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व्हाय चीट इंडिया : अति महत्वपूर्ण मुद्दे को सही परिप्रेक्ष्य में पेश करने में असफल

भारतीय शिक्षा प्रणाली को लेकर अब तक कई फिल्में बन चुकी हैं, जिनमें बच्चों को किस तरह की शिक्षा दी जानी चाहिए, इस पर बातें की जा चुकी हैं. फिर चाहे ‘थ्री इडीयट्स’हो या ‘तारे जमीन पर हो’ या ‘निल बटे सन्नाटा’. मगर शिक्षा तंत्र को चीटिंग माफिया किस तरह से खोखला कर रहा है, इस मुद्दे पर अभिनेता से निर्माता बने इमरान हाशमी फिल्म ‘‘व्हाय चीट इंडिया’’ लेकर आए हैं. कहानी के स्तर पर फिल्म में कुछ भी नया नही है. फिल्म में जो कुछ दिखाया गया है, उससे हर आम इंसान परिचित है. माना कि फिल्म हमारे देश की शिक्षा प्रणाली में व्याप्त कुप्रथा, घोटाले, भ्रष्टाचार आदि को उजागर करती है, इमरान हाशमी ने इस अहम मुद्दे पर एक असरहीन फिल्म बनाई है. यह व्यंगात्मक फिल्म पूरे सिस्टम व शिक्षा प्रणाली के दांत खट्टे कर सकती थी. यह फिल्म शिक्षा संस्थानों को चलाने वालो के परखच्चे उड़ा सकती थी, मगर फिल्म ऐसा करने में पूरी तरह से असफल रही है.

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फिल्म की कहानी झांसी निवासी राकेश सिंह उर्फ रौकी (इमरान हाशमी) के इर्द गिर्द घूमती है. रौकी का अपना एक शालीन व सभ्य परिवार है. मगर रौकी अपने पिता व परिवार के सपनों के बोझ तले दबकर झांसी से जौनपुर आकर कोचिंग क्लास खोलकर शिक्षा तंत्र में चीटिंग के ऐसे व्यवसाय पर चल पड़ता है, जिसे वह सिर्फ अपने लिए ही नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी सही मानता है. रौकी पूरे उत्तर प्रदेश का बहुत बड़ा चीटिंग माफिया बन चुका है. उसने शिक्षा तंत्र में अपनी अंदर तक गहरी पैठ बना ली है और अब शिक्षा तंत्र की खामियों का भरपूर फायदा उठा रहा है. उसके संबंध विधायकों से लेकर मंत्रियों तक हैं. अपने चीटिंग के व्यवसाय में वह गरीब और मेधावी छात्रों का उपयोग करता है. इन छात्रों को एक धनराशि देकर खुद को अपराधमुक्त मान लेता है. फिर यह गरीब मेधावी छात्र अपनी बुद्धि व अपनी पढ़ाई के आधार पर नकारा व अमीर छात्रों के बदले परीक्षा देते हैं. रौकी इन्ही नकारा व अमीर बच्चों के माता पिता से एक मोटी रकम वसूलता रहता है.

एक दिन उसे पता चलता है कि उसके शहर का एक लड़का सत्येंद्र दुबे उर्फ सत्तू (स्निग्धादीप चटर्जी) कोटा से पढ़ाई करके इंजीनियिंरंग प्रवेश परीक्षा में काफी बेहतरीन नंबर लाता है. अब पूरे शहर में उसका जलवा हो जाता है. रौकी तुरंत सत्तू से मिलता है और उसे सुनहरे सपने दिखाते हुए एक लड़के के लिए इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा देने के लिए उसे पचास हजार रूपए देने की बात करता है. परिवार की आर्थिक हालत देखते हुए सत्तू उसकी बातों में फंस जाता है. धीरे धीर सत्तू की बहन नुपुर (श्रेया धनवंतरी) भी राकेश सिंह से प्रभावित हो जाती है और उसे अपने भावी पति के रूप में देखने लगती है. उधर रौकी धीरे धीरे सत्तू में ड्रग्स व लड़की सहित हर बुरी आदत का शिकार बना देता है. एक दिन कुछ अमीर लोगों की शिकायत पर पुलिस अफसर कुरैशी उसे पकड़ते हैं, मगर विधायक जी उसे छुड़ा लेते हैं. इसी बीच ड्रग्स लेने के चक्कर में सत्तू को कौलेज से निकाल दिया जाता है, तब रौकी उसे फर्जी डिग्री देकर भारत से बाहर कतार में नौकरी करने के लिए भेजकर सत्तू व उसके परिवार से संबंध खत्म कर लेता है. कतार में सत्तू की डिग्री फर्जी है यह राज खुल जाता है. सत्तू किसी तरह अपने घर वापस आकर घर के अंदर ही आत्महत्या कर लेता है. इसी बीच पुलिस अफसर कुरैशी की मुलाकात नुपुर से होती है. दोनों राकेश सिंह को सबक सिखाने की ठान लेते हैं. इधर राकेश सिंह ने अपने चीटिंग के व्यवसाय का जाल मुंबई में फैला लिया है. अब वह एमबीए का पर्चा लीक कर करोड़ो कमा रहा है. नुपर नौकरी करने के लिए मुंबई पहुंचती है और राकेश के संपर्क में आती है, दोनों के बीच प्रेम संबंध शुरू होते हैं. पर एक दिन नुपुर की ही मदद से कुरैशी, राकेश सिंह उर्फ रौकी को सबूत के साथ गिरफ्तार करता है. अदालत में रौकी खुद को रौबिनहुड साबित करने का प्रयास करते हुए शिक्षा तंत्र की बुराइयों पर भाषणबाजी करता है. रौकी को सजा हो जाती है. जेल में विधायक जी मिलते हैं. अंत में पता चलता है कि रौकी ने अपने पिता के नाम पर बहुत बड़ा इंजीनियरिंग कौलेज खोल दिया है. अब उसके पिता खुश हैं. तथा रौकी का धंधा उसी गति से चल रहा है.

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कमजोर पटकथा व विषय के घटिया सिनेमाई कारण के चलते पूरी फिल्म मूल मुद्दे को सही परिप्रेक्ष्य में पेश नहीं कर पाती है. निर्देशक सौमिक सेन ने फिल्म के हीरो इमरान हाशमी की एंट्री एक सिनेमाघर में गुंडों से मारपीट के साथ दिखायी है, जो कि बहुत ही घटिया है और यह काम उसके व्यवसाय से भी परे है. जबकि बिना मारपीट के भी इस दृश्य में एक धूर्त ,कमीने, चालाक व विधायकों से संबंध रखने वाले इंसान रौकी का परिचय दिया जा सकता था. पर सिनेमा की सही समझ न रखने वाले सौमिक सेन से इस तरह की उम्मीद करना ही गलत है. बतौर लेखक सौमिक सेन पुलिस औफिसर कुरैशी के किरदार को भी ठीक से चित्रित नहीं कर पाए. कितनी अजीब सी बात है कि फिल्म हर इंसान को चालाक होने यानी कि गलत काम करने की प्रेरणा देती है. फिल्म के अंत में जिस तरह रौकी अपने पिता के नाम पर कौलेज खोलकर अपना काम करता हुआ दिखाया गया है, उससे यही बात उभरती है कि बुरे काम का बुरा नतीजा नहीं होता. फिल्म में लालच व लालची होने का महिमा मंडन किया गया है. फिल्मकार इस बात के लिए अपनी पीठ थपथपा सकते हैं कि उन्होंने आम फिल्मों की तरह अपनी फिल्म ‘‘व्हाय चीट इंडिया’’ में गलत इंसान का मानवीयकरण करते हुए उसे प्रायश्चित करते नहीं दिखाया.

फिल्मकार चीटिंग करने वालों के पकड़े जाने पर उनकी मानसिकता को गहराई से पकड़ने में बुरी तरह से नाकाम रहे हैं.

कथानक के स्तर पर काफी विरोधाभास है. रौकी के पिता का किरदार भी आत्मविरोधाभासी बनकर उभरता है, पूरी फिल्म में वह अपने बेटे के खिलाफ हैं, पर अंत में उनके नाम पर कौलेज के खुलते ही वह रौकी के सबसे बड़े प्रशंसक बन जाते हैं. कम से कम भारत जैसे देश में पुराने समय के लोगों की सोच इस तरह नही बदलती है. कुल मिलाकर पटकथा के स्तर पर इतनी कमियां हैं कि उन्हें गिनाने में कई पन्ने भर जाएंगे. फिल्मकार ने शिक्षा जगत की खामियों व चीटिंग माफिया जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे को बहुत ही गलत ढंग से पेशकर इस मुद्दे की अहमियत को ही खत्म कर दिया.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो सत्तू के किरदार में स्निग्धदीप चटर्जी ने काफी अच्छा अभिनय किया है और उससे काफी उम्मीदें जगती हैं.. इमरान हाशमी बहुत प्रभावित नहीं करते, इसके लिए कुछ हद तक लेखक व निर्देशक भी जिम्मेदार हैं. वेब सीरीज ‘‘लेडीज रूम’’से अपनी प्रतिभा को साबित कर चुकीं अभिनेत्री श्रेया धनवंतरी को इस फिल्म में सिर्फ मुस्कुराने के अलावा कुछ करने का अवसर ही नहीं दिया गया, यह भी लेखक व निर्देशक की कमजोरियों के चलते ही हुआ. फिल्म खत्म होने के बाद सवाल उठता है कि फिल्मों में करियर शुरू करने के लिए श्रेया धनवंतरी ने ‘व्हाय चीट इंडिया’को क्या सोचकर चुना. छोटे किरदारों में कुछ कलाकारों ने बेहतरीन अभिनय किया है.

दो घंटे एक मिनट की अवधि वाली फिल्म  ‘‘व्हाय चीट इंडिया’’ का निर्माण इमरान हाशमी, भूषण कुमार, किशन कुमार, तनुज गर्ग, अतुल कस्बेकर और प्रवीण हाशमी ने किया है. फिल्म के लेखक व निर्देशक सौमिक सेन, संगीतकार रोचक कोहली, गुरू रंधावा, अग्नि सौमिक सेन, कुणाल रंगून, कैमरामैन वाय अल्फांसो रौय तथा फिल्म को अभिनय से संवारने वाले कलाकार हैं- इमरान हाशमी, श्रेया धनवंतरी, स्निग्धदीप चटर्जी.

रेटिंग : डेढ़ स्टार

वो जो था एक मसीहा-मौलाना आजाद : नहीं उभर सका मौलाना आजाद का व्यक्तित्व

इन दिनों बौलीवुड में बायोपिक फिल्मों का दौर चल रहा है. ऐसे ही दौर में लेखक, निर्माता, अभिनेता व सहनिर्देशक डा. राजेंद्र संजय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी व देश के प्रथम शिक्षामंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद की बायोपिक फिल्म लेकर आए हैं. फिल्म में उनके बचपन से मृत्यु तक की कथा का समावेश है, मगर मनोरंजन विहीन इस फिल्म में मौलाना आजाद का व्यक्तित्व उभरकर नही आ पाता. उनके जीवन की कई घटनाओं को बहुत ही सतही अंदाज में चित्रित किया गया है.

फिल्म पूर्ण रूपेण डाक्यूड्रामा नुमा है. मौलाना आजाद का पूरा नाम अबुल कलाम मुहियुद्दीन अहमद था. फिल्म की कहानी एक शिक्षक द्वारा कुछ छात्रों के साथ मौलाना आजाद की कब्र पर पहुंचने से शुरू होती है, पर चंद मिनटों में ही वह शिक्षक (लिनेश फणसे) स्वयं मौलाना आजाद (लिनेश फणसे) के रूप में अपनी कहानी बयां करने लगते हैं. फिर पूरी फिल्म में मौलाना आजाद स्वयं अपने बचपन से मौत तक की कहानी उन्ही छात्रों को सुनाते हैं.

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मौलाना आजाद का बचपन बड़े भाई यासीन, तीन बड़ी बहनों जैनब, फातिमा और हनीफा के साथ कलकत्ता (कोलकाता) में गुजरा. महज 12 साल की उम्र में उन्होंने हस्तलिखित पत्रिका ‘नैरंग ए आलम’ निकाली, जिसे अदबी दुनिया ने खूब सराहा. हिंदुस्तान से अंग्रेजों को भगाने के लिए वे मशहूर क्रांतिकारी अरबिंदो घोष के संगठन के सक्रिय सदस्य बनकर, उनके प्रिय पात्र बन गए. जब तक उनके पिता जिंदा रहे, तब तक वह अंग्रेजी नही सीख पाए, मगर पिता के देहांत के बाद उन्होंने अंग्रेजी भी सीखी. उन्होंने एक के बाद एक दो पत्रिकाओं ‘अल हिलाल’और ‘अल बलाह’का प्रकाशन किया, जिनकी लोकप्रियता से डरकर अंग्रेजी हुकूमत ने दोनों पत्रिकाओं का प्रकाशन बंद करा उन्हें कलकत्ता से तड़ीपार कर रांची में नजरबंद कर दिया. चार साल बाद 1920 में नजरबंदी से रिहा होकर वह दिल्ली में पहली बार महात्मा गांधी (डा. राजेंद्र संजय) से मिले और उनके सबसे करीबी सहयोगी बन गए.

उनकी प्रतिभा और ओज से प्रभावित जवाहरलाल नेहरू (शरद शाह) उन्हें अपना बड़ा भाई मानते थे. पैंतीस साल की उम्र में आजाद कांग्रेस के सबसे कम उम्र वाले अध्यक्ष चुने गए. गांधीजी की लंबी जेल यात्रा के दौरान आजाद ने दो दलों में बंट चुकी कांग्रेस को फिर से एक करके अंग्रेजों के तोडू नीति को नाकाम कर दिया. उन्होंने सायमन कमीशन का विरोध किया. 1944 व1945 के दौरान जब वह कई दूसरे नेताओ के साथ जेल में बंद थे, तभी उनकी पत्नी जुमेला का निधन हुआ. देश को आजादी मिलने के बाद केंद्रीय शिक्षामंत्री के रूप में उन्होंने विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्र में क्रांति पैदा करके उसे पश्चिमी देशों की पंक्ति में ला बैठाया. वह आजीवन हिंदू मुस्लिम एकता के लिए संघर्ष करते रहे.

फिल्म कम बजट में बनी है, इसका आभास तो फिल्म देखते हुए हो जाता है, मगर लेखक, निर्माता व निर्देशक ने अपने शोध के नाम पर चिरपरिचित बातों को तोड़ने का भी काम किया है. मसलन, उनका दावा है कि गांधीजी के चेहरे पर कभी भी मूंछें नहीं रही. हम ऐतिहासिक तथ्यों को लेकर कोई बात नही करना चाहते. मगर फिल्म में कई ऐसी गलतियां व कमियां है, जिससे आभास होता है कि फिल्मकार को सिनेमा की भी समझ नहीं है. जब शिक्षक छात्रों को लेकर मौलाना आजाद की कब्र पर पहुंचता है, तब उसके साथ जो छात्र हैं, वही छात्र उस वक्त भी मौजूद रहते हैं, जब मौलाना आजाद स्वयं अपनी कहानी सुना रहे होते हैं. यानी कि काल बदलता है, पर छात्र नहीं बदलते. बड़ा अजीब सा लगता है.

पटकथा लेखक की कमियों के चलते भी फिल्म में कोई भी चरित्र उभर नहीं पाता. चरित्रों के अनुरूप कलाकारों का चयन भी सही नही है. गांधी जी का किरदार स्वयं डा. राजेंद्र संजय ने ही निभाया है जो कि कहीं से गांधी जी नहीं लगते. लगभग यही हालत हर किरदार के साथ है.

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बजट की कमियो के चलते तमाम अहम दृश्यों में क्रोमा का उपयोग किया गया है, जिससे फिल्म की गुणवत्ता कमतर हो गयी. एक ऐतिहासिक फिल्म में जिस तरह से घटनाक्रमो का रोमांच होता है, वह भी इसमें नही है. मनोरंजन का भी घोर अभाव है.

दो घंटे एक मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘वो जो था एक मसीहाः मौलाना आजाद’’ का निर्माण डा. राजेंद्र संजय ने ‘‘राजेंद्र फिल्मस’’ के बैनर तले किया है. फिल्म को प्रस्तुत किया है श्रीमती भारती व्यास ने. फिल्म के निर्देशक डा. राजेंद्र संजय व संजय सिंह नेगी, लेखक व गीतकार डा. राजेंद्र संजय, कैमरामैन अजय तांबत, संगीतकार दर्शन कहार तथा कलाकार हैं- लिनेश फणसे, सिराली, सुधीर जोगलेकर, भानु प्रताप, साईदीप देलेकर,काव्या, दर्शना, वीरेंद्र मिश्रा, डा. राजेंद्र संजय, आरती गुप्ते, माही सिंह, चांद अंसारी, शरद शाह, अरविंद वेकारिया, के टी मेंघाणी, प्रेम सिंह, चेतन ठक्कर, सुनील बलवंत, पवनमिश्रा, साहिल त्यागी व अन्य

रेटिंगः डेढ़ स्टार

ये बचपन की आदत बताती है कि आप लेफ्ट हैंडर हैं या राइट हैंडर

आप बाएं हाथ से काम करते हैं या दाएं हाथ से, ये इसका सीधा कनेक्शन आपके बचपन से है. एक शोध में पता चला है कि बच्चे को स्तनपान का समयकाल उसके हाथ उपयोग करने पर असर डाल सकता है. अमेरिका में हुए एक शोध में ये बात सामने आई कि जिन शिशुओं ने स्तनपान किया होता है उनमें ज्यादातर लोग दाएं हाथ से काम करने वाले होते हैं.

इस रिसर्च में पाया गया कि नौ महीने से ज्यादा समय तक स्तनपान करने वाले बच्चे दाएं हाथ से काम करते हैं, वहीं दूसरी ओर जिन शिशुओं ने बोतल से दूध पिया है उनमें बाएं हाथ से काम करने वाले लोग अधिक होते हैं.

हालांकि बच्चों में इस आदत के पीछे कारण ये भी है कि हाथ पर नियंत्रण करने वाला दिमाग का हिस्सा दिमाग के एक हिस्से में स्थिर कर जाता है. शोधकर्ताओं ने बताया कि संभव है कि स्तनपान से यह प्रक्रिया गति पकड़ लेती है जिससे शिशु के दाएं या बाएं हाथ से काम करने का निर्धारण होता है. रिसर्च के लिए शोधकर्ताओं ने 62,129 मां-बच्चे के जोड़ों को शामिल किया था.

जानिए ग्रीन टी के हैरान कर देने वाले फायदे

पिछले कुछ वक्त से लोगों में ग्रीन टी का चलन तेज हुआ है. इसे कई कारणों से पीया जाता है. कई लोग इसे वजन कम करने के लिए पीते हैं, तो कुछ इसे मेटाबौलिज्म बढ़ाने के लिए पीते हैं. पर क्या आपको पता है कि ग्रीन टी स्किन को जवां करने और कैंसर की बिमारी में भी मददगार साबित होती है. एक अध्ययन में तो एम्स के शोधकर्ताओं ने ये खुलासा किया है कि ग्रीन टी से डैमेज किडनी को भी ठीक किया जा सकता है. इस खबर में हम आपको ग्रीन टी के फायदे बताएंगे.

वेट लौस

अगर आपका बढ़ते वजन से परेशान हैं तो ग्रीन टी आपके लिए काफी मददगार होगा. ग्रीन टी मेटाबौलिज्म स्पीड अप करती है. इससे जो फूड आप खाते हैं उससे बौडी ज्यादा एनर्जी बर्न करती है.

कम करता है स्ट्रेस

ग्रीन टी एंजाइटी खत्म कर आपको रिलैक्स करता है. कई रिसर्च भी ये साबित कर चुकी हैं कि ग्रीन टी एंजाइटी के सिम्टम्स को खत्म कर देती है.

कैंसर में है बेहद असरदार

कई स्टडीज में ये स्पष्ट हो चुका है कि कैंसर से बचने के लिए ग्रीन टी बेहद फायदेमंद है. कैंसर पेशेंट अगर ग्रीन टी पीते हैं तो उनका इम्यून सिस्टम बेहतर होता है. उनकी हेल्थ ठीक रहती है और बॉडी से टौक्सिन निकलने में मदद मिलती है.

राउंड पालक रोल्स

सामग्री

– 1 कप पालक धुली

– 1/4 कप आलू उबला (मैश किया हुआ)

–  1/4 कप हरी मटर (उबली  हुई)

– गाजर (3 बडे चम्मच बारीक कटी)

– हलकी सी पकी और आंवला (कद्दूकस किया 1 बड़ा चम्मच)

– अदरक (2 छोटे चम्मच  बारीक कटा)

–  2 छोटे चम्मच (हरी मिर्चें)

–  3 बड़े चम्मच कौर्नफ्लोर  (बारीक कटी)

– चाटमसाला (1 छोटा चम्मच)

–  थोड़ी सी धनियापत्ती बारीक कटी

– ब्रैड क्रंब्स (2 बड़े चम्मच)

–  नमक व मिर्च (स्वादानुसार)

कोटिंग की सामग्री

– 1/4 कप मैदा  (2 बड़े चम्मच कौर्नफ्लोर)

– 1/2 छोटा चम्मच कालीमिर्च पाउडर

– 1/2 कप ब्रैड क्रंब्स

– तलने के लिए रिफाइंड औयल

बनाने की विधि

– पालक में कोटिंग की सामग्री छोड़ सभी सामग्री मिला लें.

– नीबू के आकार के छोटे-छोटे गोले बनाएं.

– कौर्नफ्लोर और मैदा को मिला कर पानी डालें व पतला घोल तैयार करें.

– एक प्लेट में ब्रैड क्रंब्स फैलाएं.

– प्रत्येक रोल को मैदा वाले घोल में डिप कर के ब्रैड क्रंब्स में रोल करें.

– तेल गरम कर के रोल्स को सुनहरा होने तक डीप फ्राई करें.

– सौस व चटनी के साथ सर्व करें.

तो ऐसे करिये मुंहासों का इलाज

चेहरे पर मुंहासे होना बेहद ही आम बात है लेकिन कई बार हम अपनी ही कुछ गलतियों से अपने चेहरे की खूबसूरती को बिगाड़ देते हैं. जब हम अपने नाखूनों से मुंहासों को फोड़ते हैं तो यह छोटी सी गलती बहुत बड़ी हो जाती है. इस गलती से मुंहासे चेहरे पर हमेशा के लिए अपनी जगह बना लेते हैं. इसलिए मुंहासों को कभी भी फोड़ना नहीं चाहिये.

पिंपल्‍स को ठीक करने के कई तरीके हैं जैसे नींबू को चेहरे पर रगड़ना. इसके अलावा चंदन पाउडर, शहद, एलोवेरा और केला आदि का फेस पैक बना कर लगाना सबसे प्रभावशाली माना जाता है. हालांकि चेहरे पर तरह तरह की चीजें ही लगाने भर से काम नहीं होगा बल्‍कि आपको हाइजीन का ख्याल भी रखना पड़ेगा.

मुंहासों से बचने के उपाय

चेहरे की साफ-सफाई या आप जिस जिस मेकअप प्रोडक्‍ट का इस्‍तेमाल करती हैं वह औयली न हो, बालों में रूसी की समस्‍या न हो आदि बाते बहुत महत्‍वपूर्ण हैं. तो ऐसी ही कई बातें हैं जो महिलाओं और लड़कियों को अपने दिमाग मे रखनी चाहिये.

मुंहासे को फोड़े नहीं

मुंहासों को फोड़ने से वे दाग छोड़ देते हैं. इसके अलावा वे पूरे चेहरे पर अपना बैक्‍टीरिया छोड़ देते हैं जिससे और भी जगह पर मुंहासे निकल आते हैं.

चेहरा धोइये

चेहरे पर मुंहासे हो तो अपना चेहरा दिन मे दो बार धोना चाहिये. इससे तेल, गंदगी और मृत त्‍वचा साफ हो जाएगी. इसके अलावा आप जब भी कहीं बाहर से घर आएं तो अपना चेहरा जरूर धोएं.

मुंहासों को न छुएं

जब चेहरे पर मुंहासे निकलते हैं तो अक्‍सर उसे छूने का दिल करता है, पर ऐसा करके आप बैक्‍टीरिया और गंदगी को पूरे चेहरे पर फैला रहे होते हैं.

तेल रहित प्रोडक्‍ट का इस्‍तेमाल

हमेशा औयल फ्री फाउंडेशन का प्रयोग करें, इससे न केवल मुंहासे छुप जाएंगे बल्कि दुबारा आने से रुक भी जाएंगे.

खूब पानी पीजिये

ज्‍यादा पानी पीने से शरीर की गंदगी साफ होती है और त्‍चचा में मुंहासे नहीं निकलते हैं. इसके अलावा त्‍वचा साफ और चमकदार बनती है.

चेहरे पर बाल न आने दें

अक्‍सर लड़कियों को अच्‍छा लगता है कि उनके चेहरे पर बाल आएं. लेकिन औयली बाल चेहरे पर आने से मुंह पर पिंपल हो जाते हैं.

‘बेबी सीटर’ ऋषभ पंत का ‘मास्टर स्ट्रोक’

कल 18 जनवरी को भारतीय टीम तीसरे वनडे में औस्ट्रेलिया से सीरीज जीतने का इरादा ले कर मैदान पर उतरेगी पर लगता है कि उस के युवा विकेटकीपर बल्लेबाज ऋषभ पंत, जो फिलहाल वनडे टीम में शामिल नहीं हैं, अपने दिल की बाजी हार चुके हैं.

मामला कुछ यों है कि उन्होंने 16 जनवरी को अपने अकाउंट से इंस्टाग्राम पर एक लड़की के साथ अपनी तसवीर शेयर की थी और एक मैसेज भी लिखा था, ‘मैं तुम्हें खुश रखना चाहता हूं, क्योंकि तुम ही एक वजह हो कि मैं बेहद खुश हूं.’

 

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I just want to make you happy because you are the reason I am so happy ❤️

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ऋषभ पंत ने इस रोमांटिक तसवीर के साथ ही दिल वाली इमोजी भी बनाई थी. इस के बाद सब यही सोच रहे थे कि कौन है यह ‘मिस्ट्री गर्ल’. अभी लोग अपने दिमाग के घोड़े दौड़ा ही रहे थे कि जल्दी ही राज भी खुल गया.

दरअसल, उस ‘मिस्ट्री गर्ल’ ने भी वही तसवीर शेयर करते हुए इतना प्यारा मैसेज लिख दिया कि बात कन्फर्म हो गई कि उस लड़की और ऋषभ पंत के बीच प्यार की खिचड़ी पक रही है.

तसवीर वाली उस लड़की का नाम ईशा नेगी है. उस ने इंस्टाग्राम पर वही तसवीर शेयर करते हुए लिखा, ‘ … मेरा हमसफर, मेरा सब से अच्छा दोस्त, मेरा प्यार.’

 

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My man, my soulmate, my best friend, the love of my life. @rishabpant

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ऋषभ पंत ने अभी औस्ट्रेलिया में हुई टैस्ट मैचों की ‘बौर्डर गावसकर सीरीज’ में औस्ट्रेलिया के खिलाफ 4 मैचों में कुल 20 कैच लपके थे जो किसी भारतीय विकेटकीपर का रिकौर्ड है. उन्होंने इस सीरीज में 58 के औसत से कुल 350 रन भी बनाए थे.

तब ऋषभ पंत एक विवाद में भी घिर गए थे. मेलबर्न में हो रहे तीसरे टैस्ट मैच में औस्ट्रेलिया के कप्तान टिम पेन ने उन से मजाक में कहा था कि जब वे अपनी पत्नी को सिनेमा दिखाने ले जाएंगे तो पंत उन के बच्चों के ‘बेबी सीटर’ बन सकते हैं.

मामला यहीं खत्म नहीं हुआ था. बाद में भारत और औस्ट्रेलिया की टीमें किरीबिली हाउस में इकट्ठा हुई थीं. वहां टिम पेन की पत्नी बोनी ने ऋषभ पंत को ‘बैस्ट बेबीसीटर’ बताया था. इस दौरान बोनी और पंत एक तसवीर में नजर आए थे. बोनी ने इस तसवीर को इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया था और कैप्शन में लिखा था, ‘बैस्ट बेबीसीटर… ऋषभ पंत.’ उस तसवीर में मुस्कुराते हुए ऋषभ पंत टिम पेन के एक बच्चे को अपनी गोद में लिए हुए थे तो दूसरा बच्चा बोनी की गोद में था.

अब समझ में आया ऋषभ पंत के ‘बेबी सीटर’ बनने का राज.

लब मेरे खामोश रहेंगे

लब मेरे खामोश रहेंगे क्योंकि मेरा प्यार हो तुम

वरना मेरा दिल जाने है झूठे और मक्कार हो तुम

फूलों सी मुस्कान में लिपटा शबनम भीगा प्यार तेरा

जैसे मतलब निकल गया तो बरछी और कटार हो तुम

बंट जाते हो सब लोगों में मुझको तनहा छोड़ के तुम

मैं झूठे कहती रहती हूं के मेरा अधिकार हो तुम

जिनसे तुम नफरत करते हो उनसे ही तुम महफ़िल में

हंस हंस के बातें करते हो कैसे रंगे सियार हो तुम

मजबूरी है रहना होगा रक्खोगे जिस हाल में तुम

मैं हूं जैसे बेबस जनता और मेरी सरकार हो तुम

चांद से शिकवा

कल की सियाह रात का चर्चा किये बगैर

जायेंगे नहीं चांद से शिकवा किये बगैर

अब देखिये लेते हैं वो किस किस से दुश्मनी

महफ़िल में आ गये जो हम पर्दा किये बगैर

दीवानों सी सूरत लिए फिरते हैं शहर में

मानेंगे नहीं वो हमें रुसवा किये बगैर

क्या क्या न गज़ब हो गया काफ़िर की याद में

मस्जिद से लौट आये हम सजदा किया बगैर

मालूम है के शेख जी तौबा के साथ साथ

रहते नहीं हैं हुस्न का चर्चा किये बगैर

ये शायरी नहीं है मदारी का खेल है

मिलता नहीं है पेट को मजमा किये बगैर

इस उम्र के बाद ही पिलाएं बच्चे को गाय का दूध

बच्चे के जन्म के साथ ही मां का दूध बेहद जरूरी होता है. मां के दूध में बच्चे को सारे जरूरी पोषण मिल जाते हैं. यही कारण है कि जन्म के तुरंत बाद बच्चे को मां का दूध पिलाना अच्छा होता है. आमतौर पर मांएं बच्चों को बहुत ज्यादा दिनों तक ब्रेस्टफीडिंग नहीं कराती हैं. कुछ दिनों बाद ही वो नवजात को गाय का दूध पिलाना शुरू कर देती हैं. बच्चे की सेहत के लिए ये नुकसानदायक होता है. इस खबर में हम आपको बताएंगे कि नवजात को क्यों गाय का दूध नहीं पिलाना चाहिए और उन्हें गाय का दूध पिलाने का सही समय कौन सा होता है.

एक साल से कम उम्र के बच्चों को गाय का दूध पिलाना हानिकारक होता है. इससे बच्चों में  पाचन तंत्र में एलर्जी संबंधी रोगों के बढ़ने का जोखिम होता है. जानकारों की माने तो गाय के दूध में मौजूद प्रोटीन को छोटे बच्चे पचा नहीं पाते. जिन शिशुओं को मां का दूध नहीं मिलता उनके स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए पोषण के तौर पर वैकल्पिक व्यवस्था की आवश्यकता होती है. चाइल्ड स्पेशलिस्ट्स का कहना है कि अगर एक साल से कम उम्र के बच्चे को गाय का दूध दिया जाए तो आयरन के लो कौन्सन्ट्रेशन की वजह से बच्चे में अनीमिया का खतरा हो सकता है.

आपको बता दें कि गाय का दूध नवजात के कमजोर किडनी पर तनाव डाल सकता है और पचाने में भी मुश्किल होता है. वहीं, 1 साल से ऊपर के शिशुओं को घर का अनुपूरक भोजन खिलाया जा सकता है, जबकि 1 साल से कम उम्र के बच्चों को विशेष हाइड्रोलाइज्ड और एमिनो ऐसिड-आधारित भोजन की जरूरत होती है, जिससे एलर्जी न हो. भारत में अधिकतर शिशुओं को गाय का दूध दिया जाता है, क्योंकि ग्रामीण इलाकों में विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता की कमी होती है.

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