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2 सहेलियों का साझा प्रेमी : ज्योति ने कैसी साजिश रची

‘‘देखो या तो तुम मेरी बात को समझ नहीं पा रहे हो या फिर जानबूझ कर अनजान बनने की कोशिश कर रहे हो. तुम्हें तो पता ही है कि इस उम्र में भी छोटीछोटी बातों को ले कर बीजी मुझ से झगड़ा करती हैं. बातबात पर टोकना तो जैसे उन की आदत सी हो गई है. अब तुम ही बताओ कि मैं क्या कोई दूध पीती बच्ची हूं जो हर समय मुझ से टीकाटिप्पणी की जाती रहे. आखिर बीजी मेरे साथ सौतेला व्यवहार क्यों करती हैं.

‘‘हमारी शादी को लगभग 20-22 साल हो चुके हैं. 3 बच्चों की मां हूं मैं. बड़ा बेटा शादी के लायक हो चुका है. इन सब के बावजूद मुझे ऐसा लगता है कि जैसे मैं इस घर की बहू नहीं मात्र एक नौकरानी हूं. यहां तक कि मेरे सारे गहने भी उन्होंने अलमारी में बंद कर रखे हैं.

‘‘कहीं आनाजाना हो तो पहले उन की मिन्नतें करो या फिर बिना गहनों के ही विधवाओं की तरह जाओ. मुझे यह सब अच्छा नहीं लगता. आखिर बरदाश्त करने की भी कोई सीमा होती है.’’ ज्योति ने पति मंजीत से कहा.

पत्नी की बात सुन कर कुछ समय के लिए मंजीत गंभीर हो गया था पर वह ज्योति को कोई ठोस जवाब नहीं दे सका था. वह भी अच्छी तरह जानता था कि ज्योति जो कह रही है वह सही तो है पर वह अपनी मां सुरजीत कौर के स्वभाव से अच्छी तरह वाकिफ था.

वह पुराने विचारों की शक्की महिला थीं. बहू ज्योति को वह अपने हिसाब से चलाना चाहती थीं. पर ज्योति की कुछ बातें उन्हें पसंद नहीं थीं. इसलिए ज्योति भी सास को पसंद नहीं करती थी. मंजीत अपनी मां के सामने जुबान नहीं खोल पाता था. या इस तरह कहें कि वह इस मामले को ले कर घर में क्लेश नहीं करना चाहता था. इसीलिए ज्योति उस से जब भी मां की शिकायत करती तो वह हर बार उस की बातों को टाल जाता था.

सब कुछ समझते हुए उस दिन भी वह ज्योति की बात को टालते हुए बोला, ‘‘ज्योति देखो, अब साढ़े 8 बज गए हैं. मैं ड्यूटी के लिए लेट हो रहा हूं. तुम्हारे इस मसले पर मैं शाम को बीजी से बात कर लूंगा. तब तक तुम सब्र करो.’’ ज्योति को आश्वासन दे कर मंजीत सिंह अपनी ड्यूटी पर चला गया. यह बात 29 मई, 2018 की है.

मंजीत सिंह लुधियाना के उपनगर टिब्बा रोड की कंपनी बाग कालोनी में रहता था. उस के पिता की कई साल पहले मौत हो चुकी थी. परिवार में 75 वर्षीय मां सुरजीत कौर के अलावा पत्नी ज्योति और 3 बच्चे थे जिन में बड़ा बेटा गुरप्रीत सिंह 19 साल का हो चुका था.

मंजीत सिंह लुधियाना के औद्योगिक नगर, फोकल पौइंट फेस-4 स्थित एक साइकिल कंपनी में बतौर ड्राइवर की नौकरी करता था. वहां उसे जो तनख्वाह मिलती उस से आसानी से घर का गुजारा चल रहा था. दोनों बेटियों की पढ़ाई चल रही थी और बेटा गुरप्रीत एक कंपनी में नौकरी करता था.

29 मई की सुबह साढ़े 8 बजे मंजीत के औफिस जाने के कुछ देर बाद गुरप्रीत भी अपने काम पर चला गया और 9 बजे तक दोनों बेटियां सिमरन और खुशी भी अपने स्कूल चली गई थीं.

सब के चले जाने के बाद ज्योति घर के कामों में व्यस्त हो गई. उस समय सुरजीत कौर अपने कमरे में लेटी हुई थी. घर का काम खत्म करने के बाद ज्योति पड़ोस में रहने वाली अपनी सहेली बरखा के घर चली गई थी. वह सास को बता कर गई थी और सहेली के यहां जाना उस का रोज का नियम था.

दोपहर के लगभग डेढ़ बजे मोहल्ले वालों ने मंजीत सिंह के घर से ज्योति के चीखने और जोरजोर से रोने की आवाजें सुनीं. ज्योति के चीखने की आवाज सुन कर आसपास के लोग इकट्ठे हो गए. लोग जब आए तो उन्होंने देखा कि सुरजीत कौर बुरी तरह से घायल थीं. उन के सिर से खून निकल रहा था. वह हौलेहौले कराह भी रही थीं.

पड़ोसियों ने इस बात की सूचना सुरजीत कौर के बेटे मंजीत सिंह को फोन द्वारा दी और नजदीक के थाना टिब्बा रोड में भी इस वारदात की इत्तला दे दी.

फिर वह सुरजीत कौर को सिविल अस्पताल ले कर पहुंचे. उन की गंभीर हालत को देखते हुए डाक्टरों ने उन्हें चंडीगढ़ स्थित पीजीआई अस्पताल रेफर कर दिया. लेकिन चंडीगढ़ पहुंचने से पहले ही रास्ते में उन की मौत हो गई.

सूचना मिलने के बाद थाना टिब्बा के थानाप्रभारी दिलीप बेदी पुलिस पार्टी के साथ मौके पर पहुंच गए. घटनास्थल पर एक कांस्टेबल को छोड़ कर वह पीजीआई चंडीगढ़ पहुंच गए.

वहां जब पता चला कि घर की मालकिन सुरजीत कौर की मौत हो गई है तो उन्होंने इस की सूचना एसीपी (पूर्वी) पवनजीत सिंह को दे दी. थानाप्रभारी दिलीप बेदी की सूचना पा कर एसीपी भी अस्पताल पहुंच गए.

उन्होंने वहां मौजूद मृतका के बेटे मंजीत सिंह से बात की. इस के बाद दोनों पुलिस अधिकारी मंजीत को ले कर उस के घर पहुंचे. मौके पर एसीपी ने उसी समय क्राइम इन्वैस्टीगेशन टीम को भी बुला लिया.

उन्होंने घर का निरीक्षण किया तो घर का सामान इधरउधर बिखरा पड़ा था. अलमारी खुली हुई थी और उस में रखे जेवर और नकदी गायब थी. यह सब देख कर लग रहा था कि सुरजीत कौर की हत्या लूट के लिए ही की गई थी. यह भी साफ पता चल रहा था कि इस वारदात को अंजाम देने वाला जो भी व्यक्ति रहा होगा वह इस परिवार से परिचित होगा. क्योंकि घर में जबरदस्ती घुसने का कहीं कोई प्रमाण नहीं मिला.

देख कर ऐसा लग रहा था जैसे हत्यारों के लिए पहले से ही दरवाजा खोल कर रखा गया था या उस के आने पर खोला गया था और यह काम घर का ही कोई सदस्य कर सकता है. बिस्तर पर और फर्श पर खून भी फैला हुआ था.

पूछताछ के दौरान मंजीत सिंह ने पुलिस को वही सब बताया था जो उस की पत्नी से बात हुई थी. मंजीत के बेटे गुरप्रीत ने बताया कि रोज की तरह वह उस दिन सुबह पौने 9 बजे काम पर जाने के लिए घर से निकल गया था. दोनों बेटियों ने भी बताया था कि वह समय से स्कूल चली गई थीं.

थानाप्रभारी ने जब इन सब बातों की तस्दीक की तो वह सही पाई गई. परिवार के सदस्यों में अब केवल ज्योति बची थी. ज्योति के बारे में मोहल्ले से जो रिपोर्ट मिली, वह अच्छी नहीं थी.

इस मामले में वह संदिग्ध लग रही थी. लेडी हेडकांस्टेबल सुरजीत कौर पूछताछ के लिए ज्योति को थाने बुला कर ले गई. उस से पूछा, ‘‘जिस समय यह घटना घटी उस समय तुम कहां थी?’’

‘‘घर का काम निपटा कर मैं पूर्वाह्न लगभग 11 बजे पड़ोस में रहने वाली अपनी सहेली बरखा के घर गई थी, मैं रोज ऐसा ही करती थी. कामकाज से निबटने के बाद मैं रोजाना ही बरखा के घर चली जाया करती थी और वहां से दोपहर करीब 1 बजे लौटती थी. उस दिन भी बीजी को दवा देने के बाद, उन्हें बता कर मैं बरखा के घर चली गई थी. जिस समय मैं बरखा के घर गई उस समय बीजी अपने कमरे में सो रही थीं.’’ ज्योति ने बताया.

‘‘वारदात वाले दिन क्या हुआ था, अच्छी तरह सोच कर विस्तार से बताओ.’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, रोज की तरह उस दिन भी मैं घर का काम निपटा कर बरखा के घर चली गई थी और जब वापस दोपहर करीब एक बजे मैं ने लौट कर देखा तो बीजी खून से लथपथ अपने बिस्तर पर पड़ी थीं. घर का सामान इधरउधर बिखरा पड़ा था. यह सब देख कर मैं घबरा गई थी. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. मैं ने शोर मचाना शुरू कर दिया जिसे सुन कर पड़ोसी भागे चले आए थे.’’ वह बोली.

‘‘जब आप बरखा के घर गई थीं, तब क्या बाहर का दरवाजा बंद कर के गई थीं?’’

‘‘जी नहीं, दरवाजा अंदर से बीजी ने बंद किया था,’’ ज्योति ने कहा.

ज्योति की इस बात पर पुलिस का शक गहरा गया. दरअसल शुरू से ही ज्योति पर संदेह था. ज्योति के बारे में पड़ोसियों ने जो बताया था वह भी कुछ ठीक नहीं था. पड़ोसियों के अनुसार ज्योति की अपनी सास सुरजीत कौर से बिलकुल नहीं बनती थी.

अकसर सासबहू के बीच झगड़ा होता रहता था. ज्योति का चरित्र भी ठीक नहीं था. पति के काम पर और बच्चों के स्कूल चले जाने के बाद वह अपने प्रेमी से मिलने चली जाती थी. सास सुरजीत कौर उसे इन सब बातों के लिए टोका करती थी.

‘‘मैं यह पूछता हूं कि सुरजीत कौर के साथ लुटेरों ने इतनी मारपीट की, उन्हें घायल किया. वह भी चीखीचिल्लाई होंगी. तब आप ने उन की आवाज कैसे नहीं सुनी, जबकि आप की आवाज सुन कर पड़ोसी दौड़े आए थे. सुरजीत कौर की आवाज किसी ने कैसे नहीं सुनी.’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, इस बारे में मैं क्या कह सकती हूं.’’ वह गंभीर हो कर बोली.

‘‘चलिए छोडि़ए इस बात को. आप ने कहा था कि बरखा के घर जाने से पहले आप ने बीजी को दवा दी थी और वह अपने कमरे में सो रही थीं.’’

‘‘जी साहब.’’

‘‘तो फिर अभी आप ने बताया कि दरवाजा बीजी ने अंदर से बंद किया था. जब दवा पीने के बाद वह अपने बिस्तर पर सो रही थीं तो सोते हुए उठ कर दरवाजा अंदर से कैसे बंद कर सकती थीं.’’ थानाप्रभारी ने पूछा.

थानाप्रभारी के इस प्रश्न पर ज्योति बगलें झांकने लगी. उसे भी लगने लगा था कि वह अपने ही झूठे जवाबों के बीच उलझ कर रह गई है. फिर भी उस ने अपने झूठ पर परदा डालने की असफल कोशिश की. पर वह कामयाब नहीं हो पा रही थी.

एक पड़ोसी ने साफ बताया था कि ज्योति घर से जाते समय मुख्य दरवाजे पर ताला लगा कर जाती थी पर उस दिन उस ने ऐसा नहीं किया था. इन सब बातों से यह तो स्पष्ट हो गया था कि सास को मरवाने में ज्योति का हाथ है. वह मुख्यद्वार इसलिए खुला छोड़ कर गई थी कि हत्यारे आसानी से घर में प्रवेश कर सकें. इस के बाद पुलिस ने जब उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया कि उसी ने सुपारी दे कर यह कांड करवाया है. इस हत्याकांड में शामिल लोगों के नाम भी उस ने पुलिस को बता दिए.

ज्योति के बयानों पर थानाप्रभारी दिलीप बेदी ने उसी दिन ज्योति की सहेली बरखा, बरखा के आशिक राजवीर कश्यप उर्फ राजू को उन के घर से गिरफ्तार कर लिया.

पकड़े गए तीनों आरोपियों को 30 मई, 2018 को अदालत में पेश कर 24 घंटे के पुलिस रिमांड पर ले लिया था. रिमांड के दौरान इस लूट और हत्याकांड की जो कहानी प्रकाश में आई वह कुछ इस प्रकार से थी.

घरेलू विवाद के चलते और सास सुरजीत कौर की रोकाटोकी से परेशान हो कर ज्योति ने अपने और अपनी सहेली बरखा के संयुक्त प्रेमी राजवीर कश्यप उर्फ राजू से सास की हत्या कराई थी. राजू बाबा थानसिंह चौक के पास स्थित अंबेडकर नगर में रहता था. योजना के अनुसार राजू ने मामले को लूट का रूप देने की कोशिश की थी.

शुरुआती जांच में यह कहानी सामने आई कि ज्योति की अपनी सास से पटती नहीं थी. उस की सास उस के चरित्र पर संदेह करती थी जिसे ले कर घरेलू विवाद रहता था. ज्योति पति से शिकायत करती तो पति भी अपनी मां का साथ देता था. और तो और पति मनजीत ने पैसा व ज्योति के जेवर अपनी मां को सौंप रखे थे.

यह बात भी ज्योति को बेहद खटक रही थी. घर पर पूरी तरह से कब्जा करने और सास से छुटकारा पाने के लिए उस ने यह बात अपनी सहेली बरखा को बताई, बरखा ने यह बात अपने आशिक राजवीर उर्फ राजू को बताई. जिस के बाद तीनों ने मिल कर 75 वर्षीया सुरजीत कौर को रास्ते से हटाने के लिए बड़े ही सुनियोजित ढंग से साजिश तैयार की.

साजिश के तहत राजू ने सुरजीत की हत्या करने के बाद घर में लूटपाट की. ज्योति ने लूटे गए पैसों में से 50 हजार रुपए राजू को देने का लालच दिया, जबकि लूटपाट करने के बाद जो गहने हासिल होने थे वह ज्योति ने अपने पास रखने की शर्त रखी थी.

29 मई, 2018 को मंजीत और उस का बेटा नौकरी पर चले गए. दोनों बेटियां भी स्कूल चली गईं. इस के बाद दोपहर करीब एक और डेढ़ बजे के बीच ज्योति बरखा और राजू की आपस में फोन पर बात हुई.

योजना के मुताबिक ज्योति अपनी सास को अकेली घर में छोड़ कर बरखा के पास चली गई और जाते वक्त वह दरवाजा खुला छोड़ गई थी. इस बीच वारदात को अंजाम देने के लिए राजू अपनी एक्टिवा से वहां पहुंच गया.

घटना के वक्त सुरजीत कौर अपने कमरे में बैड पर लेटी हुई थीं. वह राजू को पहचानती थीं, क्योंकि राजू की शादीशुदा बहन उन के घर के नजदीक ही रहती थी. राजू अकसर अपनी बहन के पास आताजाता था.

घर में दाखिल होने के बाद राजू ने योजना के मुताबिक सुरजीत कौर से कुछ पैसों की मांग की, जब उन्होंने पैसे देने से इनकार किया तो राजू ने बड़ी क्रूरता से लोहे की छैनी से उन के सिर पर 5-6 वार किए.

छैनी का एक वार तो सुरजीत कौर के सिर के आरपास हो गया और वह लहूलुहान हो गईं. वह जोरजोर से चिल्लाने लगीं. पकडे़ जाने के डर से राजू घबरा गया और खून से लथपथ छैनी मौके पर छोड़ कर वहां से भाग खड़ा हुआ.

जल्दबाजी में उस का मोबाइल फोन भी वहीं रह गया था. वारदात को अंजाम देने के बाद उस ने बाहर से किसी के फोन से ज्योति को फोन कर के काम हो जाने की सूचना दे दी.

इस के कुछ देर बाद ज्योति घर आ गई. सब से पहले उस ने खून से सना सुरजीत का मोबाइल पानी से धोया और खुद को ड्रामा रचने के लिए तैयार करते हुए लूटपाट का शोर मचा दिया. शोर सुन कर पड़ोसी जब वहां पहुंचे तो सुरजीत कौर बैड पर पड़ी थीं और उन के सिर पर चोटों के गहरे घाव थे. तब उन की सांसें चल रही थीं.

लोगों ने बताया कि इस हालत में भी सुरजीत कौर राजू और अपनी बहू ज्योति का नाम ले रही थीं. उस समय किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया था. बरखा और ज्योति ने राजू को सुपारी देने के साथ यह वादा भी किया था कि अगर वह पकड़ा गया तो उस की जमानत का इंतजाम भी वह खुद कर देंगी.

पूछताछ में राजू ने बताया कि ज्योति के पड़ोस में उस की बहन रहती है. उस के पास वह अकसर आताजाता था और इस दौरान उस की पहचान ज्योति से हुई. उस ने उस की पहचान अपनी सहेली बरखा से करवाई. बरखा के राजू के साथ करीब 2 साल से अवैध संबंध  चल रहे थे. इसी बीच ज्योति के साथ भी उस के संबंध बन गए और तीनों साथ मिल कर ऐश करने लगे.

बरखा की किडनी में पथरी थी. बरखा का पति उस की पिटाई करता था और उस की पथरी का औपरेशन भी नहीं करा रहा था. इसलिए वह अपने पति से तलाक ले कर राजू से शादी करना चाहती थी. राजू ने उस से वादा किया था कि वह उस का पथरी का इलाज करवा कर उस से शादी कर लेगा.

इस के लिए उन्हें पैसों की सख्त जरूरत थी. पर पैसों का कहीं से इंतजाम नहीं हो रहा था. इसलिए जब ज्योति ने अपनी सास के बारे में उन्हें बताया तो बरखा और राजू इस काम को करने के लिए तैयार हो गए. वैसे यह सौदा ढाई लाख रुपए में हुआ था.

ज्योति ने भी अपने बयान में बताया था कि वह अपनी सास से बहुत दुखी थी. पति भी उस की नहीं सुनता था और मां की तरफदारी करता था. मां के कहने पर उस से मारपीट भी करता था.

ज्योति चाहती थी कि किसी तरह से उस का सास से छुटकारा मिल जाए. इस के चलते उस ने राजू को सास का मर्डर करने के बदले में उसे 50 हजार रुपए और अपने हिस्से की कुछ ज्वैलरी देने की बात कही थी. इस पर तीनों ने मिल कर मर्डर करने की प्लानिंग की और सुरजीत कौर की हत्या कर दी थी.

पूछताछ के बाद देर रात पुलिस ने आरोपी की निशानदेही पर वारदात के दौरान इस्तेमाल की गई छैनी भी बरामद कर ली.

पुलिस काररवाई मुकम्मल होने के बाद रिमांड अवधि समाप्त होने पर तीनों आरोपियों को अदालत में पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.?

— पुलिस सूत्रों पर आधारित

सर्दियों के मौसम में इस तरह रखें अपने घर को गर्म

सर्दियों के मौसम में आप पहनावा से लेकर खान-पान सब कुछ बदलती हैं तो फिर भला डेकोर में पीछे कैसे रह सकती हैं. इस मौसम में आप अपने घर को हौट लुक दे कर स्वस्थ रह सकती हैं. तो आइए जानते हैं, आप अपने घर को हौट लुक कैसे दे सकती हैं.

–  सीलिंग रूम का ऐसा हिस्सा है, सबसे पहले ठंडा होता है, इसलिए इसे गर्म करने के उपाय के साथ इसका खूबसूरत होना भी जरूरी है. इसके लिए सीलिंग बनाते वक्त यदि थर्माकोल लगा दिया जाए तो यह ठंड में फयदेमंद होता है.

–  दीवारों को ब्राइट कलर से सजाएं. मसलन रेंड, औरेंज, ब्लू कलर्स. इन दिनों परपल कलर की काफी डिमांड है. यदि चाहें तो लाइट और डार्क कलर का कौम्बिनेशन भी दीवारों पर ट्राय कर सकती हैं. यह भी काफी अच्छा लुक देगा. इसके अलावा वालपेपर की भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं. डार्क शेड के वाल कलर भी दीवारों पर लगाए जा सकते हैं, यह भी गर्मी का एहसास दिलाएगा.

परदे में खुदकुशी का राज : क्या था एसपी की आत्महत्या का राज

5 सितंबर की बात है. कानपुर के एसपी (पूर्वी) सुरेंद्र कुमार दास अपनी पत्नी डा. रवीना सिंह के
साथ सरकारी आवास में थे. पतिपत्नी के बीच काफी दिन से तनाव चल रहा था. एसपी सुरेंद्र दास तनाव में थे. वह अपनी परेशानी किसी से बता भी नहीं पा रहे थे. उन के दिल की बात किसी को पता नहीं थी. डा. रवीना को भी हालत की गंभीरता का अंदाजा नहीं था. सुबह का समय था. सुरेंद्र दास ने पत्नी को आवाज दी.

वह आई तो एसपी सुरेंद्र दास ने बिना हावभाव बदले रवीना के हाथ में एक कागज का टुकड़ा देते हुए बोले, ‘‘मैं ने जहर खा लिया है. मैं ने इस के लिए तुम्हें या किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया है.’’पति की बात सुन कर रवीना अवाक रह गई. उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे? वह बोली, ‘‘आप नहीं होंगे तो इस लेटर का हम क्या करेंगे?’’

रवीना ने लेटर को बिना पढ़े, बिना देखे मरोड़ कर कमरे में एक तरफ फेंक दिया. बिना वक्त गंवाए रवीना ने पुलिस आवास पर तैनात पुलिसकर्मियों को एसपी साहब की तबीयत खराब होने की जानकारी दे दी.

पुलिसकर्मियों की मदद से वह पति को प्राइवेट अस्पताल में ले गई. 5 बज कर 20 मिनट पर वहां से उन्हें उर्सला अस्पताल और 6 बज कर 20 मिनट पर रीजेंसी अस्पताल ले जाया गया.
पुलिस अफसर के जहर खाने की बात तेजी से फैलने लगी. कानपुर से ले कर राजधानी लखनऊ के पुलिस मुख्यालय तक अफसरों में हड़कंप मच गया. सुरेंद्र कुमार दास के बेहतर इलाज के लिए हरसंभव प्रयास किए जाने लगे.

कानपुर के रीजेंसी अस्पताल के डाक्टरों ने एम्स दिल्ली और मुंबई के बड़े अस्पतालों के डाक्टरों से संपर्क साधा ताकि एसपी साहब को बेहतर इलाज दिया जा सके. एसपी सुरेंद्र कुमार दास के शरीर के अंदरूनी अंगों पर जहरीले पदार्थ का असर पड़ने लगा था, जिस से शरीर के दूसरे अंगों के फेल होने का खतरा बढ़ता जा रहा था.

स्वास्थ्य में सुधार और बेहतर इलाज के लिए मुंबई से हवाई जहाज से इलाज में सहायक एक्मो नाम का एक उपकरण मंगाया गया. यह उपकरण लखनऊ और कानपुर में उपलब्ध नहीं था. एक्मो के द्वारा शरीर के अंगों को काम करने के लिए मदद दी जाती है.

एसपी सुरेंद्र कुमार दास 2014 बैच के आईपीएस अधिकारी थे. मूलरूप से वह बलिया जिले के रहने वाले थे. उन के पिता लखनऊ के रायबरेली रोड स्थित पीजीआई कालोनी में रहते थे. कानपुर शहर में वह एसपी (पूर्वी) के पद पर तैनात थे. उन की पत्नी रवीना डाक्टर थी. दोनों की शादी 9 अप्रैल, 2017 को हुई थी.

यह शादी अखबार के वैवाहिक विज्ञापन के माध्यम से हुई थी. रवीना के पिता भी सरकारी डाक्टर हैं. शादी के बाद सुरेंद्र दास अंबेडकर नगर में बतौर सीओ तैनात थे. उस समय रवीना भी उन के साथ रहती थी. रवीना वहां अंबेडकर नगर मैडिकल कालेज में बतौर डाक्टर संविदा पर तैनात थी.
रवीना ने जुलाई माह में ही नौकरी जौइन की थी और एक महीने बाद अगस्त में ही नौकरी छोड़ दी. सुरेंद्र दास जब कानपुर में एसपी (पूर्वी) के रूप में तैनात किए गए तो रवीना उन के साथ रहने लगी थी.

एसपी सुरेंद्र कुमार दास के जहर खाने की सूचना उन के कल्ली, लखनऊ स्थित घर पहुंची तो सुरेंद्र की मां इंदु देवी, बड़ा भाई नरेंद्र दास, भाभी सुनीता कानपुर के लिए रवाना हो गए.

मुंबई और रीजेंसी अस्पताल के डाक्टरों की टीम ने सुरेंद्र दास को बचाए रखने का प्रयास जारी रखा, लेकिन 5 दिन के संघर्ष के बाद रविवार 9 सितंबर की दोपहर 12 बज कर 20 मिनट पर सुरेंद्र दास का निधन हो गया. उन के शव को कानपुर से लखनऊ उन के एकता नगर स्थित निवास पर लाया गया. पूरी कालोनी सदमे में थी.

सुरेंद्र दास के पिता रामचंद्र दास सेना से रिटायर हुए थे. उन्होंने करीब डेढ़ दशक पहले एकता नगर में पंचवटी नाम से मकान बनाया था. सुरेंद्र दास 2 भाई थे. उन के बड़े भाई नरेंद्र दास अपने मकान में ही हार्डवेयर की दुकान चलाते थे. सुरेंद्र दास की 5 बहनें पुष्पा, आरती, सुनीता, अनीता और सावित्री थीं. सभी बहनों की शादी हो चुकी थी.

सुरेंद्र दास पढ़ाई में तेज थे. उन के पिता रामचंद्र दास ने सुरेंद्र की पढ़ाई के लिए अलग जमीन पर कमरा बनवा दिया था, जिस से उन की पढ़ाई में व्यवधान न आए. यहीं रह कर सुरेंद्र पढ़ाई करने लगे. दिन भर वह कमरे में रह कर पढ़ाई करते थे. वहां से वह घर केवल खाना खाने आते थे.
जब उन का चयन आईपीएस के लिए हुआ तो पूरी कालोनी में खुशियां मनाई गईं. कालोनी में रहने वाले सभी मातापिता अपने बच्चों को सुरेंद्र दास जैसा बनने का उदाहरण देते थे. कालोनी के कुछ बच्चे सुरेंद्र दास के संपर्क में रहते थे. वे उन बच्चों को कंपटीशन की तैयारी की सलाह देते थे. 10 साल पहले सुरेंद्र दास के पिता नरेंद्र दास की मौत हो गई थी.

सुरेंद्र दास की खुदकुशी पर किसी को यकीन नहीं हो रहा था. इस का कारण यह था कि वह संस्कारी स्वभाव के थे. कालोनी में रहने वाले किसी भी बुजुर्ग से वह ऊंची आवाज में बात नहीं करते थे, हमेशा अंकल कह कर उन्हें इज्जत देते थे. उन की मौत के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पुलिस प्रमुख ओमप्रकाश सिंह सहित सभी अफसरों ने उन के घर जा कर शोक जताया.

सुरेंद्र दास के परिवार ने उन की मौत के लिए पत्नी डा. रवीना सिंह को जिम्मेदार ठहराना शुरू कर दिया था. सुरेंद्र दास के भाई नरेंद्र दास ने कहा कि वह रवीना के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने की रिपोर्ट दर्ज कराएंगे.

नरेंद्र दास ने कहा कि सुरेंद्र दास की मौत के लिए रवीना ही हिम्मेदार है. रवीना उन्हें परिवार से अलग रखना चाहती थी, जबकि सुरेंद्र परिवार से दूर नहीं रहना चाहते थे. वह भावुक और संवेदनशील इंसान थे. जबकि रवीना उन पर शक करती थी, जब वह गश्त पर जाते थे तो वह उन के साथ ही जाती थी.

वैसे भी रवीना का अपने मायके की तरफ झुकाव ज्यादा था. पुलिस लाइन में जन्माष्टमी के दिन लड्डू गोपाल के कपड़े खरीदने को ले कर दोनों में विवाद हुआ था. सुरेंद्र उन के साथ जाना चाहते थे, जबकि वह अकेले जाना चाहती थी.

सुरेंद्र दास के भाई नरेंद्र दास का आरोप था कि रवीना ने पति को इतना प्रताडि़त किया कि उन्होंने आत्महत्या कर ली. इस के अलावा उन के पास कोई रास्ता नहीं था.

वह पूरी तरह से टूट गए थे और बिना सोचेसमझे आत्महत्या कर ली. नरेंद्र ने कहा कि सुसाइड नोट में हैंड राइटिंग की जांच कराएंगे. नरेंद्र ने बताया कि रवीना नानवेज खाती थी, जबकि सुरेंद्र पूरी तरह से शाकाहारी थे.

कृष्ण जन्माष्टमी के दिन भी रवीना ने नानवेज खाया था, जिस की वजह से दोनों में तनाव था. नरेंद्र दास का कहना था कि मानसिक तनाव में ही सुरेंद्र दास यह सोच रहे थे कि आत्महत्या कैसे की जाए. कानपुर के एसएसपी ए.के. तिवारी के अनुसार सुरेंद्र दास के सुसाइड नोट में पारिवारिक कलह, पत्नी से छोटीछोटी बातों में तनाव और कई बातें भी लिखी थीं. सुरेंद्र ने सीधे तौर पर अपनी आत्महत्या के लिए किसी को भी जिम्मेदार नहीं ठहराया था.

एसपी सुरेंद्र दास के भाई नरेंद्र दास ने भले ही उन की पत्नी रवीना को आत्महत्या का जिम्मेदार बताया हो, पर खुद सुरेंद्र ने अपने सुसाइड नोट में पत्नी रवीना को जिम्मेदार नहीं माना. सुरेंद्र दास ने अपने 7 लाइन के पत्र में अंगरेजी और हिंदी दोनों में लिखा था.

अंगरेजी में उन्होंने लिखा था कि वह पिछले एक सप्ताह से आत्महत्या करने के तरीके खोज रहे थे. गूगल पर आत्महत्या करने का सब से आसान तरीके को समझने के लिए पढ़ा और वीडियो देखी. इस के बाद 2 तरीकों पर ध्यान दिया. पहला ब्लेड से शरीर की नस काटनी थी. दूसरा जहर खाने का तरीका था.

नस काटने में दर्द होने की संभावना ज्यादा थी. ऐसे में मुझे जहर खाने का तरीका सब से अच्छा लगा. इस के लिए उन्होंने सल्फास लाने के लिए अपने एक कर्मचारी को कहा कि उन्हें चूहे और सांप भगाने हैं. 4 सितंबर को जहर खाने से पहले सुरेंद्र दास ने सल्फास मंगवा कर रख ली थी.
इन तमाम आरोपों पर सुरेंद्र दास की पत्नी डा. रवीना की तरफ से कोई भी बात नहीं कही गई. रवीना ने केवल इतना कहा कि मेरा सब कुछ चला गया है. मुझे मेरे हाल पर छोड़ दीजिए. मुझे किसी से कोई बात नहीं करनी है. मैं हाथ जोड़ कर कह रही हूं कि मुझे किसी से कुछ नहीं कहना है.
रवीना के परिजनों ने हर आरोप को गलत बताते हुए कहा कि सच्चाई सुरेंद्र दास के परिवार को पता है. वह अपने परिवार से परेशान थे और 4 महीने से वह अपने परिवार के संपर्क में नहीं थे. सुरेंद्र की मौत की फाइल अभी बंद नहीं हुई है. ऐसे में संभव है कि कुछ दिनों के बाद कोई सुराग मिले तो फिर से नए तथ्य सामने आएं.

एक बात साफ है कि सुरेंद्र अपने जीवन में बेहद तनाव के दौर में गुजर रहे थे. इस बारे में उन्होंने अपने घरपरिवार और पत्नी से भी किसी तरह की कोई चर्चा नहीं की थी. अगर वह अपने करीबी लोगों से अपने तनाव के बारे में चर्चा कर लेते तो शायद वह ऐसा कदम नहीं उठाते.
एसपी सुरेंद्र दास की आत्महत्या को ले कर जब आरोपों का दौर चला तो उन की पत्नी डा. रवीना के मातापिता ने सामने आ कर प्रैस कौन्फ्रैंस की. रवीना के पिता रावेंद्र ने कई कथित सबूतों के साथ आरोप लगाया कि सुरेंद्र का परिवार नहीं चाहता था कि सुरेंद्र रवीना के साथ रहे. उन्होंने यह भी कहा कि सुरेंद्र की शादी की बात पहले तूलिका नाम की लड़की से हुई. बात नहीं बनी तो मोनिका से सगाई हुई, लेकिन वह भी टूट गई.

अगस्त 2016 में सुरेंद्र की पहली मुलाकात रवीना से हुई. बात आगे बढ़ी तो सुरेंद्र का परिवार इस रिश्ते के खिलाफ था. लेकिन सुरेंद्र ने किसी तरह अपनी मां को मना लिया. शादी से पहले सुरेंद्र के बड़े भाई नरेंद्र ने शादी का सामान रवीना के एटीएम कार्ड से खरीदा. अप्रैल, 2017 में रवीना अपनी ससुराल पहुंची तो वहां उस से अभद्रता की गई. भद्दे कमेंट्स किए गए. यहां तक कि उसे खाना भी नहीं दिया गया.

रावेंद्र के अनुसार, सुरेंद्र का बड़ा भाई नरेंद्र एक व्यावसायिक प्लौट खरीदने के लिए सुरेंद्र से पैसे मांग रहा था. एकता नगर का प्लौट बेचने के चक्कर में दोनों भाइयों में झगड़ा होता था.

रावेंद्र के अनुसार, सुरेंद्र की मां इंदु अपने बेटे के पास नहीं जाती थीं. सुरेंद्र दास जब सहारनपुर में तैनात थे तो लखनऊ आते थे लेकिन अपने परिवार को सूचना देने से मना कर देते थे. बाद में अंबेडकर नगर ट्रांसफर के समय सुरेंद्र ने दहेज का सामान लाने के लिए ट्रक भेजा था, लेकिन नरेंद्र ने सामान देने से मना कर दिया.

बहरहाल, दोनों पक्षों की ओर से आरोपप्रत्यारोप चल रहे हैं. कौन सच बोल रहा है, कौन झूठ कहा नहीं जा सकता. हां, यह तय है कि सुरेंद्र दास ने मानसिक द्वंद के चलते ही आत्महत्या की. दुख यह जान कर होता है कि जो व्यक्ति कानून का रखवाला था, आत्महत्या कर के वह खुद ही कानून से खेल कर दुनिया से दूर चला गया. आखिर कोई तो ऐसी बात रही होगी जो उन से बरदाश्त नहीं हुई. इस बात का पता लगाया जाना जरूरी है.

टैबलेट भूल जाएं, आपके किचन में रखी ये चीजें हैं पेन किलर

शरीर में चाहे कैसा भी दर्द हो, निजात पाने के लिए हम तुरंत किसी पेन किलर की ओर भागते हैं. ये पेन किलर हमारे दिल के लिए, लिवर और गुर्दे के लिए काफी हानिकारक होते हैं. हमारी सेहत पर इनका नकारात्मक असर होता है.

किसी अंग्रेजी दवाई से बेहतर आप प्राकृतिक उपाय, या कहें कि घरेलू नुस्खों का इस्तेमाल करें. इस खबर में हम आपको कुछ ऐसे ही घरेलू नुस्खों के बारे में बताएंगे जिनका इस्तेमाल आप पेन किलर के तौर पर कर सकेंगे. सबसे अच्छी बात कि इनका सेहत पर किसी भी तरह का नकारात्मक असर नहीं होता.

लौंग

natural pain killers

लौंग में ऐंटी इंफ्लामेट्री के साथ ऐंटीऔक्‍सीडेंट और ऐंटीबैक्‍टीरियल यौगिक होते हैं. दांत या मुंह में होने वाली समस्याओं में लौंग बेहद असरदार होता है. ये एक प्राकृतिक पेन किलर है. मितली में, सर्दी, सिर दर्द और अर्थराइटिक में ये काफी फायदेमंद होता है. अगर आपके दांत में दर्द है तो 1 लौंग पीसकर उसमें औलिव औयल डालकर दांतों पर लगाएं. मुंह की बदबू से बचने और दांतों के दर्द से राहत पाने के लिए लौंग को चबा भी सकते हैं.

लहसुन

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लहसुन ऐंटीबैक्‍टीरियल, ऐंटीफंगल और ऐंटीवायरल गुणों से युक्‍त होता है. कान के संक्रमण, आंत परजीवी और अर्थराइटिस के दर्द से राहत दिलाता है. लहसुन को कच्चा चबाने में बेहद फायदेमंद है. मांसपेशियों या जोड़ों के दर्द में गर्म लहसुन का तेल से मालिश करने से बहुत आराम मिलता है.

हल्‍दी

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किसी भी तरह के चोट या बीमारी में हल्दी प्रमुखता से उपयोग किया जाता है. मांसपेशियों के दर्द से लिए सभी प्रकार के दर्द में ये काफी असरदार होता है. हल्दी में ऐंटी इंफ्लामेट्री यौगिक होते हैं, जो मांसपेशियों या जोड़ों के दर्द में काफी असरदार होते हैं.

अदरक

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अदरक भी ऐंटी इंफ्लामेट्री यौगिक के कारण दर्द में काफी कारगर होता है. किसी भी तरह के सूजन में, पेट दर्द, छाती, अर्थराइटिस और माहवारी के दौरान होने वाली परेशानियों में ये काफी कारगर होता है.

अदरक उपरी संक्रमण, खांसी, जुकाम, गले की खराश जैसी समस्याओं का मारक उपाय है. जानकारों की मानें तो अदरक की चाय से माइग्रेन से तुरंत आराम मिलता है और अदरक को चबाने से गैस की समस्‍या भी ठीक हो जाती है. मांसपेशियों के दर्द और सूजन में अदरक की सिकाई करें.

कौफी

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कौफी में कैफीन होता है जो सिरदर्द, मासंपेशियों में दर्द और दर्द की सनसनाहट से राहत दिलाता है. कैफीन दर्द निवारक दवाओं से भी तेजी से काम करता है. जानकारों का मानना है कि कौफी किसी भी तरह के दर्द में तेजी से असर करता है और आपको आराम देता है.

सेंधा नमक

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सेंधा नमक भी दर्द कम करने में बेहद कारगर होता है. इसमें थेरेपी वाले गुण होते हैं. किसी भी तरह के दर्द में सेंधा नमक को पानी में मिला कर नहाएं. ये आपके त्वचा से हो कर मांसपेशियों तक पहुंच कर आराम देता है.

पुदीना

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पुदीने में भी थेरेपी के गुण होते हैं. ये मांसपेशियों की परेशानी में राहत दिलाते हैं. सिरदर्द, दांतों के दर्द और नसों में दर्द में ये काफी असरदार है. मांसपेशियों को और नसों को क्रैंप में भी ये काफी फायदेमंद होता है. अपच और मानसिक शांति के लिए पुदीने की कुछ पत्तियों को चबाएं.

औलिव औयल

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औलिव औयल में ऐंटी इंफ्लामेट्री गुण होते हैं. एक्‍स्‍ट्रा वर्जिन औलिव औयलमें इबुप्रोफेन होता है जोकि दर्द दूर करता है. सलाद या किसी अन्‍य डिश पर औलिव औयल की ड्रेसिंग कर सकते हैं.

चौटाला परिवार में नई पार्टी का ऐलान, नए दलों में बंटते राजनीतिक कुनबे

परिवार के बल पर चल रही राजनीतिक पार्टियों में अब कलह और बिखराव पैदा हो गया है. परिवार बंट रहे हैं तो पार्टियां भी परिवार के सदस्यों के बीच विभाजित हो रही हैं. शुरुआत हरियाणा में इंडियन नैशनल लोकदल से हो चुकी है.

चौधरी देवीलाल के परिवार में चल रही कलह का अंजाम 9 दिसंबर को हिसार से सांसद दुष्यंत चौटाला द्वारा नई पार्टी के ऐलान के रूप में सामने आया है. उन्होंने जींद में रैली कर जननायक जनता पार्टी नाम से नई पार्टी का ऐलान किया है. दुष्यंत चौटाला को ओमप्रकाश चौटाला ने इनलो से निकाल दिया गया था. दुष्यंत चौटाला ओमप्रकाश चौटाला के पोते और अजय चौटाला के बेटे हैं.

दुष्यंत चौटाला की नई पार्टी हरियाणा के 3 लालों देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल के परिवारों से निकली चौथी पार्टी है. चौधरी देवीलाल ने अपने राजनीतिक जीवन में कई पार्टियां बनाई थी. वह कांग्रेस छोड़ने के बाद भारतीय क्रांति दल, जनता पार्टी, लोकदल, जनता दल, दलित मजदूर पार्टी, समता पार्टी में रहे. इस के बाद उन के बेटे ओमप्रकाश चौटाला ने 1996 में इनेलो का गठन किया था.

2001 में देवीलाल की मृत्यु के बाद पार्टी में संघर्ष शुरू हो गया था. वर्तमान में ओमप्रकाश चौटाला इनेलो के प्रमुख हैं और उन के बड़े बेटे अजय सिंह पार्टी के महासचिव पर परिवार में आपसी कलह के चलते अजय सिंह को पार्टी से निकाल दिया गया.

अब इनेलो पर ओप्रकाश चौटाला और उन के दूसरे बेटे अभय सिंह का कब्जा है. अभय सिंह विधानसभा में विपक्ष के नेता हैं. दुष्यंत सिंह द्वारा बनाई गई नई पार्टी में उन की मां डबवाली से विधायक नैना चौटाला, भाई दिग्विजय सिंह साथ हैं. दिग्विजय सिंह दो बार राजस्थान से विधायक रहे और इंडियन नैशनल स्टूडेंट संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने.

पिछले कुछ समय से चौटाला परिवार में राजनीतिक विरासत को ले कर झगड़ा सड़कों पर आ गया था. ओमप्रकाश चौटाला शिक्षक भर्ती घोटाला मामले में जेल में हैं.

दुष्यंत चौटाला ने नई पार्टी के झंडे पर चौधरी देवीलाल की फोटो लगाई है. उन का कहना है कि इनेलो का गठन चौधरी देवीलाल ने नीतियों और सिद्घांतों को ले कर किया था पर अब पार्टी ने उन के सिद्घांतों को त्याग दिया है. कार्यकर्ताओं को  परेशान करना शुरू कर दिया गया और उन के पिता को पार्टी से बाहर निकाल दिया गया.

पार्टी के झंडे पर ओमप्रकाश चौटाला की फोटो न होने पर दुष्यंत सिंह ने कहा कि वह हमारे परिवार के मुखिया जरूर हैं पर वह विरोधी दल में हैं. झंडे पर उन की फोटो नहीं देना हमारी मजबूरी है.

राजनीतिक परिवारों का बंटना कोई नई बात नहीं है. देश के सब से बड़े राजनीतिक परिवार माने जाने वाले गांधी परिवार में संजय गांधी की मृत्यु के बाद जबरदस्त कलह देखने को मिली. संजय गांधी की पत्नी मेनका गांधी ने अपनी सास और तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ चली गई थीं. मेनका गांधी को परिवार से अलग होना पड़ा. बाद में वह अपने परिवार की राजनीतिक दिशा से एकदम विपरीत जा कर भाजपा में शामिल हो गईं. उन के पुत्र वरुण गांधी भी भाजपा की ओर से सांसद बने. मेनका गांधी की अपने जेठ राजीव गांधी और अपनी जेठानी सोनिया गांधी से भी नहीं बनी.

सिंधिया परिवार में भाई और बहनों के कलह के चलते अलगअलग राजनीतिक पार्टियों में चले जाने की बात पुरानी है. ठाकरे परिवार कलह में दो फाड़ हो गया. बाल ठाकरे की मृत्यु के बाद उन के पुत्र उद्घव ठाकरे ने शिवसेना पर कब्जा कर लिया तो भतीजे राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्र्माण सेना बना ली.

उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी में कलह जारी है. मुलायम सिंह यादव के बेटे अखिलेश और भाई शिवपाल सिंह में ठनी हुई है. मुलायम सिंह यादव भाई शिवपाल के पक्ष में दिखाई देते हैं. शिवपाल अब नई पार्टी के गठन की सोच रहे हैं.

बिहार में लालू यादव परिवार में भाइयों के बीच मनमुटाव की खबरें सुर्खियों में हैं तो तमिलनाडु में करुणानिधि परिवार में उन के बेटों के बीच राजनीतिक विरासत के बंटवारे का हल नहीं हो पाया है.

दरअसल आज कलह से कोई भी परिवार नहीं बच पा रहा है. वह चाहे राजनीतिक परिवार हो या व्यापारिक या फिर आम व्यावसायिक या नौकरीपेशा.

आज के दौर की बात करें तो संयुक्त परिवार की अवधारणा लगभग खत्म हो चुकी है जब सभी तरह के फैसले परिवार का मुखिया लेता था और वह सर्वमान्य होता था. अब नई पीढी परिवार के बड़ेबुजुर्गों की सलाह के हर फैसले खुद लेना चाहता है. वह किसी का हस्तक्षेप बर्दास्त नहीं कर सकता. हर सदस्य अपनेफायदे और स्वार्थ के वशीभूत हो रहा है.

परिवारों में बढ़ती कलह की इस स्थिति को टाला नहीं जा सकता. अब परिवारों में न धर्म की प्रेम, शांति, एकता जैसी सीख काम आ रही, न स्वयं का विवेक. अगर किसी समस्या का हल न होता दिख रहा तो स्थिति को वक्त के भरोसे छोड़ देने के अलावा कोई चारा नहीं है.

मेरे हाथ बहुत रूखे रहते हैं. किसी से हाथ मिलाने पर मुझे शर्मिंदगी का एहसास होता है. मैं ऐसा क्या उपाय करूं कि मेरे हाथ मुलायम हो जाएं.

सवाल
मेरे हाथ बहुत रूखे रहते हैं. किसी से हाथ मिलाने पर मुझे शर्मिंदगी का एहसास होता है. मैं ऐसा क्या उपाय करूं कि मेरे हाथ मुलायम हो जाएं?

जवाब
हाथों में औयल ग्लैंड्स कम होती है, इसलिए हाथ विशेषकर बदलते मौसम में रूखे हो जाते हैं. घर के काम जैसे कपड़े, बरतन आदि धोते रहने से भी हाथों की स्किन खराब हो जाती है. ऐसे में हाथों को नियमित तौर पर ऐक्सफौलिएट और मौइश्चराइज करते रहना चाहिए. इस के अलावा 1 बड़ा चम्मच नीबू का रस व 1 छोटा चम्मच चीनी में थोड़ा सा पानी मिला कर पेस्ट बना लें.

इस मिश्रण का हाथों पर 5 मिनट लगाए रखें. फिर हाथों को कुनकुने पानी से साफ कर लें. इस के अलावा 1/3 कप ग्लिसरीन और 2/3 कप गुलाबजल को आपस में मिला कर इसे बोतल में भर कर फ्रिज में रख जब भी कोई काम करने के बाद हाथ रूखे लगें तो इस से उन की मसाज कर लें.

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रूखी त्वचा को कहें बायबाय

सुंदर त्वचा का राज उस की सही देखभाल में ही छिपा है. मौसम में बदलाव का असर त्वचा पर पड़ता है. सर्दी के मौसम में नमी की कमी के कारण त्वचा रुखी, बेजान और गंदी हो जाती है. ऐसे में सर्दी का मौसम शुरू होने पर त्वचा की खास देखभाल करने के साथसाथ अपनी दिनचर्या को बदलने की भी जरूरत होती है.

विंटर स्किन केयर

यदि आप की त्वचा सामान्य से रूखी है, तो चेहरा साबुन व पानी से न धोएं. इन की जगह ऐलोवेरा युक्त क्लीजिंग जैल का उपयोग करें ताकि यह नमी संतुलन बनाए रखते हुए त्वचा को साफ कर सके. इसे त्वचा पर लगाएं और नम रुई से साफ करें.

तैलीय त्वचा के लिए तुलसी व नीम या चंदन क्लींजिंग लोशन युक्त फेस वाश का उपयोग करें. क्लीजिंग के बाद त्वचा को टोन करने के लिए गुलाबजल का प्रयोग करें. गीली रुई को इस में डुबो कर उस से त्वचा साफ करें.

गुलाबजल सब से अच्छा प्राकृतिक स्किन टोनर है और सभी प्रकार की त्वचा के लिए उचित है. रुखी त्वचा के पोषण के लिए रात के समय क्लीजिंग करें. यह त्वचा में नमी बनाए रखने में मदद करता है. चेहरे पर क्रीम लगाएं और 2-3 मिनट तक त्वचा की मालिश कर गीली रुई से साफ कर लें.

मौइश्चराइजर लगा कर त्वचा को सुरक्षित किया जा सकता है. यदि आप दिन में बाहर निकलती हैं, तो सनस्क्रीन लगाएं. सूर्य की किरणें त्वचा से नमी सोख लेती हैं. यदि त्वचा तैलीय है तो सनस्क्रीन जैल का उपयोग करें. तैलीय त्वचा पर अधिक क्रीम लगाने से बचें, क्योंकि क्रीम से रोम छिद्र बंद हो जाते हैं, जिस से मुंहासे हो जाते हैं.

फेशियल मास्क भी त्वचा पर नियमित रूप से लगाएं. 2 छोटे चम्मच चोकर, 1 चम्मच बादाम या जई का तेल और 1-1 चम्मच शहद, दही और गुलाबजल को मिला कर घर में ही मास्क बना सकती हैं. इस मिश्रण को सप्ताह में 2-3 बार त्वचा पर लगाएं. 20-30 मिनट लगा रहने के बाद चेहरे को धो लें.

चेहरे के अन्य भागों की देखभाल

सामान्य त्वचा की देखभाल के अलावा चेहरे के कुछ भागों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होती है. जैसे होंठों की त्वचा बहुत पतली होती है और इन में चिकनी ग्रंथियों की कमी होती है. यही कारण है कि होंठ रुखे हो जाते हैं और विशेषरूप से सर्दी के मौसम में इन में दरारे पड़ जाती हैं.

चेहरा धोने के बाद मृत त्वचा को हटाने के लिए नर्म तौलिए से धीरेधीरे होंठों को रगड़ें. रोज होंठों पर दूध (मलाई) क्रीम लगाएं. 1 घंटा लगा रहने के बाद धो लें. यदि होंठ काले हैं तो दूध की क्रीम में नीबू के रस की कुछ बूंदें मिलाएं. रात में होंठों पर रोजाना शुद्ध बादाम तेल या बादाम क्रीम लगाएं और पूरी रात लगी रहने दें. मैट लिपस्टिक लगाने से बचें.

रुखे पैर और फटी एडि़यों को अधिक देखभाल की जरूरत होती है. अत: रात में सोने से पहले लगभग 20 मिनट तक गरम पानी में पैरों को भिगोएं. उन्हें भिगोने से पहले पानी में थोड़ा मोटा नमक और शैंपू मिलाएं. गरम पानी एडि़यों की मृत त्वचा को नर्म करता है. हील स्क्रबर की मदद से मृत कोशिकाओं को हटाने के लिए धीरेधीरे एडि़यों को रगड़ें. मैटल के स्क्रबर से बचें.

पैरों को धोने के बाद अच्छी क्रीम से एडि़यों की मालिश करें. मौइश्चराइजिंग क्रीम या वैसलीन एडि़यों पर लगाएं. जालीदार कपड़ा या सूती ऊन और सर्जिकल गेज एडि़यों पर बांधें और सूती मोजे पहनें. फिर सो जाएं. ऐसा करने पर क्रीम एडि़यों पर लगी रहेगी और बिस्तर पर नहीं लगेगी. एडि़यों पर पूरी रात लगी क्रीम उन की त्वचा को नर्म बनाती है.

 

एडिलेड टेस्ट : भारत का ऐतिहासिक आगाज

एडिलेड में भारत 31 रन से जीत गया. ऐसा होना ही दिख रहा था पर इस मैच से दोनों टीमों ने कई सबक जरूर लिए होंगे. सब से पहला सबक तो यह कि दोनों टीमों ने इस मैच को किसी टैस्ट मैच की तरह तो कतई नहीं खेला.

ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी में उस के सलामी बल्लेबाज आरोन फिंच ने 11 रन के निजी स्कोर पर आश्विन की गेंद पर जब ऋषभ पंत को अपना कैच थमाया था तब उन के पास डीआरएस लेने का मौका था और उन्हें खुद नहीं पता था कि गेंद उन के बल्ले को छू कर निकली भी थी या नहीं, पर वे मौका चूक गए.

आज के जमाने में तकनीक खिलाड़ियों का बखूबी साथ देती है और इतने बड़े मैच में ऐसा मौका गंवाना मैच गंवाने जैसा होता है क्योंकि आरोन फिंच जैसे धाकड़ बल्लेबाज इतने कम लक्ष्य में मैच का रुख अपनी और मोड़ने की क्षमता रखते हैं.

ऑस्ट्रेलिया के कप्तान टिम पेन, जो क्रीज पर जम चुके थे और 41 रन भी बना चुके थे, को वह अधकचरा पुल शॉट खेलने की कोई जरूरत नहीं थी. बुमराह की वह उछलती हुई गेंद ऑफ़ स्टंप पर थी जिसे आसानी से छोड़ा जा सकता पर पेन खुद पर काबू न रख पाए और विकेट गंवा बैठे.

भारतीय बल्लेबाज भी कम गैरजिम्मेदाराना शॉट नहीं खेले थे. एक समय पर भारत के 6 विकेट पर 282 रन थे. ऋषभ पंत को इतनी क्या जल्दबाजी थी कि 16 गेंदों पर 28 रन बनाने के बाद वे अपनी विकेट फेंक कर चले गए, क्योंकि इस के बाद महज 25 रनों पर बाकी टीम आउट हो गई.

वह तो भला हो ‘मैन ऑफ़ द मैच’ चेतेश्वर पुजारा का जो उन्होंने दूसरी पारी में भी सब्र के साथ बल्लेबाजी करते हुए 204 गेंदों पर 71 रन बना दिए थे वरना भारतीय टीम 300 का आंकड़ा भी पार कर पाती, इस में भी शक ही था.

पर अंत भला तो सब भला. भारत यह मैच जीत चुका है और यह पहला मौका है जब भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलिया में सीरीज का पहला टैस्ट मैच जीता हो.

ऑस्ट्रेलिया की दूसरी पारी में उस के ऊपरी क्रम ने तो कोई खास कमाल नहीं किया था, पर निचले क्रम के बल्लेबाजों ने जीत की उम्मीद जगाए रखी. मिशेल स्टार्क और पैट कमिंस की जोड़ी ने 8वें विकेट के लिए 16.3 ओवरों तक बल्लेबाजी की और महत्वपूर्ण 41 रन जोड़े.

इसी तरह 9वें विकेट के लिए पैट कमिंस और नाथन लायन ने 29 रनों की भागीदारी की, जबकि आखिरी विकेट के लिए नाथन लायन ने जोश हेजलवुड के साथ मिल कर 32 रन जोड़े. वे दोनों धीरेधीरे ऑस्ट्रेलिया को जीत की तरफ ले जा रहे थे कि रविचंद्रन अश्विन ने जोश हेजलवुड का विकेट ले कर भारत को जीत दिला ही दी.

अब इस सीरीज का अगला मैच पर्थ में 14 दिसंबर, 2018 से खेला जाएगा जहां की पिच अपनी तेज रफ़्तार के लिए बदनाम रही है. टीम इंडिया को अभी से मानसिक रूप से तैयार रहना होगा क्योंकि मेजबान टीम पलटवार के लिए तिलमिला रही है.

बदलने वाला है आप का WhatsApp

फेसबुक के स्वामित्व वाली कंपनी WhatsApp पर आये दिन कुछ न कुछ नया फीचर आने की खबरें आते ही रहती हैं. बता दें कि इस साल WhatsApp पर कई बेहतरीन फीचर जोड़े जा चुके हैं. जिनमें ग्रुप कौलिंग, WhatsApp पेमेंट, स्वाइप टू रिप्लाई, स्टीकर्स आदि प्रमुख हैं.

इन फीचर्स के अलावा WhatsApp तीन और नए फीचर्स जोड़ने वाला है. आज हम उसी विषय पर बात करने वाले हैं तो आप इस पोस्ट को पूरा पढ़ कर ही जाएं.

मल्टीशेयर फीचर

वॉट्सऐप के इस नए फीचर्स के रोल आउट हो जाने के बाद आप किसी भी मैसेज, फोटो या वीडियो का प्रिव्यू देख सकेंगे, जिसे आप दो या दो ज्यादा लोगों को भेज रहे हैं. इस फीचर की मदद से आप किसी भी मैसेज को मल्टीपल शेयर करने से पहले जांच सकते हैं.

फिलहाल, आप एक बार में पांच लोगों को किसी भी मैसेज को शेयर कर सकते हैं. लेकिन मैसेज को शेयर करने से पहले आपके पास उसका प्रिव्यू देखने का औपशन उपलब्ध नहीं है. यह फीचर कुछ ई-मेल में उपलब्ध है.

कंटिन्यूअस वौयस मैसेज

प्लेबैक इस फीचर के रोल आउट हो जाने के बाद से वॉट्सऐप आपके सभी वौयस मैसेज को औटोमैटिकली प्ले करेगा. अगर वौयस मैसेज एक सीरीज में भेजा गया है तो यूजर्स को एक बार वौयस मैसेज को प्ले करने के लिए बटन पर टैप करना होगा. इसके बाद सारे वौयस मैसेज अपने आप प्ले होंगे.

ग्रुप कौल शौर्टकट

वॉट्सऐप जल्द ही ग्रुप कौलिंग के लिए शार्टकट जोड़ने वाला है. इस फीचर के जुड़ जाने से आपको ग्रुप कौल करने के लिए ग्रुप चैट विंडो में एक शार्टकट मिलेगा. ग्रुप के सदस्यों को आप सेलेक्ट करके वौयस या वीडियो कौल कर सकेंगे.

चरनोई जमीन की कमी में पशुपालन हुआ मुश्किल

बढ़ती आबादी और नएनए खुलते उद्योगधंधों की वजह से खेती की जमीन का रकबा लगातार घटता जा रहा है. शहरी इलाकों के साथसाथ गंवई इलाकों में भी अंधाधुंध खुलते वेयरहाउस, पैट्रोल पंप, व्यावसायिक परिसरों के बन जाने के चलते खेतीलायक जमीन घट रही है.

मध्य प्रदेश के ज्यादातर गंवई इलाकों में चरनोई जमीन पर दबंगों का कब्जा है, जिस की वजह से गाय, बैल, भैंस, बकरी जैसे पालतू पशु किसानों के घर बंधे रहते हैं या फिर उन्हें आवारा सड़कों पर छोड़ दिया जाता है.

सरकार गायों के संरक्षण का ढिंढोरा भले ही पीटे, पर सरकार की तमाम योजनाओं का जमीनी लैवल पर सही ढंग से लागू न होने से प्रदेश में किसानों द्वारा पशुपालन में दिलचस्पी लेना कम कर दिया है.

गंवई इलाकों में चरनोई जमीन की व्यवस्था पुराने समय से रखने का नियम था. पशुओं को चराने के लिए चरनोई जमीन गांव में इसलिए छोड़े जाने का इंतजाम किया गया था कि गांव में पशुओं को चारा मिलता रहे.

शासनादेश में हर गांव में चरनोई जमीन रहना अनिवार्य थी, जो भूसंहिता में आरक्षित भी मानी जाती थी. अब चरनोई जमीन के माने बदले गए हैं. इस चरनोई जमीन को जिस मकसद से रिजर्व रखा गया?था, वह मकसद पूरी तरह से खत्म हो गया है.

आज भी कागजों में तो चरनोई जमीन हर गांव के राजस्व रिकौर्ड में दर्ज है, पर सच यही?है कि चरनोई जमीन कहीं दिखाई नहीं देती.

आज गंवई इलाकों में हालात ये हैं कि गांव में ऊंची जाति के दबंगों ने चरनोई जमीन पर कब्जा कर लिया?है और उस पर वे खेतीबारी कर रहे हैं, पर नीची जाति के पशुपालकों को अपने पशुओं को चराने के लिए किसी तरह की चरनोई जमीन नहीं है. दबंगों के डर से वे अपने मवेशी छुट्टा तक नहीं छोड़ पाते हैं.

कैसे घट रही खेती और चरनोई जमीन : मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह के शासनकाल में आवासीय पट्टा देने के लिए सरकारी जमीन के अलावा चरनोई जमीन का भी आवंटन राजस्व महकमे द्वारा दलितों को कर दिया गया था.

सरकार के इस कदम से बचीखुची चरनोई जमीन भी खत्म हो गई थी. इसी तरह गंवई इलाकों में कृषि उपज मंडी, अस्पताल, स्कूल, दूसरी सरकारी इमारतों का बनना भी चरनोई जमीन के रकबे पर किया जा रहा है. किसानों?द्वारा?भी वेयरहाउस, पैट्रोल पंप, बरातघर व दूसरे व्यावसायिक परिसरों को खेतीबारी की जमीन पर बनाया जा रहा है.

कसबों और शहरों में भी खेतीलायक जमीन पर आवासीय कालोनी बना कर प्लौट बेचे जा रहे?हैं. गांवों में चरनोई के अलावा जो पठारी इलाके या सरकारी जमीन बची है, उस पर दबंगों का कब्जा है. यहां तक कि जुलाई यानी आषाढ़ी के दौरान तो प्रदेश के हर थाने में जमीन विवाद, मेंड़ विवाद और मवेशी विवाद की रिपोर्ट आती हैं.

जमीन की कमी में आवारा घूमते

पशु : आज शहर और गांव की सड़कों पर झुंड बनाए बैठे पशुओं की आवारगी की प्रमुख वजह भी खत्म होती चरनोई जमीन ही?है.

गांवदेहात में चरनोई जमीन के नाम पर कुछ नहीं बचा है. ऐसे में वे किसान जिन के पास खुद की जमीन नहीं हैं, वे गायों को खुला छोड़ देते हैं.

चरनोई जमीन नहीं होने से गाय खेतों में घुस कर फसलों को खा जाती हैं. जिन किसानों की फसलों को नुकसान होता?है, वे लड़ने पर आमादा हो जाते?हैं.

गांवों में चरनोई जमीन नहीं होने और गायों के पालने में किसानों की दिलचस्पी कम होने के चलते शहर की गलियों में गाय आवारा घूमती रहती हैं. लोगों द्वारा प्लास्टिक की थैली में फेंकी गई खाद्य वस्तुओं को खाने के चक्कर में प्लास्टिक की थैली को खा कर गंभीर बीमारियों का शिकार हो रही?हैं.

चरनोई जमीन पर कब्जा किए दबंगों के राजनीतिक दबदबे के चलते इन पर शिकंजा नहीं कसा जा सका है. गाय को दरदर भटकने के लिए मजबूर करने में गौपालकों के साथ ही अपने हित की राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले ये दबंग भी जिम्मेदार हैं.

सरकार चरनोई जमीन को इन दबंगों के चंगुल से मुक्त कराने की कोई योजना बनाए तो गायों के लिए चरने के इंतजाम के साथ पशुपालन के प्रति किसानों की दिलचस्पी जाग सकती है.

उद्योगों ने लीली चरनोई जमीन : पूंजीपतियों ने सरकारी जमीन को सस्ते दामों में लीज पर ले कर अपने उद्योग खड़े कर चरनोई जमीन को लीलने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

प्रदेश में विकास और औद्योगीकरण के नाम पर जमीनों की सब से ज्यादा बंदरबांट हुई है. इस में ज्यादातर चरनोई जमीन पूंजीपतियों के नाम कर दी गई है.

साल 2010 में चरनोई जमीन की बंदरबांट के चलते सरकार ने सभी कलक्टरों से जमीन की अदलाबदली के आदेश वापस ले लिए थे और तब की कटनी की कलक्टर अंजू सिंह बघेल को चरनोई जमीन की अदलाबदली के चलते सस्पैंड कर दिया गया था. उस के बाद भी चरनोई जमीन की बंदरबांट इस कदर जारी है कि 22,000 गांवों की चरनोई जमीन ही गायब हो गई है.

मार्च, 2010 में विधानसभा में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने यह आश्वासन दिया था कि प्रदेश में अगर किसी कलक्टर ने किसी शख्स के लिए चरनोई जमीन की अदलाबदली की है तो ऐसे मामलों की जांच कर उसे रद्द किया जाएगा. लेकिन इस के बाद भी हालत यह है कि प्रदेश के 54,903 गांवों में से तकरीबन 22,000 गांवों में चरनोई जमीन ही नहीं बची है.

मध्य प्रदेश भूराजस्व संहिता 1959 की धारा 237 (1) के तहत चरनोई जमीन को अलग रखा जाना है. इस पर शासन का अधिकार रहता?है. लेकिन मुख्यमंत्री के आश्वासन को राजस्व विभाग के लापरवाह अधिकारियों ने गंभीरता से नहीं लिया था.

प्रदेश में सब से ज्यादा चरनोई जमीन की बंदरबांट उन जिलों में हुई है जहां तेजी से विकास हुआ है. कटनी, सतना, रीवां, शहडोल, छतरपुर, ग्वालियर, भिंड समेत 2 दर्जन जिलों में करोड़ों रुपए की चरनोई  जमीन प्रशासन की ढुलमुल नीति और लचर व्यवस्था के चलते असरदार भूमाफिया के कब्जे में चली गई?है. सरकारी जमीन को कब्जे से छुड़ाने के नाम पर अधिकारी कागजी कार्यवाही का दिखावा करते रहते हैं.

गौ संवर्धन बोर्ड भी नहीं कर पाया ठोस काम : मध्य प्रदेश सरकार ने तो बाकायदा एक गौ संवर्धन बोर्ड बना कर जानेमाने संत अखिलेशानंद को राज्यमंत्री का दर्जा दे रखा है.

गौ संवर्धन बोर्ड ने गोठान बना कर चरनोई जमीन रिजर्व करने और उस पर हैलीपैड बनाने का सपना जरूर देखा, पर आज के हालात में न तो आवारा घूमती गायों की समस्या हल हुई?है और न ही चरनोई जमीन का रकबा कहीं दिखाई दे रहा है.

गौ संवर्धन बोर्ड गायों की चिंता करने के बजाय मुख्यमंत्री की जनआशीर्वाद यात्रा, नर्मदा सेवा यात्रा और शंकराचार्य की पादुका यात्रा का व्यवस्थापक बन कर रह गया है.

सरकार वोटों की राजनीति के चलते सरकारी जमीन पर अतिक्रमण को रोक पाने में लाचार दिख रही है. गौ संवर्धन बोर्ड और गौ सेवा आयोग बना कर गाय की सेवा का ढोंग रचने वाली सरकार अगर हर गांव में चरनोई जमीन को दबंगों के कब्जे से मुक्त करा दे तो गायों के संवर्धन का किसानों का सपना सच हो जाएगा और दुधारू पशुओं से मिलने वाले दूधघी से वे माली रूप से मजबूत होंगे.

ऐसे लें पत्तागोभी से मुनाफा

पत्तागोभी यानी बंदगोभी भारत में पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, महाराष्ट्र, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और हरियाणा में खासतौर से उगाई जाती है. पत्तागोभी  क्रुसीफेरी परिवार की एक खास सब्जी है.

मिट्टी और आबोहवा

पत्तागोभी की खेती के लिए मटियार, दोमट या फिर मटियार दोमट मिट्टी ज्यादा मुफीद होती है. पौध लगाने से पहले गोबर की सड़ी खाद मिला कर खेत की मिट्टी भुरभुरी कर लें और 3-4 हल या हैरो चला कर खेत को एकसार कर के जरूरत के मुताबिक छोटीछोटी क्यारियां बना लेनी चाहिए.

यह जाड़े के मौसम का पौधा है. इस को ठंड व नम जलवायु की जरूरत होती है. इस के जमने के दौरान जमीन का तापमान 12 डिगरी सैंटीग्रेड से 15 डिगरी सैंटीग्रेड से माकूल होता है.

बीज की मात्रा और उपचार

पत्तागोभी के लिए एक हेक्टेयर खेत में 500 से 750 ग्राम बीज की जरूरत होती है. संकर किस्मों का बीज 300 से 350 ग्राम ही काफी है.

बीज की बोआई से पहले फफूंदनाशी दवा थायरम या केप्टान की 2 से 3 ग्राम मात्रा प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोएं ताकि पौधशाला में आर्द्र विगलन जैसी बीमारियों से पौध को बचाया जा सके.

बीज की बोआई का समय

बोआई का सही समय सितंबरअक्तूबर महीने तक है. वसंत व ग्रीष्म में फसल लेने के लिए बीज सुरक्षित जगहों पर प्लास्टिकघर, शीश महल वगैरह में दिसंबरजनवरी में बोया जा सकता है.

पौध तैयार करना

पत्तागोभी की पौध के लिए 1.0 से 1.25 मीटर चौड़ी, 15 सैंटीमीटर ऊंची तकरीबन 7 से 10 मीटर लंबी 15 से 16 क्यारियों की जरूरत होती है. क्यारियों की गुड़ाई कर के उस में कंपोस्ट या गोबर की सड़ी खाद 10 किलोग्राम वर्गमीटर की दर से मिला कर खेत में क्यारी तैयार कर लें और 5 से 10 ग्राम फ्यूरोडौन या थिमेट मिला लें. साथ ही, 5 से 10 ग्राम थाइरम, केप्टान या बाविस्टीन दवा कवकनाशी मिला कर बीज बोने के लिए तैयार कर लें. अब 8 से 10 सैंटीमीटर की दूरी पर 2 से 3 सैंटीमीटर गहरी नुकीली लकड़ी की मदद से क्यारी में लाइनें यानी कतारें बना लें.

इन कतारों में बीज को शोधित करने के बाद बो दें और हलके हाथ की मदद से इन कतारों को पूरी तरह ढक दें.

सूखी घास की परत पलवार के रूप में क्यारी में बिछा दें. इस तरह हर दूसरेतीसरे दिन सिंचाई करते रहें. क्यारी में पत्तागोभी का बीज 7 से 8 दिन बाद अंकुरित हो जाता है. इस तरह से 30 से 35 दिनों में पौधों की रोपाई हो जाती है.

खाद और उर्वरक

पत्तागोभी का बढि़या उत्पादन लेने और जमीन की ताकत बढ़ाने के लिए तकरीबन 150 से 200 क्विंटल सड़ी गोबर की खाद का इस्तेमाल रोपाई के 30-35 दिन पहले खेत में करें.

खेत की जुताई कर के खाद को अच्छी तरह खेत में मिला दें. 120 किलोग्राम नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम फास्फोरस व 60 किलोग्राम पोटेशियम खाद का इस्तेमाल उर्वरक के रूप में करें, जिस में से पूरा फास्फोरस व पोटाश व नाइट्रोजन को खेत की तैयारी के समय आखिरी जुताई के समय करना चाहिए.

बाकी बची आधी नाइट्रोजन को 2 भागों में बांट कर एक भाग रोपाई के 25 से 30 दिन बाद और दूसरा भाग 45 से 50 दिन बाद खड़ी फसल में देना चाहिए. संकर प्रजातियों के लिए उर्वरकों की मात्रा 200 किलोग्राम, 100 किलोग्राम नाइट्रोजन फास्फोरस प्रति हेक्टेयर की दर से करना चाहिए.

खरपतवार नियंत्रण और अंत:सस्य क्रिया

फूलगोभी में पौध रोपण से ले कर फूल तैयार होने तक के बीच कई तरह के खरपतवार उगते हैं. 2 से 3 निराईगुड़ाई से खरपतवार की रोकथाम हो जाती है. खरपतवारनाश्ी का इस्तेमाल काफी फायदेमंद होता है. पेंडीमिथिलीन 3.3 लिटर को 1,000 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर का छिड़काव रोपाई से पहले काफी फायदेमंद होता है.

रोपाई और दूरी

पत्तागोभी की पौध 30 से 35 दिन में तैयार हो जाती है. खेत में 50 सैंटीमीटर की दूरी पर कतारें बना लें और उतनी ही दूरी पर पौधों की रोपाई करनी चाहिए.

कम बढ़ने वाली किस्मों को 45×45 सैंटीमीटर की दूरी पर और ज्यादा बढ़ने वाली प्रजातियों को 60×60 सैंटीमीटर की दूरी पर रोपाई कर सकते हैं.

सिंचाई : पौधों की रोपाई करने के बाद मामूली सी सिंचाई करनी चाहिए. दोबारा रोपण एक हफ्ते के अंदर कर देना चाहिए वरना पैदावार प्रति इकाई घट जाती है. दोबारा रोपण के तुरंत बाद सिंचाई करें और समय से पौधों को रोप दें.

कटाई : पत्तागोभी के हैड यानी कल्ले पूरे आकार के हो जाएं और छूने पर ठोस लगें तभी काटना चाहिए. काटने के लिए तेज दरांती हंसिया या चाकू को इस्तेमाल में लाया जाता है.

पत्तागोभी के हैड को काटने का समय प्रजाति के मुताबिक मध्य दिसंबर से अप्रैल तक और मैदानी क्षेत्र में मईजून तक भी है.

पैदावार : अगेती प्रजातियों की औसत पैदावार 500 से 600 क्विंटल प्रति हेक्टेयर हासिल की जा सकती है.

उत्तर भारत में औसत पैदावार 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर और दक्षिण भारत में 150 से 200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक आंकी गई है, पर वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाए तो पैदावार और भी बढ़ाई जा सकती है.

पत्तागोभी के खास कीट

पत्तागोभी की तितली : इस कीट की व्यस्क तितलियां सफेद रंग की होती हैं. इल्लियां शुरू में पीले नारंगी रंग की होती हैं. ये बड़े पौधों के शीर्ष के आसपास वाले पत्तों की शिराओं को छोड़ कर सभी भागों को खा जाती हैं. नतीजतन, पौधे पूरी तरह से खराब हो जाते हैं.

रोकथाम : फल पर नीम के अर्क (एनएसकेई) का 5 फीसदी घोल का 2-3 बार छिड़काव करें. ज्यादा प्रकोप हो तो स्पाइनोसैड (3 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर पानी) या इमामेक्टिन बेंजोएट (3 ग्राम प्रति 10 लिटर पानी) या फिप्रोनिल (2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) या क्लोरेंट्रेनिप्रोले (1 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर पानी) का इस्तेमाल करें.

अर्धकुंडलक कीट : इस कीट का व्यस्क कीट भूरा पतंगा होता है. इस कीट की इल्लियां ही नुकसान पहुंचाती हैं. ये बड़ी तादाद में पौधघर और खेत में दिखाई देती हैं. ये इल्लियां पत्तियों के हरे भाग को खा जाती हैं. नतीजतन, पत्तियों पर केवल नसें ही रह जाती हैं.

रोकथाम : फसल की बढ़वार की अवस्था में नीम के अर्क (एनएसकेई) का 5 फीसदी घोल का 2-3 बार इस्तेमाल करें. सूंडि़यों के परजीवी कोटेशिया प्लूटेली का इस्तेमाल 1000 व्यस्क प्रति हेक्टेयर पर दर से करने पर कीटनाशकों के इस्तेमाल में कमी आती है.

यदि कीटों की मात्रा ज्यादा हो तो स्पाइनोसैड (3 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर पानी) या इमामेक्टिन बेंजोएट (3 ग्राम प्रति 10 लिटर पानी) या फिप्रोनिल (2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) का इस्तेमाल करें.

माहू कीट : यह बंदगोभी या पत्तागोभी का प्रमुख कीट है जिसे चैंपा, माहू व तेला के नाम से जाना जाता है. माहू कीट छोटा और कोमल होता है. ये कीट पत्तागोभी के एफिड/माहू पीलापन लिए हुए हरे रंग के होते हैं.

यह कीट अकसर दिसंबर से मार्च महीने तक सक्रिय रहता है. माहू के प्रौढ़ व शिशु दोनों ही पौधों के भागों से रस चूस कर नुकसान पहुंचाते हैं.

रोकथाम : मेटासिस्टोक्स 25 ईसी, रोगोर 30 ईसी या इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एसएल की 1 मिलीलिटर मात्रा प्रति लिटर पर 2 छिड़काव करें. परभक्षी कीटों जैसे सिरफिड, क्राइसोपरला, क्रोक्सीनेला वगैरह का संरक्षण करें.

पत्तीजालक कीट  : ये कीट मध्यम आकार के पतंगे होते हैं. दिन में ये पत्तियों के नीचे छिपे बैठे रहते हैं और दूरदूर तक उड़ कर जा सकते हैं.

इस कीट की इल्लियां पौधों को काफी नुकसान पहुंचाती हैं. नई निकली हुई इल्लियां एक जगह पर झुंड में खाती हैं और पत्तियों में छोटेछोटे अनेक छेद कर देती हैं. पौधे में केवल पत्तियों की खास शिराएं धागों द्वारा एकसाथ जुड़ी हुई दिखाई देती हैं.

रोकथाम : फसल की बढ़वार की दशा में नीम के अर्क (एनएसकेई) का 5 फीसदी घोल का 2-3 बार इस्तेमाल करें.

अगर कीटों की मात्रा ज्यादा हो तो स्पाइनोसैड (3 मिलीलिटर प्रति 10 लिटर पानी) या इमामेक्टिन बेंजोएट (3 ग्राम प्रति 10 लिटर पानी) या फिप्रोनिल (2 मिलीलिटर प्रति लिटर पानी) का इस्तेमाल करें. प्रौढ़ तितलियों को प्रकाशप्राश में इकट्ठा कर मार देना चाहिए.

हीरक पृष्ठ पतंगा : व्यस्क कीट छोटा, धूसर रंग का होता है. इस कीट की इल्लियां पीलापन लिए हुए हरे रंग की होती हैं. इस कीट के छोटे शिशु पत्तियों की निचली सतह पर रहते हैं और उन में छोटेछोटे छेद बना देते हैं. तेजी से बढ़ने पर छोटे पौधे पूरी तरह पत्तियोंरहित हो जाते हैं और मर जाते हैं. ये बड़े पौधों के शीर्षों में छेद बना देते हैं जिन में इन का मल भरा रहता है.

रोकथाम : सरसों को जाल फसल के रूप में बोना चाहिए. गोभी की रोपाई के 15 दिन बाद सरसों की एक लाइन की बोआई करते हैं. बीटी 1 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर छिड़काव करें.

ज्यादा प्रकोप होने पर मैलाथियान 50 ईसी का 500 मिलीलिटर को 500 लिटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए.

फसल पकने की अवस्था में प्रकोप होने पर 1 लिटर मैलाथियान को 1,000 लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करना चाहिए.

पत्तागोभी के खास रोग

मृदुरोमिल आसिता : यह रोग पौधशाला से फूल बनने तक कभी भी लग सकता है. महीन पतले बाल जैसे सफेद कवक तंतु पत्ती की निचली सतह पर दिखते हैं. पत्तियों की निचली सतह पर जहां कवक तंतु दिखते हैं. वहीं पत्तियों की ऊपरी सतह पर भूरे नेक्रोटिक धब्बे बनते हैं जो रोग के तीव्र हो जाने पर आपस में मिल कर बड़े हो जाते हैं.

रोकथाम : मैंकोजेब कवकनाशी की 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लिटर पानी की दर से छिड़काव करें. रिडोमिल कवकनाशी की 2 ग्राम मात्रा प्रति लिटर पानी में घोल कर छिड़काव करें. रोग की ज्यादा दशाओं में केवल एक बार छिड़काव करना चाहिए.

अल्टरनेरिया पर्ण दाग : अल्टरनेरिया पर्ण दाग पत्तागोभी में बाद की दशाओं में आता है. पर्ण दाग निचली पत्तियों में ही आता है. इस रोग में पत्तियों पर गोल भूरे धब्बे बनते हैं. इस में छल्लेदार रिंग साफतौर से दिखती है. नमी के मौसम में इन्हीं धब्बों पर काले बीजाणु बन जाते हैं. पत्तागोभी की ऊपरी पत्तियां संक्रमित हो जाती हैं.

रोकथाम : इस रोग में शाम के समय क्लोरोथेलोनिल कवकनाशी की 2 ग्राम मात्रा प्रति लिटर पानी की दर से और 0.1 मिलीलिटर स्टीकर के साथ मिला कर छिड़काव करना चाहिए. साथ ही, सेहतमंद पौधों से ही बीज को लें  और फली बनने तक एक बार मैंकोजेब 2.5 ग्राम मात्रा प्रति लिटर पानी ले कर छिड़काव करें. कमर तोड़ रोग : यह रोग पौध का एक खास रोग है. इस रोग के लक्षण पौधों पर 2 तरह से दिखाई देते हैं. एक में तो पौधे जमीन से बाहर निकलने से पहले ही रोगी हो जाते हैं और बीज जमते ही मर जाता है. इस से पौधशाला में पौधों की तादाद में कमी आ जाती है.

रोकथाम : 25 एमएम की पारदर्शी पौलीथिन की चादर बिछा कर 45 दिन तक जमीन को सौर ऊर्जा से शोधित करें.

क्यारियों को बीजाई से 15 से 20 दिन पहले फार्मलिन 1 भाग फार्मलिन 7 भाग पानी से शोधित करें. क्यारियों को मैंकोजेब 25 ग्राम प्रति 10 लिटर पानी और कार्बंडाजिम 5 ग्राम प्रति 10 लिटर पानी के घोल से बीज से पौध निकलने पर रोग के लक्षण देखते ही सींचें.

तना विगलन रोग : यह पत्तागोभी का खास रोग है. अगर यह रोग एक बार लग जाए तो खेत में अच्छी फसल लेना मुश्किल हो जाता है. यह रोग पौधे पर मिट्टी चढ़ाने के साथ ही दिसंबर महीने में शुरू हो  जाता है और पत्ते पीले पड़ कर गिर जाते हैं. पौधे के तने पर गहरे भूरे रंग की सड़न पैदा हो जाती है और तना अंदर से खोखला हो जाता है.

रोकथाम : रोगग्रस्त पत्तियों और फूलों को उखाड़ कर जमीन में दबा दें. फसल पर फूल बनने से बीज बनने तक 10 से 15 दिन के अंतराल पर कार्बंडाजिम 50 ग्राम प्रति 100 लिटर पानी और मैंकोजेब 250 ग्राम प्रति 100 लिटर पानी का छिड़काव करें.

काला सड़न रोग : रोगग्रस्त पौधों के पत्तों के किनारे पर ‘वी’ आकार के पीले धब्बे पड़ जाते हैं जो समय के साथ बढ़ कर पत्ते के ज्यादातर भाग को घेर लेते हैं. प्रभावित पत्तों की शिराएं गहरे भूरे या काले रंग की हो जाती हैं. तापमान के बदलने से रोगी पौधे एकदम सूख जाते हैं. अगर फसल बीज के लिए लगाई गई है तो रोगाणु का संक्रमण बीज तक भी चला जाता है.

रोकथाम : 50 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान पर स्ट्रैप्टोसाइक्लीन की 1 ग्राम मात्रा 10 लिटर पानी में घोल कर 30 मिनट बीजोपचार करें. इस के अलावा कौपर औक्सीक्लोराइड 3 ग्राम की मात्रा के मिश्रण को 0.5 मिलीलिटर चिपकने वाले पदार्थ के साथ मिला कर भी एक बार इस्तेमाल करें.

डा. ऋषिपाल और डा. श्वेता सोनी

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