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मैं जौब छोड़ कर बिजनैस करना चाहता हूं, क्या करूं?

सवाल

मेरी पत्नी अच्छी जौब में सैटल है. हमारे 2 बच्चे हैं. मैं आईटी कंपनी में जौब करता हूं, लेकिन कंपनी में प्रैशर बढ़ने के कारण अब मैं जौब छोड़ कर बिजनैस करना चाहता हूं. क्या मेरा फैसला सही है?

जवाब

भले ही आप की पत्नी अच्छी जौब में है, लेकिन घर के मुखिया तो आप ही हैं न, आप पर ही घर की पूरी जिम्मेदारी है. ऐसे में आप जौब छोड़ कर बिजनैस में इतनी जल्दी सैटल होंगे, यह कहना आसान नहीं है. आजकल कंपीटिशन व प्रैशर तो हर जगह है, जिसे आप को फेस करना ही पड़ेगा. इसलिए अभी जौब छोड़ने के इरादे को मन से निकालिए और खुद को कंपनी के प्रैशर के लिए तैयार करें.

इस के साथ ही बिजनैस करने के लिए खुद को तैयार करें, फिर बिजनैस  शुरू कर दें. अगर आप उस में अच्छे से सैटिल हो जाते हैं तब जौब से बिजनैस में आने के बारे में सोचें. इस से पत्नी पर भार नहीं पड़ेगा और आप को अपने लक्ष्य में कामयाबी मिलने की संभावना बढ़ जाएगी.

पति की दूसरी औरत, वजह सिर्फ पत्नी क्यों?

‘रखैल, जिसे अंगरेजी भाषा में ‘कैप्ट’ कहा जाता है, शब्द सुनते ही किसी भी पत्नी के तेवर टेढ़े हो जाने स्वाभाविक हैं क्योंकि कोई भी औरत किसी पुरुष की पत्नी का दरजा हासिल करने में गरिमामय रहती है और रखैल बनते ही शर्मिंदगी का दूसरा नाम बन जाती है. फिर, आखिर क्या हो जाता है कि एक पति, पत्नी के स्थान पर एक अन्य महिला को दिल दे बैठता है या उस का दिल खुदबखुद उस ओर खिंच जाता है?

रखैल यानी वह औरत जिसे किसी भी पति ने अपनी पत्नी के अलावा अपने लिए रखा है. उस पुरुष के भावनात्मक व शारीरिक सभी अधिकार उस की रखैल को स्वत: मिल जाते हैं. वह उस के पास जाता है और शायद वहां जा कर उसे वह सुकून मिलता है जिस की उसे तलाश रहती है.

आमतौर पर भारतीय समाज में स्त्रियां शांत मानी जाती हैं और पुरुष को चंचल प्रवृत्ति का माना जाता है. यह बात भी विचारणीय है कि दिल कब किसी की ओर झुक जाता है, यह पता ही नहीं चलता और कब एक पुरुष की जिंदगी में पत्नी के स्थान पर उस की प्रेमिका या रखैल अपनी जगह बना लेती है, इस से पुरुष स्वयं अनजान रहता है.

प्रश्न यह उठता है कि आखिर क्यों एक पुरुष का झुकाव परस्त्री की ओर हो जाता है? क्यों वह अपनी पत्नी से अधिक सुकून रखैल के पास जा कर महसूस करता है? क्या इस के लिए पत्नी ही पूरी तरह से उत्तरदायी है? इस बाबत हर उम्र की शिक्षित व अल्पशिक्षित कुछ महिलाओं से बात की गई.

देखिए, क्या कहती हैं ये महिलाएं-

कांता तिवारी जीवन के 48 वसंत पार कर चुकी हैं. वे कहती हैं, ‘‘इस के लिए पूरी तरह से स्त्री ही दोषी है क्योंकि यह तब होता है जब कोई आदमी घर के माहौल या घर के लोगों से परेशान रहता है और घर में उसे वह सुकून नहीं मिलता जिस की उसे तलाश है. ऐसे में जब कोई उसे समझने वाला मिल जाता है तो उस का झुकाव उधर हो जाता है.’’

मंजू सिंह एक गृहिणी, विवाहित बेटी की मां और रिटायर्ड कर्नल की पत्नी हैं. वे कहती हैं, ‘‘विवाह के बाद एक पत्नी को समझना चाहिए कि उस का पति उस से क्या चाहता है. जब पत्नी अपने पति को समझने में भूल कर देती है तो ऐसे में आदमी को भावनात्मक सहयोग जिस से भी मिलता है वह उस की ओर खिंच जाता है, फिर चाहे वह नातेरिश्ते की कोई भाभी, बहन हो या औफिस की कोई सहकर्मी. इसलिए जब यह सहयोग घर से बाहर अधिक मिलता है तो घर यानी पत्नी गौण हो जाती है.’’

कीर्ति दुबे एक स्कूल में शिक्षिका हैं, कहती हैं, ‘‘घर आने पर जब रोजरोज चिकचिक और ताने मिलते हैं, एकदूसरे से शिकवाशिकायतें होती हैं तो आदमी घर क्यों आएगा, वह तो वहां जाएगा न, जहां उसे ठंडी बयार यानी प्यार और अपनापन मिलेगा. घर ऐसा हो जहां आ कर आदमी को सुकून का एहसास हो और घर वालों से मिलने के लिए वह लालायित रहे.’’

वीणा नागर, 2 बहुओं और 2 पोतियों की दादी हैं, ने स्वयं इस दंश को झेला है. वे कहती हैं, ‘‘कम उम्र में शादी हो गई. अपने पति के बारे में कुछ नहीं जानती थी. मैं गांव की बहुत सीधीसादी और साधारण रूपरंग की थी. वे राजनीति में अच्छा दखल रखते थे. उन्हें मौडर्न, शिक्षित पत्नी चाहिए थी जो उन की हाई प्रोफाइल सोसाइटी में फिट हो सके. मैं उन की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही थी. एक बार बीमारी के कारण वे अस्पताल में भरती रहे. वहीं पर न जाने कब वे एक नर्स को दिल दे बैठे. पानी सिर के ऊपर से निकल चुका था. शुरू में बहुत झगड़ा किया पर उस से कुछ हासिल नहीं हुआ. क्या करते, समझौता कर लिया. घरबाहर सभी को पता है. पर जब उन्हें वहां ही जाना पसंद है तो फिर क्या. हां, हमारा ध्यान भी पूरा वे रखते हैं. सामाजिक व पारिवारिक रूप से मैं ही उन की पत्नी हूं पर…’’

उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट है कि यदि किसी पुरुष की रखैल है तो पूरी तरह तो नहीं, परंतु आंशिक रूप से पत्नी भी दोषी है, फिर चाहे उस के कारण प्रत्यक्ष हों या अप्रत्यक्ष.

पति के प्रति लापरवाही

पतिपत्नी 2 अलगअलग परिवार और परिवेश से आते हैं. उस के बाद भी प्रारंभ के दिनों में पतिपत्नी में एकदूसरे के प्रति बहुत आकर्षण रहता है. किंतु बच्चे होने और परिवार की जिम्मेदारी बढ़ने के साथसाथ इस झुकाव में कमी होने लगती है. महिलाएं घर और परिवार में इतनी अधिक व्यस्त हो जाती हैं कि वे अपने पति की ओर से लापरवाह हो जाती हैं. जब औफिस से आ कर पति अपनी परेशानी या खुशी अपनी पत्नी के साथ बांटना चाहता है तो पत्नी के पास समय ही नहीं होता. ऐसे में पति का झुकाव कई बार घर से बाहर दूसरी महिला के प्रति हो जाता है.

पति को न समझ पाना

पति को न समझना भी पतिपत्नी के रिश्ते में रखैल नाम के रिश्ते को जन्म देता है. इस का एक अहम कारण है. कई बार देखा जाता है कि पति अपनी पत्नी को स्मार्ट और मौडर्न ड्रैसेज में देखना चाहता है और इस के लिए वह प्रयास भी करता है. परंतु पत्नी अपनेआप में कोई परिवर्तन नहीं करती. एक पति ने अपनी पत्नी को सूट पहनने, गाड़ी चलाने, स्वतंत्ररूप से कंप्यूटर आदि चलाने की पूरी छूट दे रखी है परंतु पत्नी अपनेआप को परिवर्तित करने को ही तैयार नहीं. ऐसे में जब उसे कोई मनपसंद मिलता है तो भी कई बार पति का मन भटक जाता है.

घर का वातावरण

निर्मेश जब भी औफिस से घर आते, बस चाय का प्याला थमाते ही नमिता दिनभर का पूरा ब्योरा देने के बाद, अधूरे कामों की लंबी लिस्ट गिनाती और फिर बच्चे को निर्मेश को थमा निकल जाती अपने दोस्तों के साथ. कई बार तो घर आए मेहमानों के सामने भी वह निर्मेश की बेइज्जती करने से नहीं चूकती थी. ऐसे में जब निर्मेश की औफिस असिंस्टैंट ने उसे तरजीह देनी शुरू की तो निर्मेश कब उस की ओर झुक गया, उसे खुद ही पता नहीं चला.

यौन जरूरतें

चिकित्साशास्त्र ने यह प्रमाणित किया है कि महिलाओं को जहां अपने पति से भावनात्मक लगाव की आवश्यकता होती है वहीं पुरुषों को पत्नी से शारीरिक संबंधों की आवश्यकता अधिक होती है. ऐसे में जबजब पति को पत्नी से शारीरिक संबंधों की जरूरत होती है और पत्नी की ओर से बारबार न की जाती है तो अपनी शारीरिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पुरुष का झुकाव कहीं और हो ही जाता है.

स्वयं के प्रति लापरवाही

आमतौर पर विवाह के बाद महिलाएं अपने प्रति बहुत जागरूक, साफसुथरी और स्मार्ट हो कर जीती हैं. परंतु बच्चा होने और घरपरिवार की जिम्मेदारियों के बोझ तले अपने शरीर और व्यक्तित्व के प्रति लापरवाह हो जाती हैं और यह लापरवाही कभीकभी उन के पतिपत्नी के रिश्ते पर भारी पड़ जाती है.

बेमेल विवाह

कई बार कम उम्र में या बच्चे की पसंद पूछे बिना ही विवाह कर दिया जाता है. एक पिता ने अपने बेटे की शादी, बेटे के मना करने के बाद भी, अपने एक मित्र की अल्पशिक्षित बेटी से कर दी. नतीजा, शादी चली ही नहीं और बेटे का, इस बीच, अपने औफिस की सहकर्मी से लगाव हो गया. बाद में पूर्व पत्नी से तलाक ले कर उस ने उस सहकर्मी से विवाह कर लिया.

मनोवैज्ञानिक काउंसलर निधि तिवारी कहती हैं, ‘‘विवाह पतिपत्नी दोनों का रिश्ता है और उसे निभाने की जिम्मेदारी भी दोनों की होती है. यह सही है कि काफी हद तक पति की रखैल के लिए पत्नी जिम्मेदार है परंतु इसे पूरी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि इस के लिए कहीं न कहीं पति का उच्छृंखल मन भी उत्तरदायी होता है.

‘‘पतिपत्नी एक ही गाड़ी के 2 पहिए होते हैं. ऐसे में यदि गाड़ी का एक पहिया पटरी से उतर जाए या टूट जाए तो दूसरे का दायित्व उस पहिए को दुरुस्त कर के संतुलन को कायम रखना है, न कि पहिए को ही बदल देना. महिला यदि घरपरिवार में उलझ कर पति की ओर या अपने प्रति लापरवाह हो जाती है तो पति को उसे सहायता और सहयोग कर के अपने संबंध को मजबूत बनाना चाहिए.’’

क्या है समाधान

कई बार ऐसे संबंधों का पता चलने पर महिलाएं बहुत अधिक क्रोधित हो जाती हैं, बातबात पर पति को ताने देना, सरेआम बेइज्जती करना और उन्हें अनदेखा करना प्रारंभ कर देती हैं. इस से समस्या कम होने के बजाय और अधिक बढ़ जाती है. इस प्रकार की समस्या का समाधान प्यार, आत्ममूल्यांकन, पति से बातचीत के द्वारा दूर करने का प्रयास करना चाहिए. यदि कोई भी समाधान नजर नहीं आए, तो काउंसलर की मदद ले कर समस्या को सुलझाने का प्रयास करना चाहिए.

जून का दूसरा सप्ताह, कैसा रहा बौलीवुड का कारोबार

‘भूल भुलैया 2’ को मिली अपार सफलता के बाद अभिनेता कार्तिक आर्यन खुद को बौक्स आफिस का राजा मानने लगे थे. उनकी इस सोच के पीछे उनके  ‘पीआरओ’ का दिमाग था और जब जून माह के दूसरे सप्ताह यानी कि 14 जून को फिल्म ‘चंदू चैम्पियन’ का प्रदर्शन तय हुआ था, तभी से कार्तिक आर्यन ने चिल्लाना शुरू किया था कि ‘चंदू चैम्पियन’ उनके करियर के लिए ‘गेम चेंजर’ साबित होगी और अपनी इस फिल्म के पीआरओ की सलाह पर कार्तिक आर्यन ने फिल्म का ट्रेलर अपने गृह नगर ग्वालियर में भव्य स्तर पर रिलीज किया था और अपने सभी चमचा पत्रकारों व तथाकथित ‘समोसा क्रिटिक्स’ को ग्वालियर ले गए थे. उनके एक चमचा पत्रकार ने तो बाकायदा सोशल मीडिया पर लोगों से आव्हान किया था कि वह किस समय किस मल्टीप्लैक्स में ‘चंदू चैम्पियन’ देखने जा रहे हैं और वह 24 लोगों को फिल्म की टिकट खरीदकर देने को तैयार हैं,जिन्हें फिल्म देखनी हो वह समय पर मल्टीप्लैक्स पहुंच जाए.तो इस पत्रकार की इस घोषणा के बावजूद उनके साथ मुफ्त में ‘चंदू चैम्पियन’ देखने कोई नहीं पहुंचा.लोगों ने सवाल जरूर किया कि आखिर वह अपनी जेब से टिकट खरीदकर क्यों दे रहे हैं?

क्या इसके लिए कार्तिक आर्यन या निर्माता या फिल्म के पीआरओ ने उन्हें पैसे दिए हैं? बहरहाल, कार्तिक आर्यन व फिल्म के निर्माता की तरफ से हर चाल चली गयी. तथाकथित ‘समोसा क्रिटिक्स’ से फिल्म को चार व साढ़े चार स्टार दिलवाकर उसका विज्ञापन सोशल मीडिया व अखबारों में 14 जून को छपवाया गया. मगर अफसोस 150 करोड़ रूपए की लागत से बनी यह फिल्म सात दिन के अंदर महज 35 करोड़ रूपए ही बौक्स आफिस पर इकट्ठा कर सकी, जबकि इसे पूरे चार दिन की छुट्टी वाला सप्ताह मिला. इन 35 करोड़ में से निर्माता के हाथ में  बमुश्किल  15 करोड़ रूपए ही आएंगे. फिल्म ‘चंदू चैम्पियन’ की बौक्स आफिस पर इस दुर्गति के लिए फिल्म के निर्देशक कबीर खान व अभिनेता कार्तिक आर्यन के साथ ही फिल्म के प्रचारक भी जिम्मेदार हैं.

फिल्म के प्रदर्शन से पहले जिस तरह का फिल्म का प्रचार होना चाहिए था, वह नहीं हुआ था. इतना ही नही हमने इस फिल्म की समीक्षा में भी बताया था कि कबीर खान के लेखन व निर्देशन में तमाम त्रुटियों के अलावा फिल्म के कई दृश्यों में कार्तिक आर्यन ने अपने अभिनय से दिखाया है कि उनके अभिनय में कितनी कमियां हैं. अपने अभिनय को सुधारने पर मेहनत करने की बजाय कार्तिक कब तक ‘चमचा’ पत्रकारों के कहने पर चने के झाड़ पर टंगे रहेंगे..यह तो वही जाने..

कार्तिक आर्यन को यह नही भूलना चाहिए कि जून के पहले सप्ताह यानी कि सात जून को प्रदर्शित अभय वर्मा जैसे नए कलाकारों की फिल्म ‘‘मुंज्या’ ने पहले सप्ताह 35 करोड़ रूपए कमा लिए थे और दूसरे सप्ताह में कार्तिक की फिल्म ‘‘चंदू चैम्पियन’ को जबरदस्त टक्कर देते हुए 32 करोड़ पैंसठ लाख रूपए कमा लिए. इस तरह ‘मुंज्या’ ने 14 दिनों में  67 करोड़ पैंसठ लाख रूपए कमा लिए. जबकि ‘मुंज्या’ का बजट बीस करोड़ रूपए ही है. इस तरह अभय वर्मा के लिए उनकी फिल्म ‘‘मुंज्या’ गेम चेंजर साबित हुई,जबकि कार्तिक आर्यन के सारे दावे बाक्स आफिस पर बुरी तरह से ध्वस्त हुए.

जून माह के दूसरे सप्ताह यानी कि 14 जून को ही निर्देशक संजीव कुमार राजपूत की फिल्म ‘मनिहार’ प्रदर्शित हुई,जिसमें रोशनी रस्तोगी,बदरूल इस्लाम जैसे नए कलाकार हैं. यह फिल्म बौक्स आफिस पर दस लाख रूपए भी एकत्र नहीं कर सकी.

अब तुम पहले जैसे नहीं रहे

रिश्ते अब तुम पहले जैसे नहीं रहे द्य नसीम अंसारी कोचर कोई भी रिलेशनशिप आसानी से नहीं टूटती है. रिश्तों में धीरेधीरे दूरियां बढ़नी शुरू होती हैं और इस को अनदेखा किया तो एक समय ऐसा आता है जब दूरियां इस कदर बढ़ जाती हैं कि संबंध बेमानी हो जाते हैं. आराधना की शादी टूटने की कगार पर है. महज 5 वर्षों पहले बसी गृहस्थी अब पचास तरह के झगड़ों से तहसनहस हो चुकी है. आराधना और आशीष दोनों ही मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छी पोस्ट पर कार्यरत हैं. हाइली एजुकेटेड हैं. बड़ी तनख्वाह पाते हैं. पौश कालोनी में फ्लैट लिया है. सबकुछ बढि़या है, सिवा उन दोनों के बीच संबंध के. 2 साल चले प्रेमप्रसंग के बाद आराधना और आशीष ने शादी का फैसला किया था.

शादी से पहले तक दोनों दो जिस्म एक जान थे. साथसाथ खूब घूमेफिरे, फिल्में देखीं, शौपिंग की, हिल स्टेशन साथ गए, एकदूसरे को ढेरों गिफ्ट दिए, एकदूसरे की कंपनी खूब एंजौय की. ऐसा लगता कि इस से अच्छा मैच तो मिल ही नहीं सकता. इतना अच्छा और प्यारा जीवनसाथी हो तो पूरा जीवन खुशनुमा हो जाए. लेकिन शादी के 2 ही वर्षों के अंदर सबकुछ बदल गया. शादी के बाद धीरेधीरे दोनों का जो रूप एकदूसरे के सामने आया, उस से लगा इस व्यक्तित्व से तो वे कभी परिचित ही नहीं हुए. एकदूसरे से बेइंतहा प्यार करने वाले आराधना और आशीष अब पूरे वक्त एकदूसरे पर दोषारोपण करते रहते हैं. छोटी सी बात पर गालीगलौच, मारपीट तक हो जाती है. फिर या तो आराधना अपने कपड़े बैग में भर कर अपनी दोस्त के यहां रहने चली जाती है या आशीष रातभर के लिए गायब हो जाता है. दरअसल, शादी से पहले दोनों का अच्छा पक्ष ही एकदूसरे के सामने आया.

मगर शादी के बाद उन की ऐसी आदतें और व्यवहार एकदूसरे पर खुले, जो घर के अंदर हमेशा से उन के जीवन का हिस्सा थे. शादी के बाद आशीष की बहुत सी आदतें आराधना को नागवार गुजरती थीं, खासतौर पर उस का गंदे पैर ले कर बिस्तर पर चढ़ जाना. आशीष को घर में नंगे पैर रहने की आदत है. दिनभर जूते में उस के पैर कसे रहते हैं, लिहाजा, घर आते ही वह जूते उतार कर नंगे पैर ही रहता है. आराधना उस की इस आदत को कभी स्वीकार नहीं कर पाई. आराधना सफाई के मामले में सनकी है. कोई गंदे पैर ले कर उस के बिस्तर पर कैसे आ सकता है? शादी के पहले ही साल उस ने बैडरूम में लगे डबलबैड को 2 सिंगल बैड में बांट दिया.

अपने बिस्तर पर वह आशीष को हरगिज चढ़ने नहीं देती है. कभी आशीष का मूड रोमांटिक हुआ और उस ने उस के बिस्तर में घुसने की कोशिश की तो वह उस के गंदे पैरों को ले कर चिढ़ी दिखती है और सारे मूड का सत्यानाश कर देती है. उन के रिश्ते में दरार बढ़ने की शुरुआत भी, दरअसल, यहीं से शुरुआत हुई एकदूसरे की नजदीकियां न मिलने से दूरियां बढ़ने की. और भी कई आदतें आशीष की थीं जो आराधना को बरदाश्त नहीं थीं. नहाने के बाद भीगा तौलिया बाथरूम में ही छोड़ देना, धुलने वाले कपड़े वाशिंग मशीन में डालने की जगह इधरउधर रख देना, बिस्तर छोड़ने के बाद उस को तय कर के न रखना, खाने में हरी सब्जियों से परहेज, हर दूसरेतीसरे दिन नौनवेज खाने की फरमाइश, न मिलने पर बाहर से मंगवा लेना, ये तमाम बातें आराधना को परेशान करती हैं. आराधना की भी आदतें आशीष को खटकती हैं. उस का जरूरत से ज्यादा सफाई पसंद होना,

पूरी शाम फोन पर सहेलियों या अपने घर वालों से बातें करना, उस का डाइटिंग वाला खाना जो कभी भी आशीष के गले नहीं उतर सकता, अपने रूपरंग को बरकरार रखने के लिए ब्यूटीपार्लर में पानी की तरह पैसे बहाना, हर वीकैंड पर शौपिंग करना, फालतू की महंगी चीजें खरीद लाना और फिर गिफ्ट के तौर पर किसी सहेली को पकड़ा देना, कोई फ्यूचर प्लानिंग न करना, ऐसी उस की बहुतेरी बातें आशीष को खटकती हैं. इन्हीं पर दोनों के बीच झगड़े होते हैं. दोनों आर्थिक रूप से सक्षम हैं, लिहाजा, किसी के दबने का सवाल ही पैदा नहीं होता. झगड़ा होता है तो दोनों कईकई दिनों तक एक छत के नीचे 2 अजनबियों की तरह रहते हैं. दोनों में से कोई सौरी नहीं बोलता. अब तो दोनों को ही यह लगने लगा है कि वे अलगअलग ही रहें तो बेहतर है. कम से कम औफिस से घर आने पर सुकून तो होगा. बेकार की बातों पर कोई खिचखिच तो नहीं करेगा. सात जन्मों तक साथ रहने की कसमे खाने वाले आराधना और आशीष 5 वर्षों में ही एकदूसरे से बुरी तरह ऊब चुके हैं. कोई भी रिलेशनशिप आसानी से नहीं टूटती है. रिलेशनशिप में छोटीछोटी बातों का ध्यान रखना होता है. रिश्तों में धीरेधीरे दूरियां बढ़नी शुरू होती हैं और एक समय ऐसा आता है जब दूरियां इस कदर बढ़ जाती हैं कि रिलेशनशिप टूट जाती है.

अकसर रिलेशनशिप में देखा जाता है कि छोटीछोटी समस्याएं होती रहती हैं, जिन को अधिकतर हम नजरअंदाज कर देते हैं. परंतु इन समस्याओं को नजरअंदाज करने से आप के रिश्ते में दरार पड़ सकती है. इन समस्याओं को हमें नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, हमें इन समस्याओं का समाधान निकालना चाहिए. रिलेशनशिप में कुछ समस्याओं को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और रिश्ते को बचाए रखने के लिए निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए : स्वभाव में अंतर अगर आप के और आप के पार्टनर के स्वभाव में काफी अंतर है तो यह अंतर बाद में रिलेशनशिप में समस्याएं पैदा कर सकता है.

हर किसी का अपना अलग स्वभाव होता है. हो सकता है आप के पार्टनर को घूमने का शौक हो और आप घर पर रहना ही पसंद करते हों. हो सकता है आप के पार्टनर को बाहर जा कर पार्टी करने का शौक हो और आप घर पर ही पार्टी करने का शौक रखते हों. अलगअलग स्वभाव होने की वजह से भी रिलेशनशिप में दूरियां बढ़ने लगती हैं. स्वभाव में अंतर होना आम बात है, पर इस अंतर को दूर किया जा सकता है. अगर आप चाहते हैं कि आप के रिश्ते में हमेशा प्यार बना रहे तो एकदूसरे के स्वभाव में ढलने का प्रयास करें. रिलेशनशिप को सफल बनाने के लिए पतिपत्नी दोनों को प्रयास करना होता है. अलग चाहतें रिलेशनशिप में एकदूसरे को सम झना काफी महत्त्वपूर्ण होता है. अगर आप की और आप के पार्टनर की प्राथमिकताएं व चाहतें एकदूसरे से अलग हैं तो समय रहते इस बात पर ध्यान देना आप की रिलेशनशिप के लिए बेहतर रहेगा. अगर आप समय रहते इस बात पर ध्यान नहीं देंगे तो आप के रिश्ते में दूरियां बढ़ने लगेंगी. रिलेशनशिप सिर्फ एक व्यक्ति के चाहनेभर से नहीं चल सकती.

एक अच्छी रिलेशनशिप होने के लिए जरूरी है कि एकदूसरे की प्राथमिकताओं को सम झा जाए. जीवन में हर इंसान की कुछ न कुछ प्राथमिकताएं होती हैं. आप की और आप के पार्टनर की भी कुछ प्राथमिकताएं होंगी. आप एकदूसरे की प्राथमिकताओं को सम झने का प्रयास करेंगे तो आप की रिलेशनशिप में कोई भी समस्या नहीं आएगी. उन के फैसले को तवज्जुह दें अगर रिश्ते में छोटीछोटी बातों को ले कर तनाव होने लगे तो आप को सम झ जाना चाहिए कि रिलेशनशिप में समस्याएं आ रही हैं. एकदूसरे पर अधिकार जमाने के कारण या पार्टनर द्वारा सिर्फ अपने ही फैसलों को तवज्जुह देने के कारण रिश्ते में तनाव बढ़ने लगता है. तनाव बढ़ने के कारण रिश्ता टूट सकता है. अगर आप चाहते हैं कि आप के रिश्ते में कभी भी कोई भी परेशानी न आए तो एकदूसरे पर अधिकार जमाना छोड़ दें और हर काम में एकदूसरे का साथ निभाएं. रिलेशनशिप में प्यार से रहने से किसी भी तरह का कोई तनाव नहीं रहता. पार्टनर के साथ अधिक से अधिक समय बिताने का प्रयास करें.

भावनाएं सा झा करें एकदूसरे से बातचीत के जरिए अपनी भावनाओं को सा झा करें और कहां कमियां रह गई हैं, इस बात पर विचार करें. रिलेशनशिप में आपस में किसी को भी चलताऊ न लें. अगर आप का पार्टनर आप के लिए कुछ कर रहा है तो उसे अहमियत दें. अहमियत देने से रिश्ते और ज्यादा मजबूत होते हैं और आपसी प्यार भी बढ़ता है. अगर आप का पार्टनर आप के प्रति प्यार जता रहा है तो उस की भावनाओं की कद्र करें. उन को सम्मान दें एकदूसरे को सम्मान देने से ही प्यार बढ़ता है. बिना सम्मान के कोई भी रिश्ता नहीं चलता. इसलिए, हमेशा एकदूसरे को सम्मान दें, जम कर एकदूसरे की तारीफ करें. अगर आप से कोई गलती हुई है तो उसे फौरन स्वीकार कर लें. इस से आप का रिश्ता और ज्यादा मजबूत होगा और दरार नहीं आएगी. अकसर हम अपनी गलतियों को कभी नहीं मानते और दूसरे की गलती को स्वीकार कराने में ही पूरा वक्त लगा देते हैं.

इस से रिश्ते कमजोर होते हैं. रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए एकदूसरे को भरपूर वक्त देने के साथ ही अपने शौकों को एकदूसरे के साथ सा झा करें. कभी तंज न करें हमेशा एकदूसरे पर तंज कसते रहने से रिश्ता कमजोर होने लगता है. गलतियां सब से होती हैं, परंतु अगर हम उन गलतियों के लिए बारबार अपने पार्टनर पर तंज कसते रहेंगे तो रिश्ता कमजोर होने लगेगा और रिलेशनशिप में दूरियां बढ़ने लगेंगी. पुरानी गलतियां याद न करें जीवन में हर किसी से गलतियां होती हैं. कुछ ऐसी बातें भी होती हैं जिन्हें आप का पार्टनर याद नहीं करना चाहता होगा. उन बातों को पार्टनर को याद न दिलाएं. अगर आप बारबार पार्टनर को उन बातों को याद दिलाएंगे तो आप के रिश्ते में दूरियां बढ़ने लगेंगी और रिश्ता कमजोर होने लगेगा. कम्युनिकेशन गैप अकसर कम्युनिकेशन गैप होने की वजह से भी रिश्ते में दूरियां बढ़ने लगती हैं. अगर आप चाहते हैं कि आप की रिलेशनशिप मजबूत रहे, तो अपने पार्टनर से बातचीत करते रहें. घरबाहर की बातें उन से शेयर करें. अपने पार्टनर से खुल कर बातें करें. रिलेशनशिप को मजबूत बनाने के लिए इस बात का भी विशेष ध्यान रखें कि आप को पार्टनर की बातों को अनसुना नहीं करना है. एक्स की बात न करें एक्स के बारे में बात करने से भी रिलेशनशिप टूटने का खतरा रहता है.

बारबार एक्स के बारे में बात करने से रिश्ते में दूरियां बढ़नी शुरू हो सकती हैं. एक्स के बारे में बात करने से लड़ाई झगड़े भी अधिक होने की संभावना रहती है. इसलिए पुराने जख्मों को कभी न कुरेदें. भरोसा पैदा करें रिश्ते को मजबूत बनाने के लिए भरोसा बहुत जरूरी होता है. भरोसा किसी भी रिश्ते की नींव होता है. रिलेशनशिप में धोखा देने का मतलब है कि रिश्ते में दूरियां बढ़ना. पार्टनर को धोखा देने से, झूठ बोलने से, बातें छिपाने से रिश्ता मजबूत नहीं होता. धोखा देने से रिलेशनशिप में कई तरह की समस्याएं आनी शुरू हो जाती हैं. 2 लोग एक छत के नीचे खुशीखुशी से तभी रह सकते हैं जब उन के व्यवहार में पारदर्शिता हो, एकदूसरे के लिए प्यार और सम्मान हो. दोनों में से किसी में किसी बात का अहंकार न हो बल्कि आपसी विश्वास मजबूत हो.

औरत को सुविधा नहीं बराबरी चाहिए

आधुनिक तकनीक न्यूट्रल नहीं बनाई जा रही है बल्कि स्त्री और पुरुष दो सोच से ग्रस्त हैं. अगर मर्दों को किचन में मिक्सचरग्राइंडर चलाना होता, खाना बनाना होता, डिशवाशर में बरतन धोने होते, वैक्यूम क्लीनर से घर साफ करना होता तो तकनीक जैंडरबायस न होती. आज भी हर तकनीक, हर निर्माण के पीछे पितृसत्तात्मक सोच वाला पुरुष है. कमांड उसी के हाथ में है. सीमा दत्ता के पति रोहित ने उस को करवाचौथ पर कार गिफ्ट की. चमचमाती रैड कलर की अमेज गाड़ी देख कर सीमा की खुशी का ठिकाना न रहा. वह खुशी से उछलने लगी. पति के गले लग गई. लेकिन यह खुशी दूसरे ही दिन हवा हो गई जब कार चलाने के लिए रोहित ने एक ड्राइवर भी रख लिया, जबकि अपनी कार वह खुद चला कर औफिस जाता है.

सीमा को बताया गया कि वह जहां जाना चाहे, ड्राइवर उस को ले कर आयाजाया करेगा. कार की देखभाल, साफसफाई सब ड्राइवर की जिम्मेदारी होगी. सीमा को तो बस कार में बैठ कर अपने हाई स्टेटस का शोऔफ करना है और एंजौय करना है. सीमा की आजादी पर निगरानी और जासूसी अब तक उस का पति करता था और अब यह ड्राइवर भी करेगा. रोहित ने नई सुविधा दे कर उसे एक और बंधन में बांध दिया था. कार देख कर सीमा ने सोचा था कि अब रोहित कहेगा कि वह ड्राइविंग सीख ले, इंडिपैंडैंट हो जाए, मगर उस ने तो उसे और ज्यादा गुलाम बना दिया. क्या फर्क रह गया इस कार में और प्राइवेट टैक्सी में? रोहित औफिस में होता था और सीमा को कहीं जाना होता था तो वह प्राइवेट टैक्सी बुक करवा लेती थी या औटो से चली जाती थी.

अब वह काम यह ड्राइवर करेगा, उस की अपनी कार होने के बावजूद वह पुरुषों पर ही निर्भर रहेगी. अपनी मरजी से कार ले कर वह कहीं भी उस तरह नहीं जा सकती जैसे कि उस का पति जाता है. सीमा उच्चवर्गीय गुलाम है. सीमा की तरह वे सभी औरतें पुरुषों की गुलाम हैं जो अपनी कार को खुद ड्राइव नहीं करतीं, जिन्हें कार के बारे में कोई जानकारी नहीं है, जो कहीं आनेजाने के लिए पति या ड्राइवर पर निर्भर हैं. आकांक्षा के घर में पहली बार वाशिंग मशीन आई. उस के मायके वाले गरीब हैं. वहां कभी वाशिंग मशीन नहीं लगी. वहां सब नहाने के बाद अपने कपड़े खुद ही धोते हैं. ससुराल वाले भी कोई अमीर नहीं हैं. निम्नमध्यवर्गीय लोग हैं. मगर आकांक्षा के पति ने थोड़ी बचत कर के उस के लिए वाशिंग मशीन खरीद दी. मगर यह मशीन आकांक्षा को अब आफत लगने लगी है. पहले सब नहाने के बाद अपने कपड़े खुद ही धोते थे, अब सब के कपड़े धोने की जिम्मेदारी आकांक्षा पर आ गई है. वह रोज सब के गंदे कपड़े इकट्ठा करती है. मशीन में डालती है.

तय समय पर निकाल कर टोकरा भर कर छत पर लगी अलगनी पर सूखने के लिए डाल कर आती है. शाम को उस को उतारने जाना पड़ता है. फिर कपड़ों के ढेर के आगे बैठ कर वह हर कपड़े की तह लगाती है. जो घर में प्रैस हो सकते हैं उन्हें अलग छांटती है और जो धोबी से प्रैस करवाने हैं उन को अलग रखती है. पहले घर का हर सदस्य अपनेअपने कपड़ों की जिम्मेदारी खुद उठाता था, कब धोने हैं, कौन से प्रैस होने हैं, सब अपनाअपना देख लेते थे, मगर मशीन आने के बाद सारी जिम्मेदारी आकांक्षा के सिर आ पड़ी है. ऐसे में किसी के कपड़े पर कोई दाग वगैरह रह जाए तो ताने अलग से सुनने पड़ते हैं कि इतनी महंगी मशीन खरीद कर दी, फिर भी भाभी का काम में मन नहीं लगता है. औरतों को काम में सुविधा देने वाली वाशिंग मशीन ने आकांक्षा के लिए असुविधाएं पैदा कर दी हैं. तकनीक ने उस का काम बढ़ा दिया है. महिलाओं को तकनीकी सुविधा कहने को तकनीक ने औरतों को सुविधा देने के नाम पर तमाम तरह की मशीनें ईजाद कर दी हैं. द्य किचन में सिलबट्टे पर मसाला पीसने में उसे पसीना न बहाना पड़े,

इसलिए मिक्सी-ग्राइंडर ईजाद हुआ. द्य कंडाकोयला इकट्ठा कर के मिट्टी का चूल्हा न फूंकना पड़े, उस के फेफड़ों को धुआं न खाना पड़े, इसलिए किचन में गैस चूल्हे आ गए. द्य खाना फटाफट गरम हो जाए तो किचन में माइक्रोवेव ओवन लगा दिए गए. द्य डिशवाशर, राइस कुकर, वैक्यूम क्लीनर जैसी तमाम तकनीकें आ गईं. दरअसल, उन के माध्यम से औरत को घर और किचन में कैद कर दिया गया है. इन सुविधाओं से न तो उस पर काम का बो झ कम हुआ है और न उस के अंदर आजादी, खुदमुख्तारी का एहसास जागा है. इन से पुरुषों को आजादी मिली है. उन्हें इन चीजों को उपलब्ध कराने की माथापच्ची नहीं करनी पड़ती. पहले कोयला पुरुष रिकशे में भरवा कर लाते थे, खाना ठंडा खाते थे, पानी भर कर लाते थे. वहीं सोचने वाली बात यह भी है कि क्या विज्ञान की ईजाद इन तमाम चीजों के साथ आदमी को जोड़ सकते हैं? क्या आप कल्पना कर सकती है कि घर का मर्द किचन में मिक्सरग्राइंडर चला रहा है, या डिश वाशर में बरतन धो रहा है, या वैक्यूम क्लीनर ले कर घर साफ कर रहा है? नहीं, क्योंकि तकनीक जैंडरबायस हो चुकी है.

तकनीक न्यूट्रल नहीं, बल्कि स्त्री और पुरुष की सोच से ग्रस्त है. हर तकनीक, हर निर्माण के पीछे पितृसत्तात्मक सोच वाला पुरुष है. कमांड उस के हाथ में है. अगर पुरुषों को ये काम करने होते तो इन की नई तकनीक कब की आ चुकी होती. पुरुष औरतों के कपड़े डिजाइन करता है. उस को कितना नंगा रखना है, कितना ढांकना है, यह वह तय करता है. पुरुष स्त्री के लिए ज्वैलरी डिजाइन करता है. खूबसूरत सोनेचांदी की बेडि़यां उस के शरीर पर कहांकहां और कैसेकैसे जकड़नी हैं, यह वह निश्चित करता है. वह स्त्री के लिए दुनियाभर के कौस्मैटिक्स बनाता है. ऊंची हील की जूतियांचप्पलें बनाता है ताकि उस की गति को कंट्रोल में रख सके, उसे नाजुक बनाए रखा जा सके. डर है कि कहीं औरतों ने पुरुषों के समान जूते पहन कर दौड़नाभागना शुरू कर दिया तो वे आदमियों को बहुत पीछे छोड़ देंगी. करवाचौथ पर कई जोक्स चले व्हाट्सऐप पर. किसी ने लिखा कि इस दिन मोबाइल कंपनी का दिवाला निकल गया क्योंकि औरतों के हाथों में मेहंदी लगी होने की वजह से व्हाट्सऐप यूज नहीं किया गया.

एक सर्वे के मुताबिक, औरतें व्हाट्सऐप पर चैटिंग पुरुषों से 1.3 गुना ज्यादा करती हैं. पर कितनी औरतें? आंकड़े बताते हैं कि हमारे देश की 61 करोड़ से ज्यादा औरतों में से सिर्फ 28 परसैंट के पास फोन हैं. इस 28 परसैंट में से सिर्फ 20 परसैंट डेटा एनबिल्ट फोन का इस्तेमाल करती हैं यानी वे व्हाट्सऐप चला पाती हैं. दरअसल, औरतों के पास फोन होते ही कम हैं. अधिकतर घरों में अगर एक फोन है तो वह पति के पास रहता है. औरत को फोन का क्या काम? वह तो पति के फोन से भी काम चला लेगी. अगर कहीं औरत के पास फोन होगा तो वह पति के फोन से कमतर होगा. बस, बात भर ही तो करनी है इसलिए. पति खरीदेगा 8 हजार का फोन और औरत को 1,500 रुपए के फोन से काम चलाना होगा. स्मार्ट होने का हक सिर्फ आदमी को है, इसलिए उस के हाथ में स्मार्टफोन है. औरत को स्मार्ट हो कर क्या करना है, कौन सा सारे दिन दफ्तर में खटना है? फिर जिन औरतों के पास स्मार्टफोन हैं, वे हर पल शक के दायरे में रहती हैं. पति जब मन करे उन का फोन चैक करते हैं. कौल हिस्ट्री खंगालते हैं.

व्हाट्सऐप पर किसकिस से चैट हुई देखते हैं. वह कहांकहां गई, उस की लोकेशन ट्रेस करते हैं. औरत के लिए स्मार्टफोन सुविधा नहीं, बल्कि जी का जंजाल हो गया है. मैट्रो और मौल्स में हाथों में स्मार्टफोन लिए लड़कियोंऔरतों के ऊर्जावान तबके को देखने वाले इस बात को नकारते हैं कि फोन से औरतों की मुसीबत बड़ी है. पर यह सिर्फ आप के अरबन चश्मे का दोष है. इन से बाहर निकलने पर स्थिति 360 डिग्री के कोण पर घूम जाती है. हमारे यहां अब भी खाप पंचायतें लड़कियों के फोन रखने पर बैन लगाती हैं. बाड़मेर, राजस्थान के गरारिया गांव में मुसलमान औरतें सिर्फ इसलिए फोन का इस्तेमाल नहीं कर सकतीं क्योंकि उन के धर्म और खाप की नजर में यह सामाजिक बुराई है. किशनगंज, बिहार में लड़कियों को मोबाइल फोन रखने के लिए 10 हजार रुपए तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है.

आगरा के पास बसौली गांव में पंचायत ने 18 साल से कम उम्र की लड़कियों के लिए मोबाइल को बैन किया हुआ है. गुजरात की राजधानी अहमदाबाद से 100 किलोमीटर दूर सूरज गांव में औरतों के पास मोबाइल होने की सजा 2,100 रुपए का जुर्माना है और खबरी को इनाम के तौर पर 200 रुपए मिलते हैं. चेन्नई के कई इंजीनियरिंग कालेजों में कैंपस के बाहर लड़कियों को मोबाइल फोन रखने की इजाजत तो है लेकिन उन की रिंगटोन रोमांटिक नहीं होनी चाहिए. सोचिए कि ऐसे नियम और बंधन कहीं पुरुषों पर लागू होते हैं? डिजिटल इंडिया कैंपेन तब बगलें झांकने लगता है जब दिल्ली से जुड़े कितने ही गांवों में लड़कियों को मोबाइल छूने भी नहीं दिया जाता है. कुल जमा यह कि तकनीक औरतों और पुरुषों को अलगअलग चश्मे से देखती है. देश में मोबाइल जैंडर गैप बहुत बड़ा है. यहां पुरुषों के पास अगर 43 परसैंट मोबाइल फोन हैं तो औरतों के पास सिर्फ 28 परसैंट. लगभग 81 परसैंट औरतों ने इंटरनैट सर्फिंग कभी की ही नहीं है. फेसबुक पेज बनाने वाली भी सिर्फ 24 परसैंट औरतें हैं. अगर भारत में 7 करोड़ व्हाट्सऐप यूजर्स हैं तो सिर्फ 38 परसैंट औरतें आईपी मैसेजिंग का इस्तेमाल करती हैं.

इंटरनैट एंड मोबाइल एसोसिएशन औफ इंडिया द्वारा साल 2014 में किए गए एक सर्वे से पता चलता है कि तब तक सिर्फ 9 परसैंट औरतों को इंटरनैट सर्फ करना और ईमेल भेजना आता था. जानकार कहते हैं कि जब औरतों को डिजिटल फ्लूएंसी यानी बिना किसी बाधा के इंटरनैट के प्रयोग की सुविधा मिलेगी, तभी मर्दऔरत की असमानता को मिटाना मुमकिन होगा. इस से विकसित देशों में वर्कप्लेस यानी काम करने की जगहों पर उन के बीच 25 सालों में बराबरी आएगी और विकासशील देशों में 45 सालों में. भारत में काम तलाशने के लिए मोबाइल रखने वाले 81 परसैंट पुरुष डिजिटल स्पेस का प्रयोग करते हैं. औरतों की संख्या इस से काफी कम यानी 54 परसैंट ही है. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन का यह कहना काफी माने रखता है कि भारत की वर्कफोर्स में सिर्फ 27 परसैंट औरतें हैं.

अगर उन्हें तकनीक से रूबरू होने का मौका सही तरीके से मिलेगा तभी उन के लिए कंपीटिशन में टिके रहना आसान होगा. औरतों को हमेशा तकनीक से दूर ही रखने का प्रयास होता रहा है. मगर जहां उस को कुछ तकनीकी सुविधाएं दी भी गई हैं तो वे उस के लिए या तो मुसीबत पैदा कर रही हैं या इस एहसास को पुख्ता कर रही हैं कि वे सिर्फ मर्द की दासी ही हैं. और्डर फौलो करती फीमेल वर्चुअल वर्ल्ड की बात करें तो यहां औरतें सिर्फ हैल्पर हैं, कमांड आदमी के हाथ में है. माइक्रोसौफ्ट की कोर्टाना, अमेजन की एलेक्सा, गूगल की गूगल असिस्टैंट और एप्पल की सिरी, इन सब में एक बात समान है कि ये सभी वर्चुअल असिस्टैंट्स हैं और इन का जैंडर फीमेल है. बेंगलुरु के सेसना बिजनैस पार्क स्थित स्मार्टवर्क्स के दफ्तर में फीमेल रोबोट ‘मित्री’ को लौंच किया गया है. यह कंपनी की रिसैप्शनिस्ट है. यह महिला रोबोट दफ्तर में साफसफाई, हाउसकीपिंग का काम करती है.

गुलाबी फ्रौक पहने, नाजुक, फीमेल बौडी टाइप वाली इस रोबोट को बालाजी विश्वनाथन ने बनाया है. विश्वनाथन ने मित्र रोबोट भी बनाए हैं. ये मेल रोबोट हैं जो चौड़े कंधों वाले और वजनदार आवाज वाले हैं. ये दुकान में कारें बेचते हैं. जहां हैल्पर की जरूरत है वहां फीमेल ‘मित्री’ मदद के लिए हाजिर है. स्टीरियोटाइप्स हमेशा कायम रहते हैं, यही वजह है कि सारे वर्चुअल असिस्टैंट फीमेल जैंडर को रिफ्लैक्ट करते हैं. हालांकि, यूनेस्को ने इस तरह के रवैए पर ऐतराज जताया है. उस का कहना है कि डिजिटल असिस्टैंट्स के तौर पर महिला जैंडर का इस्तेमाल करने से लैंगिक भेद को मजबूती मिलती है. लोगों को लगता है कि सिर्फ एक बटन दबाने से औरतें किसी को खुश करने के लिए तैयार हो जाती हैं. इस से ज्यादातर समुदायों में इस बात को बल मिलता है कि महिलाएं पुरुषों के अधीन होती हैं और खराब व्यवहार को भी बरदाश्त कर सकती हैं.

यूनेस्को ने अपील की है कि डिजिटल असिस्टैंट्स को बायडिफौल्ट महिला न बनाया जाए और एक जैंडर न्यूट्रल मशीन पर काम किया जाए. आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस तकनीक के तयशुदा जैंडर का कारण और कुछ नहीं, सिर्फ यह है कि ज्यादातर टैक कंपनियों में इंजीनियरिंग टीम के प्रमुख आदमी हैं जो पुरुष ग्राहकों को सोच कर ही सारे प्रोडक्ट तैयार करते हैं. पुरुष ही पुरुषों के लिए प्रोडक्ट बनाते हैं, इसीलिए रोबोट जैसे जैंडर न्यूट्रल आविष्कार भी मर्द और औरत में बंटे दिखाई देते हैं. रोबोट्स के डिजाइनर्स और यूजर्स तय करते हैं कि उन का जैंडर क्या होगा. ये दोनों समूह अपने पूर्वाग्रह के आधार पर काम करते हैं. यही वजह है कि टर्मिनेटर, स्टार वार्स, रोबो कौप, एवेंजर्स में साहसिक कार्य करने वाले पात्र तो पुरुषों के तौर पर कोडेड होते हैं जबकि औरतें वहां सिर्फ प्रेमिका या पीडि़ता या मददगार होती हैं. महिलाओं की धीमी, मधुर आवाज सब को भाती है. अगर वह और्डर देने लगे तो सब उस से कतराते हैं.

महिलाओं के बौसी होने से सब को चिढ़ होती है. आदमी धौंस देने के लिए चिल्लाए, डपटे तो लोग ज्यादा परेशान नहीं होते हैं. वर्ष 2015 में टेस्को ने ब्रिटेन के कई शहरों में अपने रिटेल स्टोर्स के सैल्फ सर्विस चैकआउट्स से फीमेल वौयस को हटा कर मेल वौयस का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया. इस की वजह यह थी कि ग्राहकों को औरत की ‘बौसी’ किस्म की आवाज से शिकायत थी. हमारी परवरिश ऐसी है जो औरत के वर्चस्व व उस के काम को महत्त्व नहीं देती है. सालों से भविष्य में ऐसी दुनिया की कल्पना की जा रही है जब तकनीक हमारी जिंदगी को आसान बनाएगी, लेकिन उस दुनिया में भी औरतों की भूमिका तय होगी. पुरुष अधिपति होंगे और महिलाएं एप्रेन पहने, उन के काम करती रहेंगी.

गौरतलब है कि जिन क्षेत्रों में औरतों की संख्या मर्दों से ज्यादा है, वहां भी वे मर्दों को असिस्ट ही करती हैं, कमांड मर्दों के हाथ में होती है. फैसला मर्दों का होता है. घरों में काम करने वाली बाइयां, अस्पतालों में नर्सें, स्कूलों में छोटे बच्चों की टीचर, दफ्तरों में सैक्रेटरी और रिसैप्शनिस्ट, दुकान में सेल्स गर्ल्स, ये सब नईनई तकनीक का इस्तेमाल तो करती हैं, मगर ये उन की मालकिन नहीं होती हैं. महिलाओं के लिए तकनीकी आदर्श लोक तो तब बनेगा जब वर्चुअल सहायता का काम लिंग विशेष से जुड़ा न होगा. यों कोई भी काम लिंग विशेष तक सीमित क्यों हो? विज्ञान और तकनीक इंसान के लिंग को देख कर आगे बढ़ेंगे तो ये देश और समाज में भारी असमानता, डर, तनाव और अपराध को ही बढ़ाएंगे.

वर्क फ्रौम होम से गले में दर्द शुरू हो गया है समझ नहीं आ रहा क्या करें?

सवाल 

वर्क फ्रौम होम करती हूं. आई टी कंपनी में हूं, इसलिए सारा काम कंप्यूटर पर ही होता है. घर में शुरू में तो कोई दिक्कत
नहीं आई लेकिन अब गरदन में दर्द रहने लगा है. ज्यादा देर बैठा नहीं जाता. काफी परेशान हो गई हूं. कोई निदान सुझाएं?

 

जवाब 

आप ने बताया कि सारा दिन आप कंप्यूटर पर काम करते हैं. हो सकता है घर पर कंप्यूटर के आगे बैठने की पोजिशन सही न हो. कुरसी आरामदायक न हो. कई घंटे टीवी व मोबाइल देखना भी एक कारण हो सकता है. इस से बचें. बैठने के सही तरीके व गरदन की ऐक्सरसाइज से आराम मिल सकता है. अगर फिर भी आराम  न मिले तो फिजियोथेरैपिस्ट को दिखाएं.

रिश्ता : शमा को आखिर क्यों नापसंद था रफीक

शमा के लिए रफीक का रिश्ता आया. वह उसे पहले से जानती थी. वह ‘रेशमा आटो सर्विस’ में मेकैनिक था और अच्छी तनख्वाह पाता था.

शमा की मां सईदा अपनी बेटी का रिश्ता लेने को तैयार थीं.

शमा बेहद हसीन और दिलकश लड़की थी. अपनी खूबसूरती के मुकाबले वह रफीक को बहुत मामूली इनसान समझती थी. इसलिए रफीक उसे दिल से नापसंद था.

दूसरी ओर शमा की सहेली नाजिमा हमेशा उस की तारीफ करते हुए उकसाया करती थी कि वह मौडलिंग करे, तो उस का रुतबा बढ़ेगा. साथ ही, अच्छी कमाई भी होगी.

एक दिन शमा ख्वाबों में खोई सड़क पर चली जा रही थी.

‘‘अरी ओ ड्रीमगर्ल…’’ पीछे से पुकारते हुए नाजिमा ने जब शमा के कंधे पर हाथ रखा, तो वह चौंक पड़ी.

‘‘किस के खयालों में चली जा रही हो तुम? तुझे रोका न होता, तो वह स्कूटर वाला जानबूझ कर तुझ पर स्कूटर चढ़ा देता. वह तेरा पीछा कर रहा था,’’ नाजिमा ने कहा.

शमा ने नाजिमा के होंठों पर चुप रहने के लिए उंगली रख दी. वह जानती थी कि ऐसा न करने पर नाजिमा बेकार की बातें करने लगेगी.

अपने होंठों पर से उंगली हटाते हुए नाजिमा बोली, ‘‘मालूम पड़ता है कि तेरा दिमाग सातवें आसमान में उड़ने लगा है. तेरी चमड़ी में जरा सफेदी आ गई, तो इतराने लगी.’’

‘‘बसबस, आते ही ऐसी बातें शुरू कर दीं. जबान पर लगाम रख. थोड़ा सुस्ता ले…’’

थोड़ा रुक कर शमा ने कहा, ‘‘चल, मेरे साथ चल.’’

‘‘अभी तो मैं तेरे साथ नहीं चल सकूंगी. थोड़ा रहम कर…’’

‘‘आज तुझे होटल में कौफी पिलाऊंगी और खाना भी खिलाऊंगी.’’

‘‘मेरी मां ने मेरे लिए जो पकवान बनाया होगा, उसे कौन खाएगा?’’

‘‘मैं हूं न,’’ शमा नाजिमा को जबरदस्ती घसीटते हुए पास के एक होटल में ले गई.

‘‘आज तू बड़ी खुश है? क्या तेरे चाहने वाले नौशाद की चिट्ठी आई है?’’ शमा ने पूछा.

यह सुन कर नाजिमा झेंप गई और बोली, ‘‘नहीं, साहिबा का फोटो और चिट्ठी आई है.’’

‘‘साहिबा…’’ शमा के मुंह से निकला.

साहिबा और शमा की कहानी एक ही थी. उस के भी ऊंचे खयालात थे. वह फिल्मी दुनिया की बुलंदियों पर पहुंचना चाहती थी.

साहिबा का रिश्ता उस की मरजी के खिलाफ एक आम शख्स से तय हो गया था, जो किसी दफ्तर में बड़ा बाबू था. उसे वह शख्स पसंद नहीं था.

कुछ महीने पहले साहिबा हीरोइन बनने की लालसा लिए मुंबई भाग गई थी, फिर उस की कोई खबर नहीं मिली थी. आज उस की एक चिट्ठी आई थी.

चिट्ठी की खबर सुनने के बाद शमा ने नाजिमा के सामने साहिबा के तमाम फोटो टेबिल पर रख दिए, जिन्हें वह बड़े ध्यान से देखने लगी. सोचने लगी, ‘फिल्म लाइन में एक औरत पर कितना सितम ढाया जाता है, उसे कितना नीचे गिरना पड़ता है.’

नाजिमा से रहा नहीं गया. वह गुस्से में बोल पड़ी, ‘‘इस बेहया लड़की को देखो… कैसेकैसे अलफाजों में अपनी बेइज्जती का डंका पीटा है. शर्म मानो माने ही नहीं रखती है. क्या यही फिल्म स्टार बनने का सही तरीका है? मैं तो समझती हूं कि उस ने ही तुम्हें झूठी बातों से भड़काया होगा.

‘‘देखो शमा, फिल्म लाइन में जो लड़की जाएगी, उसे पहले कीमत तो अदा करनी ही पड़ेगी.’’

‘‘फिल्मों में आजकल विदेशी रस्म के मुताबिक खुला बदन, किसिंग सीन वगैरह मामूली बात हो गई है.

‘‘कोई फिल्म गंदे सीन दिखाने पर ही आगे बढ़ेगी, वरना…’’ शमा बोली.

‘‘सच पूछो, तो साहिबा के फिल्मस्टार बनने से मुझे खुशी नहीं हुई, बल्कि मेरे दिल को सदमा पहुंचा है. ख्वाबों की दुनिया में उस ने अपनेआप को बेच कर जो इज्जत कमाई, वह तारीफ की बात नहीं है,’’ नाजिमा ने कहा.

बातोंबातों में उन दोनों ने 3-3 कप कौफी पी डाली, फिर टेबिल पर उन के लिए वेटर खाना सजाने लगा.

‘‘शमा, ऐसे फोटो ले जा कर तुम भी फिल्म वालों से मिलोगी, तो तुझे फौरन कबूल कर लेंगे. तू तो यों भी इतनी हसीन है…’’ हंस कर नाजिमा बोली.

‘‘आजकल मैं इसलिए ज्यादा परेशान हूं कि मां ने मेरी शादी रफीक से करने के लिए जीना मुश्किल कर दिया है. उन्हें डर है कि मैं भी मुंबई न भाग जाऊं.’’

‘‘अगर तुझे रफीक पसंद नहीं है, तो मना कर दे.’’

‘‘वही तो समस्या है. मां समझती हैं कि ऐसे कमाऊ लड़के जल्दी नहीं मिलते.’’

‘‘उस में कमी क्या है? मेहनत की कमाई करता है. तुझे प्यारदुलार और आराम मुहैया कराएगा. और क्या चाहिए तुझे?’’

‘‘तू भी मां की तरह बतियाने लगी कि मैं उस मेकैनिक रफीक से शादी कर लूं और अपने सारे अरमानों में आग लगा दूं.

‘‘रफीक जब घर में घुसे, तो उस के कपड़ों से पैट्रोल, मोबिल औयल और मिट्टी के तेल की महक सूंघने को मिले, जिस की गंध नाक में पहुंचते ही मेरा सिर फटने लगे. न बाबा न. मैं तो एक हसीन जिंदगी गुजारना चाहती हूं.’’

‘‘सच तो यह है कि तू टैलीविजन पर फिल्में देखदेख कर और फिल्मी मसाले पढ़पढ़ कर महलों के ख्वाब देखने लगी है, इसलिए तेरा दिमाग खराब होने लगा है. उन ख्वाबों से हट कर सोच. तेरी उम्र 24 से ऊपर जा रही है. हमारी बिरादरी में यह उम्र ज्यादा मानी जाती है. आगे पूछने वाला न मिलेगा, तो फिर…’’

इसी तरह की बातें होती रहीं. इस के बाद वे दोनों अपनेअपने घर चली गईं.

उस दिन शमा रात को ठीक से सो न सकी. वह बारबार रफीक, नाजिमा और साहिबा के बारे में सोचती रही.

रात के 3 बज रहे थे. शमा ने उठ कर आईने के सामने अपने शरीर को कई बार घुमाफिरा कर देखा, फिर कपड़े उतार कर अपने जिस्म पर निगाहें गड़ाईं और मुसकरा दी. फिर वह खुद से ही बोली, ‘मुझे साहिबा नहीं बनना पड़ेगा. मेरे इस खूबसूरत जिस्म और हुस्न को देखते ही फिल्म वाले खुश हो कर मुझे हीरोइन बना देंगे.’’

जब कोई गलत रास्ते पर जाने का इरादा बना लेता है, तो उस का दिमाग भी वैसा ही हो जाता है. उसे आगेपीछे कुछ सूझता ही नहीं है.

शमा ने सोचा कि अगर वह साहिबा से मिलने गई, तो वह उस की मदद जरूर करेगी. क्योंकि साहिबा भी उस की सहेली थी, जो आज नाम व पैसा कमा रही है.

लोग कहते हैं कि दूर के ढोल सुहावने होते हैं. वे सच कहते हैं, लेकिन जब मुसीबत आती है, तो वही ढोल कानफाड़ू बन कर परेशान कर देते हैं.

शमा अच्छी तरह जानती थी कि उस की मां उसे मुंबई जाने की इजाजत नहीं देंगी, तो क्या उस के सपने केवल सपने बन कर रह जाएंगे? वह मुंबई जरूर जाएगी, चाहे इस के लिए उसे मां को छोड़ना पड़े.

शमा ने अपने बैंक खाते से रुपए निकाले, ट्रेन का रिजर्वेशन कराया और मां से बहाना कर के एक दिन मुंबई के लिए चली गई.

शमा ने साहिबा को फोन कर दिया था. साहिबा ने उसे दादर रेलवे स्टेशन पर मिलने को कहा और अपने घर ले चलने का भरोसा दिलाया.

जब ट्रेन मुंबई में दादर रेलवे स्टेशन पर पहुंची, उस समय मूसलाधार बारिश हो रही थी. बहुत से लोग स्टेशन पर बारिश के थमने का इंतजार कर रहे थे. प्लेटफार्म पर बैठने की थोड़ी सी जगह मिल गई.

शमा सोचने लगी, ‘घनघोर बारिश के चलते साहिबा कहीं रुक गई होगी.’

उसी बैंच पर एक औरत बैठी थी. शायद, उसे भी किसी के आने का इंतजार था.

शमा उस औरत को गौर से देखने लगी, जो उम्र में 40 साल से ज्यादा की लग रही थी. रंग गोरा, चेहरे पर दिलकशी थी. अच्छी सेहत और उस का सुडौल बदन बड़ा कशिश वाला लग रहा था.

शमा ने सोचा कि वह औरत जब इस उम्र में इतनी खूबसूरत लग रही है, तो जवानी की उम्र में उस पर बहुत से नौजवान फिदा होते रहे होंगे.

उस औरत ने मुड़ कर शमा को देखा और कहा, ‘‘बारिश अभी रुकने वाली नहीं है. कहां जाना है तुम्हें?’’

शमा ने जवाब दिया, ‘‘गोविंदनगर जाना था. कोई मुझे लेने आने वाली थी. शायद बारिश की वजह से वह रुक गई होगी.’’

‘‘जानती हो, गोविंदनगर इलाका इस दादर रेलवे स्टेशन से कितनी दूर है? वह मलाड़ इलाके में पड़ता है. यहां पहली बार आई हो क्या?’’

‘‘जी हां.’’

‘‘किस के यहां जाना है?’’

‘‘मेरी एक सहेली है साहिबा. हम दोनों एक ही कालेज में पढ़ती थीं. 2-3 साल पहले वह यहां आ कर बस गई. उस ने मुझे भी शहर देखने के लिए बुलाया था.’’

उस औरत ने शमा की ओर एक खास तरह की मुसकराहट से देखते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारे पास सामान तो बहुत कम है. क्या 1-2 दिन के लिए ही आई हो?’’

‘‘अभी कुछ नहीं कह सकती. साहिबा के आने पर ही बता सकूंगी.’’

‘‘कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम अपने घर से बिना किसी को बताए यहां भाग कर आई हो? अकसर तुम्हारी उम्र की लड़कियों को मुंबई देखने का बड़ा शौक रहता है, इसलिए वे बिना इजाजत लिए इस नगरी की ओर दौड़ पड़ती हैं और यहां पहुंच कर गुमराह हो जाती हैं.’’

शमा के चेहरे की हकीकत उस औरत से छिप न सकी.

‘‘मुझे लगता है कि तुम भी भाग कर आई हो. मुमकिन है कि तुम्हें भी हीरोइन बनने का चसका लगा होगा, क्योंकि तुम्हारी जैसी हसीन लड़कियां बिना सोचे ही गलत रास्ते पर चल पड़ती हैं.’’

‘‘आप ने मुझे एक नजर में ताड़ लिया. लगता है कि आप लड़कियों को पहचानने में माहिर हैं,’’ कह कर शमा हंस दी.

‘‘ठीक कहा तुम ने…’’ कह कर वह औरत भी हंस दी, ‘‘मैं भी किसी जमाने में तुम्हारी उम्र की एक हसीन लड़की गिनी जाती थी. मैं भी मुंबई में उसी इरादे से आई थी, फिर वापस न लौट सकी.

‘‘मैं भी अपने घर से भाग कर आई थी. मुझ से पहले मेरी सहेली भी यहां आ कर बस चुकी थी और उसी के बुलावे पर मैं यहां आई थी, पर जो पेशा उस ने अपना रखा था, सुन कर मेरा दिल कांप उठा…

‘‘वह बड़ी बेगैरत जिंदगी जी रही थी. उस ने मुझे भी शामिल करना चाहा, तो मैं उस के दड़बे से भाग कर अपने घर जाना चाहती थी, लेकिन यहां के दलालों ने मुझे ऐसा वश में किया कि मैं यहीं की हो कर रह गई.

‘‘मुझे कालगर्ल बनना पड़ा. फिर कोठे तक पहुंचाया गया. मैं बेची गई, लेकिन वहां से भाग निकली. अब स्टेशनों पर बैठते ऐसे शख्स को ढूंढ़ती फिरती हूं, जो मेरी कद्र कर सके, लेकिन इस उम्र तक कोई ऐसा नहीं मिला, जिस का दामन पकड़ कर बाकी जिंदगी गुजार दूं,’’ बताते हुए उस औरत की आंखें नम हो गईं.

‘‘कहीं तुम्हारा भी वास्ता साहिबा से पड़ गया, तो जिंदगी नरक बन जाएगी. तुम ने यह नहीं बताया कि तुम्हारी सहेली करती क्या है?’’ उस औरत ने पूछा.

शमा चुप्पी साध गई.

‘‘नहीं बताना चाहती, तो ठीक है?’’

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है. वह हीरोइन बनने आई थी. अभी उस को किसी फिल्म में काम करने को नहीं मिला, पर आगे उम्मीद है.’’

‘‘फिर तो बड़ा लंबा सफर समझो. मुझे भी लोगों ने लालच दे कर बरगलाया था,’’ कह कर औरत अजीब तरह से हंसी, ‘‘तुम जिस का इंतजार कर रही हो, शायद वह तुम्हें लेने नहीं आएगी, क्योंकि जब अभी वह अपना पैर नहीं जमा सकी, तो तुम्हारी खूबसूरती के आगे लोग उसे पीछे छोड़ देंगे, जो वह बरदाश्त नहीं कर पाएगी.’’

दोनों को बातें करतेकरते 3 घंटे बीत गए. न तो बारिश रुकी, न शाम तक साहिबा उसे लेने आई. वे दोनों उठ कर एक रैस्टोरैंट में खाना खाने चली गईं.

शमा ने वहां खुल कर बताया कि उस की मां उस की शादी जिस से करना चाहती थीं, वह उसे पसंद नहीं करती. वह बहुत दूर के सपने देखने लगी और अपनी तकदीर आजमाने मुंबई चली आई.

‘‘शमा, बेहतर होगा कि तुम अपने घर लौट जाओ. तुम्हें वह आदमी पसंद नहीं, तो तुम किसी दूसरे से शादी कर के इज्जत की जिंदगी बिताओ, इसी में तुम्हारी भलाई है, वरना तुम्हारी इस खूबसूरत जवानी को मुंबई के गुंडे लूट कर दोजख में तुम्हें लावारिस फेंक देंगे, जहां तुम्हारी आवाज सुनने वाला कोई न होगा.’’

शमा उस औरत से प्रभावित हो कर उस के पैरों पर गिर पड़ी और वापस जाने की मंसा जाहिर की.

‘‘अगर तुम इस ग्लैमर की दुनिया में कदम न रखने का फैसला कर घर वापस जाने को राजी हो गई हो, तो मैं यही समझूंगी कि तुम एक जहीन लड़की थी, जो पाप के दलदल में उतरने से बच गई. मैं तुम्हारे वापसी टिकट का इंतजाम करा दूंगी,’’ उस औरत ने कहा.

शमा घर लौट कर अपनी बूढ़ी मां सईदा की बांहों में लिपट कर खूब रोई.

आखिरकार शमा रफीक से शादी करने को राजी हो गई.

मां ने भी शमा की शादी बड़े ही धूमधाम से करा दी.

अब रफीक और शमा खुशहाल जिंदगी के सपने बुन रहे हैं. शमा भी पिछली बातें भूलने की कोशिश कर रही है.

नीट और प्रोटेम स्पीकर के मुद्दे पर विपक्ष ने दिखाई संविधान की किताब

18वीं लोकसभा का पहला सत्र राष्ट्रगान के साथ शुरू हुआ. इसके बाद पिछले सदन के दिवंगत सदस्यों को श्रद्धांजलि दी गई. संसद में आज और कल नए सांसद शपथ लेंगे. इससे पहले भाजपा सांसद भर्तुहरि महताब को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने प्रोटेम स्पीकर की शपथ दिलाई थी. इस दौरान संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू राष्ट्रपति भवन में मौजूद थे.

सत्ता पक्ष की तैयारी के बीच विपक्ष की अपनी अलग से तैयारी थी. विपक्ष के सभी सासंदोे ने तय किया था कि वह एक साथ संसद में प्रवेश करेंगे. सबके हाथ में संविधान की कौपी होगी. इंडिया ब्लौक के सभी सांसद सबसे पहले महात्मा गांधी की प्रतिमा के पास एकत्र हुये. वहां से सांसद अपने साथ संविधान की एक कौपी लेकर संसद भवन में गये.

संसद भवन में समाजवादी पार्टी के सांसदों ने सबसे पहले प्रवेश किया. सभी के सिर पर लाल टोपी और लाल गमछा था. हाथ में संविधान की किताब थी. अखिलेश यादव के ठीक बगल उनकी पत्नी डिंपल यादव थी. रामगोपाल और उनके परिवार के दूसरे सदस्य आदित्य और धर्मेन्द्र के साथ अयोध्या के सांसद अवधेष प्रसद सबसे अधिक आकर्षण का केन्द्र थे.

जब सपा सांसदों का फोटो हो रहा था. इस बीच कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे और सोनिया गांधी पीछे से आती दिखी. खडगे सफेद धोती कुर्ता में थे तो सोनिया ने बूटेदार कौटन की साडी और सफेद ब्लाउज पहन रखा था और आंखों पर ब्राउन कलर के शीशे वाला गौगल्स लगाया हुआ था. अखिलेश यादव ने उनके लिये रास्ता देते मल्लिकार्जुन खडगे से कहा कि ‘हम एक साथ है. आपसे बड़ी संविधान की किताब लेकर आये है.’ इस पर दोनो हंस दिये. मल्लिकार्जुन खडगे ने अखिलेश से कहा ‘देर आये दुरूस्त आये.’

पीछे आ रही सोनिया गांधी को अखिलेश ने अभिवादन किया और अयोध्या के सांसद अवधेश प्रसाद का परिचय कराते कहा यह अयोध्या के सांसद अवधेष प्रसाद है. सोनिया ने उनको बधाई दी. अखिलेष ने सोनिया से कहा ‘हम आपसे बड़ी संविधान कि किताब लेकर आये है.’ सोनिया गांधी ने अखिलेश को बधाई देते कहा ‘आपका काम भी बड़ा है.’ विपक्ष ने एकजुटता और आत्मविश्वास दिखाने का पूरा काम किया.

मोदी और धर्मेन्द्र प्रधान का विरोध:

शपथ लेने वालों में सबसे पहला नाम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का था. जब वह शपथ लेने आये तो विपक्षी दलों ने संविधान की कौपी लहराई. मोदी की शपथ के दौरान सत्ता पक्ष के सांसदों ने भारत माता की जय के नारे लगाए, जिसके जवाब में विपक्ष ने संविधान की कौपी लहराई. कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे ने विपक्ष के सांसदों के साथ संविधान की कौपी लेकर प्रदर्शन किया. सपा के सभी सांसद हाथ में संविधान की कौपी लेकर पहुंचे. सपा प्रमुख अखिलेश यादव और उनकी पत्नी डिंपल यादव समेत सभी सपा सांसद हाथ में संविधान की कौपी लेकर संसद पहुंचे.

अनुप्रिया पटेल, जितेंद्र सिंह, चिराग पासवान, मनसुख मंडाविया, किरेन रिजिजू, गजेंद्र सिंह शेखावत, राम मोहन नायडू, ललन सिंह, शिवराज सिंह चैहान, नितिन गडकरी, अमित शाह राजनाथ सिंह, फग्गन सिंह कुलस्ते, राधा मोहन सिंह ने शपथ ली. जब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का नाम जब शपथ के लिए बुलाया गया तो विपक्ष ने ‘नीट नीट, शेम शेम’ बोलना शुरू कर दिया. विपक्ष नीट पेपर धांधली में उनके इस्तीफे की भी मांग कर रहा है. शपथ ग्रहण के लिये सीढियों से चढ़कर पोडियम तक जाना होता है. जिसमे 2-3 मिनट का समय लग रहा था. इस दौरान पूरे समय विपक्ष के नारे संसद हौल में गूजंते रहें.

प्रोटेम स्पीकर का विरोध:

नीट के बाद दूसरा हंगामा प्रोटेम स्पीकर को लेकर हो रहा था. इसके विरोध में इडिया ब्लॉक के सांसदों ने गांधी प्रतिमा के पास प्रदर्शन किया. सांसद हाथ में संविधान की कॉपी लिए थे. प्रोटेम स्पीकर भर्तुहरि महताब के साथ पैनल में शामिल 3 विपक्षी सांसद सुरेश कोडिकुन्निल, थलिक्कोट्टई राजुथेवर बालू, सुदीप बंदोपाध्याय संसद में उपस्थित नहीं हुए. ये सांसद प्रोटेम स्पीकर भर्तुहरि महताब का विरोध कर रहे हैं. इनका कहना है कि सरकार ने नियमों को दरकिनार कर प्रोटेम स्पीकर नियुक्त किया है. नियम के मुताबिक, कांग्रेस के के. सुरेश 8 बार के सांसद हैं, इसलिए प्रोटेम स्पीकर उन्हें बनाना चाहिए था. महताब 7 बार के सांसद हैं.

कांग्रेस सांसद के सुरेश ने कहा एनडीए सरकार ने लोकसभा की परंपरा तोड़ी है. अब तक जो सांसद सबसे अधिक ज्यादा बार चुनाव जीतता है, वही प्रोटेम स्पीकर बनता रहा है. भर्तृहरि महताब 7वीं बार सांसद चुने गए हैं. जबकि, मैं 8वीं बार सांसद चुना गया हूं. वे फिर से विपक्ष का अपमान कर रहे हैं. इसलिए इंडिया ब्लौक ने सर्वसम्मति से पैनल सदस्यों का बहिष्कार करने का फैसला किया है.

18वीं लोकसभा को मिलेगा नेता विपक्ष:

लोकसभा चुनाव 2024 के पहले सत्र में 10 साल बाद कांग्रेस को नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी मिलेगी. पिछले 10 साल से लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद खाली है, क्योंकि 2014 के बाद से किसी भी विपक्षी दल के 54 सांसद नहीं जीते. मावलंकर नियम के तहत नेता प्रतिपक्ष बनने के लिए लोकसभा की कुल संख्या 543 का 10 प्रतिशत यानी 54 सांसद होना जरूरी है. 16वीं लोकसभा में मल्लिकार्जुन खड़गे 44 सांसदों वाले कांग्रेस संसदीय दल के नेता थे, लेकिन उन्हें नेता प्रतिपक्ष का दर्जा नहीं था. 17वीं लोकसभा में 52 सांसदों की अगुआई अधीर रंजन चैधरी ने की थी. उन्हें भी कैबिनेट जैसे अधिकार नहीं थे.

संसद में विपक्ष के नेता का अपना अलग महत्व होता है. नेता विपक्ष हर बड़ी नियुक्ति में शामिल होता है. उसे नेता सदन यानि पीएम के बराबर तरजीह मिलती है. चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली कमेटी में भी उन्हें शामिल किया जाता है, जिसकी अध्यक्षता पीएम करते हैं. नेता प्रतिपक्ष राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, केंद्रीय सूचना आयोग, सीवीसी और सीबीआई के प्रमुखों की नियुक्ति करने वाली कमेटी में भी शामिल होता है.

लोकसभा की लोक लेखा समिति का अध्यक्ष भी आमतौर पर नेता प्रतिपक्ष को ही बनाया जाता है. इस समिति के पास पीमए तक को तलब करने का अधिकार होता है. सदन के भीतर प्रतिपक्ष के अगली, दूसरी कतार में कौन नेता बैठेगा, इसकी राय भी विपक्ष के नेता से ली जाती है.

18वीं लोकसभा में सत्ता पक्ष और विपक्ष हालत बदली हुई है. 2014 और 2019 की तुलना में इस बार बीजेपी की पूर्ण बहुमत की सरकार नहीं है. 18वीं लोकसभा में एनडीए की सरकार है. गठबंधन के पास 293 सांसद हैं.

मोदी के पिछले दो कार्यकाल की तुलना में तीसरे कार्यकाल में विपक्ष मजबूत हुआ है. इंडिया ब्लॉक ने 234 सीटें जीती हैं. कांग्रेस के पास 99 सीटे हैं, जो सदन में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी है. संसद में इंडिया ब्लौक मजबूत दिखा. जिससे राहुल गांधी की ताकत बढेगी. 10 साल बाद कांग्रेस से नेता विपक्ष भी बनाया जाएगा. जिसके लिए राहुल गांधी का नाम सबसे ऊपर चल रहा है. बैठक में इस पर भी विचार विमर्श होगा. सत्र का पहला दिन विपक्ष की एकजुटता और आत्मविश्वास के नाम रहा.

नरेन्द्र मोदी ने सबको साथ लेकर सबकी सहमति से काम करने की बात कहते विपक्ष की अहमियत बताई और कहा कि उम्मीद है विपक्ष का साथ मिलेगा.

सड़क से संसद तक नीट की धांधली

नीट परीक्षा के परिणामों को ले कर उठा विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा था कि यूजीसी नेट की गड़बड़ी भी सामने आ खड़ी हुई. इस समय एनटीए चारों तरफ से घिर चुकी है. तपती गरमी के बावजूद छात्र सड़कों पर हैं, वे रिजल्ट में धांधली का आरोप लगा रहे हैं.

छात्रों की मांग है कि एनटीए को ही निरस्त कर दिया जाए और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफ़ा दें. इस के अलावा परीक्षा कैसिंल हो और दोबारा परीक्षा कराई जाए. धर्मेंद्र प्रधान जो पहले किसी भी गड़बड़ी से इनकार कर रहे थे वे भी कहीं गुंजाइश की बात करने लगे हैं.

 

विपक्ष इस मौके पर पूरी तरह से हमलावर हैं. मुख्य रूप से राहुल गांधी ने इस पर कांफ्रेस की है और छात्रों से मुलाक़ात भी की है.उन्होंने नरेंद्र मोदी पर हमला बोलते कहा है कि “नीट के रिजल्ट में धांधली कर के 24 लाख छात्रों का घर तोड़ दिया गया है.”

अपने ट्वीट पर राहुल गांधी ने लिखा था ‘नरेंद्र मोदी ने अभी शपथ भी नहीं ली है और नीट परीक्षा में हुई धांधली ने 24 लाख से अधिक स्टूडैंट्स और उन के परिवारों को तोड़ दिया है. एक ही एग्जाम सेंटर से 6 छात्र मैक्सिमम मार्क्स के साथ टौप कर जाते हैं, कितनों को ऐसे मार्क्स मिलते हैं जो टैक्निकली संभव ही नहीं है, लेकिन सरकार लगातार पेपर लीक की संभावना को नकार रही है.’

उन्होंने आगे कहा है, “शिक्षा माफिया और सरकारी तंत्र की मिलीभगत से चल रहे इस पेपर लीक उद्योग से निपटने के लिए ही कांग्रेस ने एक रोबस्ट प्लान बनाया था. हम ने अपने मैनिफेस्टो में कानून बना कर छात्रों को पेपर लीक से मुक्ति दिलाने का संकल्प लिया था. आज मैं देश के सभी स्टूडेंट्स को विश्वास दिलाता हूं कि मैं आप की आवाज को दबने नहीं दूंगा.”

छात्रों के साथ फिजिक्सवाला के सीईओ अलख पांडेय, कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी और रणदीप सुरजेवाला समेत कई राजनेताओं ने भी सवाल पूछे. फिजिक्सवाला के फाउंडर अलख पांडेय तो चैनलों में जाजा कर इस के खिलाफ इंटरव्यू दे रहे हैं. उन्होंने एक वीडियो में दावा किया कि वे नीट 2024 में एनटीए का सबसे बड़ा राज सबूत के साथ पेश कर रहे हैं. उन्होंने वीडियो में एक ओएमआर सीट शेयर किया और कहा कि “इस में कैलकुलेट करोगे तो 368 नंबर आएंगे और एनटीए ने इस बच्चे को रिजल्ट में 453 नंबर दिए हैं यानी कुल 85 नंबर का अंतर यानी इसे ग्रेस मार्क मिला या इसे कैसे मिला ?

राहुल गांधी से जो छात्र मिलने आए थे उन्होंने अपनी मांगे रखीं. जिस के बाद यह तय है कि नीट गड़बड़ी का मामला संसद शुरू होने के बाद और भी जोर पकड़ेगा. एक तरफ छात्र सड़कों पर आंदोलित होंगे तो वहीँ दूसरी तरफ संसद में विपक्ष पूरे जोश से इस मुद्दे को उठाएगा तो सरकार कहीं न कहीं बैकफुट में ही रहेगी

मैं 58 वर्षीय महिला हूं मुझे बारबार यूटीआई हो जाता है, बहुत परेशान हूं, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 58 वर्षीय महिला हूं. मुझे बारबार यूटीआई हो जाता है. कई बार उपचार कराया, लेकिन यह समस्या स्थाई रूप से दूर नहीं होती. बहुत परेशान हूं. क्या करूं?

 

जवाब

मेनोपौज के बाद महिलाओं को अकसर इस प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. ब्लैडर में यूरिन रुक जाता है, अच्छी तरह से पास नहीं होता. इसलिए संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है. कई महिलाओं में मेनोपौज के बाद यूरिन पास करने का रास्ता ड्राई हो जाता है. हारमोन थेरैपी से इस समस्या का उपचार किया जाता है. कई बार औपरेशन के द्वारा यूरिन पास करने का रास्ता चौड़ा किया जाता है. मेनोपौज के बाद यूटीआई के संक्रमण का खतरा और बढ़ जाता है, क्योंकि ऐस्ट्रोजन हारमोन के कम होने से वैजाइना, यूरेथ्रा और ब्लैडर के निचले हिस्से के ऊतक बहुत पतले और आसानी से टूटने वाले हो जाते हैं.

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महिलाओं में यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फैक्शन

यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फैक्शन या यूटीआई (यह ट्रैक्ट शरीर से मुख्यरूप से किडनी, यूरेटर ब्लैडर और यूरेथरा से मूत्र निकालता है) एक प्रकार का विषाणुजनित संक्रमण है. यह ब्लैडर में होने वाला सब से सामान्य प्रकार का संक्रमण है लेकिन कई बार मरीजों को किडनी में गंभीर प्रकार का संक्रमण भी हो सकता है जिसे पाइलोनफ्रिटिस कहते हैं.

यौनरूप से सक्रिय महिलाओं में यह अधिक होता है क्योंकि यूरेथरा सिर्फ 4 सैंटीमीटर लंबा होता है और जीवाणु के पास ब्लैडर के बाहर से ले कर भीतर तक घूमने के लिए इतनी ही जगह होती है. डायबिटीज होने से मरीजों में यूटीआई होने का खतरा दोगुना तक बढ़ जाता है.

डायबिटीज से बढ़ता है जोखिम

डायबिटीज के कारण शरीर की प्रतिरोधक क्षमता प्रभावित होती है, इसलिए शरीर जीवाणुओं, विषाणुओं और फुंगी से मुकाबला करने में अक्षम हो जाता है. इस वजह से डायबिटीज से पीडि़त मरीजों को अकसर ऐसे जीवाणुओं की वजह से यूटीआई हो जाता है. इस में सामान्य एंटीबायोटिक काम नहीं आते हैं.

लंबी अवधि की डायबिटीज ब्लैडर को आपूर्ति करने वाली नसों को प्रभावित कर सकती है जिस की वजह से ब्लैडर की मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं जो यूरिनरी सिस्टम के बीच सिग्नल को प्रभावित कर ब्लैडर को खाली होने से रोक सकती हैं. परिणामस्वरूप, मूत्र पूरी तरह से नहीं निकल पाता है और इस की वजह से संक्रमण का खतरा बढ़ जाता ह

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