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बेअसर एक और युद्ध फिल्म पिप्पा

भारतपाक के बीच जितने भी युद्ध हुए हैं उन में सिनेप्रेमियों की दिलचस्पी हमेशा से रही है. फिल्म ‘शेरशाह’ भी भारतपाक युद्ध पर थी जिस का नायक एक युवा था. अब आगे ‘इक्कीस’ पर काम शुरू हो चुका है. इसी बीच भारतपाक युद्ध पर एक और फिल्म आई है, जिस का नाम है ‘पिप्पा’.

इस फिल्म में भारत ने एक ऐसे टैंक का इस्तेमाल किया था जो जमीन पर चलने के साथसाथ पानी में भी तैर सकता था और इसलिए पंजाब रैजीमैंट के जवानों ने उसे प्यार से पिप्पा नाम दिया. पिप्पा घी का वह कनस्तर होता है जो पानी में आराम से तैर सकता है.

यह उभयचर टैंक जिसे पीटी-76 और पलावुशी टैंक कहा जाता है, एक अनोखा टैंक था जिसे उभयचर अभियानों के लिए डिजाइन किया गया था और इस का उपयोग युद्ध के दौरान नदियों को पार करने के लिए किया गया था.

यह टैंक युद्ध के दौरान बहुत महत्त्वपूर्ण था जिस ने युद्ध में जीत के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. सेना के पास बचा इकलौता असली पीटी-76 टैंक इस फिल्म में दिखाया गया है. बताते हैं कि फिल्म की शूटिंग के आखिरी दिन इस टैंक ने भी जलसमाधि ले ली थी.

निर्देशक राजाकृष्णा मेनन ने अपनी इस फिल्म में पिप्पा यानी पीटी-76 टैकों से पाकिस्तान के टैंकों को आग लगा दी थी. इस फिल्म में उस ने बलराम सिंह (ईशान खट्टर), उन के परिवार, उन की यूनिट और पूर्वी पाकिस्तान के हालात के साथसाथ पिप्पा की भूमिका को भी दिखाया है.

पिप्पा एक युद्ध फिल्म है, जिस में कुछ हीरो हैं, उन की बैकस्टोरी है, उन का दर्द है. फिल्म में कुछ अगलबगल के ट्रैक भी हैं. फिर भी यह फिल्म दिल को छू नहीं पाती, दिमाग पर असर नहीं कर पाती. इसे देख कर मुट्ठियां नहीं भिचतीं, भुजाएं नहीं फड़कतीं, हालांकि इस के युद्ध सीन सजीव हैं.

यह फिल्म अमृतसर, अहमदनगर, पश्चिम बंगाल के अंदरूनी इलाकों की पृष्ठभूमि पर आधारित है. यह फिल्म देशभक्ति और वीरता की कहानी है जिस में 45 कैवेलरी टैंक स्क्वाड्रन के कैप्टन बलराम मेहता की जिंदगी की झलकियां दिखती हैं.

पिप्पा को ले कर सीओ कमांडिंग ने उसे चुनौती दी पीटी-76 टैंक की 3 फौजियों को बढ़ा कर 4 फौजियों की जगह बनाने की. बलराम ने उसे कर दिखाया. मानेक्क्षा ने इस काबिल लड़के को तुरंत फ्रंट पर रवाना करने का हुक्म दिया. वह नौजवान अपने शहीद फौजी पिता के बूट्स उठा कर चल निकला एक ऐसे मिशन पर जिस की मिसाल दुनिया में दूसरी नहीं मिलती. भारत ने पाकिस्तान से युद्ध किया और बनाया एक नया देश बंगलादेश.

इस फिल्म में बलराम के साथ जो टैंक परदे पर आया वह असली पीटी-76 टैंक ही है. इस टैंक के हमले से धूधू कर जलते पाकिस्तान के चैफी टैंकों के नाम पर ही ब्रिगेडियर मेहता ने अपनी किताब का नाम रखा ‘द बर्निंग चैफीज’.

यह फिल्म पाकिस्तान से बंगलादेश की आजादी पर आधारित है. ‘पिप्पा’ में ईशान खट्टर एक सैनिक की भूमिका में है, जो बंगलादेश के 6 करोड़ लोगों को आजाद कराने के लिए पाकिस्तान से युद्ध लड़ रहा है. फिल्म में प्रियांशु ईशान खट्टर के बड़े भाई का किरदार निभा रहे हैं.

प्रियांशु राम जबकि ईशान खट्टर बलराम मेहता का किरदार निभा रहे हैं. फिल्म के शौट्स अच्छे बने हैं, जैसे युद्ध के लिए एक नदी पार करने के लिए एक टैंक का उपयोग करने वाला सीन.

भारतपाकिस्तान और 1971 के युद्ध पर पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं. इस बार ईशान खट्टर कुछ अलग ले कर आए हैं. इस में पारिवारिक ड्रामा और युद्ध की भयावहता दोनों दिखाई गई है. साथ ही, देशभक्ति की भावना और खुद को साबित करने की उत्सुकता भी है.

फिल्म के प्रोडक्शन डिजाइनर ने दर्शकों को 5 दशक पीछे ले जा कर पूरा एहसास कराने का काम किया है. इतिहास गवाह है कि पूर्वी पाकिस्तान के आजाद हो कर बंगलादेश बनने के उस संघर्ष को दबाने के लिए वहां के करीब 30 लाख लोगों को मार दिया गया था और करीब 3 लाख औरतों के साथ बलात्कार किए गए थे.

मुक्तिवाहिनी के उस संघर्ष में भारत की प्रमुख भूमिका थी और पूर्वी मोरचे पर पाकिस्तान को हराने में वहां के गरीबपुर में हुई निर्णायक लड़ाई की थी. गरीबपुर की लड़ाई के हीरो कैप्टन बलराम सिंह मेहता थे.

‘पिप्पा’ फिल्म बुरी नहीं बनी है. शुरू से ही यह अपने मुख्य किरदारों की सोच को स्पष्ट कर देती है. बलराम के बागी तेवर दिखा कर यह स्थापित करती है कि यह बंदा कल को मैदान में क्या रुख अपनाएगा. अपने बड़े भाई और 1965 की लड़ाई के हीरो मेजर राम से बलराम का खुंदक रखना अजीब लगता है. बलराम की बहन (मृणाल ठाकुर) की शादी वाला ट्रैक भी मिसफिट है. पूरी फिल्म में दृश्यों के बीच का तालमेल बारबार टूटता है.

सैम के किरदार में कंवल सदाना जंचे हैं. बलराम बने ईशान खट्टर ने अपने किरदार में जोर लगाया है. कलाकार अपनीअपनी भूमिकाओं में फिट हैं. इनामउल हक ने शानदार काम किया है. ‘परवाना…’ वाले गाने को छोड़ कर बाकी का गीतसंगीत औसत है.

सच यह है, यह फिल्म पूरी तरह से पिप्पा की कहानी नहीं है न ही बलराम की और न ही बंगलादेश के जन्म की. यह फिल्म आधे भरे कनस्तर की तरह है. यही अधूरापन इस फिल्म की कमी है.

सर्दी के मौसम में क्यों बढ़ जाते हैं फेफड़ों के रोग

सर्दी का मौसम शुरू होते ही देश की राजधानी दिल्ली प्रदूषण से बेहाल हो जाती है. पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसान धान की कटाई के बाद उन की जड़ों को खोद कर निकालने की जगह पर उन को जलाने का काम करते हैं. धान के इन बचे सूखे पौधों को ही पराली कहा जाता है. किसान धान की कटाई मशीनों से करते हैं. मशीन धान के पौधे को 6 इंच ऊपर से काट लेती है. 6 इंच के ये सूखे धान के पौधे खेत में बच जाते हैं. इन को एकएक कर खोद कर निकालना महंगा पड़ता है. ऐसे में किसान इन को जला देता है. इन का धुआं दिल्ली की सेहत को खराब कर देता है.

इस वक्त सर्दी का मौसम होता है, इस कारण पराली का धुआं ऊपर नहीं जा पाता. इस के अलावा दीवाली भी इसी दौरान होती है जिस में पटाखों का खूब प्रयोग किया जाता है. कई बार लोग सर्दी से बचने के लिए खराब प्लास्टिक टायर भी जलाते हैं. इन सब का मिलाजुला प्रभाव दिल्ली वालों की सेहत को बिगाड़ देता है, जिस वजह से दिल्ली दिल वालों की जगह प्रदूषण वालों की नगरी होती जा रही है.

इस प्रदूषण की वजह से लोगों की तकलीफें काफी बढ़ गई हैं, खासकर उन लोगों के लिए दिल्ली बेहद खतरनाक हो जाती है जिन को श्वास संबंधी किसी भी तरह की दिक्कत होती है.

यूपीए की चेयरपर्सन और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को डाक्टरों की सलाह पर प्रदूषण से बचने के लिए दिल्ली छोड़ कर जयपुर जाना पड़ा. हवा में प्रदूषण का प्रभाव सभी पर पड़ता है. जिन लोगों को श्वास संबंधी दिक्कतें होती हैं उन के सामने खतरे बढ़ जाते हैं. इस की वजह यह होती है कि औक्सीजन की कमी और धुएं का लंग्स यानी फेफड़ों पर असर पड़ता है. फेफड़ों की सेहत खराब होती है, जिस से शरीर को सही तरह से औक्सीजन नहीं मिल पाती है. सांस लेने की दिक्कत हो जाती है. कई बार यह जानलेवा हो जाता है. यही वजह है कि लोगों को इस तरह के वातावरण में रहने से मना किया जाता है.

जीवन पर खतरे को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट तक इस पर गंभीर है. दिल्ली सरकार को नकली बारिश करानी पड़ी. प्रदूषण को रोकने के लिए कई तरह के फैसले दिल्ली में लेने पड़े. इस के बाद भी श्वास संबंधी रोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है. ऐसे में जरूरी है कि हम फेफड़ों के महत्त्व को समझें और उन को स्वस्थ रखने के लिए जरूरी उपाय करें.

फेफड़ों का महत्त्व

मानव का शरीर जीवित रहने के लिए सांस लेता है. सांस के रूप में हवा में मौजूद औक्सीजन हम लेते हैं. फेफड़ों का काम सांस लेने और औक्सीजन को पूरे शरीर में पहुंचाने का होता है. फेफड़ों की रचना इस प्रकार होती है कि वे शरीर की बाहरी क्षति से हिफाजत कर सकें. फेफड़े बिना किसी जानकारी के अपना काम लगातार करते रहते हैं.

इस के बाद भी कुछ वजहों से फेफड़ों को भी नुकसान पहुंच सकता है और वे हवा से औक्सीजन लेने व कार्बन डाइऔक्साइड को बाहर निकालने की अपनी क्षमता खो सकते हैं.

शरीर की कोशिकाओं को जीवित रहने और सही तरह से काम करने के लिए औक्सीजन की आवश्यकता होती है. जिस हवा में हम सांस लेते हैं उस में औक्सीजन और अन्य आवश्यक गैसें मौजूद होती हैं. श्वसन तंत्र का पहला काम नई वायु को शरीर में अंदर लेना और अपशिष्ट गैसों को शरीर से बाहर निकालना होता है.

फेफड़ों में प्रवेश करने के बाद औक्सीजन शरीर के रक्तप्रवाह में प्रवेश करती है. फिर शरीर में प्रत्येक कोशिका से अपशिष्ट गैस कार्बन डाइऔक्साइड का औक्सीजन से आदानप्रदान हो जाता है. उस के बाद रक्तप्रवाह से यह अपशिष्ट गैस फिर से फेफड़ों तक लाई जाती है जहां इसे शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है. यह गैस विनिमय कहलाता है, जो फेफड़ों और श्वसन तंत्र द्वारा स्वाभाविक रूप से किया जाने वाला एक अहम कार्य होता है. यह मूलभूत जीवन के लिए बेहद जरूरी होता है.

इस के अलावा श्वसन तंत्र श्वसन संबंधी अन्य महत्त्वपूर्ण कार्यों को भी पूरा करता है. यह शरीर को हानिकारक विषैले पदार्थों से बचाता है.

यह कार्य वह खांसी और छींक के जरिए करता है. गंध लेने की क्रिया के जरिए भी यह शरीर को खतरों से बचाने का काम करता है. जैसे, हम कोई खराब चीज खाने जा रहे होते हैं तो सब से पहले हमें उस की गंध बताती है कि यह खाने वाला है या नहीं, उसी तरह से जब हम कोई खराब चीज खा लेते हैं तो शरीर उसे रक्त में घुलने से पहले ही शरीर से उलटी के जरिए बाहर करने का काम करता है.

फेफड़ों की संरचना

फेफड़े छाती में पसलियों के पीछे और हृदय के दोनों ओर स्थित होते हैं. ये लगभग शंकु के आकार के होते हैं. इन का आधार समतल होता है जो डायफ्राम से जुड़ता है और इन का शिखर एक गोलाकार सिरा सा होता है.

जिस्म में फेफड़ों की संख्या 2 होती है. ये आकार व रूप में एकदूसरे से थोड़ा भिन्न होते हैं. दाहिना फेफड़ा नीचे लिवर के लिए जगह बनाने के लिए आकार में थोड़ा छोटा होता है. वहीं, बाएं फेफड़े में हृदय के स्थान के पास एक इंडेंटेशन शामिल होता है जिसे कार्डियक नौच कहते हैं. यही उस क्षेत्र की सीमा बनाता है जहां हृदय उपस्थित होता है. बाएं फेफड़े का वजन और क्षमता दाएं फेफड़े की तुलना में थोड़ा कम होती है.

फेफड़े 2 ?िल्लियों से घिरे होते हैं, जिन्हें प्लूरा कहा जाता है. बाहरी ?िल्ली पसली के पिंजरे की अंदरूनी दीवार से जुड़ी होती है. आंतरिक ?िल्ली फेफड़ों की बाहरी सतह से सीधी जुड़ी होती है. 2 ?िल्लियों के बीच के प्लूरा अंतराल में फुफ्फुस द्रव मौजूद होता है जो प्लूरा को आर्द्र रखता है और सांस लेने के दौरान होने वाले घर्षण को कम करता है.

फेफड़ों का पहला कार्य बाहरी वातावरण से वायु लेना और उस में मौजूद औक्सीजन को रक्त में प्रवाहित करना होता है. यह औक्सीजन रक्त से शरीर के बाकी हिस्सों में फैल जाती है. शरीर के अंग, जैसे डायफ्राम मांसपेशी, पसलियों के बीच के इंटरकोस्टल मांसपेशी, पेट की मांसपेशियां और कभीकभी गरदन की मांसपेशी भी सांस लेने में सहायता करती हैं.

डायफ्राम मांसपेशी फेफड़ों के नीचे स्थित होती है और इस का ऊपरी भाग गुंबदाकार होता है. जब डायफ्राम संकुचित होती है तो यह नीचे चली जाती है जिस के कारण छाती की गुहा बढ़ जाती है और वह फेफड़ों की फैलने की क्षमता को बेहतर बनाती है.

जैसेजैसे जगह बढ़ती है वैसेवैसे ही छाती की गुहा में दबाव कम होता जाता है जिस के परिणामस्वरूप वायु मुंह या नाक के माध्यम से फेफड़ों में आने में सक्षम हो जाती है. जब डायफ्राम अपनी आराम स्थिति में वापस आती है और इस की मांसपेशियां शिथिल होती हैं तब फेफड़ों की क्षमता कम हो जाती है. जिस के कारण छाती की गुहा में दबाव बढ़ जाता है और फेफड़े वायु को बाहर छोड़ते हैं.

मुंह या नाक में प्रवेश करने के बाद वायु ट्रेकिआ, जिसे आमतौर पर श्वासनली भी कहते हैं, से हो कर गुजरती है. इस के बाद यह कैरिना नामक स्थान में पहुंचती है. कैरिना में श्वासनली 2 भागों में विभाजित हो जाती है जिस से 2 मुख्य स्टेम ब्रांकाई बन जाती हैं. उन में से एक दाईं ओर दूसरी बाईं ओर जाती है.

पाइप की आकार की ब्रांकाई पहले छोटे ब्रांकाई में विभाजित होती है और फिर वृक्ष की शाखाओं की तरह और भी छोटी ब्रोंकिओल में विभाजित हो जाती है. यह श्वासनलिका लगातार छोटी होती जाती है और अंत में एल्विओली नामक छोटी वायु थैलियों में समाप्त होती है, जहां गैस का विनिमय होता है.

औक्सीजन की कमी का लंग्स पर प्रभाव

कोविड संक्रमण के दौरान औक्सीजन की महत्ता लोगों की सम?ा में आ गई. इस की वजह यह थी कि कोरोना वायरस का संक्रमण सीधे फेफड़ों पर असर करता था, जिस से कुछ मरीजों में औक्सीजन लैवल कम होने लगता था. औक्सीजन की कमी ने कुछ मरीजों के दिल पर भी असर डाला, जिस का प्रभाव उन के जीवन पर पड़ा. फेफड़ों के खराब होने पर पूरी तरह सांस लेने में दिक्कत होने लगती है. सांस फूलने लगती है. लंबी सांस लेने पर खांसी आने लगती है. कई बार सांस लेने में दर्द महसूस होता है. सांस लेते समय चक्कर आता है. अगर शरीर में औक्सीजन के लैवल में गिरावट नहीं है तो दिल और फेफड़े दोनों को ही सेहतमंद माना जाता है.

लंग्स को मजबूत करने के लिए ऐक्सरसाइज करना बेहद जरूरी होता है. इस के लिए ‘ब्रीथ होल्ंिडग ऐक्सरसाइज’ कर सकते हैं. इस में पहले सांस मुंह में भर लें और फिर रोकें. अगर आप 25 सैकंड तक सांस रोकने में सफल रहते हैं तो आप के फेफड़े सेहतमंद हैं. इसे कम से कम 6 महीने तक करने से लंग्स को लाभ होगा.

फेफड़े बैलून की तरह होते हैं. कई बार जब हम सांस लेते हैं, फेफड़ों के बाहरी हिस्से तक सांस नहीं पहुंचती. लेकिन जब हम इस तरह की ऐक्सरसाइज करते हैं तो उन हिस्सों में भी औक्सीजन जाती है. वे खुल जाते हैं, सिकुड़ते नहीं हैं. लंग्स को मजबूत करने के लिए ब्रीदिंग ऐक्सरसाइज करनी चाहिए. रोजाना भाप लेने, गरारे करने और मास्क पहने रखने से फेफड़ों को सेहतमंद रखा जा सकता है. साथ ही, खाने में मिर्च और मसालों का सेवन कम करना भी आप के फेफड़ों के लिए अच्छा है.

लंग्स पर धुएं का असर

लंग्स पर धुएं का प्रभाव पड़ता है. यही कारण है कि जब पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में धान के किसानों द्वारा पराली जलाई जाती है तो दिल्ली तक इस का असर होता है. दिल्ली में वायु प्रदूषण बढ़ जाता है, जिस से सांस की बीमारियों के साथ ही साथ शरीर में औक्सीजन का लैवल कम होने लगता है.

सरकार से ले कर कोर्ट तक इस की चिंता करने लगते हैं. इस से बचने के लिए धुएं को खत्म करने को नकली बरसात तक करानी पड़ती है. टीबी यानी क्षय रोग का भी सब से बड़ा कारण धुआं होता है. पहले गांवों में लकड़ी और कंडों को जला कर खाना बनाया जाता था जिस का प्रभाव औरतों की सेहत पर पड़ता था. उन की आंखें और फेफड़े दोनों खराब होते थे. उन की उम्र कम हो जाती थी. वे कम उम्र में ही बूढ़ी नजर आने लगती थीं.

धुएं में छोड़े गए रसायनों, जैसे हाइड्रोजन क्लोराइड, फौस्जीन, सल्फर डाइऔक्साइड, विषाक्त एल्डिहाइड रसायन और अमोनिया आदि खतरनाक कैमिकल पाए जाते हैं. सांस लेने की प्रक्रिया में ये फेफड़ों यानी लंग्स के अंदर पहुंच जाते हैं. ये फेफड़ों में जमने लगते हैं, जिस से फेफड़ों में सूजन आ जाती है और फेफड़े बीमार हो कर अपना काम सही तरह से नहीं कर पाते. फेफड़ों की ओर जाने वाले छोटे वायुमार्ग संकरे हो जाते हैं, जिस से वायुप्रवाह में और रुकावट आती है. सांस लेने में दिक्कत के साथ ही साथ औक्सीजन कम मात्रा में पहुंचने लगती है, जिस का प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ता है.

धूल, धुआं और धूम्रपान का प्रभाव लंग्स पर पड़ता है. इस संबंध में जागरूकता के लिए हर साल 12 नवंबर को विश्व निमोनिया दिवस मनाया जाता है. धूल, धुआं और धूम्रपान के प्रभाव से लंग्स को निमोनिया नामक बीमारी हो जाती है. इस कारण ही इस से बचने की सलाह दी जाती है. धूल, धुआं और धूम्रपान वायु प्रदूषण के प्रमुख कारण होते हैं. वायु प्रदूषण के कारण लंग्स की बीमारियां बढ़ रही हैं.

जो महिलाएं या पुरुष धूम्रपान करते हैं उन का असर उन के साथ ही साथ उन के बच्चों पर भी पड़ता है. बच्चों में दमा, निमोनिया, ब्रोंकाइटिस एवं फेफड़े के संक्रमण होने का खतरा अधिक होता है. इसलिए घरों में धूमपान न करने की सलाह दी जाती है. निमोनिया के कारण फेफड़ों में इन्फैक्शन हो जाता है. फेफड़ों में सूजन आ जाती है. कई बार पानी भर जाता है. धूल, धुआं और धूम्रपान का असर सभी पर पड़ता है. यही कारण है कि जब हम इस तरह की जगहों पर जाते हैं तो सांस लेने में दिक्कत होने लगती है. जहां वायु प्रदूषण कम होता है वहां के लोग अधिक स्वस्थ होते हैं.

मेरे पति को मेरा मायके जाना पसंद नहीं हैं, अब आप ही बताइएं कि मैं उन्हें कैसे मनाऊं ?

सवाल

मेरे पति बिलकुल भी सोशल नहीं हैं. वे यह तो चाहते हैं कि मैं उन की तरफ के हर रिश्ते को निभाऊं, उन की मां की दिनरात सेवा करूं. लेकिन अब जब मेरी मां बीमार हुईं तो उन्होंने साफ कह दिया कि मुझे आएदिन तुम्हारा मायके जाना पसंद नहीं और अब तुम्हें उस घर के लिए चिंतित होने की ज्यादा जरूरत भी नहीं है. उन की इस बात ने मुझे अंदर तक तोड़ दिया है?

जवाब

शादी का यह मतलब नहीं कि मायके से बिलकुल ही ताल्लुक खत्म कर दिए जाएं, बल्कि यह है कि दोनों तरफ रिश्तों के बीच सामंजस्य बनाए रखना है.

आप को उन्हें यह बात समझानी होगी कि जैसे उन की मां है वैसे ही आप की भी मां है. ऐसे वक्त उन्हें भी अपनों की, अपनों के साथ की जरूरत है. और जब आप उन के परिवार की तनमन से सेवा कर रही हैं तो आप भी यही उम्मीद रखती हैं. अगर फिर भी वे आप को मना करें तो उन्हें बताएं कि ऐसी परिस्थिति में कोई अपनी मां को अकेले नहीं छोड़ सकता और मैं भी नहीं.

आप के इस फैसले से उन्हें समझ आ जाएगा कि उन की दादागीरी आप के सामने नहीं चल सकती. इस से आप को अपनी मां की सेवा करने का मौका मिल जाएगा.

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क्या महिलाओं ने भाजपा को ज्यादा वोट किया और किया तो क्यों किया ?

खासतौर से मध्य प्रदेश , राजस्थान और छत्तीसगढ़ के बारे में दावा किया जा रहा है कि भाजपा के पक्ष में महिलाओं ने बढ़चढ़ कर मतदान किया. तकरीबन 50 फीसदी महिलाओं के वोट भाजपा को मिले. हालांकि इस अनुमान को वास्तविक कहने न कहने की कोई प्रमाणिक वजह नहीं है. विभिन्न एजेसियां ऐसे आंकड़े जारी किया करती हैं लेकिन बात हैरानी की इस लिहाज से है कि साल 1980 तक भाजपा महिलाओं की तरफ कोई खास ध्यान नही देती थी.

इस की इकलौती वजह यह थी कि हिंदू राष्ट्र के उस के एजेंडे में महिलाओं की कोई भूमिका ही नहीं समझी जाती थी. आजादी के बाद से ही तमाम हिंदूवादी दल मसलन रामराज्य परिषद हिंदू महासभा और जनसंघ धर्म आधारित राजनीति करते रहे थे, वही आज की भाजपा दूसरे तरीके से ही सही कर रही है. लेकिन फर्क है ,जो अस्सी के दशक के बाद से आना शुरू हुआ था. भाजपा के पहले की हिंदूवादी राजनीतिक पार्टियां केवल पुरुषों तक सिमटी थीं. भाजपा ने इस कमी को समझा और 1980 में महिला प्रकोष्ठ का गठन किया.

यह इंदिरा गांधी का दौर था जिन के महिला होने के नाते कांग्रेस की स्वाभाविक दावेदारी महिला वोटों पर बनती थी. इंदिरा गांधी न केवल सवर्ण बल्कि पिछड़ी, दलित अल्पसंख्यक और आदिवासी महिलाओं में भी भारी लोकप्रिय थीं. उन की सभाओं में महिलाओं का उमड़ता हुजूम एक अलग आकर्षण पैदा करता था, जिस का तोड़ निकालने के लिए भाजपा ने कई प्रयोग किए लेकिन कोई भी सफल नहीं हो पाया. तब भाजपा के पास इकलौता बड़ा चेहरा ग्वालियर घराने की राजमाता विजयाराजे सिंधिया का हुआ करता था लेकिन लोकप्रियता और स्वीकार्यता के मामले में वह इंदिरा गांधी से बहुत पीछें रहीं. दक्षिण और पूर्वोत्तर भारत में तो कोई उन्हें जानता तक नही था.

धर्म ने दी पहचान और आकर्षण

महिला प्रकोष्ठ के गठन का भी कोई फायदा भाजपा को नहीं हुआ क्योंकि अभी भी उस पर पितृसत्तात्मक होने और ब्राह्मणों और बनियों की पार्टी होने का ठप्पा लगा था और अविवाहितों वाला उस का पितृ संगठन आरएसएस भी अपनी यह पहचान बदलने के लिए कतई उत्सुक नहीं था. कमोबेश स्थिति आज भी नहीं है क्योंकि महिलाओं को शूद्रों की तरह किसी भी तरह के अधिकार या बराबरी का दर्जा देना सनातन धर्म के मूलभूत सिद्धांतों से मेल नही खाता.

सत्ता के जरिए हिंदू राष्ट्र भी बन जाए और मनुवादी मानसिकता पर भी चलते रहा जाए, ये दोनों काम सामानांतर होना कोई आसान काम नहीं था . देश का माहौल 80 के दशक तक काफी बदल चुका था . महिलाएं तेजी से शिक्षित जागरूक और नौकरीपेशा हो रहीं थीं लेकिन एक और सुखद बाद यह थी कि वे वोट भी उत्साहपूर्वक करने लगी थीं पर दिक्कत यह थी कि भाजपा उन की प्राथमिकता नही होती थी.

इत्तफाक से इसी वक्त में दो धाकड़ नेत्रियों की भाजपा में एंट्री हुई ये थीं सुषमा स्वराज और उमा भारती. सुषमा स्वराज की इमेज शुद्ध भारतीय हिंदू गृहिणी की थी. वे माथे पर बड़ी बिंदी लगाती थी, मांग में सिंदूर भरती थीं. इंदिरा गांधी के सामने तो वे भी कहीं ठहरती थीं लेकिन उन्हीं की तरह आधुनिकता और परंपरा का मिश्रण उन में था. विधायक बनने से ले कर सांसद और फिर दिल्ली की मुख्यमंत्री और इस के बाद मोदी मंत्रिमंडल में मजबूती से जम जाने के सफर में न्यूज चैनल्स पर करवा चौथ के उन के व्रत और पूजापाठों ने सवर्ण महिलाओं का उन की तरह झुकाव बढ़ाया.

उलट इस के उमा भारती बुंदेलखंड के देहाती इलाके से थीं. वे भागवत बांचती थीं और कट्टर हिंदुत्व की बातें करती थीं. एक धक्का और दो बाबरी मसजिद तोड़ तो का भड़काऊ नारा बुलंद करने वाली और अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाने वालों में से एक इस तेजतर्रार साध्वी को भी केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह मिली और 2003 में मध्य प्रदेश की कांग्रेसी सत्ता भी उन्होंने दिग्विजय सिंह से छीन कर भाजपा को दिलाई एवज में उन्हें मुख्यमंत्री भी बनाया गया.

इसी दौरान एक और हिंदूवादी और पूर्णकालिक हिंदुत्व की छवि वाली साध्वी ऋतंभरा भी अप्रत्यक्ष रूप से राम मंदिर निर्माण आंदोलन के जरिए भाजपा से जुड़ी वे भी उमा की तरह उत्तेजक और भड़काऊ भाषण देने के लिए कुख्यात थीं.

इन तीनों की धार्मिक इमेज से महिलाएं भाजपा और उस के हिंदुत्व की तरफ आकर्षित हुईं तो यह सिलसिला अभी तक बरक़रार है. इसी दौरान भाजपा ने पिछड़ी दलित महिलाओं को अहमियत देना शुरू की जिस के चलते उसे 2014 और 2019 में हाहाकारी कामयाबी मिली. केंद्र में उस ने मजबूती से पैर जमाए और अपनी कल्याणकारी योजनाओं के जरिए उन्हें लुभाए और पार्टी से जोड़े रखा.

लेकिन महिला पूजापाठी बनी रही

लेकिन इस का यह मतलब नहीं कि महिला सामाजिक या वैचारिक रूप से स्वतंत्र हो गई उलटे वह पहले से और तेजी से धार्मिक और पूजापाठी होती गई. यही भाजपा चाहती थी कि आधी आबादी के ये वोट ज्यादा से ज्यादा तादाद में उसे मिलते रहें. महिलाओं ने भी उस हिंदुत्व के एजेंडे को आत्मसात कर लिया जो उसे दोयम दर्जे की करार देता है. पुरुषों को भी यह मनमाफिक लगा क्योंकि धार्मिक महिला ज्यादा चूंचपड़ नहीं करती. वह पूरी जिम्मेदारी और समर्पण से बच्चे और घरगृहस्थी संभालती है और कलश यात्राओं में भी धार्मिक आयोजनों की शोभा बढ़ाती है.

इस वोट बैंक को कायम रखने नरेंद्र मोदी ने शौचालय और रसोई वाली योजनाएं शुरू करते महिलाओं को आश्वासन दिया कि यह सब उन के लिए खासतौर से किया जा रहा है. हर योजना का बखान उन्होंने बतौर एहसान महिलाओं पर थोपा कि अब वे सुरक्षित हैं, स्वाभिमानी हैं और पहले से बेहतर जिंदगी जी रही हैं.

कोई कल्याणकारी योजना कभी सौ तो क्या 25 फीसदी भी अमल में नहीं आ पाती. लेकिन इन का ढिंढोरा कुछ इस तरह पीटा जाता रहा कि इन्हीं की बदौलत औरतों की जिंदगी में क्रांति और बदलाव आ रहे हैं, जनधन योजना में बैंक खाते खुलने से महिलाओं को खुद के आर्थिक अस्तित्व का एहसास हुआ अब यह और बात है कि इन खातों में फूटी कौड़ी भी सरकार ने जमा नहीं की. हां, कल्याणकारी योजनाओ का पैसा जरुर इन में आता है जिस से औरतों को लगता है कि वे अथाह दौलत की मालकिन हो गई हैं.

मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की लाड़ली बहिना योजना के चलते बिलाशक भाजपा को उम्मीद से ज्यादा वोट और सीटें मिलीं लेकिन यह सोचने और पूछने वाला कोई नहीं कि इस से महिलाओं की सामाजिक और आर्थिक हैसियत कितनी सुधरी. शिवराज सिंह 40 रुपए रोज दे कर ये काल्पनिक दावे और सपने देहाती अंदाज में महिलाओं को दिखाते रहते हैं कि अब उन्हें पैसों के लिए पति सास या पिता का मुंह नहीं ताकना पड़ता.

अब महिलाओं को लखपति बनाने की योजना गढ़ रहे हैं लेकिन यह नहीं कह पा रहे कि मैं अपनी बहनों को स्थायी रोजगार दूंगा उन के होने वाले अपराध कम करने कोशिश करूंगा वे ऐसा कह और कर भी नहीं सकते क्योंकि मध्य प्रदेश महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों में 2003 से ही अव्वल 5 राज्यों में से एक है. यानी उन के मुख्यमंत्री रहते महिलाओं की जिंदगी ज्यादा मुश्किल और दुश्वार हुई है जिसे लाड़ली बहिना के चादर से ढकने में तो हालफ़िलहाल वे और भाजपा कामयाब हो गए हैं लेकिन कबतक ?

यह सवाल अब खुद लाड़ली बहनाएं करने लगी हैं. भाजपा ने धर्म और पूजापाठ को उस तबके का भी हिस्सा बना दिया है जो सुबह से शाम तक होड़तोड़ मेहनत कर पेट भर पाता है. गरीब दलित बस्तियों में अब दुर्गा और गणेश की झांकिया लगने लगी हैं, भंडारे होने लगे हैं और तो और राम कथाएं तक होने लगी हैं जिन में कथावाचक लोकल ब्राह्मण या उन्हीं की जाति का हिमालय से अवतरित कोई सन्यासी होता है. इन आयोजनों में गरीब दलित तबीयत से पैसा फूंकते हैं.इन में महिलाओं की भागीदारी और उत्साह देखते ही बनता है लेकिन सियासी तौर पर कांग्रेस इस की चिंता नहीं कर रही जो उस की जिम्मेदारी होना चाहिए. यह नहीं यह उस के शीर्ष नेताओं को गंभीरता से सोचना ही पड़ेगा.

इसी धार्मिक दिखावे और आडंबरों से कांग्रेस कैसे मात खा रही है. इस की एक मिसाल भोपाल की दक्षिण पश्चिम सीट है जहां से उस के वजनदार नेता पीसी शर्मा भाजपा के भगवान दास सबनानी से अप्रत्याशित रूप से हारे. असल में कांग्रेसी उम्मीदवार भी पूरे वक्त कुछ करने के नाम पर धार्मिक आयोजनों में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते रहे और यह मान बैठे कि अब तो लोग उन्हें वोट देंगे ही.

असल में तीनों राज्यों में यही हुआ कि कांग्रेस आम लोगों की बुनियादी परेशानियों बेरोजगारी महंगाई और भ्रष्टाचार पर फोकस न कर गरीब बस्तियों में भाजपाइयों की तरह सुंदर काण्ड, कथाएं और भंडारे करतीकराती रही. कमलनाथ और भूपेश बघेल ने ऐसा ज्यादा किया इसलिए मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की दुर्गति हद से ज्यादा हुई. राजस्थान में अशोक गहलोत ने इन दोनों से कम किया इसलिए वहां कांग्रेस की दुर्गति अपेक्षाकृत कम हुई.

कांग्रेस इन तीनों राज्यों में महिलाओं से वह भावनात्मक लगाव और संवाद पैदा नहीं कर पाई जो कि भाजपा ने कर डाला. इस की बड़ी वजह उस का भी धर्म का दिखावा रहा जब महिलाओं को यह समझ आ ही गया कि हम हमें तो ऐसे ही रहना है जैसे हम रह रहे हैं तो वोट उस पार्टी को क्यों न करें जो धर्म के नाम पर ज्यादा पाखंड और दिखावा करती है. हमारी बेटियों को लव जिहाद से बचाने भगवा गमछाधारी युवा दावा तो करते हैं लेकिन इन से बेटियों को कौन बचाएगा यह महिलाएं अभी नहीं सोच पा रही हैं और जब तक सोचेंगी तब तक नर्मदा गंगा का पानी सिर से उपर होगा.

यह सिर्फ कहने भर की बात नहीं है बल्कि दुनिया भर में पाकिस्तान व अफगानिस्तान और कई यूरोपीय देशों के उदाहरण हैं जहां धार्मिक लोगों का शासन है और वहीँ महिलाएं दासियों और गुलामों सरीखी जिंदगी जीने के लिए मजबूर हैं.

कांग्रेस को भारी पड़ा ‘दोस्ती में दगा’

राजनीति में धारणा का सब से बड़ा महत्त्व होता है. कई बार चुनाव मैदान में इस धारणा से ही माहौल बदल जाता है. राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ ने पूरे देश में एक धारणा को स्थापित होने में मदद की कि मोदी से राहुल ही लड़ सकते हैं. इस के बाद ही भाजपा के खिलाफ लामबंद हो रहे विपक्ष को एक दिशा मिल गई. वह कांग्रेस की अगुवाई में आगे बढ़ने लगे. कांग्रेस ने भारत जोड़ो यात्रा का अगला कदम ‘इंडिया गठबंधन’ के रूप में तैयार किया. यह गठबंधन एक सार्थक दिशा में बढ़ने लगा था. कई विरोधी विचारधारा के दल अपने विरोध को छोड़ कर मोदी को सत्ता से हटाने के लिए एक मंच जुट गए थे.

इंडिया गठबंधन इस बात के लिए भी करीबकरीब सहमत था कि कांग्रेस की अगुवाई में वह आगे बढ़ेंगे. राहुल गांधी को ले कर भी कोई विरोध नहीं रह गया था. लालू यादव ने इंडिया गठबंधन की मीटिंग में यह कह भी दिया था कि ‘हमारे दूल्हा राहुल गांधी है. हम सब बाराती हैं.’ इसी बीच नवंबर माह में 5 राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, तेलंगाना और मिजोरम के विधानसभा चुनाव आ गए. इन चुनावों में इंडिया गठबंधन को साथ मिल कर चुनाव लड़ना था. लेकिन इस की नीति नहीं बन सकी.

साथियों से दगा

कांग्रेस के क्षेत्रीय नेता इंडिया गठबंधन का विरोध कर रहे थे. कांग्रेस अपने क्षेत्रीय नेताओं को समझाने में सफल नहीं हो रही थी. इंडिया गठबंधन की एक मीटिंग भोपाल में प्रस्तावित थी. राहुल गांधी चाहते थे कि भोपाल में यह मीटिंग हो जिस से मध्य प्रदेश के चुनावी माहौल को गर्मी दी जा सके. यह बात मध्य प्रदेश में कांग्रेस के नेता कमलनाथ को पसंद नहीं थी. कमलनाथ का तर्क यह था कि इंडिया गठबंधन में शामिल कई दल हिंदू धर्म को ले कर उल्टे सीधे बयान दे रहे हैं. ऐसे में अगर मीटिंग के बाद पत्रकारों के सवाल जवाब या अपने से किसी ने कुछ बोल दिया तो मध्य प्रदेश का चुनावी माहौल खराब हो जाएगा.

कमलनाथ ने कांग्रेस हाई कमान को यह समझाया था कि वह हिंदुत्व का विरोध नहीं कर सकते थे. कांग्रेस ने कर्नाटक चुनाव में हनुमान के मंदिर बनवाने की बात कर के चुनाव जीत लिया था तो उसे कमलनाथ की बात समझ आ गई. इस के बाद इंडिया गठबंधन की भोपाल मीटिंग टाल दी गई.

जब सवाल इस बात का हुआ कि विधानसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन एक साथ मिल कर चुनाव लडेगा तो कांग्रेस ने कोई साफ नीति नहीं बनाई. मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव लड़ने की बात समाजवादी पार्टी ने की. कांग्रेस के साथ समाजवादी पार्टी की बात भी हुई. समाजवादी पार्टी 6-7 सीटों की मांग मध्य प्रदेश में कर रही थी.

कांग्रेस का अति आत्मविश्वास

हाई कमान स्तर पर यह बात तय हो गई कि समाजवादी पार्टी के साथ मध्य प्रदेश में चुनावी तालमेल करना है. इस तालमेल का जिम्मा कमलनाथ और दिग्विजय सिंह को सौंप दिया गया. यह लोग सपा प्रमुख अखिलेश यादव से बात कर रहे थे. कमलनाथ मध्य प्रदेश में कांग्रेस के प्रस्तावित मुख्यमंत्री थे, उन को लग रहा था कि मध्य प्रदेश में सपा का कोई वोट नहीं है.
ऐसे में उन को 6-7 सीटें देना नुकसानदायक हो सकता है. सपा सीटें जीत नहीं पाएगी. कांग्रेस का नुकसान होगा. उन के सामने बिहार का उदाहरण था जहां राजद के साथ गठबंधन में कांग्रेस ने ज्यादा सीटें मांग ली चुनाव जीत नहीं पाई जिस से राजद को बहुमत से कम सीटों पर सिमटना पड़ा.

कांग्रेस ने सपा से सीटें देने की बात तो कहीं पर एक भी सीट नहीं दी. इस से खफा समाजवादी पार्टी ने मध्य प्रदेश में 70 विधानसभा सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े कर दिए. चुनाव प्रचार में दोनों ही दलों के बीच जुबानी जंग भी हुई. इस से इंडिया गठबंधन की साख पर सवाल खड़े हो गए. कांग्रेस इस भुलावे में रही कि वह मध्य प्रदेश जीत रही है. इसलिए उस ने केवल सपा का ही निरादर नहीं किया, बहुजन समाज पार्टी के साथ भी कोई तालमेल नहीं कर पाई.

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बसपा ने गोंड़वाना गणतंत्र पार्टी यानि जीजीपी से गठबंधन किया. इस के तहत बसपा ने 178 और जीजीपी ने 52 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे. इसी तरह से छत्तीसगढ़ में बसपा ने 53 और जीजीपी ने 37 सीटों पर चुनाव लड़ा. पिछले चुनावों में बसपा ने दोनों ही राज्यों में 2-2 सीटें जीती थीं, इस चुनाव में एक भी सीट हासिल नहीं हुई.

अगर कांग्रेस इन विरोधी दलों से तालमेल किया होता तो भाजपा के साथ मुकाबला हो सकता था. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ दोनों में ही कांग्रेस को अति आत्मविश्वास था. इसलिए उस ने किसी दल से तालमेल की जरूरत नहीं समझी और उस की सत्ता डूब गई.

राजस्थान में भी कांग्रेस ने बसपा और लोकदल को तबज्जो नहीं दिया. वहां जादूगर अशोक गहलोत अपने ही साथी सचिन पायलेट के साथ पूरे कार्यकाल लड़ते नजर आए. जिस से जनता को यकीन हो गया कि अशोक गहलोत सही तरह से राज चलाने की हालत में नहीं है. कभी वह हाई कमान से लड़ रहे थे तो कभी सचिन पायलेट से.

उन की जादू वाली झप्पी जनता को रास नहीं आई. कांग्रेस यहां भी इंडिया गठबंधन को साथ ले कर नहीं चल पाई, जिस का खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा. राजस्थान में कांग्रेस को 1 करोड़ 56 लाख 66 हजार और भाजपा को 1 करोड़ 65 लाख 23 हजार के करीब वोट मिले. अगर कांग्रेस की नीति साफ और संगठन में झगड़े नहीं होते तो जादूगर का जादू काम कर जाता.

विचारों से समझौता

राजनीति में विचारों का अपना महत्व होता है. कांग्रेस में हिंदूवादी विचारों के नेता पहले भी थे. 1948 में फैजाबाद सीट पर उपचुनाव हो रहा था. सोशलिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के बतौर आचार्य नरेंद्र देव उपचुनाव लड़ रहे थे. कांग्रेस ने बाबा राघव दास नामक साधु को अपना उम्मीदवार बनाया. वह मूलतः पुणे महाराष्ट्र के रहने वाले थे. कांग्रेस ने आचार्य नरेंद्र देव को नास्तिक बताया. पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी चुनाव प्रचार में आचार्य की नास्तिकता का सवाल उठाया. बाबा राघवदास ने स्वयं घरघर जा कर तुलसी की माला बांटी. वह धर्म के नाम पर चुनाव भी जीत गए.

आजाद भारत में धर्मनिरपेक्षता पर कट्टर हिंदुत्व की यह पहली जीत थी. इस जीत के बाद ही 1949 में बाबरी मस्जिद में रामलला प्रकट हुए. असल में कांग्रेस में कई नेता ऐसे थे जो ब्राहमणवाद के समर्थक थे. इन में महात्मा गांधी और राजेंद्र प्रसाद जैसे लोग भी थे. उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पंत के विचार अयोध्या विवाद मसले में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से अलग थे. पंत धार्मिक विचार वाले नेता थे और नेहरू धर्म की राजनीति के खिलाफ थे.

1949 में 22 और 23 दिसंबर की आधी रात मस्जिद के अंदर कथित तौर पर चोरी छिपे रामलला की मूर्तियां रख दी गईं. अयोध्या में शोर मच गया कि जन्मभूमि में भगवान प्रकट हुए हैं. मौके पर तैनात कांस्टेबल के हवाले से लिब्राहन आयोग की रिपोर्ट में लिखा गया है कि इस घटना की सूचना कांस्टेबल माता प्रसाद ने थाना इंचार्ज राम दुबे को दी. ‘50-60 लोगों का एक समूह परिसर का ताला तोड़ कर, दीवारों और सीढ़ियों को फांद कर अंदर घुस आए और श्रीराम की प्रतिमा स्थापित कर दी. साथ ही उन्होंने पीले और गेरुआ रंग में श्रीराम लिख दिया.’

इस के बाद अयोध्या में मंदिर मस्जिद की राजनीति शुरू हो गई. अयोध्या का राम मंदिर मुददा बन चुका था. ‘युद्ध में अयोध्या’ किताब में लेखक पत्रकार हेमंत शर्मा ने मूर्ति रखने के विवाद पर लिखा है कि केरल के अलप्पी के रहने वाले के के नायर 1930 बैच के आईसीएस अफसर थे. फैजाबाद के जिलाधिकारी रहते इन्हीं के कार्यकाल में बाबरी ढांचे में मूर्तियां रखी गईं. बाबरी मामले से जुड़े वह ऐसे व्यक्ति हैं जिन के कार्यकाल में इस मामले में सब से बड़ा टर्निंग प्वाइंट आया.

नायर 1 जून 1949 को फैजाबाद के कलैक्टर बने. 23 दिसंबर 1949 को जब भगवान राम की मूर्तियां मस्जिद में स्थापित हुईं तो तब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत से फौरन मूर्तियां हटवाने को कहा. उत्तर प्रदेश सरकार ने मूर्तियां हटवाने का आदेश भी दिया. जिला मजिस्ट्रेट नायर इस के लिए तैयार नहीं थे. उन्होने दंगों और हिंदुओं की भावनाओं के भड़कने के ड़र से इस आदेश को पूरा करने में असमर्थता जताई.

इस के बाद नेहरू ने दोबारा मूर्तियां हटाने को कहा तो केके नायर ने सरकार को लिखा कि मूर्तियां हटाने से पहले मुझे हटाया जाए. देश के सांप्रदायिक माहौल को देखते हुए सरकार पीछे हट गई. इस पूरे विवाद में कांग्रेस की नीति आजादी के बाद से ही मंदिर समर्थक की रही. विभाजन की त्रासदी के बाद देश में जो सांप्रदायिक हालात थे उस के आगे तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने घुटने टेके. मूर्तियों की पूजा-अर्चना शुरू हुई. इंदिरा गांधी और राजीव गांधी भी धर्म के नाम पर झुकते रहे. अयोध्या में ताला खुलवाने और शिलान्यास में राजीव गांधी की धर्म के प्रति स्पष्ठ नीति सामने नहीं रही. कांग्रेस का सौफ्ट हिंदुत्व उस की नीतियों पर भारी पड़ने लगा.

न राम काम आए न हनुमान

कर्नाटक चुनाव में जब हनुमान का नाम ले कर कांग्रेस को जीत हासिल हुई तो पूरी कांग्रेस हनुमान के रंग में रंग कई. मध्य प्रदेश में कमलनाथ ने इंडिया गठबंधन की मीटिंग इसलिए नहीं होने दी कि कहीं धर्म के विरोध में कोई बयान न मुददा बन जाए जिस से उन की बनी हुई हवा खराब हो जाए. मध्य प्रदेश से भी अधिक भरोसे में छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल थे. उन की सरकार ने राम के नाम पर राम वन गमन मार्ग बनवाया था. इस के नाम पर कई बड़े आयोजन कराए थे. उन को लग रहा था जब हिंदुत्व और धर्म के नाम पर वोट मिल रहे हैं तो फिर वह तो सब से बड़े राम के पुजारी है.

एक तरफ छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल को राम के नाम पर भरोसा था तो दूसरी तरफ कमलनाथ को हनुमान पर पूरा भरोसा था. कांग्रेस की मजबूरी यह थी कि वह जिस भाजपा के साथ धर्म की राजनीति पर आमनेसामने दोदो हाथ कर रही थी वह धर्म के सब से ताकतवर खिलाड़ी थी. कांग्रेस ने न केवल अपने इंडिया गठबंधन के साथियों के साथ दगा किया बल्कि जो चुनावी मुददे वहां इंडिया गठबंधन के थे उन को भी छोड़ कर सौफ्ट हिंदुत्व की राह पकड़ी. मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सौफ्ट हिंदुत्व बनाम हार्ड हिंदुत्व की दो पाटन की चक्की के बीच फंस गई. ऐसे में उस का साबुत बचना संभव नहीं था वह दोनों प्रदेश हार गई.

देखा जाए तो कांग्रेस और भाजपा के बीच वोट प्रतिशत में बहुत अंतर नहीं रहा है. मध्य प्रदेश में कांग्रेस को 1 करोड़ 75 लाख 64 हजार वोट मिले जबकि सरकार बनाने वाली भाजपा को 2 करोड़ 11 लाख 13 हजार वोट मिले. इसी तरह छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को 66 लाख 2 हजार 588 वोट मिले और भाजपा को 72 लाख 34 हजार 968 वोट मिले.

अगर जनता में साफ संदेश गया होता तो कांग्रेस के लिए सत्ता हासिल करना कठिन नहीं था. साफ राजनीतिक विचार न होने के कारण कांग्रेस को भाजपा की बी टीम मान कर जनता ने ए टीम को ही चुन लिया. 3 राज्यों की हार से इंडिया गठबंधन में कांग्रेस की ताकत घटी है.
इस के बाद भी कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जो टूटे दिलों को जोड़ कर भाजपा के खिलाफ 2024 के लोकसभा चुनाव में एक विकल्प दे सकती है. उस के पहले उसे अपने साथियों को जादू की एक झप्पी देनी होगी.

अच्छी बात यह है कि क्षेत्रीय दलों का झगड़ा कांग्रेस के हाई कमान से नहीं है. ऐसे में घाव भरना सरल होगा. क्षेत्रीय दलों की लड़ाई कांग्रेस के प्रदेश स्तर के नेताओं तक ही सीमित है. कांग्रेस हाई कमान को इंडिया गठबंधन को ले कर जल्द सक्रिय होना पड़ेगा और बड़ा दिल दिखाते हुए सब को साथ ले कर चलने और लोकसभा की सीटों के बटवारे पर काम करना होगा. आपसी मतभेद दूर करने होंगे क्योंकि टूटे मन से कोई लड़ाई नहीं जीती जा सकती है.

लंग्स की बीमारियां : झाड़फूंक के चक्कर में न पड़ें

सांस की बीमारियों में मरीज को कई बार चक्कर आ जाते हैं. ऐसे में कुछ लोग इस को भूतप्रेत व झड़फूंक से जोड़ कर इस का इलाज शुरू कर देते हैं. इस से बचना चाहिए. श्वास की बीमारी का कारण फेफड़े भी हो सकते हैं. ऐसे में पहले यह समझ लें कि फेफड़े यानी लंग्स किस तरह से बीमार होते हैं और उन का क्या इलाज है. अगर झड़फूंक से इस का इलाज करेंगे तो नुकसान हो सकता है, जिस का प्रभाव मरीज के जीवन पर पड़ता है.

डाक्टर शिवम त्रिपाठी कहते हैं, ‘‘जब लंग्स और हार्ट हैल्दी होते हैं तो उन का प्रभाव पूरे शरीर पर पड़ता है. शरीर स्वस्थ होता है तो कार्यक्षमता बढ़ती है और काम करने में मन लगता है. लंग्स की बीमारियों के बारे में लोगों को कम जानकारी होती है.’’

कोई भी असामान्य स्थिति या बीमारी जो फेफड़ों को ठीक से काम करने से रोकती है उसे फेफड़े की बीमारी कहा जाता है. फेफड़ों की बीमारी में कई प्रकार की बीमारियां शामिल हैं जो फेफड़ों की सामान्य रूप से कार्य करने की क्षमता को खराब कर देती हैं. इन में बैक्टीरिया, वायरल और फंगल संक्रमण सहित फेफड़ों के संक्रमण विभिन्न प्रकार की बीमारियों का कारण बनते हैं. फेफड़ों की अन्य बीमारियों में अस्थमा, मेसोथेलियोमा और फेफड़ों का कैंसर शामिल हैं.

फेफड़ों की बीमारियां 3 कारणों से फैलती हैं. वायु प्रदूषण इन में सब से प्रमुख है. इस के कारण फेफड़ों से सांस अंदर लेना और छोड़ना मुश्किल हो जाता है. दूसरा, फेफड़ों के संक्रमण के कारण सांस लेने वाली नली प्रभावित होती है. लंबे समय तक सीने में दर्द, अत्यधिक बलगम बनना, घबराहट, लगातार खांसी, सूजन या दर्द, लगातार थकावट महसूस होना, खांसी के साथ खून आना, सांस लेने में तकलीफ, वजन कम होना और लगातार सांस में संक्रमण फेफड़ों की कमजोरी की निशानी है.

इस से अस्थमा, क्रौनिक औब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) और ब्रोंकाइटिस की संभावनाएं बढ़ जाती हैं. इस के अलावा फेफड़े में घाव या सूजन आ जाती है जिस से फेफड़े फैल नहीं पाते हैं और तब फेफड़ों को औक्सीजन लेने व कार्बन डाइऔक्साइड छोड़ने में कठिनाई होती है. ऐसे में मरीज गहरी सांस लेने में असमर्थ होते हैं.

कई बार रक्त संचार प्रभावित होता है जिस से फेफड़ों की रक्त धमनियां प्रभावित होती हैं. ऐसे में रक्त नलियों में थक्का जमना, घाव होना या सूजन होना आम होता है. अस्थमा और निमोनिया जैसे फेफड़ों के रोगों के कारण सांस लेने में परेशानी होती है. यदि आप का हृदय आप के शरीर में औक्सीजन पहुंचाने के लिए पर्याप्त रक्त पंप करने में असमर्थ है तो आप को सांस लेने में परेशानी और घबराहट के दौरे पड़ सकते हैं. इतना ही नहीं, चलने, सीढि़यां चढ़ने, दौड़ने या चुपचाप बैठने के दौरान भी सांस की तकलीफ होती है.

लंग्स की बीमारियों के लक्षण

यदि किसी को खांसी व सीने में दर्द के साथ बहुत अधिक खून आ रहा है तो यह फेफड़ों की बीमारी का संकेत हो सकता है. यदि सीढि़यां चढ़ने, चलने पर सांस फूले तो यह भी फेफड़ों की बीमारियों का संकेत हो सकता है. फेफड़ों के रोग का सब से बड़ा कारण धूम्रपान होता है. जो लोग धूम्रपान करते हैं उन में फेफड़े के कैंसर सहित फेफड़ों की बीमारियां विकसित होने की संभावना अधिक होती है. कई बार एलर्जी के कारण भी फेफड़ों के रोग बढ़ते हैं. इस से फेफड़ों की वायु थैलियों और उस के आसपास सूजन हो सकती है जो दर्द का कारण बनती है.

इलाज

फेफड़ों के रोगों में ब्रोंकोडाइलेटर्स का प्रयोग किया जाता है. ब्रोंकोडाइलेटर्स ऐसी दवाएं हैं जो फेफड़ों की मांसपेशियों को आराम देती हैं. ये नलियों को खोलती हैं, जिस से सांस लेना आसान हो जाता है. इस के अलावा इनहेल्ड स्टेरौयड का उपयोग किया जाता है. इनहेल्ड कौर्टिको स्टेरौइड्स फेफड़ों की कार्यक्षमता को बढ़ाते हैं और बीमारियों को आगे बढ़ने से रोकते हैं. जो लंबे समय तक इस का उपयोग करते हैं, उन में निमोनिया होने की संभावना अधिक होती है क्योंकि दवा सीधे फेफड़ों में जाती है और कुछ दुष्प्रभाव पैदा कर सकती है.

दवाओं के अलावा कुछ उपाय हैं जिन से फेफड़ों की बीमारियों से बचा जा सकता है. इस के लिए धूम्रपान न करें. वायु प्रदूषण से बचें. शुद्ध हवा का प्रयोग करें. उन लोगों से दूर रहें जो संक्रमण वाली बीमारियों से ग्रसित हों. उन से सावधानी से मिलें. जहरीली गंध, गैस, धुआं और अन्य खतरनाक पदार्थों से बचना चाहिए. फ्लू या सर्दी से पीडि़त लोगों के निकट संपर्क से बचें. नियमित जांच कराएं. फेफड़े कितने प्रभावी ढंग से काम कर रहे हैं, इस की जांच कराएं.

सावधानियां

फेफड़ों की बीमारियां बैक्टीरियल, वायरल या फंगल बीमारियां हो सकती हैं. निमोनिया जैसे फेफड़ों के रोग एक या दोनों फेफड़ों को प्रभावित करते हैं. खांसी, बलगम, बुखार और सीने में दर्द ये सभी निमोनिया के लक्षण हैं. फेफड़ों का संक्रमण और बीमारियां किसी को भी हो सकती हैं. बुजुर्ग लोग इस बीमारी के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं. फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए धूम्रपान से बचें. अधिक गहराई से सांस लेने का प्रयास करें. प्रदूषण से हर कीमत पर बचना चाहिए.

खाने में लहसुन, पानी, मिर्च, सेब, कद्दू, हलदी, टमाटर, ब्लू बेरी और ग्रीन टी का प्रयोग फेफड़ों को हैल्दी रखने में मदद करता है. दवा और ऐक्सरसाइज से फेफड़ों को हैल्दी रखा जा सकता है. इस के लिए झड़फूंक और झलाछाप डाक्टरों से बचें. कई बार लोग इन बीमारियों का इलाज झड़फूंक में ढूढ़ने लगते हैं जो ठीक नहीं.

पत्नी के नाम से मकान खरीदने से क्या है फायदे, आप भी जानिए

नैशनल हाउसिंग बैंक की सालाना रिपोर्ट में एक सुखद और चौका देने वाली बात यह कही गई है कि लोग अब तेजी से होम लोन ले रहे हैं जो कि अर्थव्यवस्था के लिहाज से उल्लेखनीय बात है. रिपोर्ट के मुताबिक 50 लाख से ज्यादा कीमत वाले होम लोन 120 फीसदी तक बढ़े हैं. लोग किस तेजी से अपना घर बनाने के लिए कर्ज ले रहे हैं यह बात इस तथ्य से भी उजागर होती है. पिछले एक साल में बैंकों के कुल लोन में 65 फीसदी हिस्सा 50 लाख से ज्यादा के लोन का रहा.

साफ दिख रहा है कि मिडिल क्लास के लोगों की आमदनी का एक बड़ा हिस्सा मकान खरीदने में लग रहा है. यह जरूरत भी है और निवेश भी है जिस के चलते कोविड के बाद 57 हजार से भी ज्यादा के हाउसिंग प्रोजैक्ट लौंच हुए हैं . दिलचस्प बात यह है कि प्रौपर्टी की कीमतों में भी बढोतरी हुई है जो ज्यादा असर लोगों की जेब पर नहीं डाल रही है. जाहिर है होम लोन का सहूलियत से मिल जाना इस की बड़ी वजह है.

होम लोन अब खुली किताब की तरह हो गए हैं जिन को बारीकी से देखें तो कुछ फायदे की गुंजाइश भी नजर आती है बशर्ते यह पत्नी के नाम पर लिया जाए तो. पत्नी के नाम पर लिया जाने वाला होम लोन आपसी प्यार और बौंडिंग बढ़ाने के अलावा कुछ पैसे भी बचाता है.

ये हैं फायदे

– कई बैंक पत्नी के नाम पर होम लोन लेने पर ब्याज में छूट देते हैं जो देखने में बहुत मामूली लगती है लेकिन पूरी किश्तें चुकता होने तक यह राशि काफी बढ़ जाती है. प्रचलित ब्याज दर में 0.05 फीसदी की छूट बैंक देते हैं.

– पत्नी के नाम होम लोन लेने से एक बड़ा फायदा टैक्स में छूट का भी मिलता है. अगर पति पत्नी दोनों आवेदन देते हैं तो सैक्शन 80 सी के तहत 2 लाख रुपए और मूलधन पर 5 लाख रुपए का फायदा वे उठा सकते हैं.

– पत्नी को सह आवेदक बनाने पर यानी जौइंट होम लेने का एक और फायदा ईएमआई का है जिस का भार किसी एक पर नहीं पड़ता . जौइंट होम लोन में पति पत्नी दोनों के बैंक अकाउंट लिंक होते हैं. इस में यह ध्यान रखना जरूरी है कि दोनों में से किसी एक के अकाउंट में ईएमआई का पैसा होना चाहिए. नहीं तो सिविल स्कोर पर फर्क पड़ता है.

– पत्नी के नाम होम लेने पर रजिस्ट्री शुल्क में छूट मिलती है जो अलगअलग राज्यों में अलगअलग है. आमतौर पर यह एक फीसदी है यानी रजिस्ट्री फीस अगर 8 लाख रुपए है तो 8 हजार रुपए का लाभ होता है. दिल्ली में यह छूट 2 फीसदी है.

– अगर पत्नी का सिविल स्कोर ठीकठाक है और पति का कम है तो लोन मिलने में दिक्कत नहीं आती. आप के लोन का प्रस्ताव खारिज होने की आशंका कम हो जाती है.

– अगर पत्नी भी कामकाजी है तो ईएमआई चुकाना सहूलियत वाला काम हो जाता है.

पति पत्नी का रिश्ता आपसी विश्वास पर टिका होता है. पत्नी के नाम मकान खरीदने से आपसी रिश्ते और भी मजबूत होते हैं. इस से किसी तीसरे से कानूनी विवाद होने की संभावना भी कम हो जाती है और पत्नी का आत्मविश्वास भी बढ़ता है. यह ठीक है कि ब्याज आयु टैक्स में छूट शुरू में बहुत बड़ी नहीं दिखती लेकिन आखिरी मासिक किश्त तक हिसाब आप लगाएंगे तो जो पैसा बचता है वह 2 से 5 लाख रुपए तक का होता है.

मेरी पड़ोसन कभी भी बिना बताएं घर में आ जाती हैं, बताएं मैं उन्हें घर में आने से कैसे रोकूं ?

सवाल

हमारे पड़ोस में एक आंटी रहती हैं. वे जब चाहे हमारे घर में चली आती हैं. हमें उन का इस तरह बेमतलब और बेवक्त आना पसंद नहीं है. पर हम से उन्हें कुछ कहते नहीं बनता. हम उन्हें कुछ सालों से जानते हैं, इसलिए कुछ कह नहीं सकते पर वे खुद भी तो समझ सकती हैं कि उन के कारण हमें परेशानी होती है. वे हमें देख कर टीकाटिप्पणी और टोकाटाकी करने लगती हैं जो हमें अच्छा नहीं लगता. उन्हें आने से कैसे रोकें, कुछ बताएं.

 जवाब

देखिए, आजकल वैसे भी समय ऐसा नहीं है कि आप आपसी रिश्ते या दोस्ती देखें. इस समय आप के लिए सब से ज्यादा जरूरी होना चाहिए हर बाहरी व्यक्ति से दूरी बनाए रखना. आप उन से यदि यह नहीं कह सकते कि आप को उन का अपने घर आनाजाना पसंद नहीं है तो कम से कम आप उन से कह सकते हैं कि देश में चल रही महामारी को देखते हुए उन्हें अपनी और आप सभी की सेहत का ध्यान रखते हुए दूरी मैंटेन करनी चाहिए और अपने घर में रहना चाहिए.

वे आप के घर आती हैं तो किसी व्यक्ति से मिलने ही आती होंगी, जैसे आप की मम्मी या कोई और. वे जब आप के घर आएं तो कह दीजिए कि आप की मम्मी फ्री नहीं हैं और कुछ काम कर रही हैं, सो, उन से बैठ कर बात नहीं कर सकतीं. शायद इस से वे वापस चली जाएं. आप एकदो दिन एकसमान बहाना बनाएंगे तो हो सकता है वे आप का इशारा समझ जाएं और खुद ही बिना कहे घर आना कम कर दें या बंद कर दें.

देवकन्या : श्यामलाल कहां से आया था ?

राधिका मैडम ने उबाकई ली, फिर इधरउधर नजर दौड़ाई. बस में आज उन के रास्ते का स्टाफ कम था. कहीं छुट्टी तो नहीं है? कोई नेता अचानक मर गया होगा. उन्होंने पिता को फोन किया. कोई नेता नहीं मरा था, छुट्टी भी नहीं थी. बस चलने लगी. उन्होंने बैग से ‘हनुमान चालीसा’ निकाली और पढ़ने लगीं. थोड़ी देर में बस स्टैंड आ गया. वे धीरेधीरे नीचे उतरीं. घड़ी देखी. 8 बजे थे. आधा घंटा देर हो गई थी. वे आराम से चलते हुए स्कूल पहुंचीं. 3-4 छात्र आए थे. एक नौजवान भी खड़ा था.

राधिका मैडम ताला खोल कर अंदर गईं और कुरसी पर पसर गईं. उस नौजवान ने कमरे में आ कर नमस्ते कहते हुए एक कागज उन की तरफ बढ़ा दिया. राधिका ने देखा कि वह जौइनिंग लैटर था. नाम पढ़ा. श्यामलाल आदिवासी. उन्होंने मुंह बनाया और श्यामलाल को कुरसी पर बैठने को कहा. फिर पूछा, ‘‘क्या आईपीएससी से चयनित हो? कितने नंबर आए थे?’’ जवाब का इंतजार न करते हुए वे फिर बोलीं, ‘‘इस गांव में सभी आदिवासी हैं. बच्चों को पढ़ाने नहीं भेजते. मैं तो थक गई. अब तुम कोशिश करो. यहां गांव में वनवासी संगठन का एकल स्कूल चलता है. बहुत से बच्चे वहीं पढ़ने जाते हैं.’’

श्यामलाल बोल पड़ा ‘‘हम पढ़ाएंगे, तो हमारे यहां भी आने लगेंगे.’’ यह सुन कर राधिका मैडम का पारा चढ़ गया. उन्हें लगा कि यह नयानया मास्टर बना भील उन्हें निकम्मा कह रहा है. उन्होंने दबाव बनाने के लिए कहा, ‘‘तुम मेरे पति को तो जानते ही होगे. सुगम भारती नाम है उन का. धर्म प्रसार का काम करते हैं. राष्ट्रवादी सोच है. बहुत दबदबा है उन का…’’ अचानक राधिका मैडम को लगा कि श्यामलाल का ध्यान उन की देह पर है. उन्होंने ब्लाउज से बाहर झांकती ब्रा की लाल स्ट्रिप को ब्लाउज में दबाने की कोशिश की. श्यामलाल के चेहरे पर उलझन थी. वह उठ गया और पढ़ने आए 4-5 छात्रों से बातें करने लगा.

मिड डे मील बन कर आ गया. दाल में पानी ही पानी था. रोटियां कच्ची व कम थीं. राधिका मैडम ने 55 छात्रों की हाजिरी भरी थी. श्यामलाल कुछ कहना चाहता था कि राधिका बोलीं, ‘‘मैं तुम्हारा जौइनिंग लैटर नोडल सैंटर में देने जा रही हूं. यह लो स्कूल की चाबी.’’ उन के जाने के बाद श्यामलाल ने गांव का चक्कर लगाया. घरघर जा कर बच्चों को पढ़ने के लिए भेजने को कहा. मांबाप के मुंह से राधिका मैडम की बुराई सुन कर उसे लगा कि बहुत मेहनत कर के ही स्कूल जमाया जा सकता है. दूसरे दिन राधिका मैडम रोजाना की तुलना में और देर से स्कूल पहुंचीं. साढ़े 8 हो गए थे. स्कूल खुला था. तकरीबन 30 बच्चे क्लास में बैठे थे. श्यामलाल कविताएं बुलवा रहा था.

राधिका मैडम दूसरे कमरे में जा कर ‘धम्म’ से कुरसी पर बैठ गईं. उन्हें बहुत गुस्सा आ रहा था. श्यामलाल को बुला कर वे बोलीं, ‘‘तुम यह क्या कर रहे हो? क्यों पढ़ा रहे हो? इन सभी के लिए मिड डे मील बनाना होगा. काफी खर्चा होगा बेकार में.’’ श्यामलाल ने कहा, ‘‘मैडम, सरकार दे रही है न गेहूंचावल पकाने का खर्च.’’

राधिका का गुस्सा बढ़ गया. उन्होंने साड़ी के अंदर हाथ डाला और ब्लाउज के बटन से खेलने लगीं. श्यामलाल का ध्यान भी उसी तरफ चला गया. हलके सफेद रंग के ब्लाउज में से काले रंग की ब्रा दिख रही थी. राधिका मैडम के बड़ेबड़े उभार… श्यामलाल के होंठों पर जीभ घूम गई. राधिका ने पल्लू पीठ पीछे से घुमा कर छाती को ढक दिया. श्यामलाल घबरा कर दूसरे कमरे में चला गया और बच्चों को पढ़ाने लगा. अगले दिन ही श्यामलाल की मेहनत रंग लाने लगी. 50 छात्र पढ़ने आए थे. कुछ ने नई कमीज पहनी थी, कुछ के पास नई स्लेट थी.

राधिका मैडम आज और देर से आईं. मिड डे मील की सब्जीमसाले ले कर पति के साथ मोटरसाइकिल पर आई थीं. श्यामलाल का परिचय हुआ. बातचीत का सिलसिला चला. सुगम भारती बोले, ‘‘तुम ने अच्छा किया. स्कूल जमा दिया. अब इन बच्चों को श्लोक, मंत्र, सरस्वती की प्रार्थना, राष्ट्रगीत सुनाओ. पर ध्यान रखना भाई, गांव में चल रहे अपने एकल स्कूल पर असर न हो. वे भी हमारी संस्कृति का जागरण कर रहे हैं, वरना ईसाई मशीनरी…’’ श्यामलाल ने टोक दिया, ‘‘ईसाई और हिंदू की खींचतान में हमारी आदिवासी संस्कृति उलझ गई है, खत्म होने लगा है हमारा आदि धर्म…’’ सुगम भारती ने टोका, ‘‘भाई श्यामलाल, हमतुम अलग नहीं हैं. हमारे पूर्वज एक ही हैं.’’

बहस हद पर थी. श्यामलाल बोला, ‘‘आर्य हैं आप. हम मूल निवासी, राक्षस, असुर, दैत्य…’’ सुगम भारती ने उसे बीच में ही टोक दिया, ‘‘तुम ईसाई तो नहीं हो? कौन सी किताबें, पत्रिकाएं पढ़ते हो जो ऐसी गैरों सी बातें करते हो? अभी तो मुझे कुछ काम है, फिर कभी बात करेंगे,’’ कह कर वे चल दिए. श्यामलाल क्लास में गया. वहां वह पढ़ाता रहा. वक्त कहां निकल गया, पता ही नहीं चला. राधिका मैडम समय से ही घर के लिए निकल गईं. श्यामलाल बस में बैठ गया. उस का विचार मंथन चल रहा था, ‘डाक्टर अंबेडकर ने संविधान का प्रारूप बनाया, इसीलिए देश में समानता की धारा चल रही है, वरना ये लोग तो ‘मनुस्मृति’ ही लागू करते. हमारी अशिक्षा, पिछड़ेपन, गरीबी की वजह पूर्व जन्म के कर्म बताते हैं. हमारा अन्न नहीं लेते, पर रुपया लपक लेते हैं. हम पर अपने कर्मकांड लाद रहे हैं. हम इन के यजमान हैं. गौतम बुद्ध ने सही कहा है कि पहले अनुभव, फिर विश्वास, आस्था व श्रद्धा. जानो, न कि मानो.

‘ईश्वर है तो पहले पता तो लगे कि कहां है? स्वर्गनरक कहां है? ये कहते हैं कि पहले मानो, फिर जानो. पहले आस्था, श्रद्धा, फिर अनुभव. क्यों भाई, क्यों? ईसाई मशीनरी ने शिक्षा, स्वास्थ्य के माध्यम से लोगों का दिल जीता, धर्म बदला. तभी तो ये लोग हमें पढ़ाने आए हैं. एकल स्कूल चला रहे हैं, वरना इन्हें कहां फुरसत थी हमारे शोषण से.’ श्यामलाल घर पहुंच गया. खाट पर डाक पड़ी थी. डाकिया महीने में 1-2 बार ही आता था. वह सारी डाक एकसाथ दे जाता था. अगले दिन श्यामलाल स्कूल पहुंचा. स्कूल खुला देख कर वह हैरान हुआ. राधिका मैडम स्कूल में आ गई थीं. श्यामलाल ने नमस्ते कहा और वह क्लास में चला गया.

राधिका का देर से स्कूल आना, जल्दी चले जाना, कभीकभी नहीं आ कर दूसरे दिन दस्तखत करना चलता रहा. श्यामलाल पढ़ाता रहता, अपना काम करता रहता. कभीकभी दोनों एकसाथ बैठते तो बातें चलतीं, मजाक होता, उंगलियों का छूना भी हो जाता. एक दिन श्यामलाल मोटरसाइकिल ले कर स्कूल आया. उसे शहर जाना था, पर छुट्टी के बाद राधिका मैडम उस की मोटरसाइकिल पर बैठ गईं. श्यामलाल को मजबूरन उन के घर जाना पड़ा. सुगम भारती घर पर ही थे. बातचीत चली, तो बहस में बदल गई. ‘‘हमारे आध्यात्मिक मूल्य एक हैं. यह भूभाग पवित्र है, इसीलिए हम एक राष्ट्र हैं. हमारा धर्म हमें आपस में जोड़ता है. हमें अपनी भारत माता की तनमनधन से सेवा करनी चाहिए,’’ सुगम भारती लगातार बोलते रहे. श्यामलाल बहस नहीं करना चाहता था. बहस कटुता बढ़ाती है. मतभेद को मनभेद में बदल देती है, फिर भी जब हद हो गई, तो वह बोल ही गया, ‘‘आप के शास्त्र में यह क्यों लिखा है कि पूजिए विप्र शील गुण हीना, शुद्र न गुनगान, ज्ञान प्रवीणा?’’

इतने में सुगम भारती के दफ्तर का चपरासी रजिस्टर ले कर आ गया. उन्होंने 15-20 दिनों के दस्तखत एकसाथ किए. श्यामलाल की आंखों में उठे सवाल को जान कर वे बोले, ‘‘क्या करूं? राष्ट्र सेवा में लगा रहता हूं, दफ्तर जाने का वक्त ही नहीं मिलता. देश पहले है, दफ्तर तो चलता रहेगा.’’ राधिका चाय ले कर आ गईं. बहस रुक गई. घरपरिवार की बातें चल पड़ीं. एक दिन स्कूल में हाथ की रेखाएं देखते हुए राधिका ने अपना ज्योतिष ज्ञान बताया, ‘‘तुम्हारे अनेक लड़कियों से संबंध रहेंगे.’’ श्यामलाल मुसकरा दिया. राधिका ने कहा, ‘‘भारतीजी बाहर गए हैं…’’ और वे भी मुसकरा दीं.

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