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Indian Society: कट्टरता के उफान पर सेकुलर इंडिया

Indian Society: भारत आज उस दोराहे पर खड़ा है जहां आस्था, पहचान और राजनीति आपस में गड्डमड्ड हो चुकी हैं. मुसलमान हों या हिंदू, सिख हों या जैन—हर कोई अपनेअपने धर्म के नाम पर सड़क पर है. सवाल यह है कि क्या यह आस्था का उफान है या फिर कट्टरता का विस्फोट? संविधान ने सब को धार्मिक स्वतंत्रता दी, मगर सेकुलर भारत में सेकुलर होना आज गाली क्यों बन गया है?

मुसलमान अपने धर्म को ले कर सड़कों पर हैं तो हिंदू भी अपनी आस्थाओं के नाम पर सड़कों पर तांडव कर रहे हैं. सेक्युलर देश में सेकुलर होना गाली बन गया है. आस्था अपनी जगह है. सभी को अपनी अपनी आस्था के साथ जीने का हक है. भारत का संविधान भी धार्मिक आजादी की बात करता है लेकिन धार्मिक आजादी के नाम पर देश भर में यह कैसा तमाशा चल रहा है?

4 सितंबर 2025 को उत्तर प्रदेश के कानपुर के रावतपुर इलाके में बारावफात (ईद-ए-मिलाद-उन-नबी) का जुलूस निकला. इस दौरान कुछ मुसलिम समुदाय के लोगों ने जुलूस मार्ग पर ‘आई लव मोहम्मद’ का बैनर लगाया. हिंदू संगठनों ने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि यह साम्प्रदायिक सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश है. पुलिस ने बैनर हटाने का आदेश दिया. विवाद बढ़ा तो 9 सितंबर को कानपुर पुलिस ने 5 नामजद और 15 अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की.

मुसलिम संगठनों ने इसे धार्मिक स्वतंत्रता (संविधान के अनुच्छेद 25) पर हमला बताया. एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सोशल मीडिया पर लिखा, “आई लव मोहम्मद कहना कोई अपराध नहीं है.” इस से शोशल मीडिया पर #आईलवमोहम्मद ट्रैंड करने लगा. इस विवाद में ओवैसी के कूदने के बाद बरेली, लखनऊ, उन्नाव, महाराजगंज, कौशांबी, मऊ में रैलियां निकली. बरेली में मौलाना तौकीर रजा के आह्वान पर जुमे की नमाज के बाद पथराव हुआ, पुलिस ने लाठीचार्ज किया. 12 लोग गिरफ्तार, 21 एफआईआर और 1,324 मुसलिमों पर मुकदमे हुए. कश्मीर, तेलंगाना, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और कर्नाटक में पथराव हुए जिस से देश भर में सांप्रदायिक तनाव और बढ़ा. शोशल मीडिया पर लाखों पोस्ट्स में लोग प्रोफाइल पिक्चर बदल कर ‘आई लव मोहम्मद’ शेयर करने लगे.

वाराणसी में जगद्गुरु शंकराचार्य नरेंद्रनंद ने ‘आई लव महादेव’ का बैनर ले कर मार्च निकाला और इसे क्रिया की प्रतिक्रिया का नाम देते हुए मुसलमानों के कारनामे को “देश को बर्बाद करने की साजिश” बताया.

इस बात में कोई दो राय नहीं कि हाल के वर्षों में मुसलमानों के अंदर कट्टरता बढ़ी है. फ़्रांस के कार्टून विवाद के मामले में भारत भर में विरोध प्रदर्शन हुए. हजरत मुहम्मद पर नूपुर शर्मा के बयान के बाद भी मुसलमान सड़कों पर उतर आए थे. इन मामलों के अलावा बीजेपी सरकार की ओर से तीन तलाक, सीएए, वक्फ बोर्ड और औरंगजेब जैसे मुद्दों को भी लगातार उठाया जाता रहा जिन से मुसलमान विरोध के लिए सड़कों पर उतर आए.

इस तरह की तमाम घटनाक्रमों में मुसलिम समाज लगातार हाशिये पर ही गया है. इस से मुसलमानो में कट्टरता बढ़ी है और मुसलमान भारतीय समाज की मुख्यधारा से कटता चला गया है. ‘आई लव मुहम्मद’ वाला प्रकरण इसी कट्टरता का नतीजा है.

बहुसंख्यक हिंदूओं के धार्मिक चेतना का यह ताज़ा उभार अल्पसंख्यक वर्गों को बेचैन कर रहा है. मुसलमानों की बात छोड़ दी जाए तो पिछले एक दशक में देश के दूसरे अल्पसंख्यक तबकों में भी धार्मिक कट्टरता तेजी से बढ़ती हुई नजर आई है. जैन, बौद्ध या सिख ये सब भी तेजी से कट्टरता की ओर बढ़ रहे हैं.

सिखों में कट्टरता तेजी से बढ़ी है. इशनिंदा (ब्लासफेमी) या बेअदबी के नाम पर हत्याएं इस बात का प्रमाण हैं. 2024 में पंजाब के फिरोजपुर जिले के बडाला गांव में 19 साल के एक मानसिक रूप से अस्वस्थ सिख युवक बक्शीश सिंह ने गुरु ग्रंथ साहिब के कुछ पन्ने फाड़ दिए. गुस्साए ग्रामीणों ने उसे पीटपीट कर मार डाला.

सांप्रदायिकता की राजनीती कितनी खतरनाक?

जातिवाद और सांप्रदायिकता यह भारत की दो सब से बड़ी समस्याएं हैं. यहां दोनों तरह की राजनीति साथसाथ चलती है. जातिवाद पर आधारित राजनीती सामाजिक न्याय और शोषित वर्गो के अधिकारों के नाम पर की जाती है तो सांप्रदायिकता की राजनीति बहुसंख्यक हिंदूओं के हितों के नाम पर होती है.

2014 से पहले देश में जातिवाद पर आधारित राजनीती का जोर रहा तो 2014 के बाद सत्ता में सांप्रदायिक विचारधारा ने जगह बनाई और तब से लगातार यह विचारधारा मजबूती की ओर बढ़ रही है. आज देश में भयंकर बेरोजगारी है, किसानों की समस्याएं हैं, आम जनता शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाओं से जूझ रही हैं, कहीं सूखा और कहीं बाढ़ से त्रासदी की स्थितियां पैदा हो रही हैं, मनीपुर, असम और लद्दाख जैसे शांतिपूर्ण राज्य जल रहे हैं लेकिन सत्ता के टुकड़ों पर पलने वाले मेन स्ट्रीम मीडिया के लिए इनमें से कोई मुद्दा जरूरी नहीं है. दिन रात उन फिजूल के मुद्दों पर चर्चा होती है जिससे देश की गंगा जमुनी तहजीब में आग लगाई जा सके.

पाकिस्तान में जियाउल हक की कट्टरपंथी सोच का खामियाजा पाकिस्तान के बहुसंख्यक मुसलमान आज तक भुगत रहे हैं. खुमेनी की इसलामिक क्रांति के बाद वहां की बहुसंख्यक शिया आबादी को ही सब से ज्यादा नुकसान झेलना पड़ा. पाकिस्तान में जियाउल हक और ईरान में आयतुल्लाह खुमेनी की कट्टरता ने पिछले 4 दशकों में दोनों देशों को धार्मिक उन्माद में धकेल रखा है. इस बीच शिक्षा बर्बाद कर दी गई और शिक्षा के धार्मिककरण से नस्ले तबाह हो गईं. आज भारत भी ईरान और पाकिस्तान की राह पर है.

नफरत एकतरफा नहीं

धर्म की राजनीति से पैदा हुआ उन्माद एकतरफा नहीं होता. बहुसंख्यक वर्ग की धार्मिक चेतना को हवा दी जाती है तो इस की प्रतिक्रिया में अल्पसंख्यक समुदाय के भीतर भी धार्मिक उन्माद कुलांचे मारता है. इस से सांप्रदायिक राजनीति और मजबूत होती है.

दक्षिणपंथ की राजनीती बहुसंख्यक हिंदूओं के वोट बैंक पर आधारित है. हिंदूओं को हिंदू होने पर गर्व होना जरूरी है तभी हिंदुत्ववाद की राजनीति निर्बाध रूप से मजबूती और स्थिरता की ओर आगे बढ़ पाएगी हिंदू होने पर गर्व तभी होगा जब हिंदू अस्मिता के नाम पर धार्मिकता, आस्था, संस्कृति और परंपराओं का ढोल पीटा जाता रहेगा. इस के लिए पिछले एक दशक से तमाम तरह के प्रोपगेंडे और हठकंडे अपनाए जा रहे हैं. यही कारण है कि पिछले एक दशक में बहुसंख्यक हिंदूओं के अंदर धार्मिकता तेजी से बढ़ी है. धार्मिकता के साथ कट्टरता और पाखंडवाद भी तेजी से बढ़ा है.

रामनवमी के नाम पर जुलूस व्यापक स्तर पर बढ़े हैं. गणेश उत्सव, कांवड़ यात्रा, रथयात्रा, सरस्वती पूजा, माता के जागरण, नवरात्रि और दशहरा जैसे आयोजनों में बेतहाशा भीड़ दिखाई देने लगी है. इन धार्मिक आयोजनों के अलावा बड़ी संख्या में संतों और धर्मगुरुओं के आयोजन भी हो रहे हैं. इन धार्मिक आयोजनों के जरिये सांप्रदायिकता को हवा दी जा रही है. सांप्रदायिकता की इस राजनीति का शिकार अब सिर्फ मुसलमान ही नहीं बल्कि जैन सिख और बौद्ध भी हो रहे हैं.

पिछले 10 वर्षों में लगातार मुसलिमों के साथ मौब लिंचिंग की घटनाएं हुईं. मस्जिदों को निशाना बनाया गया. दुकानें जलाई गईं. तथाकथित हिंदू संतों ने सार्वजनिक मंचों से मुसलमानों के सामूहिक नरसंहार की बातें कीं. टीवी डिबेट्स में लगातार मुसलमानो के खिलाफ जहर उगला गया. रेड़ी पटरी वाले मुसलमानों के रोजगार बंद करवाए गए. मुसलमानों के घरों पर बुलडोजर चलाए गए. इस तरह सांप्रदायिक नफरत की यह आग पूरे देश में फैली लेकिन सांप्रदायिकता की इस घिनौनी राजनीती की जद में अब केवल मुसलमान ही नहीं हैं बल्कि सिख, जैन और बौद्ध भी इस की चपेट में आ चुके हैं.

जैनियों के विरुद्ध हिंसा

हाल के वर्षो में BJP शासित राज्यों में जैन समाज पर हमले बढ़े हैं. मुंबई में जैन मंदिर ध्वस्त किया गया, मूर्तियां तोड़ी गईं. हिंदुत्ववादियों द्वारा गुजरात के गिरनार और झारखंड के शिखरजी पर कब्जे की कोशिशें की गईं. मध्य प्रदेश के जबलपुर में बीजेपी नेताओं के औडियो में जैनों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियों का मामला सामने आया तो उत्तर प्रदेश के बागपत के एक जैन कालेज में मूर्ति लगाने को ले कर हिंदुत्वदियों ने जम कर विरोध किया. इन सभी घटनाओं को ले कर जैन समाज ने जोधपुर, इंदौर और अन्य जगहों पर विशाल विरोध प्रदर्शन किए. जैन समाज का आरएसएस / बीजेपी के साथ ऐतिहासिक जुड़ाव रहा है इस के बावजूद जैन समाज खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है.

20 मई 2022 को एक मानसिक रूप से विक्षिप्त जैन बुजुर्ग, भंवरलाल जैन (उम्र लगभग 65 वर्ष), को कुछ लोगों ने मुसलिम समझ कर बेरहमी से पीटपीट कर हत्या कर दी थी. वीडियो फुटेज में आरोपी उन्हें चांटे मारते हुए पूछते सुनाई देता है, “क्या तेरा नाम मोहम्मद है? आधार कार्ड दिखा.” पिटाई इतनी क्रूर थी कि भंवरलाल को गंभीर चोटें आईं, और अगले दिन (21 मई 2022) अस्पताल में उन की मौत हो गई.

अल्पसंख्यक समाज के खिलाफ इस तरह की घटनाएं भारत में बढ़ती सांप्रदायिक नफ़रत का उदाहरण हैं जहां एक मानसिक रूप से बीमार आदमी भी सुरक्षित नहीं है.

पूरी दुनिया में धर्म क्यों हावी हो रहा है

धर्म ने हमेशा विज्ञान का विरोध किया लेकिन इसी विज्ञान के सहारे धर्म पनपा भी है. तमाम धर्म मौडर्न इन्फौर्मेशन टैक्नोलौजी को अपना रहे हैं और इस के जरिये नई पीढ़ी के अंदर पुरानी रूढ़ियों को फिट कर रहे हैं. केथौलिक चर्च ने 16वीं सदी के बाद से लगातार वैज्ञानिकों के विरुद्ध षड्यंत्र किए उन्हें प्रताड़ित किया लेकिन 19वीं और 20वीं सदी में इसी केथौलिक चर्च ने विज्ञान का सहारा लेना शुरू किया. 1975 में तबके पोप पोल आई ने सभी केथौलिक चर्चों को टीवी और कंप्यूटर को अपनाने को कहा.

आज सभी धर्म एक तरफ विज्ञान की भर्त्सना करते हैं और दूसरी ओर आधुनिक टैक्नोलौजी से मंदिर मस्जिद चर्च बनवा रहे हैं. ईश्वर के नाम पर उल्लू बनाने वाले बड़े बड़े धर्मगुरु ईश्वर के बिना जीवन भर रह सकते हैं लेकिन विज्ञान और टैक्नोलौजी के बिना एक दिन नहीं रह सकते. यही धर्मगुरु समाज में कट्टरता पैदा करने के लिए तकनीक का भरपूर इस्तेमाल कर रहे हैं. कट्टरता फैलाने के नए तरीके आ गए हैं. रामलीलाओं के हनुमान अब नई तकनीक के सहारे उड़ने लगे हैं तो “आई लव मोहम्मद” के लिए बिजली के ग्लो साइन का इस्तेमाल किया जा रहा है.

सभी चर्च मंदिर मस्जिद एअर कंडीशन्ड हो रहे हैं. इन धर्मस्थलों में फर्श से ले कर छत तक हाई टेक होते जा रहे हैं. औनलाइन पूजा करवाई जा रही है. दान वैब साइट पर मांगा जा रहा है. औनलाइन दर्शन हो रहे हैं. जलाभिषेक तक वर्चुअल हो रहे हैं. व्हाट्सएप्प पर तलाक देना जायज माना जा रहा है. वाट्सअप पर भक्तों के ग्रुप बन रहे हैं. इस तरह नई तकनीक के सहारे पुराने धर्मों की मार्केटिंग जोरों पर चल रही है. धर्म के नजरिये में विज्ञान कुछ नहीं है लेकिन सच यह है की आज तकनीक के बिना धर्म कुछ नहीं है.

दरअसल आम आदमी के जीवन को सरल बनाने में धर्म की कोई भूमिका नहीं होती. धर्म से एक वक़्त की रोटी हासिल नहीं होती. दुनिया धर्म से नहीं चलती और इस दुनिया में सांस लेने वाले प्राणियों का जीवन भी धर्म से नहीं चलता लेकिन पूरी दुनिया में धर्म के नाम पर राजनीति जरूर चलती है. आज भारत की राजनीती में धर्म हावी है और आम आदमी हाशिये पर पहुंच चुका है. आज के वक़्त भारत में चारों ओर बस धर्म ही धर्म नजर आ रहा है. धार्मिक त्यौहार, धार्मिक जमावड़े और धर्म के नाम पर बेलगाम उदंडता, यही देश की सच्चाई बन चुकी है. सांप्रदायिक राजनीति का शिकार अल्पसंख्यक मुस्लमान तो हैं ही लेकिन इस घिनौनी राजनीति में सब से ज्यादा बहुसंख्यक हिंदू ही पिस रहा है लेकिन यह बात फिलहाल किसी को समझ नहीं आ रही. Indian Societ.

Online Harassment: अपस्कर्टिंग, प्राइवेसी और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स

Online Harassment: फेसबुक पर एक अजीबोगरीब वीडियो दिखी जिस में किसी अनजान सब्जी मार्किट में भीड़ में एक लड़का वीडियो शूट कर रहा होता है. वह शूट करते हुए कैमरा उस जगह ले कर जाता है जहां महिलाएं सब्जियां खरीद रही हैं. अब है तो यह साधारण सी व्लौग वीडियो मगर इस की बारीकियां कैमरे के पीछे छुपे इंसान की मंशा से पता चलती है. वह जानबूझ कर कैमरे का एंगल कुछ इस तरह रखता है कि महिलाओं की आपत्तिजनक फूटेज दिखाई दे. कभी कैमरा उन के पीछे की तरफ जूमइन करता है कभी उन के ब्रैस्ट की तरफ.

ठीक ऐसे ही भरी ट्रेन में किसी डब्बे में ऊपर वाली सीट पर बैठा लड़का नीचे खड़ी लड़कियों की छुप कर वीडियो इस एंगल से बनाता है कि उन की क्लीवेज दिखाई दे. या हावभाव दिखाई दे. आखिर वह बना क्यों रहा है सवाल इस पर है. यह बेरोकटोक है.

एक वीडियो में ट्रेन एक कपल किसी कम्पार्टमेंट में सोते हुए इंटिमेट होते दिखाई देते हैं. उसी समय कोई उन की वीडियो चुपके से बना लेता है और उसे सोशल मीडिया पर वायरल कर देता है.

ऐसे ही मेट्रो वाली कई वीडियो सोशल मीडिया पर दिखाई पड़ती हैं, जहां कोई कपल एकदूसरे को किस कर रहे होते हैं. कोई गले मिल रहे होते हैं. इसे शूट कर के कोई सोशल मीडिया पर पोस्ट कर देता है और लिखता है “दिल्ली मेट्रो में आप का स्वागत है.” अरे भाई, तुम्हे उन के व्यवहार से आपत्ति है तो जहां तुम्हारी इच्छा है, शिकायत करो, मगर बिना उन की मर्जी के उन की प्राइवेट वीडियो शूट कर के पोस्ट करना कहां तक सही है.

बात अब सीसीटीवी कैमरे तक नहीं रह गई है अब हर हाथ में फ़ोन है, जो बेलगाम है. ये कैमरे जो चाहे शूट कर रहे हैं. बिना किसी की मर्जी के बिना किसी परमिशन के.

इमेज बेज्ड सैक्सुअल हरासमेंट

डिजिटल युग ने हमें अनगिनत सुविधाएं दी हैं. हम हर रोज इंटरनेट पर फोटो शेयर करते हैं, वीडियो अपलोड करते हैं और हर पल को सोशल मीडिया पर दर्ज करने के फितूर में रहते हैं. नेपाल में युवा आंदोलन कर रहे हैं क्योंकि वहां सोशल मीडिया पर ही बैन लगा दिया है और उन के पास सोशल मीडिया से पैसे कमाने के अलावा कोई और काम ही नहीं है. जिस दुनिया में ‘कंटेंट ही करंसी’ बन चुका है, वहां लोग लाइक्स, फौलोअर्स और वायरल होने की भूख में किसी भी हद तक चले जाते हैं.

इस का एक अंधेरा पक्ष अपस्कर्टिंग और इमेज-बेस्ड सैक्सुअल एब्यूज यानी बिना सहमति किसी की प्राइवेट फोटोज या वीडियो बनाना व शेयर करना है.

अपस्कर्टिंग पहले विदेशों में खूब था, उन की कुछ छटीकटी वीडियो देख कर लगता है कि वहां यह आज भी है. जैसे, कुछ वीडियो इस तरह की भी दिखाई देती हैं जहां सड़क पर किसी सीवर के नीचे एयर ब्लोअर लगा दिया जाता है और जो स्कर्ट वाली लड़की उस के आसपास से गुजरती है तो हवा ब्लो की जाती है जिस से उन की स्कर्ट हवा में उड़ती है और उन की क्लिप बना ली जाती है.

वहां की फिल्मों में यह अभी भी दिखाया जाता है. जहां हाई स्कूल में कोई लड़का अपनी बेंच के आगे स्कर्ट में बैठी लड़की की नीचे से चुपके से पिक्चर ले लेता है.

सुनने में यह मामूली और हंसी में टालने जैसी बात लग सकती है, लेकिन हकीकत में यह मेंटल और इमोशनल लेवल पर गहरा हमला करता है. बात केवल एक वीडियो या फोटो तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह किसी इंसान की पूरी प्राइवेसी और सेल्फ रिसपेक्ट को तोड़ कर रख देती है. दिक्कत यह कि डिजिटल प्लेटफौर्म्स के पहले जो हरकतें छिप कर की जाती थीं, आज वे खुले तौर पर “कंटेंट” का हिस्सा बन गई हैं.

अपस्कर्टिंग का ताजा मामला

राजधानी दिल्ली का ताजा मामला इसे समझने में बिल्कुल सटीक उदाहरण है. हाल ही में दिल्ली पुलिस ने एक पायलट को गिरफ्तार किया, जो मेट्रो और भीड़भाड़ वाली जगहों पर महिलाओं के प्राइवेट हिस्सों की चोरीछुपे वीडियो बनाता था.

उस के पास से करीब 74 ऐसी क्लिप्स बरामद की गईं, जिन्हें उस ने एडवांस स्पाई कैमरे के जरिये रिकौर्ड किया था. यह कैमरा उस ने जूते में बारीकी से लगाया था, जिस से वह महिलाओं के बिल्कुल पास खड़ा हो कर उन के कपड़ों के नीचे वीडियो बना लेता था, और उन्हें भनक तक नहीं लगती थी. यह घटना सिर्फ एक व्यक्ति के अपराध की कहानी नहीं बताती, बल्कि यह समाज में टैक्नोलौजी और यौन कुंठा के खतरनाक जोड़ को सामने लाती है.

अब सोचिए इन जैसे लोगों के चलते लड़कियों को कितना सतर्क रहना पड़ता होगा. कैसे हर समय अपने कपड़े संभालने पड़ते होंगे. कई मामलों में उन का सामाजिक जीवन पूरी तरह बदल जाता है.

साल 2018 में, इंग्लैंड में इस पर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ था. कई महिलाओं और एक्टिविस्ट्स ने एक कैम्पेन चलाया कि सरकार अपस्कर्टिंग को अपराध घोषित करे. लंबे समय तक चली बहस के बाद इसे सैक्सुअल औफेंस की श्रेणी में शामिल तो किया गया, लेकिन तब तक सैकड़ों महिलाएं ऐसी हरकतों का शिकार बन चुकी थीं. औस्ट्रेलिया ने भी इस दिशा में कदम उठाया और कानून ला कर साफ कर दिया कि बिना सहमति किसी भी प्रकार की निजी तस्वीर बनाना, चाहें असली हो या डीपफेक, एक सीधा अपराध है.

क्यों हो रही सामान्य

भारत की स्थिति और चिंताजनक है. दिल्ली मेट्रो का उदाहरण लीजिए. हम अकसर सुनते हैं कि यहां से लगातार “वायरल वीडियोज” निकलते रहते हैं. किसी के फैशन स्टाइल या किसी लड़की के पहनावे को ले कर जानबूझ कर वीडियो बनाना और फिर उसे सोशल मीडिया पर डालना अब कौमन हो गया है. धीरेधीरे यह ट्रैंड सिर्फ बौडी-शेमिंग तक सीमित नहीं रहा. अब इस में छिपे कैमरों से अपस्कर्टिंग कर क्लिप्स बनाई जाने लगीं हैं. इन वीडियोस को ‘मज़ाक’ या ‘प्रैंक’ कह कर शूट किया जाता है, लेकिन असल में यह सीधेसीधे सैक्सुअल हैरेसमेंट के दायरे में आता है.

इस तरह की आप कोई भी वीडियो उठा कर देखिए, कंटेंट के नाम पर क्या दिखाने की कोशिश की जा रही है. आज यूथ के दिमाग में यह फितूर भर गया है कि अगर आप इंस्टाग्राम पर ट्रेंड नहीं कर रहे, अगर आप के रील्स पर हजारों लाइक नहीं आ रहे, तो आप किसी काम के नहीं हैं. इस दबाव ने लाखों युवाओं को ऐसा शौर्टकट ढूंढने पर मजबूर कर दिया है जिस की कीमत किसी दूसरे को चुकानी पड़ रही है. सोचिए, अगर किसी लड़की को यह पता चले कि उस की चोरीछिपे ली गई एक फोटो या वीडियो आज सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी है, तो उस की मानसिक स्थिति कैसी होगी?

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार अगर लड़की को अपनी कोई ऐसी वीडियो का पता भी चलता है तो इंग्लैंड में ऐसे 70 प्रतिशत मामले दर्ज ही नहीं हो पाते क्योंकि लड़कियां पुलिस तक जाने से हिचकती हैं. उन्हें डर रहता है कि केस दर्ज करने से उन का नाम सामने आ जाएगा और वीडियो और ज्यादा फैल जाएगी.

भारत में भी लगभग यही हाल है. एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि 2023 में 18 हजार से ज्यादा साइबर उत्पीड़न और अश्लील कंटेंट शेयरिंग के केस दर्ज हुए, लेकिन यह आंकड़ा असल संख्या की तुलना में बहुत कम है. असली हकीकत यह है कि ज्यादातर लड़कियां डर और शर्म की वजह से चुप रह जाती हैं. यह तो वो मामले हैं जो जांच के दायरे में आ गए हैं. मगर हर दिन ऐसी सैकड़ों वीडियो रोज बन रही हैं कुछ इन्फ्लुएंसर्स के द्वारा जो कभी जांच के दायरे में आते ही नहीं क्योंकि उन के लिए तो यह कंटेंट क्रिएशन है.

दरअसल, अब केवल चोरीछिपे मोबाइल कैमरा ही खतरा नहीं है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और डीपफेक तकनीक ने हालात को और खतरनाक बना दिया है. किसी लड़की की इंस्टाग्राम से ली गई तस्वीर को एआई टूल्स के जरिए बदल कर अश्लील वीडियो बना देना सेकेंडो का खेल बन गया है. वह वीडियो व्हाट्सएप ग्रुप्स या टेलीग्राम चैनलों पर फैलतेफैलते हजारों हाथों में पहुंच जाती है. कई बार तो असल और नकल में फर्क करना तक मुश्किल हो जाता है.

इन्फ्लुएंसर्स कल्चर से बढ़ावा

यहां एक और गंभीर सवाल उठता है, इन्फ्लुएंसर कल्चर इस पूरे खेल को कितना बढ़ावा दे रहा है? आज भारत ही नहीं, पूरी दुनिया के युवा इन्फ्लुएंसर्स की गिरफ्त में फंसे हैं. अच्छाखराब जो भी कंटेट वो दिखाते हैं वही उन की दुनिया बनते जा रहे हैं.

लेकिन समस्या यह है कि कई इन्फ्लुएंसर फौलोअर्स की भूख में किसी भी हद तक चले जाते हैं. वे बिना सोचेसमझे पब्लिक जगहों पर वीडियो बनाते हैं, कभी राह चलती लड़कियों से छेड़छाड़ को मजाक की तरह दिखाते हैं और कभी ऐसी क्लिप शूट कर देते हैं जो सीधे किसी लड़की की प्राइवेसी का उल्लंघन करती है.

भारत में कानूनी स्थिति अभी बहुत कमजोर है. अपस्कर्टिंग को अभी तक कानून में अलग अपराध नहीं माना गया है. हालांकि आईपीसी सेक्शन 354सी यानी वोयुरिज्म और 509 यानी महिलाओं की अस्मिता का अपमान करने से जुड़े प्रावधान लागू हो सकते हैं, लेकिन इन की सीमाएं स्पष्ट हैं. डीपफेक जैसे आधुनिक अपराध इन धाराओं में फिट नहीं बैठते. जब तक कोई खास, अलग कानून नहीं बनेगा, तब तक पीड़ितों को न्याय मिलना बहुत मुश्किल है. इस के साथ ही पीड़िता को गुमनामी (anonymity) का भी अधिकार मिलना चाहिए, ताकि वह शिकायत दर्ज कराने में सहज महसूस करे. लेकिन भारत में ऐसे मामलों में अभी यह सुरक्षा बहुत सीमित है.

पुलिस और न्याय प्रणाली की धीमी रफ्तार अलग समस्या है. अकसर सुनवाई लंबी खिंच जाती है, सबूत इकट्ठा करना मुश्किल हो जाता है और पीड़िता की हिम्मत टूट जाती है. अफसोस की बात यह है कि एक पीड़िता के पास केवल दो ही रास्ते बचते हैं. या तो वह कोर्ट का चक्कर लगाए और अपनी प्राइवेसी के उजागर होने का खतरा उठाए, या फिर चुपचाप यह सब झेले और जिंदगी भर उसे याद रखे. ऐसे में ज्यादातर लड़कियां शिकायत करने के बजाय चुप रहना बेहतर समझती हैं.

इंस्टाग्राम, यूट्यूब और टेलीग्राम जैसे प्लेटफौर्म्स को तुरंत ऐसे कंटेंट हटाने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए. बेशक वे सिर्फ प्लेटफौर्म हैं और उन्हें इस के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, मगर उन्हें ऐसे कंटेंट देखना पड़ेगा कि बारबार किसी यूजर का अकाउंट आपत्तिजनक कंटेंट डाल रहा है, तो उस पर उपयुक्त कार्यवाही हो. दूसरा वीडियो डालने से ज्यादा जरूरी यह है कि वीडियो देखने वाला ही इस तरह के कंटेंट क्रिएटर को बायकोट करें, क्योंकि आज किसी के साथ हो रहा है तो कल को उन के साथ भी हो ही सकता है.

जेन जेड को यह समझना होगा कि किसी की प्राइवेसी कभी भी मजाक नहीं है. असली ‘कूलनेस’ यह है कि आप दूसरों की प्राइवेसी का ख्याल रखें, और यह दिखाएं कि आप डिजिटल सिटीज़नशिप निभा सकते हैं. अगर आप देखते हैं कि कोई दोस्त ऐसे वीडियो बना रहा है या अनजाने में किसी को शर्मिंदा कर रहा है, तो उसे रोकना भी जिम्मेदारी है. Online Harassment

Bollywood Updates: जौली एलएलबी3 – घिसेपिटे स्टाइल में और 2 जौली

Bollywood Updates: ‘जौली एलएलबी-3’ हिंदी भाषा की एक कानूनी कौमेडी ड्रामा फिल्म है जिसे पिछली दोनों फिल्मों के निर्देशक सुभाष कपूर ने लिखा और निर्देशित किया है. इस कड़ी की पहली फिल्म 2013 में रिलीज की गई और दूसरी 2017 में. पहली फिल्म में एडवोकेट जगदीश त्यागी जिन्हें लोग जौली भी कहते हैं, एक उच्च समाज के लड़के राहुल दीवान के खिलाफ पैरवी करते हैं जिस पर लैंड क्रूजर को नशे में चलाने और फुटपाथ पर सो रहे 6 मजदूरों की मौत का कारण बनने का आरोप है.

इस शृंखला की दूसरी फिल्म को 2017 में रिलीज किया गया. उस फिल्म में कहानी लखनऊ आधारित एक वकील की थी जो एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी और एक कथित मृत आतंकवादी के बीच हुई फर्जी मुठभेड़ के मृतक पीडि़त को न्याय दिलाने के लिए एक क्रूर और शक्तिशाली वकील के खिलाफ मुकदमा लड़ता है.

‘जौली एलएलबी’ की तीसरे सीक्वल में अक्षय कुमार, सौरभ शुक्ला और हुमा कुरैशी को दोहराया गया है. इस बार फिल्म में न्याय व्यवस्था की खामियों के बजाय अन्नदाना यानी किसान का मुद्दा उठाया गया है. मगर जो मुद्दा उठाया गया है वह न तो आज चौंकाता है, न उस ने फिलमाया सही गया है. कहानी पिछले पार्ट से आगे बढ़ती है. अब एडवोकेट जगदीश्वर मिश्रा उर्फ जौली (अक्षय कुमार) कानपुर से निकल कर और जौली (अरशद वारसी) भी मेरठ की गलियों से आगे बढ़ कर राजधानी की कोर्ट में हाथपैर मार रहे हैं. दोनों के बीच केस हथियाने को ले कर टकराव हो जाता है.

इस फिल्म की कहानी 2011 में उत्तर प्रदेश के भट्टा-परसौल में हुए भूमि अधिग्रहण के खिलाफ हुए विरोध से प्रेरित है. फिल्म की कहानी यूपी से हट कर राजस्थान के बीकानेर की है. फिल्म आगे बढ़ती है और मामला बड़ी अदालत में जस्टिस सुंदरलाल त्रिपाठी (सौरभ शुक्ला) की अदालत में पहुंचता है. यहां किसानों और इंडस्ट्रियलिस्ट की ऐसी टक्कर होती है जो सीधी किसानों की जिंदगी पर असर डालती है. इस कहानी में सब से बड़ा आकर्षण है 2-2 जौलियों का होना. 2-2 जौली एकदूसरे से खूब ?ागड़ते हैं, वह भी जज साहब के सामने. जैसे अदालत न हो, कुश्ती का अखाड़ा हो कोई.

2013 में आई पहली ‘जौली एलएलबी’ में अभिनेता अरशद वारसी ने वकील जोशी की भूमिका खूबसूरती से निभाई थी, दर्शकों ने भी उसे खूब पसंद किया. 2017 में अक्षय कुमार ने अरशद वारसी की जगह ले ली. निर्देशक ने इस फिल्म में दोनों कलाकारों को एकसाथ ला कर हंसी की डोज गायब कर दी है क्योंकि पूरी कहानी लचर है और अदालतों की जगह बिजनैसमैनों की बन गई है.

यह फिल्म प्रोपगेंडा और जबरन देशभक्ति के दौर में मूल मुद्दों को दिखाती है. किसान देश को अन्न देता है, पेट भरता है. मगर जब बात उस के हक की आती है तो सब अपनी आंखें मूंद लेते हैं. यहां विकास के नाम पर किसानों की जमीन तो ले ली जाती है मगर उसे अपनी जमीन देनी है या नहीं, उसे विकल्प नहीं दिया जाता. आम शहरी को इस से फर्क नहीं पड़ता क्योंकि वह बुलेट की रफ्तार से दौड़ते देश को देखना चाहता है मगर जब बात खुद के मकान, जमीन पर आती है तो सारे हक याद आ जाते हैं. फिल्म का क्लाइमैक्स भी इसी बिंदु पर आधारित है.

‘जौली एलएलबी 3’ में पहली 2 जौली फिल्मों के दृश्यों को जबरन दोहराया गया है मानो उन से हास्य पैदा हो जाएगा ही. अरशद वारसी और अक्षय कुमार ने कोशिश की है कि वे पिछली फिल्मों के सीनों और हावभावों को दोहराएं और यहीं फिल्म चूक कर गई है. इस तरह की शृंखला बनने वाली फिल्मों में जब कहानी मजबूत हो तो ही पात्रों का एक सा व्यवहार जम सकता है. अरशद वारसी और अक्षय कुमार ही नहीं, जज बने सौरभ शुक्ला ने भी लगभग वही संवाद दोहराए हैं जो उन्होंने पिछली फिल्मों में दोहराए थे. फिल्म कोर्टरूम ड्रामा कम है. कोर्ट के बाहर का ज्यादा रही है. तेजी से भागती है. फिल्म सवाल छोड़ती है कि देश के लिए विकास का मतलब क्या है? क्या वह विकास जिस पर टौप 20 प्रतिशत आबादी गर्व कर सके या वह जो समावेशी हो. आखिर विकास के मायने क्या हैं?

फिल्म में जस्टिस सुंदर लाल त्रिपाठी का एक सीन है, जिस पर कानून जगत में खूब चर्चा है. दरअसल, खेतान के खिलाफ केस लड़ते हुए सुंदर लाल दोनों जौलियों के पक्ष में खड़े हो जाते हैं. इस पर उन का असिस्टैंट उन से सवाल के अंदाज में कहता है, क्या जौलियों का साथ देना पार्शियलिटी नहीं है? जवाब में सुंदर लाल कहता है कि अब तक वह सिर्फ उसे फौलो कर रहे थे, जो संविधान में लिखा हुआ था मगर इस बार वह उस लिखे के पीछे की भावना को एक मौका देना चाहते हैं. न्याय की परिभाषा में ‘लेटर’ और ‘स्पिरिट’ में से ‘स्पिरिट’ को चुनना चाहते हैं. वह बताते हैं कि दोनों जौली अक्खड़ हैं, बदतमीज हैं, कम पढ़ेलिखे हैं मगर अपने काम को ले कर ईमानदार हैं और एक नेक काम के लिए लड़ रहे हैं.

अक्षय कुमार ने अपने जौली मिश्रा के किरदार को आत्मविश्वास से निभाया है. सौरभ शुक्ला जज त्रिपाठी के किरदार में दर्शकों का मनोरंजन करते हैं. राम कपूर इस बार वकील बने हैं. अच्छे सधे हुए लगते हैं. गजराव राव ने भ्रष्ट कारोबारी का किरदार निभाया है. अमृताराव और हुमा कुरैशी को नाममात्र के लिए रखा गया है. कहानी में उन का कोई योगदान नहीं है. निर्देशक ने अक्षय और अरशद की जुगलबंदी को बरकरार रखा है. संवाद बढि़या हैं, संगीत कमजोर कड़ी है. फिल्म मनोरंजन को परोसते हुए सामाजिक संदेश भी देती है. कई सीन नाटकीय बन पड़े हैं. फिल्म आप को हंसाती है तो सोचने पर मजबूर भी करती है. फिल्म ने नारा भी दिया है- ‘जय जवान जय किसान.’  Bollywood Updates

 

Film Review : हीर एक्सप्रैस (2 स्टार)

Film Review : ‘हीर एक्सप्रैस’ में हलकाफुलका फैमिली ड्रामा है, जो जिंदगी की बड़ी सीख दे कर जाता है. हीर की भूमिका में दिविजा जुनेजा ने डैब्यू किया है. मसालों से परहेज करने वाली इस फिल्म को सुकून के साथ परिवार के साथ बैठ कर देखा जा सकता है. इस में कोई ऐक्शन नहीं है, गालीगलौज नहीं है, ‘ओह माई गौड’ और ‘102 नौट आउट’ जैसी फिल्में बनाने वाले उमेश शुक्ला ने इस बार युवाओं पर भरोसा जताया है. आजकल जब ‘एनिमल’ और ‘किल’ जैसी मारामारी वाली खूनखराबे से भरी फिल्में बन रही हैं तब इस फिल्म में आप को पंजाब का एक खूबसूरत गांव देखने को मिलेगा.

फिल्म की कहानी हीर वालिया (दिविता जुनेजा) की है. उस की मां नहीं है, उसे उस के चाचाओं (गुलशन ग्रोवर और संजय मिश्रा) ने पाला है. लंदन में एक रैस्तरां में एक विदेशी महिला ओलिविया (सारा लाकेट) हीर के हाथ का खाना खा कर खुश हो जाती है. वह हीर को अपने रैस्टोरैंट की कमान संभालने को कहती है. हीर राजी हो जाती है. लंदन पहुंच कर हीर ओलविया के पति टी जे (आशुतोष राणा) से मिलती है और रैस्तरां का काम शुरू करती है.

टी जे के दूसरे बिजनैस उस के नाबालिक बेटे की वजह से नाकाम होने लगते हैं. अब हीर के सामने अपनी मां के नाम पर चल रहे रैस्तरां को बचाने के लिए एक महीने का समय है. मामला तब बिगड़ता है जब टी जे का बेटा गुंडों से रैस्तरां में तोड़फोड़ कराता है.

फिल्म एक पारिवारिक ड्रामा है. क्लाइमैक्स में सारी चीजें बेतुकी हो जाती हैं और एक अलग ही लैवल पर पहुंचती हैं. घुड़सवारी का कंपीटिशन है. कौमेंट्री बौक्स में बैठे रौनी को अचानक लगता है कि ओलिविया का खत पढ़ने का यही सही समय है, जबकि दर्शकों को लगता है कि जल्दी से यह रेस खत्म हो जाए तो बाहर जाया जा सके.

पटकथा में चालाकी की गई है. कई सीन जबरन डाले गए हैं. फिल्म की कहानी प्रिडिक्टिबल है. दर्शकों के अनुमान के अनुसार हीर अपने मकसद में कामयाब होती है और रैस्तरां को बचा लेती है.

यह फिल्म पंजाब से लंदन तक के सफर को दिखाती है. लेकिन इस में जोश का अभाव है, रोमांच भी नहीं है. पंजाब की हरियाली, एक बिछुड़ा परिवार भी इसे देखने पर मजबूर नहीं करता. कहानी एक दशक पुरानी लगती है, घिसीपिटी बातें भरी पड़ी हैं जबकि दर्शकों की रुचि अब बदल चुकी है. उन्हें इमोशनल फिल्म ही भाती है.

डैब्यू कर रही दिविता जुनेजा ने नायिका की भूमिका में छाप छोड़ी है. रौनी की भूमिका में प्रीत कमानी ने आत्मविश्वास के साथ काम किया है. आशुतोष राणा का काम बढ़िया है. गुलशन ग्रेावर और संजय मिश्रा निराश करते हैं. गीतसंगीत साधारण हैं. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. Film Review

 

Film Review : बागी 4 (डेढ़ स्टार)

Film Review :  नाडियाडवाला की ‘हीरोपंती’ टाइगर श्रौफ की पहली फिल्म थी. इस के बाद 2016 में उसे ‘बागी’ का औफर मिला. इस फिल्म में उस की कोस्टार श्रद्धा कपूर थी. इस फिल्म ने एक अरब रुपए की कमाई की थी. 2018 में आई ‘बागी-2’ इस श्रृंखला की सब से सफल फिल्म मानी जाती है. टाइगर श्रौफ और उस के ऐक्शन दृश्यों को युवा खूब पसंद करते हैं. टाइगर को ऐक्शन हीरो स्थापित करने में ‘बागी’ सीरीज की चारों फिल्मों का बड़ा हाथ है.

जिन दर्शकों ने खूनखराबे वाली ‘एनिमल’ फिल्म देखी होगी उन्हें इस फिल्म में ऐक्शन और मारधाड़ वाले सीन ‘एनिमल’ से कौपी किए लगेंगे. निर्माता साजिद नाडियाडवाला ने निर्देशन की जिम्मेदारी कन्नड़ फिल्मों के निर्देशक ए हर्षा को दी है, जो फिल्म को लाउड बनाने में यकीन करते हैं. ‘बागी-4’ भी बेहद लाउड है. टाइगर श्रौफ और संजय दत्त जब एकदूसरे से लड़ते हैं तो चिल्ला कर एकदूसरे की ओर दौड़ते हैं. दक्षिण भारतीय ऐक्शन फिल्मों का यही स्टाइल है. हमारे फिल्मकार मारधाड़ और खूनखराबे वाली ‘एनिमल’ और ‘किल’ जैसी फिल्में कब बनाना बंद करेंगे. इन फिल्मों से समाज में गहरा नकारात्मक असर पड़ता है.

लोगों को एकदूसरे को मारने की पड़ी रहती है. गुस्सा उन की नाक पर रहता है. ढूंढ़ने से बौलीवुड में सैकड़ों ऐसी कहानियां मिल जाएंगी जो न सिर्फ प्रेरणादायक हैं, युवाओं को सही राह पर ले जाने को भी तैयार हैं. कहानी रौनी (टाइगर श्रौफ) की है. वह नेवी का धाकड़ अफसर है, मगर एक ऐक्सिडैंट के बाद कोमा में चला जाता है. 7 महीने बाद वह कोमा से बाहर आता है तो अपने प्यार अलीशा (हरनाज संधू) को उस हादसे में खोने के गम से उबर नहीं पाता. डाक्टर से ले कर अलीशा के भाई (श्रेयस तलपड़े) उसे यकीन दिलाते हैं कि अलीशा नाम की कोई लड़की कभी थी ही नहीं. यह उस का सिर्फ वहम है.

रौनी की जिंदगी में एक डांसर ओलिविका उर्फ ओलिविया (सोनम बाजवा) की एंट्री होती है. मगर रौनी अलीशा को भूल नहीं पाता. आखिर अलीशा हकीकत है या वहम. सब लोग रौनी को झूठा साबित करने पर तुल जाते हैं. इस के बारे में क्लाइमैक्स में परदा उठता है. यह पूरी फिल्म सिरदर्द है, नायक शुरू से आखिर तक वहम में घिरा रहता है. पटकथा एकदम खराब है. फर्स्ट हाफ में रौनी यानी टाइगर श्रौफ और सैकंड हाफ में चाको यानी संजय दत्त की लवस्टोरी का फ्लैशबैक ही चलता रहता है. इस बार ऐक्शन का डोज कम है. मास्क लगाए गुंडों के झुंड को कुल्हाड़ी और गंड़ासे से काटने वाला सीन फिल्म ‘एनिमल’ से लिया गया है.

हरनाज पर फिल्माया ‘ये मेरा हुस्न…’ गाना दीपिका पादुकोण के ‘बेशरम रंग…’ की नकल लगता है. ऐक्टिंग के लिहाज से कलाकार कमजोर है. टाइगर श्रौफ की हीरोपंथी जाती नहीं, ऐक्टिंग क्या करेगा. हरनाज संधू इस फिल्म में अच्छी लगती है. संजय दत्त खूंखार लगा है. क्लाइमैक्स लंबा है. निर्देशक ने फिल्म को बड़े पैमाने पर शूट किया है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. विजुअल्स अच्छे हैं. लेकिन ऐसी फिल्में देखने के बजाय अपने दिमाग पर जोर न दें तो अच्छा है. Film Review

Ladakh Protest: हिमालय की गूंज – लद्दाख आंदोलन से सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी तक

Ladakh Protest: लद्दाख के लोग लम्बे समय से राज्य के दर्जे की मांग कर रहे हैं. जिसे शांतिपूर्वक तरीके से मशहूर भारतीय वैज्ञानिक व शिक्षक सोनम वांगचुक नेतृत्व कर रहे थे. मगर हाल में लद्दाख में हुए हिंसक विरोध के बाद सोनम वांगचुक को कथित देश विरोधी गतिविधियों के आधार पर गिरफ्तार कर लिया गया. इस से हालात बिगड़ सकते हैं.

24 सितंबर को लेह लद्दाख में भड़की हिंसा के बाद शिक्षा के क्षेत्र में योगदान के लिए रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित, एक इंजीनियर, इनोवेटर, शिक्षाविद और जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणामों से दुनिया को सचेत करने वाले एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक को गिरफ्तार कर लिया गया. वही सोनम वांगचुक, जिन का सपना था लद्दाख को सुरक्षित और आत्मनिर्भर बनाना, जिन की शिक्षा की सोच ने हजारों स्टूडैंट्स का भविष्य बदला और जिन के ‘आइस स्तूप’ जैसे अनोखे प्रयोगों ने पूरी दुनिया में भारत का नाम ऊंचा किया.

वही सोनम वांगचुक जिन के ज्ञान और जिन की जुझारू जिंदगी से प्रेरित हो कर बौलीवुड ने ‘थ्री ईडियट्स’ जैसी सफलतम फिल्म बनाई थी. लेकिन प्रशासन ने लद्दाख के अस्तित्व के लिए शांतिपूर्ण आंदोलन का नेतृत्व करने वाले सोनम वांगचुक को जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया. लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और छठे शेड्यूल में शामिल करने की मांग वाले आंदोलन को ले कर सरकार ने सीधेसीधे वांगचुक को हिंसा भड़काने का दोषी ठहरा दिया, जबकि वांगचुक आमरण अनशन पर थे.

पिछले कुछ दिनों से लद्दाख में केंद्र सरकार के खिलाफ भारी विरोध-प्रदर्शन हो रहा है. पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने को ले कर मोदी सरकार द्वारा बातचीत के लिए तारीख पर तारीख देने के कारण लोगों के सब्र का बांध अब टूट रहा है. इसी के चलते लोग सड़कों पर उतर आए, जिस में बड़ी संख्या युवाओं की थी. इसी बीच हिंसा भड़की और 4 लोगों की मौत हो गई. वांगचुक जो पिछले 15 दिनों से अनशन पर थे उन्होंने तुरंत अपना अनशन तोड़ा और लोगों से शांति की गुहार लगाई.

24 तारीख की दोपहर 2:30 बजे वे प्रेस कान्फ्रेंस करने वाले थे, लेकिन उस से पहले ही पुलिस ने उन्हें रासुका (राष्ट्रीय सुरक्षा कानून) के तहत गिरफ्तार कर लिया और लद्दाख से दूर राजस्थान की जयपुर जेल ले गई. लेह एपेक्स बौडी द्वारा बुलाए गए पूर्ण बंद के बीच यह हिंसा उस समय हुई जब आंदोलन अपने 15वें दिन में था और उसे 10 दिन और चलना था. सवाल यह है कि क्या सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी सचमुच कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए है, या फिर यह आवाज दबाने की कोशिश है?

24 सितंबर को भड़की हिंसा के बाद राष्ट्रीय स्तर पर लद्दाख की स्थिति को ले कर नए सिरे से बहस छिड़ गई है. विपक्ष का कहना है कि लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और चीन द्वारा लगातार कब्जाई जा रही जमीनों को ले कर लम्बे समय से आंदोलनरत सोनम वांगचुक को गिरफ्तार कर मोदी सरकार ने एक बार फिर अपने झूठ और निकम्मेपन को ढांपने की कोशिश की है.

बीते साल मार्च में वांगचुक ने लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा देने और इसे छठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए 21 दिनों तक भूख हड़ताल की थी. वहीं अक्तूबर 2024 में ही इसी मांग को ले कर उन्होंने लद्दाख से दिल्ली तक पैदल मार्च निकाला था. हालांकि दिल्ली पुलिस ने सिंघु बौर्डर पर उन्हें हिरासत में ले लिया था. अब की बार 35 दिन की उन की भूख हड़ताल के 15वें दिन ही लेह में आंदोलन हिंसक हो गया.

हाल के इतिहास में लद्दाख में पहली बार इतने बड़े पैमाने पर हिंसक झड़पें हुईं, जिन में 4 लोगों की मौत और 70 से अधिक लोग घायल हो गए. हिंसा के दौरान वहां उग्र युवाओं ने कई सरकारी इमारतों को आग के हवाले कर दिया, जिस में भाजपा कार्यालय भी शामिल है. आखिर क्या वजह रही कि ज़मीन, नौकरियों और स्वायत्तता की मांग को ले कर चल रहा शांतिपूर्ण आंदोलन अचानक उग्र हो उठा? और क्या वांगचुक को गिरफ्तार कर के सरकार लेह में उठ रही असंतोष की आग को ठंडा कर लेगी और जारी आंदोलनों को रोक लेगी? स्थानीय निवासियों की मानें तो जो आवाजें लेह लद्दाख की बर्फीली वादियों में बुलंद हो रही हैं, उन्हें रोक पाना अब संभव नहीं होगा.

लद्दाख लम्बे समय से अपने अस्तित्व के लड़ रहा है. भाजपा ने 2020 के लेह पर्वतीय परिषद के चुनावों में इस क्षेत्र को छठी अनुसूची के तहत शामिल करने का वादा किया था, मगर अब वह अपने वादे से मुकर गई है. केंद्र इस बात का दावा करता है कि उस ने लद्दाख को वृहद जम्मू-कश्मीर से स्वायत्तता दी है, लेकिन वास्तव में उस ने इस केंद्र शासित प्रदेश में लोकतंत्र के सभी पहलुओं को समाप्त कर दिया है.

गौरतलब है कि साल 2019 में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 को खत्म कर के जम्मू-कश्मीर राज्य को दो अलगअलग केंद्र शासित प्रदेशों जम्मूकश्मीर और लद्दाख में बांट दिया था. लद्दाख की अधिकतर जनता ने इस फैसले का स्वागत किया था क्योंकि जम्मूकश्मीर से अलग होने की उन की काफी पुरानी मांग थी. इस फैसले का स्वागत सोनम वांगचुक ने भी किया था. उन्होंने सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उन के कार्यालय को इस फैसले के लिए धन्यवाद किया था. उन्होंने लिखा था, “शुक्रिया प्रधानमंत्री. लद्दाख के लिए लंबे समय से देखे जा रहे ख़्वाब को पूरा करने के लिए लद्दाख प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और प्रधानमंत्री कार्यालय का शुक्रिया करता है. पूरे 30 साल पहले अगस्त 1989 में केंद्र शासित प्रदेश के दर्जे को लेकर लद्दाखी नेताओं ने आंदोलन की शुरुआत की थी. इस लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में मदद करने वाले सभी लोगों का शुक्रिया.”

अब जबकि सोनम वांगचुक को गिरफ्तार कर लद्दाख से दूर जयपुर सेंट्रल जेल में कैद कर दिया गया है, लेह अपेक्स बौडी (एलएबी) ने मोदी सरकार की आलोचना करते हुए कहा कि इस से लद्दाख में स्थिति और खराब होगी. सरकार लोगों को डरा रही है जिस से अविश्वास पैदा हो रहा है. वांगचुक की गिरफ्तारी केंद्र सरकार की घबराहट दिखाती है पर इस से उन का आंदोलन नहीं रुकेगा. प्रशासन का उन को गिरफ्तार करने का फैसला दुर्भाग्यपूर्ण और गलत फैसला है. हिंसा में उन का कोई हाथ नहीं था और न है. उस दिन जो हुआ, वह अचानक हुआ क्योंकि लद्दाख का नौजवान बहुत गुस्से में है. बिना किसी आधार के वांगचुक की गिरफ्तारी से लद्दाख के लोगों को भावनात्मक रूप से चोट पहुंची है, और अब यह मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाने वाला है.

अपेक्स बौडी के कानूनी सलाहकार हाजी गुलाम मुस्तफा का कहना है कि लद्दाख में शिक्षा, समाज और पर्यावरण के क्षेत्र में वांगचुक के योगदान के लिए पूरी दुनिया उन का सम्मान करती है, उन की गिरफ्तारी से आप इस देश के लोगों को और दुनिया को क्या संदेश देना चाहते हैं कि आप किसी को भी गिरफ्तार कर जेल में डाल देंगे.

उन्होंने कहा कि सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी के जरिए केंद्र सरकार लद्दाख आंदोलन को नुकसान पहुंचाने के साथसाथ, एलएबी (लेह अपेक्स बौडी) व केडीए (करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस) के साथ जारी बातचीत की प्रक्रिया को भी पटरी से उतारना चाहती ही. केंद्र चाहता है कि बातचीत में रुकावट के लिए उस पर कोई आरोप न लगे. सारा दोष वांगचुक के सिर मढ़ कर वह बातचीत की तारीख और आगे खिसका दें.

एलएबी के एक घटक अंजुमन-ए-मोइनुल इसलाम के उपाध्यक्ष मोहम्मद रमजान कहते हैं कि सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी एक सुनियोजित षड्यंत्र का हिस्सा है. पहले उन्हें बदनाम किया गया, फिर उन पर विदेश से चंदा लेने का आरोप लगाया गया और फिर हिंसा के लिए युवाओं को उकसाने का इल्जाम लगा कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. वह हमारे हीरो हैं, एक ऐसा नेता जो गांधीवादी जीवन शैली का पालन करता है और भारत के संविधान में दृढ़ विश्वास रखता है. वह भूख हड़ताल से शांतिपूर्वक आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे. उन्होंने लेह से दिल्ली तक पैदल मार्च भी किया था. केंद्र सरकार लद्दाख में हमारे नेतृत्व को दबाने के लिए दूसरी जगहों पर अपनाई गई नीतियों का प्रयोग यहां कर रही है. इस कदम से क्षेत्र में हालात सामान्य होने की बजाय और बिगड़ेंगे.

लेह लद्दाख का इतिहास

लेह-लद्दाख का इतिहास बहुत ही रोचक और विविधताओं से भरा हुआ है. यह इलाका हिमालय और काराकोरम की ऊंची पर्वत श्रृंखलाओं के बीच बसा है और प्राचीन काल से ही भारत, तिब्बत, मध्य एशिया और चीन के बीच व्यापार, संस्कृति और धर्म का संगम रहा है. लद्दाख क्षेत्र को प्राचीन काल में ‘मेरी-युल’ (अंधेरे की भूमि) के नाम से जाना जाता था. यहां प्राचीन काल से ही बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव रहा. तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व से बौद्ध भिक्षु यहां आतेजाते रहे.

लद्दाख को “लिटिल तिब्बत” भी कहा जाता है क्योंकि यहां की संस्कृति तिब्बत से काफी मिलतीजुलती है. लेह-लद्दाख व्यापार, धर्म और रणनीति का केंद्र रहा है. यह भारत-तिब्बत-केन्द्रीय एशिया की संस्कृतियों का संगम स्थल है और सामरिक दृष्टि से भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण क्षेत्र है. सिल्क रूट का हिस्सा होने के कारण यह इलाका भारत, तिब्बत और मध्य एशिया के व्यापार का बड़ा केंद्र था. ऊन, नमक, पशु और रेशम का व्यापार यहीं से होकर गुजरता था.

7वीं शताब्दी में तिब्बत के राजा सोन्ग्सेन गम्पो ने इस इलाके में बौद्ध धर्म को बढ़ावा दिया. तिब्बती संस्कृति, भाषा और धर्म का यहां के लोगों पर गहरा प्रभाव पड़ा, जो आज भी लद्दाख की जीवनशैली में दिखता है. लगभग 10वीं शताब्दी में ल्हा-चेन पालगिगोन ने लद्दाख को स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित किया. इस के बाद कई सदियों तक लद्दाख पर स्थानीय राजाओं का शासन रहा. लेह पैलेस और कई मठ, जैसे थिकसे, हेमिस, अलची आदि इन्हीं शासकों ने बनवाए. 17वीं शताब्दी में लद्दाख के राजा सेनगे नामग्याल जिन को “लायन किंग” कहा जाता है, ने लेह पैलेस और हेमिस मठ का निर्माण कराया.

1834 में जम्मू के डोगरा सेनापति जनरल जुरावर सिंह ने लद्दाख को जीत कर जम्मूकश्मीर की रियासत में मिला दिया. इस के बाद लद्दाख जम्मूकश्मीर का हिस्सा बन गया. ब्रिटिश शासन के दौरान लद्दाख सिल्क रूट और मध्य एशिया की ओर जाने वाला सामरिक दरवाजा बना. 1947 में भारत की आजादी के बाद यह जम्मूकश्मीर राज्य के अधीन रहा.

1947 में पाकिस्तान ने जब कबायलियों के जरिए लद्दाख पर हमला किया तब भारतीय सेना ने लद्दाख को बचाया. 1962 के भारतचीन युद्ध में लद्दाख अहम युद्धक्षेत्र रहा. काराकोरम और गलवान घाटी जैसे इलाके आज भी सामरिक दृष्टि से बेहद संवेदनशील हैं. 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद, लद्दाख को जम्मूकश्मीर से अलग कर केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया.

‘भारत के नेपोलियन’ डोगरा योद्धा जोरावर सिंह

लद्दाख के जम्मू कश्मीर में विलय की कहानी भी दिलचस्प है. उसे जानने के लिए लद्दाख, तिब्बत, बाल्टिस्तान जैसे क्षेत्रों को जीतने वाले महान सेनापति जोरावर सिंह कहलुरिया को जानना बेहद जरूरी है. डोगरा योद्धा जोरावर सिंह कहलुरिया को ‘भारत का नपोलियन’ भी कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने देश की सीमाओं का चीन के बौर्डर तक विस्तार किया. जोरावर सिंह सिर्फ एक योद्धा ही नहीं थे, बल्कि वह पंजाब की आजादी और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए समर्पित महान देशभक्त भी थे. उन का योगदान पंजाब के इतिहास में अमूल्य है. आज भी उन्हें पंजाब के इतिहास में गर्व के साथ याद किया जाता है.

उत्तर भारत के साम्राज्य को विस्तार देने में जोरावर सिंह का बड़ा योगदान है. उन का जन्म 1784 में हिमाचल के कांगड़ा जिले के एक गांव में हुआ था. उन का गांव कहलुर नाम की एक रियासत का हिस्सा था और इसी वजह से उन का नाम जोरावर सिंह कहलुरिया पड़ा. परिवार में जमीन विवाद की वजह से उन्होंने अपना गांव छोड़ दिया और रोजगार की तलाश में हरिद्वार चले गए. हरिद्वार में उन की मुलाकात राणा जसवंत सिंह से हुई, जो जम्मू कश्मीर में एक जमींदार थे. राणा जसवंत सिंह के साथ ही उन्होंने जम्मूकश्मीर में युद्ध के कौशल सीखे और जल्द ही इस प्रशिक्षण को आजमाने का वक्त भी आ गया.

साल 1800 में महाराजा रणजीत सिंह ने सिखों के एक साम्राज्य की स्थापना कर ली थी. उन्हें अब योद्धाओं की जरूरत थी. जोरावर सिंह ने पहले रणजीत सिंह की सेना में नौकरी की और बाद में वह कांगड़ा के राजा संसार चंद के साथ चले गए. साल 1817 में जोरावर सिंह की जिंदगी में एक बड़ा बदलाव आया, जब उन्हें जम्मू के डोगरा सरदार मिया किशोर सिंह जमवाल की सेवा में जाने का मौका मिला. महाराजा रणजीत सिंह ने साल 1808 जम्मू पर जीत हासिल कर उसे अपनी रियासत बना लिया था और वहां की सत्ता किशोर सिंह को सौंप दी थी.

किशोर सिंह के बेटे गुलाब सिंह की नजर जोरावर सिंह पर पड़ी और उन्होंने जोरावर को भीमगढ़ नाम के किले का नेतृत्व सौंप दिया. साल 1819 में जोरावर सिंह के कंधे पर एक और बड़ी जिम्मेदारी आई. महाराजा रणजीत सिंह ने कश्मीर का एक बड़ा इलाका गुलाब सिंह के सुपुर्द कर दिया और गुलाब सिंह राजा बन गए. उन्होंने अपने सब से खास जोरावर सिंह को किश्तवाड़ सहित कई जागीरों का गवर्नर बना दिया. वह डोगरा रियासत में राजा के बाद सब से ताकतवर शख्स बन गए. कमान संभालते ही जोरावर सिंह ने अपनी सीमाओं का विस्तार करने की योजना बनाई.

जोरावर सिंह को अपनी पहली बड़ी जीत लद्दाख में मिली. उस से पहले तक लद्दाख में बौद्धों का शासन था और वह तिब्बत को टैक्स चुकाया करते थे. लद्दाख तब काफी अहम होता था, क्योंकि तिब्बत से अफगानिस्तान तक जाने वाला ट्रेड रूट लद्दाख से होकर जाता था. यहां मिलने वाली ऊनी शौल की दुनिया भर में काफी मांग थी. कश्मीर के राजा गुलाब सिंह लंबे वक्त से लद्दाख को डोगरा शासन के अधीन लाना चाहते थे. यह मौका उन्हें 1834 में मिला.

उस साल लद्दाख के स्थानीय गवर्नर ने स्थानीय शासक से बगावत कर दी और उस ने गुलाब सिंह से मदद मांगी. गुलाब सिंह के लिए यह लद्दाख में पैर जमाने का बड़ा मौका था. इसलिए उन्होंने जोरावर सिंह की अगुवाई में लद्दाख के लिए डोगरा फौज को रवाना कर दिया. 5000 फौजी ले कर जोरावर सिंह करगिल तक पहुंचे. यहां हुई एक लंबी लड़ाई के बाद डोगरा फौज ने जीत हासिल की. युद्ध के बाद हुई एक संधि के तहत लद्दाख के शासक ने राजा गुलाब सिंह की अधीनता को स्वीकार कर लिया और इस तरह लद्दाख डोगरा शासन और सिख साम्राज्य के अधीन आ गया.

हालांकि जोरावर जब लद्दाख में जीत का झंडा लहरा रहे थे, ठीक इस समय कश्मीर में उन के खिलाफ एक साजिश की शुरुआत हो रही थी. कश्मीर के गवर्नर मियां सिंह की गुलाब सिंह के साथ रंजिश थी. जोरावर की जीत से हताश हो कर उन्होंने लद्दाख में डोगरा शासन के खिलाफ विद्रोह भड़काना शुरू कर दिया. इस का नतीजा था कि अगले 5 साल में कारगिल से ले कर लेह तक गुलाब सिंह के खिलाफ बगावत शुरू हो गई. किलों पर कब्जा कर डोगरा फौजियों को मार डाला गया. इस बात से गुस्सा हो कर जोरावर सिंह ने 3000 सैनिकों को इकट्ठा किया और लद्दाख पर एक बार फिर हमला कर दिया.

इस बार उन्होंने लद्दाख को जागीर नहीं रहने दिया, उस का पूरी तरह जम्मू कश्मीर में विलय कर दिया. लद्दाख जीतने के कारण जोरावर सिंह का पूरे सिख साम्राज्य में नाम हो चुका था. हालांकि वह यहीं पर नहीं रुके. साल 1840 में उन्होंने काराकोरम के पार बाल्टिस्तान का रुख किया. यहां भी शाही परिवार में हुई बगावत ने जोरावर सिंह को मौका दिया. आखिर में बाल्टिस्तान भी डोगरा राजाओं के शासन के अधीन आ गया. इस के बाद उन्होंने तिब्बत के कई इलाकों पर अपना साम्राज्य स्थापित किया.

12 दिसंबर 1841 को जोरावर सिंह तिब्बतियों के खिलाफ अपनी आखिरी लड़ाई लड़ रहे थे, तभी उन के कंधे में एक गोली लगी. बावजूद इस के योद्धा ने लड़ना जारी रखा. फिर एक तिब्बती कमांडर ने जोरावर सिंह पर भाले से वार किया और उन्हें वीरगति हासिल हुई. जोरावर सिंह की बहादुरी देख दुश्मन ने भी सम्मान के साथ उन का अंतिम संस्कार किया. तिब्बतियों ने तकलाकोट पर उन की समाधि बनाई और उन के नाम पर एक स्मारक भी बनवाया. आज जब लद्दाख हिंसा की आग में सुलग रहा है तो हमें जोरावर सिंह जैसे महान योद्धा के बलिदान को नहीं भूलना चाहिए. डोगरा सेनापति के पराक्रम और युद्ध कौशल की वजह से ही लद्दाख भारत का हिस्सा बना था. Ladakh Protest

Social Issue: धार्मिक कन्फ्यूजन में है जेनजी

Social Issue: पहली वह पीढ़ी है जिसे कई वजहों के चलते धार्मिक माहौल पिछली पीढ़ियों के मुकाबले कम मिला है और उसी अनुपात में साइंस और टैक्नोलौजी का माहौल ज्यादा मिला है लेकिन जहर जहर होता है, उस की मात्रा कम हो या ज्यादा, असर तो करती ही है. यही इस जेनरेशन के साथ हो रहा है कि वह गले में रखे इस यानी धार्मिक जहर को न निगल पा रही है न उगल.

जेनजी पीढ़ी को इस बाबत कोसना बहुत आसान और आम है कि वह धरमकरम को नहीं मानती, पौराणिक मान्यताओं को सहज मान्यता नहीं देती, तीजत्योहार, व्रतझांकियों वगैरह से दूरी बना कर चलती है. यह हालांकि अच्छी बात है कि वह नास्तिक या अनास्थावादी नहीं है लेकिन ईश्वर के अस्तित्व को ले कर फुजूल सवाल खड़े करती है जबकि वह है, इस में किसी को शक नहीं होना चाहिए. भगवान जाने क्या होगा इस जेनरेशन का. आजकल ये और इस तरह के आरोप जेनजी पर लगाने वाले लोगों की कमी नहीं. दरअसल, यह पीढ़ी धर्म और उस से जुड़े अंधविश्वासों व रीतिरिवाजों को मानने या स्वीकारने से पहले उन्हें तर्क के तराजू पर तोलती है जो इस दौर का सब से ‘गंभीर अपराध’ है.

जेनजी पहली वह पीढ़ी है जिसे कई वजहों के चलते धार्मिक माहौल पिछली पीढ़ियों के मुकाबले कम मिला है और उसी अनुपात में साइंस और टैक्नोलौजी का माहौल ज्यादा मिला है लेकिन जहर जहर होता है, उस की मात्रा कम हो या ज्यादा हो, असर तो करती ही है. यही इस जेनरेशन के साथ हो रहा है कि वह गले में रखे इस यानी धार्मिक जहर को न निगल पा रही है और न ही उगल पा रही.

धर्म कुछ तो है, लेकिन है क्यों और उस का न होना जिंदगी पर क्या कोई असर डालता, यह सब से बड़ा कन्फ्यूजन जेनजी का है. दूसरा बड़ा कन्फ्यूजन यह है कि भगवान कहीं हो न हो, ऐसा हो या वैसा हो, उस के कोई खास माने नहीं लेकिन उस के नाम पर मचाया जाते रहने वाला हल्ला क्या साबित करता है और यह हल्ला मचाते रहने वाले मुट्ठीभर लोग किस चालाकी से दुनिया को हांक रहे हैं. ये धर्म के ठेकेदार कैसेकैसे हमारे सार्वजनिक और व्यक्तिगत जीवन तक में दखल दे कर जो खलल पैदा करते हैं, इस पर दुनिया खामोश क्यों रहती है.

धर्म बनाम आध्यात्म का कुचक्र

जेनजी कितनी धार्मिक है और कितनी धार्मिक नहीं है, इस पर दुनियाभर में आएदिन सर्वे होते रहते हैं जो यह बताते हैं कि यह जेनरेशन धर्म से परहेज तो कर रही है लेकिन उस के आध्यात्म नाम के कुचक्र से मुक्त नहीं हो पा रही है. इस जेनरेशन का प्रिय नारा है- वी आर स्प्रीचुअल बट नौट रिलीजियस.

इसी साल यूगाव-मिंट सर्वे की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में 53 फीसदी ही जेनजी युवा मानते हैं कि धर्म महत्त्वपूर्ण है लेकिन निर्णायक नहीं. इस में बतौर निष्कर्ष कहा गया है कि जेनजी मैंटल हैल्थ और जिंदगी की चुनौतियों से निबटने के लिए बजाय धर्म के आध्यात्मिकता को इस्तेमाल कर रही है. लेकिन साथ ही, वह पारंपरिक रीतिरिवाजों से दूरी बना रही है. मसलन, मंदिर जाने और पूजापाठ करने को यह जेनरेशन जिम्मेदारी या मजबूरी नहीं मानती बल्कि अकसर उस शांति के लिए जाती है जिस के सिर्फ धर्म से ही मिलने का बखान धर्मगुरु और पिछली पीढ़ी करती रहती है. यानी, यह कोई श्रद्धा नहीं बल्कि ‘एक बार ट्राई कर के देखने में क्या हर्ज है’ वाली मानसिकता या भ्रम है.

इस बारे में जब भोपाल के कुछ युवाओं से बात की गई तो उन्होंने इस से आंशिक सहमति जताई. 19 वर्षीय अदिति कहती है, ‘मंदिरों में शांति कम अशांति और लूटपाट ज्यादा है. मैं कुछ दिनों पहले ही मम्मीपापा के साथ उज्जैन के महाकाल मंदिर यह सोच कर चली गई थी कि वहां शायद थोड़ा सुकून मिलेगा लेकिन हुआ उलटा. वहां के भीड़भड़क्के और धक्कामुक्की से मन कसैला हो गया और इस से बचने के लिए मैं बिना पेरैंट्स को बताए बाहर आ कर छोटे से होटल पर चाय पीने बैठ गई. तब मुझे महसूस हुआ कि मंदिर से ज्यादा शांति तो इस होटल में है.

‘हां, लेकिन शाम को क्षिप्रा नदी किनारे हम लोग गए तो अच्छा लगा.’ अदिति आगे बताती है, ‘कलकल कर बहता पानी मन मोह रहा था जबकि भीड़ और बेवजह के धार्मिक नारे व शोर नहीं थे. वहां कहीं दानपेटियां भी नहीं थीं और गद्दी लगा कर बैठे पंडे भी नहीं थे जो जबरन माथे पर तिलकत्रिशूल लगा कर पैसे वसूलते हैं. तब, मुझे लगा कि शांति की तलाश में बजाय मंदिरों के समुद्र किनारे, पहाड़ों पर या जंगलों में जाना चाहिए.

20 वर्षीय युवराज की मानें तो मैं ने कई छोटे मंदिरों सहित कुछ बड़े मंदिर भी देखे हैं मसलन शिर्डी और तिरुपति के वहां हम जैसे युवाओं के लिए कुछ खास नहीं है. वहां जा कर हमें यह सबक नहीं मिलता कि आगे की जिंदगी की कैरियर की लड़ाई हमें कैसे लड़ना है. इन दोनों मंदिरों में ऐसा कोई कौर्नर तक मुझे नहीं मिला जहां मैं शांति से बैठ कर इन मसलों पर कुछ सोच सकूं और न ही वहां कोई यह सब बताने वाला होता है. चूंकि पापा की जिद थी, इसलिए जाना पड़ा. मेरी समझ में यह भी नहीं आया कि कालोनी के छोटे और इन बड़े मंदिरों में फर्क क्या. भगवान अगर है तो उसे दोनों जगह बराबरी से होना चाहिए और जहां नहीं है वहां जाने से फायदा क्या.

पेरैंट्स बनाते हैं प्रैशर

जाहिर है पेरैंट्स का दबाव जेनजी को धर्मस्थलों पर ले जा रहा है जिस का घोषितअघोषित मकसद उन का कैरियर या भविष्य बनाना या किसी मनोवैज्ञानिक या मैंटर से काउंसलिंग करवाना नहीं बल्कि उस के खलबलाते दिमाग में धर्म की अफीम इंजैक्ट करना है जिस से वह अनास्थावादी न हो जाए बल्कि उन की ही तरह रूढ़ि और भाग्यवादी ही रहे. सीधे तौर पर कहा जाए तो पेरैंट्स, जो धर्मगुरुओं और धर्मस्थलों पर जिंदगीभर लुटतेपिटते रहे हैं, की मंशा, जो मूलतया डर है, धार्मिक दुकानदारों, पंडोंपुरोहितों के लिए एक नया ग्राहक तैयार कर देना होती है क्योंकि आर्थिक रूप से वे उन भक्तों पर ही तो निर्भर होते हैं.

बचपन से ही अभिभावक बच्चों को धर्म के अंधे कुएं में धकेल देते हैं जबकि होना यह चाहिए कि वयस्क होने पर ही धर्म को चुनने न चुनने की आजादी या सहूलियत मिले वरना धार्मिक कन्फ्यूजन युवाओं को गुमराह ही करते रहेंगे जिस का बड़ा नुकसान उन्हें कुंठा की शक्ल में उठाना पड़ेगा. श्राद्ध के दिनों में पूर्वज किस तरीके से धरती पर दिया खाना ऊपर आसमान में खा लेते हैं, यह हर बच्चा सोचता है लेकिन पेरैंट्स के पास उन की इस और ऐसी सैकड़ों जिज्ञासाओं का कोई समाधान नहीं होता. वजह, ये अंधभक्त खुद ही पीढ़ियों से भेड़चाल चल रहे हैं.

यही हाल स्कूलों का है. प्राथमिक कक्षाओं से ही बच्चों को धर्म के किस्सेकहानी पढ़ाए जा रहे हैं. एनसीईरटी की 7वीं जमात में महाभारत की कहानियां पढ़ाया जाना बच्चे को वैज्ञानिक नहीं बल्कि अतार्तिक बनाने वाली बात है. सब से बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के स्कूली बच्चों को धार्मिक पर्यावरण यानी शिक्षा के नाम पर रामायण और महाभारत की कहानियां रटाई जा रही हैं जो सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 28 का उल्लंघन है जो यह कहता है कि सरकारी स्कूलों में धार्मिक शिक्षा या उपासनाओं का प्रावधान नहीं किया जा सकता.

भाजपाशासित राज्यों राजस्थान, मध्य प्रदेश, असम के स्कूलों के भी यही हाल हैं. लेकिन केरल जैसा कम्युनिस्ट राज्य भी स्कूली बच्चों को धर्म परोसने की बीमारी से मुक्त नहीं हैं जहां अरबी भाषा को सिलेबस में शामिल कर अप्रत्यक्ष रूप से इसलामिक तालीम दी जा रही है. प्रसंगवश यह दिलचस्प बात है कि मदरसे तो धार्मिक शिक्षा के अड्डे हैं ही लेकिन हिंदीभाषी राज्यों के सरकारी स्कूलों को ही हिंदू मदरसे बनाने की साजिश जोरों पर हैं. ऐसे में यह उम्मीद करना बेकार की बात है कि धर्म के इन अर्धधार्मिक अड्डों की जेनजी पीढ़ी कोई वैज्ञानिक, इंजीनियर या फिर डाक्टर बन कर निकलेगी वहां से तो कांवडिए और जमाती ही निकलेंगे.

और, जो बच्चे जैसेतैसे और अपने दम पर स्नातक स्तर तक पहुंच भी जाएंगे, उन्हें घेरने के लिए कालेज लैवल पर भी जाल बिछाया जा रहा है. इसे एक उदाहरण से आसानी से समझा जा सकता है. बीती 18 सितंबर को देशभर के कोई 900 गणितज्ञों व रिसर्च स्कौलर्स ने यूजीसी से स्नातक गणित का ड्राफ्ट वापस लेने को कहा था. इन लोगों ने आगाह किया है कि इस ड्राफ्ट में गणित संबंधी तो कमियां और खामियां हैं ही लेकिन प्रस्तावित सिलेबस में काल गणना यानी पंचांग (जिस में शादीविवाह, मुंडन और गृहप्रवेश जैसे विभिन्न तरह के मुहूर्त निकाले जाते हैं), भारतीय बीज गणित, पुराणों का महत्त्व, नारद पुराण में पाई जाने वाली अंकगणित और ज्यामिति से जुड़ी विधाओं को शामिल किया गया है, इन्हें हटाया जाना चाहिए.

यूजीसी इस पर क्या फैसला लेता है, यह देखना दिलचस्प होगा और अगर भगवा सरकार के दबाव में पोंगापंथ वाला पाठ्यक्रम वापस नहीं लेता है तो सहज समझा जा सकता है कि कालेजों से इंजीनियर नहीं बल्कि पंडेपुजारी निकलेंगे. दक्षिणपंथियों के शिकंजे में छटपटा रहे देश में ऐसी पढ़ाई हैरत की नहीं बल्कि चिंता की बात है जिन के नेतृत्व की सरकार के रक्षामंत्री फ्रांस जा कर राफेल के पहियों के नीचे नारियल रखते हैं और उस पर नीबू मिर्चीटांगने का टोटका करते हैं.

आध्यात्मिकता हल नहीं

एमटीवी यूथ स्टडी के मुताबिक 62 फीसदी जेनजी मानते हैं कि आध्यामिकता उन्हें जिंदगी में स्पष्टता और आत्मविश्वास देती है. जबकि, धार्मिक रीतिरिवाज पुराने और बंदिशें थोपने वाले होते हैं. प्यू रिसर्च के एक सर्वे की मानें तो जेनजी पारंपरिक धार्मिक संस्थाओं या स्थलों, जिन्हें धार्मिक अड्डे कहना ज्यादा बेहतर होगा, को जजमैंटल और पौलिटिकल मानती है. इस सर्वे के मुताबिक 40 फीसदी जेनजी युवा धार्मिक रूप से नन्स यानी असम्बद्ध हैं खासतौर से युवतियां जिन की तादाद 35 फीसदी युवकों के मुकाबले 45 फीसदी है.

यह हाल अकेले भारत का नहीं बल्कि पूरी दुनिया का है. प्यू रिसर्च की ही फरवरी 2025 में जारी एक रिपोर्ट कहती है कि 65 फीसदी जेनजी खुद को आध्यात्मिक मानती है.

चर्चों की दैनिक प्रार्थनाओं में जेनजी की भागीदारी कम हो रही है लेकिन आध्यात्मिक प्रथाओं मसलन प्रकृति से उन का जुडाव बढ़ रहा है. यानी, अमेरिकी जेनजी युवा भी मानते हैं कि उन की जिज्ञासाओं का समाधान चर्चों से नहीं मिलना और बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए वही रास्ता उपयुक्त है जो युवराज और अदिति जैसे युवा बताते हैं.

पूरी दुनिया के युवा परंपरागत और संस्थागत धर्म छोड़ कर आध्यात्म की तरफ झुक रहे हैं तो यह तात्कालिक तौर पर ही राहत देने वाली बात लगती है क्योंकि आध्यात्म पर भी छद्म धर्मगुरुओं का ही कब्जा है. खुद को आध्यात्मिक गुरु कहने वाले ये लोग धर्मगुरुओं जितने चालाक और धूर्त भले ही न हों लेकिन हैं तो दुकानदार ही. भारत में जग्गी वासुदेव और श्रीश्री रविशंकर और एक हद तक रामदेव ऐसे ही दुकानदार हैं जो युवाओं को धर्म से इतर रास्तों मसलन ध्यान, योग, प्राणायाम, आयुर्वेद और पर्यावरण वगैरह पर चल कर शांति की बात करते हैं. इस खेप के काफी पहले यह काम महर्षि महेश योगी परमहंस योगानंद जैसे गुरु किया करते रहते थे.

आध्यात्मिकता जेनजी के धार्मिक असमंजस का पूरा हल नहीं है क्योंकि इस में बजाय सीधे धार्मिक पाखंड, पोंगापंथ के बदले- मैं कौन हूं, कहां से आया हूं, कहां जाऊंगा, दुनिया क्या है, आत्मा परमात्मा क्या है और मृत्यु के बाद क्या होता है- जैसे सवालजवाब हैं जो एक उम्र के बाद आदमी को धर्म की तरफ मुड़ने को मजबूर कर देते हैं कि इन सवालों के जवाब या इन जिज्ञासाओं का समाधान गीता, कुरान और बाइबिल आदि में है.

अब यह जेनजी युवाओं की खुद की जिम्मेदारी है कि वे इस चक्कर में ही न पड़ें और सीधे तौर पर मान लें कि शरीर एक मशीन है जो धर्म से नहीं बल्कि विज्ञान से संचालित होती है. यह दुनिया किसी अल्लाह, गौड या भगवान की नहीं बल्कि खुद आदमी की बनाई हुई है. सृष्टि के इस विकास क्रम को तार्किक तरीके से सरिता के सितंबर (प्रथम) 2025 अंक में ‘सृष्टि की शुरुआत – धर्म ने बहकाया साइंस ने बताया’ शीर्षक से समझाया भी गया है. Social Issue

Religion and Caste: धर्म और जाति के नाम दोस्ती को ठुकराती लड़कियां

Religion and Caste: भारतीय समाज में कास्ट को ले कर अलगाव हमेशा से रहा है. अमीरीगरीबी भी जाति पर बेस्ड रही है. ऊंची जाति का मतलब जमीनजायदाद वाला और नीची जाति का मतलब दीनहीन व गरीब. ऐसी जातिगत व्यवस्था में लड़कियों को हमेशा छिपाने की वस्तु बनाए रखा गया. घर की लड़कियों का दूसरी जाति से किसी भी प्रकार का संपर्क वर्जित था. लड़कियों को बचपन से ही धार्मिक नियमों में बांध दिया जाता. व्रत, त्योहार, पूजा, परंपराएं और संस्कार आदि सब लड़कियों के लिए ही थे.

पिछले कुछ दशकों में लड़कियों को इतनी आजादी मिली है कि वे स्कूल, कालेज और नौकरियों तक पहुंच रही हैं. लड़कियां समाज से बाहर निकल कर आधुनिक दुनिया का हिस्सा बन रही हैं और पुरुषों की बनाई घेराबंदियों को लांघ रही हैं लेकिन धर्म और जाति के एलिमैंट्स आज भी उन से चिपके हुए हैं. प्राइमरी स्कूल तक लड़कियों में जातिधर्म को ले कर ज्यादा जुड़ाव नहीं देखा जाता. सरकारी स्कूल में पढ़ने वाली ज्यादातर लड़कियां एक ही सामाजिक और आर्थिक परिवेश से आती हैं.

ये लड़कियां प्राइमरी शिक्षा तक दोस्ती को धर्म और जाति से ऊपर रखती हैं. एकसाथ स्कूल आने, साथ खेलने, गपें करने और एकदूजे की परवा करने की आदतें लड़कियों के स्वाभाविक गुणों में शामिल होती हैं लेकिन यही लड़कियां जैसेजैसे बड़ी होती हैं, बड़ी क्लासों में पहुंचती हैं तो इन की दोस्ती पर धर्म और जाति हावी होने लगती है. यही लड़कियां कालेज और नौकरियों तक पहुंचतेपहुंचते विशुद्ध धार्मिक या जातिवादी हो जाती हैं. आखिर क्या वजह है कि आज की मौडर्न लड़कियां भी जातिवाद और धार्मिक मकड़जाल से बाहर नहीं निकल पा रही हैं?

पुष्पा तिवारी जब 6ठी कक्षा में थी तब निगार कुरैशी उस की सब से अच्छी दोस्तों में से एक थी. 10वीं कक्षा तक दोनों की दोस्ती बनी रही लेकिन 11वीं के दौरान निगार और पुष्पा की दोस्ती के बीच दोनों का धर्म बाधा बनने लगा. पुष्पा माथे पर हलका चंदन लगाने लगी तो निगार भी अपने सिर को काले कपड़े से ढक कर स्कूल आने लगी. पुष्पा के घर में दिनरात न्यूज़ पर जो खबरें दिखाई जातीं. उस से पुष्पा की विचारधारा भी बदलने लगी थी. उस की विचारधारा जब कुलांचे मारती तो वह कक्षा में पहुंच कर निगार पर अपनी भड़ास निकाल लेती. एक दिन लंच के दौरान पुष्पा ने निगार के साथ स्कूल के पार्क में जाने से इनकार कर दिया और बोली, ‘देश की आजादी के वक़्त धर्म के नाम पर बंटवारा हुआ था तब सारे मुसलमान पाकिस्तान क्यों नहीं गए?’ पुष्पा के इस सवाल पर निगार कुछ नहीं बोली और वो फिर कभी स्कूल नहीं आई.

लड़कियों में इस तरह का अलगाव सिर्फ धर्म को ले कर ही पैदा नहीं होता बल्कि जाति को ले कर भी उन में श्रेष्टता या हीनता का भाव पैदा होने लगता है. सरकारी स्कूलों में ज्यादातर लड़कियां ओबीसी और दलित समाज से आती हैं. यहां शुरुआती कक्षाओं में ओबीसी लड़कियों की दलित लड़कियों से खासी दोस्ती हो जाती है मगर जैसेजैसे उम्र और कक्षा बढ़ती है वैसेवैसे दोस्ती पर जाति का फैक्टर हावी होने लगता है.

ओबीसी लड़कियां दलित लड़कियों से दूरी बना लेती हैं. गांवकसबों के सरकारी स्कूलों में अपर कास्ट की लड़कियां भी पहुंचती हैं और ये अपर कास्ट लड़कियां जब बड़ी कक्षाओं तक पहुंचती हैं तब ओबीसी और दलित लड़कियों से अपनी दोस्ती खत्म कर लेती हैं. जो लड़कियां प्राइमरी स्कूल में दूसरी लड़कियों को अपने जैसा समझती हैं वही लड़कियां हायर एजुकेशन तक पहुंचतेपहुंचते घोर धार्मिक या घोर जातिवादी हो जाती हैं और धर्म व जाति के चलते अच्छे दोस्त खो देती हैं.

लड़कियों को यह बात समझनी होगी कि हायर एजुकेशन तक पहुंचना उन के लिए एक जंग जीतने के बराबर है. धर्म और जाति की मानसिकता को तोड़ कर ही वो हायर एजुकेशन तक पहुंच पाती हैं. ऐसे में लड़कियों के लिए धर्म और जाति को दरकिनार कर अच्छे दोस्तों का साथ बनाए रखना बेहद जरूरी है.

यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफौर्मेशन सिस्टम फौर एजुकेशन और औल इंडिया सर्वे औन हायर एजुकेशन के 2021-22 से 2023-24 तक के आंकड़ों के अनुसार लड़कियों की प्राइमरी कक्षा में नामांकन दर 100 फीसदी से अधिक है जो राइट टू एजुकेशन एक्ट (2009) की सफलता को दर्शाता है लेकिन इन 100 लड़कियों में से लगभग 80 ही माध्यमिक शिक्षा (कक्षा 9-10) तक पहुंच पाती हैं और उच्चतर शिक्षा (कालेज स्तर) तक पहुंचने वाली लड़कियों का अनुपात मात्र 28 फीसदी रह जाता है. प्राइमरी से जौब तक मात्र 10 से 12 फीसदी लड़कियां ही पहुंच पाती हैं.

ये आंकड़े पिछले दशकों के मुकाबले काफी बेहतर हुए हैं, फिर भी यह लड़कियों के प्रति समाज की मानसिकता को दर्शाने के लिए काफ़ी है. लड़कियों के मामले में समाज अभी भी ज्यादा नहीं बदला है. आज भी धर्म और जाति के नाम पर लड़कियों की औनर किलिंग की जाती है. धर्म और जाति कभी भी लड़कियों के पक्ष में नहीं रहे. यह वो बेड़िया हैं जिन के जरिए सदियों तक औरतों को गुलाम बनाए रखा गया. आज की लड़कियां अगर स्कूल, कालेज और नौकरियों तक पहुंच रही हैं और हर क्षेत्र में मर्दों को चुनौती दे रही हैं तो यह तभी संभव हो पा रहा है जब धर्म और जाति की बेड़ियों को संविधान ने कमजोर किया है.

औरतों की शिक्षा, आत्मनिर्भरता, आजादी और नौकरी संविधान की बदौलत है. यह बात हर उस लड़की को समझनी चाहिए जो शिक्षित हो कर भी धर्म और जाति की मानसिकता से उबर नहीं पाई है.

औरतों की आजादी के रास्ते में एजुकेशन पहली सीढ़ी है. शिक्षा के जरिए ही लड़कियां गुलामी के बंधनों से मुक्त हो सकती हैं. ऐसे में लड़कियों को अपनी धार्मिक और जाति के झूठे संस्कारों को छोड़ना होगा लेकिन यह इतना आसान भी नहीं है. लड़कियां शिक्षा की ओर जितनी सीढ़ियां चढ़ती हैं, परिवार और सामाजिक परिवेश लड़कियों से उतना ही भयभीत होता है. सो, उन की उम्र और कक्षा के साथ ही धर्म संस्कारों की बेड़ियां कसता जाता है. इन अदृश्य बेड़ियों को लड़कियां देख ही नहीं पातीं और फंसती चली जाती हैं.

शिक्षा व्यवस्था भी लड़कियों को साक्षर और डिग्रीधारी बनाए रखने के अलावा कुछ नहीं करता. लड़कियां समझदार हो गईं तो इस का सब से बड़ा नुकसान धर्म की दुकानदारी करने वाले लोगों को होगा, इसलिए धर्म के ठेकेदार समझदार लड़कियों को पसंद नहीं करते. शिक्षा व्यवस्था को चलाने वाले लोग कैसे धार्मिक व्यवस्था को ही मजबूत करते हैं, इस कहानी से आप को यह बात समझ आ जाएगी-

क्लास में आते ही नए टीचर ने बच्चों को अपना लंबाचौड़ा परिचय दिया. बातों ही बातों में उस ने जान लिया कि लड़कियों के इस क्लास में सब से तेज और सब से आगे कौन सी लड़की है? टीचर ने खामोश सी बैठी उस लड़की से पूछा, “बेटा, आप का नाम क्या है?” लड़की खड़ी हुई और बोली, “जी सर, मेरा नाम है जूही.” टीचर ने आगे पूछा, “पूरा नाम बताओ, बेटा.” जैसे उस लड़की ने नाम मे कुछ छिपा रखा हो. लड़की ने कहा, “जी सर, मेरा पूरा नाम जूही ही है.” टीचर ने सवाल बदल दिया और पूछा, “पापा का नाम बताओ?” लड़की ने जवाब दिया, “जी सर, मेरे पापा का नाम है शमशेर.” टीचर ने फिर पूछा, “अपने पापा का पूरा नाम बताओ?” लड़की ने जवाब दिया, “मेरे पापा का पूरा नाम शमशेर ही है, सरजी.”

अब टीचर ने कुछ सोच कर बोला, “अच्छा, अपनी मां का पूरा नाम बताओ.” लड़की ने जवाब दिया, “सरजी, मेरी मां का पूरा नाम है निशा.” टीचर के पसीने छूट चुके थे क्योंकि अब तक वो उस लड़की की फैमिली के पूरे बायोडाटा में जो एक चीज ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा था वो उसे नहीं मिला था. टीचर ने आखिरी पैंतरा आजमाया और बोला, “अच्छा, तुम कितने भाईबहन हो?” टीचर ने सोचा कि जो चीज वो ढूंढ़ रहा है, शायद इस के भाईबहनों के नाम में वो क्लू मिल जाए. लड़की ने टीचर के इस सवाल का भी बड़ी मासूमियत से जवाब दिया, बोली, “सर जी, मैं अकेली हूं. मेरा कोई भाईबहन नहीं है.”

अब टीचर ने सीधा और निर्णायक सवाल पूछा, “बेटे, तुम्हारा धर्म क्या है?” लड़की ने इस सीधे से सवाल का भी सीधा सा जवाब दिया, बोली, “सर, मैं एक विद्यार्थी हूं और ज्ञान प्राप्त करना ही मेरा धर्म है और मुझे पता है कि अब आप मेरे पेरैंट्स का धर्म पूछोगे तो मैं आप को बता दूं कि मेरे पापा का धर्म है मुझे पढ़ाना और मेरी मम्मी की जरूरतों को पूरा करना और मेरी मम्मी का धर्म है मेरी देखभाल करना और मेरे पापा की जरूरतों को पूरा करना.”

लड़की का जवाब सुन कर टीचर के होश उड़ गए. उस ने टेबल पर रखे पानी के गिलास की ओर देखा, लेकिन, उसे उठा कर पीना भूल गया, तभी लड़की की आवाज एक बार फिर उस के कानों में किसी धमाके की तरह गूंजी, “सर, मैं विज्ञान की छात्रा हूं और एक साइंटिस्ट बनना चाहती हूं. जब अपनी पढ़ाई पूरी कर लुंगी और अपने मांबाप के सपनों को पूरा कर लूंगी तब कभी फुरसत में सभी धर्मों के अध्ययन में जुटूंगी और जो भी धर्म विज्ञान की कसौटी पर खरा उतरेगा उसे अपना लूंगी लेकिन अगर धर्मग्रंथों के उन पन्नों में एक भी बात विज्ञान के विरुद्ध हुई तो मैं उस पूरी पवित्र किताब को अपवित्र समझूंगी और उसे कूड़े के ढेर में फेंक दूंगी क्योंकि साइंस कहता है, एक गिलास दूध में अगर एक बूंद भी जहर मिली हो तो पूरा का पूरा दूध ही बेकार हो जाता है.”

लड़की की बात खत्म होते ही पूरा क्लास साथी लड़कियों की तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा. टीचर के पसीने छूट चुके थे, तालियों की गूंज उस के कानों में गोलियों की गड़गड़ाहट की तरह सुनाई दे रही थी. टीचर ने आंखों पर लगे धर्म के मोटे चश्मे को उतार कर कुछ देर के लिए टेबल पर रख दिया और पानी का गिलास उठा कर एक ही सांस में गटक लिया. थोड़ी हिम्मत जुटा कर लड़की से बिना नजर मिलाए ही बोला, “बेटा, आई प्राउड औफ़ यू.”

गर्ल स्टूडैंट की सोच व बोल ने वातावरण को खूबसूरत बना दिया था. Religion and Caste

Emotional Story : सूनी मांग का दर्द

Emotional Story : कि तने बरसों बाद आज किसी ने उस के नाम की टेर मांगी थी. उस के हाथ आटे से सने हुए थे इसलिए वहीं से उस ने नौकरानी को आवाज दी, ‘‘चम्पा, देख कौन आया है.’’

थोड़ी ही देर में चंपा उस के पास आ कर बोली, ‘‘बाईजी, कोई तरुण आए हैं.’’

‘‘तरुण….’’ वह हतप्रभ रह गई. शरीर में एक सिहरन सी दौड़ गई. उस ने फिर पूछा, ‘‘तरुण कि अरुण…’’

‘‘कुछ ऐसा ही नाम बताया बाईजी.’’

वह ‘उफ’ कर रह गई. लंबी आह भर कर उस ने सोचा, बड़ा अंतर है तरुण व अरुण में. एक वह जो उस के रोमरोम में समाया हुआ है और दूसरा वह जो बिलकुल अनजान है….फिर सोचा, अरुण ही होगा. तरुण नाम का कोई व्यक्ति तो उसे जानता ही नहीं. यह खयाल आते ही उस का रोमरोम पुलकित हो उठा. तुरंत हाथ धो कर वह दौड़ती हुई बाहर पहुंची, देखा तो अरुण नहीं था.

‘‘आप अर्पणा हैं न?’’ आने वाले पुरुष के शब्द उस के कानों में पडे़.

‘‘जी…’’

‘‘मैं अरुण का दोस्त हूं तरुण.’’

मन में तो उस के आया, कह दे कि तुम ने ऐसा नाम क्यों रखा, जिस से अरुण का भ्रम हो लेकिन प्रत्यक्ष में होंठों पर मुसकराहट बिखेरते हुए बोली, ‘‘आइए, अंदर बैठिए…चाय तो लेंगे,’’ और बिना उस के जवाब की प्रतीक्षा किए अंदर चली गई.

चाय की केतली गैस पर रखी तो यादों का उफान फिर उफन गया. कैसा होगा अरुण….उसे याद करता भी है…जरूर करता होगा, तभी तो उस ने अपने दोस्त को भेजा है. कोई खबर तो लाया ही होगा…तभी चाय उफन गई. उस ने जल्दी गैस बंद की और चाय ले कर बैठक में आ गई.

‘‘आप ने व्यर्थ कष्ट किया. मैं तो चाय पी कर आया था.’’

‘‘कष्ट कैसा, आप पहली बार तो मेरे घर आए हैं.’’

तरुण चुपचाप चाय की चुस्कियां भरने लगा. उस की खामोशी अपर्णा को अंदर से बेचैन कर रही थी कि कुछ बताए भी…कैसा है अरुण? कहां है? कैसे आना हुआ?

यही हाल तरुण का था, बोलने को बहुत कुछ था लेकिन बात कहां से शुरू की जाए, तरुण कुछ सोच नहीं पा रहा था. आखिर अपर्णा ने ही खामेशी तोड़ी, ‘‘अरुण कैसे हैं? ’’

‘‘उस का एक्सीडेंट हो गया है….’’

‘‘क्या?’’ अपर्णा की चीख ही निकल गई.

‘‘अभी 2 हफ्ते पहले वह फैक्टरी से घर जा रहा था कि अचानक उस की कार के सामने एक बच्चा आ गया. बच्चे को बचाने के लिए उस ने जैसे ही कार दाईं ओर मोड़ी कि उधर से आते ट्रक से एक्सीडेंट हो गया.’’

‘‘ज्यादा चोट तो नहीं आई?’’

‘‘बड़ा भयंकर एक्सीडेंट था. उसे देख कर रोंगटे खडे़ हो गए थे. ट्रक से टकरा कर कार नीचे खड्डे में जा गिरी थी. पेट में गहरा घाव है. सिर किसी तरह बच गया पर अभी भी बेहोशी छाई रहती है.’’

‘‘मुझे खबर नहीं दी?’’

‘‘खबर कौन देता? अरुण के डैडी को आप के नाम से चिढ़ है. अरुण पर उन्होंने कितनी बंदिशें नहीं लगाईं, कितनी डांट उसे नहीं पिलाई, फिर भी वह आप को नहीं भुला सका. रातरात भर आप की याद में तड़पता रहा. आप को तो पता ही होगा कि ठाकुर साहब अरुण की शादी टीकमगढ़ के राजघराने में करना चाहते थे. बात भी तय हो गई थी लेकिन अरुण ने साफ मना कर दिया. ठाकुर साहब का पारा चढ़ गया. उन्होंने छड़ी उठा ली और उसे भयंकर ढंग से पीटा लेकिन उस ने ‘उफ’ तक न की.

‘‘यह देख कर भी ठाकुर साहब अपनी जिद पर अटल रहे. लोगों ने उन्हें बहुत समझाया कि बेटे की शादी उस की मरजी से कर दें लेकिन वे सहमत नहीं हुए और एक दिन उन्होंने यहां तक कह दिया कि अरुण ने उन की मरजी के बगैर शादी की तो वे अपने आप को गोली मार लेंगे.

‘‘अरुण इस बात से डर गया. वह आप को खत भी न लिख सका क्योंकि वह जानता था कि डैडी अपने वचन के पक्के हैं. यदि ऐसा हो गया तो वह किसी को मुंह दिखाने लायक नहीं रहेगा. दिन ब दिन उस की हालत पतली होती गई. वह आप के गम में आंसू बहाता रहा. उस दिन अस्पताल में अचेतावस्था में उस के होंठों पर जब मैं ने आप का नाम सुना तो मुझे लगा कि आप ही उसे मौत के मुंह से बचा सकती हैं. मेरे दोस्त को बचा लीजिए,’’ इतना कहते ही उस का गला रुंध गया. आंखें छलछला आईं.

इस दुखद वृत्तांत ने अपर्णा का अंतस बेध दिया. वह गहरीगहरी सांसें भरने लगी. मन में धुंधली यादें ताजा हो आईं, अतीत कचोट गया. किन कठिन परिस्थितियों में उसे घर छोड़ना पड़ा, रिश्तेदारों से नाता तोड़ना पड़ा और परिचितों, सहेलियों से मुख मोड़ना पड़ा. कहांकहां नहीं भटकी वह, लेकिन अरुण की याद भुला न सकी. प्रेम का दीपक उस के अंदर सदैव जलता रहा और आज वह उस से अलग होना चाहता है, नहीं वह ऐसा कभी भी नहीं होने देगी. यदि उसे अपने जीवन की कुरबानी भी देनी पडे़ तो वह देगी. बेशक, उस की शादी अरुण से नहीं हो सकी, लेकिन उस के नाम के साथ उस का नाम जुड़ा तो है. यह सोचते ही उस की आंखें छलछला आईं.

तभी खामोशी को तोड़ता हुआ तरुण बोला, ‘‘अच्छा अपर्णाजी, चलता हूं. आज ही शाम को छतरपुर जाना है, आप तैयार रहिएगा.’’

वह चुप ही रही…‘हां’, ‘न’ उस के मुख से कुछ नहीं निकल सका और तरुण हवा के तेज झोंके सा बाहर निकल गया. अतीत की परछाइयों ने फिर उसे समेट लिया. एकएक लम्हा उसे कुरेदता गया.

कालिज के दिनों में उस का साथ अरुण से हुआ था. अरुण उस की कक्षा का मेधावी छात्र था. दोनों की सीट पासपास थीं इसलिए उन में अकसर किसी विषय पर बहस हो जाया करती थी. अरुण के तर्क इतने सटीक होते थे कि वह परास्त हो जाती. हार की पीड़ा उस के अंदर छटपटाती रहती. वह पूरी कोशिश कर मंजे तर्क उस के सामने रखती, लेकिन वह उतनी ही कुशलता से उस के तर्क काट देता. तर्कवितर्क का यह सिलसिला प्रेम में परिणीत हो गया. दोनों घंटों बातों में मशगूल रहते और अपने प्रेम के इंद्रधनुषी पुल बनाते. कालिज के कैंपस से ले कर चौकचौराहों तक यह प्रेमजोड़ी चर्चित हो गई.

अपर्णा के पिता हरिशंकर उपाध्याय धार्मिक विचारों के थे, वे अध्यापक थे. उन के एक ही संतान थी अपर्णा और उसे वह उच्च से उच्च शिक्षा दिलाना चाहते थे, लेकिन बेटी के जमाने के साथ बदलते रंगों ने उन्हें तोड़ कर रख दिया. उन्होंने अपर्णा को समझाते हुए कहा, ‘बेटी अपनी सीमा में रहो, जैसे इस परिवार की लड़कियां रही हैं. तुम्हारा इस तरह ठाकुर के लड़के के साथ घूमना मुझे बिलकुल पसंद नहीं.’

‘पिताजी, मैं उस से शादी करना चाहती हूं,’ अपर्णा ने जवाब दिया.

‘चुप नादान, तेरा रिश्ता उस से कैसे हो सकता है? वह क्षत्रिय है, हम ब्राह्मण हैं.’

‘लेकिन पिताजी, वह मुझ से शादी करने को तैयार है.’

‘उस के मानने से क्या होगा? जब तक कि उस के परिवार वाले न मानें. वह बहुत बडे़ आदमी हैं बेटी, उन्हें यह रिश्ता कभी मंजूर नहीं होगा.’

‘तब हम कोर्ट में शादी कर लेंगे.’

‘चुप बेशर्म,’ वह गुस्से से आगबबूला हो गए, ‘जा, चली जा मेरी आंखों के सामने से, वरना…. ’

यही हाल अरुण का था. जब उस के डैडी सूर्यभान सिंह को इस बात का पता चला तो वे क्रोध से पागल हो गए. यह उन के लिए बरदाश्त से बाहर था कि उन का लड़का एक मामूली पंडित की लड़की से प्यार करे. उन्होंने पहले अरुण को बहुत समझाया लेकिन जब उन की बात का उस पर कुछ असर नहीं हुआ तो उन्होंने दूसरा गंभीर उपाय सोचा.

वह सीधे हरिशंकर उपाध्याय के पास पहुंचे जो उस समय बरामदे में बैठे स्कूल का कुछ काम कर रहे थे. ठाकुर साहब को देखते ही वह हाथ जोड़ कर खडे़ हो गए.

‘हां, तो पंडित हरिशंकर, यह मैं क्या सुन रहा हूं?’ अपनी जोरदार आवाज में ठाकुर साहब ने कहा.

‘बहुत ख्वाब देखने लगे हो तुम.’

‘जी ठाकुर साहब, मैं समझा नहीं.’

‘अच्छा, तो तुम्हें यह भी बताना पडे़गा. जिस बात को पूरा कसबा जानता है उस से तू कैसे अनजान है. देखो पंडित, अपनी लड़की को समझाओ कि वह मेरे बेटे से मिलना छोड़ दे वरना मैं तुम बापबेटी का वह हाल करूंगा जिस की तुम कल्पना भी नहीं कर सकते हो.’

‘ठाकुर साहब, यह क्या कह रहे हैं आप….मैं आज ही उस की खबर लेता हूं. माफ करें….माफ करें.’

ठाकुर साहब के कडे़ प्रतिबंध के बाद भी अरुण अपर्णा से छुटपुट मुलाकात करने में सफल हो जाता जिस की भनक किसी न किसी तरह ठाकुर सूर्यभान को लग ही जाती और वे गुस्से से भिनभिना उठते. उन्होंने दूसरा उपाय सोचा, क्यों न हरिशंकर का तबादला छतरपुर से कहीं और करा दिया जाए. और यह कार्य वहां के विधायक से कह कर करवा दिया. इधर पंडित हरिशंकर घबरा गए थे. तबादले का जैसे ही उन्हें आदेश मिला फौरन छतरपुर छोड़ दतिया आ गए. अपर्णा को भी पिताजी के साथ आना पड़ा. वह दिन अपर्णा के जीवन का सब से बोझिल दिन था, जब बिना अरुण से मिले उसे दतिया आना पड़ा. जुदाई के सौसौ तीर उस के दिल में चुभ गए थे. अरुण का घर से निकलना बंद था. वह जातेजाते एक बार मिल लेना चाहती थी. लेकिन उस की हर कोशिश नाकाम हुई. एक यही दुख उसे लगातार पूरी यात्रा सालता रहा.

पिताजी के साथ अपर्णा चली तो आई लेकिन अरुण को भुला न सकी. दतिया आए अब 1 साल हो गया था. उस दौरान अरुण की उसे कोई खबर नहीं मिली. पढ़ाई भी उस की बंद हो गई. पिताजी को उस की शादी करने की जल्दी थी. मास्टर हरिशंकर ने एक अच्छा घर देख कर अपर्णा की सगाई बिना उस से पूछे ही कर दी. यह पता चलते ही उस ने शादी करने से इनकार कर दिया कि वह शादी करेगी तो सिर्फ अरुण से. यह सुन कर पिताजी उस पर बरस पडे़, ‘‘तेरी ही वजह से मुझे छतरपुर छोड़ कर दतिया आना पड़ा है फिर भी तू अरुण के नाम की माला जप रही है. कितना सताएगी मुझे. भला इसी में है कि तू घर छोड़ कर कहीं निकल जा.’’

‘ऐसा मत कहिए पिताजी, अपर्णा गिड़गिड़ा पड़ी, समझने की कोशिश कीजिए.’

‘मुझे कुछ नहीं समझना. अगर तू यहां से नहीं जाएगी तो मैं ही चला जाता हूं, ले रह तू यहां….’

आखिर दिल के हाथों मजबूर हो कर अपर्णा ने वह घर त्याग दिया और अपनी सहेली नीता के पास भिंड चली आई. नीता की मदद से उसे भिंड में नौकरी मिल गई. खानेपीने का जरिया हो गया. किराए पर मकान ले लिया. इसी बीच उस के पास शादी के कई प्रस्ताव आए लेकिन उस ने सब को ठुकरा दिया.

वह दिन याद आते ही उस की आंखें डबडबा आईं, ‘‘समाज की यह कैसी रूढि़यां हैं कि आदमी अपना मनपसंद साथी भी नहीं ढूंढ़ सकता? वंश परिवार की परंपराएं उस पर थोप दी जाती हैं. वहां आदमी टूटेगा नहीं तो क्या जुडे़गा?’’

आज अरुण की दुर्घटना की खबर ने उसे बेचैन ही कर दिया. वह नदी के किनारे पड़ी मछली सी फड़फड़ा गई. शाम को जब तरुण आया तो वह जाने को पूरी तरह तैयार बैठी थी, इस समय तक उस ने अपनी मानसिक स्थिति संभाल ली थी.

छतरपुर पहुंचते ही अपर्णा सीधे अस्पताल पहुंची. एक वार्ड में अरुण बेड पर मूर्छित पड़ा था. खून की बोतल लगी थी. हाथपैरों में प्लास्टर बंधा था. दोस्त, परिजन, रिश्तेदार उसे घेर कर खडे़ थे. डाक्टर उपचार में लगा था. उसे समझते देर न लगी कि अभी जरूर कोई गंभीर दौर गुजरा है क्योंकि सभी के चेहरे उदास थे.

ठाकुर सूर्यभान सिंह सिर नीचे झुकाए खडे़ थे. यद्यपि वह एक नजर उस पर डाल चुके थे. आज उसे उन से डर नहीं लगा था. डाक्टर के चेहरे से मायूसी साफ झलक रही थी. सभी की निगाहें उन पर टिक गईं.

‘‘इंजेक्शन दे दिया है. 10 मिनट में होश आ जाना चाहिए,’’ डाक्टर ने कहा.

‘‘लेकिन डाक्टर साहब, कुछ मिनट होश में रहता है फिर बेहोश हो जाता है,’’ ठाकुर साहब व्यग्रता से बोले.

‘‘देखिए, मैं तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा हूं. आप मरीज को खुश रखने की कोशिश कीजिए….कोई गहरा आघात पहुंचा है, जिस की याद आते ही उसे बेहोशी छा जाती है. वैसे ंिचंता की बात नहीं. इस रोग पर काबू पाया जा सकता है,’’ इतना कह कर डाक्टर नर्स के साथ चले गए.

मौत सा सन्नाटा छा गया. किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था. तभी तरुण अपर्णा की ओर देख कर बोला, ‘‘आप कोशिश कीजिए, शायद होश आए. एक हफ्ते से यह इसी तरह पड़ा है. होश में आने पर भी किसी से एक शब्द नहीं बोलता.’’

यह सुनते ही अपर्णा निडर हो कर अंदर गई और अरुण के पास पहुंच कर बोली, ‘‘अरुण, अब मैं कहीं नहीं जाऊंगी, यहीं रहूंगी तुम्हारे पास.’’

‘‘लेकिन तुम ने तो….कोई दूसरा घर बसा लिया….शादी कर ली?’’

‘‘अरुण क्या कहते हो? किस ने कहा तुम से यह….मुझ पर विश्वास नहीं?’’

‘‘विश्वास तो था लेकिन….’’

‘‘कैसी बात करते हो? मैं तुम्हें कैसे समझाऊं? तुम्हारे नाम के अलावा कोई दूसरा नाम मेरे होंठों पर कभी नहीं आया. मेरी आंखों में आंखें डाल कर देखो, सच क्या है तुम्हें पता चल जाएगा,’’ इतना कह कर अपर्णा फूटफूट कर रो पड़ी.

अरुण कुछ क्षण उसे देखता रहा, फिर आह कर उठा. उसे लगा जैसे उस के अंदर हजारों शूल एकसाथ चुभ गए हों.

‘‘अपर्णा….’’ वह गहरी निश्वास भरता हुआ बोला, ‘‘धोखा…विश्वासघात हुआ मेरे साथ…क्या समझ बैठा मैं तुम्हें…सोच भी नहीं सकता, तुम्हारे पिताजी ने यह झूठ मुझ से क्यों बोला?’’

कुछ क्षण अंदर ही अंदर वह सुलगती रही, फिर सोचा इस से तो काम नहीं चलेगा, उसे अगर अरुण को पाना है तो डट कर आगे आना होगा,’’

इस विचार के आते ही वह दृढ़ता से बोली, ‘‘अब मैं यहां से कहीं नहीं जाऊंगी अरुण, तुम्हारे पास रहूंगी. देखती हूं कौन मुझे हटाता है.’’

तभी अरुण के सीने में भयंकर दर्द उठा और वह कराह उठा, उस के हाथपैर मछली से फड़फड़ा गए. लोग डाक्टर को बुलाने दौडे़…अरुण हांफता हुआ बोला, ‘‘बहुत देर हो गई अपर्णा, अब मैं नहीं बचूंगा….मुझे माफ…’’ और यहीं उस के शब्द अटक गए. आंखें खुली रह गईं… चेहरा एक तरफ लुढ़क गया. यह देख अपर्णा की चीख ही निकल गई.

उसे जब होश आया तो देखा ठाकुर साहब और 2-3 लोग उस के पास खडे़ थे. अरुण के शरीर को स्ट्रेचर पर रखा जा रहा था. वह तेजी से स्ट्रेचर की तरफ लपक कर बोली, ‘‘इन्हें मत ले जाओ. मैं भी इन के साथ जाऊंगी.’’

ठाकुर साहब अपर्णा को पकड़ते हुए बोले, ‘‘यह क्या कह रही हो अपर्णा? पागल हो गई हो…’’

वह शेरनी सी दहाड़ उठी, ‘‘पागल तो आप हैं, इन्हें पागल बना कर मार दिया, अब मुझे पागल बना रहे हैं. मुझे आप की कृपा की जरूरत नहीं ठाकुर सूर्यभान सिंह. आप ने भले ही मुझे अपने घर की बहू नहीं बनने दिया, लेकिन विधवा बनने से आप मुझे नहीं रोक सकते.’’

वह और जोर से सिसक पड़ी, ‘‘काश, मौत कुछ क्षण ठहर जाती तो वह मांग में सिंदूर तो लगा लेती?’’ आज इस स्थिति में, कुछ पोंछने को भी उस के पास नहीं था. सबकुछ पहले से ही सूनासूना था…. Emotional Story

Short Hindi Stories : मिलन

Short Hindi Stories :  प्रांजल और हिमालय दोनों बचपन से ही दोस्त रहे. नौकरी व विवाह के बाद भी उन की निकटता बनी रही. प्रांजल की पत्नी भावना को हिमालय की पत्नी रचना का साथ भी अच्छा लगता. दोनों मित्रों की पत्नियां जबतब बतियाती रहतीं. प्रांजल की दोनों बेटियां मीता व गीता अपनी पढ़ाई लगभग पूरी कर चुकी थीं और बेटा उज्ज्वल अभी डाक्टरी के तीसरे वर्ष में पढ़ रहा था. मीता की शादी में हिमालय अपने बेटे सौरभ व बेटी ऋचा के साथ मुंबई यथासमय पहुंच गए थे. दोनों परिवार के बच्चे जब एकदूसरे के साथ रहे तो संबंध और भी पक्के हो गए.

एक दिन अचानक प्रांजल को हिमालय से अत्यंत दुखद समाचार मिला. उस की पत्नी रचना रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर सीढि़यों से फिसल कर गिर जाने के कारण गंभीर रूप से घायल हो गई है. प्रांजल और भावना के मुंबई पहुंचने से पहले ही रचना की मृत्यु हो गई. बचपन के मित्र के कष्ट को समझते हुए भी प्रांजल और भावना संवेदना के दो शब्द के अलावा कुछ भी समझा नहीं पाए. हिमालय दुखी व नितांत अकेले रह गए थे. उन की बेटी ऋचा ससुराल में थी और सौरभ की भी नौकरी दूसरे शहर में थी. लौटते हुए हिमालय से वे कह कर आए थे, ‘जब भी मन करे हमारे पास आ जाया करना…मन कुछ बदल जाएगा.’

प्रांजल के बेटे उज्ज्वल के विवाह पर हिमालय मित्र के आग्रह पर कुछ पहले आए थे. मीता और गीता के विवाह में वह पत्नी रचना के साथ आए थे…वे दिन आंखों के सामने बारबार आ जाते. प्रांजल और भावना उन के दुख को समझ रहे थे अत: उन्हें हर तरह से व्यस्त रखने का प्रयास करते ताकि मित्र अपनी पीड़ा को कुछ सीमा तक भुला सके. बाद में हिमालय का मन अपने अकेलेपन से बहुत उचाट होता तो वह प्रांजल के पास ही आ जाते. मुश्किल से 2 साल गुजरे होंगे कि प्रांजल भी गंभीर रूप से बीमार हो गए और केवल एक माह की बीमारी के बाद भावना अकेली रह गई.

बेटियां और उज्ज्वल भावना को बारीबारी से अपने साथ ले भी गए पर वह 3-4 महीने में घूमफिर कर दोबारा अपने घरौंदे में वापस आ गई…पति के साथ सुखदुख की यादों के बीच. उसे घर में हर तरफ प्रांजल ही दिखाई पड़ते…कभी ऐसा आभास होता कि प्रांजल किचन में उस के पीछे आ कर खड़े हैं और दूसरे ही क्षण उसे लगता…जैसे प्रांजल उसे समझा रहे हैं कि मैं तुम से दूर नहीं हूं भावना बल्कि तुम्हारे बिलकुल पास हूं…और भावना चौंक पड़ती. भावना का अपने बच्चों के पास मन नहीं लगा. जब हिमालय ने यह सुना तो हिम्मत कर के कुछ दिन का अवकाश ले कर भावना के पास आए. उन्हें देख कर भावना बिफर पड़ी…प्रांजल की यादें जो ताजा हो गईं…जब रचना नहीं रही…और हिमालय आते तो प्रांजल बारबार भावना से कहते, ‘मैं चाहता हूं जो चीजें नाश्ते व भोजन में हिमालय को पसंद हैं…वही बनें. जब तक वह हमारे साथ है हम उस की ही पसंद का खाना व नाश्ता करेंगे.’

भावना प्रांजल की बात इसलिए नहीं रखती कि हिमालय उस के पति के दोस्त हैं…बल्कि इस का दूसरा कारण भी था कि रचना की मृत्यु से हिमालय के प्रति उसे गहरी सहानुभूति हो गई थी. लेकिन अब? अब सबकुछ परिवर्तित रूप में था…अब भावना किचन में घुसती ही नहीं. हिमालय ही जो कुछ बना सकते थे, बना लेते पर खाते दोनों साथसाथ. भावना ने काफी समय तक बातें भी न के बराबर कीं. हिमालय कहते तो वह तटस्थ सी सुनती. जवाब नपेतुले शब्दों में देती. हिमालय स्वयं चोट खाए हुए थे इसलिए भावना की पीड़ा को समझते थे. वह उसे समझाने का प्रयास जरूर करते, ‘‘जीवन मृत्यु में किसी का दखल नहीं चलता. इनसान खुद परिस्थितियों के अनुसार जीवन व्यतीत करने को मजबूर है. घाव कुछ हलका होने पर इनसान स्वयं अपने आसपास छोटीमोटी खुशियां खोजने का प्रयास करे. हमें इस तथ्य को अपना कर ही चलना होगा, भावनाजी.’’

भावना की आंखों से बस, आंसू टपकते रहते…वह बोलती कुछ नहीं. हिमालय जाने लगे तो भावना से यह वादा जरूर लिया कि वह अपने खानेपीने का पूरा ध्यान रखेगी. मन ठीक नहीं है तो क्या तन को स्वस्थ रखना जरूरी है. समय के मरहम से भावना का घाव भरा तो हिमालय का जबतब आना उसे अच्छा लगने लगा…बातें भी करनी शुरू कर दीं. नाश्ताभोजन भी उन के पसंद का बनाने लगी. हिमालय को भी भावना के यहां आना अच्छा लगता. मीता, गीता व उज्ज्वल भावना से मिलने आए हुए थे. तभी हिमालय भी आ गए थे. बेटियां चाह रही थीं कि मां उन के साथ या भाई के साथ चलें लेकिन भावना तैयार नहीं हुईं. उन का कहना था कि उन्हें अपने इसी घर में अच्छा लगता है.

बच्चे मां को समझ रहे थे…जहां उन्हें अच्छा लगे वहीं रहें. हां, उन्हें इस बात का अंदाजा जरूर लग गया था कि हिमालय अंकल के यहां रहने से मां के मन को कुछ ठीक लगता है. अंकल बरसों से उन के पारिवारिक मित्र रहे हैं और काफी समय उन लोगों ने साथसाथ गुजारा भी है. मीता और उज्ज्वल सोच रहे थे कि हिमालय अंकल जितना भी मां के साथ रह लेते हैं, कम से कम उतने समय तो वे लोग मां की तरफ से निश्चिंत से रहते हैं.

वैसे बच्चे चाहते कि उन में से कोई एक मां के पास अवश्य रहे लेकिन जब यह संभव नहीं था तो वे हिमालय अंकल पर ही निर्भर होने लगे और साग्रह उन से कहते भी, ‘‘अंकल, हम मां पर किसी प्रकार का दबाव नहीं डालना चाहते पर आप से आग्रह करते हैं कि उन का हालचाल पूछते रहेंगे. हम लोग भी यथासंभव शीघ्र आने का प्रयास करते रहेंगे.’’

एक दिन हिमालय ने हिम्मत कर के कहा, ‘‘भावना, मैं समझता हूं कि तुम्हारा कष्ट ऐसा है जिस का भागीदार कोई नहीं हो सकता. फिर भी हिम्मत कर के कह रहा हूं…यदि आप अपने जीवन में किसी हैसियत से मुझे शामिल करना चाहो तो मैं आप की शर्तों के साथ आप को स्वीकार करने को सहर्ष तैयार हूं. इस से न केवल एक को बल्कि दोनों को सहारा और बल मिलेगा.’’

थोड़ा विराम दे कर हिमालय ने पुन: कहा, ‘‘आप के हर निर्णय का मैं सम्मान करूंगा. आप इस बात से भी निश्चिंत रहिए कि हमारी दोस्ती के रिश्ते पर कोई आंच नहीं आएगी.’’

भावना ने पलक उठा कर हिमालय की तरफ देखा. वह मन से यही चाहती थी, हिमालय की बात अपनी जगह सही है. अब वह भी खुद को प्रांजल के अभाव में अकेली और बेसहारा अनुभव करती है. वह कोई गलत अथवा अनुचित कदम उठाना नहीं चाहती…उस के समक्ष उस का परिवार है, बच्चे हैं और सब से बड़ा समाज है. हिमालय की बात का कुछ जवाब दिए बिना वह किचन की तरफ बढ़ गई. हिमालय ने भी फिर कुछ कहा नहीं. हिमालय के बेटे सौरभ व बेटी ऋचा को यह पता था कि जब से मां मरी हैं पिताजी बहुत दुखी, उदास व नितांत अकेले हैं. यह बात दोनों बच्चे अच्छी तरह जानते थे कि पापा को प्रांजल अंकल और भावना आंटी के यहां जाना हमेशा ही अच्छा लगता रहा, और आज जब आंटी नितांत अकेली व दुखी हो गई हैं, तब भी.

सौरभ ने ही ऋचा से कहा, ‘‘क्यों न हम भावना आंटी के मन का अंदाजा लगाने की कोशिश करें. यदि उन के मन में पापा के लिए कोई जगह होगी तो हम उन से जरूर कुछ कहना चाहेंगे. आंटी का साथ पा कर पापा के दिन भी अच्छे से गुजर सकेंगे.’’

सौरभ और ऋचा ने भावना के पास जाने का निश्चय किया. हिमालय, भावना के यहां ही थे. अचानक सौरभ को फोन से पता चला कि भावना आंटी को सीरियस बीमारी है फिर तो दोनों बहनभाई तुरंत ही वहां के लिए निकल पड़े. मीता, गीता तथा उज्ज्वल का परिवार सब पहुंच चुके थे. दरअसल, कई दिनों से भावना का मन ठीक नहीं था. उलझन और अनिश्चय से भरा अंतर्मन समुद्र मंथन सा मथ रहा था…कभी हिमालय की बात और अपनत्वपूर्ण व्यवहार उसे अपनी तरफ खींचता तो कभी पति के साथ बिताए दिन यादों को झकझोर देते…तो कभी जीवन में आया अकेलापन भी अपना कोई साथी ढूंढ़ता…सब तरफ से घिरे मन को भावना ने अच्छी तरह से टटोला, परखा तो यही लगा कि पति के अभाव में वह कुछ सीमा तक अकेली और दुखी जरूर है पर उसे किसी और बात का अभाव नहीं है.

दूसरी बात, वह हर कदम अपने बच्चों और परिवार को साथ ले कर ही चलना चाहेगी…सोचती हुई भावना ने अपने मन में निश्चय किया कि हिमालय जैसे अब तक प्रांजल के दोस्त रहे बस, वही दोस्ती का रिश्ता अब भी बना रहेगा. अपने फैसले से संतुष्ट भावना ने तय किया कि कल सुबह वह हिमालय को उन की उस दिन कही बात के बारे में अपना फैसला जरूर सुना देगी. लेकिन मन में तनाव के चलते रात को भावना का रक्तचाप काफी बढ़ जाने से उसे जबरदस्त हार्ट अटैक पड़ गया. हिमालय ने फौरन उसे अस्पताल में भरती कराया. डाक्टरों ने 72 घंटे उसे आईसीयू में रखा था. एक सप्ताह अस्पताल में रहने के बाद ही भावना घर आ सकी.

15 दिनों तक मां के साथ रहने के बाद आफिस व बच्चों के स्कूल के चलते मीता, गीता और उज्ज्वल वापस जाने की तैयारी में लग गए थे. हिमालय के दोनों बच्चे सौरभ व ऋचा तो 2 दिन बाद ही चले गए थे. उज्ज्वल ने मां को ले जाना चाहा लेकिन भावना अभी इस स्थिति में नहीं थी कि सफर कर सके. बच्चे जानते थे कि मां की सेवा में हिमालय अंकल का अहम स्थान रहा, वह अभी भी भावना को अकेली छोड़ कर जाने के लिए तैयार नहीं थे. हिमालय का भावना के प्रति आत्मीयभाव व सहृदयता से की गई सेवा ने सिर्फ भावना के ही नहीं बल्कि दोनों के बच्चों के अंतर्मन को गहराइयों से छू लिया था. और अपनी मां व पिता के प्रति एक सुखद फैसला लेने को प्रेरित किया. जाने से पहले मीता और उज्ज्वल ने सौरभ और ऋचा से फोन पर लंबी बातचीत की. इसी के साथ उन्होंने अपने सोचे फैसले के प्रति मन को पक्का भी कर लिया.

एक दिन भावना ने देखा कि अचानक उस के बच्चों के साथ हिमालय के भी दोनों बच्चे आए हैं. उस ने सब से बेहद अनुनय के साथ कहा, ‘‘तुम सब ने तथा हिमालय अंकल ने मेरी बहुत सेवा की. शायद उन के यहां होने से ही मुझे दूसरा जीवन मिला है. यदि उस दिन हिमालय अंकल यहां न होते तो…’’

मीता ने मां के होंठों पर हाथ रख कर आगे बोलने से रोक दिया. अचानक उसे याद आया जब 11 दिसंबर को उस की शादी में हिमालय अंकल सपरिवार आए थे तो पापा ने उन से मुसकरा कर कहा था, ‘जानते हो हिमालय, मैं ने मीता की शादी के लिए यह दिन चुन कर क्यों रखा? यह बड़ा शुभ दिन है…हमारी भावना का जन्मदिन जो है.’

‘तो यह बात तुम ने आज तक मुझ से छिपा कर क्यों रखी? और साथ में यह भी भूल गए कि 11 दिसंबर को मेरा भी जन्मदिन होता है.’ हिमालय अंकल के इतना कहने के बाद प्रांजल ने खुश हो कर उन को बांहों में भर लिया था. फिर तो हिमालय अंकल और मां को बधाई देने वालों का घर में तांता सा लग गया था.

मीता ने कहा, ‘‘मां, जब से मेरी शादी हुई है मैं अपने विवाह की वर्षगांठ पर कभी आप के पास नहीं रही. इस बार मेरी दिली इच्छा है कि इस शुभ दिन का जश्न मैं और यश आप के साथ मनाएं. और मैं ने तो अपनी शादी की इस सालगिरह के लिए होटल भी बुक करा लिया है. कुछ खासखास मेहमानों के साथ हिमालय अंकल, सौरभ भैया तथा ऋचा भी रहेगी. मां, उस दिन आप का भी तो जन्मदिन होता है…हम दोनों यह दिन सुंदरता से एकसाथ मनाया करेंगे.’’

भावना को बेटी की बात सुन कर अच्छा लगा, इसी बहाने घर में कुछ दिन तो रौनक रहेगी. उसे याद था कि इस दिन हिमालय का भी जन्मदिन होता है, लेकिन उस ने मीता से इस का कोई जिक्र नहीं किया. निश्चित दिन से एक दिन पहले ही ज्यादातर लोग आ गए, इसीलिए अगले दिन सुबह से ही घर में चहलपहल का माहौल बना हुआ था. जहां मीता और यश को सब बधाई दे रहे थे वहीं भावना और हिमालय भी अपनेअपने जन्मदिन की बधाई स्वीकार कर रहे थे. संध्या समय घर के सभी लोग होटल पहुंच गए. होटल में आकर्षक सजावट की गई थी. एक तरफ शहनाई वादन की व्यवस्था की गई थी. विवाह की वर्षगांठ के मौके पर मीता और यश की जयमाल होने के साथ ही तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी. तभी मुसकराती मीता हिमालय के पास आ कर आग्रह पूर्वक बोली, ‘‘प्लीज अंकल, एक मिनट के लिए उधर मंच पर चलिए.’’

हिमालय भी बिना कुछ सोचेसमझे उस के साथ हो लिए. दूसरी तरफ ऋचा भावना को साथ ले कर मंच पर आई. मीता और ऋचा ने आमनेसामने खड़े भावना और हिमालय के हाथों में बड़ा सा फूलों का हार पकड़ाते हुए हंस कर कहा, ‘‘जानते हैं अंकल और आंटी, आप इस का क्या करेंगे?’’

‘‘हां, तुम को और यशजी को शादी की वर्षगांठ की खुशी में पहनाना है,’’ हिमालय ने मुसकरा कर कहा.

‘‘नहीं, आज मम्मी का जन्मदिन है. इस उपलक्ष्य में यह हार आप उन को पहनाएंगे,’’ मीता ने हंस कर कहा.

‘‘और आंटी, आज मेरे पापा का भी जन्मदिन है,’’ मीता के कहने के तुरंत बाद ऋचा ने कहा, ‘‘इस खुशी में आप को हार पापा को पहनाना है.’’

अपनेअपने हाथों में हार पकड़े हिमालय और भावना आश्चर्य से भर कर बच्चों की तरफ देखने लगे. अपने लिए बच्चों की इस खूबसूरत कोशिश पर दोनों का दिल भर आया और उन्होंने बच्चों का मन रखने के लिए एकदूसरे को जयमाला पहना कर रस्म अदा कर दी. मीता और ऋचा ने तालियां बजाते हुए सब के सामने कहा, ‘‘अब आप दोनों दोस्त से आगे एकदूसरे को स्वीकार कर के एक दूसरे के हो कर रहेंगे. हमारा यह प्रयास बस, आप लोगों को अपनी स्थायी पीड़ा और अकेलेपन से कुछ सीमा तक निजात दिलाने के लिए किया गया है.’’

बच्चों के साहस और प्रयास की सब ने मुक्त कंठ से सराहना की. तालियों की गड़गड़ाहट से होटल का हाल गूंज उठा. हिमालय ने अनुग्रहीत नजरों से बच्चों की तरफ देखा…जिन्होंने अत्यंत खूबसूरती से सब को साक्षी बना कर उन के मिलन को स्वीकार किया था. Short Hindi Stories

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