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हरा परांठा रोल

सामग्री

– 1 कप मूंग व चने के स्प्राउट्स

– 1/2 कप शिमलामिर्च बारीक कटी

– 1 गाजर कदद्कस की

– 3 बड़े चम्मच हंग कर्ड

– जरूरतानुसार चिली व टोमैटो सौस

– 1 कप पालक उबली व पीसी

– घी परांठे सेंकने के लिए

– 2 कप गेहूं का आटा

– नमक स्वादानुसार.

विधि

– पालक पेस्ट को आटे के साथ मिला कर डो तैयार करें व परांठे सेंक कर रख लें.

– स्प्राउट्स, सब्जियां, दही, नमक व सौसेज मिला कर फिलिंग तैयार करें.

– परांठों में फिलिंग सैट कर रोल बनाएं और सर्व करें.

व्यंजन सहयोग : महाराज जोधाराम चौधरी
कारपोरेट शैफ, खानदानी राजधानी

सावधान अगर हाई हील पहनने से पैरों में होता है दर्द

हाई हील्स तकरीबन हर लड़की के वार्डरौब में सबसे खास माना जाता है. ये लड़की की पर्सनालिटी को बेहतर बनाकर उन्हें हौट भी बनाता है. ऐसा कई बार देखा गया है कि लड़कियों को हाई हील्स पहनने से खुशी तो मिलती है लेकिन उसके साथ दर्द भी मुफ्त में मिलता है. एक सर्वे से ये बात पता चली है कि 73 प्रतिशत महिलाएं जो हाई हील्स पहनती हैं उनमें से 69 प्रतिशत को भयानक दर्द झेलना पड़ता है.

अगर आपको भी हाई हिल्स पहनना पसंद है लेकिन पैरों में होने वाले दर्द की वजह से आप इसे पहनने में परहेज करती हैं तो ये खबर खास आपके लिए ही है. हम इस आर्टिकल में आपको कुछ ऐसे घरेलू उपचार के बारे में बताएंगे जिससे पैरों के दर्द में राहत मिलेगा.

तकिये की एक्सरसाइज

जब तक आप इस दर्द से उबरकर नार्मल स्थिति में आने का प्रयास कर रही हैं तब तक आप अपने पैरों के नीचे तकिया रखें और कुछ देर इंतजार करें. पैरों के नीचे तकिया रखने से नर्वस सिस्टम को दोबारा ठीक से काम करने का समय मिल पाता है. इससे पैरों में हुई सूजन भी कम होती है. आप रात में इसे ट्राई करें और आपको अगली सुबह इसका फर्क पता चलेगा.

आइस पैक

हील के दर्द को कम करने में आइस पैक एक सबसे कारगर उपाय है. आइस पैक दर्द को कम करने में काफी असर दिखाता है क्योंकि ये इन्फ्लेम्शन को कम करके पैरों को राहत देता है. इसके लिए आपको एक बोतल को फ्रीज करना है और फिर इस जमी हुई बोतल को अपनी हील के नीचे रखना है. इसे अपने पैरों के नीचे रोल करें, थोड़ी देर रुक कर फिर से ऐसा करें. दोनों पैरों के साथ ऐसा करें जब तक आपको आराम ना मिले.

गर्म और ठंडा

गर्म और ठंडे पानी वाला एक्सरसाइज भी पैरों के दर्द को कम करने में मदद करता है. गर्म पानी जहां शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है तो वहीं ठंडा पानी इन्फ्लेम्शन को कम करता है. एक बाल्टी में गर्म पानी लें और एक बाल्टी को ठंडे पानी से भर दें. अब अपने पैरों को कुछ देर के लिए गर्म पानी में डुबाएं और फिर ठंडे पानी में रखें. ये कई बार आपको करते रहना है. बेहतर महसूस होने पर रुक जाएं.

विनेगर

पैरों के दर्द में राहत पाने में विनेगर दूसरा बड़ा उपचार है. ये स्किन के इन्फ्लेम्शन को कम करके दर्द में आराम देता है. एक टब में गर्म पानी लें और उसमें तीन चार चम्मच विनेगर मिला लें. अब इसमें अपने पैरों को रखें और 15 से 20 मिनट तक इंतजार करें. जब आपके पैरों को सुकून मिल जाए तब अपने पैरों को टब से बाहर निकाल लें.

लौंग का तेल

एंटी इंफ्लेमेटरी गुण होने की वजह से लौंग का तेल हील की वजह से पैरों में उठने वाले दर्द में राहत देता है. आप लौंग का तेल लें और सोने जाने से पहले इसे अपने तलवों में लगा लें. लौंग का तेल सिर्फ पैर के दर्द में ही नहीं बल्कि सिर दर्द और शरीर के दर्द में भी आराम देता है. आपको लौंग के तेल का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए क्योंकि ये शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को ठीक करता है जिससे आप रिलैक्स फील करते हैं.

सेंधा नमक

पैरों में हो रहे दर्द से छुटकारा पाने के लिए थोड़ा सा सेंधा नमक गर्म पानी में डाल दें और उसमें अपने पैरों को डूबा दें. 20 मिनट के लिए उस पानी में ही पैरों को रखें और फिर हल्के गुनगुने पानी से धो लें. आपको तुरंत ही अंतर पता चल जाएगा क्योंकि सेंधा नमक में ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाने की क्षमता है जिससे आपकी स्किन को भी राहत मिलती है. मगर सेंधा नमक का इस्तेमाल करते समय आपको एक बात का ध्यान जरूर रखना चाहिए. दरअसल सेंधा नमक का ज्यादा देर प्रयोग करने से आपकी स्किन ड्राई हो सकती है इसलिए आप पानी से पैर बाहर निकालने के बाद तुरंत माइशचराइजर का इस्तेमाल करें

सर्दियों में मेकअप करने में आता है आलस ? अपनाएं ये ब्यूटी टिप्स

सर्दियों के मौसम में हम में से कई लोगों को सुबह उठने, तैयार होने, मेकअप करने और हेयरस्टाइल बनाने में काफी आलस आता है. उस वक्त तो बिना मेहनत किये ही घर से बाहर निकल जाना ज्यादा आसान लगता है. मेकअप तो छोड़िए कई बार हम अपनी स्किन और बालों की भी अच्छे से देखभाल भी नहीं कर पाते ऐसे में हमारे सामने रूखे सूखे बाल, ड्राई स्किन जैसी कई समस्याएं आने लगती हैं. अगर आप उन्हीं लोगों में से एक हैं तो चिंतित ना हों.

ठंडे पानी का इस्तेमाल

सर्दियों में ठंडे पानी से चेहरा धोना एक अच्छा और असरकारी उपाय है. सुबह उठने के बाद अपने चेहरे को ठंडे पानी से धोएं. इससे ना केवल आपको फ्रेश महसूस होगा बल्कि इससे आपके पोर्स बंद हो जायेंगे और स्किन टाइट नजर आएगी. ये चेहरे की त्वचा को डीहाईड्रेशन से बचा कर आपके एजिंग प्रोसेस को भी धीमा करते हैं.

रेड लिपस्टिक है आपका परफेक्ट साथी

गर्मी, सर्दी चाहे कोई भी मौसम हो, रेड लिपस्टिक कभी भी ट्रेंड से बाहर नहीं होती है. अगर आप मेकअप नहीं करना चाहती हैं या फिर कम मेकअप से ही काम चलाना चाहती हैं तो ये बेस्ट आईडिया है. बस रेड लिपस्टिक लगाकर आप घर से बाहर निकलने के लिए पूरी तरह से तैयार हैं. इस वजह से आप कहीं पर भी जाएं अपनी रेड लिपस्टिक साथ रखना ना भूलें.

बालों का काम एक रात पहले ही निपटा लें

सुबह सुबह बालों को धोना काफी भारी काम लग सकता है, खासतौर से सर्दियों के मौसम में. अगर अगली सुबह आपको कोई खास प्रोग्राम अटेंड करना है बेहतर होगा कि ये काम आप एक रात पहले ही कर लें. अगली सुबह सिर्फ आपको अपने बालों को कंघी करनी होगी और आप प्रोग्राम में जाने के लिए तैयार हों जाएंगी. इससे ना सिर्फ आपका समय बचेगा, आप सुबह बालों को गिला करने के डर से भी बच जाएंगी.

करें ड्राई शैम्पू का इस्तेमाल

आपके पास हौट वाटर बाथ लेने का टाइम नहीं है तो ऐसे समय में ड्राई शैम्पू आपकी मदद कर सकता है. आप बस अपने बालों में ड्राई शैम्पू लगा लें. इससे आपके बाल सौफ्ट और सिल्की बनेंगे और उनका चिपचिपापन भी खत्म हो जाएगा.

अपनी स्किन को भी पहले से करें तैयार

सुबह सुबह स्किन केयर के लिए पूरा रूटीन फौलो करना मुश्किल हो सकता है और इसमें वक्त भी काफी लगता है. आप रात में ही चेहरे की क्लींजिंग, मौइश्चराइजिंग, फेस पैक और सीरम लगाने का काम कर सकती हैं ताकि अगली सुबह आपको ज्यादा समय ना लगे. इससे आपकी त्वचा इस मौसम में भी स्वस्थ रहेगी और अगले दिन घर से बाहर निकलते वक्त ग्लो भी करेगी.

गारंटर बनने से पहले ध्यान में रखें ये बातें

कालेज में प्रोफैसर थे. उन के अभिन्न मित्र राज वर्षों बाद उन से मिले. राज और अमित दोनों एकसाथ पढ़ेलिखे थे. अमित मुंबई में एक प्राइवेट कालेज में प्रोफैसर बन गए और राज एक सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल बन गए. राज को कार लेने के लिए कर्ज की जरूरत थी. उस ने बैंक से लोन लेने का निर्णय लिया. इस के लिए उसे बैंक की अनेक औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ीं, जिस में से एक था बैंक गारंटर. इस के लिए राज ने अमित का सहारा लिया. अमित इस के लिए तैयार हो गया. राज ने कार लेने के बाद कुछ वर्षों तक कार की मासिक किस्तें तो समय पर चुकाईं, फिर उस का ट्रांसफर हो गया. जिस के कारण कार की किस्तें अनियमित होने लगीं. चूंकि अमित ने गारंटी ली थी, इसलिए उसे भी बारबार बैंक के नोटिस मिलने लगे.

इसी तरह आर्यन ने अपनी साली की बैंक गारंटी होमलोन के लिए ली. संयोग से घर लेने के कुछ दिनों बाद ही उन की साली का निधन हो गया. वे नौकरीपेशा एकाकी महिला थीं. उन्होंने बैंक की केवल एक किस्त ही जमा की थी. सालभर लोन की किस्तें न भरने से बैंक ने घर की नीलामी के लिए आर्यन को नोटिस भेजा. आर्यन ने किसी तरह बैंक से समझौता कर इस समस्या का समाधान किया. इस वजह से उन  को काफी परेशानी उठानी पड़ी. साथ ही, मानसिक और पारिवारिक टैंशन से भी उन का सामना होता रहा.

किसी को लोन दिलाने में सोचसमझ कर ही गारंटर बनना चाहिए. कोई भी बैंक केवल फाइनैंशियल डौक्यूमैंट्स के आधार पर लोन दे दे, यह जरूरी नहीं है. बैंक गारंटर लाने को भी कहता है. गारंटर उधार ली जाने वाली राशि की सुरक्षा की तरह होता है. वह भरोसा दिलाता है

कि लोनअमाउंट चुकाया जाएगा. यदि कर्जदार उसे चुकाने में विफल रहा तो गारंटर इसे चुकाने के लिए सहमत है. एजुकेशनल लोन में मातापिता गारंटर बनते हैं. यदि संतान लोन नहीं चुका पाती है तो मातापिता कर्ज चुकाने के लिए जिम्मेदार होते हैं.

गारंटर किसे बना सकते हैं

साधारणतया, कोई भी गारंटर बन सकता है. यदि बैंक चाहे तो रिश्तेदार भी गारंटर बन सकते हैैं, लेकिन किसी दूसरे को भी गारंटर बनाना व्यावहारिक नहीं है. इस के लिए बैंक की शर्तें पूरी करना जरूरी है. ये आवेदक के लिए निर्धारित शर्तों के समान ही होती हैं. बैंक गारंटर की क्रैडिट हिस्ट्री देखता है. इस के द्वारा वह गारंटर की कर्ज चुकाने की क्षमता को परखता है. गारंटर अपनी गारंटी के कारण लोन से जुड़ा होता है. यह गारंटी छोड़ी भी जा सकती है. भले ही कर्जदार ने पूरा लोन अदा न किया हो. गारंटर बनने के लिए गारंटी डीड पर दस्तखत करने होते हैं.

गारंटी डीड क्या है

–      कर्जदार नियत तिथि पर कर्ज चुकाने में विफल रहा तो ऋण का भुगतान गारंटर को करना पड़ता है.

–      कर्ज लेने वाला अपनी आय और उम्र की सही जानकारी दे रहा है और संबंधित सभी नियमों का पालन कर रहा है.

–      लोन की अदायगी में डिफौल्ट होने पर गारंटर इसे समान रूप से चुकाने के लिए जिम्मेदार होता है.

गारंटर की जरूरत क्यों होती

बैंकिंग तंत्र में कई तरह की पेचीदगियां होती हैं. कर्ज से खरीदी हुई वस्तु बेच कर लोन की वसूली के नियम बहुत सख्त नहीं हैं, लेकिन कुछ मामलों में बैंकों को प्रौपर्टी ले कर लोन की वसूली करने में कठिनाइयां पेश आई हैं, इसलिए बैंक अपने हितों की सुरक्षा के लिए और लोन की अदायगी समय पर होगी, यह सुनिश्चित करने के लिए गारंटर को महत्त्व देता है.

होमलोन में गारंटर

–      यदि कर्ज लेने वाला अकेला आवेदक हो, कोई सहआवेदक न हो.

–      यदि आवेदक जिस जगह प्रौपर्टी खरीद रहा है, उस जगह न रहता हो.

–      यदि आवेदक की आय परिवर्तनशील हो.

–      यदि आवेदक का स्वरोजगार हो और उस के पास कोई पेशेवर योग्यता न हो.

–      यदि आवेदक की नौकरी तबादले वाली हो.

–      यदि आवेदक ऐसा कोई काम करता हो जिस में लंबी विदेश यात्रा की संभावना अधिक हो.

वर्तमान में लोन डिफौल्ट के मामले बढ़ रहे हैं. ऐसे में जरूरी है कि आप गारंटर बनने के नतीजों के बारे में जान लें. जिस पर पूरा विश्वास हो सिर्फ उस की गारंटी दें. गारंटी देते समय यह जरूर ध्यान में रखें कि जिस की आप गारंटी ले रहे हैं, यदि उस ने कर्ज की अदायगी नहीं की तो बैंक आप को ऋण अदा करने को कह सकता है. कर्जदार के डिफौल्टर होने पर आप परेशानी में पड़ सकते हैं.

रूप फागुनी

देह तुम्हारी

रंगों की कविता.

होंठ गुलाबी

आंखें कजरारी

रूप फागुनी

बातें पिचकारी.

सांस तुम्हारी

गंधों की कविता.

तितली सी चितवन

पर तोले है

ठलके आंचल

तनमन डोले है.

चाल तुम्हारी

अंगों की कविता.

पायल उतरी

अपनी नसनस में

तोड़ रही हर बंधन

हर कसमें.

चाह तुम्हारी

पंखों की कविता.

-डा. हरीश निगम

अविवाहित ननद यानि डेढ़ सास

इसमें कोई शक नहीं कि बेटी का रिश्ता तय करते वक्त मां बाप इस बात पर ज्यादा गौर करते हैं कि कहीं लड़के की बड़ी बहन अविवाहित तो नहीं. इसकी वजह भी बेहद साफ है कि घर में चलती उसी की है. सास अब पहले की तरह ललिता पवार जैसी क्रूर नहीं रह गई है, लेकिन बड़ी अविवाहित ननद बिन्दु, अरुणा ईरानी और जयश्री टी जैसी हैं, जिसके हाथ में घर की न केवल चाबियां बल्कि सत्ता भी रहती है, इसीलिए उसे डेढ़ सास के खिताब से नवाजा जाता है. छोटे भाई को वह बेटा भी कहती है और दोस्त भी मानती है. ऐसे में बेटी शादी के बाद उससे तालमेल बैठा पाएगी इसमें हर मां बाप को शक रहता है.

बेटी भले ही रानी बनकर राज न करे चिंता की बात नहीं, लेकिन ससुराल जाकर ननद के इशारों पर नाचने मजबूर हो यह कोई नहीं चाहता क्योंकि भाई का स्वभाविक झुकाव कुंवारी बड़ी बहन की तरफ रहता ही है. हालांकि इसके पीछे उसकी मंशा यह रहती है कि दीदी को एक अच्छी सहेली और छोटी बहन मिल जाएगी, लेकिन अधिकतर मामलों में ऐसा होता नहीं है क्योंकि पत्नी और बहन दोनों उस पर बराबरी से हक जमाते कुछ दिनों बाद बिल्लियों की तरह लड़ती नजर आती हैं.

भोपाल के 32 वर्षीय बैंक अधिकारी विवेक की बड़ी बहन 36 वर्षीय प्रेरणा की शादी किन्हीं वजहों के चलते नहीं हो पाई थी. मां की इच्छा और असशक्ता के चलते तीनों ने फैसला यह लिया लिया कि विवेक ही शादी कर ले. पिता थे नहीं, इसलिए विवेक की तरफ से शादी के सारे फैसले प्रेरणा ने लिए. शुचि के मां बाप ने भी मन में खटका लिए ही सही शादी कर दी. शुरू में प्रेरणा का रवैया बेहद गंभीर और परिपक्व था उसने पूरे उत्साह और जिम्मेदारी से शादी सम्पन्न कराई और शुचि को भाभी के बजाय छोटी बहन ही कहा.

दो चार महीने ठीक ठाक गुजरे.  शुचि भी बैंक कर्मी थी लिहाजा हनीमून से लौटने के बाद वह अपनी नौकरी में लग गई. एक बात उसने न चाहते हुये भी नोटिस की कि पूरे हनीमून के दौरान विवेक दीदी की बातें ज्यादा करता रहा था कि पापा के असामयिक निधन के बाद मम्मी बिलकुल टूट गईं थी और बिस्तर से लग गईं थीं तो उनकी देखभाल के लिए दीदी ने शादी नहीं की क्योंकि उस वक्त वह पढ़ रहा था.

विवेक की नजर में दीदी का यह त्याग अतुलनीय था. शुचि उसकी भावनाओं को समझ रही थी लेकिन यह बात उसे खटक रही थी कि नैनीताल वे दीदी के त्याग का पुराण बांचने आए हैं या फिर रोमांस करते एक दूसरे को समझने आए हैं.

भोपाल लौटते ही बात आई गई हो गई और चारों अपनी दिनचर्या में बांध गए. बहू बेटा और बेटी साथ खाने बैठते थे तो मां खुश हो जातीं थीं और बार बार हर कभी शुचि की तारीफों में कसीदे गढ़तीं रहतीं थीं कि उसके आने से घर में रौनक आ गई है, उलट इसके विवेक का पूरा ध्यान प्रेरणा पर रहता था कि ऐसी कोई बात न हो जो दीदी को बुरी लगे. हर बात में दीदी उसकी प्राथमिकता में रहती थीं. वह जो भी शुचि के लिए खरीदता था वही प्रेरणा के लिए भी खरीदता था ताकि उसे बुरा न लगे.

शुचि को इस पर कोई एतराज नहीं था हालांकि कभी कभी उसे यह सब बुरा लगता था लेकिन मम्मी की दी यह सीख उसे याद थी कि ऐसा शुरू शुरू में हो सकता है इसलिए उसे इन बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए, बल्कि पति का सहयोग करना चाहिए फिर धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा और मुमकिन है अब प्रेरणा की भी शादी हो जाये.

लेकिन ऐसा हुआ नहीं उल्टे दिक्कत उस वक्त शुरू हो गई जब दिन भर घर में खाली बैठी रहने वाली प्रेरणा शुचि के कामों में मीनमेख निकालने लगी और विवेक दीदी के लिहाज में चुप रहा. यहां तक भी शुचि कुछ नहीं बोली लेकिन ननद का व्यवहार और घर में एकछत्र दबदबा उसे अखरने लगा था. घर में क्या आना है, रिश्तेदारी कैसे निभाना है जैसी बातें प्रेरणा ही तय करती थी. और तो और आज सब्जी कौनसी बनेगी यह फैसला भी वही लेती थी.

शुरू में जब शुचि बैंक से आती थी तो प्रेरणा उसे चाय बनाकर दे देती थी, इस परिहास के साथ कि मेरी भाभी कम बहन ज्यादा थक गई होगी लेकिन वक्त के साथ घर में पैदा हुआ यह सौहाद्र छू हो रहा था. थकी हारी शुचि या तो खुद चाय बनाकर पी लेती थी या फिर बिना पिये ही रह जाती थी. इस और ऐसे कई बदलावों पर प्रेरणा पहले तो खामोश रही पर जल्द ही उसने शुचि को महारानी के खिताब से नवाजते एक दिन विवेक को कह दिया कि बेहतर होगा कि वह अलग रहने लगे.

इस धमाके से सभी भौंचक्क रह गए खासतौर से विवेक जिसने कभी ऐसी स्थिति की उम्मीद ही नहीं की थी. अब घर में स्थायी रूप से कलह पसर गई है और शुचि का मुंह भी खुल गया गया है.

यह सच्चा वाकिया हर उस घर का है जहां डेढ़ सास है. रिश्तों को समझने और निभाने में कहां किससे कितनी चूक हुई है, इसे हर किरदार के लिहाज से देखा जाना जरूरी है जिससे यह समझ आए कि इस अप्रिय और अप्रत्याशित स्थिति की वजह क्या है.

विवेक – विवेक की गलती यह है कि उसने पत्नी के मुकाबले बहन को ज्यादा तरजीह दी, जबकि उसे शुचि की भावनाओं का भी खयाल बराबरी से रखते दोनों के बीच तालमेल बैठाना चाहिए था. शादी के बाद उसे बहन पर निर्भरता कम करनी चाहिए थी और शुचि को भी हर छोटे बड़े फैसले में महत्व देना चाहिए था. दीदी अकेली है, बड़ी है और अब हमें ही उसका ध्यान रखना है जैसी बातों से साफ है कि वह शुचि को प्रेरणा का प्रतिस्पर्धी मानने की गलती कर रहा था. उसकी मंशा गलत नहीं थी लेकिन हालातों को ओपरेट करने का तरीका गलत था.

शुचि – ससुराल आते ही शुचि के मन में यह बात बैठ गई थी कि घर में उसकी भूमिका एक सदस्य की नहीं बल्कि मेहमान की की है लिहाजा उसने अपने अधिकार न तो हासिल किए और न ही इस्तेमाल किए. उसने यह भी मान लिया कि जब सब कुछ प्रेरणा ने ही करना है तो वह क्यों खामखा किसी मामले में टांग अड़ाये. एक तरह से विवादों और जिम्मेदारियों से बचने वह डिफेंस में रही, लेकिन प्रेरणा के ताने सुन आपा खो बैठी और विवेक से दीदी के लगाव के चलते हर ज्यादती बर्दाश्त करती रही.

प्रेरणा – शुरू में प्रेरणा की भूमिका अभिभावक की थी लेकिन असुरक्षा के चलते वह खुद की तुलना शुचि से करने की गलती कर बैठी. खासी पढ़ी लिखी प्रेरणा यह नहीं समझ पाई कि विवेक और शुचि को एक दूसरे को समझने नजदीकियां और एकांत चाहिए और इसमें उसे आड़े नहीं आना चाहिए. उसे यह काल्पनिक चिंता सताने लगी थी कि शुचि घर की बहू है इस नाते वह उसके अधिकार छीन लेगी इस गलतफहमी के चलते वह लगातार आक्रामक होती गई. अलावा इसके खुद के अकेलेपन का दंश भी उसे सालने लगा था जो निरधार था. उसने शुचि को न भाभी समझा और न ही बहिन मान पाई.

मां –  मां की तटस्थ भूमिका का खामियाजा सभी भुगत रहे हैं जिन्होंने हालातों को भांपने के बाद भी दखल नहीं दिया जो जरूरी था. बेटी की परेशानी के सामने उन्हें बहू की परेशानी समझ नहीं आई और आई भी तो वे चुप रहीं. जरूरी तो यह था कि वे तीनों को अलग अलग और इकट्ठा बैठाकर भी समझातीं, खासतौर से विवेक को कि उसे कैसे बहन और पत्नी के बीच में संतुलन बैठालना है.

अब शुचि प्रेगनेंट है और मायके में रह रही है, उसके मम्मी पापा को भी समझ नहीं आ रहा है कि ऐसी हालत में क्या किया जाये. अगर विवेक को ज्यादा  समझाएंगे तो वह भड़क भी सकता है, हालांकि वह हर सप्ताह शुचि से मिलने आता है और उसे समझाता है कि कुछ दिनों में सब ठीक हो जाएगा. दीदी ने तो गुस्से में अलग होने की बात कह दी है.

लेकिन शुचि को लगता है कि अब कुछ ठीक नहीं होगा और होगा तो तभी जब डेढ़ सास की शादी हो जाये.

मंजिल (भाग-2) : पुरवा और सुहास की इच्छा क्या पूरी हो पाई

पूर्व कथा

पुरवा कालिज जाने के लिए बस में जाती है कि एक चोर उस का पर्स छीन कर चलती बस से कूद जाता है. पुरवा के चिल्लाने पर एक युवक तुरंत बस से कूद कर उस चोर को पकड़ लेता है और पर्स पुरवा को लौटा देता है. इस घटना के बाद वे दोनों अकसर बस में मिलते रहते हैं. युवक का नाम सुहास है जो उच्च सरकारी पद से रिटायर हुए मकरंद वर्मा का तीसरा बेटा है. पुरवा और सुहास की मुलाकातों का सिलसिला बढ़ता जाता है और  दोनों के मन में प्यार की कोंपल फूटने लगती है.

अब आगे…

कौफी हाउस से निकल कर दोनों काफी देर साथसाथ टहलते रहे. सबकुछ बहुत आनंदित करने वाला था. सुहास ने कहा, ‘‘पुरवा, हम दोनों ऐसे ही सदा के लिए साथसाथ नहीं चल सकते?’’

पुरवा हंस कर बोली, ‘‘शादी कर लो न. फिर सदा साथसाथ चलते रहेंगे.’’

‘‘अरे हां,’’ सुहास उत्साहित सा बोला, ‘‘यह तो सब से सरल उपाय है.’’

‘‘तो पापा को तुम्हारे घर भेजूं?’’ पुरवा ने शरारत से पूछा.

‘‘ठहरोठहरो,’’ सुहास ने कहा तो पुरवा उसे बनावटी गुस्से से देखते हुए बोली, ‘‘क्यों, डर गए. तुम्हारे मम्मीपापा नाराज होंगे क्या?’’

‘‘नहीं, मैं तो मम्मीपापा का लाडला बेटा मशहूर हूं,’’ सुहास बोला, ‘‘मेरी भाभियों को यही तो शिकायत है कि अभी तक मैं खाली बैठा मुफ्त की रोटियां तोड़ रहा हूं.’’

‘‘यह तो सोचने की बात है कि तुम्हारे साथ कहीं मैं भी मुफ्तखोरी में शामिल हो गई तो क्या हाल होगा महाशय?’’ पुरवा ने आश्चर्य दिखाते हुए कहा.

‘‘मेरे मातापिता 2 क्या 10 लोगों को बैठा कर खिला सकते हैं, मैडम,’’ सुहास ने भी अकड़ने की मुद्रा बनाई. फिर दोनों ही खिलखिला कर हंस दिए. कुछ देर के मौन के बाद अचानक पुरवा ठहर गई और धीरे से बोली, ‘‘अपनी पढ़ाई पूरी होते ही मैं भी नौकरी खोज लूंगी सुहास और तुम तो कोशिश कर ही रहे हो अपने लिए, हमारी शादी में कोई बाधा नहीं पड़नी चाहिए.’’

‘‘लगता तो यही है, फिर भी पहले मैं मम्मी से बात कर लूं. फिर तुम अपने पापाजी को भेजना,’’ सुहास ने कुछ गंभीर स्वर में कहा.

दोनों साथसाथ चलते हुए बस स्टाप पर पहुंचे और अपनीअपनी बसों की प्रतीक्षा करने लगे.

उस दिन सुहास पूरी रात अस्पताल में पड़ोस के सागर साहब के साथ जागा था अत: घर आते ही उस की आंखें बोझिल होने लगी थीं. इसीलिए सुबह के 10 बजे भी वह सोया हुआ था. सागर साहब अस्थमा के मरीज हैं. कभीकभी उन्हें अस्थमा का भयानक दौरा पड़ता है. ऐसे में उन की पत्नी बेला सहायता के लिए सदा मकरंद वर्मा के घर दौड़ आती हैं. शुरू में एक पड़ोसी होने के नाते वर्मा साहब ही जा कर डाक्टर को बुलवाते थे, रजनीबाला देर तक वहीं बनी रहती थीं. फिर धीरेधीरे यह कार्यभार सुहास ने संभाल लिया.

उस समय यह पड़ोस धर्म उस ने मम्मीपापा को राहत देने के लिए संभाला था. धीरेधीरे इस तरह

की जिम्मेदारियों को निभाना उस का स्वभाव बन गया. वह लोगों की सहायता में निपुण होता गया. दूसरों को भी लगता था कि सुहास उन के हर दुख को पलक झपकते ही दूर कर देगा और लोगों का यह विश्वास ही उस की प्रेरणा बन गई. जीवन के इस पहलू को भी उस ने अपना एक लक्ष्य बना लिया.

पुरवा से मिलने के बाद अचानक उस के पास समय की कमी रहने लगी. नौकरी की तलाश भी जारी थी. एक दिन वर्मा साहब ने उस से कहा, ‘‘यदि नौकरी पाना इतना कठिन है तो क्यों नहीं कोई व्यापार शुरू कर देते हो.’’

‘‘पापा, व्यापार के लिए रुपए भी तो चाहिए,’’ सुहास ने कहा.

‘‘बैंक से कर्ज दिलवा देंगे,’’ वर्मा साहब ने कहा.

व्यापार के नाम से अचानक उसे पुरवा के पिता की याद आ गई. सोचा, यह अवसर अच्छा है, व्यापार की जानकारी लेने के बहाने उन से निकटता बना कर पुरवा से विवाह तक पहुंचने की राह सरल हो जाएगी, लेकिन पहले किसी तरह पुरवा को मम्मीपापा से मिलवाना होगा. उस ने मन ही मन योजना तैयार की और एक दिन पुरवा को अपने घर पर ले आया.

मम्मी को उस शाम कहीं पार्टी में जाना था. वह लौन में बैठ कर नाखून की पुरानी पालिश उतार रही थीं. श्वेता भी निकट बैठ कर कोई उपन्यास पढ़ रही थी.

सुहास के साथ एक लड़की को देख कर दोनों चौंक उठीं. सुहास ने हंसते हुए कहा, ‘‘मम्मा, यह पुरवा है, मेरी बहुत अच्छी मित्र.’’

श्वेता मुसकराते हुए बोली, ‘‘मुझे तो लगता है कि यह आप से अधिक मेरी प्यारी मित्र बन सकती हैं.’’

‘‘बेशक,’’ पुरवा ने झट से अपनी हथेली उस की तरफ बढ़ा दी. दोनों हमउम्र लड़कियों के हाथ आपस में आ मिले.

मम्मी ने पूरी सौम्यता से कहा, ‘‘आओ, पुरवा, यहां बैठो.’’

पास की खाली कुरसियों पर पुरवा व सुहास बैठ गए. रजनीबाला की पारखी आंखों ने भांप लिया कि बेटा इस लड़की को यहां क्यों लाया है. उन्होंने नौकर से चाय लाने को कहा और पुरवा के परिवारजनों की जानकारी लेने लगीं.

सुहास बीच में बोल पड़ा, ‘‘मम्मा, पुरवा के पिताजी व्यापारी हैं और पापा कह रहे थे कि मैं भी व्यापार शुरू करूं तो सोचता हूं कि उन से मिल कर व्यापार के तौरतरीके सीख लूं.’’

चाय आ गई थी. साथ में कुछ नमकीन, काजू और बिस्कुट. मम्मी ने उसे चाय पकड़ाते हुए सुहास से कहा, ‘‘तुम तो ऐसे कह रहे हो जैसे व्यापार भी कोई खेल हो. अरे, बड़ा खून जलाना पड़ता है व्यापार शुरू करने के लिए और फिर उसे संभाले रखने के लिए.’’

‘‘आप ठीक कह रही हैं, आंटी. मेरे पापा इतने व्यस्त रहते हैं कि हम लोग कईकई दिन उन्हें देखने को तरस जाते हैं. कभी मुंबई, कभी लुधियाना और कभी विदेश भी,’’ पुरवा ने मम्मी के समर्थन में कहा था. लेकिन रजनीबाला के मन में तो कुछ और ही उमड़घुमड़ रहा था कि लड़की तो अच्छी पसंद की है सुहास ने, अगर इस लड़की के प्यार के कारण ही उसे काम करने की जिम्मेदारी समझ में आ जाए तो बुरा क्या है.

अपनी सोच को संवाद देते हुए वह बोलीं, ‘‘मुझे बड़ी खुशी हो रही है बेटी कि तुम्हारी मित्रता इसे अपने पैरों पर खड़े होने का उत्साह दिला रही है.’’

पुरवा थोड़ा सा लजाई फिर सुहास की ओर देख कर बोली, ‘‘काम तो सुहास तलाश ही रहे हैं आंटी, और आप जो व्यापार की सलाह दे रही हैं वह भी बहुत अच्छी है.’’

रजनीबाला प्रसन्न हो गईं. सोचा, लड़की मेरे कामचोर बेटे को ठिकाने से लगाने में समर्थ रहेगी. उन्होंने हंस कर बड़ी आत्मीयता से पुरवा की तरफ देखा और बोलीं, ‘‘पुरवा बेटी, मुझे पूरा विश्वास है कि तुम इसे व्यापार के लिए मन बनाने में सहायता करोगी.’’

‘‘क्यों नहीं आंटी, यह तो मेरा पहला कर्तव्य होगा,’’ फिर थोड़ा संकोच से मुसकराते हुए बोली, ‘‘वैसे आंटी, सुहास में एक सफल व्यापारी बनने के सारे गुण हैं. दूसरों के काम आ कर उन का मन जीत लेना इन्हें खूब आता है.’’

श्वेता उठते हुए झट से बोली, ‘‘बस, यही तो एक काम भैया को आता है. पूरे महल्ले की सेवा करते रहते हैं,’’ और अपने कमरे में चली गई.

रजनीबाला ने संकोच से पुरवा की ओर देखा और बोलीं, ‘‘बहुत लाडली है अपने भाई की. ऐसे ही छेड़ती रहती है इसे.’’

एक दिन पुरवा ने फोन पर सुहास को बताया कि आज पापा सारा दिन घर पर ही रहेंगे. सुहास झटपट तैयार हो कर चल दिया. रजनीबाला ने पूछा तो बोला, ‘‘मम्मा, मैं पुरवा के पापा के पास व्यापार के गुर सीखने जा रहा हूं.’’

रजनी ने मन ही मन सोचा, ‘व्यापार के गुर सीखने जा रहा है या पुरवा के लिए बाप के दिल में जगह बनाने,’ पर चेहरे पर हंसी ला कर बोलीं, ‘‘यह तो खुशी की बात है. तुम्हारे पापा तो कब से चाहते हैं कि तुम कुछ करो लेकिन सुहास, घर जल्दी आ जाना, आज श्वेता को देखने कुछ लोग आ रहे हैं.’’

‘‘जब देखो उस नकचढ़ी के विवाह के पीछे लगी रहती हैं. अरे, करनी है तो मेरे विवाह की चिंता कीजिए न,’’ इतना कहते हुए सुहास बाहर निकल गया.

पुरवा के पापा से मिलते ही सुहास उन के कदमों में झुक गया और बोला, ‘‘अंकल, आप मेरी नैया पार लगा सकते हैं.’’

सहाय साहब के पैर छू कर वह खड़ा हुआ तो पुरवा हंसने लगी. फिर अपने पापा से बोली, ‘‘पापा, मैं ने आप को बताया था कि सुहास व्यापार करना चाहता है.’’

सहाय साहब ने सुहास को सोफे पर बैठने का संकेत किया और खुद भी बैठते हुए बोले, ‘‘पुरू अकसर तुम्हारे बारे में बताती रहती है. अच्छा सुहास, तुम किस तरह का व्यापार करना चाहते हो?’’

सुहास सकपका गया. घबराहट में बोला, ‘‘कुछ भी, अंकल, जो मुझ जैसे नएनए खिलाड़ी के लिए सरल हो.’’

‘‘हां, यह तो है. शुरू में तो व्यापार छोटा ही जमाना पड़ता है और किसी भी व्यापार के लिए व्यक्ति को साहसी, परिश्रमी व अच्छा प्रबंधक होना चाहिए,’’ सहाय साहब ने सुहास को ऊपर से नीचे तक देखा और बोले, ‘‘मेरा खयाल है कि तुम्हारे अंदर ये सभी गुण हैं.’’

इतना कह कर सहाय साहब ने उसे 2 दिन बाद दोबारा आने को कहा तो सुहास खुश हो गया. एक तो पुरवा से अब उस के ही घर पर खुलेआम भेंट हो सकेगी और दूसरे, उस की मां के हाथ से बनाए स्वादिष्ठ व्यंजन भी खाने को मिलेंगे.

मकरंद वर्मा के अथक प्रयास से एक अति सुंदर युवक श्वेता को देखने आ रहा था. रजनीबाला ने श्वेता से कहा कि तुम दोपहर में ही बाल वगैरह सेट करवा कर लौट आना.

‘‘अच्छी तरह सजसंवर कर आना मोटी, बड़ा स्मार्ट है वह…’’ सुहास ने श्वेता को चिढ़ा दिया.

‘‘देखो मम्मा, भैया के पास और कोई काम नहीं है तो बस, मुझे ही छेड़ते रहते हैं,’’ श्वेता ने चिढ़ कर कहा.

‘‘काम क्यों नहीं है. उस के लिए मिठाई जो लानी है,’’ सुहास हंस दिया पर मन ही मन वह बेहद खुश हो रहा था कि श्वेता का विवाह हो जाए तो वह अपने लिए भी मां से कुछ कहे.

सुहास मेहमानों के आने की तैयारी में लगा हुआ था तभी पुरवा का फोन आ गया. रजनी ने हंस कर उसे आवाज दी, ‘‘सुहास, तुम्हारा फोन.’’

सुहास लपकता हुआ आया तो रजनी वहां से हट गईं.

‘‘हैलो पुरु,’’ सुहास प्रसन्नता से बोला.

‘‘आज मिले नहीं,’’ पुरवा ने उलाहना सा दिया.

‘‘आज श्वेता को देखने के लिए कुछ लोग आने वाले हैं,’’ सुहास ने कहा.

‘‘मैं भी आ जाऊं क्या?’’ पुरवा ने भी शरारत से पूछा.

‘‘न बाबा, न,’’ सुहास अपनी ही रौ में बोला, ‘‘कहीं उन्होंने श्वेता की जगह तुम्हें पसंद कर लिया तब?’’

पुरवा खिलखिला कर हंस पड़ी और बोली, ‘‘तब क्या? मुझे ही डोली में बैठा देना.’’

‘‘क्या कहा, फिर से तो कहना,’’ सुहास को अचानक ही क्रोध आ गया.

‘‘फिर से सुनने के लिए तो तुम्हें यहां आना पड़ेगा,’’ पुरवा ने हंसते हुए फोन रख दिया. सुहास मुंह बनाता हुआ पलटा तो श्वेता खड़ी मुसकरा रही थी.

‘‘लगता है होने वाली भाभी ने डांट लगाई है जो मुंह का नक्शा गोलगप्पे जैसा हो रहा है.’’

‘‘सुहास उसे डांट कर अपने कमरे में चला गया और कुरसी पर बैठ कर पुरवा के बारे में सोचने लगा तो उसे पहली बार एहसास हुआ कि वह पुरवा को सचमुच कितना प्यार करने लगा है. मजाक में भी उस से अलग होने की बात वह नहीं सोच सकता है.

काफी समय से सुहास ने अपने अड़ोसपड़ोस के चक्कर नहीं लगाए थे. शायद तभी से जब से पुरवा उस के जीवन में आ गई थी. पुरवा एक ऐसी बहार की तरह थी जिस की सुगंध को वह महसूस कर सकता है.

नकवी साहब के यहां ईद मुबारक की अच्छीखासी भीड़ थी. मकरंद वर्मा उन के बहुत नजदीकी दोस्त थे. सुहास भी अपने पापा के साथ ईद की मुबारकबाद देने आया था. वहीं सागर और बेला से भी भेंट हो गई. सागर ने वर्मा साहब का अभिवादन करने के बाद सुहास से कहा, ‘‘क्या बात है, सुहास, आजकल दिखाई नहीं देते हो.’’

नजदीक खड़े नकवी साहब झट से बोले, ‘‘भई, आप की ही खिदमत में लगे रहेंगे क्या सुहास मियां,’’ फिर सुहास के कान में फुसफुसाए, ‘‘क्यों? कौन थी वह नाजनीन जो परसों तुम्हारे साथ पार्क में टहल रही थी?’’

‘‘अरे, चाचू, आप भी…’’ सुहास ने लज्जित स्वर में कहा. तभी वर्मा साहब बोल पड़े, ‘‘नकवी साहब, आजकल अपना बेटा व्यापार शुरू करने की तैयारी में लगा है. इस की एक मित्र पुरवा है उस के पिता ही इसे संरक्षण दे रहे हैं.’’

‘‘भई वाह, बहुत अच्छी खबर है. कौन सा व्यापार आप शुरू कर रहे हैं, बेटे?’’ नकवी साहब ने पूछा.

‘‘अभी पूरी तरह तय नहीं हुआ है, चाचू. शायद मोटर पार्ट्स का काम शुरू करवाएंगे,’’ सुहास ने कहा.

इतनी देर में वहां सिवइयों से भरी कटोरी ले कर बेला आ गईं और सुहास से बोलीं, ‘‘एक दिन उसे ले कर मेरे घर आना.’’

‘‘अरे, किसे, भाभी?’’ सुहास सिटपिटा गया, ‘‘उस से थोड़ी मुलाकात है. उस का पर्स बचा कर लाया था, बस, यही कहानी है.’’

‘‘मैं ने कब कहा कि कुछ और कहानी भी है,’’ बेला ने शरारत से उसे देखा और एकदम निकट आ कर बोलीं, ‘‘देवरजी, अब मान भी जाओ कि असली बात क्या है.’’

‘‘कुछ नहीं, कुछ भी नहीं, भाभी. मैं घर पर मिलूंगा आप से,’’ सुहास ने भीड़ पर नजर डाली और झटपट वहां से भाग कर बाहर आ गया और एक लंबी सांस भर कर घर की ओर चल दिया.

श्वेता ने आखिरकार गौरव को पसंद कर ही लिया. स्वस्थ, सुंदर गौरव इंजीनियर था. मकरंद वर्मा अपनी इकलौती बेटी का विवाह बहुत धूमधाम से करना चाहते थे.

गौरव के मातापिता अधिक संपन्न नहीं थे पर लड़का इंजीनियर था, इस बात से सभी संतुष्ट थे. सब से बड़ी बात यह थी कि अनेक लड़कों को नापसंद करने वाली श्वेता गौरव को देखते ही हतप्रभ रह गई थी. कदाचित उसे लगा था कि यही उस के सपनों का राजकुमार है.

अब पुरवा के घर जाने का सुहास के पास अच्छा बहाना था. वह बोला, ‘‘मम्मा, श्वेता का विवाह तय हो गया है तो हमें सहाय साहब को मिठाई तो खिलानी चाहिए. आखिर वे…’’

रजनी ने हंसते हुए उस की बात बीच में ही लपक ली और बोलीं, ‘‘आखिर वह तुम्हारे होने वाले ससुर हैं.’’

‘‘क्या, माम…’’ सुहास लजा सा गया.

‘‘देखो सुहास, उन्हें केवल मिठाई ही नहीं देनी है बल्कि सगाई के लिए निमंत्रण भी देना है,’’ रजनी ने सुहास को समझाते हुए कहा.

सुहास मिठाई का डब्बा ले कर पुरवा के घर पहुंचा तो पाया कि सहाय साहब बुखार में पड़े हैं. उस का उत्साह ठंडा पड़ने लगा. जानेअनजाने बहुत से चेहरे सहाय साहब को घेरे हुए थे.

सुहास को देखते ही सहाय साहब मुसकराए और बोले, ‘‘आओ पार्टनर, आओ. इन सब से तुम्हारा परिचय करवा दूं,’’ कह कर सहाय साहब वहां बैठे लोगों की ओर मुखातिब हुए और सुहास का परिचय करवाते हुए बोले, ‘‘यह सुहास है. मैं इसे मोटर पार्ट्स का व्यापार खुलवा रहा हूं, आप सब भी इन की सहायता करना.’’

‘‘जरूर, साहब,’’ वे सभी बोले, ‘‘दुकान कहां लगा रहे हैं आप?’’

उन के इस प्रश्न से सुहास घबरा उठा. सोचने लगा, क्या मुझे दुकान खोल कर बैठना पड़ेगा. यह कैसा व्यापार है. यह तो बहुत बंधन वाली बात हो जाएगी.

उस ने अपनी घबराहट पर अंकुश लगाने की चेष्टा की. सोचा, शायद इसी तरह से व्यापार शुरू किया जाता होगा. अब पुरवा को पाना है तो यह सब तो करना ही होगा. वह हंस कर बोला, ‘‘अब अंकल जहां राय देंगे वहीं पापा काम शुरू करवा देंगे.’’

सहाय साहब ने अपने सहयोगी खन्ना से कहा, ‘‘खन्ना, मेरा एक काम करवाना है.’’

‘‘कहिए, सहाय साहब.’’

‘‘मुझे तो डाक्टर मलेरिया वगैरह बता गए हैं. मेरी कल की फ्लाइट कैंसिल करवानी है.’’

सुहास ने उन की बात पूरी होते ही झट से कहा, ‘‘अंकल, यह काम तो मैं चुटकियों में करवा दूंगा. मेरी वहां काफी जानपहचान है.’’

‘‘भई वाह, आप तो बहुत ही काम के आदमी हैं,’’ सहाय साहब ने सब को छोड़ अपना ध्यान सुहास पर केंद्रित कर दिया.

‘‘बस, अंकल, आप का ही बच्चा हूं, सेवा का अवसर दीजिए.’’

सुहास ने पलक झपकते ही सहाय साहब को अपनेआप में उलझा लिया. वैसे भी उस का मन इन्हीं कामों में अधिक लगता था और सहाय साहब व पुरवा पर अपनी धाक जमाने का इस से अच्छा अवसर कहां मिलता.

‘‘ठीक है, खन्ना साहब, सुहास घर का ही बच्चा है, करवा देगा.’’

सहाय साहब की बातों ने सुहास के मन में खुशी के अपार फूल खिला दिए थे. अपनी आत्मीयता का और अधिक प्रदर्शन करने के विचार से सुहास ने मिठाई का डब्बा कस कर थामते हुए कहा, ‘‘अंकल, मैं जरा आंटी से मिल कर आता हूं. यह मेरी बहन की सगाई का निमंत्रण है,’’ उस ने डब्बे की ओर संकेत किया और दूसरे कमरे में लपक लिया.

– क्रमश:

देवर की दीवानी : अनीता ने कैसे करवाई अपने पति की हत्या

दरियागंज के थानाप्रभारी मंगेश गेडाम अपने औफिस में बैठे थे तभी ड्यूटी औफिसर ने इंटरकाम पर सूचना दी कि एक राहगीर से जानकारी मिली है कि गीता कालोनी फ्लाईओवर के नीचे गंदे नाले के पास एक युवक की लाश पड़ी है. थानाप्रभारी मंगेश गेडाम अपनी पुलिस टीम के साथ गीता कालोनी फ्लाईओवर के नीचे उस जगह पहुंच गए जहां लाश पड़ी होने की सूचना मिली थी.

लाश के करीब जाने पर पता चला कि वह सड़ीगली हालत में थी यानी उस की मृत्यु कई दिन पहले हुई थी. थानाप्रभारी ने यह सूचना उच्चाधिकारियों को दे दी साथ ही क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम को भी बुला लिया. थोड़ी देर में बड़े अधिकारी और क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम वहां पहुंच गई. लाश कई दिन पुरानी थी और उस का सिर किसी भारी वस्तु से बुरी तरह कुचला हुआ था, जिस से उस का चेहरा विकृत हो गया था.

लाश के फोटो लेने के बाद उस के कपड़ों की तलाशी ली गई तो उस की पैंट की जेब से एक आधार कार्ड, पर्स और एक मोबाइल फोन मिला.

आधार कार्ड में मृतक का नाम राजेश कुमार और पता अगसोली, जिला हाथरस लिखा था. यह गांव सिकंदरा राव थाने के अंतर्गत आता है. थानाप्रभारी ने बरामद चीजों को कब्जे में कर लाश पोस्टमार्टम के लिए मौलाना आजाद मैडिकल कालेज भेज दी. मौके की काररवाई निपटा कर मंगेश पुलिस टीम के साथ थाने लौट आए. ड्यूटी औफिसर ने उन के आदेश पर मृतक की हत्या का मुकदमा दर्ज कर के तफ्तीश अतिरिक्त थानाप्रभारी संजीव मिश्रा को सौंप दी.

इस मामले को सुलझाने के लिए सेंट्रल जिले के डीसीपी एम.एस. रंधावा के आदेश पर एसीपी गीतांजलि खंडेलवाल की देखरेख में एक पुलिस टीम गठित की गई, जिस में थानाप्रभारी मंगेश गेडाम, अतिरिक्त थानाप्रभारी संजीव मिश्रा, एसआई बलजिंदर सिंह, दिनेश जोशी, एएसआई रामकरण और बच्चू सिंह को शामिल किया गया.

थानाप्रभारी मंगेश गेडाम ने थाना सिकंदरा राव के इंचार्ज को बता कर इस मामले में मदद की अपील की. इस के अगले दिन गांव अगसोली का रहने वाला रामचरण अपने जवान बेटे विजय के साथ मध्य दिल्ली के थाना दरियागंज पहुंचा. रामचरण ने खुद को राजेश का पिता बताया और लाश दिखाने के लिए कहा.

लाश देखते ही दोनों की आंखों से आंसू बहने लगे. उन दोनों ने लाश पहचान ली. मृतक रामचरण का बड़ा बेटा राजेश था. मृतक की शिनाख्त हो जाने के बाद लाश का पोस्टमार्टम किया गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हत्या का कारण मृतक का दम घुटना बताया गया.

थानाप्रभारी मंगेश गेडाम ने तफ्तीश आगे बढ़ाई तो पता चला कि राजेश जहां रहता था, वहां उस का कमरा बंद था. छानबीन के लिए एसआई बलजिंदर सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस टीम उस के पैतृक गांव अगसोली, हाथरस भेजी गई.

वहां मृतक के पिता रामचरण से राजेश के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि राजेश अविवाहित था और दिल्ली में अकेला रह कर मेहनतमजदूरी करता था. वह गांव आने वाला था लेकिन इस से पहले ही किसी ने उस की हत्या कर दी. जबकि वह एकदम सीधे स्वभाव का लड़का था. घर के बाकी सदस्यों ने भी राजेश के बारे में यही सब बताया था.

अगसोली से दिल्ली लौटने के बाद एसआई बलजिंदर, हेड कांस्टेबल सोमनाथ के साथ उत्तम नगर के हस्तसाल गांव स्थित उस मकान पर पहुंचे, जहां राजेश रहता था. वहां रहने लोगों से राजेश के बारे में पूछताछ की गई तो उन्होंने बताया कि राजेश यहां अपनी पत्नी के साथ रहता था. वह बहुत कम बोलता था.

राजेश के घर वालों ने उसे अविवाहित बताया था, जबकि वहां के लोगों के अनुसार वह वहां पत्नी के साथ रहता था. बलजिंदर सिंह ने थाना दरियागंज लौट कर थानाप्रभारी मंगेश गेडाम को सारी बातें बताईं. इस पर उन्होंने मामले की तह तक जाने के लिए एसआई बलजिंदर के नेतृत्व में दोबारा एक पुलिस टीम मृतक राजेश के गांव में भेजी.

इस टीम में जब रामचरण से राजेश के साथ दिल्ली में रहने वाली महिला के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि दरअसल उस ने ऐसा बयान विजय और अनीता के दबाव में दिया था.

रामचरण की बात सुन कर एसआई बलजिंदर को समझते देर नहीं लगी कि विजय और अनीता राजेश के बारे में जानबूझ कर कुछ छिपा रहे थे. उन से सख्ती से पूछताछ करने पर वे टूट गए और राजेश की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. पुलिस टीम उन दोनों को हिरासत में ले कर दिल्ली लौट आई. थानाप्रभारी मंगेश गेडाम के सामने अनीता और विजय ने जो कुछ बताया वह एक भाभी और उस के देवर के कुत्सित षड्यंत्र की हौलनाक कहानी थी.

उत्तर प्रदेश के जिला हाथरस के पास एक गांव है अगसोली. रामचरण अपने परिवार के साथ इसी गांव में रहता था. उस के परिवार में पत्नी के अलावा 2 बेटे थे, राजेश और विजय.

घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण घर के सभी सदस्य मेहनतमजदूरी करते थे. इस गांव में और भी कई ऐसे परिवार थे जो रामचरण की तरह दूसरों के यहां काम कर के गुजरबसर करते थे.

गरमियों में ये लोग ज्यादा कमाने के चक्कर में पंजाब चले जाते थे. वहां ये कुछ महीनों ईंट भट्ठों पर काम करते थे. भट्ठों पर काम करने से उन्हें ज्यादा मजदूरी मिलती थी. जब भट्ठों पर काम मिलना बंद हो जाता था तो ये लोग गांव लौट आते थे.

रामचरण का बड़ा बेटा राजेश बहुत शांत स्वभाव का था. वह अपने काम से मतलब रखता था, लेकिन छोटा बेटा विजय चालाक था. जब राजेश 23 साल का था और विजय 18 का, तभी विजय ने बडे़ भाई के कुंवारा रहते हुए ही पड़ोस के गांव की लड़की सोना से शादी कर ली थी.

शादी के शुरुआती दिन बड़े मजे से गुजरे लेकिन बाद में उस ने शराब पीनी शुरू कर दी तो घर में कलह रहने लगी. फिर भी जैसेतैसे जीवन गुजरता रहा. इसी दौरान वह 2 बेटियों का बाप बन गया.

पत्नी उसे अपने बच्चों का हवाला दे कर अपना चालचलन सुधारने के लिए कहती थी. लेकिन वह ध्यान नहीं देता था. जब उस ने देखा कि पति सुधरने वाला नहीं है तो एक दिन विजय की गैरमौजूदगी में वह दोनो बेटियों को छोड़ कर अपने मायके चली गई.

विजय जब घर लौटा तो उसे पत्नी के जाने का पता चला. उस ने उसे वापस लाने की काफी कोशिश की, पर वह और उस के मांबाप इस के लिए राजी नहीं हुए. अब विजय के मांबाप के ऊपर उस की बेटियों की देखभाल की जिम्मेदारी आ गई.

करीब एक साल पहले विजय का बड़ा भाई राजेश पंजाब के फरीदकोट में काम कर रहा था. तभी एक दिन उस की नजरें वहां काम कर रही अनीता से टकरा गईं. अनीता शादीशुदा औरत थी, लेकिन उस का पति घर में कलह रखता था. वह उसे छोड़ कर अपने गांव चला गया था. राजेश को अनीता मन भा गई तो उस ने अनीता को अपने साथ रख लिया. दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे.

पत्नी के जीवन में आ जाने से उस की बेरंग जिंदगी में खुशियों की बहार आ गई. हमेशा गुमसुम रहने वाला राजेश अब अपना ही काम खुशी से करने लगा. अनीता उस का खूब खयाल रखती थी जिस से राजेश को उस के व्यवहार में किसी प्रकार की कमी निकालने का मौका नहीं दिया. अनीता की जिंदगी में पति के चले जाने से जो ठहराव आ गया था, वह खत्म हो गया.

दोनों पतिपत्नी चूंकि भट्ठे पर काम करते थे, इसलिए घर में थोड़ी बचत भी होने लगी. राजेश अनीता को खुश भी रखता था और प्यार भी करता था. राजेश की खुशियों को तब ग्रहण लग गया जब, जब 6 महीने पहले उस का छोटा भाई विजय और उस के मातापिता मजदूरी करने फरीदकोट आ गए.

जब से विजय की पत्नी उसे छोड़ कर गई थी, वह स्त्री सुख के लिए तरसता रहता था. उस ने जब अनीता को देखा तो देवर होने के नाते किसी न किसी बहाने उस के करीब आने की कोशिश करने लगा.

कुछ दिनों तक तो अनीता ने उसे अपने पास फटकने का मौका नहीं दिया, लेकिन धीरेधीरे विजय ने उस का मन जीत लिया. इस के बाद अनीता और विजय अवसर की तलाश में रहने लगे.

एक दिन जब विजय को मौका मिला तो उस ने अनीता के साथ अवैध संबंध बना लिए. अनीता को भी विजय की बांहों में ऐसा सुख मिला जो उसे अभी तक दोनों पतियों से नहीं मिला था. इसलिए जब भी उसे मौका मिलता, वह विजय की बांहों में सिमट जाती.

राजेश को कई महीनों तक अनीता को विजय के संबंधों की जानकारी नहीं हुई. लेकिन जब उस ने देखा कि अनीता उस से अधिक विजय का खयाल रखने लगी है तो उस का माथा ठनका. वह छिपछिप कर उन दोनों की हरकतों पर नजर रखने लगा.

एक दिन जब देवरभाभी दोनों रंगीनियों में बेसुध थे, तभी राजेश ने दोनों को रंगेहाथों पकड़ लिया. राजेश ने गुस्से में विजय को बहुत लताड़ा और अनीता को ले कर दिल्ली आ गया. यहां उस के गांव के कई लोग हस्तसाल गांव में रहते थे. उन लोगों की मदद से उस ने एक कमरा किराए पर ले लिया और अनीता के साथ रहने लगा.

दिल्ली आने के बाद राजेश ने सोचा था कि अब विजय उस का पीछा छोड़ देगा, लेकिन ऐसा सोचना उस की भूल थी. राजेश बीती बातों को भूल कर अनीता के साथ जीवन गुजारने लगा था.

फरीदकोट से अनीता के चले जाने के बाद विजय को कुछ ही दिनों बाद फिर से उस की याद सताने लगी. जब उस से नहीं रहा गया तो वह राजेश और अनीता को ढूंढने दिल्ली चला आया.

थोड़े से प्रयासों के बाद उस ने अपने बड़े भाई का ठिकाना तलाश लिया और एक दिन जब राजेश काम पर गया हुआ था विजय अनीता से मिलने उस के घर जा पहुंचा. अनीता को डर था कि अगर उस का पति राजेश आ गया तो क्या होगा. लेकिन भाभी के डर की परवाह न कर के विजय उसे मनाता रहा. विजय के मानमनुहार के आगे वह पिघल गई. दोनों ने शारीरिक संबंध बना लिए.

विजय अनीता के साथ देर तक रहना चाहता था, लेकिन इस बार वह चौकन्नी थी. उस ने विजय को वहां से चले जाने के लिए कह दिया. भाभी से फिर मिलने का वादा कर के वह वहां से निकल गया.

राजेश को कई दिनों तक विजय के आने का पता नहीं चला. लेकिन कुछ दिनों बाद वहां के एक पड़ोसी ने उसे जानकारी दी कि उस की गैरमौजूदगी में एक शख्स उस की पत्नी से मिलने आता है.

राजेश ने जब उस से आने वाले युवक के हुलिया के बारे में पूछा तो पड़ोसी का जवाब सुनने के बाद वह समझ गया कि उस के पीछे विजय घर आता होगा.

घर पहुंच कर जब उस ने अनीता से विजय के बारे में पूछा तो उस की चुगली कर रही आंखों ने परदे के पीछे का सारा सच बयां कर दिया. उस दिन के बाद राजेश गुमसुम रहने लगा. जब वह काम पर जाता तो उस का ध्यान घर पर लगा रहता था. इस के लिए कई बार उसे मालिक की डांट भी खानी पड़ती थी.

थोड़े दिनों के बाद उस ने काम पर जाना छोड़ दिया. घर का खर्चा चलाने के लिए अब अनीता काम पर जाने लगी. इस से अनीता को परेशानी हुई तो घर में कलह रहने लगी. अब उसे राजेश बोझ लगने लगा था.

घटना से कुछ दिन पहले विजय ने अनीता को समझाया कि वह इस तरह कब तक राजेश का बोझ ढोएगी. बेहतर है उसे ठिकाने लगा दिया जाए. विजय की बात अनीता को ठीक लगी. इस के बाद दोनों ने मिल कर राजेश को रास्ते से हटा देने की योजना बनाई.

योजना के अनुसार विजय ने एक मोबाइल खरीद कर अनीता को दे दिया और उस से उसी मोबाइल पर बात करने की ताकीद की. घटना के दिन सुबह अनीता और राजेश के बीच जम कर लड़ाई हुई. जिस से राजेश नाराज हो कर गांव जाने के लिए निकल गया.

राजेश के घर से निकलने के बाद अनीता ने विजय को फोन कर के अपने पास बुला लिया और आगे की योजना के बारे में साचेने लगे. विजय ने अनीता से कहा कि वह फोन कर के राजेश से कहे कि वह थोड़ी देर में स्टेशन पहुंच रही है, इसलिए उस का इंतजार करे.

एक घंटे के बाद जब वह आनंद विहार स्टेशन पर अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहा था, तभी अनीता ने उस के मोबाइल पर फोन कर के कहा कि वह भी उस के साथ गांव जाना चाहती है, इसलिए स्टेशन पर उस के आने का इंतजार करे. भोलाभाला राजेश अनीता की मंशा को नहीं भांप सका. वह वहीं एक बेंच पर बैठ कर अनीता के आने का इंतजार करने लगा.

राजेश को स्टेशन पर इंतजार के लिए कहने के बाद अनीता ने फौरन अपने मोबाइल का स्विच औफ कर दिया. इस के काफी देर बाद अनीता और विजय आनंद विहार स्टेशन पहुंचे. अनीता विजय को एक जगह छोड़ कर अकेली राजेश को तलाश करती हुई उस के पास पहुंच गई और उस से मांफी मांगते हुए उसे घर जाने से रोक लिया.

वह राजेश को ले कर औटो रिक्शा में बैठ गई. जब औटो चलने को हुआ तभी विजय भी पीछे से आ कर उसी औटो में बैठ गया. जब औटो शांति वन बस स्टौप के सामने पहुंचा तो विजय ने पूर्व नियोजित योजना के अनुसार आंखों से अनीता को इशारा कर दिया.

अनीता ने राजेश से कहा कि पेशाब के लिए जाना है उसे यह एक ऐसी बात कही थी जिसे कोई भी इनकार नहीं कर सकता. राजेश ने औटो रुकवा दिया. अनीता राजेश को साथ ले कर झाडि़यों के पीछे पहुंच गई. फिर विजय ने औटो वाले को पैसे दे कर यह कह कर चले जाने को कह दिया कि इन्हें देर लग सकती है. हम लोग बाद में दूसरे औटो से चले जाएंगे.

तभी विजय भी योजना के अनुसार उन दोनों के पीछेपीछे चला गया और मौका देख कर उस ने गमछे का फंदा राजेश के गले में डाल कर कस दिया.

राजेश ने बचने का प्रयास किया लेकिन अनीता ने उसे पूरी ताकत से जकड़ लिया. बेबस राजेश अनीता…अनीता कह कर छोड़ देने की गुहार लगाता रहा. लेकिन विजय और अनीता ने उसे मार डाला.

राजेश की हत्या करने के बाद विजय ने एक भारी पत्थर उठा कर उस का सिर कुचल दिया. फिर दोनों उस की लाश को वहीं छोड़ कर गांव चले गए. जहां उन्होंने घर वालों को बुरी तरह डरा धमका कर अपने मन मुताबिक बयान देने के लिए राजी कर लिया.

थानाप्रभारी मंगेश गेडाम ने 14 सितंबर को अनीता को तथा 15 दिसंबर को विजय को गिरफ्तार करने के बाद पूछताछ के लिए 2 दिनों के लिए पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड के दौरान खून से सना पत्थर और राजेश की हत्या में इस्तेमाल गमछा बरामद करने के बाद उन्हें कोर्ट में पेश कर दिया. जहां से उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

 -कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

विदेश नीति का भटकाव

भारत की विदेश नीति कचरा होती दिख रही है. पाकिस्तान से नरेंद्र मोदी की बढ़ती नाराजगी के कारण भारत ने बंगाल की खाड़ी के चारों तरफ के देशों का एक संगठन बनाया और उस में आर्थिक, सांस्कृतिक व सैन्य सहयोग की बातों की शुरुआत की. पर काठमांडू में हुई बैठक के कुछ दिनों बाद ही पहले मेजबान नेपाल ने न केवल सैन्य सहयोग देने से इनकार कर दिया, वह चीन के साथ भी जा मिला.

बंगलादेश को इस संगठन में शामिल किया गया है. पर जब असम में घुसपैठियों की समस्या सिर पर हो और करीब 40 लाख लोगों को वापस बंगलादेश खदेड़ देने की बात चुनावी लड़ाई के लिए की जा रही हो, तो बंगलादेश कितने दिन चुप बैठेगा. म्यांमार, बंगलादेश व भारत रोहिंग्या मुसलमानों के मुद्दे पर भी तेवर अपनाए हुए हैं. श्रीलंका अब अपनेआप को श्रेष्ठ समझता है और उसे हमेशा डर लगता है कि भारत श्रीलंका के तमिलों के साथ मिल कर उस के देश में कुछ उत्पात न मचा दे.

असल में भारत की विदेश नीति अब ढुलमुल हो गई है. यह बिलकुल हिंदू राजाओं की पौराणिक परंपरा पर चलती नजर आ रही है जिस में राजा हर रोज पाला बदलते थे और कोई भी दूरगामी परिणाम की नहीं सोचता था.

भारत ने अब रूस से नाता हलका कर यूरोप और अमेरिका का हाथ पकड़ा है. लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बेहद अविश्वसनीय हैं. वे कहते कुछ हैं, और करते कुछ हैं. रूस अपना साम्राज्य खड़ा करना चाहता है पर उस के पास न पैसा है न सोच. फालतू पैसा अगर किसी के पास है तो वह चीन है. पर भारत व चीन के संबंध सुधरने के आसार नहीं, क्योंकि चीन को पाकिस्तान ज्यादा सुहाता है. चीन और पाकिस्तान के बीच सीमा विवाद भी नहीं है.

भारत की विदेश नीति अब समुद्र में बिना कंपास वाले जहाज की तरह भटक रही है जो कभी इधर तो कभी उधर जा रहा है. गनीमत यही है कि आज विश्व के सभी देशों की मित्रता और संधियां टूट के कगार पर हैं. सो, भारत का पाला बदलना किसी को अखरता नहीं.

विदेश नीति शायद अब देशों के विदेश मंत्रालयों से निकल कर बड़ी कंपनियों के हाथों में चली गई है जो बाजार ढूंढ़ रही हैं और उसी आधार पर देशों में दोस्ती व लड़ाइयां करा रही हैं. इन कंपनियों में सैनिक साजोसामान बनाने वाली भी हैं और गूगल, एपल व फेसबुक जैसी भी. ये तय कर रही हैं कि किस देश की विदेश नीति कैसी हो. हमारी नीति में कोई लोच होगा तो ये अपनेआप ठीक कर देंगी, अपने फायदे के हिसाब से. हो सकता है इसी वजह से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने अभी से कह दिया कि वे 2019 का चुनाव नहीं लड़ेंगी. वे नहीं चाहतीं कि उन्हें असफल विदेश मंत्री कह कर निकाला जाए.

जुड़वां बहनों ने एक ही समय पर बच्चों को जन्मा

जुड़वां बच्चों का चेहरामोहरा ही नहीं बल्कि उन की आदतें, खानपान, यहां तक कि दर्द तकलीफ भी एक जैसी होती हैं, यह तो सुनने में आता रहा है. लेकिन यह पहला ऐसा मामला है जिस में 2 जुड़वां बहनों ने एक ही समय पर एक ही अस्पताल में बच्चों को जन्म दिया है.

अमेरिका में रहने वाली ये दो बहनें हैं जेलिनी एप्रिल कौफर्ड और जेनेली एन लियोपोल्डो. अलगअलग रहने वाली ये दोनों बहनें बीमारी के चलते फर्टिलिटी की समस्या से जूझ रही थीं. इन में से एक बहन को तो 2 बार मिस कैरेज भी हो चुका था. जेलिनी एप्रिल कौफर्ड और जेनेली की एक बहन की कुछ दिन पहले मृत्यु हो गई थी, जिस की वजह से पूरा परिवार टूट सा गया था.

लेकिन अब दोनों बहनों के मां बनने से परिवार की खुशियां लौट आई हैं. दोनों बहनों की उम्र 30 वर्ष है, इन में जेलिनी कुछ मिनट बड़ी हैं. जेनेली बताती है कि जब मुझे जेलिनी के प्रेग्नेंट होने का मैसेज मिला तो मैं बहुत खुश हुई, क्योंकि हार्मोनल डिस औडर की वजह से उस की प्रेग्नेंसी में दिक्कतें आ रही थीं. उस की प्रेग्नेंसी की सुन कर सब खुश हुए. इस से 4 दिन पहले मुझे अपनी प्रेग्नेंसी का पता चला था.

प्रेग्नेंसी के बाद दोनों परिवारों ने एक साथ डिलीवरी करवाने की योजना बनाई और डिलीवरी के 6 सप्ताह पहले जेनेली और उस का परिवार केलीफोर्निया आ गया. जेलिनी अपने पति ब्रैंडन माइकल कौफर्ड के साथ एरिजोना में रहती है, जबकि जेनेली अपने पति जैसन सर्जियो लियोपोल्डो के साथ कैलीफोर्निया में रहती है. इन सब की मुलाकात 2005 में एक टूर्नामेंट में हुई थी, जहां ये स्टूडेंट एथलीट के तौर पर भाग लेने पहुंचे थे.

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