Download App

तेरेमेरे बीच में एआई

AI Impact on Society: आजकल की दुनिया में तकनीक ने हमारी जिंदगी को बहुत आसान बना दिया है. पहले जहां छोटीछोटी बातों के लिए हम अपने दोस्तों से बात करते थे, अब वही काम एआई (आर्टिफिशियल इंटैलिजैंस) कर देता है लेकिन क्या आप ने कभी सोचा है कि यह एआई हमारे दोस्तों के बीच थर्ड व्हीलिंग कर रहा है? थर्ड व्हीलिंग का मतलब होता है वह तीसरा व्यक्ति या वह चीज जो 2 लोगों के बीच में आ कर उन की बातचीत या रिश्ते को प्रभावित कर दे. जानें कैसे एआई ने दोस्तों की बातचीत को बदल दिया है और इस से दोस्ती में दूरियां कैसे बढ़ रही हैं.

पहले जब स्मार्टफोन और इंटरनैट इतना आम नहीं था, तब दोस्ती का मतलब था एकदूसरे से मिलना, बात करना और छोटीछोटी मदद लेना. अगर किसी को कोई जानकारी चाहिए होती तो वह अपने दोस्त से पूछता था. उदाहरण के लिए, कोई लड़का अपनी दोस्त से कहता, ‘‘अरे, आज क्या बनाऊं खाने में?’’ तो दोस्त जवाब देती, ‘‘ट्राई कर न पनीर की सब्जी, मैं बताती हूं रैसिपी.’’ इस बातचीत से न सिर्फ जानकारी मिलती बल्कि हंसीमजाक भी होता और रिश्ता मजबूत होता था.

कोई समस्या हो, जैसे ‘‘मुझे यह मूवी देखनी है, कैसी है?’’ तो दोस्त अपना अनुभव शेयर करता. इस से दोस्ती में विश्वास बढ़ता था लेकिन अब एआई ने यह सब बदल दिया है. लोग सोचते हैं, ‘‘क्यों दोस्त को डिस्टर्ब करूं, एआई से ही पूछ लेता हूं.’’ इस से दोस्ती की अहमियत कम हो गई है.

एआई का इस्तेमाल और उस का प्रभाव

एआई के आने से जिंदगी आसान हो गई है. गूगल असिस्टैंट, सिरी, चैटजीपीटी जैसे टूल्स किसी भी सवाल का जवाब सैकंडों में दे देते हैं लेकिन समस्या यह है कि ये टूल्स 2 दोस्तों के बीच में आ कर थर्ड व्हीलिंग करने लगते हैं.

2 दोस्त, राहुल और प्रिया, पहले हर शाम मैसेज पर बात करते थे. राहुल पूछता, ‘‘प्रिया, आज का मौसम कैसा है? बाहर निकलूं?’’ प्रिया जवाब देती, ‘‘बारिश हो रही है, घर पर रह. कल मिलते हैं.’’ लेकिन अब राहुल एआई से पूछता है, ‘‘आज का मौसम क्या है?’’ एआई बताता है, ‘‘बारिश का 70 फीसदी चांस है.’’ बस, बात खत्म. प्रिया को मैसेज नहीं जाता और धीरेधीरे बातचीत कम हो जाती है.

दोस्त सिर्फ दोस्त नहीं होते थे, वे अनऔफिशियल गाइड, इमोशनल सपोर्ट सिस्टम और कई बार फैमिली के बाद सब से भरोसेमंद इंसान होते हैं. कालेज के फौर्म भरने से ले कर नौकरी के इंटरव्यू तक, रिश्तों की उलझन से ले कर पैसों की प्लानिंग तक हर जगह दोस्त अहम भूमिका निभाते हैं. लेकिन अब वही सवाल पहले एआई से पूछे जाते हैं. ‘‘यह कैसे करें?’’, ‘‘क्या सही है?’’, ‘‘क्या गलत है?’’ हर सवाल का जवाब मशीन से मिल जाता है. दोस्त को मैसेज करने की जरूरत ही नहीं पड़ती.

लोग सोचते हैं कि दोस्त का एहसान क्यों लें. मतलब, क्यों किसी को परेशान करें जब एआई फ्री में जवाब दे देता है लेकिन एहसान लेनेदेने से ही रिश्ते मजबूत होते हैं. कई बार किसी से अपनी फीलिंग्स शेयर करने या कुछ पूछने पर ऐसी भावना आती है कि कहीं हमारा दोस्त मजाक न उड़ाए या मुझे डंब न समझे, ऐसे में एआई सहजलगता है. एआई मशीन है, वह भावनाएं नहीं समझती. इस से दोस्ती में इमोशनल टच गायब हो जाता है.

आजकल छोटीछोटी चीजों के लिए लोग एआई का सहारा लेते हैं जैसे रैसिपी, फिल्म सुझाव, ट्रैवल टिप्स और यहां तक कि फैशन एडवाइस तक. पहले ये सब दोस्तों से पूछा जाता था, जो बातचीत का बहाना बनता था. अब एआई ने ये सब अपने हाथ में ले लिया है.

ये छोटी क्वेरीज लगती हैं, लेकिन ये दोस्ती की नींव होती हैं. एआई असली ह्यूमन कनैक्शन को तोड़ देता है. लोग सोचते हैं कि एआई 24×7 उपलब्ध है, कभी थकता नहीं, कभी जज नहीं करता लेकिन दोस्त इंसान हैं, वे भावनाएं समझते हैं. एआई से बात कर के हम अकेले हो जाते हैं.

ऐसी कई स्टडीज सामने आई हैं जिन के मुताबिक युवाओं में सोशल मीडिया और एआई के कारण डिप्रैशन बढ़ रहा है. पहले दोस्तों से बात कर के समस्या सौल्व होती थी, अब एआई से. लेकिन एआई समस्या सुन कर सौल्यूशन देता है, सहानुभूति नहीं.

कैसे बैलेंस रखें

दोस्ती को बचाने के लिए बैलेंस जरूरी है. एआई का इस्तेमाल करें, लेकिन दोस्तों को भूलें नहीं. छोटी क्वेरीज का बहाना बना कर दोस्तों से बात करें. जैसे, एआई से जानकारी लें, फिर दोस्त से शेयर करें, ‘‘यार, एआई ने यह बताया, तू क्या कहता है?’’

एआई से आउटफिट सुझाव लें, फिर दोस्त को फोटो भेज कर पूछें, ‘‘कैसा लग रहा है?’’ इस से बातचीत बढ़ेगी.

इस में कोई दोहराय नहीं कि एआई हमारी जिंदगी में थर्ड व्हीलिंग कर रहा है, लेकिन हम इसे कंट्रोल कर सकते हैं. दोस्ती इंसानी रिश्ता है, उसे मशीन से न बदलें. AI Impact on Society

 

पीरियड्स के समय बौयफ्रैंड दूरदूर रहता है

Relationship Advice: पीरियड्स के समय शरीर ही नहीं, मन भी बहुत संवेदनशील हो जाता है. ऐसे में अगर बौयफ्रैंड भावनात्मक रूप से दूर लगे तो अकेलापन और ज्यादा चुभता है. सब से पहले खुद को यह समझाएं कि इस दौर में आप की भावनाएं ‘ज्यादा’ नहीं, बल्कि स्वाभाविक हैं. चुप रह कर दुख सहने के बजाय अपने बौयफ्रैंड को साफ लेकिन नरमी से बताइए कि इन दिनों आप को बड़े काम नहीं, बस थोड़ी सी बात, एक कौल या स्नेहभरे 2 मैसेज ही सुकून दे देते हैं.

अगर वह सच में आप को चाहता है तो उसे आप की जरूरत समझने में समय लग सकता है पर रास्ता बताया जाना जरूरी है. साथ ही, पूरा सहारा एक ही इंसान से पाने की उम्मीद खुद को और थका सकती है, इसलिए इन दिनों खुद की देखभाल को प्राथमिकता दें- गरम पानी, हलका खाना, आराम, अपनी पसंद का म्यूजिक या कोई भरोसेमंद दोस्त से बात. याद रखिए, भावनात्मक मजबूती का मतलब अकेले सब सहना नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर सही तरीके से सहारा मांगना है और खुद के साथ थोड़ा ज्यादा प्यार करना भी.

मेरे बौयफ्रैंड की बहन मुझसे ठीक से बात नहीं करती और हर बात में मुझे नीचा दिखाने की कोशिश करती है. इस से मुझे बहुत बुरा लगता है लेकिन मैं झगड़ा नहीं चाहती. क्या करूं?

जब आप के बौयफ्रैंड की बहन आप को बारबार नीचा दिखाने की कोशिश करती है तो तकलीफ होना स्वाभाविक ही है क्योंकि सम्मान हर रिश्ते की बुनियाद होता है. ऐसी स्थिति में सब से जरूरी बात यह समझना है कि हर तंज का जवाब देना मजबूती नहीं, बल्कि कई बार चुप रह कर संतुलन बनाए रखना ही समझदारी होती है.

आप अपनी बातव्यवहार में शालीनता और आत्मसम्मान बनाए रखें, ताकि सामने वाला यह समझ सके कि आप कमजोर नहीं हैं, बस, झगड़ा नहीं चाहतीं. साथ ही, अपने बौयफ्रैंड से शांत तरीके से यह बात साझ करना जरूरी है, आरोप लगा कर नहीं, बल्कि अपनी भावना बताते हुए कि उस के घर का माहौल आप को कैसे प्रभावित करता है. अगर वह सम?ादार है तो वह सीमाएं तय करने में आप की मदद करेगा. याद रखिए, आप को किसी को खुश करने के लिए खुद को छोटा करने की जरूरत नहीं है. रिश्ते वहीं टिकते हैं जहां धीरेधीरे सम्मान पैदा होता है. अगर आप संयम, आत्मविश्वास और साफ सीमाओं के साथ आगे बढ़ेंगी तो, या तो सामने वाले का व्यवहार बदलेगा या कम से कम आप की मानसिक शांति सुरक्षित रहेगी. Mental Health Awareness

Relationship Advice

भाजपा गठबंधन सरकार की मनमानी – मणिपुर में कुकी समुदाय के साथ फिर धोखा

Manipur Crisis: फरवरी 2026 में राष्ट्रपति शासन हटने के बाद मणिपुर में फिर से भाजपा की गठबंधन सरकार बहाल हुई जिस में मैतेई समाज से आने वाले युमनाम खेमचंद सिंह मुख्यमंत्री बने और कुकी समाज के नेमचा किपगेन डिप्टी सीएम बनाए गए हैं. कुकी समुदाय ने इसे ‘धोखा’ माना क्योंकि वे मणिपुर को यूनियन टैरिटरी बनाने की मांग कर रहे हैं.

मणिपुर में कुकी समुदाय के लोग भाजपा की सरकार से नाराज हैं. भाजपा के खिलाफ कुकी समाज का यह असंतोष लंबे समय से चला आ रहा है. भाजपा ने मणिपुर में हमेशा मैतेई समाज के हितों के लिए काम किया जिस से कुकी समाज हाशिए पर चला गया. भाजपा शासन में ही मैतेई और कुकी के बीच जातीय हिंसा बढ़ी और इस हिंसा के दौरान सरकार का रवैया पक्षपातपूर्ण बना रहा.

2023 से मणिपुर की घाटियों में बसने वाले मैतेई समाज और पहाड़ों पर रहने वाले कुकी समुदाय के बीच हिंसा जारी है. कुकी समुदाय का आरोप है कि भाजपा सरकार, खासकर मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह, के नेतृत्व में कुकी जनजाति के खिलाफ मैतेई मिलिशिया ग्रुप्स को सपोर्ट मिला जिस से पूरे राज्य में कुकी लोगों के खिलाफ जुल्म बढ़े. सरकार ने हिंसा में कुकी लोगों की रक्षा नहीं की बल्कि मैतेई मिलिशिया का साथ दिया. कुकी संगठनों ने सरकार पर ‘एथनिक क्लीनजिंग’ का आरोप लगाया. सरकार के जरिए कुकी की ट्राइबल भूमि को जब्त करने की कोशिशें हुईं.

हाईकोर्ट ने 2023 में मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति (एसटी) स्टेटस देने का फैसला किया जिस से कुकी समुदाय नाराज हुआ और हिंसा भड़की. कुकी समाज जल, जंगल और जमीन पर अपना अधिकार समझता है लेकिन शहरों में बसने वाले मैतेई समाज को एसटी का दर्जा मिल जाने से कुकी के लिए अपनी भूमि और संसाधनों पर खतरा मंडराने लगा. भाजपा सरकार ने मैतेई को एसटी का दर्जा दिए जाने का समर्थन किया जो कुकी के हितों के खिलाफ है.

म्यांमार से चिनकुकी शरणार्थियों को बीजेपी सरकार ने घुसपैठिया साबित किया और इसी बहाने कुकी की जमीनों को हथिया लिया. केंद्र सरकार मणिपुर मुद्दे पर चुप रही और हालात के बेकाबू होने तक बीरेन सिंह को मुख्यमंत्री पद से नहीं हटाया. इन्हीं सब कारणों से कुकी लोगों में भाजपा से भरोसा पूरी तरह उठ गया और अब मणिपुर में नई सरकार के गठन के बाद कुकी समुदाय एक बार फिर से ठगा हुआ महसूस कर रहा है. Manipur Crisis

अमेरिका-इजराइल और ईरान

Iran US Conflict: ईरान का अमेरिकीइजराइली हमले के जवाब में पश्चिमी एशिया के तेल के पैसों से लबालब भरे इसलामी देशों के आर्थिक केंद्रों पर हमला एक जख्मी शेर की अच्छी नीति साबित हो रही है. ये सारे सुन्नी इसलामी देश अमेरिका के साथ हैं और इजराइल के फिलिस्तीनियों पर किए जा रहे जुल्मों पर अपने व्यावसायिक हितों के कारण चुप ही रहते थे. उन्हें यह भी मालूम है कि उन के पास चाहे पैसा भरपूर हो पर वे इजराइल-अमेरिका जैसी तकनीक खुद पैदा नहीं कर सकते जो उन्हें सुरक्षा दे सके.

ईरान ने अयातुल्लाह अली खामेनेई की हत्या के बाद पश्चिमी एशिया में बने अमेरिकी सैनिक अड्डों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया और तटस्थता से सुरक्षित मानने वाले कतर, यूएई, सऊदी अरब के एयरपोर्टों व उद्योगों, पैट्रोल रिफाइनरियों पर भी हमले शुरू कर दिए. ईरान कभी दूध का धुला नहीं था. वास्तव में तो उस का शासन क्रूर, दंभी, कट्टर इसलामी लोगों के हाथों में ही था जो अपने लोगों पर भी जुल्म करते थे और बाहर के देशों, खासतौर पर इजराइल, को धमकियां देते रहते थे. ईरान से किसी को हमदर्दी नहीं हो सकती लेकिन उस की रणनीति कामयाब साबित हो रही है.

अमेरिका जैसे वियतनाम और अफगानिस्तान में हारा था, कुछ वैसा ही ईरान में हो, तो कोई बड़ी बात नहीं. ईरानी सेना बेवकूफों की भीड़ नहीं है क्योंकि ईरान का इतिहास न केवल पुराना है बल्कि वह गोरों के शासन से भी बचा रहा है. वह बेहद अंधविश्वासी है पर वहां का कल्चर और शिक्षा ठीकठाक है, दूसरे अरब देशों से कहीं बेहतर है. ईरान पर गलत लोगों का राज लंबे समय से रहा है पर फिर भी वहां की जनता ने हार मानना नहीं सीखा है. इस युद्ध में ईरान अपने सस्ते हथियारों से अमेरिका और इजराइल के महंगे हथियारों को नष्ट कर रहा है. छापामार गुरिल्ला युद्ध वियतनाम और अफगानिस्तान में जम कर काम आया था और कोई वजह नहीं कि इस बार काम नहीं आएगा.

असल में यह युद्ध अमेरिका और इजराइल की धौंस को कम करेगा, ऐसी उम्मीद है. आज का युग जनता का है, शासकों का नहीं. डोनाल्ड ट्रंप, बेंजामिन नेतन्याहू या अयातुल्लाह खामेनेई को कोई हक नहीं है कि वे अपने देशों को बेकार के युद्धों में धकेलें, ठीक वैसे ही जैसे नरेंद्र मोदी को कोई हक नहीं है कि देश की शक्ति और कमाई को मंदिरों पर, तीर्थों पर, हिदुओं को विधर्मियों के खिलाफ भड़काने पर, विपक्षी दलों की सरकारों को गिराने पर खर्च करें. जो काम ट्रंप वगैरह दूसरे देशों के साथ कर रहे थे वैसा ही दंभ और शक्ति दिखाने के लिए भारत में नरेंद्र मोदी कर रहे हैं.

यह किस तरह पासा पलट सकता है या मारने वाले या पिटने वाले दोनों को नुकसान कर सकता है, इस का जीताजागता नमूना हैं ट्रंप, नेतन्याहू और ईरानी युद्ध. सत्ता व्यक्तिगत गरूर के लिए नहीं, जनता की सेवा करने के लिए मिलती है.

इजराइल में चरणचुंबन एक तरफ अमेरिका व इजराइल और दूसरी ओर ईरान एकदूसरे पर बम फेंक रहे हैं, मकानों को ध्वस्त कर रहे हैं, सैनिक अड्डों पर हमले के नाम पर स्कूलों, एयरपोर्टों, बस स्टेशनों को तबाह कर रहे हैं. दुनिया की जनता नहीं जानती कि वह किस के साथ हो क्योंकि अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप, इजराइल के बेंजामिन नेतन्याहू और ईरान के अयातुल्लाह खामेनेई तीनों बेहद खूंखार, जिद्दी, धर्मभक्त, लड़ाकू, बड़बोले हैं.

इन तीनों से उन देशों की जनता परेशान है. डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ लगातार पूरे अमेरिका में प्रदर्शन होते रहे हैं. बेंजामिन नेतन्याहू कुछ महीने पहले ही जनरोष के शिकार थे. ईरान की जनता खामेनेई की मोरल पुलिस के अत्याचारों से परेशान और हैरान है. इन में से जो भी जीतेगा वह अपने देश में भी नाम कमा लेगा, यह लगता नहीं है. इन तीनों देशों की जनता एक तरह से अमेरिका-इजराइल और ईरान के मध्य जारी युद्ध में बेबात पिस रही है.

तीनों देशों के संसाधनों को उस युद्ध में धकेला जा रहा है जो सदियों पहले के क्रूसेडों, धर्मयुद्धों की याद दिलाता है जब वैटिकन के पोप ने यूरोप के राजाओं को ईसामसीह की जन्मभूमि कहे जाने वाले यरूशलम को मुसलिम शासकों से मुक्ति दिलाने के लिए आदेश दिया था. उन युद्धों में यूरोप और अरब इलाकों के लाखों लोग मारे गए थे जबकि हासिल कुछ नहीं हुआ. हां, पोपवाद चलता रहा व फलताफूलता रहा. अब भी यही होगा. अमेरिकीइजराइली यानी ईसाईयहूदी युद्ध शिया मुसलिमों के खिलाफ है. इस का जनता से लेनादेना बहुत कम है.

असल में अब सामाजिक व राजनीतिक परेशानियों की जड़ धर्म है. अमेरिका पिछले 150 साल उन्नति कर पाया तो इसलिए कि उस के एक बड़े भाग में धर्म का काला साया फीका पड़ गया था. यूरोप, चीन, जापान, कोरिया, वियतनाम, कंबोडिया धर्म के चंगुल से निकलने पर ही उन्नत हुए थे. इजराइल धर्म के नाम पर बचा देश था पर धर्म से ज्यादा पहले 50 साल उस ने मेहनत पर भरोसा किया था. बाद में उस की रगों में वही धार्मिक खून दौड़ने लगा जो अब अमेरिका में दौड़ रहा है.

ईरान प्राचीन सभ्यता का गढ़ रहा है और इसलाम के साथ वहां उदारवादी भी पनपे जिस से वह ताकत बनता चला गया. फिर वहां भी तानाशाह रजा शाह पहलवी के खिलाफ जनाक्रोश पनपा लेकिन उस से धर्म का शैतान निकल आया. अफसोस यह है कि युद्ध से 3 दिनों पहले हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यहूदी धर्म के गढ़ इजराइल में चरणचुंबन करते नजर आए, बिना किसी खास वजह से.

मोदी नीति में धर्म

भारत से बाहर देशों में बसे ‘ऊंची’ जातियों के हिंदू भी पड़ोस के मुसलिमों से वैसे ही बरताव करते हैं जैसे उन के आज के या पूर्व के संबंधी भारत में करते हैं. भारत की विदेश नीति धर्म के अनुसार चले, इस से ज्यादा अफसोस की बात नहीं हो सकती. आज से 2 दशक पहले अमेरिका मूलतया धर्म के प्रति उदासीन देश था हालांकि चर्चों की दुकानें पैसों और भक्तों से लगभग भरी रहती थीं लेकिन राजनीति में दखल नहीं था. ऐसा ही कुछ भारत में था और भारत बिना धर्म को बीच में लाए अपनी विदेश नीति चुनने को स्वतंत्र था.

अब व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति को चर्चों के पुजारी आशीर्वाद देते नजर आते हैं और भारत की संसद का उद्घाटन पंडेपुजारी करते हैं जिस में अछूतों, शूद्रों को प्रवेश नहीं दिया गया था. इजराइल से गलबहियां और अमेरिका की हर बात को सिर ?ाका कर मान लेने के पीछे यही वजह है कि दोनों देशों की नीति अपनी मिलिट्री का उपयोग कर मुसलिम जनता पर बम बरसाना है. ऐसा नहीं है कि मुसलिम देश दूध के धुले हैं. वे भी हरदम कोशिश करते रहते हैं कि किस तरह कट्टर इसलाम को थोपा जाए चाहे अपनी जनता पर या दूसरों पर. ओसामा बिन लादेन का न्यूयौर्क के वर्ल्ड ट्रेड टावर्स और पेंटागन पर हमला करवाना उसी की एक कड़ी थी.

भारत को अगर चीन, जापान, कोरिया जैसा उन्नत होना है या यूरोप के मुकाबले संपन्न होना है तो अपनी घरेलू और विदेश नीति दोनों को गैरधार्मिक करना होगा. कठिनाई यही है कि कहने को चाहे हमारे 70-80 लाख हिंदूमुसलिम लोग खाड़ी के मुसलिम देशों में मजदूरी कर रहे हों, खरबों डौलर देश को भेज रहे हों लेकिन भारत सरकार का प्रेम फिर भी इजराइल और अमेरिका पर उमड़ रहा है.

युद्ध में विपक्ष के नेताओं को मारने का प्रयास करना सम?ा जा सकता है लेकिन शहरों पर बम बरसा कर पानी, बिजली, अस्पताल, स्कूल नष्ट कर देना अनावश्यक है. धर्म ने हमेशा यही किया, धर्म तो घर की औरतों को भी नहीं छोड़ता. हर धर्म घर चलाने वाली औरत से ले कर घर की प्यारी बेटियों पर कहर ढाने के लिए भक्तों को उकसाता रहता है ताकि वे शरण में उसी के चरणों में जाएं जो आतंक का जिम्मेदार है. धर्मों को शांति नहीं चाहिए न घर में, न शहर में, न देशों में.

अदालतों पर शिकंजा

क्या अदालतों को धर्म का स्थान दिया जाए कि उन्हें खरीखरी कहने वालों का मुंह बंद कर दिया जाए? यह विवाद 8वीं कक्षा की स्कूली पुस्तकों में एक चैप्टर के जोड़ने से शुरू हुआ जिस में न्यायपालिका पर कुछ गंभीर आरोप लगाए गए हैं. जज और वकील ही नहीं, सामाजिक विचारक भी इसे उस सरकार की साजिश मान रहे हैं जो धर्म के अनुसार चल रही है.

एनसीईआरटी की टैक्स्ट बुक्स में यह चैप्टर एक योजना के अंतर्गत ही डाला गया क्योंकि स्कूली टैक्स्ट बुक्स के बारे में भाजपा सरकार बहुत ही संवेदनशील है. 2014 के बाद तो वह अपने पंजे बुरी तरह फैला ही रही है. इस से पहले भी उस ने स्कूली पाठ्यपुस्तकों में से अंधविश्वासों, धार्मिक रीतिरिवाजों, कुरीतियों, विधवा प्रकरण, जातिभेदभाव की बातों पर बातें करना कम करवा दिया था.

कांग्रेस सरकारें पाठ्यपुस्तकों के साथ आमतौर पर ज्यादा छेड़छाड़ नहीं करती थीं और जहां नियुक्त समिति में 4-5 लोग किसी बात पर सहमत हों वहां ज्यादा हेरफेर नहीं करती थीं क्योंकि कांग्रेस को न तो धर्म बेचना था, न समाज को अपने तौरतरीकों से चलाना था. कांग्रेस जातिगत भेदभाव के खिलाफ थी लेकिन यह उस का एजेंडा नहीं था.

धर्म, समाज, जाति, पाखंड, कर्मकांड भारतीय जनता पार्टी के राजनीतिक एजेंडे के हिस्से हैं. इस में आड़े आ रहे संविधान और संविधान को बचा कर रखने वाली न्यायपालिका के लचीले होने पर भी वह उस से बहुत खुश नहीं है. वह संविधान पर लिखी स्याही को इतना फीका कर देना चाहती है कि जज भाजपाई सरकार और पंडों की सुनें, 1950 से लागू संविधान की नहीं. 8वीं के छात्रों की पाठ्यपुस्तक में न्यायपालिका को कठघरे में खड़ा कर के भाजपाई सरकार एक विस्तृत योजना को आकार दे रही है ताकि न्यायपालिका पर कालिख पोती जा सके.

इस में संदेह नहीं है कि न्यायपालिका में भयंकर अंधेर है लेकिन यह असल में देरी के कारण है. स्थगन आदेश देने और जमानत न देने के 2 अधिकार ऐसे हैं जिन में नागरिक को न्यायपालिका के तुरंत न्याय या अन्याय का सामना करना पड़ता है, वरना हर मामला 3-4 स्तर तक जाता है और इस तरह हर विवाद खुली अदालतों में बीसियों जजों के हाथों से गुजरता है कि भ्रष्टाचार की गुंजाइश नहीं रह जाती.

सरकार को कोर्ट के स्थगन आदेशों और जमानत दे देने के अधिकार पर भी आपत्ति है जबकि आमतौर पर निचली अदालतें बहुत कम मामलों में अब जमानतें दे रही हैं जो असल में गलत है. सरकार को इस तरह की न्यायपालिका भी नहीं चाहिए जो सरकारी फाइलें मंगा सके, जो सरकार से कह सके कि बताओ कि नीति क्या है, बताओ कि नीति कितनी सही है और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन तो नहीं हो रहा. भाजपा के नेतृत्व की मौजूदा सरकार चाहती है कि जैसे पंडेपुजारी किसी लड़की को मांगलिक दोषी करार दे दें, कहीं वास्तुदोष बता दें, किसी जगह ग्रहों की चाल टेढ़ी बना दें ठीक वैसे ही जज व्यवहार करें. सरकारी बाबू ने जो कह दिया वही अंतिम सत्य है वरना भ्रष्ट आचरण है, बच्चों को यह पाठ बचपन से ही पढ़ाने की कोशिश की जा रही है. Iran US Conflict

अभी तक मेरी शादी नहीं हुई है. मेरी उम्र 35 वर्ष है

Single Woman Life: यह दबाव हमारे समाज की एक पुरानी आदत का नतीजा है- यह मान लेना कि शादी जीवन की सफलता का तय पैमाना है. जबकि, सच यह है कि हर इंसान की जिंदगी की समयरेखा अलग होती है. आप अपने कैरियर से संतुष्ट हैं, आत्मनिर्भर हैं, यह अपनेआप में एक बड़ी उपलब्धि है. सब से पहले, अपने लिए एक साफ और छोटा जवाब तय कर लें, ताकि हर बार आप को भावनात्मक रूप से खुद को साबित न करना पड़े, जैसे, ‘मैं अपनी जिंदगी से संतुष्ट हूं, जब सही समय होगा तब यह भी हो जाएगा,’ या ‘मैं इस पर सोच रही हूं, धन्यवाद.’ ऐसा जवाब आप को बारबार सफाई देने के दबाव से बचाता है. याद रखें, हर किसी को अपनी निजी जिंदगी का पूरा हिसाब देना आप की जिम्मेदारी नहीं है.

अपने जीवन के फैसलों पर भरोसा रखना सीखें और खुद की खुशियों को प्राथमिकता दें. अपने आसपास ऐसा सपोर्ट सिस्टम बनाइए- दोस्त, परिवार के समझदार लोग- जो आप को वैसे ही स्वीकार करते हों जैसी आप हैं. याद रखें, आप की जिंदगी किसी टाइमटेबल से नहीं चलती, वह आप के फैसलों से बनती है.

दोस्तों से मिलनाजुलना कम हो गया है. दूरी को कैसे पाटूं

मेरी उम्र 34 वर्ष है. नई जिंदगी और जिम्मेदारियों में पुराने दोस्तों से लगभग न के बराबर मिल पाता हूं. शादी के बाद चेन्नई शिफ्ट हो गया हूं. पुराने दोस्तों से अब जब बात करता हूं, तो लगता है कि हमारे बीच पहले जैसी गर्मजोशी नहीं रही. मन में अपराधबोध भी होता है कि शायद मैं ने दोस्ती को समय नहीं दिया. इस दूरी को कैसे कम करूं?

जीवन के नए चरण में रिश्तों की प्रकृति बदलना स्वाभाविक है. दोस्ती का मतलब रोज मिलना नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखना है. आप छोटेछोटे प्रयासों से रिश्तों में फिर से गर्माहट ला सकते हैं- कभी कौल कर लेना, मैसेज से हालचाल पूछ लेना. अगर संभव हो तो कभीकभार मिलने का प्लान बनाइए- छुट्टियों में पुराने शहर जाना या दोस्तों को चेन्नई बुला कर छोटी सी मुलाकात तय करना. भले ही यह साल में एकदो बार हो, लेकिन आमनेसामने मिलने से भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होता है.

अपने दोस्तों को यह बताना भी जरूरी है कि व्यस्तता के बावजूद आप उन्हें महत्त्व देते हैं. जब अपेक्षाएं स्पष्ट होती हैं तो गलतफहमियां कम होती हैं. रिश्ते समय के साथ बदलते हैं, खत्म नहीं होते. उन्हें निभाने का तरीका बदल जाता है. एक और अहम बात, रिश्तों में बदलाव को स्वीकार करना सीखें. पहले जैसी रोज की बातें शायद अब न हों, लेकिन कम बात होने का मतलब यह नहीं कि भावनाएं कम हो गई हैं. अब दोस्ती अधिक परिपक्व हो जाती है-कम शब्दों में भी गहराई बनी रहती है.

सोशल मीडिया की जिंदगी देख कर फोमो फील होता है.

मुझे अपनी जिंदगी फीकी लगने लगी है. मैं, उम्र 25 वर्ष, इंदौर में रहता हूं. सोशल मीडिया पर मेरे दोस्त अपनी शानदार जिंदगी, ट्रैवल और महंगी चीजों की तसवीरें डालते रहते हैं. उन्हें देख कर मुझे अपनी जिंदगी फीकी लगने लगी है. मन में हीन भावना पैदा होती है, जबकि असल जिंदगी में सब की अपनीअपनी परेशानियां होती हैं. फिर भी मैं इस तुलना से बाहर नहीं निकल पा रहा हूं. मैं क्या करूं?

जो आप महसूस कर रहे हैं वह आज के सोशल मीडिया दौर की सब से आम मानसिक उल?ानों में से एक है. लगातार दूसरों की ‘परफैक्ट’ दिखती जिंदगी  देखना हमारे मन में अनजाने ही तुलना पैदा कर देता है, जबकि हमें यह पता भी होता है कि सोशल मीडिया ज्यादातर लोगों की जिंदगी का चुनिंदा और सजासंवरा हुआ हिस्सा ही दिखाता है. दिमाग यह बात सम?ा लेता है, लेकिन दिल पर उस का असर फिर भी पड़ता है. यही वजह है कि हीनभावना पैदा होने लगती है.

सब से पहले, अपने सोशल मीडिया इस्तेमाल को थोड़ा सचेत बनाइए. बिना सोचेसमझे स्क्रौल करना मन पर सब से ज्यादा असर डालता है. आप नोटिस करें कि किन अकाउंट्स को देखने के बाद आप को खुद के बारे में बुरा लगता है. ऐसे अकाउंट्स को कुछ समय के लिए म्यूट या अनफौलो करना बिलकुल ठीक है. यह भागना नहीं, अपनी मानसिक सेहत की सुरक्षा करना है. दिन में सोशल मीडिया के लिए एक तय समय रखें, ताकि यह आप की भावनाओं पर हावी न हो. अपनी जिंदगी की छोटीछोटी उपलब्धियों पर ध्यान दें. अपने लक्ष्यों को व्यक्तिगत बनाइए, तुलनात्मक नहीं.

यह याद रखना जरूरी है कि सोशल मीडिया पर दिखने वाली जिंदगी अकसर पूरी सच्चाई नहीं होती. लोग मुसकान और सफलता पोस्ट करते हैं, परेशानियां नहीं. आप की जिंदगी फीकी नहीं है, वह बस, कैमरे के लिए सजाई हुई नहीं है. खुद की गति, अपनी परिस्थितियां और अपनी खुशियां- यही आप की असली पहचान हैं. जब आप यह स्वीकार कर लेते हैं तो तुलना का शोर धीरेधीरे मन से उतरने लगता है.

आप भी अपनी समस्या भेजें

पता : कंचन, सरिता

ई-8, झंडेवाला एस्टेट, नई दिल्ली-55.

समस्या हमें एसएमएस या व्हाट्सऐप के जरिए मैसेज/औडियो भीकर सकते हैं.

08588843415

मेरा वाला इतवार

Family Story: शनिवार शाम से ही वसुधा का दिल बैठने लगता था. हफ्तेभर तक जितनी भागदौड़ होती थी उस की, उस से ज्यादा तो रविवार को बोझ बढ़ जाता था. सब के हिस्से आराम करने के लिए एक रविवार आता था लेकिन वसुधा के हिस्से तो जैसे रविवार लिखा ही नहीं था. आराम तो दूर की बात है, रविवार को तो उस को दोगुना काम हो जाता था.

अभय को रविवार को छुट्टी रहती तो वह शनिवार की रात पलंग पर पसर कर देररात तक अपनी पसंद की फिल्म देखता. टीवी की लाइट और आवाज में वसुधा सो न पाती. जब तक अभय फिल्म देख कर सोता, तब तक वसुधा की नींद उड़ जाती. कितनी बार अभय से रिक्वैस्ट करती कि जल्दी सो जाया करो लेकिन वह एक ही जवाब देता कि ‘हफ्तेभर तो औफिस में सिर खपाता रहता हूं, एक दिन क्या अपने ही घर में अपनी मरजी से फिल्म भी नहीं देख सकता. इतने मनोरंजन पर तो मेरा भी अधिकार है. हफ्तेभर तो नहीं रहता हूं मैं तुम्हें डिस्टर्ब करने के लिए. दोपहर को सो लेना.’

अब वसुधा क्या कहे. हफ्तेभर वह भी तो सुबह 5 बजे से पहले उठ कर बच्चों के टिफिन बनाती है, यूनिफौर्म प्रैस कर, उन्हें तैयार कर बसस्टौप पर छोड़ने भी वही जाती है. अभय का तो एक ही बहाना है कि ‘दिनभर औफिस में काम करना है तो सुबह थोड़ी देर सो लेने दो, तुम तो दोपहर में भी सो सकती हो.’

अब वह कैसे अभय को सम?ाए कि बच्चों के बाद अभय का चायनाश्ता, दोपहर का लंच, बच्चों की फरमाइश का खाना बनाना, बाई से घर का काम करवा कर बड़ी मुश्किल से बीच में वह नहाने का समय निकाल पाती है. घर के काम से फ्री हुई नहीं कि बच्चे स्कूल से आ जाते हैं. फिर वही, उन्हें खिलानापिलाना, ड्रैस चेंज करवाना, उन का होमवर्क करवाना. बस, सारी दोपहर खत्म और फिर शाम हुई नहीं कि फिर वही शाम का नाश्ता, डिनर के लिए जुट जाने के बाद रात 11 बजे तक ही वह बिस्तर पर लेट पाती है.

उस पर ‘रविवार है’ कह कर क्या तो अभय की और क्या तो बच्चों की ढेर सारी फरमाइशें. उस पर भी सब के ताने. बच्चे कहते, ‘मम्मी, तुम कितनी लकी हो कि तुम्हें पढ़ना नहीं पड़ता. बस, आराम से रहो.’ अभय कहते, ‘तुम्हारे तो मजे हैं भई, औफिस का झंझट नहीं, कोई वर्कलोड नहीं. बस, ऐश है.’

अब सुबह से रात तक कितने ऐश में रहती है वह, यह तो उस का दिल ही जानता है. उस पर किसी के नाश्तेखाने का कोई समय ही नहीं है. जितना समय खाना बनाने में नहीं लगता, उस से ज्यादा समय तो सब को खाना खिलाने में लग जाता है. सब का नाश्ते का, खाने का समय अलग. सारा दिन वह खाना ही परोसती रहती है. दोपहर का खाना खत्म हुआ नहीं कि जिस ने सब से पहले खाया होता है उस को फिर भूख लग आती है.

उस पर पढ़ाई का आजकल पैटर्न ऐसा हो गया है कि हर समय बच्चों के टैस्ट ही चलते रहते हैं. ऋचा के टैस्ट खत्म हुए नहीं कि रोहन के शुरू. काम के बीच बच्चों को पढ़ाना भी पड़ता है और अधिकतर रविवार के दिन पर एक बो?ा यह भी बढ़ जाता है क्योंकि अकसर ही सोमवार को बच्चों का टैस्ट या परीक्षा होती. कितनी भी तैयारी कर के रखो, तब भी वह सारा दिन चकरघिन्नी सी घूमती रहती है सब की फरमाइशें पूरी करते हुए.

और इधर हफ्तेभर से सासुमां और ससुरजी भी आए हुए हैं उस के पास रहने को. अब कल का रविवार जाने कैसे बीतेगा. ससुरजी को सुबह 6 बजे ही चाय हाथ में चाहिए और अभय को 9 बजे जब ससुरजी का नाश्ते का समय होता है. इन के बीच बच्चों को मैनेज करना होगा. ‘उफ्फ, पता नहीं मेरा अपना रविवार कब आएगा.’ वसुधा के दिल से एक आह निकली.

दूसरे दिन वसुधा ने 9 बजे सासससुर को नाश्ता दिया तो उन्होंने कहा, ‘‘बच्चों और अभय के साथ ही नाश्ता करेंगे, बहू. उन्हें भी बुला लो.’’

तब वसुधा बोली कि ‘‘आज तो रविवार है. वे लोग तो आज देर से उठेंगे. आप दोनों नाश्ता कर लीजिए.’’

‘‘ऐसे कैसे देर से उठेंगे. 9 तो बज गए. तुम क्या सारा दिन नाश्ता हाथ में ले कर घूमती रहोगी?’’ ससुरजी ने डपट कर सब को आवाज लगाई तो तीनों अगले 15 मिनट में ही डाइनिंग टेबल पर हाजिर हो गए. 10 बजे तक सब का चायनाश्ता हो गया. वसुधा खाने की तैयारी करने लगी.

बच्चे और अभय हर बार की तरह टीवी के सामने बैठ गए तो सासुमां ने टोक दिया, ‘‘समय पर नहा लो.’’

‘‘मां, आज रविवार है. नहा लूंगा आराम से. औफिस थोड़े ही जाना है,’’ अभय ने पैर फैला कर आलस से कहा.

‘‘औफिस नहीं जाना, मतलब, सारा दिन ऐसे ही बैठे रहोगे क्या. पहले नहा लो. नहाने के बाद टीवी नहीं देख सकते, ऐसा कोई नियम तो नहीं है न?’’ सासुमां ने अभय को डांट दिया.

अभय चुपचाप उठ कर नहाने चला गया. उस के बाद मांजी ने ऋचा और रोहन को भी नहाने भेजा.

डेढ़ बजे वसुधा सासससुर को खाना परोसने लगी तो ससुरजी ने कहा, ‘‘सब साथ बैठ कर ही खाना खाएंगे. इस से परिवार में प्यार भी बढ़ता है और गृहिणी भी समय पर काम से फ्री हो जाती है. बुलाओ सब को.’’

ससुरजी की एक आवाज पर सभी तुरंत डाइनिंग टेबल पर आ बैठे. आपस में बातें करते हंसतेबोलते सब का लंच हो गया.

उस दिन ढाई बजे जब सारा काम निबट गया तो सालों बाद वसुधा अखबार ले कर अपना मनपसंद कौलम पढ़ पाई. बीच में जब भी बच्चे या अभय कोई फरमाइश करने के लिए मुंह खोलते, मांजी उन को डांट देतीं कि ‘खुद उठ कर ले लो, तुम्हारे पैरों में क्या मेहंदी लगी है. हर काम वसुधा ही क्यों करे? और रोहन, तुम अब क्या इतने छोटे हो कि खुद पानी ले कर पी नहीं सकते. करना तो यह चाहिए कि तुम खुद मां को पानी ला कर दो.’

अब तो मांजी की डांट के सामने रोहन तो क्या अभय की भी हिम्मत नहीं थी कि वह वसुधा से पानी मांग ले. बरसों बाद वसुधा दोपहर में घंटाभर तान कर सोई. शाम 5 बजे जब उस ने सब की चाय बनाई तब ससुरजी ने सरप्राइज दिया, ‘‘बच्चों को हम देख लेंगे. तुम्हारे लिए फिल्म के टिकट बुक कर दिए हैं. जाओ, तुम दोनों फिल्म देख आओ.’’

‘‘लेकिन रात का खाना भी तो बनाना है, पिताजी. फिल्म देखने में तो देर हो जाएगी,’’ वसुधा बोली.

‘‘9 बजे खत्म हो जाएगी. आज के दिन सब खिचड़ी खा लेंगे. मैं बना लूंगी,’’ मांजी ने कहा तो वह आननफानन तैयार हो कर मूवी देखने चली गई. बरसों बाद एक खुशनुमा शाम बिताई उस ने. इंटरवल में पौपकौर्न और कोल्डड्रिंक भी पिया. मूवी भी खूब एंजौय की.

लेकिन फिल्म खत्म होने के बाद घर आते हुए फिर रसोईघर दिखने लगा, पता नहीं मांजी ने खिचड़ी बनाई होगी या नहीं. बनाई भी होगी तो सब को परोसना तो पड़ेगा ही न. घर आते ही वह हाथमुंह धो कर किचन में जाने लगी तो मांजी ने कहा, ‘‘वहां कहां जा रही हो. आओ, खाना खा लो.’’

‘‘ओह मांजी, आप को ही बनाना पड़ा. आप बैठिए, मैं परोस देती हूं खिचड़ी,’’ वसुधा बोली.

‘‘लेकिन मैं ने तो खिचड़ी बनाई ही नहीं,’’ मांजी मुसकराते हुए बोलीं.

‘‘तब फिर, क्या बनाया है?’’ वसुधा ने असमंजस से पूछा.

‘‘तुम्हारी मनपसंद मिक्स वेज, शाही पनीर, फ्रूट रायता और तंदूरी रोटी के साथ जीरा राइस और दाल तड़का तैयार है,’’ मांजी ने डाइनिंग टेबल की ओर इशारा किया.

‘‘अरे, इतना सब?’’ वसुधा हैरान थी.

‘‘जोमैटो, स्विगी जिंदाबाद,’’ ससुरजी अपना मोबाइल दिखा कर मुसकराए.

‘‘हफ्तेभर सब का ध्यान रखने वाली को भी तो एक दिन आराम मिलना चाहिए और फिर किसी दिन एक अच्छे सरप्राइज डिनर पर उस का भी तो अधिकार है जो उसे मिलना ही चाहिए,’’ मांजी बोलीं.

‘‘ओह. धन्यवाद मांजी, पिताजी,’’ वसुधा का मन भीग गया. बरसों बाद आखिर उसे उस का रविवार मिल ही गया था.

‘‘अब से हम हर रविवार को मम्मी को भी उस का रविवार दिया करेंगे और अपना काम खुद किया करेंगे,’’ ऋचा व रोहन ने घोषणा की.

‘‘अच्छा बदमाशो, सच में मम्मी को रविवार देना चाहते हो या होटल का खाना खाने के लिए कह रहे हो?’’ अभय ने यह कहा, तो सब हंस पड़े.

 

 

पेरैंटल ओवर प्रोटेक्शन से खुद बचें और बच्चे को बचाएं ओवर टेस्टिंग से

Parenting Tips: पेरैंटिंग के माने और तौरतरीके हर दौर में बदलते रहे हैं लेकिन बच्चों को ले कर इतनी चिंता पहले कभी नहीं थी जितनी आजकल के पेरैंट्स में है जो बच्चों की सेहत को ले कर खतरनाक स्तर तक की चिंता वह भी इतनी कि बेवजह पैथोलौजी तक पहुंच जाए. यह किसी चिंता का हल नहीं है. बल्कि वक्त और पैसों की बरबादी के अलावा बच्चों में डर पैदा करने वाली बात भी है. इस से बचा जाना जरूरी है इसलिए किसी भी जांच के लिए पैथोलौजी तभी जाएं जब पीडियाट्रिशियन कहे.

खुद पर तो प्रयोग करते ही रहते हैं लेकिन सेहत के मामले में इंटरनेटी ज्ञान का कहर पेरैंट्स अपने बच्चे पर भी ढा रहे हैं. इन दिनों गूगल, एआइ और तमाम सोशल मीडिया प्लेटफार्म्स की आधीअधूरी और गलतसलत जानकारियों ने बजाय आसान करने के पेरैंटिंग को और मुश्किल और जटिल बना दिया है. नए दौर के पेरैंट्स का केयरिंग होना हर्ज की बात नहीं, लेकिन उन की हद और जरूरत से ज्यादा सुरक्षात्मक होने की आदत जिसे मनोविज्ञान की भाषा में पेरैंटल ओवर प्रोटेक्शन कहते हैं वह बच्चे के न तो शारीरिक विकास के लिए ठीक है और न ही मानसिक विकास के लिए ठीक है.

हर किसी को ठीक वैसा ही इश्तहारों वाला बच्चा चाहिए जो गोलमटोल होता है, हरदम एक्टिव रहता है, जिस के घुंघराले बाल होते हैं और जो आमतौर पर मुस्कुराता रहता है. वह रोता तभी है जब बेचने वाले को कोई घुट्टी या ग्राइप वाटर नुमा कुछ बेचने बच्चे को हैरान परेशान और बैचेन दिखाना रहता है. इन परेशानियों और तकलीफों से बच्चे को बचाने पेरैंट्स हर वो चीज खरीदते हैं जिसे विज्ञापन जरूरी बता देते हैं.

यह भी बहुत ज्यादा हर्ज की बात नहीं क्योंकि यह सब बच्चे को आमतौर पर नुकसानदेह नहीं होता. लेकिन सेहत के मामले में खुद को बच्चों का डाक्टर समझ और मान लेना जरूर बच्चे को खतरे में डाल सकता है. इस से भी ज्यादा खतरे की बात है बच्चे को खुद से पैथोलौजी ले जा कर तरहतरह की जांचे करवाना जो गैरजरूरी होती हैं. यह आदत जोखिम को कम नहीं करती उलटे बढ़ा सकती है. क्योंकि एक गलत मैडिसन की तरह एक गलत जांच रिपोर्ट भी जानलेवा बन जाती है. अकसर डाक्टर उसी टेस्ट रिपोर्ट की बिना पर दवाइयां लिख देते हैं जिस रिपोर्ट को पेरैंट्स उस के पास ले गए होते हैं.

भोपाल के वरिष्ठ पीडियाट्रिशियन एएस चावला की माने तो आमतौर पर बच्चों को बहुत ज्यादा पैथोलौजी टेस्ट्स की जरूरत नहीं होती. लेकिन पेरैंट्स हर वक्त बच्चे की सेहत को ले कर आशंकित रहते हैं. उन्हें लगता है कि उन के बच्चे की शारीरिक और मानसिक गतिविधियां सामान्य नहीं हैं. इसलिए वे अपने वहम की पुष्टि के लिए बिना डाक्टर के निर्देश के पैथोलौजी जा कर तरहतरह की जांच करा लाते हैं. कई पेरैंट्स तो इतने झक्की होते हैं कि एक पैथोलौजी से रिपोर्ट नार्मल आए तो क्रौस चेक के लिए दूसरी में जा धमकते हैं. इस से कुछ हासिल नहीं होता हां वक्त और पैसे की जरूर बरबादी होती है और बच्चे पर भी गलत असर पड़ता है. जिसे दरअसल में इलाज की जरूरत होती है अनावश्यक जांचों की नहीं.

कहीं मेरा बच्चा बीमार तो नहीं

न्यूक्लियर फैमिली के इस दौर में बिनाशक पेरैंट्स के लिए बच्चे से ज्यादा कीमती और अहम कुछ और नहीं क्योंकि एक या दो बच्चों से ज्यादा की बात कोई सोचता ही नहीं. दूसरे मांबाप बनने की उम्र भी बढ़ रही है. आमतौर पर बच्चा 30 की उम्र के बाद ही पैदा किया जा रहा है शहरी इलाकों में कामकाजी होने के चलते तो यह उम्र और बढ़ती जा रही है. भारत में भी अमेरिका और यूरोप की तरह बच्चा प्लान कर पैदा किया जा रहा है. यानी बच्चा अब पहले की तरह होता नहीं है बल्कि बाकायदा प्लानिंग के तहत पैदा किया जाता है.

पेरैंट्स की यह सजगता अच्छी बात है लेकिन बुरी बात है अपने बच्चे को अकसर बीमार समझना. एक बच्चे की अपनी दुनिया और मूड होता है जिस के तहत कभी वह खुश तो कभी उदास दिखता है कभी कम खाता है तो कभी ज्यादा खाता है. दिक्कत बस यहीं से शुरू होती है कि जरा सा भी बच्चे को सुस्त देखा या जरूरत से ज्यादा रोते देखा तो नए दौर के पेरैंट्स की जान निकलने लगती है. उन्हें लगता है कि बच्चे को कोई तकलीफ है और वह बीमार है. वे तुरंत भागते हैं डाक्टर के पास.

बातबात में डाक्टर के यहां भागने तक में भी हर्ज की बात नहीं, हर्ज की बात है बच्चे को विटामिन, प्रोटीन और कैल्शियम यहां तक कि मिनरल्स भी इंटरनेटी नालेज के तहत नाप कर देना. बुखार अगर 100 डिग्री छूने लगे तो यह मान लेना कि हो न हो इंफैक्शन हो गया है डाक्टर का क्या है वह तो नब्ज देख कर और स्टैथस्कोप से छाती और पीठ टटोल कर पैरासिटामाल टाइप की 2-4 दवाइयां लिख कर कह देता है कि चिंता की कोई बात नहीं. एकाध दो दिन में बच्चा ठीक हो जाएगा बस ये दवाइयां वक्त पर देते रहें.

ये हैं गैरजरूरी जांचें

वक्त पर दवाइयां देने से भी बच्चा एकदम ठीक नहीं होता तो पेरैंट्स को डाक्टर यानी पीडियाट्रिशियन में ही खोट नजर आने लगता है. मसलन इन के यहां तो भीड़ उमड़ी रहती है इसलिए 500-1000 की फीस ले कर टरका देते हैं या फिर इस डाक्टर को ज्यादा एक्सपीरियंस नहीं… लेकिन अगर दूसरे तीसरे ने भी यही किया तो क्या हम खुद ही पैथोलौजी जा कर टेस्ट करा लाते हैं जिस से बीमारी जल्द पकड़ में आ जाए और बच्चा ठीक हो जाए. इस में हर्ज क्या है क्योंकि दूसरी तीसरी बार जाएंगे तो खुद डाक्टर टेस्ट कराने के लिए कहेगा.

आखिर हम भी तो टेस्ट कराते हैं आजकल तो डाक्टर देखता बाद में है पहले दर्जनों टेस्ट प्रिसक्रिब्शन पर लिख देता है. बस यहीं से शुरू होती है बच्चे की असल परेशानी जिसे वह बेचारा बीमारी और तकलीफ की तरह बयां नहीं कर पाता. इंटरनेट की मेहरबानी से हर कोई सामान्य जांचों के बारे में थोड़ा बहुत जानने लगा है जैसे कि सीबीसी यानी कम्प्लीट ब्लड काउंट जिस से बीमारी खासतौर से वायरल इंफैक्शन जल्द पकड़ में आ जाता है. लेकिन सीबीसी की सलाह पीडियाट्रिशियन तभी देते हैं जब बच्चे का बुखार 5 दिन तक ठीक न हो.

बच्चे की कमजोरी और सुस्ती में भी यह जांच कराइ जाती है लेकिन फर्क डाक्टर और पेरैंट्स के देखने और समझने का होता है. पेरैंट्स को 1-2 दिन की बीमारी या बुखार में ही बच्चा सुस्त और कमजोर दिखने लगता है लेकिन डाक्टर सप्ताह भर इंतजार करने के बाद यह सलाह देते हैं. अब दूसरे तीसरे दिन ही बिना डाक्टर के लिखे सीबीसी के लिए बच्चे को ले कर पैथोलौजी पहुंच जाना नादानी की बात है.

इसी तरह के दूसरे टेस्ट जो बहुत आम हो चले हैं ईएसआर और सीआरपी हैं जिन के फुलफार्म भी अधिकतर पेरैंट्स नहीं जानते. लेकिन यह ज्ञान उन्हें सहज प्राप्त है कि एनीमिया और निमोनिया जैसा खतरनाक इंफैक्शन इन्हीं से पकड़ में आता है. सूजन, टीबी और दूसरी गंभीर बीमारियों को पहचानने के लिए भी इन्हीं का सहारा लिया जाता है. लेकिन ये भी सीबीसी की तरह ये भी तब तक गैरजरूरी हैं जब तक पीडियाट्रिशियन न कहे. साधारण सर्दी खांसी और 2-4 दिन तक चलने वाले बुखार में ये जांचे नहीं करवाना चाहिए.

हैरानी की बात तो यह है कि ये टेस्ट किसी भी बीमारी का नाम नहीं बताते सिर्फ बीमारियों की तरफ इशारा करते हैं जिन्हें बच्चे की हालत देख कर डाक्टर ही समझ सकता है. और उसी के आधार पर इलाज व दवाइयां तय करता है. चूंकि पैथोलौजी रिपोर्ट में गड़बड़ी बाले आंकड़े मोटे अक्षरों यानी बोल्ड लैटर्स में लिखे जाते हैं इसलिए यह तो देखने वाले को समझ आता है कि वैल्यू नार्मल नही हैं. लेकिन इन से सिवाय डाक्टर के कोई और यह तय नहीं कर सकता कि बीमारी क्या हो सकती है. कई बार ये वैल्यूज अस्थाई भी होती हैं इसलिए खुद से बीमारी का अंदाजा लगाना और महज इसलिए बच्चे को सुई टुचवाना बेवकूफी है कि हम डाक्टर से पहले बीमारी जान लेना चाहते हैं.

50 हजार के लगभग पीडियास्ट्रीयिशंस की सब से बड़ी संस्था आईएपी यानी इंडियन एकेडमी आफ पीडियाट्रिक्स की गाइडलाइंस में भी साफसाफ कहा गया है कि स्वस्थ बच्चे की गैरजरूरी जांचे नहीं कराइ जानी चाहिए. इन गाइडलाइंस जो मैडिकल शब्दाबली के चलते आम आदमी की समझ से बाहर हैं के निर्देशों के मुताबिक ही डाक्टर टेस्ट की सलाह देते हैं.

मेरा बच्चा भूखा है 

बच्चा ढंग से खा पी नहीं रहा यह चिंता 100 फीसदी पेरैंट्स को रहती है, फिर भले ही बच्चा अपनी जरूरत के मुताबिक डाइट ले रहा हो पेरैंट्स को वह भूखा ही दिखता रहता है. वे चाहते हैं बच्चा हर वक्त कुछ खातापीता रहे तभी स्वस्थ है. इसलिए खासतौर से मम्मियां हर वक्त उस के मुंह में कुछ न कुछ ठूंसती रहती हैं और अकसर बच्चे के उलटी कर देने तक उन्हें तसल्ली नहीं होती. कम डाइट का संबंध सीधे विटामिनों की कमी से जोड़ना हर भारतीय मांबाप की पहचान है इसलिए वे जल्द ही महज शक के चलते विटामिन डी और बी 12 की जांच करवाने के लिए पैथोलौजी जा धमकते हैं.

इन दिनों थायराइड बीमारी की गिरफ्त में हर कोई आ रहा है जिस का ताल्लुक चूंकि वजन के घटने बढ़ने और बच्चों के मामले में उस की ग्रोथ से ज्यादा है इसलिए यह टेस्ट भी महज अपनी तसल्ली के लिए पेरैंट्स करा रहे हैं. जबकि बच्चों में बड़ों के मुकाबले थायराइड की बीमारी बहुत कम होती है. आजकल वजन लेने की मशीनें घरघर में मौजूद हैं जिन में बच्चे को हर 2-3 दिन भाजी तरकारी की तरह तौला जाना भी आम है और जिस दिन बच्चे के वजन में किलो आधा किलो का भी फर्क देखने को मिलता है उस दिन पेरैंट्स कूद कर इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि हो न हो बच्चे को या तो थायराइड हो गया है या फिर डाइबिटीज की गिरफ्त में वह आ गया है.

ये आशंकाएं ऊपरी हवा की तरह होती हैं जिन का कोई वजूद नहीं होता. इस के बाद भी बच्चे को पैथोलौजी की हवा खिलाना उस के साथ ज्यादती ही है. बच्चा छोटा हो या बड़ा एकाध दो दिन तक उस के बारबार पेशाब करने की वजह या ज्यादा पानी पीने की वजह डाइबिटीज ही है यह सोच दरअसल में उस पेरैंटल ओवर प्रोटेक्शन की तरफ इशारा करती है जिस से बचने की सलाह कोई भी डाक्टर या पीडियाट्रिशियन देता है.

पीडियाट्रिशियन की सलाह पर ध्यान दें

आमतौर पर पीडियाट्रिशियन एलर्जी टेस्ट की भी सलाह भी तभी देते हैं जब अपने तजुर्बे और लक्षणों के आधार पर जरूरी समझते हैं. इस समझ से न केवल असहमति बल्कि उसे खामोखामां में चुनौती देने की मानसिकता की देन है एलर्जी टेस्ट और उस में भी फूड एलर्जी टेस्ट कराना. बड़ों की तरह बच्चों का भी अपना टेस्ट होता है जो बदलता रहता है. इसलिए यह चिंता और टेस्ट दोनों फिजूल हैं कि बच्चा चूंकि खास किस्म का आइटम नहीं खा रहा है इसलिए हो न हो उसे फूड एलर्जी ही हो गई है जिस की जांच करा लेना कोई हर्ज की बात नहीं.

यही बात सामान्य एलर्जी पर लागू होती है मसलन लगातार या बारबार छींक आना, स्किन पर रेशेज आना ये बहुत आम लक्षण हैं जो वक्त रहते दूर हो जाते हैं. इसलिए बच्चों एलर्जी टेस्ट दूसरे टेस्टों की तरह ही गैरजरूरी है और यह महंगा भी होता है. दिल्ली के ग्रेटर नोएडा स्थित ए होलिस्टिक चाइल्ड केयर के चाइल्ड स्पेशलिस्ट आशुतोष श्रीवास्तव की माने तो बच्चों के बढ़ते पैथोलौजी टेस्ट चिंता का विषय तो इस लिहाज से है कि ये अकसर डाक्टरों की सलाह के बगैर करवाए जाते हैं. इस से एक बड़ा नुकसान डाक्टर और पेरैंट्स के बीच अविश्वास पैदा होने का भी है.

बकौल आशुतोष पेरैंट्स को बच्चों के डाक्टरों पर भरोसा रखना चाहिए. डाक्टर बहुत जरूरी होने पर ही पेथोलौजिकल टेस्ट्स की सलाह और हिदायत देते हैं. अधिकतर बीमारियां और परेशानियां दवाइयों से ही ठीक हो जाते हैं. डाक्टरों को भी चाहिए कि वे पेथोलौजिक्ल टेस्ट्स की सलाह बहुत जरूरी होने पर ही दें.

बचें किड्स हेल्थ पैकेज से

मुमकिन है आशुतोष का इशारा कम्प्लीट चाइल्ड हेल्थ पैकेज जैसे पनपते ट्रैंड पर हो जो न केवल दिल्ली बल्कि तमाम मेट्रो शहरों के बाद अब बी टियर शहरों में भी देखने में आ रहा है. बड़ी और नामी पैथोलौजी लैब्स इन पैकेज को अलगअलग नामों से बेच रही हैं. इस के लिए प्रचार और इश्तहारबाजी भी आम हो चली है.

ये पैकेज न केवल लुभावने बल्कि डरावने भी होते हैं जो अब औनलाइन भी चल रहे हैं. इन का मजमून ही पेरैंट्स को पैथोलौजी तक आने उकसाने वाला होता है. इस में कहा जाता है कि क्या आप का बच्चा बारबार बीमार पड़ता है, क्या आप उस की हेल्थ व ग्रोथ को ले कर चिंतित हैं, तो अब चिंता छोड़िए और आइए हमारी लैब में जहां बच्चे की सभी जांचें भारी डिस्काउंट पर की जाती हैं. मसलन सीबीसी, थायराइड प्रोफाइल, विटामिन बी 12 और विटामिन डी सहित कैल्शियम और लीवर – किडनी फंक्शन टेस्ट ब्लड सुगर और यूरिन रूटीन.

इन विज्ञापनों के मुताबिक इस पैकेज से फायदे ये हैं कि बच्चे की बीमारियों की जल्दी पहचान हो जाती है, डाक्टर को डायग्नोस करने में सहूलियत रहती है और आप खुद बच्चे की ग्रोथ और डेवलपमेंट की सही निगरानी कर सकते हैं. दर्द रहित सैंपल व घर से सैंपल लेने की सुविधा उपलब्ध है कौल करें…

डर की इस दुकानदारी से पेरैंट्स को लगने लगता है कि क्या हर्ज है अगर दो चार हजार रु में बच्चे की सारी जांचें हो रही हैं. यानी जरूरत होती नहीं जरूरत पैदा की जाती है.

लेकिन हर्ज है

अब यह पेरैंट्स के सोचने और फैसला लेने की बात है कि क्यों अच्छे खासे सामान्य बच्चे के इतने सारे टेस्ट करवाए जाएं और उन के बच्चे की सेहत की चिंता ये पैथोलौजी लेब्स क्यों कर रही हैं. जाहिर है पैसा कमाने के लिए जिस में इस बात की कोई गारंटी नहीं कि टेस्ट रिपोर्ट्स सही ही होंगी वाश बेसिन टेस्ट भी जम कर होते हैं. ऐसे में एक गलत रिपोर्ट पेरैंट्स को तनाव में और डाक्टर को भ्रम में डाल सकती है.

दूसरा तीसरा हर्ज यह है कि इस से बच्चे के मन में स्थाई डर भी बैठता है. 80 – 90 फीसदी बच्चे सुई या इंजेक्शन से बेवजह नहीं डरते. उन्हें बारबार पैथोलौजी ले जाया जाए तो उन पर बुरा असर पड़ता है. उन्हें आगे चल कर नीडल फोबिया भी हो सकता है जिस से बचने वे लंबे समय तक अपनी परेशानी छिपा भी सकते हैं बच्चे बारबार पैथोलौजी ले जाने के चलते खुद को कमजोर भी समझने लगते हैं जिस से उन का आत्मविश्वास कम होता है. गलत रिपोर्ट पर डाक्टर अगर इलाज शुरू कर दे तो इस में खतरे ही खतरे हैं इसलिए बेवजह गैर जरूरी जांचों से बच्चे को बचाएं और बिना डाक्टर की हिदायत के पैथोलौजी न जाएं. Parenting Tips

 

छत्तीसगढ़ में धर्म स्वातंत्र्य कानून : बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति

Chhattisgarh Freedom of Religion Act 2026: सत्ता में रहते हुए असली मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने का सबसे आसान रास्ता धर्म की राजनीति है यह बात छत्तीसगढ़ में बीजेपी सरकार ने साबित कर दिया है. बजट सत्र में पारित छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य विधेयक-2026 पर राज्यपाल रमेन डेका ने मुहर लगा दी है. अब यह कानून लागू हो गया है. इसमें धर्मांतरण पर 7 से 10 साल की कैद, 5 लाख से 25 लाख तक जुर्माना और सामूहिक मामलों में आजीवन कारावास तक का प्रावधान है. बीजेपी इसे अवैध धर्मांतरण रोकने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है लेकिन हकीकत यह है कि यह बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति का नया अध्याय है जिसका मकसद विकास, बेरोजगारी, अशिक्षा, अपराध और महंगाई जैसे असली मुद्दों से जनता का ध्यान हटाना है.

छत्तीसगढ़ में धर्मान्तरण के खिलाफ 1968 का पुराना कानून पहले से मौजूद था. तब यह राज्य मध्य प्रदेश का हिस्सा था. बीजेपी ने 2023 के चुनाव में सत्ता में आने के बाद वादा किया था कि धर्मान्तरण के खिलाफ नया और सख्त कानून लाएंगे. 2026 में जब बीजेपी को सत्ता में आये दो-ढाई साल हो गए अचानक इस बिल को प्राथमिकता दी गई क्योंकि राज्य में किसान कर्ज में डूबे हैं, युवा बेरोजगारी से जूझ रहे हैं, नक्सली हिंसा थमने का नाम नहीं ले रही और महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है. इन तमाम असफलताओं को छुपाने के लिए धर्मांतरण का डर दिखाना बीजेपी की पुरानी ट्रिक है.

नाम से तो यह कानून धर्म के स्वातंत्र्य का आभास देता है लेकिन असल में यह संविधान के आर्टिकल 25 के धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार पर हमला है. इसमें जबरदस्ती, धोखा, प्रलोभन या विवाह के नाम पर किसी भी तरह के रूपांतरण को गैरकानूनी करार दिया गया है लेकिन कौन तय करेगा कि प्रलोभन क्या है? असल में छत्तीसगढ़ की ईसाई मिशनरियों और चर्चों पर निशाना साधने के लिए यह कानून बनाया गया है. ईसाई समाज ने पहले ही इसका विरोध किया है. हजारों लोग रैली निकाल चुके हैं और इसे काला कानून बता रहे हैं लेकिन बीजेपी को माईनॉरिटीज के चिल्लाने से कभी फर्क नहीं पड़ता. बीजेपी का एकमात्र मकसद वोट बैंक के लिए ध्रुविकरण की राजनीती है.

देश के 12 बीजेपी शासित राज्यों में पहले ही ऐसे ही कानून बन चुके हैं. हर जगह यही पैटर्न अपनाया गया. इन कानूनों का मकसद धर्मांतरण क़ानून के नाम पर अल्पसंख्यकों को टारगेट करना ही है. अब छत्तीसगढ़ में जो क़ानून बना है यह तो और भी सख्त है. सामूहिक धर्मांतरण पर 25 लाख जुर्माना और आजीवन जेल लेकिन क्या बीजेपी ने कभी हिंदू धर्म अपनाने को अवैध माना? क्या यह धर्मान्तरण नहीं? अगर कुछ लोग प्रलोभन में आकर हिन्दू धर्म अपनाना चाहें तो क्या उन पर यह क़ानून लगा होगा? क्या उन्हें 7 साल की सजा य दस साल की जेल होगी? क्योंकि बीजेपी के लिए धर्म स्वातंत्र्य सिर्फ एक तरफा है. जो उनके एजेंडे में फिट बैठे. कांग्रेस ने सदन में विरोध किया, इस बिल का बहिष्कार किया लेकिन विपक्ष की आवाज दबा दी गई.

असल सवाल यह है की अगर अवैध धर्मांतरण सच में समस्या थी तो पुराने कानून को क्यों लागू नहीं किया? पिछले सालों में कितने मामले दर्ज हुए? कितने दोषी साबित हुए? डेटा शून्य के करीब है फिर यह नया कानून क्यों? जवाब साफ है. बीजेपी 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले अपने पक्ष में माहौल बनाना चाहती है. असली मुद्दों पर बात न हो, विकास के वादों पर सवाल न उठे इसके लिए धर्म की राजनीति जरूरी है. बीजेपी जानती है कि छत्तीसगढ़ जैसे आदिवासी बहुल राज्य में ऐसे कानून से पोलराइजेशन आसान है. गरीब आदिवासियों को ईसाई मिशनरी का डर दिखाओ और बहुसंख्यक वोट बटोरो.

यह घटिया राजनीति है. पिछड़े इलाकों में शिक्षा-स्वास्थ्य की बजाय धर्मांतरण पर नजर रखने वाले अधिकारी काम पर लगेंगे. चर्च और एनजीओ पर दबाव बढ़ेगा. पर्यटन, निवेश, रोजगार सब पीछे छूट जाएगा. बीजेपी की यह रणनीति न सिर्फ संवैधानिक मूल्यों की हत्या है बल्कि समाज को तोड़ने वाली भी है.

छत्तीसगढ़ के लोगों को समझना होगा की धर्म स्वातंत्र्य का नाम लेकर लाया गया यह कानून असल में असली मुद्दों से ध्यान भटकाने का एक तरीका है. असली स्वातंत्र्य तो तब आएगा जब मंदिर-मस्जिद-चर्च की राजनीति से ऊपर उठकर बेरोजगारी, भुखमरी और हिंसा पर ध्यान दिया जाएगा. अब फैसला जनता को करना है. क्या वे विकास चाहते हैं या सिर्फ धर्म की राजनीति का शिकार बनना चाहते हैं? Chhattisgarh Freedom of Religion Act 2026

इस्लामिक नाटो का सपना टूटा, अलग-थलग पड़े मुनीर

Muslim World Alliance: पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर ने सोचा था कि इस्लामिक ब्रदरहुड के नाम पर सऊदी अरब, तुर्की और कुछ दूसरे मुस्लिम देशों को एक छत के नीचे खींच लाएंगे. नाम रखा था इस्लामिक नाटो. धार्मिक वर्जन ऑफ नाटो जहां अल्लाह की मेहरबानी से सब एक हो जाएंगे और भारत और इरान जैसे दुश्मनों को सबक सिखा देंगे लेकिन मुनीर के हसीन ख्वाबों पर तुर्की ने लात मार दी. तुर्की ने कहा हम सऊदी-पाकिस्तान के साथ कोई डिफेंस पैक्ट नहीं करेंगे.

तुर्की के इस रवैया से मुनीर का धर्म के नाम पर गठबंधन बनाने का भ्रम टूट गया. दरअसल मुसलमान देशों में भी उम्मा यानि भाईचारा सिर्फ भाषणों और जुमलों तक सीमित है. यहाँ सबकी अपनी नेशनल पॉलिसी, इकोनॉमिकल इंटरेस्ट, पेट्रोल-डॉलर, हथियारों का बाजार और जियो-पॉलिटिक्स चलती है. पाकिस्तान के साथ गठबंधन करने से तुर्की की इकोनॉमी और रूस-चाइना बैलेंस बिगड़ सकता है इसलिए बिजनेस पहले और धर्म बाद में. जब बात पावर, पैसे और सर्वाइवल की आती है तो धर्म को बगल में रखना पड़ता है.

मुनीर साहब ने पाकिस्तान को मुस्लिम दुनिया का चैंपियन बताने की कोशिश की. न्यूक्लियर पावर के साथ इस्लाम वाला फॉर्मूला अपनाने का भ्रम पाल लिया लेकिन यह फॉर्मूला फेल हो गया क्योंकि दुनिया धर्म से नहीं, हितों से चलती है. धर्म तो यूनिटी चाहता ही नहीं. पाकिस्तान के अंदर ही शिया-सुन्नी टेंशन “इस्लामिक यूनिटी” के सपने को चीर देता है फिर भी मुनीर जैसे नेता धर्म को हथियार बनाकर पावर कंसोलिडेट करना चाहते हैं. नतीजा यह हुआ की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी क्रेडिबिलिटी जीरो हो गई.

धर्म कभी भी गठबंधन नहीं बना सकता. नाटो काम करता है क्योंकि वो सेकुलर हितों पर टिका है. कॉमन थ्रेट, कॉमन वैल्यूज, डेमोक्रेसी, मार्केट और कॉमन मनी के मामले में धर्म कहीं नहीं है इसलिए नाटो जिन्दा है लेकिन इस्लामिक नाटो में अल्लाहु अकबर के नारे के अलावा कॉमन क्या है? कोई कॉमन इकोनॉमी नहीं और कोई कॉमन स्ट्रैटेजी नहीं सिर्फ इस्लाम का झुनझुना? उसमें भी शिया, सुन्नी अहले सुन्नत, अहले हदीस, बरेलवी, देवबन्दी और अहमदिया जैसे 72 फिरके?  मुनीर का सपना टूटना कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि लॉजिक का नतीजा है. जब आप फैंटसी पर पॉलिसी बनाते हो तो रियलिटी आपको अलग-थलग छोड़ देती है. गठबंधन हितों पर बनते हैं. किताबों या कल्पनाओं के नाम पर तो सिर्फ अलगाव पैदा होता है. Muslim World Alliance

रिश्वत लेने के मामले में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी का प्रबंधक और जाँचकर्ता गिरफ्तार

Insurance Scam: रिश्वतखोरी में नेशनल इंश्योरेंस कंपनी के मैनेजर और इंस्पेक्टर पकड़े गए हैं. वैसे तो यह मानवीय लालच, सिस्टम की कमजोरी और जवाबदेही की कमी का मामला है लेकिन बात सिर्फ इतनी सी नहीं है. रिश्वतखोरी भारतीयों की रग रग में है. इसमें धर्म का अहम रोल है क्युकी भगवान भी दान के नाम रिश्वत लेता है. भारत में रिश्वतखोरी सिर्फ नाजायज तरीके से पैसों के लेन देन का मामला नहीं होता बल्कि यह भारतीयों की तथाकथित महान संस्कृति की विरासत भी है. जहाँ हर मंदिर में बैठा भगवान दान और चढ़ावे से खुश होता हो वहाँ मामूली अफसर को खुश करने के लिए उन्हें चढ़ावे के रूप में थोड़ी रिश्वत देनी पड़ जाये तो इससे आम आदमी को क्या फर्क पड़ता है?

CBI ने 7 अप्रैल 2026 को नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के दो अधिकारियों को रिश्वतखोरी के मामले में गिरफ्तार किया है. नेशनल इंश्योरेंस कंपनी, दिल्ली के मैनेजर हनुमान मीणा और इन्वेस्टिगेटर संतोष कुमार जैन दोनों ने एक निजी अस्पताल की कैशलेस सुविधा को बहाल करने के बदले कुल 2 लाख 60 हजार की रिश्वत मांगी थी. निजी अस्पताल से पहले 1 लाख रुपये ले लिए गए थे. CBI ने ट्रैप लगाया और दोनों को 1.6 लाख रुपये लेते रंगे हाथ पकड़ लिया और दोनों को गिरफ्तार कर लिया. CBI ने दोनों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया है.

रिश्वतखोरी भारतीयों की रग-रग में है क्युकी भगवान भी दान के नाम रिश्वत लेता है. असल में तो कोई भगवान है ही नहीं. दान, चढ़ावा सब इंसान ही इंसान से वसूलता है. मंदिर, मस्जिद, मठ, गुरुद्वारे और चर्च ये सब इंसानी संस्थाएँ हैं. वहाँ जो पैसा जाता है वो पंडित, पुजारी, मुल्ला, महंत या मैनेजमेंट की जेब में जाता है. ईश्वर, अल्लाह के नाम पर तो बस लोगों को धोखा दिया जाता है. यह ठीक वही मनोविज्ञान है जो क्लर्क, इंस्पेक्टर या मैनेजर रिश्वत लेते वक्त इस्तेमाल करता है. एक में भगवान के नाम पर वसूली की जाती है दूसरे में फाइल फॉरवर्ड करने के नाम पर.

भारत में भ्रष्टाचार इसलिए फलता-फूलता है क्योंकि
नियम-कानून का पालन करवाने वाली मशीनरी खुद भ्रष्ट है. चाहे भक्ति का हो या सरकारी दफ्तर का आम आदमी का कोई भी काम बिना रिश्वत के पूरा नहीं होता इसलिए वह रिश्वत देने को जिंदगी का जरुरी हिस्सा मान लेता है.

धर्म ने रिश्वत को “पवित्र” बना रखा है. भारतीय समाज में सदियों से चढ़ावा, दक्षिणा और भेंट को पवित्र माना गया है. जब कोई पंडित कहता है माथा टेककर 1100 रुपये चढ़ा दो, काम बन जाएगा तो आम आदमी 1100 देने में संकोच भी नहीं करता भले ही बच्चे की स्कूल फीस के लिए जेब में रूपये न हों लेकिन भगवान की दान पेटी जरूर भरी जाएंगी. यही मानसिकता क्लर्क के सामने साहब, थोड़ा देख लीजिए कहने के बाद रिश्वत देने में काम करती है. Insurance Scam

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें