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‘ब्लाइंड डेट’: मजा या सजा ?

ब्लाइंड डेट का अर्थ है किसी ऐसे व्यक्ति के साथ डेट पर जाना जिस से आप पहले न मिले हो. आजकल ब्लाइंड डेट का ट्रेंड भी है. लोग एक दूसरे से सोशल नेटवर्किंग पर मिलते हैं और कुछ ही दिनों में एक दूसरे से मिलने का प्लान बनाते हैं. ब्लाइंड डेट पर जाने के लिए लोग अक्सर दो कारणों से तैयार होते हैं, पहला कि उन्हें तस्वीरों में देख कर उस व्यक्ति में इंटरेस्ट आ जाता है और दूसरा कि वह उस व्यक्ति की बातें सुन कर ही इतने इम्प्रेस हो गए हैं कि उस से मिलना चाहते हैं. डेट्स वैसे तो इंटरेस्टिंग होती हैं और कभी कभी अच्छी भी निकल सकती हैं, लेकिन जब बात ब्लाइंड डेट्स की आती है तो डिसपौइंट होने के चांसेस कहीं ज्यादा होते हैं.

शुरुआत हमेशा दिलचस्प होती है

बात तीन महीने पुरानी है जब मेरी दोस्त ईशा ने यूं ही किसी काम से एक कालेज के लड़के को इंस्टाग्राम पर मैसेज कर दिया. उस ने मुझ से पूछा कि क्या मैं किसी आर्टिस्ट को जानती हूं जो उस के औफिस के लिए कुछ तस्वीरें बना सके, और मैंने उसे इस लड़के के बारे में बताया जो हमारे ही कालेज का था. ईशा ने उस लड़के को मैसेज किया और उस से पूछा अगर वह उस की मदद कर सके तो काफी सही रहेगा. वह लड़का आर्टिस्ट था और ईशा की इतनी बड़ी कंपनी थी कि वह ये मौका छोड़ना नहीं चाहता था. तो, उस ने हां कह दी और इस तरह वे दोनों एक दूसरे के कौंटेक्ट में आ गए. इस से आगे उन दोनों की कहानी कुछ इस तरह शुरू हुई:

पहला दिन ईशा ने उस लड़के के आर्ट एंड क्राफ्ट की तारीफ की. यह सुन कर वह लड़का सचमुच बहुत खुश हुआ और उस ने ईशा को अपने वह आर्ट एंड क्राफ्ट भी भेजे जो उसने इंस्टाग्राम पर पोस्ट नहीं किए थे. उन दोनों ने इंस्टाग्राम पर कुछ देर बात की और उस लड़के ने बड़े ही लहजे से ईशा का नंबर मांगा. ईशा को ज्यादा देर नहीं लगी उस से इम्प्रेस हो उसे अपना नंबर देने में.

ईशा ने उस की पूरी इंस्टाग्राम प्रोफाइल देखी जिस में उस की कुछ ज्यादा पिक्चर्स नहीं थीं लेकिन जितनी भी थीं उन्हें देख कर उसे वह लड़का अच्छा लगा था. ईशा के मुताबिक उस का चेहरा बिलकुल बोल्ड, स्मार्ट और कौंफिडेंट था जिसे देख कर उसे उस में इंटरेस्ट आना लाजिमी था. उस लड़के ने ईशा को व्हाट्सएप पर मैसेज किया और दोनों हलकी फुलकी बातें करने लगे. उस लड़के ने ईशा को बताया कि वह इंट्रोवर्ट है और ईशा पहली लड़की है जिस से उस ने महीनों बाद इतनी लंबी बात की.

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दूसरा दिन ईशा और उस लड़के की बातें काफी हुईं. ईशा को पता चला कि वह अब दिल्ली में नहीं रहता बल्कि नौकरी के लिए उत्तर प्रदेश में पोस्टेड है. ईशा उस की बातों से हद से ज्यादा इम्प्रेस होने लगी थी. उस लड़के का सेंस औफ ह्यूमर और ईशा का सेंस औफ ह्यूमर एक दूसरे से काफी मिलता था. ईशा को बातों ही बातों में यह भी पता चला कि उस लड़के को पिछली दो गर्लफ्रेंड्स ने चीट किया था. ईशा ने भी फ्लोफ्लो में बता दिया कि उस की पास्ट रिलेशनशिप्स भी कुछ खास नहीं रहीं.

तीसरा दिन उस लड़के ने ईशा को बताया कि वह दिल्ली आ रहा है अपने घर और अगर हो सके तो क्या ईशा उस से मिलेगी. ईशा ने उसे बताया कि वह फ्री नहीं है लेकिन अगली बार शायद मिल ले. ईशा और उस लड़के ने तीन दिनों में ही एक दूसरे को काफी हद तक जान लिया था. उस लड़के ने बाकायदा ईशा को यह भी बताया था कि उस की मुस्कराहट कितनी खूबसूरत है. वे दोनों रात के 3 बजे तक बात करते ही रहे थे. इसी बीच वह दोनों एक गेम खेलने लगे जिस में उन दोनों को बारी बारी एक दूसरे से कुछ प्रश्न करने थे और उन के जवाब देने थे. रात के साढ़े तीन बज चुके थे. ईशा ने उस से पूछा कि तुम्हें किसी लड़की में इंटरेस्ट कब आता है. इस प्रश्न के जवाब में उस लड़के ने कहा कि जब वह किसी लड़की से रात के साढ़े तीन बजे तक बातें करे.

चौथा दिन वह लड़का अब भी दिल्ली में था और अगले दिन संडे था तो जब उस ने ईशा से एकबार फिर मिलने के लिए कहा तो वह मना न कर सकी. संडे के दिन बस एक परेशानी थी कि ईशा को औफिस के काम से साढ़े चार बजे के करीब एक कार्यक्रम में जाना था. इस पर ईशा को भी बुरा लगा क्योंकि अब तक उस ने उस लड़के से जितनी भी बात कि थी उस के बाद वह उस के साथ ज्यादा समय बिताने का सोच रही थी. खैर, उस ने सोचा कि जितना समय है उतने को ही वे एंजौय कर लेंगे. ईशा और उस लड़के का प्लान मूवी देखने का बना जिस के बाद वे साथ खाने पीने और घूमने वाले थे.

पांचवा दिन आज ईशा के जीवन की पहली ब्लाइंड डेट थी. वह बाकि छुट्टी के दिनों की तरह घोड़े बेचकर सोती नहीं रही. वह समय से पहले ही उठ गई. उसे फंक्शन और डेट दोनों के अकौर्डिंग रेडी होना था. उस ने अच्छी सी लिपस्टिक का शेड लगाया, लाइनर, मस्कारा लगाया. हलके हलके अपरलिप्स दिख रहे थे और पार्लर जाने का टाइम नहीं था तो बेचारी ने रेजर चला लिया मुंह पर. वह बस सुंदर दिखना चाहती थी.

वह लगभग दौड़ते हुए मेट्रो प्लेटफार्म पर पहुंची जहां उसे वह लड़का खड़ा हुआ दिखा. वह उस लड़के को देख कर लगभग हिंदी टीवी सीरियलों की बहुओं की तरह ‘नहीहीहीहीही’ चिल्लाने ही वाली थी कि उस ने खुद को कंट्रोल कर लिया और चेहरे पर कैज़ुअल मुस्कराहट बनाए रखी. उस लड़के का कद ईशा से भी छोटा था, उस की शक्ल जितनी बोल्ड उस की पिक्चर में दिख रही थी उस से कही ज्यादा बचकानी सामने से थी. वह लड़का ईशा को देख कर हंसा और ईशा के मन ने रोना स्टार्ट कर दिया.

जब सब अटपटा लगने लगे

एक केजुअल मीटिंग समझकर ही ईशा उस के साथ मेट्रो में चढ़ गई. वे दोनों मेट्रो में खड़े बातें करने लगे. ईशा का इंटरेस्ट उस लड़के में जितनी तेजी से आया था उतनी ही तेजी से चला भी गया. वे दोनों  मूवी के लिए पहुंचे तो उन्हें एक horror मूवी की टिकट्स ही अवेलेबल मिलीं. थिएटर में बैठे बैठे तबतक तो सब ठीक था जबतक लाइट्स जल रही थीं क्योंकि लाइट्स बंद होते ही ईशा का दिल धकधक करने लगा. ईशा को लगा कि वह उस लड़के से बहुत दूर जा कर बैठे ताकि गलती से भी उसे कोई हिंट न मिल जाए.

मूवी स्टार्ट हुई और उस लड़के ने ईशा का हाथ पकड़ने के लिए अपना हाथ उस के हाथ के काफी पास रख लिया. ईशा ने अपना हाथ दूसरी तरफ कर लिया. उस लड़के ने उस की आंखों में देखने की कोशिश की तो ईशा ने नजरें मूवी स्क्रीन पर टिका लीं. उस लड़के ने एक फनी सीन पर ईशा के कंधे पर हलके से धक्का दिया तो ईशा ने कुछ रिएक्ट ही नहीं किया. और इन सब से ऊपर जो ईशा के साथ सब से ज्यादा औक्वर्ड हुआ वो यह था कि थिएटर में ज़रूरत से ज्यादा अंधेरा था जिस का फायदा थिएटर में बैठा हर एक कपल बहुत अच्छे से उठा रहा था.

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अब पछताए होत क्या

ईशा बस अपने इस ब्लाइंड डेट के ख्याल पर ही इतना पछता रही थी कि अब उस की शक्ल पर यह डिसपौइन्टमेंट दिखने लगी थी. स्क्रीन पर नजरें टिका कर, आगे की तरफ झुक कर बेठने से ईशा की गर्दन और पीठ हद से ज्यादा दुखने लगे. वह लड़का बीचबीच में ईशा की तरफ हल्का हल्का खिसकने की कोशिश करता तो ईशा और अनकम्फर्टेबल हो जाती. एक बार तो ईशा को लगा कि वह लड़का उसे किस करना चाहता है, और यह ख्याल आते ही उस की लगभग चीख निकलने को थी.

जैसे ही मूवी खत्म हुई उस लड़के को समझ आ गया था कि ईशा को उस में इंटरेस्ट नहीं है. लेकिन, ईशा ने संयम से काम लिया. वे दोनों साथ बर्गर खाने के लिए गए जहां ईशा ने उस से बिल आधा आधा चुकाने के लिए कहा. उस लड़के ने जब इस बात पर यह कहा कि उसे इस तरह ईशा का आधा बिल देना अजीब लग रहा है, तो इस पर ईशा ने उसे यह जवाब दिया कि केजुअल फ्रेंड्स में तो सब चलता है. ईशा ने जल्दी जल्दी खाना खत्म किया और अपने औफिस के फंक्शन के लिए निकलने लगी. ईशा ने उस लड़के के साथ एक फोटो भी ली और हंसी हंसी में यह भी कह दिया कि वह असल जिन्दगी में अपनी तस्वीर से बिलकुल अलग दिखता है. यह सुन कर उस लड़के को शायद अजीब भी लगा हो. वे दोनों मेट्रो स्टेशन तक पहुंचे जहां ईशा ने उसे बाय कहा और अपनी मेट्रो की तरफ चल दी, बगैर पीछे देखे.

सब खत्म करना है जरूरी

ईशा मेट्रो में चढ़ी और राहत की सांस लेने लगी. उसे अपने आप पर गुस्सा भी आया और यह सोच कर खुशी भी हुई कि अच्छा है कम से कम उस के पास औफिस के फंक्शन का बहाना था. ईशा ने जब मुझे यह बात बताई तो मैं पहले तो अपनी हंसी रोक नहीं पाई, फिर थोड़ा संभली तो उसे समझाया कि इस तरह की चीजें जिंदगी में अनुभव ही देती हैं, तो इस बारे में ज्यादा न सोचे.

ईशा फंक्शन से देर रात घर पहुंची तो उलझन में थी कि उस लड़के को मैसेज करे या न करे. कुछ देर सोचने के बाद उस ने उसे मेसेज लिख भेजा ‘इट वाज नाईस मीटिंग यू.’ इस पर उसे लड़के का रिप्लाई आया ‘सेम हियर.’ अगले दिन उस लडके का ईशा के पास एक बार फिर मैसेज आया कि वह सोच रहा है कि जाने से पहले ईशा से बात करता जाए, लेकिन ईशा ने यह कह कर टाल दिया कि वह फ्री नहीं है. इस बारे में इन दोनों की फिर कोई बात नहीं हुई. शायद वह लड़का समझदार था जो ईशा की ‘ना’ को बिना कहे ही समझ गया.

यह गलती न करें

  • ईशा के उदाहरण से कई चीजें सीखने को मिलती हैं. पहली तो यही कि ब्लाइंड डेट अगर डिसपौइंटिंग हो तो इस का मतलब यह नहीं कि सामने वाले की रिस्पेक्ट न की जाए. ईशा को वह लड़का पसंद नहीं आया था लेकिन फिर भी उस ने चीजों को एक अच्छे नोट पर खत्म किया. वह चाहती तो उस लड़के को फिर कभी मैसेज न करती, पर बजाए उस लड़के को इग्नोर करने के उस ने उसे स्पष्ट रूप से यह हिंट दे दिया कि वह उस में इंटरेस्टेड नहीं है. इसलिए यदि ब्लाइंड डेट एक्स्पेक्टेशन के मुताबिक न भी हो, तो भी सामने वाले व्यक्ति की भावनाओं का ख्याल रखें.
  • शक्ल बनाते फिरने की गलती न करें. व्यक्ति आप को पसंद नहीं आया तो आप उसे यह फील न कराएं कि आप उस के साथ इस डेट पर आ कर पछता रही हैं. साधारण व्यवहार रखें, यहां वहां की बाते करें.
  • यदि आप की डेट आप से क्लोज होने की कोशिश कर रहा है तो उसे यह स्पष्ट कर दें कि आप इंटरेस्टेड नहीं हैं.
  • बिल सामने वाले को अकेले न चुकाने दें. आप भी आधे पैसे दें. इस से कम से कम उसे यह तो नहीं लगेगा कि फ़ालतू में ऐसी डेट पर गया जहां अपना ही चूना लग गया और हाथ कुछ आया नहीं.
  • यदि आप की ब्लाइंड डेट इतनी बुरी गई है तो आगे उस व्यक्ति से फालतू में बातचीत बढ़ाने का कोई फायदा नहीं है.
  • आप को किसी को भी कोई सफाई देने की जरुरत नहीं है. आप बात करना बंद कर दें, बेमतलब के लंबे लंबे मैसेज भेज कर दोनों का टाइम बर्बाद न करें.
  • जो कुछ भी हो उसे एक्सपीरियंस समझ कर भूल जाएं. किसी तरह का सदमा दिल पर ले कर न बैठे रहें.

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शुभारंभ : हो गई अड़चनों से भरी राजा-रानी की शादी, कैसा होगा इनके जीवन का नया शुभारंभ?

कलर्स के शो, ‘शुभारंभ’ में कीर्तिदा की अनेक चालों के बीच आखिरकार राजा और रानी शादी के बंधन में बंध गए हैं. जहाँ एक तरफ राजा की माँ, आशा, कीर्तिदा को हराकर खुश है तो वहीं दूसरी तरफ कीर्तिदा का गुस्सा राजा और रानी की शादी होने से सातवे आसमान पर पहुंच गया है. आइए आपको बताते हैं अब आगे क्या मोड़ लेगी शादी के बाद राजा और रानी की ये नई जिंदगी…

रानी का हुआ गृहप्रवेश

अब तक आपने देखा कि राजा और रानी का गृह प्रवेश होता है, जहाँ कीर्तिदा जानबूझ कर रानी के चेहरे पर सिंदूर डाल देती है, वहीं राजा पूरी बात को संभालते हुए रानी का चेहरा साफ करने में मदद करता है.

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घर की चाबी आई रानी के हाथ

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शादी में आए हुए मेहमानों में आई हुई घर की बड़ी, फुई का फैसला गुणवंत और कीर्तिदा को भी मानना पड़ रहा है. इसी बात का फायदा उठाते हुए, गृह प्रवेश के बाद आशा, फुई को कहती है कि घर की चाबियाँ रानी को दे देनी चाहिए. ये सुनकर गुणवंत चौंक जाता है. फुई घरवालों को बुलाकर कीर्तिदा को कहती है कि घर की चाबियाँ रानी को दे दे. वहीं आशा गुस्से और जलन से भरी हुई  कीर्तिदा को चेतावनी देती है कि वह इसी तरह उससे दुकान और व्यवसाय सबकुछ वापस ले लेगी.

रानी करेगी एक गलती

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आज के एपिसोड में रानी और झरना शादी के बाद की रस्मों को निभाते हुए दिखेंगे, लेकिन इसी बीच रानी से हो जाएगी एक गलती. रानी की इस गलती को बुआ एक बहुत बड़े अपशगुन का नाम देंगी. क्या रानी पर आई इस नयी मुसीबत को राजा दूर कर पाएगा?

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कैसी होगी शादी के बाद राजा-रानी की जिंदगी की ये नई शुरूआत? जानने के लिए देखते रहिए शुभारंभ, सोमवार से शुक्रवार रात 9 बजे, सिर्फ कलर्स पर.

क्रूरता की इंतिहा

जमाना कितना भी आगे बढ़ गया हो, देश में कितना ही तकनीकि विकास हो गया हो, लोग चाहे कितने ही शिक्षित बन गए हों पर कुछ लोग अपनी मानसिकता से अंधविश्वासी बने हुए हैं. इसीलिए गलीनुक्कड़ पर दुकान जमाए बैठे नीमहकीम, मुल्लामौलवी और तांत्रिक उन्हें अब भी चंद पैसों के लिए अपने जाल में फंसा ही लेते हैं.

ये लोग अंधविश्वासी लोगों का न केवल शोषण करते हैं बल्कि कभीकभी उन के हाथों ऐसा अपराध करवा देते हैं, जिस की वजह से उन्हें अपनी सारी जिंदगी सलाखों के पीछे काटनी पड़ती है. हाल ही में पंजाब की एक महिला तांत्रिक ने एक महिला को अपने सम्मोहन के जाल में फांस कर ऐसा जघन्य अपराध करा दिया, जिसे सुन कर किसी के भी रोंगटे खड़े हो जाएं.

पंजाब में थाना सदर बटाला के अंतर्गत एक गांव है काला नंगल. 32 वर्षीय बलविंदर सिंह उर्फ बिंदर अपनी 27 वर्षीय पत्नी जसबीर कौर के साथ इसी गांव में रहता था. वैसे बलविंदर सिंह मूलरूप से अमृतसर के गांव अकालगढ़ दपिया का निवासी था. लेकिन अपनी शादी के बाद वह अपनी पत्नी को साथ ले कर अपनी ननिहाल काला नंगल में रहने लगा था.

इस गांव में उस के नाना गुरनाम सिंह, मामा संतोख सिंह और बड़ा मामा जगतार सिंह रहते थे. उस के ननिहाल वाले कोई अमीर आदमी नहीं थे. बस मेहनतमजदूरी कर अपना परिवार चलाने वाले लोग थे. बिंदर भी उन के साथ खेतों में मेहनतमजदूरी करने लगा.

बिंदर के मामा के साथ उन की पत्नियां भी खेतों में काम करने जाया करती थीं. ताकि घर में ज्यादा पैसे आए. उन के देखादेखी बिंदर की पत्नी भी उन के साथ काम करने जाती थी.

बिंदर के पड़ोस में पूर्ण सिंह का परिवार रहता था. उस के परिवार में पत्नी जोगिंदर कौर के अलावा बेटा हरप्रीत सिंह, उस की पत्नी रविंदर कौर, बेटी नीतू अमन और राजिंदर कौर थीं. हालांकि नीतू और राजिंदर कौर दोनों ही शादीशुदा थीं पर वह अधिकतर अपने मायके में ही डेरा जमाए रहती थीं. ये सब लोग उन्हीं के खेतों के साथ वाले खेत में काम करते थे, जिस में बिंदर और उस के मामामामी काम किया करते थे, यह भी कहा जा सकता है कि ये दोनों परिवार साथसाथ काम करते थे.

27 अप्रैल, 2019 की बात है. सुबह के लगभग 11 बजे का समय था. कुछ लोग उस समय खेतों में काम पर लगे हुए थे तो कुछ लोग पेड़ों के नीचे बैठे सुस्ता रहे थे.

बिंदर का मामा संतोख सिंह, उस की पत्नी कंवलजीत कौर, मामा जगतार सिंह और बिंदर की पत्नी जसबीर कौर साथ बैठे इधरउधर की बातें कर रहे थे कि उन के बीच बैठी जसबीर कौर अचानक गायब हो गई.

उन लोगों ने सोचा शायद वह लघुशंका के लिए गई होगी और किसी ने इस बात पर अधिक ध्यान नहीं दिया. सब अपनेअपने काम में व्यस्त हो गए थे. शाम के 5 बजे यानी छुट्टी का समय हो गया पर तब तक जसबीर कौर किसी को दिखाई नहीं दी. अब पूरे परिवार को चिंता ने घेर लिया कि आखिर सब के बीच जसबीर कहां गायब हो गई. जसबीर कौर इन दिनों गर्भवती थी. उसे सातवां महीना चल रहा था.

सब ने मिल कर सोचा कि कहीं तबीयत खराब होने के कारण वह घर तो नहीं चली गई. घर पहुंचने पर पता चला कि वह वहां भी नहीं थी. उसे फिर पूरे गांव में ढूंढा गया पर उस का कहीं पता नहीं चला.

जसबीर के मायके और अन्य रिश्तेदारियों में भी उसे तलाशा गया. कुल मिला कर रातभर की खोज के बाद भी जसबीर का कहीं सुराग नहीं लगा. अगली सुबह 28 अप्रैल को सब लोगों ने थाना सदर बटाला जा कर जसबीर कौर के रहस्यमय तरीके से लापता होने की सूचना दी. पुलिस ने जसबीर कौर का फोटो ले कर उस की तलाश शुरू कर दी.

जसबीर कौर के लापता होने की वजह किसी की समझ में नहीं आ रही थी, क्योंकि न तो वो पैसे वाले लोग थे जो कोई फिरौती के लिए उस का अपहरण करता और न ही जसबीर कौर चालू किस्म की औरत थी. वह बेहद शरीफ औरत थी.

सरपंच परजिंदर सिंह और साबका सरपंच नवदीप सिंह भी यही सोचसोच कर हैरान थे. पुलिस और बिंदर के परिजन अपनेअपने तरीके से जसबीर की तलाश में जुटे  थे. इसी दौरान किसी ने सरपंच नवदीप सिंह और बिंदर को बताया कि जसबीर के गायब होने वाले दिन यानी 27 अप्रैल को उसे पूर्ण सिंह की पत्नी जोगिंदर कौर और पड़ोसन राजिंदर कौर के साथ उन के घर की तरफ जाते देखा गया था.

इस बात का पता चलते ही सरपंच नवदीप सिंह कुछ गांव वालों के साथ पूर्ण सिंह के घर पहुंचे और जसबीर के बारे में पूछा.

उस समय घर पर पूर्ण सिंह, उस की पत्नी जोगिंदर कौर, बेटा गुरप्रीत, उस की बहू रविंदर कौर और दोनों बेटियां नीतू व राजिंदर कौर मौजूद थीं. उन्होंने बताया कि जसबीर कौर दोपहर को उन के घर आई तो जरूर थी पर 3 बजे वापस अपने घर चली गई थी. जसबीर कौर का पता लगने की जो आशा दिखाई दे रही थी वह जोगिंदर कौर के बताने से बुझ गई थी.

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जसबीर की तलाश फिर से शुरू की गई. पर न जाने क्यों सरपंच नवदीप को ऐसा लगने लगा कि जसबीर के गायब होने का राज पूर्ण सिंह और उस का परिवार जानता है. यही बात बिंदर और उस के दोनों मामाओं को भी खटक रही थी. आखिर 29 अप्रैल, 2019 को शाम को सरपंच नवदीप और परजिंदर  के साथ पूरे गांव ने पूर्ण सिंह के घर पर धावा बोल दिया.

उन्होंने उस के घर के चप्पेचप्पे की तलाशी लेनी शुरू कर दी. उन्हें घर में एक जगह बड़ा संदूक दिखाई दिया. वह संदूक कमरों के पीछे पशुओं के बाड़े के पास पड़ा था. संदूक पर मक्खियां भिनभिना रही थीं और उस में से अजीब सी दुर्गंध आ रही थी.

सरपंच नवदीप ने बढ़ कर जब उस संदूक को खोल कर देखा तो उन के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. संदूक में जसबीर कौर की लाश थी जो जगहजगह से कटी हुई थी. थोड़ी ही देर में यह खबर गांव भर में फैल गई. पूरा गांव पूर्ण सिंह के घर की ओर दौड़ने लगा.

बिंदर ने सरपंच नवदीप सिंह के साथ थाना बटाला जा कर इस की सूचना एसएचओ हरसंदीप सिंह को दी. एसएचओ तुरंत एएसआई बलविंदर सिंह, सितरमान सिंह, लेडी एएसआई अंजू बाला, लेडी हवलदार जसविंदर कौर, बलजीत कौर, हवलदार दिलबाग, सुखजीत सिंह, लखविंदर सिंह, सिपाही जगदीप सिंह और सुखदेव सिंह को साथ ले कर पूर्ण सिंह के घर पहुंच गए.

मौके पर पहुंच कर पुलिस ने सब से पहले जसबीर कौर की लाश अपने कब्जे में ली. इस के बाद पूर्ण सिंह उस की पत्नी जोगिंदर कौर, बेटे की पत्नी रविंदर कौर तथा एक महिला तांत्रिक जगदीशो उर्फ दीशो को गिरफ्तार कर लिया.

इस हत्याकांड से जुड़े अन्य 3 आरोपी नीतू, अमन और राजिंदर कौर फरार होेने में कामयाब हो गए थे. एसएचओ हरसंदीप सिंह ने एसपी बटाला एच.एस. हीर, डीएसपी बलबीर सिंह को भी घटना की सूचना दे दी थी.

कुछ देर में दोनों पुलिस अधिकारी क्राइम टीम के साथ मौकाएवारदात पर पहुंच गए. मृतका जसबीर कौर का पेट चीरा हुआ था. वह 7 महीने की गर्भवती थी. पुलिस ने जब लाश बरामद की तो उस के पेट से बच्चा गायब था.

इस बारे में पुलिस के साथ आरोपियों से पूछताछ की गई तो प्रथम पूछताछ में ही रविंदर कौर ने अपना अपराध स्वीकर कर लिया. उस ने बताया कि उस के परिवार के लोगों ने मृतका का पेट चीर कर उस के गर्भ से बच्चा निकाला था. इन लोगों ने गर्भवती महिला के पेट को चीर कर गर्भ से बच्चा निकालने की जो कहानी बताई वह वास्तव में रोंगटे खडे़ कर देने वाली निकली.

इस कहानी की मुख्य अभियुक्ता रविंदर कौर की शादी लगभग 12 साल पहले हुई थी. उस के 4 बच्चे थे. रविंदर कौर बचपन से ही आजादखयाल की महत्त्वाकांक्षी औरत थी. वह अपनी जिंदगी अपनी तरह से जीना चाहती थी. उसे अपने ऊपर किसी भी तरह की बंदिश पसंद नहीं थी.

अपने स्वार्थपूर्ति के लिए रिश्ते बदलना, बनाना उस का मनपसंद खेल था. करीब 6 साल पहले जब उस की आंख पूर्ण सिंह के बेटे हरप्रीत सिंह के साथ लड़ीं तो वह अपने चारों बच्चों सहित अपने पुराने पति को अलविदा कह कर हरप्रीत सिंह की पत्नी बन उस के घर आ गई थी.

अब इसे रविंदर की बदकिस्मती कहें या उस की ढलती उम्र समझें अथवा नए पति हरप्रीत सिंह की शारीरिक कमी. बात कुछ भी रही हो पर हरप्रीत के साथ शादी के 5 साल बीत जाने के बाद भी वह उस के बच्चे की मां नहीं बन पाई थी. बच्चा न जनने के कारण उस की सास जोगिंदर कौर हर समय उसे कोसती रहती और ताने देती थी. जिस कारण रविंदर कौर बड़ी परेशान थी.

एक बार उस की एक खास सहेली ने उसे बताया कि पास के गांव में जगदीशो उर्फ दीशो नाम की महिला तांत्रिक रहती है, जिस के आशीर्वाद से कई बांझ औरतों की गोद हरी हुई है. तुम उस के पास चलो.

सहेली के कहने पर रविंदर कौर तांत्रिक दीशो से मिली. दीशो कुछ टाइम तक अपनी ढोंग विद्या से उस से पैसे ऐंठ कर उल्लू बनाती रही. अंत में उस ने स्पष्ट कह दिया ‘‘रविंदर तुम्हारी कोख पर ऐसे जिन्न का साया है जो अब कभी तुम्हें मां नहीं बनने देगा. हां एक तरीका है अगर तुम उसे कर सको तो मैं तुम्हें बताऊं?’’

‘‘मैं कुछ भी करने को तैयार हूं.’’ रविंदर कौर बोली.

‘‘तो सुनो, अपने अड़ोसपड़ोस में कोई ऐसी औरत तलाश करो जो गर्भवती हो और तुम अभी कुछ दिन अपने घर से बाहर मत निकलना. अपने बारे में यह बात भी फैला दो कि तुम गर्भ से हो. इस के बाद क्या करना है यह मैं तुम्हें बाद में बताऊंगी.’’ दीशो ने सलाह दी.

दीशो के कहने पर रविंदर कौर ने वैसा ही किया. साथ ही यह बात अपनी सास और ननदों को भी बता दी. उन्हीं दिनों जसबीर कौर गर्भवती थी. यह बात रविंदर कौर ने तांत्रिक दीशो को बता दी. दीशो ने फिर एक भयानक योजना बनाई.

घटना वाले दिन रविंदर कौर पड़ोस के खेतों में काम कर रही जसबीर को इशारे से बुला कर वह उसे अपने घर ले गई. उस ने जसबीर को बताया था कि एक बड़ी देवी उन के घर आई हुई है. वह उस से आशीर्वाद ले ले ताकि उस का बच्चा सहीसलामत पैदा हो.

जसबीर नीयत की साफ थी और भोली भी. रविंदर कौर की बातों को वह समझ नहीं पाई और उस के घर चली गई. वहां पहले से ही रविंदर कौर के परिवार के सब लोग मौजूद थे. सो समय व्यर्थ न करते हुए सब ने किसी तरह जसबीर को अपने कब्जे में ले कर दुपट्टे से उस का गला घोंट दिया.

दम घुटते ही जसबीर एक ओर लुढ़क गई. वह मर चुकी थी. तभी तांत्रिक दीशो ने अपने साथ लाए सर्जिकल ब्लेड से उस का पेट चीर कर पेट का शिशु बाहर निकाल लिया. शिशु को गोद में ले कर जब देखा तो पता चला कि जसबीर कौर के साथसाथ वह भी मर चुका है. मां और बच्चे की मौत के बाद उन सब के हाथपैर फूल गए.

अब क्या किया जाए? सब के सामने अब यही एक प्रश्न था. काफी सोचविचार के बाद तय किया गया कि शिशु के शव को घर में बनी सीढि़यों के नीचे गाड़ दिया जाए और जसबीर की लाश कमरे के बाहर रखे संदूक में छिपा दिया जाए.

बाद में मौका मिलने पर जसबीर की लाश के टुकड़े कर नहर में बहा देंगे. किसी को कानोंकान खबर भी नहीं लगेगी कि जसबीर कहां गई. बाद में यह अफवाह फैला देंगे कि वह अपने किसी यार के साथ भाग गई होगी.

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एसएचओ हरसंदीप सिंह ने भादंवि की धारा 302, 313, 316, 201 और 120 बी के तहत पूर्ण सिंह, जोगिंदर कौर, रविंदर कौर, गुरप्रीत सिंह, नीतू, अमन और राजिंदर कौर के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कर चारों अभियुक्तों पूर्ण सिंह, उस की पत्नी जोगिंदर कौर, बेटे की पत्नी रविंदर कौर और महिला तांत्रिक जगदीशो उर्फ दीशो को गिरफ्तार कर पहली मई को अदालत में पेश कर पुलिस रिमांड पर ले लिया.

रिमांड के दौरान इस हत्याकांड की मुख्य आरोपी रविंदर कौर की निशानदेही पर ड्यूटी मजिस्ट्रैट अजय पाल सिंह और नायब तहसीलदार तथा पुलिस के उच्च अधिकारियों व गांव वालों की मौजूदगी में उन के घर में सीढि़यों के नीचे दफनाए गए मृतका जसबीर के शिशु को जमीन खोद कर बाहर निकला. फिर मांबेटे का शव पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल भिजवाया गया. अन्य 3 दोषियों की निशानदेही पर घर से खून सने कपडे़ और सर्जिकल ब्लेड बरामद कर लिया गया.

बहरहाल जो 4 लोग गिरफ्तार हो चुके हैं, उन्हें सीखचों के पीछे से बाहर आने का मौका कब मिलेगा, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. वह बाहर आ पाएंगे या नहीं, किसी को पता नहीं है. अदालत से उन्हें कितनी सजा मिलती है, यह भी अभी भविष्य के गर्भ में है.

लेकिन इतना तय है कि समाज में अंधविश्वास की जड़ें बहुत गहरे तक जमी हुई हैं. ये जड़ें कैसे और कब उखड़ सकेंगी, कोई नहीं जानता.

कहानी सौजन्य: मनोहर कहानी

जानें, कैसे बनाएं ड्राई फ्रूट्स रायता

आज आपको ड्राई फ्रूट्स रायता बनाने की रेसिपी बताते है. जो  बहुत टेस्टी है और इसे बनाना भी काफी आसान है.  अगर आपको रायता खाना पसंद है, तो आप इस रेसिपी को जरूर ट्राई करें.

सामग्री

2 बड़ी चम्मच  बादाम का चूरा

2 बड़े चम्मच बारीक कटी हुई खजूर

1/2 कटोरी कटे हुए ड्राई फ्रूट्स

3 कप दही

1 चुटकी नमक

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बनाने की वि​धि

एक बड़ा बर्तन लेकर उसमें दही डाल दें.

अब कटे हुए ड्राई फ्रूट्स, खजूर, नमक और बादाम का चूरा इसमें डालें.

सभी चीजों को अच्छी तरह मिला लें. कुछ देर के लिए फ्रिज में रखें.

अब ठंडा-ठंडा ड्राई फ्रूट्स रायता सर्व करें.

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किचन की इन चीजों का इस्तेमाल कर डायबिटीज को करें ‘बाय’

आज के वक्त में डायबिटीज लोगों के लिए एक गंभीर परेशानी बनी हुई है. दुनियाभर में ज्यादातर लोग इस परेशानी से जूझ रहे हैं. डायबिटीज की बीमारी में शरीर में इंसुलिन हार्मोन का प्रोडक्शन सही मात्रा में नहीं होता है. जानकारों की माने तो अगर डायबिटीज को नियंत्रण में न रखा जाए तो इससे किडनी और दिल की बीमारी होने के साथ व्यक्ति का वजन भी बढ़ने लगता है.

इस खबर में हम आपको डायबिटीज का घरेलू उपचार बताएंगे. हम बताएंगे कि अपने किचन में मौजूद चीजों का इस्तेमाल कर आप कैसे डायबिटीज को काबू में कर सकते हैं.

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तांबे के बर्तन में पिएं पानी

जानकारों की माने तो इस बीमारी में तांबे के बर्तन में पानी पीना काफी लाभकारी होता है. इसके लिए रात में तांबे के बर्तने में पानी भर कर रख लें और रोज सुबह जागते ही एक ग्लास पानी पी लें. इससे तांबे के एंटीऑक्सीडेंट और एंटी इंफ्लामेट्री गुण पानी में आ जाते हैं, जो डायबिटीज को कंट्रोल में रखने में मदद करते हैं.

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मेथी का दाना

कई तरह के शोधो में से स्पष्ट हुआ है कि डाइबिटीज की परेशानी में मेथी का दाना काफी लाभकारी होता है. अगर आप रोजाना गर्म पानी में भींगी हुई 10 ग्राम मेथी के दाने का नियमित रूप से सेवन करते हैं तो टाइप-2 डायबिटीज कंट्रोल में रहती है. मेथी दाने में मौजूद फाइबर धीरे-धीरे ही ब्लडस्ट्रीम में शुगर को रिलीज करता है.

केवल मीठा से दूर रहना नहीं है इलाज

डायबिटीज को कंट्रोल करने के लिए सिर्फ मीठा खाना छोड़ना काफी नहीं होता. बल्कि इसके लिए जरूरी है कि आप करेला, एलोवेरा जैसी चीजों को अपने खाने में शामिल करें. इसके अलावा आंवला भी काफी फायदेमंद होता है. इसमें मौजूद फाइबर डाइबिटीज में काफी लाभकारी होता है.

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एक रिश्ता किताब का : भाग 3

‘‘…मैं क्या करता. मांबाप दोनों की कमी पूरी करताकरता यह भूल ही गया कि बच्चे को ना सुनने की आदत भी डालनी चाहिए. मैं ने ना सुनना नहीं न सिखाया, आज तुम ने सिखा दिया. दुनिया भी सिखाएगी उसे कि जिस चीज पर भी वह हाथ रखे, जरूरी नहीं उसे मिल ही जाए,’’ रो रहे थे जगदीश चाचा, ‘‘सारा दोष मेरा है. मैं ने अपनी शादी से भी कुछ ज्यादा ही अपेक्षाएं कर ली थीं जो पूरी नहीं उतरीं. जिम्मेदारी न समझ मजाक ही समझा. मेरी पत्नी की और मेरी निभ नहीं पाई जिस में मेरा दोष ज्यादा था. मेरे ही कर्मों का फल है जो आज मेरा बच्चा बेडि़यों में बंधा है…मुझे माफ कर दो बेटी और सदा सुखी रहो… हमारी वजह से बहुत परेशानी उठानी पड़ी तुम्हें.’’

हम सब एकदूसरे का मुंह देख रहे थे. जगदीश चाचा का एकाएक बदल जाना गले के नीचे नहीं उतर रहा था. कहीं कोई छलावा तो नहीं है न उन का यह व्यवहार. कल तक मुझे बरबाद कर देने की कसमें खा रहे थे, आज अपनी ही बरबादी की कथा सुना कर उस की जिम्मेदारी भी खुद पर ले रहे थे.

‘‘बेटी, मैं ने सच में औरों से कुछ ज्यादा ही उम्मीदें लगाई हैं. सदा लेने को हाथ बढ़ाया है देने को नहीं. सदा यही चाहा कि सामने वाला मेरे अनुसार अपने को ढाले, कभी मैं भी वह करूं जो सामने वाले को अच्छा लगे, ऐसा नहीं सोचा. जैसा मैं था वैसा ही सोमेश को भी बनाता गया…बेहद जिद्दी और सब पर अपना ही अधिकार समझने वाला…ऐसा इनसान जीवन में कभी सफल नहीं होता बेटी. न मेरी शादी सफल हुई न मेरी परवरिश. न मैं अच्छा पति बना न अच्छा पिता. अच्छा किया जो तुम ने शादी से मना कर दिया. कम से कम तुम्हारे इनकार से मेरी इस जिद पर एक पूर्णविराम तो लगा.’’

निरंतर रो रहे थे जगदीश चाचा. पापा भी रो रहे थे. शायद हम सब भी. इस कथा का अंत इस तरह होगा किस ने सोचा था. जगदीश चाचा सब रिश्तों को खो कर इतना तो समझ ही गए थे कि अकेला इनसान कितना असहाय, कितना असुरक्षित होता है. सब गंवा कर दोस्ती का रिश्ता बचाना सीख लिया यही बहुत था, एक शुरुआत की न जगदीश चाचा ने. पापा ने माफ कर दिया जगदीश चाचा को. सिर से भारी बोझ हट गया, एक रिश्ता तोड़ एक रिश्ता बचा लिया, सौदा महंगा नहीं रहा.

तूफान के बाद की शांति घर भर में पैर पसारे थी. दोपहर का समय था जब मेरे एक सहयोगी ने दरवाजा खटखटाया. कंधे पर बैग और हाथ में शादी का तोहफा लिए मामा ने उन्हें अंदर बिठाया. मैं मिलने गई तो विजय को देख कर सहसा हैरान हो गई.

‘‘अरे, शादी वाला घर नहीं लग रहा आप का…आप भी मेहंदी से लिपीपुती नहीं हैं…पंजाबी दुलहन के हाथ में तो लंबेलंबे कलीरे होते हैं न. मुझे तो लगा था कि पहुंच ही नहीं पाऊंगा. सीधा स्टेशन से आ रहा हूं. आप पहले यह तोहफा ले लीजिए. अभी फुरसत है न. रात को तो आप बहुत व्यस्त होंगी. जरा खोल कर देखिए न, आप की पसंद का है कुछ.’’

एक ही सांस में विजय सब कह गए. उन के चेहरे पर मंदमंद मुसकान थी, जो सदा ही रहती है. आफिस के काम से उन को मद्रास में नियुक्त किया गया था. अच्छे इनसान हैं. मेरी शादी के लिए ही इतनी दूर से आए थे. आसपास भी देख रहे थे.

‘‘क्या बात है शुभाजी, घर में शादी की चहलपहल नहीं है. क्या शादी का प्रबंध कहीं और किया गया है? आप जरा खोल कर देखिए न इसे…माफ कीजिएगा, मुझे रात ही वापस लौटना होगा. आप को तो पता है कि छुट्टी मिलना कितना मुश्किल है…मैं तो किसी तरह जरा सा समय खींच पाया हूं. आप को दुलहन के रूप में देखना चाहता था. आप के हाथों में वह सब कैसा लगता वह सब देखने का लोभ मैं छोड़ ही नहीं पाया.’’

विजय के शब्दों की बेलगाम दौड़ कभी मेरे हाथ में दिए गए तोहफे पर रुकती और कभी आसपास के चुप माहौल पर. इतनी दूर से मुझे बस दुलहन के रूप में देखने आए थे. चाहते थे तोहफा अभी खोल कर देख लूं.

‘‘आप बहुत अच्छी हैं शुभाजी, सोेमेशजी बहुत किस्मत वाले हैं जो आप उन्हें मिलने वाली हैं. आप सदा सुखी रहें. मेरी यह दिली ख्वाहिश है.’’

सहसा उन का हाथ मेरे सिर पर आया. सिहर गया था मेरा पूरा का पूरा अस्तित्व. नजरें उठा कर देखा कुछ तैर रहा था आंखों में.

‘‘क्या बात है, शुभाजी, सब ठीक तो है न…घबराहट हो रही है क्या?’’

क्या कहूं मैं सोेमेश के बारे में, और विजय को भी क्या समझूं. विजय तो आज भी वहीं खड़े हैं जहां तब खड़े थे जब मेरी सोमेश के साथ सगाई हुई थी. एक मीठा सा भाव रहता था सदा विजय की आंखों में. कुछ छू जाता था मुझे. इस से पहले मैं कुछ समझ पाती सोमेश से मेरी सगाई हो गई और जितना समय सगाई को हुआ उतने ही समय से विजय की नियुक्ति भी मद्रास में है, जिस वजह से यह प्रकरण पुन: कभी उठा ही नहीं था. भूल ही गई थी मैं विजय को.

तभी पापा भीतर चले आए और मैं तोहफा वहीं मेज पर टिका कर भीतर चली आई. अपने कमरे में दुबक सुबक- सुबक कर रो पड़ी. जाहिर सा था पापा ने सारी की सारी कहानी विजय को सुना दी होगी. कुछ समय बीत गया…फिर ऐसा लगा बहुत पास आ कर बैठ गया है कोई. कान में एक मीठा सा स्वर भी पड़ा, ‘‘आप ने अभी तक मेरा तोहफा खोल कर नहीं देखा शुभाजी. जरा देखिए तो, क्या यह वही किताब है जिसे सोमेश ने जला दिया था…देखिए न शुभाजी, क्या इसी किताब को आप पिछले साल भर से ढूंढ़ रही थीं. देखिए तो…

‘‘शुभा, आप मेरी बात सुन रही हैं न. जो हो गया उसे तो होना ही था क्योंकि सोमेश इतनी अच्छी तकदीर का मालिक नहीं था और जिस रिश्ते की शुरुआत ही धोखे और खराब नीयत से हो उस का अंत कैसा होता है. सभी जानते हैं न. आप कमरे में दुबक कर क्यों रो रही हैं. आप ने तो किसी को धोखा नहीं दिया, तो फिर दुखी होने की क्या जरूरत. इधर देखिए न…’’

मेरा हाथ जबरदस्ती अपनी तरफ खींचा विजय ने. स्तब्ध थी मैं कि इतना अधिकार विजय को किस ने दिया? दोनों हाथों से मेरा चेहरा सामने कर आंसू पोंछे.

‘‘इतनी दूर से मैं आप के आंसू देखने तो नहीं आया था. आप बहुत अच्छी लगती थीं मुझे…अच्छे लोग सदा मन के किसी न किसी कोने में छिपे रहते हैं न. यह अलग बात है कि आप ने मन का कोई कोना नहीं पूरा मन ही बांध रखा था… आप का हाथ मांगना चाहता था. जरा सी देर हो गई थी मुझ से. आप की सगाई हो गई और मैं जानबूझ कर आप से दूर चला गया. सदा आप का सुख मांगा है…प्रकृति से यही मांगता रहा कि आप को कभी गरम हवा छू भी न जाए.

‘‘आप की एक नन्ही सी इच्छा का पता चला था.

‘‘याद है एक शाम आप बुक शाप में यह किताब ढूंढ़ती मिल गई थीं. आप से पता चला था कि आप इसे लंबे समय से ढूंढ़ रही हैं. मैं ने भी इसे मद्रास में ढूंढ़ा… मिल गई मुझे. सोचा शादी में इस से अच्छा तोहफा और क्या होगा…इसे पा कर आप के चेहरे पर जो चमक आएगी उसी में मैं भी सुखी हो लूंगा इसीलिए तो बारबार इसे खोल कर देख लेने की जल्दी मचा रहा था मैं.’’

पहली बार नजरें मिलाने की हिम्मत की मैं ने. आकंठ डूब गई मैं विजय के शब्दों में. मेरी नन्ही सी इच्छा का इतना सम्मान किया विजय ने और इसी इच्छा का दाहसंस्कार सोमेश के पागलपन को दर्शा गया जिस पर इतना बड़ा झूठ तारतार कर बिखर गया.

‘‘आप को दुलहन के रूप में देखना चाहता था, तभी तो इतनी दूर से आया हूं. आज का दिन आप की शादी का दिन है न. तो शादी हो जानी चाहिए. आप के पापा और मां ने पूछने को भेजा है. क्या आप मेरा हाथ पकड़ना पसंद करेंगी?’’

क्या कहती मैं? विजय ने कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया. झट से एक प्रगाढ़ चुंबन मेरे गाल पर जड़ा और सर थपक दिया. शायद कुछ था जो सदा से हमें जोड़े था. बिना कुछ कहे बिना कुछ सुने. कुछ ऐसा जिसे सोमेश के साथ कभी महसूस नहीं किया था.

विजय बाहर चले गए. पापा और मां से क्याक्या बातें करते रहे मैं ने सुना नहीं. ऐसा लगा एक सुरक्षा कवच घिर आया है आसपास. मेरी एक नन्ही सी इच्छा मेरी वह प्रिय किताब मेरे हाथों में चली आई. समझ नहीं पा रही हूं कैसे सोमेश का धन्यवाद करूं?

एक रिश्ता किताब का : भाग 2

‘‘मैं कुछ भी समझना नहीं चाहता. मुझे तो बस मेरे बच्चे की खुशी चाहिए और तुम ने शादी से इनकार कर दिया तो वह पागल हो जाएगा. वह बहुत प्यार करता है तुम से.’’

मन कांप रहा था मेरा. क्या कहूं मैं इस पिता समान इनसान से? अपनी संतान के मोह में वह इतना अंधा हो चुका है कि पराई संतान का सुखदुख भी उसे नजर नहीं आ रहा.

‘‘अगर शुभा ऐसा चाहती है तो तुम ही क्यों नहीं मान जाते?’’ पापा ने सवाल किया जिस पर सोमेश के पिता तिलमिला से गए.

‘‘तुम भी अपनी बेटी की बोली बोलने लगे हो.’’

‘‘मैं ने भी अपनी बच्ची बड़े लाड़प्यार से पाली है, जगदीश. माना मेरे पास तुम्हारी तरह करोड़ों की विरासत नहीं है, लेकिन इतना भूखा भी नहीं हूं जो अपनी बच्ची को पालपोस कर कुएं में धकेल दूं. शादी की तैयारी में मेरा भी तो लाखों खर्च हो चुका है. अब मैं खर्च का हिसाब तो नहीं करूंगा न…जब बेटी का भविष्य ही प्रश्नचिह्न बन सामने खड़ा होगा…चलो, मैं साथ चलता हूं. सोमेश को किसी मनोचिकित्सक को दिखा लेते हैं.’’

सोमेश के पिता माने नहीं और दनदनाते हुए चले गए.

‘‘कहीं हमारे हाथों किसी का दिल तो नहीं टूट रहा, शुभा? कहीं कोई अन्याय तो नहीं हो रहा?’’ मां ने धीरे से पूछा, ‘‘सोमेश बहुत प्यार करता है तुम से.’’

‘‘मां, पहली नजर में ही उसे मुझ से प्यार हो गया, समझ नहीं पाई थी मैं. न पहले देखा था कभी और न ही मेरे बारे में कुछ जानता था…चलो, माना… हो गया. अब क्या वह मेरी सोच का भी मालिक हो गया? मां, इतना समय मैं चुप रही तो इसलिए कि मैं भी यही मानती रही, यह उस का प्यार ही है जो कोई मुझे देख रहा हो तो उसे सहन ही नहीं होता. एक दिन रेस्तरां में मेरे एक सहयोगी मिल गए तो उन्हीं के बारे में हजार सवाल करने लगा और फिर न मुझे खाने दिया न खुद खाया. वजह सिर्फ यह कि उन्होंने मुझ से बात ही क्यों की. उस में समझदारी नाम की कोई चीज ही नहीं है मां. अपनी जरा सी इच्छा का मान रखने के लिए वह मुझे चरित्रहीन भी समझने लगता है…मेरी नजरों पर पहरा, मैं ने उधर क्यों देखा, मैं ने पीछे क्यों देखा, कभीकभी तो मुझे अपने बारे में भी शक होने लगता है कि क्या सच में मैं अच्छी लड़की नहीं हूं…’’

पापा मेरी बातें सुन कर अवाक् थे. इतने दिन मैं ने यह सब उन से क्यों नहीं कहा इसी बात पर नाराज होने लगे.

‘‘तुम अच्छी लड़की हो बेटा, तुम तो मेरा अभिमान हो…लोग कहते थे मैं ने एक ही बेटी पर अपना परिवार क्यों रोक लिया तो मैं यही कहता था कि मेरी बेटी ही मेरा बेटा है. लाखों रुपए लगा कर तुम्हें पढ़ायालिखाया, एक समझदार इनसान बनाया. वह इसलिए तो नहीं कि तुम्हें एक मानसिक रोगी के साथ बांध दूं. 4 महीने से तुम दोनों मिल रहे हो, इतना डांवांडोल चरित्र है सोमेश का तो तुम ने हम से कहा क्यों नहीं?’’

‘‘मैं खुद भी समझ नहीं पा रही थी पापा, एक दिशा नहीं दे पा रही थी अपने निर्णय को…लेकिन यह सच है कि सोमेश के साथ रहने से दम घुटता है.’’

रिश्ता तोड़ दिया पापा ने. हाथ जोड़ कर जगदीश चाचा से क्षमा मांग ली. बदहवासी में क्याक्या बोलने लगे जगदीश चाचा. मेरे मामा और ताऊजी भी पापा के साथ गए थे. घर वापस आए तो काफी उदास भी थे और चिंतित भी. मामा अपनी बात समझाने लगे, ‘‘उस का गुस्सा जायज है लेकिन वह हमारा ही शक दूर करने के लिए मान क्यों नहीं जाता. क्यों नहीं हमारे साथ सोमेश को डाक्टर के पास भेज देता.

शादी के बाद सब ठीक हो जाएगा, एक ही रट मेरे तो गले से नीचे नहीं उतरती. शादी क्या कोई दवा की गोली है जिस के होते ही मर्ज चला जाएगा. मुझे तो लगता है बापबेटा दोनों ही जिद्दी हैं. जरूर कुछ छिपा रहे हैं वरना सांच को आंच क्या. क्या डर है जगदीश को जो डाक्टर के पास ले जाना ही नहीं चाहता,’’ ताऊजी ने भी अपने मन की शंका सामने रखी.

‘‘बेटियां क्या इतनी सस्ती होती हैं जो किसी के भी हाथ दे दी जाएं. कोई मुझ से पूछे बेटी की कीमत…प्रकृति ने मुझे तो बेटी भी नहीं दी…अगर मेरी भी बेटी होती तो क्या मैं उसे पढ़ालिखा कर, सोचनेसमझने की अक्ल दिला कर किसी कुंए में धकेल देता?’’ रो पड़े थे ताऊजी.

मैं दरवाजे की ओट में खड़ी थी. उधर सोमेश लगातार मुझे फोन कर रहा था, मना रहा था मुझे…गिड़गिड़ा रहा था. क्या उस के पास आत्मसम्मान नाम की कोई चीज नहीं है. मैं सोचने लगी कि इतने अपमान के बाद कोई भी विवेकी पुरुष होता तो मेरी तरफ देखता तक नहीं. कैसा है यह प्यार? प्यार तो एहसास से होता है न. जिस प्यार का दावा सोमेश पहले दिन से कर रहा है वह जरा सा छू भर नहीं गया मुझे. कोई एक पल भी कभी ऐसा नहीं आया जब मुझे लगा हो कोई ऐसा धागा है जो मुझे सोमेश से बांधता है. हर पल यही लगा कि उस के अधिकार में चली गई हूं.

‘‘मैं बदनाम कर दूंगा तुम्हें शुभा, तेजाब डाल दूंगा तुम्हारे चेहरे पर, तुम मेरे सिवा किसी और की नहीं हो सकतीं…’’

मेरे कार्यालय में आ कर जोरजोर से चीखने लगा सोमेश. शादी टूट जाने की जो बात मैं ने अभी किसी से भी नहीं कही थी, उस ने चौराहे का मजाक बना दी. अपना पागलपन स्वयं ही सब को दिखा दिया. हमारे प्रबंधक महोदय ने पुलिस बुला ली और तेजाब की धमकी देने पर सलाखों के पीछे पहुंचा दिया सोमेश को.

उधर जगदीश चाचा भी दुश्मनी पर उतर आए थे. वह कुछ भी करने को तैयार थे, लेकिन अपनी और अपने बेटे की असंतुलित मनोस्थिति को स्वीकारना नहीं चाहते थे. हमारा परिवार परेशान तो था लेकिन डरा हुआ नहीं था. शादी की तारीख धीरेधीरे पास आ रही थी जिस के गुजर जाने का इंतजार तो सभी को था लेकिन उस के पास आने का चाव समाप्त हो चुका था.

शादी की तारीख आई तो मां ने रोक लिया, ‘‘आज घर पर ही रह शुभा, पता नहीं सोमेश क्या कर बैठे.’’

मान गई मैं. अफसोस हो रहा था मुझे, क्या चैन से जीना मेरा अधिकार नहीं है? दोष क्या है मेरा? यही न कि एक जनून की भेंट चढ़ना नहीं चाहती. क्यों अपना जीवन नरक बना लूं जब जानती हूं सामने जलती लपटों के सिवा कुछ नहीं.

मेरे ममेरे भाई और ताऊजी सुबह ही हमारे घर पर चले आए.

‘‘बूआ, आप चिंता क्यों कर रही हैं…हम हैं न. अब डरडर कर भी तो नहीं न जिआ जा सकता. सहीगलत की समझ जब आ गई है तो सही का ही चुनाव करेंगे न हम. जानबूझ कर जहर भी तो नहीं न पिआ जा सकता.’’

मां को सांत्वना दी उन्होंने. अजीब सा तनाव था घर में. कब क्या हो बस इसी आशंका में जरा सी आहट पर भी हम चौंक जाते थे. लगभग 8 बजे एक नई ही करवट बदल ली हालात ने.

जगदीश चाचा चुपचाप खड़े थे हमारे दरवाजे पर. आशंकित थे हम. कैसी विडंबना है न, जिन से जीवन भर का नाता बांधने जा रहे थे वही जान के दुश्मन नजर आने लगे थे.

पापा ने हाथ पकड़ कर भीतर बुलाया. हम ने कब उन से दुश्मनी चाही थी. जोरजोर से रोने लगे जगदीश चाचा. पता चला, सोमेश सचमुच पागलखाने में है. बेडि़यों से बंधा पड़ा है सोमेश. पता चला वह पूरे घर को आग लगाने वाला था. हम सब यह सुन कर अवाक् रह गए.

‘‘मुझे माफ कर दो बेटी. तुम सही थीं. मेरा बेटा वास्तव में संतुलित दिमाग का मालिक नहीं है. मेरा बच्चा पागल है. वह बचपन से ही ऐसा है जब से उस की मां चली गई.’’

सोमेश की मां तभी उन्हें छोड़ कर चली गई थी जब वह मात्र 4 साल का था. यह बात मुझे पापा ने बताई थी. पतिपत्नी में निभ नहीं पाई थी और इस रिश्ते का अंत तलाक में हुआ था.

एक रिश्ता किताब का : भाग 1

सोमेश में भावनाओं के बजाय अधिकार और मैं का जनून दिखा था शुभ्रा को. यहां तक कि उस का प्यार प्यार नहीं पागलपन था, यह बात शुभ्रा उस के साथ विवाह होने से पहले जान गई थी. सब जानते हुए भी क्या शुभ्रा ने सोमेश के साथ विवाह कर अपनी जिंदगी दांव पर लगा दी? पढि़ए, की दिल को छूती कहानी.

‘‘बीमार हो तुम, इलाज कराओ अपना. तुम तो इनसान ही नहीं लगते हो मुझे…’’

‘‘तो क्या मैं जानवर हूं?’’

‘‘शायद जानवर भी नहीं हो. जानवर को भी अपने मालिक पर कम से कम भरोसा तो होता है…उसे पता होता है कि उस का मालिक उस से प्यार करता है तभी तो खाना देने में देरसवेर हो जाए तो उसे काटने को नहीं दौड़ता, जैसे तुम दौड़ते हो.’’

‘‘मैं काटने को दौड़ता हूं तुम्हें? अरे, मैं तुम से बेहद प्यार करता हूं.’’

‘‘मत करो मुझ से प्यार…मुझे ऐसा प्यार नहीं चाहिए जिसे निभाने में मेरा दम ही घुट जाए. मेरी एकएक सांस पर तुम ने पहरा लगा रखा है. क्या मैं बेजान गुडि़या हूं जिस की अपनी कोई पसंदनापसंद नहीं. तुम हंसो तो मैं हंसू, तुम नाचो तो मैं नाचूं…हद होती है हर चीज की…तुम सामान्य नहीं हो सोमेश, तुम बीमार हो, कृपा कर के तुम किसी समझदार मनोचिकित्सक को दिखाओ.’’

ऐसा लग रहा था मुझे जैसे मेरे पूरे शरीर का रक्त मेरी कनपटियों में समा कर उन्हें फाड़ने जा रहा है. आवेश में मेरे हाथपैर कांपने लगे. मैं जो कह रही थी वह मेरी सहनशक्ति समाप्त हो जाने का ही नतीजा था. कोई इस सीमा तक भी स्वार्थी और आधिपत्य जताने वाला हो सकता है मेरी कल्पना से भी परे था. ऐसा क्या हो गया जो सोमेश ने मेरी पसंद की उस किताब को आग ही लगा दी. वह किताब जिसे मैं पिछले 1 साल से ढूंढ़ रही थी. आज सुबह ही मुझे सोमेश ने बताया था कि शाम 4 बजे वह मुझ से मिलने आएगा. 4 से 5 तक मैं उस का इंतजार करती रही, हार कर पास वाली किताबों की दुकान में चली गई.

समय का पाबंद सोमेश कभी नहीं होता और अपनी जरूरत और इच्छा के अनुसार फैसला बदल लेना या देरसवेर करना उस की आदत है, जिसे पिछले 4 महीने से मैं महसूस भी कर रही हूं और मन ही मन परेशान भी हो रही हूं यह सोच कर कि कैसे इस उलझे हुए व्यक्ति के साथ पूरी उम्र गुजार पाऊंगी.

कुछ समय बीत गया दुकान में और सहसा मुझे वह किताब नजर आ गई जिसे मैं बहुत समय से ढूंढ़ रही थी. किताब खरीद कर मैं बाहर चली आई और उसी कोने में सोमेश को भुनभुनाते हुए पाया. इस से पहले कि मैं किताब मिल जाने की खुशी उस पर जाहिर करूं उस ने किताब मेरे हाथ से छीन ली और जेब से लाइटर निकाल यह कहते हुए उसे आग लगा दी, ‘‘इसी की वजह से मुझे यहां इंतजार करना पड़ा न.’’

10 मिनट इंतजार नहीं कर पाया सोमेश और मैं जो पूरे घंटे भर से यहां खड़ी थी जिसे हर आताजाता घूर रहा था. अपनी वजह से मुझे परेशान करना जो अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है और अपनी जरा सी परेशानी का यह आलम कि उस वजह को आग ही लगा दी.

अवाक् रह गया सोमेश मुझे चीखते देख कर जिसे पुन: हर आताजाता रुक कर देख भी रहा था और सुन भी रहा था. मेरा तमाशा बनाने वाला अपना भी तमाशा बनना सह नहीं पाया और झट से मेरी बांह पकड़ अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ने का प्रयास करने लगा.

‘‘बस, सोमेश, अब और नहीं,’’ इतना कह कर मैं ने अपना हाथ खींच लिया और मैं ने सामने खड़े रिकशा को इशारा किया.

रिकशा पर बैठ गई मैं. सोमेश के चेहरे के उड़ते रंग और उस के पैरों के पास पड़ी धूधू कर जलती मेरी प्रिय किताब इतना संकेत अवश्य दे गई मुझे कि सोमेश सामान्य नहीं है. उस के साथ नहीं जी पाऊंगी मैं.

पापा के दोस्त का बेटा है सोमेश और उसे मैं इतनी पसंद आ गई थी कि सोमेश के पिता ने हाथ पसार कर मुझे मांग लिया था जबकि सचाई यह थी कि सोमेश की हैसियत हम से कहीं ज्यादा थी. लाखों का दहेज मिल सकता था उसे जो शायद यहां नहीं मिलता क्योंकि मैं हर महीने इतना कमा रही थी कि हर महीने किस्त दर किस्त दहेज उस घर में जाता.

मैं ही दहेज के विरुद्ध थी जिस पर उस के पिता भारी मन से ही राजी हुए थे. बेटे की जिद थी जिस पर उन का लाखों का नुकसान होने वाला था.

‘‘मेरे बेटे में यही तो कमी है, यह जिद्दी बहुत है…और मेरी सब से बड़ी कमजोरी है मेरा बेटा. आज तक इस ने जिस भी चीज पर हाथ रखा मैं ने इनकार नहीं किया…बड़े नाजों से पाला है मैं ने इसे बेटी. तुम इस रिश्ते से इनकार मत करो.’’

दिमाग भन्ना गया मेरा. मैं ने बारीबारी से अपने मांबाप का चेहरा देखा. वे भी परेशान थे मेरे इस निर्णय पर. शादी की सारी तैयारी हो चुकी थी.

‘‘मैं तुम्हारे लिए वे सारी किताबें लाऊंगा शुभा बेटी जो तुम चाहोगी…’’ हाथ जोड़ता हूं मैं. शादी से इनकार हो गया तो मेरा बेटा पागल हो जाएगा.’’

‘‘आप का बेटा पागल ही है चाचाजी, आप समझते क्यों नहीं? सवाल किताबों का नहीं, किताबें तो मैं भी खरीद सकती हूं, सवाल इस बात का है कि सोमेश ने ऐसा किया ही क्यों? क्या उस ने मुझे भी कोई खिलौना ही मान लिया था कि उस ने मांगा और आप ने लाखों का दहेज ठुकरा कर भी मेरा हाथ मांग लिया…सच तो यही है कि उस की हर जायजनाजायज मांग मानमान कर ही आप ने उस की मनोवृत्ति ऐसी स्वार्थी बना दी है कि अपनी खुशी के सामने उसे सब की खुशी बेतुकी लगती है. बेजान चीजें बच्चे की झोली में डाल देना अलग बात है, आज टूट गई कल नई भी आ सकती है. लेकिन माफ कीजिए, मैं बेजान खिलौना नहीं जो आप के बच्चे के लिए शहीद हो जाऊं.

‘‘हाथ क्यों जोड़ते हैं मेरे सामने. क्यों अपने बेटे के जुनून को हवा दे रहे हैं. आप रोकिए उसे और अपनेआप को भी. सोमेश का दिमाग संतुलित नहीं है. कृपया आप इस सत्य को समझने की कोशिश कीजिए…’’

इन 6 कारणों से होते हैं चेहरे पर पिंपल

चेहरे पर पिंपल होना आम बात है, लेकिन चेहरे पर हमेशा पिंपल और उसके दाग धब्बे का बने रहना कोई आम बात नहीं है. इसके लिए आप खुद जिम्मेदार हो सकते हैं. पिंपल या एक्ने होने पर हम अक्सर अपनी त्वचा या फिर अपनी डाइट को कोसते हैं. लेकिन एक्ने होने के पीछे केवल यही दो समस्याएं नहीं हैं बल्कि इसके पीछे कई अजीबो गरीब चीजे जिम्मेदार हैं, जिनके बारे में  आपको बताएंगे.

यहां जानिए क्‍या है वो 6 कारण जिनकी वजह से आपके चेहरे पर पिंपल होते हैं.

  1. मोबाइल फोन

क्या आप घंटो तक अपने दोस्तों से फोन पर चिपके रहते हैं? और क्या आपको जरा सा भी एहसास है कि लंबे समय तक फोन को अपनी त्वचा से चिपकाए रखने से तेल निकलता है, जो फोन में पनप रहे बैक्टीरिया के संपर्क में आ के त्वचा पर जम जाते हैं और इन्हीं से पैदा होते हैं एक्ने. इसलिये फोन को प्रयोग करने के बाद टिशू पेपर से अपना फेस पोछना कभी ना भूलें.

2. हेयर स्टाइलिंग

ज्यादातर हेयर प्रोडक्ट गाढे और तैलिय होते हैं. इसलिये जब हम सो रहे होते हैं, तब यह हमारी त्वचा के सम्पर्क में आ जाते हैं और स्किन के पोर्स को ब्लौक कर देते हैं. यह इसी तरह होता है जैसे किसी ने त्वचा पर तेल लगा दिया हो. इसलिये हमेशा औयल फ्री हेयर प्रोडक्ट का ही प्रयोग करना चाहिये. साथ ही एक्ने पैदा करने में हेयर स्टाइल का भी काफी रोल होता है. लंबे बाल जो मुंह को छूते हों, वह स्किन के पोर्स को ब्लौक कर देते हैं.

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3. हाथों से चेहरा रगड़ना

यह एक आम चीज है जो लगभग हर दूसरा इंसान करता है. हमारे हाथ गंदगी और कीटाणुओं से भरे हुए होते हैं. जब भी हम अपनी हथेलियों को चेहरे पर रखते हैं तो कीटाणु का हमला सीधे हमारी स्किन पोर्स पर होता है. जिससे पिंपल जैसी समस्या पैदा हो जाती है.

4. हार्ड वाटर

जी हां, आपको यह जानकर थोड़ा अजीब लगेगा लेकिन पानी भी पिंपल पैदा करने के लिये बहुत हद तक जिम्मेदार होता है. अगर आप हार्ड वाटर का प्रयोग कर रहे हैं, तो वह चेहरे पर कैमिकल रेसीड़यू छोड़ देता है जिससे पिंपल बनने लगता है.

5. टूथपेस्ट

कई लोगों को ध्यान ही नहीं होता है कि उनके मुंह से टूथब्रश करते वक्‍त झाग निकलता रहता है. कई टूथपेस्ट में फलोराइड होता है, जो एक्ने पैदा करता है. इसके अलावा सोडियम लौरियल सल्फेट भी स्किन में जलन पैदा करता है.

6. यात्रा

क्या आपने कभी ध्यान दिया है कि हमेश यात्रा करने के ही बाद हमारे चेहरे पर एक्ने क्यों आते हैं. दरअसल यह मौसम, पानी और खाने के बदलाव की वजह से होता है. अगर आप फ्लाइट द्वारा यात्रा कर रहीं हैं तो आप की त्वचा बहुत ही कम आर्द्र वातावरण के संपर्क में आती है. जिससे आयल ग्रंथी से ज्यादा तेल निकलता है और यह समस्या पैदा हो जाती है.

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दीपिका तुम्हारी वजह से हम लड़कियों के पर निकल आए हैं…

डियर दीपिका,

तुम मेरी जैसी ना जाने कितनी लड़कियों की हिम्म्त बन गई हो. आज से नहीं बल्कि उस दिन से जिस दिन से तुमने अपने डिप्रेशन की सच्चाई को अपनाते हुए उससे लड़ी और जीती भी.

80-90 के दशक में फिल्मों के नायक को हम लड़कियां अपना हीरो समझती थीं जो बस्ती के लिए लोगों के लिए लड़ता. जो महिलाओं की इज्जत बचाता. जो गरीबों का मसीहा होता. जो कभी मजदूरों का लीडर तो कभी कुली बन जाता. जब हम लड़कियां बड़ी हुईं तो समझ आया ये तो कल्पना के हीरो हैं असलियत के नहीं. हां असल जिंदगी में फिल्मों के उन विलेन से जरूर सामना हुआ. ये अलग बात थी कि उनके चेहरे अलग थे.

तुम हो असली हीरो…

बचपन से सुना था कि फिल्में समाज के लिए आईना होती हैं. असल में हीरो तो तुम हो. तुमने तुम्हारे किरदार को जिया. अपनी काबिलियत के बलबूते फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाई. टॉप की एक्ट्रेस होते हुए भी एक एसिड पीड़िता का किरदार निभाकर तुमने हम लड़कियों के लिए दिल में जगह तो बना ही ली.

साथ ही जेनयू में जाकर वहां के छात्रों का सपोर्ट कर बहुत से युवाओं की प्रेरणा भी बन गई. दीपिका तुमने देश के युवाओं के साथ खड़े होकर करोड़ों दिलों को जीता है. उम्मीद है देश की बड़ी हस्तियां तुमसे सीख लेंगी और आवाज़ उठाने की हिम्मत कर पाएंगी.

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तुम्हारे अंदर हैं सच्चाई की ताकत

तुम्हें हमेशा पता होता है कि लोग बातें करेंगे, ट्रोलर्स तुम्हें ट्रोल करेंगे, तुम्हारा पुतला जलाया जाएगा या लोग फिल्मों का बौयकोट करेंगे. एक सेलिब्रिटी होने के नाते ज्यादातर एक्टर और एक्ट्रेस विवाद में आने से बचते हैं लेकिन तुमने इस बात की परवाह नहीं की, क्योंकि तुम्हारे अंदर सच्चाई कहने की ताकत है और तुमने इस बार भी ये बात साबित कर दी.

जब बताई थी डिप्रेशन की कहानी

लोगों ने तो तब भी बाते बनाई थीं जब तुमने अपने मानसिक अवसाद (डिप्रेशन) पर खुलकर बात की थी. लोगों ने कहा था ये सब पब्लिसिटी स्टंट है लेकिन तुम डटी रही. फिर एक समय बाद लोगों ने इस बात को स्वीकारा कि मानसिक पीड़ा भी एक तरह की बीमारी होती है.

ब्रेकअप के बाद एक लड़की किस तकलीफ से गुजरती है तुमने इसे स्वीकारा लेकिन हार नहीं मानी बल्कि इसे अपनाते हुए आगे बढ़ी.

मिला लोगों का साथ…

तुमने माना कि सिनेमा एक मजबूत माध्यम है और समाज पर इसके प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता है. देखो आज तुम्हारे सपोर्ट में आज कितने लोग हैं. आम लोगों के अलावा फ़िल्म निर्देशक अनुराग कश्यप, फ़िल्म निर्माता अनुभव सिन्हा, गायक विशाल ददलानी, फ़िल्म अभिनेत्री रिचा चड्ढा और स्वरा भास्कर सहित कई लोगों ने तुम्हारे इस इस क़दम को बहादुरी भरा बताया है और सराहा है. इसलिए तुम उन चंद लोगों की बातों पर ध्यान ना देना जो तरह-तरह की बातें बनाकर तुम्हारे कदम को को रोकना चाहेंगे.

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तुमने हम सभी को हिम्मत दी…

वैसे भी यहां महिलाओं के सम्मान और हक की बातें तो बहुत होती हैं लेकिन जैसे ही कोई महिला आगे बढ़ने लगती है कुछ लोग धर्म और परंपरा के नाम पर उसे पीछे खींचने लगते हैं और दबाने की कोशिश करने लगते हैं. लड़कियों की आवाज को तेज आवाज से दबाने की कोशिश की जाती है. उसके इमोशन से भरे आसुंओं को तलवार बताया जाता है. ऐसे में तुमने हम सभी को हिम्मत दी है, अपनी बात कहने और आवाज उठाने का.

तुमने हमे पंख दिए दीपिका

दीपिका तुमने कभी अपनी फिल्मों से तो कभी खुद के माध्यम से हम लड़कियों को वो पंख दिए हैं जिससे अब खुलकर सांस ले सकती हैं और एक उंची उड़ान भर सकती हैं. हम लड़कियां तुम्हारी फैन इसलिए नहीं कि तुम एक खूबसूरत एक्ट्रेस हो बल्कि इसलिए क्योंकि तुम खास में भी एक आम लड़की हो. ऐसे ही नहीं तुम सबसे अलग हो दीपिका.

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एडिट बाय- निशा राय

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