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सीलिंग दे मनचाही फीलिंग

सीलिंग की डिजाइन और रंगों को ले कर हर कोई दुविधा में रहता है कि यह कैसी बनवाई जाए. अगर बहुत से विकल्पों वाली सीलिंग डिजाइनें आप को दुविधा में डाल देती हैं, तो इस की वजह जानकारी की कमी और सब से अच्छी सीलिंग पाने की इच्छा होती है.

सीलिंग की डिजाइनों का वर्गीकरण कोई नहीं कर सकता. वजह रोज नई डिजाइनें बाजार में आती हैं, जो पहले वाली से कहीं बेहतर नजर आती हैं. लेकिन सीलिंग निहायत ही व्यक्तिगत पसंद का मामला है, जो एक हद तक आप की रुचि भी प्रदर्शित करता है.

पहले राजमहलों और फिर फिल्म उद्योग जगत की शान मानी जाने वाली फौल्स सीलिंग आज हर किसी की पहुंच में है, जिस में नया तड़का अब लाइट का लग गया है. कहने का मतलब यह नहीं कि पीओपी (प्लास्टर औफ पैरिस) का जमाना अब लद गया है, बल्कि बदलाव यह आया है कि रंगबिरंगी लाइटें सीलिंग का जरूरी हिस्सा बन गई हैं, जिन से खूबसूरती में चारचांद लग जाते हैं.

जब भी सीलिंग कराएं तब केवल अपने दिल की सुनें. उस डिजाइन को छत पर साकार करवाएं जो मुद्दत से आप के जेहन में हो. आइए जानें सीलिंग के बारे में:

ट्रैडिशनल डिजाइन

यह ठीक है कि एकदम सादगी वाली सीलिंग कोई नहीं चाहता, इसलिए अब हलकी डिजाइनों को लोग प्राथमिकता दे रहे हैं. भोपाल के नामी शोरूम झूमरवाला के नवीन साहू का कहना है कि हलकी पीली और औफ व्हाइट सीलिंग का दौर दोबारा लौट रहा है. हां, इन में लाइट जरूर लोग नईनई डिजाइन वाली लगवा रहे हैं. अब इलैक्ट्रिक आइटम की वैराइटी और रेंज काफी बढ़ गई है.

अगर ड्राइंगरूम की सीलिंग प्लेन या हलके रंग की है तो उस में तरहतरह की लाइटें लगवाई जा सकती हैं. आमतौर पर सैंटर में एक बड़ा लैंप या झूमर ठीक रहता है और चारों कोनों पर एलईडी बल्ब कमरे को बेहतर लुक देते हैं. कमरे के आकार के अनुपात में बल्बों की संख्या बढ़ाई जा सकती है.

नैचुरल डिजाइन

जब फौल्स सीलिंग चलन में नहीं आई थी तब कमरों और दीवारों को नैचुरल सीनरीज वाले पोस्टरों से ही सजाया जाता था. मसलन झरने का दृश्य, नीला आसमान, छोटेछोटे खिले हुए फूल आदि.

सीलिंग पर नैचुरल लुक कई और तरीकों से भी दिया जा सकता है. यह आप की पसंद पर निर्भर करता है कि वह कैसा हो. निश्चित रूप से आप चाहें तो वह एक गांव का भी दृश्य हो सकता है और पगडंडी भी हो सकती है, जिस के किनारों पर छोटेछोटे बल्ब रोशनी बिखेरते नजर आएं तो लोग देखेंगे भी और इस के बारे में पूछेंगे भी.

जिओमैट्रिकल डिजाइनिंग

जिओमैट्रिकल डिजाइनिंग हमेशा पहली पसंद रही है. भोपाल के सीनियर आर्किटैक्ट सुयश कुलश्रेष्ठ की मानें तो ये डिजाइनें सहूलत वाली और आकर्षक होती हैं और लगभग

50% घरों में देखने को मिल जाती हैं.

इन डिजाइनो में बढ़ते हुए क्रम यानी आकार में त्रिभुज, चतुर्भज और समानांतर रेखाएं हो सकती हैं और सर्कल भी जिन के बीच एक निश्चित दूरी रखी जाती है. इन आकृतियों को आप मनचाहे तरीके से लाइट दे सकती हैं. इन डिजाइनों में रंगों का उपयोग भी अपनी पसंद मुताबिक किया जा सकता है. अगर सफेद आकृतियों को जामुनी रंग से रंगा जाए तो ड्राइंगरूम जगमगा उठता है. सुयश के अनुसार बहुत ज्यादा डार्क या तीखे रंगों का इस्तेमाल कुछ दिनों बाद खटकने लगता है, इसलिए जिओमैट्रिकल डिजाइन में हलके गहरे रंगों का प्रयोग ज्यादा अच्छा रहता है.

क्लासिकल डिजाइन

सीलिंग में शहनाई, ढोलक, तबला और हारमोनियम जैसे वाद्ययंत्र बने हों तो वे ड्राइंगरूम को एक अलग कलात्मकता देते हैं. हालांकि क्लासिकल डिजाइनें थोड़ी कम बनवाई जाती हैं, लेकिन इसी वजह से वे मेहमानों का ध्यान भी खींचती हैं. इन डिजाइनों के साथ ज्यादा लाइट इस्तेमाल करना ठीक नहीं लगता है.

अगर क्लासिकल डिजाइनों में कला चित्रों का इस्तेमाल किया जाए तो बात कुछ और होती है. कई पारंपरिक व आंचलिक डिजाइनें इस के लिए उपयुक्त होती हैं. इन की बहुत रेंज होती है.

स्टाइलिश डिजाइन

सीलिंग में स्टाइलिश डिजाइनों का कोई ओरछोर नहीं है. इन में लाइट और कलर्स का भरपूर इस्तेमाल होता है. आमतौर पर बड़े आकार के ड्राइंगरूम और बैडरूम के लिए ये उपयुक्त होती हैं.

अपने ड्राइंगरूम के लिए सैंटर में एक बड़ा और चारों कोनों में उस से छोटे झूमर लगवाएं तो कमरा ठीक वैसा ही लगेगा जैसा बड़े होटलों या कौरपोरेट दफ्तरों का लगता है. स्टाइल अपनी पसंद के अनुसार बनवाया भी जा सकता है और रैडीमेड भी लिया जा सकता है. आजकल कई कंपनियां औनलाइन सीलिंग बेच रही हैं. उन में ज्यादातर डिजाइनें स्टाइलिश होती हैं.

रोमांटिक डिजाइन

यंग कपल्स की पहली पसंद रोमांटिक डिजाइनें होती हैं खासतौर से बैडरूम में जहां सीलिंग पर गुलाबी रंग हो और गुलाब के ही छोटेबड़े फूल भी जड़े नजर आएं तो कमरे में पहुंचते ही मूड बदल जाता है.

आजकल अभिसार दर्शाती डिजाइनें भी मिलने लगी हैं जो प्रतीकात्मक रूप से भी होती हैं. इन्हें अपनाने या आजमाने में हरज नहीं बशर्ते घर में प्राइवेसी हो या फिर आप दोनों अकेले रहते हों. अगर बहुत ज्यादा लोग बैडरूम में आतेजाते हों तो फिर अधर से अधर छूने वाली डिजाइन दिक्कत दे सकती है.

रोमांटिक डिजाइन कोई भी हो, लेकिन उस में लगाई गई लाइट और कलर अकसर गुलाबी ही होता है. गुलाबी रंग रोमांस का पर्याय माना जाता है, इसलिए न्यू कपल्स इसे प्राथमिकता देते हैं. हलका हरा रंग भी कपल्स ज्यादा पसंद करते हैं.

फ्रूट फेस पैक से पाएं नैचुरल ग्लो

ब्यूटी पार्लर का कैमिकल्स वाला ट्रीटमैंट केवल बाहरी निखार दे सकता है और कभीकभी यह त्वचा को नुकसान भी पहुंचा सकता है, जबकि नैचुरल उपचार त्वचा को अंदर से निखार कर उसे मुलायम और जवां बनाता है. खिलीखिली और नैचुरल ग्लो वाली त्वचा के लिए घर पर फलों से बने ये फेस पैक आजमाएं.

केले से बना पैक: केला ऐंटीऔक्सीडैंट से भरपूर फल है. इस से बना पैक त्वचा की खुश्की दूर कर उसे मुलायम बनाता है. इस का पैक बनाने के लिए 1 पके केले को मसल लें. फिर उस में शहद और औलिव औयल मिला कर चेहरे पर लगाएं. 10 मिनट लगा रहने के बाद चेहरे को धो लें.

पपीते से बना पैक: पपीता ऐंटीऔक्सीडैंट, फ्लावोनौइड्स और मिनरल्स से भरपूर फल है. यह नैचुरल ऐंटीएजिंग है. इस का पैक बनाने के लिए इस का गूदा निकाल कर उस में शहद, नीबू का रस और मुलतानी मिट्टी मिला कर चेहरे पर लगाएं. यह पैक त्वचा को नमी तो देगा ही, साथ ही डैड स्किन हटा कर त्वचा की भीतरी परत को भी स्मूद बनाएगा.

स्ट्राबैरी से बना पैक: इस से बना पैक त्वचा के सूर्य के संपर्क में आने पर हुई परेशानी को दूर करेगा. इस का पैक बनाने के लिए इस का रस निकाल कर उस में योगर्ट मिला कर चेहरे पर लगाएं. यह पैक त्वचा को प्राकृतिक निखार देता है.

तरबूज से बना पैक: तरबूज पानी से भरपूर फल होने के कारण त्वचा को अंदरूनी नमी दे उस की खुश्की दूर करता है. इस का पैक बनाने के लिए इस का रस निकाल कर इस में योगर्ट और मिल्क पाउडर मिला कर चेहरे पर लगाएं. 15 मिनट लगाए रखने के बाद चेहरे को धो लें.

संतरे से बना पैक: संतरा विटामिन सी से भरपूर होने के कारण त्वचा को हाइड्रेट करता है, साथ ही त्वचा को गहराई तक साफ भी करता है. इस का पैक बनाने के लिए इस का रस निकाल कर उस में योगर्ट और गुलाबजल मिला कर चेहरे पर लगा कर 20 मिनट बाद चेहरे को धो लें.

दबे पांव दस्तक देता अवसाद

एक दिन मेरी सहेली रीवा का फोन आया. वह कुछ परेशान सी लग रही थी. पूछने पर उस ने बताया कि उस की 30 वर्षीय बेटी रिचा और दामाद के बीच कुछ ठीक नहीं चल रहा. सुन कर मुझे धक्का लगा कि अचानक ऐसा क्या हुआ जो यह नौबत आ गई? पूछने पर पता चला कि रिचा और समर दोनों एक ही कंपनी में काम करते थे. रिचा की प्रतिभा के कारण उसे कंपनी में जल्दी तरक्की मिल गई. अब समर उस से कटाकटा रहने लगा. यही नहीं उस पर दबाव भी बनाने लगा कि नौकरी छोड़ दे.

न चाहते हुए भी रिचा ने नौकरी छोड़ दी. आखिर परिवार में तालमेल जो बैठाना था. अब उस के सामने समस्या थी कि वह सारा दिन क्या करे? अकेलापन खाने को दौड़ता. समर सुबह औफिस चला जाता और आने में रात हो जाती. मन मसोस कर रह जाती बेचारी. उसे अपने कैरियर को तिलांजलि देने का दुख भी साल रहा था. अंतत: वह तनाव में रहने लगी.

अब सवाल यह है कि पति की किसी भी कामयाबी पर खुश होने वाली या उस के लिए मनौती मानने वाली पत्नी के साथ यह व्यवहार क्या सही है? क्या पत्नी को अपनी काबिलीयत दिखाने का मौका नहीं मिलना चाहिए ताकि वह मानसिक तनाव अथवा अवसाद से मुक्त रहे? यदि पत्नी जौब नहीं करती तो उसे दूसरे कामों के लिए भी तो प्रोत्साहित किया जा सकता है?

चेहरे पर हताशा क्यों

एक औरत की जिंदगी उस बस कंडक्टर की तरह होती है, जिस का सफर तो हर समय है पर उसे कहीं जाना नहीं है. पत्नी की जिंदगी कहां जा रही है, कौन सा मोड़ ले रही है और उस की लाइफ में क्या हो रहा है वह नहीं जानती?

ऐसी लड़कियां या महिलाएं अपनी जिंदगी सही ढंग से नहीं जीती हैं, बल्कि अपनी जिंदगी को काट रही होती हैं. अगर उन से पूछा जाए कि और क्या चल रहा है, तो उन का बस एक ही जवाब होता है कि बस कट रही है जिंदगी. ऐसी लड़की या महिला के चेहरे पर हताशा साफ दिखती है.

आज के समय में एक ऐसा सामाजिक तानाबाना बनता जा रहा है, जहां पूरी की पूरी एक जमात अपनी बात किसी के साथ शेयर करने के लिए तरस रही है. खासकर 18 से 35 या 40 साल तक की उम्र की महिलाएं.

जापान में तो आजकल अस्सान यानी अपना मन हलका करने के लिए किराए के दोस्त लेने का फैशन है. इन किराए के दोस्तों से 1 घंटा बात करने के लिए हजार येन यानी लगभग क्व700 चुकाने पड़ते हैं. वहां लोग अस्सान से बातें कर के खुद को सहज पाते हैं.

जापान में आज जिस तरह की स्थिति आ गई है, हमारा समाज भी उसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है. प्रश्न यह है कि ऐसी स्थिति आती कैसे है? जब हम सामाजिक रूप से किसी से मिलनाजुलना नहीं चाहते हैं, हमारी जिंदगी में इतनी भागदौड़ समा जाती है कि दूसरों की बात छोडि़ए खुद के बारे में सोचने के लिए भी समय नहीं मिल पाता.

अकेलेपन से तनाव

फरीदाबाद में रहने वाली 18 वर्षीय सिमर एमबीबीएस की प्रवेश परीक्षा की तैयारी कर रही थी, जिस की वजह से उस ने अपनी पूरी दिनचर्या अस्तव्यस्त कर ली थी. मातापिता चाहते थे कि वह सिर्फ बीए कर शादी कर ले. उन के अनुसार एक लड़की की पढ़ाई पर इतना खर्च करना बेवकूफी है. लेकिन जब सिमर नहीं मानी तो मातापिता ने शर्त रखी कि अगर तुम्हारा एमबीबीएस में दाखिला नहीं हुआ तो हम तुम्हारी शादी कर देंगे.

अब सिमर न कहीं आती न जाती और न ही किसी से मिलती थी. क्या होगा? कर पाऊंगी या नहीं? लोग क्या कहेंगे आदि सोचसोच कर उस ने खुद को मानसिकरूप से बीमार कर लिया. उस के मातापिता नौकरी करते थे और वह सारा दिन घर में अकेली रहती हुई बस यही सब सोचती रहती थी, जिस का असर उस की सेहत पर भी पड़ रहा था. लेकिन घर में किसी के पास इतना वक्त नहीं था कि उस से दो बोल हमदर्दी के जता कर उस के मानसिक तनाव को कम कर सके. फिर क्या था. वही हुआ जिस का डर था. एक दिन सिमर ने अकेलेपन की वजह से पैदा हुए तनाव में आ कर आत्महत्या कर ली.

अब दूसरा सवाल है कि क्या आजकल मातापिता के पास इतना समय नहीं कि वे अपनी युवा होती बेटी को सकारात्मक माहौल दे सकें? मातापिता इस तरह से हीन भावना तो पैदा करते ही हैं, साथ ही बेटी के मन में द्वेष भी पैदा कर देते हैं, जिस का बुरा परिणाम सभी को भुगतना पड़ता है. इसलिए जरूरत है समस्या के अनुरूप व्यवहार करने की और सही माहौल मुहैया कराने की.

लड़कियों का यह अकेलापन उन की उम्र की हर स्टेज पर देखने को मिलता है. वे अपने दुख, अपनी चिंताएं अपने घर वालों से आसानी से शेयर नहीं कर पातीं. यहां तक कि अपने पति से भी वे कई बातें छिपा जाती हैं. जैसेजैसे अकेलेपन की भावना बढ़ती जाती है वैसेवैसे परेशानियां भी बढ़ जाती हैं और मानसिक तनाव में लड़कियां या महिलाएं आत्महत्या जैसा कदम उठा लेती हैं.

एकसार जिंदगी में महिलाएं अकेलापन महसूस करने लगती हैं. अकेलेपन से उन के अंदर की खुशी मर जाती है. फिर जब वे अंदर से खुश नहीं होतीं तब उन की ऊर्जा कमजोर पड़ने लगती है. वे खुद को इतना कमजोर महसूस करती हैं कि धीरेधीरे उन्हें सभी तरह के काम बोझिल लगने लगते हैं.

गलत रास्ते

कहने का अर्थ यह है कि वे एक मशीन के सिवा कुछ नहीं रहतीं. उन का सामाजिक सरोकार खत्म हो जाता है. जब सामाजिक अलगाव बढ़ जाता है तो वे खुद को समाज से हफ्तों या महीनों के लिए अलग कर लेती हैं. यह बीमारी तब और गंभीर हो जाती है जब उन का दूसरों से या तो संवाद बिलकुल बंद हो जाता है या फिर कम हो जाता है. इस तरह का सामाजिक अलगाव बहुत ही खतरनाक होता है.

वास्तव में सामाजिक मेलमिलाप किसी के भी दिमाग को स्वस्थ रखता है जबकि सामाजिक अलगाव इस के उलटा काम करता है. उन का ब्लड प्रैशर बढ़ जाता है. नकारात्मक सोच और असुरक्षा की भावना बढ़ जाती है. सब से बड़ी बात है कि उन्हें अपनी जिंदगी महत्त्वहीन लगने लगती है.

कई बार इस तरह की खबरें पढ़ने में आती हैं कि अकेलेपन की शिकार युवती या महिला ने अकेलेपन को दूर करने के लिए विवाहेतर संबंध बना लिए या नाकाम संबंध के कारण खुदकुशी कर ली. यह अवसाद की स्थिति है. इस स्थिति के आने से पहले ही सतर्क हो जाना चाहिए.

किराए की दोस्ती भारत में भी

दिल्ली और कुछ दूसरे बड़े शहरों में भी ऐसी ही सर्विस चल रही है, जिस के माध्यम से एकाकी जीवन जी रही महिलाएं, खासतौर पर युवा लड़कों को अपनी शारीरिक व मानसिक संतुष्टि के लिए किराए पर दोस्त बनाती हैं. इन्हें वैबसाइट्स भी अलगअलग रेंज में दोस्त उपलब्ध करवा रही हैं. इन में डिनर के लिए या फिर मूवी देखने जाने के लिए दोस्त मंगवा सकते हैं. इन से मौसम पर बातचीत करना, राजनीतिक मुद्दों पर बात करना आदि विषय भी शामिल हैं.

1 घंटे की बातचीत के लिए करीब क्व600 भुगतान करना होगा. हालांकि किराया कितना होगा, यह आप के मकसद पर निर्भर होगा. कई वैबसाइट्स किराए के अलावा क्व1,000 से ले कर क्व1,500 तक शुरुआती सदस्यता शुल्क भी लेती हैं. ऐसे पुरुषों को जिगोलो कहा जाता है.

बढ़ता कारोबार

भारत में ऐसी सेवाओं के लिए शहरी क्षेत्रों में तेजी से इजाफा हो रहा है. दिल्ली में एक जिगोलो एक रात के क्व1 से 3 हजार तक लेता है. पैसा कमाने की होड़ में डिगरी कालेजों के लड़के इस व्यापार में लिप्त हो रहे हैं. इन लड़कों से सेवाएं लेने वाली महिलाएं भी बड़े घरानों की होती हैं, जो एक बार में क्व3 हजार तक देती हैं.

एक नया और गलत ट्रैंड

इंटरनैट पर फ्रैंडशिप के नाम पर ऐसी कई वैबसाइट्स चल रही हैं, जिन में दोस्त दिलवाने की आड़ में कुछ और ही काम होता है. औनलाइन फ्रैंड को ले कर कई तरह के सवाल खड़े होते रहे हैं. ऐसी कई घटनाएं भी सामने आई हैं, जो दोस्ती के नाम पर कुछ और हैं और वे डेटिंग का भी दावा करती हैं.

बैंगलुरु में एक 34 वर्षीय महिला ने औनलाइन डेटिंग वैबसाइट पर एक पुरुष से दोस्ती की. सतीश (बदला हुआ नाम) ने प्रोफाइल देख कर  ‘शौंपा 76’ आईडी से एक अच्छे घराने की महिला से 18 जुलाई, 2017 को संपर्क किया और खुद को कोलकाता का बताया. थोड़ी बातचीत के बाद दोनों ने एकदूसरे को अपना मोबाइल नंबर दे दिया और व्हाट्सऐप पर चैटिंग शुरू कर दी. फोटो भी शेयर किए. फिर दोनों बाहर भी मिलने लगे.

कुछ दिनों बाद सतीश ने उसे फोन करना बंद कर दिया. जब महिला ने कारण जानने के लिए उस से संपर्क किया तो उस ने बिजनैस में आते घाटे और पिता की बीमारी का रोना रोते हुए मदद मांगी और यह भी बताया कि उस के पिता हौस्पिटल में भरती हैं. उसे त्र 50 हजार की मदद की जरूरत है. उस महिला ने सतीश के खाते में पैसे भेज दिए. कुछ दिन बाद सतीश ने फिर पैसे मांगे और कहा कि पिताजी को बड़े हौस्पिटल में भरती कराया गया है.

15 दिसंबर, 2017 से 23 जनवरी, 2018 के बीच सतीश ने अर्पिता (महिला) से कई बार रुपए लिए. एक भावनात्मक व शारीरिक साथ की चाह में चुपचाप अर्पिता ने क्व4 लाख 70 हजार उस के खाते में भेजे. जब सतीश ने उस के फोन और मैसेज का जवाब देना बंद कर दिया तब अर्पिता को संदेह हुआ. अब उसे एहसास हो गया था कि उस के साथ धोखा हुआ है.

साइबर पुलिस के मुताबिक इस तरह के अपराध लंबे समय से हो रहे हैं. एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि शादी और डेटिंग वैबसाइटों पर साइबर अपराधी ज्यादा उम्र वाली या तलाकशुदा महिलाओं को निशाना बनाते हैं. वे खुद को अमीर बताते हैं और फिर झांसा दे कर उन से रुपए ऐंठ लेते हैं.

अकेलापन लाता है बीमारियां

हम में से कई लोग कई बार अकेलापन महसूस करते हैं जोकि दिल की बीमारियों और स्ट्रोक का खतरा बढ़ाता है. शोधों के अनुसार दिल की बीमारी का खतरा 29% और स्ट्रोक का खतरा 32% बढ़ जाता है.

अब वह समय आ गया है कि लड़कियों, औरतों को भी मजबूत भावनात्मक सहारे का एहसास करवाया जाए.

परिवार, कालेज में उन की बातें सहानुभूति के साथ सुनी और समझी जाएं. उन्हें सही समय पर सही सलाह दी जाए. उन के भावुक होने को मजाक में न ले कर उन की परेशानियों को समझा जाए और उन्हें इस से उबरने के लिए उचित सलाह दी जाए.

बचपन से ही उन्हें सिर्फ दिखावटी मजबूत होने के बजाय वाकई ऐसा मजबूत बनाया जाए कि वे अपनी परेशानियों को अपने परिवार के साथ शेयर करने से झिझकें नहीं.

घरेलू हिंसा : सहें नहीं, आवाज उठाएं

क्या आज की महिला प्रताड़ना यानी डांटफटकार सह सकती है जबकि न अब वह परदे में है और न ही घर की चारदीवारी तक सीमित है? वह हर क्षेत्र में पुरुष के कंधे से कंधा मिला कर काम कर रही है. तब फिर क्या कारण है उसे पगपग पर पुरुष वर्ग से मांगना पड़ता है? कभी आरक्षण, कभी अपने लिए अलग से कानून. 1983 में घरेलू हिंसा को सरकार ने इंडियन पीनल कोड के तहत प्रस्तुत किया और फिर कई सालों बाद भारतीय दंड विधान की धारा 498-ए बनी और इसे लागू किया गया.

सरकार द्वारा स्त्री सुरक्षा बिल पास करने का अर्थ है कि स्त्री प्रताडि़त है. घरेलू और अनपढ़ ही नहीं पढ़ीलिखी और कामकाजी भी. निम्नवर्ग और मध्यवर्ग में ही नहीं, उच्चवर्ग में भी स्त्री प्रताडि़त है. एक सर्वे से पता चलता है कि 50% स्त्रियां घरेलू हिंसा से पीडि़त हैं. पति ही नहीं पति के परिवार के अन्य लोगों से भी वे पीडि़त होती हैं. कई बार उन्हें अपने मांबाप और परिवार के अन्य लोगों से मिलने नहीं दिया जाता है.

अपराध है पत्नी से मारपीट

पति द्वारा पत्नी पर अत्याचार करने के रोज सैकड़ों केस दर्ज किए जाते हैं. उन में कुछ ऐसे होते हैं कि जान कर हैरानी होती है कि क्या ये हकीकत में पतिपत्नी हैं. अभी तक यह मारपीट अपराध नहीं मानी जाती थी. यही समझा जाता था कि यह पतिपत्नी का आपसी मामला है, लेकिन नए कानून के पास होने के साथ ही यह एक अपराध बन गया है, जिस में पति को 14 साल की जेल तक हो सकती है.

यद्यपि कार्यवाही कठिन है, परंतु नया कानून बहुत सरल है. नए कानून के अनुसार पहले पुलिस तसवीर में आएगी तब पीडि़ता को एनजीओ के सामने जाना होगा. भारत में पुलिस का क्या रोल है, सभी जानते हैं. केस और उलझ जाएगा.

यह विधेयक महिलाओं को पति की हिंसा के विरोध में दीवानी मुकदमे चलाने का विकल्प देने की उम्मीद दिलाता है. यह विधेयक महिला को प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के अपनी शिकायत किसी अंतिम चरण पर पहुचाए बिना ही सीधे अदालत में जाने की सुविधा देता है.

पत्नी के काम को मान्यता नहीं

पत्नी घर में कितना काम करती है इस से पति को कोई मतलब नहीं होता. वह उसे सजावटी सामान समझता है. नौकर रखे या न रखे पर यही समझता है कि घर में कोई काम नहीं है. सारा दिन या तो अड़ोसपड़ोस में गप्पें मारी होंगी या फिर पलंग तोड़ा होगा. ‘कौन सी चक्की चलानी पड़ रही है’ यह कहना एक तकिया कलाम है. 2 रोटियां ही तो पकानी थीं. ऐसा क्या काम किया, जिस के लिए तुम्हें जरा से काम के लिए समय नहीं मिला?

निम्नवर्ग में डांटफटकार का मुख्य कारण शराबखोरी है. सुबह से ही सारा ध्यान शराब के लिए पैसे छीनने पर रहता है. इस में चाहे पति हो या बेटा कोई भी हो सकता है. यहां तक कि पिता शराब के लिए बेटी को भी प्रताडि़त करता है. मध्यवर्ग में अहंकार सब से आगे आता है. स्त्री कमाती है तब भी उस के लिए निंदा, लानतमलामत है और न कमाए तो वह निखट्टू है ही.

महिलाओं के काम को कहीं भी सराहना नहीं मिलती है न घर में न बाहर. घर की महिलाएं भी बेटे के लिए कहेंगी कि थकाहारा आया है. बहू उस के बाद काम कर के आई होगी तब भी यही कहा जाएगा मटरगश्ती कर के आ रही है. घरपरिवार, औफिस कहीं भी किसी को महिला का ऊंची आवाज में बोलना नहीं सुहाता. सब यही चाहते हैं कि वह दब कर बात करे.

यह बात बचपन से ही लड़कों के मन में भर दी जाती है कि वे लड़कियों से श्रेष्ठ हैं. लड़कियां पराई हैं, लड़का घर का होने वाला मुखिया है, घर का वंशज है, चिराग है. यहीं से लड़का अपने को श्रेष्ठ समझने लगता है. लड़की को बातबात पर डरा कर रखा जाता है.

स्त्री को शुरू से ही एक नौकरानी का सा स्वरूप दिया जाता है. एक सेविका के रूप में उसे प्रवेश दिया जाता है. मां भी यही शिक्षा देती है कि तुझे सब को खुश रखना है. इसी में तेरी खुशी है उस की अपनी कोई इच्छा नहीं है. और यहीं से औरत का दमन शुरू हो जाता है.

सीखें खुद को मान देना

घरेलू हिंसा से बचने के लिए सब से पहले खुद को को जगाना होगा. खुद को दीनहीन न बना कर मान देना सीखें. सब से पहले घर की बेटी को मान दें. दूसरों की बेटियों यानी बहुओं को मान दें.

प्रताड़ना जब असहनीय हो जाती है तभी स्त्री घर की बात बाहर लाती है. घर की मर्यादा रखने की जिम्मेदारी केवल स्त्री की नहीं है. यदि स्त्री घर की लाज मानी जाती है तो पुरुष को उस लाज को रखना चाहिए. यदि उस का उल्लंघन होता है तो कानून रखवाला बनता है. इस के लिए किसी भी पास के पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराएं, अपने और बच्चों के लिए सुरक्षा मांगें.

महिलाओं के लिए स्मार्ट निवेश विकल्प

भारत में ज्यादातर महिलाएं धन से जुड़े मामलों को पुरुषों जैसे अपने पति, भाई, पिता आदि पर छोड़ देती हैं. इन में पढ़ीलिखी महिलाएं भी शामिल होती हैं, जो अच्छे पदों पर भी आसीन हैं. पुरुषप्रधान समाज और वित्तीय साक्षरता में कमजोरी इस के प्रमुख कारण हैं.

अब समय आ गया है कि महिलाएं निवेश से जुड़े फैसले स्वयं लेना सीखें. एक महिला के अपने ये निजी वित्तीय लक्ष्य होते हैं, जिन्हें पूरा करने के लिए उसे निवेश करना चाहिए:

  • शादी और एक खुशहाल शादीशुदा जीवन के लिए
  • बच्चों को जीवन में बेहतर शुरुआत देने के लिए
  • अपने बुजुर्ग मातापिता की सेवा के लिए
  • अपने स्वास्थ्य और बेहतर कल के लिए

इंडियामनी डौट कौम के सीईओ व संस्थापक, सीएस सुधीर सही निवेश विकल्प बता रहे हैं:

अविवाहित युवा महिलाओं के लिए, यदि आप की शादी नहीं हुई है और आप फुलटाइम जौब करती हैं, तो आप के पास निवेश में पूरा जोखिम लेने की आजादी है. याद रखें इस उम्र में लिया गया निवेश निर्णय भविष्य में आप के निवेश की बैकबोन साबित हो सकता है.

शादी के लिए निवेश एक अल्पकालिक लक्ष्य है और आप को एफडी, पोस्ट औफिस की योजनाओं और लिक्विड म्यूचुअल फंड जैसे निवेश अपनाने चाहिए.

ऐसे वित्तीय लक्ष्यों जिन्हें 5 वर्ष से ज्यादा समय में प्राप्त करना है जैसे कि घर खरीदना तो इस के लिए आप इक्विटी म्यूचुअल फंड एवं शेयरों में निवेश कर सकती हैं. लंबे समय के लिए (5 साल या अधिक) इक्विटी में निवेश करना सुरक्षित है और इस में अच्छा रिटर्न मिलने की भी संभावना होती है.

कामकाजी शादीशुदा महिलाओं के लिए: एक शादीशुदा कामकाजी महिला के दो काम होते हैं- घर संभालना और नौकरी करना.

ऐसी महिलाओं को सीमित जोखिम वाले निवेश पर ध्यान देना चाहिए. एक कामकाजी महिला मुख्यरूप से अपने बच्चों की शादी करने, कार या घर खरीदने अथवा सेवानिवृत्ति के लिए निवेश करती है.

पीपीएफ और एनपीएस सेवानिवृत्ति के लिए निवेश के बेहतर विकल्प हो सकते हैं और इन से कर बचाने में भी मदद मिलती है. बच्चों की शिक्षा के लिए निवेश करना हो तो डेट और इक्विटी के मिश्रण में निवेश का विकल्प अपना सकती हैं.

इक्विटी म्यूचुअल फंड, एनएससी, एफडी और बैलैंस्ड म्यूचुअल फंड में भी निवेश किया जा सकता है. सिप के जरीए म्यूचुअल फंड में निवेश करें. सिस्टेमैटिक इन्वैस्टमैंट प्लान को सिप के नाम से जाना जाता है. इस में महीने या पखवाड़े की किसी भी तारीख में नियमित तौर पर म्यूचुअल फंड में छोटी रकम निवेश की जा सकती है.

गृहिणियों के लिए निवेश के विकल्प

गृहिणियां हमेशा मुश्किल के दिनों के लिए बचत करती हैं. वे एसबी खाते में अपनी बचत डालती हैं पर उन्हें एफडी या आरडी में निवेश करने पर विचार करना चाहिए. इन में ब्याज ज्यादा मिलता है.

यदि आप निवेश में जोखिम लेना चाहती हैं, तो दीर्घकाल के लिए सिप के जरीए म्यूचुअल फंड में निवेश करना एक अच्छा विकल्प हो सकता है. गोल्ड ईटीएफ में निवेश करना भी समझदारी भरा फैसला होगा.

महिलाओं के लिए कुछ स्मार्ट निवेश विकल्प

फेयरसैंट के संस्थापक और सीईओ रजत गांधी के मुताबिक कुछ स्मार्ट निवेश विकल्प निम्न हैं:

  • डिजिटल गोल्ड: हालांकि वस्तु और निवेश दोनों के रूप में सोने ने पिछले दशक में अपनी चमक खो दी है, इसलिए देश की स्मार्ट महिलाएं आज डिजिटल सोने की खरीद को प्राथमिकता दे रही हैं. इस में निवेश का मतलब है अपनी संपत्ति को सुरक्षित रखने की चिंता से मुक्ति. साथ ही इस तरह से सोने की खरीद में उस की क्वालिटी को ले कर भी दुविधा नहीं रहती.

डिजिटल रूप से खरीदा जाने वाला सोना विश्वसनीय और मान्यताप्राप्त चैनलों से प्राप्त किया जाता है, जो गुणवत्ता और शुद्धता का आश्वासन देते हैं.

  • पी 2 पी लैंडिंग: कम जोखिम में ज्यादा लाभ के लिए तकनीक आधारित पी 2 पी लैंडिंग प्लेटफौर्म जैसे फेयरैंट डौट कौम निवेशकों के लिए एक अच्छा और सुरक्षित विकल्प है.

स्मार्ट भारतीय महिलाओं के लिए आकर्षक निवेश माध्यम के रूप में पी 2 पी लैंडिंग का चुनाव इस का आसान और सुविधाजनक होना भी है. पी 2 पी लैंडिंग प्लेटफोर्म पर साइन अप की प्रक्रिया के दौरान सत्यापन के लिए कुछ ही क्लिक करने होते हैं. कुछ बुनियादी केवाईसी दस्तावेज लगते हैं. एक बार सत्यापित होने पर निवेशक 750 रुपए के निचले स्तर के निवेश के साथ विभिन्न कर्ज आवश्यकताओं की पूर्ति कर सकते हैं. वास्तविक समय के आधार पर निवेश कर के वे अपने लैंडिंग पोर्टफोलियो का निर्माण शुरू कर सकते हैं.

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बौलीवुड के ऐसे किरदार, जो काफी हद तक चार्ली चैपलिन से प्रेरित थे

हंसी के बेताज बादशाह चार्ली चैपलीन का आज 129वां जन्मदिन है. बिना एक शब्द बोले अपने खास अभिनय से लोगों के दिलों पर राज करने वाले चार्ली चैपलिन न केवल कौमिक टाइमिंग बल्कि खास ड्रेसिंग सेन्स के लिए भी जाने जाते हैं. ऐसा शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो चार्ली चैपलिन की अदाकारी पर नहीं हंसा होगा. भले ही वह इस दुनिया में न हों लेकिन उनकी कौमेडी के लोग आज भी दिवाने हैं. इतना ही नहीं बौलीवुड फिल्मों में उनके किरदार की छाप भी देखी गई.

तो चलिए आपको बौलीवुड के 4 ऐसे किरदार बताते हैं जो काफी हद तक चार्ली चैपलिन से प्रेरित थे.

राज कपूर

बौलीवुड अभिनेता राज कपूर को भारत का पहला चार्ली चैपलिन कहा गया. साल 1955 में आई फिल्म ‘श्री 420’ में उनका किरदार चार्ली चैपलिन से प्रभावित था. चार्ली अपने दुख को हंसी के पीछे छिपा लिया करते थे वहीं राज कपूर ने बड़े पर्दे पर देसी अंदाज में चार्ली के किरदार को निभाकर अपनी अलग पहचान बनाई. इसके बाद ‘मेरा नाम जोकर’ और कई दूसरी फिल्मों में राज कपूर को इस तरह के किरदार निभाने का मौका मिला.

श्रीदेवी का चार्ली चैपलिन एक्ट

श्रीदेवी भले ही हम लोगों के बीच न हो लेकिन अपने फिल्मी सफर में उन्होंने एक से बढ़कर एक किरदार निभाए. वह अपने वर्सटाइल नेचर और इस तरह के एक्ट्स के लिए फेमस थीं. उन्होंने साल 1987 में आई फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ में चैपलिन का किरदार निभाया था. इस फिल्म के एक सीन में वह चैपलिन के किरदार में दिखाईं दीं थी और उनके साथ एक बच्चे ने भी इस तरह का किरदार निभाया था. श्रीदेवी का यह एक्ट चार्ली चैपलिन के लिए ट्रिब्यूट था.  इसमें न केवल श्रीदेवी ने चार्ली की तरह एक्ट किया बल्कि अपने देसी अंदाज में चार्ली के किरदार को भारतीय सिनेमा में एक अलग ही मुकाम पर ले गईं. उनके इस एक्ट को बौलीवुड में और दर्शकों द्वारा काफी पसंद किया गया था.

जब रणबीर कपूर ने अपनाया था चार्ली लुक

अपने दादा राज कपूर की तरह रणबीर कपूर ने भी साल 2009 में आई फिल्म ‘अजब प्रेम की गजब कहानी’ के एक सीन में चार्ली चैपलिन का किरदार निभाया था और उनके कौमिक टाइमिंग को दर्शकों ने काफी पसंद भी किया था.

असरानी

1975 की फिल्म ‘शोले’ में असरानी का किरदार चैपलिन के कौमिक वर्जन अडोल्फ हिटलर से प्रेरित था. शोले में असरानी के जेलर किरदार को लोग आज भी याद करते हैं. इसमें न केवल चार्ली जैसी मूंछे बल्कि चेहरे के हाव-भाव ने भी असरानी के इस किरदार को भारतीय सिनेमा में हमेशा के लिए अमर कर दिया. साथ ही असरानी का डायलॉग ‘हम अंग्रेजों के जमाने के जेलर हैं’…लोगों की जुबान पर आज भी चढ़ा हुआ हैं.

 

हेडफोन खरीदने से पहले इन बातों का जरूर रखें ख्याल

अगर आप हेडफोन खरीदने की सोच रहे है तो आपको इसे परखने के लिए कुछ चीजें जान लेना बेहद जरूरी है. वैसे तो बाजार में आपको तरह-तरह के हेडफोन मिल जाएंगे, लेकिन उसमें सबसे अच्छा कौन सा है, जो बजट में भी हो, बाजार में मौजूद ढेरों हेडफोन्स में से अपने लिए सही हेडफोन चुनना आसान काम नहीं है.

ईयरफोन्स अलग-अलग साइज में आते हैं, जिनमें से आप अपने कानों में ठीक से फिट होने वाले ईयरफोन को चुन सकते हैं. वहीं, गलत साइज के ईयरफोन्स से औडियो क्वालिटी पर तो फर्क पड़ता ही है, साथ ही ये बार-बार कान से गिरते भी रहते हैं. वहीं, जब बात हेडफोन के स्पेसिफिकेशंस की हो, तो इन्हें समझना और भी पेचीदा है. साथ ही तकनीक और साउंड क्वालिटी की भी परख कर पाना मुश्किल होता है.

ऐसे में पहले हेडफोन्स के बारे में जरूरी बातें जान लें जैसे कितने प्रकार के हेडफोन्स होते हैं और इनके जटिल स्पेसिफिकेशंस का मतलब क्या होता है?

इन ईयर हेडफोन्स या ईयरफोन्स

इन ईयर हेडफोन्स को ईयर मौनिटर भी कहते हैं. इन हेडफोन्स को इस तरह डिजाइन किया जाता है कि ये कान के अंदर फिट हो जाते हैं. इसके दो फायदे होते हैं. पहला, ये हेडफोन्स कान के पर्दे के पास रहते हैं, जिससे आपको बेहतर साउंड क्वालिटी मिलती है. दूसरा, ये बाहर के शोर को भी अंदर आने से रोकते हैं.

ओवर ईयर हेडफोन्स

इस तरह के हेडफोन्स आपके पूरे कानों को ढक लेते हैं. पूरा कान ढकने के कारण, ये हेडफोन्स बाहर के शोर को काफी हद तक कम कर देते हैं साथ ही, इनके बड़े आकार के कारण, इनमें बड़े ड्राइवर्स भी आसानी से लगाए जा सकते हैं. बड़े ड्राइवर का मतलब है, तेज आवाज और बेहतर बास. इस प्रकार के हेडफोन्स में ड्राइवर्स को कान से थोड़ी दूरी पर रखते हैं, जिस कारण इनसे मिलने वाले औडियो से स्पीकर की तरह मिलने वाली साउंड क्वालिटी का अनुभव होता है.

ओपन और क्लोज्ड बैक हेडफोन्स

अक्सर, हेडफोन्स के स्पेसिफिकेशंस में ओपन बैक और क्लोज्ड बैक देखने को मिलता है. इसका मतलब हेडफोन के पिछले हिस्से से होता है कि वह खुला हुआ है या सील किया हुआ है. क्लोज्ड बैक हेडफोन्स से साफ साउंड मिलती है और यह आस-पास के शोर के प्रभाव को भी रोकते हैं. ओपन बैक हेडफोन्स से नेचुरल साउंड मिलती है.

ड्राइवर

ड्राइवर, हेडफोन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होता है. ड्राइवर ही इलेक्ट्रिक सिग्नल को साउंड प्रेशर में बदलता है. जितना बड़ा ड्राइवर होगा, हेडफोन की क्वालिटी भी उतनी ही बेहतर होगी. उदाहरण के लिए, यदि आप कोई ओवर ईयर हेडफोन ले रहे हैं, तो 40mm का ड्राइवर बेहतर होगा. ईयरफोन्स या ईयरबड्स के छोटे आकार के कारण, इनमें बड़े ड्राइवर नहीं लगाए जा सकते. ऐसे में अब कई ब्रांड्स इनमें डुअल ड्राइवर का प्रयोग करते हैं. इस तरह के डुअल ड्राइवर सेटअप में केवल एक ही ड्राइवर सारी फ्रीक्वेंसी को नियंत्रित करने की बजाय एक ड्राइवर बास यानी धमक और दूसरा मिड और हाई फ्रीक्वेंसी को नियंत्रित करता है.

सेंसिटिविटी और साउंड प्रेशर लेवल

हेडफोन्स के स्पेसिफिकेशंस में ये अमूमन देखे जाने वाले सेंसिटिविटी और साउंड प्रेशर लेवल को एसपीएल भी कहा जाता है. हेडफोन की आवाज कितनी तेज हो सकती है यह एसपीएल पर ही निर्भर करता है. सेंसिटिविटी का मतलब होता है कि हेडफोन इलेक्ट्रौनिक सिग्नल को ध्वनिक सिग्नल में बदलने में कितना सक्षम है. सेंसिटिविटी को अक्सर डेसीबल्स में मापा जाता है. हेडफोन्स के स्पेसिफिकेशन में इसे डेसीबल पर मिलीवौट में दर्शाया जाता है. बाजार में बिकने वाले अधिकांश हेडफोन्स 85 -120 dB SPL/mW के बीच आते हैं.

फ्रीक्वेंसी रिस्पौन्स

फ्रीक्वेंसी रिस्पौन्स का मतलब होता है कि हेडफोन कितनी औडियो फ्रीक्वेंसी पैदा कर सकता है. इसे हर्ट्ज में मापा जाता है. फ्रीक्वेंसी जितनी कम होगी, हेडफोन का बास यानी धमक उतनी ही कम होगी और फ्रीक्वेंसी जितनी अधिक होगी टर्बल यानी झंकार उतनी ही अधिक होगी.

उपर दिये गए जरूरी बातो को जानना और समझना बेहद जरूरी है, ताकि आप एक अच्छा ईयरफोन खरीद सकें.

आयकर से जुड़ी पेंचीदगियों को सरल भाषा में समझना है, तो यहां गौर करें

आयकर कानूनों में इतने पेच हैं कि किसी के लिए भी उन्हें समझना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है, जबकि उचित कर नियोजन के द्वारा व्यक्ति न केवल करों की देनदारियों को कम कर सकता है, बल्कि अपने जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में निर्धारित लक्ष्यों के लिए भी बचत कर सकता है.

टैक्स प्लानिंग क्या है और क्यों जरूरी है, आइए जानते हैं:

टैक्स किसे कहते हैं

हर वित्तवर्ष की शुरुआत में हर नौकरीपेशा शख्स अपने ऐंप्लायर को उस रकम की जानकारी देता है, जो वह इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम, बीमा पौलिसी प्रीमियम, मकान किराया, होम लोन, ऐजुकेशन लोन या बच्चों की ट्यूशन फीस पर खर्च करने वाला है. इसी घोषणा के आधार पर तय होता है कि नौकरी करने वाले शख्स की ऐनुअल टैक्स लायबिलिटी यानी वार्षिक कर देनदारी कितनी होगी और आप के वेतन से कितना टीडीएस (स्रोत पर कर कटौती या टैक्स डिडक्टिड ऐट सोर्स) कटेगा.

टैक्स प्लानिंग टैक्स चोरी नहीं. इस में आप गंभीरता से अपनी आय के स्रोत और निवेश के विकल्पों की प्लानिंग करते हैं. टैक्स प्लानिंग का मतलब यह भी नहीं है कि आप आंख मूंद कर के धारा 80 सी के विकल्पों में पैसा लगा दें. टैक्स प्लानिंग मुश्किल नहीं बल्कि काफी आसान है.

टैक्स प्लानिंग की जरूरत क्यों

एक ऐफिशिएंट टैक्स प्लानिंग टैक्स देनदारी कम करने में आप की मदद करती है. उदाहरण के तौर पर हो सकता है कि आप शादी करने वाले हों या फिर आप को घर की जरूरत हो, इस स्थिति में आप को खुद पर आश्रित जीवनसाथी के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए इंश्योरैंस की जरूरत पड़ेगी, साथ ही आप को होम लोन का भी खयाल रखना होगा.

ऐंडोमैंट, यूलिप, जीवन बीमा कंपनियों की पेंशन योजनाओं में निवेश कर के भी आप आयकर में बचत कर सकते हैं. धारा 80सी के तहत जीवन बीमा के प्रीमियम भुगतान पर आप सालाना कटौती का लाभ पा सकते हैं.

इस के अलावा जीवन बीमा योजनाओं की मैच्योरिटी पर प्राप्त होने वाले पैसे भी धारा 10(10)डी के तहत टैक्स फ्री होते हैं. लंबी अवधि में यूलिप आप को बेहतर रिटर्न दे सकते हैं, क्योंकि ये शेयर बाजार में निवेश करते हैं और लंबी अवधि में इक्विटी में किया गया निवेश हमेशा ही बेहतर रिटर्न देता है. अगर आप जोखिम नहीं उठाना चाहते हैं तो टैक्स सेविंग के साथसाथ बचत के लिए ऐंडौमैंट पौलिसी भी ले सकते हैं.

परिवार के आपसी समझौते द्वारा टैक्स प्लानिंग

इस के लिए स्वयं की आयकर टैक्स रिटर्न फाइल करने के साथसाथ अपने परिवार के सदस्यों की भी रिटर्न फाइल करें.

अपने वयस्क बच्चों के लिए टैक्स प्लानिंग करें.

वसीयत द्वारा संपत्ति को ऐसे बांटें, जिस से वह भार उत्तराधिकारियों पर टैक्स के रूप में कम से कम आए.

जब कभी करदाता की देय अधिक होती है, तो वह टैक्स की ऐसी प्लानिंग करे, जिस के द्वारा वह अपनी आय अपने संबंधियों को ट्रांसफर कर सके ताकि उस की टैक्स लाइबिलिटी कम हो जाए. मगर ऐसा करते समय कुछ बातों का उसे ध्यान रखना होगा. जैसे:

संपत्ति ट्रांसफर किए बिना आय ट्रांसफर करना.

रिवोकेबल ट्रांसफर की सही प्लानिंग करना.

पत्नी, पुत्रवधू, अवयस्क बच्चों को अपनी आय ट्रांसफर करने से बचें.

निवेश विकल्पों का चुनाव

टैक्स बचाने के लिए निवेश के विकल्पों का चुनाव करने में इन बातों का ध्यान रखें:

लिक्विडिटी: आप को पैसे की जरूरत कितनी जल्दी पड़ सकती है? क्या आप 1 या

2 साल की अवधि में यह फंड हासिल कर सकते हैं? आप निवेश के किसी भी विकल्प से इतनी जल्दी पैसा निकाल नहीं पाएंगे. यहां तक कि सभी टैक्स बचत विकल्पों के लिए न्यूनतम लौक इन पीरियड 3 साल का है.

जोखिम और रिटर्न: आप को तय करना होगा कि आखिर आप कितना जोखिम लेना चाहते हैं. निवेश के कुछ विकल्पों में जोखिम कम होता है और रिटर्न भी कम. जिन में रिटर्न ज्यादा है उन में जोखिम भी ज्यादा है.

मुद्रास्फीति से सुरक्षा: जो इंस्ट्रूमैंट कम रिटर्न देते हैं वे मुद्रास्फीति के लिहाज से ठीक नहीं हैं. इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है, क्योंकि कई इंस्ट्रूमैंट लंबी अवधि तक आप का निवेश रोक लेते हैं और इस पर एक निश्चित दर से ही ब्याज देते हैं. हालांकि मुद्रास्फीति के लिहाज से यह अच्छा नहीं है.

टैक्स छूट: धारा 80सी, 80सीसीसी, 80सीसीडी के तहत आने वाले सभी इंस्ट्रूमैंट इस लिहाज से एकजैसे हैं, क्योंकि आप को इन पर टैक्स छूट का फायदा तभी मिलेगा जब आप इन में निवेश करेंगे. हालांकि इन से मिलने वाली आय में और मैच्योरिटी पर लगने वाले टैक्स में अंतर है.

– आलोक अग्रवाल, चेयरमैन, अलंकित समूह

खेल के बदलते रूप : वक्त बदला, समाज बदला और बदल गए बचपन के खेल

वक्त बदला, समाज बदला और बदल गए बचपन के खेल. तकनीक ने जहां काम को आसान बनाया है वहीं कुछ मुश्किलें भी पैदा की हैं. खासकर बचपन को सब से ज्यादा प्रभावित किया है.

एक समय था जब बच्चे खेल के मैदानों में घंटों अपने दोस्तों के साथ गिल्ली डंडा, कंचा, कबड्डी, छुपनछिपाई, पिट्ठू, चोरसिपाही, सांपसीढ़ी और न जाने क्याक्या खेलते थे. खेल में इतना मस्त रहते थे कि खानेपीने तक की फुरसत नहीं रहती थी, पर अब ऐसा नहीं है.

आज के बच्चे मोबाइल, इंटरनैट, लैपटौप व कंप्यूटर में सिमट कर रह गए हैं. उन की दुनिया अब एक कमरे में सिमट गई है. वे अकेलेपन का शिकार हो चले हैं.

शारीरिक गतिविधियों के नाम पर कुछ भी नहीं हो रहा. ऊपर से बर्गर, पिज्जा, चाऊमीन, चीज, बटर व सौस के बिना दालरोटी, चावल व फलसब्जी उन्हें सुहाता नहीं. ऐसे में मानसिक के साथसाथ शारीरिक बीमारियों से भी वे ग्रसित हो रहे हैं. अब तो मोबाइल या इंटरनैट में सामान्य गेम को कोई हाथ तक नहीं लगाता. अब हिंसक गेम को ज्यादातर तवज्जुह दे रहे हैं. इस गेम को खेलने के लिए उन्हें अकेलापन चाहिए, इसलिए वे अपनेआप को कमरे बंद कर लेते हैं या फिर छत या दूसरी जगह कहीं जा कर इस गेम को खेलते हैं. यही वजह है कि हर रोज नएनए गेम ईजाद हो रहे हैं.

इस से बच्चों में दिनोंदिन हिंसक प्रवृत्ति बढ़ रही है. आएदिन पत्रपत्रिकाओं में पढ़ने को मिल जाता है कि घंटों बैठ कर गेम खेलना बच्चों की मृत्यु का कारण बना.

हिंसक गेम खेलने वाले बच्चे अब हिंसक तसवीरों को देख कर विचलित नहीं होते बल्कि उन्हें मजा आता है, इसलिए बच्चे अब अपना धैर्य खोते जा रहे हैं. अपनी बात को मनवाने के लिए वे मातापिता से पहले जिद करते हैं और जब मातापिता उन की बात को नहीं मानते हैं तो वे हिंसक प्रवृत्ति को अपनाने में पीछे नहीं रहते. ऊंची आवाज में बोलना और धमकी देना तो आम बात हो गई है. धीरेधीरे यही रवैया उन के लिए घातक साबित होता है.

हाल ही में उत्तर प्रदेश के नोएडा की गौड़ सिटी में एक बच्चे ने अपनी मां को मार डाला. पता चला कि उस की मां ने उस की बात नहीं मानी थी. और वह कई तरह के हिंसक व क्राइम बेस्ड गेम्स का शौकीन भी था.

हिंसक गेम, हिंसक कार्टून या फिर हिंसक फिल्म बच्चों की मानसिकता पर असर डाल रहा है. टैलीविजन में भी कार्टून फिल्मों में इस तरह के कैरेक्टर को परोसा जाता है जो बच्चों के दिमाग पर असर डालता है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने चिंता जाहिर की है कि ज्यादातर मारधाड़ वाले टीवी चैनल व वीडियो गेम खेलने वालों का ब्लडप्रैशर बढ़ा हुआ पाया गया है और यह चिंता का विषय है.

ब्लू व्हेल गेम भी ऐसा ही गेम है जो बच्चों को निगल रहा है. विदेशों से ले कर भारत में भी बच्चे इस के शिकार हो चुके हैं. इस गेम में एक लक्ष्य पूरा करना होता है. कई बच्चे इस लक्ष्य को पूरा करने के एवज में अपनी जान गंवा चुके हैं.

बाजार में भी आजकल बच्चों के खिलौनों के रूप में बंदूक, पिस्तौल, तलवार व छुरा जैसे खिलौने बिक रहे हैं. बाजार में चलते वक्त बच्चे अपने मातापिता को उंगली पकड़ कर वहीं खींच लेते हैं. बच्चे की जिद की वजह से मातापिता भी उसे वही खरीद कर देते हैं जो उस ने डिमांड की.

मातापिता भी इस के लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं. बच्चे को मोबाइल दे देना या बच्चों के उछलकूद या शोर मचाने से पीछा छुड़ाने के लिए टीवी में कार्टून नैटवर्क लगा कर बिठा देना कहां की समझदारी है? धीरेधीरे बच्चे बिना कार्टून नैटवर्क या मोबाइल के खाना नहीं खाते. कई मातापिता बच्चों को खिलाते वक्त या तो मोबाइल पकड़ा देते हैं या फिर टैलीविजन में कार्टून नैटवर्क लगा कर खिलाते हैं. बच्चे तो बच्चे हैं पर कम से कम आप तो बच्चे मत बनिए.

अमेरिकी वीजा नीति: प्रगतिशील युवाओं की उड़ान में बाधक

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा अपने देश के युवाओं को पहले रोजगार देने के चुनावी वादे के तहत एच 1बी वीजा नीति में बदलाव किया जा रहा है. आखिरकार उस पर अब अमल की तैयारी है. दुनिया भर के युवाओं का अमेरिका में जा कर रोजगार करने का सपना इस नीति से टूटता नजर आ रहा है. अमेरिकन कंपनियों के लिए अब एच 1बी वीजा पर विदेशी युवाओं को नौकरी पर रखना आसान नहीं होगा. यह कदम ट्रम्प की ‘बाय अमेरिकन, हायर अमेरिकन’ नीति के तहत उठाया जा रहा है.

ट्रम्प सरकार ने वीजा प्रक्रिया को सख्त करने के लिए नए नियम जारी कर दिए हैं. नए प्रावधानों के तहत कंपनियों को एच 1बी वीजा पर विदेशी को नौकरी देने से पहले श्रम विभाग से आवेदन पर स्वीकृति लेनी होगी. इस बात का प्रमाणपत्र मिलने के बाद ही विदेशी को नौकरी पर रखा जा सकेगा कि एच 1बी वीजा श्रेणी में जिस पद पर विदेशी को रखा जा रहा है उस पद के लिए कोई अमेरिकी नहीं मिला. कंपनियों को यह बताना भी अनिवार्य होगा कि उन के यहां पहले से कुल कितने विदेशी काम कर रहे हैं.

एच 1बी वीजा के जरिए अमेरिकन कंपनियों को उन क्षेत्रों में उच्च कौशल विदेशी पेशेवरों को नौकरी पर रखने की अनुमति मिलती है जिन में अमेरिकी पेशेवरों की कमी है. यह वीजा तीन साल के लिए जारी किया जाता है और छह साल तक इस की अवधि बढाई जा सकती है.

अमेरिका के गृह सुरक्षा विभाग का कहना है कि अमेरिकी नागरिकता और आव्रजन सेवा इस संबंध में जनवरी 2019 तक नया प्रस्ताव लाने की योजना बना रही है. इस का उद्देश्य विशेष व्यवसाय की परिभाषा को संशोधित करना है ताकि एच1बी वीजा कार्यक्रम के माध्यम से बेहतर और प्रतिभाशाली विदेशी नागरिकों पर ध्यान केंद्रित किया जा सके.

विभाग ने कहा है कि वह अमेरिक कामगारों और उन के वेतनभत्तों के हितों को ध्यान में रखते हुए रोजगार और नियोक्ता कर्मचारी संघ की परिभाषा को भी संशोधित करेगा. अमेरिकी सरकार ने कहा कि एच1बी वीजा धारकों को नियोक्ताओं से उचित वेतन सुनिश्चित करने के लिए गृह सुरक्षा विभाग और भी कदम उठाएगा.

विभाग ने यह भी कहा है कि एच1बी वीजा धारकों के जीवनसाथी को जारी होने वाले एच 1बी वीजा के कुछ नियमों को हटाने का भी प्रस्ताव कर रहा है. मौजूदा वीजा नियमों के तहत एच 1बी वीजा धारकों को अमेरिका में काम करने की अनुमति मिलती है.

परिवर्तित वीजा नीति के में एच 1बी वीजा के तहत आने वाले रोजगार और विशेष व्यवसायों या पेशों की परिभाषा को संशोधित किया जा रहा है.

अमेरिका की इस परिवर्तित वीजा नीति से सब से ज्यादा असर भारतीय युवाओं पर होगा. बड़ी संख्या में भारतीय युवा अमेरिकी आईटी कंपनियों में काम कर रहे हैं. एच 1बी वीजा भारतीय आईटी पेशेवरों के बीच खासा लोकप्रिय है. प्रौद्योगिकी कंपनियां  चीन और भारत जैसे देशों से कर्मचारियों की भर्ती के लिए इस वीजा पर निर्भर हैं.

सिलिकौन वैली में 20 प्रतिशत से ज्यादा स्टार्टअप कंपनियां भारतीय पेशवर चला रहे हैं लेकिन ट्रम्प प्रशासन की नीतियों के कारण अब धीरेधीरे नए इंजीनियरों का आना कम होने लगा है. सिलिकौन वैली में अब स्थानीय इंजीनियरों की भर्ती बढने लगी है.

बीस साल पहले इंजीनियरिंग करने वाले भारतीय युवा अमेरिका की ओर रुख करते थे. उन के मांबाप का भी सपना होता था कि उन का बेटा या बेटी अमेरिका जाएं. इन सालों के दौरान अमेरिका की अर्थव्यवस्था को भारतीय पेशेवरों ने बड़ा फायदा पहुंचाया. अमेरिका भारतीय ब्रेन का लोहा मानता है लेकिन अमेरिकी मूल के युवाओं में विदेशी प्रतिभाओं को ले कर पिछले समय से आक्रोश पनप रहा था और वहां बेरोजगारी बढ़ रही थी.

अमेरिका शुरू से ही आप्रवासियों का देश रहा है. विदेशियों को शरण देने में अमेरिका आगे है. उस की यह नीति विश्व भर में सराही जाती रही है. एक सच्चे लोकतंत्र के लिए यह आवश्यक भी है कि वह देश, प्रांत, नस्ल, भाषा, धर्म, जाति को ले कर रोजगार से ले कर रहने, बसने तक कोई भेदभाव न बरते.

वीजा को ले कर अमेरिका की परिवर्तित नीति से लाखों युवाओं पर प्रतिकूल असर पड़ेगा जो अमेरिका में जा कर नौकरी करने का सपना देख रहे हैं. यह नीति दुनिया भर के युवाओं की उड़ान को रोकने के लिए तैयार है.

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