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घर पर बनाएं मेथी के चावल

सामग्री

– 1 कटोरी चावल (पानी में भींगे हुए)

– मेथी के पत्ते (1 कप)

-1 टमाटर (कटा हुआ)

–  स्वीटकौर्न (2 बड़े चम्मच)

–  हरीमिर्च  (1कटी हुई)

– 3 छोटे बैगन (कटे हुए)

– हल्दी पाउडर (1/4 छोटा चम्मच)

–  धनिया पाउडर (1/2 छोटा चम्मच)

– गरममसाला (1/4 छोटा चम्मच)

– नमक (स्वादानुसार)

– तेल (2 बड़े चम्मच)

–  जीरा (1 छोटा चम्मच)

बनाने की विधि

– कढ़ाई में तेल गरम कर जीरा, हल्दी पाउडर, धनिया पाउडर, गरममसाला, हरीमिर्च         भूनें

– फिर मेथी के पत्ते, टमाटर और बैगन मिला कर कुछ देर पकाएं.

– अब चावल, नमक और स्वीटकौर्न मिला कर धीमी आंच पर ढक कर पकाएं.

– चावल पक जाने पर धनिया पत्ती से सजा कर परोसें.

गाजर हलवा कचौरी

सामग्री

– गाजर का हलवा (1 कप)

– मैदा (1 कप)

– घी (1 बड़ा चम्मच)

–  तेल (तलने के लिए)

– काजू, किशमिश (थोड़ा सा)

– बादाम का चूरा (कम मात्रा में)

बनाने की विधि

–  मैदा में घी मिला कर गूंध लें.

– गाजर के हलवे में काजू, किशमिश, बादाम का चूरा मिला कर भरावन तैयार करें.

– लोई (डो) के छोटे-छोटे पेड़े बेल कर भरावन भरें .

–  और गरम तेल में सुनहरा होने तक तल कर परोसें.

मुझे भारतीय फुटबौल टीम पर गर्व है : स्टीफन कांस्टेनटाइन

भारतीय फुटबौल टीम के पूर्व कोच स्टीफन कांस्टेनटाइन ने सोशल मीडिया के माध्यम से टीम के खिलाड़ियों तथा अखिल भारतीय फुटबौल महासंघ (एआईएफएफ) का शुक्रिया अदा किया. कांस्टेनटाइन ने भारतीय फुटबौल टीम के एएफसी एशियन कप के पहले दौर से ही बाहर होने के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया था.

उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा, ‘बीते चार साल में भारतीय फुटबौल ने जो हासिल किया है उस पर मुझे गर्व है. मैं एआईएफएफ, खिलाड़ियों, सपोर्ट स्टाफ और सभी प्रशंसकों का शुक्रिया अदा करता हूं. जय हिंद.’

गौरतलब है कि भारतीय फुटबौल टीम पहली बार एएफसी एशियन कप के क्वार्टर फाइनल में पहुंचने के मुहाने पर खड़ी थी. उसे इसके लिए ग्रुप-ए के अपने आखिरी मैच में बहरीन से ड्रॉ खेलना था. टीम के पक्ष में सब कुछ अच्छा चल रहा था लेकिन प्रणाय हल्दार की एक गलती से बहरीन को आखिरी मिनट में पेनल्टी मिल गया जिस पर गोल हुआ और भारत को 0-1 से हार का सामना करना पड़ा.

इसके बाद स्टीफन कांस्टेनटाइन ने 4 वर्षों तक भारतीय टीम के कोच पद पर बने रहने के बाद इस्तीफा दे दिया. कांस्टेनटाइन इससे पहले भी 2005 में भारतीय फुटबौल टीम के कोच रह चुके थे.

गूगल मैप्स की ये टिप्स आपकी जिंदगी बना देंगी आसान

स्मार्टफोन पर गूगल मैप्स का इस्तेमाल कई लोगों ने किया होगा, लेकिन जब फोन की बैटरी कम होती है तो लोग मैप्स का इस्तेमाल करने से परहेज करते हैं. दरअसल जीपीएस के कारण बैटरी जल्दी खत्म होती है. आइये जानते हैं कुछ शानदार टिप्स के बारे में जो मोबाइल डाटा, बैटरी और स्टोरेज की बचत करेंगे.

गूगल मैप्स की मदद से हम नई लोकेशन का पता लगाते हैं और कई बार एक ही जगह पर कई बार मैप्स खोलने की वजह से डाटा और स्मार्टफोन की बैटरी दोनों की खपत होती है. ऐसे में आप गूगल मैप्स को औफलाइन डाउनलोड कर सकते हैं.

अगर स्मार्टफोन में ज्यादा स्टोरेज का विकल्प उपलब्ध है तो उसी सूरत में स्मार्टफोन में गूगल मैप्स को डाउनलोड करें. अगर किसी विशेष जगह जा रहे हैं या फिर किसी विशेष लोकेशन पर ज्यादा जाते हैं तो उस सीमित जगह के ही मैप्स को डाउनलोड करें.

कैसे बनें स्मार्ट

इसके लिए पहले गूगल मैप्स के बाईं तरफ ऊपर की ओर दिए गए मेन्यु वाले विकल्प पर क्लिक करें. इसके बाद एक नया बौक्स खुलेगा, जिसमें औफलाइन नाम का विकल्प मिलेगा, उस पर क्लिक कर दें. ऐसा करने के से स्क्रीन पर नीली रेखाओं से घिरा हुआ एक बौक्स मिलेगा, उसमें अपनी जगह को रखें. ध्यान रखें इसमें आप जगह को जूम करके कम और छोटा करके ज्यादा घेर सकते हैं. उसके बाद नीचे की तरफ दिए गए डाउनलोड वाले विकल्प पर क्लिक कर दें.

बिना इंटरनेट के भी भेज सकते हैं लोकेशन

अगर आप इंटरनेट कनेक्टिविटी वाले क्षेत्र में नहीं हैं तब भी आप अपनी लोकेशन साझा कर सकते हैं. हालांकि इसके लिए आपको गूगल मैप्स पर अपनी लोकेशन पता करनी होगी कि आप कहां पर मौजूद हैं और उस पर थोड़ी देर टच करके रखें.

ऐसा करने के बाद फोन स्क्रीन पर नीचे की तरफ तीन विकल्प नजर आएंगे जिनमें से एक डायरेक्शन, दूसरा शेयर और तीसरा सेव का विकल्प होगा. लोकेशन साझा करने के लिए शेयर वाले विकल्प पर क्लिक करें. इसके बाद टेक्स्ट मैसेज का विकल्प चुनें और अपनी लोकेशन पसंदीदा यूजर के साथ साझा कर दें.

पार्किंग याद रखने के अलावा शेयर करें अपनी लोकेशन

कई बार होता है जब हम अपनी कार को पार्क करने के बाद उसकी लोकेशन भूल जाते हैं. इसका हल भी गूगल मैप्स लेकर आया है. लोकेशन शेयर करने के लिए जो ब्लू डौट (जीपीएस सिग्नल) दिख रहा है, उस पर थोड़ी देर टैप करके रखें. इसके बाद नीचे शेयर करने का विकल्प आ जाएगा, उसके बाद यूजर अपनी लोकेशन साझा कर सकते हैं. वहीं इस स्पौट को कार पार्किंग के रूप में भी सेव कर सकते हैं.

औफिस या कौलेज से घर जाते वक्त अगर आप रास्ते में अपने दोस्त को घर छोड़ते हुए जाना चाहते हैं तो इसके लिए भी गूगल मैप्स की मदद ले सकते हैं. दरअसल, गूगल मैप्स में मल्टीपल स्टौप वाला डायरेक्शन फीचर है. इसके लिए पहले अपने गंतव्य स्थान का नाम डालकर अपनी डायरेक्शन का पता करें. इसके बाद स्क्रीन पर ऊपर की तरफ दाईं ओर दिए गए तीन डौट वाले विकल्प विकल्प पर क्लिक करें. इसके बाद Add Stop पर क्लिक कर दें. ध्यान देने वाली बात यह है कि इसमें आप एक से ज्यादा स्टॉप शामिल कर सकते हैं.

घर/औफिस/कौलेज का पता करें डिफौल्ट सेव

सड़क पर जाम और अन्य कारणों की वजह से कई यूजर दिन में कई बार गूगल मैप्स का इस्तेमाल करते हैं. ऐसे में अगर आप बार-बार घर का पता या औफिस का पता टाइप करते हैं तो आप उन विशेष लोकेशन को सेव कर सकते हैं. इसके लिए पहले उस जगह को सर्च करें या फिर अगर उस जगह पर मौजूद हैं तो ब्लू टिक वाले निशान पर थोड़ी देर टच करके रखें. इसके बाद नीचे सेव करने का फीचर आ जाएगा. इसमें आप औफिस या घर नाम से लोकेशन सेव कर सकते हैं.

ड्राइविंग के दौरान इस्तेमाल करें वौयस सर्च

गूगल मैप्स का एक उपयोगी फीचर यह भी है कि यूजर इसमें ड्राइविंग के दौरान वौयस सर्च का इस्तेमाल करके लोकेशन सर्च कर सकते हैं. यह फीचर सर्च बार में दाईं ओर दिया जाता है और उसका इस्तेमाल करने के लिए सिर्फ उस माइक पर क्लिक करना होता है. यहां तक कि अगर आपने फोन में गूगल मैप्स ओपेन नहीं किया है तो गूगल असिस्टेंट ‘ओके गूगल’ की मदद से गूगल मैप्स ओपेन कर सकते हैं. इसके लिए सिर्फ आपको ओके गूगल कहना होगा और उसके बाद ओपेन गूगल मैप्स बोलना होगा.

इनकम टैक्स प्लानिंग में आप भी तो नहीं करते ये गलतियां

अगर आप दूसरों से सीख सकते हैं तो आपको गलतियां करने से बचना चाहिए. खास का टैक्स प्लानिंग के मामले में आपको उन गलतियों से बचना चाहिए जो आपके माता पिता कर चुके हैं. एक स्टडी से पता चलता है कि मिलेनियल्स यानी जिनकी उम्र 35 साल से कम है उनमें से 91 फीसदी लोग पैसों से जुड़े मामलों का प्रबंधन खुद करते हैं. ऐसे में आपको निवेश और पैसों से जुड़े फैसले करने के अलावा आपको यह भी समझना चाहिए कि आपकी इनकम पर कितना टैक्स बन रहा है और आपको टैक्स का भुगतान समय पर करना चाहिए.

किसी पेशेवर एक्सपर्ट की मदद के बिना हो सकता है कि आप भी उसी तरह की गलतियां करें जो शायद आपके माता पिता ने टैक्स प्लानिंग को लेकर की हैं. ऐसे में हम आपको बता रहे हैं कि आप कैसे उन गलतियों से बच सकते हैं.

चेक करें आपकी इनकम पर कितना बनता है टैक्स

आपकी कुल इनकम पर टैक्स लगता है न कि सिर्फ आपकी सैलरी पर. आप को दूसरे स्रोत से भी इनकम हो सकती है. जैसे फिक्स्ड डिपॉजिट पर ब्याज, म्युचुअल फंड या शेयर बाजार पर मिलने वाला रिटर्न, या आपको कहीं और से पैसा मिला हो. ऐसे में आपको अपनी कुल टैक्स देनदारी समझने के लिए सभी तरह की इनकम को जोड़ना होगा. इनकम के सभी स्रोत को जोड़ने के बाद ही आप यह जान सकते हैं कि आपकी कुल इनकम कितनी है और आपको इस पर कितना टैक्स देना है. इसके बाद अगर आप टैक्स बचाना चाहते हैं तो आप इसके हिसाब से टैक्स बचाने के विकल्पों में निवेश कर सकते हैं.

जीवन बीमा की जरूरत पर करें विचार

आम तौर पर टैक्स बचाने के लिए जीवन बीमा पौलिसी खरीदना काफी लोकप्रिय है. हालांकि सिर्फ टैक्स बचाने के लिए आपको जीवन बीमा पौलिसी नहीं खरीदनी चाहिए. यह सही है कि आप इनकम टैक्स एक्ट के सेक्शन 80 सी के तहत जीवन बीमा पौलिसी में 1.5 लाख रुपए तक निवेश करके टैक्स छूट हासिल कर सकते हैं. लेकिन आपको पहले यह चेक करना चाहिए कि क्या आप 80 सी के तहत किसी और विकल्प में निवेश करके टैक्स छूट ले सकते हैं या नहीं. अगर आपके पास पहले से जीवन बीमा पौलिसी है जो आपकी जरूरत को पूरा करती है तो आपको दूसरे विकल्पों में निवेश करना चाहिए.

टैक्स बचाने के लिए जल्दबाजी में न करें निवेश का फैसला

आपके बैंक का रिलेशनशिप मैनेजर, पड़ोसी, रिश्तेदार या दोस्त आप को बता सकते हैं कि टैक्स बचाने के लिए आपको कहां पर निवेश करना चाहिए. हालांकि आपको निवेश करने से पहले इसके बारे में सही तरीके से जानकारी हासिल करनी चाहिए. आप निवेश के तमाम विकल्पों के बारे में औनलाइन जानकारी हासिल करके उसकी तुलना कर सकते हैं कि इनके क्या फायदे और नुकसान हैं. अगर आप अब भी फैसला नहीं कर पा रहे हैं तो आपको फाइनेंशियल एक्सपर्ट की सलाह लेनी चाहिए. फाइनेंशियल एक्सपर्ट को इस क्षेत्र का सालों का अनुभव होता है. ऐसे में वह आपकी जरूरतों के हिसाब से आपको सही सलाह दे सकता है.

माता पिता या कंपनी के हेल्थ कवर पर न रहे निर्भर

आपको अपने लिए खुद हेल्थ इन्श्योरेंस प्लान खरीदना चाहिए. इस तरह से आप मेडिकल इमरजेंसी की सूरत में फाइनेंशियल सपोर्ट के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रहेंगे. भले ही आपके पैरेंट्स के हेल्थ कवर में आप भी कवर हों या आपकी कंपनी आपको ग्रुप हेल्थ इन्श्योरेंस कवर दे रही हो. ये कवर आपकी जरूतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं.

इसके अलावा अगर आप अपने लिए हेल्थ इन्श्योरेंस पौलिसी खरीदते हैं तो आप 25,000 रुपए तक के प्रीमियम भुगतान पर टैक्स छूट क्लेम कर सकते हैं. अगर आप अपने माता पिता के लिए हेल्थ इन्श्योरेंस पौलिसी प्रीमियम का भुगतान कर रहे हैं जिनकी उम्र 60 वर्ष से कम है तो आप 25,000 तक का अलग से टैक्स छूट क्लेम कर सकते हैं. अगर उनकी उम्र 60 साल से अधिक है तो आप 50,000 तक के प्रीमियम पर टैक्स छूट क्लेम कर सकते हैं.

निवेश से पहले जान लें कितना मिलेगा रिटर्न

अगर आप टैक्स बचाने के लिए निवेश कर रहे हैं तो आपको यह पता करना चाहिए कि टैक्स लगने और महंगाई दर का हिसाब लगाने के बाद इस पर आपको कितना रिटर्न मिलेगा. उदाहरण के लिए पीपीएफ पर मिलने वाला रिटर्न टैक्स फ्री है वहीं फिक्स्ड डिपौजिट पर मिलने वाले रिटर्न पर टैक्स लगता है. इसके अलावा आपको यह भी सुनिश्चत करना चाहिए कि आपके निवेश पर जो रिटर्न मिले वह महंगाई की दर से अधिक हो. उदाहरण के लिए मौजूदा समय में पीपीएफ पर रिटर्न 8 फीसदी है महंगाई की दर लगभग 4 फीसदी है. ऐसे में आपको पीपीएफ पर वास्तविक रिटर्न 4 फीसदी मिलेगा.

घर खरीदने में न करें जल्दबाजी

आपको यह बात आकर्षक लग सकती है कि होम लोन लेकर आप न सिर्फ अपना घर खरीद सकते हैं बल्कि आप इससे टैक्स भी बचा सकते हैं. लेकिन आपको तमाम पहलुओं पर विचार करने के बाद ही घर खरीदने का फैसला करना चाहिए. जैसे आप होम लोन की ईएमआई आसानी से चुका पाएंगे या नहीं. होम लोन की ईएमआई चुकाने के बाद आप लंबी अवधि के लिए सेविंग या निवेश कर पाएंगे या नहीं. अगर आप होम लोन ईएमआई चुकाने के बाद सेविंग नहीं कर पाते हैं तो आपको लंबी अवधि में इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी.

तो क्या अब ‘ठाकरे’ में नहीं होगी सचिन खेड़ेकर की आवाज?

शिवसेना नेता व सांसद संजय राउत निर्मित शिवसेना सुप्रीमो बाला साहेब ठाकरे की हिंदी और मराठी दोनो भाषाओं में बनी बायोपिक फिल्म ‘‘ठाकरे’’ 25 जनवरी 2019 को प्रदर्शित होने जा रही है. अभिजीत पनसे निर्देशित इस फिल्म में बाला साहेब ठाकरे का किरदार नवाजुद्दीन सिद्दिकी तथा उनकी पत्नी मीनाताई का किरदार अमृता राव ने निभाया है.

अमृता राव ने स्वयं मराठी भाषी होने के नाते मराठी भाषी फिल्म में अपने संवाद स्वयं डब किए हैं. जबकि मराठी भाषा वाली फिल्म में नवाजुद्दीन के संवाद मशहूर अभिनेता सचिन खेड़ेकर ने डब किए थे, जो कि मराठी भाषी फिल्म ‘‘ठाकरे’’ के ट्रेलर व टीजर में सुनाई दे रहे हैं.

मगर फिल्म का ट्रेलर आने के बाद से महाराष्ट् खासकर मराठी भाषी दर्शकों द्वारा विरोध शुरू हो गया था. मराठी भाषी लोगों को मानना है कि सचिन खेड़ेकर अति मशहूर अभिनेता हैं. वह अतीत में सुभाष चंद्र बोस सहित कुछ मशहूर किरदार निभा चुके हैं. मराठी व हिंदी सिनेमा में सचिन खेड़ेकर अपनी आवाज व अभिनय को लेकर काफी अच्छी पहचान रखते हैं.

सूत्रों की माने तो पहले शिवसेना के नेताओं ने अपने स्तर पर इस विरोध को दबाने का प्रयास किया और लोगों को समझाने का प्रयास किया कि वह इसे स्वीकार कर लें, मगर बात नहीं बनी. अब सूत्र दावा कर रहे हैं कि संजय राउत ने मराठी भाषा की फिल्म ‘‘ठाकरे’’ में नवाजुद्दीन सिद्दिकी के उन संवादों को जिन्हें पहले अभिनेता सचिन खेड़ेकर ने डब किए थे, उन्हें अब डबिंग आर्टिस्ट चेतन शशिताल की आवाज में डब कराया है. चेतन शशिताल इससे पहले 2015 में प्रदर्शित मराठी फिल्म ‘‘बालकड़ू’’ में बाला साहेब ठाकरे के किरदार को अपनी आवाज दे चुके हैं.

इस प्रकरण पर संजय राउत कहते हैं-‘‘मेरे दिमाग में सचिन खेडे़कर की आवाज और उनका व्यक्तित्व हावी रहा है. मराठी भाषा पर उनका पूरा अधिकार भी है. मगर जो लोग वर्षों से बाला साहेब ठाकरे के प्रशंसक और उनकी आवाज के दीवाने रहे हैं, उन्हे लगा कि सचिन की आवाज परदे पर बाला साहेब ठाकरे की आवाज से मेल नहीं खाती है. लेकिन हम चाहकर भी बालासाहेब की आवाज तो ला नहीं सकते. फिल्म के ट्रेलर में सचिन खेड़ेकर की ही आवाज रखी है.’’

अब तक संजय राउत ने स्वीकार नहीं किया है कि फिल्म के संवाद चेतन शशिताल की आवाज में डब कराए जा चुके हैं.

जेएनयू से निकला देशद्रोह का जिन्न फिर जिंदा करने की कोशिश

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में कथित देश विरोधी नारों को ले कर उठा देशद्रोह का बवाल फिर गरमा रहा है. दिल्ली पुलिस के जेएनयू के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार समेत 10 लोगों के खिलाफ पटियाला हाउस कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करने के बाद मामला सुर्खियों में आ गया है. यह ऐसे वक्त चर्चा में लाया गया है जब आम चुनावों में महज 3 महीने रह गए हैं. ऐसे में पुलिस द्वारा दाखिल चार्जशीट की टाइमिंग पर सवाल उठ रहे हैं.

दरअसल संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु को फांसी पर लटकाए जाने के विरोध में 9 फरवरी 2016 को जेएनयू कैंपस में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था. आरोप लगे थे कि कार्यक्रम के दौरान कथित रूप से देश विरोधी नारे लगाए गए थे.

पुलिस ने गवाहों के बयानों के बाद कन्हैया, उमर खालिद, अनिर्बान भट्टाचार्य, अकीब हुसैन, बशरत अली, मुजीब हुसैन गट्टू, उमर  गुल, मुनीब हुसैन, रईस रसूल और खालिद बशीर पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया था. इन छात्रों में से कन्हैया, उमर, अनिर्बान जेएनयू में पढ़ते थे, जबकि बाकी बाहरी थे.

कोर्ट में पेश 1200 पेजों की चार्जशीट में 90 गवाह बनाए गए हैं. उन में 30 ऐसे हैं जो देश के खिलाफ की गई कथित नारेबाजी के प्रत्यक्षदर्शी हैं. इन में कुछ जेएनयू के स्टाफ और सुरक्षा कर्मचारी हैं.

चार्जशीट में कहा गया है कि यह 2016 की घटना एक सुनियोजित साजिश का परिणाम थी, जिस दौरान देश विरोधी नारे लगाए गए थे.

दरअसल जब से केंद्र में भाजपा सरकार आई विश्वविद्यालयों की स्वायतत्ता पर हमला शुरू हो गया. विश्वविद्यालय जो बहस  केंद्र थे, विभिन्न विचाराधाराओं के बीच एक स्वस्थ तर्कवितर्क होते चले आ रहे थे, उस पर रोक लगाने के प्रयास शुरू हो गए और कट्टर हिंदुत्ववादी विचार थोपने के लिए झूठे राष्ट्रवाद का पाखंड खड़ा कर दिया गया.

जेएनयू, हैदराबाद यूनिवर्सिटी, अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी, इलाहाबाद  यूनिवर्सिटी, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, आईआईटी दिल्ली जैसे एकएक कर संस्थानों में संघ के लोग भरे जाने लगे और हिंदुत्व सोच थोपे जाने के प्रयास शुरू किए गए. यह सब राष्ट्रवाद ने नाम पर किया जाने लगा. देश भर के बुद्घिजीवियों और जेएनयू जैसे संस्थानों में सरकार की इस मंशा को कठघरे में खड़ा किया गया.

दरअसल यह शिक्षा पर हमला है. शिक्षा पर हमले का मतलब समाज की बुनियाद पर हमला है. दुनिया भर में राष्ट्रवाद की आड़ में तानाशाही न केवल सिर उठाती रही, सत्ता पर आ कर काबिज भी हुई. इस की शुरुआत शिक्षण संस्थानों से की जाती है. तालिबान का हमला सब से पहले स्कूलों, कौलेजों पर हुआ और उस का जोर इसे खत्म कर धार्मिक शिक्षा देने पर रहा.

यही मानसिकता भारत में शुरू हुई. ज्ञान की रोशनी को खत्म कर समाज को कूपमंडूक बना कर रखा जाए ताकि लोग, खासकर युवाओं में वैज्ञानिक, तार्किक सोच का पनप ही न पाए और वह प्राचीन मिथक कहानियों को ही सत्य माने, उन पर ही आस्था और भरोसा करे.

विश्वविद्यालयों से ही देश एवं राष्ट्र निर्माण की नींव पड़ती है. विश्वविद्यालयों ने हमारी सभ्यता के बौद्घिक मार्गदर्शकों को प्रशिक्षित किया है पर विश्वविद्यालयों की यह शिक्षा सदियों से समाज, देशों को चलाते आ रहे धर्मों का धीरेधीरे खात्मा करती हैं.

धर्म के बल पर चलने वाली सरकारों के लिए शिक्षण संस्थान सब से बड़ी बाधा होते हैं. लिहाजा लोकतंत्र का मुखौटा पहन कर आईं धार्मिक सरकारें धर्म को शिक्षा में थोपने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती.

हमारे देश में यह उस समय हो रहा है जब शिक्षा की गुणवत्ता और युवाओं में बेरोजगारी जैसी चुनौतियां खड़ी हैं. आंकड़े बताते हैं कि विश्व के शीर्ष 200 विश्वविद्यालयों में भारत का एक भी विश्वविद्यालय शामिल नहीं है.

विभिन्न सर्वेक्षणों में तमाम संस्थानों ने माना है कि भारत में उच्च तकनीक और व्यावसायिक शिक्षा प्राप्त छात्रों में आधे से कम छात्र अपनी शिक्षा के अनुरूप काम कर पाने के योग्य नहीं हैं. इसीलिए आजकल बीटेक, पीएचडी जैसे उच्च शिक्षा प्राप्त डिग्रीधारी युवा चपरासी व अन्य चतुर्थ श्रेणी की नौकरियों में बड़ी संख्या में आवेदक के रूप में देखे गए हैं.

उच्च शिक्षा की गुणवत्ता के संदर्भ में होने वाले विभिन्न शोधों में भी यह बात उभर कर आई है कि हमारे उच्च शिक्षा प्राप्त युवकों में 70 प्रतिशत से भी अधिक अकुशल हैं जो आधुनिक तकनीक विकास और निर्धारित योग्यता के अनुरूप काम करने में सक्षम नहीं हैं.

देशदुनिया में विख्यात जेएनयू में बदलाव की आवाजें उठती रही हैं. यहां राजनीतिक, सामाजिक मुद्दों पर हमेशा बहसें चलती आई हैं और विभिन्न देशविदेश के पढ़ने वाले छात्रों व शिक्षकों के बीच अलगअलग संस्कृतियों, विचारों को ले कर तर्कवितर्क होता आया है. खासतौर से यहां सामाजिक विसंगतियों के सवाल सुलगते रहे हैं. यह बात धर्म की तरफदारी करने वाली सरकार को हजम नहीं हो रही थी, इसलिए कट्टर हिंदुवादियों ने जेएनयू को देशद्रोहियों का अड्डा साबित करने की ठान ली.

2016 में हुए कार्यक्रम के माध्यम से यहां के छात्रों और समानता, उदारवादी लोकतांत्रिक मूल्यों का समर्थन करने वालों को देशद्रोही प्रचारित करने का अभियान चल पड़ा लेकिन यह सोच न तो देश के विकास के लिए सही है न समाज की तरक्की के लिए. यह कट्टर सोच है जो शिक्षण संस्थानों के माध्यम से समाज और देश में सिर्फ धर्म की सत्ता स्थापित कराना चाहती है. यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है.

बुजुर्गों में बढ़ रहा है अवसाद, ऐसे करें बचाव

बुजुर्गों और बच्चों को स्पेशल केयर की जरूरत होती है. बुढ़ापे की अवस्था में लोग शारीरिक और मानसिक तौर पर बेहद कमजोर हो जाते हैं. ऐसे में जरूरी हो जाता है कि उनके खानपान से  उनके लिए जीवनशैली का बेहद ख्याल रखा जाए.

शारीरिक कमजोरियां तो आसानी से सामने आ जाती हैं. पर  इस अवस्था में मानसिक परेशानियों को समझना मुश्किल होता है. इस उम्र में आ कर बुजुर्गों में अवसाद का खतरा काफी बढ़ जाता है. इसका प्रमुख कारण है उन्हें सूर्य की किरणों से दूर रखना. एक हालिया शोध में ये बात सामने आई है कि  उनमें विटामिन डी की कमी के कारण अवसाद तेजी से बढ़ रहा है. आपको बता दें कि सूर्य की किरणें विटामिन डी का प्रमुख स्रोत है.

शोध में पाया गया कि विटामिन डी की कमी के कारण बुजुर्गों में अवसाद का खतरा 75 फीसदी बढ़ जाता है. शोध में शामिल शोधार्थियों की माने तो, विटामिन डी का संबंध हड्डी के अलावा स्वास्थ्य संबंधी अन्य दशाओं से भी रहता है. हैरानी की बात यह है कि इसकी कमी का असर अवसाद पर भी होता है.

विटामिन-डी का सेवन सुरक्षित है और अपेक्षाकृत सस्ता भी है. इस शोध में विटामिन-डी से स्वास्थ को होने वाले फायदे के प्रमाण मिलते हैं.

वृद्धावस्था में नहीं रहना है दूसरों पर आश्रित तो ये खबर पढ़ें

वृद्धावस्था में शरीर की ताकत काफी कम हो जाती है. मांसपेशियां और हड्डियां कमजोर हो जाती हैं. इस उम्र में कामकाज की क्षमता कम हो जाती है.  हाल में हुए एक शोध के मुताबिक बुजुर्गों को अपने खाने में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाना चाहिए. इससे उनमें दैनिक गतिविधियों की क्षमता संरक्षित रखने और इसके साथ ही अक्षमता के खतरे को कम करने में मदद मिल सकती है.

अध्ययन में बताया गया कि डाइट में प्रटीन की मात्रा ज्यादा करने से बुजुर्गों में अक्षमता के खतरे को कम किया जा सकता है. इससे वो अपने दैनिक जीवन की चीजें, जैसे खुद से नहाना, खाना, कपड़े पहनना जैसे अन्य काम आसानी से कर सकेंगे.

शोध में शामिल अध्ययनकर्ता की माने को, खोज उस मौजूदा सोच का समर्थन करती है, जिसमें प्रतिदिन प्रोटीन लेने से हम सक्रिय रहते हैं और स्वस्थ तरीके से बूढ़े होते हैं.

इस शोध में 722 लोगों को शामिल किया गया. इसमें 60 फीसदी महिलाएं थीं. अध्ययन की रिपोर्ट में ये भी बताया गया है कि कम प्रोटीन लेने वाले बुजुर्गों के खराब स्वास्थ्य की वजह से उनकी शारीरिक गतिविधि में कमी आती है और दांत व चेहरे में परिवर्तन होते हैं. इसके नतीजे बताते हैं कि जो ज्यादा प्रोटीन लेते हैं वे कम प्रोटीन लेने वाले लोगों की तुलना में कम अक्षम होते हैं. अध्यनकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि बुजुर्ग व्यक्तियों को बौडी वेट के प्रत्येक 2.2 पाउंड के लिए 1 से 1.2 ग्राम प्रोटीन का सेवन करना चाहिए.

बथुआ स्टिक्स रेसिपी

सामग्री:

–  1 कप मैदा

– 3 बड़े चम्मच बथुए का पेस्ट

– थोड़ा सा लहसुन और मिर्च का पेस्ट

– 1 बड़ा चम्मच मक्खन

–  नमक स्वादानुसार

– तलने के लिए तेल

बनाने की विधि

– मैदा, बथुए का पेस्ट, लहसुन-मिर्च का पेस्ट, नमक और मक्खन थोड़े से पानी में     एकसाथ मिलाएं.

– अब इसकी टाइट लोई (डो) बनाएं.

–  लोई की पतली-पतली स्ट्रिप्स काटें

–  फिर इसे गरम तेल में तलें और सर्व करें.

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