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अकेली युवतियां कानून बदले, समाज नहीं जिम्मेदारियां बढ़ीं, हक नहीं

Single Women Struggle: 37 साल की मसाबा गुप्ता फिल्म अभिनेत्री नीना गुप्ता और वेस्टइंडीज के पूर्व क्रिकेटर विवियन रिचर्ड्स की बेटी है. उस के मातापिता ने कभी शादी नहीं की और उस का पालनपोषण उस की मां नीना गुप्ता ने किया. मसाबा ने अपनी मां के साथ ही बड़े होना सीखा. मां का ही उस के जीवन पर पूरा प्रभाव पड़ा. 20 साल की अवस्था में अपने पिता विवियन रिचर्ड्स से भी मिली. अब दोनों के बीच एक मजबूत रिश्ता है. क्रिकेटर पिता की बेटी मसाबा बचपन में टैनिस खिलाड़ी बनना चाहती थी. कुछ वर्षों तक उस ने टैनिस खेला लेकिन 16 साल की उम्र में टैनिस खेलना छोड़ दिया.

मां के ऐक्टिंग से जुड़े डांस और म्यूजिक के प्रति उस का रुझान बढ़ा. इस के लिए वह लंदन भी गई. अपनी मां के अकेलेपन को देखते हुए मसाबा वापस मुंबई आ गई. मुंबई में मसाबा ने एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय से संबद्ध प्रेमलीला विट्ठलदास पौलिटैक्निक में पढ़ाई शुरू की. इस के बाद उस ने मुंबई में फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया. उस दौरान उस ने अपनी पहली ड्रैस एग्जीबिशन लगाई. वहां से उसे 2014 में लैक्मे फैशन वीक में हिस्सा लेने का मौका मिला, जहां उस की ड्रैस चर्चा में आई.

मसाबा ने सोशल मीडिया का अच्छा उपयोग किया. उस को इंस्टाग्राम के माध्यम से फैशन शो करने वाली पहली भारतीय डिजाइनर के रूप जाना जाता है. वह कहती है कि उस की लगभग 60 प्रतिशत बिक्री व्हाट्सऐप के माध्यम से होती है. मसाबा ने मुसलिम महिलाओं को सामने रख कर हिजाबसाड़ी लौंच की थी. 2020 में ‘मसाबा मसाबा’ नाम से एक टीवी सीरियल बना जिस में मसाबा और उस की मां नीना गुप्ता ने खुद अभिनय किया था. उस में फैशन और फिल्म के साथ उन के जीवन की घटनाओं को दिखाया गया था.

मसाबा ने 2015 में फिल्म निर्माता मधु मंटेना से शादी की थी. यह शादी जल्दी ही टूट गई. 2018 में दोनों अलग हो गए. सितंबर 2019 में इन का तलाक हो गया. 27 जनवरी, 2023 को मसाबा ने सत्यदीप मिश्रा से दूसरी शादी की. जिन्होंने ‘मसाबा मसाबा’ में उन के पूर्व पति की भूमिका निभाई थी. 11 अक्तूबर, 2024 को मसाबा को बेटी हुई. मसाबा के पास बहुत सारे रास्ते थे, इस के बाद भी उस ने अपनी मां नीना गुप्ता के साथ रहना पसंद किया. अपने मातापिता की अकेली लड़कियों को उन का ध्यान रखना पड़ता है. यही वजह है कि कई बार उन को अच्छे रिश्ते नहीं मिल पाते. समाज यह सोचता है कि अगर सिंगल बेटी है तो उसे अपने मांबाप की देखभाल के लिए मायके में रहना पड़ सकता है. उस के पति को भी उस का साथ देना पड़ता है. उसे पत्नी के घर पर ‘घरजंवाई’ बन कर रहना पड़ता है.

समाज अभी इस को अच्छा नहीं समझता. इस वजह से लड़कियों के सामने कठिनाई आने लगी है. घरजंवाई को ले कर जो सामाजिक सोच है उस को बदलना पड़ेगा. आज पेरैंट्स की देखभाल के लिए लड़कियों की जिम्मेदारियां बढ़ गई हैं. नैतिकता ही नहीं, कानून भी इस का पक्षधर है.

बेटी पर भी है मातापिता की जिम्मेदारी

वर्ष 2007 में मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान बने कानून मेंटिनैंस एंड वैलफेयर औफ पेरैंट्स एंड सीनियर सिटिजन एक्ट के अनुसार बच्चों पर मातापिता की देखभाल की जिम्मेदारी होती है. एक्ट में बेटा और बेटी को अलगअलग नहीं किया गया है. शादीशुदा और अविवाहित दोनों पर यह कानून लागू होता है. यदि लड़की अकेली है और कमाने वाली है तो उस पर भी मातापिता की जिम्मेदारी हो सकती है. सिर्फ अकेली होने से जिम्मेदारी में कोई फर्क नहीं पड़ता. दिल्ली हाईकोर्ट ही नहीं, पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी अपने कई फैसलों में कहा है कि ‘बेटी भी बेटे की ही तरह से मातापिता के भरणपोषण के लिए जिम्मेदार है.’

द्य  इस में एक ही शर्त होती है कि लड़की कमाने वाली हो और मातापिता अपना पालनपोषण करने में सक्षम न हों.

द्य जब लड़कालड़की मातापिता का पालनपोषण नहीं करते तो उन को मासिक भरणपोषण के लिए कोर्ट में शिकायत करने का अधिकार होता है.

द्य कोर्ट को रकम तय करने का अधिकार है.

द्य लड़की अकेली है तो उसे अकेले यह देना पड़ेगा.

द्य दूसरे भाईबहन भी हैं तो पालनपोषण की रकम आनुपातिक रूप से बंट जाएगी.

द्य   पालनपोषण की रकम 10 हजार रुपए माह है. इस को बढ़ाने की बात चल रही है.

पिता की विरासत संभालने के लिए सपनों को छोड़ा

कानपुर की रहने वाली नेहा कशिश के पिता रंपत सिंह भदौरिया नौटंकी के मशहूर कलाकार थे. नौटंकी में वे जोकर का काम करते हुए ऐसे कमैंट करते थे कि कुछ दिनों में ही उन को लोगों ने रंपत हरामी का नाम दे दिया. दर्शकों के दिए इस नाम को रंपत सिंह भदौरिया ने दिल से स्वीकार किया. इस के बाद अपना नाम रंपत हरामी ही रख लिया. नेहा कशिश उन की बेटी थी. रंपत सिंह भदौरिया का कोई बेटा नहीं था. उन को लगता था कि उन के बाद नौटंकी की यह कला खत्म हो जाएगी. अकसर वे अपनी पत्नी रानी से इस बात की चर्चा करते थे और दुखी हो जाते थे.

यह बात उन की बेटी नेहा कशिश ने जब सुनी तो बोली, ‘पापा, मैं नौटंकी की कलाकार बनूंगी.’

रंपत हरामी ने अपनी बेटी को समझाते हुए कहा, ‘मेरी इच्छा होना एक बात है और तुम्हारा नौटंकी की कलाकार होना दूसरी बात है. नौटंकी के कलाकारों को लोग अच्छी नजरों से नहीं देखते. लड़कियों के लिए तो यह बेहद शर्म की बात होती है.’

नेहा ने कहा, ‘पापा, जिस कला को आप पूजते हैं उस में मेरे आने में क्या दिक्कत है? मैं आप की कला को आगे ले कर जाना चाहती हूं.’

नेहा की जिद थी कि वह अपने पिता की कला को मरने नहीं देगी. रंपत हरामी को बेटी की चिंता थी. समाज का डर था. पिता और बेटी के बीच यह तनातनी कई माह चली. इस बीच कशिश की शादी हो गई. बिजली विभाग में संविदा पर उस की कंप्यूटर औपरेटर की जौब भी लग गई. सबकुछ सही से चल रहा था. अचानक एक दिन रंपत हरामी की तबीयत खराब हो गई. उस समय उन के मुंह से फिर यही निकला कि उन की कला को कौन संवारेगा?

नेहा कशिश के जीवन में यह निर्णय लेने का क्षण था. उस ने घर जा कर पूरी बात अपने पति को बताई और कहा कि वह अपने पिता की विरासत को संभालना चाहती है. किसी भी पति के लिए यह इजाजत देना आसान नहीं था. नेहा के पति ने बड़ा दिल दिखाते हुए उस को इजाजत दे दी. रंपत हरामी की तबीयत ठीक हो चुकी थी. वे ठीक हो कर अपने काम पर वापस आ गए. एक दिन कशिश ने कहा, ‘पापा, मैं आप की नौटंकी में कलाकार बनना चाहती हूं.’

रंपत हरामी पहले तो नहीं माने पर बेटी की जिद के आगे झुक गए.

पिता की आंखों के सामने जब बेटी नौटंकी के मंच पर उतरी तो उन की आंखों में आंसू थे. वे समझ नहीं पा रहे थे कि रोएं या खुशी मनाएं. कुछ महीनों में ही नेहा एक अच्छी कलाकार बन गई. तब उस ने अपनी संविदा वाली नौकरी छोड़ दी. पिता के साथ नौंटकी करने लगी. इसी बीच एक बार फिर रंपत हरामी की तबीयत खराब हुई और वे गुजर गए. अब नेहा कशिश ने अपने पिता की नौटंकी को पूरी तरह संभाल लिया है. इस काम में उस की मां सहयोग करती है. नौकरी कर घर संभालने का सपना छोड़ नेहा कशिश नौटंकी वाली लड़की बन कर पिता की विरासत को संभाल रही है.

पिता की जिम्मेदारियों के लिए खुशियां कुरबान

लखनऊ की रहने वाली श्रद्धा सक्सेना अपने मांबाप की अकेली संतान थी. उस के पिता सरकारी कर्मचारी थे. श्रद्धा के बचपन में ही मां की मौत हो गई थी. श्रद्धा की शादी उस समय हो गई थी जब वह इंजीनियरिंग इन फैशन टैक्नोलौजी का कोर्स कर रही थी. शादी के बाद उसे 2 बेटे हुए. इस के बाद पतिपत्नी में विवाद शुरू हो गया. विवाद की वजह, श्रद्धा के अनुसार, घरेलू हिंसा भी थी. श्रद्धा सक्सेना कहती है कि उस ने कुछ दिन तो सहन किया पर एक दिन जब पति ने छोटे बेटे को मारने का प्रयास किया तो वह सहन नहीं कर सकी. उस समय छोटा बेटा 6 माह का और बड़ा बेटा 2 साल का था.

श्रद्धा अपनी ससुराल से बस पकड़ कर सीधे लखनऊ अपने पिता के घर आ गई. पिता उस समय तक रिटायर हो चुके थे. श्रद्धा सक्सेना अपनी पढ़ाई के दौरान भी फैशन डिजाइनिंग करती थी. पिता के घर आ कर उस ने वही काम शुरू किया. बच्चे छोटे थे तो श्रद्धा और उस के पिता मिल कर उन को पाल रहे थे. समय बीतता गया. अब पिता बूढ़े हो चले थे. कई बार नातेरिश्तेदार चाहते थे कि श्रद्धा दूसरी शादी कर ले. श्रद्धा को लगा कि अब वह अपने बूढ़े पिता को अकेले नहीं छोड़ सकती. उस के 2 छोटे बेटे हैं. काफी सोचविचार करने के बाद श्रद्धा ने दूसरी शादी का फैसला छोड़ दिया.

एक दिन ऐसा आया कि श्रद्धा के पिता नहीं रहे. श्रद्धा के पिता अपना पैतृक घर छोड़ कर किराए पर मकान ले कर रहते थे. उन के बाद अब श्रद्धा के लिए अकेले किराए के मकान में रहना कठिन था. इस के बाद भी उस ने किराए का छोटा मकान लिया और अपने बच्चों के साथ रहने लगी. अब बच्चे बड़े हो गए हैं. श्रद्धा ड्रैस डिजाइनिंग के साथ मेकअप आर्टिस्ट का काम भी करती है. इस से उस को इतना मिल जाता कि वह अपना और अपने दोनों बच्चों का खर्च उठा सके.

धर्म ने नहीं विज्ञान ने बनाई राह आसान

लड़कियां अब पति, पिता और बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारियां संभाल रही हैं. जिम्मेदारियों से जिंदगी में उन के अपने सपने कहीं पीछे छूट गए. महिलाओं ने घर से बाहर निकलने को ही आजादी समझ लिया. विज्ञान ने उन की राह सरल कर दी पर समाज ने लड़कियों को जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा दिया. किचन से ले कर वर्किंग स्पेस तक विज्ञान ने लड़कियों को सुविधा दी. साइकिल के बाद जब स्कूटर आया तब तक सड़कों पर लड़कियां वाहन चलाते कम दिखती थीं. जैसे ही 1990 के दशक में स्कूटी आई, सड़क पर लड़कियों की संख्या सब से अधिक दिखने लगी.

किचन में ऐसे होम एप्लायंसेस आ गए जिन से घरेलू काम में कम समय लगने लगा. अब लड़की के शादीशुदा जीवन की शुरुआत वाशिंग मशीन में कपड़े धुलने, किचन में बच्चे के लिए ब्रेकफास्ट तैयार करने, स्कूटी से बच्चे को स्कूल छोड़ने से होने लगी है. वहां से वापस आ कर किचन में खाना तैयार करना, पति को ब्रेकफास्ट देना, लंच पैक करना और फिर अपना लंच पैक कर के औफिस जाना हो गया है. जिन महिलाओं ने होममेड भी लगा रखी है वहां भी उन को काम करना ही पड़ता है.

भारत में हर 4 में से 1 स्कूटी खरीदार लड़की होती है जबकि स्कूटी प्रयोग करने वाली लड़कियों की बात करें तो 35 फीसदी स्कूटी का प्रयोग लड़कियां करती हैं. कई बार स्कूटी घर के किसी पुरुष के नाम होती है पर उस का प्रयोग लड़कियां करती हैं. स्कूटी लेने वाली महिलाओं में 64 फीसदी की उम्र 30 साल के करीब होती है. कालेज, कोचिंग और नौकरी करने वाली लड़कियां इस का प्रयोग करती हैं. लड़कियों की आजादी में स्कूटी का बड़ा योगदान है. स्कूटी हलकी होती है. इस में लड़कियों के बैग रखने की सुविधा होती है. इलैक्ट्रिक स्कूटी आने के बाद लड़कियों को और भी पंख लग गए हैं.

अकेली लड़की ले कानून की मदद

आज अकेली लड़कियों की कानून भी मदद करता है.

द्य  महिला इंडियन पीनल कोड की जगह बने भारत न्याय संहिता यानी बीएनएस की धारा 74 से ले कर 79 तक के तहत मुकदमे दर्ज करा सकती है.

द्य  इस में महिला की इज्जत भंग करने की कोशिश, यौन उत्पीड़न, पीछा करना, अश्लील और अपमानजनक शब्दों का प्रयोग करने पर मुकदमा कायम करने का अधिकार है.

द्य  महिलाओं को वीमेन हैल्पलाइन नंबर 1090 और 112 अपने मोबाइल फोन से डायल कर के मदद लेने का अधिकार है.

द्य  मकान मालिक के साथ किराए का कोई समझौता किया है तो पुलिस शिकायत के साथ सिविल केस भी कोर्ट में किया जा सकता है.

द्य  महिला को अपने पक्ष में सुबूत दे कर सच्चाई साबित करनी पड़ेगी.

हाईकोर्ट में प्रैक्टिस करने वाली अधिवक्ता सुनीति सचान कहती हैं, ‘‘कानून ने महिलाओं को आजादी और सुरक्षा दी है. महिलाओं के लिए जरूरी है कि वे अपने अधिकारों को जानें. जब तक वे अपने अधिकारों को जानेंगी नहीं, तब तक उन को डर लगता रहेगा. लड़कियों की बढ़ती परेशानियों और कमजोरियों की सब से बड़ी वजह यह है कि आज के दौर में वे पढ़ने से बचने लगी हैं. स्कूली किताबों से छुटकारा पाने के बाद अलग से कम से कम अपने अधिकार और स्वास्थ्य के बारे में पढ़ें. टैक्नोलौजी के इस दौर में उन को इस का ज्ञान भी होना चाहिए. तभी वे कानून और पुलिस की मदद अच्छी तरह ले सकेंगी.’’

कम उम्र में शादी का दबाव

लड़कियों पर कम उम्र में शादी का दबाव आज भी होता है. इस में हिंदूमुसलिम दोनों ही समुदायों की लड़कियां शामिल हैं. मुसलिमों में यह परेशानी अधिक है. वहां 14-15 साल की उम्र में ही शादी करने का दबाव पड़ने लगता है. 19 साल की तनजीम अख्तर लखनऊ के अलीगंज इलाके की रहने वाली है. उस की मां नगमा और पिता परवेज के बीच झगड़े चलते रहते थे. नगमा अपने पति का घर छोड़ कर अपने पिता के घर में रहने लगी थी. पिता के साथ मां की बीचबीच में सुलह होती रहती थी. तनजीम की 3 बहनें और एक भाई है.

तनजीम के मामा, नाना और मां उस की 15 साल की उम्र में ही शादी किसी बड़ी उम्र के लड़के से कराना चाहते थे. उन को लगता था कि शादी हो जाए तो उन की जिम्मेदारी पूरी हो जाएगी. तनजीम बताती है, ‘‘जब मैं ने शादी करने से मना किया तो मेरे साथ घर में मारपिटाई हुई. मुझे बुराभला कहा जाने लगा. मेरी पढ़ाई छुड़वा दी गई. ऐसे समय में मुझे ‘रेड ब्रिगेड ट्रस्ट’ की सहायता मिली. मुझे वहां पर काम करने के बदले सहायता दी जाने लगी. मेरे घर वाले नहीं चाहते थे कि मैं वहां काम करूं. मुझ पर गलत काम करने का लांछन लगाया जाने लगा. मैं ने जब स्कूटी ली तो भी झगड़ा हुआ. मैं अब ‘रेड ब्रिगेड ट्रस्ट’ के साथ जुड़ कर अपनी जैसी लड़कियों की मदद करती हूं. उन को सैल्फ डिफैंस सिखाती हूं. घर वालों के विरोध के बाद भी अपनी पढ़ाई भी पूरी कर रही हूं.’’

अकेली लड़की की परेशानियां हजार

समाज में अकेली लड़कियों पर सामाजिक रूढि़वादिता का दबाव होता है. उन को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है और उन पर शादी करने का दबाव बनाया जाता है. अकेली लड़की के लिए दूसरी सब से बड़ी परेशानी यह होती है कि उन को रहने के लिए किराए का घर मिलने में बहुत मुश्किल होती है. मकान मालिक अलग नजर से देखते हैं उन्हें. कई बार उन्हें पुरुषों के अनचाहे कमैंट का सामना करना पड़ता है.

अकेले रहने के कारण लड़कियां अकसर डिप्रैशन का शिकार हो जाती हैं. जीवन की हर जिम्मेदारी अकेले उठाने के कारण आर्थिक और सामाजिक स्तर पर लड़कियों के ऊपर अधिक दबाव बन जाता है. लड़कियां इन रूढि़वादिता के बीच अपनी पहचान और स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए संघर्ष करती हैं. आजकल किसी भी लड़की के बारे में सब से अधिक जानकारी देने का काम सोशल मीडिया करता है. कई अकेली लड़कियां अपनी पहचान छिपाने के लिए जहां वैवाहिक जीवन के बारे में लिखना होता है वहां वे ‘रिलेशन में हैं’ लिख देती हैं. इस से कई बार उन का बचाव हो जाता है. लड़कियां अपने बचाव के तरीके भी निकाल रही हैं.

सिधौली से चल कर लखनऊ पढ़ने के लिए आने वाली 6 लड़कियां पहले अकेली आती थीं तो उन को लड़कों से दिक्कत होती थी. जब लड़कियों का आपस में संपर्क हो गया तो उन लोगों ने तय किया कि वे एक ही जगह से बस में चढ़ेंगी और साथ रहेंगी. लखनऊ से घर वापस लौटने पर कोई परेशान न करे, इस कारण वापसी भी वे साथ करती थीं.

सभी ने एक वाट्सऐप गु्रप बना लिया था. एकदूसरे की लोकेशन मिलती रहती थी. अब उन को अंधेरा होने, शराब की दुकान के पास से गुजरने में भी ड़र नहीं लगता है. वे अपने पर्स में सुरक्षा के उपाय, जैसे मिर्चपाउडर रख कर चलती हैं. इन सब ने कभी अपने परिवार को अपनी मुश्किलों के बारे में नहीं बताया क्योंकि डर इस बात का था कि कहीं उन का बाहर जाना ही बंद न करा दिया जाए. अफसोस की बात यह है कि जो धर्म मंदिरमसजिद की एक ईंट हटने पर भी सैकड़ों को जमा कर सकते हैं, अपनी बेटियों की सुरक्षा के लिए 5 जने भी नहीं ढूंढ़ सकते और उन्हीं लड़कियों को धर्मों के जंजाल में झोंक देते हैं.

महिला किराएदार पर मकान मालिक की नजर

लड़कियां घर के अंदर रहती हैं तो घरेलू हिंसा होती है और जब वे घर के बाहर निकलती हैं तो सामाजिक हिंसा का सामना करना पड़ता है. लखनऊ के इंदिरा नगर की रहने वाली 40 साल की उम्र की देविका के पति राकेश की मृत्यु हो गई. उस के 20 और 18 साल की 2 बेटियां थीं. विधवा होने के बाद देविका के ससुराल वाले उस को प्रताडि़त करने लगे, कहते थे, बेटियों की पढ़ाई के लिए जमीन बेचने की जरूरत नहीं है.

देविका पढ़ाई की जरूरत को समझती थी. वह किसी भी कीमत पर बेटियों को पढ़ाना चाहती थी. इस के लिए उस ने पति के हिस्से वाली थोड़ी जमीन बेच दी थी. इस बात को ले कर हुए विवाद के बाद देविका ने घर छोड़ कर किराए का मकान ले लिया. मकान के एक हिस्से में मकान मालिक नरेश महाजन और उस की पत्नी रहते थे. दूसरे हिस्से में देविका और उस की 2 बेटियां रहती थीं. मकान मालिक जब भी आता, उन के हालचाल पूछता था. शुरुआत में यह देविका को सामान्य शिष्टाचार लगा पर धीरेधीरे मकान मालिक की हरकतें खुल कर सामने आने लगीं. मकान मालिक देविका ही नहीं, उस की बेटियों पर भी गंदी निगाह रख रहा था. पहले वह हंसीमजाक वाले मैसेज व्हाट्ऐप करता था. इस के बाद उस की बोली बदलने लगी.

एक दिन किराया देते समय खुल कर बोला, ‘आप बहुत सुंदर हो. मेरा दिल आप पर आ गया है. आप बिना किराए के भी रह सकती हैं.’

देविका ने उस समय उसे किराया दे कर चलता किया. अगले ही दिन उसे मकान छोड़ने का संदेश दे दिया. उस ने बहुत प्रयास किया कि देविका घर से न जाए पर देविका को लग गया था कि इस मकान में रहना खतरनाक हो सकता है. उसे अपने साथ अपनी बेटियों की भी चिंता थी. वह दूसरी कालोनी में रहने लगी. इस के बाद भी वह उसे परेशान कर रहा था. एक दिन देविका ने उस की पत्नी को सब बात बताई तब उस को राहत मिली.

हिंदू लड़कियों के कानूनी अधिकार

द्य  कांग्रेस सरकार द्वारा बनाए गए 1956 के हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में बेटियों का पिता की संपत्ति में बराबर का अधिकार नहीं था.

द्य मनमोहन सिंह सरकार ने 2005 में इस अधिनियम में संशोधन किया था. इस के मुताबिक बेटियों को भी संयुक्त परिवार की संपत्ति में भी बेटों के बराबर ही अधिकार दिया गया.

द्य बेटियों के हक में यह एक मील के पत्थर जैसा कानून था जिस के बाद से बेटियों को संयुक्त परिवार की संपत्ति में बराबर का अधिकार मिलने लगा.

द्य अब मातापिता की अपनी संपत्ति पर भी बिना वसीयत के बेटी का उतना ही हक है जितना बेटों का होता है. अगर बेटी अकेली है तो पिता की पूरी संपत्ति पर उस का अधिकार होता है.

द्य  वर्ष 2005 के बाद बेटी को पैतृक संपत्ति में जन्म से ही बेटे के बराबर का अधिकार प्राप्त है, भले ही वह शादीशुदा हो या अविवाहित.

द्य  पैतृक संपत्ति पर पिता अपनी मरजी से वसीयत कर के किसी एक को नहीं दे सकते.

द्य इस में सभी बेटेबेटियों का बराबर हिस्सा होता है.

द्य  1956 के कानून के अनुसार बेटी भी बेटे की ही तरह से मातापिता की अपनी संपति में प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी है.

द्य  यह बात और है कि कानून बन जाने के बाद भी अभी भी समाज इस के लिए तैयार नहीं है.

नैतिकता और कानून 2 अलग चीजें है. अगर बेटियां अपना हिस्सा लेने को तैयार हो जाती हैं तो उन का हक कोई मार नहीं सकता. पिता की संपत्ति को भाई बिना बहन की सहमति के बेच नहीं सकता. यह बात और है कि हिंदूवादी लोग इस कानून को सही नहीं मानते क्योंकि वे लड़कियों को धर्म और उस से जुड़ी व्यवस्थाओं से ही देखते हैं. धर्म हमेशा ही महिलाओं के सामने कठिनाइयां खड़ी करता है. लड़की की ही तरह अकेली महिला में विधवा का नाम भी होता है. धर्म ने भले ही विधवा को समाज में सम्मानजनक तरह से रहने का अधिकार न दिया हो पर कानून ने विधवा को उस के अधिकार दिए हैं.

क्या हैं विधवा के कानूनी अधिकार

भारत में उत्तराधिकार का अधिकार व्यक्तिगत कानूनों के अंतर्गत आता है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार हिंदू अविभाजित परिवार में बहू को विवाह की तिथि से ही परिवार के सदस्य का दर्जा मिल जाता है. वह सहखातेदार नहीं बन सकती. बहू को संपत्ति में अपने पति के हिस्से या तो पति द्वारा स्वेच्छा से हस्तांतरित या पति की मृत्यु के बाद प्राप्त अधिकार के माध्यम से परिवार की संपत्ति में हिस्सा मिलता है. बहू उस संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं जता सकती जो विशेष रूप से उस के ससुराल वालों की अपनी बनाई संपत्ति हो. बहू को केवल अपने पति के हिस्से पर ही अधिकार प्राप्त होगा. उसे ससुराल वालों की संपत्ति पर अधिकार केवल अपने पति के हिस्से के माध्यम से ही प्राप्त होता है.

विधवा की संपत्ति को ले कर दूसरा बड़ा सवाल यह है कि विधवा की संपत्ति में अधिकार मायके वालों का होगा या ससुराल वालों का? पहली बात तो यह कि विधवा संतान वाली हो या निसंतान, वह किसी को भी वसीयत कर के कुछ भी दे सकती है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 15(1)(बी) के तहत के तहत यदि किसी हिंदू महिला की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाती है तो उस की संपत्ति प्राथमिक रूप से उस के बच्चों और पति को विरासत में बराबरबराबर मिलती है सिर्फ पति को नहीं. यदि पति या बच्चे मौजूद नहीं हैं तो संपत्ति पति के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित हो जाती है. जिन मामलों में पति का कोई भी उत्तराधिकारी नहीं है, संपत्ति महिला के मातापिता या उन के उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित होती है. ऐसे मामले बहुत कम होते हैं.

इस में एक अपवाद है. जब संपत्ति किसी स्रोत जैसे विधवा के मातापिता, ससुराल वाले से विरासत में मिलती है और यदि महिला की मृत्यु बिना किसी प्रत्यक्ष उत्तराधिकारी के हो जाती है तो वह उस मूल परिवार को वापस मिल जाती है. अधिनियम के तहत प्रथम श्रेणी यानी क्लास 1 के उत्तराधिकारी सब से करीबी रिश्तेदार होते हैं जिन्हें बिना वसीयत मृत्यु होने पर संपत्ति में सब से पहले और समान हिस्सा मिलता है. इस में मुख्य रूप से विधवा, पुत्र, पुत्री, माता और पूर्व मृत पुत्र या पुत्री के बच्चे व पोतेपोतियां शामिल हैं. पुत्र, पुत्री में जैविक और गोद लिए हुए दोनों बच्चे शामिल होते हैं. प्रथम श्रेणी के सभी उत्तराधिकारी संपत्ति में बराबर हिस्सेदारी पाते हैं.

यदि किसी व्यक्ति के प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी मौजूद नहीं हैं तो द्वितीय श्रेणी के उत्तराधिकारियों को संपत्ति में हिस्सा मिलता है. द्वितीय श्रेणी यानी क्लास 2 के उत्तराधिकारियों में वे रिश्तेदार होते हैं जो प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारियों के न होने पर संपत्ति के हकदार होते हैं. इन में मुख्य रूप से पिता, भाईबहन, दादादादी, चाचाचाची, मामामामी और इन के बच्चे, भतीजेभतीजी, भांजेभांजी, भाई की विधवा, पिता के भाईबहन, माता के भाईबहन आदि शामिल होते हैं. एक श्रेणी के वारिसों के न होने पर ही अगली श्रेणी के वारिसों को संपत्ति मिलती है. यदि एक ही श्रेणी में एक से अधिक वारिस हों तो वे संपत्ति को आपस में बराबर बांटते हैं.

अगर किसी मामले में पहली और दूसरी श्रेणी के उत्तराधिकारी न हों तो हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत संपत्ति मृतक के सगोत्रों को मिलती है. इन में पुरुषवंश के माध्यम से जुड़े रिश्तेदार जैसे चचेरे भाई वगैरह आते हैं. इन में यदि सगोत्र भी न हों तो सजातीयों को मिलती है, जो किसी भी वंश- पुरुष या महिला- से जुड़े होते हैं.

इन में मौसी, मामा, ममेरे भाईबहन शामिल होते हैं. अगर ये भी न हों तो संपत्ति राज्य के पास चली जाती है. हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के तहत पुरुष मृतक के लिए विरासत का क्रम प्रथम श्रेणी, द्वितीय श्रेणी, सगोत्र, सजातीय और राज्य सरकार का होता है.

भरणपोषण का मामला

दूसरी तरफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएस) की धारा 144 (पूर्व में सीआरपीसी की धारा 125) के तहत सासससुर अपनी विधवा बहू से भरणपोषण की मांग नहीं कर सकते. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि यह बहू की नैतिक जिम्मेदारी हो सकती है लेकिन इसे कानूनी रूप से लागू नहीं किया जा सकता जब तक कि कानून में इस का स्पष्ट प्रावधान न हो. बुजुर्ग सासससुर भरणपोषण के लिए अपने बेटे या बेटी पर निर्भर रह सकते हैं, न कि बहू पर. अगर मातापिता वरिष्ठ नागरिकों का भरणपोषण और कल्याण अधिनियम 2007 के तहत सहायता मांगते हैं तो मामले की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं, लेकिन सामान्य भरणपोषण में बहू को जिम्मेदार नहीं माना गया है. इस तरह से अकेली युवती की तमाम परेशानियों का निदान कानून, विज्ञान और जानकारियों में छिपा है. इस के अनुसार परेशानियां कम की जा सकती हैं.

अकेली महिलाओं की बढ़ती संख्या

समाज में अकेली महिलाओं की संख्या बढ़ रही है. 2011 की जनगणना के अनुसार अकेली रहती लड़कियोंऔरतों की संख्या 7-8 करोड़ थी. इस में सब से बड़ी संख्या विधवाओं की है. कुल आबादी का 12-14 फीसदी अकेली औरतों का था. विधवा महिलाओं की संख्या 4.5 करोड़ है. अविवाहित की संख्या 2.5 करोड़ थी. तलाकशुदा की संख्या 60-80 लाख थी. अकेली महिलाओं की संख्या ग्रामीण इलाके में सब से ज्यादा पाई गई थी. उम्र बढ़ने के साथ विधवा महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है. 2022-2025 में इन की संख्या बढ़ कर

7.2 करोड़ हो गई है. यह कुल महिला आबादी का 22-24 फीसदी है. 2030 तक इन की संख्या 45 फीसदी तक बढ़ कर करीब 15 करोड़ हो सकती है.

सामाजिक दबाव और तिरस्कार

अकेली या विधवा महिला को अकसर समाज अलग नजर से देखता है. मुसलिम समाज में, खासकर परंपरागत परिवेश में, विधवा होना केवल व्यक्तिगत दुख नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान का भी बोझ बन जाता है. मुसलिम घरों में किसी महिला के पति की मृत्यु के बाद उसे ‘बदनसीब’ या ‘मनहूस’ जैसे शब्दों से पुकारा जाना आम बात है. इन शब्दों के जरिए उसे बारबार यह एहसास कराया जाता है कि वह परिवार पर बोझ है. ऐसे में वह अपने व्यवहार, आचरण और जीवनशैली को ले कर अतिरिक्त सजग हो जाती है. वह खुद को समर्पित बेटी के रूप में स्थापित करने की कोशिश करने लगती है, ताकि परिवार और समाज में उसे थोड़ा सा सम्मान मिल सके.

यह सम्मान सशर्त होता है- उस की चुप्पी, त्याग और सेवा के बदले में होता है. वह अपनी इच्छाओं, सपनों और व्यक्तिगत जीवन को पीछे छोड़ देती है. दूसरी शादी या स्वतंत्र जीवन की संभावना अकसर सामाजिक दबाव के कारण दब जाती है. कई जगहों पर उसे सामाजिक कार्यक्रमों से दूर रखा जाता है, जिस से उस का आत्मविश्वास टूटता है. संयुक्त परिवारों में ऐसी महिलाएं घर के पुरुषों द्वारा शारीरिक शोषण का भी शिकार बनती हैं, मगर आर्थिक रूप से उन पर आश्रित होने के कारण वे उन के खिलाफ आवाज नहीं उठा पातीं.

आर्थिक असुरक्षा

पति की मृत्यु के बाद या अकेले होने पर सब से बड़ी समस्या आर्थिक होती है. यदि महिला शिक्षित नहीं है या उस के पास नौकरी का अनुभव नहीं है तो वह पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाती है. एक महिला जो गृहिणी थी, अचानक पति के निधन के बाद बच्चों की पढ़ाई, घर का खर्च और समाज की अपेक्षाओं के बीच फंस जाती है. कम पढ़ीलिखी होने की स्थिति में उसे घरेलू नौकर के रूप में काम करने के लिए निकलना पड़ता है, सिलाईकढ़ाई की दुकानों या फैक्टरियों में काम ढूंढ़ना पड़ता है या इसी तरह के अन्य काम कर के वह किसी तरह अपना और परिवार का भरणपोषण करती है.

अकेली या तलाकशुदा महिलाओं के सामने सब से बड़ी चुनौती आर्थिक आत्मनिर्भरता की होती है. शिक्षा या कौशल की कमी और सामाजिक प्रतिबंधों के कारण उन के पास सीमित अवसर होते हैं. इस के बावजूद, वह अपने परिवार के लिए हर संभव प्रयास करती है. Single Women Struggle

 

 

 

अकेली मुसलिम महिलाओं का मौन संघर्ष

Muslim Women Struggle: पुरानी दिल्ली में चितली कब्र की संकरी गलियों में से एक गली के आखिरी छोर पर वह आधी किवाड़ लगी अंधेरी व सीलनभरी सीढि़यों का रास्ता है जो पहली मंजिल पर रह रही रेशमा अंसारी तक ले जाता है. ऊपर 3 छोटेछोटे कमरे हैं, जिन में से एक में जमीन पर बिछी दरियों पर रेशमा के बूढ़े मांबाप लेटे रहते हैं. दोनों अपनी उम्र के 75वें वर्ष से आगे निकल चुके हैं. आंखों से कम दिखता है और अधिक वजन के कारण चलनेफिरने से लाचार हैं. उन का ज्यादा समय लेटे या बैठे ही गुजरता है.

दूसरे कमरे में सामान भरा हुआ है. पुराने बिछौने, राशन के डब्बे, रेशमा की भाभी के मायके से आया दहेज का सामान, जिन्हें खोल कर सजाने की उस घर में कभी जगह ही नहीं हुई और रेशमा व उस की बहन की चीजें दीवार में बनी अलमारियों में भरी पड़ी हैं. तीसरे कमरे में एक बड़ा पलंग है जो रेशमा के पिता ने उस को दहेज में दिया था और जिसे तीन तलाक ले कर वापस लौटी रेशमा को उस के ससुराल वालों ने वापस कर दिया था. घर के इस इकलौते पलंग पर रेशमा अपनी छोटी बहन के साथ सोती है.

रेशमा और उस की बहन रुकैया दोनों तीन तलाक ले कर पिछले 20 वर्षों से अपने मायके में रह रही हैं. इन का एक भाई भी है जो ऊपरी मंजिल पर अपनी पत्नी व 3 बच्चों के साथ रहता है. वह इलैक्ट्रिशियन है. उस की आमदनी से उस का अपना परिवार ही मुश्किल से गुजारा कर पाता है. ऐसे में 2 तलाकशुदा बहनों और 2 बूढ़े मांबाप का खर्चा उठाना उस के बस में नहीं है.

2006 में जब रेशमा का तलाक हुआ था, उस की उम्र कोई 20 साल की थी. मगर दोबारा उस ने निकाह नहीं किया या यों कहें कि मांबाप की इतनी हैसियत ही नहीं थी कि वे बेटी के दूसरे निकाह के लिए पैसा इकट्ठा कर पाते. तब सोचा गया था कि अगले दोचार सालों में जब छोटी बहन का निकाह हो जाएगा तो रेशमा के लिए भी कोई लड़का देखेंगे लेकिन छोटी बहन रुकैया का निकाह हुए साल भी नहीं बीता था कि वह भी तलाक का चाबुक खा कर मायके लौट आई.

मांबाप को गहरा सदमा लगा. उन की हालत और लाचारी देख कर दोनों ने दोबारा शादी करने की कभी ख्वाहिश भी जाहिर नहीं की. भाई ने भी मौका देख कर मांबाप की देखभाल का पूरा जिम्मा दोनों बहनों के कंधों पर डाल दिया और खुद घर के ऊपरी हिस्से में अपने बीवीबच्चों सहित शिफ्ट हो गया. आज 20 साल से रेशमा और रुकैया एक बुटीक में सिलाईकढ़ाई का काम कर के अपना व अपने मांबाप का पेट भर रही हैं. दोनों बूढ़ों की सांसें अपनी बेटियों के सहारे ही चल रही हैं. बहू को उन की देखभाल में कोई दिलचस्पी नहीं थी और न ही बेटा कभी कोई खर्चापानी दे पाता था.

बौलीवुड की हीरोइनें भी अकेलेपन की शिकार

बौलीवुड की ख्यात अदाकारा महजबीं बानो, जिन्हें दुनिया मीना कुमारी के नाम से जानती है, ने बचपन से फिल्मों में काम कर के अपने परिवार की आर्थिक मदद की. बल्कि यों कहें कि उस बच्ची ने अपने मांबाप को पाला. यह कोई छिपी बात नहीं है. उन का निजी जीवन उन की मौत तक बड़ा संघर्षपूर्ण रहा. महजबीं बानो ने 1952 में गुपचुप तरीके से मशहूर फिल्म निर्देशक और लेखक कमाल अमरोही से निकाह किया, जबकि कमाल अमरोही पहले से शादीशुदा थे. यह विवाह काफी विवादों में रहा.

मीना कुमारी का जीवन परदे पर जितना चमकदार दिखता था, असल में उतना ही दर्द और अकेलेपन से भरा हुआ था. शादी से पहले उन की कमाई उन के मातापिता के कब्जे में रहती थी और शादी के बाद पति ने उस कमाई पर अपना हक जमाए रखा. कमाल अमरोही का स्वभाव काफी सख्त और नियंत्रण रखने वाला था. मीना कुमारी अपने कैरियर में व्यस्त रहती थीं, दिनरात काम करती थीं मगर आर्थिक टकराव बढ़ा तो गलतफहमियां और दूरियां बढ़ती गईं और आखिरकार 1964 में उन का कमाल अमरोही से तलाक हो गया. तलाक के बाद मीना कुमारी का जीवन गहरे अकेलेपन में डूब गया. शराब की लत लग गई. जो धीरेधीरे गंभीर बीमारी में बदल गई. लिवर सिरोसिस के कारण मात्र 38 वर्ष की उम्र में मीना कुमारी का निधन हो गया.

ऐसा ही कुछ हाल परवीन बौबी का भी रहा. रंगीन परदे का यह चमकदार चेहरा अकेलेपन के अंधकार में डूबता चला गया. परवीन बौबी को प्रेम के नाम पर कई पुरुषों ने ठगा. वे आजीवन अविवाहित रहीं, परिवार से दूर अकेलेपन में जीवन बिताया, मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त रहीं और मौत के बाद कई दिन तक उन के अपार्टमैंट में उन की लाश को कीड़े नोचते रहे. दरअसल, उन का अकेलापन ही उन्हें खा गया.

लखनऊ में सायमा सिद्दीकी अपने 4 साल के बेटे के साथ मायके में मातापिता के पास रह रही है. उस की बाकी 3 बहनें अपनी अपनी ससुराल में हैं. कोई भाई नहीं है, लिहाजा जब सायमा का तलाक हुआ और वह अपने मायके वापस लौटी तो बाकी की बहनों को यह संतोष हुआ कि चलो, मांबाप की देखभाल के लिए कोई तो है. सायमा एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में टीचर है. बेटा भी उसी स्कूल में पढ़ता है. लिहाजा, उस की फीस आधी ही लगती है. सायमा की इनकम से उस के मांबाप का खर्च भी चलता है. अब चूंकि वह एक बेटे की तरह पूरे घर का खर्च उठा रही है, उस की दूसरी शादी के बारे में किसी को कोई खयाल नहीं आता है. हालांकि, अभी उस की उम्र महज 29 साल है.

अनेक तलाकशुदा या अधिक उम्र की कुंआरी मुसलिम महिलाएं अकेलेपन की त्रासदी झेलते हुए घर व बाहर के कामों में अपने को घुला रही हैं. तलाकशुदा महिला घर से बाहर निकल कर काम करने की शुरुआत सिर्फ इसलिए करती है ताकि वह मांबाप पर बोझ न बन जाए और समाज व परिवार के तानोंउलाहनों से बच जाए, मगर एक बार जब वह अपनी कमाई से परिवार का खर्च उठाने लगती है तो फिर पूरा परिवार उस पर ही आश्रित हो जाता है. वह उन के लिए सोने का अंडा देने वाली मुरगी बन जाती है.

फिर उस के निकाह का खयाल ही किसी के जेहन में नहीं आता. वह जीवनपर्यंत अकेलेपन का सामना करती है. घर व बाहर का दोहरा बोझ ढोती है. फिर भी गाहेबगाहे तानोंउलाहनों की शिकार होती ही रहती है. कहने को तो लड़कियों के लिए मायका एक सुरक्षित ठिकाना माना जाता है  जहां बेटी को बिना शर्त स्वीकार करने की बात कही जाती है, लेकिन वास्तविकता इस से उलट है. जिन मातापिता ने कभी बेटी को सहारा दिया था, अब वे उम्र के उस पड़ाव पर होते हैं जहां उन्हें खुद सहारे की जरूरत होती है. ऐसे में तलाकशुदा महिला, जो खुद भावनात्मक और सामाजिक रूप से कमजोर स्थिति में है, अचानक पूरे परिवार की देखभाल का केंद्र बन जाती है. वह घर के कामों से ले कर मातापिता की सेवा तक हर जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेती है. आर्थिक रूप से भी कई बार उसे योगदान देना पड़ता है. वह छोटेमोटे काम कर के अपनी सीमित आय से यह जिम्मेदारी निभाती है.

भारतीय समाज में महिला की पहचान अकसर उस के रिश्तों से तय की जाती है, जैसे यह किस की बेटी, किस की पत्नी, किस की मां है. लेकिन जब एक मुसलिम महिला तलाक या वैधव्य के बाद इन परिभाषाओं से बाहर निकल जाती है तो उस के सामने केवल एक व्यक्तिगत संकट ही नहीं, बल्कि सामाजिक अस्तित्व का प्रश्न भी खड़ा हो जाता है. ऐसी स्थिति में जब वह अपने मायके लौटती है तो यह वापसी अकसर आश्रय से अधिक जबरदस्ती की थोपी गई जिम्मेदारी के तौर पर उसे एहसास करवाई जाती है, जिस को हलका करने के लिए वह घर के सारे काम अपने ऊपर ओढ़ लेती है. मांबाप की देखभाल, भाई के बच्चों की आया, भाभी के काम में सहयोग करने वाली मेड और एक मुफ्त की नौकरानी बन जाती है ताकि उस के सिर पर एक छत बनी रहे.

अकेली या विधवा मुसलिम महिलाओं का जीवन अकसर कई स्तरों पर चुनौतियों से भरा हुआ है. ये चुनौतियां सिर्फ आर्थिक नहीं हैं, बल्कि सामाजिक, मानसिक, सांस्कृतिक और कानूनी पहलुओं से भी गहराई से जुड़ी हुई हैं. एक समाज के रूप में हम भले ही प्रगति की बात करते हों, लेकिन हकीकत यह है कि ऐसी महिलाओं का संघर्ष बहुत कठिन और बहुआयामी है.

पुनर्विवाह की दुविधा

इसलाम विधवा या तलाकशुदा के पुनर्विवाह की अनुमति देता है, लेकिन समाज इसे सहज रूप से स्वीकार नहीं करता. यदि कोई महिला पुनर्विवाह करना चाहती है तो कई बार उसे आलोचना का सामना करना पड़ता है. अगर उस के बच्चे हैं तो कहा जाता है कि ‘बच्चों का क्या होगा’ या ‘लोग क्या कहेंगे’. दूसरी ओर, अगर वह शादी नहीं करती है तो जीवनभर अकेलेपन, असुरक्षा और आर्थिक तंगी से जूझती रहती है. अगर शादी न कर के वह नौकरी कर अपना भरणपोषण करना चाहे तो उस की कमाई पर घर के दूसरे सदस्यों की निगाहें गड़ी रहती हैं और न चाहते हुए भी उसे अपनी कमाई का हिस्साबांट करना पड़ता है.

बच्चों की परवरिश की चुनौती

अकेली महिला के लिए बच्चों की परवरिश करना एक बड़ा संघर्ष होता है. उसे मां और पिता दोनों की भूमिकाएं निभानी पड़ती हैं. बच्चों की पढ़ाई, अनुशासन, भावनात्मक जरूरतें आदि सबकुछ अकेले संभालना मानसिक और शारीरिक रूप से थका देने वाला होता है. अकेली महिला के बच्चे भी कई बार समाज और परिवार के तानों का शिकार होते हैं.

मानसिक और भावनात्मक तनाव

अकेलापन, असुरक्षा और भविष्य की चिंता महिलाओं को मानसिक रूप से कमजोर करती है. एक अकेली महिला रात में अकेले घर में रहते हुए हर छोटी आवाज से डर जाती है या उसे यह चिंता सताती है कि अगर वह बीमार पड़ गई तो उस की देखभाल कौन करेगा.

धार्मिक और सांस्कृतिक दबाव

धार्मिक शिक्षाओं का हवाला दे कर अकेली महिलाओं पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाए जाते हैं, जैसे कि उन्हें घर से बाहर काम करने या स्वतंत्र निर्णय लेने से रोका जाता है. अकेली महिला, चाहे वह तलाकशुदा हो, विधवा हो या अविवाहित, को जीवन के कई स्तरों पर लगातार संघर्ष करना पड़ता है. समाज कभी उसे सहानुभूति तो कभी संदेह की नजरों से देखता है. अगर वह जवान है तो समाज हर एहसान के बदले उस के शरीर की मांग करता है. न कहे तो समाज उस के चरित्र पर सवाल उठाने लगता है.

ऐसी औरतों के सामने भावनात्मक अकेलापन एक बड़ा मसला है.

जीवन के कठिन क्षणों में सहारा देने वाला कोई साथी न होना महिला को, भीतर से तोड़ देता है. समाज में खुल कर अपने दर्द को साझा करना भी आसान नहीं होता क्योंकि अकसर उसे ‘कमजोरी’ समझ लिया जाता है. लिहाजा, अपने दर्द को खामोशी से पीते रहना ही इन का नसीब है.

समाज को समझना होगा कि तलाक या विधवा होना किसी महिला की पहचान का अंत नहीं है. बेटी का मायके लौटना या बेटी का अकेला रह जाने का यह मतलब नहीं है कि वह दूसरों के लिए काम करने वाली बाई बन कर रहेगी. ऐसी महिलाओं के लिए शिक्षा, रोजगार और मानसिक स्वास्थ्य सहायता के अवसर बढ़ाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाने बहुत जरूरी हैं. वे एक सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें, इस के लिए उन के आगे त्याग की शर्त न रखी जाए. उन के अस्तित्व को बिना शर्त स्वीकार कर के ही हम उन्हें फिर से जीवन जीने का अवसर दे सकते हैं.

साइंस, तकनीक से लाइफस्टाइल नई लेकिन समाज का रवैया वही : पिछले 200 सालों में साइंस और तकनीक के कारण समाज में बहुत परिवर्तन आए हैं. कट्टर देशों और कट्टरपंथियों में भी पुरुष अब बहुत से मामलों में बराबरी का हक पा गए हैं और खूब आजाद हैं. महिलाओं के मामलों में समाज आज भी संकुचित है. अकेली औरतें, जिन में विधवा, तलाकशुदा, गैरशादीशुदा और विकलांग शामिल हैं, आज भी तिरस्कृत हैं. वे या तो पिता या सासससुर और अगर बच्चे हैं तो बेटेबहू व बेटीदामाद के इशारों पर चलने को मजबूर हैं.

बहुत से कानून 2014 से पहले बने पर अब बढ़ती धर्मव्यवस्था ने औरतों को फिर से धर्मकर्म में धकेल दिया है. तथाकथित शिक्षित लड़कियोंऔरतों ने अकेली शिक्षित, अर्धशिक्षित या अशिक्षित लड़कियोंऔरतों के लिए कुछ नहीं किया. जबकि, पुरुषों ने गुट बना कर खापों, मीडिया, जजों, वकीलों, उपन्यासों, प्रवचनों के सहारे औरतों को किसी पुरुष की बांह में रहने को मजबूर कर दिया है. आज सड़क पर खड़ी एक करोड़ रुपए की गाड़ी तो सुरक्षित है लेकिन सड़क पर चलती एक लड़की सुरक्षित नहीं है, अकेली रह रही लड़की या औरत सुरक्षित नहीं है.

संपत्ति और अधिकारों से वंचित होना

इसलाम में महिलाओं को विरासत का अधिकार दिया गया है, लेकिन व्यवहार में देखा गया है कि अधिकांशतया उन्हें यह अधिकार मिलता नहीं है. परिवार या रिश्तेदार अकसर उन्हें उन का हिस्सा देने से बचते हैं. एक विधवा महिला को उस के पति की संपत्ति में हिस्सा मिलना चाहिए, लेकिन देवर या अन्य रिश्तेदार उसे यह कह कर रोक देते हैं कि ‘तुम्हारा गुजारा हम कर देंगे’, जबकि असल में उसे आर्थिक रूप से कमजोर बनाए रखा जाता है. उस का खर्चा चलाने का दावा कर के उसे घर की नौकरानी बना दिया जाता है. वह पूरे घर का काम करती है. खाना, बरतन, कपड़े सब उस की जिम्मेदारी बन जाती है. रमजान के दिनों में सुबह मुंहअंधेरे उठ कर सब के लिए सहरी तैयार करना उस का काम है. दिनभर खुद रोजा रख कर शाम की इफ्तार की पूरी तैयारी भी उसे ही करनी है.

मुसलिम कानून में बेटियों के अधिकार

मुसलिम पर्सनल ला (शरिया) के तहत मुसलिम लड़कियों को मातापिता की संपत्ति में निश्चित कानूनी हिस्सा पाने का अधिकार है, जो बेटों के हिस्से का आधा होता है. अगर केवल बेटियां हैं, बेटा नहीं तो उन्हें संपत्ति का 2/3 हिस्सा मिलता है. यह अधिकार जन्म से नहीं, बल्कि मातापिता की मृत्यु के बाद मिलता है. 1 बेटी को 1/2 (आधा) और 2 या अधिक बेटियां होने पर 2/3 (दोतिहाई) हिस्सा मिलता है. बेटी को मिलने वाली संपत्ति पर उस का पूर्ण मालिकाना हक होता है. वह इसे बेच सकती है, उपहार में दे सकती या वसीयत कर सकती है.

निकाह के समय पति से प्राप्त होने वाला मेहर भी महिला की निजी संपत्ति है, जिस पर उस का पूर्ण अधिकार होता है. मुसलिम कानून के अनुसार, मातापिता अपनी कुल संपत्ति के केवल एकतिहाई हिस्से की वसीयत कर सकते हैं. शेष दोतिहाई संपत्ति कानूनी वारिसों के बीच शरीयत के नियमों के अनुसार ही बांटी जाती है. बेटी के विवाहित होने से उस के पिता की संपत्ति में हिस्सेदारी के अधिकार पर कोई फर्क नहीं पड़ता. Muslim Women Struggle

कफन चोर

Suspense Story: यह कालोनी दिल्ली की मिडिल क्लास वाली थी जिस में आरडब्लूए कुछ न कुछ कराती रहती है. आज कालोनी के अरुण कम्यूनिटी हौल में सुबह श्याम कसरत करने के लिए पहुंचे तो वहां का नजारा ही बदला हुआ था. बड़ी चहलपहल हो रही थी. पूरे हौल में बड़ेबड़े बैनर लग चुके थे. ‘जान है तो जहान है’, मैडिकल एसोसिएशन की पहल पर आप की सेवा में उपस्थित रहेंगे- कार्डियोलौजिस्ट, डर्मियोलौजिस्ट, एन्डोक्राइनोलौजिस्ट, गैस्ट्रोएंटेरोलौजिस्ट, न्यूरोलौजिस्ट, और्थोपेडिक सर्जन, यूरोलौजिस्ट के साथ गाइनीकोलौजिस्ट, पेडियाट्रिशन और साइकोलौजिस्ट व  पल्मोनोलौजिस्ट, औप्टोमेट्रिस्ट. श्याम यह देख कर हैरान थे. इतने डाक्टर्स का मेला.

घर आ कर जब श्याम ने यह बात रंजना को बताई तो वह उत्साह से भरी हुई बोल उठी, ‘‘मैं न कहती थी, लेकिन आप हैं कि मानने को तैयार नहीं, है न सुविधा की बात, इतने डाक्टर्स के नाम भी हम ने नहीं सुने और वे सभी आज एक जगह मिलेंगे.’’ 4 दिन पहले की बात थी कि रंजना ने औफिस में ही पति को फोन कर के कहा था, ‘कालोनी के व्हाट्सऐप पर एक मैसेज आया है,’ रंजना ने पति को जानकारी देते हुए कहा था.

‘क्या मैसेज है?’ श्याम ने कहा.

‘मैसेज है कि संडे को डाक्टर कुलकर्णी कालोनी में मैडिकल एसोसिएशन की ओर से एक कैंप लगा रहे हैं. सब से बड़ी बात, यह एकदम फ्री मैडिकल टैस्ट कैंप है,’ रंजना उत्साह से बोली.

‘तो लगने दो. डाक्टर्स का तो यह बिजनैस ही है.’

‘आप भी न, अरे, बिजनैस परपज से नहीं, सोशल वर्क की दृष्टि से कैंप लगा रहे हैं वे, ताकि कालोनी के हर व्यक्ति का फ्री मैडिकल चैकअप हो सके. लोगों में हैल्थ अवेयरनैस के लिए वे शहरभर में इस तरह के कैंप लगाते रहते हैं.’’

‘ठीक है, लगाने दो, तुम क्यों इतनी उतावली हो रही हो?’

‘इसलिए कि एक तो संडे को दोनों की छुट्टी है, दोनों घर पर ही रहेंगे, दूसरे यह कि कैंप फ्री है. अगर हम कहीं मैडिकल चैकअप के लिए जाते हैं तो 4 हजार रुपए तो मामूली बात है. तो क्यों न कल हम दोनों भी अपना मैडिकल चैकअप करवा लें.’

‘लेकिन हमें कोई प्रौब्लम नहीं तो क्यों जाएं चैकअप करवाने, जिन्हें कोई तकलीफ हो उन्हें चैकअप कराने दो. बिना वजह भीड़ बढ़ाने से क्या फायदा,’ श्याम ने बहुत ही सहज भाव से कहा.

‘वही तो, भूल गए न आप, पिछले माह अचानक से जो मेरे पेट में तेज दर्द उठा था,’ रंजना थोड़े गुस्से में बोली.

‘पता है, और यह भी कि उस का कारण कोई बीमारी नहीं थी. उस दिन किटी में फ्री का माल समझ कर पेट की क्षमता से अधिक छोलेभटूरे डकार लिए थे तुम ने, इसलिए गैस बन गई थी, जो उलटी होने के बाद ठीक भी हो गई थी.’

‘नहीं, वो बात नहीं, मैं ने आप से कहा नहीं कि मुझे अभी भी कभीकभी पेट में दर्द उठता है.’

‘तो वह गैस की प्रौब्लम है. थोड़ा पैदल टहला करो, सब ठीक हो जाएगा. अपने दिमाग में बेकार की साइकोलौजी मत बनाओ. सीधेसीधे कहो कि शौक है फ्री का फायदा उठाने का.’

‘अब जो भी कहो, मुझे चैकअप कराना है.’

‘तो चली जाओ, खड़ी रहो कतार में.’

‘उहूं, मैं अकेली नहीं जाऊंगी. प्लीज, आप मेरे लिए ही मेरे संग चले चलिए न,’ रंजना के अनुनयविनय पर श्याम पत्नी रंजना संग कैंप पर जाने को तैयार हो गए थे.

जैसे ही रंजना और श्याम वहां पहुंचे, कालोनी के एक घर में क्लिनिक चलाने वाले डाक्टर कुलकर्णी ने गर्मजोशी से उन का स्वागत करते हुए कहा, ‘‘अरे श्यामजी, आप, सब कुशलमंगल तो है?’’

‘‘डाक्टर साहब, इधर तो प्रकृति की कृपा है, बस, बैटर हाफ में कुछ समस्या है,’’ मुसकराते हुए श्याम ने रंजना की ओर इशारा किया.

‘‘ओह, भाभीजी, क्या हुआ आप को? अच्छा किया आप यहां आ गईं. अपने पास पूरी टीम मौजूद है डाक्टर्स की. आइए, इधर आइए,’’ अपनी टेबल पर बैठते हुए डाक्टर कुलकर्णी ने उन्हें सामने रखी कुरसी पर बैठने का इशारा करते हुए पूछा, ‘‘हां तो, अब बताइए क्या प्रौब्लम है?’’

श्याम ने रंजना को कुहनी मार कर इशारा किया अपनी समस्या बताने का.

‘‘वो क्या है न डाक्टर साहब, पिछले महीने पेट में बहुत तेज दर्द उठा था. फिर सिर में भी भारीपन होने लगा. कुछ देर बाद दोतीन उलटियां हुईं.’’ रंजना अभी कुछ और समस्या बताती कि तभी श्याम चुटकी लेते हुए बीच में बोल पड़े, ‘‘और यह भी कहो कि उलटियां होने के बाद पेट दर्द ठीक भी हो गया क्योंकि छोलेभटूरे खाने से गैस बन गई थी.’’

‘‘अब आप ही कह लीजिए सबकुछ, मैं कुछ नहीं कहती,’’ रंजना नाराजगी दिखाते हुए बोली.

‘‘अरे भाभीजी, नाराज न हों, आप तो भलीभांति जानती हैं न श्यामजी की आदत को, बातबात पर मजाक करना आदत है इन की. अच्छा बताइए इस समय क्या होगी आप की उम्र?’’

‘‘सर, 50 प्लस.’’

‘‘लगती तो आप 40 प्लस की हैं भाभीजी. खूब मेंटेन किया है अपने को आप ने.’’

‘‘हेंहें,’’ करते हुए रंजना अपने पर ही मोहित हो गई.

‘‘श्यामजी, देखिए समय बड़ा नाजुक चल रहा है. 50 प्लस वालों को कोई रिस्क लेना नहीं चाहिए. फिर पेट का मामला है और अपने पास डाक्टर भी मौजूद हैं. अभी दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा. आप आइए मेरे साथ,’’ कहते हुए वे दोनों को ले कर गैस्ट्रोएंटेरोलौजिस्ट की टेबल की ओर बढ़ गए. रंजना और श्याम जैसे सम्मोहित से डाक्टर कुलकर्णी के पीछेपीछे चल पड़े.

‘‘डाक्टर अमित, ये दंपती श्यामजी और रंजना हैं, हमारे बड़े अच्छे नेबर हैं. भाभीजी को कुछ पेट संबंधी प्रौब्लम है, प्लीज जरा देखिएगा.’’ इस समय डाक्टर कुलकर्णी की वाणी में मानो शहद टपक रहा हो.

‘‘डोंट वरी मिस्टर कुलकर्णी, मैं अभी देख लेता हूं. जरा ये 3 पेशेंट और

देख लूं.’’

रंजना इतना वीआईपी ट्रीटमैंट पा कर फूली ही नहीं समा रही थी. कहां क्लिनिक में इतनी फीस देने के बाद भी घंटों इंतजार करते हुए बैठे रहो कि अब नंबर आएगा तब नंबर आएगा.

‘‘हम नाहक ही डाक्टर्स को कोसते हैं जी, देखिए कितने व्यावहारिक हैं ये लोग,’’ रंजना धीरे से पति के कानों में फुसफुसाते हुए बोली. श्याम जो हौल का मुआयना करते हुए हैरान थे, सोच रहे थे कि मैं बरसों से रोज सुबह यहां कसरत करने के लिए आता हूं मगर यहां कभी 25-30 से ऊपर संख्या नहीं दिखाई दी. आज चारों ओर ही लंबी कतार है. यह फ्री कैंप का असर है या वाकई इतने लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से उलझ रहे हैं?

रंजना की बातों से श्याम का ध्यान भंग हुआ, वह कुछ कहते, इस से पहले ही डाक्टर अमित ने आवाज लगाई, ‘‘मिसेस रंजना, प्लीज आइए.’’

रंजना ग्रीन परदे के पीछे रखे स्ट्रेचर पर लेट गई.

‘‘हां, तो बताइए कहां दर्द होता है, यहां?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘यहां?’’

‘‘नहींनहीं.’’

‘‘यहां?’’

‘‘हां, जी यहां.’’

‘‘ओके. क्या कुछ खाने के बाद होता है या हर समय बना रहता है?’’

‘‘जी, आजकल अकसर हलकाहलका दर्द बना ही रहता है.’’

‘‘आप की माहवारी नियमित है?’’

‘‘जी, पहले थी, अब तीनचार महीने में कभीकभार…’’ संकोच के कारण रंजना के शब्द लड़खड़ा रहे थे.

डाक्टर अमित समझ गए, ‘‘ओके, ओके, ठीक है आप आ जाइए बाहर,’’ कहते हुए डाक्टर अमित हैंडग्लव्स उतार कर डस्टबिन में डालते हुए बाहर अपनी चेयर पर आ बैठे. तब तक रंजना भी आ कर पति के बगल में बैठ गई. अपने नोटपैड पर कुछ प्रिस्क्रिप्शन लिखते हुए डा. अमित ने कहा, ‘‘श्यामजी, मुझे कुछ डाउट है कि कहीं रंजनाजी के गालब्लैडर में स्टोन न हो, बेहतर होगा आप एक अल्ट्रासाउंड करवा लीजिए, स्थिति क्लियर हो जाएगी.’’ डा. कुलकर्णी का हिप्नोटाइज रंजना पर तो पूरी तरह काम कर ही रहा था, अब श्याम भी डा. अमित की चपेट में आ गए.

‘‘ठीक है डाक्टर साहब, यह कालोनी से सटा हुआ जो सुजल अल्ट्रासाउंड सैंटर है वहां करवा लेता हूं, फिर आप के पास रिपोर्ट ले कर पहुंचता हूं.’’

‘‘सुजल अल्ट्रासाउंड, यह कौन सा सैंटर पैदा हो गया, भाई. कभी सुना नहीं यह नाम. नहीं श्यामजी, आप ऐसेवैसे सैंटर का रिस्क न लें, मेरे खयाल से ये जो हीरानंद हौस्पिटल है न.’’

‘‘हीरानंद, कभी सुना नहीं यह नाम, कहां है?’’ श्याम ने पूछा.

‘‘अरे, क्या बात करते हैं, यह नियरबाय सर्वोदय का अच्छा नया हौस्पिटल है. आप वहां करवा लीजिए. मैं लिख देता हूं, वे आप का काम जल्दी कर देंगे. फिर मैं शाम को लौटते समय वहीं आ कर रिपोर्ट भी चैक कर लूंगा,’’

डा. अमित ने कहा.

‘‘ठीक है, सर.’’

‘‘और हां, प्लीज लेट मत कीजिएगा, बीमारी बढ़ाने से कोई फायदा नहीं. मैं तो कहता हूं आप कल ही अल्ट्रासाउंड करवा लीजिए.’’

सचमुच दूसरे दिन श्याम और रंजना दोनों ने अपने दफ्तरों से छुट्टी ली और सुबह बिना खाएपिए रंजना को श्याम हीरानंद हौस्पिटल ले गए. उन्हें इंतजार था कि शाम को डाक्टर रिपोर्ट देख कर क्या कहते हैं.

शाम को रिपोर्ट चैक कर डा. अमित ने चेहरे पर गंभीरता लाते हुए कहा, ‘‘जिस का डर था वही हुआ.’’

‘‘क्या हुआ डाक्टर साहब,’’ घबराते हुए श्याम ने पूछा.

‘‘श्यामजी, इन के गालब्लैडर में स्टोन है, अच्छा किया समय पर चैकअप करवा लिया आप ने वरना बड़ी परेशानी होती.’’

‘‘अब क्या होगा डाक्टर?’’

‘‘चिंता की कोई बात नहीं श्यामजी. बस, एक छोटा सा औपरेशन है, घबराइए नहीं, स्टोन निकाल दिए जाएंगे. आप की इंश्योरेंस पौलिसी तो होगी न भाभीजी के नाम की?’’

‘‘जी सर, वह तो है.’’

‘‘कितने लाख की है?’’

‘‘जी, 10 लाख की है, सर.’’

‘‘तो आप जल्द ही इन्हें यहीं इसी हौस्पिटल में एडमिट करवा दीजिए, मैं किसी अच्छे सर्जन से बात कर लेता हूं.’’

‘‘मगर सर, हमारे बच्चे बाहर हैं, मुझे उन से एक बार बात करनी होगी.’’

‘‘अरे, श्यामजी, आप तो बेकार चिंता कर रहे हैं. इस में इतनी चिंता की कोई बात नहीं है. मामूली सा औपरेशन  है, सब ठीक हो जाएगा. बस, आप जो भी निर्णय लें, जल्दी ले लें. इनफैक्ट, मैं तो कहता हूं इसी हफ्ते करवा लीजिए वरना डाक्टर बाहर जाते रहते हैं, उन का समय मिलना मुश्किल होगा.’’

‘‘ठीक है डाक्टर. मैं घर जा कर बच्चों से बात कर बताता हूं.’’

‘‘जैसा भी हो, मुझे इन्फौर्म करें. एक दिन पहले एडमिट करवाना होगा ताकि सारे टैस्ट हो जाएं और दूसरे दिन सुबह औपरेशन हो जाए. तब तक मैं कुछ दवाएं लिख देता हूं, आप रैग्युलर

देते रहें.’’

श्याम ने घर जा कर जब दोनों बेटों से बात की तो छोटा बेटा रितेश बोला, ‘‘पापा, क्या ही अच्छा हो कि आप एक डाक्टर से और ओपिनियन ले लें.’’

‘‘ठीक है बेटा, पता करता हूं.’’

अपने जौब की व्यवस्था कह लीजिए या फिर रंजना भी ठीकठाक ही दिखाई दे रही थी, इसलिए श्याम ने इतनी तत्परता नहीं न दिखाई. रंजना दवाएं बराबर ले ही रही थी. एक सप्ताह होतेहोते डाक्टर अमित का ही फोन आया, ‘‘क्या सोचा है श्यामजी औपरेशन के बारे में, आप आए नहीं अभी तक?’’

‘‘जी, वो बच्चे अभी आने में असमर्थ हैं, उन्हें छुट्टी नहीं मिल रही. वो आ जाएं तो विचार कर बताता हूं.’’

‘‘जैसा आप उचित समझें श्यामजी लेकिन मेरी राय में स्टोन का गालब्लैडर में अधिक समय तक रहना घातक होगा. आप जितनी जल्दी औपरेशन करा लें, पेशेंट के फेवर में होगा.’’

फिर अगले दिन सुबह कालोनी के सभाकक्ष में कसरत करने के लिए जाते हुए डाक्टर कुलकर्णी टकरा गए. ‘‘गुडमौर्निंग श्यामजी, कैसी हैं भाभीजी?’’

‘‘उन्हें डाक्टर अमित ने गालब्लैडर में स्टोन बताया है और औपरेशन की सलाह दी है.’’

‘‘तो टैंशन की क्या बात है, करवा लीजिए न औपरेशन. इट्स सो इजी,’’ और साथ में हिदायत भी दे डाली कि जब समय से पता चल ही गया है तो ज्यादा देर करना उचित नहीं श्यामजी.

शाम को बेटों से बात करते हुए श्याम ने कहा, ‘‘मैं समझ नहीं पा रहा हूं और किस डाक्टर से ओपिनियन लूं और इधर ये डाक्टर कह रहे हैं कि देर करना ठीक नहीं है.’’ तब बड़ा बेटा रोहन बोला, ‘‘आप चिंता न करें, पापा. मैं औनलाइन पता करता हूं.’’

रोहन ने औनलाइन चैक करने के बाद किसी डाक्टर मंसूर की प्रोफाइल का ग्रेड देख कर उन का नाम सजेस्ट किया. वे एंडोस्कोपी के एक्सपर्ट हैं. इधर एक सप्ताह की दवाएं समाप्त होते ही रंजना ने फिर पेटदर्द की शिकायत शुरू कर दी. सो, श्याम ने उन्हें ही दिखाना उचित समझा. पुरानी सारी रिपोर्ट डा. मंसूर के सामने रखीं जिन्हें एक नजर में ही डा. मंसूर ने परे कर दिया.

रंजना का चैकअप कर उन्होंने अपनी सलाह देते हुए कहा, ‘‘श्यामजी, मुझे लगता है स्थिति कुछ क्लियर नहीं है, आप ऐसा करें ‘ईआरसीपी’ (एंडोस्कोपिक रेट्रोग्रेड कोलेंजियोपैन्क्रिएटोग्राफी) करवा लें. कारण, अगर लगातार टेबलेट लेने के बाद भी पेटदर्द बना हुआ है तो मुझे शक है पैंक्रियाज का कैंसर न हो. मैं समझता हूं कि आप पैनक्रियाज और गालब्लैडर की बायोप्सी भी करा ही लें.’’

‘‘कैंसर नाम सुनते ही श्याम की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. डाक्टर मंसूर का नाम है शहर में, सोचा, वे झूठ क्यों बोलेंगे? उधर मित्रों ने भी मशवरा दिया कि भाई डाक्टर डाक्टर होते हैं, गलत राय थोड़ी न देंगे. सो, उन्होंने पैनक्रियाज और गालब्लैडर की बायोप्सी करवाई. रिपोर्ट नैगेटिव आई लेकिन बायोप्सी और एंडोस्कोपी के बाद जहां सेहत में सुधार महसूस होना था वहीं उलटे, रंजना की तबीयत और बिगड़ने लगी. उस का दर्द और बढ़ गया.

ऐसे में श्याम विवश हुए और फिर हीरानंद हौस्पिटल में डाक्टर अमित के पास पहुंचे, सोचा, शायद उन्होंने ठीक ही कहा था. शायद स्टोन ही है. डा. अमित के पास जा कर उन्होंने डा. मंसूर के यहां का सारा वाकेआ उन्हें कह सुनाया. सारी बात सुन डाक्टर अमित भड़क उठे. उन का व्यवहार ही बदल गया. आवाज की वह मिठास करेले सी कड़वाहट में बदल गई.

‘‘अफसोस, श्यामजी, आप ने भरोसा न कर पेशेंट का केस और क्रिटिकल कर दिया है. अब अगर केस बिगड़ता है तो जिम्मेदारी आप की है. मैं ने कहा था कि आप से कि गालब्लैडर में स्टोन का अधिक समय तक रहना घातक हो सकता है.’’

क्या कहते श्याम, अपनेआप में ग्लानि महसूस कर सिर झुकाए सुनते रहे. आखिर, गलती उन्हीं से हुई है, क्या किया जाए.

‘‘सर, जो हुआ उसे भूल जाइए प्लीज बताइए आगे क्या करना है?’’

‘‘करना क्या है श्यामजी, पेशेंट को इमीडिएट एडमिट कराइए और अब फिर से हमें उन के वे पूरे टैस्ट करने होंगे, तब बता पाएंगे औपरेशन की क्या स्थिति है.’’

रंजना को एडमिट कर दिया गया. श्याम ने घबरा कर बेटों को कौल कर दिया. वे भी अगली फ्लाइट पकड़ कर आ गए. इधर, रंजना का दर्द था कि बढ़ता ही जा रहा था. उसे मंथली ब्लीडिंग जो काफी कम मात्रा में होती थी, अब अचानक बढ़ गई.

‘‘श्यामजी, हमें स्पैशलिस्ट को बुलाना होगा और उन की विजिट का चार्ज देना होगा.’’

‘‘जो भी होगा, डाक्टर बुला लीजिए.’’

3 स्पैशलिस्ट को अस्पताल ने अरेंज किया, उन्होंने शंका जाहिर की, ‘‘शायद पेट में इंटरनल ब्लीडिंग की वजह से यह दर्द हो रहा है, उन्हें फौरन आईसीयू में भरती किया जाए.’’

रोहन ने डाक्टर अमित से पूछा, ‘‘सर, इतने टैस्ट के बाद भी अब तक असली बीमारी पकड़ में क्यों नहीं आ रही है, हर डाक्टर केवल शंका ही जाहिर कर रहा है. कोई कुछ क्यों नहीं कह रहा?’’

‘‘मिस्टर रोहन, देखिए हम डाक्टर हैं, रिपोर्ट जो कहेगी वही न हम बताएंगे. फिर औपरेशन डिले कर केस आप ने खुद क्रिटिकल किया है.’’

‘‘मां खतरे में हैं, डाक्टर के शिकंजे में हैं,’’ इसलिए रोहन चुप रह गया वरना बहुतकुछ कहना चाहता था कि डाक्टर, मेरी मां तो अच्छीभली थीं, आप को कुछ समझ कर आप की शरण में आई थीं किंतु आज उन की यह हालत हो गई.

आईसीयू में रंजना को आराम लगने के बजाय उस की स्थिति और बिगड़ने लगी. उसे बेहद घबराहट और बेचैनी हो रही थी. उस का बीपी बारबार गड़बड़ाने लगा. डाक्टर ने लिवर, हार्ट और किडनी के साथ कई ब्लड टैस्ट और लिख दिए. अब की रिपोर्ट में बताया कि किडनी इन्फैक्टेड है और इन्हें डायलिसिस पर डालना होगा. रंजना को डायलिसिस पर डाल दिया गया. उस की कमजोरी बढ़ती जा रही थी.

दवा के नाम पर हर आधे घंटे में नर्स आ कर उसे पता नहीं क्याक्या दवाएं दे कर जा रही थी और बिल ऐड होता जा रहा था. दवाओं का असर था या कुछ और, रंजना को उलटियां शुरू हो गईं. उलटियों से पेट में खिंचाव की वजह से दर्द भी बढ़ गया. स्थिति यह हुई कि पानी या इलैक्ट्रौल भी उसे सूट नहीं हो रहा था, पेट में जाते ही उल्टी हो जाती. कुछ न खाने से वीकनैस बढ़ गई. रंजना को दफ्तर से अब अनपेड लीव पर रहना पड़ रहा था क्योंकि सारी लीव खत्म हो चुकी थीं.

रंजना को हौस्पिटल में रहते हुए लगभग महीना हो गया था. अब तक इंश्योरैंस की पूरी पौलिसी भी खत्म हो चुकी थी. श्यामजी की छुट्टियां समाप्त हो चुकी थीं. बच्चे आईटी कंपनी के जौब में नएनए लगे थे. यों भी इन कंपनियों में तो सदा ही छुट्टियों का टोटा रहता है. रिक्वैस्ट कर दोनों भाई बारीबारी से 6-8 दिन का वर्क फ्रौम होम ले कर आते. उन का फ्लाइट से आनेजाने का खर्च अलग बढ़ गया.

जैसेतैसे जीवन की गाड़ी लड़खड़ाती हुई चल रही थी. घर कामवालियों के भरोसे छोड़ दिया था. इधर रंजना की दिनचर्या थी हर 15 से 20 मिनट में एक लिक्विड दवा, हर 3 घंटे में एक ड्रिप, हर सप्ताह एक खून की बोतल. बस, ये ही उस के जीवन के आधार थे. वे भागतेभागते अपने औफिस जाते. दोनों का वेतन बंद हो जाए, यह अफोर्ड नहीं कर सकते थे. अब रंजना अकसर बेहोशी की हालत में रहती. पता नहीं ड्रिप में डली दवाओं का असर था या कुछ और लेकिन एक दिन रितेश के दोस्त प्रणय ने हालचाल लेने के लिए फोन लगाया, ‘‘क्या हुआ है आंटी को, रितेश?’’

‘‘वही तो पता नहीं चल रहा, प्रणय. अब तक डाक्टर जमानेभर के टैस्ट करवा चुके हैं. मगर बताते कुछ नहीं. ऐसा लग रहा है वे अपनी डाक्टरी का सारा एक्सपैरिमैंट मम्मी पर ही कर रहे हैं. कभी कुछ बीमारी का शक बता कर कुछ चैकअप करवाते हैं तो कभी कुछ.’’

‘‘तू ऐसा कर, आंटी की सारी रिपोर्ट मुझे भेज. मेरी दीदी मुंबई में अच्छी डाक्टर हैं. उन से पूछता हूं,’’ रितेश ने डाक्टर से रिपोर्ट देखने को मांगी तो डाक्टर ने अपनी नाराजगी दिखाई, ‘‘क्या मतलब है आप का, हम पर भरोसा नहीं तो क्यों लाए आप पेशेंट को यहां. इतना ही अविश्वास है तो ले जाइए अपने पेशेंट को.’’ डाक्टर तो जानता था कि पंछी पूरी तरह शिकंजे में फड़फड़ा तो सकता है मगर उड़ नहीं सकता. उस के पर जो कतर दिए हैं उस ने.

लेकिन फिर भी रितेश ने किसी तरह चुपचाप वार्डबौय की मदद से रिपोर्ट के फोटो मोबाइल में ले लिए और प्रणय को भेज दिए.

इधर, स्पैशलिस्ट आते रहे और अपना बिल बनाते रहे और रंजना को नईनई बीमारियां बताते रहे. अब की बार स्पैशलिस्ट को कहना पड़ा, पेशेंट का लिवर अफेक्टेड है, इसीलिए उन्हें कुछ हजम नहीं हो रहा है. उस ने अपना प्रिस्क्रिप्शन लिख दिया. एक पौलिथीन भर दवाइयां फिर नीचे के कैमिस्ट से आ गईं. समझ नहीं आ रहा था कि जिस पेशेंट को पानी और इलैक्ट्रौल नहीं मिल रहा है तो इतनी मैडिसिन कैसे झेल रही हैं? अगर नहीं तो ये सब कहां जा रही हैं? क्योंकि ये दवाएं परिवार वालों के सामने तो पेशेंट को कभी नहीं दीं.

आज रंजना को अस्पताल में आए 45 दिन हो गए. हर टैस्ट के अपने बिल, हर स्पैशलिस्ट के अपने बिल, रूम का किराया. तबीयत की बात करें तो दिनोंदिन डाउन ही होती जा रही थी. बिना खाएपिए कोई इंसान कब तक रह सकता है, कमजोरी तो बढ़नी ही है. कमजोरी के रहते रंजना को सांस लेने में भी तकलीफ होने लगी.

डाक्टर ने फौरन रिपोर्ट हाथ में थमा दी, ‘‘इन का हार्ट 20 फीसदी काम कर रहा है, इन्हें पेसमेकर लगाना होगा.’’ अच्छे स्वास्थ्य की कामना ले कर अपने पैरों पर चल कर आई रंजना अब अस्पताल के बिस्तर पर जिंदा लाश बन चुकी थी. यहां तक कि वह अपने हाथ से एक छोटा सा प्याला उठा कर भी नहीं पी पा रही थी. सबकुछ नर्स के भरोसे था. लगा अस्पताल के नाम को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है क्योंकि ये स्वास्थ्यकेंद्र नहीं, रुग्णालय हो गए हैं, जहां अच्छाभला इंसान भी आ कर रोगी हो जाता है.

श्याम भी बैठेबैठे सोच रहे थे, रंजना ठीकठाक आई थी अस्पताल, मामूली सा दर्द ले कर. डाक्टर के पास आ कर उसे कितनी बीमारियां निकल आईं. कैसे हुआ यह सब? कुछ समझ नहीं आ रहा. कल कालोनी में डाक्टर कुलकर्णी से उन का सामना हुआ लेकिन आज उन के लिए श्यामजी बैस्ट नेबर नहीं रहे थे. बस, एक पेशेंट की फैमिली के सदस्य थे. वे उखड़ेउखड़े अंदाज में बात कर आगे बढ़ गए. श्याम ने अभी कुछ समय पहले ही मकान बनवाया है, उस के बाद कुछ थोड़ीबहुत बची जमापूंजी जो थी वह भी धीरेधीरे निकल कर डाक्टर के हवाले कर दी. बच्चे भी अभीअभी जौब पर लगे हैं, छुट्टियों के रहते उन का कैरियर खतरे में आ रहा है. रंजना की हालत में तिल भर भी सुधार होता तो संतोष रहता. समझ नहीं आ रहा था क्या करें क्या न करें. वे मानसिक और शारीरिक रूप से बहुत थक गए थे.

आज तो सुबह से रंजना बहुत रो रही है, अंदर कोई भारी कष्ट हो रहा था शायद. बेटा दौड़ कर डाक्टर को बुला लाया. डाक्टर ने उस जिंदा लाश में भी बीमारी खोज निकाली और फौरन औपरेशन की सलाह दे डाली जिस का बड़ा सा इस्टीमेट काउंटर पर जमा करने की हिदायत भी. डाक्टर समझ जो गए थे कि अब मुरगी हलाल होने वाली है. आखिरी सोने का अंडा भी पा ही लें.

कैसे हो व्यवस्था?’’ श्याम ने बेटों की ओर देखा.

‘‘पापा, मम्मी के जो जेवर हैं वे मम्मी से बढ़ कर तो नहीं.’’

सो, लौकर से सारे जेवर निकाल कर उन्होंने जैसेतैसे कुछ पैसों की व्यवस्था की. कुछ करीबी रिश्तेदारों से उधार ले कर जैसेतैसे काउंटर पर जमा किए ताकि रंजना का औपरेशन हो सके. रंजना औपरेशन थिएटर में जा चुकी थी. श्याम उस दिन को कोस रहे थे जिस दिन कालोनी में वह फ्री कैंप लगा था, वे गए क्यों? गए क्या, अपनी अच्छीभली गृहस्थी को लुटा बैठे.

वहीं, बेटे सोच रहे थे कितना हंसमुख परिवार था हमारा, कितने खुश थे हम चारों, कितनी हंसमुख और सुंदर मां थी हमारी, कितने सपने देखे थे उन्होंने अपने बेटों के कैरियर को ले कर, विवाह और बच्चों को ले कर, यह क्या से क्या हो गया, जाने किस की नजर लग गई. औपरेशन थिएटर के बाहर श्याम और दोनों बेटे बड़ी बेसब्री से चहलकदमी कर रहे थे. इंतजार था डाक्टर के बाहर आने का.

लेकिन डाक्टर की जगह आई नर्स और हाथ में लंबाचौड़ा परचा पकड़ा कर बोली, ‘‘प्लीज, इमिडिएट.’’

बेटा दौड़ पड़ा, कहीं ऐसा न हो औपरेशन टेबल पर उन की मां दवाओं के अभाव में जीवन खो दे. नादान नहीं जानते थे, उन की मां तो कब की मर चुकी है अंदर. ये कफनचोर अब भी उन के हिस्से के कफन का पैसा भी उन से नोचने की फिराक में लगे हुए हैं. खैर, दवाओं का बड़ा सा पैकेट अंदर गया. शायद, उन्हें इसी अंतिम किस्त का इंतजार था.

तकरीबन 15 मिनट बाद ओ-टी का दरवाजा खुला. एक कुशल अभिनेता की तरह गरदन झुकाए 2 डाक्टर बाहर निकले, ‘‘आय एम सौरी श्यामजी, मिसेज रंजना इज नो मोर.’’

श्याम लुटे से डाक्टर को देखते रह गए.

‘‘पूरे जीवन की पूंजी हवन कर दी मैं ने डाक्टर. और आप कह रहे हैं शी इज नो मोर. जानते हैं मेरी पत्नी ने अपने इन बच्चों के लिए कितने सपने देखे थे? अभी तो उस के सपने पूरे होने का समय आया था और आप कह रहे हैं शी इज नो मोर.’’

डाक्टर पर जैसे उन के आंसुओं का कोई असर ही न हुआ और वे अपने लंचब्रेक पर चल दिए. खड़े रह गए उजड़े परिवार के ये

3 सदस्य. रितेश को ध्यान आया कि मां को एक नजर देख तो ले.

जैसे ही वे तीनों अंदर जाने को हुए, वार्डबौय ने उन्हें बाहर ही रोक दिया, ‘‘सर, आप अंदर नहीं जा सकते.’’

‘‘मगर क्यों, हम अपनी मां को देखना चाहते हैं.’’

‘‘जी, उन की डैड बौडी मौर्चुरी में जा चुकी है.’’

‘‘मौर्चुरी में, मगर क्यों? हम यहां बैठे हैं अपनी मां को ले घर ले जाने के लिए. ‘‘बताइए मौर्चुरी कहां है, हम अपनी मां को एक नजर देखना चाहते हैं. हम वहीं जा कर उन्हें देख लेंगे.‘‘ यह कहते हुए रितेश आगे बढ़ा तो 2 भारीभरकम बाउंसर उस के सामने आ कर खड़े हो गए.

‘‘कहा न, आप वहां नहीं जा सकते.’’

‘‘मगर क्यों?’’

‘‘क्योंकि अभी आप का पूरा बिल भुगतान नहीं हुआ है.’’

‘‘अरे, तो बिल ले कर हम भाग तो नहीं जाएंगे.’’

‘‘जी नहीं, आप पहले काउंटर पर जा कर अपना बिल पेमेंट कर दीजिए, फिर शौक से अपनी डैड बौडी घर ले जाइए.’’ तकदीर के मारे तीनों काउंटर पर पहुंचे जहां पर पौलिसी के 10 लाख के अलावा सारी दवाओं और औपरेशन के चार्ज, डाक्टर्स के राउंडचार्ज देने के बाद भी 5 लाख का बिल उन का इंतजार कर रहा था. कैसे व्यवस्था हो? अभी वे सोच रहे थे कि प्रणय का फोन आ गया, ‘‘हैलो रितेश, सौरी यार, दीदी अपने सैमिनार के चक्कर में आउट औफ इंडिया थीं, अब लौटी हैं.

दीदी ने सारी रिपोर्टें देखीं. उन का कहना है कि जो पहली रिपोर्ट थी अल्ट्रासाउंड की, उस में कहीं भी पेशेंट को गालब्लैडर में स्टोन है ही नहीं. और जो दर्द पेट के निचले हिस्से में था वह मंथली पीरियड जाने के समय अकसर 50 से ऊपर की महिलाओं को होता है जो एक सामान्य बात है लेकिन यह समझ नहीं आ रहा कि उन्हें बेमतलब हाई पावर मैडिसन क्यों दी जा रही हैं? दी पूछ रही हैं किस ने ट्रीटमैंट प्रिसक्राइब किया है? जानते हो इतना हाई डोज दे कर उन का लिवर इफैक्ट किया गया जिस के रहते वे कुछ खापी नहीं पा रही हैं. वह डोज फौरन बंद कर दो. बाकी सारी परेशानी उन की वीकनैस के कारण है. उन्हें कोई बीमारी नहीं है. उन का हार्ट और किडनी, सारी ब्लड रिपोर्ट एकदम नौर्मल हैं.

रोहन आजकल फर्जी डाक्टर्स का बड़ा ग्रुप इस तरह के स्कैम में लगा हुआ है जो पेशेंट को अपनी गिरफ्त में ले कर उन्हें झूठी रिपोर्ट दिखा कर बीमारी बता पैसा लूट रहे हैं. मुझे तो लगता है कि तुम ऐसे ही किसी मैडिकल स्कैम का शिकार हो गए हो. मेरी बात मानो तो जल्दी से जल्दी आंटी को वहां से बाहर निकाल लो. वैसे, अब कैसी हैं आंटी?’’

‘‘प्रणय, मां अब इस दुनिया से ही निकल चुकी है. उन्होंने मार डाला हमारी मां को, प्रणय. लोग झूठ कहते हैं कि डाक्टर धरती पर जीवनदाता का रूप होते हैं. जीवनदाता नहीं बल्कि ये हत्यारे हैं, हत्यारे.’’ Suspense Story

 

बिना किसी ठोस कारण अपनी मर्जी से पति से अलग रहने वाली पत्नी भरणपोषण की हकदार नहीं है

Husband Wife Case: रत्नप्रभा प्रकाश और ध्यानाबाजी की शादी 1985 में हुई थी. रत्नाकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी थे और जून 2018 में रिटायर हुए. रिटायरमैंट तक दोनों पतिपत्नी साथ रहे. रिटायरमैंट के बाद रत्नाकर अपने गांव चले गए लेकिन ध्यानाबाजी पति के साथ गांव जाने को तैयार नहीं हुईं. यहीं से दोनों के बीच विवाद बढ़ा और मामला कोर्ट तक पहुंचा. कोर्ट में ध्यानाबाजी ने आरोप लगाया कि पति ने उन के साथ दुर्व्यवहार किया और दूसरी महिला के साथ रहते हैं लेकिन इन दोनों आरोपों को वह कोर्ट में साबित नहीं कर पाई.

ध्यानाबाजी 34 साल तक पति के साथ रही इस बीच दोनों के बीच कोई विवाद नहीं हुआ. रिटायरमैंट के बाद गांव जाने की वजह से दोनों के बीच दूरियां पैदा हुईं. CrPC धारा 125(4) के अनुसार, “जो पत्नी बिना किसी पर्याप्त कारण के अपने पति के साथ रहने से इनकार करती है, वह CrPC की धारा 125 के तहत भरणपोषण की हकदार नहीं है.” इस मामले में पति की ओर से कोई गलत व्यवहार साबित नहीं हुआ इसलिए पत्नी का भरणपोषण का दावा खारिज हो गया.

फैमिली कोर्ट ने पहले ही पत्नी का दावा खारिज कर दिया था. अब हाईकोर्ट ने भी पत्नी की रिवीजन याचिका खारिज कर दी. CrPC धारा 125 केवल जरूरतमंद पत्नी को सुरक्षा देता है वहीं धारा 125(4) साफ तौर पर कहता है कि यदि पत्नी बिना पर्याप्त कारण पति के साथ रहने से मना करती है तो वह भरणपोषण नहीं पा सकती. पर्याप्त कारण में क्रूरता, खतरा, शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न शामिल हैं हर केस के तथ्य अलगअलग होते हैं. अगर पत्नी के पास क्रूरता या खतरे के ठोस सबूत हों, तो कोर्ट भरणपोषण दे सकता है. यह फैसला सिर्फ उन मामलों पर लागू होता है जहां अलगाव पूरी तरह मर्जी से हो. Husband Wife Case

जब विदेशी जाएं – खुद को करंसी का गणित समझाएं

Budget Travel Tips: विदेश यात्रा के दौरान सब से बड़ा झटका अकसर वहां की कीमतें देती हैं. मेन्यू पर 10 या 15 डौलर देख कर भारतीय पर्यटक तुरंत उसे रुपए में बदल लेते हैं और दाम बहुत महंगे लगने लगते हैं, लेकिन किसी भी देश की कीमतों को समझने का सही तरीका केवल मुद्रा बदलना नहीं, बल्कि वहां की आमदनी, जीवन स्तर और खर्च के अनुपात को साथसाथ देखना है.

पर्यटन इन दिनों विश्व स्तर पर बहुत सहज है. इस स्थिति में दूसरे देश में चीजों की कीमत समझने का सब से सही तरीका सिर्फ अपनी मुद्रा में कन्वर्ट करना नहीं, बल्कि वहां की आमदनी और जीवन स्तर के संदर्भ में सोचना है. जिस तरह भारत में 80 से 100 रुपए में एक अच्छी चाट आम शहरी के लिए सामान्य मानी जाती है, उसी तरह अमेरिका में लगभग 10 डौलर की एक प्लेट चाट वहां के मध्यवर्गीय व्यक्ति के लिए उतनी ही सामान्य बात है.

जब भारतीय पर्यटक किसी विदेशी रैस्तरां के मेन्यू पर 10 या 15 डौलर देखते हैं और तुरंत दिमाग में उसे 900 या 1,200 रुपए में बदल देते हैं तो स्वाभाविक रूप से कीमत बहुत अधिक लगती है लेकिन यह तुलना अधूरी है क्योंकि यह केवल मुद्रा के गणित को देखती है. उस समाज की आय और खर्च की वास्तविकता को ध्यान में रखे बिना सही मूल्यांकन संभव नहीं होगा.

केवल करंसी कन्वर्जन से नहीं समझी जा सकती कीमत

किसी भी देश में कौस्ट औफ लिविंग 2 चीजों से मिल कर बनती है, रोजमर्रा के खर्च और वहां की आमदनी. भारत में एक औसत व्यक्ति का मासिक व्यक्तिगत खर्च डौलर में बदलने पर भले कुछ सौ डौलर दिखे, पर इसी के साथ यह भी सच है कि औसत आय अपेक्षाकृत कम है, इसलिए 500 या 1,000 रुपए का अतिरिक्त खर्च सोचेसमझे बिना करना हर किसी के बस की बात नहीं होती.

दूसरी ओर, अमेरिका, यूके, यूएई, आस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे देशों में वही व्यक्तिगत खर्च डौलर या पाउंड में देखने पर भारत की तुलना में कई गुना अधिक नजर आता है, लेकिन उन की टैक्स के बाद की औसत सैलरी भी अकसर भारत के मुकाबले कई गुना अधिक होती है. इसीलिए जो चीज भारत के नजरिए से फुजूलखर्ची लग सकती है, वही उन देशों के निवासियों के लिए सिर्फ एक साधारण, रोजमर्रा का व्यय होती है.

बड़े शहरों में महंगाई का अलग गणित

भारत से सीधी तुलना करें तो यूएई, यूके, अमेरिका, कनाडा और आस्ट्रेलिया जैसे लोकप्रिय देशों में जीवनयापन का औसत खर्च लगभग 3 से 6 गुना तक अधिक दिखाई देता है. किराया, ट्रांसपोर्ट, बाहर खाना, सेवाएं आदि सब की कीमतें भारत से ज्यादा दिखती हैं.  विशेष तौर पर लंदन, दुबई, न्यूयौर्क, सिडनी या टोरंटो जैसे बड़े शहर इस दृष्टि से और भी महंगे पड़ते हैं. किंतु वही चित्र तब संतुलित दिखने लगता है जब यह देखा जाए कि इन देशों में औसत नैट सैलरी से किसी व्यक्ति का डेढ़ से

2 महीने तक का व्यक्तिगत खर्च निकल सकता है. यानी, वहां का निवासी यदि अपने शहर की स्टैंडर्ड नौकरी पर है तो उसे 10 डौलर की कौफी या 15 डौलर के लंच से उतना झटका नहीं लगता, जितना वह रकम सीधे भारत की अर्थव्यवस्था में डाल कर सोचने पर लगती है. इस अंतर को अनदेखा कर के केवल कन्वर्जन करने से हर कीमत अस्वाभाविक रूप से महंगी लगने लगती है.

यूएई का उदाहरण लें तो दुबई जैसे शहर में किराया, बिजली, पानी और रोजमर्रा के सामान की कीमतें भारत के औसत से कई गुना ऊपर हैं, लेकिन वहां बहुत से पेशों में टैक्स फ्री या कम टैक्स वाली उच्च आय मिलती है, जो इन खर्चों को संतुलित कर देती है. लंदन में सार्वजनिक परिवहन, किराया और बाहर खाना सब महंगे हैं, पर एक सामान्य प्रोफैशनल की आय ऐसी है कि इन खर्चों के बाद भी उस के पास बचत की पर्याप्त गुंजाइश रह जाती है. अमेरिका में भोजन, सेवाएं और स्वास्थ्य सुविधाएं भारत के मुकाबले बेहद महंगी मानी जाएंगी, फिर भी एक औसत कामकाजी व्यक्ति की सैलरी उन की भरपाई कर पाती है. कनाडा में मौसम कठोर है और कई चीजें आयात पर निर्भर हैं, इसलिए खर्च ऊंचे हैं, पर सामाजिक सुरक्षा और वेतन स्तर उन्हें वहां के लोगों के लिए व्यावहारिक बनाते हैं. आस्ट्रेलिया में खानेपीने और सेवा क्षेत्र की कीमतें भारत से कहीं ऊपर हैं, मगर न्यूनतम वेतन और औसत आय दोनों इन्हें वहां के निवासियों  हेतु सामान्य बनाते हैं.

खानेपीने की बात करें तो भारत में एक साधारण औफिसगोअर का लंच 250, 300 रुपए में अच्छे से निपट सकता है, वहीं यूएई या कनाडा के किसी शहर में कोई साधारण कैजुअल लंच 10-15 डौलर तक का हो सकता है. भारतीय पर्यटक इसे तुरंत रुपए में बदल कर देखता है और मन ही मन सोचता है कि एक दोपहर के खाने पर ही इतना पैसा, लेकिन वहीं के स्थानीय निवासी की मासिक आय को ध्यान में रखें तो यह खर्च उस की आमदनी के अनुपात में उतना ही है, जितना भारत में किसी मौल, फूडकोर्ट या अच्छे ढाबे पर 250, 300 रुपए खर्च करना.

कौफी के साथ भी यही कहानी दोहराई जाती है. भारत में 100 रुपए की कौफी, विदेश में 4-5 डौलर में मिलती है. रुपए में बदल कर देखें तो यह 2-3 गुना महंगी लगती है, मगर स्थानीय आय के अनुपात में यह किसी भी औफिसगोअर के लिए उतनी ही साधारण छोटी सी ट्रीट है जितनी भारत में किसी चायनाश्ते पर 40-50 रुपए खर्च करना.

समझदारी से बजट बनाएं तो विदेश भी किफायती

पर्यटक के लिए सब से व्यावहारिक नजरिया यह है कि हर कीमत को अपनी घरेलू मुद्रा में बदलबदल कर चौंकने के बजाय दैनिक बजट के रूप में देखे. यदि भारत में कोई व्यक्ति दिनभर के खानेपीने पर लगभग 800-1,000 रुपए खर्च करता है तो अमेरिका या यूके जाते समय उसे यह देखना चाहिए कि वहां उसी तरह के सरल, लेकिन आरामदायक दिन के लिए कितना बजट उचित होगा, उदाहरण के लिए, 30-40 डौलर प्रतिदिन. इस तुलना में केवल अंकों का खेल नहीं, बल्कि स्थानीय आय और वहां का सामान्य जीवन स्तर भी शामिल होना चाहिए.

साथ ही, हर जगह खर्च कम रखने के व्यावहारिक तरीके मौजूद हैं, पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेना, सुपरमार्केट से तैयार या अर्धतैयार भोजन खरीदना, ऐसे होस्टल या सर्विस्ड अपार्टमैंट चुनना जहां किचन की सुविधा हो और अत्यधिक पर्यटक केंद्रित महंगे इलाकों के बजाय थोड़ा अंदरूनी, स्थानीय महल्लों के कैफे, रैस्तरां आजमाना. इस तरह, अत्यधिक महंगे दिखने वाले देशों में भी यात्रा का कुल खर्च काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है.

सब से दिलचस्प और उपयोगी मानसिक अभ्यास यह है कि जब भी किसी बोर्ड पर 10-15 डौलर या 8-12 पाउंड की कीमत देख कर झटका लगे तो अपनेआप से एक छोटा सा प्रश्न पूछा जाए, यदि मेरी तनख्वाह भी इस देश की औसत सैलरी जितनी होती तो क्या यह दाम उतना ही चुभता. बहुत बार इस का उत्तर नहीं होगा और वही क्षण होता है जब समझ में आता है कि दिक्कत वास्तविक कीमत से ज्यादा, हमारे तुलना करने की मानसिकता में है.

करंसी कन्वर्जन का यह जाल जितना आकर्षक दिखता है उतना ही भ्रामक भी है. उस से बाहर निकल कर जब कोई भारतीय यात्री यूएई, लंदन, अमेरिका, आस्ट्रेलिया या कनाडा की कीमतों को उन की स्थानीय आमदनी व जीवन स्तर के संदर्भ में देखना शुरू कर देता है तो उस की यात्रा न केवल कम तनावपूर्ण होती है, बल्कि एक तरह से आर्थिक और सांस्कृतिक समझ को भी गहरा करती है. तब 10 डौलर की चाट केवल 950 रुपए की फुजूलखर्ची नहीं, बल्कि एक नए समाज के जीवन स्तर की छोटी सी झलक बन जाती है और यात्रा का अनुभव सचमुच ज्ञानवर्धक और रोचक हो उठता है. Budget Travel Tips

दुनिया में जंग – इंसानियत की हार

Iran Israel Conflict:  ‘‘लगेगी आग तो आएंगे घर कई जद में, यहां पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है.’’ मशहूर शायर राहत इंदौरी का यह शेर आज के वैश्विक हालात की तसवीर बयां करता है. यह सिर्फ एक काव्य पंक्ति नहीं, बल्कि एक गहरी चेतावनी है कि जंग कभी सीमित नहीं रहती है, उस की आग धीरेधीरे हर सरहद, हर समाज और हर अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में ले लेती है. आज ईरान के साथ इजराइल और अमेरिका का संघर्ष यह दर्शाता है कि लड़ाई भले 3 देशों के बीच शुरू हुई, लेकिन इस के असर ने पूरे पश्चिम एशिया को झकझोर दिया है. इस जंग की वजह से ईरान, लेबनान ही नहीं बल्कि सऊदी अरब, यूएई, कतर, बहरीन जैसे कई खाड़ी देश भारी असुरक्षा, तबाही और अस्थिरता की गिरफ्त में हैं.

आम जनता पर बुरा असर

जंग के कारण दुनियाभर में तेल उत्पादन और आपूर्ति प्रभावित हुई है, महंगाई बढ़ी है और उस का सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था व आमजन पर पड़ रहा है. पूरी दुनिया में तेल और गैस आपूर्ति ही बाधित नहीं हुई है बल्कि आमजन की रोजमर्रा की जरूरत का अरबोंखरबों रुपयों का सामान भी स्ट्रेट औफ होर्मुज में फंसे जहाजों में सड़ गया और सड़ रहा है.

भारत में व्यापक असर

भारत ने भले इस जंग से खुद को दूर रहने की कोशिश की लेकिन जंग का व्यापक प्रभाव यहां की जनता पर भी पड़ रहा है. खाना पकाने की गैस की किल्लत ने घर और खानेपीने की दुकानों, रैस्टोरैंट, होटलों, ढाबों आदि के चूल्हे ठंडे कर दिए गए हैं. लोग गैस का एक सिलैंडर पाने के लिए रातरात भर लाइन में लगे हुए हैं. गरीब तबका जो खाने की ठेली लगाता है, उस के घरों में तो फांकों की नौबत आ चुकी है.

प्रसिद्ध शायर साहिर लुधियानवी ने वर्षों पहले ही इस सच्चाई को शब्द दिए थे-

‘जंग तो खुद ही एक मसला है,

जंग क्या मसअलों का हल देगी,

आग और खून आज बख्शेगी,

भूख और एहतियाज कल देगी.’

यानी, जंग कभी समाधान नहीं होती, वह सिर्फ विनाश को जन्म देती है. वह विकास को दशकों पीछे धकेल देती है, समाजों को तोड़ती है और इंसानियत को शर्मसार करती है. इसलिए हर हाल में जंग को टालना ही बेहतर है, ताकि हर घर में अमन की शमा जलती रहे.

लेकिन अफसोस यह है कि दुनिया की ताकतवर कुरसियों पर बैठे नेता अपने अहं के चलते इस सच्चाई को नजरअंदाज कर देते हैं. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर भी यही आरोप हैं कि उन्होंने दूरदर्शिता के बजाय आक्रामकता को चुना. दबाव और तात्कालिक लाभ की लालसा में विनाश के रास्ते पर बढ़ गए. हजारों मासूमों की हत्या का दोष इन दोनों नेताओं के सिर है.

फंस चुके हैं डोनाल्ड ट्रंप

विशेषज्ञों का मानना है कि एक दिन पहले एक सभ्यता का अंत कर देने की धमकी देने वाले डोनाल्ड ट्रंप का अचानक सीजफायर के लिए यूटर्न लेना भी रणनीतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक कारण है. अमेरिका में चुनावी माहौल गरम है और इस जंग के कारण ट्रंप की लोकप्रियता पर बहुत असर पड़ रहा है. चारों तरफ उन की थूथू हो रही है. अमेरिका की सड़कों पर लोग उन के खिलाफ उतर पड़े हैं. उन्हें सत्ता से उखाड़ फेंकने के नारे बुलंद किए जा रहे हैं. ऐसे में शांति का संदेश देना ट्रंप की मजबूरी हो गई, ताकि कुरसी बची रहे. मगर यह शांति ज्यादा दिन कायम रहने वाली नहीं है क्योंकि अमेरिका और ईरान की पाकिस्तान में हुई शांतिवार्त्ता विफल हो चुकी है. ईरान ने अमेरिका द्वारा थोपी जा रही शर्तों को मानने से साफ इनकार कर दिया है. जाहिर है अब होर्मुज को ले कर लड़ाई तेज होगी.

शांतिवार्त्ता और बमबाजी साथसाथ  

40 दिन धुआंधार युद्ध और उस के बाद सीजफायर की घोषणा, फिर पाकिस्तान में शांतिवार्त्ता के दौरान भी इजराइल द्वारा लेबनान के नागरिक इलाकों पर हमले जारी रहना इस बात का संकेत है कि शांति की कोशिशें कितनी नाजुक और अस्थिर हैं. जब एक ओर बातचीत की पहल हो रही हो और दूसरी ओर बम गिर रहे हों तो भरोसा और शांति दोनों ही कमजोर पड़ जाते हैं. यह स्थिति बताती है कि स्थायी शांति केवल घोषणाओं से नहीं, बल्कि ईमानदार प्रतिबद्धता, पारदर्शिता और जमीनी स्तर पर हिंसा रोकने के ठोस प्रयासों से ही संभव है. जब तक दोनों पक्ष अपनेअपने रणनीतिक हितों से ऊपर उठ कर मानवीय दृष्टिकोण नहीं अपनाते, तब तक शांति बहाल की बातें बेमानी साबित होंगी.

इजराइल की खूनी साजिशें

शांतिवार्त्ता विफल होने की सब से अधिक खुशी इजराइल को है क्योंकि इजराइल नहीं चाहता कि अमेरिका ईरान पर अपने हमले रोके. शांतिवार्त्ता के बीच लेबनान पर जबरदस्त बमवर्षा कर इजराइल ने जाहिर कर दिया है कि वह अपनी खूनी हरकतें रोकने के लिए तैयार नहीं है. इस से खिन्न पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक्स पर लिखा था, ‘‘इजराइल शैतान है और मानवता पर धब्बा है. जहां इसलामाबाद में शांति की बातें हो रही हैं वहां वह लेबनान में नरसंहार कर रहा है. पहले वह गाजा में निर्दोष लोगों को मार रहा था और अब लेबनान में यही कर रहा है. उस का खूनखराबा बेरोकटोक जारी है. जिन लोगों ने यूरोपीय यहूदियों से छुटकारा पाने के लिए फिलिस्तीनियों की जमीन पर इस कैंसरनुमा देश को बनाया है वह जहन्नुम में जलें.’’

अपने चक्रव्यूह में फंसा अमेरिका

इस जंग में अमेरिका अपने ही चक्रव्यूह में उलझ कर रह गया है. इजराइल के दबाव में डोनाल्ड ट्रंप ईरान पर लावलश्कर ले कर चढ़ बैठे मगर अरबों डौलर का अपना खुद का नुकसान कर के अब इस युद्ध से बाहर निकलने का उन को रास्ता नजर नहीं आ रहा है. जिस उद्देश्य से ट्रंप ने यह लड़ाई शुरू की थी, वह उद्देश्य तो हासिल ही नहीं हुआ. स्ट्रेट औफ होर्मुज का रास्ता और बंद हो गया. ट्रंप निकले तो थे ईरान की रिजीम बदलने के लिए मगर वहां के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की शहादत के बाद उन की जगह उन के बेटे मोजतबा खामेनेई ने ले ली. ऐसे में न तो ईरान में सत्ता परिवर्तन हुआ, न उस का परमाणु या मिसाइल कार्यक्रम रुका. शांतिवार्त्ता के बाद तो ईरान ने साफ कह दिया है कि अब खुद को परमाणु शक्ति से मजबूत करने की उस के पास वजह भी है और जरूरत भी. कहना गलत न होगा कि इस संघर्ष ने ईरान को नुकसान तो पहुंचाया मगर अब वह और अधिक सुदृढ़ व आक्रामक हो गया है. अब ट्रंप होर्मुज पर नाकेबंदी की चेतावनी भी देने लगे हैं.

होर्मुज जलडमरूमध्य, जो पहले इस संघर्ष का हिस्सा भी नहीं था, ईरान ने उसे एक रणनीतिक हथियार में बदल दिया है और यही वह मोड़ है जहां अमेरिका को शांतिवार्त्ता की मेज पर आना पड़ा है. तमाम धमकियों व सैन्य क्षमता खत्म करने से ले कर ईरानी सभ्यता मिटा डालने तक की धमकी के बाद डोनाल्ड ट्रंप होर्मुज के मुहाने पर आ कर ऐसे फंसे हैं कि अब आगे क्या करना है, उन की समझ में नहीं आ रहा.

बहुधु्रवीय होती दुनिया

गौरतलब है कि 40 दिनों तक ईरान मजबूती से इजराइल और अमेरिका के सामने न सिर्फ डटा रहा बल्कि खाड़ी देशों में अमेरिका के तमाम सैन्य ठिकानों को उस ने अपनी रणनीति की ऐसी मिसाल पेश की कि अमेरिका घुटनों पर आ गया और उसे सीजफायर कराने के लिए पाकिस्तान जैसे देश की शरण में जाना पड़ा. कहना गलत नहीं होगा कि इस युद्ध में ईरान विजेता की तरह उभरा है. अयातुल्लाह अली खामेनेई समेत सरकार और सेना नेतृत्व की कई कतारें खो देने के बावजूद ईरान टस से मस नहीं हुआ. अंत में होर्मुज अपनी शर्तों पर खोल कर जंग रोकने के लिए राजी हुआ. जो होर्मुज युद्ध के कारणों में कहीं नहीं था, ईरान ने उसे अपना हथियार बना कर अमेरिका को बेबस कर दिया. पश्चिम एशिया में अमेरिका के हमदर्द और दोस्त बने खाड़ी देशों को भी ईरान ने अपनी मिसाइलों का निशाना बना कर ऐसा सबक सिखाया कि सारे के सारे अपनी सुरक्षा को ले कर चिंतित हो उठे.

डोनाल्ड ट्रंप की अदूरदर्शिता और मूर्खता ने अमेरिका के वैश्विक वर्चस्व को बड़ा झटका दिया है. होर्मुज के लिए जहां नाटो देशों ने ट्रंप का साथ देने से खुल कर इनकार कर दिया तो वहीं स्पेन, इटली ने तो उस के विमानों को उड़ान भरने तक की इजाजत नहीं दी. उन का कहना है कि जब युद्ध से पहले होर्मुज खुला ही था तो युद्ध शुरू ही क्यों किया?    सब से अहम बात यह है कि इस युद्ध ने अमेरिका के वैश्विक वर्चस्व पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं. नाटो देशों का खुला समर्थन न मिलना और स्पेन व इटली जैसे देशों का सैन्य सहयोग से पीछे हटना इस बात का संकेत है कि अब दुनिया एकध्रुवीय नहीं रही.

युद्ध हमेशा विनाशकारी

युद्ध मानव सभ्यता के लिए ठीक नहीं है. इस युद्ध ने एक और खतरनाक प्रवृत्ति को जन्म दिया है- हथियारों की होड़. जो देश अमेरिका के डर से अब तक परमाणु शक्ति बनने से हिचक रहे थे, वे अब अपनी सुरक्षा के लिए इस दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं. अपनी सुरक्षा के लिए अब सभी देश नई रणनीति पर काम करेंगे. ईरान खुद परमाणु शक्ति बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ेगा क्योंकि अब तो उस के पास पुख्ता वजह भी है. कहा जा सकता है कि यह संघर्ष शांति नहीं, बल्कि भविष्य के और बड़े खतरों की नींव रख रहा है. इसलिए बहुत जरूरी है कि ताकत के अहंकार से ऊपर उठ कर संवाद, समझ और शांति को प्राथमिकता दी जाए, वरना वह आग, जिस की लपटें आज दूर दिख रही हैं, कल हर घर तक पहुंच सकती हैं.

डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू दोनों ने अपनेअपने धर्मगुरुओं के उकसाने पर ईरान को सबक सिखाने के लिए युद्ध छेड़ा पर पासा पलट गया क्योंकि ईरान ने पहले से तैयारी कर रखी थी. पश्चिम एशिया के दूसरे इसलामी देश तो तेल बेचने के चक्कर में यूरोप और अमेरिका से चिपके रहे पर ईरान ने चर्चों की कट्टरता का शिया इसलाम की कट्टरता से करारा जवाब दिया. लेकिन धर्म और नेताओं के अहं के कारण दुनियाभर की आम जनता बेवजह ही तनाव और परेशानी में फंस रही है.               -नसीम अंसारी कोचर द्य

ईरान में रहने वाले यहूदी और ईसाईयों के साथ ईरानियों का बरताव कैसा

वर्ष 2016 की सरकारी जनगणना में ईरान में रहने वाले यहूदियों की कुल संख्या 9,826 थी. यहूदियों की यह आबादी तेहरान, शिराज और इस्फहान में है. मुसलिम देशों में यहूदियों की सब से बड़ी आबादी ईरान में ही बसती है. ईरान में हिंदुओं की कुल आबादी 39,200 है. 2016 की जनगणना में ईसाई लगभग 1,17,700 हैं जो आर्मेनियाई और असीरियन मूल के हैं. पिछले एक दशक में ईसाई मिशनरीज ने ईरान में कन्वर्जन भी अच्छीखासी तादाद में किया है जिस से ईसाइयों की कुल आबादी 3 लाख तक पहुंच गई है. ईरान में सब से बड़े ईसाई समुदाय आर्मेनियाई अपोस्टोलिक चर्च के हैं. ईरान में सुन्नी जनसंख्या आबादी का लगभग 8 प्रतिशत तक हैं यानी सब से बड़े शिया देश में लगभग 50 लाख सुन्नी भी रहते हैं.

सब से बड़ी बात यह है कि ईरान से अमेरिका और इजराइल की दशकों पुरानी दुश्मनी रही है. दोनों यहूदी और ईसाई देशों ने ईरान पर हमले किए लेकिन इस लड़ाई में ईरान में न किसी यहूदी की मौब लिंचिंग हुई न किसी ईसाई को परेशान किया गया और न किसी हिंदू की दुकान बंद करवाई गई. ईरानियों ने किसी से अपने देश का मजहबी गीत भी गला दबा कर लाठीडंडे के जोर पर नहीं गवाया. न ‘अल्लाह हो अकबर’ कहलवाया और न ही किसी को मारापीटा. न किसी यहूदी या ईसाई से देशभक्ति का सुबूत मांगा, न किसी को गद्दार कहा, न यहूदियों से इजराइल जाने को कहा, न ईसाइयों को अमेरिका भगाने की कोशिश हुई और न हिंदुओं को नेपाल जाने को कहा गया.

तेहरान में यहूदी धर्मस्थल रफी निया सिनेगौग इज़राइली हमले में बरबाद हुआ जो तमाम यहूदियों के लिए एक महत्त्वपूर्ण धार्मिक और सामाजिक केंद्र था. ईरान के लोग यहूदियों की मदद के लिए वहां पहुंचे, उसे बनाने का वादा किया, किसी ने नहीं कहा कि इस के नीचे हमारे इमाम की कब्र है. ईरान में हिंदू मंदिर भी हैं, जैसे कि बंदर अब्बास में विष्णु मंदिर और तेहरान में श्री वेंकटेश्वर मंदिर मगर किसी ईरानी ने इन के ऊपर अपना धार्मिक झंडा नहीं लहराया, न डीजे बजाया, न गाना गाया. इस से यह साबित होता है कि ईरानियों के लिए धर्म से ऊपर इंसानियत है. 4 हजार साल पुरानी असली ईरानी सभ्यता की पहचान यही है जिसे डोनाल्ड ट्रंप कभी नहीं मिटा पाएंगे. Iran Israel Conflict: दुनिया में जंग – इंसानियत की हार

छद्म नैतिकता खा रही है ‘अकेलों की आजादी’

Relationship Struggle: लखनऊ के त्रिवेणीनगर की रहने वाली पूजा मिश्रा की शादी 22 साल की उम्र में हुई थी. वह उस समय प्राइवेट कंपनी में एमबीए करने के बाद जौब कर रही थी. उस का पति निखिल बरेली में रहता था. उस का अपना बिजनेस था. शादी के बाद पूजा ने अपनी नौकरी छोड़ दी और ससुराल में रहने लगी. शादी के 2 साल तक दोनों में अच्छी निभ रही थी. इस बीच पूजा के बेटी हो गई. पूजा के अनुसार बेटी होने के बाद से ही पति और उस के परिवार के लोगों ने मारपीट और झगड़ा शुरू कर दिया. यह बात पूजा ने अपने मातापिता को बताई. पूजा की एक छोटी बहन भी थी. वह भी शादी योग्य थी.

पूजा के मातापिता चाहते थे कि जब तक पूजा की छोटी बहन की शादी न हो जाए वह अपनी सुसराल में कोई अनबन न करे. पूजा ने बहन की शादी तक सहन किया इस के कुछ ही माह के बाद अपनी एक साल की बेटी को ले कर लखनऊ चली आई. पूजा 2-3 माह अपने मातापिता के साथ रही. वह कहती है मेरे मातापिता इस से खुश नहीं थे. मातापिता के घर रह कर पूजा ने अपने लिए नौकरी तलाश करनी शुरू की. एक सौफ्टवेयर कंपनी में 30 हजार माह की उस की नौकरी लग गई.

पूजा ने उसी कालोनी में किराए पर मकान लिया जिस में उस के मातापिता रहते थे. इस की वजह यह थी कि पूजा अपनी बेटी को अपनी मां के पास छोड़ जाती थी. जब नौकरी से वापस आए तो बेटी को अपने पास ले लेती थी. पूजा बताती है ‘हम ने किराए का मकान लिया पर उस में जरूरत के सामान जुटाने में कई माह का वक्त लगा. कमरे में एक सोफा था उसी पर मांबेटी सो लेते थे. अपने मातापिता पर बोझ मैं नहीं बनाना चाहती थी’. पति के साथ पूजा ने आपसी सहमति के आधार पर तलाक ले लिया था.

30 साल की उम्र तक पूजा की शादी, बच्चा, तलाक और घर से बाहर रहने की हालत झेल चुकी थी. एक ही कालोनी में रहने के फायदे और नुकसान दोनों थे. पूजा ने कुछ माह तो उस कालोनी में गुजारे पर जैसे ही बेटी का एडमिशन प्ले स्कूल में हुआ उस ने मातापिता की कालोनी छोड़ कर अपने औफिस के पास अपार्टमेंट में रहने लगी. पूजा कम उम्र थी अकेली तलाकशुदा थी तो हर कोई उसे पटाने के चक्कर में रहता था. ऐसे में पूजा अपने किसी पुरूष मित्र से मिलने से कतराती थी. अगर मजबूरन किसी को बुलाना पड़े तो वह क्लब हाउस में बुलाती थी.

उसे लगता था कि जैसे ही आसपास के लोगों को यह पता चलेगा कि कोई मुझ से मिलने आते है वह तमाम तरह की बातें बनाने लगेंगे. ऐसे में उसे यह कालोनी भी छोड़नी पड़ सकती है. इस से बचने के लिए उस ने एतिहात बरतना शुरू कर दिया. पूजा कहती है ‘छद्म नैतिकता वाले लोगों के चलते मैं उन को ही अपने घर लाती हूं जो मेरी तरह सिंगल न हो. मैं खुद कहीं जाती हूं तो अपनी बेटी को ले कर जाती हूं.’

समाज में अकेले रहने वालों की संख्या बढ़ रही है. इस में तलाकशुदा लड़केलड़कियां तो हैं ही जिन्होंने अपनी शादी नहीं की है वह भी हैं. अकेले रहने वाली लड़कियां खासतौर पर निशाने पर रहती हैं. इस के अलावा जो लड़के अकेले रहते हैं वह अपनी महिला मित्र को लगातार अपने फ्लैट पर बुलाना चाहे तो दिक्कत होती है. आमतौर पर ऐसे लड़केलड़कियां अपने आसपास रहने वालों से अधिक घुलतेमिलते नहीं हैं. छद्म नैतिकता का असर यह है कि चाहे किसी महल्ले के छोटे से कमरे में किराए का मकान ले कर रहना हो या फिर किसी बड़ी कालोनी या अपार्टमेंट में अड़ोसपड़ोस में रहने वाले लोग आंखे गढाए रहते हैं. इन की निगाहों के आगे सीसीटीवी भी फेल होता है. सोशल मीडिया पर इस तरह की समस्या को ले कर तरहतरह के मीम्स भी बनते रहते हैं. जिस से यह साफ पता चलता है कि अकेले रहने वाले लोग किसकिस तरह से छद्म नैतिकता वाले लोगों से परेशान हैं.

बैचलर है तो ‘नो इंट्री’:

कई अपार्टमेंट ऐसे हैं जहां अकेले और खासकर कुंवारे यानि बैचलर्स को रहने के लिए घर नहीं दिए जाते हैं. भारत में ऐसे कई मामले सामने आए हैं, जहां बैचलर्स, छात्र, कामकाजी पेशेवर, या यहां तक कि अकेली महिलाओं को भी किराए पर घर देने में मना कर दिया जाता है. सामान्यतौर पर हाउसिंग सोसायटी के नियम लिखित रूप से यह नहीं कहते हैं. व्यवहारिक रूप से छद्म नैतिकता को बढ़ावा देने वाले लोग इस तरह के कानून बना लेते हैं.

किसी भी फ्लैट या मकान को किराए पर देने का अधिकार उस के मालिक के पास होता है, न कि सोसायटी के पास होता है. इस के बाद भी रेजिडैंट वैलफेयर एसोसिएशन में बैठे छद्म नैतिकता वाले लोग मकान मालिक पर भी मनमानी करने वाला काम करते हैं. उन का तर्क होता है कि कुंवारे लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता है. वह अपनी महिला मित्रों को बुला सकते हैं जिस से आसपास का माहौल खराब होता है.

लखनऊ के यमुना अपार्टमैंट में रहने वाला नरेश यादव अपनी महिला मित्र प्रिया को बुलाता था. एक दिन एक दूसरी महिला रानी प्रकाश वहां आई जिस ने यह दावा किया कि नरेश उस का पति है उसे छोड़ कर प्रिया के साथ रह रहा है. अपार्टमैंट में हंगामा होने लगा. पुलिस आई नरेश और प्रिया को थाने ले गई. बाद में दोनों को निजी मुचलके पर इस शर्त के साथ छोड़ कि अब वह यमुना अपार्टमैंट में रहने नहीं जाएंगे.

कुंवारे लोगों को किराए पर घर या फ्लैट न दिए जाने के पीछे सब से बड़ी वजह छद्म नैतिकता वाले विचार है. मकान मालिक अकसर मानते हैं कि कुंवारे लड़केलड़कियां देर रात तक पार्टियां करते हैं, शोर मचाते हैं और उन के पड़ोसियों के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं. इस के अलावा कुंवारे घर को गंदा रखेंगे, सफाई का ध्यान नहीं रखेंगे और संपत्ति को नुकसान पहुंचा सकते हैं. कई रिहायशी सोसायटियों में नियम होते हैं कि वे कुंवारों को घर नहीं देंगे, क्योंकि उन्हें लगता है कि इस से सुरक्षा संबंधी समस्याएं पैदा हो सकती हैं. किसी सोसाइटी का कुंवारे लोगों को घर किराए पर देने से रोकना अनैतिक है, लेकिन भारत में कुंवारों के अधिकारों के लिए कोई विशेष कानून नहीं है. मकान मालिक को अंतिम निर्णय लेने का अधिकार है.

सीसीटीवी की निगरानी युवाओं पर पड़ती है भारी:

ज्यादातर जगहों पर कैमरे से निगरानी होती है. जिस से लड़केलड़कियों का आना मुश्किल होता है. जो उन की सैक्स लाइफ को प्रभावित करते हैं. लड़केलड़कियां भले ही अकेले रह रहे हों पर उन की सैक्स करने की इच्छा खत्म नहीं हो जाती है. जब उन के साथियों को आने नहीं दिया जाता या उन की निगरानी और जांच पड़ताल होती है तो वह मिलने से डरते हैं. क्योंकि उन की गोपनियता नहीं रहती. गेट पर उन का नाम नंबर और गाड़ी का नंबर नोट किया जाता है. मोबाइल से उन की फोटो ली जाती है. यह उन को अपनी निजता का हनन लगता है. ऐेसे में वह ऐसी जगह जाने से बचते हैं.

महल्ले और सड़क ही नहीं अब गांव घर, अस्पताल, स्कूल कालेज, कारखाने सब सीसीटीवी की निगरानी में होते हैं. ऐसे में किसी के पास प्राइवेसी नामक चीज नहीं रह गई है. जगहजगह बिना किसी नियम कानून को समझे लोग कैमरा लगवा ले रहे हैं. सीसीटीवी कैमरे लगवाने के लिए हाउसिंग एंड डेवलपमैंट बोर्ड ने 2023 में यह नीतिगत फैसला लिया कि मकान मालिक बिना पूर्व अनुमति लिए गलियारों की ओर कैमरे लगा सकते हैं, इस के जरिए किसी की निजता में दखल नहीं दे सकते हैं.

जस्टिस केएस पुट्टास्वामी बनाम भारत सरकार में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राइट टू प्राइवेसी यानि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार में आता है. आप कैमरा लगा सकते हैं लेकिन इस के जरिए किसी की जिंदगी में ताकाझांकी गलत होता है. नियमों का पालन न करने पर भारी आर्थिक दंड और सजा दोनों हो सकती है.

यही नहीं अगर रिकार्ड किए गए फुटेज को सार्वजनिक रूप से वितरित किया जाएगा तो उस के खिलाफ आईटी एक्ट और डेटा संरक्षण अधिनियम गोपनीयता कानून के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है. यह कानून बताता है कि कैमरे का उपयोग पूरी जिम्मेदारी से करना होगा. कानून के तहत पड़ोसी का मतलब 100 मीटर के दायरे में रहना वाला कोई भी व्यक्ति हो सकता है. पड़ोसियों की खिड़कियों या निजी स्थानों की ओर सीधे कैमरे लगाना कानून अपराध होता है.

अपार्टमैंट में अब मकान मालिक साझा गलियारे की ओर मुख कर के एक सीसीटीवी यूनिट लगा सकते हैं. कैमरे का लैंस केवल उन के अपने दरवाजे के सामने के क्षेत्र पर ही केंद्रित होना चाहिए. यह पड़ोसियों के दरवाजों को कैप्चर नहीं करना चाहिए. आर. राजगोपाल बनाम तमिलनाडु स्टेट मुकदमे में कोर्ट ने कहा कि किसी को भी अकेले रहने का अधिकार है. बिना अनुमति किसी की निजी गतिविधियों को रिकार्ड करना गलत है. 2022 में हुए सर्वेक्षण के अनुसार कैमरा रिकार्डिंग के चलते पड़ोसियों के साथ विवादों में 33 फीसदी की वृद्धि हुई है. घर मालिकों को रिकार्ड की गई सामग्री को संभालने के लिए नियम बनाने चाहिए. कई बार किसी अपराधिक घटना के होने के बाद पुलिस कैमरे से वीडियो फुटेज देखना चाहती है. यहां भी कोर्ट खडक सिंह बनाम उत्तर प्रदेश के मुकदमें में फैसला देते कहती है कि किसी की भी बिना उचित कारण के लगातार निगरानी करना गलत है.

कैमरे से भी खतरनाक है अपार्टमैंट में बने कानून:

12 अगस्त 2017 की बात है एस्सेल टावर्स के एक ब्लौक पायलट कोर्ट के लगभग 15-20 युवा किराएदारों ने पुलिस आयुक्त संदीप खिरवार से मुलाकात की. इन युवाओं को शिकायत थी कि उन के घर आने वाले मेहमानों के ऊपर प्रतिबंध न लगाया जाए. कई अपार्टमैंट में काम करने वाले आरडब्ल्यूए यानि रेजिडैंट वैलफेयर एसोसिएशन मेहमानों के आने पर कई तरह के प्रतिबंध लगाती है. जैसे उन के वाहनों को अपार्टमैंट में आने से रोका जाता है. कई जगहों पर विजिटर्स पार्किंग नहीं होती है.

एसीपी अनिल कुमार ने किराएदारों और आरडब्ल्यूए के साथ बैठक बुलाई. आपसी बातचीत के बाद यह तय हुआ कि मेहमानों के आने पर कोई प्रतिबंध नहीं होगा. सोसायटी में आने वाले हर व्यक्ति को पहचान पत्र दिखाना होगा और किराएदारों को भी अपने आईडी कार्ड बनवाने होंगे. पुलिस ने एसोसिएशन को सोसायटी में सीसीटीवी कैमरे लगाने के निर्देश दिए. पुलिस ने कहा कि सुरक्षा के लिए सोसाइटी में नियम बनाए जा सकते हैं लेकिन उन को जबरन लागू नहीं किया जा सकता है. किराएदारों को आईकार्ड बनवाने और मेहमानों को पहचान पत्र दिखाने के लिए कह कर आपसी विवाद को हल किया गया.

असल में तो यह कानून सुरक्षा के नाम पर छद्म नैतिकता को दिखाते हैं. जब तक किसी तरह के अपराध की जानकारी न हो किसी कि पहचान को इस तरह से उजागर करना ठीक नहीं होता है. अपार्टमेंट में सुरक्षा के अपने काम किए जाते हैं. हर गेट पर आने जाने वाले को फोन नंबर, उस की गाड़ी का नंबर उस का पता लिखा जाता है. जब अपार्टमैंट के अंदर रहने वाला किसी को अंदर आने की परमीशन देता है तभी वह आता है. इस के बाद भी उस की फोटो गेट पर खींच ली जाती है. ऐसे में युवाओं से मिलने आने वाली लड़कीलड़का वहां आने से परहेज करता है.

अपार्टमैंट में सुरक्षा और प्रवेश को ले कर विवाद बढ़ते जा रहे हैं. यह एक आम समस्या हो गई है. इस की सब से बड़ी वजह आरडब्ल्यूए में बैठे दकियानूसी विचारों वाले लोग हैं. इस के चलते सुरक्षाकर्मियों और डिलीवरी बौय के बीच मारपीट की घटनाएं वायरल होती रहती हैं. अभी नोएडा में डिलिवरी बौय और गार्ड्स के बीच गलत फ्लैट में घंटी बजाने को ले कर लाठीडंडे चल गए थे. प्रवेश से इनकार करने या कड़ी जांच के दौरान सुरक्षा गार्डों और अपार्टमैंट में रहने वालों और मेहमानों के बीच मारपीट के मामले बढ़ रहे हैं. नोएडा में ऐसे ही एक विवाद में एक व्यक्ति ने एक महिला की लातघूंसों से पिटाई कर दी.

मकान मालिक का बिना पूर्व सूचना के किराएदार के घर में प्रवेश करना या रेंट एग्रीमैंट की शर्तों के उल्लंघन में जबरन प्रवेश करना भी एक गंभीर विवाद का विषय है. मकान मालिक अकसर सुरक्षा कारणों से या रैंट एग्रीमैंट खत्म होने के बाद किराएदारों को घर खाली करने से पहले परिसर में प्रवेश करने से रोक देते हैं. गार्ड को सुरक्षा बनाए रखने के लिए नियम बनाने का अधिकार है. कई बार मेहमान इस बात को नहीं समझते. गार्ड तो आरडब्ल्यूए के बनाए नियम से काम करता है. आरडब्ल्यूए के लोग कानून तोड़ते हैं तो कोई दिक्कत नहीं होती है. ज्यादातर पुलिस भी आरडब्ल्यूए का ही पक्ष लेती है.

किसकिस तरह के हैं कैमरे:

सीसीटीवी के लिए अच्छे किस्म के कैमरे आने लगे हैं. इन में स्मार्ट, वायरलैस और एआई वाले कैमरे बहुत प्रयोग किए जा रहे हैं. कई कैमरे ऐसे हैं जिन को लगाने के बाद कहीं से भी मोबाइल पर देख सकते हैं. वाईफाई पीटीजेड में पैन-टिल्ट-जूम, वीडियो डोरबेल, बुलेट, डोम और वायरलैस बैटरी कैमरे शामिल है. यह 360 डिग्री कवरेज, नाइट विजन, टू-वे औडियो और मोशन डिटैक्शन जैसे स्मार्ट फीचर्स के साथ आते हैं. जो घर के हर कोने पर नजर रखने के लिए बेहतरीन हैं.

वीडियो डोरबेल कैमरा दरवाजे पर आने वाले व्यक्ति को देखने और बात करने के लिए होता है. बुलेट और डोम कैमरे में बुलेट बाहर के लिए और डोम अंदर के लिए आने वाले कैमरे बढ़िया रिजौल्यूशन के साथ साफ तस्वीर देते हैं. इन कैमरों में बैटरी अंदर लगी होती है. बिजली से इन का कनैक्शन होता है. फोन का एक सिम लगा होता है. कई कैमरा युनिट सोलर से चलने वाली होती है. वीडियो स्टोरेज कैपेसिटी के हिसाब से इन की कीमत होती है. साथ ही साथ इस को देखने के लिए मौनीटर भी लेना होता है.

एक सप्ताह वीडियो स्टोरेज वाले कैमरे 8 हजार से 10 हजार के आते हैं. इस के साथ मौनीटर और रिकार्डर सहित पूरी युनिट 18 से 20 हजार में लग जाती है. एक युनिट में 4 कैमरे से 8 कैमरे लगाने तक की सुविधा होती है. एआईै के जरीए चलने वाले स्मार्ट फीचर्स वाले कैमरे इंसान या किसी की भी हलचल को पकड़ कर संदेश दे देते हैं. इन में टू-वे औडियो से बात करने की सुविधा भी होती है. यह अंधेरे में भी क्लियर रिकार्डिंग करते हैं. कैमरे को एंगल को दूर बैठ कर एप के जरिए घुमाया जा सकता है.

सीसीटीवी सुरक्षा के नियम बने:

कैमरों का प्रयोग सुरक्षा के लिए हो किसी की निजता को भंग करने के लिए न हो. जब तक कोई अपराध न हो कोई भी कैमरो में रिकार्डिग को देख न सके. खासकर अपार्टमैंट में बनी आरडब्ल्यूए के लोग वहां तक पहुंच न सके. इस से किसी को यह डर नहीं होगा कि रिकार्डिग से उन को ब्लैकमेल किया जा सकता है. जहां भी सीसीटीवी निगरानी करने वाले कैमरे लगे हैं वहां बहुत गोपनीयता बरती जाए. जिस से कोई भी रिकार्ड हुए सीन देख न सके और न ही किसी और को दिखा सके. अगर ऐसे किया जाता है तो उस के लिए कठोर सजा का प्रावधान हो.

आज के दौर में जब लोग अकेले रह रहे हैं उन की जरूरतें बदल रही है. उन को सैक्स पार्टनर की जरूरत होती है. तमाम तरह के सुरक्षा उपायों के कारण उन को मन मार कर रहना पड़ता है. ऐसे में अकेले रह रहे लड़केलड़कियों की इच्छा का सम्मान करते हुए कानून बने. केवल छद्म नैतिकता के कारण अकेले रह रही लड़कियों और लड़कों की निजता का हनन न किया जाए. उन की सुरक्षा के साथ ही साथ निजता का ध्यान रखा जाए. ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने के साथ ही साथ उन की जरूरतों का ध्यान समाज को देना चाहिए. तभी एक स्वस्थ्य समाज का निर्माण हो सकता है. Relationship Struggle

ब्रह्मफांस

Hindi Stories: पंडित बजरंगी और मेरे बीच बहस काफी देर से चल रही थी. वह कह रहे थे कि हर काम भगवान की इच्छा से होता है और मैं तर्क के साथ उन की बातों का विरोध कर रहा था. अपनी लगातार हार के कारण वह काफी झुंझला गए थे और उन का गुस्सा कचकचा कर बाहर भी निकल आया था, लेकिन फिर यह सोच कर कि यजमान नाराज हो जाएगा तो मुफ्त की कमाई चली जाएगी, उन्होंने भोंडी मुसकान के साथ बातों का लेप लगा दिया.

उधर मेरी पत्नी की घूरती आंखें मुझे टोक रही थीं जिस का मतलब था कि अब चुप हो जाइए, बहुत हो चुकी यह बहस. यह बहस मेरे टूटे हुए पैर के कारण और निवारण पर चल रही थी. पिछले सप्ताह मैं मोटरसाइकिल से अपनी ससुराल से लौट रहा था. चूंकि रास्ते में मेरी बूआजी का गांव पड़ता है अत: मेरा विचार बना कि वहां से होता हुआ अपने गांव जाऊंगा. बूआ के गांव का रास्ता बहुत ऊबड़खाबड़ था, जिस पर बीचबीच में बरसाती गड्ढे बने हुए थे. एक जगह इसी तरह का एक गड्ढा बचाने की कोशिश में मेरी मोटरसाइकिल फिसल कर किनारे की पक्की नाली में चली गई और नाली की दीवार से टकरा कर मेरे बाएं पैर की हड्डी टूट गई. फिर स्थानीय लोगों ने मेरे बताने पर मुझे ससुराल पहुंचा दिया था. तब से प्लास्टर लगने के बाद मैं वहीं पड़ा हुआ हूं. शहर होने के कारण यहां हर तरह की सुविधाएं उपलब्ध हैं.

पंडितजी की मानें तो मेरे पैर टूटने का कारण सिर्फ यही है कि आजकल मेरे ग्रह ठीक नहीं चल रहे हैं इसलिए यह दुर्घटना हुई है. यदि विधिवत पूजापाठ कर के ग्रहों को शांत न किया गया तो भविष्य में इस से भी बड़ा अनिष्ट हो सकता है.

‘‘तब क्या करना पड़ेगा पंडितजी?’’ मेरी सास ने पूछा.

‘‘दुलहन, अब इस के निवारण के लिए महामृत्युंजय मंत्र का सवा लाख जाप करना पड़ेगा और मैं मंत्र से जगा कर एक जंतर दूंगा जिसे मेहमान को दाहिने हाथ में धारण करना पड़ेगा,’’ पंडितजी ने कहा.

‘‘खर्चा क्या पड़ जाएगा, पंडितजी?’’

‘‘आप लोग मेरे पुराने यजमान हैं,’’ बातों में और शहद घोलते हुए पंडितजी बोले, ‘‘कम से कम 8 पंडित तो जाप करने के लिए बैठेंगे ही. उन को एकएक धोती, अंगोछा, एक पात्र और 551 रुपए दक्षिणा तो देना

ही पड़ेगा. जंतर का 500 रुपए और मेरी दक्षिणा आप जो उचित समझें दें, बस.’’

‘‘कुछ कम में नहीं हो जाएगा, पंडितजी?’’ मेरी सासजी ने झिझकते हुए पूछा.

‘‘आप भी क्या कहती हैं दुलहनजी, आप लोग राजा हैं. क्या कमी है आप को. जब भगवान ने दिया है तो धरम के काम में कंजूसी नहीं करनी चाहिए,’’ पंडितजी मुंह खोले उन की ओर देखने लगे.

अचानक पंडितजी के मुंह से लार बाहर आते देख स्वाति चिल्लाई, ‘‘अरे संभालिए पंडितजी, संभालिए.’’

पंडितजी ने अपनी हथेली मुंह पर लगाई और उसे वापस सुड़क लिया. देखने वालों को बरबस ही हंसी फूट पड़ी.

श्वेता और स्वाति को अब पंडितजी के रूप में बैठेबिठाए एक तमाशा मिल गया. उन्हें चिढ़ाने में उन दोनों को बहुत मजा आ रहा था. उन के तकिया कलाम ‘हे रामजी हो’ को वे कुछ भी कह कर अवश्य दुहरातीं.

श्वेता मेरी छोटी साली है और स्वाति उस की मौसेरी बहन. दोनों एम.ए. प्रथम वर्ष की छात्राएं हैं. शादी के बाद चूंकि गरमी की छुट्टियां चल रही हैं, इसलिए स्वाति भी यहीं रुकी हुई है. दोनों का स्वभाव एक सा होने के कारण इन में खूब पटती है. दोनों ही एकदूसरे से बढ़ कर खूबसूरत और शरारती हैं. फिर भी श्वेता की तुलना में स्वाति कुछ अधिक ही चुलबुली है.

मेरे पैर में फ्रैक्चर होने के बाद श्वेता ने अपनी बहन से कहा, ‘‘दीदी, जानती हो जीजाजी के पैर में फ्रैक्चर कैसे हुआ?’’

‘‘कैसे?’’

‘‘यह फ्रैक्चर अनजाने में नहीं हुआ है बल्कि इन्होंने जानबूझ कर अपना पैर खुद ही तोड़ लिया है.’’

‘‘क्या बात करती हो?’’

‘‘हां दीदी, बात यह है कि जीजाजी तुम्हें बेहद प्यार करते हैं और तुम्हें छोड़ कर अकेले जाना नहीं चाहते थे, इसलिए इन्होंने जानबूझ कर पैर तोड़ लिया और तुम्हारे पास चले आए.’’

‘‘नहीं, श्वेता, तुम एकदम गलत कह रही हो,’’ स्वाति ने कहा.

‘‘तब सही क्या है, तुम्हीं बताओ?’’

‘‘सही यह है कि जीजाजी, दीदी के कारण पैर तोड़ कर वापस नहीं आए, ये तो तुम्हारे प्यार में वापस आए हैं.’’

‘‘धत्, रुको, अभी बताती हूं,’’ श्वेता ने स्वाति को दौड़ाया और दोनों कमरे से बाहर चली गईं. इस तरह के मजाक और इस से भी बढ़ कर शरारतें ये अकसर आपस में किया करती हैं.

हां, तो पंडितजी के साथ जो बातचीत चल रही थी उस में फिर शरीक होते हुए मैं ने थोड़ी जोर से कहा, ‘‘देखिए, आप लोग इस फालतू बहस में न पड़ें. दुर्घटना इसलिए हुई कि वह रास्ता काफी खराब था जिस से गाड़ी फिसल गई और मैं उस पर नियंत्रण नहीं रख सका. इस में किसी ग्रहनक्षत्र और देवीदेवता का कोई योगदान नहीं था.’’

‘‘था, अजय बाबू था, आप नहीं समझ रहे हैं. बिना भगवान की इच्छा के कुछ नहीं होता. एक पत्ता तक नहीं हिलता है. वह लिखा है न, ‘तेरी इच्छा के बिना हे प्रभु, मंगल मूल, पत्ता तक हिलता नहीं, खिले न कोई फूल.’ ’’

उन की कूढ़मग्ज और अपाहिज दलीलों से मैं अब ऊब चुका था. मैं ने आवेश में आ कर कहा, ‘‘यदि उन्हीं की इच्छा से सब होता है तो क्या ये रोज की हत्या, लूट, बलात्कार और आगजनी वही करवाते हैं? ये जाति व धर्म के नाम पर लोगों को वही लड़वाते हैं. वे सभी को भले कामों के लिए प्रेरित क्यों नहीं करते? यदि यही सब करवाते हैं आप के भगवान तो वे भगवान नहीं राक्षस हैं,’’ मैं गुस्से में बोले जा रहा था, ‘‘यदि इतने ही शक्तिशाली हैं आप के भगवान तो वे खुद क्यों दूसरों के मुहताज होते हैं. जब वे अपनी व्यवस्था और सुरक्षा स्वयं नहीं कर पाते तो भक्तों की क्या भलाई करेंगे.’’

‘‘रिलेक्स, जीजाजी रिलेक्स,’’ स्वाति बोली, ‘‘आप तो सब जानते हुए भी नहीं समझ रहे हैं. यह पंडितजी की रोजीरोेटी का सवाल है और इस में आप का लगता भी क्या है, पैसे तो मौसीजी खर्च करेंगी. हां, आप हम लोगों को एक फिल्म दिखा दीजिएगा और किसी अच्छे से होटल में डिनर दे दीजिएगा.’’

मैं ने सोचा था कि मेरी इस तरह की बातों से कुढ़ कर पंडितजी चले जाएंगे किंतु वह अव्वल दरजे के सहनशील थे. इतना सुन कर भी हंस रहे थे और आशा लगाए हुए थे कि मैं उन की बातें मान लूंगा.

इसी बीच बड़े साले की शादी की वीडियो फिल्म शुरू हो गई थी. कमरे में बैठे सभी लोग फिल्म देखने में मशगूल हो गए. बाहर से भी कुछ लोग आ कर कमरे में बैठ गए. पड़ोसिन भौजी पान चुभलाती आ कर मेरे पास बैठ गईं. भौजी को उन के महल्ले के बच्चे, बूढ़े, जवान सभी भौजी ही कहते हैं. वह महल्ले भर की खबरें रखती हैं और मौका पाते ही धड़ाधड़ समाचार सुनाने लगती हैं. किस के घर क्या हुआ है, यह जानना हो तो आप भौजी से मिल सकते हैं. बातबात में हंसना, रोना और अपनी कही बातों को सच साबित करने के लिए कसमें खाना उन का सहज स्वभाव है.

मैं ने उन्हें छेड़ते हुए कहा, ‘‘क्यों भौजी, मैं ने सुना है पंडितजी बहुत अच्छे हैं, विद्वान हैं और पहुंचे हुए भी हैं.’’

‘‘लुआठ हैं, अरे मर गए चंद्रभान पंडित, नहीं तो इन को कोई पूछता?’’

‘‘भौजी, सुनते हैं कि चंद्रभान पंडित को इन्होंने मंत्र से मार डाला था,’’ मैं ने कुरेदते हुए कहा, ‘‘सुना है, उन के सामने इन्हें कोई पूछता ही नहीं था.’’

‘‘मंत्र से नहीं, इस बजरंगी ने जहर दे कर उन्हें मारा है.’’

‘‘अच्छा, कैसे?’’ मैं ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘चंद्रभान पंडित जब बुखार में पड़े थे तो यह उन को देखने जाता था. एक दिन शाम को देखने गया तो वह अकेले सो रहे थे. मौका देख कर इस पापी ने उन की दवाई में जहर मिला दिया. पंडितजी दवा पी कर जो एक बार सोए तो हमेशा के लिए ही सो गए. वह तो सुबह उन का नीला पड़ा शरीर देख कर लोगों को जहर देने का अंदेशा हुआ था. बाद में भेद भी खुल गया क्योंकि इन को दवा के साथ हेरफेर करते हुए गांव के ही एक व्यक्ति ने देख लिया था.’’

‘‘कुछ और बताइए न भौजी, आप की बातें भी आप ही की तरह अच्छी लगती हैं.’’

मैं ने चापलूसी की, जिस का भौजी पर फौरन असर हुआ. वह फिर चहकने लगीं और अब की बार पंडित के चरित्र का परदाफाश करते हुए एक बड़ी मजेदार कहानी सुनाईं.

‘‘इस शहर में अच्छू सोनार की बहू को शादी के कई साल बाद भी जब कोई बालबच्चा नहीं हुआ तो कुछ लोगों की सलाह पर वह पंडितजी की शरण में गया. उस ने पंडितजी के पैर पकड़ कर विनती की, ‘पंडितजी, अगर मेरी बहू को बच्चा नहीं हुआ तो मेरे खानदान का नाम ही मिट जाएगा. यह रुपयापैसा, धन- दौलत सब कौन भोगेगा, हमें मरने के बाद पिंडपानी कौन देगा?’

‘‘पंडितजी ने द्रवित हो कर कहा, ‘होगा यजमान, तुम्हारी बहू को बच्चा जरूर होगा.’

‘‘फिर पंडित ने पूजापाठ शुरू की. अकेली कोठरी में सेठ की बहू को सामने बैठा कर वह घंटों मंत्र बोलते, बीचबीच में उस की देह पर एकाध फूल और अक्षत भी फेंक देते.

‘‘एक दिन पंडितजी मंत्र बोलतेबोलते उस के बिलकुल पास चले गए तथा उस का हाथ अपने हाथ में ले कर सहलाने लगे और जब तक सोनार की बहू कुछ समझे उन्होंने उस को अपनी बांहों में कस लिया. वह पंडित की नीयत को समझते ही जोरजोर से चिल्लाने लगी. शोर सुन कर लोग वहां जमा हो गए और पंडित की ऐसी धुनाई की कि वह कई दिनों तक गुड़हलदी पीते रहे.’’ कहानी सुना कर भौजी चुप हो गईं.

अब की बार मैं ने पंडितजी को ध्यान से देखा तो उन में मुझे अपने बाबा का प्रतिबिंब नजर आया. उन की चुटिया, चंदन और वेशभूषा बहुतकुछ मेरे बाबा से मिल रही थी. मेरे बाबाजी अपने इलाके के बड़े ही जानेमाने और प्रतिष्ठित पंडित थे. वह किसी को देखते ही उस का भूत, वर्तमान और भविष्य सब बता देते थे. दूरदूर से तमाम बच्चे उन से पंडिताई पढ़ने आते थे.

मेरे बाबाजी केवल अपनी पंडिताई के बल पर माह में हजारों रुपए कमाते थे. बड़ेबड़े मंत्री, अधिकारी और सेठसाहूकार उन से मिल कर अपने को धन्य समझते थे. बाबाजी जब मरे तब मैं 7वीं कक्षा में पढ़ रहा था. मरने के कुछ समय पहले एक बार मुझे भी उन के साथ यात्रा करने का मौका मिला था. अतीत की वह घटना मेरी आंखों के आगे साकार होने लगी. बाबा की आंखों की रोशनी कम हो गई थी अत: जब भी वह शहर जाते किसी न किसी को ले कर जाते. उस बार वह तब के मुख्यमंत्री की कोठी पर जा रहे थे तो मुझे भी साथ ले कर गए थे. मुख्यमंत्रीजी बाबा को अपना गुरु मानते थे. बाबाजी हर साल उन की कुंडली बनाते थे और उसे उन के जन्मदिन पर भेंट करते थे.

बाबा के साथ की गई उस 10-12 दिन की यात्रा में मुझे कई आश्चर्यजनक अनुभव हुए जिन का मेरे किशोर मन पर गहरा असर पड़ा था. मैं ने पहली बार जाना था कि इलाके में सम्मान पाने वाले मेरे बाबा गाड़ी में बिना टिकट लिए ही चलते हैं क्योंकि उन के पास मुख्यमंत्री के हाथ का लिखा हुआ एक पहचान पत्र था जो ऐसे वक्त में काम आता था.

गाड़ी से उतर कर हम मुख्यमंत्री की कोठी पर पहुंचे. उस दिन वहां बड़ी भीड़ थी और कई पुलिस वाले बंदूकें लिए पहरा दे रहे थे. उन्हें देख कर मुझे डर लगने लगा तो मैं ने बाबा का हाथ कस कर पकड़ लिया. फिर हम धीरेधीरे चलते हुए मुख्यमंत्रीजी की बैठक के सामने पहुंचे. बीच में कुछ लोगों ने मेरे बाबा के पैरों को छू कर उन्हें प्रणाम किया. बाबा को देखते ही मुख्यमंत्री खड़े हो गए और उन्हें प्रणाम कर के आदर सहित बैठाया. यह सब देख कर तब मुझे अपने बाबा पर गर्व महसूस हुआ था.

शाम को वहां और भी भीड़ जमा हो गई. बाबाजी ने मंत्र बोल कर मुख्यमंत्रीजी को चंदन लगाया और फिर अपने साथ लाई कुंडली उन्हें भेंट की जिसे सब को पढ़ कर सुनाया गया. दूसरे दिन जब हम वहां से चलने लगे तो मुख्यमंत्रीजी ने मुझे 200 रुपए दिए. मैं बहुत खुश हुआ क्योंकि उस से पहले मुझे कभी इतने रुपए नहीं मिले थे.

मेरे बाबा जब किसी गांव में जाते थे तो गांव के बाहर ही रुक कर किसी आनेजाने वाले गंवार को रोक कर प्रेम से अपने पास बिठा लेते थे और उस से गांव के खासखास प्रतिष्ठित लोगों के बारे में पूरी जानकारी लेते. जैसे वह क्या करते हैं, कितने लड़केलड़कियां हैं, पत्नी है कि नहीं, कोई बीमारी तो नहीं है आदि. फिर गांव में पहुंच कर बाबाजी उन्हीं लोगों का हाथ देखते थे और सबकुछ सहीसही बता देते थे. फिर तो बाबा का वहां ऐसा रंग जमता कि पूछना ही क्या. बाबा उन से मनमाना पैसा वसूल करते थे.

बाबाजी लोगों पर असर डालने के लिए एक और हथियार चलाते थे जो उन का अचूक शस्त्र होता था. उन्होंने मुझ से छोटेछोटे कागजों पर अलगअलग कुछ फूलों के नाम लिखवा लिए जैसे गुलाब, कमल, गेंदा, गुड़हल आदि और उन्हें अपनी मिरजई की अलगअलग जेबों में रखते थे. जब वह लोगों का हाथ देख लेते तो उन से किसी प्रिय फूल का नाम पूछते थे. वह व्यक्ति जिस फूल का नाम लेता था, वह नाम लिखा हुआ कागज उस के सामने बाबा रख देते थे और कहते कि मैं जानता था आप यही बताएंगे, इसलिए मैं ने पहले ही लिख दिया था. वह व्यक्ति आश्चर्यचकित रह जाता.

बाबाजी की इन गतिविधियों को देखदेख कर मेरे मन में बड़ी बेचैनी होने लगी थी. मैं बाबा से चिल्लाचिल्ला कर पूछना चाहता था कि आप लोगों से झूठ क्यों बोलते हैं? उन्हें धोखा क्यों दे रहे हैं? कितना पाप छिपा है आप के इस धर्मात्मा रूप के पीछे? पर डर के मारे कुछ कहने का साहस नहीें कर पा रहा था.

एक दिन रास्ते में मैं ने उन से डरते हुए धीरे से पूछा, ‘बाबाजी, वे कागज तो सब मैं ने लिखे हैं, तो झूठ बोलने से आप को पाप नहीं लगेगा?’

बाबा ने धीरे से कहा, ‘सब मूर्ख हैं, पापपुण्य कुछ नहीं होता.’

‘लेकिन आप ही तो बताते हैं कि…’

‘सब झूठ है,’ बाबाजी ने मुझे रोकते हुए कहा, ‘अभी बच्चे हो तुम, नहीं समझ पाओगे.’

मैं चुप हो गया और बहुत दिनों तक पापपुण्य, धर्मअधर्म, झूठसच, भगवान, देवता आदि के अंतर्द्वंद्वों में फंसा रहा. समय बीतता गया. मेरे बाबाजी भी नहीं रहे लेकिन उन की बातें मेरे मन में कहीं गहरे तक बैठती गईं.

यादों का यह कोहरा छटा तो देखा, विडियो फिल्म में इस समय शादी के बाद का दृश्य चल रहा है. तंबू में सभी बराती बैठे हैं और बीच में तवायफ  का नाच हो रहा है जो बड़ी सुरीली और कशिश भरी आवाज में गा रही है, ‘‘कांटा लगा…हाय लगा…’’

फिल्म में दिखाई देता है कि कुछ लड़के उस तवायफ को पैसा दे कर उकसा रहे हैं कि वह बजरंगी पंडित के पास जाए. वह कुछ झिझकती हुई सी जा कर पंडितजी के सिर पर अपना आंचल डाल देती है. पंडितजी उस का हाथ पकड़ कर उस से लड़ने लगे हैं. सारे लोग इस दृश्य का मजा ले रहे हैं. लोगों की हंसी का ठिकाना नहीं है. इधर कमरे में बैठे पंडितजी और भी झेंप जाते हैं.

अब पंडितजी, छड़ी और झोला उठा कर मेरी सास से कहते हैं, ‘‘दुलहन, तो मंगलवार से जाप शुरू करा दें न?’’

मुझे लगता है कि मेरे बाबा मरे नहीं हैं, वह जीवित हैं, मेरे सामने हैं. फिर मुझे मेरे बाबा अनेक रूपों में दिखाई पड़ने लगते हैं. Hindi Stories

भयंकर भूल 

Hindi Stories: पंडित रामसनेही जवानी की दहलीज लांघ कर अधेड़ावस्था के आंगन में खड़े थे. अपने गोरे रंग और ताड़ जैसे शरीर पर वह धर्मेंद्र कट केश रखना पसंद करते थे. ज्यादातर वह अपने पसंदीदा हीरो की पसंद के ही कपड़े पहनते थे लेकिन कर्मकांड कराते समय उन का हुलिया बदल जाता था और ताड़ जैसे उन के शरीर पर धोतीकुरते के साथ एक कंधे पर रामनामी रंगीन गमछा दिखाई देता तो दूसरे कंधे पर मदारी की तरह का थैला लटका होता जिस में पत्रा, जंत्री और चालीसा रखते थे. माथे पर लाल रंग का बड़ा सा तिलक लगाए रामसनेही जब घर से निकलते तो गलीमहल्ले के सारे लड़के दूर से ही ‘पाय लागे पंडितजी’ कहते थे. सफेद लिबास के रामसनेही और पैंटशर्ट के रामसनेही में बहुत फर्क था.

रामसनेही को पुरोहिताई का काम अपने पुरखों से विरासत में मिला था क्योंकि बचपन से ही उन के पिता उन को अपने साथ रखते थे. विरासत की परंपरा में रह कर उन्होंने विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश और मरने के बाद के तमाम कर्मकांड कराने की दीक्षा बखूबी हासिल कर ली थी. हर कार्यक्रम पर बोले जाने वाले श्लोक उन को कंठस्थ हो गए थे. mछोटे भाई से यजमानी के बंटवारे के समय पंचायत में तिकड़म भिड़ा कर ऊंचे तथा रईस घरों की यजमानी उन्होंने हथिया ली थी. छोटे भाई को जो यजमानी मिली थी वह कम आय वालों की थी, जहां पैसे कमाने की गुंजाइश बहुत कम थी. परिवार के नाम पर रामसनेही की एक अदद बीवी और बच्ची थी.

आज की पुरोहिताई के सभी गुण रामसनेही में कूटकूट कर भरे थे. और होते भी क्यों न, आखिर 15 सालों से शंख फूंकफूंक कर पारंगत जो हो चुके थे. लड़केलड़कियों की जन्मकुंडली न मिल रही हो तो वह कोई जुगत निकाल देते थे. विवाह का मुहूर्त या तिथि इधरउधर करना उन के बाएं हाथ का खेल था. कुंडली देख कर भविष्यवाणी भी करते थे. शनी से ले कर राहूकेतू की दशा का निराकरण भी करवाते थे. झाड़फूंक, जादुई अंगूठियों से वशीकरण जैसे कार्यों में उन्हें महारत हासिल थी.

व्यावसायिक तो रामसनेही इतना थे कि कंजूस की पोटली से भी अशरफी निकाल लें. जैसा यजमान वैसा काम के सिद्धांत पर चल कर उन्होंने अपने गुणों को और भी पैना कर लिया था. वह सब तरह का नशा करते थे पर जब गांजा का नशा करते तो मन ही मन औरतों के शृंगार का आनंद भी लेते थे. कुल मिला कर उन के बारे में हम यही कह सकते हैं कि 21वीं सदी की पंडिताई के साथसाथ वह बेहतरीन हरफनमौला इनसान थे.

इधर बीच उन्हें भी एक मोबाइल लेने की सनक सवार हुई ताकि अपने काम को वह अच्छी तरह से अंजाम दे सकें. यही नहीं व्यस्त दिनों में वह पूरे दिन का एक रिकशा किराए पर लेने की बात भी सोच रहे थे ताकि मुनाफे को अधिक से अधिक बढ़ाया जा सके.

रामसनेही को जो मोबाइल पसंद आया उस की कीमत 5 हजार रुपए थी. जोड़बटोर कर उन के पास कुल 3 हजार रुपए हो रहे थे. बाकी 2 हजार रुपए किसी से मांगना वह अपनी शान के खिलाफ समझ रहे थे. इसलिए मोबाइल के विचार को फिलहाल टाल कर किसी बड़े रईस के यहां कर्मकांड होने का इंतजार करने लगे. इस के लिए उन्हें अधिक दिन तक इंतजार नहीं करना पड़ा. जैसे ही सेठ चुन्नीलाल की गद्दी से नई कोठी में गृहप्रवेश कराने का बुलावा आया उन की बांछें खिल गईं.

चुन्नीलाल शहर के रईस आदमी थे. कोई भी कार्यक्रम रहा हो पंडितजी उन के यहां से काफी पैसे पाते रहे थे. उन के लिए यह घर मोटी यजमानी का था. चूंकि उस दिन पंडितजी का कार्यक्रम कहीं और नहीं था इसलिए समय से काफी पहले ही वह चुन्नीलाल के नए घर पहुंच गए. गली में घुसते ही विभिन्न पकवानों की खुशबू का एहसास पंडितजी को होने लगा. दरवाजे पर पहुंचे तो चुन्नीलाल के बड़े लड़के नंदू ने पंडितजी के पैर छुए. आंगन में पहुंचे तो आकारप्रकार देख कर वह चौंधिया गए. विशालकाय आंगन में कम से कम 200 आदमी एकसाथ बैठ सकते थे. राजामहाराजाओं के महल जैसा उन का घर चमक रहा था.

घर मेहमानों से खचाखच भरा था. आंगन के एक ओर की दालान में महिलाएं बैठी थीं, तो दूसरी ओर की बड़ी दालान में पुरुष बैठे थे. सभी लोग कार्यक्रम शुरू होने का इंतजार कर रहे थे. कार्यक्रम के अनुसार यह तय हुआ कि पूजा शुरू होते ही पूडि़यां बनने का काम शुरू कर दिया जाए और पूजा खत्म होते ही मेहमानों की पंगतें बैठा दी जाएं.

इस दौरान ही पंडितजी को सेठ चुन्नीलाल नजर आ गए. वह सफेद धोतीकुरता, गले में कम से कम 10 तोले की सोने की जंजीर और हाथ की उंगलियों में हीरे की अंगूठियां पहने थे. अपने भारीभरकम शरीर के साथ चुन्नीलाल पंडितजी के पैर छूने की रस्म अदायगी के लिए झुके तो उन के हाथ पंडितजी के घुटनों तक मुश्किल से पहुंच पाए. यद्यपि चुन्नीलाल पंडित से उम्र में काफी बड़े थे पर रिवाज तो पूरा करना ही था. शायद अपने बड़प्पन की रक्षा के लिए ही उन्होंने रईसी अंदाज में पंडितजी को अपनेपन की एक मधुर धौल जमाते हुए कहा, ‘‘पंडितजी, इतनी देर कहां लगा दी.’’

पंडित रामसनेही तो समय से पहले ही पहुंचे थे इसलिए चुन्नीलाल के धौल पर थोड़ा खिसिया गए. कान के पास बजते मोबाइल के एहसास ने अपमान के इस घूंट को शरबत समझ कर पीते हुए होंठों पर मुसकान ला कर पंडितजी बोले, ‘‘सेठजी, आप चिंता क्यों कर रहे हैं. आप बैठें तो सही, देखिए कैसे जल्दी मैं काम को पूरा करता हूं.’’

आदेश के स्वर में सेठ चुन्नीलाल ने फिर मुंह खोला, ‘‘अरे, शार्टकट मत कर देना. पूरे विधिविधान से पूजा करानी है?’’

विधिविधान से पूजा कराने की बात चुन्नीलाल ने सिर्फ अपनी पत्नी को खुश करने के लिए कही थी अन्यथा मन से तो वह पूजापाठ के पक्ष में ही नहीं थे. वह तो शहर भर से आने वाले समाज के प्रतिष्ठित लोगों का स्वागत करना चाह रहे थे लेकिन घर में बड़े होने के नाते इस कार्यक्रमरूपी मटके को पत्नी के साथ बैठ कर उन्हें अपने सिर पर फोड़ना पड़ रहा था.

‘‘लालाजी, मैं आप के घर का सारा धार्मिक कार्यक्रम विधिविधान से पूरा करता हूं,’’ पंडितजी गर्व से बोले.

‘‘वह तो ठीक है पंडितजी,’’ चुन्नीलाल जल्दी में बोले, ‘‘यह तो बताइए कि कितना खर्च आएगा जिस में भेंट, पूजा का चढ़ावा, न्योछावर एवं दक्षिणा सभी कुछ शामिल हो.’’

इस सवाल पर पंडितजी थोड़ा रुके और माथे पर बनावटी सलवटें डाल कर मन ही मन कुछ गणना करते हुए बोले, ‘‘2 हजार रुपए से थोड़ा ऊपर.’’

‘‘2 हजार रुपए ज्यादा नहीं हैं. खैर, जल्दी शुरू करो. लंच का समय हो रहा है. आने वालों को समय से खाना भी खिलाना है.’’

पंडितजी ने मंत्रोच्चारण के साथ अपना कार्यक्रम शुरू कर दिया. हवन करने के लिए एक तरफ चुन्नीलाल अपनी पत्नी कमला के साथ बैठे थे, उन से थोड़ा हट कर मुन्नीलाल पैसों की गठरी संभाले बैठा था. दूसरी ओर पंडित रामसनेही खुद विराजमान थे. उन की नजर बारबार मुन्नीलाल के हाथ की गठरी पर जा कर रुक जाती. मन में यही हूक उठती कि आज यह गठरी खाली करा लेनी है.

गृहप्रवेश के श्लोक वह निर्धारित शैली के अनुसार बोलते चले गए और यजमान को बीचबीच में आचमन करने का तो कभी चावल छिड़कने का, सिंदूर लगाने का, पान के पत्ते से पानी छिड़कने का निर्देश देते रहे. इस दौरान चढ़ावा चढ़ाने की बात भी वह नहीं भूलते.

गृहप्रवेश का धार्मिक कार्यक्रम बेरोकटोक चल रहा था लेकिन पंडितजी और चुन्नीलाल दोनों ही दिमागी उलझनों में उलझे हुए थे. चुन्नीलाल सोच रहे थे कि डेढ़ घंटे के काम के लिए पंडित ने उन से 2 हजार रुपए मांगे हैं जो इस काम को देखते हुए बहुत अधिक हैं लेकिन वह करते भी क्या, मौका ऐसा था कि जबरन उन्हें अपने मुंह पर ताला लगाना पड़ रहा था. नातेरिश्तेदार, महल्ले वालों के साथ शहर के इज्जतदार लोग भी उन की खुशी में शरीक होने आए थे. ऐसे समय पैसे के लिए पंडित से विवाद करना ठीक नहीं था. लेकिन मन ही मन फैसला ले लिया था कि आगे इस लालची पंडित को नहीं बुलाएंगे.

उधर पंडित रामसनेही मन ही मन मुसकरा रहे थे कि सेठ को तो उन्होंने यह सोच कर अधिक पैसा बताया था कि कुछ मोलतोल होगा पर यजमान ने तो कोई मोलभाव ही नहीं किया. फिर उन के दिमाग में आया कि इतने बड़े सेठ से मुझे 4 हजार रुपए बोलना चाहिए था तो बात 3 तक आ कर पट जाती. इसी विचार मंथन के क्रम में शुरू की खुशी अब पछतावे में बदल गई थी.

अचानक पंडितजी के दिमाग में बिदाई की दक्षिणा वाली बात आ गई और उन के चेहरे पर फिर से खुशी की लहर दौड़ गई. सोचने लगे, यजमान से कितनी दक्षिणा मांगी जाए. मन की बात मन में 2 हजार रुपए से शुरू हुई, लेकिन इस कार्यक्रम में हजारों रुपए पानी की तरह बहता देख कर अंतिम दक्षिणा की रकम मन ही मन 2 हजार रुपए से बढ़ कर 5 हजार रुपए हो गई.

पूजा समाप्त होने से 5 मिनट पहले ही चुन्नीलाल ने खाना शुरू करने का इशारा अपने छोटे भाई को कर दिया. मुन्नीलाल खाने की व्यवस्था करने जैसे ही ऊपरी मंजिल की ओर चले उन के साथ परिवार के दूसरे लोग भी चल दिए. चूंकि पेटपूजा का कार्यक्रम ऊपर वाली मंजिल में शुरू होने जा रहा था इसलिए आंगन से काफी लोग छंट चुके थे. पूजा खत्म होते ही पंडितजी ने अधिकार के साथ कहा, ‘‘यजमान अंतिम दक्षिणा.’’

चुन्नीलाल दरियादिली से बोले, ‘‘हां, पंडितजी, कितनी दक्षिणा चाहिए.’’

शिकारी बिल्ली की तरह चुन्नीलाल रूपी चूहे पर झपट्टा मारने को तैयार पंडितजी कुछ धीमे स्वर में बोले, ‘‘यजमान 5 हजार रुपए.’’

चुन्नीलाल समझे कि भूल से पंडितजी 500 की जगह 5 हजार रुपए कह गए होंगे इसलिए फिर से पूछा, ‘‘कितने रुपए दे दूं.’’

पंडितजी इस बार आवाज तेज कर उस में चाटुकारिता का पुट घोलते हुए बोले, ‘‘मालिक, महज 5 हजार रुपए.’’

चुन्नीलाल इतनी रकम सुन कर सन्न रह गए. भौचक हो कर बोले, ‘‘पंडित, तुम्हारा दिमाग तो नहीं फिर गया है. जानते हो कि तुम कितनी बड़ी रकम मांग रहे हो.’’

‘‘हुजूर, आप बड़े लोग हैं,’’ चाटुकारिता की चाशनी में अपने शब्दों को लपेट कर पंडितजी बोले, ‘‘आप के लिए 5 हजार रुपए चुटकी है. पूरे शहर में आप का नाम है. किस जमाने से हमारे बापदादों ने आप के यहां पुरोहिती शुरू की थी.’’

2 हजार रुपए के चक्कर में चुन्नीलाल तो पहले से ही पंडितजी पर खार खाए बैठे थे, इस 5 हजार रुपए की नई मांग ने आग में घी का काम किया. तमतमाए चेहरे से चुन्नीलाल दहाड़े, ‘‘पंडितजी, आप अपने आपे में रहिए. इतना तो मैं कदापि नहीं दूंगा. 5 हजार रुपए हंसीठट्ठा समझ रखा है क्या?’’

इतने में कमला पति चुन्नीलाल को इशारे से चुप कराती हुई बोलीं, ‘‘पंडितजी, यह तो संयुक्त परिवार है इसलिए आप को हम लोग धनी दिख रहे हैं. हम लोग भी घर में दालरोटी ही खाते हैं. आप तो बहुत ज्यादा मांग रहे हैं. 5 हजार रुपए आप को मैं अपने बेटे नंदू की शादी में इन्हीं से दिलवाऊंगी, अभी तो 500 रुपए आप रख लें.

पंडितजी ने कमला की कोमलता को टटोल लिया. आंतरिक शक्ति बटोर कर उन्होंने कमला की तरफ मुंह कर के कहा, ‘‘अरे, मालकिन, यह गरीब ब्राह्मण आप लोगों से नहीं मांगेगा तो इस शहर में किस के पास मांगने जाएगा. यह तो धर्मकर्म का काम है. पुरोहित को देना तो सब से बड़ा पुण्य का काम होता है. यही दिया तो आगे काम आता है.’’

इसी बीच चुन्नीलाल ने 500 रुपए पंडितजी के हाथ में पकड़ाने का प्रयास किया पर वह उन रुपयों को छूने को तैयार न थे.

लिहाजा, 500 रुपए का वह नोट जमीन पर गिर पड़ा. लक्ष्मी का इस तरह अपमान होता देख कर मुन्नीलाल भड़क उठे, ‘‘500 रुपए लेना हो तो लो नहीं तो अपने घर का रास्ता नापो.’’

मोलतोल एवं तय तोड़ की सारी गुंजाइशें खत्म हो चुकी थीं. पंडितजी हाथ आई चिडि़या को किसी भी सूरत में छोड़ना नहीं चाह रहे थे. उधर दोनों भाई चुन्नीलाल और मुन्नीलाल वीर योद्धा की तरह अपनी बात पर डटे रहे. कमला भी अपनी दाल गलती न देख थोड़ी दूर जा कर खड़ी हो गईं. दोनों ओर आवेश बढ़ने लगा. वाक्युद्ध अपने पूरे उफान पर था. यद्यपि पंडितजी अकेले थे पर वाक्पटुता में निपुण थे, तभी तो अपनी चाटुकारिता से बात को बीच में संभाल लेते थे.

पंडित रामसनेही जब हर तरफ से यजमान को झुकाने की कोशिश में हार गए तो अपने पूर्वजों के अंतिम ब्रह्मास्त्र ‘शाप’ का सहारा लिया और फिल्मी अंदाज में भड़क कर बोले, ‘‘यजमान, यह ब्राह्मण की दक्षिणा है, मुझे नहीं दोगे तो तुम्हें कहीं और देना पड़ेगा. अगर मैं ने मन से शाप दे दिया तो सारा घर भस्म हो जाएगा.’’

यह सुन कर वहां खड़े घर के लोग अवाक् रह गए. मगर बाहर से आंगन की तरफ आता चुन्नीलाल का छोटा बेटा पल्लू का धैर्य जाता रहा. पंडितजी का आखिरी कहा शब्द उस के हृदय में भाले की तरह चुभा था इसलिए वह भी युद्ध के मैदान में कूद पड़ा.

पंडितजी की तरफ पल्लू झपट्टा मार कर गरजते हुए बोला, ‘‘सौ जूते मारो इस ढोंगी पंडित को. इस ने अपने आप को समझ क्या रखा है?’’

इसी के साथ हाथ में चप्पल ले कर पल्लू पंडितजी पर टूट पड़ा.

बात एकदम उलटी हो गई. पंडितजी का ब्रह्मास्त्र उन्हीं पर बज्र बन कर गिर पड़ा था. सेर को सवा सेर मिल गया था. पंडितजी इस युद्ध में चारों खाने चित हो चुके थे. तभी पल्लू और पंडितजी के बीच मुन्नीलाल और चुन्नीलाल आ गए. एक ने पल्लू की कमर पकड़ी तो दूसरे ने हाथ पकड़े और मौका देख कर पंडित रामसनेही बिना झोला उठाए और चप्पलें पहने अपनी जान हथेली पर रख कर त्वरित गति से एक प्रशिक्षित धावक की तरह संकटमोचन का नाम मन में ले कर भागे तो जा कर घर की चौखट पर ही रुके. उन के कानों में मोबाइल की घंटी तो नहीं अपने ही दिल की धड़कन सुनाई दे रही थी, जो किसी धौंकनी की रफ्तार से धड़क रही थी.

पंडित रामसनेही का झोला, पुस्तकें, 500 रुपए और उन की चप्पलें शहर में लगे कर्फ्यू की तरह आंगन में अनाथ पड़ीं अपनी कहानी बयां कर रही थीं. Hindi Stories

आशा भोसले : सुरों से बंधी एक बागी आवाज

Asha Bhosle: सुरों से बंधी एक बागी आवाज बालों में हमेशा मराठी महिलाओं की पहचान वाला गजरा गूंथे रखने वाली आशा भोसले की जिंदगी संघर्षों से भरी थी. किशोरावस्था के एक गलत फैसले की सजा उन्होंने भुगती भी लेकिन कभी भी उस अप्रिय फैसले को अपने व्यक्तित्व और पेशे पर हावी नहीं होने दिया. वे पहली गायिका थीं जिन्हें कथित अश्लील गाने के आरोपों के चलते कट्टरवादियों का विरोध झेलना पड़ा था लेकिन वे झुकी किसी के सामने न थीं.

1950 के दशक में हर वो गाना जो भजन नहीं होता था या थोड़ा सा भी गैरधार्मिक होता था उसे अश्लील करार दे कर होहल्ला हिंदूवादी मचाने लगते थे. तब देश आजाद हुए थोड़ा ही वक्त गुजरा था. हर तरफ पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की धूम थी. तब संघी, जनसंघी और महासभाई हिंदू कोड बिल को ले कर उन पर खार खाए बैठे थे. उन्हें हर वो बात जो औरतों व दलितों के हक की होने के अलावा आधुनिक, तार्किक, खुली सोच वाली और वैज्ञानिक लगती थी उसे वे पाश्चात्य कहते और धर्म व संस्कृति के खतरे में होने की दुहाई देते हायहाय करने लगते थे.

फिल्म इंडस्ट्री भी इस सनातनी माफिया से अछूती नहीं बची थी बल्कि उस पर तो खास निगाहें धर्म और संस्कृति के तथाकथित लंबरदारों की रहती थीं. क्योंकि अखबारों और पत्रिकाओं के बाद फिल्में समाज पर गहरा असर डाल रहीं थीं. सिनेमा तब आम लोगों की पहुंच से लगभग बाहर था. लेकिन एलीट क्लासी लोगों और मध्यवर्गीयों के मनोरंजन व टाइमपास का खजाना ठीक वैसे ही था जैसे आजकल सोशल मीडिया प्लेटफौर्म और इंटरनैट हैं.

इस माफिया की सब से पहली शिकार गायिका आशा भोसले थीं जिन्होंने बाद में जिंदगीभर वे तमाम गाने गाए जो कथित रूप से अश्लील थे. साल 1958 में रिलीज हुई शक्ति सामंत द्वारा निर्मित और निर्देशित ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म ‘हावड़ा ब्रिज’ का गाना ‘आइए मेहरबां बैठिए जाने जां, शौक से लीजिए जी, इश्क के इम्तिहां…’ न केवल हिंदूवादियों बल्कि तत्कालीन मीडिया को भी नागवार लगा था. यह गाना तब के दौर की सब से खूबसूरत अभिनेत्री मधुबाला पर फिल्माया गया था. आज के लिहाज से देखें तो गाने में ऐसा कुछ भी नहीं था जिस के विरोध में कोई अपनी बारूद जाया करे. लेकिन, तब इस गाने को भड़काऊ, उत्तेजक और सैक्सी कहा गया था.

गाने में एक होटल में फिल्म के चिकनेचुपड़े, लगातार सिगरेट फूंकते हीरो अशोक कुमार के अलावा दिग्गज विलेन के एन सिंह की मौजूदगी दिखाई गई है. मधुबाला स्टेज से अपना घाघरा लहराते हुए फ्लोर पर नाचते हुए उतरती हैं और दोनों बांहें फैला देती हैं. इस से उन के उभार और थोड़े स्पष्ट दिखने लगते हैं. गाने के उत्तरार्ध में आसपास की टेबलों पर बैठे युवा जोड़े भी उठ कर बाल डांस करने लगते हैं और फिर अशोक कुमार भी मधुबाला के साथ चिपक कर डांस में मशगूल हो जाते हैं.

कोई भारतीय महिला होटल में नाचते किसी पुरुष को इस यानी मदहोश कर देने वाले अंदाज में आमंत्रण दे, यह कट्टर सनातनियों और सैंसर बोर्ड के साथसाथ ‘फिल्म फेयर’ जैसी मैगजीन को भी हजम नहीं हुआ था जिस ने अपनी समीक्षा में लिखा था कि गीत आकर्षक है लेकिन इस की प्रस्तुति भारतीय दर्शकों के लिए कुछ ज्यादा ही खुली हुई है.

सैंसर बोर्ड ने भी इस गाने पर एतराज जताते इस में कई कट्स लगवाए थे. उस को क्लब सीन पर तो आपत्ति थी ही, साथ ही, उसे मधुबाला के कुछ क्लोजअप शौट्स और कुछ अदाएं भी अश्लील लगी थीं. महिलाओं की यह इमेज समाज को भी रास नहीं आई थी, इसलिए विरोध कुछ महिला संगठनों ने भी जताया था. तमाम विरोधों और एतराजों के बाद भी गाना सुपर हिट साबित हुआ था क्योंकि इसे तब के युवाओं ने खास पसंद किया था जो घुटनभरे माहौल में छटपटा से रहे थे. उन्हें एक अलग एहसास इस गाने से हुआ था.

विरोध के चलते 3 और नामों पर निशाना साधा गया था- गीतकार कमल जलालाबादी, संगीतकार ओ पी नैय्यर और तीसरी थीं आशा भोसले जिन के कैरियर की यह पेशेवर शुरुआत थी. इस गाने में उन्होंने अपनी आवाज में जो उतारचढ़ाव पैदा किए थे वे ही, दरअसल, लगने वालों को सैक्सी लगे थे. बात सच भी थी कि अपने गाए कैबरे सौंग्स में आशा भोसले ने भारी सांसें भी लीं और आवाज को खुरदुरा भी रखा था. वरना तो उस दौर की दूसरी दिग्गज गायिकाएं लता मंगेशकर, गीता दत्त और शमशाद बेगम अपनी आवाज और उच्चारण दोनों साफ और स्पष्ट रखती थीं.

ऐसा ही विरोध आशा भोसले को साल 1968 में झेलना पड़ा था ‘किस्मत’ फिल्म के गाने ‘आओ हुजुर तुम को सितारों में ले चलूं, दिल झूम जाए ऐसी बहारों में ले चलूं…’ में. यह गाना अभिनेत्री बबीता पर फिल्माया गया था जिस में वे शराब के नशे में लड़खड़ाती हुई नायक विश्वजीत और उभरते खलनायक जगदीश राज सहित होटल में मौजूद लोगों के सामने और साथ में डांस कर रही हैं.

मनमोहन देसाई निर्देशित इस थ्रिलर फिल्म में बबीता बहुत ग्लैमरस और तब के माहौल के हिसाब से उत्तेजक लगी थीं. मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे इस गाने को संगीत ओ पी नैय्यर ने ही दिया था जो तब तक आशा भोसले से बहुत गहरे तक `ट्यून` हो चुके थे. भक्तों को दिक्कत इस बात से भी थी कि बबीता को बिना चुनरी के दिखाया गया था और भारतीय महिलाएं खुलेआम क्या, चोरीछिपे भी, शराब नहीं पीतीं, यह तो अश्लीलता की हद है. रहीसही कसर आशा की आवाज ने पूरी कर दी थी लेकिन यह गाना भी सुपरहिट साबित हुआ था.

बीती 12 अप्रैल को निधन के बाद आशा भोसले को महज इसलिए महान नहीं कहा गया क्योंकि उन्होंने 14 भाषाओँ में 12 हजार से भी ज्यादा गाने गाए थे जिन के चलते उन्हें इतने पुरस्कार और खिताब मिले थे बल्कि उन्हें महान न कहने की बड़ी वजह थी उन का प्रयोगवादी होना जिस की पहली शर्त यह होती है कि कलाकार कट्टरवादियों सहित परंपराओं और वर्जनाओं के सामने झुके नहीं.

कभी कहीं नहीं झुकीं

‘आइए मेहरबां…’ से ले कर 1995 में प्रदर्शित ‘रंगीला’ के गाने ‘तनहा तनहा यहां पे जीना…’ तक वे किसी के आगे कभी झुकी नहीं फिर चाहे वे उन के पहले पति वामनराव भोसले रहे हों या फिर उन की ही सगी बड़ी बहन लता मंगेशकर रही हों जिन के इशारे पर फिल्म इंडस्ट्री नाचती थी. 1950 और 60 के दशक में आशा भोसले को बी और सी ग्रेड के ही गाने मिलते थे. ए ग्रेड के गाने लता, गीता दत्त और शमशाद बेगम के लिए रिजर्व रहते थे. आशा के हिस्से में इन के रिजैक्ट किए हुए गाने आते थे जिन्हें उन्होंने टूट कर गाया लेकिन उम्मीद के मुताबिक कामयाबी उन्हें नहीं मिल रही थी जिस का उन्होंने पूरे सब्र से इंतजार किया.

60 के दशक की खास बात यह थी कि लता मंगेशकर को कोई भी गायिका, प्रतिद्वंदिता पेश करना तो दूर की बात है, चुनौती भी नहीं दे पा रही थी. उसी दशक के उतरार्ध से गीता दत्त और शमशाद बेगम आवाज की दुनिया से गायब होती जा रही थीं जिन की जगह आशा भोसले लेती जा रही थीं. लेकिन दिक्कत यह थी कि उन्हें वैसे गाने नहीं मिल रहे थे जैसे कि लोकप्रिय होने जरूरी होते हैं. अब तक उन्हें क्लब और कैबरे सौंग्स से ही शोहरत मिल रही थी जिस से वे संतुष्ट नहीं थीं.

हालांकि इस से काफी पहले राजकपूर की 1954 में आई फिल्म ‘बूट पालिश’ के गाने ‘नन्हेमुन्ने तेरी मुट्ठी में क्या है, मुट्ठी में है तकदीर हमारी…’ मोहम्मद रफी के साथ गाने का मौका उन्हें मिला था. लेकिन प्रश्नोत्तरीनुमा इस गाने में बाल कलाकारों को उन की आवाज दी गई थी. शैलेंद्र के लिखे इस गाने में बिलाशक जोश था पर वह बच्चों तक में ही सिमट कर रह गया था. यह गाना चरित्र अभिनेता डेविड और बाल कलाकारों पर फिल्माया गया था. इसलिए इस का प्रभाव सिमट कर रह गया था. लेकिन बाद में आशा व रफी की जोड़ी ने दर्जनों हिट गाने दिए.

1957 में आशा को बड़ा ब्रेक ‘नया दौर’ फिल्म से मिला था. बी आर चोपड़ा जैसे सधे निर्मातानिर्देशक की इस फिल्म में दिलीप कुमार, वैजयंती माला, अजीत और जीवन जैसे मझे हुए ऐक्टर थे. ‘उड़ें जबजब जुल्फें तेरी…’ गाना दिलीप कुमार और वैजयंती माला पर फिल्माया गया था जो बिंदास और रोमांटिक मूड का था. मामूली और स्वस्थ छेड़छाड़ वाला यह गाना आज तक शादीब्याह और पार्टियों में बजता है. इस में आशा की आवाज की शोखी, अल्हड़पन और चुलबुलापन वैजयंती माला पर एकदम फिट बैठे थे. इस का संगीत उन्हीं ओ पी नैय्यर का था जिन का लंबा विवाद लता मंगेशकर से चला था और इस हद तक चला था कि नैय्यर ने लता के साथ काम करने से इनकार कर दिया था.

इस विवाद की वजह फीस थी या अहम का टकराव था, यह कह पाना मुश्किल है लेकिन यह किसी के लिए भी कम हैरानी की बात नहीं थी कि एक ऐसा भी संगीतकार देश में है जिस ने लता मंगेशकर जैसी गायिका के साथ काम करने से मना कर दिया. और इस के बाद भी  मजबूती से फिल्म इंडस्ट्री में जमे रह कर एक के बाद एक सुपरहिट गाने भी देता रहा. एक तरह से ओ पी नैय्यर ने आशा भोसले को लता मंगेश्कर के विकल्प के तौर पर खड़ा कर दिया था. 1950 के दशक से ले कर 70 तक इन दोनों ने कोई 35 फिल्मों में साथ काम किया. उसी दौरान बौलीवुड के रिवाज और मिजाज के मुताबिक दोनों के प्यार और शादी की खबरें रुकरुक कर उड़ती रहीं जो आशा भोसले की दूसरी शादी के साथ ही खत्म हुईं.

20 साल तक ओ पी नैय्यर ने आशा भोसले को जानबूझ कर शह और ब्रेक दिए जिन के चलते इन दोनों बहनों में वक्ती और स्वाभाविक तौर पर खटास पैदा हुई थी, जिसे मीडिया बढ़ाचढ़ा कर, मिर्चमसाला लगा कर पेश करता रहा. लेकिन कभी भी दोनों बहनों ने एकदूसरे पर कोई आरोप नहीं लगाया. सार्वजनिक तौर पर वे एकदूसरे के प्रति यथासंभव शालीनता से ही पेश आती थीं. मुमकिन है यह उन की व्यवसायिक मजबूरी रही हो या एकदूसरे के प्रति बचपन से पनपा सम्मान और स्नेह का भाव रहा हो. गौरतलब है कि पिता दीनानाथ मंगेश्कर की मौत के बाद इन दोनों बहनों ने घर की जिम्मेदारी संभाली थी. पिता की मौत के वक्त आशा की उम्र महज 9 साल थी और अगले कुछ सालों तक उन की परवरिश लता ने ही की थी.

यह और बात थी कि पारिवारिक जीवन में आशा उन की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पाई थीं. गायिकी में नएनए प्रयोगों और रिस्क उठाने के लिए पहचानी जाने वाली आशा ने अपनी व्यक्तिगत जिंदगी में भी एक प्रयोगात्मक जोखिम उठाया था जब वामन राव भोसले के साथ भाग कर शादी साल 1949 में कर ली थी. तब आशा की उम्र महज 16 साल थी और वामन राव 31 साल के थे. यह प्यार कम, एक उम्रदराज पुरुष के प्रति एक टीनएजर युवती का आकर्षण ज्यादा था. लता छोटी बहन की इस नादानी से दुखी थीं, नाराज थीं और हैरान भी थीं क्योंकि वामनराव उन के सेक्रेटरी हुआ करते थे.

इस बेमेल शादी का अंत अलगाव की शक्ल में हुआ था. 1960 आतेआते आशा ने पति का घर छोड़ दिया था क्योंकि वे उस की और ससुराल वालों की प्रताड़नाएं और ज्यादा बरदाश्त नहीं कर पा रही थीं. 1966 में वामनराव की मौत हो गई थी. पति से अलग होने के बाद तीनों बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी भी आशा के कंधों पर आ गई थी जिसे उन्होंने बखूबी निभाया भी. लेकिन यह सब आसान नहीं था. उस दौरान काफी संघर्ष उन्हें करना पड़ा था. कईयों, जिन में कुछ अपने भी शामिल थे, की अनदेखी उन्होंने झेली पर वे झुकीं किसी के सामने नहीं. इसी सख्ती ने उन की कामयाबी के रास्ते भी खोले. ‘हावड़ा ब्रिज’ और ‘किस्मत’ जैसी फिल्मों के गाने उन की आर्थिक जरूरत बन गए थे. इसलिए भी उन्होंने तब या बाद में भी कभी कट्टरवादियों के सामने झुकना गवारा नहीं किया.

विरोध को सम्मान में बदला

वामनराव से अलग होने के बाद आशा एक तरह से दबावमुक्त हो गई थीं, जिस का असर उन के गाए गानों में देखने को भी मिला. अब तक उन्हें ठीकठाक गाने भी मिलने लगे थे लेकिन जिस फिल्म के गानों ने उन्हें लोकप्रिय बनाया वह थी 1965 में प्रदर्शित ‘तीसरी मंजिल’ जिसे विजय आनंद ने निर्देशित किया था. सस्पैंस से लबरेज यह फिल्म कई मानों में अहम थी. इस की कहानी सलीम-जावेद वाले सलीम ने लिखी थी जिन्होंने इस फिल्म में अभिनय भी किया था. वे नायक शम्मी कपूर के दोस्त की भूमिका में दिखे थे.

फिल्म की नायिका आशा पारेख थीं जिन पर फिल्माया गाना ‘आ जा आ जा मैं हूं प्यार तेरा अल्लाअल्ला इंकार तेरा…’ जबरदस्त हिट हुआ था. इस गाने में लड़केलड़कियों का ग्रुप डांस, खासतौर से, कालेजगोइंग युवाओं को खूब भाया था. आशा भोसले की आवाज आशा पारेख की शोख और रोमांटिक अदाओं के साथ टूट कर थिरकी थी.

शम्मी कपूर को मोहम्मद रफी ने आवाज दी थी. इस गाने में आशा रफी के सामने बिलकुल भी उन्नीस नहीं पड़ी थीं खासतौर से थर्राते हुए ‘अ आ जा…’ निकालते हुए जो इस गाने की जान था और लोकप्रियता की बड़ी वजह बना था. इसी फिल्म के इन्हीं दोनों के गाए 2 और गाने भी पसंद किए गए थे. पहला था ‘ओ मेरे सोना रे सोना तू मुझसे जुदा मत होना होना रे…’ और ‘ओ हसीना जुल्फों वाली जाने जहां, ढूंढती हो काफिर आखें किस का निशां…’

नैय्यर के बाद बर्मन

‘तीसरी मंजिल’ आशा भोसले के लिए इसलिए भी खास थी कि इस के संगीतकार ओ पी नैय्यर नहीं बल्कि आर डी बर्मन थे. इन दोनों की नजदीकियां भी इसी फिल्म से बढ़नी शुरू हो गई थीं जो शादी में साल 1980 में तबदील हो गई थीं. पहली शादी की त्रासदी व तनाव झेल चुकी आशा ने आर डी बर्मन के साथ न केवल बेहतर जिंदगी गुजारी बल्कि उन के संगीत निर्देशन में एक से बढ़ कर एक गाने भी दिए. बर्मन खुद भी हाहाकारी संगीतकार थे और आशा की तरह ही प्रयोगवादी थे.

यह कह पाना मुश्किल है कि आशा भोसले किस संगीतकार के साथ ज्यादा हिट रहीं क्योंकि बर्मन के संगीत निर्देशन में भी कई हिट गाने उन्होंने दिए. 1971 में देवानंद की फिल्म ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ का गाना ‘दम मारो दम मिट जाए गम बोलो सुबह शाम हरे कृष्णा हरे राम…’ उस दशक के सब से ज्यादा गाए जाने वाले गानों में से एक था. जीनत अमान एक मध्यवर्गीय युवती के रोल में दिखी थीं जो मांबाप की उपेक्षा से तंग आ कर हिप्पियों के ग्रुप में शामिल हो जाती है. यह गाना जीनत पर चिलम फूंकते हुए फिल्माया गया जिन पर आशा की आवाज फिट बैठी थी.

फिर 1973 में आई नासिर हुसैन की फिल्म ‘यादों की बारात’ के गाने ‘चुरा लिया है तुम ने जो दिल तो नजर नहीं चुराना सनम…’ ने तो जैसे युवाओं को पागल सा बना दिया था. यह वह दौर था जब मिडिल क्लास के युवा कालेज में थोक में दाखिले ले रहे थे और साथ में इश्क भी फरमा रहे थे. यानी, दिल चुराने के काम को भी अंजाम दे रहे थे. जीनत अमान और विजय अरोरा पर फिल्माए इस गाने ने साबित कर दिया था कि यह जरूरी नहीं कि हर रोमांटिक गाना जबां पर चढ़ने के लिए लता मंगेश्कर का मुहताज हो. जिस सलीके और रोमांटिक अंदाज में आशा ने इसे गाया था उस की उम्मीद गाना लिखने वाले मजरूह सुल्तानपुरी को भी नहीं थी.

‘चुरा लिया है तुमने…’ में रफी आशा के साथ थे लेकिन इसी फिल्म के एक और हिट गाने ‘आप के कमरे में कोई रहता है…’ में किशोर कुमार उन के अपोजिट थे. थोड़ा सा हिस्सा आर डी बर्मन ने भी गाया था. यादों की बारात के गानों ने आशा भोसले को वह नाम और मुकाम दिला दिया था जिस के ख्वाब वे सालों से देख रही थीं. इस फिल्म का टाइटल सौंग ‘यादों की बारात निकली है आज दिल के द्वारे…’ लता मंगेश्कर से गवाया गया था.

इस से सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि जितना जोर ओ पी नैय्यर ने उन के कैरियर के पूर्वार्ध में लगाया था, आर डी बर्मन ने उत्तरार्ध में उस से कम नहीं लगाया था.

यह भी कम हैरानी और दिलचस्पी की बात नहीं कि मोहम्मद रफी के साथ लगभग 750 और किशोर कुमार के साथ 350 गाने गानेवाली आशा भोसले ने अपने दौर के तीसरे दिग्गज गायक मुकेश के साथ पूरे 50 गाने भी नहीं गाए. इन 50 में से एक भी ऐसा नहीं है जिसे हिट कहा जा सके. अभिजात्य किस्म के दर्शकों में जरूर 1978 में रवि चोपड़ा निर्देशित फ्लौप फिल्म ‘तुम्हारी कसम’ का यह गाना लोकप्रिय हुआ था ‘हम दोनों मिल के कागज पे दिल के चिट्ठी लिखेंगे जवाब आएगा…’ आनंद बख्शी का यह गाना बहुत सुंदर बन पड़ा था जिसे नवीन निश्चल और पद्मिनी कपिला पर फिल्माया गया था.

और उमराव जान…

80 के दशक तक ताई के संबोधन से मशहूर हो चुकीं आशा भोसले को दौलत और शोहरत दोनों उम्मीद से ज्यादा मिल चुकी थीं. लेकिन वह संतुष्टि अभी तक नहीं मिली थी जो किसी भी कलाकार को महान की श्रेणी में रखती है या वह मुकाम जिसे सर्वश्रेष्ठ कहा जाता है. 1981 में प्रदर्शित फिल्म ‘उमराव जान’ ने यह कसर भी पूरी कर दी थी. मुजफ्फर अली द्वारा निर्देशित यह फिल्म लखनऊ के कोठों की पृष्ठभूमि समेटे हुए थी. एक तवायफ उमराव जान की जिंदगी की कशमकश को जितने बेहतर तरीके से उकेरा गया था वह इस के पहले किसी फिल्म में देखने में नहीं आया था.

फिल्म का एकएक फ्रेम कसा हुआ था जिस में जान रेखा के अभिनय ने ज्यादा डाली थी या आशा भोसले की गाई शहरयार की गजलों ने यह तय कर पाना आम दर्शक के लिए भी किसी चैलेंज से कम नहीं.

‘इन आंखों की मस्ती के मस्ताने हजारों हैं…’ ‘दिल चीज क्या है आप मेरी जान लीजिए…’ जैसी छोटे बहर की गजलें उस दर्शक की जबां पर भी चढ़ गई थीं जिसे कला या समांतर सिनेमा से कोई सरोकार नहीं होता. फिल्म के आखिर में जब उमराव का काफिला अपने गांव से हो कर गुजरता है तो वह अपना घर देख कर बेहद जज्बाती हो उठती है. इस मौके पर आशा की गाई एक और गजल ‘ये क्या जगह है दोस्तों, ये कौन सा दयार है, हदे निगाह तक जहां गुबार ही गुबार है…’ दर्शकों को भी भावुक होने को मजबूर कर देती है.

फिल्म के असर छोड़ने वाले दृश्यों में से एक वह था जब गजल का आखिरी शेर उमराव अपनी बूढ़ी मां को दूर से देख गाती है ‘यह शेर था बुला रहा है कौन मुझे चिलमनों के उस पार मेरे लिए भी क्या कोई उदास बेकरार है…’ Asha Bhosle

 

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