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पेरैंट्स बने छोटे बच्चों के लिए रोल मौडल

बच्चों की पहली पाठशाला उस का अपना परिवार होता है. वह अपने घर में जो देखता है वही सीखता है. इसलिए अपना व्यवहार वैसा ही न रखें जैसा आप बच्चों आप अपने बच्चों में नहीं देखना चाहते.

अगर एक पिता सड़क के बीचोबीच अपनी बाइक खड़ी कर दी, तो आप बच्चों को क्या शिक्षा दे रहे हैं. साथ ही अगर सड़क से उठा कर आपने पानी की बोतल डस्टबिन में डाली है तो आप का बच्चा भी वही करेगा. लेकिन अगर आपने सड़क पर फेंक दी तो बच्चा घर में भी वही करेगा. ये छोटीछोटी बातें बच्चे के मन में बहुत बड़ी बन जाती है. बच्चे के इर्दगिर्द जो घटनाएं हो रही हैं वह उसी से सीखता है, उसे ये नहीं मालूम कि आज मोदीजी ने अमेरिका के राष्ट्रपति से क्यों बात की. लेकिन उस के मांबाप जो उस के आसपास कर रहे हैं वह उस के लिए काफी है. मां घर आते ही पर्स फेंक कर, टीवी, एसी खोल कर पसर जाएंगी, तो बच्चों को लगेगा की पसरना घर के काम से जरूरी काम है. इस तरह आप बच्चों को गलत शिक्षा दे रहें हैं. इस के लिए जिम्मेदार मांबाप का अपना व्यवहार है. यही वजह है कि बच्‍चों की परवरिश में पेरैंट्स को बहुत सावधान रहने की सलाह दी जाती है. इसलिए बच्चों को अनुशासित बनाने से पहले खुद अनुशासित बनिए.

सुबह जल्दी उठें और व्यायाम करें

अपनी सुबह की शुरुआत जल्दी सो कर उठने से करें. यह नियम बना लें कि रोज सुबह जल्दी उठ कर आप वाक पर जाएंगे या फिर घर पर ही एक्सरसाइज आदि करेंगे और छुट्टी वाले दिन बच्चों को भी साथ ले कर जाएं. इस से यह चीज बच्चों के रूटीन में आ जाएगी. जब बच्चे आप को रोज एक्सरसाइज करते हुए देखेंगे तो उन्हें पता होगा के यह करना अनिवार्य है.

मेहमानों के आने पर उन का स्वागत करें : कई बार देखने में आता है कि किसी मेहमान के आने पर आप के लाख कहने पर भी बच्चे कमरे से बाहर नहीं आते और आप सब के सामने शर्मिंदा हो जाते हैं और मेहमानों के जाने के बाद बच्चों को खूब डांट पड़ती है पर क्या आपने कभी सोचा है के वे ऐसा क्यों करते हैं. दरअसल, जब मेहमान आते हैं तो आप ही उन के जाने के बाद बच्चों के सामने उन की बुराइयां करते हैं. कई बार तो बच्चों से झूठ बुलवा देते हैं कि पापा घर पर नहीं हैं. जब आप ही ऐसा करेंगे तो बच्चें उन की इज्जत क्यों करेंगे. इसलिए मेहमानों के आने पर उन से अच्छे से पेश आएं तभी आप बच्चों से ऐसे व्यवहार की अपेक्षा रखें.

पेड़ पौधों की महत्व समझें फिर समझाएं : कहीं पौधें पर कोई फूल अच्छा देखा और नजर बचा कर तोड़ लेना आप की आदत तो नहीं? अगर ऐसा है तो बच्चे को भी प्रकृति से लगाव नहीं होगा. आपने घर में पौधें लगाएं, उन की बच्चों की मदद लें इस से वह भी समझेंगे की पौधें लगाना अच्छी बात है. इस से होने वाले फायदे भी उन्हें समझाएं.

 

बच्चों पर बेवजह गुस्सा न करें : अगर आप बच्चों से प्यार से बात करेंगे उन्हें गलती होने पर डांटने के बजाय प्यार से समझाएंगे तो बच्चों का स्वभाव भी ऐसा ही बन जाएगा. वह भी ज़िद्दी नहीं बनेंगे और मातापिता की बात सुन कर समझेंगे भी. बच्चों पर हाथ न उठाएं वरना बच्चे भी हिसंक बन जाएंगे.

कानून का पालन करें : रोड पर चलते समय अगर आप खुद नियमों और कानूनों का पालन नहीं करेंगे तो बच्चों का क्या सिखाएंगे. इसलिए सभी ट्रैफिक नियमों का पालन करें ताकि बच्चों को भी इस की आदत हो.

संवेदनशील बनें : दूसरों की मदद करना, सब की मुश्किल में साथ देना, दूसरों के दुख में दुखी होना ये सब मानवीय गुण जब आप में होंगे. बच्चा आप को यह सब करते हुए देखेगा तो खुद ब खुद आप से सीखेगा और उस का व्यवहार भी ऐसा ही हो जाएगा.

सोशल मीडिया से दूर बनाएं: अपने औफिस से आने के बाद या फिर छुट्टी वाले दिन फेसबुक और इंस्टाग्राम पर ही न लगे रहें. याद रखें आप का जितना स्क्रीनिंग टाइम होगा उस से डबल बच्चों का मान कर चलें. अगर आप को उन का स्क्रीन देखना पसंद नहीं तो पहले खुद पर कंट्रोल करें क्योंकि वे आप को देख कर ही सीखते हैं.

अपने दोस्तों के साथ समय बिताएं: बच्चे घर में हर वक्त इसलिए घुसे रहते हैं क्योंकि वे आप को ऐसा ही करते हुए देखते हैं. अपना फ्रैंड सर्कल बनाएं उन्हें और उन के बच्चों को घर बुलाएं और साथ में एन्जोए करें. चाहें तो वीकेंड्स पर बाहर घूमने जाएं. इस का फायदा यह होगा की बच्चे भी आपस में दोस्त बन जाएंगे और आप के साथसाथ उन का भी कोई सोशल सर्कल होगा.

बच्चों के साथ गेम खेलें : हर वक्त यह रोना न रोएं कि बच्चे तो सारा दिन मोबाइल में लगे रहते हैं. आप पहले खुद को देखें. आप भी तो मोबाइल में ही लगे हैं तो बच्चें भी वही सीखेंगे. बच्चों के साथ घर पर गेम खेलने की आदत डालें या फिर बाहर उन के साथ बैडमिंटन, क्रिकेट आदि गेम खेलें. इस से बच्चे मोबाइल से दूर रहेंगे और इसे बहाने सब साथ में टाइम स्पेंड कर पाएंगे.

घर के कुछ नियम बनाएं और उन का पालन करें बच्चों को बताएं के आप घर से बहार गए हैं तो खेल कर समय से घर आना है क्योंकि डिनर सब लोग साथ में ही करते हैं और सब एक दूसरे का इंतजार करते हैं इसलिए आप खुद भी इस नियम का पालन करें तभी बच्चे भी इस बात का ख्याल रखेंगे. ये नियम उन्हें समय का पाबंद और परिवार के नजदीक लाने में मदद करते हैं. साथ ही उन्हें अनुशासन भी सिखाता है.

खेलीखाई औरत : 5 सौ रुपए ले लो, पर मैडम से मत कहना

रधिया का पति बिकाऊ एक बड़े शहर में दिहाड़ी मजदूर था. रधिया पहले गांव में ही रहती थी, पर कुछ महीने पहले बिकाऊ उसे शहर में ले आया था. वे दोनों एक झुग्गी बस्ती में किराए की कोठरी ले कर रहते थे.

रधिया को खाना बनाने से ले कर हर काम उसी कोठरी में ही करना पड़ता था. सुबहशाम निबटने के लिए उसे बोतल ले कर सड़क के किनारे जाना पड़ता था. उसे शुरू में खुले में नहाने में बड़ी शर्म आती थी. पता नहीं कौन देख ले, पर धीरेधीरे वह इस की आदी हो गई.

बिकाऊ 2 रोटी खा कर और 4-6 टिफिन में ले कर सुबह 7 बजे निकलता, तो फिर रात के 9 बजे से पहले नहीं आता था. उस की 12 घंटे की ड्यूटी थी.

जब बिकाऊ को महीने की तनख्वाह मिलती, तो रधिया बिना बताए ही समझ जाती थी, क्योंकि उस दिन वह दारू पी कर आता था. रधिया के लिए वह दोने में जलेबी लाता और रात को उस का कचूमर निकाल देता.

बिकाऊ रधिया से बहुत प्यार करता था, पर उस की तनख्वाह ही इतनी कम थी कि वह रधिया के लिए कभी साड़ी या कोई दूसरी चीज नहीं ला पाता था.

एक दिन दोपहर में रधिया अपनी कोठरी में लेटी थी कि दरवाजे पर कुछ आहट हुई. वह बाहर निकली, तो सामने एक जवान औरत को देखा.

उस औरत ने मुसकरा कर कहा, ‘‘मेरा नाम मालती है. मैं बगल की झुग्गी में ही रहती हूं. तुम जब से आई हो, कभी तुम्हें बाहर निकलते नहीं देखा. मर्द तो काम पर चले जाते हैं. बाहर निकलोगी, तभी तो जानपहचान बढ़ेगी. अकेले पड़ेपड़े तो तुम परेशान हो जाओगी. चलो, मेरे कमरे पर, वहां चल कर बातें करते हैं.’’

रधिया ने कहा, ‘‘मैं यहां नई आई हूं. किसी को जानती तक नहीं.’’

‘‘अरे, कोठरी से निकलोगी, तब तो किसी को जानोगी.’’

रधिया ने अपनी कोठरी में ताला लगाया और मालती के साथ चल पड़ी.

जब वह मालती की झुग्गी में घुसी, तो दंग रह गई. उस की झुग्गी में 2 कोठरी थी. रंगीन टैलीविजन, फ्रिज, जिस में से पानी निकाल कर उस ने रधिया को पिलाया.

रधिया ने कभी फ्रिज नहीं देखा था, न ही उस के बारे में सुना था.

रधिया ने पूछा, ‘‘बहन, यह कैसी अलमारी है?’’

इस पर मालती मन ही मन मुसकरा दी. उस ने कहा, ‘‘यह अलमारी नहीं, फ्रिज है. इस में रखने पर खानेपीने की कोई चीज हफ्तों तक खराब नहीं होती. पानी ठंडा रहता है. बर्फ जमा सकते हैं. पिछले महीने ही तो पूरे 10 हजार रुपए में लिया है.’’

रधिया ने हैरानी से पूछा, ‘‘बहन, तुम्हारे आदमी क्या काम करते हैं?’’

मालती ने कहा, ‘‘वही जो तुम्हारे आदमी करते हैं. बगल वाली कैमिकल फैक्टरी में मजदूर हैं. पर उन की कमाई से यह सब नहीं है. मैं भी तो काम करती हूं. यहां रहने वाली ज्यादातर औरतें काम करती हैं, नहीं तो घर नहीं चले.

‘‘बहन, मैं तो कहती हूं कि तुम भी कहीं काम पकड़ लो. काम करोगी, तो मन भी बहला रहेगा और हाथ में दो पैसे भी आएंगे.’’

‘‘पर मुझे क्या काम मिलेगा? मैं तो अनपढ़ हूं.’’

‘‘तो मैं कौन सी पढ़ीलिखी हूं. किसी तरह दस्तखत कर लेती हूं. यहां अनपढ़ों के लिए भी काम की कमी नहीं है. तुम चौकाबरतन तो कर सकती हो? कपड़े तो साफ कर सकती हो? चायनाश्ता तो बना सकती हो? ऐसे काम कोठियों में खूब मिलते हैं और पैसे भी अच्छे मिलते हैं. नाश्ताचाय तो हर रोज मिलता ही है, त्योहारों पर नए कपड़े और दीवाली पर गिफ्ट.’’

‘‘आज मैं अपनी कमाई में से ही 2 बच्चों को प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही हूं. इन की कमाई तो झुग्गी के किराए, राशन और दारू में ही खर्च हो जाती है.’’

‘‘क्या मुझे काम मिलेगा?’’ रधिया ने जल्दी से पूछा.

‘‘करना चाहोगी, तो कल से ही काम मिलेगा. जहां मैं काम करती हूं, उस के बगल में रहने वाली कोठी की मालकिन कामवाली के बारे में पूछ रही थीं. वे एक बड़े स्कूल में पढ़ाती हैं. उन के मर्द वकील हैं. 2 बच्चे हैं, जो मां के साथ ही स्कूल जाते हैं.

‘‘मैं आज शाम को ही पूछ लूंगी और पैसे की बात भी कर लूंगी. मालिकमालकिन अगर तुम्हारे काम से खुश हुए, तो तनख्वाह के अलावा ऊपरी कमाई भी हो जाती है.’’

इस बीच मालती ने प्लेट में बिसकुट और नमकीन सजा कर उस के सामने रख दिए. गैस पर चाय चढ़ा रखी थी.

चाय पीने के बाद मालती ने रधिया से कहा कि वह चाहे, तो अभी उस के साथ चली चले. मैडम 2 बजे घर आ जाती हैं. आज ही बात पक्की कर ले और कल से काम पर लग जा.

मालती ने यह भी बताया कि हर काम के अलग से पैसे मिलते हैं. अगर सफाई करानी हो, तो उस के 3 सौ रुपए. कपड़े भी धुलवाने हों, तो उस के अलग से 3 सौ रुपए. अगर सारे काम कराने हों, तो कम से कम 2 हजार रुपए.

मालती कपड़े बदलने लगी. उस ने रधिया से कहा, ‘‘चल, तू भी कपड़े बदल ले. पैसे की बात मैं करूंगी. चायनाश्ता तो बनाना जानती होगी?’’

‘‘हां दीदी, मैं सब जानती हूं. मीटमछली भी बना लेती हूं,’’ रधिया ने कहा. उस का दिल बल्लियों उछल रहा था. अगर वह महीने में 2 हजार रुपए कमाएगी, तो उस की सारी परेशानी दूर हो जाएंगी.

रधिया तेजी से अपनी झुग्गी में आई. नई साड़ी पहनी और नया ब्लाउज भी. पैरों में वही प्लास्टिक की लाल चप्पल थी. उस ने आंखों में काजल लगाया और मालती के साथ चल पड़ी.

रधिया थी तो सांवली, पर जोबन उस का गदराया हुआ था और नैननक्श बड़े तीखे थे. गांव में न जाने कितने मर्द उस पर मरते थे, पर उस ने किसी को हाथ नहीं लगाने दिया. इस मामले में वह बड़ी पक्की थी.

रास्ते में मालती ने कहा, ‘‘बहन, अगर तुम्हारा काम बन गया, तो मैं महीने की पहली पगार का आधा हिस्सा लूंगी. यहां यही रिवाज है.’’

मालती एक कोठी के आगे रुकी. उस ने घंटी बजाई, तो मालकिन ने दरवाजा खोला.

मालती ने उन्हें नमस्ते किया. रधिया ने भी हाथ जोड़ कर नमस्ते किया. मालती 2 साल पहले उन के घर भी काम कर चुकी थी.

गेट खोल कर अंदर जाते ही मालती ने कहा, ‘‘मैडमजी, मैं आप के लिए बाई ले कर आई हूं.’’

‘‘अच्छा, बाई तो बड़ी खूबसूरत है. पहले कहीं काम किया है?’’ मैडम ने रधिया से पूछा.

मालती ने जवाब दिया, ‘‘अभी गांव से आई है, पर हर काम जानती है. मीटमछली तो ऐसी बनाती है कि खाओ तो उंगलियां चाटती रह जाओ. मेरे इलाके की ही है, इसीलिए मैं आप के पास ले कर आई हूं. अब आप बताओ कि कितने काम कराने हैं?’’

मैडम ने कहा, ‘‘देख मालती, काम तो सारे ही कराने हैं. सुबह का नाश्ता और दिन में लंच तैयार करना होगा. रात का डिनर मैं खुद तैयार कर लूंगी. कपड़े धोने ही पड़ेंगे, साफसफाई, बरतनपोंछा… यही सारे काम हैं. सुबह जल्दी आना होगा. मैं साढ़े 7 बजे तक घर से निकल जाती हूं.’’

इस के बाद मैडम ने मोलभाव किया और पूछा, ‘‘कल से काम करोगी?’’

‘‘मैं कल से ही आ जाऊंगी. जब काम करना ही है, तो कल क्या और परसों क्या?’’ रधिया ने कहा.

रात में जब बिकाऊ घर लौटा, तो रधिया ने उसे सारी रामकहानी सुनाई.

बिकाऊ ने कहा, ‘‘यह तो ठीक है कि तू काम पर जाएगी, पर कोठियों में रहने वाले लोग बड़े घटिया होते हैं. कामवालियों पर बुरी नजर रखते हैं. यह मालती बड़ी खेलीखाई औरत है. जिन कोठियों में काम करती है, वहां मर्दों को फांस कर वह खूब पैसे ऐंठती है. ऐसे ही नहीं, इस के पास फ्रिज और महंगीमहंगी चीजें हैं.’’

इस पर रधिया ने कहा, ‘‘मुझ पर कोई हाथ ऐसे ही नहीं लगा सकता. गांव में भी मेरे पीछे कुछ छिछोरे लगे थे, पर मैं ने किसी को घास नहीं डाली.

‘‘एक दिन दोपहर में मैं कुएं से पानी भरने गई थी. जेठ की दोपहरी, रास्ता एकदम सुनसान था. तभी न जाने कहां से बाबू साहब का बड़ा लड़का आ टपका और अचानक उस ने मेरा हाथ पकड़ लिया. मैं ने उसे ऐसा धक्का दिया कि कुएं में गिरतेगिरते बचा और फिर भाग ही खड़ा हुआ.

‘‘मैं दबने वाली नहीं हूं. पर मैं ने बात कर ली है. दुनिया में बुरेभले हर तरह के लोग हैं.’’

बिकाऊ ने कहा, ‘‘तू जैसा ठीक समझ. मुझे तुझ पर पूरा भरोसा है.’’

दूसरे दिन रधिया सुबह जल्दी उठी और मालती को साथ ले कर 6 बजे तक कोठी पर पहुंच गई. मालकिन ने उसे सारा काम समझाया.

रधिया ने जल्दी से पोंछा लगा दिया, गैस जला कर चाय भी बना दी.

‘‘तू भी समय से नाश्ता कर लेना. चाहो तो बाथरूम में नहा भी सकती हो. साहब निकल जाएं, तो कुछ कपड़े हैं, उन्हें धो लेना.’’

थोड़ी देर में रधिया साहब के लिए चाय बनाने चली गई. ‘ठक’ की आवाज कर वह कमरे में आ गई और बैड के पास रखी छोटी मेज पर ट्रे को रख दिया.

साहब ने रधिया को गौर से देखा और कहा, ‘‘देखना, बाहर अखबार डाल गया होगा. जरा लेती आना.’’

रधिया बाहर से अखबार ले कर आ गई और साहब की तरफ बढ़ा दिया. इसी बीच साहब ने 5 सौ का एक नोट उस की तरफ बढ़ाया.

रधिया ने कहा, ‘‘यह क्या?’’

‘‘यह रख ले. मालती ने तुझ से 5 सौ रुपए ले लिए होंगे. पहले वह यहां काम कर चुकी है.

‘‘तुम ये 5 सौ रुपए ले लो, पर मैडम से मत कहना. तनख्वाह मिलने पर मैं अलग से 5 सौ तुझे फिर दे दूंगा. यह मुआवजा समझना.’’

लेकिन रधिया ने अपना हाथ नहीं बढ़ाया. इस पर साहब ने उसे 5 सौ के 2 नोट लेने को कहा.

रधिया ने साहब के बारबार कहने पर पैसे ले लिए और कपड़े धोने में लग गई. कपड़े धो कर जब तक उन्हें छत पर सुखाने डाला, तब तक साहब नहाधो कर तैयार थे. उस ने उन के नाश्ते के लिए आमलेट और ब्रैड तैयार किया, फिर चाय बनाई.

नाश्ता करने के बाद साहब बोले, ‘‘तू ने तो अच्छा नाश्ता तैयार किया. पर नाश्ते से ज्यादा तू अच्छी लगी.’’

चाय देते समय उस ने जानबूझ कर ब्लाउज का बटन ढीला कर दिया और ओढ़नी किनारे रख दी.

‘‘अब मैं चलता हूं. किसी चीज की जरूरत हो, तो मुझ से कहना. संकोच करने की जरूरत नहीं है.’’

साहब ने उसे टैलीविजन खोलना और बंद कर के दिखाया और अपना बैग रधिया को पकड़ा दिया.

बैग ले कर रधिया उन के पीछेपीछे कार तक गई. साहब ने उस के हाथों से बैग लिया. न जाने कैसे साहब की उंगलियां उस के हाथों से छू गईं.

रधिया भी 2 सैकंड के लिए रोमांचित हो उठी. साहब के जाने के बाद रधिया ने गेट बंद किया. फिर वह कोठी के अंदर आई और दरवाजा बंद कर लिया.

वह नहाने के लिए बाथरूम में गई. ऐसा बाथरूम उस ने अपनी जिंदगी में पहली बार देखा था. तरहतरह के साबुन, तेल की शीशियां और शैंपू की शीशी, आदमकद आईना.

रधिया को लगा कि वह किसी दूसरी दुनिया में आ गई है. कपड़े उतार कर पहली बार जब से वह गांव से आई थी, उस ने जम कर साबुन लगा कर नहाया और फिर बाथरूम में टंगे तौलिए से देह पोंछ कर मैडम का दिया पुराना सूट पहन कर अपनेआप को आदमकद आईने में निहारा. उसे लगा कि वह रधिया नहीं, कोई और ही औरत है.

अपने कपड़े धो कर रधिया उन्हें भी छत पर डाल आई. फिर बचे हुए परांठे खा लिए. थोड़ी चाय बच गई थी. उसे गरम कर पी लिया, नहीं तो बरबाद ही होती.

धीरेधीरे रधिया ने उस घर के सारे तौरतरीके सीख लिए. वह सारा काम जल्दीजल्दी निबटा देती और किसी को शिकायत का मौका नहीं देती. मैडम उस के काम से काफी खुश थीं. एक महीना कब बीत गया, उसे पता ही नहीं चला. महीना पूरा होते ही मैडम ने उसे बकाया पगार दे दी.

उस दिन वह काफी खुश थी. शाम तक जब वह अपनी झुग्गी में लौटी, तो उस ने सब से पहले एक हजार रुपए जा कर मालती को दे दिए.

मालती ने उसे चाय पिलाई और हालचाल पूछा. उस ने इशारों में ही पूछा कि साहब से कोई दिक्कत तो नहीं.

रधिया ने कहा, ‘‘ऐसा नहीं है.’’

मालती ने कहा, ‘‘अगर तू चाहे, तो शाम को किसी और घर में लग जा. और कुछ नहीं, तो हजार रुपए वहां से भी मिल जाएंगे.’’

इस पर रधिया ने कहा, ‘‘सोचूंगी… अपने घर का भी तो काम है.’’

साहब तो अपनी चाय उसी से लेते. जब मैडम आसपास न हों, तो उसे ही देखते रहते और रधिया मजे लेती रहती.

रधिया समझ गई थी कि मालिक की निगाह उस की जवानी पर है. वे उसे पैसे देते, तो वह पहले लेने से मना करती, पर वे जबरन उसे दे ही डालते और कहते, ‘‘देख रधिया, अपने पास पैसों की कमी नहीं है. फिर हजार रुपए की आज कीमत ही क्या है? तेरे काम ने मेरा दिल जीत लिया है. कई औरतों ने इस घर में काम किया, पर तेरी सुघड़ता उन में नहीं थी.’’

रधिया चुप रह जाती. साहब कुछ हाथ मारना चाहते थे, पर समझ ही नहीं आता था.

एक दिन मैडम ने उस से कहा, ‘‘रधिया, हमारे स्कूल से टूर जा रहा है. मैं भी जा रही हूं और बच्चे भी, घर में सिर्फ साहब रहेंगे. हमें टूर से लौटने में 10 दिन लगेंगे.

‘‘आनेजाने के टाइम का तुम समझ लेना. साहब को कोई दिक्कत न हो.

‘‘पहले आमलेट बना दे… और तू ऐसा करना, लंच के साथ डिनर भी तैयार कर फ्रिज में रख देना. साहब रात में गरम कर के खा लेंगे.’’

‘‘ठीक है,’’ रधिया ने कहा और अपने काम में लग गई.

मैडम की गए 10वां दिन था. रधिया जब ठीक समय पर चाय और पानी का गिलास ले कर साहब के कमरे में पहुंची, तो उन्होंने कहा, ‘‘आज कोर्ट नहीं जाना है. वकीलों ने हड़ताल कर दी है. फ्रिज में एक बोतल पड़ी होगी, वह ले आ. मैं थोड़ी ब्रांडी लूंगा, मुझे ठंड लग गई है.’’

रधिया रसोई में आमलेट बनाने चली गई. आमलेट बना कर उसे प्लेट में रख कर वह साहब के कमरे में गई, तो वे वहां नहीं थे. उस ने सोचा कि शायद बाथरूम गए होंगे. साहब तब तक वहां आ गए थे.

‘‘वाह रधिया, वाह, तू ने तो फटाफट काम कर दिया. तू बड़ी अच्छी है. आ चाय पी.

‘‘ये ले हजार रुपए. मनपसंद साड़ी खरीद लेना.’’

‘‘किस बात के पैसे साहब? पगार तो मैं लेती ही हूं,’’ रधिया ने कहा.

‘‘अरे, लेले. पैसे बड़े काम आते हैं. मना मत कर,’’ कहतेकहते साहब ने उस का हाथ पकड़ लिया और पैसे उस के ब्लाउज में डाल दिए.

रधिया पीछे हटी. तब तक साहब ने उस के ब्लाउज में हाथ डाल दिया था और उस के ब्लाउज के बटन टूट गए थे.

रधिया ने एक जोर का धक्का दिया. साहब बिस्तर पर गिर पड़े. इस बीच रधिया भी उन पर गिर गई.

रधिया ने एक जोरदार चुम्मा गाल पर लगाया और बोली, ‘‘साहब, 5 हजार और दो. देखो, मैडम बच्चों के साथ चली आ रही हैं.’’

साहब ने कहा, ‘‘रधिया, तू जल्दी यहां से निकल,’’ और अपना पूरा पर्स उसे पकड़ा दिया.

विधवा सही रखैल नहीं

लखिया ठीक ढंग से खिली भी न थी कि मुरझा गई. उसे क्या पता था कि 2 साल पहले जिस ने अग्नि को साक्षी मान कर जिंदगीभर साथ निभाने का वादा किया था, वह इतनी जल्दी साथ छोड़ देगा.

शादी के बाद लखिया कितनी खुश थी. उस का पति कलुआ उसे जीजान से प्यार करता था. वह उसे खुश रखने की पूरी कोशिश करता. वह खुद तो दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करता था, लेकिन लखिया पर खरोंच भी नहीं आने देता था. महल्ले वाले लखिया की एक झलक पाने को तरसते थे.

पर लखिया की यह खुशी ज्यादा टिक न सकी. कलुआ खेत में काम कर रहा था. वहीं उसे जहरीले सांप ने काट लिया, जिस से उस की मौत हो गई.

बेचारी लखिया विधवा की जिंदगी जीने को मजबूर हो गई, क्योंकि कलुआ तोहफे के रूप में अपना एक वारिस छोड़ गया था.

किसी तरह कर्ज ले कर लखिया ने पति का अंतिम संस्कार तो कर दिया, लेकिन कर्ज चुकाने की बात सोच कर वह सिहर उठती थी. उसे भूख की तड़प का भी एहसास होने लगा था.

जब भूख से बिलखते बच्चे के रोने की आवाज लखिया के कानों से टकराती, तो उस के सीने में हूक सी उठती. पर वह करती भी तो क्या करती?

जिस लखिया की एक झलक देखने के लिए महल्ले वाले तरसते थे, वही लखिया ब मजदूरों के झुंड में काम करने लगी थी. गांव के मनचले लड़के छींटाकशी भी करते थे, लेकिन उन की अनदेखी कर लखिया अपने को कोस कर चुप रह जाती थी.

एक दिन गांव के सरपंच ने कहा, ‘‘बेटी लखिया, बीडीओ दफ्तर से कलुआ के मरने पर तुम्हें 10 हजार रुपए मिलेंगे. मैं ने सारा काम करा दिया है. तुम कल बीडीओ साहब से मिल लेना.’’

अगले दिन लखिया ने बीडीओ दफ्तर जा कर बीडीओ साहब को अपना सारा दुखड़ा सुना डाला.

बीडीओ साहब ने पहले तो लखिया को ऊपर से नीचे तक घूरा, उस के बाद अपनापन दिखाते हुए उन्होंने खुद ही फार्म भरा. उस पर लखिया के अंगूठे का निशान लगवाया और एक हफ्ते बाद दोबारा मिलने को कहा.

लखिया बहुत खुश थी और मन ही मन सरपंच और बीडीओ साहब को धन्यवाद दे रही थी. एक हफ्ते बाद लखिया फिर बीडीओ दफ्तर पहुंच गई. बीडीओ साहब ने लखिया को अदब से कुरसी पर बैठने को कहा.

लखिया ने शरमाते हुए कहा, ‘‘नहीं साहब, मैं कुरसी पर नहीं बैठूंगी. ऐसे ही ठीक हूं.’’

बीडीओ साहब ने लखिया का हाथ पकड़ कर कुरसी पर बैठाते हुए कहा, ‘‘तुम्हें मालूम नहीं है कि अब सामाजिक न्याय की सरकार चल रही है. अब केवल गरीब ही ‘कुरसी’ पर बैठेंगे. मेरी तरफ देखो न, मैं भी तुम्हारी तरह गरीब ही हूं.’’

कुरसी पर बैठी लखिया के चेहरे पर चमक थी. वह यह सोच रही थी कि आज उसे रुपए मिल जाएंगे.

उधर बीडीओ साहब काम में उलझे होने का नाटक करते हुए तिरछी नजरों से लखिया का गठा हुआ बदन देख कर मन ही मन खुश हो रहे थे.

तकरीबन एक घंटे बाद बीडीओ साहब बोले, ‘‘तुम्हारा सब काम हो गया है. बैंक से चैक भी आ गया है, लेकिन यहां का विधायक एक नंबर का घूसखोर है. वह कमीशन मांग रहा था. तुम चिंता मत करो. मैं कल तुम्हारे घर आऊंगा और वहीं पर अकेले में रुपए दे दूंगा.’’

लखिया थोड़ी नाउम्मीद तो जरूर हुई, फिर भी बोली, ‘‘ठीक है साहब, कल जरूर आइएगा.’’

इतना कह कर लखिया मुसकराते हुए बाहर निकल गई.

आज लखिया ने अपने घर की अच्छी तरह से साफसफाई कर रखी थी. अपने टूटेफूटे कमरे को भी सलीके से सजा रखा था. वह सोच रही थी कि इतने बड़े हाकिम आज उस के घर आने वाले हैं, इसलिए चायनाश्ते का भी इंतजाम करना जरूरी है.

ठंड का मौसम था. लोग खेतों में काम कर रहे थे. चारों तरफ सन्नाटा था. बीडीओ साहब दोपहर ठीक 12 बजे लखिया के घर पहुंच गए.

लखिया ने बड़े अदब से बीडीओ साहब को बैठाया. आज उस ने साफसुथरे कपड़े पहन रखे थे, जिस से वह काफी खूबसूरत लग रही थी.

‘‘आप बैठिए साहब, मैं अभी चाय बना कर लाती हूं,’’ लखिया ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘अरे नहीं, चाय की कोई जरूरत नहीं है. मैं अभी खाना खा कर आ रहा हूं,’’ बीडीओ साहब ने कहा.

मना करने के बावजूद लखिया चाय बनाने अंदर चली गई. उधर लखिया को देखते ही बीडीओ साहब अपने होशोहवास खो बैठे थे. अब वे इसी ताक में थे कि कब लखिया को अपनी बांहों में समेट लें. तभी उन्होंने उठ कर कमरे का दरवाजा बंद कर दिया.

जल्दी ही लखिया चाय ले कर आ गई. लेकिन बीडीओ साहब ने चाय का प्याला ले कर मेज पर रख दिया और लखिया को अपनी बांहों में ऐसे जकड़ा कि लाख कोशिशों के बावजूद वह उन की पकड़ से छूट न सकी.

बीडीओ साहब ने प्यार से उस के बाल सहलाते हुए कहा, ‘‘देख लखिया, अगर इनकार करेगी, तो बदनामी तेरी ही होगी. लोग यही कहेंगे कि लखिया ने विधवा होने का नाजायज फायदा उठाने के लिए बीडीओ साहब को फंसाया है. अगर चुप रही, तो तुझे रानी बना दूंगा.’’

लेकिन लखिया बिफर गई और बीडीओ साहब के चंगुल से छूटते हुए बोली, ‘‘तुम अपनेआप को समझते क्या हो? मैं 10 हजार रुपए में बिक जाऊंगी? इस से तो अच्छा है कि मैं भीख मांग कर कलुआ की विधवा कहलाना पसंद करूंगी, लेकिन रानी बन कर तुम्हारी रखैल नहीं बनूंगी.’’

लखिया के इस रूखे बरताव से बीडीओ साहब का सारा नशा काफूर हो गया. उन्होंने सोचा भी न था कि लखिया इतना हंगामा खड़ा करेगी. अब वे हाथ जोड़ कर लखिया से चुप होने की प्रार्थना करने लगे.

लखिया चिल्लाचिल्ला कर कहने लगी, ‘‘तुम जल्दी यहां से भाग जाओ, नहीं तो मैं शोर मचा कर पूरे गांव वालों को इकट्ठा कर लूंगी.’’

घबराए बीडीओ साहब ने वहां से भागने में ही अपनी भलाई समझी.

घोर कलयुग है, घोर कलयुग

एक दिन सुबहसुबह पंडितजी दरवाजे पर आ धमके. उन के हाथ में पोथीपत्रा था. मैं डर गया. दरवाजा खुलते ही उन्होंने तकरीबन डांटते हुए कहा, ‘‘जानते नहीं आज पंचमी है?’’

‘‘पंचमी,’’ यह सुन कर मैं हक्काबक्का रह गया था, ‘‘पंचमी है, तो क्या हुआ?’’

‘‘इसीलिए मैं कहता हूं घोर कलयुग है, घोर कलयुग. लोगों को अपने पितरों की फिक्र ही नहीं. एक मैं हूं, जो सब को याद दिलाता रहता हूं,’’ वे मुझे घूर रहे थे. मैं कुछ बोलता, इस से पहले ही वे दोबारा बरस पड़े, ‘‘यह पितर पक्ष है. आज ही के दिन तुम्हारे पिता का ‘स्वर्गवास’ हुआ था, इसलिए आज के दिन तुम्हें श्राद्ध कराना चाहिए.’’

अपनी बात के सुबूत में उन्होंने मुझे पत्रा में वह दिन भी दिखाया, जिस दिन मेरे पिताजी का स्वर्गवास हुआ था. उन के रहने की जगह स्वर्ग में है या नरक में, यह मैं नहीं जानता, पर पंडितजी के पत्रे के पन्ने में पंचमी की तिथि जरूर लिखी थी. 2 महीने पहले ही तो पिताजी की मौत हुई थी. मैं ने पंडितजी को इज्जत से अंदर बिठाया. सब से पहले उन्हें गरमागरम चाय पिलाई, फिर पूछा, ‘‘पंडितजी, आप तो बड़े ज्ञानीध्यानी हैं, कृपा कर के यह बताइए कि यह श्राद्ध क्यों जरूरी है?’’ ‘‘तुम क्या वाकई कुछ नहीं जानते, इस बारे में. पितर की आत्मा इस पखवारे अपने प्रियजनों से भोजनपानी लेने के लिए बेचैन रहती है. पितर पक्ष में श्राद्ध करने से उन्हें शांति मिलती है,’’ पंडितजी ने हाथ नचाते हुए जवाब दिया, जैसे मेरे पितर उन के सामने हवा में दिखाई दे रहे थे.

मैं ने सुन रखा था कि ‘आत्मा’ कभी नष्ट न होने वाली चीज है. यह सभी चीजों से परे है. यह न जलती है, न गलती है, न सूखती है. इस पर किसी चीज का कोई असर नहीं पड़ता. फिर इसे भूखप्यास कैसे लगती है? इसे भोजनपानी की जरूरत क्यों है? यह मैं समझ नहीं पा रहा था. पर पंडितजी से बहस कर के उन्हें और गुस्सा करना नहीं चाहता था.

‘‘तो फिर मुझे क्या करना होगा, पंडितजी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘कुछ खास नहीं. पास ही किसी बहती हुई नदी में पितरों की शांति के लिए तर्पण करना होगा. उस के बाद कुछ ब्राह्मणों को भोजन कराने के साथसाथ दान देना होगा,’’ उन्होंने ऐसे कहा, जैसे यह कुछ भी नहीं है.

‘‘तर्पण के लिए क्या करना होगा?’’

‘‘थोड़ा सा जौ, तिल, दूध, शहद वगैरह ले लो. कुछ सामान मेरे पास है. एक लोटा ले लो और मेरे साथ चलो.’’

मैं ने उन के द्वारा बताई हुई चीजों को आननफानन इकट्ठा किया. तर्पण न कर के मैं पितरों का कोपभाजन नहीं बनना चाहता था. पता नहीं, कोई पितर कुछ नुकसान न कर डाले. जीतेजी तो पिताजी ने मुझे डांटा तक नहीं, पर अब तो उन की ‘आत्मा’ है. ‘आत्मा’ का क्या भरोसा? खैर, मैं पंडितजी के साथ सामान को लिए नदी की ओर चल पड़ा. नदी तट पर जा कर पंडितजी ने मुझ से कहा, ‘‘सब से पहले तुम नहा लो, उस के बाद तर्पण का काम करेंगे.’’ नदी का पानी काफी गंदा था. उस में नहाना भले ही मुझे अच्छा नहीं लग रहा था, पर तर्पण के लिए नहाना जरूरी था. किसी तरह आंख, कान और नाक मूंद कर मैं ने डुबकी लगा ही ली.

पानी पर कूड़ाकचरा, गंदगी तैरते हुए मेरे करीब से गुजर रहे थे. पर मैं मजबूर था, नाक भी मूंद नहीं सकता था. इस के बाद पंडितजी ने पानी में मिट्टी घोल कर मेरे बदन पर यहांवहां लेप दी. ऐसा करते समय वह कुछ बुदबुदा भी रहे थे.

‘चलो, अब इधर आओ,’’ नदी किनारे बैठते हुए पंडितजी ने कहा. मेरे वहां आ जाने पर उन्होंने मेरी उंगली में घास की एक अंगूठी पहना दी और कहा, ‘‘यह कुश है. इसे पहनने से मन साफ होता है. इसे पहन कर किए गए वादे जान दे कर भी पूरे करने चाहिए.’’ लोग तो न वादों को निभाते हैं, न ही उन्हें सही फैसला मिलता है. पर लोग एक घास के लिए अपनी जान तक न्योछावर करने को तैयार रहते हैं. वाह रे घास.

खैर, आगे उन्होंने मुझे जौ के आटे में दूध, शहद और तिल मिला कर लड्डू बनाने को कहा. मैं ने लड्डू बनाते हुए पूछा, ‘‘पंडितजी, इस का क्या होगा?’’

‘‘इन्हीं से तो तर्पण होगा. तुम्हारे पितरों को ये लड्डू ही मिलेंगे. सब के नाम पर एकएक लड्डू संकल्प कर बालू पर रखने होंगे.’’

ये लड्डू बालू पर ही लुढ़कते रहेंगे या मेरे पितरों के मुंह में जाएंगे, यह मैं नहीं जानता, पर इतना तो कह सकता हूं कि जीतेजी उन्होंने कभी जौ का कच्चा आटा क्या, पका आटा भी नहीं खाया. और यह भी कोई खाना था. अगर मैं जानता कि ये मेरे पितरों के भोजन हैं, तो मैं दालचावल, सब्जी पका कर न ले आता. अब उन प्यासों को पानी पिलाना था. पंडितजी बोले, ‘‘नदी में कमर भर जल में उतर कर अंजली में भरभर कर पितरों को पानी पिलाओ.’’ यह गंदा पानी पितरों के पीने के लिए है? मुझे संकोच हो रहा था. ऐसे गंदे पानी को पी कर क्या उन्हें हैजा नहीं हो जाएगा? तब उन के लिए डाक्टर कहां मिलेगा? पहले जानता, तो घर से साफ पानी ले आता.

किसी तरह इन सारे कामों से निबटा. पंडितजी ने आगे का कार्यक्रम बताया, ‘‘अब घर जा कर आटा, घी, चीनी, दूध, सब्जी का इंतजाम करो. कुछ रसगुल्ले भी लेते आना. मैं ब्राह्मणों को ले कर दोपहर को तुम्हारे घर पहुंच जाऊंगा.

‘‘याद रखना, तुम जिनजिन पकवानों का भोग लगाओगे, तुम्हारे पितरों को वे ही पकवान वहां यानी स्वर्ग में प्राप्त होंगे.’’

आदेश दे कर पंडितजी चले गए. अब यह गाज गिरी सो गिरी, ऊपर से मनों का मूसल सिर पर झुला दिया. दोपहर को 10 ब्राह्मणों के साथ पंडितजी पधारे. नाक के नथुनों को फुलाफुला कर उन्होंने चारों दिशाओं की हवाओं को समेटा. जब उन की नाक में मन की इच्छानुसार सुगंध न भरी, तो वे कुछ सशंकित हो गए. मुझे एक कोने में खींच कर ले गए और बोले, ‘‘सबकुछ मंगवा लिया है न? देखो, ब्राह्मणों के भोजन में कोई कसर नहीं रहनी चाहिए. तुम यहां इन्हें जो खिलाओगे, तुम्हारे पितरों को स्वर्ग में वही सब मिलेगा.’’

‘‘पंडितजी, आप चिंता क्यों करते हैं? मैं ने सारा इंतजाम कर लिया है. आप निश्चिंत रहें,’’ मैं ने उन्हें भरोसा दे कर शांत किया.

थोड़ी देर बाद उन्हें आसन पर बिठा कर पत्तल परोसी गई. मैं वहीं सामने ही खड़ा था. सभी 11 ब्राह्मण बैठ चुके थे. मेरा बेटा एक परात में सूखी रोटियां ले कर उन्हें परोसने लगा और बेटी भी पीछे से आलू और सायोबीन की सब्जी परोस रही थी. पंडितजी यह सब देख कर आगबबूला हो गए. कहां वे तर माल उड़ाने के लिए अपनी लपलपाती जीभ बारबार होंठों पर फेर रहे थे, और कहां यहां की सूखी रोटी और आलू और सोयाबीन की सब्जी. वे पैर पटकते हुए उठ खड़े हुए.

पंडितजी चिल्ला कर बोले, ‘‘यह क्या मजाक है? यह तो घोर अपमान है हम ब्राह्मणों का. तुम्हारी यह हिम्मत कैसे हुई?’’ मैं ने हाथ जोड़ कर निवेदन किया, ‘‘शांत पंडितजी, शांत, शांत हो जाइए. मैं ने कोई गलती नहीं की है. जरा मेरी बात तो सुनिए.

‘‘आप ने ही तो कहा था कि ब्राह्मणों को जो भोजन खिलाओगे, वही मेरे पितरों को मिलेगा.

‘‘पंडितजी, मेरे पिताजी का हाजमा हमेशा कमजोर रहा. वे कभी भी घी पचा नहीं पाए. जिंदगीभर सूखी रोटी ही चबाते रहे. आलू और सोयाबीन की सब्जी उन की पसंद की सब्जी थी. इसलिए मैं ने वही सब्जी बनाई है, ताकि मेरे पिताजी को उन की पसंद का खाना मिल सके.

‘‘अब इस में मेरी गलती कहां है, पंडितजी? यह श्राद्धतर्पण तो मैं अपने पिता के लिए ही कर रहा हूं न. फिर उन की सुविधाअसुविधा का खयाल तो रखना ही पड़ेगा.’’ पंडितजी यह बात सुन कर चुप हो गए. उन्होंने मुझे घूर कर देखा, फिर मजबूरन पत्तल को हाथ लगाया. मन ही मन वे मुझे हजारों गालियां दे रहे होंगे. मुझे बेवकूफ कह रहे होंगे. न जाने शाप ही दे रहे होंगे. क्योंकि उन की जूती उन्हीं के सिर पर जो पड़ गई थी. भोजन खत्म होने के बाद वे जो भाग खड़े हुए, सो आज तक मेरे दरवाजे पर नहीं आए. वे अपनी दक्षिणा मांगते कैसे? मेरे पितरों को पैसों की जरूरत तो थी ही नहीं.

सिंगल हैं, तो खुश रहने के अपने फॉर्मूले बनाएं

आजकल की पीढ़ी खुद से प्यार करती है। लड़कियां खुद अपनी खुशियों को पूरा करना जान गई हैं। लड़का हो या लड़की वह इस बात को समझ गए हैं कि बुरे रिश्ते में रहना मानसिक और शारीरिक तौर पर बीमार बना देता है. इसलिए आजकल के युवा शादी जैसे बंधन में बंधने के बजाए सिंगल रहना ज्यादा पसंद करते है. लेकिन सिंगल का मतलब यह नहीं है कि वे दुःखी है. बल्कि सिंगल लोग अपनी लाइफ में खुश रहने के अपने तरीके ढूंढ लेते हैं.

आइये जाने क्या हैं खुश रहने के वअमेजिंग फॉर्मूले

सिंगल रहने के  कई सारे रीजन्स होते हैं. किसी को उसका मनपसंद साथी नहीं मिल पता वो इसलिए सिंगल रह जाता है और कुछ लोग अपनी मर्जी से सिंगल रहना पसंद करते हैं क्योंकि उन्हें किसी के साथ रहकर उसके हिसाब से चलना पसंद नहीं होता है.  वह अपनी लाइफ अपनी मर्जी से अपनी शर्तों पर जीना चाहते हैं. जहां किसी की भी रोकटोक न हो. लेकिन कई बार सामने वाला सिंगल को बेचारे या बेचारी की नज़र से देखता है पर अब लोगों को अपनी सोच बदलनी होगी . सिंगल लोग बेचारे नहीं है बल्कि उनके लाइफ को देखने और जीने के फंडे ही अलग हैं. उन्होंने खुश रहने के अपने कुछ अलग ही फार्मूले बना रखे हैं.

सेल्फ लव करेंगे

आपके पास खुद के साथ एक प्यार भरा रिश्ता बनाने का मौका है.  एक अच्छा जीवन सेेल्फ लव  से शुरू होता है. जब तक आप खुद से प्यार नहीं करते, तब तक आपको सब कुछ बेकार ही लगेगा, और आप अक्सर खुद को कोसते रहेंगे. अगर आप खुद से प्यार करेंगे तो अपना ध्यान भी रखेंगे और खुद खुश रहने के तरीके भी खोजेंगे.

सोशल नेटवर्किंग के लिए समय ही समय है अपने पास

आपके पास अपने घर में करने को चीजें थोड़ी कम है, तो ऐसे में आपके पास लोगों पर से नेटवर्क बेहतर बनाने के लिए पर्याप्त समय होता है. इससे जीवन में बेहतर रिश्ते बनते हैं जो न केवल आपके साथी और परिवार से संबंधित होते हैं, बल्कि उससे परे भी होते हैं.

फ्लर्टिंग करना तो बनता है यार

अगर सिंगल है और किसी के साथ कोई कमिटमेंट नहीं है तो फिर किसी पर भी लाइन मारने के लिए आज़ाद हैं. ऐसे में सोचना क्या कुछ मिंटो या दिनों तक फ़्लर्ट करके अगर आपके होठों पर दिल से मुस्कान आ जाएं तो कहना ही क्या. हां, मामले को ज्यादा लम्बा इतना लम्बा ना चलाएं की सामने वाला गंभीर ही हो जाएँ. इससे आपको लोगों को जानने में मदद भी मिलेगी और बिना डरे एन्जॉय भी करने को मिलेगा.

सिंगल मतलब अकेला होना नहीं है इस माइंडसेट को चेंज करें


हॉबी को बना लिया है पैशन :
आप काम चाहे जो भी करें लेकिन अपनी प्रोफेशनल लाइफ से अलग हॉबी के लिए टाइम जरूर निकाले। वैसे भी  घर आने पर कोई नहीं है जिसे आपको समय देना हो तो ये  और भी अच्छा है अपने मन मुताबिक जो चाहे करें।

किसी ग्रुप से कनेक्टेड रहें : अब यह ग्रुप सोसाइटी के लोगों का हो सकता है, किसी क्लब के मेंबर हो सकते हैं, कोई किट्टी जॉइन कर सकते हैं. ऐसा कुछ भी करने पर अकेलापन नहीं लगेगा और चार लोगों से मिलकर मन खुश हो जाएगा .

सिंगल लोग सेक्स को ज्यादा एन्जॉय करते हैं : अब आप सोच रहे होंगे ये कैसे पॉसिबल है. जी हाँ , जरुरी नहीं सेक्स के लिए हमेशा ही किसी पार्टनर की जरुरत हो बल्कि अब तो कई ऐसे तरीके है. जिनमे साथी की जरूरत  है ही नहीं बल्कि मन हो या ना हो फिर भी दूसरे की ख़ुशी के लिए हफ्ते में 4 बार सेक्स करने के झंझट से भी झुटकारा है.

सिंगल होने के फायदे

पहले खुद को महत्व देते है : मैरेड लोग अक्सर दूसरो में या अपने पार्टनर में अपनी खुशी ढूंढते हैं. हालाँकि एक समय ऐसा आता है जब वही उनके दुःख का कारण बन जाता है. लेकिन सिंगल लोग सबसे पहले खुद को महत्व देते हैं इसलिए वह खुद से ज्यादा संतुष्ट रहते हैं और खुश भी रहते हैं.

समझौता नहीं करते :  सिंगल लोग अकेले रह लेंगे लेकिन वह कम पर समझौता नहीं करतें। उन्हें जैसा पार्टनर चाहिए मिला तो ठीक पर न मिला तो समझौता करना उनकी मज़बूरी नहीं है.

मेन्टल हेल्थ के तो क्या कहने : सिंगल लोगों की मेन्टल हेल्थ मैरिड लोगों से तो काफी बेहतर होती है क्यूंकि थकाने और टॉर्चर करने के लिए उनके पास कोई नहीं होता.

 फाइनेंशियल बेनिफिट्स सिर्फ अपने हैं : अब जो आप आप कमाते हैं वह सिर्फ आपका है. इसके लिए आप किसी को भी जवाबदेह नहीं है. आपने ही पैसा खर्चने के लिए किसी की परमिशन लेने की जरुरत नहीं है. दूसरे शब्दों में कहें तो आपके तो बल्ले बल्ले हैं जनाबे आली.

 

 

‘सरफिरा’ : सरकार परस्त सिनेमा में अक्षय कुमार के डूबते कैरियर पर फिर दांव

रेटिंगः एक स्टार
जब से अक्षय कुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू किया है,तब से वह सरकार परस्त सिनेमा को ही प्रधानता दे रहे हैं. ऐसा करने के कारण अपने कैरियर को खात्मे की ओर ही ले जा रहे हैं. एक एक्टर के रूप में अक्षय कुमार को पौलिटिक्स की बजाय ऐक्टिंग और एंटरटेनमेंट पर ध्यान देना चाहिए. लेकिन वे फिल्मों के लिए ऐसे सब्जेक्ट को चुन रहे हैं, जिस में वह बीजेपी की वाहवाही और कांग्रेस की गलतियों का बखान कर सकें.

मजेदार बात यह है कि अक्षय कुमार की यह सारी सरकार परस्त फिल्में बौक्स औफिस पर धराशायी हो रही हैं क्योंकि ऐसा करते समय उन की फिल्मों के साथ फैक्ट्स के साथ छेड़छाड़ की जाती हैं.
देश में जब काैंग्रेस की सरकार रही है, उस वक्त हर बिजनेसमैन को सरकार के अंदर की लालफीताशाही और भ्रष्टाचार की शिकायत रही है. अब 12 जुलाई को अक्षय कुमार की फिल्म ‘सरफिरा’ रिलीज हुई. इस में कैप्टन गोपीनाथ की कहानी को बैकग्राउंड बना कर कांग्रेस को कटघरे में खड़ा करने का प्रयास किया गया है.

फिल्म बारबार इस बात का जिक्र करती है कि रतन टाटा को भी अपनी हवाई सेवा शुरू करने से पहले इस लालफीताशाही का सामना करना पड़ा. इसी के चलते फिल्म देखते समय मन में सवाल उठता है कि पिछली सरकार के समय बिजनेसमैन को होने वाली दिक्कतों को जनता के सामने लाने के मकसद से तो इस फिल्म का निर्माण हिंदी में नहीं किया गया? कला/सिनेमा में जब भी इस तरह के प्रयास किए जाते हैं तो क्रिएटिवटी जस्टिफाई नहीं हो पाती है.
अगस्त, 2003 में कैप्टन गोपीनाथ ने सामान्य लोगों को एक रुपए में हवाई यात्रा कराने के मकसद से ‘डेक्कन एयरलाइंस’ की शुरू की थी. उस के बाद उन्होंने अपनी बायोपिक बुक ‘सिम्पली फ्लाई ए डेक्कन ओडिसी’ में इस एअरलाइंस को शुरू करने को ले कर आनेवाली प्रौब्लम्स का जिक्र किया है. इसी में साउथ इंडियन ऐक्टर सूर्या ने 2020 में तमिल फिल्म ‘सुराराई पोटरु’ बनाई थी. इस फिल्म को कई नैशनल अवार्ड मिले. सूर्या को बेस्ट ऐक्टर का नैशनल अवार्ड मिला.
सुधा कोंगरा निर्देशित यह मूवी हिंदी में डब हो कर ‘उड़ान’ नाम से आई, जो ‘अमेजन प्राइम वीडियो’ पर है. इसी पर फिल्म ‘सरफिरा’ बनी है, जिस का निर्देशन मूल तमिल फिल्म को डायरेक्टर सुधा कोंगारा ने ही किया है लेकिन अक्षय कुमार की हिंदी फिल्म ‘सरफिरा’ में कई झूठ हैं. पहली बात तो ‘सरफिरा’ यह नहीं कहती कि यह तमिल फिल्म ‘सुराराई पोटरु’ का रीमेक है. इस की वजह है कि ‘सरफिरा’ में सिनेमाई छूट के नाम पर काफी बदलाव किए गए हैं.

‘सरफिरा’ यह भी नहीं कहती कि यह कैप्टन गोपीचंद की बायोपिक फिल्म है. हां! फिल्म ‘सरफिरा’ में यह बताया गया है कि सच्ची घटनाओं पर आधारित यह फिल्म ‘सिम्पली फ्लाई ए डेक्कन ओडिसी’ से प्रेरित है.
लंबे समय से बौक्स आफिस पर लगातार असफलता का दंश झेलते आ रहे अक्षय कुमार ने इस फिल्म के रिलीज से पहले ही अपनी पीआर एजेंसी को बदला. लेकिन अफसोस यह नई पीआर एजेंसी भी अक्षय कुमार के कैरियर को संवारेगी, ऐसा नहीं लगता क्योंकि इस की कार्यशैली अच्छी तो नहीं कही सकती. यह एजेंसी फिल्म ‘सरफिरा’ के फोटोग्राफ तक देने में यह रिव्यू लिखे जाने तक असमर्थता प्रकट करती रही. अक्षय कुमार ने दूसरी गलती यह कि इस फिल्म में भी अक्षय कुमार अपरोक्ष रूप से एक एजेंडे को ही पेश कर रहे हैं. एक्टर को नहीं भूलना चाहिए कि देश की सरकारों के कामकाज पर अब जनता अपनी पैनी नजर रखती है.

‘डेक्कन एयरलाइंस’ की पहली उड़ान अगस्त, 2023 को शुरू हुई थी. देश में 1999 से 2004 के बीच एनडीए की सरकार थी और भाजपा के अटल बिहारी बाजपेयी प्रधानमंत्री थे लेकिन फिल्म में नौकराशाह की लालफीताशाही व भ्रष्टाचार को ही विशेष रूप से दिखाया गया जैसे कि यह सब कांग्रेस की सरकार में हो रहा हो.
असल जिंदगी में कैप्टन गोपीनाथ सरकारी सैनिक स्कूल में पढ़े, एनडीए की परीक्षा पास कर देहरादून की इंडियन मिलिट्री अकादमी में पढ़े और भारत-बांग्लादेश की लड़ाई के समय भारतीय फौज में रहे. नौकरी छोड़ने के बाद उन्होंने दुनिया भर के काम किए और अंत में आ कर वियतनाम युद्ध के बाद वहां की एक युवती के कम पैसों वाली हैलीकौप्टर सेवा शुरू करने की कहानी से प्रेरित हो कर एयर डेक्कन शुरू करने का सपना देखा था, जिसे पूरा करने में वह सफल हुए थे पर अब डेक्कन एअर बंद हो चुकी है.

कैप्टन गोपीनाथ वह इंसान हैं, जिन्होने भारत के आम इंसानों को एक रुपए में ‘एअर डेक्कन’ से हवाई यात्रा करने का अवसर दिया. बेशक हर उड़ान में ऐसी सुविधा कुछ सीमित लोगों को ही उपलब्ध कराना संभव था. स्वयं एक गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले गोपीनाथ का लक्ष्य गरीबों के लिए हवाई यात्रा को संभव बना कर वर्ग और जाति विभाजन को पाटना था. वह वर्ग और जाति की बाधाओं को तोड़ते हुए एक सच्चे सामाजिक उद्यमी की पहचान और सीएसआर (कौर्पाेरेट सामाजिक जिम्मेदारी) का एक चमकदार उदाहरण बने. पर व्यावसायिक रूप से एक रूपए में हवाई यात्रा की सोच के चलते कई विमामन विशेषज्ञ कैप्टन गोपीनाथ को हीरो नहीं मानते.

फिल्म की कहानी के केंद्र में वीर म्हात्रे व उन के सपनों की उड़ान है. फिल्म शुरू होने पर पता चलता है कि पर्याप्त ईंधन न होने के चलते डेक्कन एयर का एक विमान चेन्नई हवाई अड्डे पर उतरना चाहता था, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से उसे अनुमति नहीं दी गई. तब डेक्कन एअर के मालिक वीर म्हात्रे (अक्षय कुमार) विचित्र तरीके से एटीसी (एयर ट्रैफिक कंट्रोल) टावर में घुस कर फोन छीन लेता है और अपने पायलट को पास के एक सैन्य रनवे पर उतरने का निर्देश देता है. पायलट के पास भी इस के अलावा कोई विकल्प नहीं है. वह एक कठिन लैंडिंग के लिए परेड अधिकारियों के ऊपर से उड़ता हुआ रनवे पर उतरता है,तब तक प्लेन के एक पहिये में आग लग चुकी होती है. दोनों पायलट बुरी तरह से घायल हो चुके हैं लेकिन बिना अनुमति के सैन्य पट्टी पर उतरने के लिए वीर म्हात्रे को भारी कीमत चुकानी पड़ती है.

इस सीन के बाद कहानी 1998 में महाराष्ट्र के एक साधारण गांव जरांदेश्वर पहुंच जाती है जहां ट्रेन से रानी (राधिका मदान) का परिवार वीर म्हात्रे (अक्षय कुमार) के घर इस उम्मीद के साथ पहुंचता है कि उन की घमंडी बेटी रानी को वीर म्हात्रे पसंद आ जाए, जिसे अब तक 20 लड़के नापसंद कर चुके हैं. वीर म्हात्रे, रानी के परिवार से अधिक गरीब है और उन का घर खेतों के बीच अस्थायी आवास है. वीर को 24 लड़कियां ठुकरा चुकी हैं. वीर, रानी को बताता है कि घर में शौचालय, उस की नौकरी, अच्छा आवास या पारिवारिक संपत्ति कुछ नहीं है पर वह पहली कम लागत वाली एयरलाइन शुरू करने के सपने को पूरा करना चाहता है. रानी के परिवार के लोग रवि म्हात्रे के साथ रिश्ता करने को तैयार नहीं लेकिन वीर,रानी को पसंद कर लेता है. पर रानी कहती है कि जब वीर की सस्ती एयरलाइंस का सपना पूरा हो जाएगा, तब वह शादी के लिए सोचेगी. इस बीच वह अपना बेकरी का व्यवसाय शुरू कर देती है.

वीर म्हात्रे (अक्षय कुमार) बचपन से ही क्रांतिकारी सोच का है. वह समाज में शोषितों और वंचितों के लिए कुछ करना चाहता है. इसी सोच के साथ वह इंडियन एयरफोर्स जौइन करता है, हालांकि इसी बीच एक घटना घटती है. वीर के पिता की तबीयत बहुत खराब हो जाती है. वह अंतिम वक्त पर अपने बेटे को बस एक नजर देखना चाहते हैं. वीर जैसेतैसे कर के आर्मी कैंप से दोस्तों से कुछ पैसे उधार ले कर वहां से एअरपोर्ट के लिए निकलता है, जिस से जल्दी घर पहुंच सके, लेकिन एयरलाइंस की महंगी टिकट के चलते वह अपने घर पिता की मौत हो जाने के बाद पहुंचता है.
इस घटना के बाद वीर प्रण लेता है कि वह ऐसी एयरलाइन शुरू करेगा जिस में लोग कम दाम में भी हवाई सफर कर सकें. उस के इस काम में काफी बाधाएं और खलल पैदा की जाती हैं. लोकप्रिय जैज एअरलाइन के मालिक परेश गोस्वामी (परेश रावल), वीर के रास्ते में सब से बड़ा रोड़ा बनते हैं. परेश की सोच है कि निचला तबका या मध्यम वर्गीय लोग प्लेन में ट्रैवल नहीं कर सकते, इस में सफर करने का अधिकार सिर्फ पैसे वालों को है. वीर को असफल करने के लिए परेश सारे हथकंडे अख्तियार करते हैं पर वीर को उस के परिवार के साथ ही पूरे गांव वालों का सहयोग मिलता है. तमाम बाधाओं के बावजूद अंततः  अगस्त 2003 में एअर डेक्कन की पहली उड़ान शुरू होती है.
फिल्म की कहानी प्रेरणादायक है,मगर कई जगह कमजोर स्क्रिप्ट और एजेंडे को ले कर चलने की वजह से कुछ मार खा जाती है. फिल्मकार ने जातिगत भेदभाव के अलावा अमीरों की छोटी जाति के प्रति सोच को बहुत ही बेहतर तरीके से उकेरा है. फिल्म में जैज एयरलांइस के मालिक परेश का व्यवहार अमीर व गरीब के बीच की खाई को दिखाता है. परेश को पसंद नहीं कि सफाई कर्मी वही वाशरूम यूज करे या उन के अगलबगल में बैठे.

हर इंसान को अपने सपने को पूरा करने के लिए कई बाधाओं का सामना करना पड़ता है. पर कैप्टन गोपीनाथ की बाधाओं में सरकारी व्यवस्था के काम करने के तरीके के साथसाथ व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता भी अहम रही. कई बार इंसान हताश भी होता है. रवि म्हात्रे भी हताश होते हैं, मगर फिल्मकार उस हताशा को ठीक से बयां नहीं कर पाए.
कहानी को तमिलनाडु से महाराष्ट्र के परिवेश में बदला गया है. यह किस की सलाह पर हुआ पता नहीं. लेकिन अक्षय कुमार और राधिका मदान अपने कैरेक्टर में पूरी तरह से ढल नहीं पाए. फिल्म में कुछ सवालों को हवा में छोड़ दिया गया है. रवि म्हात्रे ने कब और क्यों एअरफोर्स की नौकरी छोड़ी या रानी का बेकरी का व्यवसाय किस तरह शुरू हआ,आखिर डेक्कन एअर क्यों बंद हुई, इस पर फिल्म खामोश रहती है. ट्रेन में परिवार के साथ यात्रा करते हुए रानी के मांसाहारी भोजन करने का सीन व बातचीत को रखने की वजह समझ से परे है. यह भी किसी एजेंडे के तहत ही रखा गया क्या?

कुछ संवाद अच्छे बन पड़े हैं,मगर जैज एयरलाइंस के मालिक परेश के संवाद फिल्म ‘हेरा फेरी’ से चुराए हुए लगते हैं. आश्चर्य की बात यह है कि निर्देशक को यह भी नहीं पता कि मोटर साइकिल सवार के लिए पूरे देश में हेलमेट पहनना अनिवार्य है.
लंबे समय से बौक्स औफिस पर अक्षय कुमार फिल्में बुरी तरह से असफल होती रही हैं. ‘सरफिरा’ में कहानी तो जबरदस्त है, मगर रवि म्हात्रे के किरदार को परदे पर साकार करने में अक्षय कुमार मता खा गए हैं. उन के हंसने व रोने का एक जैसा मैनेरिजम हम पिछले 15 वर्षों से उन की हर फिल्म के हर किरदार में देखते आ रहे हैं. उन की चालढाल, हाथ हिलाने के अंदाज में भी कहीं कोई बदलाव नहीं आया. अक्षय कुमार का अभिनय पूरी तरह से मशीन जैसा हो गया है. यही वजह है अक्षय कुमार ने अब तक ‘मिशन रानीगंज’ या ‘सम्राट पृथ्वीराज’ सहित जितनी भी बायोपिक फिल्मों में अभिनय किया, यह सभी असफल ही रहीं.
अक्षय कुमार के अभिनय की सब से बड़ी कमजोरी यह है कि वह किसी भी किरदार में अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने का प्रयास ही नहीं करते. शायद उनके अभिनय को निखार सके, ऐसा निर्देशक उन्हें नहीं मिला. घमंडी, खड़ूस,सख्त व आत्मविश्वासी मराठी लड़की रानी के किरदार में राधिका मदान जरुर अपनी छाप छोड़ती हैं, मगर मराठी भाषा के संवाद भी उन के जबान से अटपटे ही लगते हैं. फिल्म में एक संवाद के माध्यम से यह साफ किया जा चुका है कि रवि म्हात्रे,रानी से उम्र में काफी बड़े हैं इसलिए इन की कैमिस्ट्री को ले कर कोई सवाल नहीं उठता.
कैप्टन चैतन्य राव के किरदार में अभिनेता कृष्णकुमार बालासुब्रमण्यम ठीक ठाक हैं. जैज़ एयरलाइंस के मालिक परेश गोस्वामी की भूमिका में परेश रावल को देख कर ‘हेरा फेरी’ का उन का किरदार याद आ जाता है. रवि म्हात्रे के दोस्त के किरदार में प्रकाश बेलवाडी अपने अभिनय की छाप छोड़ने में सफल रहे हैं. रवि म्हात्रे की मां के किरदार में सीमा बिस्वास सुखद एहसास देता है.

बहू की गुफ्तगू

डा. जाकिर अली लखनऊ से दिल्ली की फ्लाइट में उड़ान भर रहे थे. इस शहर से जुड़ी उन की पुरानी यादें हवाई जहाज की रफ्तार से भी तेजी से उन के दिमाग में घूम रही थीं. वे 8-10 दिनों बाद गांव से दिल्ली लौटे तो खुद के कमरे की खिड़कियों की पत्थर की नक्काशीदार जालियों पर लोहे के फ्रेम में बारीक तारों की एक और जाली लगी देख कर असमंजस में पड़ गए. उन्हें कुछ समझ में नहीं आया. उन्होंने बड़े बेटे शाहिद से जानना चाहा, तो वह बोला, ‘‘जी अब्बू, खिड़की की पुरानी जाली के बड़ेबड़े सूराखों से धूल, मच्छर, कीड़े वगैरा आते थे, इसलिए इस कमरे के अंदर की तरफ से यह जाली लगवा दी. कुल 3 हजार रुपए लगे और अब्बू, खिड़की की जाली के पत्थर पर पुराना शानदार नक्काशी का काम तो बाहर से आने वालों को पहले की तरह ही नजर आता है. और…और…इस के बाद कुछ तो नवाबी खानदान की घुट्टी में मिली तहजीब से पिता के प्रति सम्मान और कुछ कोई ठोस वजह वाले शब्द नहीं मिलने से वह हकलाते हुए चुप हो गया.

तभी उस के कमरे से उस की बीबी की आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘और  लोगों की नजरों पर एक मोहूम सा परदा भी पड़ा रहेगा.’’ इस के बाद उस की बेशरम हंसी की आवाज आई तो डा. जाकिर अली बौखला गए. उन की मौजूदगी में उन की पुत्रवधू का इस तरह गुफ्तगू करना और ठहाका लगा कर हंसना उन के खानदानी आचरण में नहीं था. उन्होंने सवालिया नजरों से शाहिद को देखा तो वह शर्मिंदगी से नजर झुकाए पीछे मुड़ा और अपने कमरे में चला गया.

मोहूम से परदे का जुमला डा. जाकिर के दिल में नश्तर की तरह चुभ गया था. सो, शाहिद के चले जाने के बाद वे काफी देर गुमसुम खड़े रहे. फिर बोझिल कदमों से धीरेधीरे चल कर अपने कमरे में जा कर आरामकुरसी पर गिर से पडे़. डा. जाकिर अली की आंखों के सामने यह जुमला सिनेमा की रील की तरह चालू हो गया…

डा. जाकिर अली नवाबी खानदान से संबंध रखते थे. महानगर से 50 किलोमीटर दूर गांव में उन की 5 मंजिली पुश्तैनी हवेली, आम के कई बाग और काफी सारी खेती की जमीन थी. उर्दू उन के खून में थी. सो, गांव के मदरसे से शुरू हुई शिक्षा राज्य की प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी से उर्दू और फारसी में एमए, पीएचडी कर के पूरी हुई. फिर उसी यूनिवर्सिटी में वे उर्दू के लेक्चरर बने और हैड औफ द डिपार्टमैंट के पद से रिटायर हुए. यह कोई 30-35 साल पहले की बात है जब डा. जाकिर ने यूनिवर्सिटी में पढ़ाना शुरू किया. जब भी किसी शायर का कलाम पढ़ाते तो क्लास का माहौल ऐसा उर्दूमय और शायराना बना देते थे कि दूसरी क्लासों के लड़के उन की क्लास में आ कर बैठ जाया करते थे. ऐसे ही एक दिन वे किसी सूफी शायर की कोई कविता पढ़ा रहे थे और उस की तुलना भारतीय विशिष्ट अद्वैत से करने के लिए वे एक संस्कृत का श्लोक उद्धृत करना चाह रहे थे लेकिन नफीस उर्दू जबान पर संस्कृत का श्लोक बारबार फिसल जाता था. तभी उधर से संस्कृत विभाग की लेक्चरर डा. मंजरी निकलीं. डा. मंजरी ने उन्हें नमस्कार किया और बतलाया कि संस्कृत के कठिन शब्दों को 2 टुकड़ों में बांट कर बोलें तो वे बिलकुल सरल हो जाएंगे. डा. जाकिर अली की मुश्किल हल हो गई.

डा. मंजरी डा. जाकिर की हमउम्र थीं. उस दिन से संस्कृत के कठिन शब्दों की गांठ खोलने का जो सिलसिला शुरू हुआ उस के चलते वे न जाने कब एकदूसरे के सामने अपने मन की गांठें खोलने लगे और धीरेधीरे एकदूसरे के मन में इतने गहरे उतर गए कि अब अगर एक दिन भी आपस में नहीं मिलते थे तो दोनों ही बेचैन हो जाते. दूसरे दिन मिलने पर दोनों की आंखें गवाही देती थीं कि रातभर नींद का इंतजार करते दुख गई हैं.

ऐसे ही एक रतजगे के बाद दोनों मिले तो डा. जाकिर ने डा. मंजरी का हाथ अपने हाथ में थाम कर बेताबी से कहा, देखो, मंजरीजी, अब इस तरह गुजारा नहीं होगा. मैं क्या कहना चाह रहा हूं आप समझ रही हैं न.’ मंजरी ने जवाब दिया था, ‘जाकिर साहब, पिताजी तो खुले विचारों के हैं, इसलिए उन्हें तो करीबकरीब मना लिया है मगर मां को मनाने में थोड़ा वक्त लगेगा, थोड़ा इंतजार करिए, सब्र का फल मीठा होता है.’ तब वह जमाना था जब देश की गंगाजमुनी संस्कृति में राजनीति विष सी  बन कर नहीं घुली थी. वोटों की खातिर सत्ता के दलालों ने 2 संस्कृतियों को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक का सांप्रदायिक लिबास नहीं पहनाया था. लवजिहाद या घरवापसी के नारे नहीं गूंजे थे. संस्कृत विभाग के प्रोफैसर डा. रामकिंकर खुद डा. जाकिर के बड़े बन कर उन की तरफ से पैगाम ले कर मंजरी के घर गए थे और पहली बार उन की मां की गालियां खा कर चुपचाप लौट आए. मगर दूसरे दिन ही फिर पहुंच गए. फिर लगातार समझाइश के बाद आखिर उन्होंने खुद डा. जाकिर का बड़ा भाई बन कर  जिम्मेदारी ली कि विवाह के बाद न  तो मंजरी का नाम बदला जाएगा, न धर्म. फिर 2-4 पढ़ेलिखे और समाज के प्रतिष्ठित व प्रगतिवादी लोगों की मध्यस्थता से उन्होंने अपनी मुंहबोली भांजी डा. मंजरी का विवाह डा. जाकिर से करा दिया था.

डा. मंजरी विवाह के बाद भी मंजरी ही रहीं. शादी के 3 सालों बाद जब पहली संतान हुई तो मंजरी ने ही जाकिर अली से कहा, ‘जाकिर साहब, औलाद की पहचान बाप के नाम से होती है, आप बच्चे का नाम अपने खानदानी रिवायत के मुताबिक ही रखें.’ और बच्चे का नाम शाहिद तय हुआ था. इस के 3 सालों बाद जब दूसरा पुत्र हुआ तो उस का नाम साजिद रखा गया. डा. जाकिर अली की शादी को 10 साल बीत गए थे. सबकुछ बेहद खुशगवार था. तभी उस साल चेचक महामारी बन कर फैली और पता नहीं कैसे डा. मंजरी उस की चपेट में आ गईं. बहुत दवा, कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका.  डा. जाकिर अली की तो दुनिया ही उजड़ गई. वे एकदम टूट गए थे. अब न तो उन्हें पढ़ाने में वह दिलचस्पी रही थी न क्लास लेने में. घरगृहस्थी की परेशानी थी, सो अलग. पता नहीं मंजरी ने पिछले 10 सालों में उन्हें और उन के घर को कैसे संभाला था कि आज उन्हें यह भी मालूम नहीं था कि उन्हें बनियान कितने नंबर की आती है.

रिश्तेदारी और परिवार में कोई ऐसी महिला थी नहीं, जिसे वे घर ला कर बच्चों की परवरिश व घर की जिम्मेदारी दे कर निश्ंिचत हो जाते. घर जैसेतैसे पुराने बावर्ची और माली की मदद से चलता रहा. एक साल बीत गया तो उन्होंने शाहिद और साजिद को होस्टल में भेजने का निर्णय किया. यह पता चलने पर बूढ़े बावर्ची ने रोते हुए साजिद को कलेजे से लगा कर फरियाद की, ‘नवाब साहब, नमक खाया है इस घर का और आप के पिता ने हमें चाकर नहीं समझा. आज उन्हीं की याद दिला कर आप से कहता हूं कि बच्चों को हमारी नजरों से दूर नहीं करें.’ हार कर उन्होंने एक पढ़ीलिखी आया की जरूरत का इश्तिहार दे दिया. इंटरव्यू के लिए राबिया बानो उन के घर आईं तो डा. जाकिर को लगा कि शायद वे यों ही आई होंगी. राबिया यूनिवर्सिटी में म्यूजिक डिपार्टमैंट में ट्यूटर थीं और गजलों के संगीत की धुन बनाने के लिए उर्दू गजलों में अरबी या फारसी के कुछ कठिन शब्दों का सीधीसादी भाषा में अर्थ समझने के लिए अकसर उन से मिलती रहती थीं. उन के बारे में बताया गया था कि उन के शौहर मेकैनिकल इंजीनियर थे. कंपनी के कौंट्रेक्ट पर दुबई गए थे. वहां किसी विदेशी महिला की मुहब्बत के जाल में फंस गए और उस से निकाह कर के टैलीफोन पर 3 बार तलाक बोल कर राबिया बानो को तलाक दे दिया.

थोड़ी देर इधरउधर की बातें होती रहीं. मगर जब दूसरी महिला उम्मीदवार आने लगी तो राबिया खुद उन से बोलीं, ‘डाक्टर साहब, आप ने 2 बच्चों की परवरिश करने लायक एक पढ़ीलिखी आया की जरूरत का इश्तिहार दिया है न?’ ‘जी हां, क्या आप की नजरों में कोई है, या आप किसी की सिफारिश कर रही हैं,’ डा. जाकिर ने अधीरता से पूछा तो राबिया ने बड़ी दृढ़ता से जवाब दिया, ‘न तो मेरी नजर में कोई है, न मैं किसी की सिफारिश कर रही हूं. डाक्टर साहब, मैं खुद हाजिर हुई हूं.’

जवाब सुन कर वे ऐसे चौंके थे जैसे कोई करंट का जोरदार झटका लगा हो. मगर बोले, ‘आप यह क्या कह रही हैं राबियाजी, आप, आप.’ आगे कोई उपयुक्त शब्द नहीं मिलने के कारण वे खुद को बेहद असहज महसूस करते हुए चुप हो गए.

उन की स्थिति को समझते हुए राबिया ने बड़ी संजीदगी से जवाब दिया, ‘डाक्टर साहब, मैं पूरे होशोहवास में आप के सामने यह प्रस्ताव रख रही हूं. पिछले 4 सालों से मैं अकेली इस समाज के भेड़ की खाल ओढ़े भेडि़यों से अपने को महफूज रखने की जंग लड़तेजूझते पस्त हो गई हूं. तलाकशुदा अकेली औरत को हर कोई मिठाई का टुकड़ा समझ कर निगल जाना चाहता है. पहले वर्किंग वुमेन होस्टल में रहती थी. वहां की वार्डन महोदया देखने में तो हमजैसी अकेली औरतों की बड़ी हमदर्द थीं, मगर वास्तव में वे भड़वागीरी करती थीं. वहां से निकल कर यूनिवर्सिटी के गर्ल्स होस्टल में रहने लगी तो कुछ दिनों बाद ही वहां के वार्डन महोदय को उर्दू सीखने का शौक चर्राया और वे इस बहाने देर रात गए मेरे कमरे में जमने लगे. फिर उर्दू की सस्ती किताबों में बाजारू लेखकों के द्विअर्थी इशारों को समझने के बहाने घटिया हरकतें करने लगे. तो एक दिन मैं ने उन्हें सख्ती से डांट दिया. बस, 2 सप्ताह में ही उन्होंने मुझे वहां से यह कह कर हटवा दिया कि मेरे रहने पर गर्ल्स स्टूडैंट्स को एतराज है. अब जिस सोसाइटी के फ्लैट में रह रही हूं वहां के सैके्रटरी साहब, वैसे तो छोटी बहन कहते हैं, मगर बातबात में गले लगाने और देररात को, खासतौर पर उन की नर्स पत्नी की नाइट ड्यूटी होने पर, मेरी खैरियत के बहाने मेरे घर का दरवाजा थपथपाने के पीछे छिपे उन के मकसद, उन की नीयत को मैं समझ रही हूं. ‘आप भले ही इसे मेरी बेहयाई कहें या फिलहाल मुझे किसी लालच से प्रेरित समझें, मगर मैं आप के पास यह ख्वाहिश ले कर आई हूं कि मुझे आया नहीं, इन बच्चों की मां बन कर इन की परवरिश करने का मौका दें. मैं वादा करती हूं कि आप की दौलत और जमीनजायदाद से मेरा कोई संबंध नहीं रहेगा. सिर्फ आप की और इन बच्चों की खिदमत में जिंदगी गुजार दूंगी. बस, आप से सिर्फ यह गुजारिश करूंगी कि अगर मुझ से कभी कोई खता हो जाए तो इसी घर के किसी कोने में नौकरानी बन कर पड़े रहने की इजाजत दे दीजिएगा. उस सूरत में मुझे तलाक की सजा मत दीजिएगा’, कहतेकहते राबिया की आवाज रुंध गई और आंखों से आंसू टपकने लगे.

उन की बात सुन कर डा. जाकिर बेहद उलझन में पड़ गए थे. वे राबिया को पिछले 4 सालों से जानते थे. उन के बारे में कभी कोई इधरउधर की बात नहीं सुनी थी. मगर ऐसा कैसे मुमकिन होगा, सोचते हुए बेहद असमंजस में वे इधरउधर टहलने लगे. तो बूढ़े बावर्ची चाय ले कर पेश हुए और बोले, ‘नवाब साहब, छोटे मुंह बड़ी बात कहने की गुस्ताखी कर रहा हूं. मेरी आप से अपील है कि इन की बातों पर गौर फरमाएं. हमें इन की बातों में सचाई नजर आती है, मालिक.’ बूढ़े बावर्ची की समझाइश में कुछ ऐसा असर था कि एक सप्ताह बाद ही एक साधारण से समारोह में राबिया बानो, बेगम जाकिर अली बन गईं. इस के 2 सप्ताह बाद ही जब राबिया ने यूनिवर्सिटी की सेवा से अपना त्यागपत्र देने की घोषणा की तो डा. जाकिर ने ही कहा था, ‘राबिया, अभी तुम ट्यूटर हो, जल्द ही तुम्हारा प्रमोशन होने वाला है. और जहां तक मैं समझता हूं, तुम्हें संगीत से लगाव महज प्रोफैशनल नहीं है, वरना किसी गजल को बिलकुल अक्षरश: सही समझ कर उस की धुन तैयार हो, यह जनून प्रोफैशनल में नहीं, डिवोशनल में ही हो सकता है जो संगीत को एक इबादत का दरजा देता हो. तुम्हें यूनिवर्सिटी की नौकरी नहीं छोड़नी चाहिए.’

उन की लंबी तकरीर सुन कर राबिया बेगम ने सिर्फ इतना कहा था, ‘जनाब, बच्चों की सही परवरिश और घरगृहस्थी की देखभाल भी एक इबादत है. संगीत की इबादत के लिए यूनिवर्सिटी की नौकरी की नहीं, रियाज की जरूरत होती है. मैं वक्त निकाल कर रियाज करती रहूंगी’ और उन्होंने इस्तीफा भेज दिया था. बीते दिन फिर से लौटने लगे. राबिया की प्यारभरी देखभाल से बच्चे बेहद खुश रहते. डा. जाकिर बारबार राबिया बेगम से संगीत का रियाज जारी रखने की अपील करते. राबिया बेगम को इतने बड़े घर की देखभाल और बच्चों की परवरिश से बहुत कम समय मिलता था. फिर भी जब भी समय मिलता, वे रियाज करतीं. उन की आवाज में वह कशिश थी कि जब वे कोई गजल गाती थीं तो किसी खास भावुक पंक्ति की रवानगी पर वे इस कद्र भावुक हो जाती थीं कि शब्द आंसू बन कर उन की आंखों से बहने लगते थे और जाकिर साहब खुद की शायराना भावुकता से उन के आंसुओं को गजल के खयाल मान कर अपने होंठों से चूम लेते थे.

ऐसे ही 20-22 साल कब बीत गए, पता ही नहीं चला. जाकिर साहब रिटायर हो गए. बच्चे अच्छे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाई पूरी कर के अच्छी नौकरियों में लग गए. जाकिर साहब अब पूरी तरह किताबों में डूबे रहते. शाम को वे राबिया बेगम से कोई गजल सुनाने के बहाने रियाज के लिए प्रेरित करते थे. उस दिन राबिया बेगम फैज साहब की गजल के अशआर लय में गा रही थीं.

‘गरचे मिल बैठे जो हम तुम, वो मुलाकात के बाद,

अपना एहसासे जियां जानिए कितना होगा.

हम सुखन होंगे जो हम तुम तो हर इक बात के बीच,

अनकही बात का मोहूम सा परदा होगा.’

अशआर के आखिरी मिसरे को गाते हुए राबिया इतनी भावुक हो गईं कि शब्द उन की आंखों से बहने लगे तो हमेशा की तरह जाकिर अली अपनी कुरसी से उठे और उन्होंने राबिया बेगम का चेहरा अपने हाथों में थाम कर उन के आसुओं को होंठों में समा लिया.

संयोग से उसी समय शाहिद की बेगम खरीदारी कर के लौटी थी. कई सारे बैग्स के बोझ को हाथों में बदलने के लिए वह उन के कमरे की इस आदमकद खिड़की के बाहर रुकी थी. तभी उस ने इस भावनात्मक दृश्य को देखा और अपने पति से शिकायत लगाई, ‘इस उम्र में यह आशनाई-तौबातौबा. अगर कोई बाहर का आदमी देख लेता तो, आप इन आदमकद खिड़कियों पर परदा लगवाने के लिए तो कहिए.’

दरअसल बात यह थी कि इस हवेलीनुमा मकान के आखिरी कोने पर बने इस आदमकद खिड़कियों वाले कमरे पर शाहिद की बीवी की मुद्दत से नजर थी. कमरे के बाहर फलदार पेड़ों की कतार, और फूलों की क्यारियां थीं. शरद की मादक चांदनी रातों में और वसंत के मौसम में कमरे से बाहर निकले बिना इस खिड़की के सामने बैठ कर ही फूलों व आमों के बौर की खुशबू के साथ उस शायराना माहौल को महसूस किया जा सकता था. शाहिद की बीवी की तालीम बीए तक थी. शायरी और उर्दू

की तहजीब तो उसे नहीं थी, हां, उस का मिजाज आशिकाना जरूर था. वह पहले भी कई मौकों पर यह इच्छा जाहिर कर चुकी थी कि अब्बू और अम्मी अगर गांव में जा कर रहें तो बेहतर होगा. वरना आधी से ज्यादा हवेली में अम्मी ने जो लड़कियों के लिए स्कूल खुलवा दिया है, स्कूल वाले धीरेधीरे पूरी हवेली पर ही काबिज जो जाएंगे. जमीनजायदाद की फसल वगैरा भी अभी कारिंदों की ईमानदारी पर ही मिल रही है. तब जमीनजायदाद की भी बेहतर देखभाल हो सकेगी.

इस के अलावा, वह, एक बार डा. जाकिर द्वारा आम के बागों का ठेका उस के एक रिश्तेदार को देने से इनकार कर देने की वजह राबिया बेगम को मानती थी, इसलिए उन से मन ही मन बेहद नाराज थी. सो, वह किसी भी तरह उन्हें इस घर से अलग कर देना चाहती थी.

इस वाकए के 2 दिनों बाद जाकिर अली अपने कमरे में बैठे किसी पत्रिका के लिए एक शायर के बारे में लेख लिख रहे थे कि राबिया बेगम उन के पास आ कर बोलीं, ‘‘आप को जनाब रामकिंकर साहब याद हैं न? अरे वही रामकिंकर साहब, जो संस्कृत के प्रोफैसर थे और बाद में किसी फैलोशिप के तहत लंदन चले गए थे. फिर वहीं बस गए.’’

‘‘अरे, आप ऐसे कैसे कह रही हैं, हम ऐसे एहसानफरामोश तो नहीं कि रामकिंकर साहब को भूल जाएं. हां, बताइए क्या हुआ रामकिंकर साहब को?’’ जाकिर अली ने कलम रोक कर उत्सुकता से पूछा.

‘‘अरे, उन्हें कुछ नहीं हुआ, कुछ दिनों पहले उन का फोन आया था. हमें लंदन आने का न्योता दिया है. कह रहे थे कि उन की ही एक संस्था भारतीय शास्त्रीय संगीत का कोई बड़ा कार्यक्रम करवा रही है, सो शास्त्रीय संगीत संबंधित कुछ साजों की संगत देने वालों की उन्हें काफी जरूरत है. वे तो कह रहे थे कि अब भी मेरे इल्म और हमारे फन की वहां बेहतर कदर हो सकेगी. क्या कहते हैं आप?’’ राबिया बेगम ने उन से मानो कुछ आश्वासन पाने की मुद्रा में प्रश्न किया. राबिया बेगम की इंगलैंड जाने की पेशकश सुन कर उन के दिमाग में 2 दिनों पहले बहू का बेहूदा डायलौग, ‘और लोगों की नजरों पर मोहूम सा परदा भी पड़ा रहेगा,’ और उस के बाद उस की बेहया हंसी की याद उन्हें करंट का सा झटका दे गई. वे समझ गए कि बात राबिया बेगम तक पहुंच गई है, और उन्हें गहरे चुभ गई है. सोच कर वे बेहद मायूस हो गए. मगर बोले, ‘‘बेगम, अपने पासपोर्ट पता नहीं कब से रिन्यू नहीं हुए, शायद नए ही बनवाने पड़ें. अब इस उम्र में यह सब झंझट कहां होगा.’’

‘‘अरे, ऐसे कौन से बूढ़े हो गए हैं आप. और ये पासपोर्ट सिर्फ एक टर्म ही तो रिन्यू नहीं हुए हैं. ब्रिटिश एंबैसी के कल्चरल सैंटर में मेरी एक शार्गिद है, शायद वह कुछ मदद कर सके. कोशिश कर के देखते हैं, कह कर राबिया बेगम ने दोनों पासपोर्ट उन के आगे रख दिए और एक गहरी सांस ले कर बेबस निगाहों से डा. जाकिर की तरफ देखा तो वे फैसला करने को मजबूर हो गए.’’ जाकिर साहब की जानपहचान और व्यवहारकुशलता से एक महीने में दोनों के पासपोर्ट बन गए. अभी तक घर में उन्होंने इस बारे में खुल कर किसी से बात नहीं की थी. अब जब उन्होंने अपने दोनों के लंदन जाने की बात कही तो अजीब सी प्रतिक्रिया मिली. राबिया बेगम के लंदन जाने पर किसी को एतराज नहीं था. पर लड़के और बहुएं जाकिर साहब को जाने नहीं देना चाहते थे. राबिया बेगम से सिर्फ उन के पोते आमिर और समद ने नहीं जाने की मनुहार की थी. बहरहाल, कुछ समझाइश के बाद दोनों लंदन रवाना हो गए.

3 महीने बीत गए. एक दिन शाहिद ने उन को फोन किया और बोला, ‘‘अब्बू, आमों के बाग को ठेके पर देने का मौसम आ गया है,आप हिंदुस्तान कब आ रहे हैं, बहुत दिन हो गए, आ जाइए न.’’

फोन सुन कर उन्होंने संक्षिप्त सा जवाब दिया, ‘‘साहबजादे, अगर आमों के बाग का ठेका देने के लिए ही मुझे आना है तो बेहतर है कि तुम अभी से इन सभी कामों को और दुनियादारी को समझ लो. भई, आगे भी तुम्हें ही सबकुछ देखना है.’’

‘‘अरे नहीं, अब्बू. बात यह है कि हम सब आप को बहुत याद कर रहे हैं,’’ अब की बहू की आवाज थी, ‘‘अब्बू, आमिर और समद भी आप को बहुत याद करते हैं.’’

‘‘वे सिर्फ  मुझे ही याद कर रहे हैं या…’’

‘‘अरे नहीं अब्बू, याद तो अम्मी को भी करते हैं, मगर वह क्या है कि वे तो अपनी संगीत की महफिलों वगैरा में व्यस्त रहती होंगी. इसलिए… इसलिए,’’ कहते हुए बहू अपनी बात जारी रखने के लिए शब्द नहीं मिलने से हकलाने लगी तो, ‘‘देखता हूं, 1-2 हफ्ते  बाद आने की कोशिश करूंगा,’’ कह कर जाकिर साहब ने फोन काट दिया.

कुछ दिनों बाद वे लौट आए तो देखा कि राबिया बेगम के सब से प्यारे सितार को कागज के कफन में लपेट कर कमरे के ताख पर रख दिया गया था. उन की गैर मौजूदगी में दोनों के कमरों का इस्तेमाल किया गया था. मगर उन की किताबों और राबिया बेगम के साजों की देखभाल कतई नहीं की गई थी. यह मंजर देख कर उन का मन खिन्न हो गया. उस दिन रात को डाइनिंग टेबल पर उन्होंने शाहिद से कहा कि वह कल उन के साथ गांव चल कर आम के बाग को ठेके पर देने के संबंध में सारी बातें समझ ले. 3-4 रोज में वे लंदन वापस लौट जाएंगे तो शाहिद बोला, ‘‘अब्बू, आप वहां जा कर क्या करेंगे. अम्मी तो अपनी महफिलों में व्यस्त रहती होंगी, आप अकेले के अकेले…’’ बात अधूरी छोड़ कर वह पता नहीं क्यों रुक गया.

शाहिद की बात सुन कर आज पहली दफा उन को लगा कि उन के बेटे जवान और समझदार ही नहीं, दुनियादार भी हो गए हैं. अब उन की नजरों में राबिया बेगम का दरजा उन की मां का नहीं, बल्कि शायद अपने बाप की दूसरी बीवी का हो गया है. मगर उन की रगों में नवाबी खानदान का खून तथा तबीयत में अदब बसा हुआ था. इसलिए गुस्से को पी कर बोले, ‘‘शाहिद, अदब से बात करो, वे तुम्हारी मां हैं. उन्होंने तुम लोगों की परवरिश के लिए अपने कैरियर को ही कुरबान नहीं किया, एक इतनी बड़ी कुरबानी दी है जिसे तुम लोग जानते भी नहीं हो और न ही उस की अहमियत को समझते हो. जानना चाहोगे?’’ उन्होंने शाहिद को घूर कर देखते हुए कहा.

‘‘चलिए, उस कुरबानी को भी आज बता ही दीजिए,’’ शाहिद की आवाज में अब भी तल्खी थी. ‘‘शाहिद, हर औरत में मां बनने की अहम ख्वाहिश होती है. उस की जिंदगी का यह एक अहम मकसद होता है. मगर राबिया बेगम ने हम से निकाह के वक्त वादा किया था कि वह तुम दोनों को ही अपनी औलाद मान कर पालेगी. अपना वचन निभाने के लिए उस ने बिना कोई अपनी औलाद पैदा किए स्टर्लाइजेशन करा लिया, जिस से उस की अपनी औलाद पैदा होने की सूरत ही न बने. यह कोई

मामूली बात नहीं है और तुम, तुम…’’ कहतेकहते दबाए गुस्से के कारण उन की आवाज कांप गई. ‘‘अब्बू, मैं आप की बहुत इज्जत करता हूं. मगर कुछ बातों पर मोहूम सा परदा ही रहे तो बेहतर है. वैसे, खुदकुशी को कुरबानी का दरजा दिया जाना भी सही नहीं है,’’ शाहिद की जबान में अब भी तल्खी कायम थी.

‘‘तुम कहना क्या चाहते हो, साफसाफ बोलो,’’ वे बोले तो उन की आवाज में अब की बार सख्ती थी. ‘‘बात यह है अब्बू, सभी चीजें उतनी खुशगवार और बेहतर नहीं थीं जितनी आप समझते रहे हैं. आप से निकाह करते वक्त मोहतरमा राबिया बेगम की नजरों में इस महानगर में एक बड़ी जमीन में बने हमारे इस आलीशान मकान और हमारी खानदानी जमीनजायदाद का खयाल बिलकुल नहीं था, यह बात कहना बिलकुल लफ्फाजी होगी. आप से निकाह के वक्त वे तलाकशुदा थीं तो उन्हें भी एक महफूज पनाह की जरूरत थी. रही बात स्टर्लाइजेशन कराने की, तो इस की वजह कोई पेचीदा जनाना मर्ज और यह खयाल भी हो सकता है कि इस निकाह का अंजाम भी अगर तलाक हुआ तो उस हाल में उन की अपनी औलाद उन की परेशानी की वजह बन सकती है. रही हमारी परवरिश की बात, वह तो आप अगर एक आया भी रख लेते तो यह काम तो वह भी करती ही. मगर उस हालत में आप की जिंदगी तनहा कटती.’’ शाहिद का संवाद और उस के मुंह से राबिया बेगम का नाम सुन कर जाकिर अली सन्न रह गए. यह वही शाहिद है जो डाइनिंग टेबल पर आने से पहले यह पूछता था कि अम्मी ने आज क्या पकाया है. 8वें दरजे में आने तक वह रात को अकसर अपने कमरे में से निकल आता और अपनी इसी अम्मी के पास सोने की जिद करता तो राबिया उसे अपने साथ सुला लेती थीं तो उसे मेहमानखाने में रात बितानी पड़ती थी.

उस समय शाहिद अपनी इन्हीं अम्मी के ही बेहद करीब था. आईआईटी में ऐडमिशन हो जाने पर वह अपनी इन्हीं अम्मी के गले में बांहें डाल कर लिपट कर रोया था-‘अम्मी आप साथ चलो, प्लीज अम्मी, कुछ दिनों के लिए चलो. आप नहीं चलोगी तो मैं भी नहीं जाऊंगा.’ और वह तभी गया था जब राबिया बेगम उस के साथ गई थीं और उस के पास से कुछ दिनों बाद नहीं, पूरे 3 महीने बाद अपना 4 किलो वजन खो कर लौटी थीं.

शाहिद की जिद सुन कर इन्हीं अम्मी के मां की मुहब्बत से लबरेज दिल और अनुभवी आंखों ने ताड़ लिया कि वह आईआईटी में नए लड़कों की रैगिंग की बातें सुन कर बेहद घबराया हुआ है और अगर वे साथ नहीं गईं तो कुछ अप्रिय हो सकता है. वे एक बड़ी यूनिवर्सिटी से छात्र और अध्यापक दोनों रूप से लंबे अरसे तक जुड़ी रही थीं. सो वे यह बात जानती थीं कि यह रैगिंग जैसा परपीड़न का घिनौना आपराधिक काम करने वाले चंद वे स्टूडैंट होते हैं जो मांबाप की प्यारभरी तवज्जुह न मिलने से उपजे आक्रोश के साथ किसी न किसी तरह के अन्य मानसिक तनाव का शिकार होते हैं. बहुत सोचसमझ कर राबिया बेगम ने एक योजना बनाई. जिस के तहत आईआईटी में पहुंच कर वे वहां के कोऔडिनेटर से मिलीं. उन्हें अपना पूरा परिचय दिया और आने का मकसद बताया तो वे अपने स्तर पर उन्हें हर संभव सहयोग देने के लिए तैयार हो गए.

राबिया बेगम ने सब से पहले उन से उन संभावित लड़कों की जानकारी प्राप्त की जो उस साल के नवागंतुकों की रैगिंग करना अपना अधिकार समझते थे. फिर उन्होंने उन लड़कों से अलगअलग मुलाकात की. उन लड़कों से राबिया बेगम की ममताभरी लंबी बातचीत में यह बात निकल कर आई कि उन्हें कभी भी मांबाप की निकटता, उन की प्यारभरी देखभाल, स्नेहभरी डांटफटकार मिली ही नहीं थी. ज्यादातर लड़कों को तो यह भी याद नहीं था कि उन्हें मां ने कभी अपने हाथ से परोस कर खाना खिलाया था. वे तो मां के उस स्वरूप से परिचित ही नहीं थे जो गुस्सा होने पर बच्चे को मार तो देती है, मगर बाद में उस के रोने पर उस के साथ खुद भी रो लेती है. पिता के बारे में उन का परिचय सिर्फ जरूरत पर पैसे मांगने पर पैसे देते हुए यह घुड़की, ‘अभी उस दिन तो इतने पैसे दिए थे. तुम्हारे खर्चे दिनपरदिन बढ़ते जा रहे हैं,’ देने वाले व्यक्ति के रूप में था. बच्चे इस बात से भी आक्रोशित थे कि उन के मांबाप उन पर जो खर्चा करते हैं उस का ढिंढोरा भी खूब पीटते हैं. इस के साथ, ये लड़के रैगिंग की पीड़ा झेलने के दमित आक्रोश का भी शिकार थे.

जब राबिया ने पहली बार उन 15-12 लड़कों को अपने घर पर खाने को कहा तो वे भौचक्के रह गए. मगर राबिया बेगम का ममताभरा अनुरोध टाल भी नहीं सके. उन के आ जाने पर राबिया बेगम ने अपने हाथ से बना खाना परोस कर मां की तरह मनुहार कर के खिलाया तो खाना खत्म होने पर एक लड़का गुनगुनाने लगा, ‘तू प्यार का सागर है…’ लड़के की आवाज में सोज था मगर उसे आरोह और अवरोह का सही ज्ञान नहीं था. यह समझते हुए राबिया ने उसे गाने को प्रोत्साहित किया और बड़ी सावधानी से थोड़ी सी समझाइश के साथ उस से पूरा गाना गवाया.

लड़के समझ गए कि उन्हें संगीत की अच्छी जानकारी है और वे बच्चों की तरह उन से गाना सुनाने की जिद करने लगे तो उन्होंने, ‘करोगे याद तो हर बात याद आएगी…’ गजल सुनाई. राबिया बेगम की सुरीली आवाज में पेश की गई गजल जब खत्म हुई तो संगीत की जानकारी रखने वाले ही नहीं, सभी लड़के बेहद भावुक हो गए और एक तो उन से ‘हाय अम्मी, आप इतना अच्छा गा भी सकती हो,’ कह कर उन से बच्चे की तरह लिपट गया.

इस के बाद तो राबिया बेगम ने अपना प्रोग्राम तय कर लिया था. वे रोज उन लड़कों को घर पर बुला लेती थीं, बल्कि कुछ दिन बीतते तो ज्यादातर लड़के उन्हें शरारती बच्चों की तरह घेरे रहने लगे थे. अब इन्हीं दमित आक्रोश के शिकार लड़कों ने घर की सफाई वगैरा से ले कर खाना बनाने और बरतन साफ करने तक में सामूहिक सहयोग करना शुरू कर दिया था. सब मिल कर खाना बनाते, फिर सहभोज होता था.

राबिया बेगम की ममता और व्यवहारमाधुर्य ने उन्हें रिश्तों की अहमियत सिखा दी थी. शुरू में जब लड़कों ने उन्हें मैडम कहा तो वे बोली थीं, ‘भई, मैं तुम्हारी टीचर थोड़े ही हूं.’ तब कुछ लड़कों ने उन्हें ‘आंटी’ कहा तो वे बोलीं, ‘यह आंटी कौन सा रिश्ता होता है. हमारी समझ में नहीं आया और अपन तो पूरी तरह देसी लोग हैं न. तो भई, हम किसी की आंटी तो नहीं बनेंगे.’ फिर लड़कों की दुविधा भांपते हुए उन्होंने कहा था, ‘देखो भई, मेरी उम्र तुम्हारी मां के बराबर है. मगर मां तो मां ही होती है.’ परिवार में मां के बाद काकी, ताई, मौसी का भी मां जैसा ही रिश्ता होता है, इसलिए मेरी उम्र के लिहाज से तुम मुझे काकी, ताई, मौसी वगैरा में से जो भी अच्छा लगे, कह सकते हो. वरना मेरा नाम राबिया है, इस नाम से भी बुला सकते हो, मगर आंटी मत कहना. पता नहीं क्यों यह आंटी मुझे अजीब लिजलिजी सी लगती है, जिस में न जाने कौनकौन छिपी बैठी हैं.’ उन की बात सुन कर लड़के एक बार तो हंस पड़े, फिर कुछ लड़कों ने उन्हें जिद कर के अम्मी, मम्मी कहना शुरू कर दिया और बाकी काकी, मौसी वगैरा कहने लगे थे तो उन्हें अम्मी कहने वाले लड़कों से शाहिद के मुंह से बेअख्तियार निकल गया, ‘जनाब, आप हमारी अम्मी के प्यार में हमारे रकीब बन रहे हैं.’ यह सारा वाकेआ पहली छुट्टियों में घर आने पर इसी शाहिद ने खुद अपने मुंह से सुनाया था.

राबिया बेगम के व्यवहार से लड़कों की संख्या में रोज इजाफा हो जाता था. अब ज्यादातर नवागंतुक भी सीनियर्स का सामीप्य राबिया बेगम की देखभाल में पाने के लिए आने लगे थे. राबिया बेगम तो सभी को अपने बच्चों के बड़े कुटुंब में शामिल कर लेती थीं, मगर 2 महीने लगातार इतने सारे लड़कों के बनाए परिवार के लिए खाने की व्यवस्था कराने, सब को एकजुट बनाए रख कर शाहिद की सुरक्षा के लिए रैगिंग विरोधी अभियान चलाए रखने की कोशिश में रातदिन मेहनत करने से राबिया बेगम का स्वास्थ्य काफी गिर गया. फिर भी उन्हें इस बात की तसल्ली थी कि इस अवधि में उन्होंने शाहिद के लिए जो दोस्ताना माहौल बना दिया है उस से शाहिद अब इस संस्थान से डिगरी लेने तक रैगिंग वगैरा से महफूज रहेगा.

इस तरह 8-10 सप्ताह बीत गए. वह दिन आ गया जब नए छात्रों को पुरानों के साथ सामंजस्य बिठाने वाला फ्रैशर्स डे मनाया जाता है. पुराने यानी सीनियर्स और जूनियर्स का सहभोज होता है और रैगिंग पर घोषित विराम लग जाता है. अब की बार फ्रैशर्स डे राबिया बेगम ने इस तरह आयोजित किया कि वह मात्र मस्तीभरा सहभोज न रह कर एक विराट सांस्कृतिक कार्यक्रम बन गया. फ्रैशर्स डे के इस जबरदस्त कारनामे का पता संस्थान के प्रिंसिपल के पत्र से हुआ, जिस में उन्हें बधाई और धन्यवाद देते हुए लिखा था कि यह साल उन के संस्थान के पिछले कई दशकों के इतिहास में यादगार बन गया है क्योंकि इस साल इस संस्थान में रैगिंग की कोई घटना नहीं हुई और फ्रैशर्स डे के अभूतपूर्व सांस्कृतिक कार्यक्रम के लिए राबियाजी को आगे भी आना होगा.

उन दिनों के शाहिद और आज के शाहिद की तुलना करते हुए जाकिर साहब डाइनिंग टेबल पर खामोश बैठे थे, सभी इंतजार में थे कि वे खाना शुरू करें तो खाना खाएं. मगर जाकिर साहब यह कह कर उठ गए, ‘‘शुक्रिया साहबजादे, आज आप ने हमें खुदकुशी और कुरबानी में फर्क का इल्म करा दिया.’’ और उन्होंने अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया. काफी सोचविचार कर उन्होंने एक फैसला कर लिया. घर के लोगों ने सुबह उठ कर देखा कि जाकिर साहब और राबिया बेगम के कमरों के दरवाजों पर ताला लगा हुआ है और जाकिर साहब घर में नहीं हैं. ऐसा तो कभी नहीं हुआ. जाकिर साहब और राबिया बेगम घर के बाहर भी जाते थे तब भी कमरों के दरवाजे हमेशा खुले रहते थे. एक दफा जाकिर साहब ने बेगम से कहा था, ‘बेगम, कम से कम दरवाजा बंद कर के कुंडी तो लगा दिया करो’ तो राबिया बेगम ने जवाब दिया था, ‘हमारे कमरों में ऐसा क्या रखा है जिसे अपने ही बच्चों की नजरों से परदा कराया जाए.’

‘अब्बू इतनी सुबह गए कहां’, इस प्रश्न पर सोचतेसोचते दोनों लड़के आपस में उलझ गए. साजिद ने साफ कह दिया, ‘‘गलती शाहिद भाई की है. अम्मी ने हमारे साथ कभी कोई बदसलूकी नहीं की. बल्कि हमेशा प्यार से हमारी परवरिश की. फिर शाहिद भाई के मन में ऐसे खयालात कैसे पैदा हुए जिन की वजह से कल उस ने अब्बू के सामने अम्मी के खिलाफ ऐसी बेहूदा बातें कीं. अगर किसी वजह से उन को निजी तौर पर अम्मी के खिलाफ कुछ शिकायत थी तो उसे मोहूम से परदे में ही रहने देते. इस तरह अब्बू के सामने उन्हें पेश कर के क्या हासिल हुआ. अरे, कुछ हासिल होना तो दूर, मुझे तो ऐसा लगता है कि हम कहीं अब्बू को खो न दें.’’ इतना कह कर साजिद चुप हो गया.

थोड़ी देर खामोशी पसरी रही, फिर साजिद ही बोला, ‘‘चलो, अब चल कर ढूंढ़ो तो सही, अब्बू गए कहां हैं, आखिरकार,’’ दोनों भाई चलने को तैयार हुए ही थे कि दरवाजे की घंटी बजी. गेट पर एक आटो चालक को खड़ा देख कर शाहिद भिनभिनाया, ‘‘अब यह कौन है, एक नई मुसीबत सुबह ही सुबह?’’

‘‘अरे चुप रहिए, देखिए, कहीं अब्बू ही न हों,’’ शाहिद की बीवी ने डांटते हुए कहा.

आटोरिक्शा वाला घर के लोगों को बाहर आया देख कर गेट खोल कर अंदर आ गया और बोला, ‘‘हजरात, आप जनाब डा. साहब के साहबजादे ही हैं न?’’

‘‘हां, मगर आप कौन हैं. और डाक्टर साहब यानी हमारे अब्बू कहां हैं?’’

दोनों के सवाल के जवाब में आटोचालक बोला, ‘‘साहबान, हमारा नाम रमजानी है, हम आप के पास की कच्ची बस्ती में ही रहते हैं. पहले यूनिवर्सिटी की डिलीवरी वैन चलाते थे. 3 साल से रिटायर हो गए. रिटायर होने से गुजरबसर में परेशानी होने लगी तो डाक्टर साहब ने हमें यह आटोरिक्शा अपनी जमानत पर फाइनैंस करा दिया. आज सवेरे 4 बजे के करीब डाक्टर साहब हमारे घर आए और बोले, ‘रमजानी, तुम्हें बेवक्त जगा कर तकलीफ दे रहे हैं लेकिन अगर तुम हमें अभी एअरपोर्ट छोड़ दोगे तो हमें सुबह 6 बजे दिल्ली के लिए फ्लाइट मिल जाएगी और वहां से शाम को हमें लंदन की फ्लाइट मिल जाएगी. तुम्हारी भाभी को वहां अपने इस पुराने सितार की बड़ी जरूरत है. अगर यह मेहरबानी कर दो तो काम बन जाएगा.’

‘‘हजरात, डाक्टर साहब के ये शब्द सुन कर हम तो शर्म से ऐसे गड़़ गए कि उन्हें सलाम करना तक भूल गए. जल्दी से कपड़े पहने, आटो निकाला और उन्हें बिठा कर चल दिए. एअरपोर्ट पहुंच कर वे आटो से उतरे, सितार निकाला और हजार का एक नोट हमारे हाथ में थमा कर बोले, ‘रमजानी, मेरे पास छुट्टा नहीं हैं, तुम्हारी बोहनी का समय है, रख लो. देखो, मना मत करना.’ यह कह कर हमारी मुट्ठी बंद कर के तेजी से एअरपोर्ट की बिल्ंिडग में दाखिल हो गए. हम तो बोडम की तरह देखते ही रह गए. भैया, हम डाक्टर साहब की बहुत इज्जत करते हैं. सो, एअरपोर्ट तक का किराया 120 रुपए रख लिया है. बाकी के यह 880 रुपए आप हजरात रखें.’’ कह कर उस ने कुछ नोट शाहिद के हाथ पर रख दिए. फिर बोला, ‘‘हां, यह खत भी दिया था. घर पर देने को,’’ कह कर कमीज की जेब से एक लिफाफा निकाल कर शाहिद के हाथ में थमा कर सलाम कर के वह चला गया.

आटोचालक के जाते ही साजिद ने शाहिद से तल्ख आवाज में कहा, ‘‘अब जनाब लिफाफा खोल कर खत पढ़ कर बताने की जहमत फरमाएं कि अब्बा हुजूर आप की तकरीर से खुश हो कर क्या पैगाम दे गए हैं.’’ शाहिद ने कांपते हाथों से लिफाफा खोला, कौपी के एक पन्ने पर शायद चलते वक्त कांपते हाथों से लिखा था, ‘‘शाहिद साहब, राबिया बेगम के बारे में आप ने अपने खयालात को आज तक मोहूम से परदे में रखा. उस के लिए शुक्रिया. अगर आप के खयालात उन की मौजूदगी में रोशन होते तो शायद वे तो शर्म और दुख से जीतेजी ही मर जातीं. हम कोशिश करेंगे कि अब इस घर में कभी वापस आना न हो. हमारे पास इल्म और फन के साथ आपसी प्यारमुहब्बत और विश्वास की जो अकूत दौलत है उस के सहारे

हम मजे से जिंदा रह लेंगे. तुम सब खुश रहो.’’ खत के अंत में उन्होंने हमेशा

की तरह ‘तुम्हारा अब्बू’ नहीं लिख कर लिखा था, ‘‘किसी का कोई नहीं,

जाकिर अली.’’

खत का मजमून सुन कर घर के सभी लोग थोड़ी देर गुमसुम खड़े रहे और शाहिद को तनहा छोड़ कर कोठी के अंदर चले गए.

पता नहीं कितना समय गुजर गया. अचानक अजब तरह के शोर से शाहिद चौंका. उस ने देखा एक मादा लंगूर कोठी के बाग के एक पुराने पेड़ की सब से ऊंची शाखा पर चढ़ कर वहां से हवेली की छत पर पहुंच कर महफूज पनाह पाने के जनून में पेड़ों के बीच में से निकल रहे बिजली के तारों की चपेट में आ कर शायद मर गई है. हाइटैंशन पावर के तार होने से उस का शरीर फट गया था. मगर पता नहीं कैसे उस की गोद में चिपका उस का छोटा सा बच्चा उस की गोद से गिर कर नीचे जमीन पर आ पड़ा था. मादा लंगूर को तारों में लटकता देख कर सारे लंगूर पेड़ पर चढ़ कर हूपहूप की आवाज में चिल्ला कर अपना आक्रोश प्रकट कर रहे थे.

उधर, मां की गोद से छिटक कर जमीन पर पड़ा छोटा सा बेसहारा बच्चा अपनी भाषा में अपनी मां को पुकार रहा था और रक्षा की गुहार लगा रहा था. लंगूर के बच्चे को जमीन पर पड़ा देख कर लंगूरों का जानी दुश्मन उन का पालतू शेफर्ड जाति का खूंखार कुत्ता उस की तरफ लपका. वह उस के करीब पहुंच ही गया था कि अचानक पेड़ की डाल से एक मादा लंगूर कूदी. उस ने झपट कर बच्चे को गोदी में चिपकाया और कुत्ते के ऊपर से छलांग लगा कर खिड़की के छज्जे पर बैठ गई. बच्चा, एक मां की गोद में आ कर, अब बेहद आश्वस्त हो गया था. उस ने चीखना बंद कर दिया था. यह दृश्य देख कर शाहिद को अपने खुद के अंदर कुछ पिघलता हुआ लगा. उस की मां की मौत के बाद से राबिया बेगम के उन की मां बनने और उन के द्वारा की गई परवरिश के बाद अब कल उस के मुंह से उन्हें राबिया बेगम कहे जाने तक का सारा माही कुछ लमहों में उस की आंखों के सामने एक फिल्म की रील के दृश्यों की तरह तेजी से गुजर गया. उस की आंखों से आंसू बहने लगे. तभी उस की बीवी हाथ में मोबाइल फोन लिए लपकती हुए आई और बोली, लंदन से आप की अम्मी का फोन, वे अब्बू को पूछ रही हैं, क्या कहना है.’’

उस ने जलती नजरों से बीवी को देखा. मोबाइल फोन उस के हाथ से छीना और रुंधे स्वर में बोला, ‘‘अम्मी आदाब, अम्मी, मैं शाहिद, आप का बेटा शाहिद. अम्मी आप हमें किस बात की सजा दे रही हैं जो हमें एकदम तनहा छोड़ कर चली गई हो. आ जाओ, अम्मी. आप को हमारी…अपने बच्चों की खुशियों के लिए वापस आ जाओ, अम्मी. मैं आप के बिना अपने को बिलकुल तनहा महसूस कर रहा हूं. एक हफ्ते में आ जाइए.’’ कहतेकहते शाहिद की हिचकिया बंध गईं तो साजिद ने फोन ले कर अम्मी की मानमनौवल शुरू कर दी.

साजिद की अम्मी से मानमनौवल पूरी हो गई थी. वह बोला, ‘‘भाईजान, आप ने रात को भी कुछ नहीं खाया, आप कुछ नाश्ता कर लीजिए. मैं ने रहमत चाचा से कार निकालने के कह दिया है. अभी निकलेंगे तो अब्बू की फ्लाइट के लिए सिक्योरिटी चैकइन के लिए एअरपोर्ट पहुंचने तक हम भी

वहां पहुंच जाएंगे. उन्हें मना कर ले कर आएंगे.’’

‘‘साजिद, मैं ने रात को खाना नहीं खाया तो तुम ने कौन सा खाया था. तुम नाश्ता कर लो, मैं तो जब तक अब्बू से मिल कर माफी नहीं मांग लेता, नहीं खाऊंगा. तुम सब यही मनाओ कि अब्बू मिल जाएं और मुझे माफ कर दें.’’ इतना कह कर उस ने सिर झुका लिया.

बकरा : एक लात डिंपल ने, दूसरी कांता ने मारी

सुनसान लंबा डग नदी में खूब तैरने के बाद डिंपल और कांता कपडे़ पहन कर जैसे ही शौर्टकट रास्ते से घर जाने लगीं, तो उन की नजर लोहारों के रास्ते चलते गुर, चेला और मौहता पर पड़ी. वे समझ गईं कि ये तीनों लोहारों की औरतों से आंख सेंकने के लिए ही इस रास्ते से आए थे.

‘‘कांता, ये गुर, चेला और मौहता जैसे लोग आज भी इनसान को इनसान से बांटे हुए हैं, ताकि इन का दबदबा बना रहे और इन की रोजीरोटी मुफ्त में चलती रहे. ये पाखंडी लोग औरतों को हमेशा इस्तेमाल की चीज बनाए रखना चाहते हैं.’’

‘‘सब से खास बात तो यह है कि ये लोग गरीबों और औरतों का शोषण करने के लिए देवीदेवता के गुस्से और कसमों के इतनी चालाकी से बहाने गढ़ते हैं कि लोगों में समाया देवीदेवता का डर उन के मरने तक भी कभी दूर नहीं होता,’’ डिंपल ने कहा.

‘‘हां डिंपल, तुम्हारा कहना एकदम सही है. ये राजनीति के मंजे खिलाड़ी आदमी को आदमी से बांटे ही रखना चाहते हैं. इन्होंने तो बड़ी होशियारी से रास्ते तक बांट दिए हैं, ताकि इन की चालाक सोच इन्हें मालामाल करती रहे,’’ कांता बोली.

‘‘बिलकुल सही कहा तुम ने कांता. इस पहाड़ी समाज को अंधेरे में रखने वाले इन भेडि़यों को सबक सिखाने के लिए हमें अपनी भूमिका अच्छे से निभानी होगी.

‘‘देवीदेवता के नाम पर ठगने वाले इन पाखंडियों की असलियत लोगों के सामने लाने के लिए हमें कुछ न कुछ करना ही होगा,’’ डिंपल ने गंभीर आवाज में कांता से कहा.

‘‘हां, यह बहुत जरूरी है डिंपल. मैं जीजान से तुम्हारे साथ हूं. जान दे कर भी दोस्ती निभाऊंगी,’’ कांता बोली.

इस के बाद उन दोनों ने एकदूसरे को प्यार से देखा और गले मिल गईं.

‘‘तुम मेरी सच्ची दोस्त हो कांता. देखो, आजादी के इतने साल बाद भी इस गांव के लोग अंधविश्वास में फंसे हुए हैं. इन्हें जगाने के लिए हम दोनों मिल कर काम करेंगी,’’ डिंपल ने अपनी बात रखी.

‘‘जरूर डिंपल, यही एकमात्र रास्ता है,’’ कांता ने कहा. डिंपल और कांता ने योजना बनाई और लटूरी देवता के मेले में मिलने की बात पक्की कर के तेजी से अपने घरों की ओर चल दीं.

डिंपल लोहारों की, तो कांता खशों की बेटी थी. कांता ने 23-24 साल की उम्र में ही घाटघाट का पानी पी रखा था. यह तो डिंपल की दोस्ती का असर था कि वह राह भटकने से बच गई थी. हमउम्र वे दोनों चानणा गांव की रहने वाली थीं.

नैशनल हाईवे से मीलों दूर पहाड़जंगल, नदीनालों के उस पार कच्ची सड़क से पहुंचते थे. वह कच्ची सड़क लंबा डग नदी तक जाती थी. नदी तट से 2 मील ऊपर नकटे पहाड़ पर सीधी चढ़ाई के बाद चानणा गांव तक पहुंचते थे.

वहां ऊंचाई की ओर खशों और निचली ओर लोहारों की बस्ती थी. खशों को ऊंची जाति और लोहारों को निचली जाति का दर्जा मिला हुआ था. वहां चलने के लिए ऊंची और छोटी जाति के अलगअलग रास्ते थे.

लोहारों को खशों के रास्ते चलने की इजाजत न थी. वे उन के घरआंगन तक को छू नहीं सकते थे, जबकि खशों को लोहारों के रास्ते चलने का पूरा हक था. वे उन के घरआंगन में बिना डरे कभी भी आजा सकते थे. यहां तक कि उन के चूल्हों में बीड़ीसिगरेट तक भी सुलगा आते थे.

गलती से भी कोई लोहार खशों के रास्ते या घरआंगन से छू गया, तो उस की शामत आ जाती थी. इस से गांव का देवता नाराज हो जाता था और उन्हें दंड में देवता को बकरे की बलि देनी पड़ती थी. मजाल है कि कोई इस प्रथा के खिलाफ एक शब्द भी कह सके. लोहारों और खशों की बस्तियों के बीच तकरीबन 4-5 एकड़ का मैदान था, जहां बीच में लटूरी देवता का लकड़ी का मंदिर और गढ़ की तरह भंडारगृह था. देवता के गुर का नाम खालटू था. गुर में प्रवेश कर देवता अपनी इच्छा बताता था.

लटूरी देवता गुर के जरीए ही शुभ और अशुभ, बारिश, सूखा, तूफान की बात कहता था. गांव और आसपास शादीब्याह, मेलाउत्सव, पर्वत्योहार सब देवता की इच्छा पर तय होते थे. यहां तक कि फसल बोना, घास काटना भी देवता की इच्छा पर तय था. गुर खालटू को सभी पूजते थे. उसे खूब इज्जत मिलती थी. एक खास बात और थी कि देवता का बजंतरी दल भी था, जो देव रथ के आगेआगे चलता था. इन में ढोलनगाड़े, शहनाई तो लोहार बजाते थे, पर तुरही, करनाल वगैरह खश बजाते थे. देवता का रथ भी खश उठाते थे, लोहारों को तो छूने की इजाजत तक न थी.

लोहारों के रास्ते चलते गुर खालटू, चेला छांगू और मौहता भागू जैसे ही माधो लोहार के घर के पास पहुंचे, उस का मोटातगड़ा बकरा और जवान बेटी देख कर वे एकदम रुक गए.

गुर खालटू के मुंह में आई लार को छांगू और भागू ने देख लिया था. चेला छांगू तो 3 साल से माधो की बेटी डिंपल पर नजर गड़ाए था, पर वह उस के हाथ न लगी थी. तीनों की नजरें बारबार बकरे से फिसलती थीं और माधो की बेटी पर अटक जाती थीं. ‘‘ऐ माधो की लड़की, कहां है तेरा बापू?’’ गुर खालटू ने पूछा.

‘‘वे मेले में ढोल बजाने गए हैं,’’ तीनों को नमस्ते कर के डिंपल ने कहा.

‘‘आजकल कहां रहती हो? दिखाई नहीं देती हो?’’

डिंपल ने चेले छांगू की बात का कोई जवाब नहीं दिया, बल्कि बकरे से बतियाते हुए उसे घासपत्ते खिलाती रही, जैसे उस ने कुछ सुना ही न हो.

‘‘बकरा बेचना तो होगा न माधो को?’’

‘‘नहीं मौहताजी, छोटे से बच्चे को दूध पिलापिला कर बच्चे की तरह पालपोस कर बड़ा किया है. इसे हम नहीं बेचेंगे,’’ नजरें झुकाए डिंपल ने कहा और बकरे को पत्ते दिखाती दूसरी ओर ले गई. उस ने तीनों को बैठने तक को न बोला. तीनों बेशर्मी से दांत निकालते हुए मेले की ओर चल दिए. माधो लोहार को सभी लोग पसंद करते थे. एक तो उस के घराट का आटा सभी को भाता था, दूसरे नगाड़ा बजाने में माहिर उस जैसा पूरे इलाके में कोई दूसरा न था.

डिंपल माधो की एकलौती औलाद थी. गांव में पढ़ने के बाद वह शहर में बीएससी फाइनल के इम्तिहान दे कर आई थी. वह खेलों में भी कई मैडल जीत चुकी थी. गुर, चेला, कारदार चानणा गांव के साथ आसपास के अनेक गांव में अपना डंका जैसेतैसे बजाए हुए थे. देवता के खासमखास कहे जाने वाले वे देव यात्रा के नाम पर शराबमांस की धामें करवाते और औरतों का रातरात भर नाच करवाते थे. गांव में खश व लोहार पूरे लकीर के फकीर थे और देवता पर उन्हें अंधश्रद्धा थी. यह श्रद्धा बढ़ाने का क्रेडिट गुर व चेला जैसे लोगों को ही जाता था. लटूरी देवता का मेला भरने लगा था. गुर खालटू के पहुंचते ही प्रधान रातकू और गांव वालों ने उन की खूब आवभगत की.

गुर ने मंदिर से लटूरी देवता की पिंडी निकाली. पिंडी को स्नान करा कर धूपदीप व चावल से पूजाअर्चना कर के भेड़ू और मुरगे की बलि दिलाई गई. फिर देवता का रथ निकाल कर पूरे मेले में घुमाया गया. इस के बाद गुर खालटू ने लोगों को मेले में गाने का आदेश दिया. ढोलनगाड़े, शहनाईरणसींगे बजने लगे और मर्दऔरत लाइनों में गोलगोल नाचने लगे.

गुर के आदेश पर प्रधान रातकू खशों द्वारा धाम भी इस मैदान पर दी जानी थी. केवल लोहारों को मैदान से हट कर निचले खेत में खिलानेपिलाने का इंतजाम था. शाम ढलने तक नाच और बाजे बंद हो गए थे. शराब का दौर शुरू हो गया था, जिस में मर्दऔरत बराबर शामिल थे. जिसे जितनी पीनी थी पीए, कोई रोक नहीं थी. नशे में झूमते लोगों में मांसभात की धाम कोईकोई ही खा पाया था. वहां से लोग झूमतेगाते आधी रात तक अपनेअपने घर पहुंचते थे. नाचगानों और प्रधान रातकू की धाम के साथ हलके अंधेरे में लोगों से दूर एकांत में घटी एक घटना बड़ी ही दिलचस्प थी, जिस का 3 के सिवाय चौथे को पता न चला था. हुआ यों था कि डिंपल अपनी सहेली कांता के साथ मेले में घूमने आई थी. मेले की जगड़ से कुछ दूर एक पेड़ के नीचे खड़ी हो कर वे आपस में बातें करने लगी थीं.

चेला छांगू भी कहीं से टपक कर चोरीछिपे उन की बातें सुनने लगा था. डिंपल पर उस की बुरी नजर से कांता पूरी तरह परिचित थी और वह उसे देख भी चुकी थी.

उस ने चेले को बड़ी मीठी आवाज में पुकारा, ‘‘चेलाजी, चुपकेचुपके क्या सुनते हो… पास आ कर सुनो न.’’ छांगू था पूरा चिकना घड़ा. वह ‘हेंहेंहें’ करता हुआ उन के पास आ कर खड़ा हो गया.

‘‘दोनों क्या बातें कर रही हो, जरा मैं भी सुनूं?’’ उस ने कहा.

‘‘चेलाजी, हमारी बातों से आप को क्या लेनादेना. आप मेले में जाइए और मौज मनाइए,’’ डिंपल ने सपाट लहजे में कहा. उसे चेले का वहां खड़े होना अच्छा नहीं लगा था.

‘‘हाय डिंपल, तुम्हारी इसी अदा पर तो मैं मरता हूं,’’ छांगू चेले की ‘हाय’ कहने के साथ ही शराब पीए होने की गंध से एक पल के लिए तो उन दोनों के नथुने फट से गए थे, फिर भी कांता ने बड़े प्यार से कहा, ‘‘चेला भाई, आप की उम्र कितनी हो गई होगी?’’

‘‘अजी कांता रानी, अभी तो मैं 40-45 साल का ही हूं. तू अपनी सहेली डिंपल को समझा दे कि एक बार वह मुझ से दोस्ती कर ले, तो फायदे में रहेगी. देवता का चेला हूं, मालामाल कर दूंगा.’’

‘‘क्या आप की बीवी और खसम करेगी?’’

‘‘चुप कर कांता, ये लोहारियां हम खशकैनेतों के लिए ही हैं. जब चाहे इन्हें उठा लें… पर प्यार से मान जाए तो बात कुछ और है. तू इसे समझा दे, मैं देवता का चेला हूं. पूरे तंत्रमंत्र जानता हूं.’’

डिंपल के पूरे बदन में बिजली सी रेंग गई. उस के दिल में एक बार तो आया कि अभी जूते से मार दे, पर बखेड़ा होने से वह मुफ्त में परेशानी मोल नहीं लेना चाहती थी, तो उस ने सब्र का घूंट पी लिया.

‘‘पर तुम्हारी मोटी भैंस का क्या होगा? वह और खसम करेगी या किसी लोहार के साथ भाग जाएगी,’’ कांता ने ताना कसते हुए कहा, तो छांगू चेला भड़क गया.

‘‘चुप कर कांता, लोहारों की इतनी हिम्मत कि वे हमारी औरतों को छू भी सकें. पर तू इसे मना ले. इसे देखते ही मेरा पूरा तन पिघल जाता है. इस लोहारी में बात ही कुछ और है. पर याद रख कांता, मैं देवता का चेला हूं, जरा संभल कर बात करना… हां.’’

तभी डिंपल ने उस के चेहरे पर एक जोर का तमाचा जड़ दिया. दूसरा थप्पड़ कांता ने मारा. छांगू चेले का सारा नशा हिरन हो गया. उस की सारी गरमी पल में उतर गई. हैरानपरेशान सा गाल मलते हुए वह कभी डिंपल, तो कभी कांता को देखने लगा. ‘‘खबरदार, अगर डिंपल की तरफ नजर उठाई, तो काट के रख दूंगी. लोहारों की क्या इज्जत नहीं होती? लोहारों की औरतें औरतें नहीं होतीं? देवता के नाम पर तुम्हारे तमाशों को हम अच्छी तरह जानती हैं. चुपचाप रास्ता नाप ले, नहीं तो गरदन उड़ा दूंगी,’’ कमर से दरांती निकाल कर कांता ने कहा, तो छांगू चेला थरथर कांपने लगा. वह गाल मलता हुआ दुम दबा कर खिसक लिया.

डिंपल और कांता खूब हंसी थीं. फिर काफी देर तक वे गांव के रिवाजों और प्रथाओं पर चर्चा करते रहने के बाद अपनेअपने घरों को लौटी थीं. सुबह ही एक खबर जंगल की आग की तरह पूरे चानणा गांव में फैल गई कि माधो लोहार शराब के नशे में खशों के रास्ते चल कर उसे अपवित्र कर गया. उस की बेटी डिंपल ने लटूरी देवता के मंदिर को छू कर अनर्थ कर दिया. खश तो आग उगलने लग गए. वहीं माधो से खार खाए लोहार भी बापबेटी को बुराभला कहने लगे. गुर खालटू ने कारदारों के जरीए पूरे गांव को मंदिर के मैदान में पहुंचने का आदेश भिजवा दिया. वह खुद छांगू, भागू और 3-4 कारदारों के साथ माधो के घर जा पहुंचा.

आंगन में खड़े हो कर गुर खालटू ने रोब से पुकारा, ‘‘माधो, ओ माधो… बाहर निकल.’’

माधो की डरीसहमी पत्नी ने आंगन में चटाई बिछाई, लेकिन उस पर कोई न बैठा. इतने में माधो बाहर निकल आया और हाथ जोड़ कर खड़ा हो गया. डिंपल भी अपनी मां के पास खड़ी हो गई. उस ने किसी को भी नमस्ते नहीं किया. उसे देख कर छांगू चेले ने गरदन हिलाई कि अब देखता हूं तुझे. ‘‘माधो, तू ने रात खशों के रास्ते पर चल कर बहुत बड़ा गुनाह कर दिया है. तू जानता है कि तुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था. तेरी बेटी ने भी मंदिर को छू कर अपवित्र कर दिया है. अब देवता नाराज हो उठेंगे,’’ गंभीर चेहरा किए गुर खालटू ने जहर उगला.

‘‘गुरजी, यह सब सही नहीं है. न मैं खशों के रास्ते चला हूं और न ही मेरी बेटी ने मंदिर को छुआ है.’’

‘‘हां, मैं तो मंदिर की तरफ गई भी नहीं,’’ डिंपल ने निडरता से कहा, तो गुर थोड़ा चौंका. दूसरे लोग भी हैरान हुए, क्योंकि गुर और कारदारों के सामने बिना इजाजत कोई औरत या लड़की एक शब्द भी नहीं बोल सकती थी. डिंपल देवता के नाम पर होने वाले पाखंड और कानून के खिलाफ हो रहे भेदभाव पर बहुतकुछ कहना चाहती थी, पर अपनी योजना के तहत वह चुप रही.

‘‘तू चुप कर डिंपल, मैं ने तुझे मंदिर को हाथ लगाते देखा है,’’ छांगू चेले ने जोर से कहा.

‘‘हांहां, बिना हवा के पेड़ नहीं हिलता. तुम बापबेटी ने बहुत बड़ा गुनाह किया है, अब तो पूरे गांव को तुम्हारी करनी भुगतनी पड़ेगी. बीमारी, आग, तूफान, बारिश वगैरह गांव को तबाह कर सकती है. तुम लोगों को पूरे गांव की जिम्मेदारी लेनी होगी,’’ मौहता भागू गुस्से से बोला.

‘‘तुम दोनों चुपचाप अपना गुनाह कबूल करो. हां, देवता महाराज को बलि दे कर और माफी मांग कर खुश कर लो,’’ एक मोटातगड़ा कारदार बोला.

‘‘जब हम ने गुनाह किया ही नहीं, तो बलि और माफी किस बात की?’’ डिंपल ने गुस्से में कहा, पर माधो की बोलती बंद थी.

‘‘माधो, इस से पहले कि देवता गुस्सा हो जाएं, तू अपने बकरे की बलि और धाम दे कर लटूरी देवता को खुश कर ले. इस से पूरा गांव प्रकोप से बच जाएगा. तुम्हारा परिवार भी देवता की नाराजगी से बच जाएगा. देख, तुझे देव गुर कह रहा है.’’

‘‘हांहां, बकरे की बलि दे कर ही रास्ते और मंदिर की शुद्धि होगी. लटूरी देवता खुश हो जाएंगे और गांव पर कोई मुसीबत नहीं आएगी,’’ छांगू चेले ने आंगन में बंधे बकरे और डिंपल को देख कर मुंह में आई लार को गटकते हुए कहा. उसे डिंपल और कांता के थप्पड़ भूले नहीं थे.

‘‘हां, धाम न लेने के लिए मैं देवता को राजी कर दूंगा, पर बकरे की बलि तो तय है माधो,’’ गुर ने फिर कड़कती आवाज में कहा. डिंपल और उस की मां ने बकरा देने की बहुत मनाही की, पर गुर खालटू और देव कारकुनों के डराने पर माधो को मानना पड़ा. उस ने एक बार फिर सभी को बताया कि वह अपने रास्ते चल कर ही घर आया था और उस की बेटी ने मंदिर छुआ ही नहीं, पर उस की बात पर किसी ने ध्यान नहीं दिया. मौहता भागू ने झट बकरा खोला और मंदिर की ओर ले चला. फिर सभी मंदिर की ओर शान से चल दिए. चलतेचलते गुर खालटू ने माधो को बेटी समेत लटूरी देवता के मैदान में पहुंचने का आदेश दिया.

लटूरी देवता के मैदान में पूरे गांव वाले इकट्ठा हो गए. देवता के गुर खालटू ने धूपदान में रखी गूगल धूप को जला कर एक हाथ में चंबर लिए मंदिर की 3 बार बड़बड़ाते हुए परिक्रमा की. देवता की पिंडी बाहर निकाल कर पालकी में रख दी गई.

सब से पहले गुर ने पिंडी की पूजा की, फिर दूसरे खास लोगों को पूजा करने को कहा गया. चेला और मौहता व दूसरे कारदार जोरजोर से जयकारा लगाते थे. ढोलनगाड़ातुरही बजने लगे थे. गुर खालटू कनखियों से चारों ओर भी देख लेता था और गंभीर चेहरा बनाए खास दिखने की पूरी कोशिश करता था. माधो डिंपल के साथ मंदिर से थोड़ी दूर अपराधी की तरह खड़ा था. कांता भी अपनी दादी के साथ एक पेड़ के नीचे खड़ी थी. माधो के बकरे को पिंडी के पास लाया गया था. उस की पीठ पर गुर ने पानी डाला, तो बकरे ने जोर से पीठ हिलाई. चारों ओर से लटूरी देवता की जयजयकार गूंज गई.

छांगू चेले ने सींगों से बकरे को पकड़ा था. एक मोटे गांव वाले ने दराट तेज कर पालकी के पास रखा था. उसे बकरा काटने के लिए गुर के आदेश का इंतजार था. अचानक कांता जोरजोर से चीखने. गरदन हिलाते हुए उछलने भी लगी. उस के बाल बिखर गए. दुपट्टा गिर गया था. सभी लोग उस की ओर हैरानी से देखने लगे थे. कांता की दादी बड़े जोर से बोली, ‘‘लड़की में कोई देवी या फिर कोई देवता आ गया है. अरे, कोई पूछो तो सही कि कौन लड़की में प्रवेश कर गया है?’’ गुर, चेला और दूसरे कारदार बड़ी हैरानी और कुछ डरे से कांता की ओर देखने लग गए. गुर पूजापाठ भूल गया था.

एक बूढ़े ने डरतेडरते पूछा, ‘‘आप कौन हैं जो इस लड़की में आ गए हैं? कहिए महाराज…’’

‘‘मैं काली हूं. कलकत्ते वाली. लटूरी देवता से बड़ी. सारे मेरी बात ध्यान से सुनो. आदमी के चलने से रास्ते कभी अपवित्र नहीं होते, न कोई देवता नाराज होता है. मैं काली हूं काली. आज में झूठों को दंड दूंगी. माधो और उस की बेटी पर झूठा इलजाम लगाया गया है. सुनो, लटूरी देवता कोई बलि नहीं ले सकता. अभी मेरी बहन महाकाली भी आने वाली है. आज सब के सामने सच और झूठ का फैसला होगा,’’ कांता उछलतीकूदती चीखतीचिल्लाती पिंडी के पास पहुंच गई.

अचानक तभी डिंपल भी जोर से चीखने और हंसने लगी. उस के बाल खुल कर बिखर गए. अब तो गांव वाले और हैरानपरेशान हो गए. इस गांव के ही नहीं, बल्कि आसपास के बीसियों गांवों में कभी ऐसा नहीं हुआ था कि किसी औरत में देवी आई हो. डिंपल की आवाज में फर्क आ गया था. एक बुढि़या ने डरतेडरते पूछा, ‘‘आप कौन हैं, जो इस सीधीसादी लड़की में प्रवेश कर गए हो? हे महाराज, आप देव हैं या देवी?’’ डिंपल भी चीखतीउछलती लटूरी देवता की पिंडी के पास पहुंच गई थी. वह जोर से बोली, ‘‘मैं महाकाली हूं. आज मैं पाखंडियों को सजा दूंगी. अब काली और महाकाली आ गई हैं, अब दुष्टों को दंड जरूर मिलेगा,’’ कह कर उस ने पिंडी के पास से दराट उठाया और बकरे का सींग पकड़े छांगू के हाथ पर दे मारा.

छांगू चेले की उंगलियों की 2 पोरें कट कर नीचे गिर गईं. वह दर्द के मारे चिल्लाने और तड़पने लगा. ‘‘बकरे, जा अपने घर, तुझे कोई नहीं काट सकता. जा, घर जा,’’ डिंपल ने उछलतेकूदते कहा.

बकरा भी माधो के घर की तरफ दौड़ गया. यह सब देख कर लोग जयकार करने लगे. अब तक तो सभी ने हाथ भी जोड़ लिए थे. बच्चे तो अपने मांओं से चिपक गए थे.

डिंपल ने दराट लहराया फिर चीखते और उछलते बोली, ‘‘बहन काली, गुर और उस के झूठे साथियों से पूछ सच क्या है, वरना इन्हें काट कर मैं इन का खून पीऊंगी.’’ ‘‘जो आज्ञा. खालटू गुर, जो पूछूंगी सच कहना. अगर झूठ कहा, तो खाल खींच लूंगी. आज सारे गांव के सामने सच बोल.’’

डिंपल ने एक जोर की लात खालटू को दे मारी. दूसरी लात कांता ने मारी, तो वह गिरतेगिरते बचा. गलत आदमी भीतर से डराडरा ही रहता है. डर के चलते ही खालटू ने सीधीसादी लड़कियों में काली और महाकाली का प्रवेश मान लिया था. छांगू की कटी उंगलियों से बहते खून ने उसे और ज्यादा डरा दिया था, जबकि वह खुद में तो झूठमूठ का देवता ला देता था. लातें खा कर मारे डर के वह उन के पैर पड़ गया और गिड़गिड़ाया ‘‘मुझे माफ कर दीजिए माता कालीमहाकाली, मुझे माफ कर दीजिए.’’

दर्द से तड़पते छांगू चेले ने अपनी उंगलियों पर रुमाल कस कर बांध लिया था. गुर को लंबा पड़ देख कर डर और दर्द के मारे वह भी रोते हुए उन के पैर पड़ गया, ‘‘मुझे भी माफी दे दो माता.’’ डिंपल ने गुर की पीठ पर कस कर लात मारी, ‘‘मैं महाकाली खप्पर वाली हूं. सच बता रे खालटू या तेरी गरदन काट कर तेरा सारा खून पी जाऊं,’’ डिंपल ने हाथ में पकड़ा दराट लहराया, तो वह डर के मारे कांप गया.

‘‘बताता हूं माता, सच बताता हूं. गांव वालो, माधो का बकरा खाने के लिए हम ने झूठमूठ की अफवाहें फैला कर माधो और डिंपल पर झूठा आरोप लगाया था. मुझ में कोई देवता नहीं आता है. मैं, चेला छांगू, मौहता भागू, कारदार सब से ठग कर माल ऐंठते थे. हम सारे दूसरों की औरतों पर बुरी नजर रखते थे. मुझे माफ कर दीजिए. आज के बाद मैं कभी बुरे काम नहीं करूंगा. मुझे माफ कर दीजिए.’’

डिंपल और कांता की 2-4 लातें और खाने से वह रो पड़ा. अब तो कारदार भी उन दोनों के पैरों में लौटने लगे थे.

‘‘तू सच बता ओ छांगू चेले, नहीं तो तेरा सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा,’’ कांता ने जोर की ठोकर मारी तो वह नीचे गिर पड़ा, फिर उठ कर उस के पैर पकड़ लिए.

‘‘गांव के भाईबहनो, मैं तो चेला बन कर तुम सब को ठगता था   आज के बाद मैं कभी बुरे काम नहीं करूंगा.’’

गुर, चेले, मौहता और कारदारों ने सब के सामने सच उगल दिया. डिंपल और कांता ने उछलतेचीखते उन्हें लातें मारमार कर वहां से भागने पर मजबूर कर दिया.

एक नौजवान ने पेड़ से एक टहनी तोड़ कर कारदार और मौहता भागू को पीट दिया. डिंपल और जोर से चीखी, ‘‘जाओ दुष्टो, भाग जाओ, अब कभी गांव मत आना.’’ वे सिर पर पैर रख कर भाग गए और 2 मील नीचे लंबा डग नदी के तट पर जीभ निकाले लंबे पड़ गए. उन की पूरे गांव के सामने पोल खुल गई थी. वे एकदूसरे से भी नजरें नहीं मिला पा रहे थे.

कांता ने उछलतेचीखते जोर की किलकारी मारते हुए गुस्से से कहा, ‘‘गांव वालो, ध्यान से सुनो. खशलोहार के नाम पर रास्ते मत बांटो, वरना मैं अभी तुम सब को शाप दे दूंगी.’’ ‘माफी काली माता, शांत हो जाइए. आप की जय हो. हम रास्ते नहीं बांटेंगे. माफीमाफी,’ सैकड़ों मर्दऔरत एक आवाज में बोल उठे. बच्चे तो पहले ही डर के मारे रोने लगे थे.

काली और महाकाली के डर से अब खशखश न थे और लोहार लोहार न थे, लेकिन वे सारे गुर खालटू, चेले, मौहता व कारदारों से ठगे जाने पर दुखी थे. ‘माफी दे दो महाकाली माता. आप दोनों देवियां शांत हो जाइए. हमारे मन का मैल खत्म हो गया है. शांत हो जाइए माता,’ कई औरतें हाथ जोड़े एकसाथ बोलीं.

‘‘क्या माफ कर दें बहन काली?’’

‘‘हां बहन, इन्हें माफ कर दो. पर ये सारे भविष्य में झूठे और पाखंडी लोगों से सावधान रहें.’’

‘हम सावधान रहेंगे.’ कई आवाजें एकसाथ गूंजी. कुछ देर उछलनीचीखने और दराट लहराने के बाद डिंपल ने कहा, ‘‘काली बहन, अब लौट चलें अपने धाम. हमारा काम खत्म.’’

‘‘हां दीदी, अब लौट चलें.’’

डिंपल और कांता कुछ देर उछलींचीखीं, फिर ‘धड़ाम’ से धरती पर गिर पड़ीं. काफी देर तक चारों ओर सन्नाटा छाया रहा. सब की जैसे बोलती बंद हो गई थी.

जब काफी देर डिंपल और कांता बिना हिलेडुले पड़ी रहीं, तो कांता की दादी ने मंदिर के पास से पानी भरा लोटा उठाया और उन के चेहरे पर पानी के छींटे मारे. वे दोनों धीरेधीरे आंखें मलती उठ बैठीं. वे हैरानी से चारों ओर देखने लगी थीं. फिर कांता ने बड़ी मासूमियत से अपनी दादी से पूछा, ‘‘दादी, मुझे क्या हुआ था?’’ ‘‘और मुझे दादी?’’ भोलेपन से डिंपल ने पूछा.

‘कुछ नहीं. आज सच और झूठ का पता चल गया है. लूट और पाखंड का पता लग गया है. जाओ भाइयो, सब अपनेअपने घर जाओ.’’

धीरेधीरे लोग अपने घरों को लौटने लगे. दादी कांता का हाथ पकड़ कर बच्ची की तरह उसे घर ले गईं. डिंपल को उस की मां और बापू घर ले आए. शाम गहराने लगी थी और हवा खुशबू लिए सरसर बहने लगी थी. एक बार फिर डिंपल और कांता सुनसान मंदिर के पास बैठ कर ठहाके लगने लगी थीं.

‘‘बहन महाकाली.’’

‘‘बोलो बहन काली.’’

‘‘आज कैसा रहा सब?’’

‘‘बहुत अच्छा. बस, अब कदम रुकेंगे नहीं. पहली कामयाबी की तुम्हें बधाई हो कांता.’’

‘‘तुम्हें भी.’’

दोनों ने ताली मारी, फिर वे अपने गांव और आसपास के इलाकों को खुशहाल बनाने के लिए योजनाएं बनाने लगीं. आकाश में चांद आज कुछ ज्यादा ही चांदनी बिखेरने लगा था.  

औटोरिक्शा वाला : इनसान है या हैवान?

दोपहर के 2 बजे थे. शिवानी ने आज का हिंदी अखबार उठाया और सोफे पर बैठ कर खबरों पर सरसरी नजर दौड़ाने लगी. हत्या, लूटमार, चोरी, ठगी और हादसों की खबरें थीं. जनपद में ही बलात्कार की 2 खबरें थीं. एक 10 साला बच्ची से पड़ोस के एक लड़के ने बलात्कार किया और दूसरी 15 साला लड़की से स्कूल के ही एक टीचर ने किया बलात्कार. पता नहीं  क्या हो रहा है? इतने अपराध क्यों बढ़ रहे हैं? कहीं भी सिक्योरिटी नहीं रही. अपराधियों को पुलिस, कानून व जेल का जरा भी डर नहीं रहा. बलात्कार की खबरें पढ़ कर शिवानी मन ही मन गुस्सा हो गई. यह कैसा समय आ गया है कि किसी भी उम्र की औरत या बच्ची महफूज नहीं है. बच्चियों से भी बलात्कार. इन बलात्कारियों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए, जो ये भविष्य में ऐसे घिनौने अपराध करने के काबिल ही न रहें.

शिवानी की नजर दीवार पर लगी घड़ी पर पड़ी. दोपहर के ढाई बज रहे थे. अभी तक मोनिका स्कूल से नहीं लौटी थी? स्कूल से डेढ़ बजे छुट्टी होती है. आधा घंटा घर लौटने में लगता है. अब तक तो मोनिका को घर आ जाना चाहिए था. शिवानी के पति कमलकांत एक प्राइवेट कंपनी में असिस्टैंट मैनेजर थे. उन की 8 साला एकलौती प्यारी सी बेटी मोनिका शहर के एक मशहूर मीडियम स्कूल में तीसरी क्लास में पढ़ रही थी. पढ़ने में होशियार मोनिका बातें भी बहुत प्यारीप्यारी करती थी. शादी के बाद कमलकांत ने शिवानी से कहा था, ‘देखो शिवानी, हमें अपने घर में केवल एक ही बच्चा चाहिए. हम उसी को अच्छी तरह पाल लें, अच्छी तालीम दिला दें, चाहे वह लड़का हो या लड़की. यही गनीमत होगी. उस के बाद हमें दूसरे बच्चे की चाह नहीं करनी है.’

शिवानी भी पति के इस विचार से सहमत हो गई थी. वह खुद एमए, बीऐड थी, पर बेटी के लिए उस ने नौकरी करना ठीक न समझा और एक घरेलू औरत बन कर रह गई. शिवानी के दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं. कहां रह गई मोनिका? सुबह साढ़े 7 बजे वह आटोरिकशा में बैठ कर गई थी. 5 बच्चे और भी जाते हैं उस के साथ. मोनिका सब से पहले बैठती है और सब से बाद में उतरती है. आटोरिकशा चलाने वाला श्यामलाल पिछले साल से बच्चों को ले जा रहा था, पर कभी लेट ही नहीं हुआ. लेकिन 2 दिन से श्यामलाल बीमार पड़ा था. कल उस का भाई रामपाल आया था आटोरिकशा ले कर.

तब शिवानी ने पूछा था, ‘आज तुम्हारा भाई श्यामलाल कहां रह गया?’

‘उसे 3 दिन से बुखार है. उस ने ही मुझे भेजा है,’ रामपाल ने कहा था.

पहले भी 2-3 बार रामपाल ही बच्चों को ले कर गया और छोड़ कर गया था. वह भी शहर में आटोरिकशा चलाता था.

आज शिवानी को खुद पर गुस्सा आ रहा था. वह रामपाल का मोबाइल नंबर लेना भूल गई थी. मोबाइल नंबर लेना न तो कल ध्यान रहा और न ही आज. अगर उस के पास रामपाल का मोबाइल नंबर होता, तो पता चल जाता कि देर क्यों हो रही है. पता नहीं, वह पढ़ीलिखी समझदार होते हुए भी ऐसी बेवकूफी क्यों कर गई?

शिवानी के मन में एक डर समा गया और वह सिहर उठी. उस का रोमरोम कांप उठा. दिल की धड़कनें मानो कम होती जा रही थीं. उस ने धड़कते दिल से श्यामलाल का मोबाइल नंबर मिलाया.

‘हैलो… नमस्कार मैडम,’ उधर से श्यामलाल की आवाज सुनाई दी.

‘‘नमस्कार. तुम्हारा भाई रामपाल अभी तक मोनिका को ले कर घर नहीं आया. पौने 3 बज रहे हैं. पता नहीं कहां रह गया वह? मेरे पास तो रामपाल का मोबाइल नंबर भी नहीं है?’’

‘इतनी देर तो नहीं होनी चाहिए थी. स्कूल से घर तक आधे घंटे से भी कम का रास्ता है. मैं ने उस का फोन मिलाया, तो फोन नहीं लग रहा है. पता नहीं, क्या बात है?

‘सुबह मैं ने उस से कहा था कि बच्चों को छोड़ कर सीधे घर आ जाना. डाक्टर के पास जाना है. दवा लानी है. 3 दिन से बुखार नहीं उतर रहा है,’ श्यामलाल बोला.

‘‘मुझे बहुत चिंता हो रही है. बेचारी मोनिका पता नहीं किस हाल में होगी?’’ शिवानी रोंआसा हो कर बोली. थोड़ी देर बाद शिवानी ने मोनिका की क्लास में पढ़ने वाली एक बच्ची की मम्मी को मोबाइल मिला कर कहा, ‘‘हैलो… मैं शिवानी बोल रही हूं…’’

‘कहिए शिवानीजी, कैसी हैं आप?’ उधर से एक औरत की मिठास भरी आवाज सुनाई दी.

‘‘क्या आप की बेटी मुनमुन स्कूल से आ गई है?’’

‘हां, वह तो 2 बजे से पहले ही आ गई थी. क्यों, क्या बात हुई?’

‘‘हमारी मोनिका अभी तक घर नहीं आई है.’’

‘यह क्या कह रही हैं आप? एक घंटा होने को है. आखिर कहां रह गई वह? आजकल का समय भी बहुत खराब चल रहा है. रोजाना अखबार में बच्चियों के बारे में उलटीसीधी खबरें छपती रहती हैं. हम अपने बच्चों को इन लोगों के साथ भेज तो देते हैं, पर इन का कोई भरोसा नहीं. किसी के मन का क्या पता…

‘आप पुलिस में रिपोर्ट तो लिखवा ही दीजिए. देर करना ठीक नहीं है.’

यह सुनते ही शिवानी का दिल बैठता चला गया. उस के मन में एक हूक सी उठी और वह रोने लगी. उस ने स्कूल में फोन मिलाया. उधर से आवाज सुनाई दी, ‘जय भारत स्कूल…’

‘‘मैं शिवानी बोल रही हूं. हमारी बेटी मोनिका तीसरी क्लास में पढ़ती है. वह अभी तक घर नहीं पहुंची. स्कूल में कोई बच्ची तो नहीं रह गई? छुट्टी कब हुई थी?’’

‘यहां तो कोई बच्ची नहीं है. छुट्टी ठीक समय पर डेढ़ बजे हुई थी. आप की बेटी किस तरह घर पहुंचती है?’

‘‘एक आटोरिकशा से. आटोरिकशा चलाने वाला श्यामलाल बीमार था, तो उस का भाई रामपाल आटोरिकशा ले कर आया था.’’

‘बाकी बच्चे घर पहुंचे या नहीं?’

‘‘जी हां, सभी पहुंच गए. बस, मेरी बेटी नहीं पहुंची.’’

‘आप पुलिस में सूचना दीजिए. इतनी देर से बच्ची घर नहीं पहुंची. कुछ तो गड़बड़ जरूर है. आजकल किस पर विश्वास करें? कुछ पता नहीं चलता कि इनसान है या शैतान?’

यह सुन कर शिवानी की आंखों से बहते आंसू रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे. लग रहा था, मानो जिस्म की ताकत निकलती जा रही हो.

शिवानी ने कमलकांत को मोबाइल फोन मिलाया.

‘हैलो…’ उधर से कमलकांत की आवाज सुनाई दी.

‘‘मोनिका अभी तक स्कूल से नहीं आई,’’ शिवानी ने रोते हुए कहा.

‘क्या कह रही हो… 3 बज चुके हैं. आखिर कहां रह गई वह? आटोरिकशा वाले का नंबर मिलाया?’ कमलकांत की डरी सी आवाज सुनाई दी.

‘‘आज भी उस का भाई रामपाल आया था. उस का नंबर मेरे पास नहीं है. श्यामलाल ने कहा है कि रामपाल का फोन नहीं मिल रहा है. सभी बच्चे अपने घरों में पहुंच चुके हैं, पर हमारी मोनिका अभी तक नहीं आई,’’ कहतेकहते शिवानी सिसकने लगी.

‘शिवानी, मैं घर आ रहा हूं. अभी पुलिस स्टेशन पहुंच कर रिपोर्ट लिखवाता हूं,’ कमलकांत की चिंता में डूबी गुस्साई आवाज सुनाई दी.

15 मिनट बाद ही कमलकांत घर पहुंच गए. शिवानी सोफे पर कटे पेड़ की तरह गिरी हुई सिसक रही थी.

‘‘शिवानी, अपनेआप को संभालो. हम पर अचानक जो मुसीबत आई है, उस का मुकाबला करना है. मैं अब पुलिस स्टेशन जा रहा हूं,’’ कहते हुए कमलकांत कमरे से बाहर निकले.

तभी घर के बाहर एक आटोरिकशा आ कर रुका. उसे देखते ही कमलकांत चीख उठे, ‘‘अबे, अब तक कहां मर गया था?’’

शिवानी भी झटपट कमरे से बाहर निकली. कमलकांत ने देखा कि रामपाल के माथे पर पट्टी बंधी हुई थी. चेहरे पर भी मारपिटाई के निशान थे.

मोनिका आटोरिकशा से उतर रही थी. रामपाल ने मोनिका का बैग उठाया. शिवानी ने मोनिका को गोद में उठा कर इस तरह गले लगा लिया, मानो सालों बाद मिली हो.

कमलकांत ने मोनिका से पूछा, ‘‘बेटी, तुम ठीक हो?’’

‘‘हां पापा, मैं ठीक हूं. अंकल को सड़क पर पुलिस ने मारा,’’ मोनिका बोली.

कमलकांत व शिवानी चौंके. वे दोनों हैरानी से रामपाल की ओर देख रहे थे.

‘‘रामपाल, क्या बात हुई? यह चोट कैसे लगी? आज इतनी देर कैसे हो गई? हम तो परेशान थे कि पता नहीं आज क्या हो गया, जो अब तक मोनिका घर नहीं आई,’’ कमलकांत ने पूछा.

‘‘चिंता करने की तो पक्की बात है, साहबजी. रोजाना तो बेटी 2 बजे तक घर आ जाती थी और आज साढ़े 3 बज गए. इतनी देर तक जब बेटी या बेटा घर न पहुंचे, तो घबराहट तो हो ही जाती है,’’ रामपाल ने कहा.

‘‘तुम्हें चोट कैसे लगी?’’ शिवानी ने हैरानी से पूछा.

आटोरिकशा के एक पहिए में पंक्चर हो गया. पंक्चर लगवाने में आधा घंटा लग गया. मेरे पास आज मोबाइल भी नहीं था, सोचा किसी और के फोन से आपको फोन कर दूं लेकिन पंक्चर लगाने में ही उलझा रहा. आगे चौक पर जाम लगा था. कुछ लोग प्रदर्शन कर किसी मंत्री का पुतला फूंक रहे थे. कुछ देर वह%B

मायका पुराण चालू

रोनी सी सूरत लिए नत्थू मेरे पास आया. मैं ने पूछा, ‘‘क्या परजाईजी से खटपट हो गई है?’’

नाम तो उस का नरसिया सिंह है पर हम सब उसे नत्थूजी ही कहते हैं क्योंकि उस के प्रकांड पंडित पिता ने नरसिया नाम क्यों रखा, मालूम नहीं.

‘वो, आप तो अंतर्यामी हैं प्रभु’ के भाव लिए ‘सही पकड़े हैं’ कह कर मेरे निकट कालीन पर बैठ गया. कुरसी खाली थी पर लगता है आज वह याचक की भूमिका पूरी तरह निभाने को तैयार हो कर आया था.

मैं ने कहा, ‘‘वत्स, सविस्तार बयान करो, बेखौफ कहो, पत्नी की चढ़ी त्योरी को ध्यान में लाओगे तो सबकुछ भीतर धरा रह जाएगा.’’

हां मैं ‘प्रभु’ की भूमिका में खुद को रख कर टीवी से मिले अधकचरे धर्मज्ञान की पोटली में से कुछ निकाल कर उस को देने की प्रक्रिया में लग जाता हूं.

यों तो ‘भीतर धरा रह जाएगा’, केवल इस एक वाक्य के तहत पोथी भर का ज्ञान दिया जा सकता है परंतु इस के लिए समय और सुपात्र की तलाश करनी पड़ेगी, हर लाइट  सब्जैक्ट पर ज्ञान को लुटाना ठीक भी नहीं. मेरी जगह दूसरा भी होता तो इस लाभ को दुलत्ती मारने की बेवकूफी नहीं कर सकता. पत्नीप्रताडि़त कम लोग ही खुल कर बयान देते देखे गए हैं. मन मसोस कर रहने वाले मरते मर जाएंगे मगर जी से पत्नी के खिलाफ बोलने की हिम्मत जुटा पाने में एक अघोषित शर्मिंदगी से दोचार होते रहते हैं. मगर नत्थू के साथ ऐसा नहीं था. उस का अडिग विश्वास मुझ पर था कि इधर की बात उधर करने वाला ‘वायरस’ मुझ में नहीं है.

‘‘बोलो भी, चुप रहना था तो मेरा समय खराब करने क्यों चले आए?’’

उस ने धारावाहिक ‘सासबहू’ सीरियल में से बहू वाला पार्ट रिलीज किया.

‘‘आप की परजाई, पिछले कुछ दिनों से अखबार में सोने के भाव कम होने की खबर क्या पढ़ रही हैं, हायतौबा मचाए रहती हैं…’’

‘‘नत्थूजी, आसान सी बात है, आप अखबार लेना बंद क्यों नहीं कर देते?’’

‘‘आप भी सरजी, अखबार बंद करवाने से रोग मिटता तो मिटा लेता. ये टीवी और उन की सहेलियों के वाट्सऐप व सोशल मीडिया का क्या करूं…पलपल की खबरें, ब्रेकिंग न्यूज माफिक चलाते फिरते हैं.

‘‘20-30 रुपए दाम भी सोने के गिरतेबढ़ते हैं तो औफिस में मोबाइल घनघना देती हैं. बोलो, सोने में 20-30 रुपए कोई माने रखते हैं भला? औफिस से थकेहारे जो वापस आओ तो चायकौफी के पहले ‘सर्राफा’ के उतारचढ़ाव पर वर्णन चालू हो जाता है. किस बहनजी के घर कितने ग्राम या कितना तोला आया, उन्हें एकएक माशा-रत्ती का हिसाब मालूम होता है. वे हम से मुखातिब हो कहती हैं, ‘मालूम है, शर्माजी के यहां पुरुषोत्तम मास के बाद किलो के हिसाब से सोना खरीदा जाने वाला है. ऐसी अपनी कालोनी के लेडीज क्लब में चर्चा है.’

‘‘मैं आश्चर्य पूछता हूं, ‘साले की नंबर दो की कमाई अब छलकने को आई. मुझे बताना कब खरीदने वाले हैं. एसीबी वालों की रेड डलवा दूंगा. शरीफों की बस्ती में तमीज नहीं है, रहने चले हैं, नंबर दो वाले…’

‘‘‘ये लो, आप को सही बात बताओ तो मिर्ची लग जाती है. जिन के पास है, भाव गिरे तो हमआप कौन हैं रोकने वाले? दूसरों के साथ लड़नेभिड़ने की जुगाड़ चौबीसों घंटे लगाए रहते हैं आप. कहे  देती हूं, ऐसे बहाने से मैं डिगने वाली नहीं. शादी के बाद रत्ती भर सोना मिला हो तो कहो. आप से जब भी बोलो, कान की दिला दो, हाथ की खरीदवा दो, गला सूना लगता है…तो अपनी शेरोशायरी में घुस जाते हो. कहे देती हूं, सब आग में झोंक दूंगी एक दिन. बहुत हो गया, देखेंगेदेखेंगे सुनते हुए.’

‘‘सरजी, पानी तो बादल फटने जैसा सिर से ऊपर होने को है. आप के पास ‘सोना नहीं खरीदने के हजार बहाने’ जैसी कोई किताब हो तो बताओ?’’

‘‘नत्थूजी, गृहस्थी के अच्छे स्वास्थ्य के लिए पति का स्वर्णदान समारोह भी समयसमय पर होता रहना चाहिए. समझदार पति इस से इनकार कर के कभी सुखी नहीं रह सकता. खैर, ये सब तो सक्षम  पति के चोंचले हैं. तुम्हारे साथ अभी पत्नीजिद से निबटने वाली समस्या का निदान होना पहली प्राथमिकता है. बोलो, ऐसा ही है या…?’’

‘‘ठीक है, दोनों तरफ देखते हैं.’’

‘‘तुम ने परजाई से पूछा, कितनी रकम है?’’

‘‘हां, पूछा, हम ने कहा, पैसे निकालो, तो कहने लगीं, ‘रकम, पैसा, वेतन कभी हाथ में दिया जो हिसाब मांग रहे हो. ठनठन गोपाल बना रखा है. आज तक मेरी हर ख्वाहिश मायके से पूरी होती रही है. होश है आप को? जितने गिनवा कर लाए थे, उस का चौथाई भी चढ़ाया होता तो पाव-आध किलो बदन पर दिखता. चार लोगों के बीच में शान से उठतीबैठती.’

‘‘सरजी, उन का मायका पुराण चालू हो जाने के बाद मेरे पास डिफैंसिव शौट खेलने के अलावा कोई दूसरा विकल्प बचता नहीं. सिरदर्द, औफिस में ज्यादा काम, थकावट जैसे आम आदमी वाले बहाने सूझते हैं. डाइनिंग टेबल पर रखे दवाओं के डब्बे से एकआध गोली दिखाने के नाम पर यों ही गटक लेता हूं.

‘‘मेरी तरफ से घोषित मौन पर, युद्धविराम पर, रात 10 बजे समझौतावार्त्ता की पहल के तहत खिचड़ी परोसी जाती है. मैं चुपचाप उसे खा कर सो जाता हूं.’’

‘‘नत्थूजी, नारीहठ का गंभीर मामला है. यह सोना जो है न, युगों से अपना खेल खेलता आया है. सीता मैया भी स्वर्णमोह से बच नहीं सकी थीं. उन्होंने न केवल अपने लिए बल्कि अपने पति के लिए भी विपत्ति को बुलावा भेज दिया था. न प्रभु स्वर्णमृग के पीछे भागे होते, न रावण सीता मैया को उठा ले गया होता.

‘‘खैर, वे सब तो जैसेतैसे मारकाट कर निबट लिए, अभी समस्या आप की है? कितनी रकम है आप के खाते में? उधर, ख्वाहिश किस चीज की हो रही है? कितने तक में आ जाएगी?’’

‘‘सरजी, डिमांड 5 तोले की है. लगभग डेढ़ लाख रुपए तक में आ जाएगी. मैं चाहता हूं वह अपनी चादर की हैसियत से पांव फैलाना जाने…’’

‘‘ऐसा करो, तुम्हारी कार की सैकंड हैंड वैल्यू भी इतनी ही होगी, उसे मेरे गैराज में डाल दो. उस से कहना कि सोने के हार के लिए बेच दी. पैसा 2-3 दिनों में मिलेगा, फिर हार ले लेंगे.

‘‘और हां, कल से शिष्टाचार सप्ताह मनाना शुरू कर दो.’’

‘‘मतलब?’’

‘‘मतलब यह कि खाने में एकाध रोटी कम कर दो. रात को औफिस का काम फैला लो. सुबह मौर्निंग वाक चले जाओ. अगर घूमना पसंद नहीं तो सौ कदम दूर, चाय की दुकान में बैठ के अखबार पढ़ के वापस चल दो. औफिस मोटरसाइकिल से आनेजाने लगो. ऐसे पति की छवि बनेगी जो बीवी की इच्छाओं के लिए तनमनधन को जीजान से लगाए दिए जा रहा है.’’

‘‘सरजी, इन सब से होगा क्या?’’

‘‘वह सौरी कह के आगेपीछे चक्कर लगाएगी, जिद करेगी कि कार वापस ले आओ. बिना कार के नाक कटती है जी. जब पैसे आ जाएंगे, नैकलैस की तब सोचेंगे.’’ नत्थू चुप.

‘‘भई नत्थू, मेरे सुझाव को अमल में लाने के बाद ‘संकट टल गया’ की मुद्रा में निश्चिंत मत हो जाना. वैसे, परजाईजी का हक बनता है, कहो तो आज ही किसी ज्वैलरी शौप चलें, कल सोने का भाव कहीं बढ़ न जाए? कार और ज्वैलरी दोनों पा कर उधर से अगाध प्रेम उमड़ेगा. उस का साक्षी बनने को मैं चाय पर जरूर आऊंगा. तब तुम्हारी काबिलीयत की तारीफ कर के मैं सोने पे सुहागा कर दूंगा.’’

चमक किसकिस की दोगुनी होती है, आप भी देखिए.

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