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Hindi Story: टिप और किराया

Hindi Story: सुबहसुबह परिदों के शोर से मेरी नींद टूटी थी लेकिन मैं ने फिर अपनी आंखें बंद कर ली थीं. सुबहसुबह की ताजगी को अपने भीतर उतार रही थी. आदमकद बड़े शीशों वाली खिड़कियों के परदे मेरे पति  प्रशांत ने हटा दिए थे जिस से शीशों से छन कर सुनहरी धूप पलंग तक पहुंच रही थी. खिड़की से बाहर आसमान को छूती हुई पहाडि़यां थीं. बीचोंबीच नैनीताल. नैनीताल के ठीक सामने वाले पहाड़ पर बना था रेलवे का हौलिडे होम. उस में 48 कमरे थे. मैं और मेरे पति ग्राउंडफ्लोर के रूम में थे. सैकंड फ्लोर पर हमारे पारिवारिक मित्र सपत्नीक रुके थे.

वर्षों से योजना बन रही थी. वर्ष 2023 में योजना पूर्ण हुई, मार्च महीने में. काठगोदाम से घुमावदार सर्पीली सड़कों से हम हौलिडे होम आ गए थे. टैक्सी चला रहा व्यक्ति 40 वर्ष का बातूनी था. वह रास्तेभर बोलता रहा था. मैं और हमारी पारिवारिक मित्र सुषमा पीछे की सीट पर थीं. हम उस से बातें करने के बजाय, बातें सुन रहे थे. हरियाली व पहाडि़यों के बीच गुजरती टैक्सी से बाहर देखने से ज्यादा सुंदर कुछ नहीं था. उसी में खोए थे. टूरिस्टों की भीड़ नैनीताल में वर्षभर रहती है, ऐसा टैक्सी ड्राइवर बता रहा था.

मार्च का मौसम सुहावना होता है लेकिन ठंडक रहती है. हम गरम कपड़े साथ लाए थे. ड्राइवर खूब बातें कर रहा था. बातोंबातों में उस ने बताया था, उस का नाम वाहिद था. वह अपनी पत्नी व 2 बच्चों के साथ एक पहाड़ी पर रहता था. बूढ़े पिता की देखभाल उस की पत्नी करती थी. ज्यादा बारिश में धंधा मंदा हो जाता है क्योंकि पहाडि़यों के होने से दुर्घटना होने की संभावना बनी रहती है. वह बता रहा था कि वह कल सुबह आ जाएगा, पूरा नैनीताल घुमा देगा. रेट भी उचित लेगा. ईमानदारी को वह अपना ईमान समझता है. ऊपर वाले को क्या मुंह दिखाएगा, बेईमानी के पैसों की अपेक्षा वह ईमानदारी की सूखी रोटी पसंद करेगा. जिस समय उस ने हौलिडे होम छोड़ा था, रात के 9 बज रहे थे. इसलिए सुबह ही निकलने की सोची थी.

रात को चारों ओर पहाडि़यों से घिरा नैनीताल रोशनियों से नहाया हुआ था. नैनीताल के निवासी पहाडि़यों पर बने मकानों में बसे थे. मकानों में जगमगाती लाइटें पहाडि़यों पर सुंदरता बिखेर रही थीं. उस सुंदरता का वर्णन शब्द तो क्या करेंगे, सिर्फ महसूस करने की बात थी. मैं उस सुंदरता को आंखों में समेटे नींद की आगोश में चली गई थी.

‘‘क्या सोच रही हो इंदु. क्या पहाडि़यां ही देखती रहोगी? वाहिद आने वाला होगा,’’ प्रशांत ने मु?ो खयालों से बाहर किया.

मैं यह सोचती हुई उठ गई कि अब प्रशांत को कौन सम?ाए या बताए कि पहाडि़यों को देखते हुए कैसा लगता है. बादल जैसे पहाडि़यों पर ?ाक कर उन का चुंबन ले रहे हों या पहाडि़यों के गले लग रहे हों. प्रशांत को ये सब बातें नजर नहीं आतीं. मैं फटाफट वाशरूम में घुस गई. मैं ने गीजर औन कर दिया. जब तैयार हो कर हम कमरे से बाहर निकले तो देखा सुषमा इंतजार कर रही थी नाश्ते के लिए. वाहिद का भी फोन आ गया था वह घर से निकल चुका है हौलिडे होम के लिए.

हम ने कैंटीन मैनेजर को आलूपरांठे, पनीरपरांठे का और्डर दे दिया था. वाहिद जब तक पहुंचेगा तब तक हम नाश्ता कर लेंगे. हुआ भी वही. नाश्ते के बाद हम हौट कौफी का आनंद ले रहे थे कि वाहिद अपनी कार ले कर पहाड़ी पर आ गया.

जब कार पहाड़ी से नीचे उतरने लगती तो मैं आंखें बंद कर लेती डर के मारे. न जाने कितने वीडियो सोशल मीडिया पर देखे आंखों  के सामने घूम जाते. लगता, गाड़ी उलटी हो कर लुढ़क रही है. सीधी खड़ी पहाड़ी पर बनी सड़क से ढलान पर गाड़ी नीचे ले कर जाना मु?ो डरा देता. हम उस दिन लोकल घूमे. शिवालिक पर्वत श्रेणियां देखीं. आसपास की झीलें देखीं, नोकुचियाताल में नौकाविहार किया. रंगबिरंगी नौकाओं की कतारें बड़ी सुंदर थीं. रंगीन परदोंझीलरों में सजी नौकाओं को चलाने वाले हम जैसे टूरिस्टों को वहां का इतिहास बता रहे थे. भीमताल के मध्य बने टापू पर भी गए. खुर्पाताल, मल्लीताल में भी बड़ा मजा आया.

वापस हौलिडे होम तक आतेआते बहुत थक चुके थे. पहाडि़यों से घिरे उस शहर में रोशनियों सी जगमग लिए आंखों में कब सो गए, पता ही नहीं चला.

यहां मेरा उद्देश्य आप को नैनीताल की सैर करवाना नहीं है. नहीं तो, एकएक जगह का वर्णन करने में पन्ने रंगते चले जाएंगे.

नैनीताल की खूबसूरती के बीच मेरी? कलम ने एक कहानी को जन्म दिया. वह कहानी बताती है, चाहे कितनी भी परेशानियां आएं, दुखों के पहाड़ टूट जाएं व्यक्ति की फिक्र जिंदा रहती है, उस का जमीर जिंदा रहता है. हम 3 दिन नैनीताल में घूमते रहे.

तीसरे दिन की बात है, हम ने वाहिद को 4 दिनों के लिए बुक कर लिया था. रोज सुबह वाहिद आता, हमें खूबसूरती की सैर करवाने ले जाता. वाहिद ने यह भी बताया कि उस के 2 बच्चे हैं- एक लड़का और एक लड़की. लड़की का नाम नूर है और लड़के का नाम दानिश. पत्नी रेहाना बहुत मेहनती है, पहाडि़यों पर सागसब्जी उगा कर वह बेचती है घर के बाहर ही. इस में भी थोड़ीबहुत आमदनी हो जाती है. साथ ही, स्वेटर, मफलर, ऊनी कपड़े भी वह बुनती है क्योंकि नैनीताल में वर्षभर ठंडक रहती है. उन से भी उसे कुछ पैसे मिल जाते हैं.

हम जब घूमने के दौरान लंचडिनर के लिए गाड़ी रुकवाते थे तो वाहिद को भी लंचडिनर के लिए बोलते थे लेकिन वह स्पष्ट मना कर देता था, बोलता था, ‘यह मेरा रोज का धंधा है टूरिस्टों को घुमाना, ऐसे ही बाहर का खाना खाता रहा तो बीमार पड़ जाऊंगा. टिफिन ?मैं साथ ले कर चलता हूं.’ वह हमें टिफिन दिखाता.

तीनों दिन उस ने हमारे औफर को मना कर दिया था.

तीसरे दिन वह हमें ‘टिफिन टौप’ ले गया. इसे अंगरेजों का रैस्ट हाउस कह लें या पिकनिक स्पौट, बेहद खूबसूरत जगह थी जहां घोड़े से ही जाया जा सकता था. इसलिए वाहिद ने कहा वह नहीं जा पाएगा, नीचे हम लोगों का इतंजार करेगा. उस ने बताया, ‘मेरा एक फ्रैंड है, वह आसपास होगा या किसी टूरिस्ट को ले कर ऊपर गया होगा. उस को फोन कर देता हूं, वह घोड़ों की व्यवस्था कर देगा.’ तभी एक व्यक्ति ऊपर पहाड़ की चोटी से नीचे आता दिखा.

लगभग 50 वर्षीय व्यक्ति कदकाठी से मजबूत था. शारिरिक श्रम वाले व्यक्ति यों भी अच्छे स्वास्थ्य के धनी होते हैं.

‘‘ओ भोला, इधर आओ,’’ वाहिद ने उसे आवाज दी. उस का नाम भोला था या चलन में शायद उस का यही नाम था.

‘‘जी, वाहिद भाई,’’ भोला घोड़े की रास पकड़ेपकड़े नजदीक आ गया.

तीन घोड़ों का इंतजाम और करो,

4 टूरिस्ट हैं,’’ वाहिद ने उस से कहा.

‘‘जी, वाहिद भाई,’’ कहते हुए उस ने मोबाइल लगाया. जब तक वह मोबाइल पर बात करता रहा, मैं सोचती रही यह भाई वाला गणित सम?ा नहीं आता. इन के नाम के आगे भाई लगा देते हैं.

‘‘थोड़ी देर इतंजार करना होगा,’’ भोला ने मोबाइल बंद करते हुए कहा, ‘‘सभी घोड़े गए हुए हैं.’’ तभी भोला का घोड़ा हिनहिनाया.

‘‘क्या हुआ सुल्तान?’’ भोला ने  घोड़े को पुचकारा.

‘‘वाह, क्या बात है,’’ मैं बोली.

‘‘जी मेम, मेम, यही मेरी रोजीरोटी है, इसी से घर चलता है,’’ भोला बोला.

‘‘ऐसा कोई महीना जब टूरिस्ट न आते हों?’’ मैं ने पूछा.

‘‘बहुत बारिश के समय,’’ भोला ने बताया, फिर वह नैनीताल की खूबसूरती के बारे में बताने लगा.

‘‘आप ही देख लो, अंगरेजों के बसाए शहर के चारों ओर उन की ईमानदारी ?ालक रही है,’’ भोला घोड़े को हथेली पर चने रख कर खिलातेखिलाते बोला.

‘‘मतलब?’’ मैं ने पूछा.

‘‘उन के समय की इमारतों की मजबूती देख लो, आप. और अभी वर्तमान के कुछ सालों की जांच कर लो,’’ भोला बोला, ‘‘आएदिन पुल टूट रहे हैं, सैकड़ों लोगों की मौत हो रही है. कितने भ्रष्टाचार में डूबे हैं हमारे लोग.’’

‘‘बिलकुल ठीक,’’ प्रशांत और उन के मित्र शैलेंद्रजी ने हां में हां मिलाई.

सभी बात करते हुए इंतजार करते रहे. तभी कुछ घोड़े आते दिखे.

‘‘मेम साब, आप लोगों से एक बात बोलनी थी,’’ भोला हाथ जोड़ कर बोला.

‘‘बोलो भोला, क्या बात है?’’ मैं ने कहा.

‘‘आप लोग घोड़े वालों को टिप भी देना किराए के अलावा,’’ भोला बोला.

‘‘क्यों भाई?’’ प्रशांत का सवाल था.

‘‘साब, गरीब लोग होते हैं. किराए के अलावा टिप मिल जाती है, तो ये खुश हो जाते हैं,’’ उस ने स्पष्ट किया.

‘‘ठीक है,’’ सुषमा बोली.

‘‘अब चलें,’’ घोड़े नजदीक आ गए थे.

मैं भोला के घोड़े पर बैठी थी. मैं भोला से बातें भी करना चाहती थी कि जिस से कुछ नया मिले. हर व्यक्ति की सोच और उस की मानसिकता अलगअलग होती है. उसे सुनने में अच्छा लगता है. हम चारों घोड़ों पर अंगरेजों के बनाए पिकनिक स्पौट पर चल दिए जहां वे अपनी थकान उतारने को आते थे.

मैं सोच रही थी वहां इमारतों को देख कर भोला गलत नहीं बोल रहा था. सच्चाई थी उस की बातों में. अंगरेज कलाप्रेमी थे. पहाडि़यों के बीच काटी गई सड़कें सुंदर तो थीं, साथ ही, उन के द्वारा किए गए निर्माण मजबूत और कला के अद्भुत नमूने थे.

यहां की पब्लिक लाइब्रेरी ब्रिटिशकालीन है- दुर्गा लाल शाह म्युनिसिपल पब्लिक लाइब्रेरी. माल रोड पर स्थित मेथाडिस्ट चर्च देश नहीं, पूरी एशिया का पहला मेथाडिस्ट चर्च है. यह सीक्रेट टिकट बिल्ंिडग और गोथिक शैली पर आधारित है. आज भी इस की मजबूती और इस का निर्माण देखने लायक है. बहुत से मिशनरी स्कूलों का निर्माण भी अंगरेजों द्वारा करवाया गया जो नैनीताल के प्रसिद्ध स्कूल हैं.

शेरवुड कालेज में तो महानायक अमिताभ बच्चन, कबीर बेदी, मेजर सोमनाथ शर्मा जैसी जानीमानी हस्तियों ने अपनी शिक्षा पूरी की है.

अंगरेज प्रकृतिप्रेमी और कलाप्रेमी थे. यह नैनीताल में किए गए उन के निर्माणकार्य बताते हैं. टिफिन टौप वाकई कमाल का है. टिफिन टौप सेना के अधिकारी कर्नल जेपी केलेट ने अपनी पत्नी डोरोथी की याद में बनवाया था. डोरोथी पेंटर थी. वहां बैठ कर खूबसूरत पेंटिंग बनाया करती थी.

टिफिन टौप से जब हम नीचे उतरने लगे तो प्रशांत ने किराए के अलावा 100-100 रुपए की टिप तीनों घोड़े वालों को दी. तीनों ने खुश हो कर सैल्यूट ठोका. शुक्रिया अदा करते हुए चले गए लेकिन भोला ने टिप नहीं ली.

मैं ने कहा, ‘‘भोला, तुम टिप क्यों नहीं ले रहे हो जबकि तुम ने कहा था टिप देने को?’’

‘‘नहीं मैडम, किराया तो मैं ले चुका हूं. मैं टिप नहीं लेता. किराया ही बहुत है.’’

‘‘दूसरों के लिए क्यों कहा तुम ने?’’ प्रशांत ने सवाल किया.

‘‘वे ज्यादा खुश हो जाते हैं टिप से,’’ भोला बोला.

‘‘तुम खुश नहीं होते?’’ सुषमा ने सवाल किया.

‘‘मुझे, मुझे टिप से खुशी नहीं मिलती. मुझे किराए से ही खुशी मिल जाती है,’’ भोला बोला.

तभी एक और टूरिस्ट आ गया था. भोला आगे बढ़ गया था.

वाहिद हम को देख रहा था बड़ी देर से. भोला के जाते ही बोला, ‘‘चलें साब, होलिडे होम पहुंचतेपहुंचते अंधेरा होने लगेगा.’’

‘‘ठीक है, वाहिद, चलो.’’

हम चारों गाड़ी में बैठ गए और गाड़ी सर्पीली सड़कों पर फिसलती हुई पहाडि़यों के बीच से नीचे उतरने लगी.

कार की खुली खिड़कियों से आती ठंडीठंडी हवाओं से आंखें बोलि होने लगी थीं लेकिन दिल अतृप्त था. मुझे पता था. कल सुबह हमें नैनीताल से निकलना होगा.

‘‘मैडम, कैसा लगा टिफिन टौप?’’

‘‘बहुत खूबसूरत,’’ मैं ने, बस, इतना ही कहा. मु?ो पता था, कल वाहिद को ही हमें काठगोदाम छोड़ना है.

‘‘कल सुबह कितने बजे आना है, शाम को घर जल्दी जाऊंगा आप लोगों को काठगोदाम छोड़ कर.’’

‘‘क्यों वाहिद?’’ मैं ने सवाल किया.

‘‘कल रेहाना का बर्थडे है, इसलिए कल की शाम मैं घर पर रहना चाहता हूं. हमेशा ही लेट पहुंचता हूं काम की वजह से.’’

‘‘अरे वाह, अच्छी बात है,’’ मैं ने खुश हो कर कहा, ‘‘हमारी ओर से भी ढेर सारी बधाइयां.’’

‘‘शुक्रिया मैडमजी,’’ वाहिद सिर ?ाका कर बोला.

मैं ने नोट किया था, वाहिद उर्दू, हिंदी, इंग्लिश के शब्द अच्छी तरह बोल रहा था.

‘‘पढ़े कहां से हो, वाहिद?’’ शैलेंद्रजी ने पूछा.

‘‘कक्षा 8 तक पढ़ा हूं,’’ वाहिद थोड़ा मुसकराते हुए बोला, फिर आगे बोला, ‘‘जीवन भी स्कूल है. सच्ची पढ़ाई तो जीवन के अनुभवों से हो जाती है. कालेजों में बस डिग्री मिलती है. उस डिग्री को ले कर न जाने कितने लोग बेरोजगार ही घूम रहे हैं. इसलिए हम कम पढ़ेलिखे लोग अच्छे हैं.’’

वाहिद ने एक मोड़ पर गाड़ी

को मोड़ा.

‘‘करेक्ट वाहिद,’’ सुषमा बोली.

वाहिद अब हौलिडे होम वाली सड़क पर था, सीधी चढ़ाई.

कुछ ही देर में हम हौलिडे होम के सामने थे.

जब हम उतरे तो मैं ने 1 हजार रुपए उसे दिए और कहा, ‘‘वाहिद, इन रुपयों से रेहाना के लिए कोई गिफ्ट ले लेना.’’

वाहिद ने तुरंत हाथ जोड़ कर वे रुपए वापस कर दिए, बोला, ‘‘मेमसाब, आप लोगों की दुआएं ही बहुत हैं.

‘‘वाहिद, ले लो, हमारा भी मन रखो,’’ सुषमा बोली.

‘‘अगर देना ही है आप को तो खुद चल कर दीजिए उस के हाथों में. थैंक्यू मैडमजी, अब मैं चलता हूं. कल सुबह कितने बजे आना है?’’ वाहिद बोला.

हम लोगों की ट्रेन काठगोदाम से शाम 5.30 बजे की थी. सारा दिन हमारे पास था, इसलिए सुबह लगभग 10.30 बजे का बोल दिया गया.

‘‘जी साब,’’ कहता हुआ वाहिद गाड़ी स्टार्ट करने लगा.

वाहिद की कार ओ?ाल हो गई, चढ़ाई से उतरते ही मैं सोचती रही कितना खुद्दार है वाहिद.

रात में डिनर हम ने हौलिडे होम की कैंटीन से मंगवाया, छोलेभटूरे और गुलाबजामुन. डिनर के दौरान ही हम सब ने तय किया कि कल सुबह यहां से निकलते समय वाहिद के घर होते हुए चलेंगे और रास्ते में कोई गिफ्ट और केक ले लेंगे जिस से रेहाना खुश हो जाए, वहीं वाहिद का आत्मसम्मान भी बचा रहे.

नैनीताल पहाडि़यों के मध्य रहस्यमयी लग रही थी. चारों ओर पहाडि़यां रोशनियों से नहाई हुई थीं. इतनी सुंदरता बिखरी थी कि शब्द ही नहीं उन का वर्णन करने को, किसी सुंदर स्वप्न सा लग रहा था नैनीताल.

हम लोगों के बिस्तर बड़ीबड़ी खिड़कियों के नजदीक थे जिस से पहाडि़यों की रोशनी दिख रही थी. उन पहाड़ों की रोशनी को देखतेदेखते हम नींद में नैनीताल की पहाडि़यों में घूमते रहे. सुबहसुबह सुनहरी किरणें शीशों से टकरा कर भीतर आने लगीं. मन कर रहा था कि कुछ देर यों ही बिस्तर पर लेट जाएं क्योंकि कमरे में पंखे और एसी नहीं लगे थे. बड़े और भारी कंबल थे, इस का कारण वर्षभर नैनीताल का ठंडा रहना है.

हम ने चाय का और्डर दे दिया था. चाय आने तक कंबल में रहते हैं, सोचते हुए मैं ने कंबल से खुद को पूरा लपेट लिया. चाय आने पर कंबल को लपेटे ही चाय का आनंद लिया. इस दौरान तय हुआ कि नाश्ता बाहर करेंगे. चाय पीतेपीते ही वाहिद का फोन आ गया था. वह निकल रहा है घर से, 10.30 बजे तक पहुंच जाएगा.

उस के आने से पहले हम सब तैयार हो चुके थे.

जब वह आया तो हम ने उसे सब से पहले किसी अच्छे रैस्टोरैंट में नाश्ते के लिए कहा. उस ने कहा, ‘‘?ाल के सामने कुछ बढि़या रैस्टोरैंट हैं जहां साउथ इंडियन डिश मिलती हैं. हम वहीं गए. वड़ासांभर, पनीरडोसा खाया, फिर एक बेकरी से सुंदर केक लिया. रास्ते में एक बढि़या सा कार्डिगन भी लिया.

वाहिद कार में इंतजार कर रहा था, बोला, ‘‘अब चलें काठगोदाम के लिए, वहां भी आप को घूमना है.’’

‘‘वहां भी घूमेंगे, पहले तुम्हारे घर चलते हैं,’’ शैलेंद्रजी बोले.

‘‘क्या?’’ वाहिद बोला.

‘‘कल रेहाना का जन्मदिन है, तुम ने कल बोला था कि हमें काठगोदाम छोड़ कर तुम जल्दी ही आना चाहते हो,’’ शैलेंद्रजी ने कहा.

‘‘हां साहब जी,’’ वह बोला, ‘‘लेकिन आप लेट हो जाएंगे और कहां गरीबों के घर देखेंगे.’’

‘‘अब चलो, सोचो मत,’’ मैं ने कहा.

‘‘ठीक है, साबजी,’’ उस ने गाड़ी आगे बढ़ा दी.

आधे घंटे बाद हम सब वाहिद के घर पर थे.

साधारण से 2 कमरे थे. पहले वाले कमरे में एक पलंग और एक पुराना सोफा था, टीवी भी वहीं था. पलंग पर बेहद कमजोर एक वृद्ध लेटे हुए थे. ‘‘ये मेरे अब्बा हैं,’’ वाहिद बोला.

‘‘नमस्ते,’’ हम ने कहा.

‘‘नमस्ते, नमस्ते,’’ बुजुर्ग ने उठने की कोशिश की.

‘‘अरे नहीं, आप लेटे रहिए.’’ वे वापस लेट गए.

इतने में 2 बच्चे दौड़तेदौड़ते घर में घुसे. बेटी बड़ी सुंदर थी, बेटा भी प्यारा था. बच्चों ने आते ही नमस्ते की. लड़की लगभग 10 वर्ष और लड़का 12 वर्ष का था. वाहिद ने कहा, ‘‘अपनी अम्मी से कहो, शरबत और नाश्ता ले आए, मेहमान आए हैं.’’

‘‘अरे, इस की कोई जरूरत नहीं,’’ प्रशांत बोले.

‘‘नहीं साब, आप मेहमान हैं हमारे,’’ वाहिद ने कहा.

लगभग 15 मिनट बाद बेटी नूर अपनी अम्मी को ले कर बाहर आई. हम चौंक से गए. पत्नी रेहाना व्हीलचेयर पर थी और उसे चलाती हुई बाहर के कमरे में आ गई. उस ने हम से नमस्ते की. चेयर को कमरे के एक तरफ कोने में कर लिया.

कुछ मिनट हमें संभलने में लगे, फिर हम सब ने उसे हैप्पी बर्थडे कहा. ‘‘रेहाना जन्मदिन बहुतबहुत मुबारक हो.’’ उस के हाथों में केक दिया और कार्डिगन वाला पैकेट भी.

वह मुसकराते हुए ‘शुक्रियाशुक्रिया’ बोलने लगी. उस का गोरा चेहरा खुशी से गुलाबी हो गया.

वाहिद की आंखों में आंसू भर आए थे.

‘‘क्या हुआ?’’ सुषमा बोली.

‘‘मैडम ये खुशी के आंसू हैं, आ जाते हैं,’’ वाहिद बोला.

‘‘रेहाना के पैर एक ऐक्सिडैंट के बाद ऐसे हुए हैं. जब बच्चे बहुत छोटे थे 2-3 साल के, उस ऐक्सिडैंट के बाद पैर ठीक न हो पाए. आप लोगों ने मेरे जैसे छोटे आदमी की बात रखी, घर आ कर मुबारकबाद दी, यह मेरे लिए अनमोल तोहफा है,’’ वाहिद ने कहा.

‘‘नहीं वाहिद, बड़े तो तुम जैसे लोग होते हैं जो काम का मेहनताना ही लेते हैं, किराया ही लेते हैं, टिप, बख्शीश नहीं लेते. यही खुद्दारी है, आत्मसम्मान है. वही व्यक्ति बड़ा है,’’ मैं ने कहा.

हम रेहाना के हाथों की अदरक-मसाले वाली चाय, वैजिटेबल पकौड़ों का आनंद ले कर वाहिद के साथ काठगोदाम के लिए निकल गए.

उस दिन वाकई मैं ने एक बड़े व्यक्ति से मुलाकात की थी जो मेरे लिए बहुत सुंदर याद बन गई है. मु?ो रेहाना की आंखों में चमकती खुशी याद आती रही. Hindi Story

विधवा औरत को पति की पैंशन मिलेगी दिल्ली हाईकोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Widow Pension Law India: आज वह जमाना नहीं है जब पति की मौत के बाद औरत को जिंदगीभर विधवा बन कर जिंदगी गुजारनी पड़ती थी. कौंस्टिट्यूशन ने विधवा औरतों को आजादी और बराबरी का दर्जा दिया जिस से आज के समय विधवाओं को आजीवन नर्क जैसी जिंदगी नहीं जीनी पड़ती. पति की मौत के बाद वह चाहे तो अपनी मरजी से दूसरी शादी कर सकती है. अगर पति सरकारी कर्मचारी है तो उस की मौत के बाद उस की पत्नी को पैंशन मिलती है जिस से उस का गुजारा चल सके लेकिन सवाल यह है कि गवर्नमैंट एम्प्लौई की मौत के बाद अगर उस की विधवा दूसरी शादी कर ले तो क्या यह पैंशन उसे मिलती रहेगी?

केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के एक जवान की ड्यूटी के दौरान मृत्यु हो गई थी. जवान की मौत के बाद उस की पत्नी को पैंशन मिलनी शुरू हुई. बाद में जवान की विधवा ने शादी कर ली. मृतक जवान के मातापिता ने औरत को मिलने वाली पैंशन पर दावा ठोक दिया. मातापिता का तर्क था कि बेटे की विधवा की दूसरी शादी के बाद उसे पैंशन का हक नहीं रहना चाहिए और आश्रित मातापिता होने के नाते उन्हें यह पैंशन दी जानी चाहिए. इसी आधार पर मातापिता ने दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी.

हाईकोर्ट ने केंद्रीय सिविल सेवा 1972 के नियम 54 को इस मामले में सही ठहराते हुए कहा कि यह नियम विधवाओं के पुनर्विवाह को बढ़ावा देने और उन के लिए सोशल सिक्योरिटी तय करने के मकसद से बनाया गया है. दिल्ली हाईकोर्ट ने इन तमाम दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया. अदालत ने कहा कि पारिवारिक पैंशन कोई विरासत नहीं है बल्कि यह एक कानूनी सामाजिक सुरक्षा इंतजाम है जो केवल पैंशन के नियमों के तहत ही दी जाती है. नियम 54 के तहत पैंशन पाने वालों की प्राथमिकता तय है. मरने वाले कर्मचारी के मातापिता तब तक पैंशन के पात्र नहीं होते जब तक मरने वाले की पत्नी जीवित है, इस से फर्क नहीं पड़ता कि उस ने पुनर्विवाह कर लिया.

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि सरकार की नीति का मकसद केवल इकोनौमिकल सपोर्ट देना नहीं बल्कि विधवाओं की दोबारा शादी को बढ़ावा देना भी है. देश के जवान देश की सेवा में अपना जीवन न्योछावर करते हैं. ऐसे में यह जरूरी है कि उन के आश्रितों को आर्थिक रूप से असुरक्षित न छोड़ा जाए.

हाईकोर्ट ने कहा कि मातापिता को पारिवारिक पैंशन तभी मिल सकती है जब मृतक कर्मचारी अपने पीछे न तो विधवा और न ही संतान छोड़ जाता हो लेकिन इस मामले में जवान की विधवा जीवित है, उस के संतान नहीं है और इनकम का कोई जरिया नहीं है, इसलिए भले ही उस ने दूसरी शादी कर ली, इस से उस औरत का हक खत्म नहीं हो जाता. ऐसे में मातापिता को बाहर रखना किसी भी तरह से गलत नहीं है. Widow Pension Law India

 

अमेरिका की गुलामी

US Tariff Policy: अमेरिका के डिप्टी सेक्रेटरी औफ स्टेट यानी उपमंत्री ने भारत के एक मंच पर साफसाफ कहा है कि वे भारत के साथ व्यापार करेंगे पर चीन की तरह उसे एक अवसर नहीं सौंपेंगे कि भारत भी अमेरिका का प्रतिद्वंद्वी बन कर खड़ा हो जाए. क्रिस्टोफर लैंडो का यह कहना असल में डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ नीति का एक रहस्य खोलता है कि अमेरिका अब क्यों अपनी टैक्नोलौजी और मार्केट को ही सुरक्षित रखना चाहता है.

अमेरिकी अधिकारी का यह बयान बिलकुल सही है. सदियों से ही व्यापारी और देश जानकारी और रहस्यों को छिपा कर रखते आए हैं कि दूसरे उन से सीख न लें. अमेरिका अब भारतीय छात्रों पर भी रोकटोक लगा रहा है ताकि वे अमेरिका से कुछ सीखसाख कर भारत में बड़ा काम न करने लग जाएं.

वैसे, यह संकुचित अमेरिका के भी हित में नहीं होगा पर जब एक देश के दिमाग में बैठ जाए कि वह महान है और वही अकेला महान है तो कोई कुछ नहीं कर सकता. अमेरिका, यह साफ है, भारत को हर तरह चूसने का प्रयास करता रहेगा और अगर हम से व्यापार करेगा तो केवल अपनी शर्तों पर. वह अमेरिका अब मर गया है जो दुनिया में लोकतंत्र लाना चाहता था, जो सब का विकास चाहता था, जो सब जगह शांति चाहता था, जो दुख में मरहम लगाने को तैयार रहता था.

अमेरिका के चर्च और रिपब्लिकन पार्टी ने एक नए अमेरिका को पैदा कर दिया है जो बेहद स्वार्थी, बेहद दंभी और जिसे अपनी ताकत पर जरूरत से ज्यादा भरोसा है. वेनेजुएला में अमेरिका ने धौंस जमा कर दिखा दिया है कि वह चाहे जो कर ले, कोई कुछ नहीं बोलेगा. नरेंद्र मोदी के विश्वगुरु बनने, ब्रिक्स बनाने में आगे बढ़ने, दुनिया को नेतागीरी सिखाने के प्रयास बेकार गए हैं. ईरान युद्ध से पहले नरेंद्र मोदी अमेरिकी डील को पूरा करने के लिए हर तरह की खुशामद करते नजर आए. भारत दुनिया की चाहे तीसरीचौथी बड़ी अर्थव्यवस्था हो लेकिन इस का मतलब यह नहीं है कि वह अमेरिका के आगे किसी तरह खड़ा हो सकता है.

हमें तो वैसे भी मंदिरों, जातियों, हिंदूमुसलिम से फुरसत नहीं है. हमें गुलामी की आदत भी है. जैसे अमेरिका के काले आज भी अपने को हीन समझते हैं, पिछड़े हुए हैं वैसे ही भारत, जो कभी शकों, कभी हूणों का, कभी पर्शियनों, कभी ग्रीकों, कभी मुसलिमों, कभी अंगरेजों और यहां तक कि छोटे से नीदरलैंड तक का गुलाम रहा है, अमेरिका की गुलामी को ही अपनी जीत और स्वतंत्रता मानता रहेगा.

बदलता विश्व परिदृश्य

जहां एक तरफ यह संतोष है कि अमेरिकाइजराइल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध में वर्षों की अमेरिकी और इजराइली धौंस को बेहद धक्का लगा है और अब वे पश्चिमी एशिया के बादशाह नहीं रह गए वहीं दूसरी तरफ सिर पर एक खतरा मंडरा रहा है कि इन 2 अमीर देशों, जहां थोड़ीबहुत व्यक्तिगत स्वंत्रताएं हैं, लोग आसानी से आजा सकते हैं, कानून का राज है और खानेपहनने पर कोई नैतिक पुलिस परेशान नहीं करती, की जगह एक धार्मिक कट्टर नेता के इशारे पर चल रहे ईरान की धौंस कई गुना दिख सकती है.

जब भी यह युद्ध बंद होगा, अपने पीछे पाकिस्तान, अफगानिस्तान, यूनाइटेड अरब अमीरात, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, इराक के लिए ही नहीं, भारत के लिए भी एक काला बादल छोड़ जाएगा. अमेरिका और इजराइल से कुछ उम्मीदें की जाती थीं कि वहां खुले चुनाव होते हैं. अखबार, मीडिया हैं, खुली पढ़ाई है, औरतें आजाद हैं और वे दूसरों के हकों का सम्मान करेंगे. लेकिन ईरान से ऐसी उम्मीद नहीं है. अमेरिका और इजराइल ने ईरान के शिया मुसलिम शासकों को एक नई अनचाही ताकत प्लेट में रख कर दे दी है जिस के बूते वे खाड़ी के सभी देशों को कंट्रोल करेंगे और पैट्रोल व गैस के बेताज बादशाह बन सकते हैं.

ईरान ने साबित कर दिया है कि वह इतने हथियार बना सकता है, जमा कर सकता है और अपने देश को तहसनहस होते देख सकता है. साथ ही, अब उसे कोई देश न धमका सकता है, न नियमकानून मानने को कह सकता है. ईरान इस युद्ध के बाद शिया इसलाम का एक्सपोर्टर बन जाए तो बड़ी बात नहीं है. जिन भी इसलामी देशों में शियाओं की बड़ी संख्या है, उन के लिए ईरान एक स्वर्ग बन जाएगा और वे उस के बल पर न केवल दूसरे धर्म वालों को हड़काना शुरू कर देंगे, बल्कि सुन्नी मुसलिमों को अब किनारे करने की कोशिश भी करेंगे.

दुनियाभर के शिया मुसलिम सभी देशों के लिए नई आफत बन जाएंगे जिन से निबटना उतना ही मुश्किल होगा जितना तालिबानियों से निबटना रहा है. जैसे फारस के बादशाह ने वर्ष 1544 में हुमायूं को भारत पर आक्रमण कर के शेरशाह सूरी से लड़ने के लिए सेना कोहेनूर हीरे के बदले दी वैसे ही इसलाम में सुन्नी से शिया बनने की होड़ लग जाए, तो बड़ी बात नहीं. मौजूदा स्थिति यह है कि सुन्नी मुसलिम देशों का पैट्रोल का पैसा हाथी के दिखावे के दांतों के समान निकला जबकि ईरान का शेर के पंजों जैसा. यह आदमखोर शेर क्याक्या करेगा, वक्त ही बताएगा, फिलहाल तो यह डरावने भविष्य की दस्तक है.

चीन से पिछड़ता भारत

यह स्वाभाविक ही है कि भारत और चीन की तुलना बारबार की जाए क्योंकि 1947 के आसपास दोनों देश बेहद गरीब थे और दोनों में राजनीतिक परिवर्तन बराबर से हुए थे- भारत को अंगरेजों से आजादी मिली थी तो चीन को आपसी युद्ध और जापान के कब्जे से. भारत में कांग्रेस पार्टी ने जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में सत्ता संभाली जबकि चीन में कम्युनिस्ट पार्टी ने माओत्से तुंग के नेतृत्व में. कई दशकों तक दोनों देश गरीबी, भुखमरी, बीमारी, बढ़ती आबादी से जूझते रहे. चीन दुनिया का नंबर वन आबादी वाला देश बना और भारत विभाजन के कारण नंबर टू.

वर्ष 1990 के बाद चीन ने छलांग लगानी शुरू की और आज वह भारत से कहीं आगे पहुंच गया है. चीन शायद आज यूरोप और अमेरिका से ज्यादा सुखी, संपन्न और सुरक्षित देश है. यूरोप और अमेरिका चीन से उधार माल ले कर मौजमस्ती कर रहे हैं और थोड़ा सा ही ऐसा उत्पादन कर रहे हैं जो रोजमर्रा की चीजों के लिए है. चीन दुनिया की फैक्ट्री बन गया, भारत बेचारा गुलाम, लेबर देने वाला देश बन रह गया है.

एक नया आंकड़ा बताता है कि 2025-26 में भारत ने 119 अरब डौलर का सामान चीन से मंगवाया पर उसे बेचा मात्र 19 अरब डौलर में. इस तरह आपसी व्यापार में भारत को 100 अरब डौलर की हानि हुई. भारत यह विदेशी मुद्रा चीन से उधार ले कर और बाहर देशों में काम पर रहे भारतीय मजदूरों के भारत भेजे गए पैसों से चुकता कर रहा है. भारत के सरकारी अर्थशास्त्री उसी तरह आंकड़े प्रस्तुत करते हैं जैसे पंडेपुजारी हरिद्वार में गंगा स्नान करने के लाभ गिनाते हैं, बेसिरपैर के, बनाए हुए, नितांत झूठे. भारत की दशा सुधर रही है लेकिन बेहद धीमी जैसे चींटी की चाल जबकि चीन छलांगें लगा रहा है. भारत का विकास केवल चुनावी मंचों पर दिखता है, चीन का विकास उस की बढ़ती शक्ति में दिख रहा है.

इस में चिंता की बात यह है कि भारत के नेता इस बात से एकदम बेखबर हैं कि देश की जनता का रहनसहन कितना सुधर रहा है, उन्हें मंदिरों के उद्घाटनों, रेलों को ?ांडियां दिखाने, तोड़फोड़ कर सत्ता में बने रहने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा.

भारत चीन से इलैक्ट्रौनिक आइटम्स, टैलीकौम इक्विपमैंट, इंडस्ट्रियल मशीनरी, कंप्यूटर्स, इलैक्ट्रिक मशीनरी खरीद रहा है. जो कुछ भी खरीद रहा है उस का आविष्कार चीन में भी नहीं हुआ था पर चीन ने उसे सुधार कर सस्ते में बनाना सीख लिया और हम ने केवल अपने मजदूरों को भारत से बाहर भेजना सीखा. हम ने जहां दलबदल करना सीखा है, चीन ने स्थिर प्रशासन देना सीखा है. हमारे यहां मंदिरों पर मंदिर बने हैं, चीन में कारखानों पर कारखाने बने. अफसोस यह है कि ये आंकड़े हमारी चर्चा से गायब हैं. हम अपने मुंह मियां मिट्ठू बने रहने में खुश हैं. हम खुद को विश्वगुरु कहते नहीं अघाते जबकि दुनिया के देश जानते भी नहीं कि यह विश्वगुरु है क्या बला.

मंदिर उद्योग

सुप्रीम कोर्ट के 7 जज इस गहन समस्या पर विचार कर रहे हैं कि मंदिर ‘उद्योग’ हैं या नहीं. अगर मंदिरों को उद्योग माना जाएगा तो वहां के कर्मचारी इंडस्ट्रियल डिसप्यूट एक्ट के अंतर्गत लेबर कोर्टों में जा सकते हैं और अपने तबादले, प्रमोशन, वेतनवृद्धि, काम के घंटों, निकाले जाने पर मुकदमा कर सकते हैं.

एक पुराने मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने मंदिरों को ‘उद्योग’ मान लिया था पर अब मंदिर चाहते हैं कि मंदिरों के प्रबंधक ही सर्वोसर्वा रहें और वहां काम कर रहे आदमीऔरत सर्वेसर्वियों को भगवान मानें. बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट के जजों की राय थी कि चढ़ावे और खर्च के बीच जो बचत होती है उस के उपयोग पर निर्भर करता है कि मंदिर उद्योग हैं या नहीं.

असल में मंदिर, मसजिद, चर्च, गुरुद्वारे सब से बड़े उद्योग हैं जिन में झठों के बंडलों का उत्पादन होता है. इस ?ाठ को बेचने के लिए मंदिरों के पास मार्केटिंग की बड़ीबड़ी टीमें होती हैं. मंदिर, मसजिद, चर्च विशाल पूजा करने के कारखाने बनवाते हैं जिन का बड़े ढंग से रखरखाव होता है. उन में मैनेजरों, मालिकों और वर्कर्स के लिए खास सुविधाएं होती हैं.

धर्म के उद्योग को चलाना आसान नहीं होता क्योंकि झूठ और छलावे का प्रोडक्ट सदीदरसदी बेचते रहना कमाल की बात है. इतनी कुशलता से कोई उद्योग नहीं चला है जिस में खरीदार अपनी गाढ़ी कमाई से झूठ , आश्वासनों, कहानियों, चमत्कारों के वादों के प्रोडक्ट खरीदने के लिए दूरदूर से आते हैं, लाइनों में लगते हैं. वे पैसा ही नहीं, अपना शरीर और अपनी औरतों तक को इस उद्योग के लिए देते हैं.

इस उद्योग के प्रोडक्ट्स इतने प्रभावशाली होते हैं कि मंदिर, मसजिद, चर्च, गुरुद्वारे से अदृश्य पैकेटों में बांध कर घरों में ले जाए जाते हैं और जगहजगह रखे जाते हैं. सरकारें किसी और उद्योग को संरक्षण दें या न दें, इस उद्योग को अवश्य देती हैं क्योंकि यह उद्योग और सरकार मिल कर जनता को बेवकूफ बनाते हैं. यह धार्मिक उद्योग ही है जो सेनाओं में जवान उपलब्ध कराता है और सरकार की टैक्स वसूली में भी सहयोगी होता है.

सुप्रीम कोर्ट सिर्फ छोटे से हिस्से पर फैसला देगा पर जो ईश्वर इस उद्योग में काम कर रहे लोगों के विवादों को हल नहीं कर सकता वह ग्राहकों की समस्याओं को कैसे हल करेगा? अगर इसे ‘उद्योग’ घोषित कर दिया गया तो झगड़े लेबर कोर्टों में भर जाएंगे. हां, ग्राहकों की कमी न होगी क्योंकि इस उद्योग की मार्केटिंग बहुत तेज है. US Tariff Policy

सोशल मीडिया पर पोस्ट ‘कर’

Social Media Regulation India: कल पढ़ा कि आयकर विभाग लोगों के सोशल मीडिया पर नजर रखेगा, कर चोरी का पता लगाएगा. मैं यह विचार सुन कर ही बौरा गया हूं. मेरे सोशल मीडिया प्रोफाइल को कुछ प्यारे दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों और चंद जलकुकड़ों के सिवा आज तक किसी ने देखा नहीं था. आगे से खुद सरकार देखेगी. कितना मजा आएगा जब आयकर भवन के रहस्यमयी गलियारों में रिटर्न के बजाय मेरी रील्स देखी जाएंगी. उन का असेसमैंट किया जाएगा. आज तक मु?ा पर किसी ने नजर डाली ही नहीं, आखिर सरकार ने मुझे आम आदमी का दर्द समझ. उस का धन्यवाद तो बनता है.

मन झम कर गा रहा है, अब जा कर आया मेरे बेचैन दिल को करार. मेरी बनाई रील्स का स्तर कितना ऊंचा हो गया है. इन्हें फुरसत में बैठे टाइमपासुओं के बजाय साहब लोग देखेंगे, जिन्होंने दिनरात मेहनत कर के यूपीएससी की परीक्षा पास की है.

वैसे, सही मायने में साहब लोगों के साथ सामाजिक न्याय अब हुआ है. इतनी मेहनत के बाद धूलभरी फाइल्स देखने से कितना अच्छा होगा सोशल मीडिया प्रोफाइल्स देखना.

वैसे, अभी तक यह साफ नहीं हुआ है कि आयकर वाले किस प्लेटफौर्म को देखेंगे?

क्योंकि इस का डिटेल प्रोसिजर नोटिफिकेशन आया नहीं है. हो सकता है, अलगअलग प्लेटफौर्म्स के लिए कुछ उपविभाग बना दिए जाएं. बताते हैं एआई यानी आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस का उपयोग किया जाएगा. मैं तो कह रहा हूं जब आप ने इतने काबिल अफसर यानी एक्चुअल इंटैलिजैंस कुरसी पर बैठाया है, तो आर्टिफिशियल काम क्यों करना?

कितना मनोरम दृश्य होगा जब रिटर्न्स के मनहूस, बेमजा आंकड़ों की भीड़ में एक बाला की रील, ‘तेनु काला चश्मा लगदा है’, देख कर साहब चश्मा उतार कर स्क्रीन के पास ?ाकते हुए क्लर्क से बोलेंगे, ‘हम्म, ये चश्मे का खर्च तो डिक्लेयर नहीं किया इस ने. इंपोर्टेड है.  पता करो कितने डौलर का है. कस्टम ड्यूटी दी या नहीं. इस ने कान में हीरे के टौप्स पहने हुए हैं. इस की इनकम  से आए हैं या कैश में लिए हैं. नोटिस देना तो बनता है. 4-5 दिन चक्कर लगवाएंगे तो औफिस की साख बढ़ेगी.

कुल मिला कर कर-संग्रह की दृष्टि से यह महान विचार है. मेरा इस मामले में कुछ सु?ाव है. इस के लिए कुछ नई पोस्ट बनाई जा सकती हैं, जैसे रील इंस्पैक्टर, स्टेटस चैकर, ट्वीट एनालिस्ट वगैरह. इन के ऊपर एक ‘आईटीओ’ मतलब ‘इंस्टाग्राम ट्विटर औफिसर’ भी बनाया जा सकता है.

नए बजट में फौलोअर्स की संख्या पर भी टैक्स लगाया जा सकता है. कमैंट्स और लाइक्स ज्यादा होने पर कुछ छूट का प्रावधान कर दें. कर बचाने वाले निवेश की जगह ‘एसआईपी’ यानी स्टेटस इन्वैस्टमैंट स्कीम लानी चाहिए.

नाचनेगाने वाली और सरकारभक्त रील को अधिक छूट दी जा सकती है. पोस्ट को हायर स्लैब में रखना आवश्यक होगा लेकिन ज्ञान बांटू.

रिटर्न के फौर्म में सैल्फ डिक्लरेशन पोस्ट अटैच करने की सुविधा दी जानी चाहिए. सोशल मीडिया के अतिरिक्त व्यक्तिगत रूप से भेजे जा रहे वीडियो को ‘अन्य स्रोत से आय’ शीर्षक में रखा जाए. अधिक शेयर या डिलीट कर दी गई पोस्ट को ‘टीडीएस’ (ट्रांसफर्ड एंड डिलीटेड सोशल पोस्ट) मान कर कर लेना चाहिए. रोज पोस्ट न करने वालों पर पेनल्टी लगाई जाए और आखिरी में एक ‘सोशल मीडिया पोस्ट ट्रिब्यूनल’ बनाया जाए जिस में इन्फ्लुएंसर मित्रों की नियुक्ति की जाए.

खैर, सुझावों के बाद कुछ बात परेशानी की भी कर लेते हैं.

थोड़ी सी दिक्कत बेचारे सीए यानी कर सलाहकारों के लिए जरूर हो सकती है.

इन्हें अब आर्टिकल क्लर्क की जगह आर्टिस्ट रखने पड़ सकते हैं जो लोगों को टैक्स के बजाय पोस्ट में लिखे जाने वाले टैक्स्ट की सलाह दें.

सीए लोगों को बैलेंस शीट में ‘प्रौफिट’ मैनेज करने के बजाय लोगों की ‘प्रोफाइल’ मैनेज करनी होगी. कर्मचारियों को ‘टैली’ जैसे अकाउंटिंग सौफ्टवेयर की जगह ‘बैली’ डांस सीखना पड़ सकता है क्योंकि ज्यादातर शौर्ट्स उसी के आते हैं. एक्सेल शीट्स के साथ डीजे बिट्स की जानकारी भी रखनी होगी. यह तय करना मुश्किल रहेगा कि पोस्ट देख कर अधिकारी खुद लाइक कर दें तो कैपिटल गेन शौर्ट टर्म होगा या लौंग टर्म?

यदि विश्वास व्यास की पोस्ट पर वह सिर खुजाने लगे तो टैक्स कितना लगेगा? कुमार विश्वास तो धर्म का प्रचार कर रहा है और करोड़ों कमा रहा है तो भी पार्टी की सेवा मान कर वह पहले से ही एक्जेम्प्ट कैटेगरी में है. वैसे, इन छोटीमोटी परेशानियों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा आखिर सरकार सोशल काज के लिए सोशल मीडिया का उपयोग कर रही है.

सीधा सा फंडा है कि बेटा जीवन में कुछ कर या मत कर, ‘कर’ तुझ से हम ले लेंगे. कितनी अच्छी बात है कि अभी तक फालतू समझ जा रहा सोशल मीडिया पोस्ट राष्ट्रनिर्माण में योगदान देगा. आप के हैंडल से मुफ्त सुविधाएं देने की योजनाएं हैंडल होंगी. इस से बड़ा काम क्या होगा. इसलिए आप और कुछ करें या न करें, सोशल मीडिया अपडेट करते रहें. मैं ने यह लिखने से पहले ही गोल्ड लोन का आवेदन दे दिया है. मुझे पता है, यह लेख पोस्ट होते ही वायरल हो जाएगा और पीछेपीछे नोटिस आता ही होगा. पर देश के लिए कुर्बानी देनी ही होती है. और, इस के लिए मैं तैयार हूं. Social Media Regulation India

 

 

शराब के धंधे में फिल्मों के धुरंधर

Bollywood Alcohol Controversy: आज का बौलीवुड केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि एक बड़ा व्यापार बन चुका है, जहां कलाकारों की प्राथमिकता समाज नहीं, बल्कि मुनाफा बन गई है. जब ये आइडल माने जाने वाले स्टार्स शराब को कूल दिखाते हैं, तो वह अप्रत्यक्ष रूप से उन लाखों महिलाओं की चीखों के जिम्मेदार बनते हैं जिन्हें रात में उन का शराबी पति पीटता है. एक युवा जब अपने आदर्श यानी कि अभिनेता को स्टाइल में वोडका का गिलास पकड़े देखता है, तो वह इसे महानता की निशानी समझने लगता है. क्या इन स्टार्स की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं है?

भारतीय सिनेमा कभी संस्कारों की पाठशाला हुआ करता था. वह दौर याद कीजिए जब पृथ्वीराज कपूर, सोहराब मोदी और बलराज साहनी जैसे दिग्गज अपनी कला को समाज सुधार का माध्यम मानते थे. 1953 की फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ में बलराज साहनी ने एक गरीब किसान की पीड़ा का चित्रण जिस अंदाज में किया था, उस ने देश की अंतरात्मा को झकझोर दिया था.

इतना ही नहीं, 70 के दशक में जब परदे पर विजय (अमिताभ बच्चन) अन्याय के खिलाफ लड़ता था तो युवा अपनी कमीज की आस्तीन वैसी ही चढ़ा लेते थे. जब 50 के दशक में दिलीप कुमार या राज कपूर परदे पर सिसकते थे तो पूरा देश रोता था. सिनेमा भारत में सिर्फ मनोरंजन नहीं, एक संस्कार था.

लेकिन आज वही महानायक और बादशाह अपने करोड़ों प्रशंसकों के हाथों में दूध का गिलास नहीं, शराब की बोतल थमा रहे हैं. कड़वा सच यही है कि वर्तमान समय में उसी भारतीय सिनेमा के नायक, जिन्हें युवा अपना आदर्श मानते हैं, अपने प्रशंसकों की बदौलत ही कई सौ करोड़ रुपए की फीस जेब में डालते हुए समाज व अपने प्रशसंकों के हाथ में जाम पकड़ा रहे हैं. यह महज व्यापार नहीं, बल्कि उस भरोसे की हत्या है जो एक आम इंसान इन सितारों पर करता है.

आज के कलाकार और पहले के अभिनेता

पहले के कलाकार खुद को समाज का हिस्सा मानते थे. सुनील दत्त ने कैंसर पीडि़तों के लिए काम किया, न कि नशे को बढ़ावा दिया. शाहरुख खान, अजय देवगन, संजय दत्त आदि ने कला को बिजनैस बना लिया है. जब अजय देवगन विमल के बाद अब ग्लेनजर्नी नाम की व्हिस्की प्रमोट करते हैं तो वह उस मध्यवर्गीय पिता के भरोसे का कत्ल करते हैं जो उन्हें सिंघम मान कर अपने बच्चों को निडर बनने की सीख देता है.

हम सभी यह जानते हैं कि आज का कलाकार 50 व 60 के दशक का कलाकार नहीं है जिसे समाज व सिनेमा की चिंता होती थी. आज का कलाकार सिनेमा से जो कमाता है, उसे सही ढंग से इन्वैस्ट करना जानता है. दोढाई दशकों के अंतराल में तमाम कलाकारों ने प्रौपर्टी में जम कर इन्वैस्ट किया है.

हाल ही में अमिताभ बच्चन ने 90 करोड़ का इन्वैस्टमैंट अयोध्या में कर प्रौपर्टी खरीदी है. इतना ही नहीं, रैस्टारैंट, फैशन ब्रैंड शुरू कर रहे हैं. आईपीएल व कबड्डी टीम में पैसा इन्वैस्ट किया है पर अब ये बातें पुरानी हो गईं. अब बौलीवुड के पुरुष कलाकार शराब में इन्वैस्ट कर रहे हैं.

यों तो अभिनेता डैनी डेंजोगपा इस मामले में सब से पुराने खिलाड़ी हैं. उन्होंने 1987 में सिक्किम में युक्सोम ब्रेवरी ल्नोवउ ठतमूमतपमे की स्थापना की थी, जो आज भारत की तीसरी सब से बड़ी बीयर कंपनी है. फिर 35 साल बाद आर्यन खान ने अपने दोस्तों के साथ शराब का व्यापार शुरू किया. 2025 में शाहरुख खान भी कुछ दूसरे भागीदारों के साथ आर्यन खान के शराब के व्यापार के साथ जुड़ गए.

शाहरुख खान का यह व्यापार कई देशों में फैल चुका है. शाहरुख खान, जिन्हें लोग प्यार से किंग खान कहते हैं, आज अपने बेटे आर्यन खान के साथ मिल कर शराब बेच रहे हैं. उन के ब्रैंड ड्यावोल की मार्केटिंग रणनीति सीधे युवाओं के मानस पर प्रहार करती है. शाहरुख खान इसे सिर्फ शराब नहीं, बल्कि लग्जरी लाइफस्टाइल के रूप में बेच रहे हैं. महाराष्ट्र में शाहरुख खान की कंपनी की ‘वोडका’ की एक बोतल की कीमत करीब 5,000 रुपए है, जबकि इनसैप्शन (माल्ट स्कौच) की प्रति बोतल की कीमत 9,000 रुपए से 9,800 रुपए के बीच है.

शराब बेचने के साथ ही शाहरुख खान का किस तरह से नैतिक पतन हुआ है, उस की बानगी भी देख लीजिए. हाल ही में एक विज्ञापन में शाहरुख को विश्वप्रसिद्ध पेंटिंग मोनालिसा का अपमान करते दिखाया गया. ऐसा महज इसलिए जिस से वे अपने बेटे आर्यन खान के ब्रैंड की जैकेट को मास्टरपीस साबित कर सकें. शाहरुख खान का यह कदम कला के प्रति उन की संवेदनहीनता का परिचायक ही है. एक समय था जब शाहरुख ने स्वास्थ्य मंत्री की अपील पर कहा था कि, ‘अगर शीतल पेय हानिकारक हैं तो उन्हें बंद कर दें.’ लेकिन आज वे खुद उस से भी खतरनाक शराब के व्यापार में मुख्य चेहरा हैं.

हिंदूमुसलिम करने वाले यह भी जान लें कि सिनेमा के परदे पर सिंघम बन कर कानून की रक्षा करने वाले अभिनेता अजय देवगन अब ‘द ग्रीन जर्नीज’ नाम की व्हिस्की बेच रहे हैं. अक्तूबर 2025 में लौंच हुए इस ब्रैंड ने महज 4 महीनों में 8,622 बोतलें बेच कर 4 करोड़ 14 लाख रुपए का कारोबार किया. यह बिक्री 437 आउटलेट्स पर की गई. अजय देवगन वही अभिनेता हैं जो विमल (गुटखा) बेच कर पहले ही आलोचना झेल चुके हैं. अब वे धड़ल्ले से शराब के जरिए युवाओं के कलेजे और जेब दोनों पर वार कर रहे हैं.

हम सभी जानते हैं कि अभिनेता संजय दत्त का अपना जीवन नशे की वजह से बरबाद हुआ, पर आज वे स्वयं ‘द ग्लेन वौक’ स्कौच बेच रहे हैं. इन्होंने छोटे पाउच के जरिए इसे इस कदर अधिक सुलभ बना दिया है कि गरीब युवा भी आसानी से इस की लत का शिकार हो रहे हैं. संजय दत्त 2023 से इस व्यापार में हैं. 750 एमएल की बोतल 1,500 रुपए में मिल जाती है. राणा डग्गूबट्टी की शराब ‘लोका लोका तकीला’ भारतीय व मैक्सिकन मिश्रित है और इस का बाजार पूरे विश्व में फैला हुआ है. भारत में तकीला की बोतल की कीमत 5,000 रुपए है. रणवीर सिंह ‘रंगीला वोडका’ तो वहीं गायक बादशाह ‘शेल्टर 6 वोडका बेच कर इस कतार में शामिल हैं.

वर्तमान समय के और 50 व 60 के दशकों के दौर के कलाकारों में अहम फर्क यह है कि उस वक्त के कलाकार मान कर चलते थे कि सैलिब्रिटी होने के नाते उन पर एक सामाजिक उत्तरदायित्व है.

अभिनेता सुनील दत्त ने खुद कभी भी सिनेमाई परदे पर या असल जिंदगी में ऐसे किसी उत्पाद को बढ़ावा नहीं दिया जो समाज को कमजोर करे. उन्होंने अपने प्रोडक्शन हाउस अजंता आर्ट्स के माध्यम से सैनिकों का मनोरंजन किया और कैंसर के खिलाफ जंग लड़ी. अभिनेता दिलीप कुमार ने तो फिल्मों के चयन में भी हमेशा इस बात का ध्यान रखा कि उन के चरित्र से समाज को क्या संदेश जा रहा है. आज के कलाकारों के लिए सोशल मैसेज सिर्फ एक स्क्रिप्ट का हिस्सा है, जबकि असल जिंदगी में उन का एकमात्र धर्म पैसा है. वे मदारी बन चुके हैं जो जनता की भावनाओं से खेल कर अपना खजाना भर रहे हैं.

शराब, शराबी और महिलाओं की चीख     

शराब के इस ग्लैमरस विज्ञापन के पीछे की हकीकत बहुत भयावह है. क्या हम सभी नहीं जानते कि भारत में होने वाली घरेलू हिंसा के पीछे शराब सब से बड़ा कारण है. जब बौलीवुड के ये तथाकथित हीरो शराब को कूल दिखाते हैं तो वे अप्रत्यक्ष रूप से उन लाखों महिलाओं की चीखों के जिम्मेदार बनते हैं जिन्हें रात में उन का शराबी पति पीटता है. एक युवा जब अपने आदर्श यानी कि अभिनेता को स्टाइल में वोडका का गिलास पकड़े देखता है तो वह इसे महानता की निशानी सम?ाने लगता है. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि जब अजय देवगन या शाहरुख खान अपने करोड़ों के बंगलों में उत्सव मनाते हैं, तब उन के द्वारा बेची गई शराब किसी ?ाग्गी या मध्यवर्गीय घर के चूल्हे को बु?ा चुकी होती है.

दक्षिण का सिनेमा : मर्यादा की आखिरी दीवार

बौलीवुड से ठीक उलट, अगर हम राणा डग्गूबट्टी को नजरंदाज कर दें तो दक्षिण के कलाकार आज भी अपनी इमेज को ले कर सजग हैं. दक्षिण की फिल्मों में फिल्मी परदे पर अकसर नायक को शराब पीते हुए नहीं दिखाया जाता, यह काम विलेन के लिए सुरक्षित रखा जाता है.

दक्षिण का नायक समाज का रक्षक होता है, जबकि बौलीवुड का नायक पूरी तरह से ऐसा बिजनैसमैन बन चुका है जो अपनी नैतिकता को नीलाम कर चुका है. दक्षिण के सुपर रजनीकांत ने कई वर्ष पहले अपनी एक फिल्म के बाद युवाओं से अपील की थी कि वे सिगरेट और शराब छोड़ दें क्योंकि इस से उन के स्वास्थ्य और परिवार पर बुरा असर पड़ता है. बौलीवुड में ऐसी रीढ़ की हड्डी वाला कलाकार ढूंढ़ना आज मुश्किल है.

शराब के व्यापार की शुरुआत अभिनेता डैनी डेंजोंगपा ने 1987 में अपने गृहप्रदेश सिक्किम में बियर फैक्टरी यानी कि ब्रेवरीज डाल कर की थी. उसी दौर में पहली बार जैकी श्रौफ ने पनामा सिगरेट का विज्ञापन किया था, जिस का विज्ञापन करने से अभिनेता राज कुमार ने मना कर दिया था. फिर शत्रुघ्न सिन्हा ने ‘बैग पाइपर’ का विज्ञापन किया था लेकिन भारत में केबल टैलीविजन नैटवर्क (संशोधन) नियम 2000 के तहत शराब और तंबाकू का सीधा विज्ञापन/ प्रचार करने पर पर पूर्ण प्रतिबंध है लेकिन बौलीवुड के ये चतुर ‘मदारी’ कानून में मीनमेख कर रास्ता निकालते हैं.

सब से पहले बात यह कि सरोगेट विज्ञापन क्या बला है? जब शाहरुख खान या अजय देवगन म्यूजिक सीडी, ग्लास, क्लब सोडा या इलायची के नाम पर विज्ञापन करते हैं तो असल में वे उसी नाम की शराब बेच रहे होते हैं. इसे कहते हैं सरोगेट या छद्म विज्ञापन. मगर अपनी व अपने बेटे आर्यन खान की शराब कंपनी का सरोगेट विज्ञापन करते हुए किस तरह शाहरुख खान ने इस कानून की धजिज्जयां उड़ा कर रख दीं, उस की बानगी देखिए.

कुछ समय पहले नैटफ्लिक्स पर आर्यन खान निर्देशित वैब सीरीज ‘बैड्स औफ बौलीवुड’ स्ट्रीम होना शुरू हुई थी. अभी भी यह सीरीज नैटफ्लिक्स पर मौजूद है. इस सीरीज में कई जगह डाओल की लाइट चमकती नजर आती है. शाहरुख खान खुद अब इसे प्रमोट करते हैं.

इतना ही नहीं, हाल ही में सैंट्रल कन्ज्यूमर प्रोटैक्शन अथौरिटी  ने पाया कि शराब के ब्रैंड्स के विज्ञापनों में दिखाए जाने वाले सोडा या सीडी का बाजार में कोई अस्तित्व ही नहीं होता. यह सिर्फ जनता को ठगने और शराब को घरघर पहुंचाने का जरिया है. अब इंस्टाग्राम रील और हाईप्रोफाइल इवैंट्स (जैसे दुबई में लौंचिंग) के जरिए युवाओं को लुभाया जाता है.

सरकार का हंटर : अब लगेगा करोड़ों का जुर्माना

खैर, सरकार इन सितारों की इस मनमानी को रोकने के लिए कमर कस चुकी है. उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने नई गाइडलाइंस जारी की है. जिस के तहत यदि कोई कलाकार (जैसे शाहरुख खान या अजय देवगन) किसी ऐसे ब्रैंड को प्रमोट करता है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से शराब से जुड़ा है तो उस पर 50 लाख रुपए तक का भारी जुर्माना लगाया जा सकता है. बारबार नियम तोड़ने पर उस कलाकार को किसी भी उत्पाद का विज्ञापन करने से 1 से 3 साल तक के लिए प्रतिबंधित किया जा सकता है.

इतना ही नहीं, अब तो ब्रैंड एंबेसडर की जिम्मेदारी भी तय की जा रही है. अब कानून कहता है कि विज्ञापन करने वाले सितारे को यह साबित करना होगा कि उस ने उस उत्पाद की पूरी जांचपड़ताल की है. अब वे यह कह कर नहीं बच सकते कि मु?ो नहीं पता था कि यह शराब है.

मौत के आंकड़ों पर खड़ा करोड़ों का मुनाफा

सरकारी आंकड़ों पर गौर किया जाए तो प्रतिवर्ष केवल भारत में लगभग 2.6 लाख मौतें सीधेतौर पर शराब के सेवन से होती हैं. क्या इन मौतों की नैतिक जिम्मेदारी शराब के व्यापार में लिप्त सुपरस्टार्स की नहीं है? ष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की मानें तो शराब पीने वाले पतियों की पत्नियों के साथ हिंसा होने की संभावना तीनगुना अधिक होती है. बौलीवुड के ये नायक परदे पर तो महिलाओं का सम्मान करने का नाटक करते हैं लेकिन असल जिंदगी में वे उस जहर के मालिक हैं जो औरतों की जिंदगी नरक बना रहा है.

कलाकारों के विरोधाभास

हम सभी जानते हैं कि संजय दत्त खुद कभी नशा मुक्ति केंद्र में रह कर अपना इलाज करवा चुके हैं, वहीं आर्यन खान खुद नशीले पदार्थों के मामले में विवादों के तहत कुछ दिन जेल मे रह चुके हैं, लेकिन वर्तमान समय में यही लोग शराब के सब से बड़े सौदागार बनने की होड़ में हैं. कितनी अजीब बात है कि आज संजय दत्त या आर्यन खान शराब बेच कर युवाओं को सैलिब्रेशन का पाठ पढ़ा रहे हैं.

धूम्रपान निषेध की बात करने वाले शाहरुख खान स्कौच बेच रहे हैं. सिनेमा के परदे पर भगत सिंह का किरदार निभा चुके अजय देवगन ने क्या कभी सोचा कि शहीद ए आजम ने ऐसे ही नशे में डूबे भारत का सपना देखा था जोकि शराब बेच कर अजय देवगन बना रहे हैं? 50 के दशक के कलाकारों के लिए पैसे से बड़ी प्रतिष्ठा मायने रखती थी लेकिन वर्तमान समय के सितारों के लिए महज दौलत मायने रखती है. इन का चरित्र शून्य है. ये आज की युवा पीढ़ी के आदर्श बनने के बजाय कौर्पोरेट की ऐसी कठपुतलियां बने हुए हैं जो अधिकाधिक मुनाफे के लिए अपनी सोच तक बेच चुके हैं.

आज की युवा पीढ़ी को यह समझने की जरूरत है सिनेमाई परदे पर मसीहा नजर आने वाले कलाकार असल में उन की जेब और सेहत पर डाका डालने वाले बिजनैसमैन हैं. इन का बहिष्कार ही समाज को बचाने का एकमात्र रास्ता है.

सिनेमाघर का परदा सफेद होता है लेकिन उस पर अभिनय करने वालों के हाथ आज शराब के धंधे से काले हो चुके हैं. ऐसा कर्म कर रहे कलाकार भूल जाते हैं कि जिन आम इंसानों ने अपनी गाढ़ी कमाई से सिनेमा का टिकट खरीद कर उन्हें स्टार बनाया, वे उसी पैसे से उसी आम इंसान को बीमार बनाने का सामान बेचते हैं. Bollywood Alcohol Controversy

अंधविश्वास का कूड़ा परोसती – भूत बंगला

Film Review:  फिल्म की कहानी मंगलपुर नाम के एक रहस्यमयी गांव से शुरू होती है, जहां बरसों से किसी की शादी नहीं हुई. वजह है कि गांव में ‘वधूसुर’ नाम का राक्षस है, जो दुलहन को गायब कर देता है. इस के रहस्य की जड़ें एक पुराने फ्लैशबैक में छिपी हैं. वहीं दूसरी तरफ लंदन में रहने वाला अर्जुन आचार्य (अक्षय कुमार) अपनी बहन मीरा (मिथिला पारकर) की शादी के लिए एक सही जगह ढूंढ रहा है. अर्जुन अच्छे घर का है मगर सिर पर उधारी भी बहुत है. उस के पिता (जीशु सेनगुप्ता) भी चाहते हैं कि मीरा की शादी अच्छे से हो, तभी अर्जुन को पता चलता है कि मीरा 500 करोड़ रुपए की संपत्ति और एक भव्य हवेली की वारिस है.

अर्जुन मंगलपुर गांव पहुंच कर अपनी बहन की शादी उसी हवेली में करना चाहता है. यहां कुछ किरदार दिखाई देते हैं जैसे असरानी इस महल का मैनेजर यानी केयरटेकर है और परेश रावल वैडिंग प्लानर है. राजपाल यादव इलैक्ट्रिशियन है. अर्जुन के कहने पर ये सभी इस महल को शादी के लिए सजाने में जुट जाते हैं. इस दौरान हवेली में अजीबोगरीब घटनाएं घटने लगती हैं. पहले अर्जुन इन घटनाओं को नकारता है मगर धीरेधीरे उसे भी भूतिया घटनाओं का अनुभव होने लगता है. इसी दौरान कौमेडी का थोड़ाबहुत तड़का भी है. मगर एक समय बाद ये सभी किरदार पुराने जमाने की पाइपलाइन के रिसाव की तरह लगते हैं.

रोहन शंकर और अभिलाष नायर द्वारा लिखित यह पटकथा दो भागों में बंटी लगती है. पहला भाग थोड़ाबहुत हंसाता है मगर दूसरा भाग तो शेयर मार्केट में हुए क्रैश की तरह गिरने लगता है. दोनों भागों में तालमेल की कमी है कहानी में न सस्पैंस है, न ट्विस्ट जो आप को सीट से बांधे रखे. कई सीन ऐसे लगते हैं जैसे बस टाइम भरने के लिए जोड़े गए हों. कुल मिला कर, स्क्रिप्ट अधूरी और बिना दिशा की महसूस होती है.

फिल्म का वीएफएक्स इतना घटिया है कि वधूसुर राक्षस कम, कालेज के नाटक का रावण ज्यादा लगता है. डर का माहौल जीरो है. कौमेडी में 20 साल पुराने जोक्स, वही गिरनाफिसलना चल रहा है. प्रियदर्शन ने ‘भागम भाग’, ‘चुप चुपके’, ‘भूलभुलैया’, ‘स्त्री’, ‘मुंज्या’ का अजीब सा कौकटेल बना कर छोड़ा है. यानी फिल्म वह दिखाने की कोशिश करती है जो पहले की फिल्मों में हो चुका है.

राजपाल यादव 2-3 बार हंसा देते हैं, बाकी टाइमपास लगता है, जबरदस्ती हंसाने की एक्टिंग चल रही है. हीरोइन वामिका गब्बी है मगर उस की भूमिका फिल्म पर कोई इम्पैक्ट नहीं डालती. फर्स्टहाफ थोड़ाबहुत ठीक भी है मगर सैकंडहाफ में तंत्रमंत्र, फ्लैशबैक और आचार्य खानदान का इतिहास दिखाया गया है. फिल्म में जबरन घुसाया मायथोलौजिकल एंगल इसे आउटडेटेड बना देता है.

फिल्म का टैक्निकल डिपार्टमैंट लगता है सब छुट्टी पर थे. निर्देशक प्रियदर्शन ने अपनी पुरानी फिल्मों में अक्षय कुमार के मीम हूबहू चिपका डाले हैं. डायलौग ऐसे हैं कि एक भी लाइन याद नहीं रहती. फिल्म का म्यूजिक प्रीतम ने कंपोज किया है. अरिजीत सिंह की आवाज में ‘तू ही दिसदा…’ गाना सुनने में अच्छा लगता है.

सिनेमेटोग्राफी के नाम पर हवेली बहुत डल लगती है. फिल्म 2 घंटा 57 मिनट की है. 90 मिनट भी झेलना मुश्किल है. अक्षय कुमार इस फिल्म को ढोते हैं, बचाते नहीं. वही आंखें घुमाना, वही पंच डिलीवरी. मगर इफैक्टिव नहीं. उम्र के इस पड़ाव में उन की कौमिक टाइमिंग भी थकी हुई लगती है. क्लाइमैक्स में अक्षय के दो सरप्राइज रोल कर दिए गए हैं लेकिन दर्शक सरप्राइज नहीं होते.

प्रियदर्शन-अक्षय जोड़ी की पहले की फिल्म ‘भूलभुलैया’ में साइंस ने अंधविश्वास को हराया था. ‘भूत बंगला’ ने 16 साल बाद उसी अंधविश्वास को हार पहना कर स्टेज पर खड़ा कर दिया गया है. यह प्रोग्रैस नहीं, रिग्रेशन है. डबल मीनिंग जोक्स भी सुनने में अजीब लगते हैं.

यह फिल्म न डराती है, न हंसाती है, सिर्फ पकाती है और थिएटर से निकलते ही लगता है कि 3 घंटे की सजा मिली थी. फिल्म की शुरुआत से ही दर्शक कनैक्ट नहीं कर पाते. फिल्म हौरर और कौमेडी का मिश्रण बनाने के चक्कर में फंस गई, लेकिन दोनों ही पहलुओं में यह पूरी तरह असफल रहती है. बेशक, यह प्रियदर्शन-अक्षय वाली हिट जोड़ी की सब से कमजोर फिल्म है. film Review

कानूनी पचड़ों से बच कर प्लान करें बुढ़ापा

Senior Citizen Rights: नि:संतान वरिष्ठ नागरिक के भरणपोषण मामले में केरल हाईकोर्ट ने अपने आदेश डब्लू ए नंबर 1301/2019 में कहा, ‘केवल कानूनी उत्तराधिकारी ही नि:संतान बुजुर्ग के भरणपोषण के लिए उत्तरदायी माने जाएंगे. किसी वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति पर कब्जा अपनेआप में भरण का दायित्व नहीं बनाता, जब तक कि वह व्यक्ति लागू पर्सनल ला के तहत कानूनी उत्तराधिकारी न हो. हाईकोर्ट ने मेंटिनैंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल का फैसला खारिज करते हुए कहा कि अपीलकर्ता महिला बूआ सास (पति की बूआ) के भरणपोषण के लिए उत्तरदायी नहीं हैं.’

मेंटिनैंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल ने मातापिता व वरिष्ठ नागरिकों के भरणपोषण और कल्याण कानून 2007 के तहत महिला को बूआ सास का भरणपोषण करने के लिए जिम्मेदार ठहराया था क्योंकि नि:संतान वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति उस के पास थी. घटना के मुताबिक, अपीलकर्ता एस सीजा नामक 40 साल की महिला के पति की अविवाहित व नि:संतान बूआ ने 1992 में अपनी संपत्ति भतीजे को उपहार में दे दी थी और 2008 में भतीजे की मृत्यु के बाद वह संपत्ति उस की पत्नी के पास चली गई थी. ऐसे में भतीजे की मृत्यु के बाद बुजुर्ग महिला ने वरिष्ठ नागरिक भरणपोषण कल्याण कानून के तहत भतीजे की पत्नी को भरणपोषण का आदेश देने की मांग की थी.

केरल हाईकोर्ट के न्यायाधीश सतीश निनान और पी कृष्ण कुमार की खंडपीठ ने बूआ सास के भरणपोषण की जिम्मेदारी डालने वाले आदेश के विरुद्ध दाखिल महिला की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि उसे पति की बूआ का भरणपोषण करने का आदेश नहीं दिया जा सकता क्योंकि वह मातापिता एवं वरिष्ठ नागरिक भरणपोषण अधिनियम की धारा 2(जी) के मुताबिक ‘रिश्तेदार’ की श्रेणी में नहीं आएगी.

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति पर कब्जा अपनेआप में भरणपोषण का दायित्व नहीं बनाता, जब तक कि वह व्यक्ति लागू पर्सनल ला के तहत कानूनी उत्तराधिकारी न हो. कोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति वरिष्ठ नागरिक का कानूनी उत्तराधिकारी नहीं है, वह कानून के तहत सिर्फ इस आधार पर रिश्तेदार नहीं कहा जा सकता कि उस के पास वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति है. हाईकोर्ट ने कहा कि वह उस फैसले से सहमत नहीं है जिस में कहा गया है कि जो व्यक्ति नि:संतान वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति का उत्तराधिकारी होगा, उसे उस का ‘रिश्तेदार’ माना जाएगा. हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसा समझ जाना कानून की स्पष्ट भाषा के साथ अन्याय होगा. हाईकोर्ट ने कानून के तहत ‘रिश्तेदार’ की व्याख्या की है.

कोर्ट ने कहा कि मातापिता और वरिष्ठ नागरिक भरणपोषण कानून की धारा-5 कहती है कि मातापिता अपने बच्चों से भरणपोषण का दावा कर सकते हैं और अगर वरिष्ठ नागरिक नि:संतान है तो वह अपने ‘रिश्तेदार’ से भरणपोषण का दावा कर सकता है. कानून के मुताबिक, वह व्यक्ति वरिष्ठ नागरिक का रिश्तेदार होना चाहिए, उस के पास भरणपोषण के साधन होने चाहिए, उस के कब्जे में वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति होनी चाहिए या उसे वरिष्ठ नागरिक की संपत्ति का उत्तराधिकार हो.

कानून में जो ‘रिश्तेदार’ की व्याख्या की गई है उस के मुताबिक नि:संतान वरिष्ठ नागरिक का कोई कानूनी उत्तराधिकारी वह है जो नाबालिग न हो और जिस के कब्जे में उस की संपत्ति हो या वह उस की संपत्ति पर उत्तराधिकार रखता हो. हाईकोर्ट ने कहा कि इस का मतलब है कि वह व्यक्ति कानून के मुताबिक वरिष्ठ नागरिक के कानूनी उत्तराधिकारी के वर्ग या श्रेणी में आता हो.

इसलिए जो व्यक्ति कानूनी उत्तराधिकारी नहीं है, वह कानून के मुताबिक, वरिष्ठ नागरिक का ‘रिश्तेदार’ नहीं हो सकता. केवल संपत्ति पर कब्जा होने भर से या उसे उत्तराधिकार में संपत्ति मिलने से वह रिश्तेदार नहीं माना जाएगा. सिर्फ इस आधार पर कानून में उसे रिश्तेदार नहीं माना जा सकता कि उस महिला ने अपने पति की संपत्ति पर उत्तराधिकार पाया है, जो वरिष्ठ नागरिक ने उपहार में दी थी. अगर गिफ्ट डीड में अलग से इस बात को लिखा गया होता तो अलग बात थी.

क्या होती है गिफ्ट डीड

गिफ्ट डीड बिना किसी प्रतिफल के संपत्ति को उपहार के रूप में देने की कानूनी प्रक्रिया को कहा जाता है. यह ‘दाता’ द्वारा संपत्ति के अधिकारों के हस्तांतरण का एक स्वैच्छिक कार्य है. जहां ‘दान पाने वाले’ को इस के बदले कुछ देना नहीं पड़ता है. इस का उपयोग आमतौर पर अचल संपत्ति, नकदी या अन्य मूल्यवान संपत्तियों को उपहार में देने के लिए किया जाता है. यह दूसरे संपत्ति हस्तांतरणों से भिन्न है क्योंकि इस में स्वामित्व का हस्तांतरण धन के आदानप्रदान के बिना किया जाता है. संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम 1882 है जो भारत में संपत्ति हस्तांतरण को नियंत्रित करता है. इस अधिनियम की प्रमुख धारा 122 और धारा 126 हैं, जिन में गिफ्ट डीड को परिभाषित किया गया है.

गिफ्ट डीड के जरिए संपत्तियां किसी भी पारिवारिक या गैरपारिवारिक सदस्य को उपहार में दी जा सकती हैं. गिफ्ट डीड में देने वाले को दान दी गई संपत्ति का स्वामित्व के प्रमाण के दस्तावेज देने होते हैं. इस के अलावा दानकर्ता और दान प्राप्तकर्ता दोनों को पहचान और पते का प्रमाण, जैसे आधार कार्ड, पासपोर्ट या मतदाता पहचान पत्र, प्रस्तुत करना होगा. यदि संपत्ति पहले इस के माध्यम से अर्जित की गई थी तो रजिस्ट्री की कौपी लगानी होगी. किसी संपत्ति को कानूनी बकाया या लंबित देनदारियों से मुक्त करने की दशा में प्रमाणपत्र देना होगा.

गिफ्ट डीड के पंजीकरण और लागू होने के दौरान 2 गवाहों की जरूरत होती है. जो अपनेअपने पहचान पत्र और पते के प्रमाण के साथ हो. स्थानीय उपपंजीयक कार्यालय गिफ्ट डीड करने के लिए स्टैंप शुल्क स्वीकार लेता है. दानकर्ता और उपहार प्राप्तकर्ता सभी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करते हैं और गवाह कार्यालय में ही इसे सत्यापित करते हैं.

गिफ्ट डीड जमा होने के बाद उसे उपपंजीयक कार्यालय में पंजीकृत किया जाता है. उपपंजीयक सभी दस्तावेजों और उन के कानूनी अनुपालन की पुष्टि करता है. उस के बाद उपपंजीयक उपहार की रसीद कानूनी प्रमाण के रूप में देता है. स्टैंप शुल्क की गणना राज्य के आधार पर की जाती है, क्योंकि अलगअलग राज्यों में स्टैंप शुल्क अलगअलग होते हैं. यह बिना किसी छूट के संपत्ति उपहार में देने पर लागू होता है.

भरणपोषण व कल्याण अधिनियम

कांग्रेस की अगुआई वाली डाक्टर मनमोहन सिंह सरकार ने समाज के हित में कई कानून बनाए थे. मातापिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरणपोषण व कल्याण अधिनियम 2007 उन्हीं में से एक है. यह संविधान द्वारा मातापिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरणपोषण व कल्याण हेतु वैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है. इस को 29 सितंबर, 2008 से लागू किया गया था.

इस कानून के मुताबिक, कोई वरिष्ठ नागरिक या मातापिता जो अपनी आय से या अपनी स्वामित्व वाली संपत्ति से अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है, वह अपने बच्चों या कानूनी उत्तराधिकारियों से भरणपोषण राशि प्राप्त करने के लिए अधिनियम की धारा 5 के तहत आवेदन करने का हकदार है. इस अधिनियम के तहत मासिक भत्ते के लिए दायर आवेदन का निबटारा 90 दिनों के भीतर किए जाने का प्रावधान है.

यदि बच्चे या रिश्तेदार न्यायाधिकरण के आदेशों का पालन करने में विफल रहते हैं तो न्यायाधिकरण जुर्माना लगा सकता है और ऐसे व्यक्तियों को वरिष्ठ नागरिकों के भरणपोषण और व्यय के लिए प्रत्येक माह के भत्ते के पूरे या उस के किसी भाग के लिए दंडित कर सकता है या एक माह तक या भुगतान किए जाने तक कारावास का आदेश दे सकता है. अधिकतम भरणपोषण भत्ता 10,000 रुपए प्रतिमाह से अधिक न होगा.

न्यायाधिकरण कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान ऐसे बच्चों या रिश्तेदारों को वरिष्ठ नागरिक के अंतरिम भरणपोषण के लिए मासिक भत्ता प्रदान करने का आदेश दे सकता है. यदि वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल और सुरक्षा के लिए जिम्मेदार व्यक्ति वरिष्ठ नागरिकों को छोड़ देते हैं तो ऐसे व्यक्तियों को 3 महीने के कारावास या 5,000 रुपए तक का जुर्माना या दोनों से दंडित किया जाएगा.

इस अधिनियम के अंतर्गत प्राप्त याचिकाओं के शीघ्र निबटारे हेतु प्रत्येक उपमंडल में राजस्व संभागीय अधिकारी की अध्यक्षता में एक न्यायाधिकरण का गठन किया गया है, जो वरिष्ठ नागरिकों और मातापिता द्वारा बच्चों और कानूनी उत्तराधिकारियों से भरणपोषण राशि प्राप्त करता है. जिला समाज कल्याण अधिकारी भरणपोषण अधिकारी के साथसाथ सुलह अधिकारी के रूप में भी इन मामलों को सुनते हैं.

मातापिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरणपोषण व कल्याण अधिनियम 2007 में ‘उत्तराधिकारी’ शब्द को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है. अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार यह उन बच्चों, रिश्तेदारों या किसी अन्य व्यक्ति को संदर्भित करता है जो वरिष्ठ नागरिक की मृत्यु के बाद उस की संपत्ति या देखभाल के लिए जिम्मेदार होते हैं.

अधिनियम के अनुसार ‘बच्चे’ में पुत्र, पुत्री, पोता और पोती शामिल हैं जो नाबालिग नहीं हैं. ‘रिश्तेदार’ शब्द में भाई, बहन भतीजे शामिल हैं जो वरिष्ठ नागरिक के कानूनी उत्तराधिकारी हैं. जिन के पास पर्याप्त साधन हैं उन्हें वरिष्ठ नागरिक का भरणपोषण करना होगा. ‘उत्तराधिकारी’ शब्द इस अधिनियम में कानूनी रूप से जिम्मेदार व्यक्ति को दर्शाता है, जो वरिष्ठ नागरिक के जीवित रहने पर उन की देखभाल करने और उन की मृत्यु के बाद उन की संपत्ति या देखभाल के लिए जिम्मेदार होता है.

टकराव से नहीं मेलजोल से रहें

देश के संविधान ने बुजुर्गों के अधिकार और भरणपोषण को ले कर कई कानून बनाए हैं. बुजुर्गों की समस्या को कानूनी पचड़ों में पड़ने से नहीं बल्कि युवाओं के साथ मेलजोल से सुलझना ज्यादा बेहतर होता है. कानूनी अधिकार लेने के लिए परिजनों के साथ टकराव की हालत बन जाती है. हमारे देश में कानून भले ही बने हों लेकिन उन का पालन बहुत कम होता है. ऐसे में कोर्ट और बाबुओं के चक्कर लगाना बुजुर्गों के बस के बाहर होता है. परिवार के लोगों से ही जब टकराव के हालात बन जाएं तो मुसीबत और बढ़ जाती है. ऐसे में जरूरी है कि परिजनों और उत्तराधिकारियों से मेलजोल कर के रहना ही सही रहता है.

बुजुर्गों के लिए जरूरी है कि वे 60 साल की उम्र के बाद अपना बुढ़ापा प्लान करना शुरू कर दें. उन की यह कोशिश रहनी चाहिए कि वे किसी पर बो?ा बन कर न रहें. परिवार में अपनी उपयोगिता बनाए रखने की स्किल सीख लें. जैसे, घर के कामकाज करना सीख लें. परिवार के छोटे बच्चों की जिम्मेदारी उठाएं. उन को स्कूल से लाएं, ले जाएं. घर में अगर पेड़पौधे हैं तो उन की केयर करें. बाजार से छोटीबड़ी खरीदारी करें. घर के जरूरी पेपर संभाल कर रखें. इस तरह के बहुत सारे काम हैं जिन को कर के वे परिवार में अपनी उपयोगिता बनाए रखें.

बुजुर्गों की कोशिश यह रहनी चाहिए कि वे परिजनों के साथ टकराव वाली बातें न करें. कई बार उन के कामकाज में सलाह दे कर टांग अड़ाने का काम करते हैं. इस से बचें. सलाह उचित समय पर उचित तरह से ही दें. अगर सलाह न मानी जाए तो उस को भी मुद्दा न बनाएं. ज्यादातर टकराव खाने को ले कर होता है. जो बच्चे खा रहे हों उसी को खा कर खुश रहें. अपनी जिम्मेदारी खुद उठाएं, जैसे अपने कपड़े धोना है, बिस्तर लगाना है. इस तरह के छोटेछोटे काम उपयोगी होते हैं.

अगर बुजुर्ग अपने अंदर इस तरह का बदलाव करने में सफल रहते हैं तो उन का बुढ़ापा सही से कट सकता है. दूसरे घरों की तुलना न करें. कई बार बुजुर्ग यह करते हैं कि वे अपने घर की तुलना दूसरे घरों से करने लगते हैं. वे यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि उन की देखभाल कम हो रही है. यह तुलना ठीक नहीं होती. यह भी बारबार करना ठीक नहीं रहता है कि वे अपने मातापिता की जिस तरह से सेवा करते थे उन की सेवा नहीं हो रही है. आर्थिक रूप से जितना अपने पर निर्भर रह सकते हैं, रहें. अपनी संपत्ति जीवनकाल में अपने पास रखें. अगर जरूरी है तो उस की वसीयत करें. वसीयत के चलते आप के बाद टकराव न हो, इस के लिए पूरे परिवार की जानकारी और सहमति से करें. – Senior Citizen Rights

रेलवे की जनरल बोगी खतरे में – आम आदमी के जनरल डिब्बे से इतनी दिक्कत क्यों?

Indian Railways: रेलवे को आम आदमी की सवारी कहा जाता है. आम आदमी को बिहार से दिल्ली जाना हो या गांव से निकल कर परदेश की यात्रा करनी हो रेलवे ही एकमात्र विकल्प हुआ करती थी. रेलवे में आगे और पीछे जनरल बोगी होती थी जिस में जब चाहे गरीब आदमी बैठ कर अपने गंतव्य तक पहुंच जाता था. समय के साथ रेलवे में कई बदलाव हुए लेकिन जनरल बोगी वहीं की वहीं रही लेकिन अब जनरल बोगी की पहचान खतरे में है.

सरकार की नजर थर्ड एसी पर है क्योंकी एसी बोगी से ज्यादा कमाई होती है. लगातार जनरल बोगी को कम किया जा रहा है जिस से जनरल और स्लीपर दोनों की हालत खराब हो गई है. स्लीपर क्लास अब जनरल जैसा लगने लगा है. लोग फर्श पर, सीट के नीचे, बाथरूम के पास सो कर यात्रा करने पर मजबूर हो रहे हैं. अब सवाल यह है की जहां 80 परसेंट लोग 5 किलो राशन की लाइन में लगे हों वहां हर आदमी थर्ड एसी या स्लीपर में कैसे सफर करे.

भारतीय रेलवे के कुल कोचों में जनरल और स्लीपर कोच अभी भी 70 प्रतिशत के करीब हैं. रेलवे के पास कुल कोचों की संख्या 82,200 है जिस में 57,200 कोच नौन एसी यानि जनरल और स्लीपर हैं. रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने 2025 में संसद में बताया था कि अगले 5 साल में 17,000 अतिरिक्त नौन एसी यानि जनरल और स्लीपर कोच बनाए जाएंगे. 2024 से 25 के बीच जनरल या अनरिजर्व्ड कोच से 651 करोड़ यात्रियों ने सफर किया. वहीं 2022 से 23 के बीच यह आंकड़ा 553 करोड़ था यानी मांग हर साल बढ़ रही है.

फिर समस्या कहां है? कई लोकप्रिय लंबी दूरी की ट्रेनों खासकर मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों में रेक कंपोजिशन बदला जा रहा है. LHB कोच आने के बाद कुछ ट्रेनों में जनरल बोगी 4 और 5 से घटा कर 3 और 4 कर दी गई. स्लीपर भी कम किए गए और उन की जगह 3एसी और 2एसी बढ़ा दिए गए. साउथर्न रेलवे और सैंट्रल रेलवे ने 2025 में कई ट्रेनों में यह प्रयोग किया. नतीजा यह हुआ की उसी ट्रेन में जनरल टिकट वाले यात्री कम जगह में फंस गए और रिजर्व्ड स्लीपर में भी अनरिजर्व्ड यात्री घुस गए.

रेलवे के इस गैरजरूरी प्रयोग से सब से ज्यादा परेशानी आम आदमी को झेलनी पड़ रही है. रेलवे प्राइवेट कंपनी जैसा व्यवहार कर रही हैं. जहां सिर्फ मुनाफा देखा जाता है. इस प्रयोग से रेलवे की कमाई जरूर बढ़ी है. एसी क्लास अब पैसेंजर राजस्व का 54 फीसदी हिस्सा दे रही है जबकि नौन एसी से केवल 41 परसैंट प्रौफिट ही आ रहा है. एक एसी कोच से जितनी कमाई होती है उतनी 3 या 4 जनरल और स्लीपर कोच से नहीं होती. रेलवे कहता है कि एसी से मिले पैसे से नई लाइनें, स्टेशन, वन्दे भारत, सुरक्षा और इलेक्ट्रिफिकेशन जैसे काम हो रहे हैं जिस से रेलवे का मौडर्नाइजेशन किया जा रहा है लेकिन आम आदमी के लिए ये मौडर्नाइजेशन खासा महंगा पड़ रहा है.

देश की बड़ी आबादी अभी भी बेहद गरीबी में जीवन जी रही है. आज भी भारत में जनरल क्लास का किराया दुनिया में सब से सस्ता है जिस से गरीब आदमी के लिए लंबी दूरी की यात्रा सस्ती पड़ती है लेकिन इसी आम आदमी के जनरल डिब्बे को कम कर दिया जाएगा तो भीड़ स्लीपर में शिफ्ट हो जाएगी. रेलवे नौन एसी को सब्सिडी देता है लेकिन मांग इतनी ज्यादा है कि कुछ ट्रेनों में जनरल बोगी बैकअप जैसी हो गई है.

अमृत भारत ट्रेनें पूरी तरह नौन एसी हैं. इस में 8 से 12 स्लीपर कुछ और 2 जनरल कुछ होते हैं. कुछ जोन में न्यूनतम 12 नौन एसी कोच रखने का नियम भी आ रहा है लेकिन समस्या जमीनी है खासकर त्योहारों और शादी के सीजन में तो रेलवे में बेतहाशा भीड़ बढ़ती है. कई लोग यात्रा के दौरान मर जाते हैं. भगदड़ में मौते होतीं हैं लेकिन व्यवस्था के नाम पर स्पेशल ट्रेनें चला दी जाती हैं. अचानक शुरू होने वाली इन स्पेशल ट्रेनों के बारे में गरीब आदमी को कोई जानकारी तक नहीं होती जिस से समस्या वहीं की वहीं बनी रहती है इस से आम आदमी की परेशानी जरा भी कम नहीं होती.

लाखों यात्री रोज ये दुर्दशा झेल रहे हैं. रेलवे को प्राइवेट जैसा मुनाफा कमाना ठीक है लेकिन सब के लिए जगह की व्यवस्था करना रेलवे का सब से बड़ा भी कर्तव्य है. Indian Railways

प्यार का साया – अपनों की खुशी के लिए जीती युवती

Hindi Story: रजिस्ट्रार के सामने एप्लीकेशनों पर साइन करते समय मां, दोनों भाई, दोनों की पत्नियां, देव के पेरैंट्स, बहन और बाहर कुछ नजदीकी रिश्तेदार थे. भाइयों ने इस शादी पर कुछ आपत्ति की थी पर यह देख कर कि दीदी अब एक पूरी समझदार रोबदार बोर्डिंग स्कूल की प्रोक्टर हैं और अपने अधिकारों से पूरी तरह वाकिफ हैं, चुप से थे. उन्होंने कहना चाहा था कि आप वैसे अपने से नीची जाति के लड़के से विवाह कर सकती हैं पर देव की पर्सनैलिटी और उस के ठाटबाट देख कर चुप रह गए पर चेहरों पर उस हताशा की झलक थी जो किसी सोने की चिडि़या हाथ से निकल जाने पर होती है.

यह 3 साल पहले की बात थी जब स्कूल की कैंटीन में चाय पीते हुए देवयानी ने कहा था, ‘कृष्णा, आज का अखबार देखा? देहरादून के प्रसिद्ध बोर्डिंग स्कूल में जौब के लिए इश्तिहार है. तुम्हारे लिए परफैक्ट रहेगा. तुम्हें अप्लाई करना चाहिए,’

कृष्णा और देवयानी पिछले कई सालों से एक ही स्कूल में काम करती थीं. सहकर्मी होने के साथसाथ दोनों अच्छी सहेलियां भी थीं. एकदूसरे से सुखदुख साझ करतीं और जरूरत पड़ने पर एकदूसरे को सलाह भी दिया करतीं. दोनों वैसे संभ्रांत पढ़ेलिखे घरों से थीं और इस स्कूल में भी नौकरी सिर्फ अच्छे पढ़ेलिखों को दी जाती थी. वे स्मार्ट और चतुर थीं.

‘देवयानी, तुम क्यों मु?ो कहीं और भेजने के लिए इतनी उतावली हो रही हो, अपने घर से दूर जा कर मु?ो क्या खुशी मिलेगी?’

‘कृष्णा, तुम जानती हो कि तुम्हारे जाने से सब से ज्यादा उदास मैं ही होऊंगी. एक तुम ही तो मेरी सब से करीबी दोस्त हो, लेकिन बात यह भी है कि मैं तुम्हारी खुशी चाहती हूं और किस घर की बात कर रही हो? उसी टौक्सिक माहौल से

तो तुम्हें दूर भेजना है. मैं क्या देख नहीं रही हूं कि तू दिनोंदिन ढल रही है,’

देवयानी बोली.

कृष्णा जानती थी कि देवयानी उस की स्थिति को देख कर व्यावहारिक सलाह दे रही थी, लेकिन वह ही किसी निर्णय पर नहीं आ पा रही थी. उस वक्त तो वह देवयानी की बातों को टाल गई लेकिन उस के शब्द कृष्णा के जेहन में रह ही गए. घर पर भी वह कमरे में बैठी देवयानी की बात पर सोच ही रही थी कि उस की नजर सामने की दीवार पर लगी अपने पिता की तसवीर पर गई. पिता को देखते ही उस का गला रुंध सा गया. लाड़ली थी वह उन की. बहुत गर्व था उन्हें उस पर. वे कहते, ‘कृष्णा, तू मेरा गरूर है. बहुत बड़े काम करेगी तू.’

गीली आंखों से तसवीर की तरफ देखते हुए कृष्णा सोचने लगी, ‘क्यों मुझे अकेला छोड़ गए, पापा? आप जानते हैं न कि हर पलआप की कमी कितनी खलती है. मेरा साथ देने के लिए कोई नहीं है. आप के सिवा मुझे  रास्ता दिखाने वाला था ही कौन? अब मैं क्या करूं, पापा?’ उसे लगा जैसे तसवीर से पापा का मुसकराता चेहरा कह रहा हो, ‘ऐसे दिल छोटा नहीं करते, बेटे. मैं गया कहां हूं, हमेशा तुम्हारे साथ ही तो हूं.’

वैसे, यह सच ही था. 10 साल हो चुके थे पापा की मृत्यु को. एक रात अच्छेभले सोए और फिर सुबह उठे ही नहीं. अकस्मात आए इस ?ाटके के लिए कोई तैयार नहीं था. उस ने तब बस ग्रेजुएशन ही पूरी की थी. दोनों भाई अभी स्कूल में ही थे. किसी के बिना कुछ कहे ही उस ने घर की जिम्मेदारी खुद पर ले ली. मां और भाइयों को उसे ही संभालना था. एक अच्छे स्कूल में उसे नौकरी मिल भी गई. नौकरी के साथसाथ उस ने बीएड की पढ़ाई भी कर ली. फिर एमए भी कर लिया. शाम को बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती और मां की मदद करती. बस, इसी तरह रोज उस के दिनरात कटते. हां, वह किताबें बहुत पढ़ती थी. हिंदी, इंग्लिश की नौवल, जीवनियां, यात्रा वृत्तांत. इसीलिए उस के छात्र उस पर मोहित थे.

कभीकभी उस की हिम्मत टूट सी जाती. मगर फिर पापा की कही बातें याद कर वह खुद को संभाल लेती. उस के पापा कहा करते थे, ‘कृष्णा, तुम इतनी बुद्धिमान, इतनी बहादुर हो कि कभी कोई मुश्किल घड़ी आन पड़ी तो तुम ही सब को संभाल पाओगी. कभी हार मत मानना, बेटा. खुद पर कभी विश्वास डगमगाने मत देना. याद रखना, तुम सबकुछ कर सकती हो.’

बस, पापा का प्यार इसी तरह साया बन कर उसे हौसला देता, उसे सुरक्षित महसूस कराता. उन की कही बातों से वह उन की उपस्थिति अपने आसपास महसूस करती. कुछ इसी तरह जिंदगी आगे सरकती रही. कृष्णा के कमाए पैसों से घर किसी तरह चलता रहा. कुछ समय बाद दोनों भाई अमन और आकाश भी पढ़ाई पूरी कर साधारण सी नौकरियों में लग गए. दोनों भाइयों ने पिता के न होने का काफी लाभ उठाया और उन की जिंदगियां मोबाइलों के इर्दगिर्द या फालतू के दोस्तों के साथ गप्पों में बीतीं.

फिर एक दिन दोनों ने उस के समक्ष अपनीअपनी पसंद की लड़की से शादी करने की इच्छा जाहिर की. अचानक आए इन प्रस्तावों से वह हैरानी में जरूर पड़ गई कि दोनों ने इतनी बड़ी जानकारी इतने दिन उस से गुप्त रखी थी, मगर फिर सोचा कि आखिर इस में हर्ज ही क्या है. दोनों अपनी पसंद की लड़कियों के साथ अपनी गृहस्थी में खुश रहें, यही तो वह भी चाहती थी.

मां ने जरूर दबी आवाज में पहले कृष्णा की शादी के लिए कहा था मगर उस ने यह कह कर बात खत्म कर दी कि उस के लिए दोनों भाइयों को इंतजार कराना ठीक नहीं होगा. जल्दी ही दोनों भाइयों का विवाह संपन्न हो गया. भाइयों को बहन से खास लगाव न था क्योंकि उन के दिमाग में बहन की छवि एक पिता समान है, हैडमास्टर की सी थी जिस के साथ हंसना, खेलना नहीं होता, जिस के आदेशों का इंतजार किया जाता है. कृष्णा ने बहुत बार नोट किया था कि उस के घर में घुसते ही दोनों भाइयों के हंसी के ठहाके बंद हो जाते थे. उस ने निर्णय किया कि भाइयों को अपने अनुशासन से आजाद करे.

सबकुछ हो जाने पर कृष्णा अपने कमरे में बैठी हाल के सारे घटनाक्रमों के बारे में सोच रही थी. तभी उसे एहसास हुआ जैसे पापा पास बैठ कर उस से कह रहे हों, ‘कृष्णा, मेरी बच्ची, तू ने हमेशा सब के बारे में सोचा लेकिन तेरे बारे में जब सोचने की उन की बारी आई, तब किसी ने नहीं सोचा. लेकिन कुछ भी हो, तू खुद अपने बारे में जरूर सोचना. अपनी खुशियों को भी उतनी ही अहमियत देना जितनी औरों की खुशियों को दी है.’ ऐसे एहसास उसे महसूस कराते कि पापा सिर्फ शरीर से ही उस के साथ नहीं थे. अपने मन, भावनाओं और सोच से पूरी तरह उस के आसपास सुरक्षाकवच बन कर खड़े थे. ऐसा सोच कर उस के मन को बड़ा संबल मिलता और वह अनवरत आगे बढ़ती रहती.

भाइयों की शादी के बाद कुछ समय तक तो ठीक चला लेकिन फिर समस्याएं आने लगीं. कारण वही थे जो हमेशा से चलते आए हैं. एकदूसरे से एडजस्ट न करना. दोनों भाभियां नौकरियां करती थीं. वह सुबह निकल जाती और फिर शाम में आती थी. दोनों को लगने लगा कि घर की जिम्मेदारी जैसे उन पर आन पड़ी है. हालांकि कृष्णा ने पहले ही पार्टटाइम हाउसहैल्प की व्यवस्था कर रखी थी मगर उन की सोच का वह क्या करती? छोटी नित नई चीजों की शौपिंग करती क्योंकि उस का वेतन कुछ ज्यादा था पर वह बड़ी को असहनीय होता. उस की देखादेखी वह भी अपने पति से उन्हीं चीजों की मांग करती. घर अब घर सा न रह कर किसी प्रतियोगिता का अखाड़ा बन गया था. दोनों के बीच लड़ाई तो नहीं होती थी लेकिन कटाक्षों का आदानप्रदान शुरू हो गया था.

हैरानी की बात यह थी कि दोनों भाई आंखें और मुंह दोनों बंद कर एक तरह से अपनीअपनी पत्नियों का मौन समर्थन कर रहे थे. किसी ने भी उन को सम?ाइश देने की जरूरत ही नहीं सम?ा. पूरे घर का वातावरण बेहद बो?िल हो चला था. आखिर कृष्णा से जब रहा न गया तो उस ने दोनों को पास बैठाया, ‘आप दोनों ही समझदार हैं. क्या ऐसा व्यव्हार आप को शोभा देता है? आखिर हम सब एक ही परिवार हैं. किसी की किसी से कोई होड़ नहीं है. जरूरत और मन की इच्छाओं को पूरा करने के लिए पैसे खर्च करना आवश्यक है, मगर पैसों की बचत भी उतनी ही जरूरी है. वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता. यह हम ने खुद देखा है. आप दोनों से निवेदन है कि जो भी करें, उस में अपने विवेक का इस्तेमाल अवश्य करें.’

उसी रात को कृष्णा को एक सीख मिल गई कि इंसान की नीयत भी साफ हो सकती है, उस की बात भी सही हो सकती है मगर यदि सामने वाला व्यक्ति दिल के दरवाजे बंद कर के बैठा हो, तब आप किसी भी तरह उस तक नहीं पहुंच सकते. खासतौर पर तब जब कुछ के मन में ‘भाग्य में लिखा है’ जैसी बातें बचपन से भरी हों. दोनों ही लड़कियां पूजापाठी, दकियानूसी परिवारों से थीं जहां हर चीज को भाग्य और पूजा से तोला जाता था. ये अंधविश्वास उन दोनों की जिंदगियों को घुन की तरह खा रहे थे. रात में कृष्णा जब सोने लगी थी तो देखा उस की पानी की बोतल खाली हो गई थी. पानी भरने के लिए जब वह किचन की ओर बढ़ी, तब छोटी भाभी के कमरे से आती आवाज सुन कर उस के पैर ठिठक गए.

‘अपनी ही कमाई खर्च करती हूं न तो तुम्हारी बहन को क्यों मिर्ची लगती है? बड़ा ज्ञान दे रही थी आज. पहले ही बड़ी भाभी क्या कम थी, जो अब ये भी शुरू हो गईं. दरअसल जलती हैं वो, शादी नहीं हुई है न, उसी का फ्रस्ट्रेशन है उन को.’

उलटे पांव अपने कमरे में लौट आई कृष्णा. बीते कुछ वर्षों ने उसे मजबूत बना दिया था, मगर आज उस का हृदय इस आघात को न सह पाया. पिता की तसवीर को देखते हुए उस की पीड़ा आंखों से बह निकली.

‘कृष्णा, समाज की सोच हमेशा से ओछी ही तो रहती आई है. तू क्यों आंसू बहा रही है? न तू इस गिरी हुई मानसिकता का आज हिस्सा है और न कल ही होगी. अगर कोई तुझे देख कर भी अपना उत्थान नहीं कर सकता तो यह सम?ा उस का समय ही खराब है.’ पिता की नर्म आंखों ने बेटी के संतप्त हृदय को सहलाया.

देवयानी कृष्णा के घरेलू हालात से वाकिफ थी. उन्हीं दिनों उस ने कृष्णा से बोर्डिंग स्कूल के इश्तिहार के बारे में बात की थी. उस का खयाल था कि कृष्णा मां के साथ स्कूल के क्वार्टर में रह कर अपनी नौकरी कर सकती है और इस तरह भाइयों के परिवारों के साथ वैमनस्य की स्थिति भी नहीं आएगी. मगर कृष्णा का मन नहीं मान रहा था. आखिर यह उस का परिवार था. ऐसे कैसे वह सबकुछ छोड़ कर चली जाए. इसी असमंजस में वह कोई निर्णय नहीं ले पा रही थी. उसे लग रहा था कि दोनों आधेअधूरे भाई घर को संभाल नहीं पाएंगे.

फिर एक सुबह अमन जातेजाते उस से कह गया, ‘दीदी, आज शाम मेरे बौस आएंगे. कुछ ढंग का पहन लेना.’ कृष्णा को बात सम?ा नहीं आई. फिर वह भी स्कूल में व्यस्त हो गई और उसे ज्यादा सोचने का मौका ही नहीं मिला. शाम को अमन के बौस की बड़ी आवभगत की गई. अमन ने बड़ी गर्मजोशी से उन्हें कृष्णा से मिलवाया और कृष्णा से उन के साथ बैठ कर बात करने का आग्रह किया. अमन का यह व्यवहार कृष्णा की समझ के परे था, मगर औपचारिकतावश उसे बैठना ही पड़ा. उस ने गौर किया कि बौस सब को छोड़ कर केवल उसी से बात करने में अत्यधिक रुचि ले रहे थे.

अधेड़ उम्र के बौस का बारबार उस की ओर देख कर खीसें निपोर कर हंसना कृष्णा को असहज कर रहा था. एक घंटे बाद जब अमन उन्हें बाहर तक छोड़ने गया, तब उसे जैसे राहत मिली. मगर फिर जैसे ही अमन वापस अंदर आया, तब उस की बात सुन कर कृष्णा जड़ रह गई. ‘दीदी, उन्होंने तुम्हें पसंद कर लिया है. उन की पहली पत्नी का देहांत हो चुका है. हां, उम्र में तुम से थोड़े बड़े हैं, पर वह कोई बड़ी बात नहीं है. बहुत पैसे वाले हैं. दोनों बच्चों को भी होस्टल में रखेंगे.’

ओह, तो यह तरीका निकाला गया था उस से छुटकारा पाने का. न कुछ पूछा गया और न ही कुछ बताया गया. सीधा उसे शादी के लिए सामने ला कर खड़ा कर दिया गया. उसे लगता था कि भाई उस के संघर्षों के गवाह रहे हैं, वे जरूर उसे सम?ोंगे. आज उस का यह भ्रम भी दूर हो गया. दोनों भाइयों ने पौराणिक सोच, कि स्त्री को पिता, भाई, पति या बेटों के अधीन ही रहना चाहिए, को उस के सामने कारपेट की तरह बिछा दिया. इस तरह की सोच तो पिता में भी नहीं थी. उन के रहते वह स्वच्छंद तितली थी. कई लड़के दोस्त थे. घूमतीफिरती, पढ़ती.

‘दीदी, आप को खुश होना चाहिए जो इस उम्र में भी इतना अच्छा रिश्ता मिल रहा है आप को,’ अमन अपनी रौ में बोलता जा रहा था.

उसे बीच में ही रोकते हुए कृष्णा ने कहा, ‘अमन, थैंक यू. आज तुम ने मेरे लिए निर्णय लेना आसान कर दिया. दरअसल, मैं एक बोर्डिंग स्कूल में नौकरी करने की सोच रही हूं. मां मेरे साथ ही रहेगी. जैसे ही नौकरी का बंदोबस्त हो जाएगा, हम यहां से चले जाएंगे.’

अपनी बात कह कर वह सीधे उठ कर अपने कमरे की तरफ चल पड़ी. पीछे मुड़ कर देखने की उसे जरूरत ही नहीं महसूस हुई. एक क्षण को उस के दिमाग में खयाल आया कि अगर बोर्डिंग स्कूल में नौकरी न मिली तो. फिर सोचा कि पहले के हालात तो और कठिन थे. उन्हें भी तो पार कर ही लिया था. अब तो उस के पास काम का अनुभव भी था. उस की डिग्रियां अच्छी थीं. अगर एक बार वह पार्लर हो आती थी तो निखर उठती थी पर आमतौर पर वह पिता की सी छवि में सादगी बनाए रखती थी जिस का भाइयों ने गलत अर्थ समझा. कहीं न कहीं उसे नौकरी मिल ही जानी थी.

बस, पहला कदम ही मुश्किल लगता है. मगर निर्णय ले कर अगर राह पर चलना शुरू करो तो रास्ता अपनेआप सम?ा आने लगता है. कृष्णा ने समय न गंवाते हुए देहरादून के बोर्डिंग स्कूल में आवेदन भर दिया. इंटरव्यू से पहले उस ने खुद पर थोड़ा काम किया. देवयानी के साथ जिम जौइन किया, पार्लर गई. जैसी उसे उम्मीद थी, उस के अनुभव और आकर्षक व्यक्तित्व के चलते उसे अच्छे वेतन और फ्लैट के साथ जौब मिल गई.

फिर भी घर से निकलते वक्त उस का मन जैसे 2 भागों में बंटा हुआ था. एक भाग भाइयों के मोह में डगमगा रहा था तो दूसरा भाग उसे सच्चाई को स्वीकार कर आगे बढ़ने के लिए कह रहा था. भाइयों ने भी उसे रोकने का कोई विशेष आग्रह नहीं किया था. उस ने अपनी सब से कीमती पूंजी पिता की तसवीर को उठाया और मन को दृढ़ कर मां के साथ देहरादून आ गई. शुरू के कुछ दिन कृष्णा का मन बड़ा उदास रहा, मगर फिर जल्दी ही उसे और मां को देहरादून की आबोहवा रास आने लगी. स्कूल बहुत ही अच्छा था. उस के सहकर्मी भी अत्यंत नम्र व उदार थे. स्कूल का फ्लैट भी सुविधाजनक था. सारे टीचर्स के परिवार एक बड़े परिवार की तरह मिलजुल कर रहते. इस से मां का भी मन लगा रहता.

सुबह कृष्णा अपनी क्लासेज लेती और शाम को होस्टल में बच्चों को होमवर्क कराने या अन्य गतिविधियों में मदद करती. उस का पूरा दिन व्यस्तताओं में कब निकल जाता, उसे पता ही नहीं चलता. यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि दोनों मांबेटी जीवन के इस नए दौर से संतुष्ट थीं. देहरादून की साफ हवा के कारण उस का शरीर निखर उठा था. वह घर की मरम्मत के लिए यदाकदा पैसे भेजती रहती थी. उस का अपना बैंक बैलेंस बढ़ रहा था.

एक दिन वह स्टाफरूम में बैठी थी कि चपरासी उसे ढूंढ़ता हुआ आया, ‘आप को प्रिंसिपल मैम ने क्लिनिक में बुलाया है, आप की मां को चोट लगी है.’

जब कृष्णा बदहवास ही वहां पहुंची तो देखा स्कूल की डाक्टर मां को फर्स्टऐड दे रही थीं और प्रिंसिपल पास ही खड़ी थीं. मां यों तो ठीक ही लग रही थीं, बस, थोड़ा घबरा सी गई थीं.

कृष्णा के चेहरे के भाव भांपते हुए प्रिंसिपल बोलीं, ‘अरे कृष्णा, घबराओ मत. मामूली खरोंच ही आई है. कैंपस में वाक कर रही थीं कि अचानक चक्कर खा कर गिर पड़ीं. कैप्टन देव ने देख लिया तो वे यहां ले आए. तुम्हें इसलिए बुलवाया है कि आज चाहो तो टाइम औफ ले कर मां का ध्यान रखो.’

तब जा कर कृष्णा को एहसास हुआ कि एक युवक प्रिंसिपल मैम के साथ खड़ा था.

‘ये हैं कैप्टन देव, एक्स आर्मी औफिसर. हमारे स्कूल की सिक्योरिटी इन्हीं के जिम्मे है. बीचबीच में सीसीटीवीज का मुआयना करने और अपने गार्ड्स से मिलने आते हैं. हमारी रिक्वैस्ट पर शाम को बच्चों की सैल्फडिफैन्स की क्लासेज भी लेते हैं,’ प्रिंसिपल मैम कह रही थीं, ‘और ये हैं कृष्णा, इन्होंने हाल ही में स्कूल जौइन किया है.’

दोनों की जब नजरें मिलीं, तब कैप्टन देव ने बड़ी शालीनता से हलका सा सिर ?ाका कर उस का अभिवादन किया. सांवली रंगत, मजबूत कदकाठी, एकदम छोटे कटे हुए बाल, यकीनन उन की पर्सनैलिटी एक आर्मी अफसर जैसी ही थी.

एक जेंटलमैन की तरह देव मां और उसे क्वार्टर तक छोड़ने आए. उन के शिष्टा व्यवहार ने मांबेटी दोनों को अत्यंत प्रभावित किया.

चूंकि देव का स्कूल में आनाजाना था ही तो कभी न कभी वे कृष्णा से टकरा ही जाते. धीरेधीरे उन के बीच बातचीत और सहजता बढ़ने लगी. कभीकभी वे शाम की सैल्फडिफैंस क्लासेस लेने के बाद क्वार्टर पर आ कर मां से भी मिलते. मां तो जैसे उन के आने भर से ही निहाल हो जातीं. कृष्णा को अपनी जिंदगी में देव की उपस्थिति बहुत सुखद लगने लगी थी. जब भी देव के बारे में सोचती, उस के गाल सुर्ख हो जाते और धड़कनें तेज हो जातीं. इस रिश्ते को क्या बुलाए, यह तो उसे नहीं पता था, मगर देव का सिर्फ होना भर भी उस के लिए बहुत मायने रखता था. वह इन एहसासों को कुछकुछ सम?ा तो रही थी मगर जीवन के पुराने कड़वे अनुभवों के चलते उस ने खुशियों पर यकीन करना बंद कर दिया था. फिर देव ने उस से कुछ कहा भी तो नहीं था.

इसी असमंजस के दौरान देव ने उसे एक दिन कौफी पर आमंत्रित किया. ‘मैं आप को पसंद करता हूं.’ उन्होंने सीधे शब्दों में कहना शुरू किया, ‘पहली मुलाकात से ही. मेरे बारे में आप ज्यादा कुछ नहीं जानतीं, इसलिए पहले अपने बारे में बताता हूं. आर्मी में शौर्ट कमीशंड अफसर रहा हूं. आर्मी से रिटायरमैंट के बाद अपनी सिक्योरिटी एजेंसी खोली जो कई संस्थाओं को सिक्योरिटी सर्विसेज देती है.

‘आप के बारे में प्रिंसिपल मैम से सब जान चुका हूं. जानने के बाद आप के लिए इज्जत और बढ़ गई है. मैं ने अब तक शादी नहीं की. सोचा यह था कि समाज के लिए नहीं, खुद के लिए विवाह करूंगा. जब तक कोई लड़की इतना पसंद नहीं आती कि उस के साथ जीवन बिताने का मन करे, तब तक अविवाहित ही रहूंगा. आप के साथ यह इंतजार खत्म हुआ.

‘मेरे घर में मां, पापा और मेरे प्यारे 2 कुत्ते हैं, जैक और जिल. मां व पापा को आप के बारे में पता है और वे इस बात की उम्मीद कर रहे हैं कि आप हां कह दें और हमारे परिवार का अटूट हिस्सा बन सकें. आप आराम से सोचिएगा. कोई जल्दी नहीं है. यदि आप हां कहती हैं तो मैं बहुत खुशी महसूस करूंगा. मगर यदि किसी कारणवश आप न भी कहती हैं तो हमारे बीच कुछ नहीं बदलेगा. आप के लिए मेरे मन में इज्जत हमेशा रहेगी.’ देव ने यह भी कह दिया कि वह ओबीसी जाति का है और उसे मालूम है कि कृष्णा कायस्थ परिवार से है.

कृष्णा के कानों में पापा की आवाज गूंजी, ‘कृष्णा, अपनी खुशियों के बारे में भी सोचना.’ आज खुशी खुद चल कर उस के पास आई थी. त्वरित ही कृष्णा ने फैसला ले लिया.

‘आप जैसा दोस्त अगर हमसफर बन जाए तो यह मेरे लिए बहुत ही खुशी की बात होगी. अपने नए परिवार से मिलने के लिए मैं भी उत्सुक हूं. हां, लेकिन पहले मां को बताना होगा.’

देव के चेहरे पर आश्चर्यमिश्रित खुशी की मुसकान दौड़ गई. ‘औफकोर्स, उन्हें तो बताना ही होगा. वैसे, आप कंफर्टेबल तो हैं न? कहीं आप को ऐसा तो नहीं लग रहा कि सब बहुत जल्दी हो रहा है?’

‘नहीं, दिल कह रहा है कि यह ठीक है और मैं उसी की सुन रही हूं.’

कैंपस में लौट कर वह क्वार्टर नहीं गई, बल्कि पार्क की बैंच पर बैठ गई. वह कुछ देर अकेली रहना चाहती थी. आज लंबे समय बाद वह खुश थी, सपने संजो रही थी. वह इस एहसास को अपने भीतर समेटना चाहती थी, खुद को यकीन दिलाना चाहती थी कि इस खुशी पर उस का पूरा हक था. तभी उस के फोन पर ईमेल का नोटिफिकेशन आया. देखा तो अमन का था. आखिर, अमन उसे ईमेल क्यों कर रहा था? वह उसे खोल कर पढ़ने लगी.

‘दीदी, कैसी हो? मां कैसी है? तुम सोच रही होगी कि इतने दिनों बाद पूछ रहा है. सच कहूं तो बड़ी हिम्मत कर के आप को मेल कर रहा हूं. आप के जाने के बाद हमें लगा जैसे हमारा भार हट गया हो और हम अपनी जिंदगी जीने के लिए आजाद हो गए. मगर जल्दी ही खुद की असलियत पता चल गई. भार आप नहीं, हम आप पर थे. आप ने तो सब सलीके से संभाल रखा था. हम भाइयों से और हमारी पत्नियों से न घर का बजट संभाला गया और न गृहस्थी. सबकुछ बिखर सा गया है. घर की औरतें आपस में लड़ती हैं और हम भाइयों ने तो एकदूसरे से बात करना ही बंद कर दिया है. चारों को नौकरियों पर तनाव में जाना पड़ता है.

‘दीदी, जो हम ने आप के साथ किया, उस के बाद आप से किस मुंह से बात करें? हो सके तो हमें माफ दो और मां और तुम आ कर वापस अपना घर संभालो. हम सभी अपने किए पर बहुत लज्जित हैं.’

कृष्णा ने एक गहरी सांस छोड़ी. कुछ सोच कर उस ने अमन को फोन मिला दिया. ‘क्यों रे, अब क्या अपनी दीदी से बात करने में भी इतना सोचेगा कि इतना लंबा मैसेज भेजा. मेरे मन में तुम सब के लिए कोई गलत भावना नहीं है और तुम गृहस्थी का बोझ पड़ते ही इतनी जल्दी घबरा गए? इस सिचुएशन को एक मौका समझ और चीजों को खुद संभालना सीखो. रही मेरी बात, तो मु?ो यहां काम करना बहुत पसंद है, लेकिन छुट्टियों में कभी मैं और मां वहां आ जाएंगे, कभी तुम लोग यहां देहरादून आ जाना मेरे पास. बल्कि अभी तो तुम लोग ही आ जाना. तुम्हें किसी से मिलवाना भी है.’

कुछ देर बाद जब कृष्णा ने फोन रखा, तब वह बहुत हलका महसूस कर रही थी. आज उस के दिल का यह बोझ भी उतर गया था. उस ने आसमान की ओर देखा, ‘पापा, यह सब आप ही कर रहे हैं न.’

लगा, जैसे पापा मुसकरा रहे हों. उसे विश्वास हो गया था, पापा के प्यार का साया हमेशा उस के सिर पर था. उस साए के संरक्षण में वह हमेशा महफूज थी. आज देव का साथ पा कर वह और भी महफूज हो गई थी. Hindi Story

 

पोल्ट्री फार्म का अंडा तुम बदनाम बहुत हो जैसे हो फिर भी अच्छे हो

Healthy Diet: अंडा खाने वाले खाते ही हैं, चटकारे ले कर. अंडा करी हो, भुरजी हो, अंडा सलाद हो. सभी को स्वादिष्ठ लगता है. इसे अकेले ही उबाला, तला, भूना जा सकता है. यह किसी बड़े व्यंजन का हिस्सा हो सकता है- औमलेट, सलाद, बेकन, पनीर, हरी मिर्च, काली मिर्च और नमक के साथ.

लेकिन कुछ लोग खातेखाते भी इलजाम लगाएंगे कि असली अंडा तो देसी मुरगी का होता है. पोल्ट्री फार्म का अंडा तो नकली होता है. दवाएं, एंटीबायोटिक, हार्मोंस वगैरह मुरगियों को दे कर उत्पादन किया जाता है. गाड़ी ले कर शहर में देशी अंडा ढूंढ़ते रहेंगे लेकिन पड़ोस की दुकान में सस्ता अंडा मिल रहा है, उसे मशीन से निकाला हुआ समझ कर नहीं लेंगे.

यह समझसमझ का फर्क है. मुझे समझते हुए एक समय निकल गया कि दोनों में कोई फर्क नहीं होता. दोनों बराबर हैं. अंतर है तो सिर्फ उत्पादन क्षमता का. यह आनुवंशिकता का कमाल है जो वैज्ञानिकों ने मुरगियों की उत्पादन क्षमता बढ़ाई है ताकि मुरगीपालन करने वाले किसानों को आर्थिक लाभ मिल सके. इसलिए आप तो अंडे के व्यंजन खाते रहो. आप को बराबर मात्रा में पोषक तत्त्व मिलते रहेंगे. इस से सस्ता प्रोटीन आहार कहां मिलेगा. 60 ग्राम के अंडे में 6 ग्राम प्रोटीन. इस प्रोटीन का जैव मूल्य लगभग 94 प्रतिशत है. इस से अधिक 100 प्रतिशत जैव मूल्य सिर्फ मां के दूध में ही होता है.

प्रतिदिन आप के शरीर के प्रति किलोग्राम वजन के हिसाब से एक ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता होती है और पोल्ट्री फार्म का अंडा लगभग एक रुपए प्रति एक ग्राम प्रोटीन के बराबर कीमत में बाजार में मिलता है. इतनी सरल गणित में आप अपने परिवार के सदस्यों को सस्ता प्रोटीन आहार दे सकते हैं. इस से महिलाओं और बच्चों में कुपोषण दूर हो सकता है.

रंगभेद का शिकार अंडा

समाज में गलतफहमी की वजह से अंडा रंगभेद का भी शिकार होता है. पोल्ट्री फार्म का अंडा सफेद रंग का और देशी मुरगी का अंडा भूरे रंग का होता है. लोग सिर्फ रंग के आधार पर अंडे में ताकतवर और नकली का निर्णय दे देते हैं. जबकि, असलियत यह कि यह रंगभेद सिर्फ अंडे के छिलके का है. अंदर से दोनों में पाए जाने वाले तत्त्व तो बराबर होते हैं. जिम जाने वाले, बौडी बिल्ंिडग वाले अंडे का सिर्फ सफेद हिस्सा खाते हैं और पीला भाग फेंक देते हैं जबकि अंडे के सफेद और पीले, दोनों में ही लगभग

3-3 ग्राम प्रोटीन होता है. अंडे का सफेद भाग मुख्य रूप से प्रोटीन का स्रोत होता है जबकि पीले भाग में प्रोटीन के साथसाथ, विटामिन सी को छोड़ कर सभी विटामिन (जैसे ए, डी, ई, के), खनिज (आयरन, जिंक), वसा, ओमेगा-3 फैटी एसिड, कोलीन और जेक्सैंथिन जैसे पोषक तत्त्व भरपूर मात्रा में होते हैं. असलियत में अंडे का पावर हाउस तो पीला भाग ही होता है. हमेशा पूरा अंडा खाना चाहिए क्योंकि इस से आप को सभी आवश्यक पोषक तत्त्व एकसाथ मिल जाते हैं.

कोलैस्ट्रोल पर विवाद

हृदय रोगी अंडा खाने से परहेज करते हैं क्योंकि इस में पाए जाने वाले कोलैस्ट्रौल पर बहुत विवाद है. असलियत यह है कि अंडे में कुल 186 मिलीग्राम कोलैस्ट्रौल होता है जो अपने शरीर के लिए अच्छा होता है और हृदय की बीमारी का खतरा कम करता है. उल्लेखनीय है कि हमारा शरीर 2000 मिलीग्राम कोलैस्ट्रौल बनाता है और अच्छे व बुरे कोलैस्ट्रौल का अनुपात हृदय को प्रभावित करता है. लोग गरमी के मौसम में अंडा खाने से परहेज करते हैं. उन का मानना है कि अंडा गरम होता है जबकि वैज्ञानिक दृष्टि से अंडे में ठंडा या गरम जैसा कोई तत्त्व नहीं होता. यह सिर्फ गलतफहमी है.

अंडे के बारे में यही वादविवाद होता है कि यह शाकाहारी भोजन है या मांसाहारी. हालांकि ऐसा कभी नहीं हुआ कि औमलेट बनाने के लिए फ्राईपैन में अंडा फोड़ा हो और अंदर से चूजा निकल आया हो. देशी मुरगी का अंडा जरूर मांसाहारी हो सकता है क्योंकि देशी मुरगी में निषेचन होता रहता है और भ्रूण का विकास हो कर अंडे से चूजा निकलता है लेकिन पोल्ट्री फार्म में पाली जा रही मुरगियों में ऐसी कोई संभावना नहीं होती क्योंकि उन में निषेचन नहीं करवाया जाता और न ही अंडे में कोई भ्रूण (या कोई भी जीव) होता है. इस में किसी भी प्रकार की कोई जीवहत्या नहीं होती. सो, यह कैसे मांसाहारी भोजन हो सकता है.

पोल्ट्री फार्म की मुरगियों में आनुवंशिक रूप से अधिक से अधिक अंडा उत्पादन की क्षमता विकसित की गई है. लगभग प्रतिदिन ओव्यूलेशन होता है और अगले 24 घंटे बाद अंडा बन कर बाहर आ जाता है. यह आनुवंशिकी का कमाल है.

फुजूल है विवाद

लोग अंडा उत्पादन की आनुवंशिकी पर ध्यान तो नहीं दे सके लेकिन अफवाह पर जरूर ध्यान देने लग जाते हैं. वर्ष 2008 में महाराष्ट्र में देश का पहला बर्ड फ्लू का प्रकोप हुआ तो लोगों ने तुरंत प्रभाव से अंडा खाना छोड़ दिया. फिर वर्ष 2019 में कोविड की महामारी आई तो शरारती तत्त्वों ने सोशल मीडिया पर अंडे को कोविड प्रकोप का जिम्मेदार घोषित कर दिया. धीरेधीरे यह दुष्प्रचार मांसाहार बनाम शाकाहार में बदल गया. वर्ष 2021 में कौओं में फ्लू के प्रकोप की खबर आई तो फिर अंडे पर कहर टूटा. फिर से अंडा खाना बंद कर दिया.

आदिवासी लोककथाओं में वर्णन है कि किसी गांव में अकाल, महामारी परिस्थितियों में ओ?ा द्वारा किसी विधवा या बूढ़ी महिला को जिम्मेदार ठहराते हुए डायन घोषित कर दिया जाता था. यहां तक कि उस की हत्या तक कर दी जाती थी. जब भी कोई रोग प्रकोप होता है तो कमोबेश यही स्थिति पोल्ट्री फार्म के अंडों की हो जाती है. अंडों के खिलाफ दुष्प्रचार शुरू हो जाता है.

प्रोटीन का बेहतरीन स्रोत

वास्तविकता यह है कि कोविड जैसे वायरल प्रकोप में अपने शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए पोल्ट्री फार्म का अंडा एक औषधि के रूप में सामने आया है. ऐसे समय में प्रोटीन युक्त भोजन लेने की आवश्यकता होती है. वायरस को पहचानने और उसे निष्क्रिय करने के लिए अपना शरीर इम्यूग्लोबिलिन्स यानी कि एंटीबौडीज बनाता है जो प्रोटीन से बनते हैं.

पोल्ट्री फार्म के अंडे में उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन होता है और शरीर के लिए अति आवश्यक सभी 9 एमीनो एसिड होते हैं. रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित करने के लिए आवश्यक जिंक, सेलेनियम, कोबाल्ट, आयरन, कोलीन क्लोराइड जैसे खनिज तत्त्व और विटामिन ए, डी, ई, बी-6, बी-12 आदि भी अंडे में प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. पोल्ट्री फार्म के अंडे के बारे कितनी भी गलतफहमियां हों, इस के खिलाफ दुष्प्रचार किया गया हो, भ्रामक जानकारी दी जा रही हो लेकिन यह कभी नहीं टूटा और अंडा उत्पादन करने वाले किसान भी जिजीविषा से भरे हुए डटे रहते हैं किसी का समर्थन मिले या न मिले. अपने देश में अंडा उत्पादन सालदरसाल 7-8 प्रतिशत की विकास दर से आगे बढ़ रहा है.

पोल्ट्री फार्म के अंडे के बारे में बात करतेकरते मशहूर शायर मोहसिन नकवी का एक शेर याद आ गया-

‘‘मोहसिन तुम बदनाम बहुत हो

जैसे हो फिर भी अच्छे हो.’’ Healthy Diet

लेखक – आलोक खरे

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