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मंजिल (भाग-3) : पुरवा और सुहास के प्यार की कहानी

पूर्व कथा

पुरवा का पर्स चोर से वापस लाने में सुहास मदद करता है. इस तरह दोनों की जानपहचान होती है और मुलाकातें बढ़ कर प्यार में बदल जाती हैं. सुहास पुरवा को अपने घर ले जाता है. वह अपनी मां रजनीबाला और बहन श्वेता से उसे मिलवाता है. रजनीबाला को पुरवा अच्छी लगती है. उधर पुरवा सुहास को अपने पिता से मिलवाने अपने घर ले आती है तो उस के पिता सहाय साहब सुहास की काम के प्रति लगन देख कर खुश होते हैं.

सुहास की बहन श्वेता को देखने लड़के वाले आते हैं. इंजीनियर लड़के गौरव से श्वेता का विवाह तय हो जाता है. मिठाई  के डब्बे के साथ बहन की सगाई का निमंत्रण ले कर सुहास सहाय साहब के घर जाता है. घर पर बीमार सहाय साहब का हालचाल पूछने उन के मित्र आए होते हैं. सहाय साहब सुहास की तारीफ करते हुए सब को बताते हैं कि वह उसे मोटरपार्ट्स की दुकान खुलवा रहे हैं. सुहास अपनी तारीफ सुन कर खुश होता है.

अब आगे…

पुरवा अंदर से सारी बातें सुन रही थी. उसे देखते ही बोली, ‘‘मैदान मारने में बहुत होशियार हो.’’

‘‘यह तो भूमिका है सब से बड़ा मैदान मारने की,’’ सुहास ने धीरे से कहा और एक आंख दबा दी, फिर बोला, ‘‘आंटी कहां हैं?’’

‘‘मम्मा रसोई में हैं.’’

‘‘यह मिठाई किस के लिए?’’ पुरवा ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘अंकलआंटी के लिए.’’

पुरवा तुनक कर बोली, ‘‘और मैं?’’

‘‘तुम्हारे लिए तो स्वयं मैं ही खड़ा हूं.’’

‘‘अच्छा चलो, बातें न बनाओ, शरारती कहीं के.’’

पुरवा की मम्मी को देखते ही सुहास अभिवादन में झुक गया. डब्बा उन की तरफ बढ़ा कर बोला, ‘‘आंटी, मेरी बहन का विवाह तय हो गया है. अगले सोमवार को सगाई है और आप सब को आना है. पुरवा, तुम्हें भी.’’

‘‘बधाई हो. हम सब अवश्य आएंगे. बस, इन की तबीयत सही रहनी चाहिए,’’ पुरवा की मां ने चिंता से कहा.

‘‘आंटी, आप चिंता न कीजिए. मेरे पारिवारिक डाक्टर अखिल बंसल हैं. उन्हें आज ही ले कर आऊंगा. उन का हाथ बहुत अच्छा है, अंकल एकदम ठीक हो जाएंगे.’’

सुहास ने फिर से आने की व्यवस्था कर ली थी. हंस कर उस ने पुरवा को देखा और बोला, ‘‘अच्छा आंटी, अभी चलता हूं. बंसल साहब को ले कर आऊंगा.’’

सुहास मुसकराता हुआ चल दिया.

सुहास ने अपने व्यवहार से धीरेधीरे सहाय परिवार का मन जीत लिया. चूंकि सहाय का बेटा विदेश में था अत: सुहास उस घर में एक पुत्र जैसा पद प्राप्त कर चुका था. कभीकभी सहाय साहब अपनी पत्नी से कहते भी थे, ‘‘संगीता, हम लोग अपनी पुरु के लिए इतना अच्छा लड़का कभी तलाश नहीं सकते थे. घरवर सब अच्छा है. थोड़ा काम सीख जाए फिर मैं अपनी बेटी का पैगाम ले कर जाऊं.’’

‘‘हां, मैं भी आजकल यही सब सोचती रहती हूं. कितने प्यार से मांमां कहता मेरे कदमों में झुक जाता है,’’ वह कुछ सोच कर बोलीं, ‘‘उस की बहन की सगाई पर तो जाना ही पड़ेगा.’’

‘‘अरे, हां, यह अच्छा अवसर है उस के परिवार को देखनेसमझने का,’’ सहाय साहब को जैसे राह सूझ गई.

श्वेता की सगाई पर बहुत रौनक थी. कुछ नजदीकी व कुछ दूर के भी जानने वाले वहां मौजूद थे. सुहास को पुरवा व उस के मातापिता की बहुत व्याकुलता से प्रतीक्षा थी. जैसे ही वे लोग आए, सुहास मन ही मन चहक उठा और खुद आगे बढ़ कर उन का स्वागत किया.

सहाय साहब बहुत उत्सुकता से मकरंद वर्मा परिवार से मिल रहे थे. पुरवा को सब ने इस तरह हाथोंहाथ लिया जैसे वह भी उस घर की एक सदस्य हो. सहाय दंपती को यह बहुत अच्छा भी लगा.

‘‘आज बहुत प्यारी लग रही हो, पुरवा, नजर न लगे,’’ रजनी ने प्यार से कहा तो पुरवा लजा गई.

रजनी ने संगीता से कहा, ‘‘आप की बेटी जितनी समझदार है उतनी सुंदर भी है. हम सब को पसंद है.’’

संगीता ने गद्गद भाव से रजनी का यह बयान सुना.

पुरवा के पिता ने भी सुना था और मन ही मन सोच रहे थे, घरवर दोनों अच्छे हैं. अब देखना कैसे, सुहास को मैं एक अच्छा व्यापारी बनने में सहायता करता हूं.

उसी समय श्वेता की ससुराल के लोग आ गए. सुंदर व समझदार गौरव को जिस ने भी देखा प्रशंसा की. सहाय साहब ने भी प्रशंसा में वर्माजी से कहा था, ‘‘बहुत अच्छा चुनाव है आप का. आप की बेटी का सगाई समारोह देख कर मुझे भी अब अपनी बेटी के विवाह की चिंता होने लगी है.’’

वर्मा साहब ने बड़े अपनत्व से उन के कंधे पर हाथ रखा और हंसते हुए बोले, ‘‘होता है, ऐसा ही होता है. आप की बेटी बहुत स्मार्ट व सुंदर है. आप क्यों चिंता करते हैं.’’

समारोह बहुत साधारण ढंग से मधुर वातावरण में संपन्न हो गया. बहुत बड़ा परिवार था श्वेता की ससुराल का. 4 भाई व 2 बहनें. बाबादादी व एक विधवा बूआ. पुरवा ने श्वेता के कान में धीरे से कहा, ‘‘लगता है परिवार नियोजन वाले इन के घर कभी नहीं आए होंगे.’’

श्वेता धीरे से मुसकरा दी और फुसफुसा कर बोली, ‘‘आए तो हमारे घर भी नहीं थे, 4 हैं, ध्यान रखना.’’

पुरवा उस की चुहलबाजी पर धीरे से हंस पड़ी, कितनी तेज है श्वेता, नहले पर दहला मारती है.

सगाई समारोह में सागर व बेला भी आए थे और दूर ही दूर से सुहास को पुरवा व सहाय साहब के पीछे भागते हुए देख हंस रहे थे. सागर ने बेला से कहा, ‘‘नकवी साहब ने खबर तो ठीक ही दी थी.’’

‘‘यह उम्र ऐसी ही होती है,’’ बेला ने कहा, ‘‘अपनी भूल गए.’’

‘‘नहीं यार, ऐसे अवसरों पर तो अपना अतीत कुछ अधिक ही जोर मारता है. पर एक बात है.’’

‘‘क्या?’’ बेला ने उत्सुकता से पूछा.

‘‘बहुत मस्त जीव है अपना सुहास. कहीं प्यार को भी तो खेल समझ कर नहीं खेल रहा है,’’ सागर ने गंभीर हो कर कहा.

‘‘हां, सच, एक दिन पकड़ कर इसे ऊंचनीच तो समझानी ही होगी,’’ बेला ने कहा. तभी सगाई की रस्म शुरू हो गई और सभी अतिथि उत्साह से समारोह में शामिल हो गए.

रस्म के बाद भोजन का प्रबंध था. श्वेता और गौरव के नजदीक ही पुरवा और सुहास खड़े थे. गौरव, सुहास से बातें करने में व्यस्त था. श्वेता अपनी प्लेट ले कर पुरवा के निकट आ गई तो पुरवा ने पूछा, ‘‘सब अच्छा लग रहा है न?’’

‘‘हां, पर एक दुख भी है,’’ श्वेता बोली, ‘‘मम्मीपापा अकेले रह जाएंगे.’’

‘‘सुहास तो है न उन के पास,’’ पुरवा ने उदास श्वेता को समझाया.

‘‘एक बात कहूं, पुरवा…’’ श्वेता ने धीरे से कहा, ‘‘अब तुम जल्दी से इस घर में आ कर मेरा स्थान ग्रहण कर लो.’’

पुरवा की आंखों में चमक उभरी पर उस के गाल शरम से लाल हो उठे. उस ने लजाई आंखों से सुहास को देखा. यह सब कैसे अचानक होता गया, वह हैरान थी. क्या सचमुच वह समय आ गया है जब वह भी दुलहन बनेगी?

समय तेजी से गुजरता गया. सुहास ने अपना व्यापार शुरू कर दिया था. 1 महीने तक उस ने दुकान अकेले ही संभाली, फिर एक नौकर रख लिया. वैसे भी एक ही जगह जम कर रह पाना उस के स्वभाव में नहीं था. इन दिनों वह पुरवा से मिलने को व्याकुल रहता. आसपास के घरों में जा कर उन के दुख बांटने को उस का मन छटपटाता.

बहुत जल्दी उसे लगने लगा कि यह तो नौकरी से भी अधिक गहरा बंधन है. कोई छुट्टी नहीं और मालिक होने का कोई दंभ नहीं. फिर वह अपने मन को समझाता, यदि पुरवा को पाना है तो यह सबकुछ करना ही होगा. कोई भी भला परिवार किसी बेकार युवक को अपनी बेटी देना कदापि स्वीकार नहीं करेगा. जबजब वह अपने मन को समझाता, उस का उत्साह बढ़ जाता. सहाय साहब भी उसे उत्साहित करने के लिए कहते, ‘‘छोटे काम से ही एक दिन व्यक्ति अपनी योग्यता व लगन से बहुत बड़ा व्यापारी बनता है.’’

‘‘अंकल, मुझ में योग्यता है या नहीं, यह तो नहीं पता, पर लगन जरूर है एक बड़ा व्यापारी बनने की,’’ सुहास भी उन्हें आश्वासन देता.

‘‘बस, वही जरूरी है, बेटे. एक सफल व्यापारी में साहस, लगन व अच्छे प्रबंध करने के सारे गुण होने आवश्यक हैं. तुम्हारी लगन तुम्हें एक दिन अवश्य मंजिल तक पहुंचाएगी,’’ सहाय साहब की उत्साहजनक बातें उसे काफी आशा बंधातीं.

हालांकि परिश्रमी वह नहीं था फिर भी जीवन के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलने की भरसक कोशिश कर रहा था. यह बात सुहास के परिवार के सभी लोग जानते थे कि उस के पास एक कोमल दिल है. दूसरों के दुख से वह बहुत शीघ्र प्रभावित हो जाता है. बस, परिश्रम करने से जी चुराता था. पर अब सब को विश्वास था कि पुरवा को पाने के लिए वह परिश्रम करना भी सीख जाएगा.

सुहास जिस तरह अपने नए वातावरण से लगातार जूझ रहा था वैसे ही पुरवा भी निरंतर व्यस्त थी. उस की परीक्षाएं निकट थीं इसलिए वह सुहास से मिल नहीं पा रही थी. अंध महाविद्यालय भी नहीं जा रही थी.

एक दिन अचानक ही सुहास पुरवा के घर पहुंच गया. वह बैठी नोट्स पलट रही थी. थोड़ी देर पहले ही उस की मम्मी ने कौफी बना कर उसे दी थी, पर पढ़ाई में डूबी होने के कारण वह कौफी पीना भूल गई थी. सुहास पहुंचा तो उसे पता भी नहीं चला कि वह कब आ कर सोफे पर उस के निकट ही बैठ गया है.

सुहास ने कौफी का प्याला उठा कर होंठों से लगाया और हंस कर बोला, ‘‘इसे कहते हैं कि दानेदाने पर लिखा है खाने वाले का नाम.’’

पुरवा ने चौंक कर गरदन उठाई तो वह झट से बोला, ‘‘सौरी, पीने वाले का नाम.’’

पुरवा हंस दी, ‘‘अच्छा है. इस तरह मुझे गरम कौफी मिल जाएगी.’’

‘‘अरे बाबा, फिर तो मैं घाटे में रहूंगा,’’ सुहास ने दुख सा जाहिर करते हुए कहा.

उसी समय पुरवा की मम्मी संगीता भी वहां आ गईं और बोलीं, ‘‘नहीं भई, घाटा कैसा, हम अभी ताजी कौफी बना कर लाते हैं.’’

‘‘मम्मी हों तो ऐसी,’’ सुहास ने कहा और संगीता जैसे ही वहां से हटीं वह पुरवा के नजदीक खिसक आया.

‘‘तुम्हें जरा भी दया नहीं है. फोन भी नहीं किया.’’

‘‘तुम खाली कहां होते हो. अपनी दुकान पर जाने कितनों को बैठाए रहते हो,’’ पुरवा ने कहा.

‘‘बिजनेस है बिजनेस, जितनी जान- पहचान बढ़ेगी उतना ही व्यापार बढ़ेगा. लेकिन उस से तुम्हें क्या?’’

‘‘जब भी फोन करो, तुम्हारे चमचे ही उठाते हैं. तुम्हें उठाने की फुरसत नहीं है तो क्यों करूं फोन,’’ पुरवा ने कृत्रिम क्रोध दिखाते हुए कहा.

‘‘अच्छा बाबा, माफ कर दो अब. मैं ध्यान रखूंगा कि फोन कोई और न उठाने पाए,’’ सुहास उसे मना ही रहा था कि संगीता कौफी ले कर आ गईं. आते ही वह उस के मम्मीपापा के बारे में पूछने लगीं. विवाह की बात छेड़ कर बोलीं, ‘‘अपनी मम्मी से कहना, हमारे योग्य कोई काम हो तो बताएं.’’

‘‘हां आंटी, जरूर बताएंगे.’’

‘‘पुरवा की परीक्षा निकट है इसी से हम लोग नहीं आ पा रहे हैं,’’ संगीता ने स्पष्टीकरण दिया.

उस दिन पुरवा से सुहास की अधिक बातें नहीं हो सकीं इसीलिए उस का मन उचाट हो रहा था. वह दुकान से वापस घर न जा कर सागर के यहां पहुंच गया. बेला बेहद खुश होते हुए बोली, ‘‘आज तुम्हें फुरसत मिल गई. लगता है अब तो सुहास को हमारी याद भी नहीं आती है.’’

‘‘ऐसा नहीं है, भाभी. इतना काम करने की आदत नहीं है न, दुकान से निकलने के बाद थक जाता हूं.’’

‘‘आदत तो डालनी पड़ेगी बच्चे,’’ सागर ने उसे छेड़ते हुए कहा, ‘‘काम नहीं तो छोकरी नहीं और छोकरी नहीं तो ब्याह भी नहीं.’’

‘‘देखो, इसे डराओ मत,’’ बेला ने सागर को धमकाया, ‘‘ब्याह तो इस का होगा पुरवा से ही. उस के पिता भी दूरदर्शी हैं, व्यापार करने में इस के सहायक वे यों ही थोड़े बन गए हैं.’’

‘‘भाभी, आप ठीक ही कह रही हैं पर देखा जाए तो हम सभी स्वार्थी हैं,’’ सुहास बोला, ‘‘काम की रट तो मैं ने यों ही मजाक में लगाई थी उन्हें प्रभावित करने के लिए ताकि पुरवा का हाथ मांगने में आसानी हो जाए.’’

‘‘लेकिन पुरवा की जगह काम तुम्हारे गले पड़ गया,’’ सागर ने हंस कर कहा.

‘‘हां, सच भाई साहब. अब तो यह एक अग्नि परीक्षा है. इस में से गुजरे बिना पुरवा मिलने वाली नहीं है.’’

‘‘सच ही है. बेकार बैठे युवक को कोई भी अपनी बेटी नहीं देना चाहता,’’ बेला ने कहा.

‘‘वही तो, भाभी,’’ सुहास उछल कर बोला, ‘‘अब दुकान चले न चले, पर मैं बेकार नहीं कहला सकता,’’ सुहास का खिलंदड़ी अंदाज उस के चेहरे पर चमक रहा था.

सागर तब तक गंभीर हो चुके थे. बोले, ‘‘यह विचार भी गलत है सुहास कि तुम ने इस दुकान को अपने पर से बेकारी का लेबल हटाने का बहाना समझ लिया है. अब जो भी काम आरंभ किया है उसे लगन से पूरा करो. जीवन की अनिवार्यता समझ कर स्वीकार करो.’’

सुहास को लगा कि वातावरण कुछ गंभीर हो गया है तो झट से चेहरे की हंसी गायब कर दी और बोला, ‘‘आप लोग ठीक कह रहे हैं भाई साहब. मुझे जीवन की गंभीरता को समझना ही चाहिए.’’

उस दिन घर वापस लौटते समय सुहास को यही लग रहा था कि आज कहीं भी उस का मन नहीं लग रहा है.

घर के निकट पहुंचते ही उसे नकवी चाचा मिल गए. कुछ परेशान से थे. उस ने पूछा, ‘‘क्या बात है, चाचा, आज बहुत परेशान से हैं?’’

‘‘हां, बेटा, अच्छा हुआ तुम मिल गए. मेरी बेटी फातिमा आने वाली है. आधे घंटे में गाड़ी स्टेशन पर पहुंच जाएगी और इधर तुम्हारी चाची की तबीयत बहुत खराब हो गई है. अब डाक्टर के पीछे भागूं या स्टेशन जाऊं,’’ नकवी साहब की चिंता उन के हर हावभाव से झलक रही थी.

सुहास को जैसे उत्साहित होने का बहाना मिल गया. उस के चेहरे पर सेवाभाव तैर उठा. वह बोला, ‘‘आप चाची की चिंता न कीजिए और स्टेशन चले जाइए. मैं डाक्टर को ले कर फौरन पहुंचता हूं और आप के आने तक वहीं रहूंगा.’’

‘‘जियो बेटा, तुम्हारी उम्र लंबी हो,’’ नकवी प्रसन्न हो गए.

सुहास आगे बढ़ा तो अचानक उस के मन में यह विचार कौंधा, ‘आखिर, वह उदास क्यों था? दुकान पर भी काम करता है, यहां भी वही तो करने जा रहा है. फिर इस में ही अधिक खुशी क्यों मिलती है?’ उस के मन ने ही उसे जवाब दिया, ‘यह सेवा है. इस सेवा में लोगों का प्यार और आशीर्वाद मिलता है.’

अपने मन को समझा कर सुहास डाक्टर के साथ नकवी के घर की ओर बढ़ गया.

श्वेता के विवाह को 4-5 दिन ही शेष थे. परीक्षा समाप्त होने के बाद पुरवा सुहास की मां के पास आ जाती थी. कोई कार्य समझ में आता था तो सहायता करती थी. सुहास के भैयाभाभी भी आ गए थे. उन सब को पुरवा का परिचय श्वेता की सहेली कह कर दिया गया था. सुहास को जब सब पुरवा के आसपास मंडराते हुए देखते तो चिढ़ाना शुरू कर देते.

निशांत की पत्नी इला कहती, ‘‘सुहास भैया, लगता है आप की शहनाई भी जल्दी बजवानी पड़ेगी.’’

‘‘मेहरबानी और पूछपूछ,’’ सुहास भी तपाक से कहता.

प्रशांत चिढ़ाता, ‘‘सुना है पुरवा के पिताजी ने ही तुझे व्यापार करवाने का जिम्मा उठाया है.’’

प्रशांत की पत्नी नेहा कहती, ‘‘लड़के को दाना डाल रहे हैं.’’

सुहास ऐसे हंसीमजाक के अवसर पर घबरा कर इधरउधर देखता कि कहीं पुरवा तो आसपास नहीं है. पुरवा समझदार थी. सुहास से दूरदूर ही रहती. वह श्वेता या रजनीबाला के निकट ही रहने का प्रयास करती. रात होते ही सुहास उसे घर छोड़ आता.

सहाय साहब और संगीता गद्गद हो जाते. अकेले में कहते, ‘‘लड़का बहुत अच्छा है. पुरवा के लिए इस से अच्छा वर कहां मिलेगा.’’

‘‘हां,’’ संगीता कहती, ‘‘घर भी अच्छा है. भले लोग हैं.’’

सहाय साहब मंदमंद मुसकराते और सुहास को याद करते हुए कहते, ‘‘अपना बेटा तो परदेस में है, पर जब से सुहास यहां आने लगा है, बेटे की कमी महसूस नहीं होती.’’

सहाय साहब परदेस में बैठे बेटे को याद करते हुए कहते, ‘‘सुनो, पुरवा के विवाह पर अपना मानस तो आएगा न?’’

‘‘क्यों नहीं. बहन की शादी में भी नहीं आएगा तो कब आएगा.’’

संगीता ने एक गहरी सांस भरी और  बोलीं, ‘‘आज अगर पारस जीवित होता तो घर में एक पुत्र रहता.’’

फिर दोनों कुछ पल यादों की गहरी घाटी में भटकते रहे, फिर संगीता ने अचानक कहा, ‘‘इस बार मानस जब आएगा तो उस का भी विवाह कर देंगे.’’

‘‘अरे हां, यह तो बहुत दूर की बात सोची तुम ने,’’ सहाय साहब बोले, ‘‘पर एक चिंता है कि अगर उस ने कोई गोरी मेम पसंद कर ली होगी तब…’’ संगीता भी सोच में डूब गईं.

जब दोनों को लगा कि वातावरण अनायास ही गंभीर हो उठा है तो हंसने का प्रयास करते हुए बोले, ‘‘हम दोनों व्यर्थ ही चिंता में घुल रहे हैं. जब कुछ हो जाएगा तभी चिंता कर लेंगे.’’

‘‘चिंता क्यों जी…’’ संगीता ने हंस कर कहा, ‘‘जिसे ब्याह कर ले आएगा, हम उसे ही आशीर्वाद दे देंगे.’’

देखते ही देखते श्वेता के विवाह का दिन आ गया. वर्मा साहब व रजनीबाला ऊपर से बहुत प्रसन्नता दिखाते हुए भी मन ही मन में बहुत उदास थे. एक ही बेटी है और वह भी अब पराई होने जा रही थी.

निशांत और प्रशांत समझाते, ‘‘पापा, जैसे आप किसी की बेटी को ब्याह कर अपने घर लाए हैं, आज वैसे ही आप की बेटी के पराए घर जाने का समय आ गया है.’’

‘‘हां, पापा,’’ बहुएं कहतीं, ‘‘आप कभी हम लोगों के पास भी आ कर रहा कीजिए.’’

मकरंद वर्मा ने निरंतर हंसने की चेष्टा की थी, पर एकांत में उन्हें अपने आंसू पोंछते हुए श्वेता ने देख ही लिया. वह खुद भी उन से चिपक कर रोने लगी और कहने लगी, ‘‘पापा, इतनी जल्दी क्यों मुझे इस घर से भेज रहे हैं?’’

उन्होंने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरा और समझाते हुए कहा, ‘‘यह घर तो हमेशा तुम्हारा रहेगा बेटा, पर दुनिया की रीति तो निभानी ही पड़ती है.’’

संध्या तक घर रोशनी से जगमगा उठा था. शहनाइयों के स्वर गूंजने लगे थे. सुहास 2 बार पुरवा को फोन कर चुका था. पुरवा के मन में भी बहुत उमंग थी. कहीं न कहीं वह स्वयं को उस घर से निरंतर जुड़ा हुआ पाती थी. उसी उत्साह में उस ने कह दिया, ‘‘भई, शोर क्यों मचा रहे हो. आखिर मेरा भी कुछ रिश्ता है उस घर से, उसी हिसाब से तैयार हो रही हूं.’’

‘‘सच,’’ सुहास की धड़कन बढ़ गई, ‘‘कैसी लग रही हो?’’ उत्सुकतावश उस ने फोन पर ही पूछ लिया.

‘‘हाय…’’ पुरवा ने भी दिल थाम लिया, ‘‘इतना धीरज भी नहीं है. घर आने पर खुद देख लेना.’’

‘‘धीरज ही धीरज है पुरु, पर यह शादी का वातावरण धैर्य रखने दे तब न.’’

दूसरी ओर से फोन रखने की आवाज आई. सुहास चाह कर भी तीसरी बार फोन न कर सका.

पुरवा का मन प्यार के हिंडोले में झूलने लगा. उस के विवाह का मौसम भी आएगा एक दिन. सुहास तब सदा उस के पास रहेगा. तब लुकछिप कर मिलने की कोई जरूरत नहीं रहेगी. उतने बड़े घर में वह अकेली होगी. दोनों भाई दूरदूर रहते हैं. श्वेता जा ही रही है. उस के अधर अनायास ही मुसकराहट में खिल उठे.

पुरवा जब अपने पिता सहाय साहब के साथ वहां पहुंची तो वर्मा साहब के बंगले के बड़े से लान में खूब चहलपहल थी. पूरा बंगला रोशनी से नहाया हुआ था.

वर्मा साहब को बहुत लोगों ने यह सुझाव दिया था कि किसी पांचसितारा होटल में व्यवस्था होनी चाहिए, पर उन का कहना था, यह तो अपने इतने सुंदर बंगले की उपेक्षा करने जैसा होगा. पुरवा ने एक भरपूर दृष्टि पूरी सजावट पर डाली और मन ही मन सोचा, ‘सुहास के पापाजी ने ठीक ही कहा था. कैसी सुंदर है मेरी ससुराल.’

मन की खुशी पुरवा के चेहरे पर दमक रही थी. दरवाजे पर सुहास और निशांत खड़े आने वालों का स्वागत कर रहे थे. सुहास ने पुरवा को देखा तो ठगा सा देखता ही रह गया. थोड़ा सा सजसंवर कर ही पुरवा इतनी सुंदर लग सकती है, इस की तो उस ने कल्पना भी नहीं की थी. कानों में लंबे झुमके, गले में मैचिंग हार, बालों में साड़ी से मिलते रंग का गुलाब का फूल. लगता था जैसे कोई अप्सरा आ खड़ी हुई है.

निशांत ने प्रशंसात्मक दृष्टि से उसे देखते हुए सहाय परिवार का स्वागत किया. श्वेता और रजनीबाला भी उसे देखते ही खिल उठीं. श्वेता ने तो कान में फुसफुसा दिया, ‘‘बहुत सुंदर लग रही हो, भाभी.’’

‘‘हिश…’’ पुरवा लजा गई.

रात्रिभोज समाप्त होने के बाद सहाय परिवार जब वर्मा साहब के पास बिदा लेने पहुंचा तो उन्होंने सहाय साहब की हथेली कस कर दबाते हुए कहा, ‘‘आप आए, बहुत अच्छा लगा.’’

‘‘बेटी की शादी थी, आना ही था,’’ वर्मा साहब ने प्यार से पुरवा की ओर देखा और बोले, ‘‘हमारी बिटिया तो सुबह बिदा हो जाएगी सहाय साहब, पर पुरवा को आने दीजिएगा. आखिर, यह भी तो मेरी ही बेटी है.’’

‘‘आप की ही है,’’ सहाय साहब ने गद्गद स्वर में कहा. बेटी के मातापिता को अचानक घरवर का वरदान मिल जाए तो उन की जो मानसिक स्थिति होती है वही अवस्था सहाय साहब की हो रही थी. सोचा, लोग एडि़यां रगड़रगड़ कर थक जाते हैं, तब भी बेटी के लिए इतना अच्छा घर और वर नहीं ढूंढ़ पाते हैं.

उस दिन के बाद से सुहास का विचित्र हाल हो गया था. पुरवा का सजाधजा रूप उस की आंखों की नींद उड़ा ले गया था पर उसे जल्दी से जल्दी प्राप्त करने का क्या उपाय हो सकता है? उस के मस्तिष्क में बेला का नाम कौंध गया.

-क्रमश:

पुराना याराना नया फसाद : बलात्कार या आपसी सहमति से संबंध

5 अगस्त, 2018 की शाम के करीब साढ़े 7 बजे थे. भोपाल के प्रेमपुरा इलाके के नामी जहांनुमा रिट्रीट की रौनक शवाब पर थी. लोग आजा रहे थे और कुछ लोग वहां इत्मीनान से बैठे बतिया रहे थे. जहांनुमा रिट्रीट फाइवस्टार होटल है, लिहाजा वहां ऐरेगैरे तो ठहरने की सोच भी नहीं पाते. जिन की जेब में खासा पैसा होता है, वही इस शानदार होटल का लुत्फ उठाते हैं.

होटल के लौन में साइकिलिंग करते एक अधेड़ पुरुष और उस के साथ बेहद अंतरंगता से हंसतीबतियाती महिला को साइकिल पर पैडल मारते देख कोई भी यही अंदाजा लगाता कि वे पतिपत्नी हैं और नए जोड़ों की तरह अठखेलियां कर रहे हैं.

इस के पहले दोनों एक साथ कैरम खेलते दिखे थे. इस पर भी होटल स्टाफ को कोई हैरानी नहीं हुई थी क्योंकि सर्वसुविधायुक्त इस लग्जरी होटल में ऐशोआराम के सारे साधन और सहूलियतें मौजूद हैं.

वह पुरुष भरेपूरे चेहरे वाला था और रुआब उस के हावभाव से साफ झलक रहा था. उस की साथी महिला उम्रदराज होते हुए भी युवा लग रही थी. बेइंतहा खूबसूरत और स्मार्ट दिख रही वह महिला पुरुष से बेतकल्लुफी से पेश आ रही थी.

साइकिलिंग करते करते पुरुष गिर पड़ा तो महिला ने तुरंत स्टाफ से फर्स्टएड बौक्स मंगाया और उस की मरहमपट्टी खुद अपने हाथों से की. नजारा देख कर ऐसा लग रहा था कि अगर दूसरे के घाव या चोट अपने ऊपर लेने का कोई प्रावधान होता तो वह महिला उस पुरुष की चोट ले लेती.

उस के चेहरे से चिंता साफ झलक रही थी जबकि पुरुष को कोई खास चोटें नहीं आई थीं. उन की ये नजदीकियां युवा दंपतियों को भी मात कर रही थीं, देखने वाले इस का पूरा लुत्फ उठा रहे थे. इस के उलट एकदूसरे की बातों में डूबे इन दोनों को मानो किसी की परवाह ही नहीं थी.

लगभग 5 घंटे दोनों ने इसी तरह से साथ गुजारे. दरअसल ये दोनों जहांनुमा रिट्रीट में रुकने के लिए आए थे, लेकिन उस समय वहां कोई कमरा खाली नहीं होने की वजह से वक्त गुजार रहे थे. रात 12 बजे के बाद इन्हें रूम नंबर 14 आवंटित हुआ तो दोनों एकदूसरे से सट कर कमरे की तरफ बढ़ गए.

एंट्री रजिस्टर में पुरुष ने अपना नाम पंकज कुमार सिंह, उम्र 42 वर्ष, पता नोएडा, उत्तर प्रदेश और पेशा सरकारी अधिकारी लिखा और साथ आई महिला का नाम नीलिमा (परिवर्तित नाम) दर्ज किया गया लेकिन इन दोनों के बीच का रिश्ता नहीं लिखा गया था.

इस की वजह यह थी कि होटल के एंट्री रजिस्टर में रिलेशन वाला कौलम ही नहीं था. आमतौर पर यह कौलम अब अनिवार्य है लेकिन जहांनुमा रिट्रीट के रजिस्टर में नहीं था तो नहीं था. पंकज ने भारत सरकार द्वारा जारी किया गया पहचान पत्र दिया था तो नीलिमा ने पैन कार्ड दिया था.

दोनों रिसैप्शन की खानापूर्ति कर के कमरे में बंद हो गए. अब तक होटल में आनेजाने वालों की तादाद इक्कादुक्का ही रह गई थी और स्टाफ के लोग भी ऊंघते हुए सोने की तैयारी करने लगे थे.

रात को होटल के बंद कमरों में ठहरे लोग क्या करते हैं, इस से होटल स्टाफ कोई मतलब नहीं रखता और मतलब रखने के कोई माने या वजह है भी नहीं. ऐसा ही पंकज और नीलिमा के मामले में हुआ था जो तकरीबन 5 घंटे तक होटल परिसर में घूमतेफिरते और बतियाते रहे थे.

दोनों ने खाना भी साथ खाया था. दोनों की ही बौडी लैंग्वेज शाही थी तो इस की वजह भी थी कि पंकज उत्तर प्रदेश के वाणिज्य कर विभाग में डिप्टी कमिश्नर थे और नीलिमा इसी विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर के पद पर थी.

रात लगभग साढ़े 3 बजे नीलिमा कमरे से बाहर आई तो परेशानी और बदहवासी उस के चेहरे से साफ झलक रही थी. हालांकि उस के कपड़े अस्तव्यस्त नहीं थे और न ही बाल बिखरे हुए थे, जैसा कि आमतौर पर बलात्कार के मामलों में पीडि़ता के साथ होता है.

बाहर आ कर नीलिमा ने रिसैप्शन पर बैठे कर्मचारी को तुरंत कैब बुलाने को कहा लेकिन वजह पूरी तरह नहीं बताई. टैक्सी आई तो वह बाहर जा कर उस में बैठ गई और ड्राइवर को थाने चलने को कहा. टैक्सी ड्राइवर हैरानी से इस संभ्रांत महिला को देखते हुए उन्हें नजदीकी कमलानगर थाने ले गया जो कोटरा इलाके में है. जहांनुमा रिट्रीट होटल इसी थाने के अंतर्गत आता है.

नीलिमा सीधे थाने के अंदर गई और मौजूद पुलिसकर्मी से रिपोर्ट लिखने को कहा. इतनी रात गए कोई अभिजात्य व सभ्य सी दिखने वाली महिला बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने आए तो थाने में खलबली मचना स्वाभाविक सी बात थी. नीलिमा का परिचय जान कर तो पुलिसकर्मी और भी हैरान रह गए. उन्होंने तुरंत उच्चाधिकारियों को इस हाईप्रोफाइल बलात्कार मामले की खबर दी.

सुबह की रोशनी होने से पहले कमला नगर थाने के टीआई मदनमोहन मालवीय और एसपी (नौर्थ भोपाल) राहुल कुमार लोढ़ा ने विस्तार से नीलिमा से जानकारी ली तो इस अनूठे बलात्कार की कहानी कुछ इस तरह सामने आई.

नीलिमा मूलत: भोपाल की ही रहने वाली है. दरअसल भोपाल के जिस नामी मिशनरी स्कूल में वह पढ़ी थी, उस के पूर्व छात्रों के सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए 3 दिन पहले भोपाल आई थी. तब वह होटल जहांनुमा पैलेस के कमरा नंबर 104 में ठहरी थी. स्कूल का जलसा शानदार रहा था.

कार्यक्रम के दौरान वह ऐसे कई सहपाठियों से मिली थी, जिन से बिछुड़े मुद्दत हो चुकी थी. सालों बाद जब पुराने दोस्त मिलते हैं तो पुरानी कई यादें ताजा हो उठती हैं. तब लोग अपनी नौकरी और पेशे की परेशानियां व तनाव भूल जाते हैं.

ऐसा ही नीलिमा के साथ हुआ था. नीलिमा के लिए भोपाल नया नहीं था, क्यों॑॑॑॑कि यहां उस का बचपन गुजरा था. तयशुदा कार्यक्रम के मुताबिक 5 अगस्त को नीलिमा को दिल्ली जाना था. दिल्ली रवाना होने के लिए जब वह एयरपोर्ट पहुंची तो एकाएक तभी पंकज का फोन आ गया.

पंकज और नीलिमा पुराने परिचित थे. साल 2009 में नीलिमा का चयन वाणिज्यिक कर विभाग में हुआ था, जबकि इसी विभाग में पंकज की नियुक्ति सन 2010 में हुई थी लेकिन पद पंकज का ऊंचा था.

एक ही विभाग में होने के कारण दोनों में परिचय हुआ और जल्द ही अच्छी जानपहचान में बदल गया. शादी की बात या चर्चा हुई या नहीं, यह तो नीलिमा ने पुलिस को नहीं बताया लेकिन चौंका देने वाली बात यह जरूर बताई कि पंकज ने पहले भी उस के साथ न केवल दुष्कर्म किया था बल्कि उस का वीडियो बना कर उसे ब्लैकमेल भी कर रहा था.

हुआ यूं था कि अब से कोई 7 साल पहले पंकज नीलिमा को अपनी मां से मिलाने के बहाने अपने घर ले गया था लेकिन वहां मां नहीं थी, घर खाली था. पंकज की नीयत में खोट थी.

एकांत का फायदा उठा कर उस ने नीलिमा के साथ जबरदस्ती की और वीडियो भी बना लिया. नीलिमा कभी इस बाबत मुंह न खोले, इसलिए उस ने वीडियो वायरल करने की धमकी दी थी.

5 अगस्त को पंकज ने फोन पर अपने किए की माफी मांगने की बात कही. इस पर नीलिमा ने ध्यान नहीं दिया तो उस ने फिर पुराना वीडियो वायरल करने की धमकी दी. नीलिमा की शादी एक बैंककर्मी से हो चुकी थी, जिस से उसे एक बेटी भी थी.

शादी तो पंकज की भी हो चुकी थी लेकिन उस का अपनी पत्नी से तलाक हो चुका था. अगर वाकई पंकज अपनी धमकी पर अमल कर बैठता तो नीलिमा के लिए कई झंझट खड़े हो जाते. इसलिए नीलिमा ने रुकने में कोई बुराई नहीं समझी.

नीलिमा के भोपाल में मौजूद रहने की बात पंकज को पता लग गई थी. पर यह खबर उसे कैसे लगी थी, यह खुलासा तो कहानी लिखे जाने तक नहीं हुआ था. होटल में न जाने कैसे पंकज ने नीलिमा के साथ नजदीकियां हासिल करने में सफलता हासिल कर ली. फिर जो हुआ, वह ऊपर बताया जा चुका है.

मामले पर लीपापोती की कैसीकैसी कोशिशें की गईं, यह पुलिस काररवाई से भी समझ आता है कि पुलिस का एक बयान यह भी सुर्खियों में रहा था कि नीलिमा पहले से जहांनुमा रिट्रीट में ठहरी हुई थी और पंकज भी उसी होटल में रुका था.

हादसे की रात 12 बजे पंकज दरवाजा खुलवा कर जबरन नीलिमा के कमरे में घुस गया और उस ने नीलिमा के साथ बलात्कार किया.

सुबह कोई 3 बजे जैसेतैसे कर के नीलिमा कमरे से बाहर आई और होटल प्रबंधन को अपने साथ हुए हादसे से अवगत कराया.

खबर मिलने पर पुलिस आई और नीलिमा की रिपोर्ट दर्ज की. इस विरोधाभास पर पुलिस की ओर से कोई स्पष्टीकरण जारी न होना भी हैरत की बात थी.

नीलिमा ने बताया कि पंकज ने उस के साथ दुष्कर्म के अलावा मारपीट और गालीगलौज भी की और उस की बेटी को अगवा करने की भी धमकी दी थी.

नीलिमा की शिकायत पर पुलिस ने पंकज के खिलाफ भादंवि की धाराओं 376, 294 और 323 के तहत मामला दर्ज कर के उसे गिरफ्तार कर लिया और मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से उसे जमानत मिल गई. इस के पहले उस का मैडिकल भी कराया गया था.

यह मामला उतना सहज नहीं है जितना लग रहा है. इस की वजह यह है कि रिपोर्ट लिखाते वक्त नीलिमा ने 3 बार अपने बयान बदले थे. इस के अलावा इतने बड़े पद पर होने के बाद भी उस ने ऐसे आदमी पर भरोसा क्यों किया जो उस के साथ पहले भी ज्यादती कर चुका था. तब उस ने उस की रिपोर्ट क्यों दर्ज नहीं कराई. इस के बावजूद भी वह आधी रात को उस के साथ एक कमरे में रुकने और सोने भी चली गई. यह बात भी समझ से परे है.

ऐसे कई झोल इस हाईप्रोफाइल बलात्कार केस में हैं, जो अब शायद ही सामने आएं. वजह पुलिस इस बारे में ज्यादा जानकारियां नहीं दे रही. चर्चा यह भी रही कि दोनों भोपाल में रहते हुए कई अधिकारियों और एक रसूखदार भाजपा नेता से भी मिले थे.

पंकज सिंह से पूछताछ की गई तो पुलिस वालों के रहेसहे होश भी तब उड़ गए. जब यह पता चला कि उस के पिता रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं और एक भाई कलेक्टर और दूसरा भाई आईपीएस अधिकारी है.

आरोपी और पीडि़ता दोनों रसूखदार और पहुंच वाले हों तो पुलिस वालों के लिए एक तरफ कुआं और दूसरी तरफ खाई जैसी स्थिति हो जाती है, इसलिए पुलिस ने मामले को ज्यादा तूल नहीं दिया और बलात्कार का यह मामला आयागया हो गया.

वैसे भी इसे बलात्कार मानने और कहने में हिचकने की अपनी वजहें हैं जिन्हें पंकज सिंह का वकील अदालत में गिनाएगा कि यह सब पीडि़ता की सहमति से हुआ था. क्योंकि वह अपनी मरजी से उस के मुवक्किल के साथ कमरे में ठहरी थी और बलात्कार से बचने के लिए चिल्लाई नहीं थी, फिर इसे बलात्कार कैसे कहा जा सकता है.

रही बात पहले किए गए दुष्कर्म की तो भोपाल पुलिस इस बात को पचाने में कामयाब रही कि ऐसा कोई वीडियो उसे नहीं मिला था.

इस हाईप्रोफाइल बलात्कार केस के चर्चे भोपाल के राजनैतिक और प्रशासनिक गलियारों में है कि देखें कोई नया गुल खिलता है या फिर दोनों पक्षों में अदालत से बाहर समझौता हो जाएगा, जिस की उम्मीद ज्यादा है.

कलंकित रिश्ते : मामी और भांजे के बीच बने अवैध संबंध

उत्तर प्रदेश के जिला औरैया का एक कस्बा है अजीतमल. यहीं का रहने वाला धर्मेंद्र वन विभाग में चौकीदार की नौकरी करता था. उस की शादी मैनपुरी की रहने वाली सुनीता से हुई थी. दोनों ही खुश थे. उन की घरगृहस्थी बड़े आराम से चल रही थी. इसी दौरान सुनीता 2 बच्चों की मां बन गई. इस के बाद तो घर की खुशियों में और इजाफा हो गया. लेकिन ये खुशियां ज्यादा दिनों तक कायम नहीं रह सकीं.

सुनीता बीमार हो गई और बीमारी के चलते एक दिन उस की मौत हो गई. पत्नी की मौत के बाद धर्मेंद्र जब नौकरी पर जाता, घर पर बच्चों की देखभाल करने वाला कोई नहीं रहता था. इस परेशानी को देखते हुए कुछ समय बाद वह अपने दोनों बच्चों को उन की ननिहाल में छोड़ आया और खुद रहने के लिए अपने मामा मुकेश के यहां चला गया.

मुकेश जिला मैनपुरी के गांव फैजपुर गढि़या में रहता था. वह एक फैक्ट्री में काम करता था. उस की शादी रीना से हुई थी, जिस से एक बेटा भी था. चूंकि धर्मेंद्र मुकेश का सगा भांजा था, इसलिए मुकेश ने उसे अपने घर के सदस्य की तरह रखा.

पत्नी की मौत के बाद धर्मेंद्र एकदम खोयाखोया सा रहता था. मामा के यहां रह कर वह एकाकी जीवन काट रहा था. धीरेधीरे माया ने उस की पीड़ा को समझा और वह उस का मन लगाने की कोशिश करने लगा.

धीरेधीरे वह घुलमिल कर रहने लगा तो उस की बोरियत दूर हो गई. साथ ही वह पत्नी की मौत का गम भी भूल गया. मामाभांजे दोनों अपनेअपने काम से लौट कर आते तो साथ मिल कर इधरउधर की खूब बातें करते थे.

दोनों की आपस में खूब बनती थी. धर्मेंद्र अपनी तनख्वाह से घर खर्च के कुछ पैसे अपनी मामी को दे देता था, जिस से घर का खर्च ठीक से चलने लगा. इसी बीच रीना एक और बेटे की मां बन गई, जिस का नाम प्रियांशु रखा गया.

28 साल की मामी रीना से धर्मेंद्र की खूब पटती थी. मामीभांजे के बीच हंसीठिठोली भी होती थी. धर्मेंद्र को मामी की सुंदरता और अल्हड़पन बहुत भाता था. कभीकभी वह उसे एकटक प्यारभरी नजरों से देखा करता था. अपनी ओर टकटकी लगाए देखते समय जब कभी रीना की नजरें उस से टकरा जातीं तो दोनों मुसकरा देते थे. धर्मेंद्र रीना के पति मुकेश से ज्यादा सुंदर और अच्छी कदकाठी का था. इस से रीना का झुकाव धर्मेंद्र के प्रति बढ़ता गया.

धर्मेंद्र रीना को दिल ही दिल चाहने लगा.  चूंकि वे मामीभांजा थे, इसलिए दोनों के साथसाथ रहने पर मुकेश को कोई शक नहीं होता था. मुकेश सीधेसरल स्वभाव का था, पत्नी और भांजे के बीच क्या खिचड़ी पक रही है, इस की मुकेश को कोई जानकारी नहीं थी. समय का चक्र घूमता रहा, धीरेधीरे दोनों एकदूसरे के करीब आते गए.

एक दिन धर्मेंद्र ने जब मजाकमजाक में मामी को बांहों में भर लिया तो रीना ने विरोध नहीं किया, बल्कि उस ने दोनों हाथों से धर्मेंद्र को जकड़ लिया. धर्मेंद्र ने इस मूक आमंत्रण का फायदा उठाते हुए उस पर चुंबनों की झड़ी लगा दी. इस के बाद अपनी मर्यादाओं को लांघते हुए दोनों ने अपनी हसरतें पूरी कीं.

धर्मेंद्र चूंकि वहीं रहता था, इसलिए कुछ दिनों तक तो दोनों का खेल इसी तरह से चलता रहा. मुकेश को पता तक नहीं चला कि उस के पीछे घर में क्या हो रहा है. एक दिन मुकेश अचानक घर आया तो उस ने दोनों को आपत्तिजनक अवस्था में देख लिया. लेकिन मौके की नजाकत को भांपते हुए रीना और धर्मेंद्र ने उस से माफी मांग ली.

मुकेश ने रहम करते हुए दोनों से कुछ नहीं कहा और उन्हें माफ कर दिया. इस के कुछ दिनों तक तो रीना और धर्मेंद्र ठीक रहे, लेकिन मौका मिलने पर वे अपनी हसरतें पूरी कर लेते थे. मामा के सीधेपन की वजह से धर्मेंद्र की हिम्मत बढ़ गई थी. अब धर्मेंद्र अपनी मामी रीना से शादी करने के ख्वाब देखने लगा.

एक दिन उस ने अपने मन की बात रीना से कही. चूंकि रीना भी उसे प्यार करती थी, इसलिए 2 बच्चों की मां होने के बावजूद वह भांजे से शादी करने के लिए तैयार हो गई. किसी तरह शादी वाली बात मुकेश को पता चली तो वह परेशान हो गया.

उस ने इस का विरोध किया. लेकिन जब रीना नहीं मानी तो उस ने रीना की पिटाई कर दी. रीना के सिर पर तो इश्क का जुनून सवार था, ऐसे में वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं थी. लेकिन मुकेश के लिए यह बड़ी बदनामी वाली बात थी.

थकहार कर मुकेश ने गांव में पंचायत बैठाई. रीना ने पंचायत में भी स्पष्ट रूप से कह दिया कि वह पति मुकेश को छोड़ सकती है लेकिन धर्मेंद्र को नहीं छोड़ेगी. वह उस से शादी जरूर करेगी. रीना की जिद के आगे मुकेश व उस के घर वालों को झुकना पड़ा.

घर वालों की इस रजामंदी के बाद पंचायत में तय हुआ कि रीना मुकेश और धर्मेंद्र दोनों की पत्नी के रूप में रहेगी. इस के बाद रीना और धर्मेंद्र ने कोर्टमैरिज कर ली. शादी करने के बाद भी रीना मुकेश के घर में ही रहती रही. यह बात लगभग 7 साल पहले की है.

इस के बाद रीना अपने पहले पति मुकेश और भांजे से दूसरा पति बने धर्मेंद्र के साथ दोनों की पत्नी बन कर रहने लगी. समय धीरेधीरे बीतने लगा. रीना दोनों पतियों के दिलों पर राज करती थी. वह चाहती थी कि उन दोनों से वह ज्यादा कमाई कराए. क्योंकि नौकरी से तो बस बंधीबधाई तनख्वाह मिलती थी, जिस से रीना संतुष्ट नहीं थी.

एक दिन धर्मेंद्र, मुकेश व रीना ने बैठ कर तय किया कि क्यों न यहां के बजाय शिकोहाबाद जा कर कोई दूसरा धंधा शुरू किया जाए. शिकोहाबाद में कबाड़ का व्यवसाय काफी बड़े पैमाने पर होता है, इसलिए उन्होंने वहां जा कर कबाड़ का काम करने का फैसला लिया. करीब ढाई साल पहले मुकेश और धर्मेंद्र गांव से जिला फिरोजाबाद के शहर शिकोहाबाद चले गए. उन्होंने लक्ष्मीनगर मोहल्ले में प्रमोद कुमार का मकान किराए पर ले लिया.

फिर वे पत्नी रीना व बच्चों को भी शिकोहाबाद ले आए. यहां रह कर मुकेश और धर्मेंद्र मिल कर कबाड़ का कारोबार करने लगे. इसी दौरान रीना एक और बेटे की मां बन गई. धर्मेंद्र भले ही रीना का पति बन गया था, लेकिन वह अपने बच्चों से उसे भैया ही कहलवाती थी.

रीना दोनों पतियों के साथ सामंजस्य बना कर रह रही थी. दोनों ही उस से खुश थे. कहते हैं, समय बहुत बलवान होता है, उस के आगे किसी की नहीं चलती.

इस परिवार में भी यही हुआ. जब दोनों का काम अच्छा चलने लगा, आमदनी बढ़ी तो धर्मेंद्र शराब पीने लगा. रीना इस का विरोध करती तो धर्मेंद्र उसे डांट देता. कभीकभी वह उस पर हाथ भी उठा देता था.

रीना अब उस से डरीडरी सी रहने लगी. शराब की लत जब बढ़ गई तो धर्मेंद्र ने काम पर जाना भी बंद कर दिया. वह दिन भर घर पर रह कर शराब पीता रहता. लड़झगड़ कर वह रीना से पैसे ले लेता था. जब रीना पैसे नहीं देती तो वह घर में रखे पैसे चुरा लेता था. एक दिन तो वह रीना की सोने की झुमकी और चांदी की पायल तक चुरा कर ले गया. इस पर रीना और मुकेश ने उसे घर से निकाल दिया.

2 महीने धर्मेंद्र इधरउधर भटकता रहा. बाद में वह रीना के पास ही लौट आया. उस ने मुकेश और रीना से शराब न पीने तथा ढंग से चलने का वादा किया. इस पर रीना ने उस पर दया दिखाते हुए उसे फिर से घर में रख लिया.

मकान मालिक प्रमोद कुमार और वहां रहने वाले अन्य किराएदारों ने रीना से धर्मेंद्र को फिर से साथ रखने को मना किया, क्योंकि वह आए दिन घर में झगड़ता रहता था. इस पर रीना ने कहा कि वह अकेला कहां धक्के खाएगा.

थोड़े दिन सब कुछ ठीक रहा, लेकिन धर्मेंद्र को शराब की जो लत लग गई थी, उस के चलते वह फिर से शराब पीने लगा. रीना ने धर्मेंद्र को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उस ने अपनी आदतों में कोई सुधार नहीं किया. इस से घर में आए दिन लड़ाई होने लगी.

10 अगस्त, 2018 की रात करीब साढ़े 8 बजे की बात है. मुकेश के कमरे से अचानक शोरशराबे की आवाज आने लगी. बच्चे चिल्ला रहे थे, ‘मम्मी मर गईं, मम्मी मर गईं.’

शोर सुन कर प्रमोद के मकान के नीचे के हिस्से में रह रहे मकान मालिक प्रमोद कुमार व उन के परिवार के लोगों को लगा कि शायद खाना बनाते समय कमरे में आग वगैरह लग गई है. इसलिए वे पानी की बाल्टी ले कर ऊपर पहुंचे.

ऊपर पहुंच कर उन्होंने जो नजारा देखा, उसे देख कर आंखें फटी की फटी रह गईं. रीना कमरे की देहरी पर मरी पड़ी थी, उस के सिर व चेहरे से खून बह कर कमरे में फैल गया. पता चला कि रीना के दूसरे पति धर्मेंद्र ने ही रीना की हत्या की थी.

हत्या करने के बाद जब धर्मेंद्र भागने को था, तभी अन्य किराएदारों ने उसे पकड़ लिया था. वह उसे वहीं दबोचे खड़े रहे. प्रमोद ने इस की सूचना पुलिस को दे दी.

थानाप्रभारी विजय कुमार गौतम, सीओ संजय रेड्डी मय पुलिस टीम के कुछ ही देर में वहां पहुंच गए. लोगों ने पकड़े गए हत्यारोपी धर्मेंद्र को पुलिस के हवाले कर दिया. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया.

मृतका के बड़े बेटे सनी ने बताया कि हम लोग अंदर टीवी देख रहे थे. मम्मी ने पापा से खाना खाने के लिए कहा. इतने में भैया (धर्मेंद्र) ने अंदर ले जा कर कुल्हाड़ी से मम्मी को मार डाला. उस ने बताया कि दोपहरी में भैया ने कहा था कि लाओ कुल्हाड़ी पर धार लगा लें. लकडि़यां काट कर लाएंगे.

पुलिस ने जब धर्मेंद्र से पूछताछ की तो पता चला कि घटना के समय रीना कमरे के बाहर चूल्हे पर रोटी बना रही थी और उस के तीनों बच्चे खाना खा कर कमरे में टीवी देख रहे थे. कमरे में ही मुकेश चारपाई पर लेटा हुआ था.

रात को अचानक धर्मेंद्र नशे में सीढि़यां चढ़ कर ऊपर आया. रीना धर्मेंद्र से कुछ नहीं बोली, उस ने अपने बेटे बेटे सनी को आवाज देते हुए कहा, ‘‘पापा से कह दे, खाना खा लें.’’

रीना द्वारा धर्मेंद्र से खाना खाने के लिए न कहने से धर्मेंद्र बौखला गया. उस के तनबदन में आग लग गई. उस ने रीना के साथ गालीगलौज करते हुए कहा कि हम से खाना खाने के लिए नहीं पूछा. अभी खबर लेता हूं तेरी. कह कर वह गुस्से में कमरे में घुसा जहां बच्चों के साथ मुकेश मौजूद था.

उस ने कमरे में रखी कुल्हाड़ी उठाई और चूल्हे पर रोटी बना रही रीना के बाल पकड़ कर उसे कमरे की देहरी पर ले जा कर लिटा दिया. फिर उस के सिर व चेहरे पर कई प्रहार कर उस की नृशंस हत्या कर दी. कमरे में चारों ओर खून फैल गया. अपनी आंखों के सामने मां को मारते देख बच्चे चिल्लाए, ‘‘मम्मी मर गई, मम्मी मर गई.’’

शोर सुन कर अन्य किराएदार वहां आ गए. धर्मेंद्र के हाथ में खून सनी कुल्हाड़ी देख कर वे सारा माजरा समझ गए. किसी तरह किराएदारों ने धर्मेंद्र को दबोच लिया, जिसे बाद में उन्होंने पुलिस के हवाले कर दिया.

पुलिस ने मुकेश की तहरीर पर धर्मेंद्र के खिलाफ हत्या की रिपोर्ट दर्ज कर के अगले दिन उसे न्यायालय में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

अपनी भावनाओं पर अंकुश न लगा पाने वाली रीना रिश्तों की मर्यादा को लांघ गई थी. वह धर्मेंद्र के प्यार में इस कदर डूबी कि उसे अपने पति, बच्चों व समाज तक की परवाह नहीं रही. उस ने अपने भांजे से अवैध संबंध बनाने के बाद उस से कोर्टमैरिज तक कर ली. इस की कीमत उसे अपनी जान दे कर चुकानी पड़ी.

   —कथा पुलिस सूत्रों व जनचर्चा पर आधारित

अपने घर को दें मौडर्न लुक

आप फर्नीचर की दुनिया के कुछ खास डिजाइंस से भी अपने घर को मौडर्न लुक दे सकती हैं. आइए बताते हैं.

रेट्रो फर्नीचर – हालांकि इस डिजाइन में कुछ बदलाव किए गए हैं. इनके पुराने लुक को मौडर्न करने की कोशिश की गई है. जैसे कि पुरानी कौफी टेबल के ग्लास को बदल कर उसे नए पैटर्न में शामिल कर दिया गया. फर्नीचर के सभी पीसेस जैसे-चेयर, सोफा, डिस्ट्रेस्ड फर्नीचर के साथ भी यही तरीका अपनाया जा रहा है.

यह पसंद पर भी निर्भर करता है कि आपको ओल्ड स्टाइल फर्नीचर आइटम अच्छे लगते हैं या बिलकुल लेटेस्ट. ओल्ड फर्नीचर आपके घर को औथेंटिक लुक देता है. यदि इसके साथ ब्राइट कार्पेट, कलरफुल पिलोज को भी जोड दिया जाए, तो घर जवान लगता है. सिंपल डिजाइन पसंद करने वालों के लिए कौमन या और्डिनरी फर्नीचर हमेशा कुछ-न-कुछ बदलाव के साथ बाजार में मौजूद रहते हैं.

राजस्थान में कांग्रेस के हाथ सत्ता : वसुंधरा सरकार के निकम्मेपन का नतीजा

राजस्थान में वसुंधरा राजे सरकार की कथित विकास की गंगा में भाजपा की सत्ता बह गई. पहले से लग रहा था कि 5-5 साल सरकार बदलने की परंपरा इस बार भी निभाई जाएगी. वही हुआ. राजस्थान में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिल गया.

विकास के लाख दावों के बावजूद वसुंधरा राजे सरकार को मतदाताओं ने बेदखल कर दिया, लेकिन यह विपक्ष में बैठी कांग्रेस का कोई कमाल नहीं है, वसुंधरा राजे सरकार के अपने ही निकम्मेपन का नतीजा है.

राज्य की 200 विधानसभा सीटों में से 199 सीटों पर 7 दिसंबर को चुनाव हुए थे. कुल 74.2 प्रतिशत मतदान हुआ. प्रदेश में कुल 2, 294 उम्मीदवार चुनावी मैदान में थे. इस चुनाव में कुल 4,74,37,761 मतदाता थे. इन में से 2,47,22,365 पुरुष और 2,27,15,396 महिला मतदाता थे. पहली बार मतदान करने वाले युवाओं की संख्या 20, 20, 156 थी.

कांग्रेस शुरू से ही उत्साहित थी. चुनावों की घोषणा होते ही अखिल भारतीय कांग्रेस के संगठन महासचिव और दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके अशोक गहलोत समेत कई केंद्रीय नेता प्रचार में जुट गए. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट पहले से ही पार्टी के लिए संघर्ष कर रहे थे.

हालांकि टिकट बंटवारे को ले कर दोनों पार्टियों में कई नेता बगावत कर बैठे और निर्दलीय के तौर पर मैदान में उतरे.

2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को रिकार्ड तोड़ सफलता मिली थी. उसे 163 सीटों पर जीत प्राप्त हुई. इस के विपरीत कांग्रेस को केवल 21 सीटें की मिल पाई थीं. इन के अलावा बसपा को 3 तथा 12 सीटें अन्य के हाथ आईं.

हालांकि बीच में हुए उपचुनावों के बाद मौजूदा समय में भाजपा के पास 160, कांग्रेस के 25, बसपा के दो रह गए थे.

पिछले साल हुए दो लोकसभा सीटों के उपचुनाव में अजमेर और अलवर भी भाजपा के हाथ से निकल गए. इस का श्रेय प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सचिन पायलट को दिया गया.

एग्जिट पोल की बात करें तो भाजपा के हाथ से सत्ता निकलती दिखाई गई. केंद्र में बैठै नेताओं को भी इस बात का एहसास पहले से था कि राजस्थान में उन्हें हार का सामना करना पड़ सकता है, इसलिए केंद्रीय नेताओं ने यहां ज्यादा ध्यान नहीं दिया. हालांकि बाद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कुछ रैलियां औैर सभाएं कीं पर उन का कोई ज्यादा असर नहीं पड़ा.

प्रदेश के मतदाता राजे सरकार के कामकाज से नाखुश थे. मुख्यमंत्री वसुंधरा खुद एक अलग रियासत की तरह प्रदेश में शासन करती दिखाई देती थीं. उन का अपनी पार्टी की केंद्र सरकार और उस के नेताओं से कभी कोई तालमेल नहीं नजर आया. इस के विपरीत मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों के साथ केंद्र का अच्छा सामंजस्य देखने को मिलता था. इन प्रदेशों ने केंद्र से अपने लिए कई छोटीबड़ी परियोजनाओं के लिए पैसा लिया और काम शुरू कराया, पर राजस्थान की मुख्यमंत्री के ऊपर स्वभावत: अपना पुराना राजशाही अहंकार हावी दिखाई देता था.

प्रदेश में इस बार धर्म, मंदिर निर्माण जैसे मुद्दे अधिक हावी नहीं रहे लेकिन संघ और धर्म से व्यापार चलाने वालों ने कोशिशें जरूर कीं. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे भी मंदिरों की परिक्रमा लगा कर धर्मांध मतदाताओं को लुभाने का प्रयास किया था. आम आदमी से ले कर युवा बेरोजगार, सरकारी कर्मचारी, किसान, मजदूर और छोटा व्यापारी वर्ग तक राज्य की भाजपा सरकार को कोसता नजर आता था. इसी का नतीजा है कि भाजपा को राज्य खोना पड़ा.

रिजर्व बैंक के गवर्नर ने क्यों दिया इस्तीफा

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल के इस्तीफे पर सरकार भले ही कुछ कहे, पर यह रिजर्व बैंक और सरकार के बीच आपसी टकराव का परिणाम है. संदेश यही जा रहा है कि सरकार स्वायत्त संस्थाओं पर हमले कर रही है.

कुछ समय से पटेल के इस्तीफे के कयास लगाए जा रहे थे. पटेल रिजर्व बैंक के कामकाज में सरकार के हस्तक्षेप से खुश नहीं थे. रिजर्व बैंक की अपनी एक अलग अहमियत है, बिना सरकार के निर्देशों के अलग भूमिका है पर सरकार अपने तरीके से बैंक को चलाना चाहती है.

पटेल के इस्तीफे की बड़ी वजह बैंकों का कर्ज लौटाने में डिफाल्टरों का दबाव माना जाता है. आरबीआई ने फरवरी में नए नियम जारी किए थे. इस के अनुसार कर्ज लौटाने में एक दिन की देरी होने पर बैंकों को कंपनी के खिलाफ रिजौल्यूशन प्रक्रिया शुरू करनी थी. बिजली और शुगर लौबी ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां उन्हें स्टे मिल गया था. पटेल दिवालिया काररवाई के पक्ष में थे जबकि सरकार ऐसा नहीं चाहती थी.

दूसरा बड़ा कारण रिजर्व फंड को ले कर है. सरकार चाहती है कि रिजर्व फंड का बड़ा हिस्सा सरकार को मिल जाए. इस के अलावा कच्चे तेल के बढ़ते दाम, रुपए की कीमत और स्टाक मार्केट में गिरावट जैसे मामलों में भी सरकार लगातार रिजर्व बैंक पर दबाव बना रही थी.

हालांकि उर्जित पटेल को एनडीए सरकार ही ले कर आई थी लेकिन उन का सरकार के साथ जल्दी ही तनाव शुरू हो गया. वह सितंबर 2016 में गवर्नर बनाए गए थे. नवंबर में प्रधानमंत्री ने नोटबंदी की घोषणा कर दी. गवर्नर ने नोटबंदी पर सरकार की हर बात मान ली थी. खबरें थीं कि पटेल पर्याप्त संख्या में नई करेंसी छापने के बाद नोटबंदी में पक्ष में थे. इस फैसले से अचानक 86 प्रतिशत करेंसी चलन से बाहर हो गई. उर्जित पटेल से पहले गवर्नर रहे रघुराम राजन ने नोटबंदी का विरोध किया था.

नोटबंदी के बाद पटेल ने बैंकों को मजबूत बनाने पर फोकस किया. एनपीए ज्यादा होने के कारण उन्होंने 21 में से 1 सरकारी बैंकों को तुरंत सुधार की श्रेणी में डाल दिया. सरकार ने पहले तो इस का समर्थन किया पर बाद में वह ढील देने की बात कहने लगी. रिजर्व बैंक ढील देने के पक्ष में नहीं था.

लंदन स्कूल औफ इकोनोमिक्स, औक्सफोर्ड और येल यूनिवर्सिटी से पढे उर्जित पटेल जनवरी 2013 में आरबीआई के डिप्टी गवर्नर बनाए गए थे. वह नैरोबी की एक बड़ी बिजनैस फैमिली से हैं और गवर्नर बनाए जाने से पहले उन्होंने भारत की नागरिकता ली थी.

सरकार एक के बाद एक अर्थशास्त्री खोती जा रही है. अरविंद सुब्रह्मण्यम, अरविंद पनगाडि़या, रघुराम राजन सरकार के हस्तक्षेप के चलते चले गए. दिक्कत यह है कि अर्थव्यवस्था का प्रबंधक अर्थशास्त्री अपने तरीके से करना जानते हैं जबकि सरकार अपने राजनीतिक नफानुकसान के हिसाब से काम करना और कराना चाहती है लेकिन राजनीतिक दलों के सामने रिजर्व बैंक जैसे संस्थानों की स्वायत्तता से बड़ा सवाल अपना राजनीतिक स्वार्थ रहता है.

सरकार के पास नेता तो बहुत हैं पर अर्थशास्त्रियों का अभाव है. उर्जित पटेल के इस्तीफे से सरकार की छवि को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नुकसान तो होगा ही, भारतीय राजनीति में विपक्ष को भी बड़ा मुद्दा मिल गया. वह भी ऐसे वक्त जब संसद का अधिवेशन शुरू हो रहा है और लोकसभा के चुनाव आगे हैं. देश की अर्थव्यवस्था ही नहीं, आम आदमी की हालत बदतर स्थिति की ओर जा रही है.

छत्तीसगढ़ : रामलला के ननिहाल से भी राम भक्तों की विदाई

उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने छत्तीसगढ़ के चुनाव प्रचार में एक बात पर खासा जोर दिया था कि छत्तीसगढ़ तो राम चन्द्र की ननिहाल है, यहां तो उनका मंदिर बनना ही चाहिए. इस और ऐसी कई बेतुकी बातों का आदिवासी बाहुल्य इस राज्य की समस्याओं से कोई लेना देना नहीं था जिनसे न तो धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के किसानों की समस्याएं हल हो रहीं थीं और न ही आदिवासियों की घोषित बदहाली दूर हो रही थी. उल्टे लोगों के मन में यह डर जरूर बैठ गया था कि कहीं भाजपा यहां भी मंदिर राग अलापना शुरू न कर दे, क्योंकि धरम करम की राजनीति से समस्याएं हल नहीं होतीं उल्टे बढ़ती ही हैं.

लिहाजा 15 साल के मुख्यमंत्री रमन सिंह से नाउम्मीद लोग उनसे इतने दूर चले गए कि पिछले चुनाव में 90 में से 49 सीट ले जाने बाली भाजपा 20 का आंकड़ा छूने भी तरस रही है, दूसरी तरफ कांग्रेस 65 से ज्यादा रिकार्ड सीटें ले जा रही है.

छत्तीसगढ़ का परिणाम बेहद चौंका देने वाला है, वजह हिन्दी भाषी राज्यों मध्यप्रदेश और राजस्थान के मुकाबले यहां कांटे की लड़ाई में त्रिशंकु विधानसभा के आसार और अंदाजे व्यक्त किए जा रहे थे, लेकिन हैरतअंगेज तरीके से कांग्रेस ने भाजपा को सत्ता से खारिज करने में कामयाबी हासिल कर ली है और कांग्रेस से अलग होकर अपनी नई पार्टी बना बैठे अजीत जोगी को भी एहसास करा दिया है कि अब वोटर सधे और तजुर्बेकार हाथों में ही सत्ता देना बेहतर समझ रहा है, बजाय कोई नया जोखिम उठाने के.

गौरतलब है कि आईएएस अधिकारी रहे अजित जोगी ने अपनी छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस बनाने के बाद बसपा से गठबंधन किया था. बसपा प्रमुख मायावती ने अजित जोगी को मुख्यमंत्री घोषित किया था. उम्मीद की जा रही थी कि जोगी-माया कुछ नया कर पाएंगे, लेकिन नतीजों में अजित जोगी की जनता कांग्रेस तो थोड़ी बहुत है पर बसपा को कोई फायदा नहीं हुआ है. अजीत जोगी का यह खयाल खयाली पुलाव साबित हुआ कि जनता रमन सिंह सरकार से छुटकारा पाने उन्हें फिर से मौका देगी.

बदलाव का मन बना चुकी जनता ने कांग्रेस को मौका दिया, तो इसके अपने अलग माने हैं. इसमें कोई शक नहीं कि छत्तीसगढ़ में भी सत्ता विरोधी लहर थी. 15 साल से काबिज भाजपा कुछ खास नहीं कर पाई. इससे ज्यादा अहम बात यह थी कि आरएसएस और दूसरे हिंदूवादी संगठन आदिवासियों की जिंदगी में खलल डालने लगे थे. इस पर नीम चढ़े करेले सी बातें आदित्यनाथ सरीखे कट्टर हिंदूवादियों ने कर रमन सिंह की विदाई डोली उठवा दी, जिनके रमन सिंह ने न केवल पैर पड़े थे बल्कि पूरे विधिविधान से देवताओं की तरह उनका पूजा पाठ किया था.

इस नजारे से लोगों को समझ आ गया था कि अगर भाजपा को चौथी बार भी सत्ता दी तो फिर राज्य में अगले पांच साल काम धाम कुछ नहीं होगा, बल्कि इसी तरह घंटे घड़ियाल बजते रहेंगे, जिससे उनकी जिंदगी और बदतर होती जाएगी. लिहाजा वोटर ने बुद्धिमानी दिखाते फैसला लिया और अजीत जोगी और बसपा गठबंधन को कमजोर विकल्प मानते कांग्रेस को गद्दी सौंप दी.

इलाकेवार नतीजे देखें तो साफ लग रहा है कि भाजपा राज से खुश या संतुष्ट कोई नहीं है. राजधानी रायपुर में भी भाजपा का सूपड़ा साफ हो गया है और नक्सलियों के गढ़ बस्तर में तो वह पानी भी नहीं मांग पाई, जहां की 19 सीटें सरकार बनाने में अहम रोल निभाती हैं. इस दफा नक्सलियों ने खुलेआम हिंसा की थी और चुनावी प्रक्रिया में भी अड़ंगे डाले थे. नक्सलियों ने पहली दफा बस्तर में हिंदूवादियों के खिलाफ मोर्चा खोला था, जिसका असर बस्तर के आदिवासियों पर यह पड़ा कि उन्होंने भाजपा से तौबा कर ली. तेजी से यह हवा बस्तर में अंदरूनी तौर पर उड़ी कि भाजपा आदिवासियों का हिंदूकरण करेगी, जबकि आदिवासी हिन्दू नहीं हैं और ये तथाकथित हिन्दू ही सदियों से उनका शोषण कर रहे हैं.

पर बात सिर्फ हिन्दुत्व की ही नहीं थी, बल्कि युवाओं की भी थी जो रोजगार के लिए तरस रहे हैं. आदिवासियों की शिक्षित होती पीढ़ी ने भी बारीकी से यह समझा था कि भाजपा सरकार वादों और उम्मीद के मुताबिक उन्हें रोजगार मुहैया नहीं करा पा रही है. उल्टे पूंजीपतियों के हाथों प्राकृतिक संसाधनों को बेचती जा रही है जिससे फायदा चंद ऊंची जाति वालों को हो रहा है. बेरोजगारी का मुद्दा शहरों में भी प्रमुख रहा था.

कांग्रेस यहां उतनी मजबूत स्थिति में थी नहीं, जितनी नतीजों में दिखाई दे रही है. उसने दूसरे राज्यों की तरह यहां भी मुख्यमंत्री पद के लिए कोई चेहरा पेश नहीं किया था, लेकिन पुराने दिग्गज कांग्रेसी चरणदास महंत को चुनाव लड़ाकर यह संदेशा जरूर दे दिया था कि वह सत्ता विरोधी लहर जो अब आंधी साबित हो रही है को भुनाने का मौका चूकना नहीं चाहती, जिसका फायदा उसे मिला भी.

शहरी इलाकों में भी भाजपा को उम्मीद के मुताबिक कामयाबी नहीं मिली तो इसके एक बड़ी वजह कर्मचारियों की नाराजी और व्यापारियों में नोट बंदी और जीएसटी को लेकर पसरी भड़ास है, जिसे लेकर बिलासपुर के एक व्यापारी जीएस छाबड़ा का कहना है कि लोगों का भरोसा नरेंद्र मोदी और रमन सिंह दोनों पर से उठा है, जिनके बेतुके फैसलों ने रोजमरराई जिंदगी दुश्वार कर दी है. छाबड़ा के मुताबिक 2019 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा को आज के से नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहना चाहिए. यह सोचना गलतफहमी है कि छत्तीसगढ़ के लोग नरेंद्र मोदी को विकल्पहीन मानते हैं.

भाजपा की फजीहत और दुर्गति से यह बात साबित भी हो रही है, जिसने भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की चुनाव जिताऊ इमेज के चिथड़े उड़ाकर रख दिये हैं और यह चेतावनी भी दे दी है कि लोगों को रामलला के नहिहाल, मायके या ससुराल के भजन कीर्तन से ज्यादा खुद से जुड़े जमीनी मुद्दों से ज्यादा सरोकार है.

इस अभिनेत्री का हौट फोटोशूट देख लोगों का हुआ बुरा हाल

इन दिनों कई टीवी एक्ट्रेस अपनी हौटनेस का जलवा दिखा रहीं हैं. टीवी के पौपुलर शो ‘खतरों के खिलाड़ी’ में अपने जलवे दिखा चुकी मोनिका डोगरा ने हाल ही में एक बहुत ही बेहतरीन फोटोशूट करवाया है, जो काफी हौट लग रहा है.

इस फोटोशूट में वह बहुत ही हौट और बेबाक अंदाज में नजर आ रही हैं, जी हां, वह आए दिन अपने बोल्ड और हौट अंदाज से सभी को हैरान करती हैं, और इस बार भी उन्होंने अपने अंदाज से सभी को हैरान कर दिया है.

आप सभी को बता दें कि मोनिका का यह अंदाज सभी को खूब पसंद आ रहा है और उनका यह लेटेस्ट फोटोशूट भी सभी को दीवाना बना रहा है. इस फोटोशूट में मोनिका बहुत ही बोल्ड अवतार में दिख रहीं हैं.

इस फोटोशूट की तस्वीर शेयर कर उन्होंने इंस्टा पर तहलका मचा दिया है, वहीं इस तस्वीर में उन्होंने काफी शार्ट ड्रेस पहन रखी हैं.

मोनिका कुछ समय पहले अपने टौपलेस फोटो के कारण भी चर्चाओं में आईं थीं और एक बार फिर वह अपनी इन तस्वीरों के कारण सुर्खियों में आ गईं हैं. इन तस्वीरों में उनका हौट अंदाज साफ नजर आ रहा है.

मोनिका की ऐसी फोटोज सभी को पसंद आती हैं और उनकी तस्वीरों पर लोग लगातार कमेंट्स भी करते हैं. मोनिका के इंस्टाग्राम पर लाखो फौलोअर्स हैं, जो उनकी हर तस्वीर पर शानदार कमेंट्स करते रहते हैं.

आखिर कहां रख दिया आपने अपना फोन, बस ताली बजाइये पता चल जाएगा

कई बार ऐसा होता है कि हम अपने फोन को घर पर या कहीं भी रखकर भूल जाते हैं. इस स्थिति में कई बार फोन ऐसी जगह रखा होता है कि फोन की साउंड को तो सुना जा सकता है लेकिन दिखाई नहीं देता. फोन अगर साइलेंट मोड पर हो तो फिर उस पर कौल करने का भी कोई फायदा नहीं होता है. दरअसल हम आपको आज ऐसी ही ट्रिक के बारे में बताने जा रहे हैं जिससे आप अपने फोन को आसानी से ढूंढ सकते हैं. अगर आपका फोन साइलेंट मोड पर है तब भी इसे आसानी से खोजा जा सकता है. आप अपने फोन को ताली बजाकर या फिर सीटी बजाकर ढूंढ सकते हैं.

Whistle Phone Finder

इस ऐप को गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है. इस ऐप के जरिए आप सीटी बजाकर अपना फोन ढूंढ सकते हैं. यह सीटी को डिटेक्ट कर काम करने लगता है. इसे ऐक्टीवेट करने के बाद फोन गुम हो जाने पर जैसे ही यूजर सीटी बजाएगा, फोन रिंग होने लगेगा.

technology

अगर आपने सेटिंग में बदलाव किया है तो फोन का वाइब्रेशन व फ्लैश औन हो जाएगा. मान लीजिए आप कार या बाइक राइड कर रहे हैं और अचानक आपको पता करना है कि फोन आपकी जेब में है या नहीं, तो सीटी बजाकर वाइब्रेशन से जान सकते हैं. वहीं अगर आप घर पर हैं या अंधेरे में हैं तो फ्लैश को औन रखना सुविधाजनक रहेगा.

Clap to Find

इस ऐप को गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है. इसके नाम से अंदाजा लगाया जा सकता है, यह ऐप ताली की आवाज पहचानकर फोन खोजने में सक्षम है. यह ऐप यूजर की ताली से सक्रिय हो जाता है और पता चल जाता है कि फोन कहां रखा है. औफिस या घर पर कहीं भी फोन गुम हो जाने पर यूजर को एक बार में 3 ताली बजानी होंगी.

इसमें साउंड, वाइब्रेट व फ्लैश अलर्ट मोड दिए गए हैं. जब यूजर का फोन साइलेंट मोड पर होगा, तब भी यह ऐप काम करेगा. अगर कहीं पहले से तालियां बज रही हैं, तो आप इसकी सेटिंग में जाकर ‘क्लैप पौज’ कर सकते हैं.

फ्रूट श्रीखंड

सामग्री

– 2 कप हंग कर्ड

– 1/4 कप शुगर पाउडर

– थोड़ी सी केसर दूध में भीगी

– 1/4 छोटा चम्मच इलायची पाउडर

– जरूरतानुसार काजू, बादाम व पिस्ता बारीक कटा.

विधि

– एक बाउल में हंग कर्ड, शुगर पाउडर और केसर को मिक्स करें.

– मिश्रण में गांठें नहीं पड़नी चाहिए.

– अब मिश्रण में इलायची पाउडर, ड्राईफ्रूट्स मिला कर फ्रिज में सैट कर ठंडाठंडा परोसें.

व्यंजन सहयोग : महाराज जोधाराम चौधरी
कारपोरेट शैफ, खानदानी राजधानी

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