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नेता प्रतिपक्ष के पद पर राहुल गांधी दिखाएंगे अपनी ताकत

हाथ में संविधान की कौपी ले कर लोकसभा सदस्य के तौर पर शपथ लेने वाले राहुल गांधी देश की 18वीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष बन गए हैं. अपने 20 साल के राजनीतिक सफर में राहुल गांधी पहली बार किसी संवैधानिक पद पर आसीन हुए हैं. बीते दस सालों में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के नेताओं और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के द्वारा अपने लिए अपशब्दों के खूब थपेड़े झेले. प्रधानमंत्री मोदी सहित तमाम भाजपा नेताओं ने खुले मंच से, सोशल मीडिया और टीवी चैनलों की डिबेट में उनका खूब मजाक उड़ाया. लेकिन 18वीं लोकसभा में प्रधानमंत्री ने जब सदन का अभिवादन किया तो उन्होंने राहुल गांधी की तरफ भी हाथ जोड़ कर ना सिर्फ ‘नमस्ते राहुल जी’ कह कर उन का अभिवादन किया, बल्कि स्पीकर ओम बिरला से मिलते वक़्त बाकायदा राहुल गांधी से हाथ मिलाया.

लोकसभा चुनाव के नतीजों ने बहुत कुछ बदल कर रख दिया है. ये वही राहुल गांधी हैं जिन्हें अब तक भाजपा पप्पू, कांग्रेस के शहजादे और न जाने किन किन उपनामों से नवाजती रही है. आज जब उसी पप्पू को प्रधानमंत्री नमस्कार कर रहे हैं तो लोकतंत्र की इस ताकत और ख़ूबसूरती को देख कर लोगों के होंठों पर मुस्कान दौड़ जाती है. सदन के भीतर पूरे दस सालों बाद विपक्ष को राहुल गांधी के रूप में अपना ताकतवर और आक्रामक सेनापति मिला है, जिस के नेतृत्व में सदन के अंदर विपक्ष की सहमतिअसहमति पर सत्ता पक्ष को पूरा संज्ञान लेना होगा.

नेता प्रतिपक्ष जैसा महत्वपूर्ण पद राहुल गांधी ने अपनी कठोर मेहनत से पाया है. इस से पहले उन की मां सोनिया गांधी भी अक्टूबर 1999 से फरवरी 2004 तक नेता प्रतिपक्ष रह चुकी हैं. लेकिन उन को तब वह स्थान एक पकी पकाई खीर के रूप में मिला था, जबकि राहुल को यह पद जमीनी संघर्ष और जनता से जुड़ाव के नतीजे के तौर पर हासिल हुआ है.

उन के पिता स्व. राजीव गांधी भी नेता प्रतिपक्ष रह चुके हैं. राजीव गांधी 18 दिसंबर 1989 से 24 दिसंबर 1990 तक नेता विपक्ष थे. राहुल गांधी परिवार के तीसरे सदस्य हैं जो इस पद को सुशोभित करेंगे. गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव से काफी पहले से ही राहुल काफी सक्रिय हो गए थे उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा, भारत जोड़ो न्याय यात्रा और चुनाव प्रचार के दौरान संविधान बचाओ अभियान के साथ पार्टी को एक नेतृत्व दिया. इस बीच कई पुराने धुरंधर जैसे गुलाम नबी आजाद सरीखे कांग्रेसी नेता बगावती सुर दिखाते हुए अलग भी हो गए, जिन्हें मनाने या वापस लाने की कोशिश नहीं की गई.

भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गांधी ने देश भर में घूमघूम कर दरिद्र और लाचार महिलाओं, अशिक्षित, कुपोषित और धूल में लोटते बच्चों, हाथ जोड़ कर रोजगार की भीख मांगते युवाओं और सस्ती दवाओं की आस में बीमारी से जूझते बुजुर्गों के भारत को बहुत नजदीक से देखा, समझा और जज़्ब किया. इस असली भारत को देखने की जहमत कभी प्रधानमंत्री या उन के नेताओं ने बीते 10 सालों में नहीं उठाई. बकौल प्रधानमंत्री भारत तो विश्वगुरु बनने की राह पर है.

भारत जोड़ो यात्रा में राहुल गांधी से सचमुच लोग जुड़े और खुद राहुल ने देश के मिजाज को समझा. लोगों की जरूरतों और उम्मीदों को जानने के बाद उन में एक परिपक्वता भी आई है. उन्हें समझ में आ चुका है कि देश की गरीब जनता को उस का हक़ दिलाने के लिए सत्ता से किस किस तरह मोर्चा लेना होगा. अब लोकसभा के भीतर राहुल की सक्रियता बढ़ेगी और वे महत्वपूर्ण विषयों पर उसी तेवर के साथ बोलते दिखाई देंगे, जैसे पिछले दिनों चुनाव प्रचार के दौरान उन के तेवर नजर आते रहे हैं. राहुल का यह बदला रूप निश्चित रूप में सत्ता पक्ष के लिए परेशानी भी पैदा करेगा और उन की मनमानियों पर भी रोक लगाएगा.

नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद राहुल गांधी सरकार के आर्थिक फैसलों की लगातार समीक्षा और सरकार के फैसलों पर कड़ी टिपण्णी भी करेंगे. Leaders Of Opposition In Parliament Act 1977 के अनुसार नेता प्रतिपक्ष के अधिकार और सुविधाएं ठीक वैसी ही होती हैं, जो एक कैबिनेट मंत्री की होती हैं. नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद राहुल को पद भी मिला है और उन का कद भी बढ़ गया है. लिहाजा अब राहुल गांधी को कैबिनेट मंत्री की तरह सरकारी सचिवालय में एक दफ्तर मिलेगा. कैबिनेट मंत्री की रैंक के अनुसार उच्च स्तर की सुरक्षा मिलेगी और मासिक वेतन और दूसरे भत्तों के लिए 3 लाख 30 हज़ार रुपये मिलेंगे, जो एक सांसद के वेतन से कहीं ज्यादा है. एक सांसद को वेतन और दूसरे भत्ते मिला कर हर महीने लगभग सवा दो लाख रुपये मिलते हैं. राहुल गांधी को एक ऐसा सरकारी बंगला मिलेगा, जो कैबिनेट मंत्रियों को मिलता है और उन्हें मुफ्त हवाई यात्रा, रेल यात्रा, सरकारी गाड़ी और दूसरी सुविधाएं भी मिलेंगी.

राहुल गांधी के पास क्या शक्तियां होंगी?

नेता प्रतिपक्ष कई जरूरी नियुक्तियों में प्रधानमंत्री के साथ बैठता है. मतलब कि अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी एक टेबल पर आमनेसामने होंगे और साथ मिलकर कई फैसले लेंगे. दोनों की राय से ही कई फैसले लिए जाएंगे.

चुनाव आयुक्त, केन्द्रीय सतर्कता आयोग के अध्यक्ष, मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष जैसे पदों पर अधिकारियों का चयन एक पैनल के जरिए किया जाता है, जिस में प्रधानमंत्री और नेता विपक्ष शामिल रहते हैं. अब तक राहुल गांधी कभी भी मोदी के साथ किसी पैनल में शामिल नहीं हुए हैं, लेकिन अब विपक्ष के नेता के रूप में उनकी सहमति आवश्यक होगी.

राहुल गांधी भारत सरकार के खर्चों की जांच करने वाली लोक लेखा समिति के अध्यक्ष होंगे. राहुल सरकार के कामकाज की लगातार समीक्षा करेंगे. वह ये जानने की कोशिश करेंगे कि सरकार कहां पर कितना पैसा खर्च कर रही है.

राहुल गांधी दूसरे देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय मुद्दों पर अपना दृष्टिकोण देने के लिए भारत बुला सकते हैं. अगर वह किसी मुद्दे पर विदेशी मेहमानों से चर्चा करना चाहें तो वह ऐसा कर पाएंगे.

नेता प्रतिपक्ष के तौर पर राहुल गांधी अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और सीबीआई जैसी केंद्रीय जांच एजेंसियों के प्रमुखों के चयन में भी अहम भूमिका निभाने वाले हैं. वह पिछले 10 साल से इन एजेंसियों पर काफी आरोप लगाते आए हैं और इन एजेंसियों ने उनके जीजा रौबर्ट वाड्रा को परेशान करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ी, जिसका असर प्रियंका गांधी पर उत्तर प्रदेश में चुनाव प्रचार के दौरान काफी पड़ा.

राहुल का नेता प्रतिपक्ष बनना बेहद खास है क्योंकि वह जब से चुनावी राजनीति में आए कोई पद लेने से बचते रहे हैं. यहां तक कि पार्टी प्रमुख के पद से भी उन्होंने इस्तीफा दे दिया था. 2004 से 2014 तक देश में कांग्रेस की सत्ता रही लेकिन उस समय भी राहुल ने कोई मंत्री पद नहीं लिया. उन पर कैबिनेट पद के लिए दबाव भी था, लेकिन फिर भी उन्होंने मना कर दिया था. 2014 में कांग्रेस जब सत्ता से बाहर हुई तो नेता प्रतिपक्ष बनाने लायक सीटें हासिल नहीं कर पाई थी. शायद राहुल को लगता था कि अभी उन्होंने देश को पूरी तरह जाना नहीं है. देश को समझने के लिए ही उन्होंने भारत जोड़ो यात्रा की शुरुआत की. भाजपा ने उनका खूब मजाक उड़ाया. कहा अभी तक इटली घूमते थे अब देश में थोड़ा घूमफिर लेने दो. भाजपा को अंदाजा ही नहीं था कि इस यात्रा में देश की जनता से उनका किसकदर आत्मीय सम्बन्ध बन जाएगा. भाजपा की आँखें तो तब खुली जब उसने राहुल की यात्राओं में उमड़ता हुआ जनसैलाब देखा. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी.

कल्कि 2898 एडी : ”प्रभास नहीं अमिताभ बच्चन की फिल्म..’’

रेटिंगः डेढ़ स्टार

निर्माताः सी अश्विनी दत्त, प्रियंका दत्त, स्वप्ना दत्त

लेखकः नाग आश्विन  व साई माधव बुर्रा

निर्देशकः नाग आश्विन

कलाकारः अमिताभ बच्चन,प्रभास, कमल हासन,दीपिका पादुकोण, सास्वता चटर्जी, शोभना, अनिल जॉर्ज, राजेंद्र प्रसाद, पसुपति, अन्ना बेन, मालविका नायर, अयाज पाशा, कीर्ति सुरेश,विजय देवराकोंडा, एस एस राजामौली,रामगोपाल वर्मा व अन्य.

अवधिः तीन घंटे तीन मिनट

दक्षिण के मशहूर फिल्मकार नाग अश्विन की नई फिल्म ‘‘कल्कि 2898 एडी’ 27 जून को सिनेमाघरों में पहुंची है, मगर साढ़े छह सौ करोड़ की लागत में बनी यह फिल्म बुरी तरह से सिर्फ निराश ही नहीं करती है बल्कि इंटरवल तक तो ‘टार्चर’ ही है. तीन घंटे की अवधि वाली यह फिल्म  डायस्टोपियन साइंस फिक्षन व मैथोलौजिकल फिल्म है, मगर फिल्मकार ने कुछ देशी और कुछ विदेश फिल्मों (मैड मैक्स, गेम औफ थ्रोन्स, स्टार वार्स, लौर्ड औफ द रिंग्स ) के दृश्यों को भरने के अलावा सनातन धर्म,हिंदू धर्म आदि का महिमा मंडन करने के चक्कर में चूंचूं का मुरब्बा बना डाला.

पहले यह फिल्म 2022 में प्रदर्शित होने वाली थी.यह फिल्म 2019 से 2024 तक केंद्र में जो सरकार थी, शायद उसे खुश करने के लिए इस फिल्म का निर्माण किया  था.पहले इस फिल्म का नाम ‘प्रोजेक्ट के’ था.आधे से ज्यादा फिल्माए जाने के बाद इसका नाम ‘कलकी 2898 एडी’ कर दिया गया. फिल्म के अंदर संवादो में भी ‘प्रोजेक्ट के’ को ही लेकर सवाल किए गए हैं.पता नही अश्विन नाग ने इस फिल्म को भगवान विष्णु के अवतार कलकी का नाम देकर प्रचारित किया गया. पर यह फिल्म 2022 में रिलीज नही हुई.तब इसे 26 जनवरी 2024 को रिलीज करने की घोषणा की गयी. फिर नौ मई 2024 की तारीख घोषित की गयी. अफसोस अब जब यह फिल्म 27 जून को प्रदर्षित हुई तो केंद्र में सरकार कुछ बदली हुई है.वैसे फिल्मकार ने ‘आदिपुरूष’ की तर्ज पर इसका भी बंटाधार करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी.

तेलुगू में फिल्मायी गयी यह फिल्म हिंदी,तमिल,मलयलम,कन्नड़ व अंग्रेजी भाषा में डब करके प्रदर्शित की गयी है.

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कहानीः

फिल्म की कहानी महाभारत युद्ध के कुछ दृश्यों के साथ शुरू होती हैं.अभिमन्यू की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे की बात होती है,युद्ध के मैदान पर कृष्ण और अश्वत्थामा के बीच युद्ध होता है. युद्ध में द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा को परास्त करने के बाद भगवान कृष् ण,अष्वत्थामा को मृत्यु  दंड देकर  मुक्ति देने की बनिस्बत अमरत्व यानी कि जीवित रहने का श्राप देकर तिल तिल गलने के लिए अनंत काल तक धरती पर छोड़ देते हैं.वह कहते है कि छह हजार वर्ष बाद जब संसार का विनाश हो जाएगा,तब वह विष्णु के दसवें अवतार कल्की के रूप में जन्म लेंगे,उस वक्त अश्वत्थामा  को उनकी रक्षा करनी होगी. उसके बादही मुक्ति मिलेगी.

फिर कहानी शुरू होती है  छह हजार वर्ष बाद यानी कि वर्तमान से 874 वर्ष बाद के काशी शहर से.जो अब वीरान व उजाड़ है. यह उन दिनों की काशी है जब गंगा में पानी नहीं है. हवा में औक्सीजन नहीं है. बरसों से किसी ने पानी बरसते नहीं देखा है.पानी सहित हर तरह की समस्या है.फिल्म में एक संवाद है-‘‘लोगों के पाप धोते धोते गंगा का पानी सूख गया.’’इसी काशी  शहर के उपर यूटोपियन शहर ‘काम्प्लेक्स’ है,जिस पर दुष्ट झुर्रीदार, सिकुड़े हुए तानाशाह सुप्रीम यास्किन (कमल हासन) का आधिपत्य है,पूरे विष्व में ‘काम्प्लेक्स’ ही एकमात्र रहने योग्य शहर है.सुप्रीम यास्किन के दल में कमांडर मानस (सास्वत चटर्जी) और सुप्रीम यास्कीन का दाहिना हाथ एक घुंघराले बालों वाला भविष्यवक्ता(अनिल जॉर्ज) शामिल हैं, जो दैवीय हस्तक्षेप और प्राचीन हथियारों गांडीव या धनुष के बारे में अंधेरे से बात करता है. सुप्रीम यास्कीन के ‘काम्प्लेक्स’ में  एक प्रयोगशाला है.यास्किन दुनिया का सबसे शक्तिशाली आदमी बनने के लिए गर्भवती महिलाओं से सीरम निकलवा कर खुद उपयोग कर अपनी उम्र घटाने के प्रयास में लगे हुए हैं.यास्कीन तक सिर्फ उनका कमांडर ही पहुंच सकता है,वही हर बार सीरम लेकर जाता है,जिस गर्भवती लड़की/महिला के गर्भ से सीरम निकाला जाता है,उसकी उसी वक्त मौत हो जाती है.उधर अच्छी जिंदगी जीने के लिए जब भैरव (प्रभास) नामक एक इनामी शिकारी कैम्प्स में प्रवेश करने की कोशिश में लगा हुआ है.इसी बीच पता चलता है कि सुमति (दीपिका पादुकोण) गर्भवती है.अब उसका सीरम निकाले जाने की बारी है.मगर एक विद्रोही कायरा (अन्ना बेन ) ,सुमति को कॉम्प्लेक्स से भगाती है,तथा उसके हमवतन (पसुपति और पाशा) बिल्कुल सही समय पर पहुंचकर सुमति को संभाला पहुॅचा देते है.कौम्पलेक्स में घुसने के लिए अपनी जगह बनाने के मकसद से भैरव,सुमति को पकड़ने निकलता है.उसी वक्त  अश्वत्थामा (अमिताभ बच्चन) को अहसास होता है कि कल्की का जन्म होने वाला है और वह सुमति की रक्षा के लिए कमर कस लेता है.आठ फुट लंबे कद और हाथ में लोहे का उंउा रखने वाले अष्वत्थामा,भैरव से लड़ते हैं.कुल मिलाकर यह कहानी यह कहानी 3102 ईसा पूर्व में महाभारत की घटनाओं, कलियुग की शुरुआत से लेकर 2898 ईस्वी तक की सहस्राब्दियों तक की यात्रा का वर्णन करती है.कथा का मूल हिंदू देवता  विष्णु के दसवें और अंतिम अवतार कल्कि की रहस्यमय छवि के आगमन की भनक तक की है.

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समीक्षाः

एक बेहतरीन आइडिया पर घटिया पटकथा वाली फिल्म है.जी हां!काफी लचर व कमजोर पटकथा के चलते यह फिल्म दर्शकों को बांधकर रखने में असफल रहती है. सेट,कास्टयूम ,वीएफएक्स पर काफी पैसा खर्च किया गया.मगर कहानी,पटकथा व संवाद पर कोई मेहनत नही की गयी. फिल्म में सनामन धर्म का महिमा मंडन करते हुए महाभारत की पौराणिक कहानियों को तोड़ मरोड़कर पेश किया गया है.ग्रे किरदारो को अच्छा बताने का प्रयास किया गया है.फिर चाहे वह अश्वत्थामा हो या कर्ण हो.सर्वविदित है कि अश्वतथामा ने ही अर्जुन के पांच पुत्रों की हत्या कर दी थी. कर्ण को प्रभास के किरदार भैरव से जोड़ना भी गलत है. फिल्म में अपरोक्ष रूप से भ्रूण हत्या को प्रोत्साहित ही किया गया है.. क्या फिल्मकार ने यह उचित काम किया है? फिल्म के सभीे एक्शन दृश्य किसी न किसी हौलीवुड फिल्म की नकल मात्र नजर आते हैं.

फिल्म मूलतः तेलुगु भाषा में फिल्मायी गयी है,बाद में हिंदी में उब किया गया है.हिंदी की डबिंग कमजोर है..उच्चारण दोष है.कई किरदार के संवादों के उच्चारण सही न होने पर इमोशन भी मार खा जाता है. फिल्म थ्री डी में बनायी गयी है,मगर एक भी दृश्य ऐसा नही है, जिसमें थ्री डी की जरुरत रही हो.

इसके अलावा बेवजह के सिर पैर वाले कई किरदार गढ़कर कहानी को विस्तार दिया गया है.फिल्म में इतने सारे किरदार है कि इंटरवल से पहले नब्बे मिनट की कहानी में समझ में ही नही आता कि आखिर कौन क्या कर रहा है और वह फिल्म में क्यो हैं? इंटरवल से पहले के नब्बे मिनट तो दर्शक को दिमागी टौर्चर देते हैं.बेचारा दर्शक सो जाता है.कुछ दर्शक सिनेमाघर छोड़कर भाग जाते हैं. यास्किन व सुमति की पृष्ठभूमि पर फिल्म मौन रहती हैं. यास्किन ने यह संसार कैसे रचा? कौम्प्लेक्स में लड़कियां गर्भवती कैसे होती हैं,यह भी एक रहस्य है.

फिल्म का अंतिम बीस मिनट का क्लायमेक्स बेहतरीन है. कम्प्यूटर ग्राफी और वीएफएक्स अच्छा है. फिल्म का इंटरनेशनल लुक नजर आता है,मगर बाकी सब बेकार है.पूरी फिल्म मनोरंजन व इमोषन के नाम पर शून्य है. फिल्म में जोर्डजे स्टोजिलजकोविक की सिनेमैटोग्राफी उत्कृष्ट है. संगीतकार संतोष नारायण का संगीत औसत दर्जे से भी निचले स्तर का है.

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अभिनयः

अश्वत्थामा के किरदार में अपने 80 साल की उम्र में भी अमिताभ बच्चन अपने अभिनय की बदौलत लोगों के दिलों दिमाग पर छा जाते हैं.उनका लुक, डायलाग डिलीवरी और स्टंट कमाल के हैं. फिल्म में भैरव का किरदार निभाने वाले अभिनेता प्रभास ने काफी निराश किया है.इस फिल्म से उनका करियर बर्बाद ही होना तय है.वैसे भी पिछले सात वर्षों में हिंदी में ‘बाहुबली एक’ और ‘बाहुबली 2’ के बाद प्रभास की ‘साहो’,‘आदिपुरूष’,‘राधेश्याम’, ‘सालार’ सहित एक भी फिल्म बाक्स आफिस पर सफल नही हुई है.फिल्म में पहले भैरव  निगेटिव किरदार में हैं,उसके बाद वह उन्हें कर्ण बताया गया.उन्होने निराश ही किया है.पता नही नाग अश्विन ने प्रभास के किरदार भैरव को हास्य किरदार क्यों बनाया? कमल हासन का किरदार काफी छोटा है,शायद इसे दूसरे भाग में ठीक से चित्रित किया जाएगा.

दीपिका पादुकोण गर्भवती होने का स्वाभाविक अभिनय करने में विफल रही हैं.अभिनय के मामले में वह शून्य हैं.कमल हासन के हिस्से करने को कुछ रहा ही नही.राम गोपाल वर्मा ,सलमान दुलकर,दिशा पाटनी ने भी निराश किया है.सुप्रीम यास्कीन के दाहिने हाथ के किरदार में अभिनेता अनिल जार्ज प्रभावित करते हैं.अपनी मुट्ठी से घातक लेजर किरणें निकालने वाले कमांडर के किरदार में सास्वत चटर्जी भी ठीक ठाक हैं.

मैं 53 साल की हूं मेरा ब्लडप्रैशर थोड़ा बढ़ गया है, ब्लडप्रैशर सामान्य रखने के लिए क्या करूं ?

सवाल
मैं 53 साल की हूं और बैंक में औफिसर हूं. मुझ पर काम का काफी दबाव रहता है. शायद इसी कारण मेरा ब्लडप्रैशर थोड़ा बढ़ गया है. घर में बच्चे और पति मेरा मजाक उड़ाते हैं कि कहीं ऐसा होता है कि मौसम से ब्लडप्रैशर घटेबढ़े? मगर मैं तो भुक्तभोगी हूं. कृपया बताएं कि क्या  बदलते मौसम से ब्लडप्रैशर से किसी प्रकार का संबंध है या नहीं? यदि हां, तो उन दिनों ब्लडप्रैशर सामान्य रखने के लिए क्याक्या उपाय करने उपयोगी रहेंगे ताकि मैं अच्छा स्वास्थ्य बनाए रख सकूं?

जवाब
आप का शक बेबुनियाद नहीं है. बदलते मौसम में बहुत लोगों का ब्लडप्रैशर बढ़ जाता है. कई क्लिनिकल अध्ययनों में यह देखा गया है. यदि ब्लडप्रैशर बढ़ कर 140 अंक सिस्टोलिक और 90 अंक डायस्टोलिक के पार पहुंचने लगे तो डाक्टर से सलाह ले कर इसे नियंत्रण में लाने के लिए उचित कदम उठाना जरूरी हो जाता है.

ब्लडप्रैशर का बढ़ा रहना सेहत के लिए नुकसानदेह है. धमनियों पर अधिक दाब बने रहने से दिल, गुरदों, दिमाग और आंखों के परदों पर समय बीतने के साथ और कभीकभी यकायक भी बुरा असर पड़ सकता है.

ब्लडप्रैशर पर नियंत्रण पाने के लिए उपयुक्त दवाओं के साथसाथ जीवनशैली में भी कुछ सुधार लाने जरूरी होते हैं. संतुलित आहार, नमक का कम प्रयोग, नियमित व्यायाम और वजन पर नियंत्रण जरूरी है.

अगर सुबह उठने पर सिर के पिछले हिस्से में भारीपन महसूस हो, तो इसे ब्लडप्रैशर बढ़ा हुआ मानें. ब्लडप्रैशर जांच लें. अगर पाएं कि ब्लडप्रैशर बढ़ा हुआ है, तो तुरंत डाक्टर से सलाह लें. डाक्टर उसे काबू में लाने के लिए दवा की खुराक बढ़ाने की राय दे तो उस की बात टालें नहीं, बल्कि उस पर तुरंत अमल करें. कुछ मामलों में कोई एक नई दवा भी जोड़नी पड़ सकती है.

ठंड के दिनों में कुछ लोगों को ब्लडप्रैशर इसलिए भी बढ़ जाता है कि वे भोजन में अधिक नमक लेने लगते हैं. अत: इस बात का ध्यान रखें कि दिन भर में 5 ग्राम से अधिक नमक न लें.

अपने खानपान पर ध्यान रखें. ताजे फल और शाकसब्जियां खूब खाएं. शुद्ध दूध के बजाय स्प्रेटा दूध पीएं. भोजन में सैचुरेटेड फैट की मात्रा घटा दें.

ब्लडप्रैशर के कुछ मरीजों में यह भी होता है कि उन का ब्लडप्रैशर सुबहसुबह बहुत बढ़ जाता है. यदि आप के साथ ऐसा होता है, तो मुमकिन है कि दवा का समय बदलने से फायदा पहुंचे.

कुछ दवाएं सुबह तो कुछ शाम में लेने से चौबीसों घंटे ब्लडप्रैशर वश में किया जा सकता है. इस बारे में भी आप अपने डाक्टर से सलाह ले सकती हैं.

अपना तनाव घटाने के लिए अपनी कार्यशैली में सुधार लाएं. हंसनेखेलने, अमोदप्रमोद के लिए समय देने के साथसाथ व्यायाम, ध्यान आदि स्ट्रैस रिलीज करने के अच्छे उपाय हैं.

मानवता को बचाए रखने के लिए बुजुर्ग क्यों हैं जरूरी

सीमा और अमित अपने डेढ़ साल के बेटे अंशुल के साथ एक पारिवारिक शादी में गए थे. नन्हा अंशुल अपनी मां सीमा की गोद में बैठा आइसक्रीम के मजे ले रहा था, तभी अमित की बूढी नानी आ गयी. सीमा ने झुक कर उनके पैर छुए, उसको आशीर्वाद देते नानी के हाथ जैसे ही अंशुल को दुलारने के लिए आगे बढ़े, अंशुल चीखें मार कर रोने लगा. दरअसल नानी के बूढ़े झुर्रियोंदार चेहरे से वह बुरी तरह डर गया था. उसने कभी अपने घर में इतनी ज़्यादा उम्र का बुजुर्ग नहीं देखा था. दिल्ली में सीमा और अमित परिवार से दूर अपने अलग फ्लैट में रहते थे. दोनों जवान थे. अमित जहां अभी 28 साल का था वहीं सीमा की उम्र भी महज 26 वर्ष की थी. दोनों ने लव मैरिज की थी, इसलिए अपने घर की शान्ति के लिए शुरू से ही दोनों अपने अपने परिवार से दूर ही रहे. यहां दिल्ली में उनके फ्लैट पर आने वाले अधिकतर युवा लोग ही थे. उनके साथ नन्हा अंशुल बहुत जल्दी घुलमिल जाता था. मगर नानी जैसा बूढ़ा चेहरा देख कर तो वह घबरा ही गया.

पार्क में साथ खेल कर लौटी प्रिया और आरती किसी बात पर जोर जोर से हंस रही थीं. मां ने पूछा तो बोली – मम्मी आज राहुल अपनी दादी को लेकर पार्क में आया था. उसकी दादी चल तो पाती नहीं हैं. पूरे वक़्त राहुल का हाथ पकड़ कर पार्क में घूमती रही. उसको हमारे साथ खेलने भी नहीं दिया. बूढी को दिखाई भी कम देता है. पार्क के गेट पर लुढ़क गयी. फिर एक अंकल ने उनको उठाया. सारे लोग देख देख कर हंस रहे थे.

मां ने समझाया – ”बेटा किसी को देख कर ऐसे हंसते नहीं हैं.”

आरती – ”अरे मम्मी तुम देखती तो तुम भी हंसते हंसते पागल हो जातीं.” कहते हुए दोनों अपने कमरे में भाग गयीं. इनमे से प्रिया की उम्र 13 साल और आरती 15 साल की थी.

मेट्रो ट्रेन में जिन युवाओं या कॉलेज स्टूडेंट्स को सीट मिल जाती है, देखा गया है कि किसी बुजुर्ग के मेट्रो में चढ़ने पर वे अपनी सीट उनके लिए नहीं छोड़ते. ऐसे में कई स्टेशन तक बुजुर्ग यात्री खड़े खड़े ही यात्रा करते हैं. रास्तों पर भी अब किसी बुजुर्ग को रास्ता पार करने के लिए युवा हाथ कम ही आगे बढ़ते हैं.

बुजुर्गों के साथ बैठना, उनसे बातें करना, उनके अनुभवों से लाभ उठाना या उनकी छोटी छोटी जरूरतों को पूरा करने की चाह आज के युवाओं में नहीं देखी जाती. महान साहित्यकार मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी याद आती है – बूढी काकी. बूढी काकी जिसने बुढ़ापे में अपना घर और जमीन अपने भतीजे के नाम लिख दी. जायदाद मिलने के बाद काकी के भतीजे और बहु का व्यवहार ही उनसे बदल गया. वे ना उनके खाने का ध्यान रखते और ना उनकी किसी जरूरत की परवाह करते थे. काकी अपने ही घर के बाहर बनी एक कोठरी में अकेली पड़ी रहती थी. घर के सभी लोग उसको दुत्कारते, सिर्फ एक किशोर उम्र की लड़की को छोड़ कर. काकी के भतीजे की बेटी जो कोई 12 साल की थी, आज अपनी मां की रसोई से अक्सर बूढी काकी के लिए खाने की चीजें चुरा कर उनको चुपके से खिला आती थी. बूढी काकी के प्रति उसका स्नेह और अपनत्व था और काकी भी उसको खूब प्यार देती थी, उसको खूब अच्छी अच्छी बातें करती थी. अच्छी सीख देती थी. दोनों के बीच अच्छी बॉन्डिंग थी. दो पीढ़ी पहले तक के बच्चों में अपने घर के बड़े-बूढ़ों के साथ ऐसी ही बॉन्डिंग हुआ करती थी. मगर वर्तमान पीढ़ी में यह ख़त्म हो रहा है और कई जगह पूरी तरह ख़त्म हो चुका है. बूढ़े लोगों के प्रति संवेदनहीनता और कई बार निर्ममता समाज में दिखने लगी है. इसकी कई वजहें हैं –

एकल परिवार

आजकल ज़्यादातर युवा शादी के बाद अपने मातापिता से अलग घर लेकर रहने लगे हैं. यह दूरी अच्छा करियर बनाने और नौकरियों के कारण भी आयी है. आज लड़के लड़कियां पढ़ाई ख़त्म करके अन्य शहरों में या मेट्रो सिटीज में जौब ढूंढते हैं ताकि वे कुछ आजाद रह सकें. जो युवा सरकारी नौकरी में आ जाते हैं उनकी भी पोस्टिंग अन्य शहरों में होती है. शादी के बाद वे पत्नी को अपने माता पिता के पास नहीं बल्कि अपने पास रखते हैं. अगर लड़की भी नौकरीपेशा है तो वह पति के साथ ही रहना चाहती है. ऐसे में संयुक्त परिवार अब लगभग टूट चुके हैं, जिसमें बच्चों को प्यार करने वाले दादा दादी मिलते थे. संयुक्त परिवारों में अक्सर रिश्तेदारों का भी आना जाना लगा रहता थे. कभी नानी नाना आ रहे हैं, कभी बुआ दादी चली आ रही हैं. तो बचपन से ही उनका अपने बुजुर्गों के साथ एक करीबी आत्मीय सम्बन्ध बन जाता था. वे जैसा घर के बुजुर्गों के साथ प्रेमपूर्ण व्यवहार करते थे, घर के बाहर मिलने वाले बुजुर्गों के साथ भी वैसा ही व्यवहार रखते थे. उनकी परेशानी और जरूरतें भी आसानी से समझ जाते थे. मगर एकल परिवार के बच्चे ना तो बुजुर्गों के सानिध्य में रहते हैं, ना उनके प्रति कोई अपनत्व या स्नेह का भाव उनमें पैदा होता है. लिहाजा बाहर नज़र आने वाले बूढ़े लोगों के प्रति भी वे उपेक्षा का व्यवहार रखते हैं.

बुजुर्गों के प्रति उनकी संतानों का बुरा व्यवहार

बहुत से घरों में बहू का अपनी सास के साथ सम्बन्ध अच्छा नहीं होता है. दोनों लड़ती रहती हैं. एक दूसरे के बारे में गलत बातें कहती हैं. आयेदिन अखबारों में अनेक समाचार बुजुर्गों को प्रताड़ित करने के छपते हैं. कई बार तो बेटा बहू मिल कर बूढ़े मां बाप पर अत्याचार करते हैं. वहीं अपने बच्चों को भी उनके पास जाने से रोकते हैं और बच्चों के मन में दादा दादी के प्रति नफरत भरते हैं. बच्चे जब बहुत कम उम्र से अपने घर के बुजुर्गों को अपमानित होते देखते हैं तो उनके दिमाग में यह बात घर कर जाती है कि बूढ़े लोग अच्छे नहीं होते हैं, तभी तो उनको दुत्कार कर रखा जाता है. उनको गाली दी जाती है, भूखा रखा जाता है, या बासी खाना दिया जाता है अथवा मारा-पीटा जाता है. ऐसे बच्चे बड़े होकर कभी भी परिवार और समाज के बुजुर्गों के लिए प्रेम या सदाचार का भाव प्रकट नहीं कर सकते. क्योंकि बुजुर्गों के साथ उनका कभी अपनत्व भाव रहा नहीं. ऐसे ही बच्चे मेट्रो ट्रेन या बस में बूढ़ों को खड़े देख कर भी अपनी सीट उनके लिए नहीं छोड़ते. ऐसे ही बच्चे सड़क पार करते किसी बूढ़े का हाथ थामने के लिए अपना हाथ आगे नहीं बढ़ाते बल्कि इयरफोन कान में ठूंसे खटाखट खटाखट उनके बगल से होकर गुजर जाते हैं. उनको यह अहसास भी नहीं होता कि वह बुजुर्ग असहाय और जरूरतमंद है.

बीते तीन दशकों में वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों की संख्या में बहुत तेजी से इजाफा हुआ है. अब इंसान की जीवन प्रत्याशा भी काफी बढ़ गयी है. पहले जहां साठ-पैंसठ की उम्र तक ही लोग जीते थे, अब अस्सी-नब्बे साल तक जी रहे हैं. साठ साल में रिटायर होने के बाद आगे तीस साल वे घर में खाली बैठे हैं. बहुत से बुजुर्ग तो कुछ ना करने के कारण ही चिड़चिड़े हो जाते हैं. जीवन के चालीस साल काम किया और अचानक बिलकुल खाली होकर बैठ गए.

ऐसे में वे बेटे बहू के काम में टांग अड़ाने लगते हैं. उन्हें मश्वरे देने लगते हैं जो अक्सर उन्हें पसंद नहीं आते और वे चाहते हैं कि उनके बूढ़े पिता या तो अपने कमरे में रहें या भगवान् भजन करें. ऐसे ही बूढी औरतें अक्सर अपनी बहुओं के काम में नुक्स निकालती रहती हैं या रिश्तेदारों या मोहल्ले वालों से उसकी बुराई करने में लगी रहती हैं. जिससे रिश्तों में खटास पैदा हो जाती है. ऐसे बूढ़े फिर अपनी ही संतानों को बोझ लगने लगते हैं. यही वजह है कि अनेक परिवार अपने बूढ़ों को त्याग रहे हैं. वे उनके साथ नहीं रहना चाहते. उनकी जरूरतें एक बोझ सी महसूस होती हैं. उनके लिए समय निकालना या उनसे थोड़ी देर बैठ कर बात करना भी वे गवारा नहीं समझते.

नौकरीपेशा बहुओं को अपने सास ससुर के लिए अलग से सादा खाना पकाना एक बोझ सा लगता है. पहले पति और बच्चों के लिए बनाओ, फिर सास ससुर के लिए बनाओ. उनके कारण वे कहीं बाहर घूमने-फिरने नहीं जा सकते. सास ससुर बीमार हो जाएं तो दिन भर उनकी देखभाल करो. महंगी दवाएं, टौनिक, डाक्टर की फीस भरो. ऐसी तमाम जिम्मेदारियां आज के बहु बेटे नहीं उठाना चाहते हैं. वे उनसे मुक्त होने के लिए छटपटा रहे हैं. इसलिए या तो नौकरी के बहाने वे मां बाप को छोड़ कर अन्य शहर में रह रहे हैं या वृद्ध माता पिता को वृद्धाश्रम में पहुंचा देते हैं. दादा दादी के प्रति मां बाप का ऐसा उपेक्षित व्यवहार देख कर बच्चे भी वैसा ही व्यवहार अपने बुजुर्गों के साथ करते हैं. फिर चाहे वे घर में हों या बाहर.

समाज और परिवार का तानाबाना ना बिखरे. इंसान का इंसान से प्रेम और स्नेह बना रहे इसके लिए बहुत जरूरी है कि हमारी सामाजिक संस्थाएं, स्कूल, कालेज और सरकार सब मिल कर बच्चों और बुजुर्गों के बीच स्नेह की डोर को मजबूत करें. बच्चों और बुजुर्गों को साथ लाकर ही उनके बीच के अजनबीपन को मिटाया जा सकता है.

स्कूलों में छोटी उम्र के बच्चों से टीचर्स पूछें या निबंध के रूप में लिखवाएं कि उनके अपने दादा दादी, नाना नानी के साथ कैसे रिश्ते हैं? वे उनसे क्या सीखते हैं? वे उनके साथ घूमने जाते हैं या नहीं? वे उनका ख्याल रखते हैं या नहीं? वे उनके साथ खाना खाते हैं या नहीं? इन सवालों के जवाब देते हुए बच्चे बहुत कुछ सीख भी जाएंगे और यदि उनके माता पिता घर के बुजुर्गों के साथ कोई अशोभनीय हरकत करते हैं तो उन पर भी रोक लगेगी.

समय समय पर स्कूलों में पेरैंट-टीचर मीटिंग होती है. ऐसे ही स्कूलों में ग्रैंड पैरेंट-टीचर मीटिंग्स भी होनी चाहिए जिसमें बच्चे अपने दादा दादी के साथ आएं. ऐसी मीटिंग्स होंगी तो दादा दादी को भी अपनी कुछ अहमियत महसूस होगी. बच्चों के साथ उनके प्रेम की डोर और मजबूत होगी, यही नहीं जब उनके जवान बेटे बहू देखेंगे कि बच्चों के स्कूल में दादा दादी भी इन्वाइट किये जा रहे हैं तो इस डर से कि कहीं उनकी कही कोई गलत बात वे बच्चों की टीचर से ना कह दें, अपने माता पिता के साथ ठीक व्यवहार करने लगेंगे. इसके साथ वे यह भी चाहेंगे कि उनके बच्चों के स्कूल में जब दादा दादी जाएं तो अच्छे कपड़े-जूते वगैरह पहन कर जाएं. इसलिए वे अपने बुजुर्गों के लिए कुछ शौपिंग भी करेंगे. उनके लिए अच्छे कपड़े भी खरीदेंगे. बहू सास को कोई अच्छी साड़ी निकाल कर पहनने के लिए देगी. अच्छी सैंडल और पर्स देगी ताकि उसके बच्चे के स्कूल में उसकी इज्जत ना घटे. फिर बच्चे भी दूसरे बच्चों से अपने दादा दादी को मिलवा कर खुश होंगे. वहाँ अन्य बुजुर्ग भी एक दूसरे से मिलेंगे, बात करेंगे. अगर बच्चों और बुजुर्गों के बीच स्नेहिल संबंधों को बनाने की शुरुआत स्कूल से हो तो इसका असर परिवार, समाज और मानवता पर गहरा पड़ेगा.

स्कूल अक्सर बच्चों को चिड़ियाघर, पिकनिक पर या ऐतिहासिक स्मारकों को दिखाने के लिए ले जाते हैं. इस लिस्ट में उन्हें वृद्धाश्रमों को भी शामिल करना चाहिए. टीचर्स बच्चों को वहाँ ले जाएं. दिन भर उनके साथ व्यतीत करें. उनके साथ गेम्स खेलें. साथ खाना खाएं. उनसे कहानियां सुने. वहां ऐसे लैक्चर भी हों जिनसे बच्चे यह जानें कि किन मजबूरियों के कारण वे बुजुर्ग परिवार से अलग वहां आकर रह रहे हैं. इससे बच्चों के अंदर अपने समाज के बुजुर्गों के लिए संवेदनशीलता पैदा होगी. वह उनकी मजबूरियों और जरूरतों को भी समझेंगे.

छोटी कक्षाओं से ही बच्चों को कहानियों की ऐसी किताबें पढ़ने को मिलनी चाहियें जिसमें दादा दादी, नाना नानी की उनके ग्रैंड चिल्ड्रेन्स के साथ बौन्डिंग की कहानियां खूब हों. इससे उनके अंदर बचपन से ही अपने बड़े-बूढ़ों के प्रति सम्मान और स्नेह विकसित होगा. टीचर्स उनको कुछ ऐसे टास्क दे सकते हैं जिसमें वे अपने क्षेत्र के किसी जरूरतमंद बुजुर्ग के लिए कुछ कर के दिखाएं. वे अपने द्वारा किये गए कार्य को लिखें और फिर सबसे अच्छा कार्य जिस बच्चे ने किया उसे पेरैंट-टीचर मीटिंग के दिन या किसी अन्य फंक्शन पर सारे पेरेंट्स और बच्चों के सामने पुरस्कृत किया जाना चाहिए. इससे सभी बच्चों में अपने आसपास के बूढ़े लोगों के प्रति जागरूकता और संवेदनशीलता बढ़ेगी और उनके माता पिता भी अपने बुजुर्गों से अच्छा व्यवहार करेंगे.

बच्चे वही सीखते हैं जो उनके माता पिता उनके सामने करते हैं. अगर माता पिता किसी बुजुर्ग के प्रति अच्छा व्यवहार नहीं कर रहे हैं, तो उनको बच्चों के माध्यम से ही सही रास्ते पर लाया जा सकता है और इसकी शुरुआत स्कूलों से होनी चाहिए.

मेरी उम्र 50 साल है, मैं मीनोपौज की समस्या से परेशान हूं, क्या करुं?

सवाल 
यदि 50 साल के आसपास की महिला नियमितरूप से सैक्स करना बंद कर दे तो मीनोपौज जल्दी आ जाता है क्या? क्या यह सच है कि नियमितरूप से सैक्स करने से मीनोपौज देर से आता है? क्या फिजिकल ऐक्सरसाइज, खानपान और दिनचर्या में बदलाव ला कर स्थिति में कुछ चेंज किया जा सकता है?
जवाब
45 से 55 साल की उम्र में ज्यादातर महिलाओं में मीनोपौज होता है. अगर 6 महीने से ले कर एक साल तक पीरियड्स न आए तो हम कह सकते हैं कि उस महिला को मीनोपौज हो चुका है. मीनोपौज के बाद कई बार सैक्स का एंजौयमैंट बढ़ भी जाता है. हां, यह सच है कि नियमितरूप से सैक्स करने पर मीनोपौज को जल्दी आने से रोका जा सकता है. 

आकाश और चंद्रशेखर के बीच फुटबौल न बन जाएं दलितपिछड़े

लोकसभा चुनाव के दौरान 7 मई को बहुजन समाज पार्टी प्रमुख मायावती ने अपने 29 वर्षीय भतीजे आकाश आनंद को अचानक अपने उत्तराधिकारी और राष्ट्रीय कोऔर्डिनेटर के पद से हटा दिया. जबकि आकाश को वे 2017 से ही अपने उत्तराधिकारी के रूप में तैयार कर रही थीं, जब आकाश की उम्र महज 22 बरस की थी. मायावती ने आकाश को राष्ट्रीय कोऔर्डिनेटर बनाया और लोकसभा चुनाव से पहले उन को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया. फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि मायावती ने आकाश आनंद को अपरिपक्व कह कर पार्टी कोऔर्डिनेटर पद के साथसाथ उत्तराधिकार के दायित्व से भी मुक्त कर दिया?

दरअसल आकाश आनंद एक जोशीले युवा हैं. लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान उनके जोशीले भाषण दलित और पिछड़े समाज के लोगों में जान फूंक रहे थे. लोग उनके भाषणों से उत्साहित थे. इससे आकाश का जोश और बढ़ गया. उन्होंने जिस तरह मनुवादियों को गरियाना शुरू किया तो दलितों को लगा कि उन्हें आकाश के रूप में अपना तारणहार मिल गया. अपने हर भाषण में आकाश आनंद सवर्णों की सरकार यानी भारतीय जनता पार्टी की जम कर आलोचना कर रहे थे. एक चुनावी रैली में आकाश आनंद को कहते हुए सुना गया, “यह सरकार बुलडोजर सरकार और देशद्रोहियों की सरकार है, जो पार्टी अपने युवाओं को भूखा छोड़ती है और अपने बुजुर्गों को गुलाम बनाती है, वह आतंकवादी सरकार है. अफगानिस्तान में तालिबान ऐसी ही सरकार चलाता है.”

गोया कि भाजपा की तुलना आकाश आनंद ने तालिबान से कर डाली. आकाश यहीं नहीं रुके बल्कि उन्होंने राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो (एनसीबी) की रिपोर्ट का हवाला देते हुए राज्य में 16,000 अपहरण की घटनाओं को लेकर भी भाजपा सरकार पर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने में विफल रहने का आरोप लगाया. उन्होंने यहां तक कह डाला कि केंद्र की भारतीय जनता पार्टी ‘चोरों की पार्टी’ है, जिसने चुनावी बांड के माध्यम से 16,000 करोड़ रुपये लिए. और बस आकाश के इसी अति जोशीले और बेबाक लहजे ने मायावती को डरा दिया.

ऐसे उत्तेजक भाषणों के बाद आकाश आनंद के खिलाफ 28 अप्रैल को सीतापुर में एक एफआईआर भी दर्ज हुई. मायावती पहले ही भ्रष्टाचार के अनेक मुकदमों में फंसी हुई हैं. चाहे प्रदेश की 11 शुगर मिल औने पौने दामों में बेचने का मामला हो, चाहे ताज कॉरिडोर मामला या आय से अधिक संपत्ति का मामला, मायावती पर 131 से ज्यादा आरोप हैं, जिनमें से अधिकांश जांचें सीबीआई द्वारा की जा रही हैं.

मायावती के खिलाफ सीबीआई ने 700 पन्नों के तीन ट्रंक सबूत जुटा रखे हैं. मायावती के खिलाफ उसके पास 50 से ज्यादा गवाह हैं. 1995 में जब मायावती पहली बार मुख्यमंत्री बनी थीं तब से लेकर अपने तीसरे कार्यकाल तक उन्होंने और उनके रिश्तेदारों ने अरबोंखरबों की जितनी संपत्ति अर्जित की इसका पूरा कच्चा चिट्ठा सीबीआई के पास है. मोदी सरकार के एक इशारे पर सीबीआई कब उनको उठा कर जेल में बंद कर दे, यह तलवार बराबर उनकी गर्दन पर लटकी हुई है. ऐसे में भतीजे आकाश आनंद के भाजपा विरुद्ध दिए जा रहे भाषणों से वे बुरी तरह डर गयीं.

सीबीआई जो केंद्र सरकार के इशारे पर उनके विरोधियों के केस की गति बढ़ाती घटाती है, मायावती की गर्दन भी केंद्र सरकार के हित में दबा रखी है. जिस भाजपा के खिलाफ मायावती चूं भी नहीं कर सकतीं, उसके खिलाफ उनके भतीजे ने जब मोर्चा ही खोल दिया तो वे बुरी तरह घबरा उठीं. क्या पता अंदरखाने उनको दिल्ली से फ़ोन भी गया हो कि सम्भालो वरना…. और बस मायावती ने आननफानन में आकाश आनंद को अपरिपक्व बताते हुए ना सिर्फ पार्टी के सभी कार्य उनके हाथ से ले लिए बल्कि राष्ट्रीय कोऔर्डिनेटर पद और अपने उत्तराधिकार से भी वंचित कर दिया.

लेकिन आकाश आनंद को चुनाव के बीच हटा देने से बसपा को नुकसान ज़्यादा हुआ. आकाश दलित और पिछड़ों की पसंद बन कर उभर रहे थे, दलित युवा उनके नेतृत्व में एकजुट हो रहा था, उनके खून में गर्मी आ रही थी और बसपा समर्थकों की तादाद बढ़ रही थी, आकाश के चेहरे में दलितों और पिछड़ों को आंबेडकर और काशीराम दोनों की छवि दिखने लगी थी कि तभी मायावती के फैसले ने उनकी उफनती आशाओं पर ठंडा पानी उंडेल दिया. आकाश के मैदान छोड़ते ही पिछड़ों-दलितों की यह भीड़ इधर उधर भागने लगी. पिछड़े कांग्रेस और समाजवादी पार्टी की तरफ भागे तो दलित भी कई भाग में बंट कर कुछ सपा और कांग्रेस तो कुछ चंद्रशेखर आजाद के झंडे तले जुट गए.

नगीना सीट से लोकसभा चुनाव लड़ने वाले दलित नेता चंद्रशेखर आजाद को मायावती के फैसले का बड़ा फायदा मिला. बसपा से छिटके दलित चंद्रशेकर से आ जुड़े और नगीना सीट पर उन्होंने अपने विरोधी पर बड़े अंतर से जीत दर्ज की, जबकि लोकसभा में बसपा एक भी सीट नहीं जीत पायी.

पार्टी की ऐसी दुर्दशा होने के बाद मायावती को आकाश के बारे में अपना फैसला वापस लेना पड़ा. बसपा की हार की समीक्षा करने पर पार्टी के अन्य सदस्यों ने एकसुर में यही कहा कि आकाश आनंद को निकालना सबसे बड़ी भूल थी. खैर मायावती ने अब भूल सुधार ली है. लोकसभा चुनाव के बाद वो काफी एक्टिव भी नज़र आ रही हैं. लोकसभा के रिजल्ट में भाजपा की हालत भी पतली हुई है. जनता ने भाजपा की सीटों को 240 पर ही समेट कर उसकी ताकत को सीमित कर दिया है, जिसके चलते उसे सहयोगियों के सहारे किसी तरह अपनी सरकार बचाना और चलाना है. भाजपा की ताकत कमजोर होने से मायावती का डर भी कुछ कम हुआ है. लिहाजा जिस भतीजे को अपरिपक्व बताकर उन्होंने बाहर किया था, 47 दिन बाद ही उसको ना सिर्फ नेशनल कोऔर्डिनेटर बना कर वापस लिया बल्कि उसकी ताकत भी दुगनी कर दी है. अब हर मीटिंग और हर फैसले में आकाश सबसे अहम भूमिका निभाएंगे और पार्टी नेताओं को उन्हें सहयोग करना होगा. पार्टी के अहम फैसलों में भी आकाश आनंद की भूमिका रहेगी. उम्मीदवारों के चयन भी उनकी राय से होगा.

कुछ ही दिन में उपचुनाव होने हैं और उसके लिए मायावती आकाश के नेतृत्व में अपने कैंडिडेट्स उतार रही हैं. उसके बाद हरियाणा, महाराष्ट्र समेत कई राज्यों के विधानसभा चुनाव भी होने हैं. आकाश आनंद पहले भी दूसरे राज्यों की जिम्मेदारी संभालते रहे हैं. अब इन चुनावों में पार्टी के पास एक दमदार युवा चेहरा होगा. उसके जोशीले भाषण होंगे. आकाश ने कुछ बेहतर किया तो उनके आगे के राजनीतिक सफर की दिशा भी तय हो जाएगी. उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2027 में हैं. इन तीन सालों में वह और परिपक्व होकर बसपा को मजबूत करेंगे.

फिलहाल आकाश के सामने अपने खोये हुए वोटर्स को वापस लाने की चुनौती है. इसके साथ ही नगीना से लोकसभा सीट जीतने वाले दलित नेता चंद्रशेखर आजाद भी उनके सामने बड़ी चुनौती बन कर खड़े हो गए हैं. दलितों और पिछड़ों के सामने इस वक़्त दो लीडर हैं. चुनाव उनको करना है. वे आकाश की भाषण शैली से भी प्रभावित हैं तो चंद्रशेखर की जीत में उनको अपना मसीहा दिखने लगा है. चंद्रशेखर उम्र में आकाश आनंद से बड़े और काफी परिपक्व हैं. वे सनातनियों के खिलाफ धुआंधार बोलते हैं और उनकी शैली काफी आक्रामक है. उनकी ताकत को हर दलित महसूस करता है.

गौरतलब है कि लोकसभा चुनाव में मायावती ने यूपी में सभी 80 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे लेकिन किसी भी सीट पर पार्टी का खाता नहीं खुला, उलटे उनका वोट बैंक 10 फीसदी नीचे आ गया. कुल वोट मिले 9.39 फीसदी, जो बसपा के गठन से अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन है. बसपा ने जब 1989 में अपना पहला चुनाव लड़ा था, तब भी बसपा को 9.90 फीसदी वोट मिले थे और उसने लोकसभा की 2 सीटों पर जीत दर्ज की थी. लेकिन 2024 में तो मायावती का कोई भी प्रत्याशी दूसरे नंबर पर भी नहीं पहुंच सका.

रही-सही कसर चंद्रशेखर आजाद ने पूरी कर दी. उन्होंने नगीना लोकसभा सीट से एक लाख 52 हजार वोट के बड़े अंतर से जीत दर्ज की. मायावती ने दलित होने के नाते चंद्रशेखर को कोई रियायत नहीं दी थी. उनके खिलाफ भी उन्होंने अपना उम्मीदवार उतारा था, जिनका नाम था सुरेंद्र पाल सिंह. चंद्रशेखर के सामने चुनाव लड़ रहे सुरेंद्र पाल सिंह को महज 13,272 वोट मिले, जबकि चंद्रशेखर ने 5,12,552 वोट लाकर इस सीट से शानदार जीत दर्ज की. राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि चंद्रशेखर की जीत ने तय कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में वे दलित राजनीति का नेतृत्व करेंगे. लेकिन उपचुनाव में अगर आकाश आनंद की मेहनत रंग लाती है और 2027 के विधानसभा चुनाव तक वे जमीनी स्तर पर अपने मतदाताओं को जोड़ने में सफल होते हैं तो प्रदेश के राजनीति में बसपा का सिक्का फिर चमक सकता है.

देखा जाए तो इस वक्त दलित और पिछड़े दो ध्रुवों – चंद्रशेखर और आकाश, के बीच ऊहापोह की स्थिति में हैं. अब दोनों को ही सिद्ध करना होगा कि दलितों का मसीहा कौन है. मायावती को भी समझ में आ गया है कि अगर अपने दलित वोटों को बचाये रखने के लिए चंद्रशेखर से मुकाबला करना है तो उसी तेवर की जरूरत है, जो आकाश आनंद के पास है. चंद्रशेखर अभी तक सीधे मायावती पर हमलावर होने से बचते थे, अगर आकाश आनंद उनका नाम लेते हैं तो फिर चंद्रशेखर के निशाने पर भाजपा, सपा और कांग्रेस ही नहीं बल्कि बसपा भी होगी. और आकाश आनंद-चंद्रशेखर की सियासी लड़ाई में जो जीतेगा, वही दलितों-पिछड़ों का नया मसीहा होगा.

निसंदेह दोनों ही काफी प्रखर, ओजस्वी, जानकार और बेख़ौफ़ नेता हैं. लेकिन चंद्रशेखर जहां काशीराम की शिक्षाओं को दलितों के बीच पहुंचाना चाहते हैं और उनको उनके अधिकारों के प्रति जागृत करना चाहते हैं वहीं आकाश आनंद राजनीतिक इच्छा से इस सफर पर आगे बढ़ रहे हैं. हालांकि शक्तिशाली होने पर दोनों ही दलितों और पिछड़ों के लिए आदर्श साबित हो सकते हैं. लेकिन इनकी शक्ति अगर आपस में प्रतिद्वंदिता करने में खर्च होगी तो इससे दलितों-पिछड़ों का नुकसान होगा. दलित और पिछड़ा वर्ग जब तक दो नावों की सवारी करेगा उसके विकास की गति धीमी ही रहेगी. वह कभी चंद्रशेखर का मुंह ताकेगा तो कभी आकाश आनंद से उम्मीद लगाएगा. कांशीराम के बाद इतने बेख़ौफ़, प्रखर और बेबाक नेता पहली बार दलितों-पिछड़ों को मिले हैं. दोनों युवा हैं. दोनों आगे कई सालों तक राजनीति में रहेंगे. अगर दोनों साथ मिल कर चलें तो मनुवादियों को धूल चटा सकते हैं. लेकिन ऐसी संभावना कम ही है.

एक तीसरा विकल्प है कांग्रेस. यदि दोनों मिल कर कांग्रेस के साथ चलते हैं तो देश में कांग्रेस ही एक ऐसी पार्टी है जहां जाति-धर्म-सम्प्रदाय और भाषा के आधार पर राजनीति नहीं खेली जाती. यही एक पार्टी है जिसमें हिन्दू, मुसलमान, दलित, पिछड़ा, ईसाई, सिख, आदिवासी आदि सभी से सामान व्यवहार होता है. किसी को शूद्र मान कर उसे दरी बिछाने या कांवर ढोने तक सीमित नहीं किया जाता. हालांकि मनुवाद के समर्थक इस पार्टी में भी खूब हैं, मगर उनकी सोच संविधान से ऊपर नहीं है. संविधान को सर्वोपरि रखने वाली कांग्रेस ही एक ऐसी धर्मनिरपेक्ष पार्टी है जिसमें सब कम्फर्टेबल है. यही एक पार्टी है जो ‘सबका साथ सबका विकास’ की सोच को वास्तविक रूप में भारत की धरती पर उतार सकती है.

जब मिले व्हाट्स एप पर इनविटेशन कार्ड तो क्या करें

भेज रहे हैं नेह निमंत्रण प्रियवर तुम्हें बुलाने को
हे मानस के राजहंस तुम भूल न जाना आने को

आजकल के वैवाहिक आमंत्रण पंत्रों में आउट डेटेड बना दी गईं ये मधुर पंक्तियां कम ही दिखती हैं, क्यों ? इस सवाल का सीधा सा जबाब यह है कि अब बुलावे में पहली सी आत्मीयता और लगाव नहीं रह गए हैं. शादी में बुलाना कम से कम 80 फीसदी मामलों में बेहद व्यवहारिक व्यवसायिक और औपचारिक होता जा रहा है और लगभग से ज्यादा डिजिटल हो गया है. पहले वैवाहिक आमंत्रण पत्रिका जिन को दी या भेजी जाती थी वे सिलैक्टेड होते थे यानी उन्हें बुलाना ही होता था.

वैवाहिक आमंत्रण पत्रिका आते ही घर में हलचल सी मच जाती थी. वर वधू के मातापिता और दादादादी और दर्शानाभिलाशियों सहित स्वागत को उत्सुक लोगों के नाम पढ़ कर उन के पारिवारिक इतिहास और भूगोल के चीरफाड़ की रनिंग कमेंट्री होती थी, उन से खुद के रिश्ते संबंध या परिचय जो भी हो का बही खाता खुलता था और फिर तय होता था कि इस शादी में कौनकौन जाएगा और मेजबान के अपने यानी मेहमान के प्रति किए गए और दिए गए व्यवहार के हिसाब से क्या गिफ्ट दिया जाएगा.

यानी बात जैसे को तैसा या ले पपड़िया तो दे पपड़िया वाली कहावतों को फौलो करती हुई होती थी कि अगर उन के यहां से कोई हमारे यहां की शादी में आया था तो हमें भी जाना चाहिए और उन के यहां से जो व्यवहार या तोहफा आया था लगभग उसी मूल्य और हैसियत का हमें भी देना चाहिए.

बढ़ते शहरीकरण और सिमटती रिश्तेदारी के चलते अब और भी बहुत सी चीजें गुम हो गई हैं. उन की व्याख्या करने को यही एक पहलू पर्याप्त हैं कि 20 फीसदी अपवादों को छोड़ दिया जाए तो शादी का कोई भी इनविटेशन जाने की बाध्यता नहीं रह गया है. अब घर पर कार्ड देने वही आता है जो वाकई में आप की गरिमामयी उपस्थित्ति आशीर्वाद समारोह में चाहता है.

यह जाहिर है नजदीकी रिश्तेदार या अभिन्न मित्र होता है जिस से एक नियमित संपर्क भी आप का होता है. वह आप को डिजिटली तो कार्ड भेजेगा ही साथ में एक बार से ज्यादा फोन कर याद भी दिलाएगा और मुमकिन है कार्ड कुरियर से भी भेजे और उस के साथ में मिठाई का डब्बा भी हो यहां जाने आप को सोचना नहीं पड़ता.

लेकिन अगर डिजिटली बुलाने वाले चाहे वे नए हों या पुराने के निमंत्रण में न नेह हैं और न ही उस ने रूबरू हो कर मानस के राजहंस और प्रियवर जैसा कोई आत्मीय संबोधन देते भूल न जाना जैसा मार्मिक और भावनात्मक आग्रह किया हुआ होता है तो जाहिर है उस ने एक औपचारिकता भर निभा दी है. नया कोई ऐसा करे तो बात ज्यादा अखरती नहीं लेकिन कोई पुराना करे तो इगो आड़े आना स्वभाविक बात है.

बुलाने के साथसाथ जाने न जाने के पैमाने भी बदल रहे हैं. मसलन अब इनविटेशन कार्ड में सिर्फ वेन्यू गौर से देखा जाता है कि घर से कितने किलोमीटर दूर किस डायरैक्शन में जाना पड़ेगा. कार्ड के बाकी मसौदे से कोई खास मतलब जाने वाले को नहीं रहता. यानी यह उत्साहहीनता और औपचारिकता दो तरफा हैं जो एक उलझन तो मन में पैदा कर ही देते हैं कि जाएं या न जाएं. और जाएं तो गिफ्ट क्या ले जाएं. हालांकि जमाना नगदी वाले लिफाफों का है इसलिए यह सरदर्दी कम तो हुई है.

अहम सवाल जाएं या नहीं इस का फैसला इन पोइंट्स से तय करें –

1 – अगर सिर्फ व्हाट्सऐप पर कार्ड डाल दिया गया है तो जाना कतई जरुरी नहीं क्योंकि बुलाने वाले की मंशा अगर वाकई बुलाने की होती तो वह कार्ड पोस्ट करने के पहले या बाद में एक बार फोन करता या मैसेज में छोटा ही सही आग्रह जरुर करता.

2 – मुमकिन यह भी है वह वाकई बुलाना चाह रहा हो लेकिन भूल गया हो या इतनी समझ और व्यवहारिकता उस में न हो कि फोन भी कर ले.

3 – ऐसे में यह देखें कि आप के उस से संबंध कैसे हैं. कई बार संबंध बेहद औपचारिक और परिचय तक ही सीमित होते हैं और केवल इसी आधार पर बेटे या बेटी की शादी का इनविटेशन कार्ड दे दिया जाता है. मसलन बुलाने वाला आप की कालोनी या अपार्टमेंट का वाशिंदा हो सकता है जिस से कभीकभार चलतेफिरते दुआ सलाम या बातचीत हो जाती है जिस के बारे में आप यह तो जानते हैं कि ये थर्ड फ्लोर पर कहीं रहने वाले शर्माजी हैं लेकिन पीएन शर्मा हैं या एनपी शर्मा हैं इस में कन्फ्यूज हों तो ऐसी शादी में जाना जरुरी नहीं.

4 – औफिस कुलीग भी अकसर इसी तरह कार्ड देते हैं कि आप आएं न आएं इस से उस की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता है. यहां आप को तय करना है कि आप उस से कैसे संबंध रखना चाहते हैं. अगर बढ़ाना चाहते हैं तो जाना हर्ज की बात नहीं. यह भी अहम है कि कार्ड देते वक्त उस ने आग्रह कैसे किया था और दोबारा कभी याद दिलाया या नहीं.

5 – जाने न जाने का एक पैमाना यह भी सटीक है कि पिछले एक साल में आप उस के घर कितनी दफा गए या वह कितनी बार आप के घर आया था. अगर इस का जबाब एक बार भी नहीं में है तो जाना बाध्यता नहीं.

6 – बुलाने बाले से आप की कितनी बार फोन पर बात हुई या होती है इस से भी जाने न जाने की उलझन हल हो सकती है. इस के अलावा इस बात से भी तय कर सकते हैं कि आप उस के घर में किस किस को जानते हैं और उस के अलावा किसी मेंबर को जानते भी हैं या नहीं. ठीक यही बात उस पर भी लागू होती है. पारिवारिक परिचय प्रगाढ़ हो यह भी आजकल जरुरी नहीं है लेकिन इतना तो हो कि जब आप जाएं तो असहज महसूस न करें कि घर के मुखिया के सिवाय किसी को जानते ही नहीं.

असल में नई दिक्कत यह खड़ी हो रही है कि जानपहचान और रिश्तेदारी का दायरा सिमट रहा है. शादी के आमंत्रण पहले की तरह थोक में और आत्मीयता से नहीं आते हैं लेकिन जैसे भी आएं, जब आ ही जाते हैं तो मन में जाने न जाने को ले कर दुविधा पैदा हो जाती है. यही कार्ड जब व्हाट्सऐप पर आते हैं तो तय करना मुश्किल हो जाता है कि मेजबान सचमुच आमंत्रित कर रहा है या सिर्फ सूचना दे रहा है जिस के कोई माने आपके लिए नहीं होते.

जमाना ज्यादा से ज्यादा शेयर और लाइक का है. अकसर फेसबुक और व्हाट्सऐप ग्रुप में कोई भी शादी का कार्ड डाल देता है कि आप सभी पधारना और वर वधू को आशीर्वाद देना. इस तरह के बुलावे पर हालांकि कोई ध्यान नहीं देता हां बधाई आशीर्वाद और शुभकामनाओं की झड़ी ऐसे लग जाती है मानो ग्रुप के सदस्यों न उस भतीजे या भतीजे को गोद में खिलाया हो. यह सब आभासी और बनावटी है. इस से बचना ही बेहतर होता है. लेकिन बुलाने वाला नया हो या पुराना उसे व्हाट्सऐप पर ही शुभकामनाएं देने की औपचारिकता और शिष्टाचार निभाना न भूलें.

स्पीकर चुनाव में सहयोगी दलों को संदेश, एनडीए नहीं बीजेपी की है सरकार

महाभारत युद्व शुरू से पहले श्रीकृष्ण ने अपने उपदेश में कहा ‘अहं सर्वस्य प्रभावो मत्तः सर्वं प्रवर्तते, इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः’ अर्थात मैं समस्त आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों का कारण हूं. प्रत्येक वस्तु मुझ ही से उद्भूत है. जो बुद्धिमान यह भलीभांति जानते हैं, वे मेरी प्रेमाभक्ति में लगते हैं तथा हृदय से पूरी तरह मेरी पूजा में तत्पर होते हैं.

2024 की लोकसभा चुनाव के शपथ ग्रहण से ले कर स्पीकर के चुनाव तक नरेंद्र मोदी का जिद्दी स्वभाव व्यवहार नजर आया. भाजपा को सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं मिला. एनडीए के घटक दल चंद्र बाबू नायडू और जदयू के नीतीश कुमार की वैशाखी पर चढ़ कर नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के पद की शपथ ली. शपथ लेने के बाद उन्होंने नीतीश और नायडू से किसी तरह की सलाह नहीं ली. मोदी मंत्रिमंडल में जदयू से राजीव रंजन सिंह, रामनाथ ठाकुर, टीडीपी से राममोहन नायडू को मंत्री बनाया गया. पूरे मंत्रिमंडल के गठन में भाजपा की संख्या भारी रही. उन के नेताओं को बड़े विभाग दिए. पूरा मंत्रिमंडल 2019 वाला ही दिखा.

मंत्रीमंडल के गठन के बाद दूसरी बड़ी परीक्षा लोकसभा स्पीकर के चुनाव को ले कर थी. लोकसभा स्पीकर के चुनाव में पेंच फंस गया कि विपक्ष डिप्टी स्पीकर की मांग करने लगा. इस के लिए सत्ता पक्ष तैयार नहीं था. स्पीकर को ले कर चुनाव की नौबत आ गई. सत्ता और विपक्ष अपनेअपने संख्या बल को ठीक करने लगा. भाजपा की तरफ से यह जिम्मेदारी राजनाथ सिंह को सौंप दी गई.

उपेक्षित राजनाथ को मिला महत्व

10 साल से उपेक्षा का शिकार रहे राजनाथ सिंह को पहली बार महत्वपूर्ण कार्य सौंपा गया. राजनाथ सिंह को साफतौर पर बता दिया गया था कि ओम बिडला को ही स्पीकर बनाना है. विपक्ष ओम बिडला के नाम पर तैयार नहीं था. राजनाथ सिंह ने कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खडगे से बात की. इस के बाद भी बात डिप्टी स्पीकर के मसले पर टूट गई. इस पूरे परिदृष्य मे नरेंद्र मोदी कहीं नजर नहीं आए. न तो उन्होंने चंद्र बाबू नायडू से बात की न ही नीतीश कुमार से. इन नेताओं के भी बयान सामने नहीं आए.
जबकि इंडिया ब्लौक में टीएमसी की ममता बनर्जी ने कहा कि कांग्रेस ने उन से बात नहीं की. इंडिया ब्लौक में यह हालत है कि नेता अपनी बात कह सकता है. एनडीए में मोदी की तानाशाही है. जिस में चलते नीतीश और नायडू अपने मन की बात बाहर बोल भी नहीं पा रहे हैं. 2014 और 2019 की मोदी सरकार में राजनाथ सिंह के कद को छोटा करने का प्रयास किया गया था. 2024 में जब भाजपा का संख्या बल कम हुआ तो राजनाथ सिंह को ही स्पीकर चुनाव की डील करने की जिम्मेदारी दी गई.

जदयू और टीडीपी से स्पीकर के चुनाव में कोई सलाह नहीं ली गई. इस के जरिए नरेंद्र मोदी ने अपने सहयोगी टीडीपी और जदयू को साफ संदेश दे दिया है. यह सरकार कहने भर के लिए एनडीए की है असल में यह भाजपा की सरकार है. सहयोगी दल इस सरकार की पूंछ भर है, लेकिन उन की पूछ नहीं है. मंत्रिमंडल के बंटवारे में भी यह बात देखने को मिली और लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव में भी यही संदेश नरेंद्र मोदी ने दिया है कि सहयोगी दल प्रेमाभक्ति तथा हृदय से पूरी तरह मेरी पूजा में तत्पर रहे. इसी में उन का भला है.

लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव में नरेंद्र मोदी का फैसला बताता है कि उन में अहम का भाव अभी बना है. जिस तरह से 2014 और 2019 विपक्ष को दरकिनार कर के फैसले लिए उसी तरह से 2024 में भी तानाशाही भरे फैसले ले रहे हैं. इस का पहला उदाहरण मंत्रिमंडल गठन में देखने को मिला जब सहयोगी दलों को केवल नाम वाले मंत्रालय दिए गए. दूसरा उदाहरण उस समय देखने को मिला जब प्रोटेम स्पीकर का चुनाव करना था.

पंरपरा के हिसाब से जो सब से अधिक बार सांसद का चुनाव जीत कर आता है उस को ही प्रोटेम स्पीकर बनाया जाता है. जो एक तरह से अस्थायी स्पीकर होता है. उस का काम नए संसद सदस्यों को षपथ दिलाना होता है. कांग्रेस के के. सुरेश सब से अधिक 8 बार सांसद का चुनाव जीत कर आए थे. मोदी सरकार ने के. सुरेश की जगह भर्तहरि माहताब को प्रोटेम स्पीकर बनाया जो 7 बार चुनाव जीते थे.

सरकार का तर्क था कि के. सुरेश ने लगातार 8 बार चुनाव नहीं जीता. भर्तहरि माहताब लगातार 7 बार चुनाव जीतने वाले सांसद हैं. प्रोटेम स्पीकर का साथ देने के लिए 5 सदस्यों की एक कमेटी बनी थी. इस में विपक्ष के 3 सांसद थे. इन्होने प्रोटेम स्पीकर का साथ देने से मना कर दिया.

विवादों में रहे स्पीकर को समर्थन

स्पीकर उम्मीदवार के रूप में ओम बिडला को विपक्ष पंसद नहीं कर रहा था. क्योकि 2019 में उन का कार्यकाल बहुत विवादित रहा था. नरेंद्र मोदी की जिद थी कि ओम बिडला ही उन के स्पीकर होंगे. इसलिए प्रोटेम स्पीकर के साथ ही साथ स्पीकर भी अपनी रूचि का बनाना चाहते थे. ऐसे में स्पीकर के लिए सत्ता पक्ष की तरफ से ओम बिडला और विपक्ष की तरफ से के. सुरेश चुनाव मैदान में उतरे. 26 जून को सुबह 11 बजे चुनाव हुआ. ध्वनिमत से ओम बिडला को लोकसभा अध्यक्ष चुन लिया गया.
इस बहाने नरेंद्र मोदी ने यह दिखाने की कोशिश की है कि 2019 के मुकाबले भले ही भाजपा पहले जितनी सीटें जीत न पाई हो पर उन का मंत्रिमंडल वैसा ही रहेगा जैसा 2019 में था. इस के जरिए वह अपना आत्मविश्वास दिखाना चाहते थे. इसलिए ओम बिडला को ही स्पीकर बनाया. सहयोगी दल हो या विपक्ष उन के मुंह पर यह तमाचा मारने वाला फैसला था.

अनुच्छेद-93 के तहत चुना जाता है लोकसभा अध्यक्ष

18वीं लोकसभा में नए अध्यक्ष का चुनाव संविधान के अनुच्छेद-93 के तहत किया जाता है. लोकसभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव सांसद अपने बीच में से ही करते हैं. लोकसभा अध्यक्ष का पद का संसदीय लोकतंत्र में महत्वपूर्ण स्थान है. संसद सदस्य अपनेअपने चुनाव क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं, लेकिन अध्यक्ष सदन के ही पूर्ण प्राधिकार का प्रतिनिधित्व करता है.

लोकसभा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव इस के सदस्य सभा में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के साधारण बहुमत के जरिए किया जाता है. यानी जिस उम्मीदवार को उस दिन लोकसभा में मौजूद आधे से अधिक सांसद वोट देते हैं, वह लोकसभा अध्यक्ष चुन लिया जाता है. अध्यक्ष के लिए कोई विशेष योग्यता निर्धारित नहीं है, उसे केवल लोकसभा का सदस्य होना चाहिए.

लोकसभा अध्यक्ष सदन का कामकाज ठीक से चलाने के लिए जिम्मेदार होता है. इसलिए यह पद काफी महत्वपूर्ण है. संसदीय बैठकों का एजेंडा भी लोकसभा अध्यक्ष ही तय करते हैं. सदन में किसी तरह का विवाद पैदा होने पर कार्रवाई भी लोकसभा अध्यक्ष ही करते हैं. लोकसभा की विभिन्न समितियों का गठन अध्यक्ष ही करते हैं.
लोकसभा में अध्यक्ष का आसन इस तरह होता है कि वह सब से अलग दिखाई दे. अध्यक्ष अपने आसन से पूरे सदन पर नजर रखते हैं. लोकसभा अध्यक्ष पद पर निर्वाचित होने से ले कर लोकसभा के भंग होने के बाद नई लोकसभा की पहली बैठक से ठीक पहले तक अपने पद पर रह सकते हैं. लोकसभा भंग होने की स्थिति में हालांकि अध्यक्ष संसद सदस्य नहीं रहते हैं, लेकिन उन्हें अपना पद नहीं छोड़ना पड़ता है.

लोकसभा अध्यक्ष से उम्मीद की जाती है कि वह तटस्थ भाव से सदन चलाएंगे. सदन में किसी प्रस्ताव पर मतदान में अगर दोनों पक्षों को बराबर वोट मिलने की स्थिति में अपना निर्णायक वोट डाल सकते हैं. आमतौर पर वो किसी प्रस्ताव पर मतदान में भाग नहीं लेते हैं. लोकसभा का अध्यक्ष, लोकसभा सचिवालय के प्रमुख होते हैं. यह सचिवालय उन के नियंत्रण में ही काम करता है. लोकसभा सचिवालय के कर्मियों, संसद परिसर और इस के सुरक्षा प्रबंधन का काम अध्यक्ष ही देखते हैं.

आमतौर पर लोकसभा अध्यक्ष का पद सत्ता पक्ष और उपाध्यक्ष का पद विपक्ष को देने की परंपरा रही है. 16वीं और 17वीं लोकसभा में भाजपा के पास पूर्ण बहुमत था. 16वीं लोकसभा में भाजपा की सुमित्रा महाजन को अध्यक्ष चुना गया था. वहीं एआईएडीएमके के एम. थंबीदुरई को उपाध्यक्ष बनाया गया था. 17वीं लोकसभा में ओम बिरला को अध्यक्ष चुना गया था. इस लोकसभा में उपाध्यक्ष का चुनाव नहीं हुआ था.

संविधान का अनुच्छेद 94 सदन को लोकसभा अध्यक्ष को पद से हटाने का अधिकार देता है. लोकसभा अध्यक्ष को 14 दिन का नोटिस दे कर प्रभावी बहुमत से पारित प्रस्ताव के जरिए उन के पद से हटाया जा सकता है. प्रभावी बहुमत का मतलब उस दिन लोकसभा में 50 फीसदी से अधिक सदस्य सांसद मौजूद होते हैं. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 7 और 8 के जरिए भी लोकसभा अध्यक्ष को हटाया जा सकता है. अगर स्पीकर स्वयं पद छोड़ना चाहें तो वो अपना इस्तीफा डिप्टी स्पीकर को दे सकता हैं.

ओम बिडला का पिछला कार्यकाल विवादित रहा है. सांसदों को न बोलने देने, माइक बंद करने से ले कर सांसदों के निलम्बन तक के बहुत सारे मामले थे. अब फिर ओम बिडला स्पीकर बन गए हैं. ऐसे में हालात बेहद टकराव वाले होंगे. वह पूरी ताकत से विपक्ष को बोलने से रोक सकते हैं. अब विपक्ष की संख्या भी बढ़ गई है. उन के बीच एकता भी आ गई है. सत्ता पक्ष का संख्या बल पहले के मुकाबले कम है. ऐेसे में ओम बिडला के लिए यह कार्यकाल पहले जैसा सरल नहीं होगा.

अब भाजपा का औपरेशन लोटस चलेगा

नरेंद्र मोदी का स्वभाव और रणनीति इस तरह की रहती है कि वह अपने आगे दूसरे नेता या दल को पनपने न दें. मोदी ने कभी सहयोगी दलों पर निर्भर रह कर राजनीति नहीं की. जब वह गुजरात में मुख्यमंत्री रहे, अपने विरोधियों और सहयोगियों को पनपने नहीं दिया. प्रधानमंत्री बनने के बाद भाजपा में हाईकमान कल्चर आया. 2014 और 2019 के दोनों कार्यकाल में न तो नेता प्रतिपक्ष रहा न ही सहयोगी दलों से पूछ कर काम किया. दोनों कार्यकाल में एनडीए केवल नाममात्र का था. नीतीश कुमार ने तो मोदी हटाओ की मुहिम चलाई थी. इंडिया ब्लौक के सूत्रधार वही थे.

अब वह नरेंद्र मोदी के साथ हैं. भाजपा के सहयोगी दलों जदयू और टीडीपी के लिए अब एनडीए से अलग होना सरल नहीं है. ऐसे में उन के लिए भाजपा का पिछलग्गू बन कर चलने के अलावा कोई रास्ता नहीं है. अगर सरकार में रह कर मलाई खानी है तो मोदीमोदी करना होगा. हृदय से उन की पूजा करनी होगी. चरणदास की तरह से प्रभू के चरणों में उन के प्रसाद की चाह में पडे रहना पड़ेगा. यही नहीं नरेंद्र मोदी भाजपा को बहुमत में लाने का प्रयास करेंगे, जिस से सहयोगी दलों पर उन की निर्भरता कम हो जाए.

ऐेसे में औपरेशन लोटस से छोटे दल घबराए हुए हैं. पंजाब में अकाली दल ने केवल एक सीट ही जीती है. इस के बाद अकाली दल में आपसी झगड़े खड़े हो गए हैं. सुखबीर सिंह बादल का आरोप है कि भाजपा और उस की एजेंसियों के द्वारा इस काम को किया जा रहा है. अगर पंजाब में आकाली दल कमजोर हुआ तो वहां पर खालिस्तानी आंदोलन उभर सकता है. जो पंजाब ही नहीं पूरे देश के लिए खतरनाक होगा. ऐसे में भाजपा का यह कदम घातक होगा. असल में भाजपा अपनी संख्या बढ़ाने के लिए छोटे दलों में तोड़फोड़ करना चाहती है. ऐसे में उस के निशाने पर सहयोगी दलों के साथ ही साथ विरोधी दल भी हैं.

सरकार के शपथ ग्रहण और लोकसभा स्पीकर चुनाव के बाद मोदी सरकार को राहत मिल गई है. ऐसे में अब वह अपने विस्तार पर ध्यान देगी. वह जल्द से जल्द अपनी 272 की संख्या के करीब तक पहुंचना चाहती है. ऐसे में औपरेशन लोटस सब से प्रमुख है. सहयोगी और विरोधी दोनों दलों को सावधान रहने की जरूरत है.

क्या धर्मकर्म की राजनीति के चलते पिछड़ रहे हैं ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक

ब्रिटेन के प्रमुख अख़बार ‘द डेली टैलीग्राफ’ के एक हालिया सर्वे के मुताबिक प्रधानमंत्री ऋषि सुनक उत्तरी इंगलैंड सीट से चुनाव हार सकते हैं. और तो और, 4 जुलाई को होने जा रहे मतदान में उन की कंजर्वेटिव पार्टी के हाउस औफ कौमन्स की 650 में से महज 53 सीटें ही ले जाने की स्थिति इस सर्वे में बताई गई है. 4 जून को भारत के आम चुनाव परिणाम देख कहा जा सकता है कि इन सर्वेक्षणों का क्या भरोसा जो एनडीए और भाजपा को भारी बढ़त पर बता रहे थे लेकिन नतीजों के आसपास भी कोई नहीं था.
इस लिहाज से बात ठीक है लेकिन यह बात अहम है कि आमतौर पर विदेशी सर्वेक्षण भक्ति और आस्था से प्रेरित नहीं होते और ब्रिटेन के मामले में तो साफ़ दिख रहा है कि टैलीग्राफ सत्तारुढ़ दल की ही दुर्गति होना बता रहा है. दो टूक यह भी कहा जा सकता है कि 1855 से प्रकाशित हो रहे टैलीग्राफ की अपनी अलग साख और विश्वसनीयता है और इस के अलावा भी हर कोई यह कह और मान रहा है कि इस बार कंजर्वेटिव पार्टी और ऋषि सुनक दोनों की हालत खस्ता है. सुनक की जीत की उतनी ही संभावना है जितनी कि उन की हार की आशंका है यानी चांस फिफ्टीफिफ्टी है. उलट इस के, प्रमुख विपक्षी दल लेबर पार्टी बहुत आगे चल रही है. टैलीग्राफ के सर्वे में उसे 516 सीटें मिलने का अंदाजा जताया गया है.

एक अकेले टैलीग्राफ ही नहीं, बल्कि कई दूसरे सर्वेक्षणों में भी लेबर पार्टी को काफी बढ़त पर बताया जा रहा है. ब्रिटिश इंटरनैश्नल मार्केटिंग रिसर्च और डाटा एनालिसिस कंपनी यूगोव (you Gov) के पोल में भी कंजर्वेटिव पार्टी को 20 फीसदी और लेबर पार्टी को 47 फीसदी वोट मिलने की बात कही गई है. एक और सर्वे पोलिटिको पोल में तो कंजर्वेटिव पार्टी को तीसरे नंबर पर जाते दिखाया गया है. उसे केवल 18 फीसदी वोट मिलने की संभावना जताई गई है. रिफौर्म यूके पार्टी को 19 फीसदी वोटों के साथ दूसरा स्थान दिया गया है. रिफौर्म यूके 2018 में गठित नईनवेली छोटी सी लेकिन दक्षिणपंथी ही पार्टी है जिस के मुखिया वे नाइजेल फराज हैं जिन्हें एक वक्त में ब्रिटेन को यूरोपीय संघ से बाहर निकालने के लिए जाना जाता है.

यह वह वक्त है जब भारत में भाजपा की दुर्दशा की चर्चा दुनियाभर में जारी है लेकिन कोई स्पष्ट निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रहा है कि ऐसा क्यों हुआ. सिर्फ एक सरिता पत्रिका ही है जो यह बताती रही कि नरेंद्र मोदी और भाजपा जनता को धर्म की आड़ ले कर गुमराह कर रहे हैं, बहलाफुसला रहे हैं जिस की हकीकत जनता समझने लगी है. नरेंद्र मोदी हालांकि टीडीपी और जेडीयू की बैसाखियों के सहारे तीसरी बार प्रधानमंत्री बन जरूर गए हैं लेकिन उन के तेवर अब पहले जैसे आक्रामक और तानाशाही वाले नहीं रह गए हैं. हालांकि वे अपनी तरफ से ठसक दिखाने की पूरी कोशिश करते हैं लेकिन वे पुराने ज़माने के ठाकुरों सरीखी साफ़साफ़ दिखती है जिन के पास आन, बान और शान के संस्मरण ज्यादा होते हैं भगवा हवेली में अब कम दीयों की रोशनी है.

इसी तर्ज पर अगर ब्रिटेन में ऋषि सुनक की हार की स्क्रिप्ट लिखी जा रही है तो उस की प्रस्तावना या इबारत शुरू ही इस बात से होती है कि कंजर्वेटिव पार्टी भी घोषित तौर पर दक्षिणपंथी है. इस बात को इतिहास के साथसाथ उस के वर्तमान चुनावप्रचार से भी समझा जा सकता है. कंजर्वेटिव पार्टी के कुछ उम्मीदवार भारत का हवाला देते हुए यह प्रचार कर रहे हैं कि मोदी फिर प्रधानमंत्री बन गए हैं. इस का मतलब यह है कि आने वाले महीने कश्मीर के लोगों के लिए और कठिन होने वाले हैं. असल में एक पत्र के जरिए कश्मीरी और पाकिस्तानी समुदाय के मतदाताओं को इस तरह लुभाने की कोशिश कंजर्वेटिव पार्टी कर रही है कि हम अगर जीते तो संसद में कश्मीर मुद्दा उठाएंगे. इस स्टाइल के प्रचार को लेबर पार्टी ने विभाजनकारी बताते हुए एतराज जताया है.

घोषित तौर पर ही लाल रंग के झंडे वाली सौ साल पुरानी लेबर पार्टी उदार वामपंथी मानी जाती है जो धरमकरम और चर्चों की राजनीति से दूर रहती है. इस का दिल और दिमाग समाजवादी है क्योंकि इस का जन्म ही मजदूर संगठनों की देन है. तीन बार प्रधानमंत्री रहे टोनी ब्लेयर लेबर पार्टी के एक लोकप्रिय नेता रहे हैं.

इस चुनाव में लेबर पार्टी के एक प्रमुख नेता डेविड लैमी भारत का नाम लेते हुए कंजर्वेटिव पार्टी पर 25 जून को जम कर यह कहते हुए बरसे थे कि 14 साल से कंजर्वेटिव पार्टी सत्ता में है. इस दौरान कितनी दीवाली आईं गईं लेकिन सरकार भारत के साथ फ्री ट्रेड एग्रीमैंट यानी मुक्त व्यापार समझौता कराने में असफल रही है. उन के निशाने पर ऋषि सुनक के साथसाथ पूर्व प्रधानमंत्री बोरिस जौनसन भी थे. हालांकि, 10 लाख भारतीयों को रिझाने के लिए उन्होंने जम कर भारत की तारीफ भी की.

ब्रिटेन के चुनावी मुद्दों, मसलन महंगाई, इमिग्रेशन, पर्यावरण, अर्थव्यवस्था, घरेलू और विदेश नीति वगैरह से परे से यह सोचना लाजिमी है कि डेविड लैमी को आखिर अपनी बात में दीवाली शब्द का इस्तेमाल जोर दे कर क्यों करना पड़ा. दरअसल, प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही ऋषि सुनक भी अपना धार्मिक चेहरा उजागर करने को जीत की गारंटी मानने लगे हैं. वे नियमित रूप से साउथेम्पटन स्थित मंदिर में जाते रहे हैं, जिस का हल्ला उन के प्रधानमंत्री बनने के बाद मचा था. कम ही लोगों को जानकारी है कि वे यहां अकसर भंडारा भी करवाते हैं. यह ठीक है कि उन्होंने बेहद उठापटक के दौर में यह पद संभाला था लेकिन उन के सामने खुद की काबिलीयत को साबित करने का सुनहरा मौका भी था जिसे वे धर्म और पूजापाठ के दिखावे की राजनीति के चलते चूक गए लगते हैं.

हालात से लड़ने के बजाय ऋषि ने धर्म का सहारा लिया और धर्मस्थलों के चक्कर काटने शुरू कर दिए. सितंबर 2022 में जब वे भारत आए थे तब दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर में भी उन्होंने पूजापाठ और जलाभिषेक करते हुए अपने हिंदू होने का राग आलापा था. 12 नवंबर, 2023 को दीवाली पर उन्होंने 10 डाउनिंग स्ट्रीट में दीवाली की ग्रैंड पार्टी आयोजित की थी. उस दिन उन्होंने अपने पहले ब्रिटिश एशियाई प्रधानमंत्री होने से ज्यादा कट्टर हिंदू होने का जिक्र किया था. इस भव्य और खर्चीले दीवाली समारोह में प्रीति जिंटा, अक्षय कुमार और ट्विंकल खन्ना जैसे फ़िल्मी सितारे खासतौर से शामिल हुए थे.

दीवाली का जिक्र कर डेविड लैमी ने कूटनीतिक चाल चलते ईसाई मतदाताओं को क्या याद दिलाने की कोशिश की है, इस सवाल का जवाब यही है कि उन्होंने भी एक धार्मिक चाल चली है, जिस की कोई काट ऋषि सुनक या कंजर्वेटिव पार्टी के पास नहीं है. दीवाली की पार्टी में ऋषि सुनक की पत्नी अक्षता मूर्ति परंपरागत भारतीय परिधान में थीं लेकिन ऋषि हास्यास्पद लग रहे थे क्योंकि उन्होंने टाई भी पहनी थी और शाल भी कंधों पर डाल रखा था. उस दिन उन के परिवार ने जम कर पूजापाठ और भजनआरती वगैरह किए.

ऋषि सुनक अपने हिंदू होने पर गर्व करें, यह किसी के लिए एतराज की बात नहीं लेकिन वे खुद के धार्मिक, कर्मकांडी और मूर्तिपूजक होने की नुमाइश बहैसियत ब्रिटेन के प्रधानमंत्री हर कभी खुलेआम करें, यह बात ब्रिटेनवासी हजम नहीं कर पा रहे क्योंकि उन का भगवान देश की बदहाली दूर नहीं कर पाया जिस की जिम्मेदारी ब्रिटेन के लोगों ने उन्हें दी थी. जब भारत के हिंदू ही नरेंद्र मोदी का धर्मकर्म ज्यादा बरदाश्त नहीं कर पाए जिस के चलते उन्होंने भाजपा को 240 पर समेट दिया तो दक्षिणपंथी सुनक ब्रिटेन में कामयाब हो पाएंगे, ऐसा सोचने की कोई वजह नहीं.

यह बात भी कम अहम नहीं कि ब्रिटेन के लोगों ने कभी ऋषि सुनक के हिंदू होने को अन्यथा नहीं लिया. उलटे, उन का स्वागत ही किया था. लेकिन वह स्वागत एक ऐसे स्मार्ट और प्रतिभाशाली नेता के तौर पर किया गया था जो देश की लडखडाती हालत को संभालने की कूवत रखता है. यह उम्मीद तो तभी ढहना शुरू हो गई थी जब ऋषि सुनक घबरा कर हिंदू देवीदेवताओं का गुणगान ‘गंगा मैया ने बुलाया है’ वाली तर्ज पर करने लगे थे.

इस का एक बेहतर उदाहरण मोरारी बापू की रामकथा में उन का नरेंद्र मोदी की तरह ‘राम सिया राम’ करते रहना था. यह रामकथा कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में 15 अगस्त, 2023 को आयोजित की गई थी. कथा की शुरुआत में ही उन्होंने कहा था कि, ‘मैं आज यहां प्रधानमंत्री के नहीं, बल्कि एक हिंदू के रूप में आया हूं. 10 डाउनिंग स्ट्रीट में एक सुनहरा गणेश प्रसन्नतापूर्वक बैठा है. साउथेम्पटन मंदिर में मेरे मातापिता और परिवारजन हवनपूजाआरती करते थे. बाद में मैं और मेरे भाईबहन दोपहर का भोजन और प्रसाद परोसने लगे थे.’

मोरारी बापू से रूबरू होते उन्होंने कहा था, ‘मैं आज यहां से रामायण को याद करते हुए जा रहा हूं लेकिन साथ ही, भगवदगीता और हनुमान चालीसा को भी याद करता हूं.’ आखिर में जय सिया राम का नारा लगाते हुए उन्होंने मोरारी बापू से ब्रिटेन के लोगों की सेवा करने के लिए असीम शक्ति मांगी. बापू ने गदगद होते उन्हें आशीर्वाद और सोमनाथ के मंदिर वाला शिवलिंग तोहफे में दे दिया.

यहां यह तुलना करना गैरप्रासंगिक नहीं कि ऐसा भारत में कोई करता तो सनातनी उस का क्या हश्र करते जहां मुसलमानों को आएदिन उन की पूजा पद्धतियों और त्योहारों के रीतिरिवाजों को ले कर तरहतरह से कोसा जाता है. मानो धर्म और ऊपर वाले में आस्था के कापीराइट सिर्फ सनातनी हिंदुओं के ही हों. और तो और, दलितों को भी आएदिन मंदिरों से मारपीट कर खदेड़े जाने की घटनाएं बहुत आम हैं. इस पर भी तरस खाने लायक बात यह कि राग सहिष्णुता और विश्वगुरु बनने गाया जाता है.

ऐसा एक नहीं, बल्कि कई मौकों पर हुआ जब ऋषि सुनक ने अपनी आस्था सार्वजनिक रूप से व्यक्त करते नरेंद्र मोदी को भी पछाड़ने की कोशिश की. दुनियाभर के मीडिया और बुद्धिजीवियों ने कंजर्वेटिव पार्टी की इस बाबत तारीफ की थी कि उस ने एक हिंदू अल्पसंख्यक को सब से बड़े पद पर बैठाया. लेकिन उन्हीं दिनों में पाकिस्तानी मूल के कनाडाई लेखक तारेक फतह के इस ट्वीट की भी चर्चा रही थी कि ऋषि और कमला एकदूसरे के विपरीत हैं. कमला हिंदू और अपनी भारतीय पहचान पर शर्मिंदा थीं वहीं ऋषि सुनक ने अपनी हिंदू पहचान कभी नहीं छिपाई, दोनों की तुलना मत कीजिए.

असल में लोग अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की तुलना महज भारतीय मूल के होने पर करने लगे थे. लेकिन लोग यह भूल गए थे कि कमला हैरिस अमेरिका की वामपंथी पार्टी डैमोक्रेटिक से ताल्लुक रखती हैं और सुनक ब्रिटेन की दक्षिणपंथी पार्टी कंजर्वेटिव से गहरे तक कनैक्ट हैं.

तमाम सर्वेक्षणों, मीडिया और सियासी पंडितों और विश्लेषकों की नजर में ऋषि सुनक और कंजर्वेटिव पार्टी चुनाव से बाहर हैं. लेकिन भारत के 4 जून के नतीजों के मद्देनजर कोई भविष्यवाणी करना समझदारी नहीं होगी अस्तु यह कहने में कोई हिचक नहीं कि जो भगवान राम अपने देश में ही भाजपा को 370 सीटें नहीं दिला सका, अपने ही लोकसभा क्षेत्र फ़ैजाबाद में नहीं जिता पाया, तमाम टोटकों और कर्मकांडों के बाद भी एनडीए को 400 पार नहीं करा सका वह ब्रिटेन जा कर ऋषि सुनक और कंजर्वेटिव पार्टी की नैया पार लगा पाएगा, इस में शक है. और फिर, फैसला वोटर को करना है जिस ने दुनियाभर में पिछले दस साल जम कर दक्षिणपंथ को हवा दी और अब घबरा कर उस से किनारा कर रहा है.

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में भी लड़ाई वामपंथ और दक्षिणपंथ की है जिस में हालफ़िलहाल कांटे की टक्कर है. मुमकिन है, भारत में कमजोर पड़ते दक्षिणपंथ का असर ब्रिटेन के वोटरों पर, थोड़ाबहुत ही सही, पड़ा हो और वही अमेरिका में भी देखने में आए लेकिन उस के लिए पहले 5 जुलाई और फिर नवंबर तक इंतजार करना पड़ेगा.

सर्वाइकल कैंसर से कैसे बचें?

सरल शब्दों में समझें तो अगर दुनिया के विकसित देशों में 100 में से एक महिला को जिंदगी में सर्वाइकल कैंसर होता है तो भारत में 53 महिलाओं में से एक को यह बीमारी होती है यानी भारतीय दृष्टिकोण में करीब आधे का फर्क है.

अन्य कारण

छोटी उम्र में संभोग करना.

एक से ज्यादा पार्टनर के साथ यौन संबंध बनाना.

ऐक्टिव और पैसिव स्मोकिंग.

लगातार गर्भनिरोधक दवाइयों का इस्तेमाल.

इम्यूनिटी कम होना.

भारतीय महिलाएं माहवारी से जुड़ी बातों पर आज भी खुल कर बात करने से बचती हैं. शायद इसलिए भारतीय महिलाओं में ब्रैस्ट कैंसर के बाद सर्वाइकल कैंसर दूसरा सब से आम कैंसर बन कर उभर रहा है. योनि से असामान्य रक्तस्राव और संभोग के बाद पैल्विक में दर्द जैसी समस्याओं से दोचार हो रही हैं, तो यह जानकारी आप के लिए ही है…

कैसे होता है

सर्विक्स गर्भाशय का भाग है, जिस में सर्वाइकल कैंसर ह्यूमन पैपीलोमा वायरस (एचपीवी) संक्रमण की वजह से होता है.

यह संक्रमण आमतौर पर यौन संबंधों के बाद होता है और इस बीमारी में असामान्य ढंग से कोशिकाएं बढ़ने लगती हैं.

इस वजह से योनि में खून आना, बंद होना और संबंधों के बाद खून आने जैसी समस्याएं हो जाती हैं.

लक्षण

आमतौर पर शुरुआत में इस के लक्षण उभर कर सामने नहीं आते, लेकिन अगर थोड़ी सी सावधानी बरती जाए तो इस के लक्षणों की पहचान की जा सकती है:

नियमित माहवारी के बीच रक्तस्राव होना, संभोग के बाद रक्तस्राव होना.

पानी जैसे बदबूदार पदार्थ का भारी डिस्चार्ज होना.

जब कैंसर के सैल्स फैलने लगते हैं तो पेट के निचले हिस्से में दर्द होने लगता है.

संभोग के दौरान पैल्विक में दर्द महसूस होना.

द्य असामान्य, भारी रक्तस्राव होना.

द्य वजन कम होना, थकान महसूस होना और एनीमिया की समस्या होना भी लक्षण हो सकते हैं.

कंट्रोल करने की वैक्सीन व टैस्ट

वैसे तो शुरुआत में सर्वाइकल कैंसर के लक्षण दिखाई नहीं देते लेकिन इसे रोकने के लिए वैक्सीन उपलब्ध है, जिस से तकरीबन 70 फीसदी तक बचा जा सकता है.

नियमित रूप से स्क्रीनिंग की जाए तो सर्वाइकल कैंसर के लक्षणों की पहचान की जा सकती है.

बीमारी की पहचान करने के लिए आमतौर पर पैप स्मीयर टैस्ट किया जाता है. इस टैस्ट में प्री कैंसर सैल्स की जांच की जाती है.

बीमारी की पहचान करने के लिए नई तकनीकों में लगातार विकास किया जा रहा है. इस में लिक्विड बेस्ड साइटोलोजी (एलबीसी) जांच बेहद कारगर साबित हुई है.

एलबीसी तकनीकों के ऐडवांस इस्तेमाल से सर्वाइकल कैंसर की जांच करने में सुधार आया है.

इलाज

अगर सर्वाइकल कैंसर का पता शुरुआती स्टेज में चल जाता है तो बचने की संभावना 85% तक होती है. वैसे सर्वाइकल कैंसर का इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि कैंसर किस स्टेज पर है. आमतौर पर सर्जरी के द्वारा गर्भाशय निकाल दिया जाता है और अगर बीमारी बिलकुल ऐडवांस स्टेज पर होती है तो कीमोथेरैपी या रेडियोथेरैपी भी दी जाती है.

बचाव है जरूरी

डाक्टर से सलाह ले कर ऐंटीसर्वाइकल कैंसर के टीके लगवाएं.

महिलाओं को खासतौर से व्यक्तिगत स्वच्छता का भी ध्यान रखना चाहिए, क्योंकि जननांगों की साफसफाई बहुत महत्त्वपूर्ण है.

माहवारी में अच्छी क्वालिटी का सैनेटरी नैपकिन इस्तेमाल करना चाहिए.

समय पर डाक्टर से संपर्क करना कैंसर के इलाज का सब से अहम कदम है, इसलिए शारीरिक बदलावों को नजरअंदाज न करें.

-डा. अंजलि मिश्रा,  लाइफलाइन लेबोरटरी

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