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भोपाल में शुरू हुई भोजपुरी फिल्म की शूटिंग, चांदनी सिंह के साथ पहुंचे अरविंद अकेला

अपनी फिल्मों के जरिये  दर्शकों का खूब मनोरंजन करने वाली आदि शक्ति इंटरटेनमेंट की नयी फिल्म गुमराह की शूटिंग इन दिनों भोपाल में तेजी से चल रही है. इस भोजपुरी फिल्म में वर्सेलटाइल एक्टर अरविन्द अकेला कल्लू और यू-ट्यूब की सनसनी चांदनी सिंह के साथ द मोस्ट टैलेंटेड एक्ट्रेस पूनम दुबे तथा अयाज़ खान, बंधु खन्ना और संजय पांडे की मुख्य भूमिका है. इस फिल्म को निर्देशित कर रहे हैं रवि सिन्हा. फिल्म को संगीत दिया है श्याम आजाद ने जबकि कथा, पटकथा और संवाद तैयार किया है शाजिद शमसेद ने.

फिल्म को लेकर एक्साइटेड हैं चांदनी सिंह…

फिल्म गुमराह को लेकर पूरी टीम में शूटिंग के दौरान गजब का उत्साह दिखाई दे रहा है. फिल्म की नायिका चांदनी सिंह कहती हैं मैं पहली बार आदि शक्ति इंटरटेनमेंट की फिल्म कर रही हूं और दुर्गाप्रसाद मजूमदार सर का नाम मैनें काफी सुना है. एक अच्छे प्रोडक्शन हाऊस में काम करना सबका सपना होता और अगर आदि शक्ति इंटरटेनमेंट जैसा प्रोडक्शन हाउस और  रवि सिन्हा जी जैसे समझदार निर्देशक मिल जायें तो यह सोने पर सुहागा होता है.

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मैं काफी मेहनत कर रही हूं- पूनम दुबे

फिल्म की दूसरी नायिका पूनम दुबे का कहना है- इस फिल्म में मेरी भूमिका लीक से हटकर है और मैं अपनी भूमिका के लिये काफी मेहनत कर रही हूं. फिल्म के निर्देशक रवि सिन्हा कहते हैं यह फिल्म दूसरी भोजपुरी फिल्मों से काफी अलग है.

ऐसे की अरविंद अकेला कल्लू की तारीफ…

एक्टर अरविंद अकेला कल्लू के बारे में फिल्म के निर्माता दुर्गाप्रसाद मजूमदार कहते हैं अरविंद अकेला कल्लू में गजब का डेडिकेशन है. दुर्गाप्रसाद मजूमदार कहते हैं मैने दिनेशलाल यादव निरहुआ और खेशारी लाल यादव सबके साथ काम किया है मगर अरविंद अकेला कल्लू में काफी लगन है अपने काम के प्रति. वे बहुत दूर तक जायेंगे.

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एडिट बाय- निशा राय

‘‘कश्मीर में बहुत सी मानवीय कहानियां हैं’: प्रवीण मोरछले

मूलतया मध्य प्रदेश निवासी और ?यूनेस्को गांधी मैडल 2018  पुरस्कार विजेता व राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार 2018 के विजेता फिल्मकार प्रवीण मोरछले ने कैरियर की शुरुआत थिएटर से की थी. इस के बाद उन्होंने कई लघु फिल्में निर्देशित कीं. 2013 में बतौर लेखक व निर्देशक अपनी पहली फीचर फिल्म ‘बेयरफुट टू गोवा’ से उन्होंने इंटरनैशनल स्तर पर पर अपनी एक पहचान हासिल की. क्रिटिक्स ने उन्हें एक नई लहर के रूप में भारतीय सिनेमा के फिल्म निर्माता के रूप में देखा. वे अपने सरल, सूक्ष्म, काव्य सिनेमा के लिए जाने जाते हैं. उन की दूसरी फिल्म ‘वाकिंग विद द विंड’ को 2018 में 3 राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाजा गया. यह लद्दाखी भाषा की फिल्म थी.

अब उन की तीसरी फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ ने 6 माह के अंदर 5 इंटरनैशनल अवार्ड जीते हैं, जबकि 11 इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल्स में इंटरनैशनल कंपीटिशन का हिस्सा रही. इसराईल, कोरिया, आस्ट्रेलिया जैसे देशों में फिल्म ने धूम मचाई है.

प्रवीण मोरछले से यह पूछने पर कि आप की पिछली फिल्म ‘वोकिंग विद द विंड’ को 3 राष्ट्रीय पुरस्कारों के अलावा कुछ अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे. इस का आप के कैरियर व जिंदगी पर क्या असर हुआ? क्या अब आप की नई फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ को फायदा मिल रहा है? वे कहते हैं, ‘‘देखिए, राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद ऐसा कुछ नहीं हुआ कि मेरे पास निर्माताओं की कतार लग गई हो और सभी ने मुझ से कहा हो कि मेरे साथ फिल्में बनाना चाहते हैं. मगर राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने पर हमें गर्व का एहसास होता है कि हमारे देश ने हमारे काम को सराहा. लेकिन इस के चलते ऐसा कुछ नहीं हुआ कि कुछ बेहतरीन कहानीकारों ने मेरे सामने अपनी कहानी ला कर रख दी हो कि इस पर फिल्म बननी चाहिए. किसी ने मुझे पैसा ला कर नहीं दिया कि आप फिल्म बनाएं, धन हम लगाते हैं.

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‘‘पर मैं चुप नहीं बैठा. फिल्म ‘वाकिंग विद द विंड’ को 3 राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद मैं ने अपने पैसे लगा कर नई फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ का निर्माण किया है.’’

आमतौर पर माना जाता है कि जब किसी निर्देशक की फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिल जाता है तो उस के लिए अपनी अगली फिल्म को भी सिनेमाघरों में पहुंचाना आसान हो जाता है. आप के अनुभव क्या हैं? इस प्रश्न पर प्रवीण जवाब देते हैं, ‘‘मुझे तो ऐसा कुछ नहीं लगता. हालात जिस तरह से बदतर हुए हैं उस में अच्छी से अच्छी फिल्म को भी सिनेमाघर में ले आना टेढ़ी खीर हो गया है. आज की तारीख में सबकुछ गणित पर चल रहा है. अब सिनेमाघरों में फिल्म के पहुंचने के कई पैमाने हो गए हैं.

‘‘फिल्म में कलाकार कौन हैं, स्टार कलाकार हैं या नहीं, फिल्म कितने दिन सिनेमाघर में चल पाएगी, फिल्म कितनी कमाई करेगी और डिस्ट्रिब्यूटर को या सिनेमाघर के मालिक को कितना कमा कर देगी? इन सभी के आधार पर फिल्म रिलीज होती है. मेरी फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ में सभी नए कलाकार हैं. कुछ तो नौन आर्टिस्ट हैं.

‘‘फिल्म को सिनेमाघरों में रिलीज करने की दूसरी समस्या यह है कि दर्शकों को सिनेमा घर तक ले कर आना आसान काम नहीं है. इस की वजह यह है कि दर्शकों की सोच यह बन गई है कि यह छोटे बजट की फिल्म है अथवा पुरस्कृत फिल्म है, तो बहुत जल्दी टीवी पर या किसी सैटेलाइट चैनल या नैटफ्लिक्स और एमेजौन पर आएगी, तब देख लेंगे.’’

फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ क्या है? इस पर प्रवीण कहते हैं, ‘‘हमारी फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ की कहानी कश्मीर की ‘हाफ विडो’ की है. यह शब्द बहुत दुख देने के साथ ही अच्छा भी नहीं लगता. कश्मीर में ‘हाफ विडो’ उन महिलाओं को कहा जाता है जिन महिलाओं के पति गायब हैं. कश्मीर में पिछले 40 वर्षों के दौरान तमाम औरतों के पति गायब होते रहे हैं जिन का कुछ पता नहीं चलता कि वे मर गए या जिंदा हैं. यदि जिंदा हैं, तो कहां हैं? उन की मृत्यु स्थापित नहीं हो पाती है. इस के चलते इन महिलाओं को विधवा नहीं माना जाता.

‘‘हमारी फिल्म की कहानी बहुत मार्मिक है. यह कहानी आसिया नामक एक ऐसी महिला की है जो अपने पति की मौत का प्रमाणपत्र लेने के लिए दरदर भटक रही है. हर किसी को पता है कि भारतीय कानून के अनुसार 7 साल तक किसी को भी मृत नहीं माना जाता. कश्मीर की औरतें अपने पति के गायब होने पर 7 साल तक दुख और जिल्लतभरी जिंदगी जीती हैं. यह एक गंभीर और सोचने पर मजबूर करने वाली कहानी है. इसी के चलते पूरी दुनिया में इस फिल्म को बहुत सराहा गया.’’

यह कहानी आप के दिमाग में कैसे आई? थोड़ा विचारने पर प्रवीण उत्तर देते हुए कहते हैं, ‘‘2 साल पहले किसी अखबार में एक खबर पढ़ी थी जिस में ‘हाफ विडो’ का जिक्र था. मुझे बड़ा अजीब सा लगा. मैं ने अब तक विधवा, शादीशुदा या कुंआरी कन्या यही सब सुना था. मुझे पता ही नहीं था कि ‘हाफ विडो’ भी होता है. इस से मेरे मन में कुतूहल जागा. फिर मैं ने इंटरनैट वगैरह पर काफी रिसर्च की तो पता चला कि कश्मीर की औरतें किस तरह दर्दनाक जिंदगी जी रही हैं. 10 दिनों के अंदर मैं कश्मीर पहुंच गया. कई गांवों में गया. कुछ औरतों से बातचीत की. कुछ सरकारी अफसरों से दफ्तरों में जा कर बात की. कुछ डौक्युमैंट्स इकट्ठे किए. फिर वहां मौजूद कुछ किताबें पढ़ीं. उसी आधार पर मैं ने अपनी फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ की पटकथा तैयार की.’’

प्रवीण से पूछने पर कि आप ने अपनी फिल्म में किस बात को प्रधानता दी है, तो वे कहते हैं, ‘‘मेरी आदत है कि मैं एक मुख्य किरदार के इर्दगिर्द कई दूसरे किरदार रचता हूं. इस में कुछ किरदार बहुत ही व्यंग्यप्रधान हैं, तो कुछ बहुत साधारण. इस के अलावा कहानी कश्मीर की है तो कश्मीर का पूरा माहौल है. मेरी फिल्में मेलोड्रामा नहीं होतीं. मैं कभी भी किसी भी मुद्दे पर जजमैंटल नहीं होता. बहुत ज्यादा कटाक्ष नहीं करता. मेरी कोशिश होती है कि मैं अपनी तरफ से सारे तथ्य सामने रख दूं, उस के बाद दर्शक खुद देख कर अपना निर्णय लें. मैं ने एक बहुत ही गंभीर फिल्म बनाई है जो लोगों को प्रभावित करेगी.’’

इस के बाद की क्या योजना है? इस पर वे कहते हैं, ‘‘मैं अपनी अगली फिल्म कश्मीर में ही बनाने वाला था. लेकिन अभी जो परिस्थितियां हैं, उस के हिसाब से वहां काम करना आसान नहीं है. तो मैं परिस्थितियों के सुधरने का इंतजार करूंगा.’’

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कश्मीर से आप को कुछ ज्यादा ही लगाव है? इस पर वे कुछ यों जवाब देते हैं, ‘‘जी हां, मुझे पहाड़ व प्रकृति से लगाव है. दूसरी बात यह है कि कश्मीर खूबसूरत भी बहुत है. वहां बहुत सारी मानवीय कहानियां भी हैं. मेरा मानना है कि जहां बहुत सारी तकलीफें होती हैं, परिस्थितियां सही नहीं होती हैं, वहां पर मानवीय कहानियां भी सब से ज्यादा निकलती हैं. अगर आप देखेंगे तो आज उस चीज के बल पर ही हम जिंदा हैं. मानवता की हमेशा जीत होती है. बहुत सारी चीजें हैं जिन को देख कर लगता है कि यह कहानी लोगों तक पहुंचनी चाहिए. ऐसी कहानियों की कश्मीर में भरमार है.’’

इसराईल और अमेरिका की संस्कृति और माहौल में काफी अंतर है. इन 2 विपरीत माहौल वाले देशों में भी आप की फिल्म को क्यों सराहा गया? इस सवाल पर प्रवीण कहते हैं, ‘‘इसराईल में हमारी फिल्म येरूशलम फिल्म फैस्टिवल में दिखाई गई. फ्रांस, जरमनी, बेल्जियम, ईरान और अमेरिका में भी फिल्म दिखाई गई. बेल्जियम में हमारी फिल्म को अवार्ड मिला. हमारी फिल्म ‘विडो औफ साइलैंस’ भारत की पहली फिल्म होगी जोकि बेल्जियम के सिनेमाघरों में रिलीज होगी. अमेरिका के सभी बड़ेबड़े फिल्म फैस्टिवल्स में यह दिखाई जा चुकी है.

‘‘देखिए, पूरे विश्व के लोगों की भावनाएं एकजैसी हैं. हमारा हंसना, हमारा रोना, हमारे दर्द, ये सारी भावनाएं एकजैसी हैं. फिर चाहे हम एशिया के हों या अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका से क्यों न हों. मानवीय दर्द व व्यथा की कथा पूरे विश्व के लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करती है. जब हम इंसानी संघर्ष की बात करते हैं तो हर कोई उस से रिलेट करता है. मेरी फिल्म की कहानी जमीन से जुड़ी होती है, बहुत ही जमीनी सचाई को बयां करती है. इसलिए वह ग्लोबली बहुत बड़ा असर डालती है. मेरी कोशिश रहती है कि मैं अपनी फिल्म में संवाद कम रख कर दृश्य ज्यादा रखूं.’’

मगर पारिवारिक भावनाएं जितनी भारत, ईरान व इसराईल में गहरी हैं  उतनी अमेरिका में नहीं हैं? इस पर वे बताते हैं, ‘‘यदि आप गहराई से देखेंगे तो पता चलेगा कि यूरोप व अमेरिका जैसे देशों में इन दिनों वे फिल्में बहुत पसंद की जा रही हैं जिन में समाज या परिवार की बात की गई हो क्योंकि वहां लोग बहुत ज्यादा बिखर गए हैं, उन्हें अब परिवार की कमी अखर रही है. उदाहरण के लिए आप पिछले वर्ष की औस्कर विजेता फिल्म ‘रोमा’ को ही लें. इस में एक परिवार की कहानी है. परिवार के अंदर जो नौकरानी काम करती है, उस की कहानी है.’’

कश्मीर में शूटिंग के क्या अनुभव रहे? इस प्रश्न पर वे जवाब देते हुए कहते हैं, ‘‘वहां के लोग बहुत अच्छे हैं. कश्मीर के लोगों का खानपान, रहनसहन अच्छा है. वे हर किसी से दिल से मिलते हैं. कमाल के लोग हैं. वे सही मानो में कलाकार हैं. बेसिकली सूफियाना लोग हैं. सूफी आर्टिस्टिक नेचर के होते हैं. यदि आप को उन का दिल जीतना है तो उन को इज्जत देनी पड़ेगी. हमें तो उन्होंने बहुत अच्छे से ट्रीट किया.’’

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न आने दें मुस्कान में दरार

सर्दियों के  मौसम का आगाज हो चुका  है. इसके  साथ ही कुछ  राहत व कुछ परेशानी भी साथ ला रहा है. सर्दियों के शुरुआत  व अंत में हमें कुछ परेशानियों से गुजरना पड़ता है.न्ही में से एक है, होठों का फटना. हमारे शरीर के दूसरे हिस्सों की तुलना में होठ की त्वचा 10  गुना नाजुक व कोमल होती है. होठ हमारी खूबसूरती का अभिन्न हिस्सा है. लेकिन हमारी लापरवाही या मौसम की मार इन्हें  भद्दा  बना देती है.  लेकिन कुछ कारण और भी होते है, जो होठ फटने की वजह बनते हैं .जरूरी है कि हम इनकी देखभाल करें लेकिन इलाज जानने से पहले हमें यह पता होना चाहिये की समस्या किस कारण हो रही है.

कारण

शरीर में पानी की कमी

सर्दियों के मौसम में  हर कोई होठ फटने की समस्या से दो चार होता ही है . लेकिन शरीर में पानी की कमी हो तो हर मौसम में होंठ सूखे ही रहेंगे. क्योंकि शरीर में हुई पानी की कमी का असर होंठों पर भी पड़ता है और बाहर निकलने पर रूखापन और भी बढ़ जाता है. इसलिए शरीर में पानी की कमी नहीं होने दें. जरूरी है की दिन में कम से कम 8 गिलास पानी का सेवन करें.

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बोतल से पानी का सेवन

अगर आप सीधे बोतल से मुंह लगाकर पानी पीते है तो भी आपके होंठ फटने की समस्या बनी रहती है क्योंकि इससे आपके होठों को नमी नहीं मिल पाती जिस कारण आपके होठ फटने लगते हैं जरूरी है की गिलास से पानी पियें .

मुंह से सांस लेना

जब कभी हमें जुखाम  होता है तो हम नाक से सांस नहीं ले पाते जिस कारण हमें मुंह से सांस लेना पड़ता है और मुंह से सांस लेने से हवा हमारे होठों से गुजरती है. जिससे होठों की नमी खत्म हो जाती है और हमारे होंठ फटने लगते हैं लेकिन कुछ लोगों को यह आदत भी होती है की वो मुंह से सांस लेते हैं जिस कारण उनके होंठ हर मौसम में फटे ही रहते है. जो ना केवल होठों के लिए बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदेह है. क्योंकि सांस लेने की क्रिया  नाक से की जाती है न की मुंह से. जरूरी है कि समय पर अपनी आदत में बदलाव लाएं.

होठों पर जीभ घूमना

कुछ लोगों को आदत होती है अपने होठो नम रखने के लिए  जीभ घूमाते रहते हैं इसके आलावा होठों को चबाना, होठों की मर्त त्वचा को दांत  या हाथ से निकाल देना यह आपके होठों को बेहद नुकसान पहुंचाता है. आपके होंठ रूखे व बेजान हो जाते हैं.  इस तरह की आदतों को छोड़ने  से आप अपने होठों की समस्या से कुछ हद तक  छुटकारा पा सकते हैं.

उपाय

शहद और वैसलीन

होठों पर शहद लगाए व उसके ऊपर से वैसलीन लगाकर 10  मिनट तक ऐसे ही रहने दें. फिर टिश्यू पेपर से साफ कर लें. ऐसा करने से एक हफ्ते में ही आपको आराम मिल जायेगा.

शहद में एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं और घाव को भरने का काम करते हैं.  वहीं, वैसलीन रूखी त्वचा या रूखे होंठों को नमी देकर उन्हें मुलायम बनाती है . इस नुस्खे से आपके होंठ मुलायम व स्वस्थ रहते हैं.

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गुलाब की पंखुड़ियां

आधा कप दूध  में 5 से 6 गुलाब की पंखड़ियों को मिलाकर 3 घंटे के लिए रख दें फिर उनको मिक्स करके अच्छे से पेस्ट बना लें . और 15 मिनट के लिये अपने होठों पर लगा लें फिर ठंडे पानी से धो दें.

दूध में गुलाब की पंखुड़ियों को डालकर दो से तीन घंटों के लिए छोड़ दें.फिर पंखुड़ियों को अच्छे तरह दूध में मिक्स करके पेस्ट बना लें.
अब इस पेस्ट को अपने होंठों पर लगाएं और 10 -15  मिनट तक लगा रहने दें.फिर ठंडे पानी से धो लें.

आप हर रोज इसे एक या दो बार लगाएं . यह हमें सूरज की किरणों से बचता है.क्योंकि गुलाब की पंखुड़ियों में मौजूद एंटी-इन्फ्लेमेटरी गुण त्वचा को धूप से होने वाले नुकसान से बचाव करने में मदद करता हैं . इतना ही नहीं, रोज एसेंशियल औयल भी त्वचा को स्वस्थ बनाने में फायदेमंद साबित होता है.

चीनी और जैतून

चीनी को जैतून के तेल और शहद के साथ मिलाएं, चीनी को घोलने न दें . और स्क्रब की तरह अपने होंठों पर लगाएं. स्क्रब करने के बाद गुनगुने पानी से इसे धो लें.ऐसा हफ्ते मई ३ बार करें.

चीनी एक  बेहतरीन एक्सफोलिएट है  जो आपके फटे होंठों को ठीक करने में मदद करेगी. इससे स्क्रब करने से होंठ एक्सफोलिएट होंगे और रूखी व परतदार त्वचा से छुटकारा मिलेगा.

शहद से  त्वचा नर्म और मुलायम रहती है  वहीं औलिव औयल में मौजूद एंटीइन्फ्लेमेटरी और एंटी-कैंसर गुण होता है जो की हमीं स्किन कैंसर से भी बचता है.

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ऐसे बनाएं एग फ्राइड राइस

अंडों के पोषण से भरपूर यह डिश बनाने में भी काफी आसान है. इस डिश को आप किटी पार्टी या फिर छोटे गेट टू गेदर के दौरान सर्व कर सकती हैं.

सामग्री

2 कप चावल

2 मध्यम आकार के प्याज

2 छोटे आकार के शिमला मिर्च

2 हरी मिर्च

4 चम्मच सोया सौस

3 चम्मच रिफाइंड औयल

8 अंडे

2 गाजर

आधा चम्मच काली मिर्च पाउडर

2 चम्मच टमाटर प्यूरी

4 चुटकी नमक

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गार्निश के लिए

उबले अंडे

बारीक कटी धनिया

बनाने की विधि

एक बड़े बर्तन में दो कप चावल ले लें. चावल को अच्छी तरह धो लें. चावल धोने के बाद इसे उबालकर पका लें और किनारे रख दें.

सारी सब्जियों को धोकर अच्छी तरह काट लें. हर सब्जी को बारीक और एक आकार में काटें.

अब एक पैन लेकर उसमें तेल गर्म करें. अब इसमें बारीक कटी प्याज को डालकर हल्का भूरा होने तक भूनें. जब प्याज का रंग बदल जाए तो इसमें बाकी सब्जियां डालकर अच्छी तरह मिला लें.

3-4 मिनट बाद इसमें हरी मिर्च का पेस्ट मिला दें. 1-2 मिनट बाद टमाटर की प्यूरी, नमक, सोया सॉस मिला लें. आंच तेज ही रखें.

अब पैन में अंडा फोड़ें और उसे हिलाते रहें. इसी समय इसमें बटर मिला लें. अब इसमें पके हुए चावल मिला लें. सारी चीजों को अच्छी तरह मिला लें.

इसे धनिया की पत्ती और उबले हुए अंडे के साथ सजाकर सर्व करें.

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बेटी को जरूर बताएं पीरियड्स से जुड़े ये 8 टिप्स

ज्यादातर मांएं पीरियड्स के बारे में बेटी से खुल कर बात नहीं करतीं. यही कारण है कि इस दौरान किशोरियां हाइजीन के महत्त्व पर ध्यान नहीं देतीं और कई परेशानियों का शिकार हो जाती हैं.

माहवारी को ले कर जागरूकता का न होना भी इन परेशानियों की बड़ी वजह है. पेश हैं, कुछ टिप्स जो हर मां को अपनी किशोर बेटी को बतानी चाहिए ताकि वह पीरियड्स के दौरान होने वाली परेशानियों से निबट सकें:

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  1. कपड़े को कहें न: आज भी हमारे देश में जागरूकता की कमी के चलते माहवारी के दौरान युवतियां कपड़े का इस्तेमाल करती हैं. ऐसा करना उन्हें गंभीर बीमारियों का शिकार बना देता है. कपड़े का इस्तेमाल करने से होने वाली बीमारियों के प्रति अपनी बेटी को जागरूक बनाना हर मां का कर्तव्य है. बेटी को सैनिटरी पैड के फायदे बताएं और उसे अवगत कराएं कि इस के इस्तेमाल से वह बीमारियों से तो दूर रहेगी ही, साथ ही उन दिनों में भी खुल कर जी सकेगी.

2. कब बदलें पैड: हर मां अपनी बेटी को यह जरूर बताए कि आमतौर पर हर 6 घंटे में सैनिटरी पैड बदलना चाहिए. इस के अलावा अपनी जरूरत के अनुसार भी सैनिटरी पैड बदलना चाहिए. हैवी फ्लो के दौरान आप को बारबार पैड बदलना पड़ता है, लेकिन अगर फ्लो कम है तो बारबार बदलने की जरूरत नहीं होती. फिर भी हर 4 से 6 घंटे में सैनिटरी पैड बदलती रहे ताकि इन्फैक्शन से सुरक्षित रह सके.

3. गुप्तांगों की नियमित सफाई: पीरियड्स के दौरान गुप्तांगों के आसपास की त्वचा में खून समा जाता है, जो संक्रमण का कारण बन सकता है. इसलिए गुप्तांगों को नियमित रूप से धो कर साफ करने की सलाह दें. इस से वैजाइना से दुर्गंध भी नहीं आएगी.

4. इन का इस्तेमाल न करें: वैजाइना में अपनेआप को साफ रखने का नैचुरल सिस्टम होता है, जो अच्छे और बुरे बैक्टीरिया का संतुलन बनाए रखता है. साबुन योनि में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया को नष्ट कर सकता है. इसलिए इस का इस्तेमाल न करने की सलाह दें.

5. धोने का सही तरीका: बेटी को बताएं कि गुप्तांगों को साफ करने के लिए योनि से गुदा की ओर साफ करे यानी आगे से पीछे की ओर. उलटी दिशा में कभी न धोए. उलटी दिशा में धोने से गुदा में मौजूद बैक्टीरिया योनि में जा सकते हैं और संक्रमण का कारण बन सकते हैं.

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6. सैनिटरी पैड का डिस्पोजल: इस्तेमाल किए गए पैड को सही तरीके से और सही जगह फेंकने को कहें, क्योंकि यह संक्रमण का कारण बन सकता है. पैड को फ्लश न करें, क्योंकि इस से टौयलेट ब्लौक हो सकता है. नैपकिन फेंकने के बाद हाथों को अच्छी तरह से धोना भी जरूरी है.

7. रैश से कैसे बचें: पीरियड्स में हैवी फ्लो के दौरान पैड से रैश होने की संभावना बहुत अधिक बढ़ जाती है. ऐसा आमतौर पर तब होता है जब पैड लंबे समय तक गीला रहे और त्वचा से रगड़ खाता रहे. इसलिए बेटी को बताएं कि नियमित रूप से पैड चेंज करे. अगर रैश हो जाए तो नहाने के बाद और सोने से पहले ऐंटीसैप्टिक औइंटमैंट लगाए. इस से रैश ठीक हो जाएगा. अगर औइंटमैंट लगाने के बाद भी रैश ठीक न हो तो उसे डाक्टर के पास ले जाएं.

8. एक ही तरह का सैनिटरी प्रोडक्ट इस्तेमाल करें: जिन किशोरियों को हैवी फ्लो होता है, वे एकसाथ 2 पैड्स या 1 पैड के साथ टैंपोन इस्तेमाल करती हैं या कभीकभी सैनिटरी पैड के साथ कपड़ा भी इस्तेमाल करती हैं यानी कि ऐसा करने से उन्हें लंबे समय तक पैड बदलने की जरूरत नहीं पड़ती. ऐसे में बेटी को बताएं कि एक समय में एक ही प्रोडक्ट इस्तेमाल करे. जब एकसाथ

2 प्रोडक्ट्स इस्तेमाल किए जाते हैं तो जाहिर है इन्हें बदला नहीं जाता, जिस कारण इन्फैक्शन की संभावना बढ़ जाती है.

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मेरा संसार : भाग 2

लेखक: अमिताभ श्रीवास्तव

गरमी से राहत पाने का इकलौता साधन कूलर खराब हो चुका है जिसे ठीक करना है, अखबार की रद्दी बेचनी है, दूध वाले का हिसाब करना है, ज्योति कह कर गई थी. रोमी का रिजल्ट भी लाना है और इन सब से भारी काम खाना बनाना है, और बर्तन भी मांजना है. घर की सफाई पिछले 2 दिनों से नहीं हुई है तो मकडि़यों ने भी अपने जाले बुनने का काम शुरू कर दिया है.

उफ…बहुत सा काम है…, ज्योति रोज कैसे सबकुछ करती होगी और यदि एक दिन भी वह आराम से बैठती है तो मेरी आवाज बुलंद हो जाती है…मानो मैं सफाईपसंद इनसान हूं…कैसा पड़ा है घर? चिल्ला उठता हूं.

ज्योति न केवल घर संभालती है, बल्कि रोमी के साथसाथ मुझे भी संभालती है. यह मैं आज महसूस कर रहा हूं, जब अलमारी में तमाम कपडे़ बगैर धुले ठुसे पडे़ हैं. रोज सोचता हूं, पानी आएगा तो धो डालूंगा. मगर आलस…पानी भी कहां भर पाता हूं, अकेला हूं तो सिर्फ एक घड़ा पीने का पानी और हाथपैर, नहाधो लेने के लिए एक बालटी पानी काफी है.

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ज्योति आएगी तभी सलीकेदार होगी जिंदगी, यही लगता है. तब तक फक्कड़ की तरह… मजबूरी जो होती है. सचमुच ज्योति कितना सारा काम करती है, बावजूद उस के चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं देखी. यहां तक कि कभी उस ने मुझ से शिकायत भी नहीं की. ऊपर से जब मैं दफ्तर से लौटता हूं तो थका हुआ मान कर मेरे पैर दबाने लगती है. मानो दफ्तर जा कर मैं कोई नाहर मार कर लौटता हूं. दफ्तर और घर के दरम्यान मेरे ज्यादा घंटे दफ्तर में गुजरते हैं. न ज्योति का खयाल रख पाता हूं, न रोमी का. दायित्वों के नाम पर महज पैसा कमा कर देने के कुछ और तो करता ही नहीं.

फोन की घंटी घनघनाई तो मेरा ध्यान भंग हुआ.

‘‘हैलो…? हां ज्योति…कैसी हो?…रोमी कैसी है?…मैं…मैं तो ठीक हूं…बस बैठा तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था. अकेले मन नहीं लगता यार…’’

कुछ देर बात करने के बाद जब ज्योति ने फोन रखा तो फिर मेरा दिमाग दौड़ने लगा. ज्योति को सिर्फ मेरी चिंता है जबकि मैं उसे ले कर कभी इतना गंभीर नहीं हो पाया. कितना प्रेम करती है वह मुझ से…सच तो यह है कि प्रेम शरणागति का पर्याय है. बस देते रहना उस का धर्म है.

ज्योति अपने लिए कभी कुछ मांगती नहीं…उसे तो मैं, रोमी और हम से जुडे़ तमाम लोगों की फिक्र रहती है. वह कहती भी तो है कि यदि तुम सुखी हो तो मेरा जीवन सुखी है. मैं तुम्हारे सुख, प्रसन्नता के बीच कैसे रोड़ा बन सकती हूं? उफ, मैं ने कभी क्यों नहीं इतना गंभीर हो कर सोचा? आज मुझे ऐसा क्यों लग रहा है? इसलिए कि मैं अकेला हूं?

रचना…फिर उस की याद…लड़ाई… गुस्सा…स्वार्थ…सिर्फ स्वयं के बारे में सोचनाविचारना….बावजूद मैं उसे प्रेम करता हूं? यही एक सत्य है. वह मुझे समझ नहीं पाई. मेरे प्रेम को, मेरे त्याग को, मेरे विचारों को. कितना नजरअंदाज करता हूं रचना को ले कर अपने इस छोटे से परिवार को? …ज्योति को, रोमी को, अपनी जिंदगी को.

बिजली गुल हो गई तो पंखा चलतेचलते अचानक रुक गया. गरमी को भगाने और मुझे राहत देने के लिए जो पंखा इस तपन से संघर्ष कर रहा था वह भी हार कर थम गया. मैं समझता हूं, सुखी होने के लिए बिजली की तरह निरंतर प्रेम प्रवाहित होते रहना चाहिए, यदि कहीं व्यवधान होता है या प्रवाह रुकता है तो इसी तरह तपना पड़ता है, इंतजार करना होता है बिजली का, प्रेम प्रवाह का.

घड़ी पर निगाहें डालीं तो पता चला कि दिन के साढे़ 3 बज रहे हैं और मैं यहां इसी तरह पिछले 2 घंटों से बैठा हूं. आदमी के पास कोई काम नहीं होता है तो दिमाग चौकड़ी भर दौड़ता है. थमने का नाम ही नहीं लेता. कुछ चीजें ऐसी होती हैं जहां दिमाग केंद्रित हो कर रस लेने लगता है, चाहे वह सुख हो या दुख. अपनी तरह का अध्ययन होता है, किसी प्रसंग की चीरफाड़ होती है और निष्कर्ष निकालने की उधेड़बुन. किंतु निष्कर्ष कभी निकलता नहीं क्योंकि परिस्थितियां व्यक्ति को पुन: धरातल पर ला पटकती हैं और वर्तमान का नजारा उस कल्पना लोक को किनारे कर देता है. फिर जब भी उस विचार का कोना पकड़ सोचने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है तो नईनई बातें, नएनए शोध होने लगते हैं. तब का निष्कर्ष बदल कर नया रूप धरने लगता है.

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सोचा, डायरी लिखने बैठ जाऊं. डायरी निकाली तो रचना के लिखे कुछ पत्र उस में से गिरे. ये पत्र और आज का उस का व्यवहार, दोनों में जमीनआसमान का फर्क है. पत्रों में लिखी बातें, उन में दर्शाया गया प्रेम, उस के आज के व्यवहार से कतई मेल नहीं खाते. जिस प्रेम की बातें वह किया करती है, आज उसी के जरिए अपना सुख प्राप्त करने का यत्न करती है. उस के लिए पे्रेम के माने हैं कि मैं उस की हरेक बातों को स्वीकार करूं. जिस प्रकार वह सोचती है उसी प्रकार व्यवहार करूं, उस को हमेशा मानता रहूं, कभी दुख न पहुंचाऊं, यही उस का फंडा है.

शायद यही सच है : भाग 1

बैंक से निकलते हुए भारती ने घड़ी पर निगाह डाली तो 6 बजे से अधिक का समय हो चुका था. यद्यपि उस के तमाम सहयोगी कर्मचारी 5 बजे से ही घर जाने की तैयारी में जुट जाते हैं, पर भारती को घर जाने की कोई जल्दी नहीं रहती. उस अकेले के लिए तो जैसे बैंक वैसे घर. एक अकेली जीव है तो किस के लिए भाग कर घर जाए. बैंक में तो फिर भी मन काम में लगा रहता है लेकिन तनहा घर में सोने व दीवारों को देखने के अलावा वह और क्या करेगी.

पार्किंग से भारती ने अपनी कार बाहर निकाली और घर की ओर चल दी. वही रास्ते, वही सड़कें, वही पेड़, कहीं कोई बदलाव नहीं, कोई रोमांच नहीं. एक बंधे बंधाए ढर्रे पर जीवन की गाड़ी जैसे रेंग रही है. सुस्त चाल से घर पहुंच कर वह सोफे पर निढाल सी जा पड़ी. अकसर ऐसा ही होता है, खाली घर जैसे उसे खाने को दौड़ता है. एक टीस सी उठती है, काश, कोई तो होता जो घर लौटने पर उस से बतियाता, उस के सुखदुख का भागीदार होता.

यद्यपि भारती अतीत की गलियों में भटकना नहीं चाहती, मन पर कठोरता से अंकुश लगाने की कोशिश करती रहती है लेकिन कभीकभी मन चंचल बच्चे सा मचल उठता है. आज भी भारती ने सोफे पर पड़ेपड़े आंखें बंद कीं तो उस का मन नियंत्रण में नहीं रहा. पलों में ही लंबीलंबी छलांगें लगा कर मन ने उस के अतीत को सामने ला खड़ा किया.

उन दिनों वह बी. काम. अंतिम वर्ष की छात्रा थी. कुदरत ने उसे आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान किया था. ऊंची कद- काठी, गोरे रंग पर तीखे नाकनक्श, लंबे घने काले बाल जिन्हें चोटी के रूप में गूंध देती तो वह नागिन का रूप ले लेती.

उसे बनसंवर कर रहने का भी बेहद शौक था. जब भी वह परिधान के साथ मेल खाते टौप्स, चूडि़यां पहन पर्स लटकाए कालिज आती तो उस की सहेलियां उसे छेड़ते हुए कहतीं, ‘वाह, आज तो गजब ढा रही हो. रास्ते में कितनों को घायल कर के आई हो?’

वह भी बड़ी शोख अदा के साथ कहती, ‘तुम ने देखा नहीं, अभीअभी बेहोश लड़कों से भरी एम्बुलेंस यहां से गुजर कर अस्पताल की ओर गई है. वे सभी मुझे देख कर ही तो बेहोश हुए थे.’ फिर जोरदार ठहाके लगते.

पढ़ाई में भी वह अव्वल थी. उस की दिली इच्छा थी कि पढ़लिख कर वह बड़ा अफसर बने. इस के लिए प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी भी उस ने शुरू कर दी, लेकिन मांबाप उस की शादी कर के जिम्मेदारी से मुक्त होना चाहते थे. जब उस ने आगे पढ़ने की बहुत जिद की तो वे इस शर्त पर तैयार हुए कि जब तक कोई अच्छा मनपसंद लड़का नहीं मिल जाता वह पढ़ाई करेगी, लेकिन जैसे ही उपयुक्त वर मिल गया उसे पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी.

एम. काम. का पहला सत्र शुरू हो गया था. वह पढ़ाई में व्यस्त हो गई थी और मांबाप उस के लिए लड़का ढूंढ़ने में. 2 भाइयों के बीच इकलौती बहन होने के कारण भारती मांबाप की लाड़ली भी थी और भाइयों की दुलारी भी. अपनी सुंदरता का गुमान तो उसे था ही, इसलिए जब पहली बार मांबाप ने उस के लिए लड़का देखा और बात चलाई तो उस का फोटो देखते ही वह बिदक कर बोली, ‘इसे आप लोगों ने पसंद किया है? इस की लटकी सूरत देख कर तो लगता है कहीं से दोचार जूते खा कर आया हो. मुझे नहीं करनी इस से शादी.’

मांबाप ने बहुतेरा समझाया कि लड़का पढ़ालिखा अफसर है, लेकिन भारती ने साफ मना कर दिया.

अगली बार उन्होंने भारती को न तो लड़के की फोटो दिखाई और न परिचय- पत्र. सीधेसीधे लड़के व उस के मातापिता को होटल में मुलाकात का समय दे दिया. इस बार भारती और चिढ़ गई, ‘जिस के बारे में मुझे कुछ जानकारी नहीं है, न उस की फोटो देखी है, उस के सामने अपनी प्रदर्शनी करने चली जाऊं?’

मांबाप ने समझाया, ‘देखो बेटी, हमें इन के बारे में संतोषप्रद जानकारी प्राप्त हुई है. तुम जो भी पूछना चाहो पूछ सकती हो. आखिर शादी तो तुम्हें ही करनी है. तुम्हारी तसल्ली के बाद ही बात आगे बढ़ेगी. तुम बेकार तनाव क्यों ले रही हो, कोई जबरदस्ती तो है नहीं,’ तब जा कर वह कुछ सामान्य हुई.

बातचीत केदौरान भारती ने लड़के के घर वालों से स्पष्ट कह दिया कि वह शादी के बाद घर बैठने वाली लड़कियों में से नहीं है. उस का कैरियर माने रखता है. वह महत्त्वाकांक्षी है और शादी के बाद भी वह नौकरी करेगी.

लड़के की मां ने साफ कह दिया, ‘बेटा, हमें तो घर संभालने वाली पढ़ीलिखी बहू चाहिए. अगर तुम 8-10 घंटे की नौकरी करोगी, सारा दिन घर के बाहर रहोगी तो हमें ऐसी बहू का क्या फायदा?’

बात खत्म हो गई पर घर आ कर मां ने भारती को फटकारा, ‘यह सब अभी से कहने की क्या जरूरत थी? शादी के बाद भी तो ये बातें की जा सकती थीं.’

इस पर तुनक कर भारती बोली थी, ‘अच्छा हुआ, अभी खुली बात हो गई. देखा नहीं आप ने, लड़के की मां को घर संभालने वाली, घर का काम करने वाली बहू नहीं नौकरानी चाहिए. इतना पढ़लिख कर भी रोटीदाल बनाओ, बच्चे पैदा करो, उन के पोतड़े धोओ और घर के कामों में जिंदगी बरबाद कर दो.’

कुछ समय गुजरने के बाद एक दिन मां ने भारती को विश्वास में लेते हुए कहा, ‘बेटा, हम देख रहे हैं कि हमारे पसंद किए लड़के तुम्हारी कसौटी पर खरे नहीं उतर रहे. अगर तुम ने अपनी तरफ से किसी को पसंद कर के रखा है तो हमें बता दो. तुम्हारी खुशी में ही हम सब की खुशी है.’

‘मम्मी, ऐसी कोई बात नहीं है,’ भारती बोली थी, ‘अगर होगी तो आप को जरूर बताऊंगी.’

लेकिन असलियत यह थी कि पिछले कुछ समय से अपने सहपाठी हिमेश के साथ भारती का प्रेमप्रसंग चल रहा था. भारती उसे अच्छी तरह से परख कर ही कोई फैसला लेना चाहती थी. वह जानती थी कि प्रेमी और पति में काफी फर्क होता है. उस ने सोच रखा था, हिमेश अगर उस की कसौटी पर खरा उतरेगा तभी वह अंतिम निर्णय लेगी और मां को इस बारे में बताएगी. 2 बहनों के बीच अकेला भाई होने के कारण हिमेश के मांबाप की सभी आशाएं उसी पर टिकी थीं.

छुट्टी का दिन था. भारती तथा हिमेश ने आज घूमने तथा किसी अच्छे से होटल में खाना खाने का प्रोग्राम बनाया. सिद्धार्थ पार्क के एक कोने में प्रेमालाप करते हुए हिमेश व भारती अपने भविष्य के रंगीन सपने बुनते रहे. तभी भारती ने कहा, ‘हिमेश, मैं बैंक की प्रतियोगिता परीक्षा में बैठ रही हूं. तैयारी शुरू कर दी है. तुम्हारी क्या योजना है भविष्य की?’

एकीकृत खेती किसानी से चमकाया कारोबार

बागबानी हो, खेती हो या फिर पशुपालन कारोबार की संभावनाओं के साथ अगर तकनीक को शामिल कर लिया जाए तो निश्चित ही अच्छा मुनाफा लिया जा सकता है. राजस्थान के दौसा जिले के मितरवाड़ी गांव के बाशिंदे रामजीलाल ऐसे किसान हैं, जिन्होंने परस्पर एकदूसरे से संबंध रखने वाले खेती, बागबानी और पशुपालन में कारोबार के मौकों को जाना, एकीकृत प्रणाली को अपनाया और अपनी खास पहचान बनाई.

आज रामजीलाल जैविक खेती, जैविक खाद बनाने और पशुपालन के 4 अगलअलग क्षेत्रों में एकसाथ कामयाबी हासिल कर पूरे इलाके में आदर्श किसान के रूप में पहचान बना चुके हैं.

किसान रामजीलाल ने कहा कि उन्होंने सरकार की ओर से दी जाने वाली ट्रेनिंग, सहूलियतें और अनुदान का भरपूर फायदा लिया और कारोबार को आगे बढ़ाया. आज वे लाखों रुपए का मुनाफा हासिल कर रहे हैं. उन के नवाचार के चलते ही उन्हें खेती महकमे की ओर से सम्मानित भी किया जा चुका है.

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ऐसे बनी जैविक खाद

किसान रामजीलाल ने बताया कि उन्होंने साल 2007 में 4,000 वर्गफुट को पक्का करा कर वर्मी कंपोस्ट की तैयारी शुरू की. इजरायल आइसेनिया फेटिडा किस्म के केंचुओं का इस्तेमाल कर उन्होंने वर्मी हेचरी तैयार की. अब इस हेचरी से सालाना 200 टन जैविक खाद तैयार हो रही है.

शुरुआती कामयाबी मिली तो एक फर्म रजिस्टर्ड करा कर उन्होंने 5 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से जैविक खाद बाजार में बेचनी शुरू की. अब 5, 10, 20 व 50 किलोग्राम के बैगों को किसान उन के फार्महाउस से सीधे ही ले जाते?हैं.

 ऐसे करें जैविक खेती

रामजीलाल तकरीबन 15 बीघा जमीन पर पिछले 10 सालों से रबी व खरीफ की जैविक फसल तैयार कर रहे हैं. वे अनाज, फलसब्जी की जैविक खेती करते हैं.

वे बताते हैं कि जैविक खाद से जमीन की संरचना के साथसाथ मिट्टी में पानी सोखने की क्षमता विकसित होती है. नतीजतन, उत्पादन भी अच्छा होता है. इस के अलावा फसलों को कीट व रोगों से बचाने के लिए उन्होंने कीट नियंत्रण यंत्र भी लगा रखे हैं. इस यंत्र को शाम 6 बजे से रात 9 बजे तक चालू करने पर कीट इस यंत्र में इकट्ठा हो जाते?हैं.

उन्होंने सिंचाई के लिए ट्यूबवैल के साथसाथ सोलर प्लांट लगा कर एक पक्की सीमेंट से खेत तलाई को भी बना रखा है.

बागबानी से आमदनी

रामजीलाल ने अपने कृषि फार्महाउस पर मौसमी, बील, नीबू व पपीते का बगीचा भी लगाया हुआ है. वे सालाना तकरीबन एक लाख रुपए की मौसमी, 80,000 रुपए के बील, सवा लाख रुपए के नीबू व 80-90 हजार रुपए के पपीता बेच देते हैं.

खास बात यह है कि मौसमी के हरेक बाग के बीच में नीबू, बील व पपीता के बाग भी लगाए हुए हैं.

करें पशुपालन

रामजीलाल ने पशुपालन को बढ़ावा देने के लिए अजोला घास को उपजाना शुरू किया. रोजाना 150 ग्राम अजोला प्रति मवेशी की दर से खिलाने पर दूध उत्पादन 25 फीसदी और दूध में वसा की मात्रा बढ़ गई. वे 15 मवेशियों से रोजाना 150 लिटर दूध ले रहे हैं.

उन्होंने अब खुद का मिल्क कलैक्शन सैंटर भी खोल लिया है, जिस से उन्हें मोटा मुनाफा मिल रहा है. पशुपालन में नईनई तकनीक का इस्तेमाल करने से वे जिला लैवल पर तमाम पुरस्कार हासिल कर चुके हैं.

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क्या आप जानते हैं, पेड़ों में क्यों लगाया जाता है सफेद रंग ?

अक्सर आप पेड़ों पर सफेद रंग की पुताई देखे होंगे. पर क्या आप जानते हैं, पेड़ों पर सफेद रंग क्यों लगाया जाता है. तो चलिए आपको इस लेख द्वारा बताते हैं.

पेड़ो पर क्यों की जाती है सफेद रंग की पुताई

दरअसल, पेड़ों पर रंग करने का मतलब है कि ये पेड़ सरकारी प्रौपर्टी हैं. और वन विभाग इसका देखभाल कर रहा है. इसके साथ ही पेड़ पर सफ़ेद रंग लगाने का ये भी मतलब है कि सरकार के इजाजत के बिना आप पेड़ को नहीं काट सकते.

पेड़ पर सफेद रंग इसलिए भी लगाया जाता है क्योंकि सफेद रंग अंधेरे में अधिक दिखाई देता है और ऐसे में रात में हादसा होने से बच सकता है. इसके साथ ही पेड़ों पर रंग करने से पेड़ों में दीमक और अन्य जीवजंतु नहीं आते और इस वजह से ही पेड़ लंबे समय तक खड़े रहते हैं.

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हैैवान ही नहीं दरिंदा बाप: भाग 1

25वर्षीय राधा गुप्ता पता नहीं क्यों सुबह से बेचैन सी थी. घर के किसी काम में उस का मन नहीं लग रहा था. रहरह कर वह कभी कमरे से किचन में जाती और कभी किचन से कमरे में. उस ने यह क्रिया कई बार दोहराई तो कमरे में बैठे पति सुनील से रहा नहीं गया. उस ने पूछा, ‘‘क्या बात है राधा, मैं काफी देर से देख रहा हूं कि तुम किचन और कमरे के बारबार चक्कर लगा रही हो. आखिर बात क्या है?’’

‘‘आप को क्या बताऊं. मैं खुद भी नहीं समझ पा रही हूं कि मैं ऐसा क्यों कर रही हूं.’’ राधा ने झिझकते हुए उत्तर दिया, ‘‘पता नहीं सुबह से ही मेरा मन किसी काम में नहीं लग रहा. जी भी बहुत घबरा रहा है.’’

‘‘तबीयत तो ठीक है न तुम्हारी?’’ पति ने पूछा.

‘‘हां, तबीयत ठीक है.’’

‘‘तो फिर क्या बात है, मन क्यों घबरा रहा है? कहो तो तुम्हें किसी डाक्टर को दिखा दूं?’’

‘‘अरे नहीं, आप परेशान मत होइए, डाक्टर की कोई जरूरत नहीं है. अभी थोड़ी देर में भलीचंगी हो जाऊंगी.’’

‘‘मैं तो इसलिए कह रहा था कि मैं ड्यूटी पर चला जाऊंगा, फिर रात में ही घर लौटूंगा. इस बीच कुछ हो गया तो…’’

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‘‘अरे बाबा, मैं कहती हूं मुझे कुछ नहीं होने वाला. मेरी फिक्र मत करिए, आप आराम से ड्यूटी जाइए. वैसे भी कोई बात होती है तो घर वाले हैं न मुझे संभालने के लिए.’’ कह कर राधा कमरे से किचन की ओर चली गई.

इस बार किचन से वह पूरा काम निपटा कर निकली थी. पति को खाना खिला कर ड्यूटी भी भेज दिया.

काम निपटा कर वह बिस्तर पर लेटी ही थी कि तभी उस के फोन की घंटी बज उठी. फोन उठा कर उस ने देखा तो स्क्रीन पर उस के पापा जयप्रकाश गुप्ता का नंबर था. राधा ने झट से चहकते हुए काल रिसीव की.

उस दिन राधा को अपने पिता की बातों से मायूसी महसूस हुई तो उस ने उन से इस की वजह जाननी चाही. जयप्रकाश ने कहा, ‘‘क्या बताऊं बेटी, मुझ से एक अनर्थ हो गया.’’

‘‘अनर्थ? कैसा अनर्थ?’’ राधा ने पूछा.

‘‘बेटी, आवेश में आ कर मैं ने अपने ही हाथों फूल सी छोटी बेटी प्रिया को मौत के घाट उतार दिया.’’

‘‘क्याऽऽ! प्रिया को आप ने मार डाला?’’ राधा चीखती हुई बोली.

‘‘हां बेटी, उस की चरित्रहीनता ने मुझे हत्यारा बना दिया. मैं ने उसे सुधरने के कई मौके दिए लेकिन वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रही थी और मेरे हाथों यह अनर्थ हो गया.’’

‘‘ये क्या किया आप ने पापा? मेरी बहन को मार डाला.’’ इतना कह कर राधा ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया और निढाल हो कर दहाड़ मारने लगी.

अचानक बहू के रोने की आवाज सुन कर उस के सासससुर घबरा गए कि अभी तो भलीचंगी किचन से अपने कमरे में गई है, फिर अचानक उसे हो क्या गया कि दहाड़ मार कर रोने लगी. वे दौड़ेभागे बहू के कमरे में पहुंचे तो देखा कि बहू बिस्तर पर लेटी सिसकियां ले रही थी.

उस के ससुर ने जब बहू से रोने की वजह पूछी तो उस ने पूरी बात उन्हें बता दी. बहू की बात सुन कर ससुर भी चौंक गए कि समधी ने ये क्या कर दिया.

थोड़ी देर बाद जब राधा थोड़ी सामान्य हुई तो उस ने पति को फोन कर के सारी बातें बता दीं. सुनील भी आश्चर्यचकित रह गए. उन्होंने पत्नी के तहेरे भाई विनोद को फोन कर के यह बात बता कर उस से पूछा कि ऐसे हालात में क्या करना चाहिए.

काफी सोचविचार के बाद विनोद इस नतीजे पर पहुंचे कि बात पुलिस को बता देनी चाहिए क्योंकि यह मामला हत्या से जुड़ा है. आज नहीं तो कल यह राज खुल ही जाएगा.

विनोद ने सुनील से कहा कि वह एसएसपी को फोन कर के इस की सूचना दे रहा है. उस के बाद गोला थाना जा कर वहां के एसओ से मिल लेंगे.

विनोद ने उसी समय एसएसपी डा. सुनील गुप्ता को अपना परिचय देते हुए पूरी घटना की जानकारी दे दी. मामला हत्या का था, इसलिए उन्होंने थाना गोला के एसओ संजय कुमार को तुरंत मौके पर पहुंच कर काररवाई करने के आदेश दिए.

कप्तान के आदेश पर एसओ संजय कुमार 17 अगस्त को ही जयप्रकाश गुप्ता के विशुनपुर स्थित घर पहुंचे. जयप्रकाश उस समय घर पर ही था. सुबहसुबह दरवाजे पर पुलिस को देख कर जयप्रकाश की जान हलक में फंस गई. उसे हिरासत में ले कर पुलिस थाने लौट आई.

एसओ संजय कुमार ने जयप्रकाश से उस की बेटी प्रिया के बारे में सख्ती से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस ने 27 जुलाई, 2019 को बेटी की गला घोंट कर हत्या कर दी, फिर उस की गरदन धड़ से अलग कर दी थी. बाद में सिर को प्लास्टिक के एक बोरे में भर कर उरुवा थाना क्षेत्र में फेंक दिया और धड़ वाले हिस्से और उस के पहने कपड़े दूसरे प्लास्टिक बोरे में भर कर गोला थाना क्षेत्र के चेनवा नाले में फेंक दिए थे.

प्रिया का सिर और धड़ बरामद करने के लिए पुलिस उसे मौके पर ले गई. उस की निशानदेही पर चेनवा नाले से धड़ बरामद कर लिया. 22 दिनों से धड़ पानी में पड़े रहने की वजह से सड़ कर कंकाल में तब्दील हो चुका था. पुलिस ने कंकाल को अपने कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. लेकिन उस के सिर का कहीं पता नहीं चला.

एसओ संजय ने जब उस से पूछा कि तुम ने अपनी ही बेटी की हत्या क्यों की, तो दबी जुबान में जयप्रकाश गुप्ता ने जो जवाब दिया, उसे सुन कर वही नहीं, वहां मौजूद सभी ने अपने दांतों तले अंगुलियां दबा लीं. कलयुगी पिता जयप्रकाश ने रिश्तों की मर्यादा का खून किया था.

कंकाल बरामद होने से करीब 22 दिनों से रहस्य बनी प्रिया के राज से परदा उठ चुका था. बहन की हत्या से राधा बहुत दुखी थी. उसे पिता की घिनौनी करतूत पर गुस्सा आ रहा था. राधा ने साहस का परिचय देते हुए पिता जयप्रकाश के खिलाफ धारा 302, 201, 120बी भादंसं के तहत रिपोर्ट दर्ज करा दी.

जयप्रकाश गुप्ता से पूछताछ के बाद इस मामले की जो घिनौनी कहानी सामने आई, उसे सुन कर सभी हैरान रह गए.

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करीब 55 वर्षीय जयप्रकाश गुप्ता मूलरूप से उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के गोला थाना क्षेत्र के विशुनपुर राजा बुजुर्ग गांव का रहने वाला था. वह गल्ले का कारोबार करता था. करीब 15 साल पहले उस ने विशुनपुर राजा बुजुर्ग गांव में मकान बनवा लिया और परिवार के साथ रहने लगा था.

उस के परिवार में पत्नी और 2 बेटियां राधा और प्रिया थीं. जयप्रकाश को बेटे की चाहत थी लेकिन बेटा नहीं हुआ. तब उस ने बेटियों की परवरिश बेटों की तरह की. वह छोटे से खुशहाल परिवार के साथ जीवनयापन कर रहा था. दुकान से भी उसे अच्छी कमाई हो जाया करती थी.

जयप्रकाश गुप्ता की गृहस्थी की गाड़ी बड़े खुशहाल तरीके से चल रही थी. पता नहीं उस की गृहस्थी को किस की नजर लगी कि सब कुछ छिन्नभिन्न हो गया. बात साल 2009 की है. अचानक उस की पत्नी की मौत हो गई.

उस समय उस की दोनों बेटियां 10-12 साल के बीच की थीं. बेटियों की परवरिश की जिम्मेदारी जयप्रकाश पर आ गई थी. जयप्रकाश के बड़े भाई राधा और प्रिया को दिल से अपनी बेटी मानते थे और उन्हें उसी तरह दुलारते भी थे. प्रिया को तो वह बहुत ज्यादा लाड़प्यार करते थे. इसी तरह दोनों बेटियों की परवरिश होती रही.

बड़ी बेटी राधा शादी योग्य हो चुकी थी. राधा के सयानी होते ही जयप्रकाश के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं. वह बेटी की जल्द से जल्द शादी कर देना चाहता था. उस के लिए वह लड़का देखने लगा. गोला इलाके में ही उसे एक लड़का पसंद आ गया तो जयप्रकाश ने साथ सन 2015 उस के में राधा की शादी कर दी.

राधा की विदाई के बाद घर में जयप्रकाश और उस की छोटी बेटी प्रिया ही रह गए. धीरेधीरे प्रिया भी सयानी हो चुकी थी.

बात 2 साल पहले की है. प्रिया बाथरूम से नहा कर बाहर निकल रही थी. गीले बदन से उस के कपड़े चिपक गए थे. इत्तफाक से उसी समय जयप्रकाश किसी काम से घर में आया.

उस की नजर बेटी प्रिया पर पड़ी तो उस की आंखों में एक अजीब सी चमक जाग उठी और उस के शरीर में वासना के कीड़े कुलबुलाने लगे. उस वक्त उसे प्रिया बेटी नहीं, एक औरत लगी. वह उस के तन को नोचने की सोचने लगा.

इस के बाद जयप्रकाश यही सोचता रहा कि प्रिया को कब और कैसे अपनी हवस का शिकार बनाए. इसी तरह एक सप्ताह बीत गया. एक रात प्रिया जब अपने कमरे में गहरी नींद में सो रही थी, तभी जयप्रकाश दबेपांव उस के कमरे में पहुंचा और सो रही बेटी को अपनी हवस का शिकार बना लिया. पिता के कुकृत्य से प्रिया बिलबिला उठी.

हवस पूरी कर के जयप्रकाश ने प्रिया को धमकाया कि अगर उस ने किसी से कुछ भी कहा तो अपनी जान से हाथ धो बैठेगी. पिता की धमकियों से वह बुरी तरह डर गई और अपना मुंह बंद कर लिया. उस दिन के बाद से जयप्रकाश प्रिया को अपना शिकार बनाता रहा.

क्रमश:

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

   सौजन्य: मनोहर कहानियां           

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