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मिलावटी खाद : किसानों की फसल और पैसा दोनों बरबाद

फल, सब्जी व अनाज की पैदावार बढ़ाने में रासायनिक खादों का इस्तेमाल बहुत मददगार साबित हुआ है, लेकिन अब महंगी खादों की आड़ में किसानों की जेबें कट रही हैं. ऊपर से खाद अब 100 फीसदी खालिस मिलनी मुश्किल हो रही है, लिहाजा खेत में डाली खाद का असर आधाअधूरा दिखता है.दरअसल खरीफ की फसलों के लिए अप्रैल से सितंबर तक व रबी के लिए अक्तूबर से मार्च तक मांग बढ़ने से खादों की किल्लत मची रहती है. ऐसे में खादों की कालाबाजारी होती है. साथ ही मिलावटखोरों की पौ बारह हो जाती है. इस खेल से नफा  चालबाजों का व नुकसान किसानों व उन की फसलों का होता है.

खादों में मिलावट के 3 तरीके हैं. पहला तरीका है खाद की नकली बोराबंदी यानी बोरे पर किसी नामी कंपनी का नामनिशान छपा होता है, पर उस के अंदर घटिया खाद भरी होती है. इस के लिए मशहूर कंपनियों की खादों के खाली बोरे खरीद कर उन में नकली खादें भर दी जाती हैं.दूसरे तरीके के तहत महंगी खादों में सस्ती खादें मिलाई जाती हैं और तीसरे तरीके में खाद में नमक व रेत वगैरह मिलाया जाता है. यूरिया में नमक, सिंगल सुपर फास्फेट में बालू व राख, कापर सल्फेट, फेरस सल्फेट व म्यूरेट आफ पोटाश में रेत व नमक मिलाया जाता है. डीएपी में दानेदार सिंगल सुपर फास्फेट व राक फास्फेट, एनपीके में सिंगल सुपर फास्फेट या राक फास्फेट, जिंक सल्फेट में मैगनीशियम सल्फेट मिला दिया जाता है.

जब मैगी के मामले में सरकार कड़े कदम उठा सकती है, तो किसानों के काम आने वाली महंगी खाद में मिलावट का मसला हमारे ओहदेदारों को अंदर तक आखिर क्यों नहीं झकझोरता? दरअसल किसानों की परवाह महज चुनावों के पहले की जाती है और खेती को बढ़ावा देने जैसी बातें फकत वोटों के लिए होती हैं.

ढीली लगाम

खाद में मिलावट रोकने, नमूने लेने व जांचपरख का सरकारी इंतजाम व कायदेकानून हैं, लेकिन सरकारी घोड़े कागजों पर ही ज्यादा दौड़ते हैं. इसीलिए खाद में हो रही मिलावट रोके नहीं रुकती. इस का बड़ा कारण सरकारी मुलाजिमों की मिलीभगत, उन का निकम्मापन व नीचे से ऊपर तक पसरा भ्रष्टाचार है. बीते 5 सालों में भरे गए खाद के कुल 6,44,983 नमूनों में से 32,283 नमूने फेल हो गए थे.गौरतलब है कि बीते 5 सालों में खादों के जितने सैंपल भरे गए, उन में फेल सैंपलों की गिनती 5 फीसदी के आसपास बनी रही. लैब के भ्रष्ट मुलाजिमों की घूसखोरी व मिलीभगत से जांच रिपोर्टें बदल दी जाती हैं और दिखावे के लिए 5 फीसदी मिलावट की रस्म अदायगी हो जाती है.मिलावटी खादों पर नकेल कसने के इंतजाम आधेअधूरे हैं, लिहाजा मिलावटखोर जल्दी नहीं पकड़े जाते. जो पकड़े जाते हैं, उन पर सख्त कार्यवाही नहीं होती है. इतने बड़े कृषि प्रधान देश में साल 2009 तक खाद की क्वालिटी जांचने के लिए सिर्फ 74 लैबें ही थीं, जिन की सालाना कूवत 1,32965 नमूने जांचने की थी.साल 2014 तक खाद प्रयोगशालाओं की गिनती बढ़ कर 78 हुई व नमूने जांचने की कूवत 1,52,470 हो गई, लेकिन दिल्ली, गोवा, त्रिपुरा, नागालैंड, मणीपुर, मेघालय, सिक्किम, अरुणांचल प्रदेश व पांडिचेरी के अलावा संघ शासित राज्यों में खाद जांचने की कोई क्वालिटी कंट्रोल लैब नहीं है.

गांवगांव घूम कर खादों का सही इस्तेमाल सिखाने व मिट्टी की जांच कराने के लिए देश में 123 घुमंतू लैबों की मोबाइल वैनें चल रही हैं, लेकिन किसान नहीं जानते कि वे न जाने कहां, कब घूमती हैं? यदि महीने में 1 बार वे सभी कृषि विज्ञान केंद्रों पर आ जाएं तो मिलावटी खादों की दिक्कतें कम हो सकती हैं.फर्टीलाइजर कंट्रोल आर्डर 1985 के तहत सरकारी लिस्ट में कुल 29 तरह की खादें हैं, उन में से सिर्फ 14 को ही खास बढ़ावा दिया जाता है. अब देश में नीम लेपित खाद ही बनेगी. पिछले दिनों 6 सरकारी खाद कारखानों को आगे लाया व बढ़ाया गया ताकि उन का उत्पादन बढ़े व जरूरत के मुताबिक खाद अपने देश में ही बने.उत्तर भारत के ज्यादातर इलाकों में खादों में मिलावट के मामले ज्यादा मिलते हैं. इस की वजह यह भी है कि इधर ज्यादातर किसान अब हरी, कंपोस्ट व गोबर की खादें बनाने को झंझट व अंगरेजी खादें डालने को आसान समझते हैं. ऐसे में अंगरेजी खादों का इस्तेमाल इतना ज्यादा है कि उन का आयात होता है.साल 2012-13 में 49,460 करोड़ रुपए की व साल 2013-14 में 39,261 करोड़ रुपए की अंगरेजी खादों का आयात किया गया था.

बढ़ती मांग

खादों में मिलावट की वजह कीमतों व मांग में बढ़ोतरी भी है. साल 2011-12 में यूरिया की खपत 295 लाख टन, 2012-13 में 300 लाख टन व साल 2013-14 में 306 लाख टन हुई थी. इस दौरान डीएपी की खपत क्रमश: 101, 91 व 73 लाख तथा एनपीके की खपत क्रमश: 277, 255 व 244 लाख टन थी. जाहिर है कि देश में यूरिया की खपत सब से ज्यादा होती है और इस में लगातार इजाफा हो रहा है.अंगरेजी खाद की सब से ज्यादा खपत पंजाब में प्रति हेक्टेयर 250 किलोग्राम, बिहार में 212 किलोग्राम व हरियाणा में 207 किलोग्राम है. उड़ीसा में अंगरेजी खाद की प्रति हेक्टेयर खपत 90 किलोग्राम, राजस्थान में 51 किलोग्राम व हिमाचल प्रदेश में 50 किलोग्राम है. खाद की सब से कम खपत पूर्वोत्तर राज्यों में सिर्फ 5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से भी कम है. उधर के किसान देसी खादों पर ज्यादा भरोसा करते हैं. वे बिना खाद व दवा की फसलें उगा कर ज्यादा दाम पाते हैं.

खादों की किल्लत क्यों

किसानों को वक्त पर खादें मुहैया कराने के लिए केंद्र सरकार का खेती महकमा हर सीजन में खादों की मांग का अंदाजा लगाता है. इस में उर्वरक मंत्रालय, राज्य सरकारों व संबंधित एजेंसियों से राय ली जाती है. इस के अलावा फसलों के रकबे, सिंचाई, पिछले सीजन की खपत व माहिरों की सिफारिशों को भी ध्यान में रखा जाता है. इस के बावजूद हर बार सारे आंकड़े, अनुमान व प्रोग्राम फेल हो जाते हैं, क्योंकि सरकारी दफ्तरों में फाइलें कछुए की चाल से आगे बढ़ती हैं. इस के बाद खादें ढोने के लिए रेल वैगनों की जरूरत होती है. तमाम वजहों से खादें वक्त पर पूरी मात्रा में नहीं मिलतीं. ऐसे में खादों में मिलावट करने वालों का धंधा तेजी से चल निकलता है.

उपाय

हालांकि आम किसानों के लिए मिलावटी खादें पकड़ना आसान नहीं हैं, फिर भी खुली खादें कभी न खरीदें. किसान इफको व कृभको की खादें कोआपरेटिव सोसायटी से लें या फिर किसी नामी कंपनी की खाद भरोसे की दुकान से खरीदें. खाद लेते वक्त रसीद व बोरे की सिलाई अच्छी तरह से देख लें. यदि जरा सा भी शक हो तो सुबूत सहित खेती महकमे के अफसरों से उस की शिकायत जरूर करें. भारत सरकार के खेती मंत्रालय ने रासायनिक उर्वरकों की क्वालिटी कंट्रोल के लिए एक संस्था बना रखी है, जिस का नाम है केंद्रीय उर्वरक गुण नियंत्रण एवं प्रशिक्षण संस्थान. इस संस्था ने खादों में मिलावट की जानकारी देने के लिए फोल्डर व मिलावट जांचने के लिए किट बनाया है. इन के जरीए किसान खुद खाद में मिलावट की जांच कर सकते हैं. इस के अलावा खाद खरीदते वक्त दुकानदार से मिली रसीद की फोटो कापी के साथ खाद का नमूना इस संस्थान को जांचने के लिए भेज सकते हैं.

ज्यादा जानकारी के लिए संस्थान का पता है : निदेशक, केंद्रीय उर्वरक गुण नियंत्रण एवं प्रशिक्षण संस्थान, एनएच 4, फरीदाबाद, हरियाणा.                         

खाद के फेल नमूने

साल   कुल भरे गए    फेल हुए

       नमूने   नमूने

2009-10     118312      5925

2010-11     121868      6099

2011-12     131970      6592

2012-13     133872      6700

2013-14     138961      6972

जितना खेत उतनी खाद

रासायनिक खादों का अंधाधुंधा इस्तेमाल, जमाखोरी व कालाबाजारी रोकने के लिए उत्तर प्रदेश में जितना खेत उतनी खाद स्कीम लागू होगी. पहले इसे सरकारी व सहकारी खाद गोदामों पर व बाद में निजी दुकानों पर लागू किया जाएगा. इस स्कीम में किसानों को उतनी खाद मिलेगी जितनी उन्हें जरूरत है. जमीन की खतौनी के आधार पर एग्री क्लीनिकों की सलाह से खाद की जरूरत तय होगी. गौरतलब है कि ‘फार्म एन फूड’ के 1 मार्च, 2015 अंक में छपे लेख ‘धड़ल्ले से जारी खाद की कालाबाजारी’ में बताई गई हकीकतों को उजागर करने के इरादे से पत्रिका की वह प्रति उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को भेजी गई थी.

हुआ असर : खाद की दुकानों पर पड़े छापे

बीती 31 जुलाई, 2015 को उत्तर प्रदेश में खाद की दुकानों व गोदामों पर ताबड़तोड़ छापे डाले गए. जिलाधिकारियों की अध्यक्षता में पड़े 2937 छापों में अफसरों की टीम को बड़े पैमाने पर स्टाक में कमी व बोरों की रीपैकिंग वगैरह की गड़बडि़यां मिलीं. कई जगह खाद के बोरों की सिलाई तयशुदा मानकों के मुताबिक नहीं थी. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की हिदायत पर हुई इस छापेमारी में खाद के 1200 नमूने लिए गए, जिन्हें जांच के लिए भेजा गया है.

मछली की उन्नत प्रजातियों का पालन

भारत की बढ़ती जनसंख्या और घटती खेती की जमीनें खाद्यान्न संकट की ओर इशारा कर रही हैं. ऐसे में बेरोजगारी व भुखमरी बढ़ने के आसार हैं. ऐसे में मछलीपालन न केवल रोजगार का अच्छा साधन साबित हो सकता है, बल्कि खाद्यान्न समस्या के पूरक के तौर पर भी अच्छा साबित हो सकता है. देश में दिनोंदिन मछली खाने वालों की तादाद में इजाफा हो रहा है, इसलिए मछली की मांग में तेजी से उछाल आया है.ऐसे में अगर बेरोजगार नौजवान और किसान मछलीपालन का काम वैज्ञानिक तरीके से करें तो कम लागत में अधिक मुनाफा हो सकता है.

तालाब का चयन : मछली पालन के लिए सब से पहले तालाब का चयन करना पड़ता है. इस के लिए ग्रामपंचायतों नगरपालिकाओं द्वारा संरक्षित तालाबों को पट्टे पर ले कर यह काम शुरू किया जा सकता है. जिन के पास 1 बीधे से 2 हेक्टेयर तक जमीन है, वे तालाब की खुदाई करा कर मछलीपालन का काम शुरू कर सकते हैं. तालाब का चयन करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि तालाब में साल भर 1-2 मीटर पानी जरूर भरा रहे. इस के लिए तालाब में पानी भरने का इंतजाम रखना चाहिए. तालाब में मछली के बच्चे डालने से पहले यह जान लेना जरूरी होता है कि तालाब बाढ़ प्रभावित न हो और उस के किनारे कटेफटे न हों.मछलीपालन से पहले यह जांच लेना चाहिए कि तालाब का समतलीकरण हो चुका हो. इस के अलावा तालाब में पानी आनेजाने की जगह पर जाली लगी होनी चाहिए, ताकि जलीय जीवजंतु तालाब में न आने पाएं. तालाब के सुधार का काम जून तक जरूर पूरा कर लेना चाहिए.

तालाब की सफाई : मछलीपालन करने से पहले ही तालाब की सफाई जांच लेनी चाहिए. जलकुंभी, लेमना, अजोला, पिस्टिया, कमल, हाईड्रिला या नजाज को तालाब से निकाल देना चाहिए, क्योंकि ये पौधे तालाब के ज्यादातर भाग को घेरे रहते हैं, जिस से मछलियों की पैदावार प्रभावित होती है. तालाब में खरपतवार नियंत्रण के लिए रसायन का इस्तेमाल न करें, क्योंकि इस से पानी जहरीला हो कर मछलियों के लिए घातक साबित हो सकता है.

तालाब से फालतू मछलियों की सफाई भी जरूरी होती है. ये मछलियां उन्नतशील मछलियों को प्रभावित करती हैं. इस के लिए मत्स्यबीज को तालाब में छोड़ने से पहले तालाब में महुए की खली डाल देनी चाहिए, जिस के असर से पढि़न, मांगुर, सौर, सिंधि जैसी मछलियां मर कर ऊपर आ जाती हैं, जिन्हें जाल से छान कर बाहर निकाल देना चाहिए. इस के 15 से 20 दिनों बाद ही तालाब में मत्स्य बीज डालना सही होता है, क्योंकि तब तक तालाब से महुए की खली के जहर का असर खत्म हो जाता है.

मछलियों की अच्छी बढ़वार के लिए मत्स्यपालन विभाग की प्रयोगशाला में तालाब की मिट्टी की जांच जरूर कराएं, ताकि तालाब में कार्बनिक व रासायनिक खादों के इस्तेमाल को तय किया जा सके.

चूने व उर्वरक का इस्तेमाल : मछलीपालन वाले तालाब में चूने का इस्तेमाल पानी की क्षारीयता में इजाफा करता है और अम्लीयता को सही करता है. चूना तालाब में मछलियों को दूसरे जलीय जीवों से भी बचाता है. इस के लिए 250 किलोग्राम बुझा हुआ चूना प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. तालाब में कार्बनिक संतुलन के लिए 10 टन गोबर प्रति हेक्टयर की दर से 1 साल में इस्तेमाल करें. यह मात्रा 10 महीने की समान मासिक किस्तों में डालीन चाहिए. गोबर की खाद डालने के 15 दिनों बाद रासायनिक खादों का इस्तेमाल करना चाहिए, जिस में यूरिया 200 किलोग्राम, सिंगल सुपर फास्फेट 250 किलोग्राम व म्यूरिक आफ पोटाश 40 किलोग्राम प्रति हेक्टयर होना चाहिए.

प्रजातियों का चयन

मछलीपालन के लिए कभी भी एक तालाब में अकेली एक प्रजाति की मछली का चयन नहीं करना चाहिए, बल्कि उच्च उत्पादकता वाली 2 से 6 प्रजातियों का चयन करना चाहिए, जिस से मछलियों की बढ़वार अच्छी होती है और उत्पादन भी अच्छी मात्रा में होता है.

कतला : यह भारतीय मछली जिसे भाकुर भी कहा जाता है, बहुत तेजी से बढ़ती है. इस मछली में भोजन को मांस में बदलने में अच्छी कूवत पाई जाती है, इसलिए इस का बाजार भाव हमेशा अच्छा रहा है. यह मछली के शौकीनों की पसंदीदा मछली मानी जाती है.

इस मछली का सिर बड़ा होता है. इस की मूछें नहीं होती हैं. यह पानी की ऊपरी सतह पर तैरने वाले प्लवकों को भोजन के रूप में खाती है. यह मछली ज्यादातर तालाब के भोजन को खाती है, लेकिन कृत्रिम भोजन भी इसे पसंद होता है. इसी वजह से तालाब में कृत्रिम भोजन का छिड़काव भी किया जा सकता है.

कतला पहले साल में ही 12-14 इंच की लंबाई में बढ़ती है. इस का वजन 1.0 किलोग्राम से ले कर 1.25 किलोग्राम तक होता है. एक कतला मछली 1 साल में 1.2 किलोग्राम तक के वजन पर 15 रुपए की लागत लेती है, जबकि इस का बाजार भाव 100 से 150 रुपए प्रति किलोग्राम होता है. इस प्रकार इस से 85 से 135 रुपए तक का लाभ लिया जा सकता है.

सिल्वर कार्प : यह मछली रूस व चीन में पाई जाती है. इस का पालन भारतीय किसानों की अच्छी आमदनी का साधन है. सिल्वर कार्प लंबी व चपटे शरीर वाली मछली है. इस का सिर नुकीला व थूथन गोल होता है. यह तालाब के शैवाल व सड़ेगले पदार्थों को खाती है. इसे अलग से मछलियों का चारा खिलाया जाना भी अच्छा होता है. सिल्वर कार्प तालाब में तेजी से बढ़ती है और 12 से 14 इंच लंबी हो जाती है. 1 साल में इस का वजन 1.5 किलोग्राम से 1.8 किलोग्राम तक हो जाता है. इस मछली को पालने में प्रति मछली मात्र 15 रुपए की लागत आती है.

रोहू : इस मछली का वैज्ञानिक नाम लेबियो रोहिता है. यह भारतीय प्रजाति की सब से तेज बढ़ने वाली मछलियों में गिनी जाती है. इस प्रजाति की मछलियां सब से स्वादिष्ठ मानी जाती हैं. खाने वाले इसे सब से ज्यादा पसंद करते हैं. यह मछली तालाब के अंदर के शैवाल व जलीय पौधों की पत्तियों को खाती है. रोहू की वृद्धि दर कतला से थोड़ी कम है. यह अपने जीवनकाल में 3 फुट की लंबाई तक बढ़ सकती है, जिस का वजन 1 किलोग्राम तक पाया जाता है.

इन तमाम मछलियों के पालन के लिए 1 हेक्टेयर तालाब में 5 हजार मत्स्यबीज या अंगुलिकाएं डालने की जरूरत पड़ती है, इन के साथ तालिका में बताई जा रही अन्य प्रजातियों की मछलियों को पालना भी जरूरी होता है.

मछलियों का आहार व देखभाल : मछलियों के विकास के लिए मूंगफली, सरसों या तिल की खली को चावल की कनकी या गेहूं की चोकर के साथ बराबर मात्रा में मिला कर मछलियों के भार के 1 से 2 फीसदी की दर से देना चाहिए. अगर ग्रास कार्प मछली का पालन किया गया है, तो पानी की वनस्पतियों जैसे लेमना, हाइड्रिला, नाजाज, सिरेटो फाइलम या स्थलीय वनस्पतियों जैसे नैपियर, बरसीम या मक्के के पत्ते वगैरह जितना खाएं उतनी मात्रा में रोजाना देना चाहिए.

मछलियों के बीज तालाब में डालने के बाद हर महीने तालाब में जाल डाल कर उन के स्वास्थ्य व वृद्धि की जांच करते रहना चाहिए. अगर मछलियां परजीवी से प्रभावित हों, तो उन्हें पोटैशियम परमैगनेट यानी लाल दवा या नमक के घोल में डुबो कर तालाब में छोड़ें. मछलियों में लाल चकत्ते या घाव दिखाई दें तो अपने नजदीकी मत्स्य विभाग से जरूर संपर्क करें.

मछलियों की निकासी व बिक्री : मछलियों की उम्र जब 12-16 महीने की हो जाए और उन का वजन 1-2 किलोग्राम हो, तो उन्हें तालाब से निकाल कर स्थानीय मंडी या बाजार में बेचा जा सकता है, जिस से मत्स्यपालक अच्छा लाभ कमा सकते हैं.      

साथसाथ पाली जाने वाली प्रजातियां

मछली की      6 प्रजातियों के लिए     4 प्रजातियों के लिए     3 प्रजातियों के लिए

प्रजाति  तालाब में फीसदी       तालाब में फीसदी       तालाब में फीसदी

कतला 10    30    40

रोहू    30    25    30

नैन    15    20    30

सिल्वर कार्प    20    –     –

ग्रास कार्प      10    –     –

कामन  15    25    –

मालपुआ- दूध, सूजी, मैदा और चीनी का कमाल

गांवों में शादी और दूसरे अवसरों पर मालपुआ काफी पसंद किया जाता है. इसे तैयार करना आसान होता है. जाडे़ के दिनों में अब यह शहरी मिठाई की दुकानों पर खूब बनने लगा है. मालपुआ की अच्छी बात यह होती है कि यह अनाज, दूध और चीनी से मिल कर तैयार होता है. इस में खराब होने वाला कुछ नहीं होता है. उत्तर भारत की सभी मिठाई की दुकानों में मालपुआ मिल जाता है. इसे घर पर भी तैयार किया जाता है. अच्छा मालपुआ बनाने के लिए दूध, सूजी और मैदे की क्वालिटी अच्छी होनी चाहिए. देशी घी में तले मालपुए ज्यादा ही स्वादिष्ठ होते हैं. मुरादाबाद की रहने वाली पकवान विशेषज्ञ आरती तरुण गुप्ता कहती हैं, ‘मालपुआ अपनेआप में बहुत ही स्वादिष्ठ और पसंद किया जाने वाला पकवान है. यह साधारण पुओं से एकदम अलग होता है.’ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह खूब बिकता है. सब से अच्छी बात यह है कि गांवों से ले कर शहरों तक हर जगह मालपुआ मिल जाता है. सभी जगहों पर इसे पसंद किया जाता है.

मालपुआ के लिए सामग्री : 4 कप फुल क्रीम दूध, 1 बड़ा चम्मच सूजी, 4 बड़े चम्मच मैदा, 1 बड़ा चम्मच चीनी, 2 इलायची और तलने के लिए पर्याप्त घी.

चाशनी के लिए सामग्री : 1 कप चीनी, आधा कप पानी, 6 से 8 केसर के धागे, 1 बड़ा चम्मच इलायची. मालपुओं को सजाने के लिए कुछ पिस्ते व बादाम.

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मालपुआ बनाने की विधि : सब से पहले कड़ाही में दूध डाल कर उबालें. पहले उबाल के बाद आंच को धीमा कर दें. दूध को गाढ़ा होने दें. जब दूध गाढ़ा हो जाए तो आंच बंद कर दें. गाढ़े दूध को ठंडा होने दें. चाशनी बनाने से पहले केसर के धागों को दूध में भिगो कर अलग रख दें और इलायची छील कर बारीक पीस लें.

इस के बाद पानी और चीनी को मिला कर चाशनी बनाने के लिए आंच पर चढ़ा दें. चाशनी को गाढ़ा होने तक पकाएं मालपुए के लिए

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1 तार की चाशनी अच्छी  रहती है. चाशनी में केसर, दूध और इलायची पाउडर डाल कर अलग रख दें.

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इस के बाद मालपुए बनाने की शुरुआत करें. गाढ़े किए दूध में चीनी, सूजी और मैदा अच्छी तरह मिलाएं. यह घोल पकौड़े के घोल जैसा बनना चाहिए. मिश्रण को आधे घंटे के लिए रख दें.

कड़ाही में घी गरम कर के उस में चम्मच से मिश्रण को गोलगोल आकार में डालें. इन का साइज छोटी पूरी जैसा होना चाहिए. इन को पकने दें. जब ये ब्राउन कलर के हो कर ठीक से पक जाएं तो इन्हें तैयार चाशनी में डालें. 15 मिनट बाद मालपुओं को बाहर निकालें और कटे हुए पिस्तेबादाम से सजा कर खाने वालों को दें और खुद भी खाएं.

खेती व खुदकुशी : मजबूरी तेरे अंजाम पर रोना आया

लोगों की जिंदगी खेती पर टिकी हुई है, क्योंकि खेती से ही खाना पैदा होता है और खाने के बगैर जीवन मुमकिन नहीं है. लेकिन खेती करने वाले किसानों की जिंदगी एक मजाक बन कर रह गई है. हालात से हार कर किसान मौत को गले लगा रहे हैं.

‘चाहे जेठ हो या हो पूस किसानों को आराम नहीं है.

छूटे कभी संग बैलों का

ऐसा कोई याम नहीं है.  

मुंह में जीभ,

शक्ति भुजा में,

 जीवन में सुख का नाम नहीं है. 

वसन कहां सूखी रोटी भी मिलती सुबहशाम नहीं है.’

किसानों की बदहाली पर रामधारी सिंह दिनकर की यह कविता बरसों पुरानी है, लेकिन आज भी सच है. हाड़तोड़ मेहनत के बाद भरपेट रोटी न मिले तो इनसान क्या करे? पेट की आग जब गरीब की हिम्मत तोड़ देती है तो रूह का परिंदा अचानक पिंजरा तोड़ कर उड़ जाता है. हालांकि मौत को गले लगाना आसान नहीं है, फिर भी लोग खुदकुशी करते हैं. अपना वजूद खत्म करने की वजह माली मजबूरी, दिमागी परेशानी या सामाजिक मामला हो, लेकिन खुदकुशी से मुश्किलें हल नहीं होतीं. नेशनल क्राइम ब्यूरो खुदकुशी करने वालों के सालाना आंकड़े जमा करता है. इस ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक साल 2014 के दौरान देश में कुल 1,31,666 लोगों ने खुदकुशी की. इन में करीब 4 फीसदी यानी 5650 किसान थे. इन में 5178 आदमी व 472 औरतें थीं. खुदकुशी करने वाले किसानों में सब से ज्यादा 44 फीसदी किसान 2 हेक्टेयर से कम जोत वाले थे, 27 फीसदी किसान 1 हेक्टेयर से कम जोत वाले थे और 29 फीसदी किसान 10 हेक्टेयर से कम जोत वाले थे. राज्य सरकारों के मुताबिक करीब 1400 किसानों ने खुदकुशी की और उन में 63 उत्तर प्रदेश के थे.

गड़बड़झाला

खुदकुशी कम होने की बातें गले से नहीं उतरतीं. नवदान्य संस्था के मुताबिक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ही 199 किसानों ने जान गंवाई थी. उन में मेरठ के 35, बागपत के 23, मुजफ्फरनगर के 25, बुलंदशहर व आगरा के 34-34, अलीगढ़ के 33 व हाथरस के 15 किसान शामिल थे. खुदकुशी के ये सरकारी आंकड़े सही नहीं लगते हैं. साल 2004 में 18,241, साल 2012 में 13,754 व साल 2013 में 11,301 किसानों ने खुदकुशी की थी. इन आंकड़ों से लगता है कि गिनती घट रही है, लेकिन सरकारी मशीनरी आंकड़े बदलने में माहिर है. थानों में रिपोर्ट जल्दी से दर्ज नहीं होती, ताकि जुर्म की गिनती कम रहे.देश आजाद होने से पहले भी किसान खुदकुशी करते थे, लेकिन तब बादशाहों, जमींदारों व अंगरेजों के जोरजुल्म थे. भारी कर, लगान व सेठसाहूकारों के चंगुल में फंसे किसान दूसरों का पेट भरते थे, तन ढकते थे, लेकिन खुद खाली पेट व अधनंगे रह कर अपनी जान गंवा देते थे. बरसों बीत गए, लेकिन किसानों की दशा नहीं बदली. आज भी ऐसे तमाम गरीब किसान हैं जिन्हें मदद की दरकार है, लेकिन सरकार से उन्हें कभी कोई इमदाद नहीं मिली. हालात ने उन्हें खुदकुशी के कगार तक पहुंचा दिया. मानसून पर टिकी खेती बुरे दौर से गुजर रही है और घाटे का सौदा साबित हो रही है. छोटे किसानों की बदहाली उन्हें पहले ही अधमरा कर देती है. ऐसे में किसानों का खुदकुशी करना भी जायज लगने लगता है.अपनी बेहिसाब मुश्किलों में घिरे किसान जब अपना पेट पालने लायक भी नहीं रहते, तो तंग आ कर आखिर में खुदकुशी कर लेते हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक साल 2014 में खुदकुशी करने वाले किसान महाराष्ट्र में सब से ज्यादा 2568 व असम में सब से कम सिर्फ 2 थे. जरूरत उस माहौल को सुधारने की है जिस में किसानों के सामने खुदकुशी करने की नौबत आती है.

खेती करे सो मरे

दरअसल दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूर भी शाम को एक तय रकम पा जाते हैं, लेकिन किसान बोआई के बाद कटाई तक सिर्फ इंतजार करते हैं कि उन्हें मेहनत का क्या फल मिलेगा? बीज, मौसम व आढ़ती में से कौन कब क्या व कितना दगा देगा? इस तरह कदमकदम पर छोटे किसानों की जिंदगी में अंधेरा बढ़ने लगता है.किसानों के लिए खेती करना, तार पर चल कर नदी पार करने जैसा जोखिम भरा है. जरा सा चूके कि गए काम से. किसानों को एक ओर मुश्किलों के पहाड़ व दूसरी ओर गहरी खाई दिखाई देती है. उन की दुश्वारियां उन्हें जीने नहीं देतीं. लिहाजा ज्यादातर किसान खेती से जुड़े बुरे हालात से तंग आ कर खुदकुशी कर लेते हैं.आंकड़े गवाह हैं कि ज्यादातर किसान कर्ज के चक्कर में खुदकुशी करते हैं. दरअसल वे इतनी बुरी तरह फंस जाते हैं कि उन्हें अपने जीते जी उस कर्ज के बोझ से छुटकारा मिलना मुमकिन नहीं लगता. आमदनी कम होने से उन की जिम्मेदारियां वक्त से पूरी नहीं होतीं. खुदकुशी करने वालों में 30 से 60 साल तक की उम्र वाले किसान ज्यादा रहते हैं.किसान मेहनती होते हैं. वे जल्दी से हिम्मत नहीं हारते और पूरे हौसले से आखिरी दम तक अपनी बेहिसाब परेशानियों, मुश्किलों व मसलों से लड़ते रहते हैं, लेकिन कई बार इन डूबते हुओं को तिनके का सहारा तक नसीब नहीं होता. उन की कहीं सुनवाई नहीं होती. ऐसे में जब उन्हें कोई सहारा नहीं दिखता तो उन को जिंदगी बोझ लगने लगती है. इनसानी इरादे फौलादी हो सकते हैं, लेकिन जिंदगी की डोर कमजोर होती है. खिंचाव हद से ज्यादा हो तो लोहे के तार भी टूट जाते हैं. कहने का मकसद यह है कि किसानों की खुदकुशी को सही ठहराना हरगिज सही नहीं है, लेकिन गरीबी व लाचारी झेलने की भी एक हद होती है. उस हद से आगे इनसान टूट जाता है और दुनिया से उस का नाता टूट जाता है.

बयानबाजी

कृषि प्रधान देश के किसान खुदकुशी करने पर मजबूर हों, यह बहुत शर्म की बात है. एक ओर किसानों को अन्नदाता व देश की रीढ़ कहा जाता है. दूसरी ओर उन के जख्मों पर मरहम लगाने की जगह नमक छिड़का जाता है. किसानों की खुदकुशी की वजहें गिनाते हुए पिछले दिनों कृषि मंत्री ने राज्यसभा में इतना बेतुका बयान दिया था कि उसे यहां फिर से दोहराना भी किसानों की तौहीन होगी. कृषि मंत्री के उस बयान पर सरकार की खूब फजीहत हुई. अगले दिन वित्त मंत्री ने अपने साथी मंत्री के बचाव में सफाई दी कि किसानों के मरने की ऐसी वजहें तो उन से पहली सरकार द्वारा भी गिनाई जाती रही हैं. अमीर मुल्कों में 1 नागरिक मरने पर भी बवाल मच जाता है, लेकिन अपने देश में हजारों किसानों की खुदकुशी को भी नजरअंदाज कर दिया जाता है. खुदकुशी के असल कारण खोजने व उन्हें रोकने के लिए कारगर कदम उठाने की जगह इस मसले को हलके में लिया जाता रहा है.

मजबूरी

इतिहास बताता है कि जब कमजोर तबके के लोगों को जीने के बुनियादी हकों से बेदखल किया जाता है, तो उन में अलगाव व असंतोष की चिनगारी सुलगती है. नाराजगी जब ज्यादा बढ़ जाती है तो मरतेखपते लोग बागी हो कर मरनेमारने पर उतर आते हैं. खेती से आमदनी पर कर नहीं लगता है, लिहाजा काले घन को सफेद करने व ऐशोआराम के लिए बहुत से रईस शहरों के नजदीक खेत खरीद कर आलीशान फार्महाउस बनवा लेते हैं. आजकल ऐसे लोगों का बोलबाला बढ़ रहा है, जो दिखावे के लिए मजदूरों से थोड़ी खेती कराते हैं और खेती की आड़ में मलाई खाते हैं.

उपाय

खेती के नाम पर चालाक लोग मौज कर रहे हैं. छप्परों व खपरैलों के झोंपड़ों में रहने व खुद खेत जोतने वाले किसान अपने हालात से तंग आ कर खुदकुशी की कगार पर हैं. जब सारे रास्ते बंद हो जाते हैं, तो इनसान गलत रास्ता अपना लेता है. ऐसे में सब से पहले उन कारणों की पहचान जरूरी है, जिन से हालात इतने खराब हो जाते हैं कि किसान खुदकुशी करने पर मजबूर हो जाते हैं. तंगहाल किसानों को समझाने व बचाने के लिए सिंगल विंडो सिस्टम होना चाहिए ताकि उन्हें सारी सहूलियतें एक ही जगह पर मिलें.

किसानों को चाहिए कि वे नाउम्मीदी के भवंर से उबरें और खुद पर व जमीन पर यकीन रखें. जिंदगी कीमती है, लिहाजा खुदकुशी हरगिज न करें. माहिरों, तजरबेकारों व सरकारी महकमों से तालमेल बनाएं. उन की सलाह लें. उन की मदद से नई तकनीक अपनाएं. स्वयं सहायता समूह बनाएं, अपनी जानकारी बढ़ाएं व मिल कर मसलों को हल करें. पुरानी लीक को छोड़ें व खेती को नए दौर में हो रहे बदलावों से जोड़ें. ऐसा करने से आमदनी बढ़ेगी और हालात बेहतर होंगे.                    ठ्ठ

खुदकुशी करने वाले किसानों की उम्र

उम्र    मर्द    औरतें  कुल

18 साल से कम 35    24    59

18 से 30 साल तक    1131  169   1300

30 से 60 साल तक    3480  232   3712

60 साल से ऊपर       532   47    579

कुल    5178  472   5650  

खाद व्यवसायी और दलाल मालामाल किसान बेहाल

अच्छी फसल होने और उपज बढ़ने से ही किसानों की माली हालत सुधरती है और वे संपन्न होते हैं. अच्छी फसल के लिए अनुकूल मौसम और किसानों की मेहनत के साथ खेतों में खाद डालना भी जरूरी होता है. यही वजह है कि किसानों द्वारा रासायनिक खाद भारी मात्रा में खरीदी जाती है. किसानों की इसी मजबूरी का फायदा उठा कर खाद व्यापारी खाद की मनमानी कीमतें वसूलते हैं. पूर्वोत्तर राज्य असम में किसान अच्छी उपज की आशा में महंगे दामों पर खाद खरीद कर खेती तो करते हैं, मगर उन के उत्पाद की कीमत लागत से भी काफी कम मिलती है. ज्यादा कीमत पर खाद खरीद कर एक ओर तो किसान बेहाल हो रहे हैं, तो दूसरी ओर खाद विक्रेता किसानों से खाद का मनमाना दाम वसूल कर मालामाल हो रहे हैं. सूबे के बरपेटा शहर में रासायनिक खाद बेचने वाले व्यापारी 50 किलोग्राम यूरिया की कीमत किसानों से 5 सौ रुपए वसूलते हैं, जबकि सरकारी रेट 284 रुपए है. इसी प्रकार खाद व्यापारी 50 किलोग्राम डीएपी रासायनिक खाद किसानों को  2 हजार रुपए में बेच रहे हैं, जबकि इस का सरकारी रेट 12 सौ रुपए है. इसी तरह 50 किलोग्राम पोटाश का सरकारी रेट 240 रुपए है, लेकिन व्यापारी इसे किसानों को 280 रुपए में बेचते हैं. गौरतलब है कि बरपेटा में एक बहुत बड़ी सब्जी मंडी है, यहां के किसान अपनी तमाम सब्जियां इस मंडी में ला कर बेचते हैं. बरपेटा  और उस के आसपास के अंचलों के किसानों द्वारा पैदा की गई तमाम तरह की सब्जियां बरपेटा की सब्जी मंडी में बिकने आती हैं. इस के अलावा यहां की सब्जियां गुवाहाटी और उस के आसपास की सब्जी मंडियों में बेची जाती हैं. बरपेटा जिले की सब्जी मंडी में थोक भाव से सब्जी बेचने वाले बड़ेबड़े आढ़त हैं. बाजार में भारी मात्रा में सब्जी आने के कारण सब्जियों के रेट काफी कम हो जाते हैं. सब्जी दलालों की मनमानी भी मंडी का माहौल बिगाड़ देती है. हरी सब्जियों की खरीद का भाव मंडी में मौजूद सब्जी दलाल ही तय करते हैं. बाजार में इन दलालों का दबदबा रहता है. मजबूरन किसानों को अपने उत्पाद बेहद कम दामों पर इन दलालों को बेचने पड़ते हैं.

ऐसी बात नहीं है कि बाजार में थोक रेट पर हरी सब्जियां खरीदने वाले व्यापारियों की कमी है. स्थानीय खुदरा व्यापारी तो बाजार में होते ही हैं, साथ ही साथ ट्रकों पर लोड कर के यहां से तमाम सब्जियां कई अन्य जिलों की सब्जी मंडियों में भेजी जाती हैं. यहां की सब्जियां गुवाहाटी के अलावा पड़ोसी राज्य शिलांग में भी भेजी जाती?हैं. इन के अलावा करीमगंज, मिजोरम, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली तक यहां की सब्जियां जाती हैं. इस धंधे में बिचौलियों व दलालों के साथसाथ सब्जी मंडी के थोक व्यापारी भी भारी मुनाफा कमाते हैं.  

 

ज्यादा आमदनी के लिए

जापानी बटेरपालन

भूमिहीन किसानों, बेरोजगार युवाओं और लघु व सीमांत किसानोें को बाजार की मांग के मुताबिक ऐसी गतिविधियां अपनानी होंगी, जो कम लागत में ज्यादा आमदनी दे सकें. वैसे ग्रामीण अपने गांवों में कृषि के साथसाथ आमदनी बढ़ाने के लिए मुरगीपालन, बतखपालन व टर्कीपालन वगैरह करने लगे हैं, पर बीमारियों, मौसम की मार और बाजार के उतारचढ़ाव के कारण इन में ज्यादा मुनाफा नहीं होता है. यदि इन की बजाय जापानी बटेरपालन का काम किया जाए तो वह ज्यादा फायदेमंद साबित होगा. जापानी बटेरपालन पर कुछ साल पहले उच्चतम न्यायालय ने रोक लगा दी थी, पर अब इसे हटा लिया गया है. जापानी बटेर को मांस व अंडों के लिए पाला जाता है. इस का मांस व अंडे स्वादिष्ठ होने के साथसाथ काफी पौष्टिक होते हैं. यही वजह है कि इन की बिक्री में कोई दिक्कत नहीं आती.

जापानी बटेरपालन के लिए चूजे मथुरा (उत्तर प्रदेश) के पंडित दीनदयाल उपाध्याय पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय सहित देश के तमाम पशु चिकित्सा विश्वविद्यालयों द्वारा अनुदानित दरों पर मुहैया कराए जा रहे हैं. मथुरा का पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय महज 9 रुपए में जापानी बटेर के चूजे मुहैया कराता है.

जापानी बटेर कबूतर के आकार का होता है, जिस का पालन मुरगीपालन की तरह जालीनुमा शेड में किया जाता है. जापानी बटेर उड़ने में तेज होता है, लिहाजा इस के शेड को बंद रखना पड़ता है. यदि शेड खुला रह जाएगा तो ये पक्षी उड़ कर गायब हो सकते हैं. जापानी बटेरपालन के लिए शुरू के 15 दिनों में तापमान पर खास ध्यान रखना पड़ता है. यदि तापमान 35 डिगरी सेल्सियस से अधिक होता है, तो कूलर लगा कर उसे कम करना पड़ता है. करीब 15 दिनों बाद इन चूजों का वजन तेजी से बढ़ना शुरू होता है और इन में रोगरोधक कूवत भी पैदा हो जाती है. जापानी बटेर के चूजों  में टीकाकरण या किसी दवा की जरूरत नहीं होती है. केवल शेड में फफूंदी या नमी का खास ध्यान रखना पड़ता है. मुरगियों के चूजों की तरह जापानी बटेर के चूजों को भी दाना खिलाना पड़ता है. करीब 5 हफ्ते तक 1 चूजे को करीब 1 किलोग्राम दाने की जरूरत होती है, जिस पर 35 से 40 रुपए का खर्च आता है. 5 हफ्ते के बाद चूजा बेचने लायक हो जाता है. इसे आसानी से 70 से 80 रुपए में बेचा जा सकता है. सर्दियों के मौसम में इन की काफी मांग बढ़ जाती है. जापानी बटेर के चूजे वजन से नहीं बेचे जाते. इन्हें प्रति चूजे की दर से बेचा जाता है. जापानी बटेर का मांस लोग काफी पसंद करते हैं. इस का पालन अंडों के लिए भी किया जाता है. मादा जापानी बटेर 2 महीने बाद रोजाना 1 अंडा देना शुरू कर देती है. यह साल भर अंडे देती है. मुरगियों की तरह मादा बटेर कभी कुड़क नहीं होती. जापानी बटेर में नर के मुकाबले मादा का वजन ज्यादा होता है. आमतौर पर बटेरपालन में 4 मादाओं के बीच 1 नर को रखा जाता है. कारोबारी तौर पर जापानी बटेरपालन कम से कम 500 जापानी बटेरों से शुरू करना बेहतर रहता है. राजस्थान के भरतपुर जिले में लुपिन फाउंडेशन संस्था द्वारा कुम्हेर पंचायत समिति के 2 गांवों में जापानी बटेरपालन शुरू कराया गया है. इन गांवों में बटेरपालन के अच्छे नतीजे मिले हैं, जिन्हें देख कर दूसरे गांवों में भी इसे शुरू कराया जा रहा ह . जापानी बटेरपालन शुरू कराने से पहले ग्रामीणों को प्रशिक्षण भी दिया जाता है. इस ट्रेनिंग में जापानी बटेरपालन के दौरान रखी जाने वाली सावधानियों, बीमारियों की रोकथाम और रखरखाव की जानकारी दी जाती है. 

जीतारम के जैविक बैगन

राजस्थान सूबे के जोधपुर जिले के पिचियाक गांव के 87 साला प्रगतिशील किसान जीताराम प्रजापत के पास 19 बीघे जमीन?है. वैसे तो वे सभी फसलों की बोआई करते?हैं, पर सब्जियों की खेती ज्यादा करते हैं. जीताराम बताते?हैं कि जैविक बैगन की खेती से ज्यादा कमाई होती?है, इसीलिए वे हर साल इस की खेती ही ज्यादा करते हैं. जीताराम को खेती की पुरानी जानकारी है. वे?ज्यादा पढ़ेलिखे नहीं?हैं, पर खेती में हमेशा नवाचार करते रहे हैं. वे पिछले 60 सालों से खेती के काम में लगे हुए हैं. जीताराम बताते हैं कि वे बैगन की बोआई जुलाई महीने में करते?हैं. वे 20 ग्राम बीज प्रति बीघे की दर से बोते?हैं. वे जोधपुर से उन्नत किस्म के बीज खरीद कर लाते हैं. उन्हें 10 ग्राम बीज 120 रुपए में मिलते?हैं.

वे सब से पहले नर्सरी लगाते हैं. वे खेत का चुनाव इस प्रकार करते हैं कि नर्सरी की जमीन कुछ उठी हुई हो, जहां पानी जमा नहीं होता हो. वे इस बात का भी खयाल रखते हैं कि चुने गए खेत में मिर्ची, टमाटर व बैगन की फसल जल्दी न ली गई हो. वे खेत की जुताई मईजून में करते हैं, ताकि सूर्य की गरमी से सूत्रकृमि व अन्य कीट और रोगों के बीजाणु खत्म हो जाएं. करीब 4 से 5 हफ्ते की नर्सरी होते ही वे पौधों की खेत में रोपाई कर देते हैं. इस से पहले वे खेत में गोबर की देशी खाद डालते हैं. वे ज्यादातर मींगनी की खाद 1 ट्रक प्रति बीघे के हिसाब से डालते हैं, जिस से बैगन की बढ़वार अच्छी होती है और उस में फलफूल खूब लगते है. मींगनी की 1 ट्रक खाद करीब 18 से 20 हजार रुपए में आती है. बैगन की रोपाई के 1 महीने बाद फलों की तोड़ाई शुरू हो जाती है. इस दौरान जीताराम देखते रहते हैं कि कोई पौधा रोगी तो नहीं है. वे रोगी पौधों को उखाड़ कर नष्ट कर देते हैं.जीताराम अपने खेत में कभी भी रासायनिक खाद (डीएपी व यूरिया) का इस्तेमाल नहीं करते है . उन का मानना है कि डीएपी व यूरिया के इस्तेमाल से जमीन बंधने लगती है और फिर कड़ी हो जाती है, जिस से फसल कमजोर होती है. इसीलिए वे हमेशा अपने खेतों में जैविक देशी खाद ही डालते हैं. जीताराम के खेत में कभी कीट यानी लट का प्रकाप होता है, तो वे जैविक नीम की दवा का छिड़काव करते हैं. वे कीटग्रस्त बैगनों को तोड़ कर गड्ढे में गाड़ देते हैं.

जीताराम बाजार से नीम की दवा एजेडिरेक्टीन खरीद कर लाते हैं और जरूरत के मुताबिक फसल पर छिड़काव करते हैं. जीताराम कहते हैं कि लट का प्रकोप अगस्तसितंबर में होता है. केवल उस समय ही दवा छिड़कने की जरूरत होती है. बाकी पूरे साल फसल स्वस्थ व भरपूर होती है. बैगन की तोड़ाई 1 दिन छोड़ कर करनी पड़ती है. जीताराम बताते हैं कि पहले वे साइकिल पर पास के गांवों बिलाड़ा, लांबा व बाला में जा कर बैगन बेच आते थे. आजकल काफी बैगन बाड़ी में ही बिक जाते हैं. जरूरत के मुताबिक वे जोधपुर मंडी जा कर भी अपने बैगन बेच देते हैं. बैगन के भावों में उतारचढ़ाव बहुत होता है. कभी 30 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बैगन बिकते हैं, तो कभीकभी 3 से 4 रुपए प्रति किलोग्राम तक बेचने पड़ते हैं. फिर भी बैगन से औसतन 1 लाख रुपए प्रति बीघे की कमाई होती है, जो दूसरी फसलों से नहीं होती. अब जीताराम ने जैविक खेती का ज्ञान अपने पोते जैराम को दिया है. जैराम ने एमए की पढ़ाई की है, पर वे भी जैविक बैगन की खेती में लगे हैं. वे पड़ोसी किसानों को सिखा भी रहे हैं और जैविक बैगन की खेती से खूब कमाई भी कर रहे हैं. ज्यादा जानकारी के लिए किसान लेखक के फोन नंबर 09414921262 या जीताराम प्रजापत के फोन नंबर 09928356960 पर संपर्क कर सकते हैं.

गन्ने की अंत:फसली खेती बढ़ाए आमदनी

गन्ना देश की एक खास नकदी फसल है. एक अनुमान के मुताबिक इस की खेती हर साल लगभग 30 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में की जाती है. देश के विभिन्न भागों में इस की 4 बार बोआई की जाती है. यह एक लंबी अवधि की फसल है, जिसे तैयार होने में कम से कम 1 साल का समय लग जाता है. इस लिहाज से केवल गन्ने के सहारे रहने वाले किसानों को एक ओर जहां अनेक रोजमर्रा की जरूरत वाली फसलों से वंचित होना पड़ता है, तो वहीं दूसरी ओर कई बार आपदा या कोई अन्य कारण होने से भारी नुकसान उठाना पड़ जाता है. किसी खेत में कई बार एक ही फसल लगातार उगाने से खेत की मिट्टी की उर्वरता व उत्पादकता की कूवत कम होने लगती है.

ऐसे में गन्ने के साथ अंत:फसल लेना एक समझदारी भरा फैसला साबित होगा, क्योंकि इस से जहां एक ओर प्राकृतिक आपदाओं की मार से दूसरी फसल से कुछ न कुछ जरूर हासिल किया जा सकता है, तो वहीं दूसरी ओर एकसाथ एक ही खेत में अलगअलग फसलें को उगाने से एक फसल के हानिकारक असर, दूसरी फसलों द्वारा खत्म हो जाते हैं. इस प्रकार मिट्टी की उर्वरता व उत्पादकता ठीक रहती है. क्या है अंत:फसल : इस बारे में राजा दिनेश सिंह कृषि विज्ञान केंद्र प्रतापगढ़ के विषय वस्तु विशेषज्ञ (प्रसार) डा. जेबी सिंह कहते हैं, ‘जब 2 या 2 से अधिक फसलों को समान अनुपात में उगाया जाता है, तो इसे अंत:फसल कहते हैं या अलगअलग फसलों को एक ही खेत में, एक ही साथ कतारों में उगाना ही अंत:फसल कहलाता है. ‘गन्ने की बोआई के बाद उस की बढ़वार पहले 4-5 महीने तक काफी धीरेधीरे होती है. ऐसे में लाइनों के बीच खाली जगहों पर अंत:फसल उगाने के लिए पूरा मौका होता है. शरदकालीन गन्ने के साथ मटर, मसूर, आलू, गोभी, शलजम, मूली, प्याज, धनिया, गेहूं, राई व सरसों वगैरह की बोआई की जा सकती है.’

मिट्टी व खेत की तैयारी : लवणीय, क्षारीय एवं अम्लीय मिट्टियां गन्ने के लिए पूरी तरह से बेकार होती हैं. जल निकासी वाली दोमट मिट्टी इस के लिए सब से अच्छी होती है. गन्ने की खेती में हलकी जुताई से काम नहीं चलता, क्योंकि इस से जड़ों का विकास बेहतर तरीके से नहीं हो पाता है. लिहाजा उत्तर भारत में कम से कम 1 बार गहरी जुताई के बाद 2 बार हैरो से क्रास जुताई करें या 5-6 बार देसी हल से जुताई करें. इस के बाद खेत को समतल व चिकना बनाए रखने के लिए पाटा चलाया जाना चाहिए.

प्रजातियां : गन्ने में करीब 2 महीने तक अंकुरण अवस्था (जर्मिनेटिव फेज) होती है. उस के बाद फार्मेटिव फेज या वानस्पतिक वृद्धि शुरू हो जाती है. ऐसे में गन्ने के साथ उन्हीं फसलों व प्रजातियों का चुनाव करना चाहिए, जो गन्ने के साथ कम से कम प्रतियोगिता करें और उन्हें फैलाव के लिए कम से कम जगह की जरूरत पड़े.  इस के अलावा फसल के पकने का समय 100 से 110 दिनों से अधिक न हो और उन्हें ज्यादा खाद व उर्वरक की जरूरत न पड़े.

बीज की मात्रा : अंत:फसली खेती में गन्ने के बीज की मात्रा सामान्य खेती के बराबर होती है, यानी 50-60 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होगी. वहीं अंत:फसल की बीज की मात्रा उस की लाइनों के मुताबिक होगी. मसलन गन्ने और आलू (2 लाइन गन्ने के बीच में 1 लाइन आलू की) की बोआई करने पर आलू की लाइनों की संख्या 50 फीसदी है. लिहाजा आलू के बीज की मात्रा गन्ने के बीज की मात्रा का 50 फीसदी होगी.

बोआई का तरीका : अंत:फसली खेती में फसलों की बोआई सामान्य खेती की तरह ही होती है. लेकिन मुख्य फसल की 2 लाइनों के बीच में दूसरी फसलों की कुछ लाइनों की बोआई करते हैं.

खाद एवं उर्वरक : बोआई से पहले 15-20 टन खूब सड़ी हुई गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर खेत में मिलाना चाहिए. गन्ने के साथ अंत:फसली खेती के लिए उर्वरक की मात्रा मुख्य फसल की सामान्य खेती के बराबर देते हैं. वहीं अंत:फसल में उर्वरकों की मात्रा उन की लाइनों के अनुपात के मुताबिक इस्तेमाल करते हैं, जैसे गन्ने व आलू में गन्ने की लाइनों की संख्या सामान्य खेती के बराबर होती है, मगर आलू की लाइनें 50 फीसदी होती हैं. लिहाजा उर्वरक की मात्रा 50 फीसदी ही रखते हैं. ध्यान रखने वाली बात यह है कि अंत:फसलों को सिर्फ नाइट्रोजन उर्वरक ही देते हैं. बाकी पोषक तत्त्वों को सामान्य खेती के मुताबिक ही इस्तेमाल करते हैं.

सिंचाई : सिंचाई मुख्य फसल गन्ने को ध्यान में रख कर करते हैं, मगर अंत:फसलों को फिर भी पानी की जरूरत पड़े तो अलग से लाइनों में पानी देते हैं.

खरपतवार नियंत्रण : यह जरूरी नहीं है कि गन्ने के साथ ली गई अंत:फसलें एक ही प्रकार की जड़ों व पत्तियों वाली हों. लिहाजा बेहतर यही है कि रासायनिक दवाओं से बचते हुए निराईगुड़ाई से ही खरपतवार नियंत्रण किया जाए. यदि दवाओं के बिना काम न चले तो कृषि वैज्ञानिकों से पूछ कर के ऐसी दवाएं इस्तेमाल करें, जो अंत:फसल या मुख्य फसल गन्ना को नुकसान न पहुंचाए.

कीट व रोग प्रबंधन : आमतौर पर गन्ने व अंत:फसल के कीट व रोग एकदूसरे से अलग होते हैं. ऐसी हालत में विशेषज्ञ की सलाह से ऐसे रसायनों का इस्तेमाल करें, जोकि किसी भी फलत को नुकसान न पहुंचाएं. बेहतर तो यही होगा कि बोआई के समय दोनों फसलों का भूमिशोधन व बीजशोधन जरूर करें.

कटाई : गन्ने की फसल विभिन्न प्रजातियों के मुताबिक अलगअलग समय पर काटी जाती है, मगर ली गई अंत:फसलें उन के तय समय के मुताबिक ही काटनी चाहिए. इस प्रकार ऊपर दी गई जानकारियों के मुताबिक बढ़ती हुई महंगाई व जनसंख्या और घटती हुई खेती लायक जमीन व घटती उत्पादकता से निबटने के लिए गन्ने के साथ अंत:फसलें उगा कर हालात का मुकाबला किया जा सकता है.      

अंत:फसल में लाइनों का हिसाब

फसल  लाइनों की संख्या

गन्ना आलू     2 लाइन गन्ने के बीच 1 लाइन आलू की 

गन्ना गेहूं      2 लाइन गन्ने के बीच 2 लाइन गेहूं की

गन्ना मक्का    2 लाइन गन्ने के बीच 1 लाइन मक्का की

गन्ना राई      2 लाइन गन्ने के बीच 2 लाइन राई की

गन्ना प्याज    2 लाइन गन्ने के बीच 2 लाइन प्याज की

गन्ना धनिया   2 लाइन गन्ने के बीच 2 लाइन धनिया की

गन्ना पालक    2 लाइन गन्ने के बीच 2 लाइन पालक की

फसल  प्रजातियां

गन्ना   कोसा 8432, कोसा 92422, कोसा 92423, कोसा 95429,

गेहूं    सिंचित व समय से बोआई के लिए : एचयूडब्ल्यू 510. असिंचित दशा में : के 8027 (इसे मगहर भी कहते हैं. यह कंडुआ व झुलसा अवरोधी है), एचडीआर 77, के 9351 (मंदाकिनी). देरी से बोआई की दशा में : के 9423 (उन्नत हलना), के 7903 (हलना)

मक्का  नवीन, श्वेता, शक्ति, कंचन, लक्ष्मी, प्रोटीना

आलू   कुफरी चंद्रमुखी, कुफरी चमत्कार, कुफरी अलंकार, कुफरी शीतमान, कुफरी किसान, कुफरी अशोका

प्याज   नसिक 53, हिसार, पूसा रतनार, पूसा लाल

धनिया  साधना, सिंधु, स्वाती

राई    वरुणा, वरदान, रोहिणी, वैभव, शिखर

तोरिया  पीटी 303, पीटी 30, टाइप 9, भवानी

मूली   पूसा हिमानी, पंजाब सफेद, कल्याणपुर नं.1, पूसा चेतकी, पूसा रेशमी

आधुनिक कृषि में हरी खाद की बढ़ती जरूरत

हरी खाद की खेती में बहुत ज्यादा अहमियत है. इस से उत्पादकता तो बढ़ती ही है, साथ ही यह जमीन के नुकसान को भी रोकती है. यह खेत को नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटैशियम, जस्ता, तांबा, मैगनीज, लोहा और मोलिब्डेनम वगैरह तत्त्व भी मुहैया कराती है. यह खेत में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा बढ़ा कर उस की भौतिक दशा में सुधार करती है. हरी खाद को अच्छी उत्पादक फसलों की तरह हर प्रकार की भूमि में जीवांश की मात्रा बढ़ाने में इस्तेमाल कर सकते हैं, जिस से भूमि की सेहत ठीक बनी रह सकेगी. हरी खाद मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने के लिए उम्दा और सस्ती जीवांश खाद है. हरी खाद का अर्थ उन पत्तीदार फसलों से है, जिन की बढ़वार जल्दी व ज्यादा होती है. ऐसी फसलों को फलफल आने से पहले जोत कर मिट्टी में दबा दिया जाता है. यह सूक्ष्म जीवों द्वारा विच्छेदित हो कर पौधों के पोषक तत्त्वों में वृद्धि करती है. ऐसी फसलों का इस्तेमाल में आना ही हरी खाद देना कहलाता है.

हरी खाद देने की विधियां

पहली विधि : इस विधि में हरी खाद जिस खेत में देनी होती है, उसी खेत में हरी खाद की फसल पैदा की जाती है और उसी में सड़ाई जाती है. इस तरह की फसलें अकेली या किसी दूसरी मुख्य फसल के साथ मिश्रित रूप में बोई जाती हैं. जिन क्षेत्रों में बारिश अधिक होती है, वहां इस विधि को अपनाया जाता है.

दूसरी विधि : इस विधि में किसी अन्य खेत में उगाई गई हरी खाद की फसल को काट कर उस खेत में फैलाते हैं, जिस में हरी खाद देनी होती है. फैलाने के बाद हरी खाद वाली फसल को मिट्टी में दबा दिया जाता है. ऐसा खास हालात में किया जाता है. जब सघन कृषि प्रणाली के कारण हरी खाद वाली फसलों को उगा कर उन्हें पलटने का समय कम होता है तब और न्यूनतम वर्षा वाले क्षेत्रों में हरी खाद इसी विधि से दी जाती है.

हरी खाद के लिए मुनासिब फसलें : सनई, ढैंचा, लोबिया, मूंग व ग्वार वगैरह हरी खाद के लिहाज से उम्दा फसलें होती हैं. इन फसलों को उगाने व उन की अच्छी बढ़वार के लिए 30-40 डिगरी सेंटीगे्रड तापमान की जरूरत होती है. फसलों के लिए समय अंतराल करीब 45-60  दिनों का होता है. यहां कुछ फसल प्रणालियां बताई जा रही हैं, जिन में हरी खाद के लिए उगाई जाने वाली फसलें भी बताई जा रही हैं :

* धानगेहूं : ढैंचा, मूंग, सनई.

* आलूगेहूं : ढैंचा, लोबिया, सनई.

* सरसों : ढैंचा.

* गन्ना : मूंग, लोबिया गेहूं.

हरी खाद वाली फसलें कैसे उगाएं : हरी खाद की सफलता 2 बातों पर निर्भर करती है. पहली बात यह है  कि हरी खाद की मात्रा पर्याप्त व गुणवत्ता अच्छी होनी चाहिए. दूसरी बात के रूप में यह ध्यान रखना चाहिए कि हरी खाद को खेत में अपघटन के लिए मिलाने के बाद नाइट्रोजन का नुकसान कम से कम हो.

सनई की हरी खाद : सनई हरी खाद के लिए बेहद लोकप्रिय फसल है. यह उत्तर भारत में ज्यादा प्रचलित हरी खाद है. मगर ज्यादा बारिश वाले स्थानों में इस का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है.  इस की बिजाई अप्रैलमई के महीनों में की जाती है. यह जल्दी बढ़ने वाली फसल है. यह खरपतवारों की बढ़वार एकदम रोक देती है.

सनई की फसल 45-60 दिनों में मिट्टी में पलटने के लिए तैयार हो जाती है. इस से 20-30 टन हरी खाद प्रति हेक्टेयर प्राप्त की जा सकती है, साथ ही साथ 4-5 टन प्रति हेक्टेयर सूखा जीवांश भी प्राप्त किया जा सकता है.

सनई की फसल 45-60 दिनों में करीब 85-100 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर नाइट्रोजन भी जमा करती है. उत्तर भारत में यह गेहूं और दक्षिण भारत में धान के लिए मुनासिब मानी जाती है. इस के अलावा आलू, बागबानी की फसलों और गन्ने की फसल के लिए भी यह उम्दा खाद मानी जाती है.

सनई की फसल में वायरस व विल्ट रोगों की समस्या को देखते हुए, राष्ट्रीय कृषि तकनीकी परियोजना के तहत कोटा एनडी 1 प्रजाति विकसित की गई है, जो वायरस व विल्ट रोगों की प्रतिरोधक है.

ढैंचा की हरी खाद : हरी खाद की फसलों में सनई के बाद ढैंचा भी बेहद खास है. यह भारी व जलमग्न मिट्टी की दशाओं के लिए मुनासिब है. लवणीय व क्षारीय जमीन को सुधारने में भी इस की खास अहमियत है. इस फसल की 2 प्रजातियां सैसबेनिया एक्यूलेटा व सैसबेनिया रोस्ट्रेटा होती हैं. इस की बिजाई अप्रैलमई के दौरान की जाती है.

इस के लिए आमतौर पर 60-80 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल किए जाते हैं. ढैंचा की बढ़वार 40 से 60 दिनों में 3-5 फुट तक होने के कारण 20-25 टन प्रति हेक्टेयर हरी खाद प्राप्त होती है. धानगेहूं फसल चक्र के इस्तेमाल से फसलों की उत्पादकता में 35 फीसदी तक की बढ़ोतरी पाई गई है. धान की फसल में हरी खाद देने के लिए इस का इस्तेमाल पूरे भारत में किया जाता है.

मूंग व लोबिया की हरी खाद : मूंग व लोबिया की फसलों को जायद में वैज्ञानिक तरीके से सही मात्रा में खाद व उर्वरक दे कर और कीट प्रबंधन कर के बोया जाता है. इन फसलों से 10-12 क्विंटल दाने और 20-25 क्विंटल फसल अवशेष की पैदावार प्रति हेक्टेयर ली जा सकती है. फसल अवशेष को खेत में मिला कर उन से हरी खाद भी बनाई जा सकती है. छोटे व मंझोले किसान जो हरी खाद के लिए अलग से जमीन उपलब्ध नहीं करा सकते वे गन्ने की बसंतकालीन फसल के साथ हरी खाद की खेती कर सकते हैं. बसंकालीन गन्ने में मूंग व लोबिया की फसलों को गन्ने की 2 लाइनों के बीच उगा कर उन्हें 45-60 दिनों की अवस्था पर जुताई के द्वारा खेत में पलट कर व तुरंत सिंचाई कर के हरी खाद का लाभ उठा सकते हैं.

ग्वार की हरी खाद : ग्वार खरीफ में बोई जाने वाली दलहनी मूसला जड़ वाली फसल है. यह भारत में उत्तरी और पश्चिमी भागों की कम वर्षा वाले शुष्क क्षेत्रों की फसल है, जो पर्याप्त मात्रा में सूखे को सहन कर सकती है. सिंचित क्षेत्रों में इस की बिजाई जून में करनी चाहिए ताकि सही समय पर इसे मिट्टी में दबाया जा सके. इस की बीज दर 20-25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर होती है.

हरी खाद की फसल पलटाई का समय : फसल की एक खास अवस्था पर पलटाई करने से मिट्टी को सब से अधिक नाइट्रोजन व जीवांश प्राप्त होते हैं. हरी खाद को जमीन में अपघटन के लिए मिलाने के बाद नाइट्रोजन का नुकसान कम मात्रा में हो, इस के लिए बेहतर होगा कि इन फसलों के 40-50 दिनों का होने पर इन को जमीन में अपघटन के लिए मिला दिया जाए. इस अवस्था में फसल में पुष्पन शुरू हो जाता है और रस युक्त कार्बनिक पदार्थों की मात्रा सब से अधिक होती है व अनुपात भी बहुत कम रहता है. ऐसी अवस्था में हरी खाद की फसल को मिट्टी में दबाने से विघटन तेजी से होता है, जिस से नाइट्रोजन और पौधे के अन्य पोषक तत्त्व ऐसी हालत में आ जाते हैं कि आने वाली फसलें उन से अधिक लाभ उठा सकती हैं. हरी खाद वाली फसलों को जमीन में मिलाने के बाद यह ध्यान रखना चाहिए कि जमीन में पर्याप्त नमी हो, क्योंकि फसलों के अपघटन के लिए पर्याप्त नमी व तापमान की जरूरत होती है.

हरी खाद में यंत्रीकरण : सब से पहले हरी खाद की खड़ी फसल को पाटा या ‘हरी खाद टै्रंपलर’ चला कर खेत में गिरा दें. फिर मिट्टी पलटने वाले हल (मोल्टा वोल्ट प्लाऊ) या वेडस्व प्लाऊ का इस्तेमाल किया जा सकता है. ये यंत्र मिट्टी को पूरी तरह पलट देते हैं, जिस से हरी खाद वाली फसलें मिट्टी में दब जाती हैं.

इन कृषि यंत्रों के बजाय रोटावेटर का इस्तेमाल ज्यादा अच्छी तरह से किया जा सकता है. यह यंत्र हरी खाद वाली फसलों को जमीन में मिलाने से पहले उन के छोटेछोटे टुकड़े कर देता है. हरी खाद वाली फसलों को जमीन में मिलाने के बाद खेत में 3-4 सेंटीमीटर पानी भर के कम से कम 3-4 दिनों तक के लिए छोड़ देना चाहिए, जिस से हरी खाद वाली फसलों के सभी हिस्से अच्छी तरह सड़ जाते हैं और खेत में सूक्ष्म जीवांश की मौजूदगी बढ़ जाती है.

रोटावेटर केवल 1 या 2 बार ही खेत में चलाने की जरूरत होती है, जिस से समय, ऊर्जा व धन की बचत होती है और पोषक तत्त्वों का नुकसान भी कम होता?है. सघन खेती में हरी खाद वाली फसलों के लिए रोटावेटर का इस्तेमाल ज्यादा फायदेमंद होता है.  

हरी खाद के लाभ

* इस से मिट्टी की संरचना अच्छी हो जाती है. और उस की पानी रखने की कूवत बढ़ जाती है.

* मिट्टी में नाइट्रोजन की बढ़ोतरी होती है.

* मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की मात्रा में इजाफा होता है.

* मिट्टी का नुकसान कम हो जाता है, नतीजतन जमीन का ऊपरी भाग महफूज रहता है.

* खरपतवार की रोकथाम होती है.

* क्षारीय व लवणीय मिट्टी में सुधार होता है, क्योंकि हरी खाद के विघटन से कई अम्ल पैदा हो कर मिट्टी को उदासीन करते हैं.

* खेत को हरी खाद से पोषक तत्त्व देना दूसरी विधियों के मुकाबले सरल व सस्ता है.

हरी खाद में सावधानियां

* हरी खाद 45-60 दिनों में खेत जरूर मिला दें.

* खेत में हरी खाद वाली फसलों को पलटते समय भरपूर नमी बनाए रखें.

* हरी खाद की फसलों को हलकी बलुई मिट्टी में अधिक गहराई पर और भारी मिट्टी में कम गहराई पर दबाना चाहिए.

* हरी खाद वाली फसलों को सूखे मौसम में ज्यादा गहराई पर पर नम मौसम में कम गहराई पर दबाना चाहिए.

* हरी खाद वाली फसलों को खेत में मिलाने के लिए फूल आने से पहले की अवस्था सब से अच्छी होती है.

* स्थानीय जलवायु व हालात के मुताबिक हरी खाद की फसलों की बिजाई करनी चाहिए.                

रफी की याद में

बीते दिनों मोहम्मद रफी की 35वीं बरसी के मौके पर दिल्ली में उन को ट्रिब्यूट करता हुआ कार्यक्रम ‘म्यूजिकल ट्रिब्यूट टू मोहम्मद रफी साहब’ आयोजित किया गया. कार्यक्रम में राजीव खंडेलवाल, इस्माइल दरबार, वैष्णवी समेत कई बौलीवुड कलाकारों ने शिरकत की. मोहम्मद रफी फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में संगीतकार आनंदजी ने वैष्णवी, झनक और गुल सक्सेना जैसे नए उभरते गायकों को म्यूजिक के गुर सिखाए. मोहम्मद रफी फाउंडेशन के सुरेश कुमार रहेजा रफी की याद में ऐसा आयोजन हर साल करवाते हैं जिस में स्थापित गायकों के बजाय नए उभरते गायकों को मौका मिलना अच्छी बात

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