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Satirical Story In Hindi : काम कम, मीटिंग ज्यादा

Satirical Story In Hindi : मीटिंग चल रही है, साहब व्यस्त हैं. सुबह से शाम तक और शाम से कभीकभी रात तक, साहब मीटिंग करते रहते हैं. मीटिंग ही इन का जीवन है, इन का खानापानी है और इन का शौक है. ये जोंक की तरह इस से चिपके रहते हैं. मीटिंग का छौंक इन की जिंदगीरूपी खाने को स्वादिष्ठ व लजीज बनाता है. इस छौंक के बिना इन्हें सब फीकाफीका लगता है. यह इन की आन, बान व शान है, इन की जान है. मीटिंग में ये जिंदगी जी रहे हैं तो मीटिंग में इन से डांट खा रहे बैठे लोग खून का घूंट पी रहे हैं.

मीटिंग में इतना बकते हैं, फिर भी ये थकते नहीं हैं. पता नहीं कौन सी चक्की का आटा खाते हैं कि इतनी ऊर्जा रहती है. सुबह 9 बजे से रात 9 बजे तक मीटिंग करतेकरते, उस में बकबकाते भी थकते नहीं हैं. मीटिंग दे रहे लोग, हां दे रहे लोग ही कहना पड़ेगा, क्योंकि ये मीटिंग लेते हैं तो कोई न कोई तो देता होगा, थक जाते हैं. उन्हें उबासी आने लगती है लेकिन साहब को कुछ नहीं होता है. ये बहुसंख्य को डांट और अल्पसंख्य को शाबाशी भी देते रहते हैं. बल्कि जैसेजैसे मीटिंग आगे बढ़ती जाती है, वे और ज्यादा चैतन्य होते जाते हैं. शायद, डांटने को बांटने से उन में ऊर्जा का भंडार बढ़ता जाता है. हां, शायद, इसीलिए पत्नियों में ऊर्जा ज्यादा रहती है, दिनभर पति को किसी न किसी बात में वे डांटती जो रहती हैं.

साहब का नामकरण मीटिंग कुमार कर देना चाहिए. क्योंकि इस के बिना ये जी नहीं सकते. कहा जाता है कि किसी अफसर से यदि दुश्मनी निभानी है तो उसे मीटिंग से वंचित कर दो. जैसे कि मछली की जल के बाहर जान निकल जाती है, लगभग वैसा ही बिना मीटिंग के अफसर हो जाता है. मीटिंग उस की औक्सीजन है. जो जितना बड़ा, वो उतनी ज्यादा मीटिंग लेता है या जो जितनी ज्यादा मीटिंग ले, वो उतना बड़ा अधिकारी होता है. हां, इसीलिए आप ने देखा होगा कि बड़े अफसर का खुद का बड़ा मीटिंगहौल होता है और छोटे का तो फटेहाल सा होता है.

मीटिंग से इन्हें इतना प्यार है, दुलार है कि इस के नएनए ईजाद इन्होंने कर लिए हैं. बस, मीटिंग होनी चाहिए, वो वीडियो कौन्फ्रैंसिंग से हो या फेस टू फेस हो. कभी रिव्यू मीटिंग तो कभी ज्यादा लोगों को बुला कर सम्मेलन कर लेते हैं. कुल मिला कर मीटिंग्स होनी ही हैं. कभी प्रशिक्षण कर लेंगे और धीरे से वहां मीटिंग के फौर्म में भी आ जाएंगे. कभी ये अपने दफ्तर में मीटिंग करते हैं तो कभी फील्ड में जा कर करते हैं.

मीटिंग का उद्देश्य तो है कि योजनाओं, कार्यक्रमों का बेहतर क्रियान्वयन हो कर आम जनता का भला हो, उस का काम त्वरित गति से हो, उसे चक्करबाजी से मुक्ति मिले, लेकिन आम आदमी जब अपने काम से दफ्तर आता है, उसे पता लगता है कि साहब मीटिंग कर रहे हैं, उसे इंतजार करना पड़ता है. इंतजार करतेकरते वह थक जाता है तो उसे लगता है कि यह मीटिंग नहीं, उस के जैसे आम आदमी से चीटिंग है. वह सोचने को मजबूर हो जाता है कि जब उस का काम नहीं हो पा रहा है तो यह मीटिंग किस काम की. जिन की सैटिंग है या जो खातिरदारी कर देते हैं, उन का तो काम हो जाता है लेकिन जिन की नहीं, उन को साहब मीटिंग में हैं कह कर टरकाया जाता है. फिर भी आम आदमी मुए पेट की खातिर इंतजार करता है.

आज के अधिकारी मीटिंग अधिकारी हो गए हैं. काम कम, मीटिंग ज्यादा. आम आदमी बड़ा भौचक है. कई सरकारें आईं और चली गईं. कोई इन मीटिंगों को कम नहीं कर पाया, और न ही उस की समस्याएं सुलझीं. उसे यह दलील दी जाती है कि तुम्हारी समस्याएं चूंकि बढ़ती जा रही हैं, इसलिए मीटिंगों की संख्या भी बढ़ती जा रही है.

आखिर तुम कोई समस्या बताते हो तो एक आदमी या अधिकारी या विभाग तो उस को सुलझा नहीं सकता है, तो इसलिए फिर मीटिंग करनी पड़ती है. तुम्हें यदि हमारा मीटिंग करना पसंद नहीं आता है तो हम कभी मीटिंग नहीं करेंगे. हमें मालूम है कि इस से हमें कितनी तकलीफ होगी और फिर मत कहना कि आप की समस्याएं दूर करने के लिए हम कुछ नहीं कर रहे.

वैसे, यदि कोई पार्टी अगले चुनाव में अपने घोषणापत्र में यह बात रख दे कि वह सत्ता में आई तो मीटिंग पर प्रतिबंध लगवा देगी, तो गंगू दावा करता है कि वह पार्टी चुनाव जीत जाएगी.

मीटिंग में बोरियत से बचने के लिए मीटिंग दे रहे अधिकारी नाना तरह के उपक्रम करते हैं. आजकल सब से अच्छा खिलौना तो मोबाइल है. मीटिंग ले रहा अधिकारी अपनी बात करता रहता है और मीटिंग दे रहे अधिकारी मोबाइल पर एसएमएस करते रहते हैं या गेम्स खेलते रहते हैं. वे सोचते हैं कि अच्छा, बहुत बनता है, मैं इस के साथ गेम खेलता हूं, ये हमारे साथ मीटिंग का गेम खेलता रहता है.

आप ने देखा ही है कि विधानसभा की मीटिंग से उकता कर तो कुछ विधायक रंगबिरंगी क्लिपिंग देखने में फंस गए थे. कुछ अधिकारी पत्रिका या किताब ला कर चुपचाप पढ़ते रहते हैं. कुछ अधिकारी अपनी चित्रकारी की योग्यता का बेजोड़ प्रदर्शन करते रहते हैं. कुछ अधिकारी मौका देख कर बीच में गायब हो जाते हैं और आखिर में फिर चुपचाप वापस भी आ जाते हैं. मीटिंग में कुछ अपनी नींद पूरी कर लेते हैं.

गड़बड़ केवल ऐसे लोगों के साथ होती है जो नींद में थोड़े गहरे जा कर खर्राटे मारने से नहीं चूकते. बस, यही चूक मीटिंग ले रहे अधिकारी के कान खड़े कर देती है. उक्त प्रकार के कलाकार अधिकारियों से दूसरों को सीखने की जरूरत है.

गंगू का तो कहना है कि देश की सब से बड़ी समस्या यदि कोई है तो वह मीटिंग ही है. हर शहर में, कसबे में हर जगह कोई न कोई मीटिंग चल रही है. इसी मीटिंग कल्चर से सम्मेलन व सभाएं निकल कर आई हैं और फिर आप ने देखा है कि ये कितनी खतरनाक हो सकती हैं. चीन के टियानअनमन चौक पर हुआ जमावड़ा या मिस्र में 2 साल पहले काहिरा में हुआ प्रदर्शन या अभी हो रहा प्रदर्शन, ये कइयों की बलि ले कर ही मानता है. न कभी मीटिंग हुआ करती और न लोगों ने यह सीखा होता, तो फिर यह खूनखराबा भी नहीं होता. रामलीला मैदान, दिल्ली में आप देख ही चुके हैं कि कैसे रामदेव को मीटिंग को सभा में बदलने के कारण भागना पड़ा था.

अब यदि इन मीटिंगों की संख्या नहीं रुकी, तो वह दिन दूर नहीं जब लोग कहेंगे कि मीटिंग नहीं, यह हमारे साथ चीटिंग हो रही है. वैसे, गंगू के पास इस का समाधान है, सरकार को अलग से एक मीटिंग डिपार्टमैंट बना देना चाहिए और कुछ मीटिंग अधिकारी इस में नियुक्त कर देने चाहिए जिन का केवल काम ही हो कि मीटिंग करें और करवाएं और हर विभाग अपने यहां से भी एक अधिकारी को मीटिंग अधिकारी नामांकित कर देना चाहिए जिस का केवल और केवल काम होगा मीटिंग में भाग लेना और बाकी लोगों को फ्री कर के उन्हें काम करने देना. जब सत्कार अधिकारी हो सकता है तो मीटिंग अधिकारी क्यों नहीं हो सकता? इस से मीटिंग की महत्ता भी कम नहीं होगी और बाकी अधिकारीगण इस से मुक्त हो कर अपने काम में लग जाएंगे. Satirical Story In Hindi

Satirical Story In Hindi : मेरा नंबर कब आएगा?

Satirical Story In Hindi :

पहला सीन

दक्षिण भारत के एक मशहूर मंदिर के सामने लोगों की लंबी लाइन लगी थी. सभी अपने पाप धोने या पाप करने से पहले ही लाइसैंस मांगने के लिए खड़े थे. मैं भी पिछले 3 घंटे से धूप में डटा हुआ था. लेकिन अगले 4 घंटे तक कामयाबी मिलने की कोई उम्मीद नहीं लग रही थी.

मुझे लग रहा था कि जितनी मेहनत यहां खड़े हो कर मूर्ति देखने के लिए कर रहा हूं, उतनी अगर हिमालय पर जा कर करता, तो अब तक शायद सीधे किसी देवता से मुलाकात हो गई होती.

अचानक ही मेरे एक दोस्त नजर आ गए. उन्होंने मुझे इस बात का अहसास दिलाया कि मैं पहले दर्जे का बेवकूफ हूं.

दोस्त ने मुझे बताया कि आजकल देवता भी उसी को जल्दी दर्शन देते हैं, जो ज्यादा भोग लगाता है.

मैं ने पलट कर देखा, तो सचमुच ही थोड़ी दूरी पर 5 सौ रुपए वालों की बुकिंग चल रही थी और कहां हम फटीचर जैसे लोग मुफ्त में ही देवता को देख लेना चाहते थे.

मंदिर में तैनात पंडे बेहद लगन से पैसे वालों को देवता का दीदार करा रहे थे. शायद देवता को भी उन से ही मिलने

की जल्दी रहती हो. मैं ने भी एक बार जाने की हिम्मत की, लेकिन रुपयों का मोह देवता की भक्ति से ज्यादा बड़ा निकला.

तभी पता चला कि मंदिर के दरवाजे बंद हो गए हैं. अब 4 बजे खुलेंगे. मैं ने गहरी सांस ली. ऊपर देखा और आसमान वाले से पूछा, ‘मेरा नंबर कब आएगा?’

दूसरा सीन

सुबहसुबह बीवी द्वारा काफी धमकाए जाने के बाद आखिरकार मैं अपना झोला उठा कर राशन की दुकान की तरफ बढ़ा. वहां काफी लंबी लाइन देख कर मेरी हिम्मत जवाब देने लगी.

कदम लौटाने की कोशिश करते ही बीवी का खतरनाक चेहरा आंखों के सामने कौंध उठा. मैं मन मार कर लाइन में लग गया.

अचानक कुछ दादा जैसे लोग मूंछों पर ताव देते हुए लाइन के बगल से आगे चले गए. मैं ने पहले तो आवाज दे कर उन्हें रोकना चाहा, पर शायद सुबह नाश्ता नहीं मिल पाने की वजह से आवाज ही नहीं निकली. मैं ने ज्यादा कोशिश भी नहीं की, क्योंकि इस बार मैं ने इंश्योरैंस पौलिसी को रीन्यू नहीं कराया था.

वे लोग सीना ताने हुए बोरियां उठा कर वापस चले गए. कुछ ही मिनटों में यह खबर फैली कि राशन खत्म हो गया. थोड़ी देर तक भीड़ बकतीझकती रही, फिर छंट गई.

मैं भारी कदमों से दुकानदार के पास पहुंचा. वह तसल्ली से करारे नोट गिन रहा था. मैं ने धीरे से उस का कंधा छुआ.

उस ने तीखी निगाहों से मुझे घूर कर देखा.

मैं ने उस से पूछा, ‘‘मेरा नंबर कब आएगा?’’

तीसरा सीन

मैं प्रदेश सचिवालय के वेटिंग रूम में बैठा था. मुझे बताया गया था कि मेरी फाइल जिस बाबू के पास है, वह अभी तक दफ्तर में नहीं आया है. तब मुझे सरकारी मुलाजिम के लिए प्रचलित एक कहावत याद आ गई, ‘12 बजे लेट नहीं और 3 बजे भेंट नहीं’.

इतना ज्यादा इंतजार तो मैं कालेज में अपनी प्रेमिका का भी नहीं किया करता था. खैर, सवा 12 बजे बाबू साहब तशरीफ लाए. बेहद बिजी होने का नाटक करते हुए उन्होंने टेबल के साथ वाली कुरसी पर आसन जमा लिया.

कुछ फाइलों को इधरउधर किया, फिर मुझे दिखा कर बड़बड़ाते हुए जोर से पटका. उड़ती हुई धूल वहां हो रहे काम की गवाह थी. उन्होंने चिल्ला कर चपरासी को बुलाया. उसे डांट कर

अपने खराब मूड की पहचान कराई. फिर मुझ से कहा, ‘‘कहिए, आप का क्या मामला है?’’

मैं ने बेहद तमीज से अपना सारा मामला सुनाया और उन से फाइल आगे बढ़ाने की गुजारिश की.

उन्होंने मुझे समझाया, ‘‘देखिए साहब, यह जो सरकारी शब्द है न, असल में ‘सरक’ शब्द का बिगड़ा हुआ रूप है. अब जो नाम से ही सरकता है, उसे आप दौड़ा कैसे सकते हैं?’’

तभी धमकते कदमों के साथ एक महाशय वहां आए. कुरसी खींच कर बैठे और बाबू पर सीधा हमला किया, ‘‘क्यों बे चपड़गंजू, तेरी इतनी हिम्मत कि नेताजी के साले की फाइल 2 दिन तक दबा कर बैठ गया. तेरी तो… अपना ट्रांसफर अंडमाननिकोबार करवाना चाहता है क्या?’’

बाबू साहब की घिग्घी बंध गई. वे गिड़गिड़ाते हुए बोले, ‘‘साहब, घोड़ा घास से यारी करेगा, तो खाएगा

क्या? और फिर ऊपर भी तो पहुंचाना पड़ता है.’’

फिर सौ रुपए के नोटों की एक गड्डी का लेनदेन हुआ और शायद जश्न मनाने के लिए वे दोनों कैंटीन की तरफ चल दिए.

मैं ने चपरासी को रोक कर पूछा, ‘‘मेरा नंबर कब आएगा?’’

चौथा सीन

मैं अपने परिवार वालों के साथ जैसे ही सिनेमाहाल पहुंचा, तो लोगों की भीड़ देख कर चकरा गया.

टिकट की लाइन चक्कर खा कर घूमती हुई जाने कहां तक चली गई थी. वहीं पर मुझे पहली बार अहसास हुआ कि हिंदुस्तान की आबादी वाकई सवा अरब पार कर चुकी है.

खैर, मैं किसी तरह लाइन का आखिरी सिरा ढूंढ़ने में कामयाब हो गया. समय गुजारने के लिए मैं ने आगे वाले से बात करनी चाही, तो पता चला कि वह अगले शो का टिकट लेने के लिए खड़ा था. उस हिसाब से तो टिकट खिड़की तक पहुंचतेपहुंचते मुझे अगला शो शुरू हो जाने की पूरी उम्मीद थी.

तभी एक मददगार की टक्कर से मैं निहाल हो गया. दरअसल, वह टिकट ब्लैक करने वाला था.

उस ने पूछा, ‘‘3 सौ का 5 सौ में मांगता है क्या?’’

मैं ने उसे दिल से शुक्रिया कहा, क्योंकि उस ने कम से कम मुझे ब्लैक में टिकट खरीदने लायक तो समझा. मैं ने उस से पूछा, ‘‘जनाब, इतनी कड़ी मेहनत कर के आप एक दिन में औसतन कितना कमाते हैं?’’

उस ने आंखें तरेरीं, ‘‘सीबीआई वाला है क्या?’’

मैं ने सहमते हुए कहा, ‘‘नहीं जी, बस यों ही अपनी जानकारी बढ़ाने के लिए पूछा था.’’

वह हंसा और बोला, ‘‘बस 5-6 हजार रुपए रोज कमा लेते हैं.’’

मैं ने कहा, ‘‘इतना… अरे साहब, हम शहर के नामी वकील हैं, फिर भी रोज इतना नहीं कमा पाते हैं.’’

‘‘वही तो, जब मैं वकील था, तो मैं भी इतना नहीं कमा पाता था, पर अब तो बात और है,’’ कह कर ब्लैक में टिकट बेचने वाला चलता बना.

मैं ने पलट कर देखा, तो टिकट खिड़की बंद हो चुकी थी.

मैं ने पूरी ताकत लगाई और चिल्ला कर कहा, ‘‘मेरा नंबर कब आएगा?’’

Satirical Story In Hindi

UGC New Rules 2026 : यूजीसी के नए नियम, क्यों तोड़ गए संयम?

UGC New Rules 2026 :

क्यों पढ़ें? – यूजीसी की गाइड लाइन्स ने जो हंगामा मचाया था वह सुप्रीम कोर्ट के स्टे से भले ही ठंडा पड़ा हो लेकिन इस बहाने समाज का कडवा सच तो एक बार फिर उजागर हुआ कि हम जातिवाद के घोड़े पर सवार होकर विश्वगुरु बनने का दिवास्वप्न देखने की मूर्खता कर रहे हैं और इसी के तहत चाहते हैं कि दलित पिछड़े और आदिवासी अपनी बदहाली को पूर्वजन्म के कर्मों का फल और भाग्य मानते उसे बर्दाश्त करते रहें.

शिक्षा में उत्पीड़न तो द्वापर युग से ही शुरू हो गया था जब द्रोणाचार्य ने एकलव्य का अंगूठा ही गुरुदाक्षिणा में ले लिया था. इस का और कोई दूसरा प्रमाण इसलिए नहीं मिलता कि शूद्रों को पढ़ने की इजाजत ही नहीं थी. गुरुकुलों में ऊंची जाति वाले ही पढ़तेपढ़ाते थे. आजादी के बाद हालात थोड़े बदले तो सवर्णों को दिक्कत होने लगी जो यूजीसी की नई गाइडलाइन आने के बाद फिर दिखी थी.

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यह सब अचानक नहीं हुआ है बल्कि पिछले 10-12 साल से जो तरहतरह की प्रताड़नाएं खासतौर से तकनीकी और उच्च शिक्षण संस्थाओं में आरक्षित कोटे के छात्रों के प्रति बढ़ रहीं थी उन्हें रोकने की एक और कोशिश थी जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने पानी फेर दिया है. यह वही सुप्रीम कोर्ट और वही जस्टिस साहबान हैं जिन की टिप्पणियां जिन्हें कटाक्ष कहना बेहतर होगा, बारबार यूजीसी को कटघरे में खड़ा कर रहीं थीं.

यह सिलसिला जिस पर 13 जनवरी 2026 के बाद बवंडर मचा की शुरुआत दरअसल में 20 सितंबर 2019 से हुई थी जब सुप्रीम कोर्ट ने रोहित वेमुला और पायल तडवी की मांओं द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी किए थे. याचिका में शैक्षणिक संस्थानों में जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया गया था.

इन दोनों ने मांग की थी कि अन्य संस्थानों में जातिगत भेदभाव खत्म करने मजबूत और कारगर मैकेनिज्म बनाया जाए. इसी याचिका की एक और अहम सुनवाई 3 जनवरी 2025 को हुई थी. इस दिन सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी से उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव का डेटा मांगा था.

अपनी याचिका में इन दोनों ने यह मांग भी की थी कि कोर्ट यूजीसी को इस बाबत हिदायत दें कि उच्च शिक्षण संस्थानों में 2012 की गाइडलाइन को सख्ती से लागू किया जाए इस पर बेंच ने यूजीसी को यह हिदायत भी दी थी कि वह इक्वल अपार्चयुनिटी सेल यानी समान अवसर प्रकोष्ठों की स्थापना के संबंध में विश्वविद्यालयों से आंकड़ें इकट्ठा कर पेश करें और 2012 के नियमों के तहत प्राप्त शिकायतों की कुल संख्या के साथसाथ की गई कार्रवाई भी की रिपोर्ट भी पेश करें.

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यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ युवाओं का विरोध-प्रदर्शन.

इस के बाद कोर्ट ने 28 फरवरी 2025 को एक अहम टिप्पणी यह की थी कि यूजीसी के पास दोषियों को सजा देने के अधिक अधिकार देने चाहिए. रोहित और पायल की मां को आश्वस्त करते कोर्ट ने कहा था कि हम इस मुद्दे से निबटने के लिए एक मजबूत तंत्र बनाएंगे और मामले को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाएंगे. इस दिन इन दोनों की अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कोर्ट को बताया था कि आप के आदेश के बाद भी विश्वविद्यालयों और कालेजों ने अपने परिसरों में होने वाली आत्महत्याओं को डेटा अभी तक पेश नहीं किया है.

16 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को हिदायत दी थी कि वह जाति आधारित उत्पीड़न रैगिंग यौन शोषण और लिंग, विकलांगता या दूसरी पहचानों पर आधारित भेदभाव को रोकने के लिए अपने मसौदे नियमों को अंतिम रूप देते वक्त रोहित वेमुला की मां राधा वेमुला और पायल तडवी की मां अबेदा सलीम तडवी द्वारा 2019 में दायर अपनी रिट में पेश सुझावों को शामिल करें.

इन दोनों द्वारा पेश प्रमुख सुझावों में एक सुझाव यह भी शामिल था कि यदि जाति समुदाय प्रवेश परीक्षा की रैंक या शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर छात्रावासों, कक्षाओं, प्रायोगिक बेंचों या प्रयोगशालाओं का आवंटन भेदभाव का कारण बनता है तो ऐसा नहीं किया जाए. 13 जनवरी 2026 के बाद गाइडलाइन पर जो बवाल सवर्णों ने काटा उस की अहम और इकलौती वजह यह थी कि यूजीसी की गाइडलाइन श्रेष्ठी लोगों के नहीं बल्कि दो दलित महिलाओं के सुझाव पर बनी थीं. जिन्होंने यह सुझाव भी दिया था कि गठित की जाने वाली कमेटियों में कम से कम 50 फीसदी सदस्य आरक्षित कोटे के हों और समिति का अध्यक्ष भी इन्हीं में से कोई एक हो.

सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बैंच को यूजीसी ने बताया था कि 2004 से 2024 के बीच अकेले आईआईटी में 115 आत्महत्याए हुईं हैं तो सुप्रीम कोर्ट का लहजा यह कहते तल्ख हो उठा था कि ऐसे मामलों पर अदालत वक्त पर सुनवाई करेगी. लेकिन यूजीसी को 2012 के नियमों को हकीकत में बदलने के लिए एक सिस्टम खोजना या बनाना होगा. 29 जनवरी के स्थगन आदेश की टिप्पणियां देख लगता है कि सब से बड़ी अदालत ने पलटी खाने के मामले में नेताओं को भी पछाड़ दिया है.

इस के बाद 17 सितंबर 2025 को बहुत सख्त लहजे में सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को यह भी निर्देश दिया था कि वह उच्च शिक्षण संस्थानों में उत्पीड़न और जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए तैयार किए जा रहे नए नियमों में जातिगत भेदभाव को रोकने के लिए`प्रभावी सुरक्षा उपायों` पर विचार करें.

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यूजीसी के नए नियमों के खिलाफ सड़कों पर उतरे दक्षिणपंथी राजनीतिक विचारधारा वाले संगठन.

लागू किये तो मचा बवंडर

जब यूजीसी ने`प्रभावी सुरक्षा उपाय` गाइडलाइंस की शक्ल में उच्च शिक्षा संस्थानों में समानता के प्रचार के विनिमय 2026 के मसौदे में 13 जनवरी 2026 को जारी कर दिए तो न जाने क्यों विनीत जिंदल, मृत्युंजय त्रिवेदी और राहुल देव सरीखे सवर्णों द्वारा दायर याचिकाओं की सुनवाई करते सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जायमाल्य बागची की बेंच ने उन्हें नकारते हुए 29 जनवरी के स्टे आर्डर में कहा –

– जाति आधारित भेदभाव क्या होता है इस संबंध में यूजीसी के 2026 के नियमों को स्थगित रखा जाएगा. 2012 के नियम लागू रहेंगे. ये प्रावधान प्रथम दृष्टया अस्पष्ट हैं और इन का दुरूपयोग किया जा सकता है.

– यदि इस मामले में हस्तक्षेप नहीं किया गया तो इस से खतरनाक प्रभाव पड़ेगा और समाज विभाजित हो जाएगा.

– जातिविहीन समाज की स्थापना के संदर्भ में हम ने जो कुछ भी हासिल किया है क्या अब हम पीछे जा रहे हैं.

-भारत को उस स्थिति में नहीं जाना चाहिए जहां अमेरिका की तरह अश्वेत और श्वेत बच्चों के लिए अलग स्कूल हुआ करते थे. भगवान के लिए.. आज हमारे समाज में अंतरजातीय शादियां हो रही हैं हम खुद हौस्टल में रहे हैं जहां सब साथ रहते थे. आधुनिक संस्थानों में विभाजन की कोई जगह नहीं होना चाहिए.

– दक्षिण भारत या पूर्वोत्तर से आने वाले छात्रों की संस्कृति का उपहास उड़ाना सब से खतरनाक है जो लोग दूसरों की संस्कृति से परिचित नहीं हैं वे अकसर इसे निशाना बनाते हैं.

2012 और 2026 के नियमों में बड़ा फर्क मचे बवंडर में साफसाफ नजर नहीं आया लेकिन कुछ तो था जो इतना धुंआ उठा. इसे समझने बस एक ही नियम समझ लेना काफी है जिस से समझ यह भी आएगा कि भाषा तो दरअसल में तब अस्पष्ट थी 2026 में तो सब कुछ स्पष्ट भाषा में लिखा गया था –

– शिक्षण संस्थानों में समानता प्रकोष्ठ बनाए जाएं जिन का काम शेड्यूल कास्ट और शेड्यूल ट्राइब कास्ट के छात्रों की शिकायत सुन कर कार्रवाई करते उन्हें हल करना होगा.

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सवर्ण युवा यूजीसी गाइडलाइन पर यों ही नहीं बिफरे. असल में उन के दिलोदिमाग में भी धर्म ने जाति का जहर घोल दिया है.

2012 के निर्देशों में खामी

2012 के निर्देशों की भाषा में बड़ी खामी यह थी कि इस में कोई बाध्यता नहीं थी. मसलन यह कि यदि शिक्षण संस्थान समानता प्रकोष्ठ न बनाएं तो यूजीसी उन का क्या बिगाड़ लेगा. दूसरे इस में कार्रवाई की कोई समय सीमा नहीं थी. अलावा इस के यह भी साफ नहीं था कि कितने और किस तरह के अधिकारी शिकायतों की सुनवाई और जांच करेंगे. 14 साल हुआ यह कि एक ही अधिकारी जिसे भेदभाव विरोधी अधिकारी कहा गया शिकायतें सुन और निबटा रहा था. निबटाने का यह मतलब नहीं कि वह कोई सख्त सजा दे रहा था बल्कि संबंधित संस्था प्रमुख से कार्रवाई की सिफारिश कर रहा था.

यानी ये नियम बेहद औपचारिक और टरकाऊ थे. हालांकि इन में भी यह स्पष्ट नहीं था कि झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों की परिभाषा क्या होगी. इस में ओबीसी तबके का जिक्र भी नहीं था जिसे अब पीड़ित वर्ग में शामिल कर लिया गया था.

जब बदलाव हुए तो…

यूजीसी ने ये तमाम खामियां दूर करते एक अधिकारी की जगह पूरी कमेटी बनाने का फरमान सुना डाला जिस के 10 सदस्यों में महिला और विकलांग सहित आरक्षित तीनो वर्गों के प्रतिनिधि का होना अनिवार्य था. यानि 5 से ले कर 7 तक सामान्य जाति के हो सकते थे. एक नया प्रावधान यह जोड़ा गया जो फसाद की बड़ी वजह बना था कि अब पीड़ित वर्गों में ओबीसी के छात्रों को भी शामिल कर लिया गया था.

समय सीमा की खामी दूर करने नई गाइडलाइन में निर्देश दिया कि समितियों को 24 घंटे चलने वाली इक्विटी हेल्पलाइन संचालित करना होगी. 24 घंटे के अंदर बैठक करनी होगी और 15 दिन में अपनी रिपोर्ट पेश करना होगी. अगर ऐसा नहीं होता है तो यूजीसी को यह अधिकार होगा कि वह संबंधित संस्थान की मान्यता रद्द कर दे, उस की ग्रांट रोक दे और डिग्री देने का हक भी छीन ले.

बाकी सब जस का तस था लेकिन इस बदलाव के माने कुछ इस तरह निकाल कर रोए गाए मानों सवर्ण या अनारक्षित छात्रों को देश निकाला दे दिया गया हो. हवा यह उड़ाई गई कि समितियों में केवल एससी, एसटी और ओबीसी वर्गों के अधिकारी ही रहेंगे जबकि ऐसा नहीं था. कहा यह गया था कि संस्थान प्रमुख समिति का अध्यक्ष होगा. यानी उस के आरक्षित अनारक्षित होने से कोई फर्क नहीं पड़ना था.

नोटिफिकेशन में इतना भर कहा गया था कि अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अन्य पिछड़ा वर्ग, महिलाओं और विकलांग व्यक्तियों का प्रतिनिधत्व सुनिशिचित हो. जिस का मतलब होनहार सवर्णों ने यह प्रचारित किया कि इस में तो सवर्णों के प्रतिनिधि न होना सुनिश्चित किया जा रहा है. यानी अब कैटेगिरी` वाले जैसा चाहे हमें नचाएंगे. इस बाबत बेहद काल्पनिक और खतरनाक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किए गए थे जिन से गलतफहमी फैली.

अब अगली सुनवाई 19 मार्च को होगी तब तक 2012 वाले नियम ही लागू रहेंगे लेकिन यह जानना और समझना भी जरूरी और अहम है कि आखिर यह सब करने और होने की नौबत आई ही क्यों?

वजह बने रोहित और पायल

यह सुनवाई जैसा कि ऊपर बताया गया है, एक तरह से श्रृंखलाबद्ध थी. जो रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला और पायल तडवी की मां अबेदा सलेम तडवी की तरफ से साल 2019 में दायर की गई जनहित याचिका के संबंध में हो रही थी. गौरतलब है कि इन दोनों ने ही जातिगत प्रताड़ना से तंग आ कर आत्महत्या की थी. जिस की वजह शैक्षणिक संस्थानों में पसरा जातिगत भेदभाव था जिसे ये होनहार दलित युवा तय है गैरत के चलते बर्दाश्त नहीं कर पाए थे.

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यूजीसी की नई गाइडलाइन में रोहित वेमुला की आत्महत्या का अहम रोल रहा. इस नई गाइडलाइन में दलित छात्रों को राहत देने की कोशिश की गई है.

पीएचडी कर रहे रोहित वेमुला ने 17 जनवरी 2016 को हैदराबाद यूनिवर्सिटी के होस्टल के अपने कमरे में आत्महत्या की थी. तब इस पर खूब बवंडर मचा था और देश भर में तगड़ा विरोध हुआ था क्योंकि वह अनुसूचित जाति के थे और आंबेडकर स्टूडैंट्स एसोशिएशन नाम के संगठन के सदस्य थे वह उन पांच छात्रों में शामिल थे जिन्हें होस्टल से बाहर निकाल दिया गया था. इन छात्रों पर आरोप था कि इन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के छात्र पर हमला किया था. हैदराबाद यूनिवर्सिटी ने अपनी शुरुआती जांच के बाद इन पांचों को क्लीनचिट दे दी थी लेकिन बाद में द्रोणाचार्य और एकलव्य वाला खेल खेलते फैसले को पलट दिया था जिस से दुखी, व्यथित और आहत रोहित ने गुरुदाक्षिणा में अपनी जान ही दे दी थी.

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पायल तड़वी को सहकर्मी डाक्टरों ने उस की
जाति को ले कर इतना प्रताड़ित किया था कि आजिज आ कर उस ने आत्महत्या कर ली थी.

26 वर्षीय स्मार्ट डाक्टर पायल तडवी टोपीवाला नेशनल मेडिकल कालेज मुंबई की छात्रा थी जो बीवाईएल नायर चैरिटिबल अस्पताल में गायनिक विषय की रेजीडैंट डाक्टर थी. पायल मूलतय मुस्लिम तडवी भील समुदाय से थी जिस ने सांगली जिले के मिराज मेडिकल काल्र्ज से डिग्री ली थी और फिर आगे पढ़ाई के लिए मुंबई चली गई थी. पायल ने 22 मई 2019 को होस्टल के अपने कमरे में आत्महत्या कर ली थी.

पायल ने आत्महत्या करने के पहले अपने सुसाइड नोट में लिखा था कि अनुसूचित समुदाय से ताल्लुक रखने के चलते सीनियर डाक्टर्स द्वारा उन्हें प्रताड़ित किया जा रहा था. इन आरोपियों के नाम हैं हेमा आहूजा, अंकिता खंडेलवाल और भक्ति मेहरे. होस्टल में रहने वाली एक आदिवासी डाक्टर लड़की किस कदर मानसिक परेशानियों से गुजर रही थी इस का अंदाजा लगाना जरूरी है कि आप खुद को उस की जगह रख कर देखें. इस के बाद भी उस मानसिकसामाजिक तनाव का दसवा हिस्सा भी महसूस नहीं कर पाएंगे.

पायल ने आत्महत्या की थी या उस की हत्या की गई थी यह तय कर पाना भी उस की मानसिक पीड़ा समझ पाने सरीखा मुश्किल है क्योंकि पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से यह खुलासा हुआ था कि उस के गले पर चोट के निशान थे. दूसरे उस का सुसाइड नोट मोबाइल फोन से स्क्रीनशौट या फोटो के रूप में बरामद हुआ था जिस के चलते यह शक गहराया था कि आरोपियों को उस की आत्महत्या की जानकारी थी और उन्होंने ही हस्तलिखित सुसाइड नोट उड़ा दिया गया होगा लेकिन यह अंदाजा उन्हें नहीं था कि पायल उन की इस तरह की चालाकियों से भी वाकिफ थी इसलिए उस ने अपने लिखे का फोटो खींच लिया था लिहाजा सनद रही और वक्त पर काम भी आई अभी इस मुकदमे में कार्रवाई चल रही है.

दलित आदिवासी और पिछड़े वर्ग के छात्रों के पास तो जातिगत अपमान और प्रताड़ना से बचने सहूलियत भरा रास्ता यह रहता है कि वे उस जगह से भाग जाएं. फिर चाहे वह होस्टल हो लाइब्रेरी हो, कैंपस हो या फिर कैंपस के आसपास का कोई अड्डा हो जहां छात्र इकट्ठा होते हैं.

लेकिन पायल जैसी लड़कियों के पास तो यह मौका भी नहीं रहता जो अकेली घुटती रहती हैं और भाग नहीं सकतीं. अपने सुसाइड नोट में पायल ने तीनों आरोपियों के नाम सहित उन के द्वारा दिए जाने वाले जातिगत तानों का भी जिक्र किया है. ऐसे में यूजीसी की नई गाइडलाइन बेहद कारगर साबित होतीं जिन की धमक से ही सामान्य वर्ग के छात्रों के होश यह सोचते फाख्ता हो गए थे कि अब कोई कमैंट्स भी कसा तो लेने के देने पड़ जाएंगे. लिहाजा छोटी जाति वालों को तंग करने की आदत उन्हें छोड़नी ही पड़ेगी.

स्टे पर जश्न

स्टे और्डर आते ही इस वर्ग के छात्र सड़कों पर जुलूस की शक्ल में अबीरगुलाल उड़ाते दिखे थे मानो सीमा पर जा कर दुश्मन के सैनिकों को खदेड़ आए हों. देश में जातिवाद का जहर कितना और किस कदर पसरा है और यह जहर घोलने वाले दरअसल में हैं कौन लोग. इस का एहसास उस वक्त भी हुआ था जब अयोध्या में साधुसंत भी स्टे और्डर के बाद कथित रूप से ही सही जश्न मनाते दिखाई दिए थे.

एक संत सीताराम दास के मुताबिक जिस तरह सड़कों पर यूजीसी की नई गाइडलाइंस का विरोध हो रहा था उसे देखते सुप्रीम कोर्ट का फैसला सराहनीय और स्वागत योग्य है अब यह कौन सी तपस्या और भक्ति है यह तो इन का भगवान कहीं हो तो वही जाने क्योंकि कोई सीताराम या राधाकृष्ण उस वक्त मुंह नहीं खोलता जब कहीं कोई रोहित या पायल तंग आ कर आत्महत्या कर रहे होते हैं.

जाति है फसाद की जड़

रोहित और पायल की मांओं की याचिका में यह मांग भी की गई थी कि इस भेदभाव को खत्म करने के लिए एक मजबूत मैकेनिज्म बनाया जाए. इस पर सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार और यूजीसी को नोटिस जारी कर चुका था.

राधिका वेमुला और अबेदा सलेम तडवी की तरफ से नामी वकील इंदिरा जयसिंह ने पैरवी की थी जो 29 जनवरी की कार्रवाई में भी शामिल थीं. इस दिन भी उन्होंने कोर्ट को याद दिलाया था कि कोर्ट में 2019 से एक याचिका लंबित है जिस में 2012 के नियमों को चुनौती दी गई है उन की जगह ही 2026 के नियम लाए गए हैं. मैं ने ऐसे उदाहरण दिए हैं जहां छात्रों को अलगअलग होस्टल्स में रखा गया, इसे पहले से लंबित याचिका से अलग कर के नहीं देखा जा सकता. यह और बात है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस दिन उन की एक न सुनी जबकि जनवरी 2025 की सुनवाई में उन की हर दलील और बात से इत्तफाक रखा गया था.

इस सुनवाई के बाद उन की जूनियर दिशा वाडेकर ने मीडिया को बताया था कि अदालत के आदेश में हमारे सभी सुझाव दर्ज किए हैं और यूजीसी को निर्देश दिया है कि वह हमारे सुझावों को शामिल करते हुए इक्विटी इन हायर एजुकेशन रैगुलेशंस 2025 को 8 सप्ताह के भीतर अधिसूचित करे.

यह और बात है कि इस में एक साल लग गया लेकिन जब यूजीसी की गाइडलाइन आई तो सवर्ण समुदाय में कुछ इस तरह हाहाकार मच गया मानों 13 जनवरी की गाइडलाइन ने ब्राह्मण से शास्त्र, क्षत्रियों से शस्त्र, वैश्यों से बहीखाते और कायस्थों के हाथ से कलम छीन ली हो.

अब भले ही ये प्रतीक चिन्ह इन जातियों की पूरी पहचान न रह गए हों लेकिन इन के सरनेम ही इन के रुतबे सहित मानसिकता बता देते हैं. शर्मा, द्विवेदी, त्रिवेदी, चतुर्वेदी से सिंह और राजपूत से होते जैन, श्रीवास्तव, माथुर, सक्सेना, अग्रवाल, गुप्ता और बंसल जैसे सरनेम अपने आप में अपर कास्ट यानी मुख्यधारा के होने के न केवल सर्टिफिकेट बल्कि अगुवा होने के लाइसैंस भी होते हैं.

उलट इस के यादव, कुशवाह, अहिरवार, वाल्मीकि, निषाद, जाटव और विश्वकर्मा जैसे सरनेम हीनता और पिछड़ेपन का एहसास कराते हैं. जातिवादी मानसिकता की जड़ धर्म, वर्ण व्यवस्था और पौराणिक साहित्य से जन्में यही सरनेम हैं जो तख्ती की तरह हर गले में लटके हुए हैं. इन से ही तय किया जाता है कि किस सरनेम वाले के साथ कैसा व्यवहार किया जाना है.

जाति की पहचान कठिन हो

ये सरनेम अहम इसलिए भी है कि अब आप किसी को उस के कपड़ों, पहनावे और डीलडौल से नहीं पहचान सकते कि सामने पड़ गया आदमी किस जाति का है या किस जाति का हो सकता है.

आजकल सभी साफसुथरे कपड़ें पहने हुए हैं, जूते और टाई सभी इस्तेमाल कर रहे हैं सभी के शरीर से परफ्यूम और टेलकम पाउडर की खुशबू उड़ रही है और तो और हावभाव और बौडी लैंग्वेज भी बदल गई है. दलित अब हरिया, बुद्धा, घसीटा या रामसेवक नहीं रह गया है जिस के रूखे बाल, सूखे होंठ, घुटनों तक बंधी मैलीफटी धोती पांव नंगे या फिर प्लास्टिक के चप्पलजूते से लिपटे अब नहीं रहे.

एक दौर था जब नाम के अलावा सरनेम से जाति पहचान ली जाती थी. अगर कोई राम ‘दास’ है तो वह दलित ही होता था. उलट इस के राम`सिंह` ठाकुर और राम`कुमार` वैश्य होता था. आजादी के बाद दलितों ने भी रामकुमार लिखना शुरू कर दिया तो पहचान कठिन होने लगी लेकिन अपनी भगवान टाइप की पहचान बनाए रखने के लिए ब्राह्मणों ने रामचंद्र लिखना आज तक नहीं छोड़ा. दलितों ने अपने नाम के आगे कुमार, लाल और प्रसाद लिखना शुरू कर खुद को दासत्व से निकालने की कोशिश शुरू की तो यह उन का स्वाभिमान और गुलामी सूचक और हीनता भरे उपनामों से उबरने का सामाजिक तरीका ही था.

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देश में इफरात से हो रहे धार्मिक आयोजन जातिवाद को हवा देते हैं. ‘कास्ट फीलिंग’ इन्हीं से आती
है. यूजीसी की गाइडलाइन के चलते उपजे विरोध ने इसे और हवा दी.

लेकिन इस से भी ज्यादा अहम बात दलितों के बंधे हाथों का खुल जाना रही उन के चेहरे से दयनीयता गायब हो गई है एवज में ठसक आई हो या न आई हो लेकिन हीनता भरा ही सही आत्मविश्वास जरूर आ गया है. किसी रसूखदार के घर के सामने से गुजरते पांव में अगर जूतेचप्पल हों तो उन्हें सर पर रख कर गुजरने का दौर भी विदा हो गया है. फिर स्तन टैक्स मटकी गले में लटका कर और पीछे झाड़ू बांध कर चलना तो कड़वे अतीत की बातें हैं.

यानी प्रताड़ना के लिए सहारा सरनेम का लिया जाता है. जब यह बात दलित युवाओं को समझ आई तो उन्होंने अपने मूल सरनेम बदल कर नाम के आगे कुमार लगाना शुरू कर दिया 70-80 के दशक में यह टोटका खूब चला था.  लेकिन धीरेधीरे गायब भी हो गया क्योंकि इस देश में आप एक दफा आंख का काजल छिपा सकते हैं लेकिन जाति नहीं छिपा सकते.

हालिया मचे बवंडर से परे यूजीसी को इस पर विचार करना चाहिए कि 2012 के बाद 2026 की भी गाइडलाइन जिन्हें हालफिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने पोस्टपोन कर दिया है से कुछ खास हासिल नहीं होने वाला. इसलिए क्यों न कालेजों में दाखिला लेने वाले सभी छात्रों के सरनेम ही गायब कर दिए जाएं या उन्हें एक सा नहीं तो 3-4 तरह के सरनेम लौटरी सिस्टम से दे दिए जाएं मसलन कुमार, नाथ, प्रसाद, लाल और चंद्र. इस से होगा यह कि किस से कैसे पेश आना है की मानसिकता खत्म होने लगेगी और जातिवादी लोग हतोत्साहित भी होंगे.

ध्वस्त हुआ हिंदू राष्ट्र का ख्वाब

यूजीसी की नई गाइडलाइन से भी जातिवादी ही हतोत्साहित होते दिखे लेकिन बेहद बौखला कर हुए क्योंकि उन से कोटे के छात्रों को बेइज्ज्त करने का मौका छीन लिया गया था. कैसे छीन लिया गया था इस के पहले यह समझना जरूरी है कि इस बाबत वे नरेंद्र मोदी और भाजपा को क्यों कोसते नजर आए.

यूजीसी की गाइडलाइन जारी होते ही एक ही झटके में सवर्णों के देश को हिंदू राष्ट्र बनाने के सपने ध्वस्त हो गए थे. जिस के माने उन के लिए यह भर होते हैं कि अब फिर सवर्णों का और उस में भी खासतौर से ब्राह्मणों का राज होगा. कहां तो मुट्ठी भर सवर्ण यह आस लगाए बैठे कि मोदी सरकार आज नहीं तो कल जातिगत आरक्षण बंद करेगी और एट्रोसिटी एक्ट भी खत्म कर देगी. लेकिन हुआ उल्टा तो सवर्ण एकदम से तिलमिला उठे और मोदी के नाम पर भाजपा को वोट देने पर खीझते भी नजर आए.

इस की दूसरी वजह यह भी थी कि एससी, एसटी और ओबीसी तबका सोशल मीडिया पर जम कर सवर्णों की सामूहिक खिल्ली उड़ा रहा था. खुद सवर्ण भी मान रहे थे कि मोदी के कट्टरवादी और मंदिर वादी तेवर देख कर ही उन्होंने भाजपा सरकार चुनी थी. नरेंद्र मोदी का इतना मजाक शायद ही पहले कभी उड़ा होगा. उन्हें उन की जाति से संबोधित करते हुए ‘तेली’ इस तंज के साथ कहा गया कि इस जाति के आदमी का चेहरा सुबहसुबह देखने से दिन बिगड़ जाता है.

जहां तक बात उच्च शिक्षण संस्थानों की है तो तेजी से वहां का माहौल बदला है. उन में रिजर्व कोटे के छात्रों की संख्या दशक दर दशक और साल दर साल बढ़ी है इस बात को विभिन्न एजेंसियों के आंकड़ें बयां भी करते हैं.

इंडियन इंस्टीट्यूट औफ मैनेजमैंट उदयपुर की टीम के एक हालिया सर्वे की मानें तो उच्च शिक्षा में अनुसूचित जाति जनजाति और पिछड़े वर्ग के छात्रों की संयुक्त हिस्सेदारी साल 2022 – 23 में क्रमश 38, 16 और 6.8 फीसदी यानी कुल 60.8 फीसदी हो गई है जो कि 2011 – 12 में 43.1 फीसदी थी. अकेले 2023 में इन वर्गों के छात्रों के नामांकनों की संख्या सामान्य वर्ग के छात्रों की संख्या के मुकाबले 95 लाख ज्यादा थी.

इसी दौरान सामान्य वर्ग की हिस्सेदारी 57 फीसदी से घट कर 2023 में 39 फीसदी पर सिमट गई. इस में ईडब्ल्यूएस कोटा यानी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के सामान्य छात्र भी शामिल हैं. इस स्टडी के तहत 4 करोड़ 38 लाख छात्र और देश भर के 60380 शिक्षण संस्थान शामिल थे.

80 – 90 के दशक में उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षित वर्गों के छात्रों की संख्या 15 – 20 फीसदी ही होती थी लेकिन अब इस वर्ग में जागरूकता बढ़ी है. युवा डिग्री ले कर सरकारी या गैरसरकारी नौकरियों में पहले के मुकाबले ज्यादा जा रहे हैं जिस से उन का जीवन स्तर सुधर रहा है. इन के बापदादों ने हाड़तोड़ मेहनत कर देश की तरक्की में अपना योगदान दिया था अब इन के युवा पढ़लिख कर योगदान दे रहे हैं. यानी पीढ़ियों से ये वर्ग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं.

लेकिन आर्थिक स्तर सुधरने का यह मतलब कतई नहीं है कि इन की सामाजिक हैसियत भी बढ़ रही है, मैनिट भोपाल के दलित तबके के एक सीनियर प्रोफेसर की माने तो सभी की आर्थिक स्थिति नहीं सुधरी है बल्कि बमुश्किल 2 फीसदी की ही बेहतर हुई है. लेकिन इस के बाद भी वे अब पहले से ज्यादा भेदभाव और प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं क्योंकि उन के पास पैसा जो आ रहा है. इस पैसे पर कल तक सवर्ण अपना हक समझते थे.

यूजीसी की गाइडलाइन के मद्देनजर सवर्ण छात्रों की यह कुंठा और भड़ास विरोध की शक्ल में सामने आए थे क्योंकि घोषित और उजागर तौर पर वे नतीजों में भी पिछड़ रहे हैं जिस की अहम वजह दरअसल में कोटे वालों का बहुसंख्यक होना है. अब दौर उन का है तो विरोध और भड़ास के मुद्दे तो ढूंढे ही जाएंगे. जैसे समाज में मुट्ठी भर सवर्ण दलित, पिछड़ों आदिवासियों को धकियाते लतियाते रहते हैं वही उच्च शिक्षण संस्थानों में भी होता है तो इस में हैरत की बात क्या.

यूजीसी के ही आंकड़ों के मुताबिक उस के अधीन शिक्षण संस्थानों में 2019 – 2020 में आरक्षित छात्रों की प्रताड़ना के 173 मामले दर्ज किए गए थे जो 2023 – 24 में बढ़ कर 378 हो गए थे. इन पांच सालों में कुल 1052 शिकायतें दर्ज की गई थीं. इस आंकड़े में जाहिर है ओबीसी के छात्रों की शिकायतों की संख्या नहीं है क्योंकि उन्हें शिकायत दर्ज कराने का अधिकार ही नहीं था. होस्टल्स में आरक्षित वर्ग के छात्र अगर जातिगत घुटन महसूस करते हैं तो सुकून से पढ़ने के लिए वे शहर में किराए के कमरे या मकान ढूंढने लगते हैं जो छोटी जाति का होने के चलते उन्हें नहीं मिलता. नतीजतन उन्हें दलित बस्तियों में रहना पड़ता है जहां का माहौल पढ़ाई के लिहाज से अनुकूल नहीं होता. इस के बाद भी ये युवा डिग्री ले कर सरकारी या प्राइवेट नौकरी से लग जाते हैं तो भी सवर्णों की भौंहें चढ़ जाती हैं कि अरे ये तो कोटे वाला है सरकारी दामाद है वगैरहवगैरह. यानी जातिगत प्रताड़ना शास्वत है जो श्मसान घाट तक पीछा नहीं छोड़ती.

ऐसे में यूजीसी की नई गाइडलाइन अपनी जगह ठीक थीं जिस से आरक्षित वर्ग के छात्र सम्मान और स्वभिमान से पढ़ सकें किसी को रोहित वेमुला, पायल तडवी और आईआईटी मुंबई के दलित छात्र दर्शन सोलंकी की तरह खुदकुशी करने मजबूर न होना पड़े.

यह सब नई बातें नहीं हैं. देश यह मानसिकता सदियों से देख और भुगत रहा है. उस की पहचान टैक्नोलौजी न हो कर यही जातिवाद है जिस से बाहर आने की कोई भी कोशिश उसे नागवार गुजरती है. सवर्णों का उबाल शबाब पर आने को ही था कि 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन गाइडलाइंस पर स्टे और्डर दे दिया. लेकिन यह ट्रीटमैंट नहीं है बल्कि अनेस्थिया है. लगता ऐसा है कि सुप्रीम कोर्ट भी सवर्णों के हल्ले से दबाव में आ गया था. ठीक वैसे ही जैसे अयोध्या के विवादित ढांचे को राममंदिर करार देते आस्था के नाम पर आया था.

अब क्या होगा?

स्टे के बाद सामान्य छात्र जश्न मना रहे हैं तो उन सहित सभी को यह समझ आ रहा है कि अब होना जाना कुछ नहीं है. क्योंकि वाकई में कुछ होने का वक्त और मौका दोनों स्टे की बलि चढ़ गए हैं. सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी और सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. 19 मार्च को याचिकाकर्ताओं की सुनवाई भी होगी जाहिर है और तारीखें भी लगेंगी. तबतक 2012 के नियमों के तहत कार्रवाई होगी जिन की भाषा अस्पष्ट नहीं थी.

इस का राजनीति पर कोई खास असर पड़ेगा ऐसा भी नहीं लग रहा क्योंकि सवर्ण कितना ही भाजपा और नरेंद्र मोदी को कोस लें उन के सिवा कोई विकल्प उन के पास है नहीं. यह जरूर है कि मोदी की साख पर बट्टा लगा है और सवर्ण भी उन्हें अब शक की निगाह से देखने लगा है दलित आदिवासी और पिछड़े तो लोकसभा चुनाव में बता चुके हैं कि उन्हें इन दोनों पर ही भरोसा नहीं. लेकिन उन के पास दर्जनों क्षेत्रीय और एक राष्ट्रीय विकल्प हैं.

इन कयासों के भी कोई खास माने नहीं कि कमेटी में अब कौन और कैसे लोग रहेंगे और क्या वे सामान्य वर्ग के छात्रों को उस खतरे से सुरक्षा दिला पाएंगे जिस का कोई अस्तित्व ही नहीं वास्तविक खतरा तो एकलव्य से ले कर रोहित, पायल और दर्शन जैसे छात्रों को रहता है जो जाति के साथसाथ पैसे से भी गरीब होते हैं.

उन की आंखों में कारें और भव्य फ्लैट्स खरीदने के नहीं बल्कि पेरैंट्स के दुःखदर्द दूर कर देने के सपने रहते हैं. वे किसी 5 स्टार होटल में हजारों का डिनर करने की नहीं सोचते बल्कि परिवार सहित 150 रुपए की मारवाड़ी थाली खाने की सोचते हैं और इस के लिए भी सवर्णों वाले सस्ते होटल में भी जाने से डरते हैं कि कहीं कोई टोक न दे या जाति न पूछ ले. इस के बाद भी कहा यह जाता है कि अब कहां जातपात और छुआछूत है, अब कहां भेदभाव और प्रताड़नाएं हैं. अब तो सब बराबर हैं और सब हिंदू हैं.

बात सही भी है कि अब तो सब हिंदू हैं क्योंकि जातपात की विदाई आरएसएस और भाजपा कह देने मात्र से हो गई है. इन के कह देने भर से सवर्ण दलित उसी तरह भाईभाई हो गए हैं जैसे कभी हिंदू और मुसलमान भाईभाई हुआ करते थे.  सब खुश हैं. हिरण और शेर एक घाट पर पानी पी रहे हैं. यानी देश हिंदू राष्ट्र बन चुका है अब बस विश्वगुरु के खिताब के ऐलान का इंतजार किया जा रहा है.

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Satirical Story In Hindi : तुम्हीं हो फादर…मदर तुम्हीं हो…तुम्हीं हो बिस्तर, चादर तुम्हीं हो

Satirical Story In Hindi : जब से मेरे बचपन के दोस्त आम से खास हुए हैं, अपना सीना बिना फुलाए 40 से 60 हो गया है. अब तो न चाहते हुए भी उन से गाहेबगाहे काम पड़ता ही रहता है. कभी पानी नल में न आने पर कमेटी वालों को उन का फोन करवाने जाना पड़ता है, तो कभी बिजली न आने पर.

इन सरकारी महकमे वालों को भी पता नहीं आजकल क्या हो गया है कि बिना किसी नेता के फोन के छींकते भी नहीं. इन की हरकतों को देख कर तो यों लगता है मानो ये जनता के नहीं, नेताओं के नौकर हों. जब देखो, जहां देखो, नेताओं के आगेपीछे दुम हिलाते रहते हैं. कभी ऐसे जनता के आगे भी दुम हिलाओ, तो मजा मिले.

नल में 2 दिन से पानी न आने के चलते पानी वालों को दोस्त का फोन करवाने उन के घर गया, पर वे घर में कहीं न दिखे. मैं ने परेशान होते हुए भाभी से पूछा, ‘‘नेताजी कहां हैं भाभीजी? घूमने गए हैं क्या? या अभी भी चुनाव के दिनों की भागदौड़ की थकान मिटाने के लिए लेटे हुए हैं? लगता है कि अब तो वे अगले चुनाव तक ही जागेंगे.’’

‘‘जब से पार्टी से निकाले गए हैं, तब से इन की नींद हराम हो गई है. पूजा कर रहे हैं भीतर. कुछ दिनों से नई बीमारी पाल ली है. जब देखो पूजा… पूजा… पूजा… सौ बार कह चुकी हूं, बहुत हो गई यह पूजा, पर उठने का नाम ही नहीं लेते.

‘‘सच कहूं भाई साहब, मैं ने ये इतने बेचारे कभी नहीं देखे, जितना आजकल देख रही हूं. चेहरे पर जीत की रत्तीभर लाली नहीं, जबान पर पहले सी कोई गाली नहीं. चाय 5-5 बार गरम करनी पड़ती है, पर इन को तो चाय पीने तक की फुरसत नहीं,’’ भाभी ने दुखड़ा रोया.

भाभी की यह हालत देख कर मुझे रोना आ गया. कैसा नेता है यह? जीत के महीनेभर बाद ही अपनी घरवाली को परेशान करने लग गया है.

सांसें रोके दबे पैर उन के भगवान रूम में गया, तो जो मैं ने देखा उसे देख कर मैं भी हैरान रह गया. सामने पार्टी प्रधान का बड़े से शीशे में मढ़ा हंसता हुआ फोटो बराबर खांसता हुआ और वे फोटो के आगे धूपदीप, फलफू्रट थाली में सजा साष्टांग अधखुली धोती में पड़े हुए.

यह देख कर मैं चकराया. मुझ से रहा न गया, सो पूछ बैठा, ‘‘भाई साहब? यह क्या…?’’

‘‘पूजा हो रही है और क्या?’’ कह कर वे लेटेलेटे ही पार्टी प्रधान के फोटो के आगे नाक रगड़ने लगे, तो मैं डरा. बचीखुची नाक भी जाती रही तो…

पर तभी कहीं से भविष्यवाणी हुई कि इन के नाक होना या न होना कोई माने नहीं रखता गधे. इन की नाक हो, तो भी ये वैसे ही, न हो तो भी ये वैसे ही.

‘‘पर… किस की पूजा?’’

‘‘अपने इन भगवान की और किस की? इन के आगे इन दिनों हर अवतार फेल है. जो ठान लेते हैं, बस कर के ही दम लेते हैं.’’

देशभर की उदासी चेहरे पर मलने के बाद उन्होंने फोटो के आगे रखे प्रसाद में से एक केला मेरी ओर बढ़ाया, तो मैं ने केला उन से प्रसाद रूप में ले कर जेब में डालते हुए पूछा, ‘‘पर यह सब चुनाव क्षेत्र के लोगों ने देख लिया, तो उन में क्या मैसेज जाएगा भाई साहब?

‘‘उन्होंने आप को काम करने के लिए वोट दिया है, दिनरात इन की तसवीर के आगे लेटे रहने के लिए नहीं.’’

‘‘भाड़ में जाए काम. यहां तो पार्टी में बने रहने के लाले पड़े हैं. जो मैसेज जाना हो जाए. मुझे अपने को देखना है.

‘‘सोच रहा हूं, अपनी जबान सिलवा लूं. कहीं गलती से भी ऐसावैसा सच जैसा कहीं बक दिया तो… इस देश में तुम किसी जबान सिलने वाले को जानते हो क्या?’’

इतना कह कर उन्होंने हाथ में घंटी पकड़ी और घंटी की ‘टनटन’ के साथ सुर में गाना गाने लगे, मानो पार्टी प्रधान को अपना दुखड़ा सुना रहे हों, ‘तुम्हीं हो फादर, मदर तुम्हीं हो, तुम्हीं हो नियरर, डियरर तुम्हीं हो… जो खिल सकें न वे फूल हम हैं… तुम्हारे चरणों की धूल हम हैं. दया की दृष्टि सदा ही रखना… तुम्हीं हो बिस्तर, चादर तुम्हीं हो… तुम्हीं हो लोटा, गागर तुम्हीं हो…’ Satirical Story In Hindi

Family Story in Hindi : बदसूरत – अविनाश की हैवानियत से कैसे बच पाई प्रभा

Family Story in Hindi :

‘प्रभा, जल्दी से मेरी चाय दे दो…’

‘प्रभा, अगर मेरा नाश्ता तैयार है, तो लाओ…’

‘प्रभा, लंच बौक्स तैयार हुआ कि नहीं?’

जितने लोग उतनी ही फरमाइशें. सुबह से ही प्रभा के नाम आदेशों की लाइन लगनी शुरू हो जाती थी. वह खुशीखुशी सब की फरमाइश पूरी कर देती थी. उस ने भी जैसे अपने दो पैरों में दस पहिए लगा रखे हों. उस की सेवा से घर का हर सदस्य संतुष्ट था. वर्मा परिवार उस की सेवा और ईमानदारी को स्वीकार भी करता था.

प्रभा थी भी गुणों की खान. दूध सा गोरा और कमल सा चिकना बदन. कजरारे नैन, रसीले होंठ, पतली कमर, सुतवां नाक, काली नागिन जैसे काले लंबे बाल और ऊपर से खनकती हुई आवाज. उस की खूबसूरती उस के किसी फिल्म की हीरोइन होने का एहसास कराती थी.

मालकिन मिसेज वर्मा की बेटी ज्योति, जो प्रभा की हमउम्र थी, के पुराने, मगर मौडर्न डिजाइन के कपड़े जब वह पहन लेती थी, तो उस की खूबसूरती में और भी निखार आ जाता था.

मिसेज वर्मा का बेटा अविनाश तो उस पर लट्टू था. हमेशा उस के आसपास डोलते रहने की कोशिश करता रहता था. वह भी मन ही मन उसे चाहने लगी थी. अब तक दोनों में से किसी ने भी अपनेअपने मन की बात एकदूसरे से जाहिर नहीं की थी.

घर के दूसरे कामों के अलावा मिसेज वर्मा की बूढ़ी सास की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी भी प्रभा के कंधों पर ही थी.

दरअसल, मिसेज वर्मा एक इंटर कालेज की प्रिंसिपल थीं. उन्हें सुबह के 9 बजे तक घर छोड़ देना पड़ता था. बड़ा बेटा अविनाश और बेटी ज्योति दोनों सुबह साढ़े 9 बजे तक अपनेअपने कालेज के लिए निकल जाते थे.

घर के मालिक पीके वर्मा पेशे से वकील थे और उन के मुवक्किलों के चायनाश्ते का इंतजाम भी प्रभा को ही देखना पड़ता था. प्रभा सुबह के 8 बजतेबजते वर्मा परिवार के फ्लैट पर पहुंच जाती थी. पूरे 8 घंटे लगातार काम करने के बाद शाम के 5 बजे तक ही वह अपने घर लौट पाती थी.

उस दिन प्रभा मिस्टर वर्मा के घर पर अकेली थी. बूढ़ी अम्मां भी किसी काम से पड़ोस में गई हुई थीं. घर का काम निबटा कर थोड़ा सुस्ताने के लिए प्रभा जैसे ही बैठी, दरवाजे की घंटी बज उठी.

प्रभा ने दरवाजा खोला, तो सामने अविनाश खड़ा था. ‘‘घर में और कोई नहीं है क्या?’’ अविनाश ने अंदर आते हुए पूछा.

‘‘नहीं,’’ प्रभा ने छोटा सा जवाब दिया.

कमरे में खुद के अलावा अविनाश की मौजूदगी ने उस के दिल की धड़कनें बढ़ा दी थीं. वह अपनी नजरें चुरा रही थी. उधर अविनाश का दिमाग प्रभा को अकेला पा कर बहकने लगा था.

अविनाश ने अपने कमरे में जाते हुए प्रभा को एक गिलास पानी देने के लिए आवाज लगाई. वह पानी ले कर कमरे में पहुंची. अविनाश ने उसे गिलास मेज पर रख देने का इशारा किया.

गिलास रख कर जब प्रभा लौटने लगी, तो अविनाश ने उसे पीछे से अपनी बांहों में कस कर जकड़ लिया. एक तो लड़की की गदराई देह, मुश्किल से मिली तनहाई और मालिक होने का रोब… अविनाश पूरी तरह अपने अंदर के हैवान के आगे मजबूर हो चुका था.

‘‘यह आप क्या कर रहे हैं साहब?’’ प्रभा बुरी तरह डर गई थी.

‘‘वही, जो तुम चाहती हो. तुम्हें तो फिल्मों की हीरोइन होना चाहिए था, किन कंगालों के घर पैदा हो गई तुम… कोई बात नहीं. तुम तो किसी बड़े घर की बहू बनने के लायक हो मेरी जान.

‘‘मैं तुम्हें बहुत प्यार करता हूं. मैं तुम से शादी करना चाहता हूं,’’ फिर अविनाश ने उसे बिस्तर पर गिरा दिया और उस के जिस्म पर सवार होने लगा.

प्रभा पर ताकत का इस्तेमाल करते हुए अविनाश बड़ी बेशरमी से बोला, ‘‘पहले अपनी जवानी का मजा चखाओ, फिर मैं तुम्हें वर्मा परिवार की बहू बनाता हूं.’’

‘‘लेकिन, शादी के पहले यह सब करना पाप होता है,’’ प्रभा गिड़गिड़ाते हुए बोली.

‘‘पापपुण्य का हिसाब बाद में समझाना बेवकूफ लड़की. पहले मैं जो चाहता हूं, वह करने दे.’’

अविनाश वासना की आग में पूरी तरह दहक रहा था. इस के आगे वह कोई हरकत करता, घर का दरवाजा ‘खटाक’ से खुला. सामने मिसेज वर्मा खड़ी थीं.

अपनी मां को देख अविनाश पहले तो झेंपा, फिर पैतरा बदल कर पलंग से उतर गया. प्रभा भी उठ खड़ी हुई. ‘‘यह सब क्या हो रहा है?’’ मिसेज वर्मा चीखते हुए बोलीं.

‘‘देखिए न मम्मी, कैसी बदचलन लड़की को आप ने घर में नौकरी दे रखी है? अकेला देख कर इस ने मुझे जबरन बिस्तर पर खींच लिया. यह इस घर की बहू बनने के सपने देख रही है,’’ अविनाश ने एक ही सांस में अपना कुसूर प्रभा के सिर पर मढ़ दिया.

‘‘नहीं मालकिन, नहीं. यह सच नहीं है,’’ कहते हुए प्रभा रो पड़ी.

‘‘देख रही हैं मम्मी, कितनी ढीठ है यह लड़की? यह कब से मुझ पर डोरे डाल रही है. आज मुझे अकेला पा कर अपनी असलियत पर उतर ही आई,’’ अविनाश सफाई देता हुआ बोला.

‘‘मैं खूब जानती हूं इन छोटे लोगों को. अपनी औकात दिखा ही देते हैं. अब मैं इसे काम पर नहीं रख सकती,’’ मिसेज वर्मा प्रभा पर आंखें तरेरते हुए बोलीं.

‘‘नहीं मालकिन, ऐसा मत कीजिए. हम लोग भूखे मर जाएंगे,’’ प्रभा बोली.

‘‘भूखे क्यों मरोगे? अपनी टकसाल ले कर बाजार में बैठ जाओ. अपनी

भूख के साथसाथ दूसरों की भी मिटाओ. घरों में झाड़ूपोंछा कर के कितना कमाओगी. चलो, निकलो अभी मेरे घर से. मेरे बेटे पर लांछन लगाती है,’’ मिसेज वर्मा बेरुखी से बोलीं.

प्रभा हैरान सी सबकुछ सुनतीदेखती रही. उस का सिर चकराने लगा. कुछ देर में जा कर वह संभली और बिना उन की तरफ देखे दरवाजे से बाहर निकल गई.

घर आ कर उस ने रोतेरोते सारी दास्तान अपनी मां को सुनाई. उस की मां लक्ष्मी हैरान रह गई.

‘‘मां, इस में मेरी कोई गलती नहीं है. यह सच है कि मैं मन ही मन अविनाश बाबू को चाहने लगी थी, पर इन सब बातों के लिए कभी तैयार नहीं थी. वह तो ऐन वक्त पर मालकिन आ गईं और मैं बरबाद होने से बच गई. मुझे माफ कर दो मां,’’ प्रभा रोने लगी.

मां लक्ष्मी ने बेटी प्रभा को खींच कर गले से लगा लिया. प्रभा काफी देर तक मां से लिपट कर रोती रही. रो लेने के बाद उस का जी हलका हो गया. वह लुटतेलुटते बची थी. इस के लिए वह मन ही मन मिसेज वर्मा को धन्यवाद भी दे रही थी. ऐन वक्त पर उन का आ धमकना प्रभा के लिए वरदान साबित हुआ था.

प्रभा को अब अपने सपनों के टूट जाने का कोई गम नहीं था. उस के सपनों का राजकुमार तो अंदर से बड़ा ही बदसूरत निकला था.

‘‘महीने की पगार की आस टूट गई तो क्या हुआ, इज्जत का कोहिनूर तो बच गया. वह अगर लुट जाता, तो किस दुकान पर वापस मिलता?’’ इतना कह कर उस की मां लक्ष्मी ने इतमीनान की एक लंबी सांस ली.

कुछ खोतेखोते बहुतकुछ बच जाने का संतोष प्रभा के चेहरे पर भी दिखने लगा था.

Family Story in Hindi

Satirical Story In Hindi : दाढ़ी वाले बाबा

Satirical Story In Hindi : पूरी कालोनी शोर के चलते परेशान  हो गई थी. कालोनी में एक सरकारी जमीन का टुकड़ा था. शर्माजी को उस पर कब्जा करना था. उन के मकान से लगालगाया वह टुकड़ा था. उन्होंने थोड़ी सी ईंटें और सीमेंट डलवा कर मंदिर बनवा लिया.

आनेजाने वालों को दिक्कत हो रही थी. लेकिन किसी के बाप की हिम्मत जो भगवान के मंदिर के खिलाफ बोल दे. शर्माजी ने उसी मंदिर से लग कर एक दुकान खोल ली जहां मोटा पेट लिए वे सेठजी बन कर बैठ गए थे. लेकिन अभी उन का मन भरा नहीं था. उन्होंने विचार किया- भगवानजी तो स्वर्ग में रहते हैं, सो उन भगवानजी का ट्रांसफर एकमंजिला बना कर ऊपर कर दें और नीचे पूरा एक हौल निकल आएगा जिस में काफी जगह निकलेगी. उस का गोदाम के तौर पर उपयोग हो जाएगा.

जयपुर से एक पत्थर लाया गया. फिर एकमंजिला ऊंचा मंदिर निर्माण कर के नीचे वाले हिस्से पर शर्माजी ने दुकान और गोदाम निकाल लिया. 5-6 महीने बाद आधी दुकान किराए पर दे कर वे चांदी काटने लगे. लेकिन शर्माजी पूजापाठ करें या दुकानदारी-वे कुछ निर्णय नहीं कर पा रहे थे. इधर कालोनी वाले ईर्ष्या कर रहे थे, शिकायतें भी हो रही थीं. अभी दुकानों की लागत निकली नहीं थी और यदि यह अवैध कब्जा हट गया तो लाखों का नुकसान हो जाएगा. उन्होंने तरकीब भिड़ाई और आननफानन अपने गांव से एक अनाथ प्रौढ़ को बाबा बनवा कर बुलवा लिया. उस बाबा का प्रचारप्रसार कालोनी में हो जाए, इसलिए उन्होंने ध्वनि विस्तारक यंत्र लगा कर धार्मिक दोहों का वाचन रखवा दिया था.

रातदिन चलने वाले इस पाठ का शोर इतना अधिक होता था कि कालोनी में सोने वाले जाग जाए और जागने वाले कालोनी छोड़ कर भाग जाए. लेकिन किसी की हिम्मत नहीं थी कि कोई भगवानजी के खिलाफ आवाज उठाए. शानदार तरीके से शर्माजी ने दुकानदारी जमा ली थी जिस के परिणामस्वरूप मंदिर का चढ़ावा, दुकान का किराया, किराने का फायदा मिला कर शर्माजी धन कूट रहे थे. कालोनी या उस में रहवासी जाए भाड़ में, उन्हें उस से कोई मतलब नहीं था.

इस बीच, शर्माजी ने अपने पुजारी महाराज के चमत्कारों का प्रचार कर दिया था. हवा से भभूत निकालना, पानी में दीपक जलाना, जबान पर कपूर को जलाना…एकदो नहीं पूरे आधा दर्जन से अधिक चमत्कारों को बतलाने के परिणामस्वरूप मंदिर में भीड़ बढ़ गई. चढ़ावा भी बढ़ गया. दुकान की बिक्री भी बढ़ गई. शर्माजी बहुत खुश थे. एक पसेरी उन का वजन और बढ़ गया था. जब दुकान चल निकली तो चमत्कारों को बढ़ाना तथा भक्तिरस में डूबा बताना भी कर्तव्य हो गया.

शर्माजी का मंदिर ही उस जह का नाम हो गया था और भीड़ बढ़ती जा रही थी. लोग अंधश्रद्घा में डूबे रहे. कोई प्रश्न खड़ा ही नहीं करे, इस के लिए शर्माजी ने भजनमंडल, पाठों का आयोजन पूरे डीजे साउंड के साथ शुरू कर दिया ताकि पूरी कालोनी में आवाज जाए. मैं ने सोचा कि अब कालोनी का मकान बेच कर चला जाऊं. सो, मैं ग्राहक खोजने लगा. जिस भी ग्राहक को मेरे घर बेचने का कारण पता चलता, वह मुझे अधर्मी कह कर मकान खरीदने से मना कर देता. मैं बहुत परेशान था.

तब ही हमारी एकमात्र सासूजी अचानक आ गईं. सुबहसुबह का समय था. इतना शोर था कि पक्षी भी कोलाहल करना भूल कर पेड़ छोड़ कर उड़ गए थे. सासूजी ने घर में प्रवेश किया और हमारी एकमात्र धर्मपत्नी का चेहरा देखा तो दंग हो गईं. दरअसल, वह पूरे एक महीने से शोर के चलते सो नहीं पाई थी. मेरे सिर के रहेसहे बाल भी उड़ गए थे और सिर खेल का मैदान हो गया था. सासूजी बहुत दुखी हुईं. यात्रा की थकान के चलते आराम करना चाहा, लेकिन दरवाजेखिड़की बंद कर लेने के बाद भी वे शोर से मुक्ति नहीं पा सकीं और सो नहीं पाईं. दोपहर वे कुछ नाराज हो कर खाने की टेबल पर आईं और बेटी से कह उठीं, मैं लौट कर जा रही हूं.

हमारी पत्नीजी ने दुखी हो कर कहा, ‘मम्मीजी, आप के बुद्धि के चर्चे विदेशों में हैं और आप अगर ऐसी स्थिति में हमें छोड़ कर चली जाएंगी तो आखिर हमारा क्या होगा? उपाय करो, मम्मीजी. हम ने भी हाथ जोड़ लिए, प्लीज सासूजी, कुछ विचार तो करो, आखिर हमारे परिवार का ही नहीं, पूरी कालोनी वालों का सवाल है.’

‘ठीक है,’ कुछ सोचती हुईं सासूजी ने कहा.

हम तो खुशी से गुब्बारे की तरह फूल गए. जानते थे कि प्रत्येक स्थिति में सासूजी ही सब को कंट्रोल कर लेंगी. शाम को भगवे कपड़े पहन कर सासूजी अपनी पूर्व परिचित कालोनी की सहेलियों के साथ मंदिर में दर्शन करने गईं. प्रसाद चढ़ाया, चंदा दिया और हाथ जोड़ कर प्रसाद लिया और अपनी सहेलियों के साथ लौट आईं. अगली सुबह हम सो कर भी नहीं उठे थे कि सासूजी सहेलियों के साथ मंदिर चली गईं जहां भयानक ध्वनिप्रदूषण हो रहा था. उन्होंने तत्काल प्रौढ़ महाराज के हाथों में 500 रुपए का नोट रखा.

महाराज तो दंग रह गया कि आखिर इतना चंदा उसे ही क्यों दिया गया. उस ने खुश हो कर प्रश्न किया, ‘‘मैडमजी, बताइए यह 500 रुपए का चंदा मुझे क्यों दिया जा रहा है?’’

सासूजी की सहेली ने कमान संभाली और कहा, ‘‘पंडितजी, ये 500 रुपए तो कम हैं, इन की इच्छा तो 5,000 रुपए देने की थी.’’

‘‘आखिर क्यों भाई? ऐसी क्या बात हो गई थी?’’

‘‘बात ही कुछ ऐसी थी. इन के पेट में पूरे 3 वर्षों से दर्द था, कल आप का प्रसाद ले गईं…सहेली अपना वाक्य पूरा भी नहीं कर पाई कि पंडित ने कहा, ‘‘ओह, वो खा कर ये ठीक हो गईं?’’

‘‘नहीं जी.’’

‘‘फिर क्या बात हो गई?’’

‘‘पंडितजी, उस प्रसाद में आप की दाढ़ी का एक बाल था. मैडमजी ने सोचा प्रसाद में बाल आया है, निश्चितरूप से इस का कोई महत्त्व तो होगा. बस, उन्होंने उस बाल को अपने पेट में बांध दिया और देखतेदेखते पेट का दर्द गायब हो गया.’’

‘‘धन्य हो पंडितजी,’’ सब सहेलियों ने समवेत स्वर में कहा.

‘‘ऐसे बाल मैं विशेष लोगों को ही देता हूं, जिस को सौ प्रतिशत लाभ देना होता है,’’ पंडित ने आत्मप्रशंसा से भर कर कहा.

‘‘हम धन्य हो गए,’’ कह कर सब सहेलियों ने चरणस्पर्श किए और चली आईं.

बस फिर क्या था-एक ने दूसरे से, दूसरे ने तीसरी से पूरी बात पूरी कालोनी में 1 घंटे में फैला दी गई. लगभग 9 बजे तक वहां एक हजार लोगों की भीड़ जमा हो गई जो पंडितजी से सौ प्रतिशत लाभ लेना चाहते थे. मरता क्या न करता. पंडितजी ने एकएक व्यक्ति से दाढ़ी का बाल नुचवाया, सिर टकला हो गया तो जो श्रद्धालु  (ग्राहक) थे उन्होंने सिर के बाल नोचने शुरू कर दिए और देखतेदेखते बिना भौंह, बिना पलकों के, टकले, दाढ़ीविहीन पंडित भूत जैसे लगने लगे. पीड़ा से बिलबिला रहे थे.

अभी भीड़ और बढ़ गई थी जो उन की टांगों व बगलों तक के केशलोचन करने के लिए आमादा थी. शर्माजी 11 बजे तक बिजनैस करते रहे. भारी ग्राहकी से वे खुश थे. लेकिन जब ज्ञात हुआ कि गांव से लाया पंडित पीछे के दरवाजे से भागने की कोशिश कर रहा है तो वे उस की छाती पर आ कर डट गए. सैकड़ों लोग उन के सिर पर बाल उगने की प्रतीक्षा में नंबर लगा कर बैठ गए थे. पंडितजी शौचक्रिया के नाम से जो बाहर गए तो फिर दोबारा लौट कर नहीं आए. 2 दिनों में ही शर्माजी का मंदिर श्मशान की तरह सुनसान हो गया था.

जब कोई नहीं रहा तो ग्राहकों ने आना बंद कर दिया. ग्राहक नहीं तो ध्वनि विस्तारक यंत्र बंद हो गया. जब शोर बंद हो गया तो भीड़ लापता हो गई. चढ़ावा खत्म हो गया. मंदिर के देवता एक दिन चोर के हाथों चोरी हो गए.

देखतेदेखते शर्माजी की दुकानदारी पूरी तरह से खत्म हो गई. शर्माजी आजकल हाथठेले पर सब्जी बेच रहे हैं और हमारी सासूजी उन से सब्जी खरीद कर मनपसंद खाना पकवा कर खा रही हैं. है न हमारी सासूजी बुद्धिमान? हम तो यही कामना करते हैं कि सब को ऐसी सास मिले. Satirical Story In Hindi

Social Story in Hindi : सही पकड़े हैं – सुशीला ने कमर कस ली रत्ना को रंगेहाथों पकड़ने की

Social Story in Hindi : ‘‘अदिति, हम कह रहे थे न, तेरी मेड ठीक नहीं लगती, थोड़ी नजर रखा कर उस पर, मगर तू है एकदम बेपरवाह. किसी दिन हाथ की बड़ी सफाई दिखा दी उस ने तो बड़ा पछताएगी तू. हम सही पकड़े हैं.’’ 4 दिनों से बेटी के घर आईं सुशीला उसे दस बार सचेत कर चुकी थीं.

‘‘अरे मां, रिलैक्स, आप फिर शुरू हो गईं, सही पकड़े हैं. कुछ नहीं कोई ले जाता, ले भी जाएगा तो ऐसा क्या है, खानेपीने का सामान ही तो है. हर वक्त उस पर नजर रखना अपना टाइम बरबाद करना है. आप भी न, अच्छा, मैं जाती हूं. 1 घंटा लग जाएगा मुझे. प्लीज, रत्ना (मेड) को अपना काम करने देना. वह चाय बना लाए तो मम्मीजीपापाजी के साथ बैठ कर आराम से पीना. आज छुट्टी है, बंटू, मिंकू और आप के दामाद तरुण की भी. वे देर तक सोते हैं, जगाना नहीं.’’

अदिति चली गई तो सुशीला ने गोलगोल आंखें नचाईं, ‘हमें क्या करना है जैसी भी आदत डालो, हम तो कुछ भी सब के भले के लिए ही कहते हैं.’

मेड थोड़ी देर बाद चाय टेबल पर रख गई. सुशीला भी अदिति के सासससुर तारा और तेजप्रकाश संग बैठ चाय की चुस्कियां लेने लगीं, पर शंकित आंखें मेड की गतिविधियों पर ही चिपकी थीं.

‘‘आजकल लड़कियां काम के लिए बाहर क्या जाने लगीं, घर के नौकरनौकरानी कब, क्या कर डालें, कुछ कहा नहीं जा सकता. हमें तो जरा भी विश्वास नहीं होता इन पर. निगाह न रखो तो चालू काम कर के चलते बनते हैं,’’ सुशीला बोल पड़ीं.

‘‘ठीक कह रही हैं समधनजी. लेकिन मैं पैरों से मजबूर हूं. क्या करूं, पीछेपीछे लग कर काम नहीं करा पाती और इन्हें तो अपने अखबार पढ़नेसुनने से ही फुरसत नहीं,’’ तारा ने पेपर में आंखें गड़ाए तेजप्रकाश की ओर मुसकराते हुए इशारा किया. तेजप्रकाश ने पेपर और चश्मा हटा कर एक ओर रख दिया और सुशीला की ओर रखे बिस्कुट अपनी चाय में डुबोडुबो कर खाने लगे.

‘‘आप तो बस भाईसाहब. भाभीजी तो पांव से परेशान हैं पर आप को तो देखना चाहिए. मगर आप तो बैठे रहते हो जैसे कोई घर का बंदा अंदर काम कर रहा हो. हम आप को एकदम सही पकड़े हैं,’’ सुशीला कुछ उलाहना के अंदाज में बोलीं. उन की आंखें चकरपकर चारों ओर रत्ना को आतेजाते देख रही थीं. रत्ना कपप्लेट ले जा चुकी थी. ‘काफी देर हो चुकी, पता नहीं क्या कर रही होगी,’ उन्हें और बैठना बरदाश्त नहीं हुआ. वे उठ खड़ी हुईं और उसे किचन में पोंछा लगाते देख यहांवहां दिखादिखा कर साफ करवाने लगीं.

‘‘ढंग से किया कर न, कोई देखता नहीं तो क्या मतलब है, पैसे तो पूरे ही लेती हो न?’’ उन का बारबार इस तरह से बोलना रत्ना को कुछ अच्छा नहीं लगता.

‘‘और कोई तो ऐसे नहीं बोलता इस घर में, अम्माजी आप तो…’’ रत्ना हाथ जोड़ कर माथे से लगा लिया करती. कभी अकेले में अन्य सदस्यों से शिकायत भी करती.

10 बज गए, मिंकी और बंटू का दूध और सब का नाश्ता बना मेज पर रख कर रत्ना चली गई तो सुशीला ढक्कन खोलखोल कर सब चैक करने लगीं.

‘‘अरे, दूध तो बिलकुल छान कर रख दिया पगलेट ने, जरा भी मलाई नहीं डाली बच्चों के लिए. ऐसे भला बढ़ेंगे बच्चे.’’ वे दोनों गिलास उठा कर किचन में चली आईं.

दूध के भगौने में तो बिलकुल भी मलाई नहीं थी. ‘जरूर अपने बच्चों के लिए चुरा कर ले जाती होगी, कोई देखने वाला भी तो नहीं, बच्चों का क्या, वैसे ही पी जाते होंगे,’ सुशीला मन ही मन बोलीं. तभी प्लेटफौर्म पर वाटर डिस्पोजर की आड़ में से झांक रहे मलाई के कटोरे पर उन की नजर पड़ी. वे भुनभुनाईं, ‘सही पकड़े हैं, महारानीजी हड़बड़ी में ले जाना भूल गई.’ उन्होंने गोलगोल आंखें घुमाईं और एक चम्मच मलाई मुंह में डाल कर बाकी मलाई दूध के गिलासों में बांटने जा रही थीं कि तेजप्रकाश आ पहुंचे, कटोरा हाथ में लेते हुए बोले, ‘‘अरे, क्या करने जा रही थीं बहनजी. बच्चे तो मलाई डला दूध मुंह भी नहीं लगाएंगे, थूथू करते रहेंगे. मौडर्न बच्चे हैं.’’

‘‘तभी तो रत्ना की ऐश है. मलाई का कटोरा छिपा कर अपने घर ले जा रही थी, पर भूल गई. हम सही पकड़े हैं.’’

‘‘अरे, नहीं बहनजी, मैं ने ही उस से कह रखा है, हफ्तेभर बाद तारा सारी इकट्ठी मलाई का घी बनाती है. घर के घी का स्वाद ही और है. आप तारा के पास बैठिए, मैं इसे डब्बे में डाल कर आता हूं.’’

‘‘यह भी ठीक है,’’ वे बालकनी में तारा के पास आ बैठीं.

‘‘हम से तो यह खटराग कभी न हुआ.’’

‘‘कैसा खटराग?’’

‘‘यह देशी घी बनाने का खटराग, भाईसाहब बता रहे हैं, हफ्ते में एक बार आप बना लेती हैं.’’

‘‘हां, इस बार ज्यादा दिन हो गए. दूध वाला अब सही दूध नहीं ला रहा, इतनी मलाई ही नहीं आती.’’

‘‘अरे नहीं, आज भी मलाई से तो पूरा कटोरा भरा हुआ था. हमें तो लगता है आप की रत्ना ही पार कर देती होगी, कल से चौकसी रखते हैं, रंगेहाथ पकड़ेंगे.’’

बंटू, मिंकी और तरुण भी ब्रश कर के आ गए थे. ‘गुडमौर्निंग दादू, दादी, नानी, सही पकड़े हैं,’ कहते हुए बंटू, मिंकी उन से लिपट कर खिलखिला उठे.

‘‘गुडमौर्निंग टू औल औफ यू. आइए, चलिए सभी नाश्ता करते हैं, अदिति पहुंच ही रही होगी. चलोचलो बच्चो…’’ तरुण ने मां को सहारा दिया और डायनिंग टेबल तक ले आया.

‘‘भाईसाहब तो फीकी चाय पीते होंगे?’’ सुशीला ने केतली से टिकोजी हटाते हुए पूछा.

‘‘बहनजी, बस 2 चम्मच चीनी,’’ स्फुट स्वरों में बोल कर कप में डालने का इशारा किया तेजप्रकाश ने.

‘‘नहीं, बिलकुल नहीं मम्मीजी, पापा को शुगर बरसों से है, कंट्रोल कर के रखा है, तब भी बौर्डर पर ही है. एक बार इन्हें दिल में बहुत जोर का दर्द उठा, डाक्टर के पास गए नहीं, पर प्रौमिस किया कि अब से मक्खन, चीनी नहीं खाएंगे. बस, तब से मक्खन वगैरा भी बंद. मां को तो शुगर नहीं है पर वे एहतियात के तौर पर अपनेआप ही नहीं लेतीं. आप बैठिए मम्मीजी, मैं निकालता हूं,’’ तरुण ने कहा.

‘‘अरे गैस थी, खाली पेट में वही चढ़ गई थी. खामखां लोगों ने एनजाइना समझ लिया और जबरदस्ती प्रौमिस ले लिया,’’ तेजप्रकाश ने सफाई दी.

‘‘ऐसे कैसे? शुक्र मनाइए कि खयाल रखने वाला परिवार मिला है, भाईसाहब. इतना लालच ठीक नहीं. जबान पर तो कंट्रोल होना ही चाहिए एक उम्र के बाद. वैसे भी, हमें इस उम्र में खुद भी अपना ध्यान रखना चाहिए,’’ सुशीला ने शुगरपौट तरुण की ओर बढ़ा दिया. तेजप्रकाश ने चीनी की ओर बढ़ता हुआ अपना हाथ मन मसोस कर पीछे खींच लिया.

‘‘तब तो चीनी का बहुत कम ही खर्चा आता होगा यहां. मिंकू, बंटू को देख रही हूं दूध में चीनी नहीं लेते पर सुबह से कई सारी चौकलेट खाने से उन का शुगर का कोटा पूरा हो जाता होगा, दामादजी भी बस आधा चम्मच, अदिति तो पहले ही वेट लौस की ऐक्सरसाइज व डाइट पर रहती है,’’ सुशीला सस्मित हो उठीं.

जिम से लौटी अदिति ने भी हाथ धो कर टेबल जौइन कर लिया, ‘‘अरे मम्मी, कहां हिसाबकिताब ले कर बैठ गईं. चीनी हो या चावल, अपनी रत्ना बड़ी परफैक्ट है, सब हिसाब से ही लाती, खर्च करती है. हम तो कभीकभी ही दुकान जा पाते हैं, उसी ने सब संभाला हुआ है.’’ वह चेयर खींच कर आराम से बैठ गई और कप में अपने लिए चाय डाल कर चीनी मिलाने लगी. तभी तेजप्रकाश ने उस से इशारे से रिक्वैस्ट की तो उस ने चुपके से आधा चम्मच चीनी तेजप्रकाश के कप में मिला दी.

‘‘हांहां, क्यों नहीं, सिर पर बिठा कर रखो महारानीजी को. एक दिन वही ऐसा गच्चा देगी तब समझ में आएगा. और भाईसाहब ने 2 शुगरफ्री डाले हैं. तू ने उन के कप में चीनी क्यों मिलाई अदिति?’’ सुशीला बोली थीं.

‘‘अरे मम्मी, अभी पापाजी का सबकुछ नियंत्रण में है, बिलकुल फिट हैं. काफी वक्त से कोई दर्द भी उन्हें दोबारा नहीं हुआ. बैलेंस के लिए सबकुछ थोड़ाथोड़ा खाना सही है. लाल और हरीमिर्च भी तो आप मानती नहीं, बहुत सारी खाती रही हैं खाने में ऐक्स्ट्रा नमक के साथ, वह क्या है? खाने के बाद एक चम्मच मलाईचीनी, रबड़ीचीनी या मक्खनचीनी के बिना आप का पेट साफ नहीं होता, वह क्या है? जबकि डाक्टर की रिपोर्ट है आप के पास. आप को सब मना है. बीपी भी है और आप को हार्ट प्रौब्लम भी. अच्छा है कि आप मेरे पास हैं, सब बंद है.’’

‘‘अरे तू हमारी कहां ले बैठी, वह तो 4-5 साल पहले की बात है. मुंह बंद कर, चुपचाप अपना नाश्ता कर,’’ सुशीला ने आंखें नचाते हुए अदिति को कुछ ऐसे डांटा कि सभी मुसकरा उठे.

ब्रेकफास्ट के बाद, तरुण और अदिति स्टोर जा कर महीनेभर का कुछ राशन और हफ्तेभर की सब्जी व फल ले आए. सुशीला डायनिंग टेबल पर फैले विविध सामानों को किचन में ले जा कर सहेजती रत्ना को बड़े गौर से देख रही थीं. रत्ना दोबारा लंच बनाने आ चुकी थी.

सुशीला की तेज नजरें सप्ताह बाद ही तेजी से खत्म हो रहे सामनों का लेखाजोखा किए जा रही थीं. खास चीनी, मक्खनमलाई, देशी घी, चाय, कौफी, मिठाई, बिस्कुट्स, नमकीन की खपत पर उस का शक 15 दिनों के भीतर यकीन में बदलने लगा.

एक दिन रंगेहाथ पकड़ेंगे रत्ना महारानी को. अदिति तो उस के खिलाफ सुनने वाली नहीं, तरुण को झमेले में पड़ना नहीं, भाभीजी को तो धर्मकर्म से फुरसत नहीं और भाईसाहब के तो कहने ही क्या. वे कहते हैं, ‘रत्ना के सिवा कौन ऐसा करेगा, वह काम समझ चुकी है, उस के बिना घर कैसे चलेगा, इसलिए उसे बरदाश्त तो करना ही होगा, कोई चारा नहीं. नजरअंदाज करें, बस.’

यह भी कोई बात हुई भला? बच्चों को पकड़ती हूं अपने साथ इस चोर को धरपकड़ने के मिशन में. अगले हफ्ते से ही बच्चों की गरमी की छुट्टियां शुरू होने वाली हैं. वे चोरसिपाही के खेल में खुशीखुशी साथ देंगे. तब तक हम अकेले ही कोशिश करते हैं, सुशीला ने दिमाग दौड़ाया.

रत्ना दिन में 3 बार काम करने आती थी. सुबह सफाई करती, बरतन मांजती और फिर नाश्ता बनाती. फिर 12 बजे आ कर लंच बनाती. और फिर शाम को आ कर बरतन साफ करती. शाम का चायनाश्ता, डिनर बना जाती. रत्ना के आने से पहले सुशीला तैयार हो जाती और उस के आते ही दमसाधे उस पर निगाह रखने में जुट जाती.

हूं, सही पकड़े हैं, जाते समय तो बड़ा पल्ला झाड़ कर दिखा जाती है कि देख लो, जा रहे हैं, कुछ भी नहीं ले जा रहे, पर असल में वह अपना डब्बाथैला बाहर ऊपर जंगले में छिपा जाती है. काम करते समय मौका मिलते ही इधर से उधर कुछ उसी में सरका जाती है. सुशीला ने जाते वक्त उसे थैलाडब्बा जंगले से उठाते देख लिया था. कल चैक करेंगे, थैले में क्या लाती है और क्या ले जाती है,’ वह स्फुट स्वरों में बुदबुदा रही थी.

दूसरे दिन रत्ना जैसे ही आई, सुशीला मौका पाते ही बाहर हो ली. जंगले पर हाथ डाला और सामान उतार कर चैक करने लगी.

‘यह तो पहले ही इतना भरा है. दूध, कुछ आलूबैगन, 2-4 केले, आटा, थोड़ी चीनी उस ने फटाफट सामान का थैला फिर से ऊपर रख दिया और अंदर हो ली. पिछले घर से लाई होगी, आज ले जाए तो सही,’ सुशीला सोच रही थीं. रत्ना झाड़ू ले कर बाहर निकल रही थी, उस से टकरातेटकराते बची.

‘‘क्या है, थोड़ा देख कर चला कर, कोई घर का बाहर भी आ सकता है,’’ कह कर सुशीला अर्थपूर्ण ढंग से मुसकराई, जैसे अब तो जल्द ही उस की करनी पकड़ी जाने वाली है.

‘‘जी अम्माजी,’’ वह अचकचा गई, उस अर्थपूर्ण मुसकराहट का अर्थ न समझते हुए वह मन ही मन बुदबुदा उठी, ‘अजीब ही हैं अम्माजी.’

तेजप्रकाश आधा कटोरा मलाई खा कर प्रसन्न थे कि चलो, अच्छा है कि बहनजी का रत्ना पर शक यों ही बना रहे. जब सब सो रहे होते, वे अपनी जिह्वा और उदर वर्जित मनपसंद चीजों से तृप्त कर लिया करते. हालांकि, सुशीला की जासूसी से उन के इस क्रियाकलाप में थोड़ी खलल पैदा हो रही थी.

‘गनीमत यही हुई कि मैं ने सुशीला बहनजी और बच्चों की प्लानिंग सुन ली,’ तेजप्रकाश सतर्क हो मन ही मन मुसकरा रहे थे.

‘बच्चों की छुट्टियां क्या शुरू हुईं, जासूसी और तगड़ी हो गई. मक्खनमलाई, मीठा खाना दुश्वार हो गया. अभी तक तो एक ही से उन्हें सावधान रहना था, अब तीनतीन से,’ तेजप्रकाश के दिमाग के घोड़े दौड़ने लगे. सोचा, क्यों न बच्चों को अपनी ओर कर लिया जाए. और जो सब से छिपा कर सुशीला बहनजी अपने बैग से लालमिर्च का अचार और हरीमिर्च, नमक, खटाई अलग से खाती हैं, उस तरफ लगा देता हूं. अभी तक तो मैं ने नजरअंदाज किया था पर ये तो रत्नारत्ना करतेकरते अब मुझ तक ही न पहुंच जाएं, इसलिए जरूरी है कि मैं बच्चा पार्टी को इन की ओर ही मोड़ दूं. यह ठीक है. यह सब सोचते हुए तेजप्रकाश के चेहरे पर मुसकान फैल गई. वे शरारती योजना बुनने में लग गए.

‘‘बंटू, मिंकू इधर आओ,’’ तेज प्रकाश ने उन्हें धीरे से बुलाया. सुशीला कमरे में बैठी थीं. तारा के पैरों की मालिश वाली मालिश कर रही थी. तरुण, अदिति और रत्ना जा चुके थे.

‘‘मामा वाली चौकलेट खानी है?’’ बच्चों ने उतावले हो कर हां में सिर हिलाया.

‘‘यह जो नानी का बैग देख रहे हो, जिस में नंबर वाला लौक पड़ा है. इस में से नानी रोज निकाल कर कुछकुछ खाती रहती हैं, मुझे तो लगता है बहुत सारी इंपौर्टेड चौकलेट अभी भी हैं, जो आते ही इन्होंने तुम्हें दी थीं. तुम्हारे मामा ने तुम लोगों के लिए दी थीं इन्हें. पहले खाते हुए पकड़ लेना, फिर मांगना.’’ वे जानते थे कि बहनजी को स्वयं कहना कतई श्रेयस्कर नहीं होगा, अतएव खुद नहीं कहा.

‘‘सही में दादू, पर उन्होंने तो कहा था खत्म हो गई हैं,’’ दोनों एकसाथ बोले.

‘‘वही तो पकड़ना है. अब से जरा आतेजाते नजर रखना.’’

‘‘ओए मिंकू, मजा आएगा. अब तो दोदो मिशन हो गए. अपनीअपनी टौयगन निकाल लेते हैं, चल…’’ दोनों उछलतेकूदते भाग जाते हैं. तेजप्रकाश मुसकराने लगे.

सुबह से दोनों बच्चों की धमाचौकड़ी होने लगती. दोनों छिपछिप कर जासूस बने फिरते. सुशीला अलग छानबीन में हैरानपरेशान थीं. आखिर मक्खनमलाई डब्बे से, कनस्तर से चीनी, मिठाई फ्रिज से, सब कैसे गायब हुए जा रहे हैं. रत्ना है बड़ी चालाक चोरनी.

रत्ना पर बेमतलब शक किए जाने से, उस की खुंदस बढ़ती ही जा रही थी. वह चिढ़ीचिढ़ी सी रहती. लगता, बस, किसी दिन ही फट पड़ेगी कि काम छोड़ कर जा रही है. कई बार अम्माजी डब्बे खोलखोल कर दिखा चुकी हैं कि ताजी निकाली सुबह की कटोराभर मलाई आधी से ज्यादा साफ, मक्खन पिछले हफ्ते आया था, कहां गया? परसों ही  2 पैकेट मिठाई के रखे थे, कहां गए? महीनेभर की चीनी 15 दिनों में ही खत्म. कितनी जरा सी बची है? मैं तो नहीं खाती, ले जाती नहीं, पर सही में ये चीजें जाती कहां हैं? वह भी सोचने लगी. कैसे पकड़ूं असली चोर, और रोजरोज के शक से जान छूटे. वह भी संदिग्ध नजरों से हर सदस्य को टटोलने लगी.

उस दिन रत्ना घर की चाबी प्लेटफौर्म पर छोड़ आई, आधे रास्ते जा कर लौटी तो तेजप्रकाश को फ्रिज में मुंह डाले पाया. वे मजे से एक, फिर दो, फिर तीन गपागप मिठाइयां उड़ाए जा रहे थे. उस का मुंह खुला रह गया. वह एक ओट में छिप कर देखने लगी. जब वह मिठाइयों से तृप्त हुए तो मलाई के कटोरे को जल्दीजल्दी आधा साफ कर, बाकी पहले की इकट्ठी मलाई के डब्बे में उलट कर अगलबगल देखने लगे. मूंछों पर लगी मलाई को देख कर रत्ना को हंसी आने लगी. जिसे एक झटके में उन्होंने हाथों से साफ करना चाहा.

‘‘सही पकड़े हैं…बाबूजी आप हैं और अम्माजी तो हमें…’’ वह हैरान हो कर मुसकराई.

तेजप्रकाश दयनीय स्थिति में हो गए, चोरी पकड़ी गई. याचना करने लगे थे. ‘‘सुन, बताना मत री किसी को. सब की डांट मिलेगी सो अलग, चैन से कभी खाने को नहीं मिलेगा. यदि बीमार होऊं तो परहेज भी कर लूं, पहले से क्या, इतनी सी बात किसी के पल्ले नहीं पड़ती,’’ उन्होंने बड़ी आजिजी से कहा.

रत्ना उन की हालत देख कर हंसने लगी, ‘‘ठीक है, नहीं कहूंगी बाबूजी, पर एक शर्त है, अम्माजी को तो आप समझाओ कैसे भी कर के, हर वक्त वे मेरे पीछे पड़ी रहती हैं.’’

‘‘तू चिंता मत कर उस का बंदोबस्त हो जाएगा.’’

उन के दिमाग में शरारती योजना घूम ही रही थी पर अब बच्चों को नहीं शामिल कर सकते, बच्चे तो सब को ही बता देंगे. फिर मैं सुशीला बहन को ब्लैकमेल कैसे कर पाऊंगा कि रत्ना को इन से बचा सकूं और रत्ना से अपने को. वरना तरुण, अदिति, तारा सब तक मेरी बात पहुंच गई तो मेरा जीना मुहाल हो जाएगा. सिर्फ परहेजी खाना, उफ्फ… क्यों बढि़याबढि़या मिठाईरबड़ी न खाऊं, मरे हुए सा सौ साल जियूं इसलिए… तो जीने का फायदा क्या?’

मनपसंद चीजों का दिमाग में खुला इंसायक्लोपीडिया देशी घी के बेसन के लड्डू, चमचम, रसमलाई… उन्हें बेचैन किए जा रहा था.

‘कुछ भी हो, सुशीला बहन को मुझे जल्दी, अकेले ही रंगेहाथ पकड़ना होगा. वरना रत्ना, बहनजी से तंग आ कर सब को मेरा सच बता देगी और मैं सूक्ष्म फलाहारी, परहेजी बाबा बन कर कहीं का नहीं रहूंगा.’ दिन में खाने के बाद एक घंटे बच्चों का सोने का टाइम और रात के खाने के बाद 9 बजे के बाद का समय, जब सुशीला बहन सब से नजरें बचा, अपना मिर्चखटाईर् का शौक पूरा करती होंगी क्योंकि नाश्ता भले ही साथ कर लेती हैं पर आदत का बहाना बता कर रात के खाने का अपना अलग ही टाइम बना रखा है, तभी पकड़ता हूं. अपने को बचाने का यही एक चारा है,’ तेजप्रकाश दिमाग की धार तेज किए जा रहे थे.

आखिरकार दूसरे दिन ही सुशीला जैसे ही अपना खाना परोस कर कमरे में ले गईं, तेजप्रकाश दबेपांव उन के पीछे हो लिए. सुशीला ने पास पड़े स्टूल पर अपना खाना, पानी रखा, दरवाजा भेड़ा और परदा खींच कर तसल्ली से बैग का लौक खोल कर पसंदीदा लालमिर्च का अचार बड़े प्रेम से निकाला और साथ में चटपटी पकी इमली भी. प्लेट में नमक के ऊपर सजी बड़ीबड़ी 2 हरीमिर्चें देख परदे के पीछे खड़े तेजप्रकाश के मुंह से सीसी निकल रही थी, उस पर से यह और कि कैसे खा पाती हैं ये सब.’

सुशीला के खाना शुरू करते ही तेजप्रकाश सामने आ गए, ‘‘सही पकड़े हैं बहनजी, इतना सारा मिर्चखटाई. अदिति सही कहती है इतना मना है आप को पर चुपकेचुपके… बहुत गलत बात है.’’ वे उन का तकियाकलाम बोल कर उन्हीं के अंदाज में आंखें नचा रहे थे. सुशीला उन्हें सामने पा घबरा कर कातर हो उठीं. लिहाजन, तेजप्रकाश उन के कमरे में कभी वैसे आते न थे.

‘‘अअआप भाईसाहब, यहां, कैसे, बब…बैठिए. प्लीज, अदिति को कुछ मत कहिएगा,’’ वे खिसियाई सी बोलीं.

‘‘सही तो नहीं, पर इस उम्र में मन का खाएगा नहीं, तो आदमी करे क्या?’’

इस बात पर सुशीला थोड़ी हैरान हुईं, फिर सहज हो कर मुसकराती हुई बोलीं, ‘‘आप भी ऐसा ही मानते हैं. मैं तो घबरा ही गई थी. आप प्लीज, बताना नहीं किसी को.’’

‘‘ठीक है, नहीं बोलूंगा, पर एक शर्त है. आप भी मेरे बारे में नहीं कहेंगी किसी से.’’

‘‘पर क्या?’’ वे सोच में पड़ गईं, ऐसा क्या है जो…

‘‘दरअसल, वह जो आप मलाई, मिठाई, चाय, चीनी सब के गायब होने के पीछे रत्ना को कारण समझती हैं, वह रत्ना नहीं, बल्कि मैं हूं.’’

‘‘क्या?’’ सुशीला का मुंह खुला रह गया. फिर वे मुंह दबा कर हंसने लगीं.

‘‘तारा, तरुण, अदिति सब मेरी जान खा जाएंगे, प्लीज.’’

‘‘फिर ठीक.’’ वे चटखारे ले कर अपना खाना खाने लगीं.

‘‘आप खाओगे?’’

‘‘नहीं बहनजी, आप मजे लो, मैं रसोई में जा कर अपनी तलब पूरी करता हूं, खौला कर स्ट्रौंग चाय बनाता हूं.’’

‘‘इस समय?’’

‘‘आप पियोगी, बहुत बढि़या पकाने वाली मसालेदार मीठी कड़क?’’ उन के चेहरे पर राहत की मुसकान थी.

‘‘अरे नहीं, आप ही मजे लो,’’ कहती हुई उन्होंने लालमिर्च, अचार मुंह में भर लिया और हंसने लगीं.

‘‘यह भी खूब रही. और हां, बच्चों को जो चोर पकड़ने के लिए लगाया है, मना कर देना.’’

मुसकराते हुए तेजप्रकाश राहत से रसोई की ओर बढ़ गए. सोचते जा रहे थे कि ‘मैं भी कल बच्चों को कोई कहानी बना कर बहनजी को पकड़ने से मना कर दूंगा.’

इधर आंखें बंद किए बंटू और मिंकू दादू की स्टोरी से आज सो नहीं पाए थे. दादू उन्हें सोया जान कर अपने रूम में चले गए. काफी देर तक यों ही पड़े रहे. खट से हलकी सी आवाज क्या हुई, आंखें खोल कर दोनों ने एकदूसरे को कोहनी मारी.

‘‘उठ न, नींद नहीं आ रही. कोई है, लगता है.’’

‘‘हां, दादू की कहानी आज बहुत शौर्ट थी.’’

‘‘दादू तो सोने गए, अब क्या करें?’’

‘‘सब सो गए हैं लगता है, रसोई में छोटी लाइट जल रही है. चल चोर को पकड़ते हैं.’’ दोनों पलंग से उतर कर अपनीअपनी टौयगन थाम लीं और सधे कदमों से कहतेफुसफुसाते हुए नन्हे जासूस मिशन पर चल पड़े.

‘‘तू इधर से जा बंटू, मैं उधर से, अकेला डरेगा तो नहीं?’’

‘‘बिलकुल भी नहीं.’’

‘‘अच्छा, तो यह मम्मी का स्टौल पकड़, अगर चोरी करते कोई दिखे, पीठ पर गन लगाना और झट से स्टौल में फंसा कर चिल्लाना. सही पकड़े हैं नानी के जैसे. खूब मजा आएगा.’’

‘‘रात के एक बज रहे थे. ताली मार कर दोनों अलगअलग दिशाओं में चल पड़े.

तेजप्रकाश और सुशीला स्वाद व खुशबू का पूरा मजा ले भी न पाए कि बच्चों ने अलगअलग पर लगभग एकसाथ उन्हें धर पकड़ा और खुशी से चिल्लाए, ‘‘सही पकड़े हैं दादू…, पापा…, मम्मी…सही पकड़े हैं नानी…, मम्मी… पापा…, सब जल्दी आओ.’’

घबराए से तेजप्रकाश किचन में मलाई की चोरी बयान करती अपनी मूंछों के साथ खौलती मसालेदार कड़क चाय को देख रहे थे तो कभी सामने गुस्से में खड़े तरुण को और सुशीला अपने खुले हुए बैग से झांकती लालमिर्च, अचार और मसालेदार इमली की खुली शीशियों को, तो कभी आगबबूला हुई नजरों से उन्हें देखती अदिति को देख कर नजरें चुरा रही थीं.

‘‘अदिति, देखो अपने लाड़ले पापाजी क्या कर रहे हैं, बड़ा विश्वास है न तुम्हें इन पर?’’

‘‘शांत हो जाओ तरु, आगे से ऐसा नहीं होगा.’’

‘‘और तुम अपनी चहेती मम्मीजी को देखो, डाक्टर ने सख्त मना किया है पर मानना ही नहीं, बच्ची बनी हुई हैं, मुझ से छिपा कर रखा था, छिपा कर, देखो ये…’’ वह एक हाथ में शीशी दूसरे से मम्मीजी को थामे रसोई में आ गई.

‘‘अदिति, सुन तो, अब ऐसा नहीं होगा.’’

तेजप्रकाश और सुशीला के हाथ बरबस अपनेअपने कानों तक चले गए, ‘‘देखो, इस बार हम सही पकड़े हैं… पर अपनेअपने कान…’’ सुशीला ने गोलगोल आंखें नचा कर कुछ यों कहा कि तरुण, अदिति की हंसी छूट गई.

‘‘कोई हमें भी तो बताए क्या हुआ,’’ दादी तारा की आवाज सुन बंटू, मिंकू भागे कि उन्हें कौन पहले बताएगा कि आज वे कैसे दादू, नानी की चोरी सही पकड़े हैं. Social Story in Hindi

Social Story in Hindi : पट्टेदार ननुआ – पटवारी ने कैसे बदल दी ननुआ और रनिया की जिंदगी?

Social Story in Hindi : ननुआ और रनिया रामपुरा गांव में भीख मांग कर जिंदगी गुजारते थे. उन की दो वक्त की रोटी का बंदोबस्त भी नहीं हो पाता था. ननुआ के पास हरिजन बस्ती में एक मड़ैया थी. मड़ैया एक कमरे की थी. उस में ही खाना पकाना और उस में ही सोना.

मड़ैया से लगे बरामदे में पत्तों और टहनियों का एक छप्पर था, जिस में वे उठनाबैठना करते थे. तरक्की ने ननुआ की मड़ैया तक पैर नहीं पसारे थे, पर पास में सरकारी नल से रनिया को पानी भरने की सहूलियत हो गई थी. गांव के कुएं, बावली या तो सूख चुके थे या उन में कूड़ाकचरा जमा हो गया था.

एक समय ननुआ के पिता के पास 2 बीघे का खेत हुआ करता था, पर उस के पिता ने उसे बेच कर ननुआ की जान बचाई थी. तब ननुआ को एक अजीबोगरीब बीमारी ने ऐसा जकड़ा था कि जिला, शहर में निजी अस्पतालों व डाक्टरों ने मिल कर उस के पिता को दिवालिया कर दिया था, पर मरते समय ननुआ के पिता खुश थे कि वे इस दुनिया में अपने वंश का नाम रखने के लिए ननुआ को छोड़ रहे थे, चाहे उसे भिखारी ही बना कर.

ननुआ की पत्नी रनिया उस पर लट्टू रहती थी. वह कहती थी कि ननुआ ने उसे क्याकुछ नहीं दिया? जवानी का मजा, औलाद का सुख और हर समय साथ रहना. जैसेतैसे कलुआ तो पल ही रहा है.

गांव में भीख मांगने का पेशा पूरी तरह भिखारी जैसा नहीं होता है, क्योंकि न तो गांव में अनेक भीख मांगने वाले होते हैं और न ही बहुत लोग भीख देने वाले. गांव में भीख में जो मिलता है, उस से पेटपूजा हो जाती है, यानी  गेहूं, चावल, आटा और खेत से ताजी सब्जियां. कभीकभी बासी खाना भी मिल जाता है.

त्योहारों पर तो मांगने वालों की चांदी हो जाती है, क्योंकि दान देने वाले उन्हें खुद ढूंढ़ने जाते हैं. गांव का भिखारी महीने में कम से कम 10 से 12 दिन तक दूसरों के खेतखलिहानों में काम करता है. गांव के जमींदार की बेगारी भी. कुछ भी नहीं मिला, तो वह पशुओं को चराने के लिए ले जाता है, जबकि उस की बीवी बड़े लोगों के घरों में चौकाबरतन, पशुघर की सफाई या अन्न भंडार की साफसफाई का काम करती है. आजकल घरों के सामने बहती नालियों की सफाई का काम भी कभीकभी मिल जाता है. ननुआ व रनिया का शरीर सुडौल था. उन्हें काम से फुरसत कहां? दिनभर या तो भीख मांगना या काम की तलाश में निकल जाना.

गांव में सभी लोग उन दोनों के साथ अच्छे बरताव के चलते उन से हमदर्दी रखते थे. सब कहते, ‘काश, ननुआ को अपना बेचा हुआ 2 बीघे का खेत वापस मिल जाए, तो उसे भीख मांगने का घटिया काम न करना पड़े.’

गांव में एक चतुर सेठ था, जो गांव वालों को उचित सलाह दे कर उन की समस्या का समाधान करता था. वह गांव वालों के बारबार कहने पर ननुआ की समस्या का समाधान करने की उधेड़बुन में लग गया.

इस बीच रामपुरा आते समय पटवारी मोटरसाइकिल समेत गड्ढे में गिर गया. उसे गंभीर हालत में जिला अस्पताल ले जाया गया. वहां से उसे तुरंत प्रदेश की राजधानी के सब से बड़े सरकारी अस्पताल में भरती कराया गया. पटवारी की रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई थी और डाक्टरों ने उसे 6 महीने तक बिस्तर पर आराम करने की सलाह दी थी. पटवारी की पत्नी मास्टरनी थी और घर में और कोई नहीं था.

पटवारी की पत्नी के पास घर के काम निबटाने का समय नहीं था और न ही उसे घर के काम में दिलचस्पी थी. फिर क्या था. सेठ को हल मिल गया. उस की सलाह पर गांव की ओर से रनिया को पटवारी के यहां बेगारी के लिए भेज दिया गया. वह चोरीछिपे ननुआ को भी पटवारी के घर से बचाखुचा खाना देती रही. अब तो दोनों के मजे हो रहे थे.

पटवारी रनिया की सेवा से बहुत खुश हुआ. उस ने एक दिन ननुआ को बुला कर पूछा, ‘‘मैं तुम्हारी औरत की सेवा से खुश हूं. मैं नहीं जानता था कि घर का काम इतनी अच्छी तरह से हो सकता है. मैं तुम्हारे लिए कुछ करना चाहता हूं. कहो, मैं तुम्हारे लिए क्या करूं?’’

सेठ के सिखाए ननुआ ने जवाब दिया, ‘‘साहब, हम तो भटकभटक कर अपना पेट पालते हैं. आप के यहां आने पर रनिया कम से कम छत के नीचे तो काम कर रही है, वरना हम तो आसमान तले रहते हैं. हम इसी बात से खुश हैं कि आप के यहां रनिया को काम करने का मौका मिला.’’

‘‘फिर भी तुम कुछ तो मांगो?’’

‘‘साहब, आप तो जानते ही हैं कि गांव के लोगों को अपनी जमीन सब से ज्यादा प्यारी होती है. पहले मेरे पिता के पास 2 बीघा जमीन थी, जो मेरी बीमारी में चली गई. अगर मुझे 2 बीघा जमीन मिल जाए, तो मैं आप का जिंदगीभर एहसान नहीं भूलूंगा.’’

‘‘तुम्हें तुम्हारी जमीन जरूर मिलेगी. तुम केवल मेरे ठीक होने का इंतजार करो,’’ पटवारी ने ननुआ को भरोसा दिलाया.

पटवारी ने बिस्तर पर पड़ेपड़े गांव की खतौनी को ध्यान से देखा, तो उस ने पाया कि ननुआ के पिता के नाम पर अभी भी वही 2 बीघा जमीन चढ़ी हुई है, क्योंकि खरीदार ने उसे अभी तक अपने नाम पर नहीं चढ़वाया था. पहले यह जमीन उस खरीदार के नाम पर चढ़ेगी, तभी सरकारी दस्तावेज में ननुआ सरकारी जमीन पाने के काबिल होगा. फिर सरकारी जमीन ननुआ के लिए ठीक करनी पड़ेगी. उस के बाद सरपंच से लिखवाना होगा. फिर ननुआ को नियमानुसार जमीन देनी होगी, जो एक लंबा रास्ता है.

पटवारी जल्दी ठीक हो गया. अपने इलाज में उस ने पानी की तरह पैसा बहाया. वह रनिया की सेवा व मेहनत को न भूल सका.

पूरी तरह ठीक होने के बाद पटवारी ने दफ्तर जाना शुरू किया व ननुआ को जमीन देने की प्रक्रिया शुरू की. बाधा देने वाले बाबुओं, पंच व अफसरों को पटवारी ने चेतावनी दी, ‘‘आप ने अगर यह निजी काम रोका, तो मैं आप के सभी कामों को रोक दूंगा. इन्हीं लोगों ने मेरी जान बचाई है.’’

पटवारी की इस धमकी से सभी चौंक गए. किसी ने भी पटवारी के काम में विरोध नहीं किया. नतीजतन, पटवारी ने ननुआ के लिए जमीन का पट्टा ठीक किया. आखिर में बड़े साहब के दस्तखत के बाद ही राज्यपाल द्वारा ननुआ को 2 बीघा जमीन का पट्टा दे दिया गया. नए सरकारी हुक्म के मुताबिक पट्टे में रनिया का नाम भी लिख दिया गया.

गांव वाले ननुआ को ले कर सेठ के पास गए. ननुआ ने उन के पैर छुए. सेठ ने कहा, ‘‘बेटा, अभी तो तुम्हारा सिर्फ आधा काम हुआ है. ऐसे तो गांव में कई लोगों के पास परती जमीनों के पट्टे हैं, पर उन के पास उन जमीनों के कब्जे नहीं हैं. बिना कब्जे की जमीन वैसी ही है, जैसे बिना गौने की बहू.

‘‘पटवारी सरकार का ऐसा आखिरी पुरजा है, जो सरकारी जमीनों का कब्जा दिला सकता है. वह जमींदारों की जमीनें सरकार में जाने के बाद भी इन सरकारी जमीनों को उन से ही जुतवा कर पैदावार में हर साल अंश लेता है.

‘‘पटवारी के पास सभी जमीन मालिकों व जमींदारों की काली करतूतों का पूरा लेखाजोखा रहता है. ऊपर के अफसर या तो दूसरे सरकारी कामों में लगे रहते हैं या पटवारी सुविधा शुल्क भेज कर उन्हें अपने पक्ष में रखता है.

‘‘पटवारी ही आज गांव का जमींदार है. और वह तुम्हारी मुट्ठी में है. समस्या हो, तो रनिया के साथ उस के पैर पड़ने चले  जाओ.’’ ननुआ को गांव वालों के सामने जमीन का कब्जा मिल गया. गांव में खुशी की लहर दौड़ गई.

पटवारी ने घोषणा की, ‘‘इस जमीन को और नहीं बेचा जा सकता है.’’ अब ननुआ के लिए पटवारी ही सबकुछ था. उस का 2 बीघा जमीन पाने का सपना पूरा हो चुका था.

ननुआ व रनिया ने मिल कर उस बंजर जमीन को अपने खूनपसीने से सींच कर उपजाऊ बना लिया, फिर पटवारी की मदद से उसे उस ऊबड़खाबड़ जमीन को बराबर करने के लिए सरकारी मदद मिल गई.

पटवारी ने स्थानीय पंचायत से मिल कर ननुआ के लिए इंदिरा आवास योजना के तहत घर बनाने के लिए सरकारी मदद भी मुहैया करा दी.

ननुआ व रनिया अपने 2 बीघा खेत में गेहूं, बाजरा, मक्का के साथसाथ दालें, तिलहन और सब्जियां भी उगाने लगे. किनारेकिनारे कुछ फलों के पेड़ भी लगा लिए. मेंड़ पर 10-12 सागौन के पेड़ लगा दिए. उन का बेटा कलुआ भी पढ़लिख गया. उन्होंने अपने घर में पटवारी की तसवीर लगाई और सोचा कि कलुआ भी पढ़लिख कर पटवारी बने. Social Story in Hindi

Social Interest : फरवरी 2026 के फर्स्ट इश्यू में “आप के पत्र व अनुभव”

Social Interest :

बच्चों को डांटें नहीं, प्यार से समझाएं

जनवरी (प्रथम) अंक में प्रकाशित लेख ‘मातापिता की अनदेखी और नशे में डूबते बच्चे’ बेहद सटीक व सारगर्भित लगा. वर्तमान समय में नशे का कारोबार दिन दूनी रात चौगुनी गति से समाज में फैल रहा है. नशे की गिरफ्त में ज्यादातर युवावर्ग आ रहा है, जो उन्हें अंदर ही अंदर खोखला कर रहा है. इस का मुख्य कारण अभिभावकों का बच्चों के प्रति जागरूक न होना है. मातापिता को बच्चे की हर संदिग्ध गतिविधि पर सूक्ष्म रूप से नजर रखनी चाहिए. यदि संभव हो तो जरूरत की चीजें खुद खरीद कर दें. हाथ में नकद धनराशि देने से बचें. बच्चों को डांट कर नहीं, बल्कि प्यारदुलार से नशे के दुष्प्रभाव के बारे में बताएं.

हमेशा की तरह सभी स्थायी स्तंभ, जैसे आप के पत्र, सरित प्रवाह, श्रीमतीजी, पाठकों की समस्याएं, इन्हें आजमाइए और चंचल छाया दिल को छू गए.

उच्च गुणवत्ता से परिपूर्ण अंक प्रकाशित करने के लिए संपादकीय टीम का हृदय की गहराइयों से धन्यवाद व आभार. – विमल वर्मा

सराहनीय अंक

जनवरी (प्रथम) अंक में प्रकाशित सभी कहानियां एक से बढ़ कर एक थीं जबकि एकदो लेख को छोड़ कर अन्य लेख साधारण लगे. स्थायी स्तंभ इन्हें आजमाइए, आप के पत्र, श्रीमतीजी, पाठकों की समस्याएं, चंचल छाया आदि ने भी मेरा भरपूर मनोरंजन किया. सच में सरिता पत्रिका में जो कुछ भी छपता है वह सराहनीय होता है. – हर ज्ञान सिंह सुथार हमसफर

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अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर लेख जरूरी

सरिता से मुझे एक शिकायत है. पहले हर अंक के संपादकीय में लगभग सभी महत्त्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं पर बहुत सटीक टिप्पणियां व सुझाव भी हुआ करते थे तथा अंदर के पृष्ठों में सामाजिक, धार्मिक और राजनीतिक विषयों पर लेख होते थे पर अब ये सब उतना नहीं होता. अंदर के पृष्ठों में एकाध लेखक ही कभीकभी इन घटनाओं पर छपते हैं पर उन के लेखन में परिपक्वता का अभाव लगता है.

आज के समय में तो लगभग हर हफ्ते कोई न कोई ऐसी ज्वलंत अंतराष्ट्रीय घटना जैसे ट्रंप का वेनेजुएला युद्ध, जलता हुआ ईरान, ग्रीनलैंड संकट और भारत पर टैरिफ आदि ऐसे प्रकरण आजा रहे हैं जिन का पूरी दुनिया पर प्रभाव पड़ना तय लगता है पर इन्हें पाक्षिक रुप से छपने वाली आप की पत्रिका पूरी रेस के साथ कवर नहीं कर पा रही है. चूंकि लगभग 53 वर्षों से आप की पत्रिका का पुराना पाठक होने के नाते मैं आप से अपेक्षा कर सकता हूं कि मेरे जैसे पाठकों की इस अभिरुचि की तरफ आप ध्यान देंगे. – सुनील कुमार चौबे

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बच्चों के मुख से

मेरा 6 वर्षीय बेटा साहिल बहुत हाजिरजवाब है. एक दिन हम सब अपने भाई के लिए लड़की देखने जा रहे थे. सभी बड़े लोगों ने तय किया कि हम लड़की देख कर टहलने का बहाना बना कर घर से बाहर निकलेंगे और तय करेंगे कि रिश्ता पसंद है या नापसंद.

यह बात मेरा बेटा भी सुन रहा था. जब हम सभी लड़की देख चुके थे तब मेरे फूफाजी बोले, ‘‘हम लोग थोड़ा बाहर टहल कर आते हैं.’’ इस पर मेरा बेटा बोल पड़ा, ‘‘ये सब बाहर टहलने नहीं, हां या न तय करने जा रहे हैं.’’

इस पर हम सभी हंसे बिना न रह सके. – अंजू सहगल

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एक दिन मैं ने अपने 3 वर्षीय नाती से पूछा कि वह क्या खाएगा? उस ने कहा कि पनीर का परांठा खाना है. पनीर घर में नहीं था तो मैं ने आलू और बींस की सब्जी मैश कर के परांठा बना दिया.

उस ने वह खाया तो उसे अच्छा लगा. घर जा कर अपनी मां से बोला, ‘‘नानी ने आज ग्रीन पनीर का क्या मस्त परांठा बनाया था. आप भी वैसा ही बना कर दो.’’

बेटी ने फोन पर परांठे का राज पूछा और पता लगने पर कि ग्रीन पनीर क्या था, सब खूब हंसे. – शकुंतला गुप्ता

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मेरी बच्ची तब छोटी थी. वह एक बार कहने लगी, ‘‘पापा, मुझे चौकलेट ले दो, मैं खाऊंगी.’’

मैं ने उसे समझाया कि बेटा, चौकलेट खाने से दांत खराब हो जाते हैं, नहीं खानी चाहिए. वह बोली, ‘‘पापा, मेरे सारे साथी तो चौकलेट खूब खाते हैं.’’ मैं ने कहा कि पागल हैं अगर ऐसा करते हैं.

इस पर वह बोली, ‘‘पापा, मुझे भी चौेकलेट ले दो, कोई बात नहीं, थोड़ी देर के लिए मैं भी पागल बन जाती हूं.’’

उस की यह बात सुन कर हम लोग खूब हंसे और मुझे उसे चौकलेट ले कर देनी ही पड़ी. – दीपक भनोट

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मेरी सहेली के 4 और 7 वर्षीय 2 बेटे हैं. बड़ा वाला बहुत ही सीधा व शांत है जबकि छोटा काफी चंचल है. बड़े वाले की आदत है, हर चीज के लिए पहले न कर देगा लेकिन जब छोटा ले लेगा तब वह भी उसी के लिए रोने लगेगा.

एक दिन किसी चीज के लिए बड़ा रोने लगा, तब मेरी सहेली गुस्से से उसे डांटते हुए बोली, ‘‘तुम्हारी यह आदत बहुत ही गंदी है. पहले न कर देते हो, फिर जब छोटा ले लेता है तो रोते हो.’’

इतने में छोटा बोल पड़ा, ‘‘हां मम्मी, ऐसे ही ये अभी कहते हैं कि मैं शादी नहीं करूंगा, और जब मैं कर लूंगा तब ये कहेंगे कि मैं तो यही दुलहन लूंगा.’’

उस की भोलेपन से कही इस बात पर मेरी सहेली गुस्सा भूल कर हंस पड़ी. – प्रेमदुलारी

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