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शिवराज हैं भाजपा की कमजोर कड़ी

मध्य प्रदेश के विधनसभा चुनाव में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भाजपा की कमजोर कड़ी बन सकते है. उनके साले संजय सिंह ने जब कांग्रेस ज्वाइन कर ली तो शिवराज सिंह चौहान को तगड़ा झटका लगा. परिवार से मिली इस चुनौती ने शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता पर सवालिया निशान लगा दिया है.

मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान मध्य प्रदेश में अपने 15 साल पूरे कर चुके है. 15 सालों में उनकी उपलब्ध्यिं पर अकेले व्यापंम घोटाला चुनौती बन गया. मध्य प्रदेश विधनसभा चुनाव के शुरूआती समय में यह माना जा रहा था कि भाजपा अलग नेता के साथ विधनसभा चुनाव लड़ेगी. भाजपा के पास विधनसभा चुनाव से पहले ऐसा कोई नेता नहीं था जिसे वह मुख्यमंत्री का प्रत्याशी बनाकर उतार सके.

ऐसे में भाजपा ने फैसला किया कि मध्य प्रदेश विधनसभा चुनाव शिवराज सिंह चौहान के नाम पर लडेगी. जैसे जैसे भाजपा चुनाव प्रचार को धार दे रही वैसे वैसे उसे लग रहा है कि लोगों में शिवराज सिंह चौहान की लोकप्रियता घटी है. उत्तर प्रदेश से लगे मध्य प्रदेश के विधनसभा क्षेत्रों में शिवराज सिंह चौहान से अधिक लोकप्रिय उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रा योगी आदित्यनाथ है. मध्य प्रदेश विधान चुनावों में संगठन की तरफ से प्रचार अभियान देखने वाले एक संगठन मंत्री कहते हैं, ‘शिवराज सिंह चौहान के 15 साल पार्टी पर भारी पड रहे है. ऐसे में पार्टी की तरफ से प्रचार अभियान में अंदरखाने यह बात समझाई जा रही है कि वोट शिवराज के नाम पर नहीं प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर मांगे जायें.’

भाजपा के उत्तर प्रदेश के रहने वाले यह संगठन मंत्री कहते है ‘हमें अपनी कमजोरी पता है पर इस बात को हम कह नहीं सकते क्योंकि अब शिवराज को आगे रखने का फैसला हो चुका है. हमें अपने प्रचार अभियान में इस बात का पता भी चला है कि लोग भ्रष्टाचार की बात पर व्यांपम घोटाले का जिक्र कर देते हैं. जिससे हमारे चुनाव प्रचार की धार कुंद हो रही है. यह बात जरूर है कि शिवराज सिंह चौहान सरल स्वभाव के नाते लोकप्रिय हैं. विरोधियों के साथ ही साथ भाजपा के कुछ स्थानीय नेता भी अब शिवराज का विरोध कर रहे है.’

असल में भाजपा को प्रधनमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहली जैसी लोकप्रियता मध्य प्रदेश के विधनसभा चुनाव में दिखाई नहीं पड़ रही है. मुख्यमंत्री के रूप में शिवराज सिंह चौहान भी अब स्टार प्रचारक नहीं रहे. देश युवा राजनीति की चर्चा कर रहा है भाजपा के पास कमलनाथ जैसा अनुभवी और ज्योतिरादित्य जैसा युवा नेता नहीं है. जो बेहतर तालमेल के साथ चुनाव प्रचार कर रहे हैं. भाजपा में शिवराज सिंह पुराना चेहरा है. उनके नाम और काम दोनो का आकर्षण जनता पर नहीं चल रहा है. मध्य प्रदेश के दूसरे भाजपा नेता भी शिवराज के साथ तालमेल नहीं बना पा रहे है.

भाजपा ने कांग्रेस के प्रचार अभियान को कुंद करने के लिये ज्योतिरादित्य सिंधियाऔर दिग्विजय सिंह की अनबन को सोशल मीडिया पर प्रचारित करना शुरू किया तो कांग्रेस ने शिवराज सिंह चौहान के साले संजय सिंह को कांग्रेस में शामिल कर अपनी आक्रामक रणनीति का परिचय दे दिया. अब शिवराज सिंह चौहान खेमे में इसका जवाब तलाश किया जा रहा है. भाजपा को खुद महसूस हो रहा है कि शिवराज का बासी पड़ता चेहरा भाजपा को भारी पड़ सकता है.

विकास का मुद्दा खोती धर्म की राजनीति

भाजपा की साम्प्रदायिक राजनीति के खिलाफ राजनीतिक दल भले ही सामाजिक मुददों पर चर्चा नहीं कर रहे पर अभी भी कुछ सामाजिक दल कमजोर ही सही पर अपनी आवाज को बुलंद कर रहे हैं. इनको मीडिया का बडा हिस्सा भी हाशिये पर डाल चुका है. इसके बाद भी यह अपनी बात कहने में पीछे नहीं हैं. ऐसे सामाजिक लोगों ने केन्द्र और प्रदेश सरकार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की है.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सामाजिक-राजनीतिक संगठनों के नेताओं ने गांधी भवन में एक चिंतन बैठक की. इसमें बलिया, झांसी, आजमगढ़, बेल्थरा, सिद्धार्थनगर, मुजफ्फरनगर, इलाहाबाद, बलरामपुर, बहराइच, बाराबंकी, फैजाबाद, अंबेडकरनगर, बस्ती, देवरिया, फतेहपुर, जौनपुर, कासंगज, संतकबीरनगर, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, मुबारकपुर, सहारनपुर, शाहजहांपुर आदि जिलों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया. बैठक में रिहाई मंच अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने कहा कि आज एक बार फिर बाबा साहेब के परिनिर्वाण दिवस को कलंकित करने के लिए 6 दिसंबर से राम मंदिर निर्माण का शिगूफा छोड़कर मुल्क को सांप्रदायिकता की आग में झोंका जा रहा है. पर उत्पीड़ित समाज की एकजुटता और एक साथ लड़ने का संकल्प मनुवादी ताकतों के मंसूबों को पूरा नहीं होने देगा.

एनएपीएम की संविधान बचाओ यात्रा से लौटी अरुंधति ध्रुव ने कहा कि संघर्ष के इलाके प्रतिरोध की शक्तियों को न सिर्फ उर्जा देते हैं बल्कि यह भी तय करते हैं कि मुल्क कैसा होगा. बुलेट ट्रेन की राजनीति करने वालों को दिल्ली में पहुंचे किसानों ने बता दिया कि इस देश की राजनीति वो नहीं बल्कि इस देश का मेहनतकश किसान तय करेगा. दिल्ली से आए एनएपीएम नेता विमल भाई ने कहा कि जो जहर बापू की हत्या के बाद बोया गया था आज वो विकराल रुप में हमारे सामने है. इस जहर ने अल्पसंख्यकों की तो सिर्फ जिन्दगी ली पर बहुसंख्यक हिंदू समाज के अन्दर एक हिंसात्मक जेहनियत का निर्माण किया जिसका खामियाज़ा हिंदू समाज को लम्बे समय तक भुगतना पड़ सकता है.

वर्कर्स काउंसिल के संयोजक ओपी सिन्हा ने कहा कि स्वतंत्र नागरिक की राजनीतिक भूमिका इस पूंजीवादी साम्राज्यवादी राज्य सत्ता का अंत कर देगी. नागरिक सत्ता की बहस को जमीन पर ले जाए बगैर इस फासीवादी निजाम से नहीं लड़ा जा सकता. इलाहाबाद से आए सीपीआईएमएल के वरिष्ठ नेता आषीष मित्तल कहते हैं कि इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करने वाली राजनीति किसानों, आदिवासी को उनकी जमीन से बेदखल कर रही है. गोरक्षकों द्वारा गोपालकों की हत्या की जा रही है. योगी सरकार आने के बाद सुनियोजित तरीके से दलितों और अल्पसंख्यकों की मुठभेड़ के नाम पर हत्या हो रही है. इलाहाबाद के वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी खालिद सिद्दीकी ने कहा कि इलाहाबाद का नाम प्रयागराज करना राजनीतिक दिवालियापन है. किसी क्षेत्र की संस्कृति सरकारी नामों की मोहताज नहीं है इलाहाबाद था और इलाहाबाद ही रहेगा.

बलिया से आए वंचित समाज के आंदोलनों के नेता बलवंत यादव ने कहा कि बेरोजगारी, पलायन, उत्तर भारतीयों पर बढ़ते हमले के इस दौर में विपक्ष घुटने टेक चुका है. सरकारें मंदिर-मस्जिद की आड़ में देश में आग लगाने पर आमादा हैं और विपक्ष ध्रुवीकरण के डर से चुप्पी साधे बैठा है. जो विपक्ष खुद को बचा नहीं सकता वो आम आदमी को क्या बचाएगा. 2 अप्रैल को भारत बंद के दौरान जेल गए मुजफ्फरनगर के आशू चौधरी ने कहा कि योगी सरकार में लगातार उनका ज़िला निशाने पर है. पुरवालियान में बच्चों के क्रिकेट मैच को लेकर हुए तनाव के बाद पुलिस ने भाजपा सांसद संजीव बालियान के दबाव में न सिर्फ मुस्लिम समुदाय के निर्दोषों पर मुकदमा कायम किया बल्कि तीन लोगों पर रासुका भी लगा दिया. ठीक इसी तरह बुढ़ाना में सांप्रदायिक तनाव के बाद भाजपा विधायक उमेश मलिक ने प्रशासन को निर्देष दिया था कि एक घंटे मुसलमानों पर लाठियां चलवाओ.

स्वराज अभियान के नेता राजीव ध्यानी ने कहा कि यह संकट दीर्घकालिक है और हमें राजनीतिक हस्तक्षेप करना पड़ेगा. सांप्रदायिकता की आड़ में संसाधनों का बेतहाशा दोहन हो रहा है. फासीवादी विरोधी मोर्चा के नेता कृपाशंकर ने कहा कि वर्तमान सरकार में जगह-जगह सांपद्रायिक हिंसा अंजाम देने वालों को खुली छूट देकर पूरे मुल्क को आग में झोकने का काम किया जा रहा है. इसका ज्वलंत उदाहरण है कि बहराइच में सांप्रदायिक तनाव जैसी घटना के बाद अल्पसंख्यकों पर यूएपीए लगा दिया जाता है.

बैठक में प्रो0 रुप रेखा वर्मा, नीति सक्सेना, ममता सिंह, शकील कुरैषी, वीरेन्द्र गुप्ता, तारिक दुर्रानी, रॉबिन वर्मा, गुफरान सिद्दीकी, गुंजन सिंह, एडवोकेट संतोष सिंह, राजकुमार, शाहरुख अहमद, अतुल, पंकज यादव, रोहित सिंह, आफाक, सचेन्द्र यादव, दुगेश चौधरी, अजय शर्मा, आशीष यादव, हफीज, खालिद, चंद्रिका, अखतरुल इस्लाम, एहसानुल हक मलिक, षिवनारायण कुषवाहा, उदय प्रताप, चौधरी फिरोज, प्रो0 जमाल नुसरत, कमर सीतापुरी, कृष्ण प्रताप यादव, तारिक शफीक, सागर यादव, विवेक यादव, विमल चौधरी, उदय राज शर्मा, रजीउद्दीन, अतहर, सदफ, परमानंद तिवारी, डीएन बौद्ध, सुभाष गौतम, मलिक शाहबाज, गुफरान चौधरी, जेपी सिंह, आरिफ, एसएस हुसैन, एडवोकेट नजमुस्स साकिब, एडवोकेट जमाल, आरती, एमडीखान, रफी खान, केके शुक्ला, नासिर अली, गनेश, धर्मपाल सिंह, रमेश साहनी, राजीव यादव विभिन्न सामाजिक राजनीतिक संगठनों के लोगों ने हिस्सा लेकर अपनी बात को रखा.

24 साल बाद दिखेगा नवाबों की नगरी में क्रिकेट का जलवा

रविवार, 4 नवंबर, 2018 को कोलकाता में हुए पहले ट्वेंटी20 मैच में भारत ने वैस्टइंडीज को हरा तो दिया पर कम लक्ष्य में भी जितनी उम्मीद थी उतनी आसानी से हम जीत नहीं पाए.

वैस्टइंडीज ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 20 ओवरों में 8 विकेट खो कर महज 109 रन ही बनाए थे. वह तो भला हो एफए एलन का जिन्होंने नीचे आ कर 27 रन बना दिए वरना वैस्टइंडीज के तो 100 रनों के भी लाले पड़ गए थे.

भारत की ओर से गेंदबाज कुलदीप यादव ने 4 ओवरों में महज 13 रन दे कर 3 विकेट झटके और ‘मैन औफ द मैच’ का खिताब पाया.

भारत की बल्लेबाजी की शुरुआत कुछ खास नहीं रही थी. उस के पहले 4  विकेट तो 45 रनों पर ही गिर गए थे. पारी को थोड़ा सा मनीष पांडे और दिनेश कार्तिक ने संभाला. जब मनीष पांडे 19 के निजी स्कोर पर आउट हुए तो डेब्यू कर रहे कुणाल पंड्या ने पारी को नई दिशा दी और मैच को जीत तक ले गए. उन्होंने 9 गेंदों पर 21 रन बटोरे तो दिनेश कार्तिक ने 34 गेंदों पर नाबाद 31 रन बनाए.

बहरहाल अब अगला ट्वेंटी20 मैच नवाबों के शहर लखनऊ में होगा जहां आखिरी बार कोई इंटरनैशनल क्रिकेट मैच जनवरी, 1994 में भारत और श्रीलंका के बीच टैस्ट मैच के रूप में खेला गया था. अब वहां का इकाना स्टेडियम फिर से तैयार है.

तकरीबन 24 साल बाद 6 नवंबर, 2018 यानी छोटी दीवाली पर उम्मीद है कि इस स्टेडियम पर चौकोंछक्कों की फुलझड़ियां देखने को मिलेंगी जिस का मजा 50,000 दर्शक उठाएंगे.

लखनऊ में आखिरी इंटरनैशनल क्रिकेट मैच जनवरी, 1994 में भारत और श्रीलंका के बीच केडी सिंह बाबू स्टेडियम में बतौर टैस्ट मैच खेला गया था. इस के बाद सारे इंटरनैशनल मैच और आईपीएल मैच कानपुर में आयोजित किए गए.

अब इकाना स्टेडियम को एकदम मौडर्न बना दिया गया है और यहां मैदान के हर कोने से दर्शक मैच का भरपूर लुत्फ उठा सकते हैं. इस स्टेडियम में 9 पिचें हैं, शानदार ड्रैसिंग रूम है और कृत्रिम रोशनी का बढ़िया इंतजाम किया गया है.

सुनने में आ रहा है कि इस मैच को ले कर क्रिकेट के दीवानों में इतनी ज्यादा दीवानगी है कि औनलाइन टिकट कुछ घंटों में ही बिक गए, जबकि औफलाइन टिकटों के लिए 2 दिन तक लंबी कतारें लगी रहीं. याद रहे कि मैच का सब से कम टिकट 1000 रूपए का है और बौक्स का टिकट तकरीबन 23 हजार रूपए का है.

उत्तर प्रदेश क्रिकेट संघ भी इस मैच को कामयाब बनाने में कोई कोरकसर नही छोड़ रहा है. क्रिकेट प्रेमियों की सिक्योरिटी और उन के मैच देखने के सभी इंतजाम किए गए हैं.

इस टी-20 मैच को देखने के लिए उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत कई कैबिनेट मंत्रियों के मौजूद रहने की उम्मीद है.

हुवावे नोवा 3आई को मिलना शुरू हुआ लेटेस्ट अपडेट

हुवावे नोवा 3आई  स्मार्टफोन्स पर EMUI 8.2.0.131 अपडेट मिलना शुरू हो चुका है. हुवावे इसमें सिक्यौरिटी अपडेट के साथ कुछ नए आकर्षक फीचर भी दे रहा है. आपको बता दें, 700 एमबी के साइज वाले इस अपडेट को इंस्टौल करने के लिए आपको अच्छी स्पीड वाला वाई-फाई कनेक्शन चाहिए. फोन पर अपडेट पहुंचने के साथ ही यूजर को नोटिफिकेशन मिल जा रहा है. अगर आपको नोटिफिकेशन न मिले तो आप अपने फोन के सेटिंग्स के अबाउट फोन औप्शन में जाकर चेक फौर अपडेट्स पर टैप कर यह मालूम कर सकते हैं कि आपके फोन पर यह अपडेट पहुंचा है कि नहीं.

इस अपडेट की सबसे खास बात है इसके कैमरा ऐप को मिलने वाला सुपर नाइट मोड फीचर. इस फीचर के जरिए यूजर कम लाइट में भी बेहतरीन फोटो क्लिक कर सकता है. यह फीचर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर काम करते हुए लाइटिंग कंडिशन्स को डिटेक्ट कर लेता है और उसके मुताबिक सेटिंग्स में बदलाव कर अच्छी फोटो देता है. यह फीचर सबसे पहले हुवावे के पी20 स्मार्टफोन में देखने को मिला था. इस अपडेट के साथ हुवावे डिवाइसेस को अक्टूबर महीने का ऐंड्रौयड सिक्यौरिटी पैच भी दे रहा है.

जहां तक इस फोन के फीचर की बात है तो यह किरिन 710 औक्टाकोर SoC प्रोसेसर पर काम करता है और बेहतरीन गेमिंग एक्सपीरियंस के लिए इसमें जीपीयू टर्बो टेक्नौलजी भी उपलब्ध है. फोन में आपको 6.3 इंच का फुलएचडी+ नौच डिस्प्ले दिया गया है. हुवावे नोवा 3आई में फोटोग्राफी के लिए रियर में 16 मेगापिक्सल + 2 मेगापिक्सल ड्यूल कैमरा सेटअप है. इसके साथ ही फोन के फ्रंट में भी 24 मेगापिक्सल +2 मेगापिक्सल का ड्यूल कैमरा सेटअप देखने को मिलेगा.

इस स्मार्टफोन को चार कलर्स ब्लैक, ट्विलाइट, पिंक गोल्ड और मिडनाइट ब्लू कलर में लॉन्च किया गया था. ट्विलाइट कलर को स्मार्टफोन का सिग्नेचर कलर होने का दावा किया जा रहा है.

सरकार और रिजर्व बैंक के बीच खींचातानी के ये हैं प्रमुख कारण

भारतीय रिजर्व बैंक और भारत सरकार के बीच चल रहे लंबे विवाद ने आम लोगों को हैरत में डाल दिया है. आम तौर पर मुद्दों पर सरकार और रिजर्व बैंक के बीच मतभेद हुए हैं और होते भी रहते हैं. पर इस मामले में पूरा विवाद सार्वजनिक हो जाना पहली बार हुआ और दोनों संस्थाओं की खींचातानी ने आम जनता के बीच अविश्वास भी पैदा किया है. विवाद इस कदर बढ़ गया कि खबरें आईं कि आरबीआई गवर्नर उर्जीत पटेल इस्तीफा दे सकते हैं. हालांकि इस पर आरबीआई ने किसी भी तरह की टिप्पड़ी नहीं की. आरबीआई सूत्रों की माने तो ऐसे विवाद आम हैं पर सरकार की ओर से आरबीआई धारा सात के इस्तेमाल के बाद मामला और गंभीर हो गया.

इन विवाद और आरोप- प्रत्यारोप के बीच हम आपको बताएंगे कि सरकार भारतीय स्टेट बैंक पर क्यों नियंत्रण रखना चाहती है.

  • कदी की मांग

सरकार रिजर्व बैंक के कोष से राजकोषिय घाटे को कम करने के लिए मदद के रूप में बार बार पैसे मांगे. आरबीआई अपने विभिन्न गतिविधियों से अर्जित अपने मुनाफे का हिस्सा देता है. लेकिन सरकार चाहती है कि आरबीआई के 3.6 खरब रुपये के भंडार में भी हिस्सा मिले. पर रिजर्व बैंक ने सरकार की इस मांग को लगातार खारिज कर रही है.

  • लिक्विडिटी का मुद्दा

सरकार चाहती है कि आरबीआई बैंकिंग क्षेत्र को, जो इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज के डिफाल्ट का शिकार हो गई है, को और अधिक लिक्विडिटी दे.

  • 11 बैंकों पर ऋण संबंधी प्रतिबंध

11 सरकारी बैंकों पर अपने उधार प्रतिबंधों को खत्म करने लिए सरकार रिजर्व बैंक से आग्रह कर रही है. इन बैंकों पर रिजर्व बैंक ने कम पूंजी आधार और बैड लोन्स की दिक्कत के चलते प्रतिबंध लगाए गए थे. 11 बैंकों को तब तक के लिए उधार देने से रोक दिया गया जब तक उनके बैड लोन कम नहीं हो जाता. सरकार का कहना है कि इन प्रतिबंधों के कारण  मध्यम और छोटे वर्ग के व्यवसायों को लोन मिलना मुश्किल हो गया है, इस लिए जरूरी है कि 11 सरकारी बैंकों पर लगे प्रतिबंध को हटाया जाए.

  • बोर्ड का प्रभाव

इस वर्ष के शुरुआत में सरकार ने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के विचारक एस गुरूमूर्ति को रिजर्व बैंक के बोर्ड में जगह दी. आपको बता दें कि रिजर्व बैंक के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ. इससे पहले इस बोर्ड में ज्यादातर सदस्य उद्योगपति या अर्थशास्त्री रहे हैं.

  • रिजर्व बैंक और सरकार के झगड़े का सार्वजनिक होना

वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के अलावा बीजेपी और संघ के कई लोग, रिजर्व बैंक और सरकार के बीच हुई खींचातानी के सार्वजनिक होने से नाराज हैं. हालांकि आचार्य ने से बात साफ की कि उन्हें पटेल द्वारा आजादी के सवाल को संबोधित करने के लिए कहा गया था. बुधवार को स्वायत्तता से संबंधित अपने बयान में सरकार ने जोर देकर कहा कि यह चर्चा गोपनीय रखेगी.

आपको बता दें कि शुक्रवार को रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने अपने एक भाषण में चेताया था कि केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता से छेड़छाड़ ‘विनाशकारी’ साबित हो सकती है. विरल आचार्य ने 27 अक्टूबर को कहा था कि जो भी सरकार केंद्रीय बैंक की स्वतंत्रता का सम्मान नहीं करती उसे देर-सबेर वित्तीय बाजारों की नाराजगी का सामना करना पड़ता है. हालांकि इस पूरे मामले में विरल की टिप्पड़ी को आरबीआई और वित्त मंत्रालय ने खारिज कर दिया.

क्या होगी योगी की अच्छी खबर : विकास का वादा या राम मंदिर का राग?

मौजूदा माहौल में देश के लिए इससे बड़ी कोई खबर हो ही नहीं सकती कि खेतों में लहलहाती फसलें देखकर किसानों के चेहरे खिले हुये हैं, हर बेकार, बेरोजगार को काम मिल गया है, कहीं भी दलितों और मुसलमानों को मारा पीटा नहीं जा रहा है, औरतों की इज्जत नहीं लुट रही है, अमेरिका हमसे कर्ज मांग रहा है, व्यापारी बिना किसी अड़चन के व्यापार कर रहा है, कारखानों और फेक्टरियों में रिकार्ड उत्पादन हो रहा है, कहीं भी किसी तरह की हिंसा या अपराध  नहीं हो रहे हैं  इसलिए थानों में पुलिस वाले हंसी मज़ाक करते वक्त काट रहे हैं, सभी बच्चे स्कूल जाकर डाक्टर, इंजीनियर और कलेक्टर बनने का अपना सपना पूरा कर रहे हैं और ऐसी कई अच्छी खबरों के साथ विजय माल्या और दूसरे भगोड़े खरबों रुपया लेकर देश वापस आ गए हैं वगैरह वगैरह.

लेकिन जो नई अच्छी खबर चंद घंटों में उत्तरप्रदेश के संत महंत मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ अयोध्या से देने वाले हैं उसके सस्पेंस से लोग हलाकान हुये जा रहे हैं कि वह क्या होगी और कितनी लाजवाब होगी. इस अच्छी खबर का ढिंढोरा तो देश भर के साधुसंत दिल्ली के तालकटोरा से पीट चुके हैं कि राम मंदिर तो बनेगा फिर चाहे कुछ भी हो जाये. इस बाबत सरकार अगर कानून बनाने की घोषणा नहीं करती है तो साधु संत खुद मंदिर बनाना शुरू कर देंगे और पूरा भगवा कुनबा 1992 जैसा आंदोलन छेड़ देगा. अव्वल तो डराने के लिए यह धौंस ही काफी है कि अब फिर मंदिर के नाम पर हिंसा भी हो सकती है क्योंकि संत समुदाय कानून हाथ में लेने से हिचकिचाने वाला नहीं और अब तो सरकार लगभग हर जगह भाजपा की है इसलिए कोई उन्हें रोकेगा भी नहीं उल्टे पुलिस प्रशासन उनकी आवाभगत करता नजर आए तो बात कतई हैरानी की नहीं होगी.

अब आदित्यनाथ कौन सा तुरुप का पत्ता खोलने बाले हैं इसे लेकर अटकलों के साथ साथ शर्तों और सट्टा बाजार भी इतना गरमा चुका है कि तीन राज्यों के चुनाव जो कल तक बेहद अहम थे जाने किस कोने में पड़े कराह रहे हैं. लोग कयास लगा रहे हैं कि वह अच्छी खबर क्या होगी, अच्छे दिनों जैसी लोलीपाप भर होगी या फिर कोई नया सनसनाता हाहाकारी फैसला होगा जिसके तहत इन दिनों आस्था के समुंदर में गले गले तक डूबे योगी जी यह चौंका देने वाला ऐलान भी कर सकते हैं कि वे अब राम मंदिर निर्माण के बाद ही कुर्सी पर बैठेंगे और लखनऊ तभी जाएंगे जब अयोध्या में रामलला का मंदिर बन चुका होगा. मुमकिन यह भी कि वे अन्न जल त्याग की घोषणा कर दें और खुद ही अपनी सरकार के खिलाफ अनशन पर बैठ जाएं.

मुमकिन यह भी कि आदित्यनाथ मंदिर निर्माण का पूजन ही कर डालें ऐसे में कोई क्या कर लेगा. अपाहिजों की तरह घिसटते इखरे बिखरे विपक्ष की घुटी आवाज नक्कारखाने में तूती की तरह ही साबित होगी और इन दिनों हीरो बनाए जा रहे योगी जी को वह श्रेय मिलना तय है जो 1992 में किसी एक को तो क्या सभी रामभक्तों को मिलाकर भी नहीं मिला था.

अगर ये सभी बातें कपोल कल्पनाएं हैं तो इससे ज्यादा या कम क्या होगा यह कह पाना मुश्किल है. धीरे धीरे नरेंद्र मोदी का विकल्प बनाए जा रहे आदित्यनाथ का मन शुरू से ही सरकारी कामकाज में नहीं लग रहा है.  वे नेता होते हुये भी मठ की ज़िंदगी के आदी हैं जहां सुबह राम धुन और गौ सेवा से शुरू होती है , फाइलों के अंबार और जनसेवा के कार्यों से नहीं. हाथ बांधकर खड़े सूट बूट वाले आईएएस अफसर उन्हें असहज बनाते हैं, उन्हें सहजता लगती है संतों और भक्तों के सत्संग में जो चौबीसों घंटे अपने कारोबार यानि रामकथा में डूबे रहते हैं.

अब अगर यही पुरानी ज़िंदगी आदित्यनाथ को बुला और लुभा रही है तो वे कोई ऐसी ही अच्छी खबर सुना सकते हैं और अगर प्रधानमंत्री बन जाने की महत्वाकांक्षा उनके दिलो दिमाग में हिलोरें मार रही होगी तो वह प्रतीक्षित अच्छी खबर यही होगी के वे संतों और रामभक्तों की आस्था पूरी करने यह कांटों भरा ताज भी पहनने तैयार हैं. हाल फिलहाल यह बात घुमाफिराकर ही कही जा सकती है.

अब कलयुग में यह चमत्कार होना तो मुश्किल ही नहीं बल्कि असंभव ही है कि 6 नवम्बर को घर घर में एक दीपक राम के नाम के जलाने पर खुद राम प्रसन्न होकर सीता लक्ष्मण और हनुमान के पुष्पक विमान से उतरें और सीधे मंदिर में जाकर विराजमान हो जाएं जिससे भक्तों को आंदोलन वगैरह करने की जहमत न उठानी पड़े जिसके कभी कोई माने नहीं निकले.

और अगर ऐसा भी नहीं हुआ तो कुछ घंटे और कयास लगाने हर कोई स्वतंत्र है कि योगी कौन सी अच्छी खबर के बाबत हवा बांध रहे हैं. वह अच्छी खबर अगर मंदिर निर्माण की है तो लोगों के हाथ निराशा ही लगेगी क्योकि उसका हल्ला और शोर शराबा तो अभी से दिवाली के पटाखों के धूम धड़ाके को मात कर रहा है वह तो एक बासी खबर का दोहराव भर होगा.

500 लोगों ने बनाया था बाहुबली का सेट, आज देखने के लिए जुट रही है भीड़

बाहुबली साल 2017 की ऐसी फिल्म बन गई थी, जिसकी रिलीज से पहले लोग इस फिल्म को लेकर हर बात जानना चाह रहे थे. इसके पहले भाग की रिलीज के बाद फिल्म की कहानी, कलाकारों की परफौरमेंस के साथ-साथ फिल्म में स्पेशल इफेक्ट ने दर्शकों के मन को ऐसा मोह लिया कि उन्हें दूसरे भाग का इंतजार करना मुश्किल हो रहा था. लेकिन इन सब के अलावा यदि किसी चीज ने लोगों का मन मोह लिया, तो वह है फिल्म के सेट की भव्यता, जिसके चर्चे अब तक लोगों के बीच हो रहे हैं.

हाल ही में मिली खबर के मुताबिक फिल्म बाहुबली का भव्य सेट जिसे हैदराबाद के रामोजी फिल्म स्टूडियो में बनाया गया था उसे अब पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है. यह खबर मिलते ही लोगों का उत्साह देखते ही बन रहा है. खबर मिली है कि माहिष्मती राज्य में एंट्री करने के लिए आप औनलाइन बुकिंग कर सकते हैं, जिसकी कीमत 1000 और 2500 के बीच बताई जा रही है.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस फिल्म का सेट बनवाने के लिए लोगों ने कितनी मेहनत की है? आइये आज जानते हैं इस फिल्म के सेट को लेकर वो बातें, जो आपने इससे पहले कभी नहीं सुनी होगी.

इतने एकड़ में फैला है महिष्मति का राज्य

इस भव्य फिल्म को बनाने के लिए जाहिर है इस फिल्म का सेट भी विशालकाय बनवाया गया होगा. बता दें कि यह सेट रामोजी फिल्म सिटी में करीब 100 एकड़ में फैला हुआ है, जिसे देखकर आपको अपनी आंखों पर विश्वास नहीं होगा.

500 लोगों ने मिलकर तैयार किया था ये सेट 

बाहुबली के जिस सेट को देखने के लिए आज टिकटें रखी जा रही हैं और जिसे आज टूरिस्ट प्लेस की तरह प्रमोट किया जा रहा है, उसे बनाने के लिए 500 लोगों ने दिन रात मेहनत की थी, जिसकी वजह से इसे ऐसा रूप मिल.

इतने दिनों में बना है ये सेट

इस विशालकाय और भव्य सेट को बनाने के लिए लोगों को बेहद मेहनत करनी पड़ी. इसकी बारीक कारीगिरी को देखकर ये पता लगाया जा सकता है. इस पूरे सेट को बनाने के लिए दिन रात 50 कारीगर काम जुटे रहे थे.

35 करोड़ की लागत में बना है बाहुबली 2 का सेट

जिस विशालकाय सेट की वजह से फिल्म को एक प्रारूप मिला, ऐसे सेट को बनाने में करीब 35 करोड़ की लागत लगी थी. फिल्म के पहले भाग में दिखाए गए सेट को 28 करोड़ में बनाया गया था, जबकि बाहुबली 2 के लिए एक नए राज्य की रचना  की गई थी, जिसे बनाने में 35 करोड़ खर्च किये गए.

विशालकाय था अंदरूनी भाग

फिल्म के पहले भाग में आपने माहिष्मती राज्य को बाहरी रूप से देखा था, लेकिन इसके दूसरे भाग में राज्य के अंदरूनी भागों को दिखाया गया, जो पहले से भी ज्यादा विशालकाय और भव्य था.

चम्बल वैली में की गई थी शूटिंग 

बता दें कि फिल्म के प्रमुख हिस्सों को फिल्माने के लिए हैदराबाद स्थित रामोजी फिल्मसिटी का इस्तेमाल किया गया था. यहां चम्बल घाटी का एक बड़ा सेट बनवाया गया था, जिसे बनवाने के लिए 100 ट्रक मिट्टी बुलवाकर डलवाई गई और बाद  में सीन शूट किये गए.

बनाए गए थे 1500 स्केच

इस फिल्म की शूटिंग से पहले प्री प्रोडक्शन टीम ने 1500 स्केच बनवाए थे, जिसे ध्यान में रखकर बाद में फिल्म की शूटिंग की गई. इन स्केच में सबसे बड़ा पोस्टर 50,000 फिट बड़ा था, जिसे गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में जगह मिली है.

17 वीएफएक्स स्टूडियो ने किया काम

आपको जानकार हैरानी होगी कि इस फिल्म के सेट को तैयार करने के लिए करीब 17 वीएफएक्स स्टूडियो ने साथ मिलकर काम किया है, जिसमें करीब 800 से ज्यादा टेक्नीक्स का इस्तेमाल किया गया है.

विजुअल इफेक्ट्स के लिए खर्च किये इतने करोड़

न सिर्फ वीएफएक्स, बल्कि इसके सेट के विजुअल इफेक्ट्स के लिए निर्मातों ने 85 करोड़ रूपए खर्च किये हैं, जिसने इस फिल्म को सदी की सबसे बड़ी और आकर्षक फिल्म का खिताब दिया.

ऐसे बड़े सेट्स में जिस बाहुबली की शूटिंग की गई, उसे  भारत में 6500 स्क्रीन्स पर और दुनिया के 8500 स्क्रीन्स पर रिलीज किया गया था.

बिग बौस 12 : दीपक ठाकुर ने सोमी को किया प्रपोज

बिग बौस 12 में खूब हंगामा हो रहा है, इसके साथ ही दर्शक भी एंटरटेन हो रहे हैं. अब जल्द ही दीवाली के मौके पर मेकर्स धमाल मचाना शुरु कर दिए हैं, ताकि दर्शक बोर न हो. हाल ही में बिग बौस के घर में विकास गुप्ता और शिल्पा शिंदे नजर आए हैं. इसके अलावा सपना चौधरी और हिना खान भी बिग बौस के घर में नजर आए. घर में मस्ती के साथ-साथ खूब बवाल भी हो रहा है.

जैसा कि सब जानते  हैं कि हर सीजन में कोई ना कोई कपल घर के अंदर बन ही जाता है. अगर कपल ना भी बने तो घर में प्यार का खुमार चलता ही रहता है. हाल ही में घर में ऐसा ही कुछ दीपक ठाकुर और सोमी खान के साथ हुआ है. ये वही दीपक ठाकुर हैं जो अपनी फैन जिन्हें ये अपने गर्लफ्रैंड बताते थे उनके साथ घर में आए है.

जी हां हम बात कर रहे हैं उर्वशी की, एक तरफ जहां उर्वशी औऱ दीपक ने शो की शुरूआत में बताया था कि दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं. हालांकि घर में आने के बाद कुछ और ही हो गया. दीपक और उर्वशी की जोड़ी तो अलग हो गई साथ ही दीपक को सोमी में नया प्यार भी दिख गया. इसीलिए तो उन्होंने सोमी को प्रपोज कर दिया. हुआ ये कि हाल ही में दीवाली सेलिब्रेशन के बीच भारती सिंह और आदित्य नारायण सिंह घर में गेस्ट बनकर आए.

भारती दीपक से पूछती हैं कि क्या तुम सच में खुद को दीपक समझते हो जो फुलझड़ी सोमी तुमसे जल जाएगी. इसी बीच भारती दीपक से कहती हैं कि उन्हें आज सोमी को प्रपोज करना होगा. बस फिर क्या था दीपक ने तुरंत ही सोमी को प्रपोज कर दिया. हालांकि दीपक कहते हैं कि वो औऱ सोमी दोस्त है. इस पर भारती कहती हैं कि अगर ऐसा है तो सोमी को बहन बोलो नहीं तो उसे प्रपोज करो. बस फिर तुरंत ही दीपक घुटनों पर बैठकर सोमी को प्रपोज करते हैं.

बंगलादेशी मुसलिमों से नफरत क्यों?

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के गोमतीनगर विस्तार में बनी कालोनियों के पास एक कालोनी बसी है झुग्गीझोंपड़ी वालों की. यहां रहने वाले काली प्लास्टिक की पन्नी डाल कर झोंपड़ी बनाए हुए हैं. इन के सामने 8 मंजिली इमारतों में रहने वाले नईनई चीजों से अपना घर सजाते हैं जबकि झोंपड़ी में रहने वाले ये लोग पुराने सामान को ही थोड़ा ठीक कर के अपने प्रयोग में लाते हैं.

इन के घरों में बैट्री से चलने वाले बल्ब और पंखे लगे हैं. किसीकिसी झोंपड़ी में बैट्री से चलने वाले टीवी भी दिख जाते हैं. टूटीफूटी चारपाई किसी झूले सी दिखती है. इन झोंपड़ीनुमा घरों में रहने वालों को बंगलादेशी कहा जाता है. एकएक झोंपड़ी में 6 से 8 लोग मिल जाते हैं. सुबह होने से पहले जब सारा शहर नींद का सुख ले रहा होता है, तो ये लोग अपनी झोंपड़ी से निकल कर रात में शहरी लोगों द्वारा फेंका गया कूड़ा उठाते हैं. नगर निगम के सफाई कर्मचारी भी इन से अपना काम लेते हैं. बदले में इन को प्लास्टिक बीनने की इजाजत दे देते हैं.

20 साल की रेहाना की शादी 4 साल पहले हुई थी. उस के 2 बच्चे हैं. वह सुबह 4 बजे ही अपनी झोंपड़ी से निकल कर नाली किनारे या कूडे़ के ढेर में से पन्नी तलाश रही होती है. लोग पन्नी में बांध कर केवल घर का कूड़ा ही नहीं फेकतें, बल्कि इन में महिलाओं द्वारा इस्तेमाल किए गए सैनिटरी पैड तक होते हैं. प्लास्टिक के लालच में ये कूड़ा बीनने वाले उस को खोल कर प्लास्टिक वाली पन्नी अलग कर लेते हैं. इस काम को करने में न तो उन्हें गंदगी का एहसास होता है, न ही उन को किसी तरह की परेशानी होती है.

रेहाना बताती है, ‘‘हम लोगों को प्लास्टिक बीनने के बाद उसे ठेकेदार को देना होता है. वह उस के बदले कुछ पैसा देता है. हम लोग रद्दी में बिकने वाले दूसरे सामान भी इकट्ठा कर लेते हैं. खासतौर पर कहीं लोहा मिल जाए तो वह बिक जाता है. हमारे यहां बहुत गरीबी है. ऐसे में हम अपनी रोजीरोटी के लिए यहां आते हैं, लेकिन हमें अपराधी कहा जाता है जो सही नहीं है.’’

असम की रहने वाली समीना 7 साल से लखनऊ में है. वह अलगअलग जगहों पर रहती है. उस का अपना राशनकार्ड भी है. अब उस के साथ परिवार के कुछ और लोग भी आ गए हैं. समीना की शादी नहीं हुई है. उस की 2 बहनें भी हैं, जो यहीं रहती हैं. ये तीनों मिल कर सुबह कूड़ा बीनने के बाद दिन में घरों में सफाई का काम करती हैं. समीना कहती है, ‘‘हमारे यहां के कुछ लोग दिल्ली में रहते हैं. हम अपना काम मेहनत से करते हैं. हमें जो यह कहा जा रहा कि हम बंगलादेशी हैं, यह गलत है. हम भी इसी देश के रहने वाले हैं.’’

इन परिवारों में मर्द कम काम करते हैं. समीना कहती है, ‘‘असम में भले ही वे काम नहीं करते थे पर यहां वे भी काम करने लगे हैं. सफाई और रद्दी बेचने वाले ठेकेदार हमें ठेलियां देते हैं जिस में भर कर हम सामान भी ले जाते हैं. हम कूड़ा एक जगह इकट्ठा कर लेते हैं. उसे सूखने के लिए रखते हैं. फिर छांट कर अलगअलग जगह पर बेचते हैं. हमें शिकायत यह है कि हमें इस देश का न समझ कर, बाहरी समझा जाता है.’’

सौतेला व्यवहार

बंगाली मुसलिमों को भी बंगलादेशी मुसलिम मान कर उन को घुसपैठिया माना जा रहा है. हकीकत यह है कि इन में बंगलादेशी मुसलिमों की संख्या बेहद कम है. पश्चिम बंगाल, ओडिशा और असम सहित पूर्वोत्तर के कई राज्यों में गरीबी का शिकार रहे लोग मैदानी इलाकों में मेहनतमजदूरी करने आ जाते हैं.

ये गरीब हैं, दरदर भटक रहे हैं. ये न तो किसी तरह के धार्मिक दंगे करने की हैसियत रखते हैं, न ही नौकरियों पर अपनी दावेदारी करने की हैसियत में हैं. ये समाज का सब से निम्न काम करते हैं. ये नालियों में कूड़ा निकालने और प्लास्टिक जमा कर गंदगी साफ करने का काम करते हैं. इस के बदले इन को मेहनताना के नाम पर इतना पैसा भी नहीं मिलता कि ये अच्छे से खाना खा सकें. इन का रहनसहन देखें तो ये बीमारी और भूख से लड़ते खुले आसमान के नीचे जानवरों की तरह रहते हैं. इस के बाद भी ये समाज में नफरत की नजर से देखे जाते हैं.

पुलिस और प्रशासन इन को अवैध विदेशी नागरिक मानते हैं. इन की खोज का काम करते हैं. अप्रैल 2017 से अप्रैल 2018 के बीच पुलिस ने केवल 92 विदेशी नागरिकों को पकड़ने का काम किया है. इन में 2 पाकिस्तानी, 57 बंगलादेशी, 7 रोहिंग्या और 26 दूसरे विदेशी नागरिक हैं.

आंकडे़ बताते हैं कि केवल 19 बंगलादेशी लोगों को ही वापस भेजा जा सका है. ऐसे में साफ जाहिर होता है कि बंगलादेशी मुसलिमों के नाम पर शोर ज्यादा हो रहा है. असल में विदेशी माने जाने वाले लोग इतने नहीं हैं जितने होने की बात कही जा रही है.

बंगलादेशी मुसलिम कहे जाने वालों के निवास को ले कर पुलिस और प्रशासन के पास कोई पुख्ता सुबूत नहीं है. इन से बात करने पर पता चलता है कि ये पश्चिम बंगाल और असम के रहने वाले हैं. तमाम लोगों के पास वहां के मतदाता पहचानपत्र भी हैं. फैजाबाद जिले में 80 लोगों की जांच हुई तो सभी के पास मतदाता पहचानपत्र मिले. बाराबंकी जिले में 15 साल से रह रहे लोगों, जिन्हें बंगलादेशी कहा व माना जाता है, के पास असम के वोटरकार्ड मिले यानी वे असम के रहने वाले हैं.

कई जगहों पर जांच में ऐसे ही तथ्य सामने आए हैं. कहीं भी ज्यादा संख्या में ऐसे लोग नहीं मिले जिन को बंगलादेशी कहा जा सके. बहुतायत में ये लोग पश्चिम बंगाल और असम के रहने वाले ही पाए गए. ये सभी कूड़ा बीनने काकाम करते हैं और सड़क के किनारे, पुल के नीचे या खाली पड़ी जमीन में प्लास्टिक  की पन्नी डाल कर रहते हैं. दिल्ली, लखनऊ जैसे महानगरों के अलावा उत्तर प्रदेश का पूर्वांचल क्षेत्र इन का सब से बड़ा गढ़ बन चुका है. करीब पिछले 20 सालों से ये यहां रह रहे हैं. इन की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है. वाराणसी, जौनपुर, चंदौली, मिर्जापुर और आजमगढ़ में ऐसे लोगों की संख्या 30 हजार आंकी जा रही है. इन सभी की पहचान को ले कर कोई सुबूत नहीं है. ऐसे में सभी को बंगलादेशी घुसपैठिया ही मान लिया जा रहा है. खुफिया विभाग के लगातार प्रयासों के बाद भी इन को बंगलादेशी घुसपैठिया साबित नहीं किया जा सका है. इन के खिलाफ सुबूत नहीं मिले हैं.

इक्कादुक्का छोटीबड़ी अपराध की घटनाओं को छोड़ दें तो इन के खिलाफ यहां भी ऐसे सुबूत नहीं हैं कि ये लोग गड़बड़ कर रहे हैं. बहुत लोगों के पास राशनकार्ड भी हैं, ऐसे में ये अब यहां भी कुछ सरकारी सुविधाओं के हकदार हो जाते हैं. लखनऊ और नोएडा सहित गाजियाबाद, मेरठ, सहारनपुर और मुजफ्फरनगर सहित कई बडे़ शहरों में ये रहते पाए जाते हैं.

मजेदार बात यह है कि इन की संख्या कितनी है, इस बात की जानकारी प्रशासन के पास नहीं है. ये लोग आज यहां तो कल वहां रहने लगते हैं, ऐसे में इन का पता करना मुश्किल हो जाता है.

देवबंद, सहारनपुर में कुछ बंगलादेशी आतंकियों के पकडे़ जाने के बाद इन से सुरक्षा का खतरा बताया जाने लगा. यह भी दावा किया गया कि इन लोगों के पास पासपोर्ट और दूसरे दस्तावेज मिले. मथुरा में भी सादिक नाम के एक बंगलादेशी को पकड़ा गया. सादिक भी यहां एक ठेकेदार के साथ आया था. वह कबाड़ बीनने का काम करता था. इस के बाद उस ने परिचयपत्र बनवाया, बैंक खाता खोला और जमीन भी खरीदी. मथुरा में पुलिस ने 14 लोगों को पकड़ा. गोवर्धन में भी कुछ बंगलादेशी मुसलिमों को पकड़ा गया. इन सभी पर अवैध रूप से रहने का आरोप है.

गरीबी बनी मजबूरी

बंगाली मुसलिमों में गरीबी का स्तर बहुत अधिक है. ऐसे में वे मजदूरी के लिए ही बडे़ शहरों में आते हैं. उत्तर प्रदेश में ये सब से बड़ी संख्या में रहते हैं. अब ये उत्तर प्रदेश के साथ ही साथ दूसरे प्रदेशों में भी बसने लगे हैं. बताया जाता है कि भारत के रास्ते खाड़ी देशों में जाने पर बंगलादेशियों को वहां काम मिलना सरल हो जाता है और उन को मजदूरी भी अधिक मिलती है. ऐसे में खाड़ी देशों में जाने का सपना भी उन को भारत ले आता है. यहां के निवासी होने से उन को काम मिलना सरल हो जाता है.

उधर, पश्चिम बंगाल और असम में रहने वाले गरीबी से परेशान हो कर दूसरे राज्यों में चले जाते हैं. उत्तर प्रदेश में कोई भी ऐसा शहर नहीं है जहां ये लोग अब न पाए जाते हों. स्लम बस्तियों की संख्या और वहां रहने वालों की संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है.

केवल लखनऊ में ऐसे लोगों की संख्या एक लाख बताई जा रही है. ये कूड़ा बीनने से ले कर छोटेमोटे काम करने लगे हैं. यह जरूर है कि गरीबी और बेकारी इन को गलत राह पर चलने को भी मजबूर करती है. ये छोटेमोटे अपराध और नशे के भी शिकार हो जाते हैं.

असम के बाद इन की सब से बड़ी संख्या उत्तर प्रदेश में ही है. यह गंभीर मुद्दा है. इस को ले कर राजनीति नहीं होनी चाहिए. परेशानी की बात यह है कि असम से ले कर उत्तर प्रदेश तक बंगलादेशी मुसलिमों को ले कर वोटबैंक की राजनीति शुरू हो गई है. ऐसे में असम और पश्चिम बंगाल के रहने वाले मुसलिमों को भी बंगलादेशी मान लिया जाता है. मुसलिम विरोध के नाम पर इस मुद्दे को ज्यादा हवा दी गई. असल में इस की वजह वोटबैंक की राजनीति है. जब चुनाव आता है तो विदेशी नागरिक और बंगलादेशी मुसलिम एक मुद्दा बन जाते हैं.

सचाई यह है कि शहरों में रहने वाले ये बंगलादेशी कहे जाने वाले लोग वहां से हट जाएं तो शहर में गंदगी साफ नहीं हो पाएगी. शहरों में रहने वाले कितनी भी बातें बना लें पर शहर में गंदगी दूर करने का कोई विकल्प उन के पास भी नहीं है. ऐसे में ये लोग इन शहरों की जरूरत बनते जा रहे हैं. सो, इन से नफरत करने की जगह पर इन के साथ हमदर्दी दिखाई जानी चाहिए.

जरा मुसकरा देते

चमन ऐसे न मुरझाता

अगर तुम मुसकरा देते

नया इक फूल खिला जाता

अगर तुम मुसकरा देते.

यही होता कि छंट जाता

अंधेरा इन फिजाओं का

तुम्हारा क्या बिगड़ जाता

अगर तुम मुसकरा देते.

बहारों पर खिजां जैसा

ये आलम क्यूं है कुछ सोचो

ये मौसम झूमता गाता

अगर तुम मुसकरा देते.

गजल के हुस्न पर

आहो-फुगां का रंग क्यूं चढ़ता

मेरा हर शै मुसकाता

अगर तुम मुसकरा देते.

मुहब्बत बरतरफ

रस्मे-तकल्लुफ भी कोई शै है

दिले-कम्बख्त रह जाता

अगर तुम मुसकरा देते.

यूं ही ये जुल्फ की मानिंद

नहीं अच्छा बल खाना

हमारा दिल भी लहराता

अगर तुम मुसकरा देते.

लबेनाजुक की ये सुर्खी

‘यकीन’ उस पर ये काला तिल

ये तिल कुछ और खिल आता

अगर तुम मुसकरा देते.

       – पुरुषोत्तम ‘यकीन’

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