story in hindi
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5 राज्यों – मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और मिजोरम में हुए विधानसभा चुनाव के जो नतीजे सामने आ रहे हैं वे निश्चिततौर पर भारतीय जनता पार्टी के लिए बेहद उत्साहवर्धक हैं.पार्टी 3 राज्यों में स्पष्ट तौर पर सरकार बनाने जा रही है.
धर्म की बिसात पर अपनी गोटियां खेलने वाली बीजेपी को यह उम्मीद नहीं थी कि जीत इतनी शानदार होगी. राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो’ यात्रा और ‘इंडिया’ गठबंधन से बीजेपी में यह धुकधुकी तो थी कि कहीं हिंदू राष्ट्र और राममंदिर निर्माण का बीजेपी का चुनावी मुद्दा विपक्षी पार्टियों के मुद्दे – भूख, बेरोजगारी, जातीय जनगणना वगैरा के आगे फीके ना पड़ जाएं मगर आश्चर्यजनक रूप से जनता ने स्वयं से जुड़े मुद्दों की अनदेखी कर धर्म के आगे घुटने टेक दिए और बीजेपी के सपने को साकार कर दिया.
दरअसल बीजेपी को यह जीत इसलिए हासिल नहीं हुई है कि उस ने विकास के कोई बहुत बड़े काम कर दिए हैं या बेरोजगार युवाओं को नौकरियां दे दीं या देश से गरीबी मिटा दी, बीजेपी को यह सफलता इसलिए मिली है क्योंकि इस वक़्त दुनियाभर में युद्ध और तनाव का माहौल है. गाजा-इजरायल और रूस-यूक्रेन के बीच कई महीनों से जो घमासान युद्ध हो रहा है उस में लाखों लोग मारे गए हैं. लाखों महिलाएं और बुजुर्ग घायल हुए हैं, बच्चों की लाशें उठाए मांबाप की चीखें आसमान का सीना छलनी कर रही हैं और यह सब हिन्दुस्तान के लोग इंटनैट और सोशल मीडिया के माध्यम से अपने स्मार्ट फोन पर देख रहे हैं इतनी लाशें, दर्दनाक चीखें, बमों के धमाके, ध्वस्त होती आलीशान इमारतें, मलबे में दबे लोग, मिट्टी के टीलों में अपने मांबाप को ढूंढते नन्हे नन्हे बच्चे, अस्पतालों में घायल खून से सने मासूमों की तस्वीरों ने पूरी दुनिया में एक भय का वातावरण बना रखा है. विश्वयुद्ध की संभावना से लोग डरे हुए हैं. अभी साल नहीं बीता है कोविड महामारी ने लाखों लोगों की जानें लील लीं. उस से उबरे ही थे कि युद्ध की विभीषिकाओं ने हमें डराना शुरू कर दिया. ऐसे में इंसान सहारे के लिए कोई मजबूत छवि तलाशता है. भारत में नरेंद्र मोदी की छवि एक मजबूत और ताकतवर व्यक्ति के रूप में गढ़ी जा चुकी है.
गरीब और कम पढ़ा लिखा आदमी आपदाओं और परेशानियों से जल्दी डर जाता है. डर के कारण भगवान की तरफ भागता है. धर्म की गोद में छुप जाना चाहता है. हमारी मानसिक स्थिति को बीजेपी खूब अच्छी तरह भांप चुकी है. यही वजह थी कि 5 राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में किसी भी राज्य में स्थानीय नेताओं के चेहरों को कोई तवज्जो नहीं दी गई बल्कि हर जगह मोदी का चेहरा सामने रख कर चुनाव लड़ा गया.
नरेंद्र मोदी बेहद दमदार व्यक्ति के रूप में सामने है. अंतर्राष्ट्रीय मसलों को सुलझाने के लिए जिस की पूछ होती है. किसी भी अन्य पार्टी में मोदी की छवि के बराबर कोई नेता नहीं है. जनता को लगता है कि अगर विश्व युद्ध छिड़ा या देश पर कोई आंच आई तो उस से मोदी ही निपट सकते हैं और किसी में इतनी ताकत नहीं है. फिर जनता मोदी को हिंदू धर्म के उत्थान और राममंदिर के निर्माण से भी जोड़ कर देखती है. लिहाजा इस बार चुनाव में लोगों ने अपने क्षेत्रीय मुद्दों को दरकिनार कर मोदी को मजबूत करने के लिए बीजेपी के माथे जीत का सेहरा बांधना ज्यादा ठीक समझा.
अंतर्राष्ट्रीय गड़बड़ियां और युद्ध भारत के चुनावों पर जो असर डाल सकते थे उस को विपक्षी पार्टियां देख नहीं पाईं. वे जातीय मसलों में ही उलझी रह गईं. 5 राज्यों के जो नतीजे आए हैं उस के बाद देश में क्षेत्रीय समस्याएं, बेरोजगारी, गरीबी, भूख, अपराध जैसी चीजें जस की तस बनी रहेंगी. अब आगे कई सालों तक इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं होगा. अलबत्ता इन नतीजों से बीजेपी की ताकत में इतनी बढ़ोत्तरी अवश्य हो गई कि इस के दम पर 2024 के लोकसभा चुनाव की वैतरणी वह बहुत आसानी से पार कर लेगी.
10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षाओं में अब छात्रों को डिवीजन या डिस्टिंक्शन नहीं मिलेगा क्योंकि सीबीएसई ने ग्रेडिंग का अपना सालों पुराना सिस्टम बदलने का फैसला किया है. इस से पहले सीबीएसई ने शिक्षा के क्षेत्र में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के उद्देश्य से मेरिट सूची जारी करने की प्रथा भी समाप्त कर दी थी. सीबीएसई बोर्ड पिछले कुछ साल से 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षा में टौप करने वाले छात्रों की लिस्ट जारी नहीं करता है.
बोर्ड ने इस के पीछे का तर्क देते हुए कहा था कि ऐसा छात्रों के बीच अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा से बचने के लिए किया गया है.यह दृष्टिकोण केवल परीक्षा प्रदर्शन के बजाय समग्र सीखने पर ध्यान केंद्रित करने, अधिक संतुलित शैक्षिक वातावरण को बढ़ावा देने और अंततः रटने की प्रक्रिया से दूर जाने को प्रोत्साहित करेगा, जो छात्रों के भविष्य और करियर के लिए अच्छा होगा.
अब बोर्ड ने 30 नवंबर को सभी स्कूलों को नोटिस जारी कर बताया है कि सीबीएसई के दसवीं और बारहवीं के नतीजों में अब ओवरऔल डिविजन, डिस्टिंक्शन या एग्रीगेट अंक भी नहीं दिए जाएंगे.अगर हायर स्टडीज के लिए या नौकरी के लिए परसेंटेज कैलकुलेशन की जरूरत पड़ती है तो संस्थान या कंपनी खुद ये कैलकुलेशन कर सकती है.बोर्ड इस बारे में कोई जानकारी नहीं देगा.बोर्ड न तो परसेंटेज की गिनती करेगा और न ही रिजल्ट में इस की कोई जानकारी दी जाएगी.अधिसूचना में कहा गया है, ‘इस संबंध में सूचित किया जाता है कि परीक्षा के अध्याय 7 की उपधारा 40.1 (iii) उपनियम यह निर्धारित करते हैं कि:- कोई समग्र डिवीजन/डिस्टिंक्शन/एग्रीगेट नहीं दिया जाएगा’.
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) ने आगामी 10वीं और 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं से पहले यह बड़ा बदलाव किया है. सीबीएसई ने तय किया है कि अगर छात्र पांच से अधिक पेपर देगा तो उस के सब से अच्छे पांच विषय तय करने का फैसला छात्र के संबंधित स्कूल या संस्थान को होगा.कुल मिला कर कोई श्रेणी, विशेष योग्यता या कुल प्राप्तांक नहीं दिए जाएंगे. सीबीएसई का मानना है कि इस से छात्रछात्राओं में हीन भावना का विकास नहीं होगा. डिवीजन खराब होने पर छात्र हताशा और अवसाद में चले जाते थे. आत्महत्या के मामले भी सामने आते थे. जबकि नंबर या ग्रेड से किसी छात्र की काबिलियत को नहीं आंका जा सकता है. हर बच्चे में अलगअलग तरह का गुण होता है, जिस को उभरना, विकसित करना ही शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए.
अगले साल सीबीएसई बोर्ड परीक्षा का आयोजन 15 फरवरी से किया जाना है. सीबीएसई बोर्ड कक्षा 10वीं और कक्षा 12वीं दोनों कक्षाओं की परीक्षाएं एक ही दिन 15 फरवरी से शुरू होने वाली है, जो अप्रैल तक चलेंगी. यद्यपि बोर्ड ने अब तक कक्षा 10वीं, 12वीं बोर्ड परीक्षा का विस्तृत शेड्यूल जारी नहीं किया है. वहीं सीबीएसई 10वीं, 12वीं प्रैक्टिकल परीक्षाएं एक जनवरी से शुरू होने वाली है.
सीबीएसई का यह निर्णय स्वागत योग्य है. इस से मार्क्स के पीछे या फिर डिवीजन के पीछे भागने की जो मारामारी थी वह अब समाप्त हो जाएगी.अब स्कूल स्तर से ही अंक तालिका जारी होगी इस से छात्रछात्राओं को कुंठाग्रस्त होने की जो स्थिति बनती थी, उस पर विराम लगेगा.
जरमनी पहुंच कर दुर्गा को बिलकुल अलग माहौल मिला. जरमनी के लगभग एक दर्जन से ज्यादा शीर्ष विश्वविद्यालयों हीडेलबर्ग, एलएम यूनिवर्सिटी म्यूनिक, वुर्जबर्ग यूनिवर्सिटी, टुएबिनजेन यूनिवर्सिटी आदि में संस्कृत की पढ़ाई होती है. उसे देख कर खुशी हुई कि जरमनी के अतिरिक्त अन्य यूरोपियन देश और अमेरिका के विद्यार्थी भी संस्कृत पढ़ते हैं. वे जानना चाहते हैं कि भारत के प्राचीन इतिहास व विचार किस तरह इन ग्रंथों में छिपे हैं. भारत में संस्कृत की डिगरी तो नौकरी के लिए बटोरी जाती है लेकिन जरमनी में लोग अपना ज्ञान बढ़ाने के लिए संस्कृत पढ़ने आते हैं. इन विद्यार्थियों में हर उम्र के बच्चे, किशोर, युवा और प्रौढ़ होते हैं. दुर्गा ने देखा कि इन में कुछ नौकरीपेशा यहां तक कि डाक्टर भी हैं. दुर्गा को पता चला कि अमेरिका और ब्रिटेन में जरमन टीचर संस्कृत पढ़ाते हैं. हम अपनी प्राचीन संस्कृति और भाषा की समृद्ध विरासत को सहेजने में सफल नहीं रहे हैं. यहां का माहौल देख कर ऐसा प्रतीत होता है कि जरमन लोग ही शायद भविष्य में संस्कृत के संरक्षक हों. वे दूसरी लेटिन व रोमन भाषाओं को भी संरक्षित करने की कोशिश कर रहे हैं.
दुर्गा का बेटा शलभ भी अब बड़ा हो रहा था. वह जरमन के अतिरिक्त हिंदी, इंगलिश और संस्कृत भी सीख रहा था. दुर्गा ने कुछ प्राचीन पुस्तकों, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, कालिदास का अभिज्ञान शाकुंतलम, गीता और वेद के जरमन अनुवाद भी देखे और कुछ पढ़े भी. जरमन विद्वानों का कहना है कि भारत के वेदों में बहुतकुछ छिपा है जिन से वे काफी सीख सकते हैं. सामान्य बातें और सामान्य ज्ञान से ले कर विज्ञान के बारे में भी वेद से सीखा जा सकता है.
जरमनी आने पर भी दुर्गा हमेशा अपनी सहेली माधुरी के संपर्क में रही थी. उस ने माधुरी को कुछ पैसे भी लौटा दिए थे जिस के चलते माधुरी थोड़ा नाराज भी हुई थी. माधुरी से ही दुर्गा को मालूम हुआ कि उस की दीदी अमोलिका और पापा दीनानाथ अब नहीं रहे. अमोलिका का बेटा बंटी कुछ साल नानी के साथ रहा था, बाद में वह अपने पापा जतिन के पास चला गया. उस की नानी भी उसी के साथ रहती थी. बंटी 16 साल का हो चुका था और कालेज में पढ़ रहा था. इधर, दुर्गा का बेटा शलभ 15 साल का हो गया था. वह भी अगले साल कालेज में चला जाएगा. दुर्गा के निमंत्रण पर माधुरी जरमनी आई थी. वह करीब एक महीने यहां रही. दुर्गा ने उसे बर्लिन, बोन, म्युनिक, फ्रैंकफर्ट, कौंलोन आदि जगहें घुमाईं. माधुरी इंडिया लौट गई.
दुर्गा से यूनिवर्सिटी की ओर से वेद पढ़ाने को कहा गया. उस से वेद के कुछ अध्यायों व श्लोकों का समुचित विश्लेषण करने को कहा गया. दुर्गा ने वेदों का अध्ययन किया था, इसलिए उसे पढ़ाने में कोई परेशानी नहीं हुई. उस के पढ़ाने के तरीके की विद्यार्थियों और शिक्षकों ने खूब प्रशंसा की. दुर्गा अब यूनिवर्सिटी में प्रतिष्ठित हो चुकी थी, बल्कि उसे अन्य पश्चिमी देशों में भी कभीकभी पढ़ाने जाना होता था.
5 वर्षों बाद शलभ फिजिक्स से ग्रेजुएशन कर चुका था. उसे न्यूक्लिअर फिजिक्स में आगे की पढ़ाई करनी थी. पीजी में ऐडमिशन से पहले उस ने मां से इंडिया जाने की पेशकश की तो दुर्गा ने उस की बात मान ली. दुर्गा ने उस के जन्म की सचाई अब उसे बता दी थी. सच जान कर उसे अपनी मां पर गर्व हुआ. अकेले ही काफी दुख झेल कर, अपने साहस के बलबूते पर मां खुद को और मुझे सम्मानजनक स्थिति में लाई थी. शलभ को अपनी मां पर गर्व हो रहा था. हालांकि वह किसी संबंधी के यहां नहीं जाना चाहता था लेकिन दुर्गा ने उसे अपने पिता जतिन और नानी से मिलने को कहा. माधुरी ने दुर्गा को जतिन का ठिकाना बता दिया था. जतिन आजकल नागपुर के पास वैस्टर्न कोलफील्ड में कार्यरत था.
इंडिया आ कर शलभ ने पहले देश के विभिन्न ऐतिहासिक व प्राचीन नगरों का भ्रमण किया. बाद में वह पिता से मिलने नागपुर गया. उस दिन रविवार था, जतिन और नानी दोनों घर पर ही थे. डोरबैल बजाने पर जतिन ने दरवाजा खोला. शलभ ने उस के पैर छुए. जतिन बोला, ‘‘मैं ने तुम को पहचाना नहीं.’’ शलभ बोला, ‘‘मैं एक जरमन नागरिक हूं. भारत घूमने आया हूं. मैं अंदर आ सकता हूं. मेरी मां ने मुझे आप से मिलने के लिए कहा है.’’
शलभ का चेहरा एकदम अपनी मां से मिलता था. तब तक उस की नानी भी आई तो उस ने नानी के भी पैर छू कर प्रणाम किया. जतिन और नानी दोनों शलभ को बड़े गौर से देख रहे थे. शलभ ने देखा कि शोकेस पर उस की मौसी और मां दोनों की फोटो पर माला पड़ी हुई है. शलभ ने दोनों तसवीरों की ओर संकेत करते हुए पूछा, ‘‘ये महिलाएं कौन हैं?’’
जतिन ने बताया, ‘‘एक मेरी पत्नी अमोलिका, दूसरी उन की छोटी बहन दुर्गा है, अब दोनों इस दुनिया में नहीं हैं.’’
‘‘एस तुत मिर लाइट,’’ शलभ बोला. ‘‘मैं समझा नहीं,’’ जतिन ने कहा.
‘‘आई एम सौरी, यही पहले मैं ने जरमन भाषा में कहा था,’’ शलभ बोला. ‘‘अरे वाह, कितनी भाषाएं जानते हो,’’ जतिन ने हैरानी जताई.
‘‘सब मेरी मां की देन है,’’ शलभ ने कहा. फिर दुर्गा की फोटो को दिखाते हुए शलभ बोला, ‘‘तो ये आप की केलिकुंचिका हैं.’’
‘‘व्हाट?’’
‘‘केलिकुंचिका यानी साली, सिस्टर इन लौ.’’
‘‘यह कौन सी भाषा है…जरमन?’’
‘‘जी नहीं, संस्कृत.’’
‘‘तो तुम संस्कृत भी जानते हो?’’
‘‘जी, आप की केलिकुंचिका संस्कृत की विदुषी हैं, उन्हीं ने मुझे संस्कृत भी सिखाई है.’’
‘‘वह तो बहुत पहले मर चुकी है.’’
‘‘आप के लिए मृत होंगी.’’
‘‘व्हाट? हम लोगों ने उसे ढूढ़ने की बहुत कोशिश की थी, पर वह नहीं मिली. आखिर में हम ने उसे मृत मान लिया.’’
‘‘अच्छा, तो अब चलता हूं, कल दिल्ली से मेरी फ्लाइट है.’’
शलभ ने उठ कर दोनों के पैर छुए और बाहर निकल गया. ‘‘अरे, जरा रुको तो सही, हमारी बात तो सुनते जाओ, शलभ…’’
वे दोनों उसे पुकारते रहे, पर उस ने एक बार भी मुड़ कर उन की तरफ नहीं देखा.
यह देख रशिका रोती हुई वहां से दौड़ी और उस के पीछे गजाला. उस दिन रशिका ने डांस कंपीटिशन तो जीत लिया लेकिन शक और धर्म के नाम पर जो विष रशिका के मातापिता रशिका के ज़ेहन में बचपन से बोते आ रहे थे कि गजाला के क़ौम के लोग कभी किसी के नहीं होते, ये लोग पीठ पर वार करते हैं, उस जहर ने आज रशिका को हमेशा के लिए गजाला से जुदा कर दिया.
उस दिन रशिका के पीछे गजाला भी दौड़ी थी और वह दौड़ती हुई सीढ़ियों से फिसल कर गिर गई. गजाला के सिर पर काफी गहरी चोट लगने की वजह से उस ने 2 दिनों के बाद इस दुनिया को अलविदा कह दिया. रशिका ने अपनी सब से अच्छी दोस्त गजाला को सदा के लिए खो दिया. उसे अपनी इस गलती का एहसास तब हुआ जब अचानक एक रोज़ राशि से उस की मुलाकात हुई और राशि ने गजाला की सचाई बयां करते हुए कहा-
“रशिका, तुम कैसी हो, तुम्हारे पास गजाला जैसी सच्ची दोस्त थी और तुम ने उसे अपनी बेतुकी सोच की वजह से खो दिया. हां, मैं उस दिन डांस कंपीटिशन में तुम्हें हराना चाहती थी, मैं चाहती थी कि गजाला वह नशे की दवाई तुम्हारे पानी की बोतल में मिला दे लेकिन उस ने ऐसा करने से मना कर दिया था. जानती हो, गजाला ने उस दिन मुझ से क्या कहा था. तुम्हें तो पता भी नहीं है कि उस ने मुझ से क्या कहा था. उस ने मुझ से कहा कि रशिका मेरी सब से अच्छी सहेली है और मैं अपने जीते जी उस के साथ किसी को भी ग़लत नहीं करने दूंगी. और तुम ने क्या किया, तुम उस की दोस्ती का मान भी नहीं रख पाईं.”
इतना कह कर राशि तो चली गई लेकिन रशिका आज भी उस नामुराद घड़ी और खुद को कोसती रहती है और खुद को गजाला की मौत के लिए जिम्मेदार मानती है. यह सब सोचते हुए रशिका की आंखों से नींद गुम हो गई थी. कल हैदराबाद लौटना था. रशिका ने यह फैसला ले लिया कि हैदराबाद पहुंचते ही वह हनीफ से इजहारे मोहब्बत कर देगी क्योंकि वह एक बार फिर अपनी जिंदगी से किसी अच्छे इंसान को नहीं खोना चाहती और उस ने यह भी तय कर लिया कि वह अपने मातापिता को भी हर हाल में इस शादी के लिए राज़ी कर लेगी.
अगली सुबह सभी पांचों साथ में ही एयरपोर्ट पहुंचे. बीती रात रशिका संग की अपनी बदतमीजी पर राजीव को अफसोस था और वह शर्मिंदा भी था. उस ने रशिका से माफी भी मांगी. रशिका ने ऊपरी तौर पर उसे माफ कर दिया लेकिन मन ही मन रशिका अब भी राजीव के रात वाले बरताव पर बेहद नाराज़ थी.
यहां हैदराबाद पहुंचते ही फिर सभी अपने बनावटी रूप में आ गए और एक सभ्य, संस्कारी व धार्मिक होने का चोला पहन कर घूमने लगे. इधर रशिका अपना हाल ए दिल हनीफ से बयां करने के मौके तलाशने लगी और उधर हनीफ बैंगलुरु से आने के बाद से ही रशिका से दूर रहने लगा. रशिका जब भी हनीफ से मिलने को कहती, वह कोई न कोई बहाना बना देता. रशिका अपने लिए हनीफ की आंखों में प्यार देख चुकी थी, अब बस, वह हनीफ की जबानी सुनना चाहती थी.
एक रोज़ औफिस के फूड कोर्ट में हनीफ अकेले बैठा कौफी पी रहा था. यह देख रशिका उस के पास जा बैठी और अपने दिल के सारे पन्ने उस के सामने खोल कर रख दिए. हनीफ बिना कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किए चुपचाप सुनता रहा. उस के बाद अपनी कौफी पी रशिका से कुछ कहे बगैर उठ खड़ा हुआ और वहां से जाने लगा. यह देख रशिका भी उठ खड़ी हुई और हनीफ का हाथ पकड़ उसे रोकती हुई बोली-
“मैं जानती हूं, तुम मुझसे प्यार करते हो. तुम्हारी आंखों में इस वक़्त भी मैं अपने लिए प्यार देख रही हूं. तुम अभी कुछ नहीं कहना चाहते, मत कहो. मैं तुम्हारे हां का इंतजार करूंगी और हां, मैं आज ही अपने मम्मीपापा से हमारे लिए बात भी करूंगी.”
इतना कह कर रशिका ने हनीफ का हाथ छोड़ दिया. हनीफ बुत की तरह खड़ा रहा और रशिका वहां से चली गई. उस रात रशिका ने अपने मातापिता से फोन पर हनीफ के बारे में बताते हुए उस से शादी करने की अपनी इच्छा ज़ाहिर कर दी. हनीफ के बारे में सुन कर रशिका के मातापिता ने उसे फौरन इंदौर आने को कहा ताकि वे इस विषय पर बात कर सकें.
अगले दिन रशिका औफिस से एक हफ्ते की छुट्टी ले कर इंदौर आ गई. घर पहुंचते ही रशिका के मातापिता उस पर बरस पड़े. रशिका की मां चिल्लाती हुई उस से बोली-
“पूरे हैदराबाद में तुझे कोई और लड़का नहीं मिला, दूसरी जाति में भी नहीं. तुम तो गैरधर्म में शादी करना चाहती हो, ऊपर से तलाक शुदा आदमी के साथ जिस का एक बेटा भी है. तुम्हारा दिमाग ठिकाने पर तो है.”
यह सुन रशिका बोली- “मम्मी, हनीफ तलाकशुदा जरूर है लेकिन उस में केवल हनीफ की ही गलती नहीं है. उस में उस लड़की की भी उतनी ही गलती है, वह भी तो शादी कर के अपनी शादी निभा नहीं पाई.”
“कभी सोचा है वह लड़की अपनी शादी निभा क्यों नहीं पाई क्योंकि वह अपना धर्म छोड़ कर दूसरे धर्म में चली गई थी और जिस धर्म में तुम जाना चाहती हो न, उस धर्म के लड़के किसी गैरधर्म की लड़की से प्यार नहीं करते, बस जिहाद करते हैं, जिहाद…समझी. आज वह तुम से शादी करेगा, कल तुम्हें तलाक़तलाक़तलाक कह कर दे देगा और फिर किसी तीसरी की तलाश में निकल जाएगा. तुम्हें मालूम है, वह अपने धर्म के मुताबिक 4 शादियां कर सकता है. तब क्या करोगी,” रशिका की मां गुस्से में तिलमिलाती हुई बोली.
“मां, हनीफ ऐसा कुछ नहीं करेगा. उस की एक शादी टूट गई है, इस का मतलब यह नहीं है कि वह बुरा है,” रशिका ने अपनी मां को बहुत समझाने की कोशिश की लेकिन वह नहीं मानी. तब रशिका ने साफ शब्दों में कह दिया कि वह शादी करेगी तो हनीफ से ही करेगी.
रशिका का इतना कहना था कि रशिका के पिता, जो अब तक कुछ नहीं कह रहे थे, भड़क उठे और बोले, “यह शादी किसी भी सूरत में नहीं हो सकती. अगर तुम उस लड़के से शादी करती हो तो दोबारा इस घर की चौखट पर कभी पैर मत रखना. यह समझ लेना कि तुम्हारे मातापिता तुम्हारे लिए मर गए हैं.”
रशिका अपने मातापिता के आशीर्वाद से हनीफ संग शादी के बंधन में बंधना चाहती थी, इसलिए वह पूरे एक हफ्ते इंदौर में रुकी और अपने मातापिता को इस शादी के लिए राज़ी करने का प्रयत्न करती रही लेकिन अंत तक वे नहीं माने और रशिका निराश हो कर हैदराबाद लौट आई.
यहां हैदराबाद में जब रशिका औफिस पहुंची तो उसे हनीफ कहीं दिखाई नहीं दे रहा था. उस का मोबाइल भी बंद बता रहा था. रशिका ने जब संदीप और राजीव से हनीफ के बारे में पूछा तो उन्हें भी कुछ मालूम नहीं था. राजीव ने इतना कहा कि उस ने लास्ट टाइम हनीफ को उपासना के साथ देखा था पर आज उपासना भी औफिस नहीं आई थी.
रशिका बारबार कभी हनीफ का नंबर डायल करती तो कभी उपासना का. लेकिन दोनों का ही नंबर बंद बता रहा था. वह समझ ही नहीं पा रही थी कि आखिर दोनों का नंबर बंद क्यों बता रहा है. आखिरकार रशिका का पूरा दिन ऐसे ही बीत गया और सारी रात आंखों ही आंखों में कटी. दूसरे दिन जब रशिका औफिस पहुंची तब भी हनीफ का कुछ पता नहीं था. वह सोच ही रही थी कि आखिर हनीफ कहां होगा. उसी वक्त रशिका के सामने उपासना आ खड़ी हुई. उपासना को सामने खड़ा देख रशिका भी खड़ी हो गई और वह उपासना से बोली, “मैं कल से तुम्हारा और हनीफ का मोबाइल ट्राई कर रही हूं, तुम्हारा नंबर भी बंद बता रहा है और हनीफ का भी, तुम्हें पता है हनीफ कहां है?”
उपासना लंबी सांस लेती हुई रशिका को उस की चेयर पर बिठाती हुई बोली, “कल मैं छुट्टी पर थी और मेरे मोबाइल की बैटरी खराब हो गई थी, इसलिए मेरा मोबाइल बंद था. रही बात हनीफ की, तो मुझे नहीं पता वह कहां है. हां, इतना जरूर पता है कि उस ने यह कंपनी और जौब दोनों छोड़ दी है.”
इतना कहने के बाद उपासना अपने पर्स से एक बंद लिफाफा रशिका को देती हुई बोली, “यह लिफाफा हनीफ तुम्हारे लिए छोड़ गया है.” यह कह कर उपासना वहां से चली गई.
धड़कते दिल और कंपकंपाते हाथों से रशिका ने वह बंद लिफाफा खोला जिस पर लिखा था-
“रशिका, मैं जानता हूं तुम्हारे दिल में मेरे लिए जो जज्बात हैं. मैं यह भी जानता हूं कि तुम्हारे मातापिता इस रिश्ते के लिए कभी तैयार नहीं होंगे और उन के आशीर्वाद के बगैर मैं तुम्हारा हाथ नहीं थाम पाऊंगा. मैं एक बार फिर शादी कर के अपने प्यार को जिहाद का नाम नहीं देना चाहता, इसलिए प्यार को, बस, प्यार ही रहने दो…”
इतना पढ़ कर रशिका की आंखों से अश्रुधारा बहने लगे. उस के बाद रशिका ने झिलमिलाती आंखों से जो पढ़ा, उस में मशहूर गीतकार साहिर लुधियानवी की एक ग़ज़ल की पंक्ति लिखी थी-
“वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा…”
यह पढ़ने के बाद रशिका ने नम आंखों से वह लिफाफा संभाल कर अपने बैग में रख लिया. आज एक बार फिर ऊंचनीच, जाति, धर्म, संप्रदाय, क़ौम जैसे बेमाने शब्दों की वजह से 2 प्यार करने वाले दिल जुदा हो गए और प्यार फिर हार गया.
ब्राह्मण भोज समाप्त हुआ तो अम्मां धूप में खटोला डाल कर बैठ गईं. अजय, अपर्णा और नीरा को भी अपने पास आ कर बैठने को कहा. तेल की तश्तरी में से तेल निकाल कर अपने टखनों पर धीरेधीरे मलती हुई अम्मां बोलीं, ‘याद है, अजय, मैं ने एक बार कहा था कि घर में कोई भी नया सामान तभी जगह पा सकता है जब पुराने सामान को अपनी जगह से हटाया जाए. इसी तरह जब परिवार के लोग पुराने सामान को कूड़ा समझ कर फेंकने पर ही उतारू हो जाएं तो भलाई इसी में है कि उस सामान को किसी सुरक्षित स्थान पर पहुंचा दिया जाए. शायद वह सामान तब भी किसी के काम आ सके? जो इनसान समझौता करते हैं वे ही सार्थक जीवन जीते हैं पर जो समझौता करतेकरते टूट जाते हैं वे कायर कहलाते हैं. और मैं कायर नहीं हूं.’
अम्मां के बच्चे उन का मंतव्य समझे या नहीं पर अगले दिन वह कमरे में नहीं थीं. तकिये के नीचे एक नीला लिफाफा ही मिला था.
विचारों में डूबताउतराता अजय आश्रम के जंग खाए, विशालकाय गेट के सामने आ खड़ा हुआ. सड़क पतली, वीरान और खामोश थी. न जाने उसे यहां आ कर ऐसा क्यों लग रहा था कि अम्मां पूर्ण रूप से यहां सुरक्षित हैं. उस की सारी चिंताएं, तनाव न जाने कहां खो गए. गेट खोल कर अजय अंदर आया तो अम्मां अपने कमरे में बैठी एक बच्ची को वर्णमाला का पाठ पढ़ा रही थीं. अजय को देखते ही उन की आंखें भर आईं.
‘‘तू कब आया?’’ आंसू भरी आंखों को छिपाने के लिए इधरउधर देखने लगीं. दोबारा पूछा, ‘‘अकेले ही आया? मेरी बहू नीरा कहां है? लवकुश कैसे हैं? होमवर्क करते हैं कि नहीं?’’
अजय ने अम्मां का हाथ अपने हाथ में थाम लिया और बोला, ‘‘मां, सबकुछ एक ही पल में पूछ लोगी?’’
अम्मां को धैर्य कहां था, अजय को समझाते हुए बोलीं, ‘‘बेटा, तू बहू को काम पर जाने से मत रोकना. जानता है, जब बच्चे सैटिल हो जाते हैं तो औरत को खालीपन का एहसास होने लगता है. ऐसा लगता है जैसे वह एक निरर्थक सी जिंदगी जी रही है, एक ऐसी जिंदगी, जिस का इस्तेमाल कर के बच्चे और पति अपनेअपने क्षेत्र में सफल हो गए और वह उपेक्षित सी एक कोने में पड़ी है.’’
अपने भीतर के दर्द को ढांपने के लिए अम्मां ने हलकी मुसकान के साथ अपनी नजरें अजय पर टिका दी थीं. अजय बारबार अम्मां को शांत करता, उन का ध्यान दूसरी बातों में लगाने का प्रयास करता पर जहां यादों का खजाना और पीड़ा का मलबा हो वहां अपने लिए छोटा सा कोना भी पा सकना मुश्किल है.
‘‘अजय, क्या खाएगा तू? मठरी, पेठा, लड्डू?’’ और अम्मां दीवार की तरफ हो कर अलमारी में से डब्बे निकालने लगीं.
‘‘अम्मां, अब भी अपनी अलमारी में आप यह सब रखती हो? कौन ला कर देता है ये सारा सामान तुम्हें?’’ अजय ने छोटे से बच्चे की तरह मचल कर पूछा.
‘‘चौकीदार को 5 रुपए दे कर मंगा लेती हूं. यहां भी लवकुश की तरह कई नन्हेनन्हे बालगोपाल हैं. कमरे में आते ही कुछ भी मांगने लगते हैं. सच में अजय, ऐसा लगता है, खाते वह हैं, तन मेरे लगता है.’’
अजय सोच रहा था, भावनाओं और अनुराग की कोई सीमा नहीं होती. जिन का आंचल प्यार, दया और ममता से भरा होता है वह कहीं भी इन भावनाओं को बांट लेते हैं. अम्मां अलमारी में रखे डब्बे में से सामान निकाल रही थीं कि अचानक नीरा का स्वर उभरा, ‘‘अम्मां, मुझे कुछ नहीं चाहिए. सिर्फ अपनी गोदी में सिर रख कर हमें लेटने दीजिए.’’
‘‘तू कब आई?’’ अम्मां आत्म- विभोर हो उठी थीं.
‘‘अजय के साथ ही आई, अम्मां. जानती हैं, आप के जाने के बाद कितने अकेले हो गए थे हम. कितना सहारा मिलता था आप से? निश्चिंत हो कर स्कूल जाती. लौटती तो सबकुछ बना- बनाया, पकापकाया मिलता था. घर का दरवाजा तो खुला ही रहता था. अहंकार और अहं की अग्नि में राख हुई मैं यह भी नहीं जान पाई कि बच्चों को जो सुख, आनंद, नानीदादी के मुख से सुनी कहानियों में मिलता है वह वीडियो कैसेट में कहां?
‘‘बच्चों के स्कूल बैग टटोलती तो छोटेछोटे चोरी से लाए सामान मिलते. अजय घंटों आप के फोटो के पास बैठे रोते. फिर मन का संताप दूर करने के लिए नशे का सहारा लेते तो मन तिरोहित हो उठता कि क्यों जाने दिया मैं ने आप को?
‘‘मैं ने अजय से अनुनय की कि मुझे एक बार मां से मिलना है पर वह नहीं माने. कैसे मानते? मेरे दुर्व्यवहार की परिणति से ही तो आप को घर से बेघर होना पड़ा था. मेरे मन में प्रश्न उठा कि क्या स्नेह की आंच से मां के मन में ठोस हुई कोमल भावनाओं को पिघलाया नहीं जा सकता. मां का आंचल तो सुरक्षा प्रदान करता है. एक ऐसे प्यार की भावना देता है जिस के उजास से तनमन भीग जाता है.’’
अम्मां चुप्पी साधे रहीं. शुरू से ही चिंतन, मनन, आत्मविश्लेषण करने के बाद ही किसी निर्णय पर पहुंचती थीं.
‘‘इतना बड़ा ब्रह्मांड है, अम्मां. आकाश, तारे, नक्षत्र, सूर्य सब अपनीअपनी जगह पर अपना दायित्व निभाते रहते हैं. कमाल का समायोजन है. लेकिन हम मानव ही इतने असंतुलित क्यों हैं?’’
अम्मां समझ रही थीं, अजय बेचैन है. अंदर ही अंदर खौल रहा था. अम्मां ने उस की जिज्ञासा शांत की, ‘‘क्योंकि इनसान ही एक ऐसा प्राणी है जो राग, द्वेष, प्रतिद्वंद्विता, प्रतिस्पर्धा जैसी भावनाओं से घिरा रहता है.’’
‘‘सच अम्मां, मेरा विरोधात्मक तरीका आज मुझे उस मुकाम पर ले आया जहां आत्मसम्मान के नाम पर रुपया, पैसा, आरामदायक जिंदगी होते हुए भी घर खाली है. साथ है तो केवल अकेलापन. यह सब मैं अब समझ पाई हूं.’’
अपने मन के सामने अपराधिनी बनी नीरा अम्मां के कथन की सचाई को सहन कर, हृदय की पीड़ा के चक्र से अपनेआप को मुक्त करती बोली तो अम्मां की आंखों से भी आंसुओं की अविरल धारा बह निकली.
‘‘अम्मां, हम तो बातोें में ही उलझ गए. आप को लिवाने आए हैं. कहां चोट लगी आप को?’’ अजय नन्हे बालक की तरह मचल उठा.
‘‘अरे, कुछ नहीं हुआ. तुम से मिलने को जी चाहा तो बहाना बना दिया. महंतजी से फोन करवा दिया. जानती थी, मैं तुम्हें याद करती हूं तो तुम लोग भी जरूर याद करते होगे. दिल से दिल के तार मिले होते हैं न.’’
‘‘तो फिर अम्मां, चलोगी न हमारे साथ?’’ अजय ने पूछा, तो अम्मां हंस दीं, ‘‘मैं ने कब मना किया.’’
अजय ने नीरा की ओर देखा. अपने ही खयालों में खोई नीरा भी शायद यही सोच रही थी, ‘घरपरिवार की दौलत छोटीछोटी खुशियां होती हैं जो एकदूसरे की भावनाओं का सम्मान करने से प्राप्त होती हैं.’ आज सही मानों में दोनों को खुशी प्राप्त हुई थी.
किसी तरह खुद को बहलाफुसला कर लेट गई. खुद का खून देखने का शौक कभी रहा नहीं इसलिए नर्स की विपरीत दिशा में देखने लगी. गाड़ी में ज्यादा जगह न होने की वजह से वह बिलकुल पास ही खड़ा था. चेहरे पर ऐसी लकीरें थीं जैसे कोई उस के दिल में सूई चुभो रहा हो.
दर्द और घबराहट का बवंडर थमा तो वह मेरी हथेली थामे मुझे दिलासा दे रहा था. मेरी आंखों में थोड़े आंसू जरूर जमा हो गए होंगे. मन भी काफी भारी लगने लगा था.
बाहर आने से पहले मैं ने 2 गिलास जूस गटक लिया था और बहुत मना करने के बाद भी डाक्टरों ने उस का ब्लड सैंपल ले लिया.
इंडियन म्यूजियम से निकल कर हम ‘मैदान’ में आ गए. गहराते अंधकार के साथ हमेशा की तरह लोगों की संख्या घटने लगी थी और जोड़े बढ़ने लगे थे. यहां अकसर प्रेमी युगल खुले आकाश के नीचे बैठ सितारों के बीच अपना आशियाना बनाते थे. इच्छा तो बिलकुल नहीं थी लेकिन मैं ने सोच रखा था कि खानेपीने का कार्यक्रम निबटा कर ही वापस लौटूंगी. हम दोनों भी अंधेरे का हिस्सा बन गए.
मैं कुछ ज्यादा ही थकावट महसूस कर रही थी. इसलिए अनजाने ही कब उस की गोद में सिर रख कर लेट गई पता ही नहीं चला. मेरी निगाहें आसमान में तारों के बीच भटकने लगीं.
वे अगणित सितारे हम से कितनी दूर होते हैं. हम उन्हें रोज देखा करते हैं. वे भी मौन रह कर हमें बस, देख लिया करते हैं. हम कभी उन से बातें करने की कोशिश नहीं करते हैं. हम कभी उन के बारे में सोचते ही नहीं हैं क्योंकि हमें लगता ही नहीं है कि वे हम से बात कर सकते हैं, हमें सुन सकते हैं, हमारे साथ हंस सकते हैं, सिसक सकते हैं. हम कभी उन्हें याद रखने की कोशिश नहीं करते हैं क्योंकि हम जानते हैंकि कल भी वे यहीं थे और कल भी वे यही रहेंगे.
मुझे अपने माथे पर एक शीतल स्पर्श का एहसास हुआ. शायद शीतल हवा मेरे ललाट को सहला कर गुजर गई.
सुबह दरवाजे पर ताबड़तोड़ थापों से मेरी नींद खुली. मम्मी की चीखें साफ सुनाई दे रही थीं. मैं भाग कर गेस्टरूम में पहुंची तो कोई नजर नहीं आया. मैं दरवाजे की ओर बढ़ गई.
4 दिन बाद 2 चिट्ठियां लगभग एकसाथ मिलीं. मैं ने एक को खोला. एक तसवीर में मैं तांबे की मूर्ति के बगल में विचित्र मुद्रा में खड़ी थी. साथ में एक कागज भी था. लिखा था :
‘‘इशिताजी,
मैं बड़ीबड़ी बातें करना नहीं जानता, लेकिन कुछ बातें जरूर कहना चाहूंगा जो मेरे लिए शायद सबकुछ हैं. आप कितनी सुंदर हैं यह तो कोई भी आंख वाला समझ सकता है लेकिन जो अंधा है वह इस सच को जानता है कि वह कभी आप को नहीं देख पाएगा. जैसे हर लिखे शब्द का कोई अर्थ नहीं होता है वैसे ही हर भावना के लिए शब्द नहीं हैं, इसलिए मैं ज्यादा लिख भी नहीं सकता. मगर एक चीज ऐसी है जो आप से कहीं अधिक खूबसूरत है, वह है आप का दिल.
हम जीवन में कई चीजों को याद रखने की कोशिश नहीं करते हैं क्योंकि वे हमेशा हमारे साथ होती हैं और कुछ चीजों को याद रखने का कोई मतलब नहीं होता क्योंकि वे हमारे साथ बस, एक बार होती हैं.
सच कहूं तो आप के साथ गुजरे 2 दिन में मैं ठीक से मुसकरा भी नहीं सका था. जब इतनी सारी हंसी एकसाथ मिल जाए तो इन्हें खोने का गम सताने लगता है. उन 2 दिनों के सहारे तो मैं दो जनम जी लेता फिर ये जिंदगी तो दो पल की है. जानता हूं दुनिया गोल है, बस रास्ते कुछ ज्यादा ही लंबे निकल आते हैं.
जब हम अपने आंगन में खड़े होते हैं तो कभीकभार एक पंछी मुंडेर पर आ बैठता है. हमें पता नहीं होता है कि वह कहां से आया. हम बस, उसे देखते हैं, थोड़ा गुस्साते हैं, थोड़ा हंसते भी हैं और थोड़ी देर में वह वापस उड़ जाता है. हमें पता नहीं होता है कि वह कहां जाएगा और उसे याद रखने की जरूरत कभी महसूस ही नहीं होती है.
जीवन के कुछ लमहे हमारे नाम करने का शुक्रिया.
-एक परिंदा.’’
दूसरी चिट्ठी में ब्लड रिपोर्ट थी. मुझे अपने बारे में पता था. अभिन्न की जांच रिपोर्ट देख कर पलकें उठाईं तो महसूस हुआ कि कोई परिंदा धुंधले आकाश में उड़ चला है…अगणित सितारों की ओर…दिल में चुभन छोड़ कर.
हवलदार ने दीपिका की हां में हां मिलाई और भीड़ से जाने के लिए कहा. और फिर दीपिका के पीछेपीछे वह भी सीढि़यां चढ़ने लगा. थोड़ी देर बाद हवलदार फ्लैट से वापस आया और बोला, ‘‘फ्लैट में तो कोई नहीं था. किस ने कहा कि वहां लड़कालड़की बंद हैं. फालतू में इतना शोर मचा दिया.’’ सामने के फ्लैट वाले अंकल चुपचाप वहां से गायब हो गए, लेकिन उन का दिमाग अभी भी चल रहा था…जैसे ही भीड़ छटी, दीपिका ने अस्मिता और समर को चुपचाप बाहर निकाल दिया. दरअसल, सीढि़यां चढ़ते समय ही दीपिका ने हवलदार को कुछ रुपए दे कर उस का मुंह बंद कर दिया था. जैसेतैसे आई हुई बला टल गई, लेकिन अस्मिता और समर को मुंह देख कर साफ पता लग रहा था कि उन्होंने इन 2 घंटों के दौरान कितना अच्छा समय बिताया होगा.
जब दोनों फ्लैट के अंदर थे तब समर ने कहा, ‘‘सौरी, जल्दीजल्दी में तुम्हारे लिए कोई उपहार लाना तो भूल ही गया.’’ ‘‘तुम आ गए हो तो नूर आ गया है,’’ कहते हुए अस्मिता हंस पड़ी. तब दोनों ने हृदय के तार झंकृत हो उठे थे. दिल में एक रागिनी बज उठी थी. रहीसही कसर आंखों से छलकते प्रेम निमंत्रण ने पूरी कर दी थी. सहसा ही समर के हाथ उस के तन से लिपट गए और यह आलिंगन हजारोंलाखों उपहारों से कहीं ज्यादा था.
असल तूफान तो उस के बाद आया जब समर अचानक अस्मिता से दूर होने लगा. फिर 6 महीने में सबकुछ बदल गया था. अब सिर्फ अस्मिता उसे फोन करती थी. और…समर, अस्मिता का फोन भी नहीं उठाता था. वह अब उस से बात नहीं करना चाहता था. जब उस की मरजी होती, मिलने को बुलाता, पर उस दौरान भी बात नहीं करता. ऐसा लगता था जैसे वह जिस्म की भूख मिटा रहा है. अस्मिता उस से प्यार करती थी, लेकिन वह अस्मिता को सिर्फ इस्तेमाल कर रहा था.
अस्मिता की तो पूरी दुनिया ही बदल चुकी थी. वह खुद से नफरत करने लगी थी. उस का आत्मविश्वास हिल गया था. वह अकसर अपनेआप से कहती, ‘मैं इतनी बेवकूफ कैसे हो सकती हूं? मैं अंधों की तरह एक मृगतृष्णा की ओर भागती जा रही हूं.’ वह घंटों रोती. निराशा उस की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी थी. इस हार को बरदाश्त न कर पाते हुए इसी बीच अस्मिता बारबार समर को वापस लाने की नाकाम कोशिश करने लगी. उसे मेल भेजना, प्रेम गीत भेजना, कभीकभी गाली लिख कर भेजना, अब यही उस का काम था.
इसी बीच, एक दिन- समर : तुम्हें समझ में नहीं आ रहा कि मैं तुम से अब कोई संबंध नहीं रखना चाहता? मुझे दोबारा फोन मत करना.
अस्मिता : देखो, तुम क्यों ऐसा कर रहे हो? मुझे पता है कि तुम भी मुझ से प्यार करते हो, लेकिन क्या है जिस से तुम परेशान हो? समर : ऐसा कुछ नहीं है. हमारा रिश्ता आगे नहीं बढ़ सकता. मुझे जिंदगी में बहुतकुछ करना है. मेरे पास इन चीजों के लिए वक्त नहीं है.
अस्मिता : नहीं, देखो समर, प्लीज मेरी बात सुनो. हम दोस्त बन कर भी तो रह सकते हैं? हम इस रिश्ते को वक्त देते हैं. अगर कई साल बाद भी तुम को ऐसा ही लगा. तब सोचेंगे. समर : तुम पागल हो, मेरे पास फालतू वक्त नहीं है. मेरी एक गर्लफ्रैंड है. और मैं तुम से आगे कभी बात नहीं करना चाहता.
टैलीफोन की यह बातचीत अस्मिता को आज भी याद है. यह उन दोनों के बीच आखिरी बातचीत थी. इसे सुन कर कोईर् भी कह सकता है कि अस्मिता बेवकूफ थी, भ्रम में जी रही थी. लेकिन वह भी क्या करती? कुल 16 की थी, और उसे लगता था, सब फिल्मों की तरह ही होता है. ‘जब वी मेट’ फिल्म से वह काफी प्रभावित थी. वैसे भी 16 का प्यार हो या 60 का, जब कोई प्यार में होता है, तो कुछ भी सहीगलत नहीं होता.
पर स्कूल में समर उस से बचता, नजरें छिपाता, अस्मिता उस से बात करने जाती तो वह झिड़क देता या दोस्तों के साथ मिल कर उस की खिल्ली उड़ाता, कहता, ‘‘कितनी बेवकूफ है जो उस की बातों में आ कर सबकुछ लुटा बैठी. उस ने तो यह सब एक शर्त के लिए किया था.’’ ‘ओह, तो यह सिर्फ उस की एक चाल थी. काश, मैं पहले ही समझ जाती,’ वह घंटों रोती रही.
आज प्यार के मामले में भी उस का भरोसा टूट गया था. प्यार पर से विश्वास तो पहले ही उठने लगा था. वार्षिक परीक्षाएं सिर पर मंडरा रही थीं. वह खुद से जूझ रही थी. पर अस्मिता ने पढ़ाई या स्कूल बंद नहीं किया. यह शायद उस की अंदरूनी शक्ति ही थी जिस से वह उबर रही थी या उबरने की कोशिश कर रही थी. हालांकि चिड़चिड़ाहट बढ़ रही थी और उस के बढ़ते चिड़चिड़ेपन से घर पर सब परेशान थे. अगर घर पर कोई कुछ जानना चाहता भी तो उस ने कभी नहीं बताया कि उस के साथ क्या हुआ है.
अस्मिता नई क्लास में आ गई थी. हर बार से नंबर काफी कम थे. समर ने नई कक्षा में पहुंच कर स्कूल ही बदल लिया था. यही नहीं, मोबाइल नंबर भी. अस्मिता के लिए यह सब किसी बहुत बड़े जलजले से कम न था. बात न करे पर रोज वह समर को देख कर ही अपना मन शांत कर लेती थी. पर अब तो… अस्मिता ने खाना बंद कर दिया था. इस कारण उस की तबीयत बिगड़ रही थी.
बहुत मेहनत से उस ने समर का नया नंबर पता किया. समर ने फोन उठाया मगर सिर्फ इतना कहा, ‘‘तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे फोन करने की? किस से नंबर मिला तुम्हें? आइंदा फोन किया तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. मेरे पास तुम्हारे कुछ फोटोज हैं. मैं उन्हें सार्वजनिक कर दूंगा. फिर मत कहना, हा…हा…हा… और समर ने फोन काट दिया.’’ समर के लिए यह सब खेल था, लेकिन अस्मिता के लिए वह पहला प्यार था. ‘कितनी बेवकूफ थी न मैं, जो अपने आत्मसम्मान को पीछे रख कर भी उसे मनाना और पाना चाहती थी,’ अस्मिता ने सोचा. अब उसे अपनेआप से घिन और नफरत सी होने लगी थी. अस्मिता खुद को खत्म करना चाहती थी.
लेकिन, दीपिका जो उस के अच्छे और बुरे दोनों ही पलों की सहेली थी, ने अस्मिता के मनोबल और उसे, एक हद तक टूटने नहीं दिया. उसे समझाया, ‘‘ऐसे एकतरफा रिश्तों से जिंदगी नहीं चलती. अगर आप किसी से प्यार करते हो और वह नहीं करता. तो आप चाहे जितनी भी कोशिश कर लो, कुछ नहीं हो सकता. और ऐसे में आत्मसम्मान सब से अहम होता है.’’ कहीं न कहीं अस्मिता की इस हालत की जिम्मेदार वह खुद को भी ठहराती थी. उस ने कभी भी अस्मिता को अकेला नहीं छोड़ा. हर समय उसे टूटने से बचाया वरना इतना अपमान और असम्मान सहना किसी लड़की के लिए आसान नहीं था. दीपिका की कोशिश का ही नतीजा था कि इतने अपमान, असम्मान के बाद भी अस्मिता ने ठान लिया, ‘‘अब मैं नहीं रोऊंगी. मैं जिंदगी में आगे बढ़ूंगी, कुछ करूंगी. एक हादसे की वजह से मेरी पूरी जिंदगी खराब नहीं हो सकती.’’
अब वह समर को याद भी नहीं करना चाहती थी. समर उस की जिंदगी में अब कोई माने नहीं रखता. लेकिन उस के धोखे को वह माफ नहीं कर पाई. प्यार करना उस ने यदि समर से मिल कर सीखा तो प्यार का सही मतलब और वादे का सही मतलब, शायद समर को अस्मिता से समझना चाहिए था. समर ने सिर्फ प्यार ही नहीं, धोखा क्या होता है, यह भी समझा दिया था. समर से मिल कर उस के साथ रिश्ते में रह कर, अस्मिता का प्यार पर से यकीन उठ चुका अब. वाकई कितनी छोटी उम्र होती है ऐसे प्यार की. शायद सिर्फ शारीरिक आकर्षण आधार होता है. तभी तो इसे कच्ची उम्र का प्यार कहते हैं ‘टीनऐजर्स लव.
नरेंद्र ने एक सप्ताह की छुट्टी ले ली थी. मोहिनी सोच रही थी कि शायद वे दोनों कहीं बाहर जाएंगे. किंतु नरेंद्र ने उस से बिना कुछ छिपाए अपने मन की बात उस के सामने रख दी, ‘‘मांजी और छोटे भाइयों को अकेला छोड़ कर हमारा घूमने जाना उचित नहीं.’’
मोहिनी खुशीखुशी पति की बात मान गई थी. उसे तो वैसे भी अपने दोनों छोटे देवर बहुत प्यारे लगते थे. मायके में बहनें तो थीं, लेकिन छोटे भाई नहीं. हृदय के किसी कोने में छिपा यह अभाव भी मानो पूरा होने को था. किंतु वे दोनों तो उस से इस कदर शरमाते थे कि दूरदूर से केवल देखते भर रहते थे. कभी मोहिनी से आंखें मिल जातीं तो शरमा कर मुंह छिपा लेते. तब मोहिनी हंस कर रह जाती और सोचती, ‘कभी तो उस से खुलेंगे.’ एक दिन मोहिनी को अवसर मिल ही गया. दोपहर का समय था. नरेंद्र किसी काम से बाहर गए हुए थे और मां पड़ोस में किसी से मिलने गई हुई थीं. अचानक दोनों देवर रमेश और सुरेश किताबें उठाए स्कूल से वापस आ गए.
‘‘मां, जल्दी से खाना दो, स्कूल में छुट्टी हो गई है. अब हम मैच खेलने जा रहे हैं.’’ किताबें पटक कर दोनों रसोई में आ धमके, किंतु वहां मां को न पा दोनों पलटे तो दरवाजे पर भाभी खड़ी थीं, हंसती, मुसकराती.
‘‘मैं खाना दे दूं?’’ मोहिनी ने हंस कर पूछा तो दोनों सकुचा कर बोले, ‘‘नहीं, मां ही दे देंगी, वे कहां गई हैं?’’
‘‘पड़ोस में किसी से मिलने गई हैं. उन्हें तो मालूम नहीं था कि आप दोनों आने वाले हैं. चलिए, मैं गरमगरम परांठे सेंक देती हूं.’’
मोहिनी ने रसोई में रखी छोटी सी मेज पर प्लेटें लगा दीं. सुबहसुबह जल्दी से सब यहीं इसी मेज पर खापी कर भागते थे. मोहिनी ने फ्रिज से सब्जी निकाल कर गरम की. कटा हुआ प्याज, हरीमिर्च, अचार सबकुछ मेज पर रखा. फ्रिज में दही दिखाई दिया तो उस का रायता भी बना दिया. ये सारी तैयारी देख रमेश व सुरेश कूद कर मेज के पास आ धमके. जल्दीजल्दी गरम परांठे उतार कर देती भाभी से खाना खातेखाते उन की अच्छीखासी दोस्ती भी हो गई. स्कूल के दोस्तों का हाल, मैच में किस की टीम अच्छी है, कौन सा टीचर अच्छा है, कौन नहीं आदि सब खबरें मोहिनी को मिल गईं. उस ने उन्हें अपने मायके के किस्से सुनाए. बिंदु और मीनू के साथ होने वाले छोटेमोटे झगड़े और फिर छत पर बैठ कर उस का कविताएं लिखना, सबकुछ सुरेश, रमेश को पता लग गया. ‘‘अरे वाह भाभी, तुम कविता लिखती हो? तब तो तुम हमें हिंदी भी पढ़ा सकती हो?’’ सुरेश उत्साहित हो कर बोला.
‘‘हांहां, क्यों नहीं. अपनी किताबें मुझे दिखाना. हिंदी तो मेरा प्रिय विषय है. कालेज में तो…’’ और मोहिनी बोलतेबोलते सहसा रुक गई क्योंकि चेहरे पर अजीब सा भाव लिए मांजी दरवाजे के पास खड़ी थीं. मोहिनी से कुछ न कह वे अपने दोनों बेटों से बोलीं, ‘‘तुम दोनों मेरे आने तक रुक नहीं सकते थे.’’
रमेश और सुरेश को तो मानो सांप ही सूंघ गया. मां के चेहरे का यह कठोर भाव उन के लिए नया था. भाभी से खाना मांग कर उन्होंने क्या गलती कर दी है, समझ न सके. हाथ का कौर हाथ में ही पकड़े खामोश रह गए. पल दो पल तो मोहिनी भी चुप ही रही, फिर हौले से बोली, ‘‘ये दोनों तो आप ही को ढूंढ़ रहे थे. आप थीं नहीं तो मैं ने सोचा, मैं ही खिला दूं.’’
‘‘क्यों? क्या घर में फल, डबलरोटी… कुछ भी नहीं था जो परांठे सेंकने पड़े?’’ मां ने तल्खी से पूछा.
‘‘ऐसा नहीं है मांजी. मैं ने सोचा बच्चे हैं, जोर की भूख लगी होगी, इसलिए बना दिए.’’
‘‘तुम्हारे बच्चे तो नहीं हैं न? मैं खुद ही निबट लेती आ कर,’’ अत्यंत निर्ममतापूर्वक कही गई सास की यह बात मोहिनी को मानो अंदर तक चीर गई, ‘क्या रमेश, सुरेश उस के कुछ नहीं लगते? नरेंद्र के छोटे भाइयों को प्यार करने का क्या उसे कोई हक नहीं? उन पर केवल मां का ही एकाधिकार है क्या? फिर कल जब ये दोनों भी बड़े हो जाएंगे तो मांजी क्या करेंगी? विवाह तो इन के भी होंगे ही, फिर…?’
रमेश व सुरेश न जाने कब के अपने कमरों में जा दुबके थे और मांजी अपनी तीखी दृष्टि के पैने चुभते बाणों से मोहिनी का हृदय छलनी कर अपने कमरे में जा बैठी थीं. एक अजीब सा तनाव पूरे घर में छा गया था. मोहिनी की आंखें छलछला आईं. उसे याद आया अपना मायका, जहां वह किसी पक्षी की भांति स्वतंत्र थी, जहां उस का अपना आसमान था, जिस के साथ अपने छोटेमोटे सुखदुख बांट कर हलकी हो जाती थी. मोहिनी को लगा, अब भी उस के साथसाथ चल कर आया आसमान का वह नन्हा टुकड़ा उस का साथी है, जो उसे हाथ हिलाहिला कर ऊपर बुला रहा है. वह नरेंद्र की अलमारी में कुछ ढूंढ़ने लगी. एक सादी कौपी और पैन उसे मिल ही गया. जल्दीजल्दी धूलभरी सीढि़यां चढ़ती हुई वह छत पर जा पहुंची. कैसी शांति थी वहां, मानो किसी घुटनभरी कैद से मुक्ति मिली हो. मन किसी पक्षी की भांति बहती हवा के साथ उड़ने लगा. धूप छत से अभीअभी गई थी. पूरा माहौल गुनगुना सा था. वहीं जीने की दीवार से पीठ टिका कर मोहिनी बैठ गई और कौपी खोल कर कोई प्यारी सी कविता लिखने की कोशिश करने लगी.
विचारों में उलझी मोहिनी के सामने सास का एक नया ही रूप उभर कर आया था. उसे लगा, व्यर्थ ही वह मांजी से अपने लिए प्यार की आशा लगाए बैठी थी. इन के प्यार का दायरा तो इतना सीमित, संकुचित है कि उस में उस के लिए जगह बन ही नहीं सकती और जैसेजैसे उन के बेटों के विवाह होते जाएंगे, यह दायरा और भी सीमित होता जाएगा, इतना सीमित कि उस में अकेली मांजी ही बचेंगी. मोहिनी के मुंह में न जाने कैसी कड़वाहट सी घुल गई. उस का हृदय वितृष्णा से भर उठा. जीवन का एक नया ही पक्ष उस ने देखा था. शायद नरेंद्र भी 23 वर्षों में अपनी मां को इतना न जान पाए होंगे जितना इन कुछ पलों में मोहिनी जान गई. साथ ही, वह यह भी जान गई कि प्यार यदि बांटा न जाए तो कितना स्वार्थी हो सकता है. मोहिनी ने मन ही मन एक निश्चय किया कि वह प्यार को इन संकुचित सीमाओं में कैद नहीं करेगी. मांजी को बदलना ही होगा. प्यार के इस सुंदर कोमल रूप से उन्हें परिचित कराना ही होगा.
‘‘यहां पर तो मेरी जान जा रही है और तुम्हें मस्ती सूझ रही है. पता नहीं, घर वाले क्याक्या सोच रहे होंगे?’’ ‘‘तुम तो ऐसे डर रही हो, जैसे मैं तुम्हें यहां पर भगा कर लाया हूं.’’ शिवेश ने जोरदार ठहाका लगाते हुए कहा. ‘‘चलो, घर वालों को बता दो.’’ ‘‘बता दिया जी.’’ ‘‘वैरी गुड.’’ ‘‘जी मैडम, अब चलो कुछ खायापीया जाए.’’ दोनों स्टेशन परिसर से बाहर आए. कई होटल खुले हुए थे. ‘‘चलो फुटपाथ के स्टौल पर खाते हैं,’’ शिवेश ने कहा.
स्टेशन के बाहर सभी तरह के खाने के कई स्टौल थे. वे एक स्टौल के पास रुके. एक प्लेट चिकन फ्राइड राइस और एक प्लेट चिकन लौलीपौप ले कर एक ही प्लेट में दोनों ने खाया. ‘‘अब मैरीन ड्राइव चला जाए?’’ शिवेश ने प्रस्ताव रखा. ‘‘इस समय…? रात के 2 बजने वाले हैं. मेरा खयाल है, स्टेशन के आसपास ही घूमा जाए. एकडेढ़ घंटे की ही तो बात है,’’ शिवानी ने उस का प्रस्ताव खारिज करते हुए कहा. ‘‘यह भी सही है,’’ शिवेश ने भी हथियार डाल दिए. वे दोनों एक बस स्टौप के पास आ कर रुके. यहां मेकअप में लिपीपुती कुछ लड़कियां खड़ी थीं.
शिवेश और शिवानी ने एकदूसरे की तरफ गौर से देखा. उन्हें मालूम था कि रात के अंधेरे में खड़ी ये किस तरह की औरतें हैं. वे दोनों जल्दी से वहां से निकलना चाहते थे. इतने में जैसे भगदड़ मच गई. बस स्टौप के पास एक पुलिस वैन आ कर रुकी. सारी औरतें पलभर में गायब हो गईं. लेकिन मुसीबत तो शिवानी और शिवेश पर आने वाली थी. ‘‘रुको, तुम दोनों…’’ एक पुलिस वाला उन पर चिल्लाया. शिवानी और शिवेश दोनों ठिठक कर रुक गए.
‘‘इतनी रात में तुम दोनों इधर कहां घूम रहे हो?’’ एक पुलिस वाले ने पूछा. ‘‘अरे देख यार, यह औरत तो धंधे वाली लगती है,’’ दूसरे पुलिस वाले ने बेशर्मी से कहा. ‘‘किसी शरीफ औरत से बात करने का यह कौन सा नया तरीका है?’’ शिवेश को गुस्सा आ रहा था. ‘‘शरीफ…? इतनी रात में शराफत दिखाने निकले हो शरीफजादे,’’ एक सिपाही ने गौर से शिवानी को घूरते हुए कहा. ‘‘वाह, ये धंधे वाली शरीफ औरतें कब से बन गईं?’’ दूसरे सिपाही ने एक भद्दी हंसी हंसते हुए कहा.
शिवेश का जी चाहा कि एक जोरदार तमाचा जड़ दे. ‘‘देखिए, हम लोग सरकारी दफ्तर में काम करते हैं. आखिरी लोकल मिस हो गई, इसलिए हम लोग फंस गए,’’ शिवेश ने समाने की कोशिश की. ‘‘वाह, यह तो और भी अजीब बात है. कौन सा सरकारी विभाग है, जहां रात के 12 बजे छुट्टी होती है? बेवकूफ बनाने की कोशिश न करो.’’ ‘‘ये रहे हमारे परिचयपत्र,’’ कहते हुए शिवेश ने अपना और शिवानी का परिचयपत्र दिखाया. ‘‘ठीक है. अपने किसी भी औफिस वाले से बात कराओ, ताकि पता चल सके कि तुम लोग रात को 12 बजे तक औफिस में काम कर रहे थे,’’ इस बार पुलिस इंस्पैक्टर ने पूछा, जो वैन से बाहर आ गया था. ‘‘इतनी रात में किसे जगाऊं? सर, बात यह है कि हम ने औफिस के बाद नाइट शो का प्लान किया था. ये रहे टिकट,’’ शिवेश ने टिकट दिखाए.
‘‘मैं कुछ नहीं सुनूंगा. अब तो थाने चल कर ही बात होगी. चलो, दोनों को वैन में डालो,’’ इंस्पैक्टर वरदी के रोब में कुछ सुनने को तैयार ही नहीं था. शिवानी की आंखों में आंसू आ गए. बुरी तरह घबराए हुए शिवेश की समा में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? किसे फोन करे? अचानक एक सिपाही शिवेश को पकड़ कर वैन की तरफ ले जाने लगा. शिवानी चीख उठी, ‘‘हैल्प… हैल्प…’’ लोगों की भीड़ तो इकट्ठा हुई, पर पुलिस को देख कर कोई सामने आने की हिम्मत नहीं कर पाया.
थोड़ी देर में एक अधेड़ औरत भीड़ से निकल कर सामने आई. ‘‘साहब नमस्ते. क्यों इन लोगों को तंग कर रहे हो? ये शरीफ इज्जतदार लोग हैं,’’ वह औरत बोली. ‘‘अब धंधे वाली बताएगी कि कौन शरीफ है? चल निकल यहां से, वरना तुझे भी अंदर कर देंगे,’’ एक सिपाही गुर्राया. ‘‘साहब, आप को भी मालूम है कि इस एरिया में कितनी धंधे वाली हैं. मैं भी जानती हूं कि यह औरत हमारी तरह नहीं है.’’ ‘‘इस बात का देगी बयान?’’ ‘‘हां साहब, जहां बयान देना होगा, दे दूंगी. बुला लेना मुझे. हफ्ता बाकी है, वह भी दे दूंगी. लेकिन अभी इन को छोड़ दो,’’ इस बार उस औरत की आवाज कठोर थी. ‘हफ्ता’ शब्द सुनते ही पुलिस वालों को मानो सांप सूंघ गया. इस बीच भीड़ के तेवर भी तीखे होने लगे.
पुलिस वालों को समा में आ गया कि उन्होंने गलत जगह हाथ डाला है. ‘‘ठीक है, अभी छोड़ देते हैं, फिर कभी रात में ऐसे मत भटकना.’’ ‘‘वह तो कल हमारे मैनेजर ही एसपी साहब से मिल कर बताएंगे कि रात में उन के मुलाजिम क्यों भटक रहे थे,’’ शिवेश बोला. ‘‘जाने दे भाई, ये लोग मोटी चमड़ी के हैं. इन पर कोई असर नहीं होगा,’’ उस अधेड़ औरत ने शिवेश को समाते हुए कहा. ‘‘अब निकलो साहब,’’ उस औरत ने पुलिस इंस्पैक्टर से कहा. सारे पुलिस वाले उसे, शिवानी, शिवेश और भीड़ को घूरते हुए वैन में सवार हो गए. वैन आगे बढ़ गई. शिवेश और शिवानी ने राहत की सांस ली.
‘‘आप का बहुतबहुत शुक्रिया. आप नहीं आतीं तो उन पुलिस वालों को समाना मुश्किल हो जाता,’’ शिवानी ने उस औरत का हाथ पकड़ कर कहा. ‘‘पुलिस वालों को समाना शरीफों के बस की बात नहीं. अब जाओ और स्टेशन के आसपास ही रहो,’’ उस अधेड़ औरत ने शिवानी से कहा. ‘‘फिर भी, आप का एहसान हम जिंदगीभर नहीं भूल पाएंगे. कभी कोई काम पड़े तो हमें जरूर याद कीजिएगा,’’ शिवेश ने अपना विजिटिंग कार्ड निकाल कर उसे देते हुए कहा. ‘‘यह कार्डवार्ड ले कर हम क्या करेंगे? रहने दे भाई,’’ उस औरत ने कार्ड लेने से साफ इनकार कर दिया.
शिवानी ने शिवेश की तरफ देखा, फिर अपने पर्स से 500 रुपए का एक नोट निकाल कर उसे देने के लिए हाथ आगे बढ़ाया. ‘‘कर दी न छोटी बात. तुम शरीफों की यही तकलीफ है. हर बात के लिए पैसा तैयार रखते हो. हर काम पैसे के लिए नहीं करती मैं…’’ उस औरत ने हंस कर कहा. ‘‘अब जाओ यहां से. वे दोबारा भी आ सकते हैं.’’ शिवेश और शिवानी की भावनाओं पर मानो घड़ों पानी फिर गया. वे दोनों वहां से स्टेशन की तरफ चल पड़े, पहली लोकल पकड़ने के लिए. पहली लोकल मिली. फर्स्ट क्लास का पास होते हुए भी वे दोनों सैकंड क्लास के डब्बे में बैठ गए. ‘‘क्यों जी, आज सैकंड क्लास की जिद क्यों?’’ शिवानी ने पूछा. ‘‘ऐसे ही मन किया. पता है, एक जमाने में ट्रेन में थर्ड क्लास भी हुआ करती थी,’’ शिवेश ने गंभीरता से कहा.
‘‘उसे हटाया क्यों?’’ शिवानी ने बड़ी मासूमियत से पूछा. ‘‘सरकार को लगा होगा कि इस देश में 2 ही क्लास होनी चाहिए. फर्स्ट और सैकंड,’’ शिवेश ने कहा, ‘‘क्योंकि, सरकार को यह अंदाजा हो गया कि जिन का कोई क्लास नहीं होगा, वे लोग ही फर्स्ट और सैकंड क्लास वालों को बचाएंगे और वह थर्ड, फोर्थ वगैरहवगैरह कुछ भी हो सकता है,’’ शिवेश ने हंसते हुए कहा. ‘‘बड़ी अजीब बात है. अच्छा, उस औरत को किस क्लास में रखोगे?’’ शिवानी ने मुसकरा कर पूछा. ‘‘हर क्लास से ऊपर,’’ शिवेश ने जवाब दिया. ‘‘सच है, आज के जमाने में खुद आगे बढ़ कर कौन इतनी मदद करता है.
हम जिस्म बेचने वालियों के बारे में न जाने क्याक्या सोचते रहते हैं. कम से कम अच्छा तो नहीं सोचते. वह नहीं आती तो पुलिस वाले हमें परेशान करने की ठान चुके थे. हमेशा सुखी रहे वह. अरे, हम ने उन का नाम ही नहीं पूछा.’’ ‘‘क्या पता, वह अपना असली नाम बताती भी या नहीं. वैसे, एक बात तो तय है,’’ शिवेश ने कहा. ‘‘क्या…?’’ ‘‘अब हम कभी आखिरी लोकल पकड़ने का खतरा नहीं उठाएंगे. चाहे तुम्हारे हीरो की कितनी भी अच्छी फिल्म क्यों न हो?’’ शिवेश ने उसे चिढ़ाने की कोशिश की.
‘‘अब इस में उस बेचारे का क्या कुसूर है? चलो, अब ज्यादा खिंचाई न करो. मो सोने दो,’’ शिवानी ने अपना सिर उस के कंधे पर टिकाते हुए कहा. ‘‘अच्छा, ठीक है,’’ शिवेश ने बड़े प्यार से शिवानी की तरफ देखा. कई स्टेशनों पर रुकते हुए लोकल ट्रेन यानी मुंबई के ‘जीवन की धड़कन’ चल रही थी.
शिवेश सोच रहा था, ‘सचमुच जिंदगी के कई पहलू दिखाती है यह लोकल. आखिरी लोकल ट्रेन छूट जाए तब भी और पकड़ने के बाद तो खैर कहना ही क्या…’ शिवेश ने शिवानी की तरफ देखा, उस के चेहरे पर बेफिक्री के भाव थे. बहुत प्यारी लग रही थी वह.