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Valentine’s Day 2026 : Relationship Tips – अगर आपको भी लेना है अपने पार्टनर का ‘लव टेस्ट’, तो अपनाएं ये 7 प्वाइंट्स

Valentine’s Day 2026 : Relationship Tips –

अनूप को अक्सर घर काटने को दौड़ता..पत्नी  पराई पराई सी लगती.मन करता,घर से कहीं बाहर निकल जाए और सड़कों पर तब तक घूमता रहे,जब तक थक कर टूट न जाए.  फिर घर लौटकर गहरी नींद सो जाए,ताकि उसकी पत्नी की ऊँचा बोलने की आवाज़  उसे सुनाई ही   न दे. उसे लगता उसकी अपनी पत्नी  ही उसकी सबसे बड़ी दुश्मन है,जिसने सुख शांति छीन ली है.

असल में रिश्तों की मजबूती की नींव प्यार, विश्वास, सम्मान और आत्मसमर्पण से मजबूत होती है. इनमें से किसी भी एक भावना की कमी आपके रिश्ते की इमारत को कमजोर और जर्जर बना सकती है. कई बार रिश्तों में आई परेशानियों को हम अनदेखा या नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन ऐसा करना आपकी सबसे बड़ी गलती हो सकती है. क्योंकि रिश्ता दो लोगों के साथ चलने से ही खूबसूरत बनता है. अगर आपको भी अपने रिश्ते में ये 7 बातें नजर आ रही हैं तो मान लीजिए कि आपके रिश्ते में कुछ गड़बड़ है.

अपनी पसंद थोपने की कोशिश

रिश्ते में एक दूसरे के फैसलों का सम्मान करना जरूरी होता है. अगर आपका साथी अक्सर अपनी पसंद आप पर थोपने की कोशिश करता है या फिर आपके निर्णयों को प्रभावित करने का प्रयास करता है तो यह खतरे की घंटी जैसा है.

इमोशनल सपोर्ट का अभाव

दो लोगों के रिश्ते में सबसे जरूरी है इमोशन यानी भावनाएं. अगर आपका साथी आपकी भावनाओं को न ही समझता है और न ही उनका सम्मान करता है तो आपको अपने रिश्ते पर फिर से गौर करने की जरूरत है. क्योंकि जब बार-बार ऐसा व्यवहार होता है तो रिश्ते में भावनाएं खत्म हो जाती हैं और दूरियां खुद-ब-खुद आने लगती हैं.

एक दूसरे पर विश्वास जरूरी

विश्वास आपके रिश्ते की नींव है. जिस रिश्ते में साथी एक दूसरे पर विश्वास नहीं करते, उसमें असुरक्षा की भावना पैदा होने लगती है. एक दूसरे पर शक करना आपके रिश्ते को कमजोर बना देता है. ऐसा रिश्ता समझौते के जैसा हो जाता है. इसलिए एक दूसरे पर विश्वास करना जरूरी है.

बातचीत से निकलेगा हल

पार्टनर्स के बीच की बातचीत रिश्ते को मजबूत और पारदर्शी बनाती है. दो लोगों के बीच संवाद किसी पुल का काम करता है. यह आपको आपस में जोड़ता है. जब यह पुल टूटता है या कमजोर होता है तो रिश्तों में दूरी आने लगती है. एक दूसरे की भावनाएं साझा नहीं हो पातीं और रिश्तों में कड़वाहट आने लगती है. इसलिए अपनी मन की बातें एक दूसरे से जरूर करें.

सम्मान के बिना, सब बेईमानी

सम्मान आपके रिश्ते को न सिर्फ मजबूती देता है, बल्कि यह पार्टनर की नजरों में आपका महत्व भी बढ़ा देता है. सम्मान के बिना प्यार की बातें  बेईमानी हैं. जब आप अपने साथी का सम्मान करते हैं तो एक तरह से उसे यह भी बताते हैं कि आप उन्हें कितना प्यार करते हैं. इसकी कमी रिश्ते के खोखलेपन दिखाता है.

अतीत में उलझे रहना 

‘मैं तुम्हारे अतीत को जानता हूं, इसलिए बोल रहा हूं’,‘आपने पहले भी ऐसा किया था’, ‘कहीं आप पहले की तरह तो नहीं कर रहे’, अक्सर पार्टनर्स रिश्तों में ऐसी बातें करते हैं. लेकिन अतीत में उलझे रहने से आपका आज का रिश्ता कमजोर हो सकता है. अगर आपका पार्टनर अक्सर आपको आपके अतीत को लेकर टोकता है या आपके अतीत के अनुसार आपको जज करता है तो रिश्ते में जुड़ाव की कमी हो सकती है.

आलोचना है असहनीय

अपने पार्टनर की बात-बात पर आलोचना करना, दूसरों को उसकी कमी बताना, आपको भले ही मजाक लगे, लेकिन यह आपके साथी को अंदर से तोड़ देता है. यह न सिर्फ उन्हें मानसिक रूप से परेशान करता है, बल्कि उनके काॅन्फिडेंस को भी तार-तार कर देता है. ऐसी आलोचनाएं आपके रिश्ते के लिए आत्मघाती साबित हो सकती हैं.

Valentine’s Day 2026 : Relationship Tips –

Valentine’s Day 2026 : वैलेंटाइन डे पर पढ़ें Top 10 Love Stories, जो आपको प्यार करने पर कर देंगी मजबूर

Valentine’s Day 2026

Top 10 Love Stories in Hindi : ‘प्रेम’ ये एक सुखद एहसास है, जिसे हर एक व्यक्ति जीना चाहता हैं. प्यार में हर चीज अच्छी लगती है. साथ ही दिल और दिमाग खुश रहता है. इसके अलावा जब कोई व्यक्ति प्यार में होता है, तो उसे अपने पार्टनर की हर एक खूबी व बुराई अच्छी लगती है.

कई लोगों को तो प्यार का इतना जुनून चढ़ जाता है कि वो अपने पार्टनर के प्रेम के खातिर कुछ भी कर गुजर जाने को तैयार हो जाते हैं. ऐसी ही प्यार और रिश्ते से जुड़ी कुछ दिलचस्प कहानियां हम आपके लिए लेकर आए हैं. अगर आपको भी कहानिया पढ़ने का शौक, तो पढ़ें सरिता की Top 10 Romantic Story in Hindi.

Top 10 Love Stories in Hindi : टॉप 10 प्रेम कहानियां हिंदी में

1. Valentine’s Day 2024 : कांटे गुलाब के – अमरेश और मिताली की अनोखी प्रेम कहानी

Valentines Day

सुबह के 8 बज रहे थे. किचन में व्यस्त थी. तभी मोबाइल की घंटी बज उठी. मन में यह सोच कर खुशी की लहर दौड़ गई कि अमरेश का फोन होगा. फिर अचानक मन ने प्रतिवाद किया. वह अभी फोन क्यों करेगा? वह तो प्रतिदिन रात के 8 बजे के बाद फोन करता है. अमरेश मेरा पति था. दुबई में नौकरी करता था. मोबाइल पर नंबर देखा, तो झट से उठा लिया. फोन मेरी प्रिय सहेली स्वाति ने किया था. बात करने पर पता चला कि कल उस की शादी होने वाली है. शादी में उस ने हर हाल में आने के लिए कहा. शादी अचानक क्यों हो रही है, यह बात उस ने नहीं बताई. दरअसल, उस की शादी 2 महीने बाद होने वाली थी. जिस लड़के से शादी होने वाली थी, उस की दादी की तबीयत अचानक बहुत खराब हो गईर् थी. डाक्टर ने उसे 2-3 दिनों की मेहमान बताया था. इसीलिए घर वाले दादी की मौजूदगी में ही उस की शादी कर देना चाहते थे.

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2. Valentine’s Day 2024 : इजहार- सीमा के लिए किसने भेजा था गुलदस्ता ?

Valentines Day 2024

मनीषा ने सुबह उठते ही जोशीले अंदाज में पूछा, ‘‘पापा, आज आप मम्मी को क्या गिफ्ट दे रहे हो?’’ ‘‘आज क्या खास दिन है, बेटी?’’ कपिल ने माथे में बल डाल कर बेटी की तरफ देखा. ‘‘आप भी हद करते हो, पापा. पिछले कई सालों की तरह आप इस बार भी भूल गए कि आज वैलेंटाइनडे है. आप जिसे भी प्यार करते हो, उसे आज के दिन कोई न कोई उपहार देने का रिवाज है.’’ ‘‘ये सब बातें मुझे मालूम हैं, पर मैं पूछता हूं कि विदेशियों के ढकोसले हमें क्यों अपनाते हैं?’’ ‘‘पापा, बात देशीविदेशी की नहीं, बल्कि अपने प्यार का इजहार करने की है.’’ ‘‘मुझे नहीं लगता कि सच्चा प्यार किसी तरह के इजहार का मुहताज होता है. तेरी मां और मेरे बीच तो प्यार का मजबूत बंधन जन्मोंजन्मों पुराना है.’’ ‘‘तू भी किन को समझाने की कोशिश कर रही है, मनीषा?’’ मेरी जीवनसंगिनी ने उखड़े मूड के साथ हम बापबेटी के वार्तालाप में हस्तक्षेप किया, ‘‘इन से वह बातें करना बिलकुल बेकार है जिन में खर्चा होने वाला हो, ये न ला कर दें मुझे 5-10 रुपए का गिफ्ट भी.’’

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3. Valentine’s Day 2024 : कुछ कहना था तुम से – 10 साल बाद सौरव को क्यों आई वैदेही की याद ?

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वैदेही का मन बहुत अशांत हो उठा था. अचानक 10 साल बाद सौरव का ईमेल पढ़ बहुत बेचैनी महसूस कर रही थी. वह न चाहते हुए भी सौरव के बारे में सोचने को मजबूर हो गई कि क्यों मुझे बिना कुछ कहे छोड़ गया था? कहता था कि तुम्हारे लिए चांदतारे तो नहीं ला सकता पर अपनी जान दे सकता है पर वह भी नहीं कर सकता, क्योंकि मेरी जान तुम में बसी है. वैदेही हंस कर कहती थी कि कितने झूठे हो तुम… डरपोक कहीं के. आज भी इस बात को सोच कर वैदेही के चेहरे पर हलकी सी मुसकान आ गई थी पर दूसरे ही क्षण गुस्से के भाव से पूरा चेहरा लाल हो गया था. फिर वही सवाल कि क्यों वह मुझे छोड़ गया था? आज क्यों याद कर मुझे ईमेल किया है?

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4. Valentine’s Day 2024 : तीन शब्द – राखी से वो तीन शब्द कहने की हिम्मत क्या जुटा पाया परम ?

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परम आज फिर से कैंटीन की खिड़की के पास बैठा यूनिवर्सिटी कैंपस को निहार रहा था. कैंटीन की गहमागहमी के बीच वह बिलकुल अकेला था. यों तो वह निर्विकार नजर आ रहा था पर उस के मस्तिष्क में विगत घटनाक्रम चलचित्र की तरह आजा रहे थे.

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5. Valentine’s Day 2024 : रूह का स्पंदन – दीक्षा के जीवन की क्या थी हकीकत ?

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शादी के लिए सुदेश और दीक्षा एक रेस्टोरेंट में मिले. दोनों को ही उम्मीद नहीं थी कि वे एकदूसरे की कसौटी पर खरे उतरेंगे. तब तो बिलकुल भी नहीं, जब दीक्षा ने अपने जीवन की हकीकत बताई. लेकिन सुदेश ने जब 5 मिनट दीक्षा का हाथ अपने हाथों में थामा तो नतीजा पल भर में सामने आ गया. आखिर ऐसा…

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6. Valentine’s Day 2024 : साथ साथ – उस दिन कौन सी अनहोनी हुई थी रुखसाना और रज्जाक के साथ ?

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आपरेशन थियेटर के दरवाजे पर लालबत्ती अब भी जल रही थी और रुखसाना बेगम की नजर लगातार उस पर टिकी थी. पलकें मानो झपकना ही भूल गई थीं, लग रहा था जैसे उसी लालबत्ती की चमक पर उस की जिंदगी रुकी है.

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7. Valentine’s Day 2024 : ऐ दिल संभल जा : रीमा को किस बात की चिंता हो रही थी ?

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रीमा की आंखों के सामने बारबार डाक्टर गोविंद का चेहरा घूम रहा था. हंसमुख लेकिन सौम्य मुखमंडल, 6 फुट लंबा इकहरा बदन और इन सब से बढ़ कर उन का बात करने का अंदाज. उन की गंभीर मगर चुटीली बातों में बहुत वजन होता था, गहरी दृष्टि और गजब की याददाश्त. एक बार किसी को देख लें तो फिर उसे भूलते नहीं. उन  की ईमानदारी व कर्तव्यनिष्ठा के गुण सभी गाते थे. उम्र 50 वर्ष के करीब तो होगी ही लेकिन मुश्किल से 35-36 के दिखते थे. रीमा बारबार अपना ध्यान मैगजीन पढ़ने में लगा रही थी लेकिन उस के खयालों में डाक्टर गोविंद आजा रहे थे.

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8. Valentine’s Day 2024 : सायोनारा – उस दिन क्या हुआ था अंजू और देव के बीच ?

रोमांटिक स्टोरी

उन दिनों देव झारखंड के जमशेदपुर स्थित टाटा स्टील में इंजीनियर था. वह पंजाब के मोगा जिले का रहने वाला था. परंतु उस के पिता का जमशेदपुर में बिजनैस था. यहां जमशेदपुर को टाटा भी कहते हैं. स्टेशन का नाम टाटानगर है. शायद संक्षेप में इसीलिए इस शहर को टाटा कहते हैं. टाटा के बिष्टुपुर स्थित शौपिंग कौंप्लैक्स कमानी सैंटर में कपड़ों का शोरूम था.

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9. Valentine’s Day 2024 : सच्चा प्यार – क्या शेखर की कोई गलत मंशा थी ?

वैलेंटाइन डे स्पेशल स्टोरी

‘‘उर्मी,अब बताओ मैं लड़के वालों को क्या जवाब दूं? लड़के के पिताजी 3 बार फोन कर चुके हैं. उन्हें तुम पसंद आ गई हो… लड़का मनोहर भी तुम से शादी करने के लिए तैयार है… वे हमारे लायक हैं. दहेज में भी कुछ नहीं मांग रहे हैं. अब हम सब तुम्हारी हां सुनने के लिए बेचैनी से इंतजार कर रहे हैं. तुम्हारी क्या राय है?’’ मां ने चाय का प्याला मेरे पास रखते हुए पूछा.

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10. Valentine’s Day 2024 : तुम्हारा जवाब नहीं – क्या मानसी का आत्मविश्वास उसे नीरज के करीब ला पाया ?

वैलेंटाइन डे स्पेशल स्टोरी हिंदी में

अपनी शादी का वीडियो देखते हुए मैं ने पड़ोस में रहने वाली वंदना भाभी से पूछा, ‘‘क्या आप इस नीली साड़ी वाली सुंदर औरत को जानती हैं?’’ ‘‘इस रूपसी का नाम कविता है. यह नीरज की भाभी भी है और पक्की सहेली भी. ये दोनों कालेज में साथ पढ़े हैं और इस का पति कपिल नीरज के साथ काम करता है. तुम यह समझ लो कि तुम्हारे पति के ऊपर कविता के आकर्षक व्यक्तित्व का जादू सिर चढ़ कर बोलता है,’’ मेरे सवाल का जवाब देते हुए वे कुछ संजीदा हो उठी थीं.

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Valentine’s Day 2026

Satirical Story In Hindi : अलगाव ए मोबाइल

Satirical Story In Hindi : साक्षी और सिंधु ने साबित कर दिया कि घर के लिए सब्जी, बच्चों की पीटीएम से ले कर ओलिंपिक में मैडल लाने तक के लिए महिलाओं को ही आगे आना पड़ता है. इतनी बड़ी कामयाबी के साथ एक और छोटी खबर जो पिछले दिनों चर्चा में रही, वह थी ‘सिंधु का मोबाइल से अलगाव’  वह भी पूरे 3 महीने के लिए. आज शायद यह ओलिंपिक में मैडल जीतने से भी ज्यादा कठिन कार्य है. महान तपस्या है. जब मोबाइल यत्रतत्रसर्वत्र छाया है, तो इस के बिना रहने की कल्पना करने से भी डर लगता है. घर, बाहर, मैट्रो स्टेशन या एयरपोर्ट सब जगह मोबाइल पर जुटे लोग दिख जाएंगे. बीएमडब्लू वाला हो या रिकशे वाला हर कोई इस का दीवाना है. सुबह से ले कर रात और रात से ले कर सुबह, अनवरत मोबाइल देवो भव:.

अब आप ही बताइए उस सफलता या उपलब्धि के क्या माने हैं जिस की पलपल की खबर लोगों तक न पहुंचे. कैसा होगा वह करुणामय पल जब सिंधु ने भरे मन से मोबाइल का त्याग किया होगा? कितनी मुश्किल से मोबाइल अपने बैग या जेब से निकाल कर दिया होगा? क्या उस का हाथ नहीं कांपा होगा? क्या उस के मन में एक बार भी नहीं आया होगा कि अब मैं सैल्फी कैसे लूंगी? मैं फेसबुक पर पोस्ट कैसे डालूंगी? ट्विटर पर ट्वीट कैसे करूंगी? कैसे इंस्टाग्राम पर धड़ाधड़ पिक्स डालूंगी. शायद इन में से अगर एक खयाल भी दिमाग में आ जाता तो बेचारी के तो आंसू निकल जाते और शायद वह कह भी देती, ‘भाड़ में जाए ओलिंपिक्स’ इस महान कार्य के लिए ‘भारत रत्न’ तो बहुत छोटी चीज है. उस से भी बड़ा कोईर् अवार्ड है तो  उसे मिलना चाहिए था, जैसे ‘संभाले जनून अवार्ड’ या फिर ‘काबिलेतारीफ अवार्ड.’

क्या फायदा ऐसी सफलता का जब तक उस की पलपल की खबर फेसबुक पर किसी ने न ली. आज कोई भी नौजवान  नाम से कम इस बात से ज्यादा जाना जाता है कि उस ने सोशल मीडिया पर कितनी पोस्ट डालीं. सोचो जरा, कैसी खुशी रही होगी सिंधु के मुख पर जब वह रियो पहुंची होगी. क्याक्या सत्कार हुआ होगा उस का? पर सब बेकार, जब उन हसीन लमहों को किसी ने फेसबुक पर देखा ही नहीं, लाइक ही नहीं किया और न ही कोई कमैंट किया. आज के ज़माने में इसे बेइज्ज़ती कहते हैं, अगर कोई लाइक या कमैंट न करे, और जो पोस्ट न डाले वह बैकवर्ड.

वह ज़माने लद गए जब बच्चे मां के उठाने पर या घड़ी के अलार्म से उठते थे. अब उन की नींद व्हाट्सऐप या फेसबुक के मैसेज से खुलती है. चाहे मां कितनी भी आवाज लगा लें मजाल है कि बच्चे जरा हिल भी जाएं और वहीं अगर वह वाईफाई औन कर दें, तो देखो नज़ारा, एक मिनट में उठ जाएंगे और पूरी मुस्तैदी से फोन उठा कर मैसेज पढ़ना शुरू कर देंगे. अब आप यह न कहना कि हमारा बच्चा पढ़ता नहीं है. देखो, कितने मनोयोग से पढ़ रहा है. फिर चाहे वह ग्रुप के मैसेज हों या पिछली रात वाली चैट. सुबह बेशक अपने सामने खड़ी मम्मी को नमस्ते, गुडमौर्निंग न बोले पर मजाल है, अपने व्हाट्सऐप ग्रुप पर ‘गुडमौर्निंग फैं्रड्स’ लिखना भूल जाए. जैसे वे तो ताक लगाए बैठे हैं कि कब आप का बच्चा गुडमौर्निंग बोले और वे अपने दिन का शुभारंभ करें.

फेसबुक पर भी वे ऐसीऐसी पोस्ट डालेंगे कि फै्रंड्स पुरजोर कोशिश करेंगे कि उन की खबर दुनिया के कोनेकोने तक पहुंच जाए. इतना लाइक करेंगे कि हरेक कमैंट का जवाब देंगे. सैल्फी डालेंगे और लोगों को पकाएंगे. पिछली रात का एकएक मिनट का लेखाजोखा होगा. तिस पर उन का बस चले तो अपनी नींद में आने वाले सपने भी फेसबुक पर डाल दें, पर कमबख्त याद ही नहीं रहते बड़ा अफसोस है. वह जमाना गया जब लोग समय देखने के लिए घड़ी देखते थे. अब तो वह बेचारी दीवार टंगेटंगे ही ‘टैं’ बोल जाती है, किसी को उस का ध्यान ही नहीं आता. अब लोग वक्तबेवक्त मोबाइल चैक करते हैं. हर आधे सैकंड में जैसे इतने समय में कोईर् भूकंप न आ गया हो, उन के फोन और उन्हें देखना क्या होता है कि कितने लाइक आए हैं, कितने कमैंट मिले हैं या फिर किस ने क्या पोस्ट डाली है. शायद उन्हें लगता है कि लोग टौर्च ले कर उन्हें ही ढूंढ़ रहे हैं. कितने फौलोअर हो गए, कितने लाइक, कमैंट जैसे इस में कोई विश्व रिकौर्ड बनाना है.

लोगों की गुडमौर्निंग, गुडईवनिंग, बर्थ के विशेज, हर त्योहार की शुभकामनाएं यहां तक कि विमंस डे, फादर्स डे आदि की अवधारणाएं भी सुबहसुबह व्हाट्सऐप बीप के साथ सब का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करती हैं. जहां इतना जनून उबल रहा हो, ऐसे में सिंधु का अलगाव ए मोबाइल वाकई काबिलेतारीफ है. एक भारत रत्न तो इस उपलब्धि के लिए भी बनता है जी.

पहले बच्चे किताबें ले कर खुश होते थे और अब मोबाइल. उन्हें कह दो, ‘बेटा नोट्स बना लो,’ तो जवाब मिलेगा, ‘क्या जरूरत है मौम? व्हाट्सऐप ग्रुप पर कोई भी डाल देगा?’ नोट्स भी अब इंस्टैंट पिज्जा की तरह हो गए हैं. 15 मिनट के बाद फ्री, क्योंकि 15 मिनट में ही बच्चे उन नोट्स पर इतने कमैंट्स डाल कर बेइज्जती कर देते हैं कि बनाने वाला सोच में पड़ जाता है कि मैं ज्यादा समझदार हूं या फिर ये सब लोग, जो अपनी ऐक्सपर्ट राय दे रहे हैं. उसे अपने ही बनाए नोट्स की गुणवत्ता पर शक होने लगता है. और तो और व्हाट्सऐप अब रैगिंग का नया तरीका बन गया है. पहले फै्रशर्स को अच्छेअच्छे सब्ज़बाग दिखा कर ग्रुप में जोड़ लेते हैं. टीचर्स भी कहते हैं, ‘सीनियर्स से बना कर रखो. काम आएगी यह दोस्ती आगे बढ़ने में.’

फिर वह इसी ग्रुप पर कालेज की छुट्टी का ऐलान कर के क्लास बंक करवा देते हैं. पर अफसोस, सिंधु ने ये सब अविस्मरणीय पल खो दिए सिर्फ ओलिंपिक में मैडल की चाह में. Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : स्मार्ट बन जा रे

Satirical Story In Hindi : शहर के स्मार्ट घोषित होने का अलग ही मजा है. रहते थे पहले भी हम उसी शहर में. जीवनशैली भी वही थी पहले अपनी, जो आज है. पर जब से अपने शहर को स्मार्ट यानी स्मार्ट सिटी घोषित कर दिया गया है, दिल झूमझूम कर गा रहा है ‘मैं वही, धड़कन वही न जाने ये क्या हो गया, सबकुछ लागे स्मार्टस्मार्ट सा.’ वह बात अलग है कि हमारे शहर को स्मार्ट घोषित किए जाने के बाद कई लोगों को स्मार्ट शब्द के बारे में अपने ज्ञान पर, शब्दकोश पर, संशय होने लगा है. अब बातबात पर संशय करने वालों की क्या बात की जाए. भाई, शहर स्मार्ट शहरों की सूची में शामिल हो गया है, तो इस का जश्न मनाओ. क्या चीनियों की तरह मुंह फुलाए बैठे हो जो ओलिंपिक गेम्स में इतने मैडल मिलने पर भी खुश नहीं हैं.

हम तो उस देश के वासी हैं जिस देश में अरबों की आबादी पर 2 मैडल मिलने पर भी खुश हो लेते हैं. अगर 2 मैडल भी न मिलें तो भी कोई बात नहीं. कई बार हम शून्य ले कर भी शान से लौटे हैं. आखिर शून्य का आविष्कार हमारे देश में ही तो हुआ था, फिर हम क्यों शून्य पर किसी और का अधिकार होने दें? हमारे ढेर सारे खिलाड़ी खेल आए विदेशों में, सफर कर आए हवाईजहाज से, अतिथि बन आए बड़ेबड़े होटलों के, यही क्या कम है हमारे लिए? आखिर हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है. और गंगा के मैली होने के बाद भी, उस में और गंदगी जमा होने के बाद भी कोई फर्क पड़ता है हमें भला? गंगा के जल को बोतलबंद कर दो तो वह और भी पवित्र हो जाता है.

गंगा किनारे के शहर को हम स्मार्ट घोषित करवा लेंगे और सभी समस्याओं से मुक्ति मिल जाएगी. शहरवासियों को बाढ़ में घिरने में भी स्मार्टस्मार्ट सी फीलिंग आएगी. नाव में महिलाएं बच्चे जनने में स्मार्टनैस का एहसास करेंगी. खामखां लोग सरकार को ड्रेनेज सिस्टम में खामी बता कर और पौलिसी पर रोक न लगाने का दोष देते हैं. यदि ड्रेनेज सिस्टम को दुरुस्त कर दिया जाता, यदि पौलिथीन पर रोक लगा दी जाती तो बाढ़ का जो आनंद शहरवासी उठाते हैं वह उठा पाते? सड़क पर नाव चलाने का रोमांच ले पाते? नेतागण सपरिवार हैलिकौप्टर से बाढ़ का जायजा ले पाते?

जब से अपने शहर को स्मार्ट घोषित कर दिया गया है, दिल हर बात में, हर काम में स्मार्टनैस महसूस करता है. सुबह घर से निकलते ही, गड्ढे में पड़ते ही, मन हिचकोले खाने लगता है. सड़कमुक्त गड्ढे और गड्ढेयुक्त सड़कों पर गाड़ी चलाते हुए भादो मास में भी सावन के झूले झूलने का एहसास होता है-सावन आए या न आए, गाड़ी जब गड्ढे में झूमे, समझो सावन है. सड़कों पर बहते पवित्र नाले का सुगंधित जल में ‘छई छपा छई’ गाने का अलग ही रोमांच होता है. ट्रैफिक जाम में फंसने पर भी बड़ी स्मार्ट सी फीलिंग होती है. फीलिंग यह होती है कि अपने शहर में गाडि़यां इतनी हैं, गाड़ी वाले इतने हैं तभी तो रोड के चप्पेचप्पे गाडि़यों की फिल्लिंग से जाम हैं. जिन शहरों में, जिन देशों में गाडि़यों की संख्या कम है वहां क्या खाक जाम होगा? बिना मतलब के वे देश सार्वजनिक सेवा उपलब्ध करवा कर जनता को निजी गाड़ी से वंचित करते हैं. अपने यहां देखिए, बैंक हों या दूसरे वित्तप्रदाता, लोगों को निजी गाडि़यों के लिए प्रलोभित कर उन के अन्य खर्च कितना कम कर देते हैं. गाड़ी के मेंटिनैंस, बीमा, पैट्रोल आदि के बाद खर्चे करने के लिए पैसे काफी कम बचते हैं तो फिर खर्च होगा तो भला किस चीज पर?

और फिर अपने शहर की सड़कों के हर डिवाइडर फांद कर पार करने वाले युवा व बुजुर्गों को देख कर लगता है कि इन की स्मार्टनैस को देख कर ही हमारे शहर को स्मार्ट घोषित किया गया है. अब 100-200 मीटर दूर जा कर रोड क्रौस कर फिर सौदोसौ मीटर वापस आने में जो समय जाया होगा, उसे बचाना स्मार्टनैस नहीं तो और क्या है? सीधे डिवाइडर को फांद कर उस पार जाने में जो समय बचेगा, उस का स्मार्ट प्रयोग पानगुमटी पर खड़े हो कर कभी इस को, कभी उस को गरियाने का सदुपयोग हो सकता है कि नहीं? Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : जय इंडिया, जय करप्शन

Satirical Story In Hindi : कई दिनों से बड़े बाबू का चेहरा लटकालटका देख रहा था. नीम के पेड़ पर सूखी, लटकी, सड़ीगली लौकी जैसा. पर उन से इस बारे में कुछ पूछने का दुसाहस मुझ में न हो सका. औफिस में भी सहमेसहमे से रहते. सोचा, होगी घरबाहर की कोई प्रौब्लम. राजा हो या रंक, घरबाहर की प्रौब्लम आज किस की नहीं? घरबाहर की प्रौब्लम तो आज सासबहू की तरह घरघर की कहानी है. जो जितना बड़ा, उस के घरबाहर की प्रौब्लम उतनी बड़ी. हमारे जैसों के घर की प्रौब्लम हमारे जैसी. यहां मोदी से ले कर मौजी तक, सब अपनेअपने घर की प्रौब्लम से परेशान हैं. और कोई प्रौब्लम न होना भी अपनेआप में एक प्रौब्लम है.

हफ्तेभर औफिस से बिन बताए गायब रहे. आज अचानक पधारे और बड़े बाबू के चेहरे पर औफिस का गेट पार करते ही सौ किलो मुसकान देखी तो हक्काबक्का रह गया. चेहरे पर ऐसा नूर…मानो वक्त से पहले ही वसंत आ गया हो. या फिर, वसंत ने अपने आने की सब से पहले सूचना उन के चेहरे पर आ कर दी हो. गोया, उन का चेहरा, चेहरा न हो कर कोई नोटिसबोर्ड हो. वाह, क्या कामदेव सा दमदमाता चेहरा. रामदेव भी देख लें तो योग क्रियाएं भूल जाएं.

उन्होंने आव देखा न ताव, आते ही बड़ी बेरहमी से मुझे गले लगाते बोले, ‘‘वैल डन कामरेड, वैल डन. आज मैं तुम से बेहद खुश हूं.’’

‘‘सर मुझ से, मेरी वर्किंग से या…?’’

‘‘तुम्हारी वर्किंग से. तुम ने मेरे औफिस की ही नहीं, पूरे देश की नाक रख ली.’’

‘‘मैं समझा नहीं साहब, जिन का हमारे औफिस से आज तक वास्ता पड़ा है वे तो कहते हैं कि मेरी नाक ही नहीं. ऐसे में मेरी नाक न होने के बावजूद मैं ने अपने देश की नाक कैसे रख ली, सर?’’

‘‘ऐसे, ये देखो, भ्रष्टाचार की ऐनुअल ग्लोबल रिपोर्ट. हम ने हमजैसों के अथक प्रयासों से इस मामले में अपनी पोजिशन बरकार रखी है. ऊपर नहीं चढ़े तो नीचे भी नहीं गिरे. सच कहूं, अब के तो मैं डर ही गया था कि पता नहीं हमारा क्या होगा? हम अपनी इस पोजिशन को मेंटेन रख पाएंगे कि नहीं. अब एक यही तो फील्ड रह गई है जिस में हम अपना बैस्ट दे सकते हैं. सच कहूं मेरे दोस्त, यह सब तुम जैसे भ्रष्टाचार को समर्पित भ्रष्टाचारियों की वजह से ही संभव हो पाया है. आज सारे स्टाफ को लंच मेरी ओर से. कहो, क्या मेन्यू रखा जाए? जो तुम कहोगे, वही चलेगा.’’

‘‘मतलब, साहब?’’

‘‘अरे बुद्धू, तुम लोगों को जो मैं दिनरात रिश्वत लेने को बूस्ट करता था, उस का परिणाम आ गया है. देखा नहीं तुम ने अखबार में? कभीकभार अखबार पढ़ने के लिए औफिस के आरामों से वक्त निकाल लिया करो, मेरे दोस्त. तुम जैसों की मेहनत एकबार फिर रंग लाई है. भ्रष्टाचार के मामले में हम अपने पड़ोसी से आगे हैं.’’

‘‘मतलब, पड़ोसी के यहां ईमानदारी के दिन फिर रहे हैं. हम ईमानदारी में उन से पीछे हैं?’’

‘‘नहीं, भ्रष्टाचार में हम उन से आगे हैं. मैं तो कई दिनों से मरा जा रहा था कि पता नहीं अब की हमारी मेहनत का क्या रिजल्ट आएगा? भूखप्यास सब, रिजल्ट की सोच में डूबा, भूल गया था. दिनरात, सोतेजागते, उठतेबैठते यही मनाता रहा था कि भ्रष्टाचार में जो अब के हम कम से कम अपने पड़ोसी से चार कदम आगे न रहें तो न सही, पर जिस पोजिशन पर हैं उस से नीचे भी न आएं.’’

‘‘एक बात तो तय है मेरे दोस्त, कुछ और रंग लाए या न, पर जो मेहनत सच्चे मन से, बिना किसी कानून के डर से की जाए, वह रंग जरूर लाती है. अब उन के सीने के जो हाल हों, सो हों पर आज मेरा सीना चालीस इंच से फूल कर छप्पन इंच हुआ जा रहा है. क्या कर लिया उन के ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ के सिद्धांत ने हमारा? पर अंदर की बात कहूं, उन के इस बयान से मैं डर गया था यार, कि अब इस देश का क्या होगा? लेकिन अब सब समझ गया कामरेड, कोई इस देश में न खाए तो न खाए. एकाध के खाने या न खाने से कोई फर्क नहीं पड़ता. आई एम प्राउड औफ यू, माई डियर. तुम लंबी उम्र जियो. मे यू लिव लौंग. जब तक तुमहम जैसे इस देश में भ्रष्टाचार को समर्पित रहेंगे, भ्रष्टाचार को बढ़ने से इस देश में कोई भी माई का लाल नहीं रोक सकता. जय इंडिया, जय करप्शन…’’ Satirical Story In Hindi

Marginalized Leaders : हाशिए पर पड़े नेता न घर के रहे न घाट के

Marginalized Leaders : राजनीति हर किसी के बस की बात नहीं खासतौर से उन लोगों के लिए जिन के लिए यह फुल टाइम प्रोफैशन नहीं रहा ऐसे लोग जो कोई और व्यवसाय या कामधंधा छोड़ कर राजनीति में आते हैं उन्हें न तो जनता ज्यादा वक्त तक गंभीरता से लेती और न ही पार्टी आलाकमान जिस की मेहरबानी से ये राजनीति में चलते हैं ऐसे ही कुछ नेताओं की मौजूदा हालत पर गौर करें.

“जिस का काम उसी को साजे और करे तो ठेंगा बाजे” इस कहावत का सीधा सा मतलब यह है कि हर व्यक्ति अपने काम में माहिर होता है कोई और इस काम को करे तो राजनीति के लिहाज से उस का हश्र वही हो सकता है जो कई नेताओं का हुआ. जिन के अब दूरदूर तक कहीं अतेपते नहीं. ये नेता जो कल तक खूब चमकतेदमकते थे अब क्या कर रहे हैं किस हाल में हैं यह किसी को नहीं मालूम. सार यह कि राजनीति हर किसी के बस की बात नहीं, उन लोगों के बस की तो कतई नहीं जिन का मूल पेशा यह नहीं था और जिन का था वे प्रतिवद्धता से कर नहीं पाए.

हाशिए पर पड़े नेताओं में से अधिकतर बेमन से अपने मूल व्यवसाय की तरफ लौट रहे हैं लेकिन वहां भी इन्हें उम्मीद के मुताबिक या पहले की तरह रेस्पांस नहीं मिल रहा है. दो टूक कहें तो ये अब कहीं के नहीं रहे.

Marginalized Leaders (5)
स्मृति की सब से ज्यादा भद्द उस वक्त पिटी थी जब उन्होंने तथ्यात्मक खामी यानी गलत रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को सजा देने वाला सर्कुलर जारी किया था.

बहू से नेता बनीं स्मृति ईरानी

हाशिए पर पड़े दिग्गज नेताओं की लिस्ट में एक बहुत बड़ा न सही लेकिन अहम नाम स्नातक फर्स्ट ईयर के बाद पढ़ाई छोड़ देने वाली स्मृति ईरानी का है. टीवी ऐक्ट्रैस रहीं स्मृति का स्टूडियो से ले कर संसद तक का सफर किसी धारावाहिक सरीखा ही ड्रामैटिक था.

सुंदर सलोनी तीखे नैन नक्श वाली महत्वाकांक्षी इस युवती ने कैरियर की शुरुआत छोटेमोटे मौडलिंग शूट से की थी. इस के पहले वे मेकडौन्ल्स में वेट्रैस हुआ करती थीं, ग्राहकों की टेबल पर पिज्जा भी वे सर्व करती थीं और टेबल पर पोंछा लगाने में भी उन्हें कोई शर्म यह झिझक महसूस नहीं होती थी. एक सौंदर्य प्रतियोगिता में हिस्सा लेने उन्होंने अपने पिता से 1.5 लाख रुपए उधार लिए थे जिन्हें चुकता करने वे इस तरह के काम करती थीं.

एकता कपूर के 2000 के लोकप्रिय टीवी सीरियल ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ से घरघर में छा जाने वाली स्मृति ने साल 2003 में भाजपा ज्वाइन की थी. इस सीरियल से उन की पहचान एक परंपरागत हिंदू स्त्री की बनी थी जो माथे पर बड़ी बिंदी लगाती है, सलीके से सर ढके साड़ी पहनती है और तुलसी पूजा सहित तमाम हिंदू धार्मिक मान्यताओं और कर्मकांडों मसलन पूजापाठ वगैरह का पालन करती है.

लेकिन धार्मिक बहू के चुनावी रोल को जनता ने नकार दिया था. स्मृति ईरानी ने साल 2004 का लोकसभा चुनाव दिल्ली की चांदनी चौक सीट से दिग्गज कांग्रेसी कपिल सिब्बल के खिलाफ लड़ा था और हार गई थीं. अकेली स्मृति ही नहीं बल्कि समूची भाजपा दुर्गति का शिकार इस चुनाव में हुई थी.

अधिकतर लोग इस गलतफहमी का शिकार हैं कि स्मृति को मोदीशाह राजनीति में लाए थे लेकिन इस बात को हर कोई भूल चुका है कि 2004 की हार के बाद स्मृति नरेंद्र मोदी को गोधरा कांड का जिम्मेदार मानते उन के इस्तीफे की मांग को ले कर उन के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठ गई थी. हालांकि कुछ ही घंटों में भाजपा हाई कमान ने उन्हें मैनेज कर लिया था जिस के चलते उन्होंने अपना बयान और विरोध दोनों वापस ले लिए थे. दरअसल में उन्हें राजनीति में लाने का श्रेय अपने दौर के धाकड़ भाजपाई दिग्गज प्रमोद महाजन को जाता है जिन की संदिग्ध हालातों में 2006 में मौत हो गई थी. इस के बाद स्मृति की गिनती अटल खेमे में शुमार होने लगी थी.

यह भाजपा का संक्रमण काल था क्योंकि अटल युग ढलान पर था और पार्टी में नए चेहरों का टोटा था. खासतौर से महिला नेताओं के मामले में उस के पास उमा भारती और सुषमा स्वराज के अलावा कोई और जमीनी लोकप्रिय चेहरा नहीं था. इस वक्त तक क्योंकि सास भी …..की तुलसी विरानी शहरी मध्यमवर्गीय परिवारों में दैनिक चर्चा का विषय बन चुकी थी. ऐसे में पार्टी संगठन ने स्मृति की लोकप्रियता को भुनाने न केवल पार्टी में ले लिया बल्कि उन्हें राज्यसभा में भी भेज दिया.

यह मनमोहन सरकार का दौर था इसलिए स्मृति जैसे पैराशूट नेताओं की भूमिका बेहद सिमट गई थी. लेकिन साल 2014 का लोकसभा चुनाव पार्टी ने उन्हें अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ लड़ाया तो वे फिर से चर्चा में आ गई थीं. हालांकि यह चुनाव उम्मीद के मुताबिक वे हार गईं थीं इस के बाद भी मोदी ने उन्हें इनाम या बख्शीस कुछ भी कह लें से नवाजते अपने मंत्रिमंडल में शामिल कर उन का कद बढ़ाया था. इस के पहले न्यूज चैनल्स पर बतौर भाजपाई प्रवक्ता उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बना ली थी.

2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी शाह की जोड़ी ने फिर से स्मृति पर दांव खेला और इस बार यह दांव कामयाब रहा. उम्मीदों और अनुमानों को झुठलाते हुए स्मृति तकरीबन 55 हजार वोटों से जीतीं तो भगवा गैंग ने उन्हें हाथोंहाथ लेते फिर केंद्रीय मंत्री बनाया. इस हार से राहुल गांधी का कद भले ही छोटा न हुआ हो लेकिन स्मृति का इतना जरूर बढ़ गया था कि उन की गिनती भाजपा के टौप 10 नेताओं में होने लगी थी.

लेकिन व हैसियत पहले मानव संसाधन फिर सूचना एवं प्रसारण और इस के बाद कपड़ा मंत्री बनी स्मृति कुछ खास नहीं कर पाई. उलटेसुलटे बयान देती रहीं.

स्मृति की सब से ज्यादा भद्द उस वक्त पिटी थी जब उन्होंने तथ्यात्मक खामी यानी गलत रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों को सजा देने वाला सर्कुलर जारी किया था. यह कितनी अलोकतांत्रिक और असंवैधानिक हरकत थी इस का अंदाजा चंद घंटों की प्रतिक्रिया से ही सरकार को लग गया था कि कई मीडिया समूह जिन में भक्त भी शामिल हैं इस का जोरदार विरोध करने की तयारी में हैं लिहाजा पीएमओ के दखल के चलते उस ने तुरंत ही इसे वापस ले लिया था.

इस से पहले उन की भी डिग्री विवादों से घिर गई थी. दरअसल में स्मृति ने पहले चुनाव के शपथ पत्र में दिल्ली यूनिवर्सिटी से खुद के आर्ट ग्रैजुएट होने की बात कही थी. लेकिन 2013 के शपथ पत्र में उन्होंने खुद को दिल्ली के ही स्कूल औफ ओपन लर्निंग से बीकाम पार्ट वन की परीक्षा पास करने की जानकारी दी थी. उन्होंने हलफनामे में साफसाफ लिखा था कि वे ग्रैजुएट नहीं हैं क्योंकि 3 साल का डिग्री कोर्स कम्प्लीट नहीं किया है.

2024 का लोकसभा चुनाव स्मृति ईरानी ने फिर से अमेठी से लड़ा लेकिन इस बार कांग्रेस की चालाकी का शिकार हो गईं जिसने अपने एक मामूली कार्यकर्त्ता किशोरीलाल वर्मा को टिकट दे दिया. इस के पीछे कांग्रेसी तर्क यह था कि अब चुनाव लेवल का होगा यानी स्मृति ईरानी की हैसियत इतनी गिरी हुई आंकी गई कि राहुल का उन के खिलाफ लड़ना जिल्लत और जलालत की बात होती लिहाजा उन के लेवल का उम्मीदवार उतार दिया.

यह चुनाव स्मृति 1 लाख 67 हजार से भी ज्यादा वोटों से हारीं तो फिर किसी ने उन की सुध नहीं ली. क्योंकि वैसे भी भाजपा 234 सीटें देख सकते में आ गई थी खासतौर से उत्तरप्रदेश में तो उसे लेने के देने पड़ गए थे. वेटर से एक्टर और लीडर तक का सफर तय करने वाली स्मृति अब फिर से क्योंकि सास भी …से वापसी कर रही हैं लेकिन अब किसी की दिलचस्पी उन में या इस सीरियल में नहीं रह गई है.

उमा भारती को राजनीति ने बहुतकुछ दिया लेकिन वे कुछ खास कर नहीं पाईं, इसलिए हाशिए पर हैं. नरेंद्र मोदी की अनदेखी भी उन्हें महंगी पड़ी.

मोदी की अनदेखी का शिकार उमा

दैनिक भजनआरती करने वालों को अकसर यह दोहा गाते सुना जा सकता है जा पर कृपा राम की होय, ता पर कृपा करे हर कोय. इस दोहे में राम की जगह मोदी नाम भर दिया जाए तो स्मृति ईरानी सहित भाजपा के दर्जन भर से ज्यादा नेताओं की मौजूदा हालत देख कहा जा सकता है कि जिस पर मोदी की कृपा हो उस पर हर कोई कृपा करता है यानी जो मोदी की अनदेखी का शिकार हो गया उसे कोई नहीं पूछता स्मृति ईरानी और उन के बाद उमा भारती इस का अपवाद नहीं हैं.

स्मृति ईरानी की तरह ही केंद्रीय मंत्री और मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रही साध्वी उमा भारती भी अपने मूल व्यवसाय धर्म और आध्यात्म की तरफ वापस लौटती दिखाई दे रही हैं. हालांकि अब बाजार तरहतरह के नएनवेले कथाकारों और प्रवचनकारियों से भरा पड़ा है इसलिए यह सोचने की कोई वजह नहीं कि अब से कोई 45 – 50 साल पहले की तरह उमा पांडाल में बैठ कर गीतारामायण या भागवत बांचेंगी. लेकिन धर्म और आध्यात्म का मोह उन की बातों से साफ झलकता है. जाहिर है इसलिए कि वे भी राजनीति के मैदान से बाहर की जा चुकी हैं.

उमा के साथ भी दिक्कत यह है कि वे भी बहुत ज्यादा शिक्षित नहीं हैं. इस के बाद भी वे चमत्कारिक हिंदुत्व की बात नहीं करतीं. वैचारिक हिंदुत्व (जो दरअसल में एक परिकल्पना है) की भी अलिफ बे भी वे नहीं जानती. जो हिंदुत्व उन की बातों से झलकता है वह आरएसएस के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद से काफी हद तक मेल खाता है कि देश में कुछ और हो न हो ब्राह्मण पुजते रहना चाहिए, मंदिरों का विकास होते रहना चाहिए, तीर्थयात्राएं फलतीफूलती रहनी चाहिए.

इस में कोई शक नहीं कि एक वक्त में भाजपा और आरएसएस की वह बहुत बड़ी जरूरत मजबूरी की हद तक थीं. 90 के दशक के राममंदिर आंदोलन की अगुआई करने वालों में वे अग्रणी थीं और बच्चाबच्चा राम का जन्मभूमि के काम का और एक धक्का और दो बाबरी मसजिद तोड़ दो का नारा बुलंद करती रहती थीं.

अपने आक्रामक तेवरों और जिद्दी स्वभाव होने के चलते उमा भारती राजनीति में कभी सहज नहीं हो पाई. इस में भी कोई शक नहीं कि 2003 में मध्यप्रदेश में भाजपा की वापसी में उन का रोल अहम था लेकिन इस की वजह उन का जनप्रिय नेत्री होना कम दिग्विजय सरकार के खिलाफ जनाक्रोश को सलीके से भुना लेना ज्यादा था.

हुबली कांड के चलते वे कम समय मुख्यमंत्री रह पाई. उन की जगह बाबूलाल गौर को इस आश्वासन के साथ मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया था कि अदालती मामला सुलझते ही वापस मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा. लेकिन शिवराज सिंह जो एक दफा मुख्यमंत्री बने तो अंगद के पांव की तरह कुर्सी पर जमे रहे, जिन्हें जैसेतैसे रुखसत कर मोहन यादव को गद्दी भाजपा आलाकमान ने आरएसएस के इशारे पर सौंपी.

2003 में सोनिया गांधी जब यूपीए की नेता चुन ली गईं थी और उन के और प्रधानमंत्री की कुर्सी के बीच चंद कदमों का ही फासला बचा था, तब सुषमा स्वराज के साथ अपना सर मुड़ा लेने का एलान उमा भारती ने भी किया था. इस पर सोनिया ने समझ और त्याग की अनूठी मिसाल कायम करते डाक्टर मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बना कर इन दोनों नेत्रियों को घुटमुंडा होने से बचा लिया था.

हुबली की अदालत से सितंबर 2004 को ही बरी होने के बाद जब उन्हें वापस मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री वादे के मुताबिक नहीं बनाया गया तो अपनी अलग भारतीय जन शक्ति पार्टी उन्होंने बना ली थी जो चुनाव में कोई करिश्मा नहीं दिखा पाई तो 2011 में वे भाजपा में लौट गईं थीं. इस वक्त उन्होंने जातिगत राजनीति की नाकाम कोशिश भी की थी.

उमा भारती की ठसक कभी किसी सबूत की मोहताज नहीं रही. साल 2003 में भाजपा की एक मीटिंग में वे लालकृष्ण आडवाणी की मौजूदगी में पार्टी पर बरसी थीं और गुजरात जा कर एक प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने नरेंद्र मोदी को विकास नहीं बल्कि विनाश पुरुष कहा था तब मोदी की हैसियत उमा के सामने प्यादे सरीखी थी.

2014 के बाद मोदी लगातार ताकतवर और मजबूत होते गए लेकिन आरएसएस की इस लाडली को नजरंदाज करने की हिम्मत नही जुटा पाए. साल 2014 का लोकसभा चुनाव उन्होंने झांसी सीट से जीता था और मोदी को उन्हें न चाहते हुए भी मंत्रिमंडल में शामिल करना पड़ा था.

पर इस के बाद के चुनावों में उन्हें टिकट नहीं दिया गया. इस पर वे खामोश रहीं और संयास, गंगा सफाई अभियान वगैरह की बात करतीं रही. लेकिन अबतक उन के बोलने न बोलने को कोई नोटिस नहीं करता था. आज भी उमा कुछ बोलती हैं तो उसे मीडिया भी भाव नहीं देता. इंदौर में दूषित पानी से हुई मौतों पर उन्होंने इसे महापोर इंदौर पुष्यमित्र भार्गव का पाप बताते दंड की मांग की थी. लेकिन बात वही लागू हुई कि जिस की भाजपा के रामलक्ष्मण न सुनें उस की कोई नहीं सुनता. अब फुर्सत में बैठी कल की यह फायर ब्रांड नेत्री ट्वीटट्वीट खेलती रहती हैं. उन के इर्दगिर्द दीदी कहने वालों की भीड़ मोहन यादव को भैया कहते घेरती है तो तय है उमा को कसक तो होती होगी.

Marginalized Leaders (4)
रविशंकर प्रसाद भाजपा की बुद्धिजीवी लौबी के प्रमुख नेताओं में से एक हैं, मोदीशाह को खतरा लगा तो उन्हें मागदर्शक मंडल में डाल दिया गया.

बुद्धिजीवी होने की सजा भुगतते प्रसाद

कसक तो पटना के संपन्न कायस्थ परिवार के रविशंकर प्रसाद को भी खूब होती होगी जो सिर्फ इस वजह से हाशिए पर पड़े हैं कि वे मोदी शाह के यस मेन नहीं रह पाए. जबकि उन की पृष्ठभूमि राजनैतिक है उन के पिता ठाकुर प्रसाद जनसंघ के संस्थापक सदस्यों में से एक थे और पेशे से वकील भी थे.

पिछला लोकसभा चुनाव रविशंकर ने पटना साहब सीट से कांग्रेस के अंशुल अविजित को 1 लाख 53 हजार से भी ज्यादा वोटों से हरा कर जीता था. तब उम्मीद की जा रही थी कि एक बार फिर कानून मंत्रालय उन्हें ही दिया जाएगा. लेकिन यह जिम्मेदारी मोदी ने किरण रिजिजू को सौंपी फिर अर्जुन राम मेघवाल को कानून मंत्री बना दिया गया क्योंकि किरण रिजिजू भी सरकार और न्यायपालिका के बीच पुल का काम नहीं कर पा रहे थे.

इस के पहले 2014 में राज्यसभा में रहते रविशंकर प्रसाद को पहली दफा कानून मंत्री बनाया गया था तब नरेंद्र मोदी की यह मजबूरी थी कि मंत्रिमंडल में पढ़े लिखे जानकार और बुद्धिजीवी मंत्री भी दिखें अब यह जरूरत और मजबूरी खत्म हो गई है.

पेशे से सुप्रीम कोर्ट के सीनियर लायर रविशंकर का एक गुनाह यह भी है कि वे कानूनविद होने के नाते किसी भी स्तर पर भगवा गैंग की नीतियों के मुताबिक संविधान से असहमति नहीं जता पाते उन की इमेज दरअसल में एक संतुलित नेता की भी है जबकि मोदी शाह को बुद्धिजीवी नहीं बल्कि बुद्धूजीवी नेता चाहिए. कानून मंत्री अकसर प्रधानमंत्रियों के निशाने पर रहते आए हैं चाहे वे अटल युग के दिग्गज रामजेठमलानी हों या इंदिरा युग के शांति भूषण हों वजह कानून मंत्री सीमित दायरे में न कुछ सोच पाता न कुछ कर पाता.

हालांकि रविशंकर कभीकभार बयान या किसी सामयिक मुद्दे पर प्रतिक्रिया दे देते हैं लेकिन वह किसी के लिए कोई खास माने नहीं रखती. खाली वक्त वे अध्ययन और थोड़ीमोड़ी वकालात में गुजार रहे हैं. नए साल में खबरों में उन के दिल्ली स्थित आवास में मकर संक्राति के दिन आग लगने की खबर सुर्खियों में रही थी. इस के एक दिन पहले उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर सवाल उठाया था कि ईडी की आइपैक पर छापेमारी के दौरान क्यों एक फाइल उन्हें खुद निकालना पड़ी थी. इस पर भी किसी ने नोटिस नहीं लिया था क्योंकि गोदी और गैरगोदी मीडिया भी जानता समझता है कि रविशंकर प्रसाद इन दिनों हाशिए पर हैं.

Marginalized Leaders (3)
मनीष तिवारी जब तब मोदी सरकार की कुछ नीतियों से सार्वजनिक सहमति जताने की सजा ज्यादा भुगत रहे हैं.

मनीष को महंगी पड़ रही असहमति

नेताओं को हाशिए पर रखने का रिवाज कांग्रेस में भी बराबरी से है. इन में अहम नाम मनीष तिवारी का ठीक वैसे ही है जैसा भाजपा में रविशंकर प्रसाद का है. पेशे से वकील मनीष पिछला लोकसभा चुनाव लुधियाना सीट से जीते थे. वे छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय रहे और स्मृति ईरानी की तरह टीवी डिबेट में धुआंधार तरीके से बोलते नजर आते थे. उन की इमेज पारंपरिक कांग्रेसी नेताओं से थोड़ी अलग हट कर है. लेकिन वह दिग्विजय सिंह और शशि थरूर जैसी भी नहीं है जो ऋषिमुनियों की तरह अपनी ही पार्टी को श्राप देने से नहीं हिचकते.

मनीष तिवारी जब तब मोदी सरकार की कुछ नीतियों से सार्वजनिक सहमति जताने की सजा ज्यादा भुगत रहे हैं. मसलन, अग्निवीर योजना का खुलेतौर पर समर्थन करने के अलावा इस योजना को वापस लेने की मांग वाले विपक्ष के ज्ञापन पर दस्तखत करने से मना कर देना.

हिंदुत्व पर भी पार्टी की गाइड लाइन से हट कर बोलना कांग्रेस हाई कमान को नागवार गुजरा था नागवार तो पिछले साल अगस्त में यह इशारा करना भी रहा था कि कांग्रेस में सांसदों को बोलने की इजाजत नहीं है. दरअसल में वे औपरेशन सिंदूर के बाद केंद्र सरकार के प्रतिनिधिमंडल में शशि थरूर के बाद दूसरे कांग्रेसी सदस्य थे जिसे सरकार ने दुनिया भर में समर्थन बटोरने बनाया था. मनीष इस विषय पर संसद में बोलना चाहते थे लेकिन उन्हें आलाकमान ने इजाजत नहीं दी थी.

साल 2021 में उस वक्त खासी चर्चा हुई थी जब उन्होंने यह कह डाला था कि वह कांग्रेस में हिंदू धर्म बनाम हिंदुत्व की बहस को ले कर असमंजस में हैं. बकौल मनीष वह कांग्रेस में इसलिए हैं कि वे नेहरूवादी आदर्शो में विश्वास करते हैं कि धर्म एक निजी मामला है हर किसी को अपनी जिंदगी में अपने धर्म का पालन करने और उस के प्रचारप्रसार का अधिकार है.

धर्म और हिंदुत्व के बारे में आमतौर पर सवर्ण कांग्रेसियों और उन में भी ब्राह्मण नेताओं की राय डाक्टर राजेंद्र प्रसाद से ले कर शशि थरूर तक की यही रही है कि उसे राजनितिक मुद्दा न बनाया जाए. यह राय इसलिए बेमानी है कि भाजपा धर्म और कट्टर हिंदुत्व की राजनीति करते ही सत्ता तक पहुंची है और नरेंद्र मोदी खालिस कर्मकांडी राजनीति ही करते हैं. इस का और आरएसएस का विरोध राहुल गांधी अकसर करते रहते हैं कि हिंदू धर्म और हिंदुत्व दो अलगअलग चीजें हैं राहुल गांधी से बहुत दिनों तक असहमत रहने का सीधा सा मतलब है अपने लिए ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरह कोई दूसरा ठिया ढूंढ लेना. हालांकि मनीष तिवारी का इरादा हालफिलहाल ऐसा कुछ लग नहीं रहा लेकिन कब उन के भीतर का भी ब्राह्मण सर उठा ले कहा नहीं जा सकता.

Marginalized Leaders (1)
आनंद शर्मा कांग्रेस में रहते भगवा जबां बोलने लगे थे, इसलिए सिरदर्द भी बनने लगे थे, अब दोराहे पर खड़े हैं.

अधर में आनंद

मनीष तिवारी की तरह दूसरे ब्राह्मण नेता हैं जिन्हें लगता है कि कांग्रेस पार्टी में सुधार की गुंजाइशें और नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत है. ऐसा उसे ही लगता है जो खुद को कांग्रेस में मिसफिट पाने लगता है. पिछला लोकसभा चुनाव अपने गृह राज्य हिमाचल प्रदेश की कांगड़ा सीट से हारे आनंद को कांग्रेस ने उपकृत करने में कोई कमी कभी नहीं छोड़ी. उन्हें राज्यसभा में भी लिया गया और मंत्री पद से भी नवाजा गया. लेकिन वे कभी जमीनी नेता नहीं रहे.

कांग्रेस के भीतर बदलाब की मांग करने वाले जी-23 समूह के भी सदस्य वे रहे और अति उत्साह में आ कर राहुल गांधी की नीतियों और जातिगत राजनीति का विरोध भी उन्होंने किया था. विदेश मामलों के विशेषज्ञ माने जाने वाले आनंद शर्मा तभी से हाशिए पर हैं जब उन्होंने जाति आधारित जनगणना को बेरोजगारी का समाधान मानने से इंकार कर दिया था लेकिन इस के बाबत कोई ठोस तर्क उन के पास नहीं थे. मकसद सिर्फ सुर्खिया बटोरना था जो उन्हें उम्मीद के मुताबिक नहीं मिली और न ही कांग्रेस ने उन पर कोई एक्शन लिया. कांग्रेस आलाकमान शायद यह चाहता था कि वे खुद ही चले जाएं तो बेहतर है लेकिन नहीं गए तो अपनी ताकत दिखाने का मौका उन्हें दिया गया कि लोकसभा चुनाव जीत कर दिखाओ तो जानें पर वे हार गए.

अब आनंद शर्मा के सामने एक अनिश्चित भविष्य खड़ा है और सारे विकल्प भी खुले हैं जिन में से एक भाजपा में जाने का भी है पर भाजपा ने जब दिग्गज कमलनाथ को अपनी पार्टी के काबिल नहीं समझा तो आनंद शर्मा का कद तो उन से आधा भी नहीं है. अब देखना दिलचस्प होगा कि वे क्या करेंगे.

Marginalized Leaders (2)
मेनका गांधी को परिवार से छल करने का इनाम तो भाजपा ने दिया लेकिन जब असर खोने लगीं तो बेटे वरुण सहित उसे किनारे कर दिया.

तपस्या कर रहीं मेनका गांधी

देखना तो यह भी कम दिलचस्प नहीं होगा कि मेनका गांधी अब क्या करेंगी क्योंकि राजनीति तो उन की भाजपा ने खत्म सी कर दी है. बची समाजसेवा तो उस में भी उन का मन नहीं लग रहा ऐसा भी अभी नहीं दिख या लग रहा कि अपनी ससुराल से विद्रोह और धोखा देने का कोई गिल्ट वे महसूसती हों. गांधी नेहरू परिवार से उन के बिगड़े संबंध और खटास कभी किसी सबूत की मोहताज नहीं रही जिस के बारे में पाठक सरिता के जनवरी 2026 प्रथम अंक में विस्तार से पढ़ चुके हैं. शीर्षक – अलग धर्म में शादी बच्चों का क्या होगा धर्म.

भाजपा ने मेनका गांधी के बारे में भी वही रुख अपना रखा है जो स्मृति ईरानी रविशंकर प्रसाद और उमा भारती सहित डेढ़ दर्जन नेताओं के बारे में अपनाया हुआ है कि हम निकालेंगे नहीं अपने से जाना हो दरवाजे खुले हैं.

मेनका गांधी संजय गांधी की पत्नी होने के नाते कभी भाजपा और आरएसएस की नीतियों रीतियों से इत्तफाक नहीं रख पाई लेकिन जो उपकार भगवा गैंग ने उन पर किए थे उन के चलते विरोध भी उन्होंने नहीं किया और कभी किया भी तो वह बहुत छोटे लेवल का रहा मसलन दीवाली पर जब भगवा गैंग पटाखे जलाने का देशव्यापी आव्हान कर रही थी तब मेनका कह रहीं थीं कि पटाखे चलाने वाले देशद्रोही हैं. क्योंकि इन से प्रदूषण फैलता है लोगों को सांस लेने में घुटन होती है.

सुप्रीम कोर्ट में कुत्तों के मामले में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की खिंचाई यह कहते की थी कि उस ने पूरे भारत में नफरत का माहौल बना दिया है. जजों ने जो किया वह गलत है. इस बयान के भी कोई खास माने नहीं थे लगता ऐसा है कि मेनका अपनी हाजिरी और मौजूदगी बनाए रखना चाहती हैं लेकिन सवाल यह है कि कब तक सवाल यह भी है कि बेटे वरुण गांधी का अब क्या होगा जो मां के पल्लू से चिपकेचिपके ही राजनीति करते रहे.

मेनका की भद्द लोकसभा चुनाव में स्मृति ईरानी से कम नहीं पिटी थी जब सुल्तानपुर सीट से सपा के रामभुआल निशाद के हाथों 43174 वोटों से हार का मुंह उन्हें देखना पड़ा था वरुण को तो भाजपा ने टिकट ही नहीं दिया था. केंद्रीय मंत्री रह चुकी मेनका के पास अब पर्यावरण और पशु सुरक्षा के लिए बयान रुपी काम ही बचते हैं जो एक तरह की निरर्थक तपस्या ही है. अपने परिवार से छल करने का इनाम भगवा गैंग ने उन्हें दिया था तो अब सजा भी दे दी है. Marginalized Leaders

Satirical Story In Hindi : बड़ा फील करने के अवसर पगपग पर

Satirical Story In Hindi : हर आदमी बड़ा होना, बड़ा बनना चाहता है. लेकिन हर आदमी बड़ा बन नहीं सकता. यदि सभी बड़े बन जाएं तो फिर कोई बड़ा नहीं रहेगा क्योंकि कोई छोटा नहीं बचेगा. आदमी जो मुकाम हासिल नहीं कर पाता है, वह उस के अवचेतन में बैठ जाता है और समयसमय पर प्रकट होता है. कोई सोते में सपने देखता है तो कोई जागते में देखता है.

वैसे, जो बड़ा नहीं बन पाया उस के लिए हर जगह अवसर उपलब्ध हैं कि वह अपनेआप को दूसरों से बड़ा फील करे. एक उदाहरण ले लें, एक प्रसिद्ध गायक का कार्यक्रम शहर के औडिटोरियम में चल रहा था. हजारों की भीड़ होने से जगह की मारामारी हो रही थी. कुरसियां भीड़ से काफी कम थीं. जो पहले आ गए वे कुरसी पा गए. जो देर से आए उन्हें यहांवहां खड़ा होना पड़ा. अब जो कुरसी में बैठे थे वे इन खड़े लोगों से अपने को बड़े समझने लगे. यह भाव उन में ज्यादा झलक रहा था जिन की कुरसी के बिलकुल पास 10-15 लोग खड़े थे. वे अब कार्यक्रम कम देख रहे थे, खड़े लोगों को ज्यादा देख रहे थे. यहां अवसर था छोटे होते हुए भी अपने को बड़ा फील करने का. एकदो चवन्नी के चलन से बाहर होने के बाद भी अपनेआप को हजार रुपए के सिक्के के बराबर समझ रहे थे. बड़े होने के अवसर बड़ा न होते हुए भी हर जगह हैं.

दूसरी स्थिति लीजिए, आप भद्र पुरुष हैं. अचानक शहर से बाहर जाना पड़ा. ट्रेन में आरक्षण नहीं मिला. आप को स्लीपर में बिना आरक्षण के जाना पड़ा. ट्रेन में खचाखच भीड़ थी. कई लोग अर्थ पर थे, मतलब फर्श पर. आप जिस बर्थ पर बैठे, वह आरक्षित थी. बैठे हुए सज्जन ने पहले तो कोई प्रतिक्रिया नहीं की लेकिन बाद में पूछ बैठे कि आप का बर्थ नंबर कौन सा है. आप ने कहा कि अभी तो टीटीई का इंतजार कर रहे हैं. आप ने उसे बड़ा फील करने का अवसर प्रदान कर दिया.

वह बड़ा फील कर रहा था लगातार और आप उस के रहमोकरम पर थे. आप जब कभी अर्थ पर बैठे लोगों और कभी इस को देखते तो आप को लगता कि वह आप से बड़ा है. उस के चेहरे के हावभाव से ऐसा लगता भी था. ऐसे ही स्थिति सिटी बसों में भी बनती है यदि आप को खड़ा होना पड़े और कोई बैठा हो. लेकिन यहां बड़ा होने का खयाल बहुत कम समय के लिए रहता है. जो आज सीट पर बैठा है वह कल खड़ा हो कर छोटा फील कर सकता है.

छोटा होते हुए बड़ा फील करने के बड़े अवसर हैं. आप सिनेमा देखने सपरिवार गए हैं. लाइन में लगे हैं टिकट लेने के लिए और आप के पहले वाले को टिकट मिल गया है. आप के आते ही टिकटखिड़की धड़ाम से बंद हो जाती है. अब जिसे टिकट मिल गया है उस के चेहरे पर मुसकान है. आप के चेहरे पर मायूसी. वह बड़ा फील कर रहा है. छोटा आदमी हो सकता है, फेरी लगा कर पेट भरता हो या गुब्बारे बेचता हो लेकिन इस समय उस का मुंह प्रसन्नता की हवा से गुब्बारे की तरह फूल कर कुप्पा हो गया है. आज सपरिवार वह इस हिट मूवी को देखेगा और आप टिकटरूपी खेल में हिटविकेट हो गए हैं. आप की पत्नी का भी मुख फूल कर कुप्पा हो गया है लेकिन यह नाराजगी की हवा भरने से हुआ है.

यही तत्काल के आरक्षण की लाइन में भी होता है. आप सुबह 6 बजे से जा कर लाइन में लग गए हैं. आप के पहले 4 बजे से ही कई लोग लगे हैं. 8 बजे खिड़की छपाक से खुलती है, काम शुरू हो गया है. कैसे पता चला? रेलवे के चरमराते हुए डौट मैट्रिक्स प्रिंटर की कर्णभेदी ध्वनि लय में सुनाई दे रही है.

लाइन में सब बराबर हैं रिकशे वाला, आटो वाला, फेरी वाला, बाबू, अधिकारी, व्यापारी, प्रोफैशनल. लेकिन आप के नंबर आने के पहले 4 आदमी और हैं. आप व पीछे के सभी हाथ मलते रह गए जब छपाक से खुली खिड़की धड़ाम से बंद हो गई. ऐसी कि लगा कि धड़कन न बंद हो जाए. अब जो आदमी आरक्षण करवा कर जा रहा था, वह आप जैसे छोटे रह गए लोगों के सामने अपने को बड़ा समझेगा ही.

आप बड़े बाप की औलाद हो, कार से कालेज आते हो. आप के कालेज का आज रिजल्ट आया है. आप सैकंड ग्रेड में आए हैं जबकि रामरतन मोची का साइकिल में आने वाला लड़का फर्स्ट ग्रेड में है. अब उस का समय है बड़ा फील करने का.

बड़ा फील करने का अवसर तो किसी होटल बुक करते समय भी उपलब्ध है. सीजन है, होटल्स बुक हैं. पर्यटकों से भरे पड़े हैं. आप भी पहुंच गए हैं. होटलों के चक्कर काट रहे हैं. कहीं कमरा नहीं मिला. 7वीं होटल में आए हैं. एक ही कमरा बचा है. एक अनार और 4 बीमार, 3 और लोग कमरे को खोजते आ गए हैं. एक ज्यादा व्यावहारिक निकला. ऐसे मौके पर उस ने बिना कमरे को देखे ही हां कर बुक कर दिया. अब आप तीनों छोटों के सामने वह अंदर ही अंदर मुसकराता हुआ बड़ा फील कर रहा है.

भगवानों की दुकानों में भी लोग अपने को बड़ा फील करते हैं या करवाते हैं. कहने को यहां सब बराबर होने चाहिए लेकिन कई लोग खुद दुकानदार पंडों को पैसा दे कर उन से वीआईपी पास बनवा लेते हैं और लाइन से हट कर सीधे पूजा के प्रोडक्ट के सामने पतली गली से पहुंच जाते हैं. श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखते ही रह जाती है और ये अपने को बड़ा फील करने लगते हैं.

बड़ा फील करने के अवसर हर जगह हैं. बड़ा बनना बड़ा कठिन है, बड़ा फील करना बड़ा आसान है. बस, मौका मिलना चाहिए. ठीक है समय ने आप को अभी तक छोटा ही रखा है. लेकिन बड़ा फील करने, थोड़ी देर के लिए बड़ा बन जाने के अवसर पगपग पर हैं.

वैसे भी, इस देश में आम आदमी छोटा ही रह जाता है ताउम्र. यहां बड़ा माना जाता है उस को जिस के पास धनदौलत हो, भले ही वह घोटालेबाजी से, कालाबाजारी से या सरकारी धन में पलीता लगा कर की गई कमाई हो. और यहां बड़ा बनने के अवसर अधिकारी, ठेकेदार, नेता व दलालों को ज्यादा मिलते हैं. तो फिर, बड़ा फील करने के जितने अवसर मिलते हैं उन को एंजौय करने में ही समझदारी है. Satirical Story In Hindi

Social Story in Hindi : संदूक में लाश – हत्या की आंखों देखी कहानी एक पुलिसकर्मी की जुबानी

Social Story in Hindi : बात तब की है जब मैं पंजाब के एक जिले का एसपी था. मेरे इलाके में जो गांव आते थे, उन में एक गांव सादतपुर था. एक दिन इसी गांव का नंबरदार थाने आया. उस के साथ एक जवान लड़का था, जो कपड़ों से खातेपीते घर का लग रहा था. नंबरदार से पता चला कि उस लड़के का नाम सांवल है और वह एक संपन्न जमींदार है.  नंबरदार ने बताया था कि सांवल की घरवाली गुलबहार उर्फ गुल्लो साल से लापता है.

मैं ने थोड़ा नाराज हो कर कहा, ‘‘तुम्हारी घरवाली कल से लापता है और तुम रिपोर्ट लिखवाने आज आ रहे हो.’’

‘‘इज्जत की बात है आगा जी,’’ सांवल ने कहा, ‘‘पहले हम ने उसे अपनी रिश्तेदारियों में ढूंढा, उस के घर भी पता किया. उस के बारे में कुछ बताने के बजाय उस के मांबाप ने उलटा हमारे ऊपर ही आरोप लगा दिया कि हम ने उसे जानबूझ कर गायब किया है. जब वह कहीं नहीं मिली तो रिपोर्ट लिखाने आ गया.’’

‘‘शादी को कितने दिन हुए हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘3 महीने हुए हैं जी.’’ सांवल ने बताया.

‘‘किसी से दुश्मनी तो नहीं है?’’

‘‘नहीं जी, गांव में किसी की क्या मजाल जो हमारी तरफ नजर उठा कर देख ले.’’ सांवल ने अकड़ कर कहा.

‘‘फिर भी किसी पर कोई शक.’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी, मुझे शक है कि शादी से पहले उस के किसी से अवैध संबंध थे. लगता है, उसी के साथ भाग गई है?’’

‘‘घर से कोई रकम, गहने आदि गायब हैं क्या?’’ मैं ने पूछा.

‘‘घर में जितने भी गहने और महंगे कपड़े थे, वे सब गायब हैं. उस के पैरों में सोने की वजनी झांझर भी थी, जो मैं ने पहनाई थी, उन्हें भी ले गई.’’

मैं ने गुल्लो की गुमशुदगी दर्ज कर उन्हें वापस भेज दिया. इश्तहार वगैरह दे कर मैं इस केस के बारे में सोचने  लगा. मुझे यह केस प्रेमप्रसंग का लग रहा था.

एक सिपाही को बहलोलपुर भेज कर मैं ने गुल्लो के मातापिता को बुलवा लिया. वे दोनों काफी घबराए हुए थे. मैं ने उन्हें तसल्ली दी. गुल्लो की मां का नाम सरदारा और बाप का नाम करमू जाट था.

मैं ने उन से गुल्लो के गायब होने के बारे में पूछा तो गुल्लो की मां ने कहा, ‘‘हमारी बेटी को खुद सांवल ने गायब कराया है. गुल्लो जबान की तेज थी. हो सकता है किसी बात पर कोई झगड़ा हुआ हो और सांवल ने उसे मार दिया हो.’’

मैं ने उन्हें यह कह कर जाने दिया कि अगर उन की जरूरत हुई तो उन्हें फिर बुलाऊंगा. मैं ने मुखबिरों को लगा दिया. 2 दिनों बाद एक मुखबिर बहलोलपुर से आया. उस के साथ 30-32 साल की एक औरत थी. मुखबिर ने बताया कि यह औरत गुल्लो के मातापिता के घर साफसफाई का काम करती है.

उस औरत ने बताया कि गुल्लो के शम्स से नाजायज संबंध थे. वह औरत दोनों को अपने घर चोरीछिपे मिलवाती थी. इस के बदले में गुल्लो उसे अच्छे पैसे देती थी. वह औरत जाते समय हाथ जोड़ कर बोली कि उस ने जो कुछ बताया है, उस में उस का नाम नहीं आना चाहिए. मैं ने उसे तसल्ली दे कर भेज दिया.

उस के जाने के बाद मैं ने मुखबिर से पूछा, ‘‘शम्स कहां है, उसे साथ क्यों नहीं ले आए.’’

‘‘वह गांव में नहीं है साहब, वह उसी दिन से गायब है, जिस दिन से गुल्लो गायब हुई है. उस के घर वालों को भी उस का पता नहीं है.’’ मुखबिर ने बताया.

यह सुन कर मेरा संदेह यकीन में बदल गया. इस का मतलब गुल्लो अपने प्रेमी के साथ भाग गई थी. मैं ने मुखबिर से कहा कि वह गांव में ही रहे. 2 दिन गुजर गए, कहीं से कोई सूचना नहीं आई. तीसरे दिन जो सूचना आई, वह अद्भुत थी. दोपहर को पड़ोस के गांव दतवाल से वहां का नंबरदार सारू आया. उस के साथ 2 जवान लड़के भी थे. वे थाने के माहौल से काफी डरे हुए लग रहे थे. उन के हाथों में लोहे का एक संदूक था. उस संदूक में ताला नहीं लगा था. नंबरदार ने संदूक नीचे रखवा दिया.

मैं ने नंबरदार से पूछा, ‘‘ये दोनों कौन हैं और इस संदूक में क्या है?’’

नंबरदार ने बताया, ‘‘ये दोनों मेरे भाई हैं. बड़े का नाम रोशन और छोटे का नाम जैन है. ये दोनों दतवाल गांव में रहते हैं. कल जब ये घर पर नहीं थे तो सुबह के वक्त इन के घर एक आदमी और 2 औरतें आईं. उस समय घर में इन की मां और रोशन की पत्नी हुस्ना थी. औरतों ने पीने के लिए पानी मांगा तो रोशन की मां ने गांव के रिवाज के मुताबिक उन्हें लस्सी दी. उन लोगों के पास लोहे का एक संदूक था, जो उन्होंने घर के बाहर रख दिया था.

औरतों ने बताया था कि वे शादी का सामान खरीदने दतवाल की बाजार आई हैं. जब तक वे बाजार से लौटें, तब तक उन की संदूक वे घर में रख लें. उन औरतों ने अपना नाम और गांव नहीं बताया था. संदूक रख कर वे औरतें उस आदमी के साथ चली गईं.

शाम तक दोनों औरतें नहीं आईं. रोशन और जैन शाम को घर आए तो उन की मां ने संदूक वाली बात बताई. रोशन ने तुरंत बैठक में रखा संदूक देखा. उसे उस में से दुर्गंध आती लगी. उस ने जैसे ही संदूक खोला, दुर्गंध का भभका उस की नाक में समा गया. संदूक में एक औरत की मुड़ीतुड़ी लाश रखी थी.

लाश देखते ही घर वालों के हाथपांव फूल गए. हुस्ना और मां तो थरथर कांपने लगीं. जैसेतैसे रात गुजारी, सवेरा होते ही नंबरदार को बुलाया तो वह दोनों भाइयों और संदूक ले कर थाने गया था.

मैं ने संदूक खुलवाया, उस में 22-23 साल की एक सुंदर लड़की की लाश थी. मैं ने लाश बाहर निकलवाई. मुझे लाश पर एक चीज दिखाई दी, जिस ने मुझे चौंका दिया. वह चीज थी सोने की झांझर. मुझे तुरंत सांवल की वह बात याद आ गई, जो उस ने कही थी कि गुल्लो सोने की झांझर पहने थी.

इस से मुझे लगा कि कहीं यह सांवल की पत्नी गुल्लो की लाश तो नहीं है. मृतका का गला किसी धारदार हथियार से रेता हुआ लग रहा था. उस के सीने पर भी किसी तेज धारदार हथियार का घाव था.

मैं ने रोशन से पूछा कि उस की मां और पत्नी उन औरतों को पहचान लेंगी. रोशन ने कहा, ‘‘साहब, मेरी मां ने बताया था कि जो औरतें आई थीं, उन में से एक के माथे पर काला मस्सा था. लेकिन वह कहां की रहने वाली थीं, यह वह नहीं पूछ पाई थी.’’

मैं ने लाश के फोटो वगैरह खिंचवा कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. रोशन और जैन पर मुझे शक हो रहा था, इसलिए उन्हें मैं ने हवालात में डाल दिया था. यही नहीं, पूछताछ के लिए रोशन की मां और पत्नी हुस्ना को भी बुलवा लिया था. साथ ही एक सिपाही को सांवल को बुलाने के लिए भेज दिया था.

पर वह घर पर नहीं मिला. तब सिपाही ने उस के घर वालों से सख्त लहजे में कहा था कि वह सांवल को थाने में पेश कर दें, नहीं तो सभी के खिलाफ काररवाई की जाएगी. एक सिपाही को बहलोलपुर सांवल की ससुराल भेज दिया था, ताकि लाश की शिनाख्त हो सके.

करीब 2 घंटे बाद गुल्लो की मां और पिता करमू जाट भी थाने आ गए. करमू जाट एक जमींदार था. मैं ने दोनों को मृतका के फोटो और कपड़े दिखाए तो वे चीखचीख कर रोने लगे. इस से मैं समझ गया कि मरने वाली युवती इन की बेटी गुल्लो ही थी. मां रोरो कर यही कह रही थी कि सांवल ने ही उस की बेटी को मारा है.

पोस्टमार्टम होने के बाद लाश मृतका के मांबाप के हवाले कर दी थी, ताकि वे उस का अंतिम संस्कार कर सकें. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया था कि मृतका गुल्लो गर्भवती थी.

जो युवक थाने में संदूक लाए थे, मुझे उन पर तो शक था ही, इस के अलावा मुझे गुल्लो का पति सांवल भी संदिग्ध लग रहा था. इस के अलावा गुल्लो की मां, जो रोतेरोते सांवल पर आरोप लगा रही थी, उस पर भी मैं ने गौर किया. अभी मुझे ऐसा कोई क्लू नहीं दिख रहा था, जिस से केस के खुलने की उम्मीद हो.

मैं इस केस की गुत्थी को जितनी जल्दी सुलझाना चाहता था, उतनी ही यह उलझती जा रही थी. मैं ने हवालात में बंद रोशन और उस के भाई जैन को निकलवा कर उन से ताबड़तोड़ सवाल किए. लेकिन उन से कुछ भी हासिल नहीं हो सका. इस से यही लगा कि इस हत्या में शायद इन का हाथ नहीं है.

अब मैं ने गुल्लो के पति सांवल और उस के प्रेमी शम्स के बारे में विचार किया. दोनों ही लापता थे. मैं ने एक एएसआई को सांवल को गिरफ्तार करने को कहा, साथ ही उस की हवेली की तलाशी लेने को भी कहा. उस का गायब होना मुझे शक में डाल रहा था.

गुल्लो के प्रेमी शम्स की भी कोई सूचना नहीं थी. अब मुझे शक हो रहा था कि कहीं गुल्लो के घर वालों ने शम्स और गुल्लो को एक साथ देख लिया हो, उस के बाद दोनों की हत्या कर दी हो. शम्स की लाश और कहीं डाल दी हो.

सांवल को गिरफ्तार करने जो एएसआई गया था, वह खाली हाथ वापस आ गया. उस ने कहा कि उस की हवेली की तलाशी में कुछ नहीं मिला. उस का इस तरह गायब होना शक को मजबूत कर रहा था. अब मुझे पक्का यकीन हो गया था कि हत्या उसी ने की है.

सांवल ने यह भी बताया था कि उस की पत्नी के शादी से पहले किसी बहलोलपुर के ही युवक से संबंध थे और वह उसी के साथ भाग गई है. मुझे लग रहा था कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सांवल ने गुल्लो और शम्स को मिलते हुए रंगेहाथ पकड़ लिया हो.

देहात में ऐसे अपराध की सजा मौत से कम नहीं होती. गुल्लो के मांबाप से ज्यादा मुझे सांवल पर ही शक हो रहा था. अब सांवल से पूछताछ करनी जरूरी थी.

संयोग से अगले दिन सांवल खुद ही थाने आ गया. उस के साथ नंबरदार भी था. मैं ने डांट कर सांवल से पूछा, ‘‘तुम कहां थे?’’

‘‘मैं डर गया था हुजूर,’’ उस ने बड़ी विनम्रता से कहा, ‘‘मैं तो पहले से ही परेशान इंसान हूं. मेरे साथ बहलोलपुर वालों ने धोखा किया है. मेरी शादी ऐसी लड़की से कर दी, जिस का दिल पहले ही से कहीं और लगा था. उस का तो अपनी गंदी हरकतों के कारण अंत हो गया, लेकिन मेरे लिए मुसीबत खड़ी कर गई. साहब, मैं ने सुना है कि उस की मां थाने आ कर मेरे ऊपर इलजाम लगा रही थी?’’

कुछ कहने के बजाय मैं ने हवालात में बंद रोशन और जैन को बाहर निकलवा कर पूछा, ‘‘क्या यही वह आदमी है, जो तुम्हारे घर संदूक छोड़ कर गया था.’’

‘‘साहब, हम उस समय घर पर नहीं थे, मां और मेरी पत्नी ने देखा था.’’ रोशन ने कहा, ‘‘आप उन्हें ही बुला कर पहचान करा लें.’’

मैं ने तुरंत एक सिपाही को दतवाल गांव रोशन की मां और घर वाली को लाने भेज दिया. आधे घंटे में वह उन दोनों औरतों को ले कर आ गया. मेरी नजर सांवल पर थी, वह काफी परेशान लग रहा था. उन दोनों औरतों को देख कर वह गरदन घुमाने लगा.

मैं ने उन दोनों औरतों से कहा, ‘‘इस आदमी को ध्यान से देखो और बताओ कि यह उन 2 औरतों के साथ था, जो संदूक के साथ तुम्हारे यहां आई थीं.’’

‘‘हम ने उन के साथ वाले आदमी को नहीं देखा था. हम ने केवल औरतों को ही देखा था.’’ रोशन की मां ने कहा.

औरतों की बात सुन कर सांवल के चेहरे की चमक लौट आई. तभी रोशन की पत्नी ने कहा, ‘‘अगर वे औरतें मेरे सामने आ जाएं तो मैं उन्हें पहचान लूंगी, एक के चेहरे पर मस्सा था.’’

सांवल बेचैनी से इधरउधर देखने लगा. उस की हर हरकत पर मेरी नजर थी. मैं उन औरतों को ले कर सादतपुर स्थित सांवल की हवेली पर पहुंचा. सांवल ने हवेली में कहलवा दिया कि पुलिस वाले आए हैं. वह आदमी अंदर गया और कुछ ही देर में वापस आ गया.

‘‘मेरे घर की सभी औरतें हवेली में मौजूद हैं, आप जा कर देख लें.’’ सांवल ने कहा.

मैं ने उन दोनों औरतों को हवेली के अंदर ले कर कहा, ‘‘इन औरतों को पहचान कर बताओ कि इन में वे औरतें हैं या नहीं?’’

दोनों ने देख कर कहा कि इन में वे नहीं हैं. मेरी सारी उम्मीद पर पानी फिर गया. इस बात से मैं बहुत हताशा हुआ. हत्या की एक पेचीदा गुत्थी सुलझतेसुलझते रह गई. नंबरदार भी वहां था, वह मुझे अपने मेहमान खाने में ले गया और वहां मुझे लस्सी दी. मैं तकिए से सिर लगा कर लेट गया.

कमरे का दरवाजा आधा खुला था. मुझे ऐसा लगा कि वहां से कोई गुजरा है. कुछ देर बाद फिर वह उधर से गुजरा. अब मेरी पुलिस वाली अनुभवशक्ति जाग गई. मैं ने दरवाजे की ओर नजरें गड़ा दीं. कुछ ही देर में तीसरी बार फिर कोई वहां से गुजरा.

इस बार मैं ने देख लिया. पता चला कि वह कोई आदमी है और सफेद कपड़े पहने है. मैं बिजली की तरह तेजी से उठा और दरवाजे के बाहर जा कर देखा. वह एक आदमी था, जिस के चेहरे पर दाढ़ी थी. मैं ने उसे अंदर बुलाया और उस से पूछा कि वह इस कमरे के बाहर बारबार क्यों चक्कर लगा रहा है?

उस ने कहा, ‘‘मेरा नाम रहमत है साहब, मैं एक जमींदार हूं और आप से एक बात कहना चाहता हूं.’’

‘‘बताओ क्या बात है?’’

‘‘साहब, अगर आप मेरा नाम गुप्त रखें तो मैं आप को एक खास बात बताना चाहता हूं.’’ उस आदमी ने कहा.

मैं ने उसे पूरा यकीन दिलाया तो उस ने कहा, ‘‘साहब, सांवल ने आप को धोखा दिया है. उस ने अपनी मां को हवेली की पिछली दीवार से बाहर उतार दिया था. सांवल का इस गांव में बड़ा दबदबा है, इसलिए उस के सामने किसी की बोलने की हिम्मत नहीं है.’’

मैं ने उस आदमी को धन्यवाद दे कर भेज दिया. उस ने मेरी बहुत बड़ी मुश्किल आसान कर दी थी. गांव में अकसर आपस में दुश्मनियां होती हैं, रहमत ने भी अपनी कोई दुश्मनी सांवल से निकाली थी. बहरहाल, जो भी रहा हो, उस ने मेरा काम आसान कर दिया.

अब मुझे सांवल की मक्कारी पर बड़ा गुस्सा आ रहा था. मैं ने उसे कमरे में बुलवा लिया और गुस्से से पूछा, ‘‘क्या तुम ने अपने घर की सारी औरतों को पहचान के लिए पेश कर दिया था?’’

‘‘जी सरकार, सभी थीं. क्या आप  को कोई शक है?’’ उस ने कहा.

मैं ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ उस के बाएं गाल पर मारा. थप्पड़ खा कर वह नीचे गिर पड़ा. उसे उठने का मौका दिए बगैर मैं अपना बूट उस के हाथों पर रख कर खड़ा हो गया. वह दर्द से छटपटाने लगा. मैं ने कहा, ‘‘तेरी मां कहां मर गई, उसे अभी हाजिर कर.’’

मेरा सवाल सुन कर वह भौचक्का रह गया. उस ने कहा, ‘‘मेरी बहन बीमार है, उसे देखने गई है.’’

‘‘अपनी मां को पेश कर दे, वरना ठीक नहीं होगा.’’ मैं ने अपना बूट उस के हाथ से हटा कर कहा.

उस ने खड़े हो कर कहा, ‘‘हुजूर, आप मेरी बात सुन लें, मेरी मां को मत बुलाएं. आप जैसा चाहेंगे, मैं आप को खुश कर दूंगा.’’

उस की बात सुन कर मैं खुश हो गया. मैं ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारा नजराना ले लूंगा, लेकिन पहले तुम अपनी मां को पेश करो. उस के बाद लेनदेन की बात करेंगे.’’

मेरी बात सुन कर वह खुश हो गया. उस ने कहा, ‘‘वह घर में बैठी है, किसी को भेज कर बुलवा लें.’’

मैं ने सिपाही को भेजने के बजाय नंबरदार की नौकरानी को भेज कर उसे बुलवा लिया. कुछ ही देर में एक अधेड़ उम्र की भारीभरकम औरत नौकरानी के साथ मेरे कमरे में आ गई. कमरे में मुझे देख कर उस का रंग उड़ गया. मैं ने सब से पहले जो चीज नोट की, वह उस के माथे पर काला मस्सा. उसी समय मैं ने रोशन की मां और पत्नी को कमरे में बुलवा लिया.

जैसे ही उन की नजर सांवल की मां पर पड़ी, वे चौंक पड़ीं, ‘‘यही है वह मक्कार बुढि़या.’’ हुस्ना ने कहा, ‘‘यही वह संदूक हमारे घर पर रख गई थी. इस के कारण ही मेरे पति और देवर को हवालात में रहना पड़ा.’’

मामला खुल गया था. मैं ने सांवल तथा उस की मां को गिरफ्तार कर लिया और रोशन एवं उस के भाई जैन को छोड़ दिया. इस के बाद सांवल से पूछताछ करने पर जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

सादतपुर वाले और बहलोलपुर वाले बालिके कहलाते थे. ये एक ही बिरादरी से आते थे. बालिके एक कबीला था, जो आपस में शादीब्याह कर लेता था. सांवल की शादी बहलोलपुर के करमू जाट की बेटी गुलबहार उर्फ गुल्लो से हुई थी.

गुल्लो बहुत सुंदर थी, लेकिन शादी के बाद वह चुप और खोईखोई सी रहती थी. पहले तो किसी ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब काफी समय हो गया तो गांव की औरतों ने तरहतरह की बातें करनी शुरू कर दीं, जिस से सांवल के दिल में शक के बिच्छू ने पंजे गाड़ दिए.

उसे शक हुआ कि उस की पत्नी उसे नहीं चाहती, बल्कि किसी और को चाहती है. गुल्लो कभीकभी शाम के समय बिना बताए घर से निकल जाती थी. सांवल की मां ने उस से कहा कि वह अपनी पत्नी को संभाले, उस के लच्छन ठीक नहीं लगते.

एक बार रात के समय सांवल अपने फार्म के पश्चिमी छोर पर पहुंचा तो उसे पेड़ों के झुंड में 2 साए दिखाई दिए. उन के आकार से लग रहा था कि उन में एक औरत और एक मर्द है. सांवल को शक हुआ तो दबे पांव पास जा कर उस ने ललकारा तो उस आदमी ने सांवल पर लाठी से वार कर दिया.

सांवल ने वार बचा कर बरछी से उस पर वार कर दिया, जो उस के पैर में उचटती सी लगी. वह आदमी मुकाबला करने के बजाय खेतों में घुस कर गायब हो गया. सांवल ने पास जा कर उस औरत को देखा तो वह कोई और नहीं, उस की पत्नी गुल्लो थी. वह थरथर कांप रही थी. वहीं एक छोटा सा संदूक पड़ा था. उस में कीमती कपड़े और गहने थे.

गुल्लो उस आदमी के साथ भाग रही थी. सांवल उसे पकड़ कर घर ले आया और काठकबाड़ वाले कमरे में बंद कर दिया. उस ने यह बात अपनी मां को बताई तो दोनों ने आपस में तय किया कि उसे खत्म कर दिया जाए.

सांवल फरसा ले कर कबाड़ के कमरे में पहुंचा, जहां गुल्लो बैठी थी. पति के हाथ में फरसा देख कर वह डर गई. वह हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगी. लेकिन सांवल पर तो खून सवार था, उस ने फरसा उठाया और उस की गरदन काट दी. वह छटपटाने लगी, इस के बाद बरछी उस के सीने में उतार दी, जिस से वह तड़प कर मर गई.

अब लाश को ठिकाने लगाने की बात आई. मांबेटे की समझ नहीं आ रहा कि लाश को कहां छिपाएं. अंत में सांवल ने लाश को एक संदूक में डाला और बैलगाड़ी में रख कर मां और भावज के साथ दतवाल पहुंचा.

सांवल ने सोचा था कि संदूक कहीं रख कर निकल आएंगे. एक घर के बाहर 2 औरतें बैठी हुई दिखाई दीं तो उस ने बैलगाड़ी वहीं रोक दी. वे रोशन की मां और पत्नी थीं. फिर बहाने से संदूक रख कर वह मां और भावज के साथ वापस आ गया.

सांवल से पूछताछ के बाद उस की निशादेही पर उस की हवेली से फरसा और बरछी बरामद कर ली गई. जहां गुल्लो की हत्या की गई थी, वहां की जमीन पर उस के खून के निशान थे, उस मिट्टी को खुरच कर सीलबंद कर दिया गया.

इस के बाद मैं ने सांवल की मां के बयान लिए तो उस ने सांवल के बयान की पुष्टि कर दी. मैं ने उस की बड़ी बहू को भी बुलवाया, जो उस के साथ संदूक छिपाने गई थी. उस ने बताया कि इस हत्या से उस का कोई लेनादेना नहीं है.

मैं ने उसे वादामाफ गवाह बनने को कहा तो वह खुशी से तैयार हो गई. इस के बाद एक रोचक बात यह हुई कि मुकदमा तैयार कर के जब मैं चार्जशीट अदालत में पेश करने की तैयारी कर रहा था, तभी एक दिन सवेरेसवेरे एक जवान आदमी मेरे पास आया. उस ने अपना नाम बताया तो मैं चौंका. वह गुल्लो का प्रेमी शम्स था. उस ने बताया कि वह और गुल्लो एकदूसरे से प्रेम करते थे, लेकिन बिरादरी अलग होने से उन की शादी नहीं हो सकी थी.

गुल्लो की शादी सांवल से हो गई थी. शादी के बाद हंसनेखेलने वाली गुल्लो को चुप्पी लग गई. शम्स उस से मिलने कभीकभी सादतपुर जाता था. गुल्लो उस से मिलती थी तो रोरो कर कहती थी कि वह उसे यहां से ले चले.

गुल्लो की हालत शम्स से देखी नहीं जा सकी और दोनों ने भागने का फैसला कर लिया. लेकिन जब वे भाग रहे थे तो पकडे़ गए. उस ने बताया कि वह इसलिए गायब हो गया था कि उस की टांग में बरछी लगी थी. सांवल उसे पहचान लेता तो उस की हत्या कर देता.

अब उसे पता चला है कि गुल्लो की हत्या कर दी गई है तो वह सांवल के खिलाफ बयान देने आया है. मैं ने उस का बयान लिया. बयान देते समय उस की आंखों में आंसू थे, लेकिन मुझे उस से कोई हमदर्दी नहीं थी, क्योंकि वह बुजदिल प्रेमी था. वह अपनी प्रेमिका को छोड़ कर भाग गया था और अब घडि़याली आंसू बहा रहा था.

मैं ने केस बहुत मजबूत बनाया था. अदालत ने सांवल को आजीवन कारावास और उस की मां को 7 साल की सजा सुनाई थी. Social Story in Hindi

History of Jeans : जींस वाली जिंदगी – अमेरिकी परिधान से वैश्विक पहचान तक

History of Jeans : आज जींस सिर्फ पहनने का कपड़ा नहीं रह गई है, बल्कि यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है. इसे पहन कर लोग खुद को आजाद, सहज और आत्मविश्वास से भरा हुआ महसूस करते हैं. समय, समाज या संस्कृति की कोई सीमा अब जींस को नहीं रोकती. भारतीय युवा हों या विदेशी कलाकार, सब के लिए जींस एक आरामदायक, आसान और अपनी पहचान दिखाने वाली जीवनशैली बन गई है.

अमेरिका का फैशन केवल आधुनिकता का प्रतीक नहीं, बल्कि विविधता, व्यावहारिकता और आत्मअभिव्यक्ति की खुली संस्कृति का दर्पण है. जींस, इसी संस्कृति की सब से सशक्त पहचान बन चुकी है. डैनिम वस्त्र का यह रूप आज दुनिया की हर सड़क, स्कूल, दफ्तर और समारोह में दिखता है. परंतु यह यात्रा, मजदूरों के कार्य परिधान से ले कर वैश्विक फैशन के मंच तक, बेहद दिलचस्प और संघर्षपूर्ण रही है.

जींस का जन्म 19वीं सदी के मध्य में अमेरिकी सामाजिक और औद्योगिक इतिहास से जुड़ा है. कैलिफोर्निया गोल्ड रश (1848) के दौरान, मजबूत और टिकाऊ कपड़े की जरूरत महसूस की जा रही थी. लिवाइ स्ट्रौस, एक जर्मनयहूदी व्यापारी, और दर्जी जैकब डेविस ने 1869 में डैनिम कपड़े पर कौपर रिवेट्स लगा कर पहली जींस बनाई. यह मजदूरों के लिए सस्ती, मजबूत और टिकाऊ पैंट थी. यही साधारण वस्त्र धीरेधीरे अमेरिकी मेहनतकश, स्वतंत्र आत्मा की पहचान बन गया.

20वीं सदी में हौलीवुड फिल्मों, विशेषकर वेस्टर्न्स (राज्य के काउबौय पात्रों) ने जींस को स्टाइल का प्रतीक बना दिया. 1950 के दशक में जेम्स डीन और मर्लन ब्रैंडो जैसे सितारों ने “रबेल विना काज” जैसी फिल्मों में जींस पहन कर विद्रोही युवा संस्कृति को परिभाषित किया. इस के बाद जींस केवल कामगारों का परिधान नहीं रही, बल्कि स्वतंत्रता और पहचान का सामाजिक प्रतीक बन गई.

अमेरिकन डैनिम इंडस्ट्री 20वीं सदी के उत्तरार्ध में वैश्विक ब्रांड संस्कृति का केंद्र बनी. लीवाइज, रैंगलर, ली जैसी कंपनियों ने अपनी आपूर्ति श्रृंखला विश्वभर में फैला कर, डैनिम उत्पादन को अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का अटूट हिस्सा बना दिया.

भारत, बंगलादेश, वियतनाम और चीन जैसे देशों में अब जींस का विशाल उत्पादन होता है. हर साल लगभग 1.25 अरब जोड़ी जींस पेंट बनाई जाती हैं.

विश्व फैशन बाजार में डैनिम उद्योग का मूल्य 100 अरब अमेरिकी डालर से भी अधिक है.

यह केवल फैशन नहीं, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण घटक बन गया है. जींस ने भौगोलिक सीमाओं और सांस्कृतिक अंतर को मिटाते हुए एक “वैश्विक वेशभूषा” का दर्जा पा लिया है.

पर्यावरण और डैनिम : रीसाइक्लिंग की दिशा में कदम

आज जींस केवल फैशन नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चिंता का विषय भी है. एक जोड़ी जींस बनाने में औसतन 7000 से 10000 लीटर तक पानी लगता है. इसलिए अमेरिकी कंपनियां अब “सस्टेनेबल डैनिम” की दिशा में शोध की ओर अग्रसर हैं.

तकनीक से पानी की खपत 80% तक घटाई जा रही है.

पैटागोनिया और एवरलेन जैसी कंपनियां जैविक कपास और रीसाइकल्ड फाइबर से जींस तैयार कर रही हैं.

न्यूयौर्क और सैन फ्रांसिस्को जैसे शहरों में “डैनिम स्वैप” या “रिडैनिम” कार्यक्रमों के जरिए पुराने कपड़े इकट्ठे कर नए उत्पादों में बदले जाते हैं.

पुराने कपड़ों का दान और पुनः उपयोग, अमेरिकी संस्कृति की संवेदनशीलता का प्रतीक है.

History of Jeans (1)
कालेज, ऑफिस या फिर जर्नी में जाना हो तो ज्यादातर युवाओं की पहली पसंद जींस होती है. आज जींस लड़केलड़कियों दोनों के लिए समान रूप से लोकप्रिय है क्योंकि यह हर मौके पर पहनने योग्य है.

अमेरिका में उपयोग किए गए कपड़ों को फेंकने के बजाय चैरिटी संगठनों के माध्यम से दान करने की परंपरा है. गुडविल, साल्वेशन आर्मी, और हैबिटेट फौर ह्यूमैनिटी जैसे संस्थान देशभर में ऐसे वस्त्र दान केंद्र चलाते हैं. लोग अपने पुराने वस्त्र “डोनेशन ड्राइव” या “क्लोदिंग बिन” में डालते हैं, जिन्हें बाद में या तो कम आय वर्ग को मुफ्त, सस्ती कीमत में दिया जाता है या पुनर्चक्रित कर नए उत्पाद बनाए जाते हैं. इस प्रक्रिया से न केवल पर्यावरणीय अपशिष्ट कम होता है, बल्कि “साझा जिम्मेदारी” और “सहायता संस्कृति” का प्रसार भी होता है.

History of Jeans (2)
जींस की सब से बड़ी खासियत इस का आरामदायक होना है. यह मजबूत डैनिम कपड़े से बनी होती है जो लंबे समय तक चलती है.

अमेरिकी फैशन में जींस केवल वस्त्र नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, गतिशीलता और समानता का रूपक है. यह अमीश समुदाय की सादगी, मूल अमेरिकी जनजातियों के परिधानों, और पूर्वी तट से पश्चिमी तट तक फैले व्यावहारिक जीवन का मिश्रण है. महिलाओं ने इसे टौप्स, हुडी, और इंडोवैस्टर्न फ्यूजन के रूप में अपनाया है. जिस से न केवल फैशन, बल्कि लैंगिक समानता की भावना भी प्रतिष्ठित हुई.

न्यूयौर्क फैशन वीक में भारतीय कढ़ाई वाले डैनिम जैकेट और धोबीवाश स्कर्ट्स इस बात के प्रमाण हैं कि जींस ने सभ्यताओं को जोड़ने का कार्य किया है. टाइम्स स्क्वायर की क्रौप्ड जींस से ले कर राजस्थान के टाईडाई डैनिम तक, यह परिधान अब वैश्विक जीवनशैली का प्रतीक है.

जींस वाली जिंदगी एक नई परिभाषा है.

जींस एक ऐसा परिधान बन चुका है जो समय, समाज और संस्कृति की सीमाओं से ऊपर है. यह पहनने वाले की पहचान, स्वतंत्रता और आत्मविश्वास का विस्तार है. इसी कारण भारतीय युवाओं से लेकर अमेरिकी कलाकारों तक, सभी के लिए जींस अब केवल कपड़ा नहीं बल्कि जीवन की व्यावहारिक, आरामदायक और आत्माभिव्यक्ति पूर्ण जीवन शैली है.

जींस पूरी दुनिया की साझा कहानी बन चुकी है, सहजता, समानता और आत्मविश्वास की कहानी. History of Jeans

Social Story in Hindi : तलाक – क्या जाहिरा इस मुसीबत से बाहर निकल पाई?

Social Story in Hindi : रात का सारा काम निबटा कर जब जाहिरा बिस्तर पर जा कर सोने की कोशिश कर रही थी, तभी उस के मोबाइल फोन की घंटी शोर करने लगी.

जाहिरा बड़बड़ाते हुए बिस्तर से उठी, ‘‘सारा दिन काम करते हुए बदन थक कर चूर हो जाता है. बेटा अलग परेशान करता है. ननद बैठीबैठी और्डर जमाती है… न दिन को चैन, न रात को आराम…’’ फिर वह मोबाइल फोन पर बोली, ‘‘हैलो, कौन?’’

‘मैं शादाब, तुम्हारा शौहर,’ उधर से आवाज आई.

‘‘जी…’’ कहते हुए जाहिरा खुशी से उछल पड़ी,

‘‘जी, कैसे हैं आप?’’

‘मैं ठीक हूं. मेरी बात ध्यान से सुनो. मैं तुम्हें तलाक दे रहा हूं. आज से मेरातुम्हारा मियांबीवी का रिश्ता खत्म. मैं यह बात अम्मी और खाला के सामने बोल रहा हूं. तुम आज से आजाद हो. मेरे घर में रहने का तुम्हें कोई हक नहीं है. बालिग होने पर मेरा बेटा मेरे पास आ जाएगा,’ कह कर शादाब ने मोबाइल फोन काट दिया.

‘‘सुनिए… सुनिए…’’ जाहिरा ने कई बार कहा, पर मोबाइल फोन बंद हो चुका था. जाहिरा ने नंबर मिला कर बात करनी चाही, पर शादाब का मोबाइल फोन बंद मिला. जाहिरा को अपने पैरों के नीचे की जमीन खिसकती नजर आई. आंसुओं की झड़ी लग गई. बिस्तर पर उस का एक साल का बेटा बेसुध सोया था. उसे देख कर जाहिदा के आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे.

जाहिरा दौड़ीदौड़ी अपने ससुर हसन मियां के कमरे में पहुंची. उस की सास शादाब के पास दुबई में थीं. जाहिरा ने दरवाजे के बाहर से आवाज दी, ‘‘अब्बू, दरवाजा खोलिए…’’

‘‘क्या बात है? क्यों चीख रही है?’’ शादाब के अब्बू हसन मियां ने कहा.

‘‘अब्बू…’’ लड़खड़ाते हुए जाहिरा ने कहा ‘‘शादाब ने मुझे फोन पर तलाक दे दिया है,’’ इतना कह कर वह रो पड़ी.

‘‘तो मैं क्या करूं…? यह तुम मियांबीवी के बीच का मामला है. तुम जानो और तुम्हारा शौहर…’’ कह कर हसन मियां ने दरवाजा बंद कर लिया.

जाहिरा रोतेरोते अपने कमरे मेंआ गई. रात यों ही बीत गई. सुबह जाहिरा ने उठ कर देखा कि रसोईघर के दरवाजे पर ताला लटक रहा था. वह परेशान हो गई और पड़ोसियों को पूरी बात बताई. पर पड़ोसी हसन मियां के पक्ष में थे. वह मन मार कर लौट आई.

पड़ोस में रहने वाली विधवा चाची ने जाहिरा को समझाया, ‘‘बेटी, तू फिक्र न कर. मसजिद के हाफिज के पास जा. शायद, वहां इस मसले का कोई हल निकले.’’ उस इलाके की मसजिद के सारे खर्चे माली मदद से चलते थे. हसन मियां मसजिद के सदर थे.

हाफिज के पास जाहिरा की शिकायत बेकार साबित हुई. उन्होंने कहा कि शौहर ने तलाक दे दिया है, अब कुछ नहीं हो सकता. जाहिरा ने कहा, ‘‘हाफिज साहब, फोन पर दिया गया तलाक नाजायज है. मेरी कोई गलती नहीं है. न शौहर से कोई अनबन, अचानक मुझे तलाक…’’ कह कर वह रो पड़ी, ‘‘मेरी गोद में उन का ही बच्चा है. इस की परवरिश कैसे होगी? मेरा क्या कुसूर है?

‘‘शरीअत में ऐसा कुछ नहीं है. आप एक औरत पर जुल्म ढा रहे हैं. मर्द की हर बात अगर जायज है, तो औरत की भी जायज मानो.’’

जाहिरा मौलवी को खूब खरीखोटी सुना कर वापस आ गई और शौहर के खिलाफ कोर्ट में जाने का मन बना लिया.

घर आ कर जाहिरा ने देखा कि घर के बाहर दरवाजे पर ताला लटक रहा था. बिना कुछ कहे वह अपने बेटे को मायके ले कर आ गई. घर पर मांबाप को सारी बात बता कर उस ने तलाक के खिलाफ आवाज उठाने का मन बना लिया और फिर समाज के उन मुल्लाहाफिजों के खिलाफ मोरचा खोल दिया, जो शरीअत के नाम पर लोगों पर दबाव बनाते हैं.

‘‘देहात की गंवार औरत को तुम्हारे गले से बांध दिया था. कहां तुम पढ़ेलिखे खूबसूरत जवान, कहां वह देहातीगंवार… ज्वार के दाने में उड़द का बीज…’’ कह कर शादाब की खाला खिलखिला उठीं.

‘‘शादाब और रेहाना की जोड़ी लगती ठीक है. पढ़ीलिखी बीवी कम से कम अंगरेजी में बात तो कर सकेगी. क्यों आपा, ठीक कह रही हूं न मैं?’’

शादाब की खाला ने अपनी बेटी के कसीदे पढ़ने चालू किए. शादाब की मां ने भी उन की हां में हां मिलाई. शादाब की मां हमीदा बानो की छोटी बहन नूर अपनी बेटी रेहाना को ले कर पिछले 2 महीने से दुबई आई थीं. उन्हें 3 महीने का वीजा मिला था.

रेहाना एमए की छात्रा थी. वह अपने मांबाप की एकलौती औलाद थी, जिसे लाड़प्यार से पाला गया था चुलबुली, खूबसूरत रेहाना ने अपनी मां की शह पा कर शादाब पर डोरे डालने शुरू किए थे, यह जानते हुए भी कि वह शादीशुदा है.

‘‘पर अम्मी, शादाब तो एक बच्चे का बाप है. मैं उस से निकाह कैसे करूंगी?’’ रेहाना ने अपनी अम्मी से पूछा.

‘‘तू फिक्र मत कर. अगर शादाब तेरा शौहर बन गया, तो तू मजे करेगी. विदेश में रहेगी. तू हवाईजहाज से आनाजाना करेगी.

‘‘तू मालामाल हो जाएगी और हमारी गरीबी भी दूर हो जाएगी. बड़ी नौकरी है शादाब की. उस की जायदाद हमारी. तू किसी न किसी तरह उसे अपने वश में कर ले,’’ रेहाना की अम्मी ने समझाया. और फिर उन्होंने ऐसा जाल बिछाया कि उस में मांबेटा उलझ कर रह गए.

‘‘रेहाना, अम्मी कहां हैं?’’ एक दिन दफ्तर से लौट कर शादाब ने पूछा.

‘‘वे पड़ोस में गई हैं. देर रात तक लौटेंगी. वहां उन की दावत है. मेरी अम्मी भी साथ गई हैं.’’

‘‘तुम क्यों नहीं गईं?’’

‘‘आप की वजह से नहीं गई.’’

रेहाना चाय ले कर शादाब के कमरे में पहुंची, जहां वह लेटा हुआ था. आज रेहाना ने ऐसा सिंगार कर रखा था कि शादाब उसे देख कर सुधबुध खो बैठा. चाय दे कर वह उस के करीब बैठ गई. इत्र की भीनीभीनी खुशबू से महकती रेहाना ने रोमांस भरी बातें करना शुरू किया.

शादाब भी उस की बातों का लुत्फ लेने लगा. उस ने रेहाना को अपने सीने से लगाना चाहा, तो बगैर किसी डर के वह शादाब की बांहों में सिमट गई. फिर वे दोनों हवस के गहरे समुद्र में डुबकी लगाने लगे. जब जी भर गया, तो एकदूसरे को देख कर शरमा गए.

जब तक रेहाना वहां रही, शादाब उसे महंगे से महंगा सामान दिलाने लगा. जवानी के जोश में वह सबकुछ भूल गया. अब उसे सिर्फ रेहाना दिखती थी. वह अपनी बीवी को तलाक दे कर रेहाना को बीवी बनाने के सपने देखने लगा था.

वक्त तेजी से गुजर रहा था. रेहाना के वीजा की मीआद खत्म होने वाली थी. शादाब ने रेहाना से जल्द निकाह करने का वादा किया. रेहाना अपनी अम्मी के साथ दुबई में रहने के सपने संजोए भारत वापस आ गई. शादाब ने खाला से 2 महीने के अंदर रेहाना से निकाह करने की अपनी मंशा जाहिर की, तो खाला ने भी खुशीखुशी अपनी रजामंदी जाहिर की.

कुछ वक्त बीत जाने पर जाहिरा ने शहर की बड़ी मसजिद में शादाब के द्वारा दिए गए तलाक के बारे में शिकायत पेश की, जिस की सुनवाई आज होनी थी.

जाहिरा ने कमेटी के सामने, जहां काजी, आलिम, हाफिज, बड़ेबड़े मौलाना सदस्य थे, अपनी बात रखी. उन्होंने बड़े गौर से जाहिरा की फरियाद सुनी. इस से पहले शादाब को मांबाप के साथ कमेटी के सामने हाजिर होने की इत्तिला भेजी गई थी, पर वे नहीं आए.

अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने कमेटी पर दबाव डालना चाहा था. वे तकरीबन 6 महीने तक कमेटी को चकमा देते रहे थे, बारबार के बुलावे पर भी नहीं आए थे. इस बात को ध्यान में रख कर कमेटी ने कड़ा फैसला लिया और उन्हें जमात से बेदखल करने के साथ कानूनी कार्यवाही करने का फैसला लिया. आज मसजिद में काफी गहमागहमी थी. कावाही शुरू हुई. शादाब, उस के अब्बू व दूसरे रिश्तेदार हाजिर थे.

कमेटी के सदर ने शादाब से पूछा, ‘‘किस वजह से तुम ने अपनी बीवी जाहिरा को तलाक दिया है?’’ ‘‘इस के अंदर शहर में रहने की काबिलीयत नहीं है. यह पढ़ीलिखी भी नहीं है. अंगरेजी नहीं जानती है. इसे ढंग से खाना बनाना तक नहीं आता है.’’ ‘‘बेटी, तुम बताओ कि शादाब मियां जोकुछ कह रहे हैं, वह सही है या गलत?’’ सदर ने पूछा.

‘‘बिलकुल झूठ है. हमारी शादी को 3 साल हो गए हैं. मैं एक बच्चे की मां बन गई हूं. मैं इन की हर बात मानती हूं. मैं ने पूरी 7 जमात पढ़ी है. ‘‘इन के मांबाप व रिश्तेदार मुझे पसंद कर के लाए थे. हम ने भरपूर दहेज दिया था. अभी तक सब ठीकठाक चल रहा था, पर अचानक इन्होंने मुझे फोन पर तलाक दे दिया.’’

‘‘फोन पर तलाक…?’’ कमेटी के सभी सदस्य जाहिरा की यह बात सुन कर सकते में आ गए.

उन्होंने आपस में सोचविचार कर के फैसला दिया, ‘यह तलाक नाजायज है. न तलाक देने की ठोस वजह है, न ही तलाक आमनेसामने बैठ कर दिया गया है. एकतरफा तलाक जायज नहीं है.

‘शादाब मियां के तलाक को गैरकानूनी मान कर खारिज किया जाता है. जाहिरा आज भी उन की बीवी हैं. उन्हें अपनी बीवी को सारे हक देने पड़ेंगे. साथ में रखेंगे. कोई तकलीफ नहीं देंगे, वरना यह कमेटी इन पर तलाक के बहाने औरत पर जुल्म करने का मामला दायर करेगी…’ इतना फरमान सुना कर जमात उठ गई. Social Story in Hindi

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