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फंसे कर्ज की वसूली के लिए बैंकों को कड़े आदेश

बैंक कर्ज बांटते हैं और कर्जदार उस से अपना कारोबार संचालित कर देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं. यह स्वस्थ अर्थव्यवस्था का नमूना है लेकिन जब कर्जदार करोड़ों का कर्ज लौटाए बिना भाग कर विदेशों में ऐश करने लगे और बैंकों की गैर निष्पादित राशि यानी एनपीए तेजी से बढ़ने लगे तो यह अर्थव्यवस्था की डूबती नाव वाली स्थिति होती है.

हमारे बैंकों का करोड़ों रुपए का कर्ज फंसा हुआ है. कई बैंक इस वजह से दिवालिया होने की कगार पर आ गए हैं. यह कर्ज कौन देता है और किस के कहने पर दिया जाता है, यह जांच का विषय है. लेकिन कर्ज की फंसी राशि के कारण बैंकों का संकट कैसे टले, यह काम सरकार तेजी से कर रही है. इसीलिए उस ने कर्ज में डूबे सरकारी क्षेत्र के आईडीबीआई बैंक को बचाने का काम एलआईसी को सौंप दिया है और बैंक औफ बड़ौदा, विजया बैंक तथा देना बैंक का विलय करने का फैसला लिया है.

तर्क यह दिया जा रहा है कि देश में वैश्विक आकार के मजबूत और बड़े बैंक बनाने के लिए यह निर्णय लिया गया है. असलियत यह है कि सरकार फंसे कर्ज में डूब रहे बैंकों को बचाने के लिए इस तरह के कदम उठा रही है. सरकार की कर्जवसूली की गति की असलियत यह है कि पिछले वित्तवर्ष में उस ने महज 74,562 करोड़ रुपए की वसूली की है.

अच्छी बात यह है कि चालू वित्तवर्ष की पहली तिमाही में 36,551 करोड़ रुपए की वसूली की गई है. ऐसा लगता है कि कर्जदार के भगोड़ा होने को ले कर सरकार पर बने दबाव के कारण कर्जवसूली में तेजी आई है. यह क्रम बना रहना चाहिए. इस के लिए वित्त मंत्रालय ने बैंकों को कर्जवसूली में तेजी लाने का निर्देश दिया है. बैंकों का यह प्रयास जितना सफल होगा और अनापशनाप कर्ज बंटने में जितना अंकुश लगेगा, देश की बैंकिंग प्रणाली उतनी ही मजबूत होगी.

अंधविश्वास : पोंगापंथ के चक्कर में दलितों की कटती जेब

बस्ती, उत्तर प्रदेश के विशुनपुरा गांव के दलित जाति के रामदीन को जब औलाद नहीं हुई तो उन्हें एक बाबा ने बताया कि यह सब उस के पिछले जन्म में किए गए बुरे कर्मों के चलते हुआ है जिस वजह से उसे औलाद नहीं हुई. अगर उस ने इस जन्म में अपने कर्मों को नहीं सुधारा तो फिर से अगले जन्म में उसे इसी तरह बेऔलाद रहना पड़ेगा.

रामदीन को लगा कि हो न हो, बाबा सही कह रहे हैं. उस ने बाबा के कहे मुताबिक इस समस्या का उपाय पूछा तो बाबा ने कहा कि उसे पिछले जन्म में किए गए बुरे कर्मों के पापों से छुटकारा पाने के लिए 9 दिनों तक कथा सुननी होगी. साथ ही, ऊंची जाति के लोगों को भोजन भी कराना होगा.

बाबा की बात सुन कर रामदीन ने कहा कि वह अपने घर कथा तो सुन लेगा लेकिन दलित होने के चलते कोई भी ऊंची जाति का आदमी उस के घर भोजन नहीं करेगा.

बाबा ने कहा कि वह किसी ऊंची जाति के आदमी के घर भोजन तैयार करने का पैसा दे दे और उसी के घर पर भोज का इंतजाम हो जाएगा.

रामदीन को बाबा की बात जंच गई और उस ने अपने घर पर 9 दिनों के लिए कथा का आयोजन किया और ऊंची जाति के लोगों के लिए एक बड़े जाति के आदमी के घर पर भोजन का इंतजाम शुरू कर दिया.

एक गरीब रिकशा चालक रामदीन को 9 दिनों तक कथा के आयोजन, भोजन के इंतजाम व दानदक्षिणा के लिए तकरीबन 2 लाख रुपए की जरूरत थी. उस ने पिछले जन्मों के बुरे कर्मों से छुटकारा पाने के लालच में थोड़े से खेत व पत्नी के गहनों को बेच कर पैसों का इंतजाम किया और उस बाबा के कहे मुताबिक कथा सुनने लगा.

लेकिन बाद में बाबा ने और भी खर्चे बढ़ा दिए जिस के चलते रामदीन को अपना घर तक गिरवी रख कर ब्याज पर पैसे उठाने पड़े, तब कहीं जा कर उस ने कथा, दानदक्षिणा व भोजन का इंतजाम करने में कामयाबी पाई.

पिछले जन्म के बुरे कर्मों से छुटकारा पाने के लालच के चलते रामदीन ने अपनी माली हालत बहुत ही खस्ता कर ली थी जिस से उस के घर में खाने तक के लाले पड़ गए क्योंकि उस ने अपनी सारी जमापूंजी पुण्य कमाने के लालच में गंवा दी थी.

बेवकूफी और निकम्मापन

पुण्य कमाने, पिछले जन्मों के बुरे कर्मों के डर से छुटकारा पाने का लालच दलितों में बेवकूफी व निकम्मेपन की तरफ इशारा करता है जिस का फायदा शातिर किस्म के बाबा उठाते हैं और सदियों से उन्हें बेवकूफ बनाते आ रहे हैं. इस वजह से दलित तबका गरीबी व पिछड़ेपन के दलदल से निकल ही नहीं पा रहा है. आज भी यह तबका बदहाली का शिकार बना हुआ है, जबकि सरकार इस को आगे बढ़ाने के लिए तमाम तरह की सहूलियतें दे रही है.

सरकार की सहूलियतों के चलते दलित और पिछड़ों में जो भी आगे बढ़े हैं वे अपनी जाति के दूसरे लोगों को आगे बढ़ाने के लिए पीछे मुड़ कर नहीं देखते हैं और न ही उन को ऊंचा उठाने के लिए कोई काम करते हैं, बल्कि वे भी ऊंची जाति की जमात में शामिल होने की कोशिश करते हैं.

पोंगापंथ के साए में

दलित पिछड़े अपनी बदहाली के लिए खुद ही जिम्मेदार हैं क्योंकि उन की बेवकूफी का फायदा बाबाओं द्वारा उठाया जाता है. बाबाओं द्वारा धर्मकर्म का डर दिखा कर उन की जेब खाली कर दी जाती है और ये इन बाबाओं से लुटने को हर वक्त तैयार भी रहते हैं. इन्हें अगले जन्म में ऊंची जातियों में जन्म लेने का लालच दिया जाता है.

दलितों के मन में धर्मकर्म और अंधविश्वास का डर इस कदर समाया हुआ है कि ये बेवकूफ इन बाबाओं के बहकावे में आ कर कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं.

जहां दलित तबका पुण्य कमाने और पिछले जन्म के बुरे कर्मों से छुटकारा पाने की जुगत में अपनी जेबें खाली करने में लगा है वहीं दूसरे तबकों से कहीं ज्यादा इस तबके के लोगों में अंधविश्वास की जड़ें फैली हुई हैं. दलित तबके से जुड़े लोग हर छोटीमोटी बीमारी और समस्या की वजह भूतप्रेत और काली शक्तियों को मानते हैं. ऐसे में ये लोग डाक्टर से इलाज न करा कर झाड़फूंक से समाधान ढूंढ़ने की कोशिश करते हैं.

अंधविश्वास का दायरा सिर्फ यहीं तक नहीं सिमटा है, बल्कि इस तबके से जुड़े लोग तंत्रतंत्र से अमीर होने के सपने भी देखते हैं. झाड़फूंक के दौरान इन तबके की औरतों और लड़कियों की इज्जत लुटना आम बात है.

दलित जातियों में तांत्रिकों और झाड़फूंक करने वालों की तादाद में बड़ी तेजी से इजाफा हुआ है और ये तांत्रिक हर छोटीमोटी बीमारी में भूतप्रेत का डर दिखा कर झाड़फूंक का नाटक करते हैं. इसी की आड़ में बाबाओं द्वारा दलित जाति की लड़कियों की इज्जत के साथ खिलवाड़ भी किया जाता रहा है.

अपनों से लुटते दलित

जहां एक तरफ ऊंची जातियों के हाथों दलित धर्मकर्म और पोंगापंथ के चक्कर में पड़ कर लुटते रहे हैं, वहीं दलित जातियों में भी कुछ शातिर किस्म के लोग अपनी ही जाति के लोगों को धर्मकर्म के नाम पर बेवकूफ बना कर लूटने में लगे हैं.

दलित जातियों में से ही कुछ लोग बाबागीरी का चोला ओढ़ कर दलित जातियों के लोगों को बौद्ध कथा और अंबेडकर कथा सुनाने के नाम पर उन

से मोटी रकम खर्च करवाते हैं. और अब तो इन के शादीब्याह भी दलित जाति के बाबाओं द्वारा किए जाने लगे हैं.

ये दलित जाति के बाबा ऊंची जाति के बाबाओं से कम शातिर नहीं होते हैं. चूंकि दलित जातियों के बाबा उन की अपनी जाति के होते हैं इसलिए उन की कही बातों पर यह जल्दी विश्वास कर लेते हैं और धर्मकर्म, अंधविश्वास और झाड़फूंक के चक्कर में पड़ कर अपनी माली हालत को खस्ता कर लेते हैं. इस के चलते बाद में वे नुकसान का सामना करते हैं.

सुनिश्चित थी यह हेराफेरी

चुनावी मंच पर खड़े हो कर कहना आसान है कि न खाऊंगा न खाने दूंगा पर जब देश में हरकोई खाने और निगलने को नहीं हड़पने को तैयार बैठा हो तो कैसा भी नेता हो बेईमानियां तो होंगी ही. नेताओं और अफसरों की बेईमानियां तो देश में कम नहीं हुईं ऊपर से बिल्डरों, उद्योगपतियों, व्यापारियों आदि की एक नई जमात पैदा हो गई है, जिस ने बेरहमी से बैंकों में आम गरीब जनता का पैसा ठीक उसी तरह हड़प लिया जैसे मृत्युभोज पर पंडे हड़पते हैं, जबकि मृतक के घर वाले हिसाब लगा रहे होते हैं कि कल से घर कैसे चलेगा.

पिछले 4 सालों में जब से नई सरकार कालाबाजारियों, कानून से बचने वालों, धनपतियों, बेईमानों को दुरुस्त करने के नाम पर आई है सरकारी व गैरसरकारी बैंकों ने 3,16,500 करोड़ रुपए की लेनदारी अपने खाते से हटा दी, क्योंकि पैसा वसूल करना असंभव था. इन्हीं

4 सालों में बैंकों के ऐसे कर्जों जिन्हें वसूलना नामुमकिन था बढ़ कर 7,70,000 करोड़ रुपए हो गए. यह पैसा जो कर्ज लेने वाले खा गए किस का है? यह पैसा आम छोटे खातेदारों का है.

यह विडंबना ही है कि इसी दौरान बारबार कहा गया कि कैशलैस अर्थव्यवस्था बनाई जाएगी और सभी लेनदेन बैंकों से होंगे. बैंकों तक जाना हरेक के लिए जरूरी बना दिया गया. बैंक अपनी मनमानी करने लगे हैं. क्रैडिट कार्ड वाले इस कैशलैस का फायदा उठा कर धन्ना सेठों, साहूकारों से भी कई गुना ज्यादा ब्याज वसूलने लगे हैं.

जब पहुंच वाले व्यापारी लाखोंकरोड़ों हड़प रहे थे, मंचों पर भाषणों का अमृत पिलाया जा रहा था कि अब सुख आएगा, शांति आएगी. सुख के पत्ते आए पर ज्वालामुखी फटने के बाद जलाने वाले लावे के साथ. नोटबंदी और जीएसटी को इन्हीं लाखोंकरोड़ों को वसूलने के लिए लाया गया पर दोनों से फायदा केवल बैंकों, सरकार को हुआ पर इस पैसे को भी खा लिया गया. खाने वाले कुछ बहुचर्चित तो देश छोड़ कर भाग गए पर जिन्हें अपने देश से प्रेम है या जो गरीब हैं वे भाग नहीं सकते, उस गुप्त अत्याचार को सहने को मजबूर हैं.

यह हेराफेरी बैंकों की मजबूरी नहीं थी, यह उन्होंने जानबूझ कर की. उन्हें एहसास हो गया कि नई सरकार बैंकों का उपयोग शास्त्रों और स्मृतियों की तरह कर रही है ताकि इन के माध्यम से जजमान जनता को लपेटा जा सके. बैंकों ने अपनी मनमानी कुंडलियां बनवा लीं और मांगने वाले रसूखदारों को भरभर कर्ज दिए. चूंकि बैंकों के मैनेजरों को महापुरोहितों का दर्जा दे दिया गया, उन से सवालजवाब करने बंद कर दिए गए. पाप और पुण्य का लेखाजोखा केवल आम जनता, जो जजमान कस्टमर बन कर रह गई, तक रह गया. नतीजा सामने है. कुछ को पुण्य मिला है जो पैसा डकार गए, बाकियों के हाथों में पाप आ गए.

जानिए कौन हैं राजनीति के जेठालाल, सुंदर और दयाबेन

लाखों में एक बहनोई मुश्किल से मिलेगा जो ईमानदारी से दिल पर हाथ रखकर कह पाये का हां उसका साला बहुत तो नहीं पर अच्छा है इसके बाद भी जाने क्यों लोग बड़ी चुटकियां लेकर यह कहावत दोहराते रहते हैं कि सारी दुनिया एक तरफ और जोरू का भाई एक तरफ. पत्नी एक दफा सलीके की न हो तो भी ज़िंदगी जैसे तैसे रोते झींकते गुजर जाती है लेकिन साला अगर तिरछा आड़ा हो तो ज़िंदगी कितनी दुश्वार हो जाती है यह सब टीवी के मनोरंजक धारावाहिक तारक मेहता का उल्टा चश्मा के केंद्रीय पात्र जेठालाल को देख समझा जा सकता है जिसका साला सुंदर जब भी अहमदाबाद से मुंबई आता है जीजा के लिए एक नई मुसीबत लेकर आता है. इसीलिए जेठलाल उसे पनौती कहकर बुलाता है.

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान का चेहरा वाकई उस वक्त उतर गया जब उनके साले संजय सिंह ने भाजपा छोड़ कांग्रेस का दामन थाम लिया जाते जाते संजय सिंह ने कई गंभीर आरोप भी भाजपा पर मढ़ डाले कि उसमें कामदारों की नहीं बल्कि नामदारों की पूछ है और भाजपा में वंशवाद खूब फल फूल रहा है.

बात यहीं खत्म हो जाती तो कोई बात ही नहीं थी पर संजय सिंह ने बिना किसी लागलपेट के यह भी कहा कि मध्यप्रदेश को अब शिवराजसिंह की नहीं बल्कि कमलनाथ की जरूरत है और छिंदवाड़ा का विकास इसका गवाह भी है. गौरतलब है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ छिंदवाड़ा के सांसद भी हैं. दिल और दल परिवर्तन वाले दिन 3 नवंबर को पत्रकार वार्ता में जैसे जैसे संजय कमलनाथ की तारीफ़ों में कसीदे गढ़ते जा रहे थे वैसे वैसे कमलनाथ का चेहरा कमल की तरह खिलता जा रहा था. बात थी भी कुछ ऐसी ही आखिर सीएम के साले को जो तोड़कर लाये थे. यह और बात है कि पेड़ से नाराज आम की तरह यह साला खुद उनकी झोली में आ गिरा था. अब आम पका था या कच्चा है इसका फैसला तो 11 दिसंबर को मतगणना वाले दिन होगा लेकिन कांग्रेस ने पेड़ गिनने की गलती नहीं की और इस कहावत के माने भी बता दिये कि चोरी के आम छांट कर नहीं खाये जाते.

संजय सिंह को नजदीक से जानने वाले एक प्रापर्टी ब्रोकर भी 2 नवम्बर को उनकी फ्लाइट में थे वे बताते हैं कि संजय उस दिन पत्नी ज्योति सहित दिल्ली के लिए उड़ान भर रहे थे लेकिन बातों में उन्होने हवा नहीं लगने दी कि वे दिल्ली किस मकसद से जा रहे हैं. भोपाल हवाईअड्डे का सारा स्टाफ जानता है कि सीएम के साले साहब दिल्ली या मुंबई जाते आते रहते  हैं.

संजय सिंह तब किशोरावस्था छोड़ युवावस्था में प्रवेश कर रहे थे जब शिवराजसिंह से उनकी बड़ी बहिन साधना सिह की शादी हुई थी. राजनीति में अपनी पहचान बनाने में जुटे शिवराज सिंह को साधना वाकई लकी साबित हुईं और देखते देखते वे विदिशा सांसद से सफर शुरू करते मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बन बैठे. आरएसएस के अखाड़े की मिट्टी को बचपन में ही माथे से लगा चुके शिवराजसिंह को एहसास था कि भाजपाई राजनीति कांग्रेस से कहीं ज्यादा चक्करदार है. वहां तो नेहरू गांधी परिवार की परिक्रमा मात्र से मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं लेकिन यहां हर कोई गिरहबान पकड़ लेता है. इसी तजुर्बे के चलते उन्होने कभी अपनों या गैरों से मात नहीं खाई और सब को खुश रखने की नीति पर चलते 14 साल राज किया. कोई शक नहीं कि पहले कार्यकाल में मतदाता उनसे बहुत खुश था दूसरा मौका उन्हें अपने दम पर मिला था और तीसरा हालातों की देन था.

इसी दौरान जाने कब अपने घर गोंदिया से बालाघाट होते हुये संजय सिंह भोपाल आ गए और ऐसे जमे कि देखते ही देखते अरबों के आसामी बन गए.  शुरू में वे जमीन खरोदफ़रोख्त का कारोबार करते थे. साधना सिंह उन्हें बहुत चाहती थीं इसलिए उन्होने अपने भाई को फलने फूलने दिया और यह कोई खास हर्ज की बात भी नहीं थी क्योंकि संजय सिंह वही कर रहे थे जो उन दिनों हर पांचवा बेरोजगार नौजवान कर रहा था इस धंधे को बढ़ाचढ़ा कर बताने रियल एस्टेट नाम दिया जाता है.

संजय सिंह को कोई शक नहीं कि अपने बहनोई के मुख्यमंत्री होने का स्वभाविक फायदा मिला और हर कोई उनके साथ डील करने में अपना फायदा देखने लगा लेकिन उन्होने किसी को ज्यादा मुंह नहीं लगाया. जब पैसा आ गया तो संजय सिंह भोपाल के पाश इलाके चूनाभट्टी में अपना न्यारा यानि अलग बंगला बनाकर रहने लगे. इसके बाद उन्होने अपना कारोबार और फैलाया और ग्लेमर की दुनिया में पाँव जमाने की अपनी सोई हसरत भी पूरी की. राजनीति और पेडमेन जैसी हिट फिल्मों में वे छोटे मोटे रोल में थे । अब तक उनके पास करोड़ों की जमीन जायदाद हो चुकी थी और कारों का अपना शौक भी उन्होने पूरा कर लिया था. संजय सिंह के पास पांच बड़ी और महंगी कारें हैं.

जिस कांग्रेस में वे अपने बहनोई को ठेंगा दिखाते गए उसी कांग्रेस ने कभी उन पर आरोप शिवराज सिंह को घेरने की गरज से लगाए थे कि संजय सिंह ने फिल्म इंडस्ट्री को कोई 200 करोड़ रु फायनेंस कर रखे हैं और सीएम के रसूख के दम पर बालाघाट में बाक्साइट की खदानें ले रखी हैं. पिछले यानि साल 2013 के विधानसभा के चुनाव में उन पर अपनी नीलाक्ष कंस्ट्रकशन कम्पनी के फर्जी दस्तावेज़ बनाने का आरोप भी कांग्रेस ने लगाया था. तब भी बात आई गई हो गई थी और भाजपा की जीत के बाद संजय सिंह पहले की तरह अपने कारोबारों में मशगूल हो गए थे.

जीजा साले के बीच खटास इसी साल आना शुरू हुई थी जिसकी असल वजह हाल फिलहाल किसी को नहीं मालूम लेकिन यह विदिशा में हर कोई जानता है कि शिवराज सिंह ने मुख्यमंत्री रहते विदिशा के गांव टीला बेस में अनाप शनाप जमीने खरीदी हैं और इस काम को अंजाम देने वाले उनके खासमखास मुकेश टंडन को उन्होने नगर पालिका का अध्यक्ष बनवा दिया था. बेहद गरीव परिवार से ताल्लुक रखने वाले औटो रिक्शा चालक मुकेश टंडन को जब विदिशा विधानसभा से इस बार टिकिट शिवराज सिंह ने अपने कोटे से दिलवा दिया तो साले साहब को गुस्सा आ गया क्योंकि वे भी बालाघाट से टिकिट चाह रहे थे और इस बाबत काफी तैयारियां भी वहां कर चुके थे.

टिकिट नहीं मिला तो वे गुस्सा उठे. हवाईजहाज में दिल्ली गए ब्रोकर की मानें तो उनकी एंट्री सीएम हाउस में बंद कर दी गई थी फिर भी उन्हें टिकिट मिलने की उम्मीद थी.

हर कोई यह भी जानता है कि शिवराज सिंह अपनी पत्नी को बहुत चाहते हैं लेकिन शायद साधना सिंह की समझाइश भी संजय के गले नहीं उतरी और उन्होने अपने बहनोई की मान मर्यादा का ख्याल नहीं किया. संजय सिंह को शायद यह भी नागवार गुजर रहा था कि जीजी और जीजाजी दोनों मिलकर अपने बेटे कार्तिकेय को राजनीति में ब्रेक दे रहे हैं. गौरतलब है कि पिछले कुछ दिनो से कार्तिकेय न केवल समाज के कार्यक्रमों में जा रहे हैं बल्कि राजनैतिक सभाओं में भी भाषण देने लगे हैं. हाल ही में उन्होने राहुल गांधी पर मानहानि का मुकदमा दायर किया तो मीडिया ने उन्हें हाथो हाथ लिया था. राहुल गांधी गफलत में यह बोल बैठे थे कि सीएम के बेटे का नाम पनामा पेपर लीक में आया है जबकि नाम छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह के बेटे अभिषेक सिंह का आया था.

अब जब सब कुछ साफ है तब साधना सिंह के द्वंद और परेशानी पर कोई ध्यान नहीं दे रहा कि उन पर क्या गुजर रही होगी एक तरफ बेटे जैसा भाई है तो दूसरी तरफ देवता समान पति की प्रतिष्ठा है.अब हर कोई कह रहा है कि एक साला तो संभाला नहीं गया शिवराज सिंह राज्य क्या संभालेगे. साधना सिंह अच्छी बात है ज्यादा विचलित नहीं हुईं हैं और पहले की तरह पति के साथ खड़ी हैं जिनकी बड़ी ताकत वे शुरू से रहीं हैं. अच्छी बात यह भी है कि वे सुंदर बन चुके संजय पर जेठालाल की पत्नी दयाबेन जैसा नाजायज लाड़ नहीं लुटा रहीं.

 

खूब खेला क्रिकेट, लेकिन नहीं लगा पाए एक भी छक्का

आज के दौर में क्रिकेट खेल से ज्यादा एंटरटेनमेंट बन चुका है. टी20 और आईपीएल के आने के बाद तो इस खेल की शोहरत और बढ़ चुकी है. मैदान के चारों तरफ जब तक चौके-छक्के न लगे, तब तक दर्शकों को मजा नहीं आता. लेकिन क्रिकेट के इतिहास में ऐसे भी खिलाड़ी हुए हैं, जिन्होंने अपने पूरे वनडे करियर में एक भी छक्का नहीं लगाया.

आपने अब तक ऐसे बल्लेबाज के बारे में बहुत सुना होगा जिनके बल्ले से सबसे ज्यादा छक्के निकले हो, लेकिन आज हम आपको बताने वाले हैं उनके बारे में जिन बल्लेबाजों ने वनडे में नहीं लगाया एक भी छक्का.

मनोज प्रभाकर, भारत

इस औलराउंडर ने भारत की ओर से 1984-1996 तक क्रिकेट खेला था. हालांकि प्रभाकर भारतीय टीम के फास्ट बौलर थे, लेकिन बल्ले से भी कई बार उन्होंने कामयाबी का स्वाद चखा है. टीम इंडिया के लिए प्रभाकर ने कई मौकों पर ओपनिंग की. दिल्ली के इस खिलाड़ी ने 39 टेस्ट मैच खेले, जिसमें उन्होंने 33 से कम की औसत से 1600 रन बनाए. वहीं 130 वनडे मैचों में उन्होंने 1858 रन बनाए, जिसमें 2 शतक और 11 अर्धशतक शामिल है. वह 1987, 1992 और 1996 वर्ल्ड कप टीम का हिस्सा भी रहे हैं. इतने लंबे वनडे करियर के बावजूद उन्होंने कभी एक छक्का नहीं लगाया.

थिलन समरवीरा, श्रीलंका

महेला जयवर्धने और कुमार संगकारा के सपोर्ट में खेलते रहे समरवीरा. उन्होंने 81 टेस्ट मैचों में 5462 रन बनाए. वनडे में हालांकि वह इस कामयाबी को दोहरा नहीं पाए. उन्होंने 12 साल में सिर्फ 53 वनडे ही खेले. इस दौरान वह केवल 862 रन ही बना पाए. और इन 42 पारियों में वह कोई छक्का नहीं लगा पाए.

जैफ्री बायकाट, इंग्लैंड

इंग्लैंड के सबसे महान खिलाड़ियों में से एक जैफ्री बायकाट को टेस्ट क्रिकेट में उनकी पारियों के लिए याद किया जाता है. उन्होंने 36 वनडे मैच खेले लेकिन कभी छक्का नहीं जड़ा. उन्होंने एक शतक और 9 अर्धशतक की मदद से वनडे क्रिकेट में 1000 से ज्यादा रन बनाए हैं.

कैलम फर्ग्युसन, आस्ट्रेलिया

आस्ट्रेलिया के इस खिलाड़ी ने साल 2009 में डेब्यू किया था और 30 वनडे मैच खेले. अपने अब तक के करियर में उन्होंने 40 से ज्यादा की एवरेज से 5 हाफ सेंचुरी की मदद से 663 रन बनाए हैं. उनकी 85 की स्ट्राइक रेट बताती है कि वह कहीं से भी धीमा खेलने वाले खिलाड़ी नहीं थे. लेकिन फिर भी वह कभी वनडे में छक्का नहीं लगा पाए.

डियोन इब्राहिम, जिम्बाब्वे

अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में इस खिलाड़ी ने जिम्बाब्वे की ओर से साल 2001 में डेब्यू किया था. उनका करियर खास टेक औफ नहीं ले सका. 29 टेस्ट के अलावा उन्होंने 82 वनडे मैच खेले, जिसमें उन्होंने 1443 रन बनाए. उनका औसत मात्र 20 का था. उन्होंने एक बांग्लादेश के खिलाफ 121 रन बनाए थे. वनडे में उन्होंने 4 अर्धशतक जड़े हैं, लेकिन कभी आगे बढ़कर गेंद को सीमा पार नहीं पहुंचाया. यही हाल उनका टेस्ट क्रिकेट में भी रहा.

अगर ये तरीके अपनाएंगे तो हर कोई पढ़ना चाहेगा आपका ईमेल

पहले के जमाने में लोग पत्र लिखा करते थे एक दूसरे को और पत्र के माध्यम से ही सूचनाओं का  आदान प्रदान होता था. लेकिन पत्र लिखने की हमारी इन आदतों को इमेल ने हमसे छीन लिया है. इमेल हमारी जिंदगी का एक अभिन्न हिस्सा भी बन गए हैं. खासतौर पर औफिशियल प्रयोग में यह महत्वपूर्ण टूल है. ईमेल लिखने के तरीके से रिसीवर के दिमाग में हमारी एक छवि बन जाती है. इसी के साथ एक आम मेल और अच्छे फौर्मेट में लिखे हुए मेल में बहुत अंतर होता है. अगर आपके काम में भी ईमेल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है तो कुछ ऐसी आदतें हैं जिसको बदलना बहुत जरुरी है.

आज हम आपको ऐसी ही कुछ आदतों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें बदलकर आप बेहतर तरीके से ईमेल को भेज पाएंगे

जरुरी इमेल का हमेशा करें रिप्लाई

आपको कैसा लगेगा अगर आप किसी से कुछ पूछें और आपको उसका रिप्लाई ना मिले. ठीक इसी तरह अगर आपको कोई मेल आया है जिसको एकनौलेज करना जरुरी है, तो समय निकलकर उसका रिप्लाई जरुर करें. इससे रिसीवर को यह सन्देश भी जाएगा की आप उसकी बात पर गौर कर रहे हैं.

मेल में सब्जेक्ट कौलम को खाली न छोड़ें

हम में से कई लोग मेल तो अच्छे लिखते हैं लेकिन सब्जेक्ट के कौलम को खाली छोड़ देते हैं. इससे रिसीवर को पता ही नहीं चलता की अपने मेल किस बारे में लिखा है. इस तरह के मेल्स कई बार इग्नोर भी हो जाते हैं या उन्हें स्पैम समझ कर डिलीट भी कर दिया जाता है.

मेल को रखें एरर फ्री

कोशिश करें की ईमेल कोे भेजने से पहले एक बार आप चेक करले की सबकुछ ठीक है या कहीं कोई गलती तो नही.. ईमेल में की कई गलतियां आपके आने वाले अवसर को खराब भी कर सकतीं हैं. आपके द्वारा लिखा गया मेल रिसीवर के लिए आपकी छवि है. इसलिये अगर आप गलत या गलतियों से भरा मेल करेंगे तो यह आपकी छवि को खराब कर सकता है.

कैप्स में ना लिखें मेल

अपने मेल को कभी भी कैप्स में ना लिखें, सभी शब्दों के लिए कैप्सलौक का प्रयोग सामने वाले के सामने गलत सन्देश भेजता है. इससे पढ़ने वाले को यह अंदेशा लगता है की या तो आप गुस्से में हैं या नकारात्मक रुप से जवाब दे रहे हैं.

मेल में शार्ट लैग्वेज  का प्रयोग ना करें

ईमेल टेक्स्ट की तरह नहीं होते, टेस्टिंग करते समय जैसे आप LOL, BTW, इत्यादी सोशल मीडिया पर प्रयोग होने वाले शार्ट फार्म का प्रयोग ना करे. ईमेल टेक्स्ट के जरिये कम्यूनिकेशन का माध्यम जरुर है, लेकिन यह एक फौर्मल प्रोफेशनल कम्युनिकेशन माना जाता है.

बुराई: शराबखोरी से कौन आबाद कौन बरबाद?  

पिछले दिनों सोशल मीडिया पर एक तसवीर खूब वायरल हुई थी. इस में देशी व अंगरेजी शराब की दुकानों के बीच में मद्यनिषेध महकमे का बोर्ड टंगा था. यह तो ठीक वही बात हुई कि पहले चोर से कहो कि तुम चोरी करो और बाद में पुलिस से कहो कि इन्हें मत छोड़ना.

इस तरह के पाखंड व दिखावे तो हमारे समाज में कदमकदम पर देखने को मिलते हैं. मसलन, एक ओर सिगरेट धड़ल्ले से बनतीबिकती हैं, दूसरी ओर उन की डब्बी व इश्तिहारों में लिखते हैं कि ‘सिगरेट पीना सेहत के लिए हानिकारक है.’ इसी तरह प्लास्टिक, औक्सीटोसिन के इंजैक्शन व फलों को पकाने वाले जहरीले कैमिकल वगैरह से परहेज व पाबंदियां हैं, लेकिन उन्हें बनाने व बेचने की पूरी छूट है.

सिर्फ एक शराब के मामले में ही नहीं, बल्कि देश की राजनीति, सरकार व धर्म के ठेकेदारों की उलटबांसियां भी कुछ कम नहीं हैं, इसलिए कदमकदम पर बड़े ही अजब व गजब खेल दिखाई देते हैं. मसलन, एक ओर राज्य सरकारों के आबकारी महकमे नशीली चीजों की बिक्री से कमाई करने में जुटे रहते हैं, वहीं दूसरी ओर समाज कल्याण व मद्यनिषेध जैसे महकमे करोड़ों रुपए इन से बचाव के प्रचार में खर्च करते हैं.

जहांतहां दीवारों पर नारे लिखे जाते हैं, होर्डिंग लगाए जाते हैं और इश्तिहार दिए जाते हैं कि शराब जहर से भी ज्यादा खराब व नुकसानदायक है. इस तरह 2 नावों पर पैर रख कर करदाताओं की गाढ़ी कमाई का पैसा बड़ी ही दरियादिली के साथ पानी में बहाया जाता है. इन में कोई एक काम बंद होना जरूरी है, लेकिन इस की फिक्र किसे है?

कहने को आबकारी महकमे नशीली चीजों की बिक्री पर नकेल कसते हैं, लेकिन असल में तो वे भांग, शराब वगैरह के ठेके नीलाम कर के रंगदारी वसूलते हैं. कहा यह जाता है कि वे लोगों को जहरीली शराब पीने से बचाते हैं. जायज व नाजायज शराब में फर्क बताते हैं. सरकारी कायदेकानून को लागू कराते हैं, लेकिन सब जानते हैं कि हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं, इसलिए भ्रष्टाचारी खूब खुल कर खेलते हैं.

इसी वजह से गुड़गांव, हरियाणा में रेयान स्कूल के पास अंगरेजी शराब की दुकान चल रही थी. हफ्तावूसली करने वालों की वजह से ज्यादातर ठेकों पर तयशुदा वक्त से पहले व बाद में और बंदी के दिन भी शराब की बिक्री चोरीछिपे बराबर चलती रहती है.

शराब बेचने की दुकानों को लाइसैंस देने के नाम पर उन से भरपूर कीमत वसूली जाती है. मसलन, उत्तर प्रदेश में आबकारी महकमे का कुल सालाना बजट 122 करोड़, 78 लाख रुपए का है, जबकि साल 2017-18 में उत्तर प्रदेश सरकार ने आबकारी से 8 अरब, 916 करोड़ रुपए कमाए. जाहिर है कि शराब का धंधा सरकारों के लिए सोने की खान है.

शराब की मनमानी कीमत तो शराब बनाने वाले खरीदारों से लेते ही हैं, इस के अलावा करों के नाम पर अरबोंखरबों रुपए जनता की जेब से निकल कर विकास के नाम पर सरकारी खजाने में चले जाते हैं. इस का एक बड़ा हिस्सा ओहदेदारों की हिफाजत, सहूलियतों, बैठकों, सैरसपाटों, मौजमस्ती वगैरह पर खर्च होता है.

शराब खराब है, यह बात जगजाहिर है. ज्यादातर लोग इसे जानते और मानते भी हैं, लेकिन कमाई के महालालच में फंसी ज्यादातर सरकारें शराबबंदी लागू ही नहीं करती हैं.

गौरतलब है कि गुजरात, नागालैंड, मणिपुर व बिहार समेत देश के 4 राज्यों में शराबबंदी होने से सरकारें कौन सी कंगाल हो गई हैं? उत्तर प्रदेश में सरकार को होने वाली कमाई का महज 17 फीसदी आबकारी से आता है.

इसे दूसरे तरीकों से भी तो पूरा किया जा सकता है. मसलन, तत्काल सेवाओं के जरीए, कानून तोड़ने वालों पर जुर्माना बढ़ा कर, हथियारों, महंगी गाडि़यों वगैरह पर बरसों पुरानी फीस की दरें बढ़ा कर, सरकारी इमारतों व रसीदों पर इश्तिहार लेने जैसे कई तरीके हैं, जिन से जनता पर बिना कर लगाए भी राज्यों की सरकारें अपनी कमाई बढ़ा सकती हैं, लेकिन ज्यादातर ओहदेदार तो खुद शराब पीने के शौकीन होते हैं, इसलिए वे शराबबंदी को लागू करने के हक में कभी नहीं रहते हैं.

यह है वजह

लोग नशेड़ी कैसे न हों क्योंकि हमारा धर्म तो खुद नाश करने की पैरवी करता है. शिवशंकर के नाम पर भांग, गांजा, सुलफा वगैरह पीने वाले साधुमहात्माओं व?भक्तों की कमी नहीं है. कांवड़ यात्रा के दौरान तो ऐसे नशेड़ी खुलेआम सामने आ कर सारी हदें पार कर देते हैं. इस के अलावा धर्म की बहुत सी किताबों में सोमरस पीने का जिक्र आता है.

शराब का इतिहास सदियों पुराना है. अंगूर से अलकोहल तक, ताड़ी से कच्ची व जहरीली शराब पी कर बहुत से लोग अपनी जान गंवा चुके हैं.

दरअसल, हमारा धर्म भी इस की इजाजत देता है. कई देवीदेवताओं की पूजा में शराब का भोग लगाया जाता है, फिर उसे प्रसाद के तौर पर भक्तों में बांटा जाता है. काली माई व भैरव के मंदिरों में शराब की बोतलें चढ़ाने जैसे नजारे देखे जा सकते हैं.

शादीब्याह के मौकों पर मौजमस्ती करने, खुशियां मनाने, गम भुलाने, तीजत्योहार या दावतों में मूड बनाने के नाम पर अकसर शराब के दौर चलते हैं. धीरेधीरे शराब पीने की यह लत रोज की आदत बन जाती है. शराब के नशे में इनसान का अपनी जबान, हाथपैर व दिमाग पर काबू नहीं रहता है. शराब पीने से शरीर कांपने लगता है. चिड़चिड़ापन, उदासी व बेचैनी बढ़ने लगती है. जिगर खराब होने लगता है. कई तरह की बीमारियां घेरने लगती हैं. इनसान इस का आदी हो जाता है. इस की लत लग जाने पर फिर शराब छोड़ना आसान नहीं रहता. आखिर में शराबी दूसरों की नजरों में भी गिरने लगता है.

फिर भी कई लोग दूसरों को बहलाफुसला कर अपना हमप्याला बनाने के लिए कहते हैं कि शराब पीना सेहत के लिए अच्छा रहता है, जबकि ऐसा कुछ नहीं है.

नुकसान ही नुकसान

शराब इनसान, उस की जेब व उस के घरपरिवार को तबाह कर देती है, फिर भी इसे पीने वालों की गिनती बढ़ रही है. अब औरतें व बच्चे भी इस के शिकार हो रहे हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 37 करोड़ से भी ज्यादा लोग शराब पीते हैं. इन में से आधे से ज्यादा लोग बहुत बड़े पियक्कड़ हैं.

शराब पीने से हर साल लाखों लोग बीमारियों व मौत के मुंह में चले जाते हैं. उन की माली हालत खराब हो जाती

है. न जाने कितने लोग शराब के नशे में कानून तोड़ते हैं. दूसरों के साथ गालीगलौज, झगड़ाफसाद व दूसरे जुर्म करते हैं. अपने बीवीबच्चों को मारतेपीटते हैं. लेकिन शराब की लत के शिकार लोगों व सरकारों की आंखें नहीं खुलती हैं.

शराब पी कर गाड़ी चलाने की वजह से सड़कों पर हो रहे हादसों में लाखों लोगों की जानें चली जाती हैं, लोग फिर भी अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मारते रहते हैं. कई बार बेगुनाह भी उन की गलती व लापरवाही के शिकार हो जाते हैं. राह चलते या सड़क किनारे सोने वाले गरीब लोग शराबियों की गाडि़यों की चपेट में आ कर अपनी जान तक गंवाते रहते हैं.

दरअसल, पूरे देश में शराबबंदी लागू होनी लाजिमी है, लेकिन ऐसा करना आसान काम नहीं है. नीतीश कुमार की सरकार ने बिहार में शराबबंदी कानून लागू की थी, लेकिन सरकार के इस फैसले को सब से तगड़ा झटका पटना हाईकोर्ट से उस वक्त लगा, जब जारी आदेश में कहा गया कि किसी भी सभ्य समाज में इतने कड़े कानून लागू नहीं किए जा सकते. यह जनता के हकों को छीनने जैसा है.

इस से पहले हरियाण, आंध्र प्रदेश, मिजोरम व तमिलनाडु राज्यों में भी शराबबंदी लागू की गई थी लेकिन भारी दबाब के चलते उसे वापस लेना पड़ा. दरअसल, शराब चाहे जायज तरीके से बनी हो या नाजायज तरीके से, वह सरकारों, नेताओं व पुलिस सब की कमाई का बड़ा जरीया है. राजकाज चलाने वाले ओहदेदार चाहते हैं कि शराब की खपत दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती रहे. ऐसे में जरूरत खुद सोचसमझ कर कदम उठाने की है.

हालांकि शराब की लत छुड़ाने के तरीके व पुनर्वास केंद्र वगैरह हैं, लेकिन इन सब में वक्त व पैसा बहुत लगता है. साथ ही, तब तक शराब दीमक की तरह अंदर ही अंदर खा कर इनसान को खोखला कर चुकी होती है, इसलिए पहले से ही पूरी सावधानी बरतें, वरना पछतावे के साथ यही करना पड़ेगा कि सबकुछ लुटा के होश में आए तो क्या हुआ.

प्रदूषण तुम्हारा और प्रमोशन हमारा : एयर प्योरिफायर्स ब्रैंड्स की ‘मौका’ मार्केटिंग

दिल्ली में प्रदूषण किस कदर बढ़ चुका है इसकी गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि एक टेक कंपनी में एनालिटिक्स हेड को जब दिल्ली में 80 फीसदी सैलरी जंप के साथ औफर दिया गया, तो भी उसने राजधानी की जहरीली हवा में काम करने से इनकार कर दिया.

हालांकि बाकी दिल्लीवासी मुंह में हाथ, रुमाल या बेअसर मास्क पहनकर रोज जी ही रहे हैं. अखबार हवा की बदतर स्थिति का हवाला देकर आगाह करते हैं लेकिन बढ़ते प्रदूषण से फेफड़े चोक करवाने के सिवा आम लोगों के पास कोई और विकल्प बचा है क्या.

हालांकि पूरी दिल्ली में एयर क्वालिटी इंडेक्स को 401 यानी जिसे बेहद खतरनाक स्थिति में देखते हुए पर्यावरण मंत्रालय का केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सार्वजनिक स्थलों पर एयर प्यूरीफायर लगवाने का निर्णय लिया है. दिल्ली के सबसे भीड़भाड़ वाले आइटीओ चौक से इसकी शुरूआत कर दी गई है.

प्रदूषण की पब्लिसिटी

अब यह प्रदूषण भले ही आम लोगों का दम घोट रहा हो लेकिन एयर प्योरिफायर कम्पनियों के लिए यह मुनाफे का सौदा बनकर आया है. जैसे जैसे प्रदूषण का स्तर बढ़ता जा रहा है इनके प्रचार कैम्पेन भी तेज होते जा रहे हैं. जिसकी वजह से एयर प्यूरीफायर की सेल बढ़ रही है. साथ ही ये न्यूज़ बिज़नेस के रूप में भी उभर के आ रहा है.

यों तो इनकी सेल पूरे देश के लिए होती है लेकिन अब ये दिल्ली को टार्गेट कर अलग तरह के प्रोमोशनल प्रोडक्ट कैम्पेन चला रहे हैं. जिसमें होर्डिंग्स में बड़े बड़े अक्षरों में दिल्ली की बदतर हवा के आंकड़े दिखाकर अपना सामना बेचने की अपील की जा रही है. चाइना की फोन सेलिंग कम्पनी एमआई ने अपने नए एयर प्योरिफायर के एक एड में ऐसा ही किया है.

कई कम्पनियां हैं मैदान में

विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जारी एक रिपोर्ट में दुनिया के 20 सबसे प्रदूषित शहरों में लगभग आधे भारत के हैं. बढ़ते एयर पॉल्यूशन से इंडिया में एयर प्यूरीफायर इंडस्ट्री 1400 करोड़ रुपए की हो गई है. भारत में इसकी सालाना ग्रोथ 50 फीसदी के लगभग है. पिछले कुछ साल से शाओमी, यूरेका फोर्ब्स, फिलिप्स और सैमसंग समेत कई कंपनियों ने भारतीय बाजार को ध्यान में रखते हुए होम एयर प्यूरिफायर पेश किए हैं.

ये प्यूरिफायर अलग-अलग प्राइस रेंज में आते हैं. आसानी से इस्तेमाल किए जा सकने वाले प्यूरिफायर एंट्री लेवल पर 14×12 फीट के कमरे को कवर कर सकते हैं. वहीं महंगे मॉडल बड़े एरिया को कवर करते हैं. शुरुआती मॉडल की कीमत 10,000 रुपए से शुरू होकर 40,000 रुपए तक के हैं.

एमआई ने काफी पहले अपना एयर प्योरिफायर लांच कर दिया था लेकिन अब हालत और मुनाफा का अंदेशा बढ़ते देख कई और कम्पनियां एयर प्योरिफायर के बाजार में उतरी हैं. हाल में घर के अंदर की हवा को साफ करने की समस्या का सोलुशन देते हुए पैनासॉनिक ने नैनो टेक्नोलॉजी से लैस एयर प्योरिफायर बाजार में उतारा है. जापानी टेक्नॉलॉजी कंपनी पैनासॉनिक एयर प्योरिफायर्स की बड़ी रेंज प्रोवाइड करा रहा है.

कंपनी का दावा है कि इस एयर प्योरिफायर के फिल्टर्स 17 तरीके के वायरस को 99 प्रतिशत कम कर सकते हैं. हालांकि हर एयर प्यूरीफायर अपने फीचर्स में यही दावे कर रहा है और दिल्ली के बढ़ते प्रदूषण को भुनाने में मसरूफ है.

चीन से लें सबक

china

दिल्ली में तो महज पांच इलाकों में एयर प्यूरीफायर लगाने की बात हो रही है लेकिन चीन तो इस मामले में कई कदम आगे निकल चुका है. चीन ने दुनिया का सबसे बड़ा प्यूरीफायर शांक्शी प्रांत के झियान शहर में एक टॉवर पर लगाया गया है. ये 330 फीट ऊंचा एअर-प्यूरीफायर है. दावा किया जाता है कि यह अकेला एयर प्यूरीफायर पूरे शहर की हवा साफ रखने की क्षमता रखता है.

सौर ऊर्जा से नियंत्रित यह टावर हमारे लिए सबक जैसा है की जब चीन प्रदूषण के लड़ने के लिए साइंस की मदद से इतने बड़े उपाय तलाश रहा है जबकि हमारे बाजार महज एक दो कमरों की हवा साफ करने वाले छोटेमोटे एयर प्योरिफायर्स के बाजार में फंसी है.

ईशनिंदा से क्यों डरते हैं धर्म के ठेकेदार

धर्म ताश के पत्तों के महल की तरह है इसीलिए धर्म की जरा सी बुराई से धर्म के ठेकेदार थर्रा उठते हैं और इकट्ठा हो कर होहल्ला मचाने लगते हैं. उन्हें भय इस बात का रहता है कि धर्म की बुराई से कहीं पोलपट्टी न खुल जाए. धर्म और उन के ठेकेदारों की असलियत सामने न आ जाए.

पाकिस्तान में इन दिनों ऐसा ही हो रहा है. यहां के सुप्रीम कोर्ट ने ईशनिंदा के मामले में एक ईसाई महिला आसिया बीबी को बरी कर दिया तो देश भर में प्रदर्शन और हिंसा का दौर शुरू हो गया. मूरखों की भीड़ सड़कों पर आ गई. कट्टरपंथी संगठनों के नेता और उन की पिछलग्गू जमात जजों के खिलाफ प्रदर्शन करने लगी.

पाकिस्तान में कई जगहों पर आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसा की घटनाएं हुईं. 4 राज्यों में धारा 144 लागू करनी पड़ी. कई इलाकों में सरकार को इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गई. कुछ राज्यों में टे्रनें और स्कूलें भी बंद कर दी गईं. पंजाब प्रांत में हाई अलर्ट घोषित किया गया. लाहौर, कराची, पेशावर, फैसलाबाद समेत 10 से अधिक बड़े शहरों में पुलिस ने कफ्यू लागू कर दिया और 10 नवंबर तक जनसभाएं करने पर भी रोक लगा दी गई है.

अदालत ने आसिया की फांसी की सजा को जैसे ही पलटा, कई शहरों में मस्जिदों से लोगों को इकट्ठा होने के ऐलान होने लगे. कुछ ही देर में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए और आगजनी करने लगे. प्रदर्शनों के कारण कई हाईवे बंद कर दिए गए.

कट्टरपंथियों ने यहां तक कह दिया कि जज और सेना प्रमुख मुसलमान ही नहीं हैं. हालात इतने बिगड़ गए कि प्रधानमंत्री इमरान खान को सामने आना पड़ा. उन्होंने कहा कि जजों ने जो फैसला दिया है, वह इस्लामी कानून के मुताबिक ही है. इसे सभी को स्वीकार करना चाहिए.

असल में मामला 2010 का है. ईसाई धर्म से ताल्लुक रखने वाली 4 बच्चों की मां आसिया बीबी का अपने मुस्लिम पड़ोसियों से विवाद हो गया था. आसिया की गलती सिर्फ इतनी थी कि उस ने कुएं के पास मुस्लिम महिलाओं के लिए रखे गिलास से पानी पी लिया.

मुस्लिमों ने कहा कि गिलास नापाक हो गया. आसिया उन्हें समझाने लगी और ईसा मसीह और पैगंबर मोहम्मद की तुलना कर दी. इस के बाद पड़ोसियों ने उस पर ईशनिंदा कानून के तहत मामला दर्ज करा दिया.

निचली अदालत ने ईशनिंदा के आरोप में आसिया को फांसी की सजा सुना दी थी लेकिन  मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा. इस दौरान मुस्लिम उदारवादी नेताओं और दुनिया भर के मानवाधिकार के पक्षाधर लोगों के बीच आसिया की फांसी को रद्द करने की मांग उठने लगी.

2011 में पंजाब के पूर्व गवर्नर सलमान तासीर की उन के बौडीगार्ड ने इसीलिए हत्या कर दी थी कि सलमान तासीर ने आसिया की रिहाई की वकालत की थी. इस के साथसाथ वह तालीबान जैसे कट्टरपंथियों और मुल्लामौलवियों जरा भी तवज्जो नहीं देते थे. उन की आलोचना करने से नहीं डरते थे.

आसिया की पैरवी करने की वजह से अल्पसंख्यक मंत्री शाहबाज भट्टी की भी हत्या कर दी गई थी.

असल में 1982 में तानाशाह जियाउल हक ने ईशनिंदा को लागू किया था. पाकिस्तान पीनल कोड [पीपीसी] में 295 बी जोड़ कर ईशनिंदा कानून बनाया गया. इस से पहले 1860 में ब्रिटिश शासन ने धर्म से जुड़े अपराधों के लिए यह कानून बनाया था लेकिन उस समय इस का उद्देश्य धार्मिक दंगे और हिंसा को रोकना था.

1982 में जिया सरकार ने संशाधन कर के कुरान के अपमान को अपराध की श्रेणी में रख दिया. 1986 में ईशनिंदा कानून में धारा 295सी भी जोड़ दी गई और पैगंबर मोहम्मद के अपमान पर उम्रकैद या मौत की सजा का प्रावधान किया गया.

यह कानून अभी भी 70 से अधिक देशों में है. 1986 के पहले तक पाकिस्तान में ईशनिंदा के मामले कम ही आते थे. 1927 से 1985 तक सिर्फ 58 मामले ही अदालत में पहुंचे थे पर इस के बाद ऐसे मामलों की बाढ आ गई. 4 हजार से अधिक मामले अदालतों में पहुंचे. हालांकि अभी तक ईशनिंदा मामले में किसी को फांसी नहीं दी गई. अधिकतर की मौत की सजा माफ हो गई.

सुप्रीम कोर्ट से रिहा होने के बाद आसिया बीबी ने कहा कि मैं इस बात पर भरोसा ही नहीं कर पा रही हूं कि मुझे आजादी मिल गई है. इस देश में हमारी जिंदगी बहुत मुश्किलों से गुजरी है.

उधर फैसले के भारी विरोध के बाद सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस मियां साकिब निसार ने कहा कि अगर किसी के खिलाफ लगे आरोप कोर्ट में साबित नहीं होते हैं तो कोर्ट उस व्यक्ति को सजा कैसे  दे सकता है. मैं और बेंच के जज पैगंबर को प्यार करते हैं. हम उन के सम्मान में बलिदान को तैयार हैं पर हम  सिर्फ मुसलमानों के जज नहीं हैं.

भारत में भी सत्यान्वेषी लोगों को कट्टरपंथियों की ओर से मुसीबतें झेलनी पड़ती हैं. धर्म और ईश्वर पर समालोचना करने वालों को कोर्टकचहरी में घसीट लिया जाता है. उन्हें धार्मिक भावना को ठेस पहुंचाने जैसे मामलों में परेशान किया जाता है.

असल में धर्म और ईश्वर के नाम पर मौज उड़ाने वाले पोल खुलने से हमेशा भयभीत रहते हैं. ऐसे लोग धर्मांधों को बेवकूफ बना कर ईश्वर, पैगंबर, गौड का भय दिखा कर, लालच दे कर अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं. जब कोई धर्म और ईश्वर की असलियत की पोल खोलता है तो वे घबरा उठते हैं, उन्हें अपनी सत्ता डोलती नजर आती है और वे धर्म पर खतरे का ऐलान करते हुए भीड़ को भड़का कर हिंसा की ओर झोंक देते हैं.

जो वस्तु दिखाई न दे, जिस के अस्तित्व पर सवाल उठ खड़े हों और वैज्ञानिक दृष्टि से उस के आधार का कोई पुख्ता प्रमाण न हो, उस पर विश्वास, आस्था के नाम पर दुनिया आपस में मारकाट, हिंसा पर उतर जाए तो इसे हद दर्जे की मूर्खता ही माना जाना चाहिए.

दुनिया भर में यह बेवकूफी सदियों से चलती आई है. जब तक लोगों के दिमाग से धर्मांधता का अंधेरा पूरी तरह नहीं हटेगा, धर्म के नाम पर हिंसा होती रहेगी. यह अंधेरा शिक्षा ही दूर कर सकती है.

खिलाड़ियों को लालपीला करती टैस्ट क्रिकेट की लाल गेंद

दक्षिण अफ्रीका की क्रिकेट टीम के कप्तान रह चुके ग्रीम स्मिथ जब जगमोहन डालमिया सालाना कौन्क्लेव में हिस्सा लेने आए तो उन्होंने माना कि टैस्ट क्रिकेट में इस्तेमाल की जाने वाली गेंद की क्वालिटी का रोल बड़ा अहम होता है.

शुक्रवार, 2 दिसंबर, 2018 को आयोजित हुई इस कौन्क्लेव में ग्रीम स्मिथ का मानना था कि लाल गेंद के इस खेल में कूकाबुरा गेंद टैस्ट क्रिकेट को खत्म कर रही है. ग्रीम स्मिथ ने बताया, ‘कूकाबुरा गेंद खेल को मार रही है. मैं अपनी राय रखूं, तो टैस्ट क्रिकेट में गेंद बहुत बड़ा मुद्दा है.’

ग्रीम स्मिथ ने हाल ही में भारत में मचे ड्यूक गेंद के हंगामे पर कहा, ‘मैं ने देखा है कि कुछ खिलाड़ी एसजी गेंद की शिकायत कर रहे हैं. ठीक उसी तरह कूकाबुरा की गेंद भी लोगों को निराश कर रही है. कूकाबुरा की गेंद अब ऐसी बनती है कि वह लंबे समय तक सख्त नहीं बनी रहती और इस के चलते लंबे समय तक वह गेंद स्विंग नहीं हो पाती.

टैस्ट क्रिकेट अब ड्रा से अपने वजूद को नहीं बचा सकता. टैस्ट क्रिकेट में नतीजे आएं, इस के लिए जरूरी है कि गेंद में स्विंग और स्पिन बनी रहे. गेंद में हमेशा ऐसा कुछ रहना चाहिए, जिस से वह हवा में भी हरकत करती रहे. बल्ले और गेंद के बीच एक तरह की होड़ बनी रहने पर ही टैस्ट क्रिकेट की प्रासंगिकता बनी रह सकती है.

टैस्ट क्रिकेट कमजोर टीमों की पोल खोल कर रख देता है. 30 गेंदों में 70 रन बना कर आप क्रिकेट के छोटे फौर्मेट में तो जीत सकते हैं लेकिन टैस्ट क्रिकेट में नहीं. यहां एक अलग ढंग की चुनौती होती है.’
टैस्ट क्रिकेट के रोमांच में आ रही कमी को ले कर उन्होंने कहा, ‘इस की अहम वजह यह भी है कि हम ने कुछ शानदार टीमों को खो दिया है. मैं मानता हूं कि क्रिकेट के सभीफौर्मेट में बराबर की चुनौती रहनी चाहिए, तभी यह खेल अपना वजूद बनाए रह सकता है.

कितनी तरह की गेंदें होती हैं इस्तेमाल

दरअसल, टैस्ट क्रिकेट में 3 तरह की गेंदों का इस्तेमाल होता है, एसजी गेंद, कूकाबुरा गेंद और ड्यूक गेंद. एसजी गेंद का इस्तेमाल सिर्फ भारत में होता है. इसे हाथों से बनाया जाता है जो अपनी शानदार सीम के लिए जानी जाती है. इस की एक क़्वालिटी और होती है कि यह स्पिन गेंदबाज को ड्रिफ्ट कराने में मदद करती है. इतना ही नहीं, यह तेज गेंदबाज को रिवर्स स्विंग भी कराती है.

कूकाबुरा गेंद को मशीन से बनाया जाता है. पर इस की सीम जल्दी फेड पड़ जाती है और इस गेंद पर ग्रिप बनाए रखना बड़ा मुश्किल काम है. हां, यह गेंद लेग स्पिनर्स के लिए मददगार है.

कूकाबुरा गेंद का इस्तेमाल ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, पाकिस्तान, श्रीलंका और जिम्बाब्वे में इस्तेमाल होता है.

तीसरी तरह की ड्यूक गेंद का इस्तेमाल इंगलैंड और वेस्टइंडीज में होता है. इस गेंद को भी हाथों से बनाया जाता है. इस की सीम लंबे समय तक ठीक रहती है और यह ज्यादा देर तक कठोर बनी रहती है. यह गेंद हर तरह के गेंदबाज के लिए मददगार है.

कोहली की पसंदीदा गेंद

भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली एसजी गेंद से ज्यादा ड्यूक गेंद को पसंद करते हैं. उन का मानना है कि एसजी गेंद अब पहले जैसी नहीं रही है. इस की क़्वालिटी पहले जैसी नहीं रही है बल्कि खराब ही हुई है. वे इस गेंद के बजाय ड्यूक गेंद को टैस्ट मैचों में बढ़िया मानते हैं.

भारतीय क्रिकेट टीम के तेज गेंदबाज उमेश यादव ने भी यह बयान दिया था कि अब सैंसपरील्स ग्रीनलैंड्स (एसजी) की गेंद गेंदबाजी के माकूल नहीं रह गई.

भारतीय क्रिकेट में इस गेंद का इस्तेमाल तकरीबन 25 साल से हो रहा है. इसी गेंद से देशभर में घरेलू और इंटरनैशनल क्रिकेट खेला जा रहा है, लेकिन अब अचानक से कुछ खिलाड़ी जैसे उमेश यादव, कुलदीप यादव, रविचंद्रन अश्विन और कप्तान विराट कोहली इस गेंद से नाराज दिख रहे हैं और वे मानते हैं कि इंगलैंड में बनी ड्यूक गेंद से क्रिकेट खेला जाना चाहिए.

अजहर हुए नाराज

भारतीय टीम के खिलाड़ियों की एसजी गेंद से हुई नाराजगी पर भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रह चुके मोहम्मद अजहरूद्दीन कहते हैं, ‘मेरी समझ में यह नहीं आ रहा कि अचानक एसजी गेंद को ले कर इतना होहल्ला क्यों हो रहा है.

‘मुझे अब भी वे साल अच्छे से याद हैं जब साल 1984-85 में भारत में ड्यूक की गेंदें इस्तेमाल होती थीं और उन की सीम खराब हो जाया करती थी. यह साफ था कि भारतीय हालात में ड्यूक की गेंद नहीं चल सकतीं. इस के बाद 1993 वह साल था, जब भारत में एसजी गेंद से क्रिकेट खेलना शुरू हुआ और इस के बाद टीम इंडिया ने अपने घर पर खेली जाने वाले क्रिकेट पर अपना दबदबा बना लिया.

‘गेंद पर शोर मचाने से पहले दुनिया के सभी गेंदबाजों का अलगअलग गेंदों से अलगअलग हालात में गेंदबाजी का औसत देख लीजिए. इस से आप को सही जवाब मिल जाएगा. तो इसे ले कर इतना हंगामा करने की क्या जरूरत है.

‘जब हमारे स्पिन गेंदबाज औस्ट्रेलिया जाते हैं, तो उन्हें कूकाबूरा गेंद पर अपनी पकड़ बनाने में मुश्किलें आती हैं. ‘आप को घरेलू टैस्ट सीरीज में वही गेंद इस्तेमाल करनी चाहिए, जो आप के हालात के माकूल हो. यही टैस्ट क्रिकेट की चुनौती है.’ गेंद पर मचे इस घमासान पर क्या फैसला लिया जाता है, यह तो आने वाले समय में ही पता चलेगा पर फिलहाल तो यह छोटी सी लाल गेंद भारतीय खिलाड़ियों को लालपीला कर रही है.

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