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डिग्री : यश के पिता क्या कहना चाहते थे

रोहन दोपहर के खाने के बाद औफिस में सुस्ता रहा था. औफिस का कामधंधा तो बढ़िया टनाटन चल रहा है, फिर भी सोच उन की पुत्री नेहा पर अटक गई.

नेहा 32  वर्ष की हो गई है. रोहन की सोच नेहा के विवाह की थी. इस उम्र तक पुत्री का विवाह हो जाना चाहिए.

हुआ कुछ यों, पहले नेहा ने विवाह के लिए इनकार कर दिया. जब तक उस की पढ़ाई समाप्त नहीं हो जाती, वह विवाह नहीं करेगी. नेहा पढ़ने में होशियार थी. बी कौम के साथ चार्टर्ड अकाउंटेंसी की पढ़ाई कर रही थी. बी कौम फर्स्ट डिवीजन में पास कर ली. सीए इंटर भी पास हो गया. सीए फाइनल में अटक गई. नेहा ने ठान लिया जब तक सीए नहीं बन जाती, शादी नहीं करेगी. एक ग्रुप अटका हुआ था, आखिर 2 वर्ष बाद सफलता मिल ही गई. नेहा सीए बन गई और नौकरी भी करने लगी.

रोहन ने पत्नी रिया के माध्यम से नेहा से कहना आरंभ कर दिया. विवाह कर ले. नेहा ने अपनी पसंद से विवाह की बात की.

कालेज के दिनों में नेहा की मित्रता नयन से गाढ़ी हो गई थी. नयन के पिता का अपना व्यापार था. नेहा और नयन एकदूसरे के घर आतेजाते रहते थे. रिया को ऐसा महसूस हुआ, नेहा की पहली और अंतिम पसंद नयन ही है.

रोहन और रिया को नयन के साथ रिश्ते में कोई आपत्ति नहीं थी. उन्हें नेहा की हरी झंडी की प्रतीक्षा थी.

जहां नेहा ने फर्स्ट डिवीजन में बी कौम किया, नयन थर्ड डिवीजन में पास हुआ. उस ने भी सीए में दाखिला तो लिया लेकिन इंटर में लुढ़क गया और सीए की पढ़ाई छोड़ कर अपने पिता के व्यापार में सैट हो गया.

नेहा के सीए बनने पर रोहन और रिया ने एक शानदार पार्टी का आयोजन किया और अपने दिल की बात नयन के पिता को बता ही दी. नयन के पिता ने एक सप्ताह बाद बातचीत करने को कहा.

एक रैस्त्रां में रोहन और रिया नयन के मातापिता से मिले. कुछ औपचारिक कुशलक्षेम की बातें हुईं और फिर रोहन सीधे मुद्दे की बात पर आए.

“नेहा और नयन कालेजके दिनों से घनिष्ठ मित्र हैं और मेरी इच्छा है हम दोनों के विवाह के लिए सहमत हो जाएं.”

नयन के मातापिता का जवाब सुन कर रोहन का माथा घूम गया.

“माना दोनों बहुत वर्षों से दोस्त हैं. दोस्ती का यह मतलब नहीं होता, वे आपस में विवाह भी करें.”

“अच्छी दोस्ती का सीधा अर्थ होता है, वे एकदूसरे को अच्छी तरह समझते हैं. विवाह सफल रहेगा,” रोहन ने अपना मत रखा.

“देखिए, नयन बी कौम है और हमारे पारिवारिक व्यवसाय में रचबस गया है. उस के लिए कई व्यापारिक घरानों से रिश्ते आ रहे हैं. हम उन रिश्तों पर भी विचार कर रहे हैं.”

“मेरा भी अपना व्यापार है. दादा जी ने एक दुकान से काम आरंभ किया था, अब 2 फैक्ट्री हैं,” रोहन ने नयन के पिता को प्रभावित किया.

“वह तो ठीक है लेकिन हमें अधिक पढ़ीलिखी लड़की बहू के रूप में स्वीकार्य नहीं है.”

“शादी का पढ़ाई से क्या संबंध है. लड़का और लड़की जब एकदूसरे को पसंद करते हैं तब पढ़ाई आड़े नहीं आती.”

“हम आप की बात से सहमत नहीं हैं. आप की लड़की हमारे लड़के से अधिक पढ़ी है. स्वाभाविक रूप से वह अपनी पढ़ाई का रोब डाल कर लड़के से ऊपर रहेगी. नयन कुंठा में नहीं जीना चाहता. हमें सिर्फ बी कौम पास लड़की ही चाहिए, जो नयन की बराबरी करे लेकिन ऊपर रहने का रोब न डाले,” नयन के पिता ने दो टूक कह दिया.

रोहन ने बात संभालने का प्रयास किया, “नेहा और नयन एकसाथ घूम फिर रहे हैं. दोनों खुश हैं. मुझे तो कभी एहसास नहीं हुआ, नेहा को अपने सीए होने का घमंड हो या नयन को कभी ताना मारा हो. जब अच्छे मित्र पतिपत्नी बनते हैं तब उन का प्यार और निखरता है. नेहा सीए है, उस की पढ़ाई आप के काम आएगी. उस के ज्ञान और टैक्स की जानकारी से आप को फायदा होगा, आप के व्यापार को फायदा होगा.”

“फिर तो हमारे ऊपर भी रोब डालेगी, हमें कुछ नहीं आता. सब ज्ञान उसी को है. हम जिस सीए से काम कराते हैं वह हमें सलाम मारता है और झुक कर काम करता है. उस को मालूम है अधिक टूंटा की तो किसी और सीए से काम करवा लेंगे. अगर नेहा ने हमारा काम संभाला तब वह बहू नहीं, हमारा बाप बन जाएगी जो हम नहीं चाहते.”

रोहन नयन के पिता के तर्क सुन कर चुप हो गया. उस ने कभी सोचा नहीं था आज के आधुनिक युग में भी पुरानी सोच के लोग जी रहे हैं.

नेहा और नयन अच्छे मित्र तो थे लेकिन पतिपत्नी नहीं बन सके. जो सपने संजोए थे उन्होंने, धाराशाही हो गए.

कुछ दिनों बाद नयन की शादी का समाचार मिला. एक बार फिर रिया ने बात छेड़ी.

“तेरी कोई पसंद हो, तो बता. कोई औफिस सहपाठी या फिर कोई मित्र?”

नेहा ने कुछ समय मांगा. अभी नौकरी बदलनी है. कुछ समय बाद सोचेगी. लड़की सीए है, अच्छी नौकरी है. सैलरी बढ़िया है. रिश्तेदारों ने भी अपने लड़कों के लिए रिश्ते भेजने बंद नहीं किए थे.

रोहन औफिस में यही सोच रहा था. लड़की हो या लड़का, हर किसी को शारीरिक जरूरतों के लिए विवाह के बंधन में बंधना होता है. कुदरत के नियम पर समाज ने अपनी मोहर लगाई है. नयन की शादी हो गई. नेहा को कुछ सोचना चाहिए. जब उसे खुली छूट दी है, जिस लड़के को पसंद करेगी उसी से विवाह करा देंगे. इसी उधेड़बुन में रिया को फोन लगाया.

“मैं आज रात फाइनल बात करती हूं. आज भी मेरे पास 2 रिश्ते आए हैं, क्या जवाब दूं. कब तक मना करती रहूं. एक समय बाद तो रिश्ते आने भी बंद हो जाएंगे.”

रात को नेहा ने कह दिया, “नयन के बाद कोई लड़का उसके जीवन में नहीं है. आप के सुझाए लड़के पर वह विचार करेगी.”

रोहन और रिया को इस जवाब पर प्रसन्नता हुई. आए रिश्तों पर चर्चा होने लगी. कुछ लड़के नेहा की 32 वर्ष उम्र देखते ही पीछे हट गए, हमें अपने से बड़ी उम्र की लड़की नहीं चाहिए.

बिरादरी के होली मिलन पर रोहन, रिया और नेहा हंस-मिल कर सभी से बातें कर रहे थे. कुछ आंखें संभावित बहू और वर की तलाश में थीं.

“और रिया, अपने को खूब मेंटेन कर रखा है,” सुकन्या ने हायहेलो करते हुए पूछा.

“थैंकयू, और बता, क्या चल रहा है?”

“इस से तो मिलवा,” नेहा को देख कर पूछा.

“अब वर्षों बाद मिल रही है, भूल गई क्या. मेरा एक ही तो बच्चा है, नेहा.”

“हाऊ स्वीट, बड़ी प्यारी बच्ची है. शादी का कोई इरादा है क्या?”

“सीए बन गई है. गुरुग्राम में नौकरी कर रही है. कोई लड़का हो तो बताना,” रिया ने सुकन्या के कान में बात डाल दी.

“नेकी और पूछपूछ. वह सामने देख लड़का, जंचे तो बता. अभी मिलवा देती हूं.”

“कौन है?”

“मेरी भाभी का लड़का है. गुरुग्राम में सौफ्टवेयर इंजीनियर है.”

सुकन्या रिया का हाथ पकड़ कर अपनी भाभी से मिलवाने ले गई. लड़के का नाम यश था. रिया और यश को मिलवाया. खैर, मिलने का पहला अवसर था. बस, हायहेलो हुई.

रिया ने यह अवसर लपक लिया. सुकन्या और उस की भाभी से पूरी जानकारी प्राप्त कर ली.

नेहा खूबसूरत थी. यश भी हैंडसम था. पहली नजर में दोनों एकदूसरे के परिवार को पसंद आ गए. 2 दिनों बाद रविवार था. सुकन्या के घर मिलने का कार्यक्रम तय हुआ. रोहन का पहला अनुभव खट्टा रहा था, इसलिए उस ने एक रैस्त्रां में मिलने का कार्यक्रम तय किया.

रैस्त्रां में नेहा और यश अलग टेबल पर बैठ कर बातचीत करने लगे.

रोहन ने यश के परिवार को स्पष्ट कर दिया. नेहा सीए है और यश सिर्फ बी टैक है. देखा जाए तो नेहा की डिग्री बड़ी है. और दूसरी बात यह है कि नेहा की उम्र 32 वर्ष है और यश की आप ने 30 वर्ष बताई है. मुझे और रिया को कोई फर्क नहीं पड़ता. भारतीय समाज में आज भी कुछ पुरानी सोच के व्यक्ति हैं जो विवाह के समय लड़की का कम पढ़ा होना और छोटी उम्र का होना पसंद करते हैं.

यश के पिता ने रोहन का हाथ पकड़ा और एक अलग टेबल पर ले गए. रोहन को कुछ समझ नहीं आया. आखिर, एकांत में क्या कहना चाहते हैं.

“देखो, एक अंदर की बात बताता हूं. मैं इन बातों पर विश्वास नहीं रखता हूं.”

“यह तो आप का बड़प्पन है,” रोहन ने यश के पिता का शुक्रिया अदा किया कि वे दकियानूस नहीं हैं.

“पहले नेहा और यश अपनी पसंद बताएं. उन की पसंद मिल जाए तो आप को वह बात बताऊंगा जिस के लिए मैं आप को अलग टेबल पर लाया हूं.”

कुछ बातें हुईं. खाना हुआ और सभी अपने घर वापस आ गए. रोहन उस बात को समझने की कोशिश कर रहा था, यश के पिता क्या कहना चाहते थे, कहीं बेवकूफ तो नहीं बना रहे.

रात को नेहा और यश ने अपनी अपनी स्वीकृति प्रदान की. रोहन और रिया के चेहरे पर रौनक आ गई. अगले रविवार शगुन की थाली ले कर रोहन यश के घर पहुंचे. रिश्ता पक्का हुआ.

मुसकराते हुए यश के पिता रोहन को फिर एकांत में ले गए.

“वह एक बात रह गई जो उस दिन रैस्त्रां में बतानी थी.”

“जी, कहिए.”

“शादी के समय मैं सिर्फ 12वीं पास था. 33 फीसदी के साथ पास हुआ. कालेज में एडमिशन के लिए कम से कम 40 फीसदी नंबर चाहिए होते हैं. मैं तो स्टौकब्रोकर बन गया. यश की मां एमए पास है. जब मुझे मालूम हुआ, नेहा सीए है तब सब से बड़ी खुशी मुझे हुई. नेहा से कहना, नौकरी छोड़ कर मेरे औफिस में हाथ बंटाए.”

रोहन मुसकरा दिया. यश के पिता को गले लगाया. मुड़ कर देखा, नेहा और यश एकदूसरे कमरे में बतिया रहे थे. उन दोनों को डिग्री से अधिक एकदूसरे के विचारों से मतलब था.

मेरा बेटा शादी के लिए तैयार नहीं है, कैसे उसे समझाएं?

सवाल

बेटा शादी के लिए तैयार नहीं. बेटे की उम्र 28 साल है. जहां तक कैरियर में सैटल होने की बात है तो वह अच्छी नौकरी कर रहा है. घर में किसी चीज की कमी नहीं है. मातापिता होने के नाते घर हम चलाते हैं. बेटे से हम ने कभी उस की सैलरी का एक पैसा भी नहीं लिया.  हां, अपने खर्चे वह खुद करता है. हम उसे यह सम?ाते हैं कि शादी करनी है तो यह सही उम्र है. तुम्हारे ऊपर कोई पारिवारिक जिम्मेदारी भी नहीं. लेकिन वह राजी ही नहीं होता शादी के लिए. कैसे उसे विवाह के लिए तैयार करें?

जवाब

मातापिता यही चाहते हैं कि उन के बच्चों की शादी हो जाए और उन का घर बस जाए. ठीक भी है. यदि शादी करनी है तो समय से हो जाए तो हर तरह से ठीक रहता है. शारीरिक रूप से भी और आर्थिक रूप से भी. लेकिन आजकल देखने में आ रहा है कि बच्चे उम्र होने के बावजूद, सैटल हो जाने के बाद भी शादी नहीं करना चाहते. यहां तक देखने को मिल रहा है कि वे रिलेशनशिप में रहने लगते हैं लेकिन शादी नहीं करना चाहते.

खैर, आप बेटे की शादी से इनकार करने की वजह जानें. अगर समस्या का हल निकल सकता है तो जरूर निकालें. कई बार युवा बच्चे अपने कैरियर को ले कर ज्यादा गंभीर होते हैं तो इस बारे में भी उन्हें सम?ाएं कि पूरी तरह सैटल तो व्यक्ति 35-40 की उम्र में जा कर होता है. तब तक का इंतजार करना बेवकूफी है.

कई बार ऐसा होता है कि अपनी पसंद का जीवनसाथी नहीं मिलने की वजह से वे शादी से भागने लगते हैं. ऐसे में आप अपने बेटे से इस बारे में खुल कर बात करें कि उसे किस तरह का जीवनसाथी चाहिए. शादी के लिए लड़की ढूंढ़ने में बच्चे की पसंद का ध्यान रखें.

हो सकता है आप के बेटे ने कोई लड़की पसंद कर रखी हो और वह आप के मापदंडों पर पूरी न उतरती हो या किसी लड़की को वह पसंद करता हो लेकिन उस से बोलने की हिम्मत न कर पा रहा तो इस में भी आप मातापिता होने के नाते उस की मदद कर सकते हैं. उस लड़की के घरवालों से आप बात कर सकते हैं.

आखिर में हम यह बात जरूर कहना चाहेंगे कि बेटे पर शादी को ले कर किसी तरह का दबाव न बनाएं. इस से उस की मैंटल हैल्थ पर काफी असर पड़ेगा. इतना ही नहीं, कई बार दबाव में आ कर बच्चे शादी तो कर लेते हैं लेकिन बाद में आने वाली परेशानियों का ठीकरा पेरैंट्स पर फोड़ते हैं. ऐसे में हमेशा बच्चे से बात करने और उस की हां बोलने के बाद ही शादी की बात आगे चलाएं.

अमीर देशों में प्रजनन दर में निरंतर गिरावट

पिछले दिनों भाजपा नेता बड़ा होहल्ला मचा रहे थे कि हिंदुओं की संख्या कम हो रही है, मुसलमानों की संख्या बढ़ रही है, हिंदू खतरे में है, वगैरहवगैरह. हालांकि, लोकसभा चुनाव के दौरान ध्रुवीकरण की कोशिश के मद्देनजर जिस आंकड़े के आधार पर वे होहल्ला मचा रहे थे वह, दरअसल, 1950 और 2015 के बीच की स्टडी थी.

मोदी सरकार ने तो जाति आधारित जनगणना कभी करवाई ही नहीं कि जिस से पता चले कि किस धर्म-जाति के लोगों की संख्या बढ़ी या कम हुई. फिर यह समझना भी जरूरी है कि जन्मदर में बदलाव के पीछे आर्थिक और सामाजिक कारण होते हैं और इस का किसी धर्म से कोई संबंध नहीं होता है. जन्मदर में गिरावट शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य सेवाओं तक बेहतर पहुंच का नतीजा है.

बीते एक दशक में दुनियाभर के देशों में प्रजनन दर बहुत तेजी से गिर रही है. यूएस सैंटर फौर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवैंशन की हालिया रिपोर्ट यह कहती है कि 2023 में अमेरिका की प्रजनन दर में 2 फीसद की गिरावट आई है. कोरोना महामारी के चरम समय प्रजनन दर में कुछ वृद्धि हुई थी क्योंकि लगभग 2 साल तक लौकडाउन के चलते पतिपत्नी घर पर एकसाथ रहे और उन के एकांत में खलल डालने वाले रिश्तेदार उन से दूर रहे. लिहाजा, औरतें ज्यादा प्रैगनैंट हुईं, यह दुनियाभर में हुआ परंतु यह वृद्धि अस्थाई थी.

हालांकि, 1971 के बाद से अमेरिकी प्रजनन दर लगातार गिर रही है. अधिक वैश्विक परिप्रेक्ष्य में यदि अन्य औद्योगिक देशों को देखें तो सभी जगह समान पैटर्न दिखाई दे रहा है. जापान, दक्षिण कोरिया और इटली में प्रजनन दर सब से कम है.

अमेरिका और आस्ट्रेलिया में वर्तमान प्रजनन दर 1.6 है. ब्रिटेन में यह 1.4 है. वहीं दक्षिण कोरिया में यह मात्र 0.68 है. ये देश लगातार सिकुड़ रहे हैं. दक्षिण कोरिया तो बहुत तेजी से सिकुड़ रहा है. इस का मतलब यह है कि इन देशों में जितने लोग पैदा हो रहे हैं उस से ज्यादा लोग मर रहे हैं. इस से काम करने वाले हाथ कम हो रहे हैं, गरीबी बढ़ रही है और लोग अपनी देखभाल के लिए दूसरों पर या सरकार पर अधिक निर्भर हो रहे हैं.

किसी जनसंख्या के वर्तमान आकार को बनाए रखने के लिए, अर्थात न तो वह सिकुड़े और न ही बहुत ज्यादा हो, कुल प्रजनन दर प्रति महिला 2.1 से ऊपर होनी चाहिए. ऐसा इसलिए है क्योंकि हमें मातापिता दोनों के मरने के बाद उन की जगह लेने के लिए पर्याप्त बच्चे पैदा करने की जरूरत होती है– एक बच्चा मां की जगह लेता है और दूसरा पिता की जगह लेता है और शिशु मृत्युदर के लिए थोड़ा अतिरिक्त.

संक्षेप में समझें तो यदि हम चाहते हैं कि जनसंख्या बढ़े, तो महिलाओं को 2 से अधिक बच्चे पैदा करने की आवश्यकता है. दूसरे विश्व युद्ध के बाद आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे कई पश्चिमी देशों में बिलकुल यही हुआ था. महिलाएं 2.1 से अधिक बच्चों को जन्म दे रही थीं, जिस के परिणामस्वरूप शिशु जन्म में वृद्धि हुई. कई परिवारों में 3 या अधिक बच्चे हो गए. मगर अब महिलाएं एक या दो बच्चे ही पैदा कर रही हैं और बहुतेरी तो बच्चा पैदा ही नहीं करना चाहती हैं. जिस की वजह से दुनिया के देशों में प्रजनन दर में भारी कमी देखी जा रही है. यह चिंता का विषय है.

प्रजनन दर कम होने की कई वजहें हैं और एकदूसरे से जुड़ी हुई हैं. शिक्षा के प्रचारप्रसार के कारण दुनियाभर में औरतें शिक्षित हुई हैं. भारत में भी औरतों की शिक्षा के क्षेत्र में काफी वृद्धि हुई है. पहले लड़कियों की शादी कम उम्र में हो जाती थी. 17-18 साल की उम्र में वे मां बन जाती थीं. उन के पास मां बनने के लिए अधिक साल भी थे. पिछली पीढ़ी पर ही नजर डालें तो अनेक घरों में 5 से 8 या 10 बच्चे तक हैं.

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 6 भाईबहन हैं जबकि नरेंद्र मोदी निसंतान हैं. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार 5 भाईबहन हैं जबकि नीतीश कुमार का सिर्फ एक बेटा है. संविधान निर्माता बाबासाहेब अंबेडकर 14 भाईबहन थे, सुभाष चंद्र बोस भी 14 भाईबहन थे, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई 7 भाईबहन थे. अपने गृहमंत्री अमित शाह 7 भाईबहन हैं, तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव 10 भाईबहन हैं और लालू यादव के 9 बच्चे हैं. जबकि अगली पीढ़ी में बच्चों की संख्या घट कर एक या दो रह गई है.

शिक्षा और उच्च शिक्षा ग्रहण करने और फिर कैरियर बनाने के चलते लड़के और लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ कर 28-35 हो गई है. इस उम्र में शादी होने पर बच्चे भी एकाध ही हो रहे हैं. इस के अलावा दुनियाभर में औरतें सिर्फ गृहिणी नहीं रहीं, बल्कि नौकरीपेशा हैं, व्यवसाय कर रही हैं, ऊंचे पदों पर नियुक्त हैं, ग्लैमर की दुनिया में हैं. इस व्यस्तता के कारण भी वे अधिक बच्चे नहीं चाहती हैं.

आज के समय में संयुक्त परिवार टूट चुके हैं. पहले बहू को यदि बच्चा न हुआ तो लड़के की मां, दादी, बूआ, मौसी, चाची सब उस को टोकती थीं, इलाज के लिए डाक्टर से ले कर साधुसंतों या झाड़फूक वालों के चक्कर काटती थीं. जब तक बहू की गोद न भर जाए, बड़ीबूढ़ी चैन से नहीं बैठती थीं. अगर तमाम दवाइलाज के बाद भी बच्चा न हुआ तो लड़के की दूसरी शादी भी करवा दी जाती थी. अगर लड़के में दोष हुआ तो चुपचाप घर के दूसरे पुरुषों से संसर्ग करवा कर बच्चा पाया जाता था. मगर संयुक्त परिवार के टूटने से नवविवाहिताएं घर की बड़ीबूढ़ियों के तानों से आजाद हो गई हैं. अब अगर शादी के कई साल तक बच्चा न भी हुआ तो चिंता नहीं है. अनेक ऐसे कपल हैं जो निसंतान है और खुश हैं. किसी को बच्चे की ज्यादा चाह हुई तो आईवीएफ से एक बच्चा पा लिया या गोद ले लिया.

उच्च शिक्षा प्राप्त और अच्छी नौकरी या व्यवसाय में लगी बहुतेरी महिलाएं शादी कर के किसी बंधन में नहीं बांधना चाहती हैं, इसलिए भी प्रजनन दर लगातार प्रभावित हो रही है. आस्ट्रेलियाई महिलाएं पुरुषों की तुलना में बेहतर शिक्षित हैं. आस्ट्रेलिया में दुनिया की सब से अधिक शिक्षित महिलाएं हैं. अधिकांश महिलाएं मां नहीं बनना चाहती हैं.

आज युवाओं को हर चीज में देरी हो रही है. युवाओं के लिए उच्च शिक्षा पाना, स्थिर नौकरी प्राप्त करना और अपना घर खरीदना शादी से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. ये ऐसे कारक हैं जो पहले बच्चे के जन्म के लिए भी महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं. इसलिए, कई युवा आर्थिक और आवास असुरक्षा के कारण बच्चा पैदा करने में देरी करते हैं.

इस के अलावा, अब हमारे पास सुरक्षित और प्रभावी गर्भनिरोधक है, जिस का अर्थ है कि विवाह के बाहर यौन संबंध संभव है और प्रजनन के बिना यौन संबंध की लगभग गारंटी दी जा सकती है. इन सब का मतलब है कि मातापिता बनने में देरी हो रही है. महिलाएं देर से और कम बच्चे पैदा कर रही हैं.

बच्चे पालना एक महंगा और समय लेने वाला काम है. कई औद्योगिक देशों में बच्चों के पालने पर आने वाली लागत बहुत अधिक है. आस्ट्रेलिया में बच्चों की देखभाल की औसत लागत मुद्रास्फीति से अधिक हो गई है. स्कूल की ट्यूशन फीस, यहां तक कि पब्लिक स्कूलों के लिए भी, मातापिता के बजट का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा खर्च कर देती है. इसलिए लोग एक बच्चे से ज्यादा नहीं पैदा कर रहे हैं.

यदि प्रजनन दर को बढ़ाना है तो सहायक देखभाल के बारे में गंभीरता से सोचना होगा. युवाओं को जल्द से जल्द बेहतर कैरियर और आवास मिले, बच्चों और वृद्ध देखभाल के बुनियादी ढांचे में अधिक निवेश, बढ़ती उम्र की आबादी का समर्थन करने के लिए तकनीकी नवाचार और ऐसे कार्यस्थलों की आवश्यकता है जो मूल रूप से देखभाल को ध्यान में रख कर तैयार किए गए हों. इस के बगैर लड़केलड़कियों को अधिक बच्चे पैदा करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है.

परिवारों में कम बच्चे पैदा होने या बच्चे न होने से एक और समस्या सिर उठाने लगी है. यदि परिवार में एक ही बच्चा है और वह शिक्षा के लिए विदेश गया और वहीं सैटल हो गया तो उस की पैतृक संपत्ति और उस के मातापिता द्वारा अर्जित चल-अचल संपत्ति की देखभाल करने और भोगने वाला कोई नहीं बचता है. दिल्ली में कई ऐसी कोठियां उजाड़ हालत पड़ी हैं, क्योंकि जो बच्चे विदेश में सैटल हो गए, वो वापस भारत नहीं लौटे.

जेरोधा के सहसंस्थापक और अरबपति निखिल कामथ भविष्य की पीढ़ियों के लिए धन जमा करने में विश्वास नहीं करते हैं. निखिल कामथ अपनी अधिकांश संपत्ति परोपकारी कार्यों के लिए दान करने के बाद ‘द गिविंग प्लेज’ में शामिल होने वाले सब से कम उम्र के भारतीय हैं. वे बेंगलुरु स्थित उद्यमियों और गिरवी रखने वाले साथी इन्फोसिस के सहसंस्थापक नंदन नीलेकणि, बायोकोन की संस्थापक किरण मजूमदार शा और विप्रो के संस्थापक अजीम प्रेमजी से प्रेरित हैं. वे भविष्य की पीढ़ियों के लिए धन जमा करने में विश्वास नहीं करते हैं.

अपने पोडकास्ट, डब्ल्यूटीएफ में, 37 वर्षीय अरबपति निखिल कामथ ने कहा कि वे अपने जीवन के 2 दशक केवल ‘बच्चों की देखभाल’ में नहीं बिताना चाहते हैं केवल यह आशा करने के लिए कि जब वे बूढ़े हो जाएंगे तो उन के बच्चे उन के साथ अच्छा व्यवहार करेंगे.

कामथ कहते हैं, “मैं बच्चे की देखभाल करतेकरते अपने जीवन के 18-20 साल बरबाद कर दूं और एक दिन वह 18 साल की उम्र में ‘स्क्रू** यू’ कहे और मुझे छोड़ कर चला जाए. मैं अपने जीवन में ऐसी स्थिति नहीं चाहता.”

मंगलसूत्र पर सवार मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक  भाषण में कह डाला है कि कांग्रेस आम लोगों से पैसा छीन कर उन को बांटना चाहती है जिन के बच्चे ज्यादा होते हैं, यानी मुसलमानों को. आम जनता में यह गलतफहमी बड़ी जोर से फैली है कि 4 शादियां कर के मुसलिम ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं और 2002 के गुजरात विधानसभा के चुनावों में नरेंद्र मोदी यह कहते घूमे थे कि वे 5 से 25 हो रहे हैं.

हिंदुओं की माताओं और बहनों के मंगलसूत्रों पर कांग्रेस की नजर है जिन्हें छीन कर वह बांटना चाहती है, प्रधानमंत्री ने खुलेआम यह आरोप लगाया. असल बात यह है कि हिंदू औरतों की सोच और संपत्ति यदि कहीं जा रही है तो वह मंदिरों में जा रही है और नरेंद्र मोदी की पार्टी ही नहीं, उस के कर्मठ समर्थक, जो मंदिरों की दुकानदारी चलाते हैं, अब अपने बढ़ते भंडार को देख कर खुश भी हैं और चिंतित भी कि कहीं दूसरी पार्टी सत्ता में आ गई तो उस पर नई सरकार की नजर न पड़ जाए. जो मंगलसूत्र औरतों के गलों से निकल कर मंदिरों में पहुंच चुके हैं उन का आकलन तो किया ही नहीं जा सकता.

तिरुपति मंदिर के कुछ आंकड़े सार्वजनिक हुए. इन के अनुसार, मुख्य मंदिर ट्रस्ट के पास 2023-2024 के वर्ष में 13.287 करोड़ रुपए की फिक्स्ड डिपौजिट है. यही नहीं, उस के सहयोगी ट्रस्टों के पास 5,529 करोड़ रुपए की फिक्स्ड डिपौजिट है. मोदीकाल में यह रकम 970 करोड़ से 800 करोड़ सालाना बढ़ रही है.

तिरुपति मंदिर के पास 800 चल संपत्तियां भी हैं. उन का मूल्य भी बेतहाशा बढ़ा है और अब कुल सकल संपत्ति 2.25 लाख करोड़ रुपए हो गई है. यह बात सिर्फ एक मंदिर की हो रही है.

देश में 5 से 20 लाख तक मंदिर गिने जाते हैं जिन में लाखों सरकारी जमीनें घेर कर बनाए गए हैं. यह संपत्ति है जिसे लूटा जा सकता है. हमारा मौखिक इतिहास इसी संपत्ति को लूटने आए मंगोलों, तुर्की, अफगानों, ग्रीकों, हूण्णों और मुगलों की बात करता है जिसे लूटने ये लोग आते रहे. यह जनता का पैसा तो था ही नहीं, जनता से लूटा जा चुका था. नरेंद्र मोदी ने अच्छा किया कि माताओं और बहनों को अपने गहनों और मंगलसूत्रों की ओर ध्यान दिलाया क्योंकि आज सनातन धर्म जब फिर से शक्तिशाली हो रहा है तो उस की नजर आम लोगों की इसी संपत्ति पर है.

लोगों को खतरा कांग्रेसी मैनिफैस्टो से नहीं, भगवा इरादे से होना चाहिए. कांग्रेस यह तब करेगी जब सत्ता में आएगी और उस की ऐसी कहीं मंशा माइक्रोस्कोप से देखने पर भी मैनिफैस्टो में नहीं मिलती है पर भगवा मैनिफैस्टो तो सभी तरह विदेशियों के शासनों में भी चलता रहा है. और विदेशी शासनों के दौरान भी लोग अपनी संपत्तियां जम कर मंदिरों में चढ़ाते रहे हैं. जो लूट विदेशी शासक जनता से कर रहे थे उस से कई गुना लूट तो मंदिरों की होती रही है.

घटती वोटिंग के पीछे देश के आम चुनाव में देशवासियों की जो रुचि बढ़ रही थी, अचानक घटने लगी है और पहले 3 चरणों में घटा मतदान एक चिंता का विषय बन गया है. यह सिर्फ गरमी की वजह से हुआ, यह बहाना नहीं चल सकता क्योंकि पिछले कई चुनाव इसी तरह की गरमी में ही हुए हैं और लोग उत्साह से मतदान में भाग लेते रहे हैं. यह एक और ही ट्रैंड की निशानी है जिसे देश की सरकार के प्रति गुस्सा ही कहा जा सकता है.

लोगों को लगने लगा है कि उन के वोटों से कुछ नहीं होने वाला और जो भी चुन कर आएगा वह दूध का धुला तो दूर, काले कोलतार से पुता होगा. 2014 में लोगों ने जम कर उत्साह से वोट दिया क्योंकि एक ओर कोयला और 2जी घोटालों के ?ाठे आरोपों से घिरी सरकार को हटाना था तो दूसरी ओर धर्म की स्थापना करने, अच्छे दिनों और भ्रष्टाचारमुक्त सरकार को लाने का मौका मिल रहा था.

देश की सत्ता पर काबिज भाजपा की सरकार ने विपक्षी नेताओं को जेलों में बंद कर वोटरों को जता दिया कि उन के वोट से जीते नेता और उन की राज्य सरकारें व देश की ज्यादातर अदालतें उस के चंगुल में हैं यानी सरकार काम करे या न करे, उस का कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता. ऐसे में फिर मतदाताओं के मतदान करने का क्या मतलब, ऐसा सोचा जाना स्वाभाविक है.

सरकार के गठन में जहां भी वोट उत्साह से पड़ते हैं या जब भी भरभर कर वोटों से सरकारें बनती हैं, कुछ चमत्कार होते हैं, ऐसा नहीं है. हां, लोगों को बस यह लगता है कि सरकार उन की सुन तो रही है. अब तो यह साफ हो चुका है कि वोट, आवाज, कोर्ट, अर्जी का कोई मतलब नहीं रह गया. सरकार हाथी नहीं, डायनासोर है, बड़ा बुलडोजर है जो अपनी मरजी से चलेगी और जो सामने आएगा, उसे कुचल देगी. उस के भरोसे कोई कल्याण नहीं होने वाला.

अगर चुनावों के अन्य चरणों में भी यही हुआ तो साफ हो जाएगा कि देश में चुनावी लोकतंत्र का भाव खत्म होने वाला है और पौराणिक काल लौटेगा जिस में ऋषिमुनियों की चलेगी क्योंकि उन्हें भगवानों ने वरदान दिया और वे दुर्वासाओं की तरह सब को धमकाते रहेंगे. जनता का काम तो दान करना रहेगा चाहे वह वोट का दान हो, टैक्स का दान हो, मंदिरों में मंगलसूत्रों का दान हो या किसी के चरणों में देह का दान हो.

एकादशियों की ऊलजलूल कथाएं बनाम लूट का साधन

पुरोहिताई पुस्तकों में एकादशी व्रत का बहुत महत्त्व बताया गया है. इस व्रत का पुण्य ट्रांसफरेबल है, जिस के बल पर पीढि़यों से नरक में पड़े हुए व्रती के पुरखे स्वर्ग पहुंच जाते हैं. मध्य व उत्तर भारत के गांवों में पुरोहित लोग प्रति एकादशी को भिक्षा लेने घरघर जाते हैं.

भाल पर तिलक लगाए और दोनों कंधों पर खोली (   झोली) लटकाए पंडितजी ‘आज ग्यारस हो गई भाई’ कहते हुए दालान या आंगन के चबूतरे पर बैठ जाते हैं. गृहिणी सब काम छोड़ कर थाली में आटादाल, नमकमिर्च आदि रख कर पंडितजी को देती हैं व पैर पड़ती हैं. पंडितजी दिया हुआ सामान खोली में भर कर दूसरे घर पहुंच जाते हैं. आजकल मोबाइल से बुकिंग भी होने लगी है.

एकादशी व्रत उद्यापन पूजा के लिए ब्राह्मण की औनलाइन बुकिंग कराई जा सकती है. इस की कीमत 6,000 रुपए से 10,000 रुपए तक है. बेंगलुरु में मिलने वाली यह सेवा फलफूल के साथ 8,300 रुपए एडवांस में देने पर मिलती है.

2 पंडित आते हैं, सारा सामान लाते हैं. दिल्ली में 11,000 रुपए में एक पंडित यह सेवा दे रहा है, सामग्री सहित 21,000 रुपए लेता है.

ग्यारस से कैसे पाप मुक्त

आप ने अकसर किसी पार्टी या पंगत में स्त्री व पुरुषों को कहते सुना होगा कि ‘आज मेरी ग्यारस है.’ इस का अर्थ यह हुआ आज मैं अन्न ग्रहण नहीं करूंगा.

इस व्रत को विधवाएं अधिक करती हैं. इस का कारण यह है कि मृतक (पति) के दशाकर्म (मृत्यु के 10 दिनों बाद) परिवार की ‘शुद्धि’ के नाम पर पंडित से कराई जाने वाली लूट की धार्मिक रस्म की पूजा के बाद चढ़ावे का सामान समेटते हुए विधवा से पंडितजी कहते हैं, ‘भगवान की इच्छा को कोई रोक नहीं सकता, अब बहन तुम को प्रत्येक ग्यारस का व्रत रखना है ताकि तुम्हारे पुण्य के प्रताप से पति की भटकती हुई आत्मा का उद्धार (स्वर्ग जाना) हो जाए.’

विधवा जानकार की भी यह कहानी ही है, दूसरों से कहने पर व्रत रख कर अपने पुण्य के बल (पुण्य ट्रांसफर कर) पर पति को स्वर्ग भेजेगी.

वर्ष में 12 माह (किसी वर्ष अधिक लौंद मास) होते हैं. प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष को मिला कर 24 ग्यारसें होती हैं. अधिक मास होने पर 26 होती हैं. अंधविश्वासी हिंदू सभी ग्यारसों का व्रत रखते हैं.

‘एकादशी व्रत कथा’ नामक पुस्तक में पंडितों ने 26 एकादशियों की कथाएं लिखी हैं और उन के अलगअलग नाम दिए हैं. अधिकांश कथाओं का महत्त्व कृष्ण (विष्णु भगवान) से कहलवाया है. कुछ कथाएं ब्रह्मा, नारद, अंगिरा व वशिष्ठ आदि ऋषिमुनियों से भी कहलवाई हैं. जब भगवान, ब्रह्मा और ऋषिमुनि कहेंगे तो विश्वास करना ही पड़ेगा.

प्रत्येक कथा में व्रत रखने के साथ व्रती को विष्णु भगवान (कृष्ण) की पूजा और रात्रि जागरण बताया है. इस व्रत के पुण्य से व्रती के पितरों का उद्धार होता है, सौभाग्य (स्त्रियों के लिए) धन संपत्ति, पुत्र की प्राप्ति होती है. सुखशांति और प्रत्येक काम में सफलता मिलती है. अंत समय में व्रती विष्णु भगवान के विमान या गरुड़ पर सवार हो कर स्वर्ग जाता है, जहां इंद्रादि देवता उस का स्वागत करते हैं.

लेकिन मृत्यु के समय विष्णु का विमान या गरुड़ तभी आएगा जब पुराहितों व ब्राह्मणों को दान देंगे व मालपुआ खिलाएंगे. हर एकादशी की कथा में ब्रह्मभोज कराने का उल्लेख है. समग्र रूप से व्रती घर, स्वर्ण आभूषण, चांदीपीतल के बरतन, हाल ही ब्याही हुई बछड़ा सहित कपिला गाय, पंडित व पंडितानी को कपड़े, शृंगार-सामान, सात प्रकार का अनाज, बिस्तर सहित शैया, दूधदही, घी, शहद, जूते आदि पंडितों को दान करे व शक्ति अनुसार दक्षिणा दे. पुरोहित व ब्राह्मणी की पूजा कर उन का चरणामृत (पैरों का धोवन) पान कर विदा करे.

अब पंडित लोग कैश ही चाहते हैं. सभी एकादशियों की कथा छोटे से लेख में न संभव है और न उचित. कुछ एकादशियों की कथा अति संक्षेप में प्रस्तुत है ताकि धर्मभीरु लोगों को मालूम हो कि धर्म के धंधेबाज बेसिरपैर की काल्पनिक कथाओं को गढ़ कर किस प्रकार उन को लूट रहे हैं. इसी धंधे को चलाने के लिए  हिंदूहिंदू के नारे लगवाए जाते हैं.

दैत्य आतंक व दुर्दशा

‘एकादशी महात्म्य’ पुस्तक में सब से पहले मार्ग (अगहन) माह कृष्ण पक्ष की एकादशी की कथा दी गई है. पंडितजी (पुस्तक लेखक) ने इस का नाम ‘उत्पन्ना’ दिया है. यह कथा भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सुनाई है. कथा इस प्रकार है-

सतयुग में नाड़ीजंग नामक एक दैत्यराज था. उस की राजधानी चंद्रवती नामक नगरी थी. नाड़ीजंग का पुत्र मुरे दैत्य बहुत प्रतापी था. कथा कहती है कि उस ने पूरे विश्व को जीत कर इंद्र आदि सब देवताओं को देवलोक से निकाल दिया. देवता अपनी रक्षा के लिए शिवजी के पास जाते हैं पर शिवजी उन को विष्णु के पास भेज देते हैं.

देवताओं ने विष्णु के पास जा कर मुरे दैत्य का आतंक और अपनी दुर्गति सुनाई. उन्होंने विष्णु से कहा कि वह (मुरे) इंद्र, अग्नि, यम, वरुण, चंद्र व सूर्य बन कर पूरी पृथ्वी को तपा रहा है. मेघ बन कर जल वर्षा रहा है. सो, आप उसे मार कर हमारी रक्षा कीजिए.

इंद्र व देवताओं की प्रार्थना पर विष्णु अपना सुदर्शन चक्र ले कर मुरे दैत्य को मारने के लिए चल देते हैं. मुरे दैत्य से लड़तेलड़ते विष्णु थक जाते हैं. अपनी थकावट दूर करने के लिए वे बद्रिका आश्रम की एक गुफा में विश्राम करते हैं. इधर, विष्णु से लड़ने के लिए मुरे दैत्य भी पहुंच जाता है. शयन करते हुए विष्णु के शरीर में से एक कन्या प्रगट होती है. वह मुरे से लड़ती है और उसे मार डालती है.

जब विष्णु जागे तो उन्होंने मुरे दैत्य को मरा पाया. वे सोच में पड़ गए कि इसे किस ने मारा. इतने में कन्या हाथ जोड़ कर कहती है, ‘हे भगवन, यह दैत्य आप को मारने को तैयार था, तब मैं ने आप के शरीर से उत्पन्न हो कर इस का वध कर दिया.’ तब विष्णु भगवान प्रसन्न हो कर उस से वर मांगने को कहते हैं. इस पर कन्या कहती है, ‘हे भगवन, मु   झे यह वर दीजिए कि जो मेरा व्रत करे उस के समस्त पाप नष्ट हो जाएं.’

कन्या के वर मांगने पर विष्णु बोले, ‘हे कन्या, तेरा नाम ‘एकादशी’ होगा. जो मनुष्य तेरा व्रत करेंगे उन के समस्त पाप नष्ट हो जाएंगे और अंत में स्वर्ग जाएंगे.’ कथा के अनुसार, एकादशी को उत्पन्न कर विष्णु भगवान अंतर्धान हो गए.

इस कथा पर कई प्रश्न उठते हैं. देवता तो करामाती और पावरफुल हैं. वे विमानों में यात्रा करते हैं, अनेक रूप बदल लेते हैं और अदृश्य हो जाते हैं. फिर एक अदना से दैत्य से क्योंकर हारे? मुरे दैत्य सूर्य, अग्नि, चंद्र, मेघ आदि कैसे बन जाता था? विष्णु ईश्वर हैं, सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान हैं, फिर मुरे दैत्य को क्यों नहीं मार सके? उन को यह भी पता नहीं पड़ा कि मुरे कैसे मरा? कन्या विष्णु के शरीर में से कैसे निकली? वह ‘एकादशी’ कैसे बनी? पंडितजी यदि महीनों, दिनों व अन्य तिथियों की उत्पत्ति भी बता देते तो पुरोहितों के धंधे (धर्म के) में और इजाफा हो जाता.

माघ शुक्ल पक्ष (जया) एकादशी की कथा

इस कथा में कृष्ण से कहलाया गया है कि एक समय इंद्र ने अप्सराओं के साथ रमण किया. थक जाने के बाद वह उन को नचाने लगा. नाचगाने में पुष्पवती नामक अप्सरा और माल्यवान नामक गंधर्व भी थे. नाचते समय वे दोनों कामातुर हो जाते हैं जिस से दोनों का मन नाचगाने में नहीं लगा. इसे इंद्र ताड़ गए और उन्होंने अपना अपमान सम   झ कर दोनों को श्राप दिया कि मृत्युलोक में जा कर पिशाच बनो.

श्राप के प्रभाव से दोनों पिशाच योनि को प्राप्त हुए. एक दिन उन को कुछ भी खाने को नहीं मिला. उस दिन माघ शुक्ल पक्ष की एकादशी थी. ठंड के दिन थे. दोनों ने परस्पर चिपक कर एक पेड़ के नीचे रात्रि व्यतीत की. द्वादशी के दिन सुबह दोनों अलग हुए तो पुष्पवती सुंदर अप्सरा और माल्यवान गंधर्व के रूप में दिखे.

कथा के अनुसार, यह एकादशी का प्रभाव था क्योंकि अन्नाभाव के कारण उस दिन दोनों को भूखा रहना पड़ा था. सुंदर वस्त्र पहन कर दोनों स्वर्ग पहुंचे तो इंद्र ने उन का स्वागत किया और कहा कि यह एकादशी का प्रभाव है.

हिंदू संस्कृति के रक्षक सिनेमा के भद्दे पोस्टर देख कर पूरे देश में हुल्लड़ मचाते हैं. लेकिन इस कथा में कितना नंगापन है जिसे पंडेपुरोहित नयन नचा कर और हाथ मटका कर महिलाओं के बीच में पढ़ते हैं. इसे कमाल ही कहा जाएगा कि (जया) एकादशी के दिन कुछ खाना न मिला तो उसे व्रत मान लिया गया और उस का तत्काल सुफल भी मिल गया. जबकि, भूखे व्यक्तियों को यह पता ही नहीं है कि आज एकादशी है.

चैत्र कृष्ण पक्ष (पाप मोचनी) एकादशी की कथा

इस एकादशी की कथा कृष्ण ने लोमस ऋषि से सुनी है. कथा के अनुसार प्राचीन काल में चेत्ररथ नामक वन में अप्सराएं रहती थीं. उसी वन में च्यवन ऋषि के पुत्र मेधावी ऋषि भी तपस्या करते थे. मंजुघोषा नामक अप्सरा मेधावी ऋषि पर मोहित हो जाती है. मेधावी ऋषि को कामातुर करने के लिए उस ने अपनी, ‘भौंहों को धनुष बनाया, कटाक्ष (चितवन) को डोरी, नेत्रों को संकेत  (तीर का फल) और कुचों को लक्ष्य (निशान) बना कर मेधावी ऋषि को कामातुर कर दिया. काम के वशीभूत हो कर ऋषि उस के साथ रमण करने लगे.’

मेधावी ऋषि 57 वर्ष 7 माह 3 दिन तक रमण करते रहे. समय का ज्ञान होने पर वे अप्सरा को श्राप देते हुए कहते हैं, ‘रे दुष्टे, तू ने मेरे तप को नष्ट कर दिया, इसलिए तू पिशाचनी बन जा.’

मंजुघोषा पिशाचनी हो कर मुनि से पूछती है, ‘आप मु   झे श्रापमुक्ति का उपाय बताइए.’

इस पर मुनि ने कहा, ‘तू चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की (पाप मोचनी) एकादशी का व्रत कर. इस से तेरे सब पाप नष्ट हो जाएंगे और तू सुंदर स्त्री बन जाएगी.’ उस ने पाप मोचनी एकादशी का व्रत किया. व्रत के प्रभाव से उस के सब पाप नष्ट हो गए और वह सुंदर स्त्री बन गई. च्यवन ऋषि के कहने से मेधावी ने भी इस एकादशी का व्रत किया और पापमुक्त हो गए.

अश्लीलताभरी कथाएं

बताइए, कथा कितनी अश्लील है. ऋषि 57 वर्ष 7 माह 3 दिन तक लगातार कैसे रमण करते रहे? क्या दोनों को भूखप्यास नहीं लगी होगी? समय की गणना कैसे की होगी? फिर तो लोग परस्त्री और परपुरुष गमन करें तथा इस एकादशी का व्रत रख, पाप से छुटकारा पाएं. कुकर्म दूर करने का इस से सस्ता नुस्खा क्या हो सकता है. वहीं यदि कालेज के लड़केलड़कियां नयन लड़ाएं तो हम पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव बता कर उन को बदनाम करते हैं. धन्य है कथा लेखक और कथावाचक, वे भी धन्य हैं जो ऐसी अश्लील कथाओं पर विश्वास कर व्रत रखती हैं.

यह बात दूसरी है कि राष्ट्रपति को सरकारी संसद और सरकारी मंदिर में भी प्रवेश के समय नहीं बुलाया जाता क्योंकि ये सारी पूजाएं असल में द्विजों के लिए ही होती हैं, हालांकि अब दूसरे भी करने लगे हैं. इस में पैसा बनता है और वोट भी मिलते हैं, इसलिए कोई सवाल नहीं उठाता.

हमारे देश की राष्ट्रपति एक महिला हैं. 10 वर्षों से देश की जनता को मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है. महंगाई आसमान छू रही है. अगर कोई पंडित, राष्ट्रपति से देवशयनी एकादशी का व्रत रखने को कह देता तो जनता को ये दुर्दिन न देखने पड़ते.

इन सब कथाओं में बराबर कहा जाता है कि केवल व्रत व पूजा से स्वर्ग नहीं मिलने वाला. व्रती को पंडित के लिए भूमि, स्वर्ण, हाल की ब्याही हुई बछड़ा सहित गाय, शैया, घी आदि दान देने से ही स्वर्ग की गारंटी है.

दुकान चलाते पंडे

सभी कथाओं का सार यह निकला कि एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति भिखारी से धनी बन जाता है, स्त्रियों का सौभग्य अमर रहता है, पुत्र की प्राप्ति होती है, बीमारियां दूर होती हैं और समस्त पाप नष्ट हो कर अंत में स्वर्ग मिलता है.

अगर ये कथाएं सही होतीं तो आज एक भी हिंदू गरीब न होता और न पुत्रहीन, अंधा, बहरा, विकलांग व बीमार भी कोई नहीं दिखता. सौभाग्य का जहां तक प्रश्न है, समाज में विधवाएं ही अधिक मिलेंगी और विधुर कम. जबकि, स्त्रियां ही अधिक व्रत रखती हैं.

साधुसंत व पंडेपुरोहित प्रत्येक एकादशी का व्रत रखते हैं. पर इन की मृत्यु के बाद विष्णु का विमान या गरुड़ को आते किसी ने नहीं देखा. वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष का कोनाकोना छान मारा पर स्वर्ग कहीं भी नहीं दिखा.

प्रत्येक एकादशी व्रत में पंडोंपुरोहितों को भोजन कराने व दानदक्षिणा देने से ही मरने के बाद स्वर्ग मिलना बताया जाता है. इस का अर्थ यह हुआ कि भोलेभाले और धर्मभीरु हिंदुओं को और उन के वोट पाने के लिए ही ये व्रतकथाएं आज भी कराई जाती हैं. जब एकादशी के व्रत रखने से समस्त कुकर्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं तो व्यक्ति कुकर्म करने से क्यों डरेगा. सो, क्या ये व्रतकथाएं पापों को बढ़ावा नहीं देती हैं?

सम   झ में नहीं आता है कि लोग सदियों से इन अश्लील, बेसिरपैर और तर्कहीन कथाओं पर कैसे विश्वास करते आ रहे हैं? समस्या यह है कि विदेशों में बसे भारतीय मूल के हिंदू वहीं भी ये सब करतेकरवाते हैं और वहां भी पंडित मजे से दुकानें चला रहे हैं.

पाइल्स के मरीज शरमाएं नहीं, सलाह लें

सुस्त जीवनशैली, मानसिक तनाव, नींद के कम होते घंटे और मसालेदार जंक फूड के प्रति लगाव इस सदी में ज्यादातर स्वास्थ्य समस्याओं के पीछे के कुछ मूल कारण हैं. बवासीर उन समस्याओं में से सब से आम है. बवासीर या पाइल्स को मैडिकल भाषा में हेमराइड्स के नाम से जाना जाता है.

यह एक ऐसी स्थिति है जिस में गुदा (ऐनस) के अंदरूनी और बाहरी क्षेत्र व मलाशय (रेक्टम) के निचले हिस्से की शिराओं में सूजन आ जाती है. इस की वजह से ऐनस के अंदर और बाहर या किसी एक जगह मस्से जैसी स्थिति बन जाती है, जो कभी अंदर रहते हैं और कभी बाहर भी आ जाते हैं.

करीब 70 फीसदी लोगों को जीवन में किसी न किसी वक्त पाइल्स की समस्या रहती है. उम्र बढ़ने के साथसाथ पाइल्स की समस्या बढ़ सकती है. अनेक स्टडीज सुझाती हैं कि 45 से 65 साल के बीच की उम्र में, दुनियाभर के देशों में, हर दूसरे व्यक्ति को यह क्रोनिक बीमारी उन के जीवन में कभीकभी होती है. बड़ी संख्या में महिलाएं गर्भावस्था के दौरान बवासीर का अनुभव करती हैं.जो लोग चाय, जंक फूड के आदी होते हैं, जिन्हें कब्ज और तनाव रहता है, उन्हें यह बीमारी होने की ज्यादा आशंका रहती है.

लक्षण पहचान

निम्न संकेतों से पता लगाया जा सकता है कि बवासीर हो गई है-

– ऐनस के इर्दगिर्द एक कठोर गांठ जैसी महसूस हो सकती है. इस में ब्लड हो सकता है, जिस की वजह से इस में काफी दर्द होता है.

– टौयलेट के बाद भी ऐसा महसूस होना कि पेट साफ नहीं हुआ है.

– मलत्याग के वक्त लाल चमकदार रक्त का आना.

– मलत्याग के वक्त म्यूकस यानी चिपचिपे तरल पदार्थ का आना और दर्द का एहसास होना.

– ऐनस के आसपास खुजली होना व उस क्षेत्र का लाल होना और सूजन आ जाना.

बवासीर के प्रकार

अंदरूनी पाइल्स : ऐनस के अंदर हलकी सूजन होती है जो कि दिखाई भी नहीं देती. मरीज मलत्याग के वक्त या जोर लगाने पर खून आने की शिकायत करता है. सूजन बढ़ने लगती है और मलत्याग के वक्त जोर लगाने पर खून के साथ मस्से बाहर आ जाते हैं, लेकिन हाथ से अंदर करने पर वे वापस चले जाते हैं.

तीसरी तरह की स्थिति गंभीर होती है. इस में सूजन वाला हिस्सा या मस्सा बाहर की ओर लटका रहता है और उसे उंगली की मदद से भी अंदर नहीं किया जा सकता. ये बड़े होते हैं और हमेशा बाहर की ओर निकले रहते हैं. अंदरूनी पाइल्स को ही खूनी बवासीर कहा जाता है.

बाहरी पाइल्स : इसे मैडिकल भाषा में पेरिएनल हेमाटोमा कहा जाता है. इस में छोटीछोटी गांठें या सूजन ऐनस की बाहरी परत पर होती हैं. इन में बहुत ज्यादा खुजली होती है. अगर इन में रक्त भी जमा हो जाए तो दर्द होता है. इस में तुरंत इलाज की जरूरत होती है.

मलाशय और गुदा में नसें जब मुड़ जाती हैं, उन में सूजन आ जाती है और वे फूल जाती हैं तो वे बवासीर को जन्म देती हैं. पाइल्स के मरीजों को खानपान का विशेष ध्यान रखना चाहिए, जैसे कि रेशे युक्त भोजन खाना चाहिए.

करेले का रस, खूब सारा सलाद व मौसमी खाना भी बवासीर के मरीजों के लिए लाभदायक होता है. इस के अलावा फलों में केला, नारियल आंवला, अंजीर, पपीता इत्यादि खाना भी इस में फायदेमंद होता है.

पाइल्स के मरीजों को खूब सारा पानी पीना चाहिए. लस्सी पीना भी फायदेमंद होता है. भोजन करने के बाद अमरूद खाने से भी फायदा होता है. पालक, गाजर, मूली, तुरई, टमाटर, लौकी इत्यादि सब्जियां भी खा सकते हैं. नियमित व्यायाम करना चाहिए और मलत्याग के दौरान बहुत ज्यादा जोर नहीं लगाना चाहिए.

पाइल्स के मरीजों को कुछ बातों का ध्यान रखना आवश्यक है, जैसे तेज मिर्च, मसालेदार खाने से परहेज करना चाहिए. इस के अलावा मांस, मछली, अंडे, उरद की दाल, खटाई, अचार, आलू, बैगन इत्यादि से भी बचना चाहिए. डब्बाबंद भोजन भी बवासीर के मरीजों के लिए हानिकारक होता है. पाइल्स के मरीजों को चाय व कौफी भी कम कर देनी चाहिए.

बवासीर लाइलाज नहीं है. बस, जरूरत है कि बीमारी होने पर शरमाएं नहीं, तुरंत डाक्टर की सलाह लें. और हां, ध्यान रखें कि औपरेशन इस बीमारी का इलाज नहीं है. उस के बिना भी इस बीमारी से नजात पाई जा सकती है.

आम न समझें गले की खिचखिच को

सर्दीजुकाम के साथ गला खराब होना, गले में खराश, कुछ भी खानेपीने में तकलीफ, लगातार खांसी आना आदि गले से जुड़ी समस्याएं हैं जिन्हें लोग साधारण समझ कर अनदेखा कर देते हैं. हालांकि इन समस्याओं की अनदेखी कभीकभी गंभीर रोग को आमंत्रण देना साबित हो सकती है. इन गंभीर रोगों में से एक गले का कैंसर है जिस का अगर समय पर इलाज न किया जाए तो रोगी के बोलने की क्षमता के खोने के साथसाथ उस के पूरे शरीर मैं कैंसर फैल सकता है.
कैसे होता है गले का कैंसर : गले की सांस लेने, बोलने और निगलने के लिए प्रयोग में आने वाली कोशिकाएं असामान्य रूप से विभाजित होना शुरू हो जाती हैं और फिर नियंत्रण से बाहर आ जाती हैं. तब गले का कैंसर होता है. ज्यादातर गले का कैंसर मुखगुहा से शुरू हो कर ग्रसनी तक फैलता है.
महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों में यह कैंसर अधिक पाया जाता है क्योंकि धूम्रपान पुरुषों में आम है. यदि धूम्रपान और तंबाकू सेवन के साथ मद्यपान किया जाता है तो गले के कैंसर की संभावना अधिक बढ़ जाती है.

गले के कैंसर के कारण : अत्यधिक धूम्रपान, तंबाकू सेवन और मद्यपान भेजने में प्रोटीन व विटामिन की कमी.

लक्षण

– भोजन निगलने में कठिनाई या दर्द
– लगातार गले में खराश
– गले में गांठ महसूस होना
– गले में दर्द या सूजन
– गले में बढ़े हुए लिम्फ नोड्स (लसीका पर्व)
– लगातार खांसी
– घबराहट या सांस लेने पर आवाज आना
– अचानक वजन घटना
– खांसने पर खून आना

निदान : चिकित्सक गले की जांच करते हैं. जांच में कुछ असामानताएं पाई जाती हैं तो चिकित्सक बायोप्सी के लिए गले के ऊतक का नमूना भेजते हैं. बायोप्सी की रिपोर्ट से चिकित्सक कैंसर की पुष्टि करते हैं. उस के बाद सीटी स्कैन द्वारा ट्यूमर के स्थान का पता लगाया जाता है. साथ ही, यह भी पता लगाया जाता है कि क्या ट्यूमर शल्य चिकित्सा द्वारा हटाया जा सकता है.

डाक्टर कैंसर के चरणों का वर्णन करने के लिए संख्या का प्रयोग करते हैं. चरण 1-2 में ट्यूमर आसपास के ऊतकों में अंदर तक दाखिल नहीं हुए होते जबकि चरण 3-4 में ट्यूमर आसपास के ऊतकों के पार व्याप्त हो जाते हैं.
पीईटी स्कैन कैंसर के फैसले की सीमा निर्धारण का नवीनतम अरिक्त परीक्षण है. इस परीक्षण की मदद से यह पता लगाया जाता है कि क्या कैंसर लिम्फ नोट्स (लसीका पर्व) के साथसाथ शरीर के अन्य भागों में फैल गया है.

गले के कैंसर की चिकित्सा : गले के कैंसर की चिकित्सा इस बात पर निर्भर करती है कि कैंसर कितनी दूरी तक फैला है. गले के कैंसर के प्रारंभिक दौर के लिए विकिरण चिकित्सा और शल्य चिकित्सा प्रयोग में लाई है. तीसरेचौथे चरण के गले कैंसर के लिए कीमोथेरैपी चिकित्सा, सर्जरी और विकिरण चिकित्सा भी की जाती है.
गले के कैंसर के लिए लैरिजक्टोमी यानी स्वरयंत्र अच्छेदन सब से आम सर्जरी है. इस के अतिरिक्त ग्रसनी या उस के हिस्से को सर्जरी से हटाने की प्रक्रिया को कैरिजैक्टोमी यानी ग्रसनी उच्छेदन कहा जाता है. इस सर्जरी की जरूरत तब पड़ती है जब कैंसर कोशिकाएं स्वरयंत्र या ग्रसनी से परे लिम्फ नोड्स में फैल जाती हैं.
सर्जरी से रोगी की बोलने की क्षमता प्रभावित होती है, बोलने की क्षमता दोबारा प्राप्त करने के लिए रोगी को विशेष तकनीकों की जरूरत पड़ती है.

गले में खराश

अगर आप को पानी पीने या अन्य तरल पदार्थ निगलने में कठिनाई हो, मुंह से सांस लेने में कठिनाई हो, सांस लेने पर आवाज आती हो, अत्यधिक लार टपकती हो. 101 डिगरी फारेनहाइट से अधिक बुखार हो तो आप गले की खराश या ग्रसनीशोध यानी गले के इंफैक्शन से पीड़ित हैं.
इंफैक्शन की वजह से गले में खराश पैदा होती है. ऐसा वायरल और बैक्टीरियल इंफैक्शन के कारण होता है. अगर गले की खराश 2 हफ्ते से अधिक रहे तो उसे अनदेखा न करें. बारबार होने वाली खराश या इंफैक्शन हृदय के वौल्व और किडनी द्वारा रक्त की शुद्धीकरण की प्रक्रिया पर असर पड़ता है. इसे नेफ्राइटिस कहते हैं, जिस की वजह से किडनी कुछ समय के लिए फेल हो सकती है.

ज्यादातर केसों में इस का उपचार हो जाता है लेकिन बारबार गले का इंफैक्शन गुर्दे को फेल भी कर सकता है. इसी तरह गले का इंफैक्शन हृदय के वौल्व पर भी असर डालता है. जिस की वजह से वौल्व सिकुड़ जाते हैं और उन की कंपन गति कमजोर हो जाती है और खून के संचालन में बाधा आती है. ऐसा ज्यादातर बाईं तरफ के वौल्व में होता है. जिसे माइट्रल या एओरटिक कहते हैं.

गले की खराश का निदान

– बुखार की दवाइयों के साथ एंटीबायोटिक दवाओं का भी पूरा कोर्स करें.
– इंफैक्शन की रोकथाम के लिए वैक्सीन भी लगवा सकते हैं.
– खानपान का पूरा ध्यान दें. विटामिन ‘सी’ का भरपूर सेवन करें.
– वायु प्रदूषण से बचें.
– हाथों को बारबार धोएं.
-अत्यधिक ठंडे और तैलीय पदार्थों का प्रयोग न करें.
-निर्जलीकरण को रोकने के लिए खूब पानी पिएं.
– भाप लें.
– गरम पानी से गरारा करें.
-जब तक संक्रमण पूरी तरह खत्म न हो जाए, दवाइयां बंद न करें.

सेहत और समाज पर इंस्टाग्राम रील्स का दुष्प्रभाव

वैसे तो सोशल मीडिया का हर प्लेटफौर्म देखने वालों की सेहत से खिलवाड़ कर रहाहै पर ‘इंस्टाग्राम’ सबसे खराब सोशल मीडिया प्लेटफौर्म साबित हो रहा है. खासतौर पर इस पर जिस तरह की रील्स बन रही हैंवे गलत कटैंट दे रही हैं. सोशल मीडिया पर जल्दी सफल होने के लिए गलत तरह के कटैंट दिखाए जा रहे हैं. देखने वाले अच्छे कंटैंट नहीं देखते. इसके लिए लोग गलत कटैंट बनाकर अपलोड कर रहे हैं. ‘इंस्टाग्राम’ ऐसे कटैंट को रोक नहीं रहा. वह इनको ज्यादा प्रमोट करता है. इसलिए लोग तेजी के साथ गलत कटैंट बना रहे हैं.

यही वजह है कि ‘इंस्टाग्राम’ सबसे खराब सोशल मीडिया प्लेटफौर्म के रूप में अपनी पहचान बनाता जा रहा है. यह मानसिक सेहत पर बुरा असर डालता है. खासकर, रील्स का ऐसा नशा होने लगा है कि एक बार आप देखना शुरू करते हैं तो एक के बाद एक देखते जाते हैं.

ऐसे में टाइम कैसे बरबाद होता है, यह पता ही नहीं चलता. छोटेछोटे बच्चों को भी इसका शौकहोने लगा है जबकि जानकार लोग कहते हैं कि छोटे बच्चों को इंटरनैट और मोबाइल नहीं देना चाहिए. इसके चलते शारीरिक सक्रियता कम होने लगती है और मानसिक बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है.

सोशल मीडिया के प्रभावों को लेकर किया गया एक सर्वे कहता है, ‘इंस्टाग्राम’ को मानसिक सेहत के लिए बेहद खराब सोशल मीडिया साइट माना गया है जबकि दूसरे नंबर पर स्नैपचैट है.’

इस सर्वे में लोगों से यूट्यूब,इंस्टाग्राम, स्नैपचैट, फेसबुक और ट्विटर का उनके स्वास्थ्य पर पड़े प्रभाव से जुड़े कई सवाल किए गए थे. सोशल मीडिया का सेहत पर खराब प्रभाव पड़ रहा है. सोशल मीडिया का सबसे अधिक इस्तेमाल युवावर्ग के लोग करते हैं, इसलिए युवाओं पर इसका असर ज्यादा पड़ सकता है. ‘इंस्टाग्राम’ के बारे में जो सबसे बड़ी समस्या बताई गई है वह यह है कि यह महिलाओं के बौडीलुक को लेकर उन्हें इनसिक्योर बना देता है. इस से फोटोशौप्ड फोटो और वीडियो का प्रयोग ज्यादा होने लगा है. अच्छे फोटो डालने के चक्कर में लोग अकेले ही तसवीरें क्लिक करते हैं और फिर उन्हें पोस्ट करने से पहले अच्छी दिखने के लिए अलगअलग तरह के फिल्टर का प्रयोग करते हैं. फिल्टर की और बिना फिल्टर की फोटो की तुलना करने में उनके मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है.

कंटैंट को ज्यादा से ज्यादा लोग देखें, इसके लिए नग्नता और गंदेगंदे शब्दों का प्रयोग किया जाता है. गालीगलौज के अलावा मारपीट जैसे कंटैंट परोसे जाते हैं जो सेहत के साथ ही साथ समाज को भी गलत राह पर ले जाते हैं. एक को देखकर दूसरा भी उसी राह पर चलता है. जो भी वीडियो या फोटो अपलोड हो रहा है उसको एडिट करने या उसको रोकने का कोई उपाय नहीं दिखता. ऐसे में सोशल मीडिया का यह कटैंट सेहत के साथ ही साथ समाज को भी खराब कर रहा है.

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