिन अब उन्हें ब्रिटिश रैजीडैंट को लगान देना पड़ा.

जमींदारों से टैक्स कलैक्ट करने के लिए कंपनी की ओर से कलैक्टर नियुक्त किए गए जिन में ज्यादातर भ्रष्ट और क्रूर थे. अकाल पड़ने या ज्यादा बरसात से फसल नष्ट होने के बाद भी गरीब जमीन जोतने वालों को लगान में कोई रियायत नहीं मिलती थी. भ्रष्ट और क्रूर सिस्टम में बिचौलिए जमींदार भी भ्रष्ट और क्रूर होते गए.

जमींदारों ने अपने मुनाफे को बढ़ाने के लिए गरीब और मजबूर लोगों को बंधुआ मजदूर बनने पर मजबूर किया. फिर भी लगान वसूल करने वाले जमींदारों से कलैक्टर खुश नहीं थे. 1770 तक जमींदारों और कलैक्टरों के बीच का यह अंतर्विरोध आंदोलन विद्रोह की स्थिति तक पहुंच गया. ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस समस्या के समाधान के लिए वारेन हेस्टिंग्स को जिम्मेदारी सौंपी.

बिहार की बरबादी का दस्तावेज ‘परमानैंट सैटलममैंट’

मुगलों और नवाबों के दौर में जमींदार टैक्स इकट्ठा करते थे. वे एक तरह से नवाब के प्रतिनिधि थे जो कमीशन पर काम करते थे लेकिन उन्हें जमीन का मालिकाना हक हासिल नहीं था. 1770 में वारेन हेस्टिंग्स ने जमींदारों के लिए 5 साल के बंदोबस्त की व्यवस्था की और 1790 में यह 10 साल का बंदोबस्त कर दिया गया. इस के तहत 10 साल का टैक्स एक ही बार में कंपनी वसूल लेती थी, बदले में जमींदार को भी 10 साल के लिए जमीन के बंदोबस्त की सहूलियत मिल जाती थी. यानी, 10 सालों के लिए जमींदार जमीन का मालिक बन जाता था.

वारेन हेस्टिंग्स के इस प्रयोग की सफलता को देखते हुए ईस्ट इंडिया कंपनी के गवर्नर जनरल लौर्ड कार्नवालिस ने परमानैंट सैलटलमैंट की व्यवस्था की और उस ने 1793 को पूरे बंगाल प्रैजिडैंसी में परमानैंट सैटलमैंट को लागू कर दिया. बिहार भी तब बंगाल प्रैजिडैंटसी का हिस्सा था, इसलिए यह व्यवस्था बिहार में भी लागू हो गई.

जमींदारों के लिए टैक्स तय कर दिया गया. जमींदारों को जमीन का मालिकाना हक तो मिल गया लेकिन उन्हें कंपनी को जमीन की आमदनी का लगभग 90 फीसदी हिस्सा देना पड़ता था. ‘सनसेट ला’ के तहत समय पर टैक्स न देने पर जमीन नीलाम हो जाती थी. मालिकाना हक मिलने के बाद जमींदारों को किसी तरह अपने मुनाफे को बढ़ाना था ताकि कंपनी को तय लगान दे कर सनसेट क़ानून से बचा जा सके.

यहीं से बिहार की आम जनता के भयावह शोषण की दास्तान की शुरुआत हुई. देशी जमींदारों ने अपने फायदे के लिए गरीब जनता का जम कर शोषण शुरू कर दिया. इस से आम जनता बुरी तरह बरबाद हुई. जमींदारों ने अपनी जमीनें छोटे किसानों को किराए पर दीं और कंपनी को तय राशि चुकाने के दबाव में वे किसानों से ऊंचा किराया वसूलने लगे. अंगरेज शासकों को सिर्फ जमींदारों से आने वाले पैसे से मतलब था. कानून व्यवस्था और न्याय पर जमींदारों का कब्जा हो गया.

अपनी समझ कर जमीन जोतने वाले किसान अब सिर्फ मजदूर बन कर रह गए. किसानों को पट्टा (लीज एग्रीमैंट) देने का नियम था, लेकिन अकसर यह नहीं दिया जाता, जिस से किसानों पर जमींदारों की मनमानी बढ़ी. ज्यादा मुनाफे के लालच में किसानों को नील और कपास जैसी नकदी फसलें उगाने के लिए मजबूर किया गया. इन नकदी फसलों ने जीवन निर्वाह करने बाली जरूरी फसलों, मसलन धान, गेंहू, चना वगैरह  की जगह ले लीं जिस से बिहार में लगातार अकाल पड़ने लगे. ये दोनों नकदी फसलें अंगरेज व्यापारी यूरोप ले जाने के लिए हाथोंहाथ खरीद ले जाते थे. इन्हें सालभर नहीं रखना पड़ता था.

जमींदारों द्वारा किसानों का दमन शुरू हुआ और यहीं से पलायन की मजबूरी भी शुरू हुई. जो किसान मजदूर अकाल या खराब फसलों के कारण बरबाद हो जाते थे उन के पास इलाके को छोड़ कर दरबदर होने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं बचता था.

परमानैंट सैटलमैंट जमींदारों के लिए एक ऐतिहासिक सैटलमैंट था जिस से बिहार के जमींदार अंगरेजों की कंपनी के प्रति वफादार बन गए. हालांकि, कुछ जमींदारों को इस सैटलमैंट से काफी नुकसान भी हुआ. अंगरेजों द्वारा तय किया गया लगान बेहद ज्यादा था, सूखे-बाढ़ या आपदा की स्थिति होने पर लगान में कोई छूट नहीं थी, इस से कई जमींदारों की जमीनें नीलाम कर दी गईं और वे बरबाद हो गए. उन की जमींदारी बिकने लगी और वहींकहीं सेठ भी ये जमींदारी खरीदने लगे.

परमानैंट  सैटलमैंट से कंपनी ने कुछ दशकों जबरदस्त फायदा उठाया लेकिन बिहार में बुनियादी ढांचे के लिए कुछ नहीं किया. इस दौरान शिक्षा या उद्योग का भी कोई विकास नहीं हुआ. इस सैटलमैंट के लागू होने के एक दशक के भीतर ही बिहार की आम जनता भुखमरी की कगार पर पहुंच गई.

गिरमिटिया मजदूरों की त्रासदी

19वीं सदी आतेआते बिहार की खेती पर आधारित अर्थव्यवस्था पूरी तरह बरबाद हो चुकी थी. बिहार बंधुआ मजदूरों का सब से बड़ा केंद्र बन गया. इन मजदूरों की तस्करी करने वाले गिरोह सक्रिय हुए जो अंगरेजों और जमींदारों को बंधुआ मजदूर मुहैया करवाते थे. यह ट्रेड अमेरिका के अफ्रीका से जहाज़ों में मवेशियों की तरह लाए गए अश्वेतों की गुलामी जैसा ही था. इन मजदूरों को ‘गिरमिटिया मजदूर’ कहा जाता था जिन्हें बिहार से ब्रिटिश उपनिवेश के दूसरे देशों तक ले जाया जाता. 1838 से शुरू हो कर 1917 तक करीब 10 लाख बिहारी मजदूरों को मौरिशस, फिजी, गुयाना, दक्षिण अफ्रीका, कैरिबियन जैसी ब्रिटिश कालोनियों में एग्रीमैंट के नाम पर भेजा गया. एक तरह से कहा गया कि ये गुलाम नहीं हैं पर असल में जहाज पर चढ़ते ही ये भी गुलाम बन कर रह जाते थे.

1830-40 के दशक से ब्रिटिश व्यापारियों ने बिहार के चंपारण क्षेत्र में नील की जबरन खेती शुरू कराई. नील की जरूरत यूरोप के कपड़ा उद्योग को होती थी. इस से मिट्टी बंजर हुई और किसान कर्जदार बने. इस से लोकल रोजगार खत्म हो गया और मजदूर बंगाल व असम की चाय बागानों या पंजाब व गुजरात के खेतों में रोजगार के लिए पलायन करने लगे. 1881 की जनगणना से पलायन के आंकड़े दिखने लगे. यह दौर पलायन की त्रासदी की शुरुआत का प्रतीक है क्योंकि यह मजबूरी की ऐसी यात्रा थी जिस में निकले ज्यादातर मजदूर कभी घर वापस नहीं लौट पाए चाहे वे भारत में ही रह रहे या विदेशों में जा कर हमेशा के लिए बस गए.

1947 में देश के बंटवारे के वक़्त बिहार दंगों में 30,000 से अधिक मुसलिम बिहारियों की हत्या हुई. इस दौरान सांप्रदायिक दंगे भड़के जिस से लाखों हिंदीभाषी मुसलिम मजदूर पूर्वी पाकिस्तान चले गए.

केंद्र सरकार ने बिहार का सत्यानाश करने के लिए 1952 के फ्रेट इक्वलाइजेशन पौलिसी के तहत बिहार के खनिज संसाधनों को भी सस्ता बना कर बेचा और बिहार के बचेखुचे उद्योगों को दिल्ली-मुंबई में ले जाया गया. आजादी के बाद के दशकों में बिहार की आबादी थोड़ी स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण तेजी से बढ़ी लेकिन इस के साथ ही पलायन भी तेजी से बढ़ा. हर साल के बाढ़ और सूखे ने बिहार के पलायन को और तेज किया. 1960-70 के दशक में दिल्ली, मुंबई, पंजाब की ओर तेजी से पलायन हुआ. 2011 जनगणना के वक़्त 83 लाख बिहारी दूसरे राज्यों में थे. आज तकरीबन 2 करोड़ से ज्यादा लोग बिहार से बाहर हैं.

अंगरेजों के शासनकाल में बिहार उन के लिए महज आर्थिक स्रोत था. बिहार को सीधे तौर पर ईस्ट इंडिया कंपनी और फिर क्राउन का प्रतिनिधि यानी गवर्नर जनरल के जरिए अंगरेज सरकार नियंत्रित करती थी. राजस्व और संसाधनों की दृष्टि से बिहार बहुत महत्त्वपूर्ण था. इस के बाद भी बिहार का कोई स्वतंत्र ढांचा नहीं था. यह कोलकाता से नियंत्रित होता था. यही वजह थी कि बिहार पूरी तरह उपेक्षित था. बिहार कृषि और राजस्व वसूली का प्रमुख केंद्र था. यहां धान, गन्ना, नील और तंबाकू की पर्याप्त मात्रा में खेती होती थी.

ईस्ट इंडिया कंपनी जमींदारों के जरिए राजस्व वसूल करती थी. इस से किसानों पर भारी आर्थिक बोझ बढ़ा और वे भुखमरी की कगार पर आ गए थे. बिहार की संस्कृति और शिक्षा का कोई खयाल नहीं रखा जा रहा था. तब बिहार में अलग पहचान की मांग बढ़ी. इस के बाद 22 मार्च, 1912 को बिहार की अलग प्रोविंस की तरह स्थापना हुई. 1936 में बिहार प्रोविंस से ओडिशा को अलग कर के अलग प्रोविंस बना दिया गया था.

पलायन बिहार का मुद्दा क्यों नहीं बना

2025 के विधानसभा चुनाव में पलायन का मुद्दा सभी दलों और नेताओं द्वारा उठाया गया. सब से बड़ी बात यह थी कि किसी दल और नेता के पास इस समस्या का कोई हल नहीं है और न ही इस समस्या का कारण किसी को पता है. साधारणतौर पर गरीबी, बेरोजगारी, बाढ़ और अपराधों को इस का कारण मान लिया जाता है. सवाल उठता है कि ये परेशानियां किस राज्य में नहीं हैं. 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ तो सब से बड़ा झटका पंजाब और आसपास के प्रदेशों में रहने वालों को उठाना पड़ा. हजारों की संख्या में वे रिफ्यूजी बन कर आए और देश के अलगअलगहिस्सों में बस गए. उन लोगों ने 50 साल में ही अपनी अलग पहचान बना ली. वे सेठ और बड़े बिजनैसमेन व बड़े किसान बन गए.

बिहार के लोग यह काम नहीं कर पाए. वे सालोंसाल अपनी गिरमिटिया मजदूर की पहचान नहीं बदल पाए. वे जिन देशों और जगहों पर गए वहां की हालत तो बदल कर रख दी, वहां का विकास बिहारियों के दम पर हुआ जबकि उन का मूल जन्मस्थान बिहार जस का तस रहा. सवाल यह कि जिन बिहारी लोगों ने दूसरी जगहों को बदल दिया वे अपने बिहार को क्यों नहीं बदल पाए?

एक दौर में केंद्र सरकार के दफ्तरों में बड़ी और छोटी नौकरियों पर बिहार के लोगों का कब्जा था. बड़े लेखक बिहार से आते थे. राजनीति में बिहार के लोगों का दबदबा था. उत्तर प्रदेश के मुलायम सिंह यादव एक दौर में प्रधानमंत्री बनने वाले थे लेकिन बिहार के लालू प्रसाद यादव का समर्थन न मिलने से वे प्रधानमंत्री नहीं बन पाए.

1973 में कांग्रेस की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ गद्दी छोड़ो आंदोलन बिहार से ही शुरू हुआ था. जयप्रकाश नारायण के जेपी आंदोलन से इंदिरा गांधी की कुरसी हिलने लगी.

उस से पहले जब देश आजाद हुआ था तो देश के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद बिहार के रहने ही वाले थे. ऐसे में बिहार अभी भी पलायन की परेशानी से निकल नहीं पा सका.

बिहार के कितने लोग पलायन कर के दूसरे देशविदेशों में रह रहे हैं, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब छठपूजा के दौरान बिहार के लोगों को बिहार आने के लिए 2025 में 12 हजार से अधिक रेलगाड़ियां सरकार को चलानी पड़ीं. कोरोनाकाल में जब सरकार रेल और बसों का इंतजाम नहीं कर पाई तो सड़क पर पैदल चलने वालों की संख्या सब से अधिक बिहार जा रही थी.

नाटकों, उपन्यासों, फिल्मों में ही नहीं बल्कि भोजपुरी गानों में पलायन का दर्द खूब दिखाया जाता है. शारदा सिन्हा से ले कर भोजपुरी के तमाम गायकों ने पलायन और बिरह को अपने गीतों में खूब उकेरा है. पलायन को राजनीति से भी जोड़ते हुए गाने बने हैं. एक गाना है- ‘कब ले पलायन के दुख लोग झेले, कब ले सुतल रहिहें एमपी-एमएलए’ 2025 के विधानसभा चुनाव में खूब बज रहा था. पलायन के गीतों में पतिपत्नी विछोह को दिखाते हुए बहुत ही समझ में आने वाला गीत कहता है- ‘सेज पर किस के साथ लडूं, सैयां अरब गए‘.

आजादी के बाद भी पलायन की समस्या

आजादी के बाद 26 जनवरी, 1950 को बिहार के रहने वाले डाक्टर राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति बने. वे 13 मई, 1962 तक पद पर रहे. राष्ट्रपति बनने से पहले वे अंतरिम सरकार में खाद्य एवं कृषि मंत्री रहे. वे संविधान सभा के अध्यक्ष भी रहे थे. इस के जरिए यह समझा जा सकता है कि बिहार का देश की राजनीति में कितना महत्त्व था. बिहार में ईमानदार और मेहनती नेताओं की कमी नहीं रही. समाजवादी आंदोलन भी वहीं से शुरू हुआ.

लेकिन ये सब नेता बिहार का इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए करते रहे. ये अंगरेजों पर उन के बनाए जमींदारों से भी ज्यादा थूथू के हकदार हैं, हार पहनाने लायक नहीं.

चुनावी वादा बन कर रह जाती है पलायन की समस्या

आजादी के बाद चुनावदरचुनाव पलायन की समस्या पर बात होती है. इस के बाद भी यह चुनाव के बाद भुला दी जाती है. 2025 के विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित तेजस्वी यादव, प्रशांत किशोर और कई नेताओं ने उठाया. देखना यह है कि चुनाव के बाद इस पर कितना काम होता है.  बेरोजगारी और पलायन बिहार की सब से बड़ी चुनौती है. 2011 की जनगणना बताती है कि 74.54 लाख बिहारी राज्य से बाहर पलायन कर चुके थे. जिन में 22.65 लाख लोग रोजगार की तलाश में गए. इस का मतलब यह हुआ कि बिहार छोड़ कर बाहर जाने वाले कुल लोगों में से 30 फीसदी लोग रोजगार की तलाश में राज्य छोड़ कर जाते हैं. आज भी यह बदस्तूर जारी है. केंद्र सरकार के ईश्रम पोर्टल पर बिहार से 3.16 करोड़ से अधिक लोगों ने पंजीकरण कराया है.

2022-23 में बिहार की बेरोजगारी दर 3.9 फीसदी थी, जो कि राष्ट्रीय औसत 3.2 फीसदी से अधिक है. बेरोजगारी का यह आंकड़ा एकदम भ्रम में डालने वाला है क्योंकि जो व्यक्ति खाने का जुगाड़ कर लेता है, केंद्र सरकार का सांख्यिकी विभाग उसे रोजगार प्राप्त मान लेता है. जिन्होंने कहीं अपने को बेरोजगार दर्ज कराया वही बेरोजगार माने जाते हैं. फिर भी 2024 में बिहार के शहरी युवा बेरोजगारी 23.2 फीसदी तक पहुंच गई. यह भी राष्ट्रीय औसत 15.9 फीसदी से कहीं अधिक है. यह बेरोजगारी पलायन को जन्म देती है. बिहार का युवा दिल्ली, पंजाब, सूरत, बेंगलुरु और मुंबई की फैक्ट्रियों में मजदूरी करता है.

बिहार में तीनों मोरचों (एनडीए, महागठबंधन और जन सुराज) ने अब इसे चुनावी मुद्दा बनाया है. महागठबंधन का कहना है कि बदलाव का वक्त आ गया है. इस ने ‘हर परिवार को एक सरकारी नौकरी’ देने की घोषणा की है. प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने बिहार के पलायन और बेरोजगारी संकट को अपनी राजनीति के केंद्र में रखते हुए यह वादा किया है कि राज्य में ऐसा माहौल बनाया जाएगा जहां युवाओं को जीविका के लिए अपना गांव और अपना प्रदेश न छोड़ना पड़े. बिहार की अर्थव्यवस्था कागजों में बहुत चमकदार है. ये सब वादे हैं, कोई कुछ करेगा नहीं.

गंगा नदी किनारे बसे गांवों में है प्रवास कल्चर

जनसंख्या विज्ञान संस्थान यानी आईआईपीएस द्वारा किए गए एक सर्वे के अनुसार बिहार के आधे से अधिक परिवार पलायन के शिकार हैं. ये परिवार बाहर से आने वाले पैसों पर निर्भर हैं. इन के घरों के लोग बाहर मजदूरी कर के इन को पैसा भेजते हैं. 36 गांवों और 2,270 परिवारों को इस सर्वे शामिल किया गया था. इस क्षेत्र में बिना परिवार के पुरुषों द्वारा पलायन किया जाता है. सारण, मुंगेर, दरभंगा, कोसी, तिरहुत और पूर्णिया के आसपास से सब से अधिक पलायन होता है. ओबीसी, एससी और एसटी समुदाय के लोगों का दूसरे वर्ग से अधिक पलायन होता है.

इस सर्वे में मध्य गंगा मैदान के हिस्सों को शामिल किया गया था. यह पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के 64 जिलों को कवर करता है. जिस गंगा को जीवनदायनी माना जाता है वह भी इस क्षेत्र के लोगों का उद्धार नहीं कर पाई. गंगा किनारे बसने वाले गांवों में प्रवास की संस्कृति अधिक होती है. ये लोग बिना परिवार के प्रवास करने के यानी कहीं आनेजाने के आदी होते हैं. पलायन करने वालों में भूमिहीन समूह और एकल परिवारों की संख्या सब से अधिक है. इन में प्रवासियों की औसत आयु 32 साल है. 80 प्रतिशत प्रवासी भूमिहीन हैं या उन के पास एक एकड़ से भी कम जमीन है और उन में से 85 फीसदी ने 10वीं कक्षा ही उत्तीर्ण की है.

90 प्रतिशत प्रवासी निजी कारखानों में श्रमिक के रूप में काम करते हैं. बिहार में एक प्रवासी द्वारा औसत 26,020 रुपए और पूर्वी उत्तर प्रदेश में 38,061 रुपए प्रति वर्ष अपने घरों को भेजा जाता है. प्रवासियों के घरों में महिलाओं की स्थिति का सवाल है, तो 47 फीसदी महिलाए साक्षर हैं और उन में से 22 फीसदी मजदूरी पर जाती हैं. अधिकतर ये महिलाएं एकल परिवार में रहती हैं. तीनचौथाई ये महिलाएं रोजाना अपने पति से मोबाइल पर बात करती हैं. केवल 29 फीसदी महिलाएं स्वयं सहायता समूहों की सदस्य हैं. 80 फीसदी महिलाओं के पास अपना बैंक खाता है. इन का मानना है कि उन के पतियों के प्रवास के बाद उन की आर्थिक स्थिति, जीवनशैली, स्वायत्तता, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार होता है.

1950 के बाद कांग्रेस सरकारों द्वारा सामाजिक उद्धार के लिए लाए गए जमींदारी उन्मूलन अधिनियम का लाभ यादव, कुर्मी, कोइरी और भूमिहार जैसी जातियों को मिला. ये नए तरह के जमींदार बन कर उभरे. अफ़सोस यह है कि इन का व्यवहार एससी और एसटी के साथ वैसा ही होने लगा जैसे पहले के सवर्ण जमींदारों का होता था. 1970 के दशक में इंदिरा गांधी के विरोध के बाद और 1990 में मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार पर ऊंची जातियों का प्रभाव कम हुआ. इस के उलट, पिछड़ों में अगड़े खासकर यादव वर्ग ने लालू प्रसाद यादव के सहारे बिहार में जो सुधार किया था उस पर कुर्मी नेता नीतीश कुमार, जो भारतीय जनता पार्टी के घोषित मुरीद रहे हैं और सदा बिहार की वर्णव्यवस्था को मजबूती देते रहे हैं, की अगुआई में ऊंची जातियों के लिए वापसी का रास्ता खुल गया.

जिसे भी बिहार की जमींदारी उन्मूलन के बाद पलायन पर काम करना था वह नेता जातीय बदला लेने में उतर आया. इसी ने नक्सलवाद को जन्म दिया. बिहार के पिछड़े नेता खुद को एससी और एसटी जातियों के साथ कभी जोड़ नहीं पाए क्योंकि धर्मजनित हिंदू व्यवस्था हावी रही. 1970 के बाद बिहार की राजनीति में कांग्रेस का ब्राहमणवाद खत्म हुआ तो 3 गुट बन गए. अगड़ी जातियां बहुत ही चालाकी से नीतीश कुमार के साथ, एससीएसटी जातियां रामविलास पासवान और ओबीसी लालू प्रसाद यादव के साथ जुड़ गईं.

लालू प्रसाद यादव ओबीसी में अति पिछड़ी जातियों, मुसलमानों और अछूतों को अपने साथ रख कर नहीं चल पाए. वे अपनी जाति और परिवार से अलग किसी और समुदाय को अपने साथ जोड़ नहीं पाए. उन की जाति नई तरह की दबंग बन कर उभरी, जिस को अब लालू का जंगल राज कहा जा रहा है. वे कभी अपने करीबी रहे रामविलास पासवान और नीतीश कुमार को जोड़ कर नहीं चल पाए. उन में दूसरों को पटाने की वह कला नहीं थी जो ब्राह्मण और कायस्थ नेताओं में है.

जमींदारी भले ही बिहार में खत्म हो गई मगर इन तरीकों से नए पैदा हुए जमींदारों ने बिहार को आगे नहीं बढ़ने दिया. जिस के कारण नीतीश कुमार प्रभावी हो गए और लालू राज को खत्म कर 20 साल बिहार के मुख्यमंत्री रहे. 2025 के चुनाव में नीतीश और रामविलास पासवान के बेटे और लोक जनशक्ति पार्टी के नेता केंद्र में मंत्री चिराग पासवान के एक मंच पर आने का असर दिख रहा है. यह वर्णव्यवस्था के हामी नेताओं की सफलता है.

पलायन के मुद्दे को सतही तौर पर सभी दलों ने छूने भर का काम किया है. बिहार में 30 साल से ऊपर की उम्र के जो लोग हैं वे नहीं चाहते कि उन के लड़केलड़कियां बिहार में रह कर काम करें. वे मानते हैं कि बिहार में चुनाव के समय बदलाव की बात होगी पर चुनाव हमेशा की तरह जाति और दंबगई पर लड़ा जा रहा है.

राष्ट्रीय जनता दल की कमान युवा तेजस्वी यादव के हाथ में होने के बाद विधानसभा चुनाव में राजद ने 50 फीसदी टिकट यादवों को दिए. बाकी ओबीसी केवल वोट देने भर के लिए हैं. उस के बाद बड़ी संख्या मुसलिमों की है. जनता देख रही है कि बात पलायन की होती है और काम जाति पर होता है. ऐसे में पुरानी पीढ़ी कुछ बदलते देख नहीं रही है. इस कारण वह अपने बच्चों को प्रवासी बना कर खुशी महसूस करती है.

पलायन की त्रासदी का समाधान क्या है?

बिहार से पलायन की त्रासदी 19वीं शताब्दी से चली आ रही है जो आज भी जारी है, जिसे रोकना नामुमकिन है. आजादी के बाद की सरकारों ने बिहार की इस समस्या को समझा ही नहीं. यही कारण है की पलायन की समस्या कभी भी बिहार चुनावों का मुद्दा नहीं रही.

हालांकि इस बार के विधानसभा चुनाव के दौरान सभी दलों ने पलायन की इस त्रासदी को मुद्दा जरूर बनाया है लेकिन समाधान उन के पास भी नहीं है. सच तो यह है कि आज बिहार के लोगों ने पलायन की हकीकत को स्वीकार कर लिया है. बिहार से पलायन भारतीय इतिहास का एक दर्दनाक अध्याय तो है ही, साथ ही, यह वर्तमान की सब से बड़ी त्रासदी भी है. बिहार का यह पलायन केवल एक घटना नहीं, बल्कि सदियों पुरानी प्रक्रिया है, जो जातिवाद, मजदूरों के शोषण और भ्रष्टाचार की दर्दनाक कहानी बयान करती है.

भारतीय संविधान में पलायन का अधिकार

भारतीय संविधान में पलायन (प्रवासन) का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(डी) के तहत दिया गया है. इस के तहत देशभर में आनेजाने और रहने की आजादी दी गई है. यह अधिकार भारत के किसी भी हिस्से में घूमने, रहने और अपनी पसंद का पेशा करने की आजादी देता है. अनुच्छेद 19(1)(डी) भारत के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से आवागमन का अधिकार देता है. अनुच्छेद 19(1)(ई) के तहत भारत के किसी भी हिस्से में निवास करने और बसने का अधिकार प्रदान करता है. अनुच्छेद 19(1)(जी) अपनी पसंद का कोई भी पेशा, व्यवसाय, व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रता देता है. यह बात और है कि यह अधिकार असीमित नहीं है और इस के कुछ प्रतिबंध भी हैं.

अनुच्छेद 19(5) के तहत सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और जनजातियों के हितों की रक्षा के लिए इन अधिकारों पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं. भारतीय संविधान सभी नागरिकों को यह गारंटी प्रदान करता है कि किसी भी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा. इस के बाद भी अलगअलग राज्यों में भेदभाव होते हैं. दक्षिण भारत में उत्तर भारतीय लोगों के साथ भेदभाव होते हैं.

नौर्थईस्ट में रहने वाले तमाम लोग देश के अलगअलग राज्यों में नौकरी करते हैं. इस के बाद भी उन के साथ भेदभाव होता है. मारपीट कर उन को भगाया जाता है. महाराष्ट्र में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों के साथ भेदभाव होता है. पंजाब में ओडिशा और बिहार के मजदूरों के साथ इसी तरह का भेदभाव होता है जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ है. इन को कहीं ‘बाहरी’ कहीं ‘बिहारी’ कहीं ‘भइया’ तो कहीं ‘चिंकी’ जैसे नामों से पुकारा जाता है.

आधार और ड्राइविंग लाइसैंस प्रवासियों के मौलिक अधिकार आर ग्रहण

संविधान देश के अंदर कहीं भी मजदूरी और कारोबार करने की आजादी देता है. जबकि, आधार कार्ड और ड्राइविंग लाइसैंस के नियम मौलिक अधिकारों को रोकने का काम करते हैं. इन के नियम प्रावासियों के मौलिक अधिकारों को रोकने का काम करते हैं. जब भी किसी को बैंक में खाता खोलना होता है तो आधार और पैन कार्ड की जरूरत पड़ती है. ऐसे में ज्यादातर लोग जहां के मूल निवासी होते हैं वहां के बैंक में खाता खोलते हैं. नैट बैंकिंग के जरिए पैसा निकालने और जमा करने का काम कहीं से भी हो जाता है. लेकिन जैसे ही दूसरे काम करने होते है, जिन में बैंक शाखा जाना होता है, तब परेशानी होती है.

इस के अलावा चैक, पासबुक या एटीएम कार्ड घर के पते पर ही आते हैं. जो बैंक के रिकौर्ड में दर्ज होता है. अगर मूल निवास वाली जगह पर कोई न रह रहा हो तो दिक्कत होती है. ऐसे में आधार समस्या बन जाता है. नियम यह होना चाहिए कि खाता खोलने वाले व्यक्ति को यह आजादी होनी चाहिए कि वह जहां रहे उस बैंक में खाता खोल सके.

इसी तरह से ड्राइविंग लाइसैंस में भी आधार और मूल निवास प्रमाणपत्र की जरूरत पड़ती है. यह बात अपनी जगह ठीक है कि पूरे भारत में यह मान्य होता है. अगर इस का रीन्यूअल कराना हो या कोई और काम करना हो तो जहां से लाइसैंस बना है वहीं आना होगा. सरकार कहती है कि यातायात नियमों को तोड़ने पर लाइसैंस कैंसिल हो जाएगा. यह गलत नियम है. यातायात नियम तोड़ने पर सजा या जुर्माना तो ठीक है लेकिन लाइसैंस रदद करना तो मौलिक अधिकार का हनन हुआ.

मोटर वाहन अधिनियम 1988 के अनुसार ट्रैफिक नियम तोड़ने पर सजा के तौर पर जुर्माना, जेल और ड्राइविंग लाइसैंस को निलंबित या रद्द किया जा सकता है. नए नियमों के अनुसार, कुछ उल्लंघनों के लिए 25,000 रुपए तक का भारी जुर्माना और 3 साल तक की जेल हो सकती है. यही नहीं, लाइसैंस को 3 महीने के लिए निलंबित किया जा सकता है. बारबार उल्लंघन करने वाले वाहन चालकों के लिए लाइसैंस को स्थाई रूप से रद्द भी किया जा सकता है. अगर किसी प्रवासी का लाइसैंस रदद हो जाएगा तो वह अपना कामधंधा नहीं कर पाएगा. यह उस के मौलिक अधिकारों का हनन होगा.

पलायन पति का, पीड़ा पत्नी की

एक पुरुष जब रोजीरोटी की जुगाड़ में अपना घर, गांव, जिला और राज्य छोड़ कर दूर किसी बड़े शहर में जाता है तो उस के मन में दुख और अपनों से बिछुड़ने के गम से ज्यादा ख़ुशी और जोश इस बात का होता है कि वह शहर में दिनरात हाड़तोड़ मेहनत कर पैसा कमाएगा. कच्चापक्का जैसा भी हो, अपना एक छोटा सा आशियाना बनाएगा और वे ढेरों खुशियां व सहूलियतें अपने बीवीबच्चों को मयस्सर कराएगा जिन के सपने वह होश संभालते ही देखता रहा है.

बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बनाएगा और पत्नी को रानी की तरह भले ही न रख पाए लेकिन नौकरानी की तरह तो नहीं रहने देगा. ट्रेन के डब्बे में चढ़ते ही उस का संघर्ष और सफर शुरू हो जाते हैं.

लेकिन गांव में रह रही पत्नी विरह में जलती, बस, मन्नतें मांगती रहती है कि पति को जल्द ही वह सबकुछ मिले जिस की बातें वे दोनों रातरात भर जाग कर करते रहे थे. पहली रात जब वह बिना पति के बिस्तर पर सोती है तो सैकड़ों संदेह और दुश्चिंताएं उस के दिलोदिमाग में कब्ज़ा किए होते हैं. उस की आंखों में नींद नहीं होती और निगाह बारबार पास पड़े मोबाइल फोन पर जाती है कि अब उन का फोन या मैसेज आता होगा कि चिंता मत करना पगली, मैं फलां स्टेशन पर पहुंच गया हूं, खाना खा लिया है, ट्रेन में भीड़ बहुत है लेकिन थोड़ी जगह मिल गई है, सो अब सोऊंगा. तू अपना व घरवालों और बच्चों का खयाल रखना. कोई परेशानी आए तो तुरंत फोन करना. जल्द ही मैं पैसे ट्रांसफर करना शुरू कर दूंगा.

पत्नी भरोसा करती है और न जाने क्याक्या सोचती आंखों में नमी या आंसू लिए सो जाती है, सुबह से उसे भी बगैर पति के एक नई लड़ाई जो लड़ना है. बच्चों के लिए अब वह मां और बाप दोनों हो गई है. सासससुर के लिए सिर्फ बहू नहीं रह गई है बल्कि बेटा भी हो गई है.

फिर धीरेधीरे वह वाकई में पुरुष होती जाती है. बूढ़े सासससुर की सेवाशुमार करती है, बच्चों के स्कूल जाने का इंतजाम करती है. सुबहशाम किचेन में खटती है और दिनभर मेहनतमजूरी कर चार पैसे कमाती है. लेकिन सब को खिलापिला कर सुलाने के बाद रात जैसे काटने को दौड़ती है तो अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करने की चुनौती से निबटने में उसे पसीने छूट जाते हैं. मोबाइल फोन पर पति से की गई रोमांटिक बातें करते वक्त तो गुदगुदाती हैं लेकिन वे पति के पहलू में होने की जरूरत पूरी नहीं कर पातीं.

सजनेसंवरने पर हालांकि कोई बंदिश नहीं है लेकिन वह सोचती है कि किस के लिए, किसे दिखाऊंगी यह सब. फिर वह दिन गिनने लगती है कि कब दीवाली, होली और छठ आएंगे और वह शहर से पति की लाई साड़ी पहनेगी, मेकअप करेगी और दोनों, कुछ दिन ही सही, जम कर मस्ती और मनमानी करते महीनों की कसर हफ्तेभर में निकालने की कोशिश करते रहेंगे. इसी दौरान पति शहर के अपनी जद्दोजेहद के किस्से सुनाएगा और वह गांव में झेली गई अपनी दुश्वारियां बताएगी. कुछ दिनों बाद पति फिर ट्रेन के डब्बे में घुस कर शहर की भीड़ में अपनी जगह बनाने को चल देगा और वह फिर तनहा हो जाएगी, क्या यही जिंदगी है- आधीअधूरी, टैंपरेरी, सधवा और श्रापित सी.

यह सिलसिला कब तक चलेगा, उसे नहीं मालूम. कितने चुनाव आए और चले गए लेकिन किसी पार्टी या नेता ने यहीं रोजगार देने का अपना वादा कभी पूरा नहीं किया. लेकिन उम्मीद पर दुनिया कायम है वाली तर्ज पर जीते वह फिर जुट जाती है. खेत में मजदूरी पर आतेजाते कई मर्दों की निगाहें उस के जिस्म पर चस्पां होती हैं जिन से बचने के लिए कितने जतन करने पड़ते हैं, यह वह पति को भी यह सोचते नहीं बता पाती कि क्या फायदा, कहीं वे और ज्यादा टैंशन में न आ जाएं या मन में शक का रोग न पाल बैठें. शक तो उसे भी कभीकभी होता है कि क्या ठिकाना कहीं इन्होंने ही शहर में दूसरी न कर ली हो. फलांनी के पति ने तो यही किया था.

ऐसा कईयों के साथ हुआ है कि बाकी सब घरगृहस्थी, बच्चे, रिश्तेदारी तो पत्नियों ने बखूबी संभाल ली लेकिन शरीर की जरूरत नहीं संभाल पाईं और फिसल गईं. इसलिए वह खामोश रहते उस दिन का इंतजार करती रहती है जिस दिन पति फोन पर यह खुशखबरी सुनाएगा कि तैयार रहना, घरगृहस्थी का सारा सामन बांध लेना, सारे इंतजाम कर लिए हैं. इस बार तुझे और बच्चों को भी यहीं ले आऊंगा. पत्नी मुद्दत से पति के इस फोन का इंतजार कर रही है.

-भारत भूषण श्रीवास्तव

बाढ़ की वजह से भी पलायन को मजबूर लोग

उत्तर बिहार के 73 फीसदी हिस्से हर साल बाढ़ से प्रभावित होते हैं. हर साल आने वाली यह बाढ़ फसलों को नष्ट कर किसानों की आजीविका छीन लेती है, जिस से लोग पलायन को मजबूर होते हैं. बिहार का 68,800 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हर साल बाढ़ से डूब जाता है. कोसी, गंडक, बागमती और गंगा जैसी नदियां बरसात में विकराल रूप धारण कर लेती हैं.

नेपाल के पहाड़ी हिस्सों से आने वाला पानी भी बिहार में तबाही मचा देता है. 2024 में ही बिहार के 19 जिलों में 12 लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हुए थे. बाढ़ से सालाना 1,000 करोड़ रुपए का खर्च राज्य सरकार पर पड़ता है. धान और गेंहू जैसी फसलें नष्ट होने से किसानों की आमदनी 50-70 फीसदी तक कम हो जाती है, जिस से कर्ज बढ़ता है और लोग पलायन को मजबूर होते हैं. 2008 की कोसी बाढ़ ने ही तकरीबन 35 लाख लोगों को विस्थापित किया था.

बिहार के सहरसा, दरभंगा और सुपौल जैसे जिलों में बाढ़ से हर साल लगभग 76 प्रतिशत आबादी प्रभावित होती है. बाढ़ से महिलाएं और बच्चे सब से ज्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि पुरुष पलायन कर दिल्ली, मुंबई या पंजाब चले जाते हैं. एक रिपोर्ट के मुताबिक, बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में तकरीबन 40 फीसदी लोग पलायन कर जाते हैं.

बिहार का एक मुख्यमंत्री ऐसा भी

बात उन दिनों की है जब बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर थे. जयप्रकाश नारायण के जन्मदिन पर एक भव्य कार्यक्रम आयोजित हुआ था. देशभर के बड़ेबड़े नेता उस समारोह में आए थे. बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर भी वहां पहुंचे थे. उन का पहनावा सब का ध्यान खींच रहा था क्योंकि वे फटा हुआ कुरता, पुरानी धोती और टूटी हुई चप्पल पहने हुए थे. उन्हें देख कर लोग हैरान थे कि एक मुख्यमंत्री इस हालत में कैसे रह सकता है.

समाजवादी नेता और बाद में देश के प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर ने कर्पूरी ठाकुर को इस हालत में देखा तो हंसते हुए मंच पर कहा कि ‘चलो, हम सब मिल कर कर्पूरी ठाकुर के कुरता फंड में कुछ योगदान दें.’ नेताओं ने मजाक में पैसे इकट्ठे किए और ठाकुरजी को दे दिए ताकि वे नया कुरता खरीद सकें. कर्पूरी ठाकुर ने मुसकराते हुए वह पैसा ले लिया और बोले, ‘जनता का पैसा जनता की भलाई के काम आना चाहिए. यह पैसा जनता की भलाई के लिए है, मेरे कपड़ों के लिए नहीं.’ यह कह कर उन्होंने पूरा पैसा मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा करवा दिया. पूरे देश में ऐसे उदाहरण नहीं मिलते हैं. वे भी बिहार से पलायन की समस्या को खत्म नहीं कर पाए.

प्रवासी बिहारियों का पैसा राज्य में

बिहार में 90 फीसदी मजदूर मौसमी प्रवासी विहार करते हैं. साल के कुछ माह नौकरी कर के ये कुछ समय के लिए वापस बिहार के अपने घर में आते हैं. इन में से 31 फीसदी पंजाब और 24 फीसदी मुंबई जाते हैं. 46 फीसदी मजदूर महीने के अंत में नकदी लाते हैं और 48 फीसदी इंटरनैट के जरिए अपना पैसा भेजते हैं. 75 फीसदी प्रवासियों ने अपने लौटने के बाद अपने परिवार की आय, पारिवारिक बंधन और सामाजिक स्थिति में सुधार महसूस किया.

घर लौट कर आने वालों में से केवल 25 फीसदी फिर से प्रवास करना चाहते हैं. बाकी अपने बच्चों को रोजगार के लिए प्रवास करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं.

प्रवास का सब से बड़ा कारण पैसा भेजना होता है. इस पैसे से ही परिवार की संपत्ति में वृद्धि होती है. यही पैसा प्रदेश की जीडीपी को बढ़ाता है. अगर बाहर से भेजे गए पैसों को जीडीपी से घटा दें तो बिहार की कलई खुल जाए. देश की प्रगति का राज भी यहीं छिपा है. Migration Crisis India.

Wedding Show-Off Trend: शादी में बढ़ रहा दिखावे का चलन

Wedding Show-Off Trend: भव्य शादियों के इस दौर में प्यार से ज्यादा दिखावा बड़ा प्रतीक बन गया है. लोग रिश्तों से ज्यादा रुतबा बचाने में जुटे हैं. लोन ले कर, पूंजी गंवा कर, समाज को प्रभावित करने के मोह में डूब कर जब शादी का मतलब प्रतिस्पर्धा में बदल जाए तो क्या वाकई वह जश्न कहलाने लायक रह जाता है?

निया और रजत दोनों एक अच्छी कंपनी में जॉब करते हैं. दोनों एक-दूसरे को 2 साल से डेट कर रहे थे. वे अपनी शादी इतनी शानदार तरीके से करना चाहते थे कि लोग उन की शादी को वर्षों तक याद रख सकें. सो, उन्होंने अपनी शादी के लिए बैंक से लोन लिया और अपनी सारी जमापूंजी भी निकाल दी, ताकि वे अपनी शादी भव्य तरीके से कर पाएं. हुआ भी ऐसा ही. लोगों ने उन की इस भव्य शादी और लजीज खानपान की जी भर कर तारीफ की. महीनों तक उन के दोस्तों और रिश्तेदारों के बीच उन की भव्य शादी की चर्चा होती रही. आज उन की शादी को 3 साल हो चुके हैं. अब लोग शायद उन की शादी को भूल भी चुके होंगे लेकिन वे आज भी बैंक का लोन चुका रहे हैं, जो उन्होंने अपनी शादी पर लिया था.

एक व्यक्ति, जो कपड़े के व्यापारी थे,  शहर में उन की खुद की दुकान थी. कपड़े का बिजनेस बहुत अच्छा चल रहा था. उन्होंने सोच रखा था कि वे अपनी इकलौती बेटी की शादी बहुत ही धूमधाम से करेंगे. इसलिए बेटी की शादी के लिए उदयपुर में महल बुक कराया. एक ही बेटी थी उन की. जाति-समाज को दिखाना था कि उन्होंने अपनी बेटी की शादी कितने शानदार ढंग से की. अपनी बेटी की शादी के लिए उन्होंने अपनी सारी जमापूंजी निकाल दी, रिश्तेदारों से कर्ज भी लिया ताकि बेटी की शादी में कोई कमी न रहने पाए. उन्होंने जैसा सोचा था वैसा ही हुआ लेकिन बैंक और रिश्तेदारों का पैसा चुकाते-चुकाते उन की कपड़ों की दुकान बिक गई.

आप लोगों ने अपने आसपास कई ऐसे मध्यवर्गीय परिवार देखे होंगे जो अपने बच्चों की शादी के लिए बैंक या रिश्तेदारों से कर्ज लेते हैं. कई बार अपने बच्चों की जिद के आगे या रिश्तेदारों और समाज के आगे अपना रुतबा बनाने के लिए या लड़के वालों की हाई डिमांड दहेज के लिए लोग अपनी हैसियत से ज्यादा शादी पर खर्च करते हैं और इस का खामियाजा कई वर्षों तक उन के परिवारों को भुगतना पड़ता है.

माना कि शादी करने का सब का अपना-अपना तरीका है लेकिन कुछ सालों से शादियां भावनात्मक कम, दिखावटी ज्यादा लगने लगी हैं. किसी धारावाहिक का एक संवाद याद आता है, ‘भारत में शादी, शादी नहीं, त्योहार है’. इस त्योहार को मनाने के लिए भारतीय कोई कसर नहीं छोड़ते, भले ही इस के लिए उन्हें कर्ज ही क्यों न लेना पड़े. यही कारण है कि शादी देश का चौथा सब से बड़ा ‘उद्योग’ बन गया है.

लोन की आफत जान पर

बिहार में एक व्यक्ति ने बेटी की शादी के लिए बैंक से लोन लिया था लेकिन उन की स्थिति यह हो गई कि वे बैंक का लोन नहीं चुका पा रहे थे जिस कारण आए-दिन बैंक वाले आ कर उन्हें धमका जाते. मामला कोर्ट पहुंचा और वह आदमी रोते हुए कहने लगा कि बेटी की शादी के बाद से वह कर्ज में डूबा है. बीमारी के दौरान डॉक्टर से दिखाने के लिए भी पैसे नहीं हैं उस के पास. किसी तरह जीवन का गुजर-बसर हो पा रहा है. सो, वह बैंक का कर्ज कहां से चुकाए. उस व्यक्ति की बात सुन कर जज का दिल पसीज गया और उन्होंने उस का लोन चुका दिया.

वहीं, राजस्थान के भेरूलाल सूर्यवंशी ने साल 2011 में अपनी शादी के लिए करीब 88 हजार रुपए का लोन लिया था, जो बढ़ कर 3 लाख रुपए हो गया. आज उन के 2 बच्चे होने के बावजूद वह ब्याज की राशि चुका रहे हैं.

खिलौने की दुकान पर काम करने वाले एक शख्स का कहना है कि उन्होंने अपनी दोनों बेटियों की शादी के लिए ओपन मार्केट से 19.5 फीसदी के दर से ब्याज पर लोन लिया था. लोन की ईएमआई समय पर नहीं चुकाने की वजह से रिकवरी एजेंट का फोन आना शुरू हो गया. एक-दो बार वसूली एजेंट घर आ कर धमका गया. इन शख्स का कहना है कि वे गांव में एकमात्र खेती की जमीन को बेच कर इस मुसीबत से छुटकारा पाने की सोच रहे हैं लेकिन फिर सोचते हैं कि इस जमीन को वे अपने बुढ़ापे का सहारा मानते हैं, यह भी चली गई तो क्या करेंगे?

शादी की खातिर लाखों रुपए कर्ज लिए जाते हैं. बैंक से, महंगे दरों पर खुले बाजार से लिए गए उधार को समय रहते नहीं चुकाने पर पूरा परिवार रिकवरी एजेंट के निशाने पर आ जाता है. वहीं, कई बार शादी के लिए लोन लेते समय सभी जरूरी पेपर नहीं होने की वजह से व्यक्ति को सरकारी बैंक से लोन नहीं मिल पाता है. इस कारण से उन्हें बाजार से कर्ज लेना पड़ता है, जहां रेट ऑफ इंटरेस्ट बहुत ज्यादा होता है, साथ ही, इस की सीमा तय नहीं होती. वहीं, जब कर्ज समय पर नहीं चुकाए जाते हैं तो ब्याज की रकम बढ़ती चली जाती है, साथ ही, पैसा वसूली के खराब तरीके भी अपनाए जाते हैं.

भारतीय समाज में शादियों पर काफी पैसे खर्च किए जाते हैं. इस खास मौके पर रिश्तेदारों के लेनदेन, वर-वधू के कपड़े, जेवर, खानपान, मेहमानों की आवभगत जैसी चीजों पर पानी की तरह पैसे बहाए जाते हैं लेकिन बाद में उन्हें इस का खामियाजा भुगतना पड़ता है.

बड़े लोगों की देखा-देखी

भारत देश में शादियों में दूसरे की देखा-देखी होने लगी है. इस दिखावे के चक्कर में मध्यवर्गीय परिवारों की जिंदगी-भर की पूंजी का एक बहुत बड़ा हिस्सा शादी पर खर्च हो रहा है. पहले जहां शादी की रस्मों के पीछे एक उद्देश्य हुआ करता था, उस की जगह अब दिखावे के उत्सवों ने ले ली है. एक-दो दिनों के समारोह पर भारी धन खर्च होने लगा है.

भारत की सब से महंगी शादी

भारत में सब से महंगी शादी में से एक, अंबानी परिवार की शादी, शायद ही लोगों के जेहन से कभी मिट पाएगी. 2018 में अंबानी परिवार की बेटी की शादी देश में बियोंसे ने परफॉर्म किया था और मेहमानों ने इटली के लेक कोमो के साथ-साथ मुंबई और राजस्थान में रिसेप्शन में भाग लिया था, जिस की लागत 100 मिलियन डॉलर बताई गई थी.

मुकेश अंबानी के छोटे बेटे अनंत अंबानी की शादी में भारत के अखबार शादी समारोह की विस्तृत जानकारी से अटे पड़े थे. भारतीय अरबपति की शादी में बॉलीवुड की हस्तियों से ले कर बिल गेट्स, मार्क जुकरबर्ग और इवांका ट्रंप जैसी बड़ी हस्तियां शामिल हुई थीं और 3 दिनों में मेहमानों को लगभग 2,500 व्यंजन परोसे गए थे.

आंकड़े बताते हैं कि भारत में महंगी शादियों का चलन बढ़ता जा रहा है. भारत में शादियों का उद्योग हर साल लगभग 130 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 10 लाख करोड़ रुपए) के बराबर खर्च होता है, जिस से यह देश का चौथा उद्योग बन गया है.

यह आंकड़ा जेफरीज की एक रिपोर्ट से आया है, जो बताती है कि भारत में शादियां सिर्फ एक समारोह नहीं, बल्कि बहुत बड़ा बिजनेस है. दुनियाभर में सब से बड़े विवाह स्थल के रूप में पहचाने जाने वाले देश भारत, में हर साल कम से कम 80 लाख से 1 करोड़ शादियां हो रही हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का शादी के खर्च से जीडीपी का अनुपात अन्य देशों की तुलना में काफी अधिक है. रिपोर्ट के अनुसार, भारत में शादियों का गहरा सांस्कृतिक महत्व है, जिस के कारण परिवार शिक्षा की तुलना में अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा शादियों पर खर्च करते हैं.

इन अरबपतियों की शादी की बेजोड़ भव्यता उस देश में विभाजन पैदा कर रही है जहां अमीर और गरीब के बीच खाई बहुत गहरी है और बढ़ती जा रही है.

न्यू लाइन्स मैगजीन की दक्षिण एशिया संपादक सुरभि गुप्ता कहती हैं कि ‘ऐसा लगता है कि अंबानी परिवार भारत के नए युग के राजघराने हैं. उन्होंने हमारी कल्पना को कई गुना विस्तार दिया कि भारतीय विवाह कैसा हो सकता है.’ वे आगे कहती हैं कि शादी की रस्में समाज को जोड़ने वाली होती हैं लेकिन ये समाज को तोड़ भी सकती हैं क्योंकि सोशल मीडिया पर धन का बेधड़क प्रदर्शन कुछ लोगों में गुस्से और घृणा की भावनाएं जगा रहे हैं.

दक्षिण एशिया से बाहर के लोग, जो इन आयोजनों को फिजूलखर्ची मानते हैं, शायद यह नहीं जानते कि भारतीय शादियां किस हद तक व्यक्ति की सामाजिक स्थिति और धन का प्रदर्शन करने का अवसर होती हैं.

द आसियान पोस्ट में प्रकाशित एक अध्ययन से संकेत मिलता है कि दक्षिण-पूर्व एशिया में शादी की लागत में तेजी से वृद्धि देखी जा रही है. ऑनलाइन लाइफस्टाइल, मीडिया और ई-बिजनेस कंपनी ईएसडी लाइफ के अनुसार, हौंगकौंग को अधिक विशेष रूप से देखें तो शहर में शादी करने की औसत लागत 2022 में 10 प्रतिशत बढ़ कर 3,60,577 एचकेडी (लगभग 45,982 यूएसडी डॉलर) हो गई. कोविड महामारी के 2 साल के अंतराल के बाद शादी के प्रत्येक सामान पर खर्च में दोहरे अंकों में वृद्धि देखी गई प्री-वेडिंग फोटोग्राफी, सगाई की अंगूठियों से ले कर हनीमून पैकेज तक.

बढ़ती मुद्रास्फीति दरों के साथ-साथ सोशल मीडिया के रु  झानों के संपर्क को भी आज के दिन और युग में शादी के बंधन में बंधने की बढ़ती लागत के कारणों के रूप में जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

जब दुनिया में सब से महंगी शादियों की बात आती है तो अकसर नए ट्रेंड्स का जन्म होता है. बॉलीवुड स्टार्स आलिया भट्ट, दीपिका पादुकोण और सोनम कपूर को ही लीजिए, जब इन अभिनेत्रियों ने पारंपरिक लाल रंग की जगह सफेद रंग के एक सदाबहार शेड को अपनाने का फैसला किया था तो भारतीय दुल्हनों ने भी यही किया.

ग्लोबल इन्वेस्टमेंट बैंकिंग फर्म जेफरीज की रिपोर्ट की मानें तो भारत में औसतन एक शादी का खर्च लगभग लाखों में है. यह खर्च शहरों और हैसियत के हिसाब से बढ़-घट सकता है. पहले भी शादियां होती थीं पर आज की तरह नहीं. आज तो मेहंदी, हल्दी, संगीत से ले कर कई तरह के कार्यक्रम होते हैं. ऐसे में शादी का बजट आप की सेविंग्स से कई गुना ज्यादा हो सकता है.

खर्च के आधार पर तय होती शादी की सफलता असफलता

बेशक इस से लाखों लोगों को रोजगार मिल रहा है लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि महंगी शादियां ही लंबे समय तक टिकेंगी. स्टील किंग लक्ष्मी मित्तल की बेटी वनिशा मित्तल की शादी बैंकर अमित भाटिया से 2004 में हुई थी, जिसे दुनिया की सब से महंगी शादियों में से एक माना जाता था, लेकिन 2014 में उन का तलाक हो गया. जबकि, इस शादी में लगभग 240 करोड़ रुपए खर्च हुए थे, जिस से यह दुनिया की सब से महंगी शादियों में से एक बन गई थी.

प्रिया सचदेव और विक्रम चटवाल ने उदयपुर में 2006 में एक भव्य शादी की थी जिस की रस्में 10 दिनों तक चली थीं और जिसे भारत की सब से महंगी शादियों में से एक माना जाता था, जिस में दुनियाभर के वीआईपी मेहमान शामिल हुए थे लेकिन यह शादी 5 साल ही चल पाई और 2011 में उन का तलाक हो गया.

इन अमीर और मशहूर लोगों की शादी उन के निजी द्वीप स्थलों, बेहतरीन शैंपेन के अंतहीन दौर और दुनिया के सर्वश्रेष्ठ डिजाइनरों द्वारा हाथ से बनाए गए काउचर परिधानों से सजी होती है. राजघरानों से ले कर मनोरंजन जगत की हस्तियां पहुंचती हैं लेकिन फिर भी कुछ महंगी शादियां टिक नहीं पातीं और तलाक हो जाता है.

एक स्टडी कहती है कि महंगी शादियों की तुलना में कम बजट वाली शादियां ज्यादा चलती हैं. शादी के खर्चे पर हुई यह स्टडी अमेरिका के 3 हजार से अधिक शादीशुदा जोड़ों पर हुई है, जो कहती है कि व्यक्ति को अपनी शादी के लिए बहुत कम खर्च करना चाहिए. ऐसा न करने वाले कपल आमतौर पर अपने रिश्ते में कम खुश देखे जाते हैं.

अध्ययन में यह भी पाया गया कि जिस वैडिंग में 1,000 डॉलर (83,011 रुपए) से कम खर्च किया गया उन शादियों के लंबे समय तक चलने की संभावना बहुत अधिक थी. जबकि, 20,000 डॉलर (16,60.230 रुपए) से अधिक वैडिंग पर खर्च करने वाले कपल्स के बीच तलाक होने की संभावना बहुत अधिक थी.

कैसे ले सकते हैं मैरिज लोन?

मैरिज लोन दरअसल पर्सनल लोन का एक प्रकार है जो शादी के खर्चों को पूरा करने के लिए दिया जाता है. मैरिज लोन की ब्याज दरें आमतौर पर बैंक या लोन संस्थानों द्वारा ऑफ़र की जाने वाली पर्सनल लोन की ब्याज दरों के सामान ही होती हैं. आप सामान्य पर्सनल लोन ले कर उस का उपयोग भी शादी के खर्चों के लिए कर सकते हैं.

बैंक या एनबीएफसी आमतौर पर 10.40 फीसदी प्रतिवर्ष की शुरुआती ब्याज दर पर 40 लाख रुपए तक का पर्सनल लोन 5 साल के लिए देते हैं. हालांकि कुछ पब्लिक सेक्टर के बैंक कम ब्याज दरों पर और लंबी अवधि के लिए पर्सनल लोन देते हैं. वहीं, कुछ चुनिंदा ग्राहकों को प्री-अप्रूव्ड इंस्टेंट पर्सनल लोन उपलब्ध होते हैं.

मैरिज लोन के लिए आप के महीने की कमाई कम से कम 15,000 रुपए होनी चाहिए. 750 या उस से अधिक क्रेडिट स्कोर होने पर लोन आवेदन के लिए मंजूर होने की संभावना बढ़ जाती है.

पहले शादियां घरों में होती थीं. शादी की सारी व्यवस्था की जिम्मेदारी परिवार और सगे-संबंधी करते थे. लोग शादियों पर उतना ही खर्च करते थे जितनी उन की हैसियत होती थी. यह ट्रैंड अब पूरी तरह बदल चुका है. अब शादी के लिए बस आप को पैसे खर्च करने हैं और इंजॉय करना है. सारे इंतजाम वैडिंग कराने वाली कंपनियां देख लेंगी. शायद, आप को यह नहीं पता कि आप को यह सुविधा दे कर वैडिंग कंपनियां अरबों की मालिक बन रही हैं.

ऐसे में कपल्स को वैडिंग पर भारी खर्चों के बजाय उन को साथ में आराम से छुट्टियां मनाने पर खर्च करना चाहिए. हनीमून एक अच्छा समय होता है जहां कपल शादी से जुड़ी जिम्मेदारियों से रूबरू होने से पहले एक-दूसरे के साथ अपनी बौंडिंग को मजबूत कर सकते हैं.

सादगी ही बेहतर विकल्प

शादियों में सादगी की ओर लौटने की आवश्यकता है. आखिर क्यों हम पारंपरिक आयोजनों को छोड़ ट्रैंड्स के पीछे भागते रहें? शादी की वास्तविक खुशी तो उन पलों में होती है जब नवकपल एक-दूसरे से मिलते हैं, साथ जीवन जीने की कसमें खाते हैं. सादगी और सच्चाई से भरी शादी उतनी ही सुंदर हो सकती है जितनी कोई भव्य और महंगी शादी.

शादी में लंबे-चौड़े खर्च के साथ समय की बर्बादी भी होती है. नाते-रिश्तेदारों को लाना व ले जाना पड़ता है. ऐसे में बहुत से युवा और उन के परिवार वाले शानो-शौकत की शादी से तोबा कर कोर्ट मैरिज का रुख कर रहे हैं.

कोर्ट मैरिज करने वाले एक दूल्हा-दुल्हन का कहना है कि शादी में फिजूलखर्ची करने से अच्छा है कि वह पैसा हम अपने भविष्य के लिए बचा कर रखें. उन्होंने यह भी कहा कि कई जगहों पर शादी-ब्याह के कागजात पेश करना जरूरी होता है और कोर्ट मैरिज करने पर उन्हें कोर्ट की ओर से मैरिज सर्टिफिकेट दिया जाता है जो भविष्य में काफी काम आता है.

आज भी कई ऐसे पति-पत्नी हैं जिन के पास शादी का सबूत नहीं है. जब कागजात की जरूरत पड़ती है तो उन को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है.

शादी रिश्तों का बंधन है, कोई फिल्म का सैट नहीं, जिसे भव्य दिखाया जाए. परंपराओं को निभाने के लिए भीड़ और दिखावे की जरूरत नहीं, बल्कि खास रिश्तेदारों की जरूरत होती है. शादी में दूल्हे के दोस्तों और दुल्हन की सहेलियों की हंसी-ठिठोली, मजाक और बड़ों के आशीर्वाद से रौनक बनती है. शादी दो लोग और दो परिवारों का जीवन-भर का मिलन है. इस में दिखावे की कोई जगह नहीं होनी चाहिए. Wedding Show-Off Trend.

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