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कैसे जीते पार्टनर का दिल

किसी भी रिश्ते की डोर विश्वास के धागों पर टिकी होती हैं. अगर किसी भी रिश्ते में जाने-अंजाने भरोसा टूट जाएं तो उस भरोसे को दुबारा वापस पाना बहुत कठिन है. रिश्ते को आगे बढ़ाने के लिए उसमें भरोसे की सबसे ज्यादा जरूरत है.

अगर आपने अपने साथी का भरोसा तोड़ा है तो उसे वापस पाने के लिए बहुत सी बातों को ध्यान रखने की जरूरत होती है. ऐसे में आप अपने साथी से बात करें और उन्हें विश्वास दिलाएं तो यह भरोसा दोबारा जीता जा सकता है. पर इसके लिए आप दोनों को बराबर कोशिश करने की जरूरत है.

खुद को माफ करें– अपने पार्टनर से मांफी मांगने से पहले आपको खुद को माफ करने की जरूरत है क्योंकि जब तक आप अपनी गलती को मांफ नहीं करेंगे तब तक कोई भी उसे माफ नहीं कर पाएगा. किसी भी रिश्ते में विश्वास लाने से पहले आपको खुद पर विश्वास करने की ज्यादा जरूरत होती है. अपनी गलती को माने और कोशिश करें कि आगे भविष्य में इस गलती को ना दोहराएं और अपने साथी को भी दुख ना दें.

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अपनी भावनाओं को व्यक्त करें – सबसे पहले आपको अपने साथी के सामने इस बात को मान लेनी चाहिए कि आपने उसके विश्वास तोड़कर गलती की है ताकि उसे इस बात का एहसास हो कि आपको अपनी गलती का पछतावा है. फिर इसके बाद अपनी भावनाओं को जाहिर करें. ये सारी बातें आपके पार्टनर को प्रभावित कर सकती है और आप वापस उनका विश्वास हासिल कर सकते हैं.

अपनी जिंदगी से जुड़ें हर बात को शेयर करें – अगर आप अपने पार्टनर का भरोसा दोबारा जितना चाहते हैं तो उसके लिए आपको अपने जिंदगी से जुड़े हर बात के बारे में अपने साथी को बताना चाहिए ताकि उसे आपके ऊपर किसी प्रकार का संदेह ना रहें. अपने बीच कोई प्राइवेसी ना रखें. इससे आपका साथी शायद इस बात को समझ पाएगा की आप आगे भविष्य में उसके साथ कुछ गलत नहीं करेंगे और ना ही धोखा देंगे.

मांफी मांगें- आपको अपने रिश्ते में विश्वास वापस लाने के लिए अपने पार्टनर से मांफी मांगने की जरूरत होती है. अपने साथी को इस बात का विश्वास दिलाएं कि जो भी गलती आपसे हुई. वैसे आगे भविष्य में नहीं होगी.

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हल्के में न लें सिरदर्द

अक्सर सिरदर्द होने पर हम कौम्बीफ्लेम, डिस्प्रिन जैसी दर्दनिवारक गोलियां खा लेते हैं, इस बात पर गौर किये बगैर कि सिरदर्द केवल एक लक्षण है. सिरदर्द के अनेक कारण हो सकते हैं. साधारण चिंता से लेकर ब्रेन ट्यूमर जैसे जानलेवा रोग का लक्षण सिरदर्द हो सकता है. हम आपको डरा नहीं रहे हैं, लेकिन जब सिरदर्द लगातार बना रहे, या कुछ समयान्तरालों पर होता हो और दर्दनिवारक गोली खाने के बाद भी आराम न पड़े तो डॉक्टर से सम्पर्क करना जरूरी है.

इंग्लैंड के गेट्सहेड में 21 साल की जेसिका केन को अचानक सिरदर्द हुआ है, वह पेनकिलर खाकर सोई और उसकी मौत हो गयी. दरअसल, जेसिका को मेनिंगोकॉकल मेनिनजाइटिस और सेप्टिकैमिया नाम की बीमारी हो गयी थी जिसने उसकी जान ले ली. इसके लक्षण के तौर पर उभरे सिरदर्द को न समझते हुए उन्होंने दर्दनिवारक गोली खा ली और सोचा कि थोड़ी देर में ठीक हो जाएगा, लेकिन उनको ऐसा इंफेक्शन हो गया था जिसमें बैक्टीरिया खून में प्रवेश करता है और बड़ी तेजी से फैलने लगता है. यह बैक्टीरिया खून में टॉक्सिन्स रिलीज करने लगता है जो जानलेवा साबित हो सकता है.

दिल्ली के अनुज रमाकांत को बचपन से सिरदर्द की शिकायत रहती थी. पहले माता-पिता ने सोचा कि स्कूल न जाने का बहाना बनाता है, उसे डांट-डपट कर स्कूल भेज दिया जाता था. लेकिन वहां भी वह टीचर से सिरदर्द की शिकायत करता था. टीचर की सलाह पर माता-पिता ने उसे आंख के डॉक्टर को दिखाया. अनुज को चश्मा लग गया मगर फिर भी सिरदर्द से मुक्ति नहीं मिली. दो साल के बाद पता चला कि उसे ब्रेन ट्यूमर है.

हम में से ज्यादातर लोग सिरदर्द, बहती नाक, छींक आना, हल्का बुखार जैसी दिक्कतों को बहुत हल्के में लेते हैं और उसके इलाज के बारे में भी नहीं सोचते. इन तकलीफों को मौसमी बीमारी समझ कर उनका घरेलू उपाय कर लेते हैं या पेनकिलर खा कर काम में लग जाते हैं, जबकि ये लक्षण किसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या के कारण भी हो सकते हैं, जिस पर अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो यह जिन्दगी के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. सिरदर्द भी ऐसा ही लक्षण है जिसे हल्के में नहीं लेना चाहिए. सौ से भी अधिक कारण हैं जिनसे सिरदर्द पैदा होता है. अब सभी कारणों का उल्लेख तो सम्भव नहीं है, लेकिन मुख्य कारणों की चर्चा यहां जरूर करेंगे.

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सिरदर्द के सामान्य कारण

मसल्स में खिंचाव : आमतौर पर खोपड़ी की मसल्स में खिंचाव के कारण सिरदर्द होता है.

फिजिकल स्ट्रेस : लंबे वक्त तक शारीरिक मेहनत और डेस्क या कंप्यूटर के सामने बैठकर घंटों काम करने से भी सिरदर्द होता है.

इमोशनल स्ट्रेस : किसी बात को लेकर मूड खराब होने या देर तक सोचते रहने से भी सिरदर्द हो सकता है. प्रेम में विफलता, धोखा, तनाव सिरदर्द का कारण बनते हैं.

जेनेटिक वजहें : सिरदर्द के लिए जेनेटिक कारण भी 20 फीसदी तक जिम्मेदार होते हैं. अगर आपके खानदान में किसी को माइग्रेन की समस्या है तो आपको भी यह तकलीफ हो सकती है, जिसके कारण तेज सिरदर्द होता है.

नींद पूरी न होना : नींद पूरी न होने से पूरा नर्वस सिस्टम प्रभावित होता है और दिमाग की मसल्स में खिंचाव होता है, जिससे सिरदर्द होता है.

गैस की अधिकता : वक्त पर खाना न खाने से कई बार शरीर में ग्लूकोज की कमी हो जाती है या उल्टा-सीधा भोजन करने से पेट में गैस बन जाती है, जिससे सिरदर्द हो सकता है.

स्मोकिंग और अल्कोहल : अल्कोहल के अधिक सेवन से भी सिरदर्द होता है. स्मोकिंग और अल्कोहल के सेवन से खून की नलियां और ब्लड सर्कुलेशन प्रभावित होता है, जिससे दिमाग तक खून ठीक से नहीं पहुंचता है और तेज सिरदर्द हो जाता है. अल्कोहल कम लें. साथ ही, डीहाइड्रेशन से बचने के लिए ड्रिंक करने के बाद खूब सारा पानी पीना चाहिए.

बीमारी : शरीर के दूसरे अंगों में बीमारियां जैसे कि आंख, कान, नाक और गले की दिक्कत से भी सिरदर्द होता है.

एनवायनरमेंटल फैक्टर : ये फैक्टर भी तेज सिरदर्द के लिए जिम्मेदार होते हैं, जैसे गाड़ी के इंजन से निकलने वाली कार्बनमोनोआॅक्साइड सिरदर्द की वजह बन सकती है.

सिरदर्द के गम्भीर कारण

ब्लड क्लौट

कई बार ब्रेन में अगर किसी तरह का ब्लड क्लॉट बन जाए तो उस वजह से भी हेडएक यानी सिरदर्द होने लगता है. अगर आपको कभी-कभार बहुत गंभीर सिरदर्द होने लगता है और दर्द बर्दाश्त के बाहर हो जाए तो आपको अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए. अगर समय रहते इलाज न हो तो ये ब्लड क्लॉट स्ट्रोक में परिवर्तित हो सकते हैं जो जानलेवा भी साबित हो सकता है.

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औप्टिक न्यूराइटिस

अगर आंखों के पीछे वाले सिर के हिस्से में दर्द हो रहा तो यह ऑप्टिक न्यूराइटिस का लक्षण हो सकता है. इसमें ब्रेन से आंखों तक जानकारी पहुंचाने वाली नसों को नुकसान पहुंचता है जिसकी वजह से देखने में दिक्कत होती है और कई बार विजिन लॉस भी हो सकता है.

माइग्रेन या ट्यूमर

लंबे समय तक सिरदर्द की समस्या है तो विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें. यह माइग्रेन, ट्यूमर या नर्वस सिस्टम से जुड़ी दूसरी बीमारी भी हो सकती है. कभी-कभी ज्यादा दिनों तक सिरदर्द से संवेदी अंगों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है, जिससे इनकी कार्यक्षमता भी प्रभावित हो जाती है. सिरदर्द को लेकर भ्रम की स्थिति में कतई न रहें.

अन्य बीमारियां

लू लगना, हिस्टीरिया, मिरगी, तंत्रिका शूल, रजोधर्म, रजोनिवृत्ति, सिर की चोट तथा माइग्रेन सिरदर्द का कारण होते हैं. आंख तथा करोटि की मांसपेशियों के अत्यधिक तनाव से भी दर्द उत्पन्न होता है.

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ध्यान देनें की बातें

सिरदर्द खतरनाक हो सकते हैं. अगर कभी आपको ऐसा सिरदर्द हो, तो तुरंत ही किसी अच्छे डौक्टर को दिखाइए :

  1. यदि सिरदर्द इतना तेज हो जैसा पहले कभी भी न हुआ हो.
  2. पहली बार सिरदर्द हो और बहुत तीव्र हो.
  3. यदि सिरदर्द के पहले उल्टियां हुई हों.
  4. सिरदर्द के साथ बेहोशी-सी लगे, शरीर का संतुलन बिगड़ रहा हो, जीभ लटपटाए, आवाज लड़खड़ाए, आंखों के आगे बार-बार अंधेरा छाये.
  5. यदि सिर का दर्द झुकने, खांसने, वजन उठाने से बढ़ता हो.
  6. यदि सिरदर्द ऐसा हो कि आपकी नींद में व्यवधान डाले.
  7. यदि रातभर ठीक से सोएं लेकिन उठते ही तेज सिर दर्द होता हो.
  8. यदि आपकी उम्र 55 वर्ष से ऊपर हो और यह सिरदर्द इस उम्र में आकर पहली बार हुआ हो.
  9. यदि सिर दर्द के साथ कनपटी की नसों को छूने या दबाने पर उन नसों में भी दर्द होता हो. आमतौर पर कनपटी दबाने से सिरदर्द कम होता है.
  10. यदि सिरदर्द कुछ दिनों या सप्ताह से ही है और रोज-रोज बढ़ता ही जा रहा हो.

ये लक्षण दिखें तो सिरदर्द को साधारण न समझें. तुरंत डौक्टर को दिखाएं.

वेलेंसिया की भूल: भाग 1

भाग 1

बात 7 जून, 2019 की है. उस समय सुबह के यही कोई 4 बजे थे. सैलानियों के लिए स्वर्ग कहे जाने वाले गोवा राज्य के मडगांव की रहने वाली जूलिया फर्नांडीस अपने साथ 4-5 रिश्तेदारों को ले कर कुडतरी पुलिस थाने पहुंची. वह किसी अनहोनी की आशंका से घबराई हुई थी.

थाने में मौजूद ड्यूटी अफसर ने जूलिया से थाने में आने की वजह पूछी तो उस ने अपना परिचय देने के बाद कहा कि उस की बहन वेलेंसिया फर्नांडीस कल से गायब है, उस का कहीं पता नहीं लग रहा है.

‘‘उस की उम्र क्या थी और कैसे गायब हुई?’’ ड्यूटी अफसर ने पूछा.

‘‘वेलेंसिया की उम्र यही कोई 30 साल थी. रोजाना की तरह वह कल सुबह 8 बजे अपनी ड्यूटी पर गई थी. वह मडगांव के एक जानेमाने मैडिकल स्टोर पर नौकरी करती थी. अपनी ड्यूटी पर जाते समय वेलेंसिया काफी खुश थी. क्योंकि आज से 10 दिनों बाद उस का जन्मदिन आने वाला था, उन का परिवार उस के जन्मदिन की पार्टी धूमधाम से मनाता था.

‘‘घर से निकलते समय वह कह कर गई थी कि आज उसे घर लौटने में देर हो जाएगी. फिर भी वह 9 बजे तक घर पहुंच जाएगी. उस का कहना था कि ड्यूटी के बाद वह मौल जा कर जन्मदिन की पार्टी की कुछ शौपिंग करेगी.

‘‘मगर ऐसा नहीं हुआ. रात 9 बजे के बाद भी जब वेलेंसिया नहीं आई तो घर वालों की चिंता बढ़ गई. उस के मोबाइल नंबर पर फोन किया गया तो उस का फोन नहीं मिला. इस के बाद सारे नातेरिश्तेदारों और उस की सभी सहेलियों को फोन कर के उस के बारे में पूछा गया. लेकिन कहीं से भी उस के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली.’’ जूलिया फर्नांडीस ने बताया.

जूलिया फर्नांडीस और उन के साथ आए रिश्तेदारों की सारी बातें सुन कर ड्यूटी अफसर ने वेलेंसिया फर्नांडीस की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर इस की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी. इस के बाद उन्होंने वेलेंसिया का फोटो लेने के बाद आश्वासन दिया कि पुलिस वेलेंसिया को खोजने की पूरी कोशिश करेगी.

वेलेंसिया की गुमशुदगी की शिकायत को अभी 4 घंटे भी नहीं हुए थे कि वेलेंसिया के परिवार वालों को उस के बारे में जो खबर मिली, उसे सुन कर पूरा परिवार हिल गया.

दरअसल, सुबहसुबह वायना के कुडतरी पुलिस थाने से लगभग 7 किलोमीटर दूर रीवन गांव के जंगल में कुछ लोगों ने सफेद रंग की चादर में एक लाश देखी तो उन में से एक शख्स ने इस की जानकारी गोवा पुलिस के कंट्रोलरूम को दे दी. पुलिस कंट्रोलरूम ने वायरलैस द्वारा यह सूचना शहर के सभी पुलिस थानों में प्रसारित कर दी.

जिस जंगल में लाश मिलने की सूचना मिली थी, वह इलाका मडगांव केपे पुलिस थाने के अंतर्गत आता था, सूचना मिलते ही केपे थाने की पुलिस लगभग 10 मिनट में मौके पर पहुंच गई. पुलिस को वहां काफी लोग खड़े मिले.

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इस बीच जंगल में लाश मिलने की खबर आसपास के गांवों तक पहुंच गई थी. देखते ही देखते वहां काफी लोगों की भीड़ एकत्र हो गई. पुलिस ने मुआयना किया तो सफेद रंग की चादर में बंधे शव के थोड़े से पैर दिखाई दे रहे थे, जिस से लग रहा था कि शव किसी महिला का हो सकता है. जब पुलिस ने चादर खोली तो वास्तव में शव युवती का ही निकला.

मृतका के हाथपैर एक नायलौन की रस्सी से बंधे थे और गले में उस का दुपट्टा लिपटा हुआ था. लेकिन हत्यारे ने उस का चेहरा इतनी बुरी तरह से विकृत कर दिया था कि उसे पहचानना आसान नहीं था. हत्यारे ने यह शायद इसलिए किया होगा ताकि उस की शिनाख्त न हो सके.

फिर भी पुलिस को अपनी काररवाई तो करनी ही थी. सब से पहले मृतका की शिनाख्त जरूरी थी, लिहाजा पुलिस ने मौके पर मौजूद लोगों से मृतका के बारे में पूछा, लेकिन कोई भी उसे पहचान नहीं सका. मृतका के कपड़ों की तलाशी लेने के बाद कोई ऐसी चीज नहीं मिली, जिस से उस की शिनाख्त हो सके.

वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को मामले की सूचना देने के बाद केपे पुलिस ने मौके पर फोरैंसिक टीम और डौग स्क्वायड टीम को भी बुला लिया. खोजी कुत्ते से पुलिस को एक साक्ष्य मिल गया. शव सूंघने के बाद वह वहां से कुछ दूर झाडि़यों में पहुंच कर भौंकने लगा. पुलिस ने वहां खोजबीन की तो एक मोबाइल फोन मिला. जिसे पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया.

केपे थाना पुलिस घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रही थी कि दक्षिणी गोवा के एसपी अरविंद गावस अपने सहायकों के साथ घटनास्थल पर आ गए. उन्होंने शव और घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया और केपे थाने के थानाप्रभारी को आवश्यक दिशानिर्देश दे कर लौट गए.

इस के बाद थानाप्रभारी ने जरूरी काररवाई कर युवती की लाश पोस्टमार्टम के लिए गोवा के जिला अस्पताल भेज दी.

थाने लौट कर थानाप्रभारी ने मृतका की शिनाख्त पर जोर दिया. क्योंकि बिना शिनाख्त के मामले की तफ्तीश आगे बढ़ना संभव नहीं थी. इस के लिए थानाप्रभारी ने गोवा शहर और जिलों के सभी पुलिस थानों में मृतका का फोटो भेज कर यह पता लगाने की कोशिश की कि कहीं किसी पुलिस थाने में उस की गुमशुदगी तो नहीं दर्ज है.

कुडतरी थाने में जब लाश की फोटो हुलिए के साथ पहुंची तो वहां के थानाप्रभारी को एक दिन पहले अपने थाने में दर्ज वेलेंसिया फर्नांडीस की गुमशुदगी की सूचना याद आ गई. बरामद लाश का हुलिया वेलेंसिया के हुलिए से मिलताजुलता था. कुडतरी थानाप्रभारी ने उसी समय केपे के थानाप्रभारी को फोन कर इस बारे में बात की.

इस के बाद उन्होंने तुरंत वेलेंसिया के परिवार वालों को थाने बुला कर उन्हें लाश की शिनाख्त करने के लिए केपे थाने भेज दिया. केपे थानाप्रभारी ने जिला अस्पताल की मोर्चरी ले जा कर युवती की लाश वेलेंसिया के घर वालों को दिखाई. चेहरे से तो नहीं, लेकिन कपड़ों और चप्पलों को देखते ही घर वाले फूटफूट कर रोने लगे. उन्होंने लाश की शिनाख्त वेलेंसिया फर्नांडीस के रूप में की.

थानाप्रभारी ने उन्हें सांत्वना दे कर शांत कराया. इस के बाद उन से पूछताछ की. लाश की शिनाख्त हो जाने के बाद उन्होंने केस की जांच शुरू कर दी. घटनास्थल पर बंद हालत में मिले मोबाइल की सिम निकाल कर उन्होंने दूसरे फोन में डाली और मोबाइल की काल हिस्ट्री खंगालने लगे. इस जांच में एक नंबर संदिग्ध लगा.

वह नंबर शैलेश वलीप के नाम पर लिया गया था. शैलेश वलीप ने 7 जून, 2019 को ही वेलेंसिया से बातें की थीं. पुलिस टीम जब शैलेश वलीप के घर पहुंची तो वह घर पर नहीं मिला. घर पर मिली उस की बहन भी उस के बारे में कोई जानकारी नहीं दे सकी. पुलिस ने जब उस की बहन से बात की तो वेलेंसिया और शैलेश वलीप के संबंधों की पुष्टि हो गई.

पुलिस को पक्का यकीन हो गया कि वेलेंसिया की हत्या में जरूर शैलेश का हाथ रहा होगा. इसलिए उस की तलाश सरगरमी से शुरू हो गई. थानाप्रभारी ने अपने मुखबिरों को भी अलर्ट कर दिया.

एक मुखबिर की सूचना पर पुलिस ने शैलेश को गोवा के अमोल कैफे में दबोच लिया. पुलिस टीम ने जिस समय उसे गिरफ्तार किया, उस समय वह शराब के नशे में धुत था.

जब नशा उतर जाने के बाद थाने में उस से पूछताछ की गई तो पहले तो वह पुलिस अधिकारियों को गुमराह करने की कोशिश करते हुए वेलेंसिया हत्याकांड से खुद को अनभिज्ञ और बेगुनाह बताता रहा. लेकिन जब उस से सख्ती से पूछताछ की गई तो उस ने अपना गुनाह स्वीकार करते हुए हत्याकांड में शामिल रहे अपने सहयोगी देवीदास गावकर का भी नाम बता दिया. शैलेश वलीप की निशानदेही पर पुलिस टीम ने देवीदास गांवकर को भी गिरफ्तार कर लिया.

इन दोनों से पूछताछ करने के बाद वेलेंसिया फर्नांडीस की हत्या की जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

30 वर्षीया वेलेंसिया फर्नांडीस दक्षिणी गोवा के मडगांव के थाना कुडतरी गांव मायना की रहने वाली थी. वह अपनी चारों बहनों में तीसरे नंबर की थी. उस के पिता जोसेफ फर्नांडीस एक सीधेसादे और सरल स्वभाव के थे. वह अपनी बेटियों में कोई भेदभाव नहीं रखते थे.

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वेलेंसिया फर्नांडीस की दोनों बड़ी बहनों की शादी हो चुकी थी. वे अपने परिवार के साथ अपनी ससुराल में खुश थीं. वेलेंसिया अपनी छोटी बहन जूलिया फर्नांडीस के साथ रहती थी. उस की सारी जिम्मेदारी वेलेंसिया पर थी. वेलेंसिया ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद जब नौकरी की कोशिश की तो उसे बिना किसी परेशानी के गोवा मडगांव के एक जानेमाने बड़े मैडिकल शौप में सेल्सगर्ल की नौकरी मिल गई.

वेलेंसिया देखने में जितनी सुंदर थी, उतनी ही वह महत्त्वाकांक्षी भी थी. जिस मैडिकल शौप में वह काम करती थी, वहां रीमा वलीप नाम की लड़की भी काम करती थी. वह वेलेंसिया की अच्छी दोस्त बन गई थी.

क्रमश:

—कथा के कुछ नाम काल्पनिक हैं

दुलहन वही जो पिया मन भाए : भाग 1

कैफेटेरिया में बैठा सत्यम अब उकताने लगा था. उस की चौथी कप कौफी चल रही थी. सुहानी का कोई अतापता नहीं था. सुहानी की याद आते ही उस के अधरों पर फिर से मुसकान तैरने लगी. उस के स्मरण मात्र से ही दिलदिमाग में शहनाइयां बजने लगती थीं. बमुश्किल 4 बार उस से अकेले में व एक बार घरवालों के साथ मिला है. पर यह पहली नजर का प्यार था. उस ने सुहानी को जब पहली दफा देखा था तभी उस के दिल से आवाज आने लगी थी, ‘हां, यही है, यही है, यही तो है…’

कोई 16 वर्ष की उम्र में वह पहली बार घर से बाहर होस्टल में रहने गया था, प्लस टु इंजीनियरिंग फिर एमबीए और अब नौकरी. मजाल है जो उस ने किसी भी सहपाठी या महिला सहकर्मी की तरफ आंख भी उठा कर देखा हो. बचपन से ही घर में मम्मीपापा ने कुछ ऐसी घुट्टी पिलाई थी कि वह ऐसा सोच भी नहीं सकता था कि वे घरवालों की पसंद की लड़की के सिवा किसी से शादी या दोस्ती भी कर ले.

वर्षों उस ने उम्र के नाजुक दौर से गुजरने के वक्त भी. अपने दिल की लगाम को कसे रखा. अपनी पसंद की पढ़ाई, कालेज और नौकरी करने के अधिकार को ही सहर्ष उस ने अपनी स्वतंत्रता का अधिकारक्षेत्र माना. अपने प्यार और शादी के अधिकार की लगाम सदा अपनी मां और परिवार वालों के ही अधिकार क्षेत्र का मामला सोच उन के ही हाथ में रहने दिया.

सत्यम की मां काफी पूजापाठ और धर्मकर्म करने वाली महिला थीं. बहुत जल्दी ही उन्हें पारिवारिक दायित्वों के भार से राहत मिल गईर् थी. सो, वे अपना अधिकांश वक्त साधुमहात्माओं की संगत और सत्संग में बिताती थीं. सत्यम के पिता एक बड़े व्यापारी थे. उन्हें अपने व्यापार से वक्त नहीं मिलता था. सो, उन्हें अपनी पत्नी का दिनरात साधुपंडितों और मंदिरों का चक्कर लगाना राहत ही देता. कम से कम उन से उन के वक्त के लिए गृहकलह तो नहीं करती थी. सो, सत्यम के पिता एक तरह से पत्नी की अंतरलिप्तता को प्रोत्साहन ही देते कि कहीं व्यस्त तो है.

सत्यम की मां धीरेधीरे पंडोंपुजारियों पर अपने घरवालों से अधिक विश्वास करने लगी थीं. वे लोग भी एक अच्छा आसामी समझ बरगलाए रखते थे. कभी शनि के वक्री होने पर दानपुण्य, तो कभी गुरु के किसी गलत घर में बैठ जाने पर महापाठ.

जाने क्यों सत्यम की मां को यह समझ ही नहीं आता कि जब वे हमेशा उन के ही कहे अनुसार चल रही हैं तो फिर ये गृहनक्षत्र उस से रूठते क्यों रहते हैं. उन्हें तो यह सोचना चाहिए कि जब वे इतना दान और चढ़ावा दे रही हैं तो फिर उन का अनिष्ट कैसे हो सकता है. परंतु वे ठीक इस के विपरीत समझ रखती थीं. उन्हें हमेशा यही लगता कि यदि वे ऐसे कर्मकांड नहीं करतीं तो कुछ और अवश्य बुरा घटित हो जाता. एक तरह से वे हमेशा सशंकित और डरीसहमी रहतीं कि कुछ अनहोनी न हो जाए. भक्ति से शक्ति के स्थान पर सत्यम की मां और असहाय, और शक्तिहीन होती जा रही थीं. अब वे पंडित और पुरोहित की सलाह के बिना एक कदम न उठाती थीं.

सत्यम को नौकरी करते लगभग 2 साल होने को आए थे. उस की मां और अन्य रिश्तेदार उस के लिए उपयुक्त वधू खोजने में लगे हुए थे. लड़कियां तो थीं पर कभी उस की मां को पसंद आती तो उस के पिता को उस लड़की के पिता का व्यवसाय पसंद नहीं आता. कभी दादी को लड़की की रंगत नहीं पसंद आती तो कभी सत्यम की बूआ लड़की के परिवार की कोई बुराई ऐसी खोज निकाल लातीं कि वहां रिश्ता करना मुश्किल लगता. यानी पूरा परिवार लगा हुआ था सत्यम के लिए दुलहन खोजने में.

दरअसल, सत्यम को कैसी बीवी चाहिए, यह कोई पूछना भी नहीं चाहता था. एकमत होने में उन्हें 2 वर्ष लग ही गए. तब उन्हें सुहानी पसंद आई. सुहानी, उस के मातापिता, घरपरिवार, पढ़ाई, औकात इत्यादि से संतुष्ट हो कर उन्होंने सत्यम को बताया.

सत्यम, जिस ने जीवन में पहली बार किसी लड़की को ऐसी नजर से देखा हो उसे तो पसंद आनी ही थी. कहना न होगा कि पहली ही नजर में वह दिल हार गया सुहानी के हाथों. अलबत्ता, सत्यम की मां ने अवश्य कहा, ‘कृपया सुहानी की कुंडली हमें दे दें ताकि हम अपने पुरोहित से सलाह कर शादी का दिन निकलवा सकें.’

‘परंतु हम तो जन्मकुंडली इत्यादि में विश्वास ही नहीं करते. सो, हमारे पास सुहानी की कोई कुंडली नहीं है,’ सुहानी के पापा ने कहा.

सत्यम की मम्मी कुछ परेशान सी होने लगीं. फिर वहीं से उन्होंने अपने पुरोहित को फोन लगाया. उन से बात की और फिर, ‘देखिए, ऐसा है यदि आप के पास कुंडली नहीं है तो कोई बात नहीं. आप मेरे पुरोहितजी से मिल लें. वे जन्मदिन और वक्त के हिसाब से सुहानी बिटिया की कुंडली बना देंगे,’ कह कर सत्यम की मां ने हल निकाला.

उस दिन के बाद से घरवालों की रजामंदी से सत्यम और सुहान मिलने लगे. सत्यम को सुहानी का सुहाना सा व्यक्तित्व, सोच और जीवन के प्रति सकारात्मक विचार काफी आकर्षक लगे. सुहानी को भी सत्यम की पढ़ाई, नौकरी और सीधापन भा गया. कुछ ही दिनों में दोनों एकदूसरे के काफी नजदीक आ गए और इंतजार करने लगे कि कब शादी होगी.

सुहानी तो कैफेटेरिया नहीं आई, पर सत्यम की मम्मी के फोन आने लगे.

‘‘बेटा, जल्दी घर आ जाओ, कुछ जरूरी बात बतानी है.’’

‘‘क्या हुआ मां, मैं ने तो बताया ही था कि मैं सुहानी से मिलने जा रहा हूं,’’ घर पहुंचते ही सत्यम ने कहा.

‘‘कोई जरूरत नहीं है अब उस लड़की से मिलने की,’’ मां ने लगभग चीखते हुए कहा.

‘‘क्यों, अब क्या हो गया? आप सब को तो वह पसंद है और अब मुझे भी,’’ सत्यम ने खीझते हुए कहा.

‘‘नहीं, पंडितजी ने बताया है कि सुहानी घोर मांगलिक है और उस से शादी करने वाले की शीघ्र मौत निश्चित है. मुझे अपने बेटे के लिए कोई अनिष्टकारी नहीं चाहिए,’’ मां ने कहा.

‘‘वैज्ञानिक मंगल की यात्रा कर चुके हैं और आप अभी तक उस से डरती ही हैं,’’ सत्यम ने मां को समझाना चाहा.

मां से बहस करना व्यर्थ लगा. सो, सत्यम अपने कमरे में चला गया. शाम तक घर के सभी सदस्य उस की मां की बातों से सहमत दिखे. सत्यम ने अपनी तरफ से सभी को समझाने की बड़ी कोशिशें कीं, परंतु उस की मृत्युकारी कन्या से विवाह के सभी विरुद्ध ही रहे. वह बारबार सुहानी को फोन करता रहा, परंतु उस ने कौल रिसीव ही नहीं की.

दूसरे दिन शाम को सुहानी ने उसे फोन किया.

‘‘क्या हुआ सत्यम, क्यों लगातार फोन कर रहे हो?’’

‘‘मैं कल कैफेटेरिया में देर तक तुम्हारी प्रतीक्षा करता रहा. तुम आई भी नहीं और मेरा फोन भी नहीं उठाया,’’ सत्यम ने शिकायती लहजे में कहा.

‘‘अब इतने भोले भी न बनो जैसे तुम्हें कुछ पता ही नहीं. तुम्हारे घरवालों ने तो परसों ही सूचना दे दी थी कि मांगलिक होने की वजह से यह रिश्ता नहीं हो सकता,’’ सुहानी ने गुस्से से कहा.

‘‘और उस ढोंगी बाबा की भी कहानी सुनो, जिस की भक्त तुम्हारी मां हैं. जब मेरे पापा उस बाबा से मिले तो उस ने कहा कि मनलायक कुंडली बनाने हेतु उसे 50 हजार रुपए चाहिए. मेरे पिताजी इन बातों पर विश्वास तो करते नहीं हैं. सो, उन्होंने इनकार कर दिया. गुस्से में उस ढोंगी ने तभी धमकी दे दी कि तब तो आप की बेटी की शादी मैं उस परिवार में होने नहीं दूंगा. लड़के की मां उस की मुट्ठी में है, कुछ ऐसा भी उस ने कहा. तुम्हारे घरवालों ने मेरे पापा की बात से अधिक उस तथाकथित बाबा की बातों को माना,’’ हांफती हुई सुहानी गुस्से में बोल रही थी.

‘‘हां, तुम्हें एक अच्छी खबर दे दूं कि आज मेरी सगाई हो गई और अगले महीने शादी है. अब मुझे कभी फोन नहीं करना,’’ कहते हुए सुहानी ने फोन काट दिया.

अयोध्या में सरकारी दीपोत्सव : जनता के करोड़ों रुपए स्वाहा

उत्तर प्रदेश की जनता ने जिस भारतीय जनता पार्टी को अपनी बेरोजगारी, बीमारी, कुपोषण और भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बहुमत से सरकार बनाने का मौका दिया, उसी की सरकार ने करोड़ों रुपए अयोध्या में दीपोत्सव मनाने में खर्च कर दिए. यह रकम सरकारी खजाने की थी. सरकारी खजाना जनता के कर योगदान से भरा जाता है. प्रदेश सरकार ने अयोध्या में 6 लाख दीए जला कर दीवाली मनाई.

6 लाख दीयों में करीब 6 हजार लिटर सरसों का तेल प्रयोग हुआ. जिस की कीमत 100 रुपए प्रति लिटर के हिसाब से 6 लाख रुपए बैठती है. सरसों के तेल का प्रयोग खाने में किया जाता है. सवाल उठता है कि क्या सरकार को खाने के तेल को जलाने का हक है? अगर सरकार खुद ऐसे आयोजन में फुजूलखर्ची कर रही है तो जनता को कैसे रोका जा सकता है. भाजपा समाजवादी पार्टी की सरकार के कार्यकाल के दौरान सैफई महोत्सव में होते खर्चों पर सवाल उठाती रही है. जब खुद सत्ता में आई तो राम के नाम पर राजनीति करने के लिए अयोध्या में सरकारी खर्च पर दीपोत्सव मनाने लगी.

राम की राजनीति करने वाली भाजपा अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले से पहले वहां भव्य कार्यक्रम का आयोजन करना चाहती थी. इस के लिए सरकार ने दीपोत्सव का बजट बढ़ा दिया.

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एक दिन के दीपोत्सव को 3 दिन का कार्यक्रम बना दिया गया. कार्यक्रम को दुनिया के सामने लाने व विश्व रिकौर्ड बनाने के लिए 6 लाख दीये जलाने का काम किया गया.

एक पुरानी कहावत है, ‘9 की लकड़ी 90 खर्च.’ उत्तर प्रदेश की योगी सरकार पर यह कहावत पूरी तरह फिट बैठती है. अयोध्या में राम की पैड़ी पर दीपोत्सव मनाने के लिए प्रदेश सरकार ने 5 लाख

50 हजार से अधिक के मिट्टी के दीये जलाने का लक्ष्य रखा था. इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए सरकार ने दीपोत्सव के बजट को बढ़ा दिया था. ऐसे में सरकार ही नहीं, दूसरे तमाम संस्थान भी दीपोत्सव को सफल बनाने के लिए कमर कस कर खड़े हो गए. अयोध्या के मंदिरों में भी ज्यादा से ज्यादा दीये जलाने का काम किया गया. दीये जलाने के साथ ही तमाम तरह के भव्य कार्यक्रम भी आयोजित किए गए.

फलस्वरूप, 6 लाख से अधिक दीये रोशन हो गए. पिछले साल दीपोत्सव के बाद अगली सुबह दीये पूरे अयोध्या में बिखरे पड़े थे. इस बार सरकार और अयोध्या नगर निगम ने कार्यक्रम खत्म होने के बाद ही कार्यक्रम स्थल से दीयों को समेटना शुरू कर दिया. इन दीयों को आधी रात के बाद सरयू नदी में प्रवाहित कर दिया गया. इस से अगली सुबह अयोध्या में राम की पैड़ी में दीये बिखरे नहीं दिखे. सरयू नदी में ये दीए वर्षों तक पानी रोकते रहेंगे, प्रदूषण फैलाएंगे, उस की चिंता योगी, मोदी को कहां. पिछले साल दीपोत्सव के बाद अयोध्या में बिखरे दीयों की वायरल हुई फोटो को ले कर सरकार की कड़ी आलोचना की गई थी.

दीपोत्सव को सफल बनाने के लिए प्रदेश सरकार के बड़े अफसर कई दिनों से तैयारी कर रहे थे. 3 दिनों तक चले दीपोत्सव के समापन वाले दिन दीये जगमगाए गए थे. दीवाली के दिन शाम को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, राज्यपाल आनंदी बेन पटेल और मुख्य अतिथि के रूप में फिजी गणराज्य की डिप्टी स्पीकर वीना भटनागर के साथ प्रदेश के डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा और केशव मौर्य भी मौजूद थे.

दीपोत्सव को ऐतिहासिक बनाने के लिए गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड्स के लोगों ने अयोध्या में एक समय में सब से अधिक दीये जलाने का रिकौर्ड दर्ज किया. राम और सीता को हैलिकौप्टर से सरयू के तट पर उतारा गया और तब मुख्यमंत्री ने उन की आरती उतारी.

राम के नाम पर भव्य आयोजन जनता को लुभाने का काम करते हैं. भव्य आयोजन में कोई कमी न रह जाए, इसलिए बजट बढ़ा दिया गया. पुलिस, पीडब्लूडी, कौर्पोरेशन के खर्च भी जोड़ लें, तो खर्च कहीं ज्यादा होगा. बजट के बढ़ने से सरकारी विभागों और गैरसरकारी संस्थाओं की रुचि इस में बढ़ गई. जिस प्रदेश में जनता रोजगार, नौकरी के लिए दरदर भटक रही हो वहां दीये जलाने के लिए सरकार करोड़ों रुपए फुजूल में खर्च कर रही है.

चर्चा में दीपोत्सव बजट

अयोध्या दीपोत्सव के बजट को ले कर असमंजस बना रहा. योगी सरकार ने अपने तीसरे अनुपूरक बजट में इस के लिए 6 करोड़ रुपए का बजट रखा था. इस के साथ ही साथ 100 करोड़ रुपए का बजट दूसरे धार्मिक स्थलों के लिए आवंटित किया गया. इस के बाद योगी सरकार ने अयोध्या के दीपोत्सव को राज्य उत्सव का दर्जा दे दिया. इस के बजट को बढ़ा कर 33 करोड़ रुपए कर दिया गया. अयोध्या दीपोत्सव के भारीभरकम खर्च को ले कर योगी सरकार की आलोचना शुरू हो गई. कुछ समाचारपत्रों में खर्च का आंकड़ा 133 करोड़ रुपए लिखा गया. फुजूलखर्ची की आलोचना से जागे योगी सरकार के अफसरों ने अपनी वैबसाइट पर इस खर्च को 1.33 करोड़ रुपए दिखाना शुरू कर दिया. सवाल उठता है कि 6 करोड़ और 33 करोड़ और 133 करोड़ रुपए के बाद अचानक यह खर्च घट कर 1.33 करोड़ रुपए कैसे हो गया?

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असल में योगी सरकार खुद इस खर्च के सही आंकड़े सामने नहीं रख रही है. बजट के बोझ को अलगअलग मदों में बांट दिया गया ताकि खर्च एक जगह कम दिखे. 6 लाख दीपक जलाने के लिए 133 करोड़ रुपए का खर्च भारीभरकम लग रहा था. एक दीपक जलाने में करीब 2,200 रुपए का खर्च दिख रहा था, जो हर तरह से आलोचना का विषय हो सकता था. सोशल मीडिया और वैबसाइट की खबरों में आलोचना शुरू हो गई. आलोचना से बचने के लिए आंकड़ों को कम दिखाने का काम किया गया. आंकड़ों की बाजीगरी कर के इस 133 करोड़ रुपए को 1.33 करोड़ रुपए कर दिया गया. ऐसा कैसे हो गया, यह शोध का विषय हो सकता है.

जानें, श्वेता तिवारी ने सलमान खान के शो के लिए क्या कहा

कलर्स चैनल पर प्रसारित होने वाला शो बिग बौस एक ऐसा शो है… जिसे  दर्शक खुब देखना पसंद करते हैं.  दर्शकों को इस शो का बेसब्री से इंतजार रहता है. यहां तक की जो कंटेस्टेंट इस शो में हिस्सा ले चुके प्रतिभागी भी नए सीजन को देखना पसंद करते हैं और कंटेस्टेंट को मशवरा भी देते हैं. लेकिन इस शो की विनर रह चुकी श्वेता तिवारी की ने कुछ ऐसा कह दिया, जिसे सुनकर आप भी चौंक जाएंगे. जी हां तो चलिए जानते है, क्या कहा श्वेता तिवारी ने.

श्वेता  तिवारी का कहना है कि उनके पास सलमान खान के इस शो को देखने के लिए टाइम ही नहीं है. जी हां हाल ही में एक इवेंट के दौरान श्वेता ने तिवारी ने बताया कि  वह बिग बौस 13 को फौलो नहीं कर रही है. जब श्वेता से इसकी वजह पूछी गई तो उन्होंने कहा कि, ‘मेरे पास इसे देखने का समय नहीं है…दूसरी बात मैं इसे कब देखूं…मेरे बच्चे है और मैं उनके सामने तो इसे नहीं देख सकती हूं.’

श्वेता ने आगे ये भी कहा कि, ‘अगर कोई बच्चों को सामने ऊंची आवाज में बात करेता है तो वो मुझसे कहते है कि आपको डांटा ?’  वे डर जाते हैं.  मैं नहीं चाहती हूं कि वह ये सब कुछ देखें. श्वेता तिवारी के काम की बात करें तो इस समय टीवी सीरियल में नजर आ रही है. उनके किरदार को फैंस पसंद भी कर रहे हैं.

आज ही के दिन राष्ट्रीय बेवफा घोषित हुई थी सोनम गुप्ता

अब से तीन साल पहले नोट बंदी के 8 दिन बाद सोनम गुप्ता नाम की एक काल्पनिक युवती सोनम गुप्ता खूब सुर्खियों में रही थी. किसी अनाम नोट बंदी पीड़ित द्वारा गढ़े इस किरदार और कहानी ने लोगों का नोट बंदी का दुख कम करने में अहम रोल निभाया था . सोनम गुप्ता  को लेकर तरह तरह के किस्से कहानी कुछ इस तरह सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे कि लोग भूल गए थे कि मोदी जी के एक सनक भरे फैसले ने उन्हें सड़क पर ला खड़ा कर दिया है.

सोनम गुप्ता कौन थी यह किसी को नहीं मालूम लेकिन उसकी बेवफाई ने हिंदुस्तानी प्रेमियों को अपनी भड़ास निकालने का मौका जरूर दे दिया था. सबसे पहले सोनम तब चर्चा में आई थी जब 2 हजार रुपए का एक नोट वायरल हुआ था जिस पर लिखा था, सोनम गुप्ता बेवफा है. बस फिर क्या था सोनम को लेकर तरह तरह की अफवाहों का दौर शुरू हो गया. फिर इस तरह के कई नोट वायरल हुए जिन पर सोनम गुप्ता बेवफा है लिखा था .

फिर किसी कहानीकार ने एक कहानी भी गढ़ दी जिसके मुताबिक सोनम गुप्ता अलीगढ़ के एक व्यापारी की बेटी थी. सोनम अपने पड़ोस में रहने बाले शर्मा जी के बेटे से प्यार करती थी जो कि इनकम टेक्स विभाग में कार्यरत थे. सोनम और उसका प्रेमी शादी करना चाहते थे लेकिन रूढ़िवादी गुप्ता जी गैर जात में लड़की व्याहने तैयार नहीं थे. बेटे की जिद देखकर शर्मा जी ने गुप्ता जी के घर जाकर शादी का प्रस्ताव रखा पर गुप्ता जी ने तैयार नहीं होना सो नहीं हुए.

सोनम और उसका प्रेमी मन मसोस कर रह गए लेकिन गुप्ता जी के इंकार को शर्मा जी ने अपने दिल पर ले लिया. फिर एक दिन गुप्ता जी के घर इनकमटेक्स का छापा पड़ गया . सोनम इस पर नाराज हो गई और उसने अपने प्रेमी को खूब खरीखोटी सुनाते हमेशा के लिए उससे नाता तोड़ने का ऐलान कर दिया. दुखी प्रेमी ने जेब से 2 हजार रु का तत्कालीन चमचमाता नोट निकाला और उस पर लिख दिया सोनम गुप्ता बेवफा है .

बस यहीं से सोनम गुप्ता की स्टोरी सत्यनारायन की कथा जैसी वायरल हुई और देखते ही देखते सोनम गुप्ता राष्ट्रीय बेवफा के खिताब से नवाज दी गई. मीडिया और सोशल मीडिया पर सोनम की बेवफाई के किस्से चटखारे ले लेकर सुनाये जाने लगे. सोनम की आड़ में लोगों ने नोट बंदी का अपना गम गलत किया. सोनम पर चुटकुले बने, गाने बने और लोगों की प्रेम अभिव्यक्ति भी प्रदर्शित हुई. जल्द ही लोगों ने यह कहना भी शुरू कर दिया कि सिर्फ सोनम ही नहीं बल्कि उसकी कजिन पूनम गुप्ता भी बेवफा है और वह अरविंद केजरीवाल की रिश्तेदार है.

यकीन माने अगर सोनम गुप्ता की कहानी इतने बड़े पैमाने पर तूल न पकड़ती तो मोदी जी को लेने के देने बन पड़ जाते. सोनम गुप्ता की कहानी अगर नोट बंदी से हैरान परेशान और त्रस्त देशवासियों का ध्यान नहीं बंटाती तो तय है गुस्साये लोग आगजनी और तोड़फोड़ कर अपना गुस्सा निकाल रहे होते और मोदी जी फिर एक बार नहीं हजार बार भी सार्वजनिक मंच से रोकर 50 दिन का वक्त मांगते तो लोग पसीजते नहीं और उन्हें 50 सेकंड का भी वक्त नहीं मिलता .

ऐसे में वह बेवफा ही सही सोनम गुप्ता ही थी जिसने मोदी जी को संकट से उबारा था .

‘‘मैं कहीं जा कर काम नहीं मांग सकती’’: माही गिल

पंजाबी फिल्मों से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाली अभिनेत्री माही गिल ने फिल्म ‘देव डी’ से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था. अनुराग कश्यप द्वारा निर्देशित मौडर्न देवदास की इस कहानी में माही ने पारो की भूमिका निभाई थी जिसे दर्शकों और आलोचकों ने काफी सराहा. इस के बाद वे ‘साहेब, बीवी और गैंगस्टर’, ‘पानसिंह तोमर’ आदि फिल्मों में नजर आईं. वे एक आत्मनिर्भर महिला हैं और एक 3 वर्षीया बेटी की मां हैं. स्वभाव से विनम्र और खूबसूरत माही अब वैब सीरीज ‘फिक्सर’ में मुख्य भूमिका निभा रही हैं.

माही से बातचीत के दौरान जब यह पूछा गया कि इस वैब सीरीज को करने की खास वजह क्या है, तो इस पर उन्होंने बताया, ‘‘यह एक अलग तरह की मनोरंजक कहानी है. असल में हम जीवन में हर चीज को फिक्स करते रहते हैं. मसलन, चौकलेट ला कर दोगे तो यह काम कर दूंगा या ड्रामा करना, कुछ लिए बिना मैं कोई काम नहीं कर सकता आदि होता है. मुझे याद आता है कि कालेज के जमाने में हम ट्रिपल राइडिंग कर फ्रैंड्स के साथ जाते थे और चालान होने पर ट्रैफिक पुलिस को अपना जन्मदिन कह कर छूट जाते थे.

‘‘इस सीरीज की कहानी भी हर व्यक्ति के जीवन में फिक्स को दिखाते हुए मनोरंजक तरीके से लिखी गई है. इस की स्क्रिप्ट मुझे बहुत पसंद आई. इस के पहले मैं ने काफी सीरियस फिल्में की हैं और अब कुछ हलकीफुलकी फिल्म करना चाह रही थी.’’

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वैब सीरीज में डरावनी कहानियां, सैक्स और गालीगलौज अधिक होता है जिसे सब लोग देख नहीं सकते. क्या निर्माता, निर्देशक को इस बात का ध्यान रखना जरूरी नहीं कि वे ऐसी वैब सीरीज बनाएं जिन का असर समाज पर अच्छा हो? वे सर्टिफिकेशन न होने की आजादी का गलत फायदा न उठाएं? इस सवाल पर माही कहती हैं, ‘‘यह सही है, लेकिन आजकल औनलाइन सबकुछ मिलता है. आप जो चाहें वह देख सकते हैं. हर तरह की फिल्में और वैब सीरीज आज बन रही हैं. कई बार मुझे भी लगता है कि आजादी मिलने की वजह से सैक्स और आइटम सौंग बिना जरूरत के भी दिखा दिए जाते हैं. उस पर रोक लगाने की जरूरत है. इस का दायित्व निर्मातानिर्देशक को अवश्य लेना चाहिए.’’

जब माही से यह पूछा गया कि उन्होंने पंजाबी और हिंदी फिल्मों में अच्छी ऐक्ंिटग की है, लेकिन फिल्मों में कम दिखी हैं. इस की वजह क्या मानती हैं? कितना मलाल है? तो माही ने कहा, ‘‘इस की वजह मैं खुद हूं क्योंकि मैं कहीं जा कर काम मांग नहीं सकती. मैं ने फिल्में बोल्ड की हैं पर रियल लाइफ में बहुत शर्मीली हूं. बहुत इन्ट्रोवर्ट और होमली महिला हूं, जो गलत है. मुझे खुल कर कहने की जरूरत थी, पर मैं ने नहीं कहा और यह मेरी ही गलती रही है. मैं बहुत संतुष्ट रहने वाली महिला हूं जिसे जीवन में बहुतकुछ नहीं चाहिए, पर काम के लिए लालची हूं. मैं ने ऐक्शन और कौमेडी फिल्में नहीं की हैं, उन्हें करने की इच्छा है.’’

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जब माही से प्रश्न पूछा गया कि कोई ऐसी फिल्म जिस ने आप की जिंदगी बदल दी, तो उन्होंने कुछ इस तरह जवाब दिया, ‘‘मेरी जिंदगी को बदलने वाली फिल्म ‘देव डी’ है जिस के बाद से मुझे हिंदी फिल्मों में एंट्री मिली. दर्शकों ने मुझे और मेरे काम को पहचाना. फिल्म ‘लम्हे’ ने मेरी जिंदगी को बहुत प्रभावित किया है और मुझे वैसी फिल्म करने की इच्छा है. मैं ने शुरू से चुनौती ली है और बोल्ड फिल्में भी की हैं. इसलिए ऐसा नहीं है कि मैं वैसी भूमिका करना पसंद करती हूं. मुझे हर नया किरदार पसंद है.’’

माही का चेहरा अभिनेत्री तब्बू से बहुत मेल खाता है, इस से उन्हें कोई फायदा मिला है या नहीं, पूछने पर माही मुसकराते हुए जवाब देती हैं कि बहुत लोगों ने उन्हें ऐसा कहा है, पर वे तब्बू की बहुत बड़ी फैन हैं और उन के साथ काम करने की इच्छा रखती हैं.

सफलता और असफलता आप के लिए क्या महत्त्व रखती हैं, पूछने पर माही कहती हैं, ‘‘मुझे सफलता फिल्मों में चाहिए जिस से मुझे आगे काम करने की प्रेरणा मिलती है. किसी फिल्म के सफल होने पर बहुत लोगों को आगे काम मिलता है. सफल न होने पर फिल्म का आगे बनना बंद हो जाता है. एक्टिंग मेरा पैशन है, पर उस के साथ पैसे की भी जरूरत है और मैं चाहती हूं कि मेरी हर फिल्म सफल हो. लाइफ में सफलता का अर्थ मेरे लिए अलग है, क्योंकि मैं अपनी जर्नी से संतुष्ट हूं.’’

अपने यहां तक पहुंचने में परिवार के सहयोग को ले कर माही बताती हैं, ‘‘मेरा परिवार अभी अमेरिका में है. पिता का देहांत हो चुका है. अभी मेरी मां हैं. जब मैं मुंबई आई थी तो वे काफी डरे हुए थे, पर अब ठीक हैं. मैं ने शुरू से अपने परिवार से कभी वित्तीय सहायता नहीं ली. उन का इमोशनल सपोर्ट हमेशा मेरे साथ रहा है. यह मेरे लिए बहुत है. मैं बहुत आत्मनिर्भर हूं. मेरी मां नहीं चाहती थीं कि मैं ऐक्ट्रैस बनूं क्योंकि उन्होंने मेरी शुरुआत की मेहनत फिल्मों में देखी थी.’’

अपनी बेटी के विषय पर पूछे जाने पर माही कहती हैं, ‘‘वह बहुत छोटी है. अभी 3 साल की है. उसे कुछ समझ नहीं है. जब बड़ी होगी, तब समझ में आएगा कि उसे क्या करना है. मैं ने एक स्वाधीन जिंदगी जी है और बेटी को भी वैसी ही जिंदगी देना चाहती हूं.’’

माही से यह पूछने पर कि क्या कोई सामाजिक काम है जिसे वे करती हों, तो इस पर उन का कहना है, ‘‘मैं बच्चों को पढ़ाती हूं क्योंकि शिक्षा हर किसी के लिए जरूरी है. मैं किसी भिखारी को कभी भीख नहीं देती, खाना खिलाती हूं. भ्रूण हत्या पर मेरी पूरी निगाह रहती है और उसे कम करने की दिशा में मैं काम करती हूं. इस के अलावा बेजबान जानवरों के लिए भी काम करना पसंद करती हूं.’’

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मेरा फुटबौल और बाबा की कुटिया

पच्हत्तर बरस की उम्र में कभी बचपन की शरारतें याद आ जाती हैं तो मैं खिलखिला कर हंस पड़ता हूं. मेरा पोता पूछता, ‘दादाजी अब क्यों हंसे?’ मैं बोलता, ‘कुछ नहीं, बस यूं ही कुछ याद आ गया…’ मगर उस दिन जब मैं देर तक हंसता रहा तो पोते के साथ-साथ बेटा भी कहने लगा, ‘पापा, अकेले-अकेले क्यों हंस रहे हो, हमें भी बताओ न क्या बात है?’

मैं हंसते हुए बोला, ‘अरे, अपने बचपन का एक किस्सा याद आ गया, इसीलिए हंस रहा हूं. बचपन में खूब बदमाशियां की हैं. आओ, सुनाता हूं वह किस्सा.’

फिर तो दोनों वहीं मेरे पलंग पर चढ़ कर बैठ गये. मैंने कहानी शुरू की. बोला – बचपन में तो हम गांव में ही रहे. वहीं पढ़े-लिखे. उन दिनों हमारे गांव के आसपास विद्यालयों की संख्या बहुत ही कम थी. मुझे भी करीब दस किलोमीटर दूर पढ़ने के लिए लिए जाना पड़ता था. मेरे स्कूल के रास्ते में एक नदी पड़ती थी और उसके किनारे एक श्मशान था. नदी किनारे इसी श्मशान में आसपास के गांवों के लोग अपने मृतक परिजनों को जलाते थे. कभी-कभी लाशें आधी-अधूरी ही जलती छोड़ जाते थे. फिर कुत्ते या सियार उनका मांस नोंचते रहते थे और हड्डियां छोड़ जाते थे. उस श्मशान में काफी हड्डियां इधर उधर बिखरी पड़ी रहती थीं. हमारे स्कूल का वक्त सुबह ग्यारह बजे का था और करीब तीन बजे तक पढ़ाई होती थी. स्कूल खत्म होने के बाद भी हम बड़ी देर तक वहीं ग्राउंड में खेलते रहते थे. घर लौटते-लौटते शाम हो जाती थी. सर्दियों के दिनों में तो पांच-छह बजे ही अंधेरा हो जाता था. मेरे साथ के लड़के नदी पर पहुंच कर बहुत डरते थे. श्मशान में अक्सर मुर्दे जलते दिख जाते थे. सारे दोस्त हनुमान चालीसा पढ़ते हुए वहां से निकलते थे, मगर मेरे अंदर डर नाम की चीज ही नहीं थी. मैं सबसे आगे उछलता-कूदता नदी किनारे पड़े नरमुंडों को फुटबाल बनाकर खेलता हुआ चला आता था. फुटबॉल मेरा प्रिय खेल था, मगर पिताजी की आर्थिक हैसियत इतनी नहीं थी कि मुझे फुटबॉल खरीद कर दे पाते. सो मैं नरमुंडों को ही फुटबॉल बना कर खेलता था. घर में कोई सोच ही नहीं सकता था कि एक बारह-तेरह बरस का बालक ऐसी हरकत कर सकता है. हमारे गांव के बाहर ही एक साधु बाबा की कुटिया थी. जिसे गांव वाले ‘बाबा की कुटिया’ के नाम से पुकारते थे. बाबा की कुटिया तक मेरा फुटबॉल का खेल चालू रहता था और फिर मैं वहीं गांव के बाहर नरमुंड को छोड़कर घर आ जाता था.

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एक रोज हुआ यह कि मैंने नरमुंड को किक मारा तो वह उछल कर बाबा की कुटिया के करीब कहीं जा गिरा. मुझे घर आने की जल्दी थी, अंधेरा भी था तो मैं उसे ढूंढने भी नहीं गया. अब साधू बाबा ने जो अपने चबूतरे पर नरमुंड देखा तो बौखला उठे. भागे-भागे गांव में आये, शोर मचाया और फिर हमारे घर के दरवाजे पर बिछी खटिया पर आ गिरे. पिताजी ने बाबा जी को पानी पिलाया. हांफने-कांपने की वजह पूछी तो साधू बाबा कंपकंपाते हुए बोले – कि उनके दरवाजे पर एक नरमुंड पड़ा है. गांव के दूसरे लोग भी वहीं आ जमे. सब परेशान, किसी को समझ नहीं आ रहा था कि आखिर साधु बाबा के दरवाजे पर नरमुंड कैसे पहुंचा? उस दिन तो पिता जी और गांव के दूसरे लोग किसी तरह समझा-बुझा कर साधु बाबा को उनकी कुटिया तक छोड़ आये. एक लकड़ी की मदद से उस नरमुंड को भी वहां से हटा कर दूर फेंक दिया गया. उस दिन की घटना से मेरा बड़ा मनोरंजन हुआ. मेरा उत्साह बढ़ा. फिर तो यह करीब-करीब रोज का हाल हो गया. मैं स्कूल से लौटते वक्त किसी न किसी नरमुंड को फुटबॉल बनाकर खेलता आता और साधु बाबा की कुटिया के आसपास छोड़ कर घर आ जाता. बाबा जी जब कोई नरमुंड देखते डर के मारे भागे-भागे गांव आते और सबको इकट्ठा कर लेते. मेरा घर गांव में घुसने पर सबसे पहले पड़ता था तो अक्सर वह वहीं बैठ कर पिताजी को ही अपना दुखड़ा सुनाते थे. अब गांव वालों के बीच भी चर्चा होने लगी कि आखिर साधु बाबा के दरवाजे पर ही नरमुंड क्यों आते हैं किसी और के दरवाजे पर क्यों नहीं आते? जरूर यह कोई ढोंगी बाबा होगें, तभी तो भगवान इनसे रुष्ट है और इनको सबक सिखाने के लिए नरमुंड भेजता है. गांव के अनपढ़ लोगों के बीच भ्रांतियां जल्दी विस्तार पा जाती हैं. धीरे-धीरे लोग उन साधु बाबा से दूरी बनाने लगे. पहले हर दिन गांव के किसी न किसी घर से उनका खाना जाता था, लोग दूध-दही और घी भी पहुंचा देते थे, अब वह भी कम हो गया. साधु बाबा बड़े परेशान हुए. एक तो नरमुंडों ने उन्हें डरा रखा था, और दूसरी ओर लोग उनको गलत आदमी समझने लगे थे और उनका फ्री का भोजन-पानी बंद हो गया था.

एक दिन किसी राजनेता के मरने पर हमारे स्कूल की जल्दी छुट्टी हो गयी. दोपहर का वक्त था. मैं रोज की आदत के अनुसार दोस्तों से काफी आगे उछलता-कूदता चला आ रहा था. श्मशान के करीब से गुजरा तो एक बड़ी सी हड्डी पड़ी नजर आयी. मैं हड्डी को अपनी ठोकर से उछालता चला आता था. साधु बाबा की कुटिया के पास पहुंचा तो देखा बाबाजी अपनी कुटिया के चबूतरे पर हुक्का गुड़गुड़ाते बैठे थे. अब आखिरी बार जो ठोकर पर हड्डी उछली तो जाकर सीधी गिरी बाबाजी के सामने.

बाबाजी ने एक नजर हड्डी पर डाली और दूसरी मुझ पर. मैं समझ गया कि आज तो बेटा खैर नहीं. बस्ता लिए तेजी से घर की ओर दौड़ लगा दी. अब आगे-आगे मैं और पीछे-पीछे धोती संभालते बाबाजी. मैं धड़धड़ाते हुए घर का दरवाजा खोलकर भीतर घुस गया. पलंग पर बस्ता पटका ही था कि साधु बाबा भी धड़धड़ाते हुए घर में दाखिल हो गये और गरज कर पिताजी का नाम लेकर बोले, ‘रामसुख बाहर निकालो अपने बदमाश लड़के को, सारी फसाद की जड़ यही है. यही हमारे दरवाजे नरमुंड इकट्ठे करता है.’ उनकी चिल्ल-पुकार सुनकर पिताजी भागे आये.

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मैं अंदर कमरे में डर के मारे मां के पीछे दुबका खड़ा था. साधु बाबा का चीखना-चिल्लाना सुन कर थर-थर कांप रहा था. पक्का था कि आज तो बाबाजी मुझे पिताजी के हाथों पिटवाये बिना जाएंगे नहीं. इतने में पिताजी ने कड़कदार आवाज में मुझे पुकारा. मैं डरता-डरता गया तो उन्होंने पूछा, ‘क्यों रे क्या कह रहे हैं बाबाजी? तू डालता है इनके दरवाजे पर नरमुंड?’

मैंने हकलाते हुए कहा, ‘वो तो मैं खेलते हुए आता हूं… फुटबॉल की तरह…’

मेरे मुंह से सच सुनकर साधु बाबा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया. आखिर मेरे कारण ही तो इतने दिनों से उनका फ्री का भोजन-पानी बंद था. लोग उनसे बच-बच कर चलने लगे थे. उनको पापी समझने लगे थे. उस दिन उनका गुस्सा खूब उबला. चीख-चीख कर गांव भर को इकट्ठा कर दिया. बड़ी मुश्किल से लोगों ने उन्हें समझाया कि बच्चा है, खेल-खेल में समझ नहीं पाया. आखिरकार मेरे पिताजी को बुरा-भला बोलते हुए साधु बाबा चलने को हुए तो फिर पलट कर बोले, ‘बड़ा हैरान किया रामसुख तुम्हारे लड़के ने, समझा कर रखो इसे. इतना घोर पाप किया है इसने. बेकार ही इसे स्कूल भेजते हो, यह तुम्हारा नाम डुबाएगा, कभी किसी जमात में पास नहीं होगा…’ तो ऐसे साधु बाबा मुझे कोसते और भुनभुनाते हुए चले गये.

अब पिताजी बड़े चिन्तित हो गये कि बाबाजी श्राप दे गये, गांव वाले भी कहने लगे कि बाबा जी को नाराज किया है, अब तो इसका पास होना मुश्किल ही है. मगर मेरी मां ने कहा कि जाने दो, मैं जानती हूं अपने बच्चे को, यह ठीक से पढ़ेगा तो काहे को फेल होगा?

तब आठवीं की बोर्ड परीक्षा होती थी. जब मैं आठवीं कक्षा में अच्छे नम्बरों से पास हो गया तो पिताजी यह खुशखबरी मिठाई के साथ साधु बाबा को सुनाने गये. साधु बाबा अब तक मन में गुस्सा लिये बैठे थे, मिठाई तो झट से ले ली मगर भुनभुनाते हुए बोले, ‘घोर कलयुग है… घोर कलयुग है.’

कहानी सुना कर मैं जोर जोर से हंसने लगा और साथ में बेटा और पोता भी खिलखिला उठे.

प्रेम तर्पण : भाग 2

‘प्रिय माधव,

‘मैं जानती हूं कि मैं तुम्हारे लिए अबूझ पहेली ही रही. मैं ने कभी तुम्हें कोई सुख नहीं दिया, न प्रेम, न संतान और न जीवन. मैं तुम्हारे लायक तो कभी थी ही नहीं, लेकिन तुम जैसे अच्छे पुरुष ने मुझे स्वीकार किया. मुझे तुम्हारा सान्निध्य मिला यह मेरे जन्मों का ही फल है, लेकिन मुझे दुख है कि मैं कभी तुम्हारा मान नहीं कर पाई, तुम्हारे जीवन को सार्थक नहीं कर पाई. तुम्हारी दोस्त, पत्नी तो बन गई लेकिन आत्मांगी नहीं बन पाई. मेरा अपराध क्षम्य तो नहीं लेकिन फिर भी हो सके तो मुझे क्षमा कर देना माधव, तुम जैसे महापुरुष का जीवन मैं ने नष्ट कर दिया, आज तुम्हारा कोई तुम्हें अपना कहने वाला नहीं, सिर्फ मेरे कारण.

‘मैं जानती हूं तुम ने मेरी कोई बात कभी नहीं टाली इसलिए एक आखिरी याचना इस पत्र के माध्यम से कर रही हूं. माधव, जब मेरी अंतिम विदाईर् का समय हो तो मुझे उसी माटी में मिश्रित कर देना जिस माटी ने मेरा निर्माण किया, जिस की छाती पर गिरगिर कर मैं ने चलना सीखा. जहां की दीवारों पर मैं ने पहली बार अक्षरों को बुनना सीखा.

जिस माटी का स्वाद मेरे बालमुख में कितनी बार जीवन का आनंद घोलता रहा. मुझे उसी आंगन में ले चलना जहां मेरी जिंदगी बिखरी है. ‘मैं समझती हूं कि यह तुम्हारे लिए मुश्किल होगा, लेकिन मेरी विनती है कि मुझे उसी मिट्टी की गोद में सुलाना जिस में मैं ने आंखें खोली थीं. तुम ने अपने सारे दायित्व निभाए, लेकिन मैं तुम्हारे प्रेम को आत्मसात न कर सकी. इस डायरी के पन्नों में मेरी पूरी जिंदगी कैद थी, लेकिन मैं ने उस का पहले ही अंतिम संस्कार कर दिया, अब मेरी बारी है, हो सके तो मुझे क्षमा करना.

‘तुम्हारी कृतिका.’

माधव सहम गया, डायरी के कोरे पन्नों के सिवा कुछ नहीं था, कृतिका यह क्या कर गई अपने जीवन की उस पूजा पर परदा डाल कर चली गई, जिस में तुम्हारी जिंदगी अटकी है. आज अस्पताल में हरेक सांस तुम्हें हजारहजार मौत दे रही है और हम सब देख रहे हैं. माधव ने डायरी के अंतिम पृष्ठ पर एक नंबर लिखा पाया, वह पूर्णिमा का नंबर था. पूर्णिमा कृतिका की बचपन की एकमात्र दोस्त थी. माधव ने खुद से प्रश्न किया कि मैं इसे कैसे भूल गया. माधव ने डायरी के लिखा नंबर डायल किया.

‘‘हैलो, क्या मैं पूर्णिमाजी से बात कर रहा हूं, मैं उन की दोस्त कृतिका का पति बोल रहा हूं,‘‘

दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘नहीं मैं उन की भाभी हूं. दीदी अब दिल्ली में रहती हैं.’’ माधव ने पूर्णिमा का दिल्ली का नंबर लिया और फौरन पूर्णिमा को फोन किया, ‘‘नमस्कार, क्या आप पूर्णिमाजी बोली रही हैं.’‘

‘‘जी, बोल रही हूं, आप कौन ’’

‘‘जी, मैं माधव, कृतिका का हसबैंड.’’

पूर्णिमा उछल पड़ी, ‘‘कृतिका. कहां है, वह तो मेरी जान थी, कैसी है वह  कब से उस से कोई मुलाकात ही नहीं हुई. उस से कहिएगा नाराज हूं बहुत, कहां गई कुछ बताया ही नहीं,’’ एकसाथ पूर्णिमा ने शिकायतों और सवालों की झड़ी लगा दी. माधव ने बीच में ही टोकते हुए कहा, ‘कृतिका अस्पताल में है, उस की हालत ठीक नहीं है. क्या आप आ सकती हैं मिलने ’’ पूर्णिमा धम्म से सोफे पर गिर पड़ी, कुछ देर दोनों ओर चुप्पी छाई रही. माधव ने पूर्णिमा को अस्पताल का पता बताया. ‘‘अभी पहुंचती हूं,’’ कह कर पूर्णिमा ने फोन काट दिया और आननफानन में अस्पताल के लिए निकल गई. माधव निर्णयों की गठरी बना कर अस्पताल पहुंच गया. कुछ ही देर बाद पूर्णिमा भी वहां पहुंच गई. डा. सुकेतु की अनुमति से पूर्णिमा को कृतिका से मिलने की आज्ञा मिल गई.

पूर्णिमा ने जैसे ही कमरे में प्रवेश किया, कृतिका को देख कर गिरतेगिरते बची. सौंदर्य की अनुपम कृति कृतिका आज सूखे मरते शरीर के साथ पड़ी थी. पूर्णिमा खुद को संभालते हुए कृतिका की बगल में स्टूल पर जा कर बैठ गई. उस की ठंडी पड़ती हथेली को अपने हाथ से रगड़ कर उसे जीवन की गरमाहट देने की कोशिश करने लगी. उस ने उस के माथे पर हाथ फेरा और कहा, ‘‘कृति, यह क्या कर लिया तूने  कौन सा दर्द तुझे खा गया  बता मुझे कौन सी पीड़ा है जो तुझे न तो जीने दे रही है न मरने. सबकुछ तेरे सामने है, तेरा परिवार जिस के लिए तू कुछ भी करने को तैयार रहती थी, तेरा उन का सगा न होना यही तेरे लिए दर्द का कारण हुआ करता था, लेकिन आज तेरे लिए वे किसी सगे से ज्यादा बिलख रहे हैं. इतने समझदार पति हैं फिर कौन सी वेदना तुझे विरक्त नहीं होने देती.’’ कृति की पथराई आंखें बस दरवाजे पर टिकी थीं, उस ने कोई उत्तर नहीं दिया.

पूर्णिमा कृति के चेहरे के भावों को पढ़ने की कोशिश कर रही थी, कुछ देर उस की आंखों में उस की पीड़ा खोजते हुए पूर्णिमा ने धीरे से कहा, ‘‘शेखर, कृति की पथराई आंख से आंसू का एक कतरा गिरा और निढाल हाथों की उंगलियां पूर्णिमा की हथेली को छू गईं. पूर्णिमा ठिठक गई, अपना हाथ कृतिका के सिर पर रख कर बिलख पड़ी, तू कौन है कृतिका, यह कैसी अराधना है तेरी जो मृत्यु शैय्या पर भी नहीं छोड़ती, यह कौन सा रूप है प्रेम का जो तेरी आत्मा तक को छलनी किए डालता है.’’ तभी आवाज आई, ‘‘मैडम, आप का मिलने का समय खत्म हो गया है, मरीज को आराम करने दीजिए.’’

पूर्णिमा कृतिका के हाथों को उम्मीदों से सहला कर बाहर आ गई और पीछे कृतिका की आंखें अपनी इस अंतिम पीड़ा के निवारण की गुहार लगा रही थीं. उस की पुतलियों पर गुजरा कल एकएक कर के नाचने लगा था. कृतिका नाम मौसी ने यह कह कर रखा था कि इस मासूम की हम सब माताएं हैं कृतिकाओं की तरह, इसलिए इस का नाम कृतिका रखते हैं. कृतिका की मां उसे जन्म देते ही इस दुनिया से चल बसी थीं. मौसी उस 2 दिन की बच्ची को अपने साथ लेआई थीं, नानी, मामी, मौसी सब ने देखभाल कर कृतिका का पालन किया था. जैसेजैसे कृतिका बड़ी हुई तो लोगों की सहानुभूति भरी नजरों और बच्चों के आपसी झगड़ों ने उसे बता दिया था कि उस के मांबाप नहीं हैं. परिवार में प्राय: उसे ले कर मनमुटाव रहता था. कई बार यह बड़े झगड़े में भी तबदील हो जाता, जिस के परिणामस्वरूप मासूम छोटी सी कृतिका संकोची, डरी, सहमी सी रहने लगी. वह लोगों के सामने आने से डरती, अकसर चिड़चिड़ाया करती, लोगों की दया भरी दलीलों ने उस के भीतर साधारण हंसनेबोलने वाली लड़की को मार डाला था.

 

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