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धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता पाने का हक हर आश्रित को

धारा – 125 सिर्फ तलाक लेने वाली महिलाओं के लिए ही गुजारे भत्ते का इंतजाम नहीं करती, बल्कि यह निराश्रित मातापिता, जायजनाजायज या अनाथ बच्चों, छोटे भाईबहनों या बहुओं के लिए भी सम्मान से जीवन जीने लायक पूंजी दिलवाने का प्रावधान करती है. नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में ये प्रावधान धारा 144 में किया गया है.

 

10 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने एक तलाकशुदा स्त्री को गुजारा भत्ता देने के संबंध में फैसला सुनाते हुए उस के पति को प्रतिमाह 20 हजार रुपये गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया. मामला चूंकि मुसलिम धर्म से जुड़ा था, लिहाजा अखबारों और टीवी चैनलों पर खूब चला. भारतीय जनता पार्टी और उस के गोदी मीडिया ने तो दो कदम आगे बढ़ कर इसे तीन तलाक के मुद्दे के बाद मुसलिम महिलाओं की दूसरी जीत करार दिया. तमाम मुसलिम महिलाओं की बाइट टीवी पर दिखाई जाने लगी. जबकि सीआरपीसी की धारा – 125 के तहत किसी भी आश्रित के लिए गुजारा भत्ता पाने का यह कोई पहला मामला नहीं था. देश भर की अदालतों में हर दिन ऐसे सैकड़ों मामलों की सुनवाई होती है और आश्रितों के हक में अदालतों द्वारा ऐसे फैसले दिए जाते हैं. पर चूंकि यह मुसलिम समाज से जुड़ा मामला था इसलिए होहल्ला अधिक हुआ.

पत्नी, बच्चों, और मातापिता के भरणपोषण के लिए आदेश देने से जुड़ी दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125, साल 1973 में बनी और 1 अप्रैल, 1974 को लागू हुई. यह धारा खासतौर पर हिंदू महिलाओं की दुर्दशा को देखते हुए लागू की गयी थी. पति द्वारा त्याग दिए जाने पर, पति की मृत्यु हो जाने पर, बच्चों द्वारा प्रताड़ित किए जाने पर अधिकांश हिंदू औरतें नारकीय जीवन जीने के लिए बाध्य हो जाती थीं. उन्हें उस नारकीय जीवन से निकल कर सम्मानपूर्वक जीवन जीने का अधिकार मिले, इस सोच के तहत यह कानून बना.

आमतौर पर हिंदू विवाह विच्छेद के बाद महिलाओं की दूसरी शादी बहुत मुश्किल से होती है. पुराने समय में तो होती भी नहीं थी, यही वजह थी कि पति द्वारा त्याग दिए जाने पर वे वृन्दावन की राह पकड़ लेती थीं और वहां भिक्षा मांग कर अपना गुजरबसर करती थीं. वृन्दावन विधवाओं और निराश्रित हिंदू महिलाओं का इतना बड़ा स्थल इसीलिए बना क्योंकि महिलाओं के पास ना तो कोई आश्रय स्थल होता था और न ही अपने गुजरबसर करने लायक पूंजी होती थी. पति ने यदि त्याग दिया तो मायके वाले भी उस को नहीं अपनाते थे. हिंदू समाज ऐसी औरतों को बहुत नीच दृष्टि से देखता था. इस के विपरीत मुसलिम समाज में तलाक और दूसरा निकाह दोनों ही काफी आसान और जल्द होते थे. वे अपनी महिलाओं को बेसहारा नहीं छोड़ते थे और तलाक के 3 महीने बाद ही उस का दूसरा निकाह पढ़वा देते थे. यही वजह है कि मुसलिम महिलाओं के लिए वृन्दावन जैसी किसी व्यवस्था की जरूरत इस देश में कभी नहीं हुई. हिंदू महिलाओं की दुर्दशा को दृष्टिगत रखते हुए कानून के जानकारों ने धारा-125 लागू की और इस के जरिए महिलाओं को आत्मसम्मान के साथ जीवन यापन करने की राह हासिल हुई.

धारा-125 सिर्फ तलाक लेने वाली महिलाओं के लिए ही गुजारे भत्ते का इंतजाम नहीं करती, बल्कि यह निराश्रित मातापिता, जायज, नाजायज या अनाथ बच्चों, छोटे भाईबहनों या बहुओं के लिए भी सम्मान से जीवन जीने लायक पूंजी दिलवाने का प्रावधान करती है. नए कानून भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में ये प्रावधान धारा 144 में किया गया है.

ये धारा कहती है कि कोई भी पुरुष अलग होने की स्थिति में अपनी पत्नी, बच्चे और मातापिता को गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं कर सकता. इस में नाजायज लेकिन वैध बच्चों को भी शामिल किया गया है. धारा साफ करती है कि पत्नी, बच्चे और मातापिता अगर अपना खर्चा नहीं उठा सकते तो पुरुष को उन्हें हर महीने गुजारा भत्ता देना होगा. गुजारा भत्ता मजिस्ट्रेट तय करेंगे. पत्नी को गुजारा भत्ता तब तक मिलेगा जब तक महिला दोबारा शादी नहीं कर लेती.

ढेरों मामले

इस धारा में ये भी प्रावधान है कि अगर कोई पत्नी बिना किसी कारण के पति से अलग रहती है या किसी और पुरुष के साथ रहती है या फिर आपसी सहमति से अलग होती है तो वो गुजारा भत्ता पाने की हकदार नहीं होगी. वहीं अगर पत्नी की आय पति से अधिक है, या पति बेरोजगार है तो वह भी इस धारा के तहत पत्नी से गुजारा भत्ता पाने का हकदार हो सकता है. इस धारा के तहत, अगर कोई व्यक्ति पर्याप्त साधन संपन्न है, लेकिन भरणपोषण करने में उपेक्षा करता है या इनकार करता है, तो प्रभावित व्यक्ति मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन कर के भरणपोषण की मांग कर सकता है. मजिस्ट्रेट को भरणपोषण देने की उचित मासिक दर तय करने का अधिकार है. किसी भी धर्मजाति, सम्प्रदाय, भाषा का नागरिक इस धारा के तहत आवेदन कर सकता है. ऐसे सैकड़ों केस देशभर की अदालतों में आएदिन आते हैं.

हालिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले की इतनी चर्चा इसलिए हो रही है क्योंकि मुसलिम महिला पर 1986 का मुसलिम महिला (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) कानून भी लागू होता है. यह कानून 1986 में तब बना जब शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट ने धारा-125 के तहत उसे गुजारा भत्ता देने का प्रावधान किया. शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से देशभर में राजनीतिक माहौल गरमा गया था. मुसलिम धर्मगुरुओं और पर्सनल ला बोर्ड ने इस फैसले का पुरजोर विरोध किया था. जिस के चलते कांग्रेस पार्टी के हाथ से मुसलिम वोट के खिसकने का डर पैदा हो गया था, लिहाजा मई 1986 में मुसलिम कठमुल्लाओं के दबाव में तत्कालीन राजीव गांधी की सरकार ने मुसलिम महिला (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) कानून पास किया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया.

1986 के इस कानून की धारा 3 में तलाकशुदा मुसलिम महिला के गुजारा भत्ता का प्रावधान है. धारा 3 में लिखा है कि तलाकशुदा मुसलिम महिला को पूर्व पति से इद्दत की अवधि तक ही गुजारा भत्ता मिल सकता है. इद्दत की अवधि तीन महीने होती है. इसी धारा में ये भी लिखा है कि अगर तलाक से पहले या तलाक के बाद महिला अकेले बच्चे का पालनपोषण नहीं कर सकती तो उसे दो साल तक पूर्व पति से गुजारा भत्ता मिलेगा.

हालांकि, शाहबानो मामले में फैसले के दो साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने एक और फैसले में साफ किया था कि तलाकशुदा मुसलिम महिला इद्दत की अवधि के बाद भी पूर्व पति से तब तक गुजारा भत्ता पाने की हकदार है, जब तक वो दोबारा शादी नहीं कर लेती. शाहबानो इंदौर की रहने वाली थीं और उन के पति ने उन्हें तीन तलाक दे दिया था. तब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते हुए कहा था कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत शाहबानो अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता पाने की हकदार है.

इतना ही नहीं, 2001 में डेनियल लतीफी नाम के वकील ने 1986 की कानून की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस कानून की वैधता बरकरार रखते हुए साफ किया था कि 1986 का कानून सिर्फ इद्दत की अवधि तक ही गुजारा भत्ता देने तक सीमित नहीं है.

गौरतलब है कि इद्दत एक इस्लामी परंपरा है. इद्दत का पालन एक मुसलिम महिला को करना पड़ता है. पति से तलाक होने या उसकी मृत्यु होने पर मुसलिम महिला को इद्दत का पालन करना होता है.

इद्दत की अवधि के दौरान तलाकशुदा महिला के दोबारा शादी करने पर पाबंदी होती है. अगर किसी गर्भवती महिला का तलाक होता या वो विधवा होती है तो बच्चे के जन्म के साथ ही इद्दत की अवधि खत्म हो जाती है. पति की मृत्यु के बाद इद्दत की अवधि 4 महीने 10 दिन होती है, जबकि तलाक के बाद 3 महीने 10 दिन की इद्दत की जाती है.

1986 का कानून और धारा 125 दोनों ही देश में एक साथ चल रहे हैं. मुसलिम महिला अगर 1986 के कानून के तहत आवेदन नहीं करना चाहती है तो वह धारा 125 के तहत मुकदमा दर्ज कर गुजारे भत्ते की मांग कर सकती है. हालिया केस में यही हुआ है.

क्या है मामला

ये पूरा मामला शुरू होता है 15 नवंबर 2012 से. उस दिन तेलंगाना में एक मुसलिम महिला आगा ने अपने पति अब्दुल समद का घर छोड़ दिया. 2017 में महिला ने अपने पति के खिलाफ आईपीसी की धारा 498A और 406 के तहत दहेज़ उत्पीड़न, विश्वासघात और घरेलू हिंसा का केस दर्ज कराया. इस से नाराज हो कर पति ने महिला को तीन तलाक दे दिया. 28 सितंबर 2017 को दोनों को तलाक का सर्टिफिकेट जारी हो गया.

दावा है कि तलाक के बाद इद्दत की अवधि तक पति ने महिला को हर महीने 15 हजार रुपये का गुजारा भत्ता देने की पेशकश की. इद्दत की अवधि तीन महीने तक होती है. लेकिन महिला ने इसे लेने से इनकार कर दिया. इस के बजाय महिला ने फैमिली कोर्ट में याचिका दायर की और सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता देने की मांग की. 9 जून 2023 को फैमिली कोर्ट ने हर महीने 20 हजार रुपये का गुजारा भत्ता देने का आदेश पति को दिया.

फैमिली कोर्ट के फैसले को पति ने तेलंगाना हाईकोर्ट में चुनौती दी. 13 दिसंबर 2023 को हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. लेकिन हर्जाने की रकम 20 हजार से घटा कर 10 हजार रुपये कर दी.

अब्दुल समद ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उस ने दलील दी कि एक तलाकशुदा मुसलिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत याचिका दायर करने की हकदार नहीं है. मुसलिम महिला पर 1986 का मुसलिम महिला (तलाक पर अधिकार का संरक्षण) कानून लागू होता है. उस ने यह भी दलील दी 1986 का कानून मुसलिम महिलाओं के लिए ज्यादा फायदेमंद है. लेकिन वहां से भी उसे राहत नहीं मिली और मामला सुप्रीम कोर्ट में आ गया.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला

10 जुलाई 2024 को सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस औगस्टिन जौर्ज मसीह की बेंच ने 99 पन्नों का फैसला देते हुए कहा कि एक तलाकशुदा मुसलिम महिला भी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता पाने के लिए याचिका दायर करने की हकदार है.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ किया कि सीआरपीसी की धारा 125 सभी शादीशुदा महिलाओं पर लागू होती है, जिन में शादीशुदा मुसलिम महिलाएं भी शामिल हैं. अदालत ने ये भी कहा कि सीआरपीसी की धारा 125 सभी गैर-मुसलिम तलाकशुदा महिलाओं पर भी लागू होती है.

मुसलिम तलाक पर कोर्ट ने कहा –

– अगर किसी मुसलिम महिला की शादी या तलाक स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत होती है, तो भी उस पर धारा 125 लागू होगी.

– अगर मुसलिम महिला की शादी और तलाक मुसलिम कानून के तहत होता है तो उस पर धारा 125 के साथसाथ 1986 के कानून के प्रावधान भी लागू होंगे. तलाकशुदा मुसलिम महिलाओं के पास दोनों कानूनों में से किसी एक या दोनों के तहत गुजारा भत्ता पाने का विकल्प है.

– अगर 1986 के कानून के साथसाथ मुसलिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भी याचिका दायर करती है तो 1986 के कानून के प्रावधानों के तहत जारी हुए किसी भी आदेश पर सीआरपीसी की धारा 127(3)(b) के तहत विचार किया जा सकता है. इस का मतलब ये है कि अगर पर्सनल लॉ के तहत मुसलिम महिला को गुजारा भत्ता दिया गया है, तो धारा 127(3)(b) के तहत मजिस्ट्रेट उस आदेश पर विचार कर सकते हैं.

दोनों जजों का फैसला

1. जस्टिस मसीह – एक तलाकशुदा मुसलिम महिला को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता पाने के अधिकार का उपयोग करने से नहीं रोका जा सकता, बशर्ते वो सारी शर्तें पूरी करती हो. धारा 125 एक सेक्युलर प्रावधान है और 1986 के कानून की धारा 3 के बराबर ही है.

2. जस्टिस नागरत्ना – 1986 का कानून धारा 125 का विकल्प नहीं है और दोनों कानून तलाकशुदा मुसलिम महिलाओं के लिए हैं. अगर मुसलिम महिलाओं को धारा 125 से बाहर रखा जाता है तो संविधान के अनुच्छेद 15(1) का उल्लंघन होगा, जो सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है.

गौरतलब है कि तीन तलाक को सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2017 में असंवैधानिक घोषित कर दिया था. इस के बाद 2019 में मोदी सरकार ने कानून लाकर तीन तलाक को न सिर्फ असंवैधानिक किया, बल्कि इसे अपराध के दायरे में भी रखा.

जस्टिस नागरत्ना ने अपने फैसले में साफ किया है कि तीन तलाक के अवैध तरीके से भी किसी मुसलिम महिला को तलाक दिया जाता है तो वो भी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत हर्जाने का दावा कर सकती है.

उन्होंने कहा, तलाकशुदा मुसलिम महिला को सीआरपीसी की धारा 125 से बाहर नहीं रखा जा सकता है, भले ही उसे किसी भी कानून के तहत तलाक दिया गया हो. जिस का

लेखपाल ऋचा, PCS अधिकारी ज्योति ने पति को छोड़ा तो सोसाइटी जजमैंटल क्यों हो गया

कुछ घटनाओं में यह देखा गया कि कुछ पत्नियों ने कामयाब होते ही  पति का हाथ जोर से झटक दिया, पति का कसूर था कि वह  शिक्षा और ओहदे की दृष्टि से पत्नी के लायक नहीं रह गया था, इसके बाद सारा समाज जज बन गया और ऐसी महिलाओं को भलाबुरा कहने लगा, लेकिन क्या इस तरह के मामलों में औरतों को लेकर जजमैंटल होना जरूरी है 

 

घटनाएं जिसने बदलती महिलाओं की ओर समाज का ध्यान खींचा
जुलाई 2024 में,  कारपेंटर नीरज विश्वकर्मा ने झांसी के सदर तहसील में हाल में नियुक्त हुई पत्नी लेखपाल ऋचा पर गंभीर आरोप लगाया. नीरज का कहना था कि जिस पत्नी को मेहनतमजदूरी कर उसने पढ़ाया और लेखपाल बनाया, उसने नौकरी मिलते ही पति को छोड़ दिया.  ऋचा का कहना है कि उनकी शादी नहीं हुई है हालांकि इनकी 3 साल पहले हुई लव मैरिज शादी की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है.  इस मामले से पहले 2023 में भी इसी तरह का एक केस बहुत चर्चा में रहा. जब यूपी की PCS अफसर ज्योति मौर्या पर पति आलोक मौर्या ने ऐसा ही आरोप लगाया था. आलोक का आरोप था कि उसने पत्नी के एजुकेशन में मदद की और उसने एसडीएम बनते ही पति से मुंह मोड़ लिया, यहां तक कि किसी अन्य अधिकारी के साथ प्रेमसंबंध भी बनाया.
उन दिनों कई पतियों के वीडियो वायरल हुए, जिसमें वे कह रहे थे कि इन मामलों की वजह से वे पत्नी को आगे नहीं पढ़ाना चाहते हैं. उन्हीं दिनों पटना के मशहूर खान सर ने भी कहा था कि उनके BPSC बैच से 93 महिलाओं के पति ने अपनी पत्नियों के नाम कटवा दिए.

 

लड़कियों को लेकर समाज जजमैंटल क्यों
एक समय था दहेज के लिए लड़कियां जला दी जाती थी इस वजह से भ्रूण हत्याएं होने लगी. समय बदला साथ ही समाज भी, बेटियों की दशा और दिशा में शिक्षा के मामले में थोड़ा सुधार आया.  कम ही संख्या में सही लड़कियों ने बोर्ड परीक्षा से  लेकर आईएएस की परीक्षाओं में टौप करके दिखा दिया कि सोसाइटी ने जिस चिंगारी को हवा से बुझाने का काम किया, उसी हवा का औक्सीजन ले कर चिंगारी, मशाल बन गई और दहकने लगी है.  कई बार यह मशाल अंधेरे में रास्ता दिखाने का काम करती है, तो कई बार इसका इस्तेमाल जलाने के लिए भी किया जाता है.  आज ऋचा और ज्योति जैसे ऐसे कई मामले आ रहे हैं, जिसमें लड़की की शिक्षा रूपी मशाल ने अपने ही आशियाने में आग लगाने का काम किया है, लेकिन क्या वाकई इसके लिए लड़कियां जिम्मेदार है या वो समाज जिसने उसे ऐसा करने पर विवश कर दिया? 

 

 

न नजरअंदाज किए जाने वाले कारण
National Crime Record Bureau के डेटा को देखें, तो दहेज निषेध अधिनियम 1961 के तहत साल 2022 में करीब 13,479 मामले दर्ज किए गए जबकि उसी साल दहेज से होने वाली मौतों की संख्या 6,450 रही.   NCRB के आंकड़ों में इस बात का भी जिक्र था कि दहेज से होने वाली मौतों में 4.5 % की और रजिस्टर्ड केसेज की संख्या में  0.6% की कमी आई है यह हाल तो साल 2022 का है. जरा सोचिए, 70, 80 और 90 के दशक में ऐसे मामलों का क्या हाल रहा होगा.  भले ही दहेज के मामलों में कमी पौजिटिव चेंज की तरह दिख रहा है लेकिन NCRB की रिपोर्ट में दिए गए इस डेटा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि 2020 की तुलना में 2021 में महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों की संख्या 56. 5% से बढ़कर 64.5 % हो गई. ‘क्राइम इन इंडिया 2022’ की रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ सबसे अधिक अपराध उसके पति या रिश्तेदारों के क्रूरता के थे, जो करीब 31. 2% है. जब घर के अंदर सबसे ज्यादा पीड़ा पहुंचाई जा रही है, तो सबसे पहला प्रतिकार तो वहीं दिखेगा, जो पतियों को छोड़ने वाली महिलाओं के रूप में सामने आ रहा है. ऋचा विश्वकर्मा ने अपने मामले में कहा भी कि उसका पति नीरज उसे शराब पीकर मारता पीटता था. 

 

गिरेबान में झांककर देखें

  महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में दहेज तो बस एक मामला भर है और भी कई ऐसे अपराध है जिसने महिलाओं को अपने हित के बारे में सोचने को मजबूर कर दिया .  समाज उनको स्वार्थी कह सकता है लेकिन यही समाज उनके साथ बलात्कार, भ्रूण हत्या, किडनैपिंग, घरेलू हिंसा, शील भंग करने के प्रयास से हिंसा जैसे मामलों को अंजाम देता रहा है . आखिर इन चीखों को कब तक दबाया जा सकता था, ऋचा, ज्योति मौर्या जैसे मामले उसी बैड एक्शन के रिएक्शन के रूप में उभरी है.  लेकिन सम्मानित पदों पर बैठनेवाली ऐसी महिलाओं की संख्या काफी  कम है . ज्यादातर तो हर परिस्थिति में घर की चाहरदीवारी में ही रंगीन चमकदार साड़ियों में सजधज कर सुखद दांपत्य का दिखावा करती रहती हैं, जबकि उन्हीं साड़ियों की तहों के नीचे बदन पर नीले दाग के निशान होते हैं .      

समाज के रूढ़िवादी और हिंसात्मक तौरतरीके का प्रतिकार पढ़ीलिखी महिलाओं का पति का साथ छोड़ने तक ही सीमित नहीं है . महिलाओं के प्रतिकार के कई रूप होते हैं सूरजपाल, रामरहीम, आशाराम बाबू  जैसे ढोंगियों की ड्योढ़ी पर मत्था टेकनेवाली महिलाएं भी इसमें शामिल है . घर और समाज में दुत्कार मिलने पर बाबाओं का सहारा इनको रास आता है . पर अफसोस कि यहां से फिर उनके शोषण का दौर शुरू होता है . 

उच्च तबका और पीड़ित शरीर पर ग्लैमर का मलहम

अफसोस की बात तो यह है कि समाज के उच्च तबके की हाइअली एजुकेटेड महिलाएं भी बाबाओं से दूर नहीं है, बस किसी का बाबा गेरुआ पहना है, तो किसी का सफेद, किसी का बाबा गांव की बोली बोलता है, किसी की फ्लूएंट इंग्लिश . हाईअर सोसायटी में डोमेस्टिक वाैयलेंस के मामले सामने नहीं आ पाते क्योंकि वहां पीड़ित महिला यह स्वीकार कर चुकी होती है कि पति के घर से निकलने के बाद वह तमाम तरह की सुविधाओं से वंचित हो जाएगी . इन्हें लंबी कार में घूमने, महंगे रेस्तरां में खाने, फाइवस्टार होटल में पार्टियां करने, डिजाइनर ड्रेसेज पहनने की लत लग चुकी होती है, डिवोर्स मांगने पर इनके हाथ से ये सारे भत्ते उसी तरह स्लिप कर जाएंगे जैसे बरसात में चिकनी मिट्टी पर पैर फिसल जाते हैा और चोट भी जबरदस्त आती है इसलिए वह पीड़ित होने का उपचार तलाशती है, जो बाबाओं की शरण में जाकर खत्म होता है .
 द डेली बीस्ट को दिए इंटरव्यू में साइकोथेरैपिस्ट सुजैन वीट्जमैन ने ऐसे मामलों के लिए अपस्केल अब्यूज का शब्द इस्तेमाल किया.  Not To People Like Us Hidden Abuse In Upscale Marriage विषय पर अपने  शोध में उन्होंने अपर मिडिल क्लास की ऐसी शादीशुदा महिलाओं से बात की, जो काफी पढ़ीलिखी थी, अच्छे खानदान से थी और अमीर घरानों में ब्याही गई थीं. इन्होंने हिंसक पार्टनर की बात को एक सिरे से नकार दिया क्योंकि ऐसे मामले को जाहिर करने को वह शर्मिंदगी मानती हैं. जब यूएस के शिकागो का यह हाल है, तो इंडिया के बिहार, यूपी का क्या कहे

महलों में रहने वाली सीता और द्रौपदी भी तो 

अब  लड़कियों ने प्रतिकार करना शुरू कर दिया है, तो समाज बहुत कसमसा रहा है, पुरुषवादी सोच यह कैसे बरदाश्त करेगा कि औरत ने मर्द को छोड़ दिया जबकि छोड़ी जानी वाली चीज तो महिला रही है. जब सीता और द्रौपदी जैसी राजकुमारियों को छोड़ा या छेड़ा गया , तो सामान्य घरों की युवतियों का पतियों का तिरस्कार कर देनेवाली बात कैसे हजम होगी.  कभी शादी के इश्तेहारों में सांवले लड़के भी मिल्की वाइट लड़की की मांग करते थे आज उन्हीं लड़कियों ने इन लड़कों को झटक दिया, तो पूरा समाज दर्द से कराह रहा है.  लड़की को धोखेबाज बता रहा है, उसके कैरेक्टर को कटघरे में खड़ा कर रहा है, क्यों ? 

 

धर्म का ठेला

मैंने बहुत से कारोबार किए, पर कामयाब न हुआ. थकाहारा मैं एक ग्राहक के लिए एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम गोभी तोल रहा था कि एकाएक कहीं से प्रकट हुए बाबा ने मुझ से पूछा, ‘‘सब्जी के ठेले पर एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम तोल कर अपना यह लोक तो छोड़ो, परलोक तक क्यों खराब कर रहे हो कामपाल?’’

मैं ने उन के पैरों में गिर कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘मैं कामपाल? मैं तो… प्रभु, और क्या करूं? अगर मैं एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम न तोलूं, तो शाम को कमेटी वालों को, इस इलाके के हवलदार को, इनकम टैक्स वाले अफसर को 4-4 किलो मुफ्त सब्जी कहां से दूंगा? अगर न दूंगा, तो कल यहां ठेला कौन लगाने देगा?

‘‘बाबा, अपना तो नसीब ही ऐसा है कि जब भी सिर मुंड़वाने बैठता हूं, तो साफ मौसम में भी पता नहीं कहां से ओले पड़ने लगते हैं.

‘‘जवानी में पहली दफा प्यार के चक्कर में सिर मुंड़वाने बैठा ही था कि शादी कर के वह मेरे गले पड़ गई. और फिर कमबख्त आज तक पता ही नहीं चल पाया कि प्यार किस बला का

नाम है.

‘‘अब आप ही बताइए कि ऐसे में मैं एक किलो के बदले साढ़े 7 सौ ग्राम न तोलूं, तो और क्या करूं?’’

‘‘तो सुनो कामपाल, अब तुम्हारे शक्तिवर्धक कैप्सूल खाने के दिन आ गए हैं. कल से तुम्हें यह देश कामपाल के नाम से जानेगा. बाबा का हुक्म है कि कल से तुम सब्जी का पंचर टायरों वाला ठेला लगाना बंद कर के धर्म का ठेला लगाओ.’’

‘‘धर्म ठेले पर भी बिकता है क्या बाबा? मैं ने तो आज तक धर्म के मौल ही देखे हैं. ऐसे में ठेले पर कौन मुझ से धर्म खरीदने आएगा? ऐसा न हो कि मैं दो वक्त की रोटी से भी जाता रहूं.’’

बाबा मेरी अक्ल पर गुस्सा होते हुए बोले, ‘‘मूर्ख, लगता है कि बीवी ने तुम्हारे दिमाग को चाटचाट कर साफ कर दिया है. इस देश में जितना धर्म बिकता है, उतना और कोई माल नहीं बिकता. धर्म के खरीदार यहां हर तबके के लोग हैं. जिन लोगों के पास आटादाल खरीदने तक को पैसे नहीं हैं, वे भी आटेदाल की परवाह किए बिना धर्म जरूर खरीदते हैं.

‘‘रही बात ठेले पर धर्म बेचने की, तो आज धर्म के जितने भी मौल सजे देख रहे हो न, सब ने ठेले से ही धर्म बेचना शुरू किया था. यह धंधा वह धंधा है, जो दिन दूनी रात सौ गुनी तरक्की करता है. जिस ने भी यह धंधा किया है, वह गंगू तेली से राजा भोज हो गया है.

‘‘मेरा तुझे आदेश है कि जनता में धर्म की स्थापना के लिए तू भी धर्म का ठेला लगा और ठेले से मौल तक पहुंच कर करोड़पति हो जा.’’

‘‘पर बाबा, मेरे पास तो सब्जी बेचने की ही पुश्तैनी कला है. ऐसे में मैं धर्म को कैसे बेच पाऊंगा? सड़ी सब्जी की गंध मेरी नसनस में बस चुकी है,’’ मैं ने अपने भीतर का दर्द कहा.

बाबा मेरी पीठ थपथपाते हुए बोले, ‘‘धर्म बेचना सब्जी बेचने से कहीं ज्यादा आसान है. न तराजू, न बट्टे. न लंगोट, न कच्छे. न तेल लगा कर चमकाई गई सड़ी शिमला मिर्च, न ग्रीस मले मुरझाए भुट्टे. कोशिश कर के तो देख. इस धंधे में न गला फाड़ने की जरूरत, न सड़ी बंदगोभी को ताजा बनाए रखने के लिए उस के सड़े पत्ते उखाड़ने की.’’

बाबा की बातों से हैरानपरेशान हो कर मैं गश खा कर गिरतेगिरते बचा. मैं ने टूटी तराजू और सील निकाले बट्टों को परे फेंकते हुए पूछा, ‘‘पर बाबा…’’

‘‘जानता हूं. तुम बरवाला वाले का केस देख कर डर रहे हो. पर बेटा, चांदनी चौक की एक दुकान बंद होने का मतलब पूरे चांदनी चौक का बाजार बंद होना तो नहीं? गरीबी की सौ बरस की जिंदगी से अच्छे हैं मौल के 2-4 दिन. घोर कलियुग है, घोर कलियुग. अब धर्म का झंडा उठाने वालों के साथ यहां ऐसा ही होगा, पर तुम डरना मत.’’

‘‘पर बाबा…’’

‘‘पर क्या… सब्जी का ठेला छोड़ कर कल से धर्म का ठेला लगा और चंद दिनों में ही इसरो से भी कम लागत में चांद पर पहुंच जा,’’ इतना कह कर बाबा अंतर्ध्यान हो गए.

मुझे बाबा की बात जंच गई. लिहाजा, शाम को ठेले की बची सब्जी के भरभर झोले कमेटी वालों को, इलाके के हवलदार को, इनकम टैक्स वाले अफसर को दे कर घर पर ही धर्म का ठेला लगाने की बात पत्नी से की, तो 10-20 दिन न नहाने वाली बीवी खोली में ही स्विमिंग पूल में तैरने के सपने लेने लगी.

खुले में शौच जाने वाली मेरी आंखों के सामने एयरकंडीशंड वाशरूम सज उठा. इधरउधर से गत्ते की पेटियां चुन कर लाने वाली मेरी बीवी की आंखों के आगे मौड्यूलर किचन नाचने लगा. देखते ही देखते मैं ने देखा कि जैसे मैं नामीगिरामी बाबा हो गया हूं.

कुछ भी बकने के लिए मेरे भक्तों ने मेरे लिए सोने का सिंहासन बनवा दिया है. भक्त मेरी बकवास सुनने को बेचैन हैं.

मेरे पास स्वर्ग तक जाने के लिए लिफ्ट मौजूद है. भीतर ही भीतर आई फील दैट स्वर्ग के देवता तक मुझ से चिढ़ने लगे हैं.

हजारों की तादाद में मेरे दिमाग और बिना दिमाग वाले भक्त हैं. घर के खाली दालचावल के डब्बों में सोने के गहने, हीरेजवाहिरात भरे पड़े हैं. कल तक जिन्हें मैं हफ्ता दिया करता था, वे सब मेरे पैरों में ‘डेली’ चढ़ाने आ रहे हैं.

 

हकीम साहब का इलाज

रोशन अली जब 45 साल का था, तब उस की पहली बीवी की मौत हो गई थी. इस के बाद उस ने 23 साला फातिमा के साथ दूसरा निकाह कर लिया था.

फातिमा का रंग गोरा था. उस का कमसिन बदन हर किसी की निगाह में चढ़ गया था, पर वह किसी को भी घास नहीं डालती थी. रोशन अली की ढलती उम्र व कड़ी मेहनतमजदूरी करने के चलते उस का शरीर भी ठंडा पड़ गया था. वह फातिमा को खुश नहीं कर पा रहा था, जिस के चलते वह हमबिस्तर होने से कतराती थी. इसी तनाव के चलते वह टीबीके मरीज की तरह खांसती रहती थी.उस का मन घर के कामों में भी नहीं लगता था.

रोशन अली ने फातिमा का खूब इलाज कराया, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ, क्योंकि फातिमा की बीमारी तो जिस्मानी तौर पर असंतुष्टि थी.

एक दिन रोशन अली ने गांव के तालाब के पास एक हकीम साहब का कैंप लगा देखा. उन की उम्र तकरीबन 30 साल थी. उन का दावा था कि वे हर तरह की बीमारी का शर्तिया इलाज करते थे. हिमालय की जड़ीबूटियों से तैयार की गई दवाएं लेने से 7 दिन में बीमारी से छुटकारा मिल जाता था, ऐसा हकीम साहब का कहना था.

रोशन अली फातिमा को ले कर उन के कैंप में गया और बीमारी का हाल सुनाया. हकीम असलम एकबारगी फातिमा को देख कर दंग रह गए. उस की जवानी, गोरे बलखाते बदन को देख कर उन की लार टपक गई.फातिमा भी हकीम साहब की जवानी देख कर मुसकरा उठी और वह ललचाई नजरों के साथ जमीन कुरेदने लगी.

हकीम ने उस की नब्ज देखने के बहाने हाथ से हाथ मिला कर कहा, ‘‘रोशन साहब, आप रात को 8 बजे इन्हें दोबारा यहां लाएं, ताकि फुरसत में पूरी तसल्ली से इन के शरीर की जांच की जा सके.’’

रोशन अली फातिमा को रात 8 बजे हकीम के कैंप में दोबारा ले गया. उसे बाहर इंतजार करने को कहा गया.हकीम साहब ने रोशन अली से दवाओं और सलाह के 5 सौ रुपए एडवांस में ले लिए.

रोशन अली ने देखा कि फातिमा के इलाज में ज्यादा समय लगेगा, इसलिए वह खाना खाने घर चला गया. इधर हकीम साहब ने फातिमा का हाथ पकड़ कर एक टेबल पर लिटा दिया और उसे नशे की गोलियां दे दीं, जिस से वह नशे की हालत में अंगड़ाइयां लेने लगी.

हकीम साहब ने अपना स्टैस्थोस्कोप निकाल कर कान में लगाया और फातिमा के ब्लाउज के बटन खोल कर उस के उभारों को सहलाना शुरू कर दिया. फातिमा नशे में चूर मुसकरा रही थी और मजा ले रही थी. इस तरह कुछ देर में दोनों में जोश जाग गया और टेबल पर ही वे एक हो गए. जब वे दोनों संतुष्ट हो गए, तो अलग हो गए.

हकीम साहब ने कहा, ‘‘7 दिन तक आती रहना. तुझे पूरी तरह संतुष्ट कर दूंगा और औलाद भी दे दूंगा.’’ फातिमा तो यही चाहती थी.

थोड़ी देर में रोशन अली भी आ गया. हकीम साहब ने दवा की पुडि़या पकड़ाते हुए कहा, ‘‘इन्हें 7 दिनों तक मेरे कैंप में ले कर आते रहना, जिस से इन की बीमारी का पूरा इलाज हो जाए.’’ इस तरह हकीम साहब ने 7 दिनों तक फातिमा को भोगा.

इस बीच हकीम साहब की करतूतों की कहानी कई गांवों में भी फैल चुकी थी, इसलिए कुछ गांव वाले एक सिपाही को ले कर उन के कैंप पर आ धमके.

छानबीन में जाली दस्तावेज, लाइसैंस, फोटो, गर्भ निरोधक वगैरह मिले. पूछताछ में हकीम ने सब सच उगल दिया और उन्हें जेल भेज कर मुकदमा दायर कर दिया गया. उन की चुपड़ी और 2-2 की पोल खुल गई.

लेकिन रोशन अली अब खुश है, क्योंकि फातिमा उस का बिस्तर पर बढ़चढ़ कर साथ देती है. जब उस ने बताया कि वह पेट से है, तो रोशन अली ने पूरे महल्ले में मिठाई बांटी.

सब ने मिठाई तो खाई, पर ज्यादातर लोग जानते थे कि असलियत क्या है, क्योंकि गांवों के कई घरों में बुजुर्ग होते मर्दों की बीवियों को अचानक उलटियां होने लगी थीं.

वैवाहिक विज्ञापन : व्हाट्सऐप और फेसबुक फैन है बेटी

मेरी 25 वर्षीय बेटी कौन्वैंट एजुकेटेड डिगरीधारी है. एक एमएनसी यानी मल्टीनैशनल कंपनी के मैनेजिंग डायरैक्टर की पर्सनल सैक्रेटरी है. उस का सालाना पैकेज 15 लाख रुपए है. रंग गोरा, सुडौल, कदकाठी आकर्षक नयननक्श, कद 5 फुट 5 इंच के लिए गृहकार्य में दक्ष, सरकारी नौकरी करने वाला (प्राइवेट नौकरी वाले कृपया क्षमा करें), पढ़ालिखा, आधुनिक विचारों वाला, सहनशील, गौरवर्ण और कम से कम 5 फुट 9 इंच कद वाला आज्ञाकारी वर चाहिए. जो निम्न शर्तें पूरी करता हो वही संपर्क करें :

•     मेरी बेटी को देररात तक अपने पसंदीदा सीरियल देखने की आदत है. उसे ऐसा करने से रोका न जाए. रविवार या छुट्टी के दिन उसे जीभर कर सोने दिया जाए और उसे डिस्टर्ब न किया जाए.

•     पति स्वयं सुबह की गरमागरम चाय बनाने के बाद ही उसे जगाए.

•     जब वह निवृत्त हो कर बाथरूम से डैसिंगरूम में जाए तो डायनिंग टेबल पर  नाश्ता सर्व करना शुरू कर दिया जाए.

•     नाश्ता करने के बाद औफिस जाते समय उसे लंचबौक्स तैयार मिलना चाहिए.

     औफिस में बहुत काम होते हैं, इसलिए वापसी में देर होने पर पूछताछ न की जाए.

•     उस का वेतन उस का अपना है, उस पर किसी तरह का अधिकार न जमाया जाए. साथ ही, पति अपना पूरा वेतन उस के हाथ में ला कर देगा क्योंकि पति के वेतन पर पत्नी का ही अधिकार होता है, अन्य किसी का नहीं.

•     हमारी लाड़ली बेटी को खाना बनाना नहीं आता है, इसलिए वह खाना नहीं बनाएगी. उसे खाना बनाने की कला सिखाने के लिए भी बाध्य न किया जाए. वहीं, यह ध्यान रखें कि घर में खाना उसी की पसंद का बनाया जाए.

•     साफसफाई का घर में पूरा ध्यान रखा जाए क्योंकि उसे गंदगी से सख्त नफरत है.

•     उस का बाथरूम कोई अन्य इस्तेमाल न करे. यदि प्रयोग किया है तो उसे पूरी तरह वायपर से रगड़ कर और पोंछा लगा कर साफ किया जाए.

•     हमारी बेटी व्हाट्सऐप और फेसबुक की फैन है. फोन पर व्यस्त रहते समय उसे बिलकुल भी डिस्टर्ब न किया जाए. उस की स्किल के कारण ही सैकड़ों लोग फ्रैंडरिक्वैस्ट भेज रहे हैं और उस की मित्रता पाने को तरस रहे हैं.

•     भूल कर भी उस के मोबाइल फोन को कोई हाथ न लगाए वरना दुष्परिणाम भुगतने के लिए परिवार को ही जिम्मेदार ठहराया जाएगा.

•     वह जो भी सूट या साड़ी पसंद करे उसे पति ही खरीद कर देगा. कोई नानुकुर सहन नहीं होगी.

•     जब भी कभी वह बच्चे को जन्म देगी तो बच्चे के लालनपालन की जिम्मेदारी बच्चे के पिता की ही होगी, मसलन नहलाना, डायपर्स बदलना, कपड़े पहनाना, दूध पिलाना, झूले पर झुलाना आदि. रात के समय बच्चे के रोने के कारण यदि उस की नींद डिस्टर्ब होगी तो इस के लिए सीधेसीधे बच्चे का पिता जिम्मेदार होगा और उसे ही कोपभाजन का शिकार होना पड़ेगा.

•     सास या ननद को उस की निजी जिंदगी में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं होगा.

•     परिवार के किसी भी सदस्य को उस से जिरह करने और किसी तरह का ताना देने का हक नहीं होगा.

शेष शर्तें लड़का पसंद आने पर बता दी जाएंगी.

नोट : हम ने अपनी बेटी को राजकुमारी की तरह पाला है और साथ ही, आधुनिक संस्कार भी दिए हैं. हम दावा तो नहीं करते लेकिन वादा जरूर करते हैं कि यह जिस घर में भी जाएगी वह परिवार ऐसी संस्कारवान वधू पा कर धन्य हो जाएगा.

धोखेबाज लड़की : आशिकमिजाज बापबेटे

सेठ मंगतराम अपने दफ्तर में बैठे फाइलों में खोए हुए थे, तभी फोन की घंटी बजने से उन का ध्यान टूट गया. फोन उन के सैक्रेटरी का था. उस ने बताया कि अनीता नाम की एक औरत आप से मिलना चाहती है. वह अपनेआप को दफ्तर के स्टाफ रह चुके रमेश की विधवा बताती है. सेठ मंगतराम ने कुछ पल सोच कर कहा, ‘‘उसे अंदर भेज दो.’’

सैक्रेटरी ने अनीता को सेठ के केबिन में भेज दिया. सेठ मंगतरात अपने काम में बिजी थे कि तभी एक मीठी सी आवाज से वे चौंक पड़े. दरवाजे पर अनीता खड़ी थी. उस ने अंदर आने की इजाजत मांगी. सेठ उसे भौंचक देखते रह गए.

अनीता की न केवल आवाज मीठी थी, बल्कि उस की कदकाठी, रंगरूप, सलीका सभी अव्वल दर्जे का था. सेठ मंगतराम ने अनीता को बैठने को कहा और आने की वजह पूछी. अनीता ने उदास सूरत बना कर कहा, ‘‘मेरे पति आप की कंपनी में काम करते थे. मैं उन की विधवा हूं. मेरी रोजीरोटी का कोई ठिकाना नहीं है. अगर कुछ काम मिल जाए, तो आप की मेहरबानी होगी.’’

सेठ मंगतराम ने साफ मना कर दिया. अनीता मिन्नतें करने लगी कि वह कोई भी काम कर लेगी. सेठ ने पूछा, ‘‘कहां तक पढ़ी हो?’’

यह सुन कर अनीता ने अपना सिर झुका लिया. सेठ मंगतराम ने कहा, ‘‘मेरा काम सर्राफ का है, जिस में हर रोज करोड़ों रुपए का लेनदेन होता है. मैं यह नहीं समझ पा रहा हूं कि तुम्हें कहां काम दूं? खैर, तुम कल आना. मैं कोई न कोई इंतजाम कर दूंगा.’’

अनीता दूसरे दिन सेठ मंगतराम के दफ्तर में आई, तो और ज्यादा कहर बरपा रही थी. सभी उसे ही देख रहे थे. सेठ भी उसे देखते रह गए. अनीता को सेठ मंगतराम ने रिसैप्शनिस्ट की नौकरी दे दी और उसे मौडर्न ड्रैस पहनने को कहा.

अनीता अगले दिन से ही मिनी स्कर्ट, टीशर्ट, जींस और खुले बालों में आने लगी. देखते ही देखते वह दफ्तर में छा गई. अनीता ने अपनी अदाओं और बरताव से जल्दी ही सेठ मंगतराम का दिल जीत लिया. उस का ज्यादातर समय सेठ के साथ ही गुजरने लगा और कब दोनों की नजदीकियां जिस्मानी रिश्ते में बदल गईं, पता नहीं चला.

अनीता तरक्की की सीढि़यां चढ़ने लगी. कुछ ही समय में वह सेठ मंगतराम के कई राज भी जान गई थी. वह सेठ के साथ शहर से बाहर भी जाने लगी थी. सेठ मंगतराम का एक बेटा था. उस का नाम राजीव था. वह अमेरिका में ज्वैलरी डिजाइन का कोर्स कर रहा था. अब वह भारत लौट रहा था.

सेठ मंगतराम ने अनीता से कहा, ‘‘आज मेरी एक जरूरी मीटिंग है, इसलिए तुम मेरे बेटे राजीव को लेने एयरपोर्ट चली जाओ.’’ अनीता जल्दी ही एयरपोर्ट पहुंची, पर उस ने राजीव को कभी देखा नहीं था, इसलिए वह एक तख्ती ले कर रिसैप्शन काउंटर पर जा कर खड़ी हो गई.

राजीव उस तख्ती को देख कर अनीता के पास पहुंचा और अपना परिचय दिया. अनीता ने उस का स्वागत किया और अपना परिचय दिया. उस ने राजीव का सामान गाड़ी में रखवाया और उस के साथ घर चल दी.

राजीव खुद बड़ा स्मार्ट था. वह भी अनीता की खूबसूरती से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका. अनीता का भी यही हालेदिल था. घर पहुंच कर राजीव ने अनीता से कल दफ्तर में मुलाकात होने की बात कही.

अगले दिन राजीव दफ्तर पहुंचा, तो सारे स्टाफ ने उसे घेर लिया. राजीव भी उन से गर्मजोशी से मिल रहा था, पर उस की आंखें तो किसी और को खोज रही थीं, लेकिन वह कहीं दिख नहीं रही थी. राजीव बुझे मन से अपने केबिन में चला गया, तभी उसे एक झटका सा लगा.

अनीता राजीव के केबिन में ही थी. वह अनीता से न केवल गर्मजोशी से मिला, बल्कि उस के गालों को चूम भी लिया. आज भी अनीता गजब की लग रही थी. उस ने राजीव के चूमने का बुरा नहीं माना. इसी बीच राजीव के पिता सेठ मंगतराम वहां आ गए. उन्होंने अनीता से कहा, ‘‘तुम मेरे बेटे को कंपनी के बारे में सारी जानकारी दे दो.’’

अनीता ने ‘हां’ में जवाब दिया. मंगतराम ने आगे कहा, ‘‘अनीता, आज से मैं तुम्हारी टेबल भी राजीव के केबिन में लगवा देता हूं, ताकि राजीव को कोई दिक्कत न हो.’’

इस तरह अनीता का अब ज्यादातर समय राजीव के साथ ही गुजरने लगा. इस वजह से उन दोनों के बीच नजदीकियां भी बढ़ने लगीं. आखिरकार एक दिन राजीव ने ही पहल कर दी और बोला, ‘‘अनीता, मैं तुम से प्यार करने लगा हूं. क्या हम एक नहीं हो सकते?’’

अनीता यह सुन कर मन ही मन बहुत खुश हुई, पर जाहिर नहीं किया. कुछ देर चुप रहने के बाद वह बोली, ‘‘राजीव, तुम शायद मेरी हकीकत नहीं जानते हो. मैं एक विधवा हूं और तुम से उम्र में भी 4-5 साल बड़ी हूं. यह कैसे मुमकिन है.’’ राजीव ने कहा, ‘‘मैं ऐसी बातों को नहीं मानता. मैं अपने दिल की बात सुनता हूं. मैं तुम्हें चाहता हूं…’’ इतना कह कर राजीव अचानक उठा और अनीता को अपनी बांहों में भर लिया. अनीता ने भी अपनी रजामंदी दे दी.

राजीव और अनीता अब खूब मस्ती करते थे. बाहर खुल कर, दफ्तर में छिप कर. राजीव अनीता पर बड़ा भरोसा करने लगा था. उस ने भी अनीता को अपना राजदार बना लिया था. इस तरह कुछ ही दिनों में अनीता ने कंपनी के मालिक और उस के बेटे को अपनी मुट्ठी में कर लिया. अनीता ने अपने जिस्म का पासा ऐसा फेंका, जिस में बापबेटे दोनों उलझ गए.

अनीता ने सेठ मंगतराम के घर पर भी अपना सिक्का जमा लिया था. उस ने सेठजी की पत्नी व नौकरों पर भी अपना जादू चला दिया. वह अपने हुस्न के साथसाथ अपनी जबान का भी जादू चलाती थी. एक दिन राजीव ने अनीता से कहा, ‘‘मैं तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

अनीता बोली, ‘‘मैं भी तुम्हें पसंद करती हूं, पर सेठजी ने तो तुम्हारे लिए किसी अमीर घराने की लड़की पसंद की है. वे हमारी शादी नहीं होने देंगे.’’ राजीव बोला, ‘‘हम भाग कर शादी कर लेंगे.’’

अनीता ने जवाब दिया, ‘‘भाग कर हम कहां जाएंगे? कहां रहेंगे? क्या खाएंगे? सेठजी शायद तुम्हें अपनी जायदाद से भी बेदखल कर दें.’’ अनीता की बातें सुन कर राजीव चौंक पड़ा. वह सोचने लगा, ‘क्या पिताजी इस हद तक नीचे गिर सकते हैं?’

अनीता ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मैं पिछले 2 साल से सेठजी के साथ हूं. जहां तक मैं जान पाई हूं, सेठजी को अपनी दौलत और समाज में इज्जत बहुत प्यारी है. क्यों न ऐसा तरीका निकाला जाए कि सेठजी जायदाद से बेदखल न कर पाएं.’’ राजीव ने पूछा, ‘‘वह कैसे?’’

अनीता ने बताया, ‘‘क्यों न सेठजी के दस्तखत किसी तरह जायदाद के कागजात पर करा लिए जाएं?’’ राजीव बोला, ‘‘यह कैसे मुमकिन है? पिताजी कागजात नहीं पढ़ेंगे क्या?’’

अनीता बोली, ‘‘सेठजी मुझ पर काफी भरोसा करते हैं. दस्तखत कराने की जिम्मेदारी मेरी है.’’ कुछ दिनों के बाद अनीता सेठजी के केबिन में पहुंची, तो उन्होंने पूछा, ‘‘बड़े दिन बाद आई हो? क्या तुम्हें मेरी याद नहीं आई?’’

अनीता ने कहा, ‘‘दफ्तर में काफी काम था. आज भी मैं आप के पास काम से ही आई हूं. कुछ जरूरी फाइलों पर आप के दस्तखत लेने हैं.’’ सेठ मंगतराम बुझे मन से बिना पढ़े ही फाइलों पर दस्तखत करने लगे. अनीता ने जायदाद वाली फाइल पर भी उन से दस्तखत करा लिए.

सेठजी ने अनीता से कहा, ‘‘कुछ देर बैठ भी जाओ मेरी जान,’’ फिर उस से पूछा, ‘‘सुना है कि तुम मेरे बेटे से शादी करना चाहती हो?’’ यह सुन कर अनीता चौंक पड़ी, पर कुछ नहीं बोली.

सेठजी ने बताया, ‘‘राजीव की शादी एक रईस घराने में तय कर दी गई है. तुम रास्ते से हट जाओ.’’ अनीता ने कहा, ‘‘सेठजी, मैं अपनी सीमा जानती हूं. मैं ऐसा कोई काम नहीं करूंगी, जिस से मैं आप की नजरों में गिर जाऊं.’’

वैसे, अनीता ने एक शक का बीज यह कह कर बो दिया कि शायद राजीव ने विदेश में किसी गोरी मेम से शादी कर रखी है. सेठजी अनीता की बातों से चौंक पड़े. यह उन के लिए नई जानकारी थी. उन्होंने अनीता को राजीव से जुड़ी हर बात की जानकारी देने को कहा.

अनीता ने अपनी दस्तखत कराने की योजना की कामयाबी की जानकारी राजीव को दी. वह खुशी से झूम उठा. राजीव ने अनीता से कहा,‘डार्लिंग, मैं ने कई बार ज्वैलरी डिजाइन की है. इन डिजाइनों की कीमत बाजार में करोड़ों रुपए है. मैं इस के बारे में अपने पिताजी को बताने वाला था, पर अब मैं इस बारे में उन से कोई बात नहीं करूंगा.’’

अनीता ने जब ज्वैलरी डिजाइन के बारे में सुना, तो वह चौंक पड़ी. उस ने मन ही मन एक योजना बना डाली. एक दिन अनीता सेठजी के केबिन में बैठी थी, तब उस ने चर्चा छेड़ते हुए कहा, ‘‘राजीवजी के पास लेटैस्ट डिजाइन की हुई ज्वैलरी है, जिस की बाजार में बहुत ज्यादा कीमत है. आप का बेटा तो हीरा है.’’

यह सुन कर सेठजी चौंक पड़े और बोले, ‘‘मुझे तो इस बारे में तुम से ही पता चला है. क्या पूरी बात बताओगी?’’ अनीता ने कहा, ‘‘शायद राजीवजी आप से खफा होंगे, इसलिए उन्होंने इस सिलसिले में आप से बात नहीं की.’’

अनीता ने चालाकी से सेठजी के दिमाग में यह कह कर शक का बीज बो दिया कि शायद राजीव अपना कारोबार खुद करेंगे. सेठ चिंतित हो गए. वे बोले, ‘‘अगर ऐसा हुआ, तो हमारी बाजार में साख गिर जाएगी. इसे रोकना होगा.’’

अनीता ने कहा, ‘‘सेठजी, अगर डिजाइन ही नहीं रहेगा, तो वे खाक कारोबार कर पाएंगे?’’ सेठजी ने पूछा, ‘‘तुम क्या पहेलियां बुझा रही हो? मैं कुछ समझा नहीं?’’

अनीता ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘सेठजी, अगर वह डिजाइन किसी तरह आप के नाम हो जाए, तो आप राजीव को अपनी मुट्ठी में कर सकते हैं.’’ ‘‘यह होगा कैसे?’’ सेठजी ने पूछा.

अनीता बोली, ‘‘मैं करूंगी यह काम. राजीवजी मुझ पर भरोसा करते हैं. मैं उन से दस्तखत ले लूंगी.’’ सेठजी ने कहा, ‘‘अगर तुम ऐसा कर दोगी, तो मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा.’’

अनीता ने यहां भी पुराना तरीका अपनाया, जो उस ने सेठजी के खिलाफ अपनाया था. राजीव से फाइलों पर दस्तखत लेने के दौरान ज्वैलरी राइट के ट्रांसफर पर भी दस्तखत करा लिए. सेठ चूंकि सोने के कारोबारी थे, इसलिए काफी मात्रा में सोना व काले धन अपने घर के तहखाने में ही रखते थे, जिस के बारे में उन्होंने किसी को नहीं बताया था. पर बुढ़ापे का प्यार बड़ा नशीला होता है. लिहाजा, उन्होंने अनीता को इस बारे में बता दिया था.

इस तरह कुछ दिन और गुजर गए. एक दिन राजीव ने अनीता से कहा, ‘‘अगले सोमवार को हम कोर्ट में शादी कर लेंगे. तुम ठीक 9 बजे आ जाना.’’ अनीता ने भी कहा, ‘‘मैं दफ्तर से छुट्टी ले लेती हूं, ताकि किसी को शक न हो.’’

फिर अनीता सेठजी के पास गई. उन्हें बताया, ‘‘सोमवार को राजीव कोर्ट में किसी विदेशी लड़की से शादी करने जा रहा है. मुझे उस ने गवाह बनने को बुलाया है.’’ सेठजी गुस्से से आगबबूला हो गए.

तब अनीता ने सेठजी को शांत करते हुए कहा, ‘‘कोर्ट पहुंच कर आप राजीव को एक किनारे ले जा कर समझाएं. शायद वह मान जाए. आप अभी होहल्ला न मचाएं. आप की ही बदनामी होगी.’’ सेठजी ने अनीता से कहा, ‘‘तुम सही बोलती हो.’’

सोमवार को राजीव कोर्ट पहुंच गया और अनीता का इंतजार करने लगा, तभी उस के सामने एक गाड़ी रुकी, जिस में अपने पिताजी को देख कर वह चौंक पड़ा.

सेठजी ने राजीव को एक कोने में ले जा कर समझाया, ‘‘क्यों तुम अपनी खानदान की इज्जत उछाल रहे हो? वह भी दो कौड़ी की गोरी मेम के लिए.’’ यह सुन कर राजीव हंस पड़ा और बोला, ‘‘क्यों नाटक कर रहे हैं आप? मैं किसी गोरी मेम से नहीं, बल्कि अनीता से शादी करने वाला हूं. पता नहीं, वह अभी तक क्यों नहीं आई?’’

अनीता का नाम सुन कर अब चौंकने की बारी सेठजी की थी. उन्होंने कहा, ‘‘क्या बकवास कर रहे हो? अनीता ने मुझे बताया है कि तुम आज एक गोरी मेम से शादी कर रहे हो, जिस के साथ तुम विदेश में रहते थे.’’ राजीव ने झुंझलाते हुए कहा, ‘‘आप क्यों अनीता को बीच में घसीट रहे हैं? मैं उसी से शादी कर रहा हूं.’’

सेठजी को अब माजरा समझ में आने लगा कि अनीता बापबेटों के साथ डबल गेम खेल रही है. उन्होंने राजीव को समझाते हुए कहा, ‘‘बेटे राजीव, वह हमारे बीच फूट डाल कर जरूर कोई गहरी साजिश रच रही है. अब वह यहां कभी नहीं आएगी.’’ राजीव को भी अपने पिता की बातों पर विश्वास होने लगा. उस ने अनीता के घर पर मोबाइल फोन का नंबर मिलाया, पर कोई जवाब नहीं मिला.

दोनों सीधे दफ्तर गए, तो पता चला कि अनीता ने इस्तीफा दे दिया है. दोनों सोचने लगे कि आखिर उस ने ऐसा क्यों किया?

कुछ दिनों के बाद जब सेठजी को कुछ सोने और पैसों की जरूरत हुई, तो वे अपने तहखाने में गए. तहखाना देख कर वे सन्न रह गए, क्योंकि उस में रखा करोड़ों रुपए का सोना और नकदी गायब हो चुकी थी. सेठजी के तो होश ही उड़ गए. वे तो थाने में शिकायत भी दर्ज नहीं करा सकते थे, क्योंकि वे खुद टैक्स के लफड़े में फंस सकते थे.

सेठजी ने यह सब अपने बेटे राजीव को बताया. राजीव ने कहा, ‘‘कोई बात नहीं. मेरे पास कुछ डिजाइन के कौपी राइट्स हैं, उन्हें बेचने पर काफी पैसे मिलेंगे.’’

पर यह क्या, राजीव जब शहर बेचने गया, तो पता चला कि वे तो 12 महीने पहले किसी को करोड़ों रुपए में बेचे जा चुके हैं. यह सुन कर राजीव सन्न रह गया. उस पर धोखाधड़ी का केस भी दर्ज हुआ, सो अलग.

सेठजी ने साख बचाने के लिए अपनी कंपनी को गिरवी रखने की सोची, ताकि बाजार से लिया कर्ज चुकाया जा सके. पर यहां भी उन्हें दगा मिली. एक फर्म ने दावा किया और बाद में कागजात भी पेश किए, जिस के मुताबिक उन्होंने करोड़ों रुपए बतौर कर्ज लिए थे और

4 महीने में चुकाने का वादा किया था. देखतेदेखते सेठजी का परिवार सड़क पर आ गया. उन्होंने अनीता की शिकायत थाने में दर्ज कराई, पर वह कहां थी किसी को नहीं पता.

पुलिस ने कार्यवाही के बाद बताया कि रमेश की तो शादी ही नहीं हुई थी, तो उस की विधवा पत्नी कहां से आ गई. आज तक यह नहीं पता चला कि अनीता कौन थी, पर उस ने आशिकमिजाज बापबेटों को ऐसी चपत लगाई कि वे जिंदगीभर याद रखेंगे.

VIDEO : फंकी लेपर्ड नेल आर्ट

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बीवी से वफदारी का स्टाम्पपेपर

बीवी से परेशान तो तब से ही हूं जब से उस के साथ सात फेरे लिए थे पर आज जब औफिस से थकाहारा घर पहुंचा तो द्वार पर बीवी मुसकराती दिखी तो हैरानी हुई. लगा, जैसे आज मैं अपने घर के द्वार पर नहीं, गलती से किसी और के द्वार पर आ खड़ा हो गया हूं. जब आंखों से चश्मा हटा कर देखा तो मुझे यकीन हो गया कि मैं अपने ही घर के द्वार पर आ खड़ा हूं. बीवी पहली बार द्वार पर स्वागत के लिए आतुरता से स्वागत की मुद्रा में दिखी तो मेरी प्रसन्नता की सीमा न रही. अरे भाईसाहब, यह क्या हो गया, क्या सूरज आज पश्चिम की जगह पूरब में अस्त हो रहा होगा? पूरब की ओर देखा तो वहां कोई सूरज न दिखा.

बीवी पीछे की ओर हाथ किए कुछ पकड़े हुए थी. मैं ने सोचा कि आज मेरे स्वागत के लिए फूलों का गुलदस्ता लिए होगी. इस खुशी में मेरा स्वागत कर रही होगी कि मैं आज भी औफिस से सकुशल लौट आया हूं.

‘‘आ गए आप?’’

‘‘रोज ही तो आता हूं. आज के आने में क्या खास है,’’ मैं अंदर जाने को हुआ तो उस ने रोकते हुए कहा, ‘‘रुको तो जरा, इतनी भी क्या जल्दी है. पहले इन कागजों में दस्तखत करो, फिर आराम से अंदर आओ.’’

उस ने पीछे किए हाथों में पकड़े कागज मेरी ओर किए तो मैं अंदर तक कांप गया. पगली, अब ये कौन से कागजों पर दस्तखत करवाने पर तुल गई? वैसे अंदर की बात कहूं, आज तक बीवी ने मेरे आगे जो भी कागज रखे हैं, मैं ने आंखें, दिमाग सब बंद कर उस पर दस्तखत किए हैं. अब ये नए कागज कौन से…

‘‘आखिर ये कैसे कागज हैं? भीतर जा कर जरा आराम करने दो तो उस के बाद इन कागजों पर दस्तखत करूं. सच कहूं, आज काम करतेकरते औफिस में बहुत थक गया हूं. एक गरमागरम कड़क चाय मिले तो…’’

‘‘नहीं, मुझे अभी इन कागजों पर दस्तखत चाहिए,’’ कह उस ने एक बार फिर मेरा भीतर जाने का रास्ता रोक दिया ठीक वैसे ही जैसे हमारे औफिस का चपरासी बिन पैसे दिए औफिस में सब का जाने का रास्ता रोक देता है, पूरे रोब से.

मैं ने हर बार की तरह अब फिर उस के आगे लंगर डालते हुए कहा, ‘‘आखिर, ये कागज हैं किस चीज के? हर चीज तो तुम्हारे नाम कर चुका हूं.’’

‘‘ये वफादारी का हलफनामा है.’’

‘‘वफादारी का हलफनामा, बोले तो?’’

‘‘यही कि तुम मेरे प्रति ईमानदार रहोगे,’’ कह वह मेरा मुंह ताकने लगी तो मैं ने अपने को कोसते हुए कहा, ‘‘हे बेगम, जिस दिन मैं ने तुम से निकाह किया था मानो या न मानो, उसी दिन से वफादार कुत्ते की तरह तुम्हारे प्रति वफादार हो गया था. अब नजदीक की तो छोड़ो, दूर तक का नंबर खराब हो गया है. ऐसे में इस वफादारी के हलफनामे की क्या जरूरत?’’

‘‘सुना है आदमी का दिल कभी भी मचल सकता है.’’

‘‘खाक मचलता है आज के दौर में आदमी का दिल. दिल तो उस का तब मचले जो उस के पास दिल बचा हो,’’ कह मैं भीतर जाने को हुआ तो उस ने पुरजोर मुझे घर के भीतर जाने से वैसे ही रोक दिया जैसे संसद के बाहर प्रदर्शनकारियों को सुरक्षाबल रोक देता है. तो, मैं ने हथियार डालते हुए कहा, ‘‘अच्छा, नहीं मानती तो दो ये स्टांपपेपर.’’ तो उस ने मुसकराते हुए मेरी ओर स्टांपपेपर बढ़ा दिया. स्टांपपेपर वहीं द्वार पर खड़े हो पढ़ना शुरू किया तो उस पर लिखा था, ‘मैं मंशाराम पुत्र श्री हेमराम, मकान नंबर 420, मीट मार्केट अपने पूरे होशोहवास में वफादारी के हलफनामे पर बिना किसी के दबाव के सारी शर्तों को पढ़ अपनी खुशी से अपने अन्नदाता को हाजिरनाजिर मान हलफनामे पर दस्तखत करता हूं कि मैं घर की मुखिया राजरानी, पुत्री श्रीमती कमला रानी के प्रति वफादारी करते रहने की मन से कसम खाता हूं. राजरानी का इकलौता पति होने के चलते भी मैं किसी और की तरफ आंख उठा कर तो दूर, कान तक उठा कर नहीं देखूंगा और अपनी बीवी के किसी भी फैसले पर मरने के बाद भी असहमति नहीं जताऊंगा. मेरी पत्नी चाहे मुझे कितना ही तंग क्यों न करे, किसी से कुछ नहीं बताऊंगा कि मेरे घर में मेरे कैसे हाल चल रहे हैं. चाहे वह जितनी बार वह मेरी जेब पर डाका डाल कर सारे नोट ले ले, मैं पत्नीभक्ति, ससुराली आतंक, काले कारनामों के नाम पर चूं तक नहीं करूंगा.’’

स्टांपपेपर पढ़ कर मुझे पहली बार गुस्सा आया और मैं ने पूरे रोब से पूंछ दबाए पूछा, ‘‘आखिर ये सब क्या ड्रामा है? मैं कभी किसी और के चक्कर में आज तक पड़ा?’’

‘‘मुझे क्या पता? सारा दिन तो औफिस में रहते हो. वहां क्या करते हो, मुझे क्या पता.’’ तुम काली साड़ी वाली लड़कियों को ब्लैक कौफी पिलाते हो. बीवी ने सीना चौड़ा कर कहा तो मेरे होश उड़तेउड़ते बचे.

‘‘तो आखिर क्या चाहती हो तुम?’’

‘‘बस, इस हलफनामे पर तुम्हारे हस्ताक्षर,’’ कह उस ने मेरी जेब से पैन निकाल मेरी ओर बढ़ाया तो मेरा दिमाग खराब होतेहोते बचा. हद है यार, विवाह के बाद तो मर गया जैसे. हर कदम फूंकफूंक कर रखता पर एक यह बीवी है कि…हे, हर बीवी के शौहर, विवाह के बाद तू चाहे कितना भी आदर्शवादी पति हो कर जी ले, पर तेरी नियति में तो बस हर पत्नी का अविश्वास ही अविश्वास लिखा है.

‘‘पर यह हलफनामा तो उन के लिए है जिन पर मरने के बाद भी विश्वास नहीं कर सकते. यह राजनीतिक हलफनामा है और हम विशुद्ध गृहस्थ हैं. हम तो विवाह के वक्त फेरे लेते हुए अग्नि को साक्षी मान पहले ही वफादारी की कसमें खा चुके हैं. ऐसे में इस कागज के पुरजे की क्या जरूरत? यह तो उन के लिए है जिन पर दूसरों को तो दूसरों को, अपने पर ही विश्वास करना मुश्किल होता है. कोई सुने या न सुने, पर मैं कहे देता हूं कि यह हलफनामा दसियों लोगों के पतियों के लोकतांत्रिक अधिकारों का गला घोंटने की कवायद से कम नहीं. जबकि हमारा तो गला हर दम ही घुटा हुआ रहता है.’’

मैं ने हलके से विरोध का प्रदर्शन करना चाहा तो बीवी तुनकते हुए बोली, ‘‘देखो जी, घुसपैठियों की तरह घुसने का साहस न करो. जो ऐसा करोगे तो मुझ से बुरा कोई न होगा. इज्जत से घर के भीतर जाना है तो जल्दी इस हलफनामे पर दस्तखत करो. वरना, मैं तुम्हें भीतर नहीं जाने दूंगी. खड़े रहो अच्छे दिनों के चक्कर में आग उगलती हवा के साथ. समझते क्यों नहीं, इस हलफनामे का मकसद तुम्हारे प्रति कोई कार्यवाही करना नहीं है. सच कहूं तो मुझे तुम पर अपने से भी अधिक भरोसा है. इस से और कुछ नहीं होगा, बस, मेरे प्रति तुम्हारी वफादारी का लिखित पता चलेगा और मैं सब के सामने तुम्हारे हलफनामे को बताते सिर ऊंचा किए कह सकूंगी कि…’’ हे मेरे देश के धांसू सलाहकारो, पाठको, अगर मैं इस हलफनामे पर दस्तखत कर दूं तो भविष्य में कोई खतरा तो नहीं होगा न? दोबारा जेब पर सर्जिकल स्ट्राइक वह भी धौंस के साथ तो न होगी.     

Movies : काम नहीं आया फिल्म ‘KILL’ का वौयलेंस

फिल्म किल को क्रिटिक से तारीफ़ तो मिली पर दर्शकों को पच नहीं पाई. अपने पहले हफ्ते में फिल्म औंधे मुंह गिर गई है.

बौलीवुड में हौलीवुड और कोरियाई फिल्मों की नकल करते हुए हिंसा प्रधान फिल्मों का निर्माण जितनी तेजी से बढ़ा है. उतनी ही तेजी से दर्शकों ने उन सभी हिंसा प्रधान फिल्मों को नकारना शुरू कर दिया है, जिस में कहानी और हिंसा के औचित्य की बात न हो. इस के बावजूद फिल्मकार सुधरने को तैयार नहीं हैं.

पिछले लंबे समय से लगातार असफलता का दंश झेल रहे फिल्म निर्माता करण जोहर ने अपनी सोच व कार्यशैली को बदलते हुए एक अति हिंसा प्रधान फिल्म ‘किल’ का निर्माण किया, जिसे टोरंटो इंटरनैशनल फिल्म फेस्टिवल में काफी पसंद किया गया. राघव जुयाल, लक्ष्य लालानी, अभिषेक चौहाण और तान्या मनकाटा के अभिनय से सजी करण जोहर निर्मित तथा निखिल नागेश भट निर्देशित फिल्म ‘किल’ जुलाई माह के पहले सप्ताह, पांच जुलाई को बिना किसी प्रचार के सिनेमाघरों में पहुंची.

फिल्म देख कर अहसास होता है कि इस फिल्म की लागत काफी है, पर निर्माता अपनी इस फिल्म की लागत बताने को तैयार नहीं हैं. 5 जुलाई को सिनेमाघरों में पहुंचते ही पहले दिन ‘किल’ बौक्स औफिस पर महज सवा करोड़ रूपए ही कमा सकी और पूरे सप्ताह में यह फिल्म 11 करोड़ 89 लाख रूपए ही कमा पाई. इस में से निर्माता की जेब में केवल साढ़े चार करोड़ रूपए ही जाएंगे. इस तरह यह फिल्म बौक्स औफिस पर पूर्णतः डिजास्टर हो चुकी है और इस की मूल वजह यह है कि फिल्मकार ने फिल्म में हिंसा और खूनखराबा तो बहुत भर दिया, मगर कहानी पर ध्यान नहीं दिया.

फिल्म ‘किल’ की बौक्स औफिस पर जिस तरह से दुर्गति हुई है, उस से एक बात साफ हो गई कि जब तक फिल्मकार अपने समाज, अपने देश से नहीं जुड़ेगा, तब तक वह सफलता से दूर रहेगा. ‘किल’ के डूबने की सब से बड़ी वजह यह भी रही कि निर्माता व निर्देशक ने अपनी फिल्म से दर्शकों को परिचित कराने के लिए फिल्म का शून्य प्रचार किया. वह तो सोसहजल मीडिया पर चिल्लाते रहे कि इंटरनैशनल फिल्म फेस्टिवल में ‘किल’ ने झंडे गाड़े है.

इस तरह का प्रचार करते समय निर्माता यह भूल गए कि हर देश की संस्कृति, वहां का समाज अलग है. आप भारतीय दर्शक की तुलना अमरीका के दर्शकों से नहीं कर सकते. करण जोहर ने अपने चहेते तथाकथित समोसा क्रिटिक्स से फिल्म को चार स्टार दिलवा दिए, पर अफसोस दर्शकों ने इस फिल्म को सिरे से नकार दिया. पहले दिन शुक्रवार को ‘किल’ ने बौक्स औफिस पर महज एक करोड़़ 25 लाख रूपए ही एकत्र किए. फिर शनीवार को दो करोड़ 15 लाख, रविवार को 2 करोड़ 70 लाख तथा चौथे दिन सोमवार को केवल एक करोड़ तीस लाख ही कमा सकी. इस तरह पूरे एक सप्ताह में ‘किल’ ने बौक्स औफिस पर केवल 11 करोड़ 89 लाख रूपए ही कमाए.

फिल्म ‘किल’ के बौक्स औफिस पर डूबने के लिए फिल्म का सही प्रचार न किए जाने के अलावा कहानी का आधार गलत होना ही है. फिल्म में एक ही परिवार के 40 लोग लूटपाट करने के लिए ट्रेन के एसी डिब्बे में चढ़ते हैं और बेवजह एक पुलिस हवलदार की हत्या कर देते हैं. जबकि हर इंसान जानता है कि लूटपाट करने वाला गिरोह हत्या व हिंसा करने से बचने का पूरा प्रयास करता है.

इस के अलावा एक तरफ फिल्मकार बता रहा है कि नायिका तुलिका के पिता बलदेव बहुत ही ज्यादा खूंखार है. उन का नाम सुन कर लूट गैंग भी डरा दिखा दिया. फिर भी वह हिंसा करने से बाज नहीं आता तो वहीं बलदेव के पैसे की भी कमी नहीं है. इस के बावजूद वह पूरे परिवार के साथ ट्रेन में यात्रा कर रहा है और निहत्था. देखिए हिंसा तब जायज लगती है जब हिंसा करने वाला इंसान ताकतवर हो और जिन पर हिंसा हो रही है, वह कमजोर हो मगर ‘किल’ में ऐसा नहीं है. ‘किल’ में हिंसा करने वाले ताकतवर हैं, तो अब उन का विरोध करने वाले दो एनएसजी कमांडो हैं. इस वजह से भी इस फिल्म से दर्शक का मोहभंग हो जाता है.

फिल्म में हिंसा के दृष्य जरुर हैं, मगर एक भी दृष्य ऐसा नहीं है जिसे देख दर्शक के अंदर विलेन या उस के गिरोह के प्रति गुस्से का भाव पैदा हो. फिल्मकार ने अपनी फिल्म में लूटपाट करने के लिए 40 लोगों के गिरोह को ट्रेन में सवार करा दिया और यह सभी एक ही परिवार से हैं. मतलब आपस मे रिश्तेदार हैं. दर्शक सवाल पूछता है कि हमारे देश में ऐसा कौन सा परिवार है, जिस के सभी रिश्तेदार एक साथ मिल कर सिर्फ ट्रेन में डकैटी डालते हैं.

आखिर फिल्मकार किस समाज की रचना करना चाहते हैं. हिंसा या एक्शन दिखाने के लिए एक ऐसी कहानी गढ़ी जानी चाहिए थी, जिस से दर्शक रिलेट कर पाता. पर फिल्मकार बुरी तरह से मात खा गए. वास्तव में लेखक व निर्देशक ने अति हिंसक फिल्म बनाने की सोची फिर नयापन लाने के लिए ट्रेन के अंदर एक्शन दृष्यों को रखना तय किया. उस के बाद एक ही परिवार से जुड़े 40 लोगों को लुटेरे बना हाथ में कुछ हथियार दे कर ट्रेन में सवार कर दिया. लेकिन कहानी गायब…?

फिल्मकार ने यह भी नहीं सोचा कि इन 40 लोगों के बीच भी आपस में रिश्तों के कई पहलू हो सकते हैं. जी नहीं. निर्माता व निर्देशक ने तो सिर्फ यह सोचा कि उन्हे हिंसा दिखानी है तो दिखा दी. जिस के चलते पूरी फिल्म अतार्किक और आकर्षण हीन हो गई. फिल्मकार इसी तरह अपना और सिनेमा का लगतार नुकसान कर रहा है, पर वह चेतना नहीं चाहता.

अंबानी की शादी : पर्दा कब गिरेगा, कब तमाशा खत्म होगा

सरिता हमेशा ही अपने लेखों के जरिए पैसों के दिखावे और फिजूलखर्ची के खिलाफ रहते पाठकों को इस के नुकसानों से आगाह करती रही हैं . लेकिन मुकेश अंबानी के बेटे अनंत अंबानी की शादी के बारे में क्या कहें … यही कि अंबानीज के पास अथाह दौलत है . बिलकुल समुद्र के पानी जैसी जिस में से बेटे की शाही शादी के लिए 5 हजार करोड़ बूंदे निकाल लेने से जल राशि कम नहीं होने वाली और न ही समुद्र सूख जाने वाला .

इसलिए आलोचना ईर्ष्या और नसीहत छोड़ते सदी की इस भव्य और खर्चीली शादी का लुत्फ ही उठाएं. किसी सर्कस के मानिंद जिस ने शो अनवरत चलता रहता है. किरदार आतेजाते रहते हैं अपनेअपने करतब दिखाते हैं . हम देखने वालों के हिस्से में हाथ से जुड़ी जो दो हथेलियां हैं उन से ताली बजाएं और अपनीअपनी रनिंग कमेंट्री देते रहें , अपनी संतानों की शादी में 5 हजार करोड़ फूंकना तो सपना है क्योंकि 50 लाख जुटाने में 25 लाख का कर्ज हो जाता है जिसे अगले 10 साल मय ब्याज के किश्तों में चुकाते रहते हैं .

उम्मीद थी कि अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट की शादी न्यूज़ चैनल्स पर पूरी दिखाई जाएगी . लेकिन निराशा उस वक्त हाथ लगी जब खासखास चैनलों को थोड़ीथोड़ी वीडियो क्लिप्स मंदिर के प्रसाद की तरह बांट दी गईं कि लो इन्हें ही दिखा कर टीआरपी बढ़ा लो .

इन्हें खास चैनलों ने दिखाया भी .दान की गईं क्लिप्स की मियाद पूरे आधे घंटे की भी नहीं थी जिसे चैनलों ने एक एक घंटे तक घसीटघसीट कर दिखाया. टीवी वालों के पास यह सहूलियत है कि वे एक ही चीज को 3 – 4 बार दिखा सकते हैं . कभी स्लो मोशन में तो तो कभी फास्ट मोशन में. उन्होंने यही किया. जिओ वर्ल्ड सेंटर जहां यह राम विवाह सा हो रहा है वहां अंदर जाने की इजाजत एंकरों को नही थी. सो वे बाहर के नजारे ज्यादा दिखाते रहे कि देखो अनिल कपूर, प्रियंका चोपड़ा, माधुरी दीक्षित, रजनीकांत और संजय दत्त सरीखे फिल्म स्टार दूल्हे अनंत के साथ नाच रहे हैं.

ये क्लिपिंग्स स्टूडियो पहुंची तो वहां मौजूद एंकरों को ही बताना पड़ा कि अब बच्चन साहब अपनी फैमिली के साथ पधार चुके हैं लेकिन उन के साथ बहू ऐश्वर्या राय नहीं है पर दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में ऐश्वर्या अपनी बेटी अराध्या के साथ नजर आ रही थी. कुछ क्रिकेटर भी आए हैं और लालू राबड़ी यादव भी आए हैं. देखिए अब किंग खान भी अपनी पत्नी गौरी खान के साथ आ चुके हैं जिन्हें देख कर अंबानी परिवार के सदस्यों का चेहरा और खिल उठा है. वे फलां रंग का सूट पहने हुए खूब जंच रहे हैं तो अनुपम खेर ने भी काला सूट पहना हुआ है.
तमाम मेहमानों ने एक खास जगह खड़े हो कर पोज दिए फिर हाथ हिलाते कहां गुम हो गए पता ही नहीं चला. क्योंकि इस के बाद कैमरों की रेंज खत्म होती जा रही थी.
इधर लोगों के मुंह में पानी आ रहा था कि वे ढाई हजार डिश क्यों नहीं दिखाई जा रही जिन्हें अल्प भोजी मेहमान उदरस्थ करेंगे. एक सीन में बनारस की चाट दिखा दी गई कि यह बनारस की मशहूर चाट है जिसे नीता अंबानी ने बनारस में चखा था और अच्छी लगने पर इन 50 कारीगरों को मुंबई बुला लिया था . इस चाट की खूबी यह है कि यह कुल्हड़ में परोसी जाती है.लोग खुश हुए कि चलो एक दिखी तो अब मुमकिन है कि बाकी 2499 भी दिखेंगी लेकिन उन की यह ख्वाहिश पूरी नहीं हुई . क्योंकि मीडिया वालों की हदें यानी लक्ष्मण रेखा पहले ही खींची जा चुकी थीं कि आप खाने वाली जगह नहीं जाओगे जो भी करना है, यहीं कर लो.
करने के नाम पर वहां एबीपी का ही एंकर कोई जैन ज्यादा दिख रहा था. लेकिन बेचारा बुरी हालत में था उसे लगता है कि 2 फुट जगह ही एलौट की गई थी. जहां वह कसमसाता सा खड़ाखड़ा क्रिकेट मैच सरीखी कमेंट्री करता जा रहा था. जब वह कमजोर पड़ता था तो बात स्टूडियो में बैठी मैडम संभाले ले रहीं थीं जिन की ड्रैस तो चमक रही थी लेकिन सुंदर चेहरा मुरझाया हुआ था शायद उन्हें जिओ वर्ल्ड न जा पाने का गम साले जा रहा था.

सारे न्यूज चैनल को शायद हिदायत थी कि ये किसी चुनिंदा क्लिपिंग्स रात 10 से 11 बजे के बीच ही दिखाई जाए. सो वे बारीबारी से अनंत राधिका के विवाह का यह हजारवा हिस्सा दिखा रहे थे और शीर्षकों में तुकबंदी गढ़ रहे थे.मेहमानों और मेजबानो की ड्रैस जूते ज्वैलरी के बारे में बता रहे थे. इतनी दयनीयता की उम्मीद मीडिया से हमेशा से ही रही है कि वे कोई तुक या मुद्दे की खबरें न दिखाएं और जो दिखाए उस में भी मनोरंजन और नाटकीयता में खुशामद का तड़का जरूर होना चाहिए क्योंकि चैनल्स आम लोगों के सब्सक्रिप्शन से कम अंबानी अडानी और रामदेवो जैसे कारोबारियों के इश्तिहारों से ज्यादा चलते हैं.
इधर देश दुनिया में जो हो रहा था उसे आधे घंटे के लिए विश्राम दे दिया गया था. क्योंकि इस खबर के आगे उन की हैसियत वही थी जो रेलवे के स्लीपर डब्बे की फर्स्ट एसी के आगे होती है. दुनिया का विरला ही कोना होगा जहां से गोरेकाले सांवले मेहमान न आए होंगे अब यह और बात कि इन के नाम भी अपने चैनल वाले नहीं जानते थे सो देखिए, विदेशी मेहमान भी पगड़ी पहन कर आ रहे हैं जैसी बातें कर वे अपनी अज्ञानता छिपा ले गए.

इधर कुछ लोगों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोस्ताना निभाने आएंगे. लेकिन वे नहीं आए तो भी लोग निराश नहीं हुए उन्होंने अपने आप को यह कहते तसल्ली दे ली कि वे 13 जुलाई को आएंगे क्योंकि उन के मुंबई में कई सरकारी कार्यक्रम भी हैं. अब भला कुबेर के यहां पुत्र का विवाह हो और साक्षात प्रभु फूल बरसानें न आएं यह तो ज्यादती और एक अपौराणिक बात है . इसलिए बिना किसी अधिकृत सूचना के यह मान लिया गया कि मोदीजी आशीर्वाद समारोह में आएंगे और आए भी. क्योंकि वरवधू सहित पूरे अंबानी परिवार को राजा के आशीर्वाद की सख्त जरूरत है. तोहफे तो वे ठेकों और लाइसैंसों की शक्ल में देते ही रहते हैं. कभीकभी तो सस्ते में हवाईअड्डे तक बेच देते हैं .

इधर देश के ड्राइंग रूमों में भी हताशा का माहौल था जो पूरी शादी देखने के मूड और तैयारियों से बैठे थे. इन आम नागरिकों को फिल्म के नाम पर उस का टीजर दिखा कर अगली खबर एक एनकाउंटर की देखने मिली तो वे टीवी बंद कर अपनेअपने मोबाइल फोन में व्यस्त हो गए.न्यूज चैनल वाले इसी में खुश थे कि चलो इतने बड़े भंडारे के प्रसाद से आधे घंटे में ही टीआरपी बढ़ गई. मुमकिन है अंबानी साहब आशीर्वाद समारोह का पूरा कवरेज करने की इजाजत दे दें तो मजा आ जाएगा.
मजा कितना आएगा यह आज शाम पता चलेगा लेकिन इधर देश भर के लोग पैसों की इस नुमाइश पर किलपते रहे क्योंकि उन के पास इतना पैसा नहीं है और न कभी होगा तो मान यह लिया जाए कि ज्यादा पैसे वालों से कम पैसे वाले चिढ़ते ही हैं.
सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रही इस शादी जो 1 मार्च से किश्तों में चल रही है पर लोगों ने अपनी भड़ास और कुंठा भी तरहतरह से निकाली कि जियो के रिचार्ज की दरें बढ़ा कर हमारे पैसे से मुकेश अंबानी अपने बेटे की शादी कर रहे हैं. इस से तो अच्छा था हमें भी बुला लेते तो हम तो जिंदगी भर का रिचार्ज करा लेते.

उम्मीद की जानी चाहिए कि 15 जुलाई को यह तमाशा खत्म हो जाएगा और अंबानीज अपने कामधंधे से लग जाएंगे और सब से पहले आम बजट में हमे क्या मिला इस का अध्यन करेंगे. हालांकि बजट का ब्लू प्रिंट हो सकता है पहले ही उन्हें उपलब्ध करा दिया गया हो कि लो भैया देख लो कुछ फेरबदल करना हो तो बता देना
अब इकलौती जिज्ञासा यह रह गई है कि राहुल सोनिया गांधी के इनकार के बाद मोदी जी आएंगे या नहीं. तो आइए आज रात तक और इंतजार करते हैं.और अगर मोदी जी आए तो तय है कि मोदी परिवार के कई और छोटेबड़े नेता भी शिरकत कर भव्यता के साक्षी बनेंगे और ढाई हजार व्यंजनों में से अपने पसंदीदा व्यंजन चखेंगे.
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प्रधानमन्त्री का रूस दौरा : खाया पिया कुछ नहीं गिलास तोड़ा बारह आना

भारत का रूस पर भरोसा करना चीन पर भरोसा करने से कम नहीं इसके बाद भी प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी वहां गए तो इसकी तुक किसी को समझ नहीं आ रही . इस दौरे से भारत को हासिल क्या हुआ इस सवाल का जबाब भी शायद ही कोई दे पाए . तो फिर क्यों गये थे मोदी रूस और दुनिया इसे किस निगाह से देखती है जानें इस रिपोर्ट में

यह एक बड़ी निराशा है और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता का मास्को में दुनिया के सबसे खुनी अपराधी को गले लगाना शांति प्रयासों के लिए झटका है . यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लादीमीर जेलेंस्की के इस एक ट्वीट ने एक झटके में न केवल प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी बल्कि 140 करोड़ भारतीयों को भी कटघरे में खड़ा करने में सफलता पा ली थी कि वे किस मुंह से शांति , अहिंसा और विश्व गुरु बन जाने का राग अलापा करते हैं .

नरेन्द्र मोदी 2 दिनी दौरे पर 8 और 9 जुलाई को रूस में थे . यह आयोजन था 22 वे भारत रूस वार्षिक सम्मेलन का जिस पर दुनिया भर की खासतौर से पश्चिम की निगाहें थीं . इसमें क्या क्या हुआ और भविष्य में इसके क्या और कैसे फर्क पड़ेंगे , इसके पहले जेलेंस्की के ट्वीट की वजह जान लेना अहम है . जैसे ही मोदी दिल्ली से मास्को के लिए उड़े थे उसके कुछ घंटों बाद ही रूस ने यूक्रेन की राजधानी कीव में बच्चों के ओखमडित चिल्ड्रन अस्पताल पर हमला कर दिया था . जिसमें में 3 बच्चों की मौके पर ही मौत हो गई थी . इस मिसाइली हमले की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि तकरीबन सौ इमारतों को नुकसान पहुंचा और मलबे में सैकड़ों लोग दब गये . कोई 36 लोगों के मरने की खबर भी सामने आई . .
रूस यूक्रेन युद्ध में भारत की तटस्थ भूमिका पर हर किसी को हैरानी है कि भारत इस हिंसा का परोक्ष रूप से समर्थन क्यों कर रहा है जबकि उसकी इमेज और दावे एक अहिंसक और शांति प्रिय देश के हैं ..हर कोई इस शांति प्रिय देश के मुखिया से यह उम्मीद लगाए बैठा था कि वे इस हमले के विरोध में अपना दौरा रद्द भले ही करें न करें लेकिन इसकी निंदा जरुर करेंगे .
लेकिन नरेन्द्र मोदी शांति का उपदेश देते रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमोर पुतिन का आलीशान निवास निहारते प्रवचन से करते रहे कि युद्ध के मैदान से शांति का रास्ता नहीं निकलता . इसके लिए वार्ता जरुरी है . जवाव में पुतिन ने भी टरकाऊ सा जवाव यह दे दिया कि हम आपकी कोशिशों का सम्मान करते हैं .लेकिन साथ ही सम्मान के नाम पर उन्होंने मोदी को रूस के सर्वोच्च सम्मान आर्डर आफ सेंट एंड्रयू द एपोस्टल से नवाज दिया . इससे कहाँ की शांति स्थापित हो गई और रूस यूक्रेन की 28 महीनों से चल रही जंग का क्या हल निकला या भगवान जाने .

औपचारिक स्वागत और आभार यानी मौसम के हालचाल के आदान प्रदान के बाद मोदी जी ने मास्को में रह रहे भारतीयों को संबोधित किया . उनका भाषण सुनकर साफ़ लगा कि वे 4 जून के नतीजे के सदमे से अभी पूरी तरह उबरे नहीं हैं . पहले हमेशा की तरह उन्होंने बताया कि वे तीसरी बार चुनकर आए हैं . बस प्रचंड बहुमत से चुनकर आए हैं और भारत में अब शुद्ध भाजपा की नही बल्कि गठबंधन बाली मिलीजुली सरकार जिसमें सेक्यूलर दल भी शामिल है , यह वे नहीं कह पाए . इस भाषण को सुनकर लगा ऐसा कि मोदी जी भारत में हो रही किसी चुनावी सभा को संबोधित कर रहे हैं . जिसमे गरीबो के कथित उत्थान से लेकर 2014 के पहले की कथित दुर्दशा का चित्रण ज्यादा है . अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों की बात न के बराबर है . एक दर्जन बार उन्होंने 140 करोड़ भारतीयों का जिक्र किया जो गैरजरूरी और उबाऊ ही था . रूस वह देश है जहाँ जाना भारतीयों की पहली तो क्या आखिरी पसंद भी नही होती इसीलिए इने गिने भारतीय ही मोदी की सभा में थे .

तो क्या हमारे प्रधानमन्त्री आबादी का आंकड़ा गिनाने मिटटी की महक ले जाने और तफरीह करने या पुतिन का अस्तबल देखने रूस गए थे , ऐसा भी नहीं है बल्कि कुछ काम की बातें भी हुईं . पर असल काम की बात थी रुसी सेना में जबरन भर्ती किए गए भारतीयों की रिहाई जिन्हें रूस ने बंधक बना रखा है . यह एक बेहद गंभीर और चिंतनीय मुद्दा है जिसके सामने सर पर लाल टोपी रुसी फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी जैसी राजकपूर छाप फ़िल्मी दोस्ताना बातों के साथ साथ भारत के शेर होने , ,घर में घुस कर मारने और मोदी जी के 56 इंची सीने की भी कलई खुल गई .

9 जुलाई की शाम को ही खबर आई कि रूस अपनी सेना में कार्यरत सभी भारतीयों की भारत वापसी में मदद करने पर सहमत हो गया है . दौरे के पहले ही दिन जब पुतिन ने मोदी को अपने घर चाय पर बुलाया था सम्भवत तभी या उसी रात डिनर पर मोदी ने रूस की सेना में भारतीयों के फंसे होने का मुद्दा उठाया था . पुतिन की सहमति को भले ही भक्त मीडिया इसे कूटनीतिक जीत बताता रहे लेकिन कहानी कुछ और है .
दरअसल में पिछले कई महीनों से ऐसे मामले सामने आ रहे थे जिनमे रूस यूक्रेन युद्ध में रूस की तरफ से लड़ते भारतीयों के मरने की खबरें थीं . ये वे भारतीय थे जो रोजगार और शिक्षा के लिए बहला फुसलाकर रूस ले जाये गये थे . तकरीबन 2 महीने पहले ही यानी मई में सीबीआई ने मानव तस्करों के एक गिरोह के कुछ सदस्यों को गिरफ्तार किया था . पूछताछ में इस गिरोह के लोगी ने कुबूला था कि वे युवाओं को रूस में आकर्षक तगड़ी पगार बाली नौकरी का लालच देकर रूस ले जाते थे और वहां पहुँचने के बाद उन्हें यूक्रेन के खिलाफ लड़ने मजबूर करते थे . इतना ही नहीं इन युवकों को सेना में नौकरी के एवज में दूसरे तरह तरह के लालच भी दिए जाते थे . तगड़ी सेलरी के अलावा रूस की नागरिकता दिलाने के साथ साथ दूसरे फायदे भी उन्हें बतौर दाना चुगाए जाते थे .

अकेले भारत ही नही बल्कि नेपाल और श्रीलंका सहित दूसरे गरीब देशों से भी युवकों को इसी तरह लालच देकर रूस ले जाया जाता था और जंग में झोंक दिया जाता था .

जब कुछ भारतीयों की मौतों की खबरें सामने आइ तो भारत सरकार को चिंता हुई . चिंता इस बात की नही कि 140 करोड़ की भारी भरकम आबादी बाले देश के 4 – 6 नौजवान मारे गये बल्कि चिंता इस बात की कि उसकी बदनामी और थू थू होने लगी थी . क्योंकि यह वही सरकार थी जिसकी एक धौंस या आवाज पर सैकड़ों भारतीयों को यूक्रेन से भारत वापसी हो गई थी . लेकिन हकीकत यह थी कि आपरेशन गंगा जिसके तहत कोई 16 हजार भारतीयों की यूक्रेन से वापसी हुई थी को सरकार ने शुरू तभी किया था जब यूक्रेन में रह रहे भारतीय अपनी दुर्दशा के वीडियों शेयर करते सरकार को कोसने लगे थे जिसका राग भक्त मीडिया और सरकार ने भजन कीर्तन की तरह गाते मोदी को हीरो साबित कर दिया था .रूस में फंसे कुछ भारतीयों ने भी वीडियो शेयर कर ही बताया था कि वहां ले जाकर उन्हें युद्ध में जबरिया झोंक दिया गया है . ये वीडियो बहुत आम नही हो पाए थे और सरकार और मीडिया ने भी इन्हें गंभीरता से नहीं लिया था .थोडा हल्ला लगभग एक महीने पहले 11 जून को मचा था जब 2 भारतीयों के मरने की खबर आई थी . इस पर विदेश मंत्रालय ने फौरी तौर पर कहने भर की सख्ती दिखाई थी लेकिन हकीकत में इसे अमल में नहीं ला पाई थी .

मोदी के रूस जाने के ठीक पहले वरिष्ठ कांग्रेसी नेता जयराम रमेश ने जरुर प्रधानमन्त्री से 3 सवाल पूछे थे व्यापार असंतुलन और रूस से गरमाहट खोते रिश्तों के अलावा तीसरा सवाल उन्होंने यही किया था कि क्या मोदी भारतीयों की भारत वापसी सुनिश्चित करेंगे . नरेंद्र मोदी ने यह कर तो दिखाया लेकिन इसके लिए उन्हें पुतिन के सामने लगभग गिडगिडाना पड़ा वे दहाड़ नहीं पाए . रूस में फंसे भारतीय गुलामों की तरह बंधक क्यों रखे गए थे यह सवाल भी वे पुतिन से नही पूछ पाए .
इसकी वजह यह है कि दुनिया भर से दक्षिणपंथी ख़ारिज किये जा रहे हैं और न्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मोदी की इमेज भी लगभग तानाशाह की ही है हालाँकि 4 जून के बाद उनके कसबल ढीले पड़े हैं . हर कोई जानता है कि अमेरिका और तमाम पश्चिमी देश युद्ध के लिए पुतिन को दोषी मानते उनका हर स्तर पर उनका बहिष्कार कर चुके हैं . उनकी नजर में पुतिन एक निरंकुश तानाशाह हैं और यह नजरिया गलत कहीं से नहीं है

. पुतिन की यूक्रेन से लम्बी लड़ाई की सनक में लाखों की जान गई है और अरबों खरबों की सम्पत्ति नष्ट हो चुकी है . यह सनक कब खत्म होगी यह कोई नही जानता लेकिन पश्चिम के लोग नरेंद्र मोदी के इस तटस्थ रूख को रूस का समर्थन ही मानते हैं . उनकी नजर में कुछ अफ्रीकी तानाशाहों के अलावा रूस के नजदीकी सम्बन्ध चीन और ईरान सहित हंगरी से ही हैं . हंगरी पहला इकलौता देश है जिसने पश्चिमी देशो को नजरंदाज किया है . दिलचस्प इत्तफाक यह है कि 10 जुलाई को नरेंद्र मोदी के रूस के दौरे के ठीक पहले हंगरी के प्रधानमन्त्री विक्टर ओरबान मास्को में पुतिन से मिले थे लेकिन मोदी की तरह गले नहीं मिले थे .
हालाँकि हंगरी की स्थिति भी यूरोप में अलग थलग जैसी है और ओरबान की इमेज भी एक तानाशाह सरीखी है . जिनके इस दावे के यूरोप में कोई माने नहीं कि हंगरी इकलौता देश है जो रूस और यूक्रेन दोनों से शांति की बात कर सकता है . यह और बात है कि उनके इस बयान से यूरोपीय संघ और नाटो सहयोगियों में निराशा और नाराजी दोनों बढ़े हैं .
लगभग यही हालत मोदी के दौरे को लेकर रही जिस पर खुलकर प्रतिक्रिया किसी देश ने नहीं दी . अमेरिका ने बेहद शिष्ट और नपीतुली भाषा का इस्तेमाल किया . लेकिन भारत में अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने अपने देश की मंशा इन शब्दों में जाहिर कर ही दी कि अमेरिका युद्ध के लिए रूस को जिम्मेदार ठहराने के लिए मिलकर काम करने के बारे में भारत के साथ लगातार सम्पर्क में है .
लेकिन मोदी कभी रूस को जंग का जिम्मेदार मानेंगे या ठहराएंगे ऐसा लग नही रहा . क्योंकि भारत रूस से लगातार हथियार और तेल खरीद कर उसे आर्थिक मजबूती ही दे रहा है . भारत में हालाँकि इस बाबत कोई सवाल नहीं करता इसके बाद भी सरकार यह जताती रही है कि रूस से हमे सस्ते दामों में तेल मिल रहा है तो हम यहाँ वहां से महंगा क्यों खरीदें . आम जनता को इस बात से मतलब नहीं कि कितना सस्ता लेकिन यह जरुर हर कोई सोचता है कि तो फिर पेट्रोल डीजल महंगे क्यों .
रूस पर नरेंद्र मोदी की मेहरबानी का आलम तो यह है कि यूक्रेन पर हमले के बाद के समय से भारत कोई 13 गुना ज्यादा तेल आयात कर रहा है . ये आंकड़े कुछ दिन पहले ही सेंटर फार रिसर्च आन एनर्जी एंड क्लीन एयर ने जारी किये हैं . लेकिन यह सस्ता कितना महंगा पड़ रहा है आंकड़े इसकी गवाही भी देते हैं कि भारत और रूस के बीच द्विपक्षीय व्यापार साल 2023 – 24 में 64 अरब डालर तक बढ़ा . लेकिन इसमें भारत का निर्यात केवल 4 अरब डालर का है . अर्थशास्त्र का अ ना जानने बाला भी आँख बंद कर कह सकता है कि यह तो निहायत ही घाटे का सौदा है .

आए दिन पश्चिमी मीडिया यह बताया करता है कि यूक्रेन पर हमले से पहले के मुकाबले रूस आज ज्यादा समृद्ध है क्योंकि भारत और चीन दोनों ही रूस के कच्चे तेल के बड़े खरीददार हैं . यानी वे अप्रत्यक्ष रूप से रूस की आर्थिक मदद ही कर रहे हैं . उलट इसके पूरा यूरोप और पश्चिम खुलकर यूक्रेन के साथ खड़े है खासतौर से अमेरिका जो यूक्रेन को पैसे और हथियार दोनों दे रहा है .
मोदी के रूस दौरे के बाद ही 10 जुलाई को अमेरिका में शुरू हुए नेटो शिखर सम्मेलन में राष्ट्रपति जो बाईडैन ने साफ़ तौर पर एलान किया था कि युद्ध समाप्त हो जायेगा और यूक्रेन एक स्वतंत्र और आजाद देश बना रहेगा . इस युद्ध में रूस नहीं यूक्रेन जीतेगा .
कोई वजह नहीं कि इस एलान को नरेंद्र मोदी और विक्टर ओरबान के रूस दौरे की तात्कालिक प्रतिक्रिया का एक हिस्सा न समझा जाए . अमेरिका में राष्ट्रपति पद के चुनाव सर पर हैं जिसमे डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बाईडैन का मुकाबला रिपब्लिकन पार्टी के डोनाल्ड ट्रम्प से है .हालाकि दोनों के बीच कड़ी टक्कर है जिसमे बाईडैन जीत भी सकते हैं जिसकी एक बड़ी वजह दुनिया के अधिकतर देशों से दक्षिणपंथियों को जनता द्वारा नकारा जाना है . भारत इसका आंशिक अपवाद है जहाँ की जनता ने दक्षिणपंथियों के सर से अश्वास्थामा की तरह मणि निकाल ली है या फिर कर्ण की तरह उसके कवच कुंडल छीन लिए हैं कुछ भी कह लें बात एक ही है .

ब्रिटेन में कंजर्वेटिव पार्टी के ऋषि सुनक भी अपनी धार्मिक सनक के चलते बेरहमी से ख़ारिज कर दिए गए हैं . ( आप इस विषय पर इसी वेब साईट पर रिपोर्ट पढ़ सकते हैं जिसका शीर्षक है , धर्मकर्म की राजनीति के चलते हार गए ऋषि सुनक ) . 6 जुलाई को आए ईरान के नतीजों ने भी मेसेज दिया है कि लोग अब कट्टरवाद और धार्मिक घुटन से आजिज आ चुके हैं . वहां रिफार्मिस्ट यानी सुधारवादी नेता पेशे से हार्ट सर्जन मसूद पेजेशाकियाँ ने कट्टरपंथी सईद जलीली को हराया है उनकी इस जीत में बहुत सी वजहों के साथ यह वजह भी शामिल है कि उन्होंने ईरान को पश्चिमी देशों से जोड़ने का वादा किया था

वैश्विक स्तर पर जुलाई का महीना एक बार फिर 8 तारीख को चौंका गया जहाँ तमाम पूर्वानुमानो , सर्वेक्षणों और सियासी पंडितों के गुणा भाग को धता बताते वामपंथी दलों के गठबंधन एनपीऍफ़ यानी न्यू पापुलर फ्रंट ने बाजी उलट दी .सत्ता की तगड़ी दावेदार मानी जाने बाली दक्षिणपंथी पार्टी नेशनल रैली बाला गठबंधन 577 में से महज 143 सीटें ही जीत पाया एक महीने पहले ही बना नया नवेला एनपीऍफ़ 182 सीटों पर जीता जबकि 168 सीटें राष्ट्रपति इमेनुअल मैंक्रो की पार्टी एनसम्बल के खाते में गईं .अब फ़्रांस में भी हालाँकि गैरदक्षिणपंथियों की गठबंधन बाली सरकार बनेगी लेकिन दक्षिणपंथियों का बुरा हाल जनता ने कर दिया है . इस नतीजे की तुलना उत्तरप्रदेश के नतीजों से गलत नहीं की जा रही . फ़्रांस के इन अप्रत्याशित नतीजों से यूरोप ने राहत की सांस ली है क्योंकि यूक्रेन को फ़्रांस का समर्थन पहले की तरह जारी रहेगा मैंक्रो , बाईडैन की तरह ही खुलेतौर पर उसका समर्थन करते रहे हैं .

इन चार प्रमुख देशों के चुनावी परिणाम इस तरफ तो इशारा करते हैं कि लोगों का भरोसा उदारवाद की तरफ बढ़ रहा है और यही ट्रेंड कायम रहा तो अमेरिका में भी इसका दोहराब देखने मिल सकता है . हालाँकि वहां अस्वस्थता के चलते बाईडैन पर पीछे हटने का दबाब बढ़ रहा है डेमोक्रेट्स की दूसरी पसंद भारतीय मूल की कमला हैरिस हैं . बाईडैन उम्मीदवार रहें या कमला हैरिस रहें या कोई और लड़े लेकिन यह तय है कि डेमोक्रेटिक पार्टी सत्ता में रही तो रूस की मुश्किलें और बढ़ेंगी .
ऐसे में नरेंद्र मोदी के रूस प्रेम का खामियाजा भारत को भी भुगतना पड़ सकता है . क्योंकि यूरोप और तमाम पश्चिमी देश पुतिन के दोस्तों को भी अच्छी निगाह से नही देखते हैं . पुतिन और रूस कभी किसी के सगे नहीं रहे इसे अतीत के कई उदाहरनो सहित महज 4 साल पहले के एक उदाहरण से भी समझा जा सकता है . जब गलवान घाटी में भारत और चीन के बीच हिंसक झडप हुई थी तब अमेरिका ने तो खुलकर भारत का साथ दिया था लेकिन रूस यह कहते कन्नी काट गया था कि दोनों देशों को बातचीत के जरिये समाधान निकालना चाहिए

जाहिर है पुतिन भारत के लिए चीन को खोना नहीं चाहेंगे जो सीमा पर पाकिस्तान के बराबर ही खतरा है और तो और भारत के बेरोजगार युवाओं को गिरमिटिया गुलामों की तरह बंधक रखता है और छोड़ने का आश्वासन भी तभी देता है जब खुद प्रधानमन्त्री वहां जाकर नाक रगड़ते हैं . यह कोई कूटनीतिक जीत नहीं जैसा कि मोदी भक्त मीडिया प्रचारित कर रहा है बल्कि कूटनीतिक हार है . भले ही रूस मृतक भारतीयों के परिजनों को भारीभरकम मुआवजा देने की भी बात कर रहा हो लेकिन इस सौदेवाजी में भी मुनाफा नहीं बल्कि घाटा ही है .भारत को इस दौरे से कुछ हासिल नहीं हुआ है हाँ पुतिन और मोदी ने एक दूसरे को गले लगाकर खुद को तसल्ली दे ली है कि हम या तुम अकेले और अलग थलग नहीं हैं .

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