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मूडीज के आकलन के बाद बाजार में अस्थिरता

थोक मूल्य सूचकांक के लगातार 9वें माह गिरावट पर रहने, मुद्रास्फीति तथा रुपए के 2 साल के निचले स्तर पर पहुंचने, तेल की दरों में गिरावट के रुख के यथावत बने रहने और रिजर्व बैंक के ब्याज दरों में कटौती नहीं करने के फैसले जैसे कई घटनाक्रमों के बीच बौंबे स्टौक एक्सचेंज में निवेशकों की मिलीजुली प्रतिक्रिया देखने को मिली. स्वतंत्रता दिवस समारोह से एक दिन पहले परिस्थितियों के अनुकूल रहने तथा ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद से सूचकांक 517 अंक छलांग लगा गया. इसी बीच, देश की विकास दर 2015 में 7 फीसदी रहने की वैश्विक संस्था मूडीज के आकलन के कारण बाजार का रुख बदला. बाजार पर उस का नकारात्मक असर पड़ा और सूचकांक अगले 2 दिन तक गिरावट पर रहा लेकिन अगले ही सत्र में कुछ अनुकूल माहौल के कारण बाजार में सुधार का रुख देखने को मिला.

उसी बीच, चीन की अर्थव्यवस्था में गिरावट संबंधी खबरों का बाजार पर जबरदस्त नकारात्मक असर पड़ा और सूचकांक एक दिन में 3 सप्ताह में सर्वाधिक गिरावट पर बंद हुआ. अमेरिका में ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने की आशंका से बाजार में नकारात्मक रुख देखने को मिला. अमेरिकी फैडरल द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की खबर से बाजार में बिकवाली का माहौल रहा और सूचकांक में बड़ी गिरावट दर्ज की गई. इधर, बाजार का माहौल सुधारने के लिए रिजर्व बैंक पर ब्याज दरों में कटौती करने के लिए दबाव बनाने के लिए लौबिंग किए जाने की भी खबर है जिसे देखते हुए जल्द ही बाजार में स्थिरता का माहौल बन सकेगा. हालांकि ब्याज दरों में भारी बढ़ोतरी तथा रुपए में जबरदस्त गिरावट के कारण बाजार में उथलपुथल की स्थिति कुछ समय तक बरकरार रह सकती है.

कब तक पप्पू बने रहेंगे अभिषेक

बौलीवुड अभिनेता अभिषेक बच्चन की पहचान आज भी अमिताभ बच्चन का सुपुत्र होना ही है. यों तो वे बौलीवुड में एक दशक से ज्यादा समय से फिल्में कर रहे हैं लेकिन यादगार सिनेमा के नाम पर उन के पास दर्जनभर फिल्में भी नहीं हैं. फिल्म समीक्षकों ने इक्कादुक्का फिल्मों को छोड़ कर हमेशा उन के अभिनय की मौलिकता पर सवाल उठाए हैं. उन के कैरियर पर गौर फरमाएं तो हिट फिल्मों की फेहरिस्त बेहद छोटी है और ज्यादातर हिट फिल्मों में अभिषेक सोलो अभिनेता नहीं थे. मसलन, धूम सीरीज, दस, बोल बच्चन जैसी फिल्में सिर्फ अभिषेक की बदौलत हिट नहीं कही जा सकतीं. अपनी पहली फिल्म रिफ्यूजी से ही आलोचना के शिकार अभिषेक को ऐश्वर्या राय बच्चन व अमिताभ बच्चन की लोकप्रिय छवियों के नीचे ही देखा जाता है. सोशल मीडिया में तो उन्हें भी राहुल गांधी की तर्ज पर ‘पप्पू’ टैग से चुटकुलों का हिस्सा बनाया जाता है. कहीं उन पर सिनेमा का राहुल गांधी होने का मजाक किया जाता है तो कहीं पिता भरोसे चलते कैरियर का ताना भी मिलता है. यों तो उन्हें शांत स्वभाव का कलाकार माना गया है लेकिन कई मौकों पर वे भी सलमान खान की तरह मीडिया को तेवर दिखा चुके हैं. हालिया फिल्म औल इज वैल के प्रमोशन के दौरान एक फैन को, उन की फोटो खींचते समय, धमकाना हो या फिर बेटी को ले कर मीडिया से उन का नाराज होना रहा हो.

सुस्त गति में चलते उन के कैरियर ने उन्हें औसत दायरे के अभिनेता तक सीमित कर रखा है. शायद अभिषेक भी अपनी क्षमताओं और कैरियर के भविष्य से वाकिफ हैं, इसलिए व्यावहारिकता दिखाते हुए अपने पिता के साथ न सिर्फ फिल्में प्रोड्यूस कर रहे हैं बल्कि एक तरफ वे प्रो कबड्डी लीग की फ्रैंचाइजी ले कर पिंक पैंथर नामक कबड्डी टीम के मालिक बन चुके हैं तो दूसरी तरफ पिछले साल से फुटबाल खेल के प्रोत्साहन के लिए शुरू हुई इंडियन सुपर लीग की फ्रैंचाइजी ले कर वे चेन्नई टीम के सह मालिक हैं. बौलीवुड में अपने 15 साल के कैरियर में अभिषेक बच्चन ने कई पड़ाव पार किए हैं. अभिनय के क्षेत्र में सफलता व असफलता के हिचकोले झेलते हुए वे निरंतर अग्रसर हैं लेकिन उन की नई फिल्म आल इज वैल बुरी तरह से फ्लौप हो गई है. उन का मानना है कि वे जिस मुद्दे पर लंबे समय से आज के यूथ से बात करना चाह रहे थे उसी मुद्दे पर उन्हें फिल्म आल इज वैल ने बात करने का सुनहरा अवसर दे दिया. उन का कहना है, ‘‘यह फिल्म आज के समाज में पितापुत्र के बीच बढ़े कम्युनिकेशन गैप पर बात करती है. कुछ लोग इसे पीढि़यों का टकराव कहते हैं. पर कड़वा सच यह है कि पितापुत्र चाहे जितने समय तक एकदूसरे से झगड़ कर अलग रहें, कभी न कभी तो वे एकदूसरे की मदद के लिए आते ही हैं.’’

वे कहते हैं कि फिल्म के लेखक व निर्देशक उमेश शुक्ला जब उन्हें इस फिल्म की स्क्रिप्ट सुना रहे थे, तब उन्होंने एहसास किया कि आजकल रोजमर्रा की जिंदगी में लोग इस कदर व्यस्त हो गए हैं कि वे अपने मातापिता के बारे में सोचते ही नहीं हैं. हमारे जो जीवन मूल्य हैं, वे खत्म हो गए हैं. अभिषेक के शब्दों में, ‘‘स्क्रिप्ट सुनाते हुए उमेश शुक्ला ने मुझ से जब पूछा कि ऐसा कबकब हुआ है कि आप देर रात अपने काम से घर लौटे हैं और अपने मातापिता के कमरे में जा कर पता करने की कोशिश की हो कि वे ठीक हैं? तो मुझे लगा कि ऐसा तो मैं कभी नहीं करता. जब हम सुबह घर से निकलने लगते हैं तो मां कहती हैं कि बेटा, खाना ठीक से समय पर खा लेना? पर क्या हम कभी फोन कर के मां से पूछते हैं कि उन्होंने खाना खाया या नहीं. रात को मैं किसी मित्र के घर पर डिनर पर जा रहा हूं तो पिता कहते हैं कि बेटे, बहुत ज्यादा देर मत करना. यह उन का अपना प्यार होता है. हमारे प्रति उन की चिंता होती है. पर जब हम डिनर कर रहे होते हैं, उस वक्त हम फोन कर के अपने पिता से नहीं पूछते कि उन्होंने खाना खाया या नहीं. हम फोन कर के यह तक भी नहीं बताते कि पिताजी, हमें थोड़ी देर हो रही है, आप सो जाएं. आल इज वैल में यही सारे मुद्दे उठाए गए हैं. ये वही मुद्दे हैं जिन को ले कर मैं लंबे समय से यूथ से बात करना चाहता था.’’

मौजूदा समय में पिता व पुत्र के बीच जो मतभेद हो रहे हैं, उस की वजह को ले कर उन की राय यों है, ‘‘मुझे लगता है कि सभी लोग अपने काम में उलझ कर रह गए हैं. विकास अच्छी चीज है, हर इंसान, हर समाज और हर देश को विकास करना चाहिए. पर मौडर्निटी या विकास की आड़ में हमें अपनी सभ्यता, संस्कृति को नहीं भूलना चाहिए. इसे खोना नहीं चाहिए. जो हमारी अपनी पहचान है, उसे हम खो दें, यह उचित नहीं.’’ कई मामलों में इन हालात के लिए मातापिता की परवरिश व संस्कारों को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है, इस बाबत अभिषेक बताते हैं, ‘‘यह तो बहुत निजी मसला है. मैं दूसरों के बारे में कुछ नहीं कह सकता. मेरी परवरिश में तो ऐसा कुछ नहीं रहा. पर बदली हुई परिस्थितियों में आम युवा सिर्फ यह सोचता है कि वह क्या करना चाहता है और कैसे करना चाहता है. वह यह भूल गया कि उस के पिता ने उस के साथ क्याक्या नहीं किया और आज भी क्याक्या कर रहे हैं. यानी कि हर इंसान अपने मातापिता के त्याग को नजरअंदाज कर स्वार्थी बना हुआ है.’’

आज के युवा को स्वार्थी कहने के बजाय कैरियर पर कुछ ज्यादा फोकस करने वाला कहा जाए तो शायद बेहतर है. आखिर उस की भी तो जिंदगी है. वह ताउम्र मातापिता की छाया में तो नहीं रह सकता. इस बात से सहमति जताते हुए वे कहते हैं, ‘‘मैं आप की बात से सहमत हूं कि आज का यूथ स्वार्थी होने के साथसाथ अपने कैरियर के बारे में जरूरत से ज्यादा सोचता है. अभिषेक ने आल इज वैल में पहली बार ऋषिकपूर के साथ अभिनय किया है. कलाकार के तौर पर ऋषि को ले कर उन का मानना है, ‘‘मैं चिंटू अंकल को बचपन से जानता हूं. वे हमारे पारिवारिक सदस्य हैं. मेरी बहन की शादी चिंटू अंकल की बहन के बेटे के साथ हुई है. उन के साथ काम करते हुए मैं ने महसूस किया कि चिंटू अंकल के अंदर काम को ले कर जो जोश है, वह कमाल का है.’’

प्रो कबड्डी लीग में पिंक पैंथर टीम के मालिक हैं तो वहीं आप एक फुटबाल टीम के सहमालिक हैं. जब आईपीएल की शुरुआत हुई थी तो लोगों ने बड़ी उम्मीदें बांधी थीं. तमाम क्रिकेटरों ने बड़े पैसे कमाए. पर अब उसी आईपीएल में कई तरह की बुराइयां नजर आने लगी हैं. भविष्य में प्रो कबड्डी लीग को ले कर ऐसा नहीं होगा, इस की क्या गारंटी है? इस पर अभिषेक अपना पक्ष रखते हुए कहते हैं कि जहां भी कमर्शियलाइजेशन होगा, वहां बुराइयों का आना स्वाभाविक है. पर मुझे नहीं लगता कि प्रो कबड्डी लीग के साथ ऐसा कुछ होगा. मैं उम्मीद करता हूं कि कबड्डी का खेल स्वस्थ तरीके से बढ़ता रहे. पर यह हमारे हाथ में नहीं है. इस से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए इन दोनों खेलों के लिए खिलाड़ी तैयार हो सकेंगे? इस सवाल पर उन्होंने कहा,  ‘‘प्रो कबड्डी लीग की शुरुआत से पहले कबड्डी को ले कर लोगों में कितनी जागरूकता थी और अब कितनी जागरूकता है, यह आप भी जानते हैं. अब जब मैं विदेश यात्रा पर जाता हूं तो वहां पर खिलाड़ी इन दोनों खेलों को ले कर मुझ से चर्चा करते हैं. वैसे भारत में क्रिकेट और फुटबाल को ले कर लोग काफी क्रेजी हैं. पिछले साल कबड्डी पर 2 बेहतरीन फिल्में बनीं. हौकी को ले कर ‘चक दे इंडिया’ जैसी बेहतरीन फिल्म बन चुकी है. मैं कबड्डी को कहानी के केंद्र में रख कर बड़े कलाकारों के संग फिल्म बनाने की सोच रहा हूं.’’

फिल्म युवा में अभिषेक बच्चन ने कबड्डी खेली है. नसीरुद्दीन शाह फिल्म हूतूतू में तथा अभिताभ बच्चन फिल्म गंगा की सौगंध में कबड्डी खेल चुके हैं. बतौर निर्माता उन्होंने कुछ समय पहले पीकू रिलीज की है. कुछ फिल्मों की स्क्रिप्ट पर काम चल रहा है. वे मराठी में एक फिल्म विहीर बना चुके हैं. इन दिनों बौलीवुड में कौर्पोरेट कंपनियां हावी होती जा रही हैं. ऐसे में इंडिविजुअल के लिए कितनी जगह बचती है. इस पर अभिषेक कहते हैं, ‘‘मेरी समझ में फिल्मों का निर्माण इंडिविजुअल प्रोड्यूसर व्यक्तिगत तौर पर ही कर रहे हैं. कौर्पोरेट कंपनियां तो ज्यादातर डिस्ट्रीब्यूशन के काम में ही लगी हुई हैं. इंडिविजुअल प्रोड्यूसर फिल्म बनाने के बाद फिल्म को कौर्पोरेट कंपनियों को बेच देते हैं. हमारे देश में इंडिविजुअल प्रोड्यूसर ज्यादा हैं. आप ने पिछले दिनों अंतर्राष्ट्रीय संगीतकार राघव के साथ एक रैंप सौंग गाया है. इस पर वे अनुभव साझा करते हुए कहते हैं कि राघव उन का दोस्त है. राघव से 2004 में वे तब मिले थे जब वे फिल्म बंटी और बबली की शूटिंग कर रहे थे. शूटिंग खत्म होने के बाद वे और शाद अली होटल में खाना खाने गए थे, वहीं पर राघव से मुलाकात हुई थी. उस वक्त राघव ने उन से कहा था कि वे दोनों कभी एकसाथ काम करेंगे. फिर पिछले साल दीवाली पर राघव उन के घर आए और कहा कि वे बहुत जल्द एकसाथ काम करेंगे. कुछ माह के बाद उन का ईमेल आया कि क्या वे इस गाने पर रैंप करना चाहेंगे? इस पर उन्होंने हामी भरी. अभिषेक आगे बताते हैं कि राघव इस अलबम के माध्यम से चैरिटी के लिए पैसा इकट्ठा कर रहे हैं. इस अलबम की बिक्री से जो भी मुनाफा होगा, उस से वे वहां सोलर  लैंप भेजेंगे जहां बिजली नहीं है. उन का यह मकसद उन्हें अच्छा लगा था.

आज अभिषेक बतौर निर्माता, अभिनेता और व्यवसायी खुद को भले ही कामयाब मानने की गलतफहमी में हों लेकिन यह बात उन्हें समझनी होगी कि पिता की छाया से निकल कर सामाजिक सरोकार से जुड़ी कुछ सशक्त फिल्में कर के ही वे अपने पिता की तरह स्थापित हो सकते हैं, वरना तो अब तक सैकड़ों कलाकार आए हैं और आते रहेंगे

पोंगापंथ का बोझ ढोते कांवरिये

9 अगस्त को तकरीबन 5 बजे देवघर के बेलाबगान इलाके के मंदिर के पास कतार में लगे कांवरिये अफरातफरी मचाने लगते हैं. जल्दी जल चढ़ाने की होड़ में पुलिस के घेरे और अनुशासन को तोड़ डालते हैं और उस के बाद शुरू हुई धक्कामुक्की भगदड़ में बदल जाती है. देखते ही देखते ‘बोल बम’ का जयकारा चीखपुकार में बदल जाता है. हर ओर से रोने और चिल्लाने की आवाजें आने लगती हैं. शिव को जल चढ़ाने के लिए 100 किलोमीटर से ज्यादा की दूरी पैदल तय कर के देवघर पहुंचे अंधभक्ति में डूबे कांवरियों की जान तथाकथित ईश्वर शिव भी नहीं बचा सके. धर्म के नाम पर लगने वाले मजमों में भगदड़ मचना अब नई बात नहीं रह गई है. सरकार और प्रशासन के खासे बंदोबस्त के बावजूद भगदड़ मचती है और बेतहाशा मौतें होती हैं. ऐसी भगदड़ों के पीछे पोंगापंथियों का उपद्रव ही होता है. भीड़ में होने की वजह से वे किसी की सुनते नहीं और अपनी मनमानी करते हैं.

हर साल सावन के महीने में बिहार के भागलपुर जिले के सुल्तानगंज कसबे से कांवर ले कर लोग पैदल झारखंड में देवघर शहर के शिवमंदिर तक जाते हैं. सुल्तानगंज में गंगा नदी उत्तरवाहिनी है. सुल्तानगंज में अजगैबीनाथ मंदिर में पूजा करने के बाद गंगा का पानी ले कर लोग 110 किलोमीटर पैदल चल कर देवघर के शिवमंदिर तक पहुंचते हैं. सुल्तानगंज से ले कर देवघर तक अंधविश्वास का खुला खेल चलता है. भगवा रंग के कपड़े पहने और कंधे पर कांवर उठाए ज्यादातर शिवभक्त खुद को किसी बादशाह से कम नहीं समझते हैं. रास्ते में कानून की धज्जियां उड़ाना और मनमानी करना उन का शगल होता है. कांवरियों की भीड़ में चलने वाले अधिकतर लोग पूजा के नाम पर पिकनिक का मजा लूटते हैं.

8 अगस्त को सुल्तानगंज में कांवरियों की टोली में शामिल होने के बाद मुझे यह स्पष्ट हो गया कि ज्यादातर कांवरियों को पूजापाठ से कोईर् मतलब नहीं होता है. वे तो भीड़ में शामिल हो कर मजे लूटते हैं और डीजे के कानफाड़ू संगीत में लड़कियों व औरतों पर फब्तियां कसते हैं. धर्म और अंधविश्वास के सागर में सिर तक डूबे कांवरिये ‘बोल बम’ का नारा लगाते हुए शरारती कांवरियों की बदमाशियों को यह कह कर अनदेखा कर देते हैं कि लफंगों की करतूतों को भगवान देख रहा है, वही सबक सिखाएगा . कांवर यात्रा के दौरान तारपुर के पास मिले पटना सिविल कोर्ट के वकील प्रवीण कुमार बताते हैं कि कांवरियों की भीड़ में कई लुच्चेलफंगे शामिल रहते हैं, जिन का मकसद छींटाकशी और छेड़खानी करना ही होता है. ऐसे ही लोगों की वजह से उपद्रव और भगदड़ का माहौल पैदा हो जाता है. कांवरिये यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि वे भगवान के भक्त हैं और गंगा का पवित्र जल ले कर शिवलिंग पर चढ़ाने जा रहे हैं. लेकिन टोली में ज्यादातर लोग भांग, गांजा और खैनी के नशे में रहते हैं. जहांतहां रुक कर गांजा और भांग पी कर ये कांवरिये नशे में बौराते दिख जाते हैं.

पूर्णियां के भट्ठा बाजार महल्ले में रहने वाले प्रौपर्टी डैवलपर उमेशराज सिंह बताते हैं कि वे पिछले 12 सालों से हर साल कांवर ले कर देवघर जाते हैं और हर साल कांवरियों की मनमौजी व नशा करने की लत को देखते रहे हैं. किसी कांवरिये को जब गांजा और भांग आदि पीने से मना किया जाता है तो वह एक ही जबाब देता है कि शिव के भक्त नशा नहीं करेंगे तो शिव प्रसन्न ही नहीं होंगे. कांवरियों की कांवर यात्रा के बीच इस बात का भी खुलासा हुआ है कि कांवर के नाम पर धर्म की दुकान चलाने वालों के कारोबार व मुनाफे  में कंपनी, होलसैलर, दुकानदार से ले कर पंडों तक की हिस्सेदारी होती है. कांवरिया अपने साथ टौर्च, 2 जोड़ी कपड़े, गमछा, तौलिया, चादर, मोमबत्ती, माचिस, गिलास, लोटा, कांवर आदि ले कर चलता है. यात्रा के लिए ये सभी चीजें नई ही खरीदी जाती हैं. पुराने कपड़ों या गिलास आदि का उपयोग नहीं किया जाता है.

एक कांवरिये को कम से कम 2 हजार रुपए का सामान खरीदना पड़ता है. एक महीने में करीब 60 लाख कांवरिये देवघर जाते हैं. इस लिहाज से हिसाब करें तो कांवरिये करीब 1,200 करोड़ रुपए की खरीदारी एक महीने के अंदर ही करते हैं. इस के अलावा चूड़ा, इलायचीदाना, बद्धी (सूत की माला) आदि को खरीदने पर एक कांवरिया कम से कम 500 रुपए खर्च करता है. इस के बाजार का आकलन करें तो यह 3 हजार करोड़ रुपए का होता है. इस के अलावा कांवर के बगैर भी देवघर पहुंच कर शिवलिंग पर जल चढ़ाने वालों का अलग ही आंकड़ा है. पोंगापंथ के नाम पर लोग 20 हजार करोड़ रुपए लुटा देते हैं. कांवरयात्रा के साथ जब जलेबिया इलाके में पहुंचे तो वहां लूट और ठगी का अलग ही नजारा देखने को मिला. सड़कों के किनारे खाली पड़ी सरकारी जमीनों पर जहांतहां शामियाने डाल कर स्थानीय दबंग कांवरियों को सोने के लिए जगह बेचते हैं. शामियाने के अंदर सोने के लिए जमीन देने के नाम पर हर कांवरिये से 50 रुपए वसूले जाते हैं. एक गिलास शरबत की कीमत 20 से 25 रुपए तक वसूली जाती है. धर्म के नाम पर आंखें बंद कर अपनी मेहनत की कमाई को लुटा कर कांवरिये इसी भ्रम में रहते हैं कि उन की तपस्या से खुश हो कर भगवान उन की हर कामना को पूरा कर देंगे, उन के घर पर धनदौलत की बारिश होगी और घरपरिवार में कोई समस्या नहीं रहेगी.

जलेबिया से 8 किलोमीटर आगे चलने के बाद तागेश्वर इलाका आता है. वहां पर सड़क के किनारे कांवर रखने के लिए बांस का स्टैंड बना हुआ है. पोंगापंथियों का मानना है कि कांवर में गंगा नदी के पानी से भरा लोटा या डब्बा लटका होता है, इसलिए कांवर को जमीन पर नहीं रखना चाहिए, इस से गंगा का पानी अपवित्र हो जाता है. पंडेपुजारी ही धर्म की किताबों व प्रवचनों में ढोल पीटते रहे हैं कि गंगा का पानी हर अपवित्र चीज को पवित्र कर देता है. गंगा का पानी समाज की हर गंदगी को बहा ले जाता है. ऐसे में गंगा के पानी से भरे डब्बे को जमीन पर केवल रखने मात्र से वह पानी अपवित्र कैसे हो जाता है? मुजफ्फरपुर के कांटी इलाके की कांवरिया रुक्मिणी शर्मा से जब इस बारे में पूछा तो वे कहती हैं कि गंगा का पानी जमीन पर रखने से अपवित्र न हो, इसलिए कांवर को जहांतहां नहीं रख देना चाहिए. देवघर के शिवमंदिर में गंगाजल चढ़ाने के लिए 8-10 किलोमीटर लंबी कतार लग जाती है. 337 वर्गमीटर में फैले करीब ढाई लाख की आबादी वाले देवघर शहर में सावन महीने में हर दिन 2 लाख से ज्यादा कांवरिये पहुंचते हैं. ऐसे में प्रशासन के लिए कांवरियों की भीड़ को कंट्रोल करना बहुत बड़ी मुसीबत होती है. सावन में कांवर यात्रा के दौरान दुकानदारों, फुटपाथी दुकानदारों, होटलों और ढाबों को चलाने वालों की तो मानो लौटरी निकल पड़ती है.

देवघर के घंटाघर के पास छोटा सा ढाबा चलाने वाला एक व्यक्ति कहता है कि सावन के महीने का इंतजार तो देवघर के कारोबारी पूरे साल करते हैं. बाकी महीनों में जहां 20 से 30 हजार रुपए की आमदनी हर महीने होती है, वहीं केवल सावन में ढाई से 3 लाख रुपए की कमाई हो जाती है. 200 रुपए के कमरे के लिए लोग हजार रुपए तक देने में नानुकुर नहीं करते. क्योंकि उस दौरान किसी भी होटल में आसानी से जगह नहीं मिल पाती है. एक घंटे के लिए फ्रैश होने के लिए लोग 400 से 500 रुपए आसानी से दे देते हैं. वहीं दूसरी ओर, शहरवासियों के लिए पूरा महीना फजीहत से भरा होता है. देवघर में हर सड़क, गली, चौराहे पर जाम का नजारा रहता है. देवघर के रहने वाले राजीव पांडे कहते हैं कि सावन के महीने में कांवरियों की भीड़ की वजह से सड़कों पर चलना मुहाल हो जाता है. दफ्तर, स्कूल, मार्केट, अस्पताल आदि जाने में पसीने छूट जाते हैं. कंधे पर कांवर ले कर पता नहीं लोग खुद को क्या समझ लेते हैं, कोई गाड़ी कितना भी हौर्न बजाए, कांवरिये रास्ता नहीं छोड़ते हैं.

‘बोल बम’, ‘बोल बम का नारा है, बाबा एक सहारा है’, ‘बोल बम, बढ़े कदम’, ‘बाबा की नगरिया दूर है, जाना जरूर है’ जैसे नारों से हल्ला मचाते लोग कांवर लिए पैदल चलते हैं. कांवर का वजन करीब 10 किलो होता है. कांवरिये कंधे पर वजनी कांवर और नंगे पैर ही 110 किलोमीटर का सफर तय करते हैं. इस दौरान उन के पैरों में छाले और फफोले निकल आते हैं. चलने में दिक्कत होने के बाद भी कांवरिये अंधभक्ति में लीन चलते रहते हैं. कांवर ले कर निकले पटना के दिलीप सिंह दावा करते हैं कि भगवान की कृपा से ही कांवरियों को ताकत मिलती है और वे लंबे सफर को पैदल आसानी से पूरा कर लेते हैं. 

पीढ़ी-दर-पीढ़ी पंडों का जाल

देवघर में पहुंचते ही लोगों को पंडे घेर लेते हैं. नाम, पता, पिता का नाम, दादा का नाम, परदादा का नाम, छरदादा का नाम, गोत्र, खास घर आदि पूछने लगते हैं. जैसे ही कोई अपने बारे में पूरी जानकारी देता है तो पंडा कहता है कि आप के दादा देवघर आए थे तो उन्होंने मेरे दादा से ही पूजा करवाई थी. कई पंडे तो पुराने रिश्ते निकाल कर उन्हें अपने घर ले जाते हैं और रहने व खाने का भी इंतजाम कर देते हैं. इस के एवज में लोग रुपया दे ही देते हैं. यानी पूजा की दानदक्षिणा वसूलने के साथ पंडे होटल और रैस्टोरेंट का भी धंधा कर लेते हैं. हर पंडे का घर सावन के महीने में होटल में बदल जाता है.

मंदिर में घुसाने के लिए रिश्वत 

पटना के रहने वाले एक सरकारी अफसर अपनी आपबीती सुनाते हुए कहते हैं कि देवघर के शिवमंदिर के सामने जब वे पहुंचे तो वहां उमड़ी भीड़ को देख कर मंदिर के अंदर जाने की उन की हिम्मत नहीं हुई. वे बताते हैं, ‘‘कुछ मिनटों के बाद मैं वापस लौटने का मन बना ही रहा था कि स्कूल के दिनों का एक पुराना दोस्त मिल गया. उस ने मुझे देखते ही पूछा कि जल चढ़ा दिया. मैं ने कहा कि इतनी भीड़ देख कर भीतर जाने का साहस नहीं हो रहा है. इतनी भीड़ में तो आदमी दब के मर सकता है. उस ने आगे छूटते ही कहा कि क्यों डर रहे हो? उस ने कहा कि रुको, अभी सैटिंग करता हूं. वह मंदिर के पास गया और थोड़ी देर के बाद वापस लौटा. उस के साथ एक हट्टाकट्टा आदमी था. दोस्त ने कहा कि उसे 200 रुपए दो और वह पलक झपकते ही मंदिर के अंदर घुसा देगा और शिवलिंग के दर्शन करवा देगा.’’ वे आगे बताते हैं, ‘‘उस लठैत टाइप आदमी ने मुझे साथ चलने को कहा. मैं ने उसे 200 रुपए थमा दिए. मंदिर के दरवाजे के पास पहुंचने पर उस पहलवान ने अपने एक और साथी को बुला लिया. दोनों पहलवानों ने आमनेसामने खड़े हो कर अपने दोनों हाथों को कस कर पकड़ा. उस के बाद उस ने मुझे, मेरी बीवी समेत और 2 लोगों को बीच में आने को कहा. उन 2 पहलवानों के हाथों की पकड़ के बीच हम 4 लोग समा गए. उस के बाद उस ने भीड़ के बीच हमें खींचना शुरू किया और धीरेधीरे खींचते हुए 5 मिनट में ही मंदिर के भीतर पहुंचा दिया. वहां पंडों ने दक्षिणा की मांग की. मेरी बीवी ने कहा कि पैसे तो पास में नहीं हैं तो पंडे ने कहा कि पैसे नहीं हैं तो भागो.’’

यह है पंडों का असली चेहरा. पैसों के अलावा उन का और कोई मकसद ही नहीं होता है. वीआईपी पूजा से मचता बावेला देवघर समेत ज्यादातर बड़े मंदिरों में वीआईपी पूजा की व्यवस्था होती है. जो पैसा दे कर वीआईपी टिकट खरीदता है उसे मंदिर में स्पैशल ट्रीटमैंट दिया जाता है. इस के लिए अलग से पूजा का इंतजाम किया जाता है. देवघर में सुबह 3 से 4 बजे तक वीआईपी पूजा होती है. उस के बाद ही आम कांवरियों को मंदिर में घुसने दिया जाता है. एक वीआईपी टिकट के लिए 500 रुपए और एक सेमी वीआईपी टिकट के लिए 300 रुपए वसूले जाते हैं. इस के अलावा मंत्री, अफसरों समेत कोई भी वीआईपी किसी भी समय पूजा के लिए आता है तो उस दौरान भी कुछ देर के लिए आम कांवरियों का मंदिर में घुसना रोक दिया जाता है. पिछले 10 अगस्त की सुबह वीआईपी लोगों की पूजा में देरी होने से ही कांवरियों का धैर्य टूट गया और वे हल्ला मचाने लगे. उस के बाद ही मची अफरातफरी में 11 लोगों की मौत हो गई.

ब्रैंड बनता बस्तर का दशहरा

वर्ष 2015 का गणतंत्र दिवस कई मानों में खास था. पहला, एनडीए सरकार के मुखिया नरेंद्र मोदी की अगुआई में मनाया गया, दूसरा, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा गणतंत्र परेड में बहैसियत मुख्य अतिथि शामिल हुए और तीसरे, राजपथ पर बस्तर के दशहरे की झांकी का प्रदर्शन किया गया. बस्तर और वहां के आदिवासी सभी के लिए हमेशा ही जिज्ञासा का विषय रहे हैं. वजह, उन का मुख्यधारा से कटे होना है. मुख्यधारा, रोशनी और विकास सहित तमाम सामयिक विषयों व प्रसंगों से मुंह मोड़े बस्तर के आदिवासी आज भी अपनी जीवनशैली, तीजत्योहारों और परंपराओं में बंधे हैं. जिसे लोग आधुनिकता कहते हैं वह बस्तर की सीमाएं छू कर वहीं ठहर सी जाती है.

बस्तर के आदिवासियों की एक खूबी यह भी है कि न तो वे बाहर की दुनिया में झांकते हैं न ही किसी बाहरी को अपनी दुनिया में जरूरत से ज्यादा झांकने देते हैं. लेकिन बीते 5-10 सालों से उन की यह जिद खत्म हो रही है. इस के लिए एक खूबसूरत बहाना बस्तर का दशहरा है जिस का राज्य सरकार और छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल खासा प्रचार करते हैं.

क्या है खास

बस्तर के दशहरे को ले कर आम लोगों की उत्सुकता बेवजह नहीं है. बस्तर का दशहरा वाकई खास और शेष देश के दशहरों से अलग होता है. यह पर्व एक, दो या तीन दिन नहीं, बल्कि पूरे 75 दिन मनाया जाता है. तय है कि यह दुनिया का सब से ज्यादा अवधि तक मनाया जाने वाला त्योहार है जिस की शुरुआत सावन के महीने की हरियाली अमावस से होती है. बस्तर के दशहरे की दूसरी खासीयत यह है कि बस्तर में गैर पौराणिक देवी की पूजा होती है. आदिवासी लोग शक्ति के उपासक होते हैं. सच जो भी हो, इन विरोधाभासों से परे बस्तर के आदिवासी हरियाली अमावस के दिन लकडि़यां ढो कर लाते हैं और बस्तर में तयशुदा जगह पर इकट्ठा करते हैं. इसे स्थानीय लोग पाट यात्रा कहते हैं. बस्तर कभी घने जंगलों के लिए जाना जाता था, आज भी उस की यह पहचान कायम है और सागौन व टीक जैसी कीमती लकडि़यों की यहां इतनी भरमार है कि हर एक आदिवासी को करोड़पति कहने में हर्ज नहीं. इस त्योहार पर 8 पहियों वाला रथ आकर्षण का केंद्र होता है.

75 दिन रुकरुक कर दर्जनभर क्रियाकलापों के बाद दशहरे के दिन आदिवासियों की भीड़ पूरे बस्तर को गुलजार कर देती है. इस दिन आदिवासी अपने पूरे रंग में रंगे, नाचते, गाते और मस्ती करते हैं. वे तमाम वर्जनाओं से दूर रहते हैं. उन्हें देख समझ में आता है कि आदिवासियों को क्यों सरल व सहज कहा जाता है. त्योहार के अवसर पर यहां 11 बकरों की बलि देने और शराब खरीदने के लिए भी पैसा जमा होता है. मदिरा सेवन के अलावा इस दिन मांस, मछली, अंडा, मुरगा वगैरह खाया जाना आम है. दूरदराज से आए आदिवासी अपने साथ नारियल जरूर लाते हैं. दशहरे के आकर्षण के कारण इस दिन पूरे जगदलपुर में आदिवासी ही दिखते हैं और शाम होते ही वे परंपरागत तरीके से नाचगाने और मेले की खरीदारी में व्यस्त हो जाते हैं.

इसलिए हो रहा मशहूर

आदिवासी जीवन में दिलचस्पी रखने वाले लोग यों तो सालभर बस्तर आते रहते हैं पर उन में ज्यादातर संख्या इतिहास के छात्रों और शोधार्थियों की होती है. लेकिन बीते 3-4 सालों से आमलोग पर्यटक के रूप में यहां आने लगे हैं. बस्तर के दशहरे की खासीयत को रूबरू देखने का मौका न चूकने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है तो इस का एक बड़ा श्रेय छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल को जाता है जिस ने बस्तर के दशहरे को एक ब्रैंड सा बना दिया है. बस्तर आ कर ही पता चलता है कि प्रकृति की मेहरबानी सब से ज्यादा यहीं बरसी है. चारों तरफ सीना ताने झूमते घने जंगल, तरहतरह के पशुपक्षी, जगहजगह झरते छोटेबड़े झरने और चट्टानें देख लोग भूल जाते हैं कि बाहर हर कहीं भीड़ है, इमारतें और वाहन हैं कि चलना और सांस लेना तक दूभर हो जाता है. यहां आ कर जो ताजगी मिलती है वह वाकई अनमोल व दुर्लभ है.

बस्तर जाने के लिए अब रायपुर से लग्जरी बसें भी चलने लगी हैं और टैक्सियां भी आसानी से मिल जाती हैं. उत्सव के दिनों में पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने से यहां पर्यटन एक नए रूप में विकसित हो रहा है. वैसे भी, पर्यटन का यह वह दौर है जिस में पर्यटक कुछ नया चाहते हैं, रोमांच चाहते हैं और ठहरने के लिए सुविधाजनक होटल भी, जो छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल ने यहां बना रखा है. दशहरा उत्सव के दौरान यानी अक्तूबरनवंबर में बस्तर का मौसम अनुकूल होता है. अप्रैलमई की भीषण गरमी तो यहां बस गए बाहरी और नौकरीपेशा लोग भी बरदाश्त नहीं कर पाते. इसलिए भी दशहरा देखने के लिए भीड़ उमड़ती है. दशहरे के बहाने पूरे छत्तीसगढ़ राज्य के आदिवासी जनजीवन, रीतिरिवाजों, रहनसहन और संस्कृति से बखूबी परिचय भी होता है.

कौन बना रहा है नेपाल को हिंदू राष्ट्र

नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र बनाने की साजिश चरम पर है. माना जा रहा है कि इस के पीछे नरेंद्र मोदी फैक्टर भी काम कर रहा है. नेपाल के ज्यादातर सियासी दल यूटर्न लेते हुए देश के नए संविधान से धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाने के लिए तकरीबन सहमत हो चुके हैं. नेपाल में 80 फीसदी हिंदू हैं. नेपालियों और वहां के सियासी दलों ने देश को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने की तैयारी तेज कर दी है. 8 सालों तक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र रहने के बाद नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र बनाने की कोशिशें जारी हैं. नेपाली कांग्रेस, युनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी औफ नेपाल समेत कई मधेशी दलों ने संविधान से धर्मनिरपेक्ष शब्द हटाने की सहमति दे दी है. नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने के पीछे भारत का हाथ होने की आशंका इसलिए जाहिर की जा रही है क्योंकि भारत का प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी पिछले साल नेपाल का दौरा कर चुके हैं और उस के लिए भरपूर खजाना खोल चुके हैं.

पिछले साल भारत में जब लोकसभा चुनाव की तैयारियां चल रही थीं, सभी दल चुनाव प्रचार में लगे हुए थे, तभी विश्व हिंदू परिषद के संयोजक अशोक सिंघल नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र बनाने की कवायद में लगे हुए थे. 1 अप्रैल, 2014 को नेपाल के सुनसरी जिले में एक सभा में उन्होंने साफतौर पर दावा भी किया था कि अगर नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बनेंगे तो नेपाल एक बार फिर से हिंदू राष्ट्र बन जाएगा. गौरतलब है कि पिछले  2 जनवरी को हिंदू धर्म समर्थक दल राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (नेपाल) ने पहली बार देश को फिर से हिंदू राष्ट्र बनाने का शिगूफा छेड़ कर नेपाल में नई हलचल मचाई थी. पार्टी के अध्यक्ष कमल थापा ने काठमांडू में 10 हजार लोगों की रैली में कहा था कि नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र बनने से कोई भी ताकत रोक नहीं सकती है. नेपाल में राजशाही को खत्म कर लोकतंत्र की नींव रखने से ले कर अब तक 8 साल गुजर गए पर अभी तक लोकतंत्र की इमारत तो दूर, सही रूपरेखा भी तैयार नहीं हो सकी है.

लोकतंत्र की ठीक से बहाली नहीं हो पाने की सब से बड़ी वजह यही है कि नेपाल की सियासी पार्टियां और नेता खुद को देश से बड़ा समझ रहे हैं. देश की भलाई के बजाय उन्हें खुद की भलाई की फिक्र ज्यादा है. यही वजह है कि अब नेपाल को फिर से हिंदू देश बनाने की सियासत चालू हो गई है, जो लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के लिए खतरनाक है.

नेपाल में हिंदू

नेपाल में 80 फीसदी हिंदू आबादी है और यह दुनिया का इकलौता हिंदू राष्ट्र रह चुका है. इस के अलावा 9 फीसदी बौद्ध, 4.6 फीसदी मुसलिम, 4 फीसदी किरात, 1.4 फीसदी ईसाई और 1 फीसदी बाकी मजहब के लोग नेपाल में रहते हैं. शाह वंश के संस्थापक द्रव्य शा (1559-70) के नौवें उत्तराधिकारी पृथ्वीनारायण शाह (1769-75) ने नेपाल को एक कर मजबूत हिंदू राष्ट्र के रूप में स्थापित किया था. छोटा देश होने के बाद भी नेपाल ने अंगरेजों और चीनियों को बराबर की टक्कर दी और धूल भी चटाई. साल 2008 तक नेपाल दुनिया का अकेला हिंदू राष्ट्र बना रहा. राजशाही बदलते नेपाल और जनता के रुख को समझ नहीं सकी और सत्ता के लालच में उलझी रही. नतीजतन माओवादियों ने अपनी जमीन तैयार कर राजशाही के पैरों तले जमीन खींच ली थी.

नेपाल में 125 जातियों और 10 समुदायों के लोग रहते हैं. 80 फीसदी हिंदुओं में अगड़ी जाति के लोग ज्यादा हैं. ब्राह्मण और क्षत्रियों की आबादी एकतिहाई है. नेपाल के रहने वाले पुष्प गुरंग कहते हैं कि नेपाल को धर्मनिरपेक्ष देश बने हुए 8 साल से ज्यादा गुजर गए हैं, लेकिन अभी भी नेपालियों पर हिंदू धर्म का ही गहरा असर है. सरकार भी अभी तक पूरी तरह से धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकी है. मंदिरों में पूजापाठ और अनुष्ठान सरकारी पैसे से ही किए जाते हैं. सरकार के बजट में बाकायदा इस का अलग से इंतजाम किया जाता है. नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र बनाने के हिमायतियों का कहना है कि देश को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र बनाने से न तो नेपाल को फायदा हुआ और न ही नेपालियों को. बंगलादेशी घुसपैठियों और चर्च ने धर्मनिरपेक्षता का जम कर फायदा उठाया. धर्मनिरपेक्षता की ओट में काठमांडू और तराई के इलाकों में हिंदुओं को बौद्ध और ईसाई बनाने का काम खूब तेजी से हुआ. देश में 6 फीसदी बौद्ध ऐसे हैं जिन्होंने पिछले 7 सालों के दौरान बौद्ध धर्म स्वीकार किया है.

नेपाल के लिए सब से बड़ी परेशानी यह है कि वहां की सभी सियासी पार्टियां राजशाही के खत्म होने के बाद से अब तक जनता का भरोसा नहीं जीत सकी हैं. नेपाल की जनता भी अभी तक इसी ऊहापोह में है कि कौन सी पार्टी और नेता जनता व देश का बेड़ा पार लगा सकती है. पिछले 8 सालों में केवल संविधान सभा बनाने की तारीख दर तारीख ही पड़ती रही है. राजनीतिक दलों के पास फुरसत ही नहीं है कि वे मिलबैठ कर संविधान तैयार करें. किसी भी नेता को यह चिंता नहीं है कि संविधान सभा में जनता ने उन्हें देश का संविधान बनाने के लिए भेजा है. इसे भूल कर वे सरकार बनाने, गिराने और मलाईदार पद पाने की होड़ में ही लगे हुए हैं.

नेपाल मामलों के जानकार हेमंत राव कहते हैं कि नेपाल के नेता पिछले 8 सालों में भी देश का संविधान नहीं बना सके हैं, जिस से वहां लोकतंत्र कमजोर होता जा रहा है. नेपाल के सियासी दलों ने अब तक जनता को गुमराह ही किया है. तराई मधेशी राष्ट्रीय अभियान के संयोजक जयप्रकाश प्रसाद गुप्ता बताते हैं कि नेपाल की संविधान सभा का कोई मतलब ही नहीं रह गया है. इस से मधेशी, आदिवासी, जनजाति और दलितों को हक और इंसाफ दिलाने वाला संविधान बनाने की उम्मीद ही नहीं रह गई है.

संविधान और अड़चनें

साल 2008 में हुए संविधान सभा के पहले चुनाव के बाद से माओवादियों के सब से बड़े दल के तौर पर उभरने के बाद भी 5 सालों तक संविधान नहीं बनाया जा सका. संविधान के प्रारूप पर अंतिम फैसला लेने के लिए कई समितियां बनीं और उन की सैकड़ों बैठकें हुईं. उस के बाद भी संविधान नहीं बन सका. करीब एक दशक तक चले गृहयुद्ध के खात्मे के साल 2006 के बाद 2008 में पहली बार संविधान सभा का चुनाव हुआ था. 2013 में दूसरी दफा संविधान सभा का चुनाव हो चुका है. नेपाल में लोकतंत्र के कमजोर पड़ने, राजनीतिक दलों के सत्ता से चिपके रहने की होड़ मचने और भूकंप के बाद नेपाल की जर्जर होती माली हालत को देख राजशाही की वकालत करने और दोबारा हिंदू राष्ट्र बनाने का सपना देखने वालों का हौसला बढ़ गया है. वे लोग अपनेअपने लेवल से अपने सपनों को जमीन पर उतारने का माहौल बनाने में लग भी गए हैं. साल 2008 में नेपाल में 240 साल पुरानी राजशाही की जड़ें उखड़ने के बाद नारायण हिती महल से निकल कर अपने परिवार के साथ जंगल में बने नागार्जुन महल में रह रहे राजा ज्ञानेंद्र की सियासी महत्त्वाकांक्षाएं फिर से जाग उठी हैं.

8 साल तक नेपाल को अपनी उंगलियों पर नचाने वाले ज्ञानेंद्र महल की दीवारों से बाहर निकल कर नई सियासी ताकत पाने और नई पारी खेलने की तैयारियों में लग गए हैं और जनता की नब्ज टटोलने के लिए आम सभाएं करने लगे हैं. ज्ञानेंद्र पिछले डेढ़दो साल से तराई के इलाकों में लगातार रोड शो करने के बहाने जनता के मन की थाह ले रहे हैं. जनता के बीच जा कर उस की परेशानियों को सुन रहे हैं और उन्हें दूर करने की कोशिशें भी कर रहे हैं. नेपाल में चल रही सियासी उठापटक के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले साल 2 बार नेपाल के दौरे कर चुके हैं. सार्क सम्मेलन के दौरान तो मोदी ने नेपाल के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए 600 करोड़ रुपए की मदद देने का ऐलान भी किया था. सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने काठमांडू पहुंचे नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला के साथ 40 मिनट की बातचीत में 10 समझौते कर डाले. नेपाल में अरुणा नदी पर 900 मेगावाट पनबिजलीघर लगाने को ले कर करार किया गया. साल 2021 तक इस योजना को पूरा कर लिया जाना है. इस से पैदा होने वाली कुल बिजली का 21 फीसदी हिस्सा नेपाल को मुफ्त में मिलेगा. मोटर वाहन को ले कर हुए समझौते में कहा गया है कि दोनों देश के मुसाफिर एकदूसरे देश में आसानी से आजा सकेंगे और दोनों देशों के तयशुदा मार्गों पर चलने के लिए गाडि़यों को परमिट दिया जाएगा. इस के साथ ही भारतीय पर्यटकों को यह राहत दी गई कि वे 1 हजार और 500 के नोट ले कर नेपाल जा सकेंगे पर यह रकम 25 हजार रुपए से ज्यादा न होगी. डेढ़ अरब रुपए की लागत से बना 200 बैड वाला ट्रामा सैंटर मोदी ने नेपाल को भेंट किया. इस की नींव 1997 में तब के भारतीय प्रधानमंत्री इंद्रकुमार गुजराल ने रखी थी. इस के अलावा काठमांडू और दिल्ली के बीच बस सर्विस की शुरुआत भी की गई. नेपाल पर मदद की बौछार करने के बाद मोदी ने कुटिल मुसकान के साथ नेपाल के प्रधानमंत्री से कहा था कि अगर नेपाल मुसकराता है तो भारत को खुशी होगी.

नेपाल के लिए मदद की झोली खोल मोदी ने नेपाल को जहां अपना मुरीद बनाने की भरपूर कोशिश की वहीं नेपाल में चीन के बढ़ते प्रभाव को कम करने का भी दांव खेला था. इस के पहले नेपाल यात्रा के दौरान मोदी ने नेपाल को बिजली, सड़क, रेल, बांध, कारोबार आदि योजनाओं में माली मदद की झड़ी लगा दी थी. उस दौरान नेपाल को एक अरब डौलर का रिआयती कर्ज दे कर भारत ने उसे यह साफतौर पर बता दिया कि माली मदद के लिए उसे चीन के सामने हाथ पसारने की दरकार नहीं है. अगर नेपाल भारत से बेहतर रिश्ता बना कर रहे तो वह हर मुमकिन मदद देने को तैयार बैठा है. 10 सालों तक नेपाल को हिंसा और गृहयुद्ध की आग में झोंकने वाले माओवादी ने अपनी ताकत और बंदूक के बूते देश से राजशाही का खात्मा तो कर दिया पर नेपालियों के दिलों में अपनी जगह बनने में वे कामयाब नहीं हो सके. 8 साल पहले माओवादियों ने चुनावी राजनीति की राह पकड़ी थी. माओवादी नेता पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ प्रधानमंत्री बनने के बाद भी गोलीबंदूक वाली मानसिकता से बाहर नहीं निकल सके. जिस का ही नतीजा था कि वे ज्यादा समय तक प्रधानमंत्री की कुरसी पर टिक नहीं पाए. अपने तानाशाही रवैये और बेतुके फैसलों की वजह से वे प्रधानमंत्री की कुरसी पर 1 साल भी नहीं टिक पाए. 18 अगस्त, 2008 से ले कर 25 मई, 2009 तक वे प्रधानमंत्री रहे थे. उस के बाद से अब तक सियासी उठापटक के दौर से गुजरे नेपाल में साल 2013 तक 7 प्रधानमंत्री बने और सभी आया राम गया राम साबित हुए.

नेपाल के सियासी दलों की खींचतान, स्वार्थ और माओवादियों की बंदूक की ताकत में दोबारा यकीन जताने के बीच नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र बनाने का शिगूफा छोड़ देश और जनता के लिए नई मुसीबत में डालने की साजिश शुरू हो गई है. नेपाल की राष्ट्रीय धर्मसभा के अध्यक्ष भरत शर्मा कहते हैं कि धर्मनिरपेक्ष लोगों ने देश को लूटने का ही काम किया है, सियासी दलों की लूटखसोट की नीति और माओवादियों की तानाशाही की वजह से ही नेपाल को दोबारा हिंदू राष्ट्र बनाने वाले सिर उठाने लगे हैं.

भारत भूमि युगे युगे

मोटापा और भौंड़ापन

बीते दिनों हद पार करते लालू प्रसाद यादव ने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के मोटापे पर कटाक्ष कर डाला कि इतने मोटे आदमी को लिफ्ट में चढ़ना ही नहीं चाहिए. हुआ यों था कि पटना में एक लिफ्ट में अमित शाह आधा घंटा फंसे रहे थे. मोटे लोग हमेशा ही हंसी का पात्र रहे हैं, लालू के ताने ने बिलाशक अमित शाह को दुखी किया होगा. दरअसल आज हंसीमजाक ने सोशल मीडिया तक पहुंचतेपहुंचते न सिर्फ अपनी गरिमा खो दी है बल्कि भौंड़ा भी हो गया है. हास्य में शालीनता के बजाय ब्लैक कौमेडी और सैंस औफ ह्यूमर जैसे भारीभरकम जुमलों की आड़ में किसी को भी सरेआम बेइज्जत कर दिया जाता है. यह सच है कि लिफ्ट में साथ में मोटा आदमी हो तो दूसरों को दहशत होने लगती है कि कहीं लिफ्ट अटक न जाए लेकिन लालू यादव ने जता दिया है कि वे सभ्यता और शिष्टता जैसे शब्दों में यकीन नहीं करते.

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उमा का दर्द

अधेड़ अविवाहिताओं की स्थिति अकसर उस वक्त असहज हो जाती है जब सार्वजनिक या मंचीय कार्यक्रमों में संचालक उन्हें श्रीमती कह देते हैं. आमतौर पर अविवाहिताएं इस पर कोई एतराज न जताते कार्यक्रम चलने देती हैं लेकिन उमा भारती इस की अपवाद हैं. लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने उन्हें श्रीमती कहते पुकार दिया तो तुरंत उमा ने स्पष्टीकरण दे डाला कि मैं अविवाहित हूं और अब शादी होने की कोई संभावना भी नहीं. बात संसदीय हंसीमजाक में आईगई हो गई लेकिन अधेड़ अविवाहिताओं का दर्द उजागर कर गई, मानो शादी न होना कोई बहुत बड़ा गुनाह हो. घरगृहस्थी बसाना हर महिला का सपना होता है. वजहें कुछ भी हों, कइयों का यह सपना पूरा नहीं हो पाता.

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खामोश घुड़की

राजनीति कोई मसाला हिंदी फिल्म नहीं होती, यह बात शत्रुघ्न सिन्हा को न पहले कभी समझ आई थी न अब आ रही है. उन की पीड़ा यह है कि कदकाठी के लिहाज से उन्हें भाजपा में तवज्जुह नहीं मिल रही. दरअसल, शत्रुघ्न यह मानते हैं कि चूंकि वे लोकप्रिय हैं इसलिए उन्हें वजन दिया जाना चाहिए, वह भी उस सूरत में जब स्मृति ईरानी और गजेंद्र चौहान सरीखे अभिनेताओं को शीर्ष पर बैठाया गया है. पार्टी के धुरविरोधी अरविंद केजरीवाल और नीतीश कुमार से नजदीकियों का सिलसिला ज्यादा लंबा चलेगा ऐसा लग नहीं रहा. भाजपा आलाकमान मनोवैज्ञानिक तरीके से उन की बेचैनी और बेसब्री बढ़ा रहे हैं. इस से जाहिर है कि उन्हें शत्रुघ्न सिन्हा ज्यादा नुकसानदेह नहीं लग रहे और पार्टी में बने रहना है तो झुकना उन्हीं को पड़ेगा. देखना दिलचस्प होगा कि रामविलास पासवान को बिहार का मुख्यमंत्री बनाए जाने का उन का समर्थन क्या गुल खिलाएगा.

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हार्दिक आंदोलन

22 वर्षीय हार्दिक पटेल को अब से 3 महीने पहले तक कोई नहीं जानता था जिन्होंने पटेल या पाटीदार समुदाय की आरक्षण की मांग को एकाएक ही रफ्तार दे दी है. इस वाणिज्य स्नातक स्मार्ट युवा की अगुआई में हजारों पटेल गुजरात के विभिन्न शहरों में अपनी मांग को ले कर इकट्ठा हुए तो पूरा देश चौंक उठा कि यह नया नेता हार्दिक किस की देन है. वे (पटेल समुदाय) यह दावा कर रहे हैं कि हम सीएम, पीएम बनाते हैं और हम को ही आरक्षण नहीं, लेकिन अब ले कर रहेंगे. यह आंदोलन की धमाकेदार पर अहिंसक शुरुआत है लेकिन हार्दिक जैसे लोकप्रिय युवा को पहले पाटीदार समाज में पसरे अंधविश्वासों व सामाजिक पिछड़ेपन को दूर करने की पहल करनी चाहिए. पाटीदार समुदाय आमतौर पर संपन्न और शांत है जिस में हार्दिक ने हलचल मचा दी है.

वार्त्ता बे-वार्त्ता

भारत व पाकिस्तान वार्त्ता का एक और राउंड टांयटांय फिस हो गया, वार्त्ता शुरू होने से पहले ही. दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने पर उफा में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने बातचीत के जरिए असहमतियों पर समझौते करने में रुचि दिखाई थी पर दोनों तरफ के कट्टरपंथियों को यह बात सुहाई नहीं और नाटकीय घटनाओं के चलते बातचीत न हो सकी. एक ही खून के 2 देशों में इस तरह के विवादों और मानमनौअल के खेल चलते रहते हैं. दोनों देशों की जनता का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि सरकारी स्तर पर चाहे कुछ भी होता रहे, आम जनजीवन दोनों देशों की आपसी दोस्ती और लेनदेन के स्तर पर चलता रहे. पर ऐसा होता नहीं है. अलग हुए इन देशों की सरकारें हमेशा युद्ध का सा माहौल बनाए रखती हैं और एकदूसरे को दुश्मन कह कर अपनेअपने नागरिकों को भरमाए रखती हैं.

भारत व पाक के बीच रिश्ते ऐसे हैं कि चाहे जो कर लो, सुधर नहीं सकते. ये पड़ोसी देश धर्म के गंभीर मामले को ले कर अलग हुए थे. जहां पाकिस्तान के कुछ लोगों के मन में कसक है कि जिस पूरे देश पर उन के पुरखों ने सदियों राज किया है, वह उन के हाथ से निकल गया, वहीं भारतीयों को लगता है कि उन के मुंह का निवाला छीन लिया गया और अंगरेजों से आजादी पाने की उन्हें पाकिस्तान दे कर भारी कीमत चुकानी पड़ी है. भारत में बसी बड़ी मुसलिम आबादी दूसरे भारतीयों को संशय में रखती है कि कहीं पाकिस्तान वाले उस का दुरुपयोग न करें. कश्मीर के मामले को ले कर पाकिस्तान बेहद नाराज है क्योंकि उस ने अगर विभाजन का कड़वा घूंट पी भी लिया था तो मुसलिम बहुल कश्मीर को भारत की तरफ जाता देख उसे आज तक स्वीकार न हुआ. दोनों देशों की सरकारें एकदूसरे देश की जनता पर बंधन लाद कर अपनी जिदों पर अड़ी रहना चाहती हैं.

आतंकवाद और कश्मीर अहम मुद्दे हैं और हो सकता है इन पर कभी फैसला न हो पाए पर इस का मतलब यह तो नहीं कि दोनों देशों के लोग पड़ोसी की तरह रह न सकें और मिठाइयां व सेंवइयां भी ले दे न सकें. यह दोनों देशों के नेताओं की हठधर्मी है कि बातचीत कर के कुछ ठीक नतीजा निकाले जाने का प्रयास भी असफल हो गया. इस जिद में मरते बेगुनाह हैं जो नियमोंकायदों के कारण सरकारों के कोपभाजन का शिकार बनते हैं. दोनों देशों की सरकारें अपने मतभेदों को चाहे कितना तीखा करें, वे आम जनता को बख्श दें, जनता यही चाहती है.

चीनी ड्रैगन का उतरा रंग

चीन भी अब आर्थिक मुश्किल की चपेट में आ गया है. अंतर्राष्ट्रीय शेयर बाजार में उस के शेयरों में आई भारी गिरावट बताती है कि उस की अर्थव्यवस्था में सबकुछ ठीकठाक नहीं है. अब चीन के चुंधिया देने वाले चमत्कार की कलई खुलती जा रही है. चीन के गुब्बारे की हवा कभी भी निकल सकती है. यह प्रक्रिया उसे सोवियत संघ के रास्ते पर भी  ले जा सकती है. कई अर्थशास्त्री कहते हैं कि निर्यात पर आधारित अर्थव्यवस्था बनाने वाले एशियाई टाइगर देशों का जो हश्र हुआ वही चीन का भी हो सकता है या हो रहा है.  अमेरिका के प्रतिष्ठित शोध संस्थान स्ट्रेटफोर ने 22 जनवरी, 2010 को आगामी दशक के बारे में चौंकाने वाली कई  भविष्यवाणियां की थीं उन में सब से प्रमुख भविष्यवाणी यह थी कि इस दशक में चीन की अर्थव्यवस्था चरमरा जाएगी. इस भविष्यवाणी ने खासतौर पर इसलिए भी चौंकाया है कि अभी 2 दशक पहले तो चीन का एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में उदय हुआ है. जिस तरह उगते सूर्य को सभी नमस्कार करते हैं उसी तरह उदीयमान चीन का दुनियाभर में स्तुतिगान हो रहा था. अचानक यह क्या हो गया कि चीन की अर्थव्यवस्था के लिए शोकगीत लिखे जाने लगे.

चीन के महाशक्ति बन कर उभरने के बाद ऐसी पुस्तकों की बाढ़ सी आ गई थी जो चीन की चुंधिया देने वाली तरक्की का जायजा लेती हैं. इन में विलियम ओवरहौल्ट की ‘राइज औफ चाइना’ और टेरिल रास की ‘द न्यू चाइनीज एंपायर’ प्रमुख हैं. लेकिन जल्दी ही चीन की जेट गति से प्रगति का घोर अंधेरा पहलू कुछ लोगों को नजर आने लगा. उन्हें अपने विश्लेषण से लगा कि चीन कुछ जल्दी ही महाशक्ति बन गया है, इसलिए वह एक ऐसी महाशक्ति है जिस की छाती तो फौलादी है मगर पांव मिट्टी के हैं. खासकर, उस का आर्थिक विकास एक ऐसा बुलबुला है जो कभी भी फूट सकता है. ऐसी पुस्तकों में गोर्डन चांग की ‘द कमिंग कोलैप्स औफ चायना’, जौय स्टडवेल की ‘द चायना ड्रीम’ प्रमुख हैं. इस के अलावा ‘चाइनीज इकोनौमी इन क्राइसिस’ और ‘चाइना डीकंस्ट्रक्ट’ जैसी अकादमिक पुस्तकों का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है.

‘द कमिंग कोलैप्स औफ चाइना’ के लेखक गोर्डन चांग ने एक इंटरव्यू में अपनी पुस्तक की चर्चा करते हुए कहा था, ‘‘आधुनिक दुनिया में चीन की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था टिक नहीं सकती. चीनी गणराज्य के संस्थापक माओ त्से तुंग ने एक असामान्य समाज का निर्माण किया था और उसे अन्य समाजों से अलगथलग कर दिया था. उन की व्यवस्था तब तक टिकी रही जब तक चीन ने अपने को बाकी दुनिया से अलगथलग रखा. लेकिन उन के उत्तराधिकारियों ने चीन गणराज्य को बाकी दुनिया के लिए खोलने की कोशिश की है. चूंकि यह देश अन्य देशों के साथ जुड़ गया है तो वही राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक शक्तियां उसे भी संचालित करेंगी जो सारी दुनिया को संचालित करती हैं. इस प्रक्रिया में एक समय ऐसा आएगा कि माओ की बनाई यह असामान्य व्यवस्था उसे छोड़नी पड़ेगी क्योंकि चीन विश्व व्यवस्था में जो स्थान बनाना चाहता है उस के लिए वह बुनियादी तौर पर अनुकूल नहीं है. जल्दी ही वह समय आएगा जब चीन की सरकार एक मुक्त और गतिशील समाज की चुनौतियों का सामना करने में अक्षम होगी. वर्तमान ढांचे के ढहने के बाद नई व्यवस्था आएगी और तब कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में नहीं होगी. निश्चित ही चीन तो रहेगा मगर वह चीन नहीं जो कम्युनिस्ट है. यह ढहना एक दशक में पूरा हो जाएगा.’’

वे आगे कहते हैं, ‘‘हम नहीं जानते कि उन घटनाओं का चरित्र क्या होगा जो कम्युनिस्ट पार्टी के पतन का कारण बनेंगी. चीन कई चुनौतियों का सामना कर रहा है-देश का बढ़ता कर्ज, आर्थिक प्रगति से हो रहा सामाजिक विस्थापन, बैंकिंग सुधार न होने से नौनपरफौर्मिंग लोन्स की भरमार, खस्ताहाल पैंशन स्कीम जो बूढ़ी होती आबादी को सामाजिक सुरक्षा देने में अक्षम है, पर्यावरण का विनाश, बेकाबू होता भ्रष्टाचार, बेतहाशा बढ़ते अपराध, चरमराती शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा इन में प्रमुख हैं. इन सब को एकसाथ मिला दीजिए और आप समझ जाएंगे कि क्यों इन से निबटने में सरकार असफल हो जाएगी. एक या दूसरे कारण को महत्त्वहीन बता कर हम सरकार के नाकाम होने की संभावना को खारिज कर देते हैं लेकिन महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कम्युनिस्ट पार्टी  को एक ही समय सारी चुनौतियों से निबटना है, एक समय में एक चुनौती से नहीं.’’

आज के चीन की नीतियां सरकार और जनता के बीच की खाई को चौड़ा करने के लिए बनाई गई हैं इसलिए वे अस्थिरता को जन्म दे रही हैं. आज सरकार संचालित आर्थिक विकास और सोशल इंजीनियरिंग के कारण असाधारण गति से अकल्पनीय सामाजिक परिवर्तन हो रहे हैं. कम्युनिस्ट पार्टी भी सार्थक राजनीतिक सुधारों के रास्ते में बाधक बन कर खड़ी हुई है. चूंकि बड़े अधिकारी सार्थक परिवर्तन की अनुमति नहीं देते इसलिए अधिकारियों को असंतोष को फैलने से रोकने के लिए बल प्रयोग करना पड़ता है. लेकिन राज्य की दमन की शक्ति का उपयोग केवल लघुकालिक समाधान ही है. नेतृत्व असंतोष के कारणों को हल करने की कोशिश नहीं कर रहा. हकीकत यह है कि चीन जैसेजैसे समृद्ध होता जा रहा है वैसेवैसे ज्यादा अस्थिर होता जा रहा है. 2002 के बाद प्रदर्शन ज्यादा बड़े और ज्यादा बार होने लगे हैं. इस के अलावा प्रदर्शन ज्यादा उग्र होते जा रहे हैं. और ऐसा नहीं है कि केवल किसान और मजदूर ही सड़कों पर उतर रहे हैं, बल्कि मध्यवर्ग भी विरोध जता रहा है जो पिछले 25 वर्षों में सब से ज्यादा फायदे में रहा है. सारे समाज में ही असंतोष के प्रदर्शन में उग्रता है, जैसी तियेनमान स्क्वायर पर 1989 हत्याकांड से पहले देखी गई थी.

बहुत सारे लोगों को उम्मीद है कि चीनी गणराज्य थाईलैंड, ताइवान और कोरिया की तरह बनेगा लेकिन इन देशों के नेताओं के सिर पर मार्क्सवाद का बोझ नहीं था. मार्क्सवाद न केवल देशों के नेताओं को शासन का अधिकार देता है बल्कि उन से यह अपेक्षा करता है कि वे इस की मांग करें. चीन के नेताओं का विश्वास है कि उन की एक नियति है कि वे हमेशा राज करेंगे. जब नेता शांतिपूर्ण परिवर्तन की संभावना को नकारते हैं तो लोग आखिरकार बल प्रयोग की रणनीति को अपना लेते हैं. यह सही है कि चीन ने पुनर्जीवन के लिए सोवियत संघ से अलग रास्ता अपनाया. चीन की आर्थिक पुनर्रचना ने कुछ समस्याओं को हल किया जिन्हें सोवियत संघ हल नहीं कर पाया था. लेकिन इस से दूसरी चुनौतियां पैदा हुईं.  वहीं, एक अनिवार्य तथ्य यह है कि सोवियत संघ और चीन दोनों का मूल चरित्र मार्क्सवादी व्यवस्था होना है, इस कारण वह सुधार से परे है.

कमजोर महाशक्ति 

अमेरिका में कुछ वर्ष पहले एक और पुस्तक छपी है जिस का शीर्षक है, ‘चाइना: फ्रेजाइल सुपर पावर : हाउ चाइनाज इंटरनल पौलिटिक्स डीरेल इट्स पीसफुल राइज.’ अमेरिकी विदेश विभाग में आला अफसर रही सूसन एल शिर्क की यह पुस्तक इस मिथ्या को तोड़ती है कि चीन एक ऐसी महाशक्ति बन सकता है जो सारी दुनिया को चलाएगा. उन का निष्कर्ष यह है कि चीन एक उभरती महाशक्ति जरूर है मगर एक कमजोर महाशक्ति. चीन के अपने अंतर्विरोध ऐसे हैं जो उस के नेतृत्व की स्थिरता के लिए चुनौती बन सकते हैं. ये हैं बूढ़ी होती आबादी, इंटरनैट का उदय, अर्थव्यवस्था का निजीकरण, शहरी अमीरों और ग्रामीण गरीबों के बीच की बढ़ती खाई, भ्रष्टाचार से त्रस्त जनता का असंतोष, प्रदूषण जो अब जानलेवा बन गया है, बढ़ती बेरोजगारी. चीन के नेता देख रहे हैं कि आर्थिक सुधारों ने ऐसी सामाजिक शक्तियों को जन्म दिया है जो सरकार को पलट सकती हैं.

स्ट्रेटफोर ने चीन की अर्थव्यवस्था चरमराने के बारे में जो भविष्यवाणी की थी उस की व्याख्या करते हुए कहा था कि चीन का आर्थिक मौडल टिकाऊ नहीं है. मौडल अन्य चिंताओं के मुकाबले रोजगार की तरफ झुका है और इसे केवल थोड़े मार्जिन से चला कर मेंटेन किया जा सकता है. दूसरा, चीनी मौडल केवल तब तक ही संभव है जब तक पश्चिम के लोग बड़े पैमाने पर चीन के माल की खपत करते रहेंगे. केवल यूरोप की जनसांख्यिकी ही इसे अगले दशक में असंभव बना देगी. तीसरा, चीनी मौडल को सस्ता माल बनाने के लिए सस्ता श्रम और सस्ती पूंजी चाहिए. उस का मिलना अब मुश्किल है. अंत में अंदरूनी तनाव वर्तमान व्यवस्था को तोड़ देंगे. एक अरब से ज्यादा चीनी घरों में आज ऐसे लोग रहते हैं जिन की आय 2 हजार डौलर प्रति वर्ष से कम है. 60 करोड़ लोगों की आय 1 हजार डौलर प्रति वर्ष से भी कम है. सरकार यह जानती है इसलिए अपने संसाधनों को अंदरूनी क्षेत्रों में ले जाना चाहती है जिस में ज्यादातर चीन बसता  है. लेकिन ये हिस्से जनसंख्या की दृष्टि से इतने सघन और गरीब हैं कि चीन के पास इन की समस्याओं को सुलझाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं.

यही वजह है कि बाजार पर पैनी नजर रखने वाले कुछ दिग्गजों का कहना है कि बहुचर्चित, बहुप्रचारित चीनी चमत्कार असल में कागजी अजगर है. उन का तर्क है कि चीन ने माल, लग्जरी स्टोर और इन्फ्रास्ट्रक्चर बना कर अपनी अर्थव्यवस्था का बहुत खतरनाक तरीके से चुंधिया देने वाला दिखावा करने की कोशिश की जबकि उन की कोई मांग नहीं थी और सारी व्यवस्था ध्वस्त होने की तरफ बढ़ रही है. चीनी अर्थव्यवस्था के ढहने के अमेरिका पर गहरे प्रभाव होंगे. चीन की अमेरिकी कर्ज खरीदने की क्षमता सीमित हो जाएगी और चीनी शासन के अंदर अज्ञात राजनीतिक परिवर्तनों को बढ़ावा मिलेगा.

मंदी की मार

चीन के आंकड़ों में भारी विसंगतियां हैं, जैसे कारों की बिक्री की संख्या बढ़ रही है मगर गैसोलीन की खपत के आंकड़े स्थिर हैं. इस से पता चलता है चीनी आंकड़े गढ़ रहे हैं. उन का अनुमान है कि चीन की राज्य संचालित कंपनियां वृद्धि दर्शाने के लिए बड़े पैमाने पर कारें खरीद रही हैं और उन्हें विशाल पार्किंग स्थलों में खड़ा किए दे रही हैं. ऐसा ही एक और आंकड़ा है. चीन विश्व के सब से ज्यादा यानी 1.4 अरब टन सीमेंट की खपत करता है लेकिन हाल ही के वर्षों में उत्पादन की क्षमता को इतना बढ़ाचढ़ा कर दिखाया  गया है कि उस के पास 34 करोड़ टन की क्षमता अतिरिक्त है.

पिवोटल कैपिटल मैनेजमैंट की इस साल की रिपोर्ट के मुताबिक, यह अतिरिक्त क्षमता अमेरिका, भारत और जापान की मिलीजुली खपत से ज्यादा है. बाजार के इन विशेषज्ञों का दावा है कि ऐसा चीन की अर्थव्यवस्था के हर सैक्टर में हो रहा है. इस का मतलब है कि चीन के सामने सब से बड़ा संकट यह है कि वह बड़े पैमाने पर ऐसा माल और उत्पाद बना रहा है जिन को वह बेच नहीं पा रहा है. पिवोटल रिपोर्ट में निष्कर्ष निकाला गया है कि हमें विश्वास है कि चीन की मंदी वैसी ही निर्णायक घटना बन सकती है जैसी विश्व बाजार में अमेरिकी सब प्राइम और हाउसिंग बूम का खात्मा बनी थी. अल्फा वन पार्टनर्स के चीफ एग्जीक्यूटिव निकोलस सारकीज ने अपने लेख ‘डौंट बी टेकन इन बाय चाइनीज मिरेकल मिथ’ में टिप्पणी की है, ‘‘मैं 31 अक्तूबर, 2010 को खत्म हुए शंघाई वर्ल्ड एक्सपो की तुलना पूर्व सोवियत संघ द्वारा अपनी महानता के दिखावे से करने से रोक नहीं पाता. सोवियत संघ के मामले में ऐसी प्रदर्शनियां अपनी भव्यता से चुंधियाने की कोशिश थीं. इसी तरह आज चीनी विशेषज्ञ यह पूछ सकते हैं, यह महान प्रदर्शनी खत्म होने के बाद क्या?

‘‘चीन की यात्रा के दौरान प्रोफैसर  मिल्टन फ्रीडमैन ने कई बिल्डरों को नए रास्ते पर काम करते देखा. वे आधुनिक तकनीक के बजाय फावड़ों से जमीन खोद रहे थे. जब उन्होंने पूछा कि आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा तो उन्हें बताया गया, यह रोजगार कार्यक्रम कंस्ट्रक्शन उद्योग में रोजगार की उच्च दर को बनाए रखने का एक हिस्सा है. इस के पीछे तर्क यह था यदि मजदूर ट्रैक्टर या रोड बनाने के आधुनिक यंत्रों का इस्तेमाल करेंगे तो कम लोगों को रोजगार मिलेगा. इस तरह आज भी पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में चीन का कुछ हद तक आटोमेशन का स्तर कम है.’’ सारकीज के मतानुसार, अनार्थिक परियोजनाओं में पूंजी निवेश सब से ज्यादा चिंता का विषय है. फिक्स्ड एसेट निवेश इतना ज्यादा है कि बुनियादी ढांचा परियोजनाओं ने दिखावे के शहर, खाली पड़े शौपिंग मौल और ऐसी इमारतें बनाई हैं जिन में कोई नहीं रहता.

चीन की अर्थव्यवस्था का विस्तृत जायजा लेने के बाद वे टिप्पणी करते हैं कि चीनी चमत्कार की बातों पर मत जाइए, उस का तो अस्तित्व ही नहीं है.रैडिफ डौट काम की एक रिपोर्ट ‘इज चाइनाज इकोनौमी वेटिंग टू कोलैप्स’ में लिखा है कि क्या चीन कई गुना बड़ा लेहमैन है. लंदन के हैज फंड मैनेजर मि हेंड्री यही सोचते हैं. उन की पक्की राय है कि चीन का प्रौपर्टी का बुलबुला फूट रहा है. वे दा वा करते हैं कि चीन की सरकार विकास दिखाने के नाम पर गैरजरूरी निर्माण करा रही है.

चमत्कार का खोखलापन

अल जजीरा चैनल ने भी 2009 में चीन के एक प्रांत इनर मंगोलिया के ओरडोस  के बारे में एक रिपोर्ट ‘चाइनाज एम्पटी सिटी’ शीर्षक से प्रसारित की  थी. ओरडोस का यह शहर राज्य संचालित निर्माण परियोजना है जो विकास दर को प्राप्त करने में मदद करती है. इस नए बने शहर के बारे में आश्चर्यजनक बात यह है कि इस शहर में कोई रहता नहीं, वहां कोई स्थानीय अर्थव्यवस्था नहीं है, फिर भी हर अपार्टमैंट कौंप्लैक्स बिक चुका है. चीन ने 2005 में दुनिया का सब से बड़ा शौपिंग मौल डंगुआन में बनाया है लेकिन कुछ विदेशी फास्ट फूड कंपनियों को छोड़ दें तो यह शौपिंग मौल 99 फीसदी खाली पड़ा है. पिछले 30 वर्षों  में चीन ने 8 फीसदी की विकास दर को बनाए रखा. दुनिया में ऐसा करिश्मा पहले कभी नहीं हुआ. 2008 के ओलिंपिक को दुनिया ने चीन की अंदरूनी शक्ति के प्रदर्शन के रूप में देखा और यह मान लिया कि चीन 21वीं सदी की महाशक्ति है. लेकिन उस के बाद से चीन की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाने लगी. 

भारत में वरिष्ठ पत्रकार और चीन पर कई पुस्तकें लिखने वाले प्रेमशंकर झा अपनी पुस्तक  ‘मैनेज्ड केओस : द फ्रजिलिटी औफ द चाइनीज मिरेकल’ में चीन के चमत्कार के अंतर्विरोधों को स्पष्ट करते हुए कहते हैं, ‘‘मसलन चीन एक ही समय विश्व की सब से ज्यादा अधिनायकवादी ?और सब से ज्यादा वैश्विक स्तर पर इंटरकनैक्टेड अर्थव्यवस्था है. उस की प्रति व्यक्ति आय पिछले 30 वर्षों में 11 गुना बढ़ी है और उस ने 40 करोड़ लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है लेकिन यह तेजी से बढ़ते असंतोष को नहीं रोक पाया जो सरकार के खिलाफ संकल्पित विपक्ष के तौर पर अपने को प्रकट कर रहा है. चीन की विकास दर पिछले 30 वर्षों में लगभग 10 फीसदी रही है. विश्व में यह सर्वोच्च है. उस के बढ़ते निर्यात और बढ़ता व्यापार लाभ उस के उत्पादन की उच्चस्तरीय कुशलता को ही दर्शाते हैं, फिर वह उत्पादों के प्रति डौलर के लिए भारत की तुलना में 2.2 गुना ऊर्जा और तीन गुना कच्चा माल क्यों खर्च कर रहा है. संक्षेप में, अकुशलता और चरम प्रतियोगितात्मकता दोनों का सहअस्तित्व कैसे बना हुआ है.’’

चीनी चमत्कार के इस  खोखलेपन ने चीन को आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तौर पर प्रभावित किया है.  चीन के पास 2 ट्रिलियन डौलर का विदेशी मुद्रा भंडार है. मगर वह गरीबों और अमीरों के बीच बहुत बड़ी विषमता का शिकार है. केवल 0.4 प्रतिशत लोगों के पास देश की 70 प्रतिशत संपदा है. 20 प्रतिशत आबादी यानी 30 करोड़ चीनियों की रोजाना की आमदनी एक डौलर से भी कम है. संपत्ति का यह चरम केंद्रीकरण चीनी सरकार के लिए गंभीर समस्या बन गया है और सत्ता पर उस की पकड़ को चुनौती दे रहा है.

बड़ी चुनौतियां

इस का मतलब यह है कि घरेलू बाजार को टिकाऊ बनाने के लिए कम उपभोक्ता हैं. इसलिए विश्व का यह वर्कशौप अपने भविष्य के लिए विशेषरूप से विश्व अर्थव्यवस्था पर निर्भर है. अब चीन का निर्यात चरमरा रहा है और उस के साथ उद्योग भी. सरकार दावा करती है कि शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी 4 प्रतिशत है लेकिन सरकारी आंकड़ों पर विश्वास नहीं किया जा सकता.बढ़ती बेरोजगारी और स्थिर वेतन देश के सुपर अमीरों के खिलाफ असंतोष को बढ़ाएंगे और शासक वर्ग के लिए खतरा बन जाएंगे. चीन की सरकार चुनी हुई नहीं है, उस की नीतियां नौकरशाह और पूंजीपतियों द्वारा संचालित की जाती हैं. वह आम चीनी के हित में काम करने के बजाय शासक और अभिजात वर्ग को बचाने की कोशिश कर रही है. इन बड़े उद्योगों के मालिक अपनी संपत्ति को सुरक्षित तरीके से बाहर दूसरे देशों में ले जा रहे हैं. इस के सुबूत लौस एंजिलिस से ले कर जेनेवा तक देखे जा सकते हैं. चीन के सुपर अमीर तेजी से नकदी दे कर संपत्ति खरीद रहे हैं. बेरोजगारी के कारण जैसेजैसे चीनी सामाजिक ढांचा हिलेगा, उथलपुथल होगी, वैसेवैसे चीन से ज्यादा से ज्यादा पूंजी का पलायन होगा. इस से एक दुश्चक्र पैदा होगा.

चीनी सरकार एक भयंकर दुविधा में फंस गई है. वह या तो आम चीनी की मदद कर सकती है या नौकरशाह, पूंजीपति वर्ग की, मगर दोनों की मदद एकसाथ नहीं कर सकती. चीन सरकार आम आदमी की मदद नहीं करती तो चीनी लोग विद्र्रोह करेंगे और सरकार का तख्ता पलट देंगे. बढ़ते असंतोष में चीन का इतिहास अपने को दोहरा रहा है. हिंसा की लहर हर राजवंश को खत्म करती रही है. इस में सैनिक दमन काम नहीं करने वाला. सैनिक उन किसानों और मजदूरों के भाई हैं जिन का रोजगार छिन गया है. सैनिक अफसरों के परिवार भी आर्थिक संकट से गुजर रहे हैं.

सरकार के खिलाफ असंतोष

वहीं, यदि चीनी सरकार आम चीनी के पक्ष में काम करती है तो बड़े उद्योगपतियों और नौकरशाहों का शासक वर्ग उसे पलट देगा. समय तय नहीं मगर उस का अंत निश्चित है. चीन से आ रही खबरों से यह स्पष्ट है कि चीनी सरकार के खिलाफ जन असंतोष तेजी से बढ़ रहा है. चीन की एक और कमजोरी है, विद्रोही राष्ट्रीयताएं. चीन हमेशा एक साम्राज्यवादी देश रहा है. साम्यवादी चीन ने इस परंपरा को जारी रखा. 1949 में माओवादी क्रांति के बाद चीन ने उसी वर्ष सीक्यांग पर कब्जा कर लिया और 1950 में तिब्बत पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया. इन दोनों के अलावा इनर मंगोलिया एक ऐसा क्षेत्र है जिस के लोग अपने को चीन का हिस्सा मानने को तैयार नहीं हैं. यों तो चीन में सरकारी तौर पर  55 राष्ट्रीयताएं हैं लेकिन उन की आबादी 10 प्रतिशत ही है और वे चीन के सीमावर्ती इलाकों में बसी हुई हैं. मगर देश की 60 प्रतिशत जमीन इन  विद्रोही राष्ट्रीयताओं की है. चीन के कारागार में 60 वर्ष तक रहने के बावजूद इन राष्ट्रीयताओं की आजादी की भावना खत्म नहीं हुई है. यही कारण है कि तिब्बत और उईगर में अकसर विद्रोही स्वर सुनाई देते हैं. जब भी चीन में कोई बड़ा संकट आएगा, ये राष्ट्रीयताएं अपने को मुक्त करने की कोशिश कर सकती हैं. सोवियत संघ के उदाहरण ने उन्हें उम्मीद बंधाई है कि कभी वे भी आजाद हो सकती हैं. कभी चीन का भी वही हश्र हो सकता है जो सोवियत संघ का हुआ है.

विदेशी निवेश पर आंकड़ों की बाजीगरी नहीं चलेगी

देश के बहुमुखी आर्थिक विकास के लिए निवेश महत्त्वपूर्ण होता है. यही कारण है कि सरकार निवेश को महत्त्व देती है. यहां तक कि राज्य सरकारें भी अपने राज्यों में निवेश को बढ़ावा देने के लिए लालच दे कर उद्योगों को आमंत्रित करती हैं. इसी तरह विदेशी निवेश के लिए केंद्र सरकार भी निवेशकों को आकर्षित करने की तरहतरह की योजनाएं चलाती है. मोदी सरकार का इस के लिए ‘मेक इन इंडिया’ नारा है और यह कारगर साबित होता हुआ नजर भी आ रहा है, सरकार के आंकड़े तो यही दावा कर रहे हैं. सरकार का यह भी दावा है कि इस वर्ष अब तक उसे विदेशी निवेश के 170 प्रस्ताव मिले हैं, जबकि पिछले वर्ष कुल 150 प्रस्ताव मिले थे. इसी तरह से प्रवासी भारतीयों ने भी देश में निवेश करने में रुचि दिखाई है. आंकड़ों से लगता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं के दौरान एनआरआई को निवेश करने के लिए दिए जाने वाले निमंत्रण रंग लाते नजर आ रहे हैं. सरकार का दावा है कि केंद्र में नई सरकार आने के बाद से प्रवासी भारतीयों से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 3 गुना बढ़ा है. विदेशी निवेश सर्वाधिक मौरीशस, सिंगापुर और नीदरलैंड से हुआ है. सर्वाधिक निवेश सेवा क्षेत्र में हुआ है जो कुल निवेश का करीब 13 फीसदी है. सेवा क्षेत्र में वित्त निवेश, बैंकिंग, गैरबैंकिंग तथा शोध क्षेत्र प्रमुख रहे हैं. आटोमोबाइल क्षेत्र दूसरे तथा सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में निवेश तीसरे स्थान पर है. यह तुलनात्मक आंकड़ा पिछले 3 वर्षों का है जबकि एनआरआई निवेश का सिर्फ एक साल का है.

सवाल यह है कि सिर्फ आंकड़े दिखा कर आर्थिक तरक्की की राह पर कामयाब नहीं हुआ जा सकता है. इस के लिए जमीनी हकीकत ज्यादा महत्त्वपूर्ण है. जमीनी हकीकत में मिसाल के तौर पर निवेश करने वाले देशों को देखा जा सकता है. यहां जिन देशों के नाम हैं उन्हें बहुत मजबूत अर्थव्यवस्था वाला देश नहीं कहा जा सकता. यह ठीक है कि सिंगापुर तथा नीदरलैंड की स्थिति अच्छी है लेकिन विकसित देशों से निवेश आकर्षित नहीं किया जा सका है. यहां ‘सौ सुनार की और एक लुहार की’ वाली कहावत को चरितार्थ करने की जरूरत है ताकि मोटी विदेशी मुद्रा अर्जित की जा सके. ‘बूंदबूंद से घड़ा भरने’ वाली कहावत शीघ्र तरक्की की शैली नहीं है. यह पकाऊ व्यवस्था का हिस्सा है. जरूरत मोटे स्तर पर विदेशी निवेश को आकर्षित करने की है ताकि विश्व की मजबूत अर्थव्यवस्था में हमारे नाम का उल्लेख हो.

ब्याज दरें नहीं घटने से बाजार को झटका

बौंबे शेयर बाजार में जुलाई के आखिरी सप्ताह से ले कर अगस्त के पहले सप्ताह की शुरुआत तक लगातार 5 सत्र में तेजी रही. लेकिन इस के बाद संसद में चल रहे हंगामे के कारण मानसून सत्र में कोई कामकाज नहीं हो पाने और सत्ता पक्ष तथा विपक्ष के बीच बढ़ते तनाव ने बाजार के सैंटिमैंट को प्रभावित किया. उसी बीच, रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन की मौद्रिक समीक्षा नीति के दौरान ब्याज दरों में कटौती नहीं करने से कटौती की उम्मीद लगाए निवेशक निरुत्साहित हुए. नतीजतन, बाजार का रुख बदल गया और सूचकांक 28 हजार अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे उतर आया. जानकार इस की वजह एशियाई बाजारों में जारी गिरावट को भी मान रहे हैं. थोक मूल्य सूचकांक में पिछले वर्ष नवंबर से जारी गिरावट और विनिर्माण क्षेत्र के निर्यात के पिछले 6 माह के दौरान बढ़ने की खबर से भी ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद की जा रही थी लेकिन सरकार का मानना है कि दरों में कटौती का आधार सिर्फ थोक मूल्य सूचकांक को ही नहीं माना जा सकता है.

विश्लेषकों का मानना है कि मानसून का मौसम अभी चल रहा है, कई क्षेत्रों में विकास दर पिछले साल से दोगुनी हुई है और खरीफ की फसल के बेहतर होने के अनुमान की वजह से सब की निगाह ब्याज दरों पर टिकी थी. उन का मानना है कि ब्याज दरों की कटौती नहीं करने की घोषणा सकारात्मक माहौल के कारण बाजार को ज्यादा दिन तक प्रभावित नहीं कर सकती है. इधर संसद में हुई अनुपूरक मांगों पर हुई चर्चा के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली के सभी रुकी विकास योजनाओं को शुरू करने और विकास दर 8 प्रतिशत तक पहुंचने के अनुमान जाहिर करने के बाद बाजार में अगले दिन ही सुधार हुआ और सूचकांक 2 सप्ताह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया.

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