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Hindi Story : गुरुदक्षिणा – निधि को ऐसा क्या दिया दीपा ने?

Hindi Story : दंग रह गई. साथ ही यह सोच कर सुखद एहसास से भी भर गई कि इतनी बड़ी कंपनी की वह सर्वेसर्वा है, जिस में उस के नीचे सैकड़ों लोग काम करते हैं और उसे सलाम ठोंकते हैं. यों तो दीपा के स्वभाव को वह शुरू से ही जानती है. एक बार वह जिस काम को करने की ठान लेती उसे पूरा कर के ही दम लेती थी. उस के तुरंत निर्णय लेने की क्षमता की वह हमेशा कायल रही है पर एक दिन वह इतनी ऊंचाई तक पहुंच जाएगी, उस ने कल्पना भी नहीं की थी. दीपा के गंभीर और रोबीले व्यक्तित्व को देख कर सहसा निधि को विश्वास ही नहीं हुआ कि यह कालेज के दिनों की वही चुलबुली दीपा है जिस की चुहल से खामोशी भी मुसकराने लगती थी. औफिस के कैबिन में बैठी निधि अतीत में खो गई.

दीपा को उस से बेहतर कोई नहीं जानता. जिंदगी उस के लिए एक खूबसूरत नगमे की तरह थी जिस के हरएक पल को वह भरपूर मौजमस्ती और जिंदादिली के साथ जीती थी. निधि उस की क्लासमेट, रूममेट, सखी और इस से भी कहीं अधिक बहन की तरह थी. निधि के मस्तिष्क के किसी कोने में वे गुजरे लमहे झांकने लगे थे जो कभी उन की खट्टी- मीठी सुखद अनुभूतियों के साक्षी रहे थे.

वह दिल्ली की कुहरे भरी एक ठिठुरती हुई शाम थी. लगातार 2 दिनों से सूरज के दर्शन न होने से ठंड बहुत बढ़ गई थी. तीर की तरह चुभती बर्फीली हवाओं से बचने के लिए निधि ने खिड़की और दरवाजा अच्छी तरह से बंद कर लिए थे और पूरे कपड़े पहने ही बिस्तर में दुबक कर पढ़ने में मशगूल हो गई थी. बढ़ती ठंड की वजह से कालेज बंद चल रहे थे और कुछ दिनों के बाद ऐग्जाम होने थे इसलिए वह कमरे में बंद रह कर ज्यादातर वक्त पढ़ाई में गुजारती थी.  निधि ने नजर उठा कर दीवार घड़ी की ओर देखा. रात के 8 बज रहे थे. महानगर के लिहाज से तो अभी शाम ही थी फिर भी सामान्य दिनों में बाहर दौड़ताभागता शहर गहरी खामोशी में की चादर ओढ़ चुका था.

खराब मौसम होने के बावजूद दीपा अभी तक नहीं आई थी. उस के मोबाइल पर निधि कई बार ट्राई कर चुकी थी पर नेटवर्क बिजी होने से एक बार भी बात नहीं हो सकी. उस के बेतरतीब रुटीन से वह आजिज आ चुकी थी. कुछ नहीं हो सकता इस लापरवाह लड़की का. साहबजादी किसी डिस्को में थिरक रही होगी या…क्या फायदा उस के बारे में कुछ भी सोचने से. वह भुनभुनाने लगी. लाख समझाओ पर वह करेगी वही जो उस का मन चाहेगा.  निधि बिखरी सोचों को एकजुट करने की कोशिश कर रही थी कि दरवाजे पर दस्तक हुई.

‘कौन?’ उस ने बिस्तर में बैठेबैठे ही पूछा.

‘दीपा,’ बाहर से आवाज आई.

‘यह कोई वक्त है आने का?’ दरवाजा खोल कर निधि बरस पड़ी उस पर.

‘रिलैक्स स्वीटहार्ट. तू गुस्से में इतनी हसीन लगती है कि मैं यदि तेरा बौयफ्रैंड होती तो मुकेश का गाया हुआ गीत, ‘तुम रूठी रहो मैं मनाता रहूं…’ गाती रहती.’

निधि की हंसी छूट गई.  वह और दीपा एक ही कालेज में साथसाथ पढ़ती थीं. कालेज में निधि का पहला परिचय दीपा से ही हुआ था, जो जल्दी ही गहरी दोस्ती में तबदील हो गया था. इस की खास वजह उन का उत्तर प्रदेश के पड़ोसी शहरों का होना भी था. उन्होंने कालेज के पास ही एक किराए का कमरा ले लिया था. दीपा रईस घराने से संबंध रखती स्वच्छंद विचारों की युवती थी और निधि मध्यवर्गीय परिवार के संस्कारों में पलीबढ़ी सरल स्वभाव की. फिर भी दोनों में खूब पटती थी.  ‘निधि, तू देवेश को तो जानती है न?’ दीपा ने उस की रजाई में घुस कर पूछा.

‘वही न जो कौफी हाउस में तुझ से चिपकचिपक कर बातें कर रहा था,’ निधि ने किताब से नजरें हटा कर दीपा की ओर देखा, ‘तेरा बैस्ट फ्रैंड जो कालेज में अकसर तेरे आसपास मंडराता दिखाई देता है.’

‘बैस्ट फ्रैंड नहीं, बौयफ्रैंड. मेरी बैस्ट फ्रैंड तो सिर्फ तू है.’

‘बसबस, साफसाफ बोल, कहना क्या चाहती है?’

‘आज मैं उस के ही साथ थी. तुझे पता है, आज वह मेरे पीछे ही पड़ गया कि आज की हसीन शाम मेरे साथ गुलजार करेगा.’

‘तू यहां पढ़ने आई है या मौजमस्ती करने?’

‘दोनों,’ दीपा चहकती हुई बोली, ‘याद है, उस दिन क्लास में अनमोल सर कह रहे थे कि जीवन के सब से अनमोल क्षण वे होते हैं जो इस समय हम लोग जी रहे हैं, यानी कि स्टूडैंट लाइफ. यह बेफिक्री और खुमारी का हसीन दौर होता है. मन के आंगन में कोई धीरे से उतर कर एक ऐसी अनोखी कहानी लिख देता है जिस के पात्र जीवनभर साथ निभाते हैं. ऐसीऐसी सुखद अनुभूतियां होती हैं इस दौर में जिन्हें वक्त बीतने के साथ हम हर पल महसूस करते हैं. मैं इस खूबसूरत वक्त के हर लमहे को जी भर कर जी लेना चाहती हूं.’

निधि खामोशी से उस का चेहरा देखती रही.  ‘एक बात बता यार,’ निधि के हाथ को अपने हाथ में ले कर दीपा शोखी से बोली, ‘देवेश मुझ से अकेले में मिलने की जिद कर रहा है. तेरी क्या राय है इस बारे में?’

‘तेरे दिमाग में कोई सीधी बात क्यों नहीं आती है?’

‘मैं ने तेरी राय पूछी है.’

‘मैं अपनी राय ही दे रही हूं,’ वह कुढ़ कर बोली, ‘घर से इतनी दूर मांबाप ने हमें पढ़ने को भेजा है. उन्होंने हम से जो अपेक्षाएं संजो रखी हैं, कभी उन के बारे में भी सोचने का वक्त निकाल. बेहतर है ऐसी बेकार की बातों में न पड़ कर पढ़ाई में मन लगा.’

‘ओके बाबा. थैंक्स फौर मौरल एडवाइज.’

‘निधि, गोलचा टाकीज में तेरे फेवरेट हीरो आमिर खान की फिल्म लगी है,’ एक दिन दीपा बोली, ‘देख कर आ न.’

‘मुझे नहीं देखनी.’

‘प्लीज,’ उस ने खुशामद करते हुए निधि के हाथ में टिकट थमा दिया.

‘एक टिकट,’ निधि ने उस की ओर आश्चर्य से देखा, ‘तू चाहती है मैं अकेली जाऊं फिल्म देखने?’

‘हां,’ दीपा मुसकराते हुए बोली.

‘और तू?’ निधि ने आश्चर्य से कहा.

‘मैं ने देवेश को यहां बुलाया है.’  यह सुन कर निधि सिर पकड़ कर बैठ गई, ‘मतलब, तू ने उस से अकेले में मिलने का फुलपू्रफ प्लान तैयार किया है. जानती है कितना खतरनाक हो सकता है तेरा यह आइडिया.’

‘तू तो बेवजह ही बात को खींचने लगती है.’  पसंदीदा अभिनेता की फिल्म होने के बावजूद निधि का मन फिल्म देखने में नहीं लगा. पूरे 3 घंटे अजीब सी बेचैनी उस के दिमाग में रेंगती रही थी. वह वापस आई तो दीपा किताब लिए कोई रोमांटिक गीत गुनगुना रही थी. उस की आंखों में तृप्ति के भाव तैरते देख वह समझ गई कि दीपा उस वर्जित फल का स्वाद ले चुकी है, जिस के बारे में वह शादी से पहले सोच भी नहीं सकती.

‘फिल्म कैसी लगी?’ दीपा ने उस की ओर देख कर पूछा.

‘तेरी मुलाकात कैसी रही?’ कोई उत्तर देने के बजाय उस ने सवाल उछाल दिया.

‘मार्वलस,’ अंगड़ाई लेती हुई दीपा एक आंख दबा कर बोली.

‘इतनी नादान तो मैं भी नहीं हूं कि एकांत में मिलने का अर्थ न समझ सकूं,’ निधि गंभीरता से बोली, ‘पर इस के दूरगामी परिणाम कितने वीभत्स हो सकते हैं, समझने की कोशिश कर. तरबूज चाकू पर गिरे या चाकू तरबूज पर, दोनों स्थितियों में कटता तरबूज ही है. लाख दागदार होने के बावजूद पुरुष का दामन पाकसाफ रहता है और कुछ ऊंचनीच हो जाने पर जिल्लत का ठीकरा औरत के सिर ही फूटता है.’  ‘जमाना कहां से कहां पहुंच गया. आज नारी हर ओर पुरुषों द्वारा स्थापित आर्थिक, मानसिक और दैहिक बंधनों को तोड़ कर स्वतंत्रता के कीर्तिमान रच रही है और तू अभी तक उन्हीं घिसीपिटी मान्यताओं में जी रही है.’  ‘दुनिया ने चाहे कितनी भी तरक्की कर ली हो पर औरत की स्थिति आज भी दोयम दरजे की है. पूरब हो चाहे पश्चिम, हर जगह एकदो अपवाद छोड़ कर पुरुष कैसा भी हो पर बीवी वह पाकसाफ ही चाहता है,’ निधि ने दीपा को समझाने की कोशिश की, ‘बेशक तू उस समाज से ताल्लुक रखती है जहां खुलापन आम बात है पर हमारे देश का अभी इतना नैतिक पतन नहीं हुआ कि मांबाप शादी से पहले बेटी के शारीरिक संबंध स्वीकार कर सकें.  ‘हो सकता है, अभी मेरी बातें तेरी समझ से परे हों पर जब तक तू समझेगी तब तक बहुत देर हो चुकी होगी.’

‘माई फुट,’ दीपा पैर पटक कर बोली, ‘मैं अपनी जिंदगी किसी और की मरजी से क्यों जीऊं? मैं उन में से नहीं हूं जो किसी भी ऐरेगैरे के पीछे आंख बंद किए चलती रहती हैं. अपनी मंजिल खुद तय करने और लक्ष्य तक अकेले ही पहुंचने का दमखम है मुझ में. शादी और पति को परमेश्वर मानने जैसे वाहियात खयालों के बारे में सोचने की मूर्खता वे करती हैं जिन्हें किसी के सहारे की आवश्यकता होती है. मैं तो खुद कुआं खोद कर पानी पीने में यकीन रखती हूं.’

इतनी विषमताओं के बावजूद निधि को दीपा से कोई शिकायत नहीं थी. हर व्यक्ति के जीने का ढंग अलगअलग होता है. दीपा बिंदास जीवन शैली के पक्ष में थी और निधि इस के विरोध में. ये एक वैचारिक मतभेद था जिस ने उन के निजी जीवन को कभी प्रभावित नहीं किया.  फाइनल इयर की परीक्षा के बाद निधि के मातापिता ने उस की शादी तय कर दी. उस की ससुराल तो लखनऊ में थी पर उस का पति दीपक दिल्ली की एक मल्टी- नैशनल कंपनी में किसी अच्छे ओहदे पर कार्यरत था.  सगाई से ले कर शादी तक के हर कार्यक्रम में दीपा उस के साथ रही थी. दिल्ली में उस ने निधि और दीपक को न केवल शानदार पार्टी दी थी बल्कि अपने खर्चे पर उन्हें हनीमून के लिए गोआ भी भेजा था. निधि ने बहुत मना किया था पर उस की जिद के आगे उस की एक न चली. एक अच्छी दोस्त के साथसाथ बहन का भी फर्ज अदा किया था दीपा ने.

शादी के कुछेक महीनों तक तो दीपा निधि के संपर्क में रही फिर अचानक उस का आनाजाना बंद हो गया. निधि ने कई बार उस को मोबाइल पर फोन भी किया पर हर बार स्विच औफ मिला. वीकएंड में 1-2 बार दीपक के साथ निधि ने दीपा की खोजखबर भी ली पर वह कहीं नहीं मिली. फिर व्यस्तता और समय बीतने के साथ धीरेधीरे उस के दिमाग में बसी दीपा की तसवीर धुंधली पड़ती गई.  आज जब दीपा अपने कैबिन में निधि से मिली तो गुजरे लमहों की खुशबू से वातावरण महक उठा. इतना ऊंचा ओहदा होने और एक लंबा अरसा बीतने के बावजूद दीपा की आत्मीयता में कोई कमी नहीं आई थी. पल भर को निधि को लगा कि उस के सामने कंपनी की मैनेजिंग डायरैक्टर नहीं बल्कि कालेज के दिनों की खिलंदड़ दीपा खड़ी है. बातचीत के बीच दीपा ने विनम्रता के साथ कहा कि काम की व्यस्तता के चलते फिलहाल 2-4 दिन तो दम मारने की भी फुरसत नहीं मिलेगी. अगले संडे को घर में बैठ कर इत्मीनान से बातें होंगी.

निधि औफिस से लौट कर आई तो बेहद प्रफुल्लित थी. वैसे शाम को घर आतेआते काम के बोझ और बस की धक्कामुक्की में वह थक कर चूर हो जाती थी पर आज वह जैसे हवा में उड़ती आई थी.  संडे की सुबह दीपा आई. निधि को बहुत खुशी हुई.

‘‘दीपक के क्या हालचाल हैं?’’ बैठते हुए दीपा ने पूछा.

‘‘अच्छे हैं. 2 दिन पहले औफिस के काम से कुछ दिनों के लिए शहर से बाहर गए हैं.’’

‘‘तू कैसी है?’’

‘‘मैं भी ठीक हूं. पर तुझ से मिलने के बाद बड़ी मुश्किल से कटा है 3-4 दिन का वक्त. एकएक पल बीतने के साथ तेरे बारे में जानने की उत्सुकता गहराती जा रही है. मैं आज भी हैरानपरेशान हूं कि अचानक कहां गायब हो गई थी तू?’’

‘‘मुंबई में थी मैं.’’

‘‘दिल्ली से मुंबई इतनी दूर भी नहीं है कि अपनों से मिलने न आया जा सके,’’ निधि उलाहना देती बोली, ‘‘वैसे भी संचार माध्यमों ने दुनिया को इतना छोटा कर दिया है कि धरती के दूसरे छोर से भी हालचाल लिया और दिया जा सकता है. तेरी खैरियत पाने को मैं अंधेरे में तीर मारती रही पर तू तो मेरा ठौरठिकाना जानती थी. एक बार भी याद नहीं आई मेरी?’’  दीपा खामोशी से मुसकराती रही.

‘‘मैं मरी जा रही हूं तेरे बारे में जानने को और तू है कि कुछ बोलना ही नहीं चाहती.’’

‘‘परेशान न हो…सब कुछ बता रही हूं, सुन. मैं ने जिस आटोमोबाइल कंपनी को जौइन किया था वह नईनई मार्केट में उतरी थी. मेरे देखतेदेखते थोड़े ही समय में जिस रफ्तार से वह देश की नामीगिरामी कंपनियों में शुमार की जाने लगी वह मेरे लिए किसी अजूबे से कम नहीं था. मैं भी उसी तेजी से आगे बढ़ना चाहती थी. कंपनी का हैड औफिस मुंबई में था. वहां प्रोग्रेस के चांस अधिक थे. मेरा पूरा ध्यान अपने लक्ष्य पर था जिसे मैं किसी भी कीमत पर हासिल कर लेना चाहती थी. अत: किसी तरह जुगाड़ लगा कर मैं हैड औफिस पहुंचने में सफल हो गई थी.’’

‘‘कभी मुझ से मिलने भी तो आ सकती थी.’’

‘‘तू क्या समझती है मैं यहां ऐसे ही आ गई,’’ दीपा के होंठों पर रहस्य भरी मुसकान थिरकने लगी, ‘‘दीपक जिस औफिस में काम करते हैं उस की फाइनैंस डील कुछ वर्षों से मुंबई स्थित मेरी कंपनी के हैड औफिस से हो रही है. संयोग से उस वक्त यह काम मैं ही देख रही थी. याद कर दीपक अकसर मुंबई दौरे पर जाते हैं कि नहीं?’’

‘‘हां,’’ निधि मंत्रमुग्ध सी बोली.

‘‘‘मुंबई में दीपक को देख कर मैं अभिभूत हो गई थी. जल्दीजल्दी काम निबटा कर मैं उन्हें लंच के लिए अपने घर ले गई थी और कुरेदकुरेद कर तुझ से जुड़ी हर सारी जानकारी हासिल कर ली थी. मैं यह जान कर खुश थी कि तू दिल्ली में मेरी कंपनी की ब्रांच में काम करती हुई खुशहाल जिंदगी जी रही है. दीपक के जाने से पहले मैं ने उन से वादा ले लिया था कि जब तक मैं न चाहूं मुझ से मिलने की बात तुझे नहीं बताएंगे. दरअसल, मैं अचानक आ कर तुझे सरप्राइज देना चाहती थी.’’  निधि की आंखें हैरत से फैल गईं.

‘‘मुंबई से यहां आने की 2 खास वजह हैं, निधि,’’ दीपा उस की आंखों में झांकती हुई बोली, ‘‘पहली तो यह कि मैं उस दिन को आज तक नहीं भूली जब तू ने औरत की मानमर्यादा की दुहाई देते हुए यह बताने की कोशिश की थी कि औरत बेहद कमजोर और असहाय होती है. हालांकि तेरी इन बातों से न मैं उस वक्त सहमत थी और न आज. सच तो यह है कि औरत कमजोर होती ही नहीं है, कमजोरी तो दिमाग में होती है. हम जैसी मानसिकता बना लें वैसा ही हमारे व्यक्तित्व का निर्माण होता है. जो ऊंचे सपने देखते हैं और उन्हें पूरा करने का माद्दा जिन के भीतर होता है वे चाहें तो हाथ बढ़ा कर आसमान से सितारे भी तोड़ सकते हैं. तेरे सामने मैं इस की प्रत्यक्ष गवाह हूं.

‘‘असंभव शब्द मेरे शब्दकोष में नहीं है. मुझे सख्त नफरत है उन लोगों से जो नारी को कम कर के आंकते हैं. दरअसल, इस के लिए भी पूरी तरह से नारी ही जिम्मेदार है. वह क्योंकर खुद को पुरुषों की जमापूंजी समझती है. अपने अनुभव की एक बात और बता दूं, औरत अगर चाहे तो कोई उस की ओर देखने की भी हिमाकत नहीं कर सकता. जब तक यह सचाई उस की समझ में नहीं आएगी, उस का शोषण होता रहेगा.  ‘‘मेहनत, लगन और दृढ़निश्चय के बलबूते मैं सफलता की सीढि़यां चढ़ती गई. परिणाम तेरे सामने है. आज हजारों पुरुष मेरे सामने हाथ बांधे खड़े रहते हैं. ऐसेऐसे तीसमार खां जिन के सामने किसी की बोलने की जुर्रत नहीं होती, मैं ने उन्हें अपने सामने गिड़गिड़ाते देखा है. ऐसा भी नहीं है कि वे हर औरत के सामने ऐसे ही पेश आते हों. कहीं न कहीं वे अपने अहं को तुष्ट जरूर करते होंगे. पर जिस दिन औरत ने खुद को पहचान लिया, उन्हें हर हाल में अपना दृष्टिकोण बदलना पड़ेगा.

‘‘मेरा यहां आने का मकसद तुझे अपमानित करना नहीं बल्कि आईना दिखा कर सचाई से रूबरू कराना है. आगे बढ़ने के रास्ते में बेशक कई तरह की कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. कई झंझावात भी झेलने पड़ते हैं और जो इन सब का डट कर मुकाबला करता हुआ आगे बढ़ता जाता है वही मंजिल पर पहुंचता है.  ‘‘उस दिन की तेरी वे सारी बातें हर पल जहां मुझे चुभती रही हैं वहीं कुछ कर गुजरने के लिए प्रेरित भी करती रही हैं. इस नाते तू मेरी गुरु हुई सो तुझे गुरुदक्षिणा भी तो देनी थी,’’ इतना बोल कर दीपा ने पर्स से एक लिफाफा निकाल कर उस के हाथों में थमा दिया, ‘‘प्लीज, इसे स्वीकार कर के मुझे ऋण से मुक्त कर दे.’’

‘‘क्या है यह?’’ चौंक कर पूछा निधि ने.

‘‘तेरा नियुक्तिपत्र. अब तू कोई साधारण कर्मचारी नहीं बल्कि इतनी बड़ी कंपनी के मैनेजिंग डायरैक्टर की प्राइवेट सेके्रटरी है.’’

‘‘दीपा…’’ इतना ही बोल पाई निधि. भावावेश में उस का गला रुंध गया था.

‘‘कमऔन यार. तू भावुक बहुत जल्दी हो जाती है,’’ दीपा हंस कर बोली, ‘‘यहां आने की दूसरी वजह भी तो सुन ले. इंसान जिंदगी में धनदौलत, मानप्रतिष्ठा सबकुछ हासिल कर सकता है पर अच्छा और सच्चा दोस्त कभीकभी ही मिलता है. जीवन में मैं ने जब जो चाहा वह पाया. आज महंगी से महंगी गाड़ी, आलीशान बंगला, लाखों का बैंकबैलेंस और ऐश्वर्य की हर चीज मौजूद है मेरे पास पर तेरी कमी हर पल महसूस हुई है मुझे. मैं यहां नईनई आई हूं, समझने में थोड़ा वक्त लगेगा. तू ये जिम्मेदारी भरा पद संभाल ले तो मेरी राह और आसान हो जाएगी.’’

‘‘तुझे समझने में भूल हो गई मुझ से,’’ निधि की पलकें भीग गईं, ‘‘तू इतना कुछ…’’

‘‘फिर शुरू हो गई,’’ दीपा आंखें तरेरती हुई बीच में बोल पड़ी, ‘‘पता है, सुबह से मैं ने कुछ भी नहीं खाया. बड़ी जोरों की भूख लगी है. अब कुछ खिलाएगीपिलाएगी भी या यों ही भूखा मार डालेगी.’’

निधि की हंसी छूट गई. ‘‘तू जरा भी नहीं बदली, दीपा. आज भी वैसी की वैसी है. पर खाना तू खाएगी तो अकेली मैं क्यों बनाऊं. तू भी साथ चल मेरे.’’

निधि, दीपा का हाथ पकड़ कर रसोई में खींच ले गई.

Love Story : प्रेम संबंध – क्या पूर्वा और रोहित की शादी हो पाई ?

Love Story : दियाबाती कर अभी उठी ही थी कि सांझ के धुंधलके में दरवाजे पर एक छाया दिखी. इस वक्त कौन आया है यह सोच कर मैं ने जोर से आवाज दी, ‘‘कौन है?’’

‘‘मैं, रोहित, आंटी,’’ कुछ गहरे स्वर में जवाब आया.

रोहित और इस वक्त? अच्छा है जो पूर्वा के पापा घर पर नहीं हैं, यदि होते तो भारी मुश्किल हो जाती, क्योंकि रोहित को देख कर तो उन की त्यौरियां ही चढ़ जाती हैं.

‘‘हां, भीतर आ जाओ बेटा. कहो, कैसे आना हुआ?’’

‘‘कुछ नहीं, आंटी, सिर्फ यह शादी का कार्ड देने आया था.’’

‘‘किस की शादी है?’’

‘‘मेरी ही है,’’ कुछ शरमाते हुए वह बोला, ‘‘अगले रविवार को शादी और सोमवार को रिसेप्शन है, आप और अंकल जरूर आना.’’

आज तक हमेशा उसे शादी के लिए उत्साहित करने वाली मैं शादी का कार्ड हाथ में थामे मुंहबाए खड़ी थी.

‘‘चलूं, आंटी, देर हो रही है,’’ रोहित बोला, ‘‘कई जगह कार्ड बांटने हैं.’’

‘‘हां बेटा, बधाई हो. तुम शादी कर रहे हो, आएंगे हम, जरूर आएंगे…’’ मैं जैसे सपने से जागती हुई बोली.

बहुत खुश हो कर कहा था यह सब पर ऐसा लगा कि रोहित मेरा अपना दामाद, मेरा अपना बेटा किसी और का हो रहा है. उस पर अब मेरा कोई हक नहीं रह जाएगा.

रोहित हमारी ही गली का लड़का है और मेरी बेटी पूर्वा के साथ बचपन से स्कूल में पढ़ता था. पूर्वा की छोटीछोटी जरूरतों का खयाल करता था. पेंसिल की नोंक टूटने से ले कर उसे रास्ता पार कराने और उस का होमवर्क पूरा कराने तक. बचपन से ही रोहित का हमारे घर आनाजाना था. बच्चों के बचपन की दोस्ती ?पर पूर्वा के पापा ने कभी कोई ध्यान नहीं दिया लेकिन जैसे ही दोनों बच्चे जवानी की ओर कदम बढ़ाने लगे वह रोहित को देखते ही नाकभौं चढ़ा लेते थे. रोहित और पूर्वा दोनों ही पापा की इस अचानक उपजी नाराजगी का कारण समझ नहीं पाते थे.

पापा का व्यवहार पहले जैसा क्यों नहीं रहा, यह बात 12वीं तक जातेजाते वे अच्छी तरह से समझ गए थे क्योंकि उन के दिल में फूटा हुआ प्रेम का नन्हा सा अंकुर अब विशाल वृक्ष बन चुका था. पापा को उन का साथ रहना क्यों नहीं अच्छा लगता है, इस का कारण वे समझ गए थे. छिप कर पूर्वा रोहित के घर जा कर नोट्स लाती थी और रोहित का तो घर के दरवाजे पर आना भी मना था.

रोहित और पूर्वा ने एकदूसरे को इतना चाहा था कि सपने में भी किसी और की कल्पना करना उन के लिए मुमकिन न था. मेरे सामने ही दोनों का प्रेम फलाफूला था. अब इस पर यों बिजली गिरते देख कर वह मन मसोस कर रह जाती थी.

एक और कारण से पूर्वा के पापा को रोहित पसंद नहीं था. वह कारण उस की गरीबी थी. पिता साधारण सी प्राइवेट कंपनी में क्लर्क थे. घर में उस के एक छोटा भाई और एक बहन थी. 3 बच्चों का भरणपोषण, शिक्षा आदि कम आय में बड़ी मुश्किल से हो पाता था. इस कारण रोहित की मां भी साड़ी में पीकोफाल जैसे छोटेछोटे काम कर के घर खर्चे में पति का हाथ बंटाती थीं. हमारी कपड़ों की 2 बड़ीबड़ी दुकानें थीं. शहर के प्रतिष्ठित व्यापारी परिवार की इकलौती बेटी पूर्वा राजकुमारी की तरह रहती थी.

रुई की तरह हलके बादलों के नरम प्यार पर जब हकीकत की बिजली कड़कड़ाती है तो क्या होता है? आसमान का दिल फट जाता है और आंसुओं की बरसात शुरू हो जाती है. मैं कभी यह समझ नहीं पाई कि दुनिया बनाने वाले ने दुनिया बनाई और इस में रहने वालों ने समाज बना दिया, जिस के नियमानुसार पूर्वा रोहित के लिए नहीं बनी थी.

तभी फोन की घंटी बजी. लंदन से पूर्वा का फोन था. फोन पर पूछ रही थी, मम्मी, कैसी हो? यहां विवेक का काम ठीक चल रहा है, सोहम अब स्कूल जाने लगा है. तुम कब आओगी? पापा की तबीयत कैसी है? और भी जाने क्याक्या.

मैं कहना चाह रही थी कि रोहित के बारे में नहीं पूछोगी, उस की शादी है, बचपन की दोस्ती क्या कांच के खिलौने से भी कच्ची थी जो पल में झनझना कर टूट गई…पर कुछ न कह सकी और न ही रोहित की शादी होने वाली है यह खुशखबरी उसे सुना सकी.

दामाद विवेक के साथ बेटी पूर्वा खुश है, मुझे खुश होना चाहिए पर रोहित की आंखों में जब भी गीलापन देखती थी, खुश नहीं हो पाती थी. विवेक लंदन की एक बड़ी फर्म में इंजीनियर है. अच्छी कदकाठी, गोरा रंग, उच्च कुल के साथसाथ उच्च शिक्षित, क्या नहीं है उस के पास. पहले पूर्वा जिद पर अड़ी थी कि शादी करेगी तो रोहित से वरना कुंआरी ही रह जाएगी. पर दुनिया की ऊंचनीच के जानकार पूर्वा के पापा ने खुद की बहन के घर बेटी को ले जा कर उस को कुछ ऐसी पट्टी पढ़ाई कि वह सोचने को मजबूर हो गई कि रोहित के छोटे से घर में रहने से बेहतर है विवेक के साथ लंदन में ऐशोआराम से रहना.

बूआ के घर से वापस आ कर जब पूर्वा ने शरमाते हुए मुझ से कहा कि मुझे विवेक पसंद है, तब मेरा दिल धक् कर रह गया था. मैं अपना दिल पत्थर का करना चाहूं तो भी नहीं कर पाती और यह लड़की…मेरी अपनी लड़की सबकु छ भूल गई. लेकिन यह मेरी भूल थी.

लंदन में सबकुछ होते हुए भी वह रोहित के बेतहाशा प्यार को अभी भी भूल नहीं पाई थी.

पूर्वा के पापा आ गए थे. बोले, ‘‘क्या हुआ, आज बड़ी अनमनी सी लग रही हो?’’

‘‘कुछ नहीं,’’ उन के हाथ से बैग लेते हुए मैं बोली, ‘‘पूर्वा की याद आ रही है.’’

‘‘तो फोन कर लो.’’

‘‘अभी थोड़ी देर पहले ही तो उस का फोन आया था, आप को याद कर रही थी.’’

‘‘हां, सोचता हूं, अगले माह तक हम लंदन जा कर पूर्वा से मिल आते हैं. और यह किस की शादी का कार्ड रखा है?’’

‘‘रोहित की.’’

‘‘चलो, अच्छा हुआ जो वह शादी कर रहा है. हां, लड़की कौन है?’’

‘‘फैजाबाद की किसी मिडिल क्लास परिवार की लगती है.’’

‘‘अच्छा है, जितनी चादर हो उतने ही पांव पसारने चाहिए.’’

मैं रसोई में जा कर उन के लिए थाली लगाने लगी. वह जाने क्याक्या बोल रहे थे. मेरा ध्यान रोहित की ओर गया, जिसे मैं बेटे से बढ़ कर मानती हूं. उस के खिलाफ एक शब्द भी नहीं सुन सकती.

पूर्वा के विवाह वाले दिन वह कैसे सुन्न खड़ा था. मैं ने देखा था और देख कर आंखें भर आई थीं. कुछ और तो न कर सकी, बस, पीठ पर हाथ फेर कर मैं ने मूक दिलासा दिया था उसे.

उस का यह उदास रूप देख कर हाथ में रखी द्वाराचार के लिए सजी थाली मनों भारी हो गई थी, पैर दरवाजे की ओर उठ नहीं रहे थे. मैं पूर्वा की मां हूं, बेटी की शादी पर मुझे बहुत खुश होना चाहिए था पर भीतर से ऐसा लग रहा था कि जो कुछ हो रहा है, गलत हो रहा है. शादी के लिए जिस पूर्वा को जोरजबरदस्ती से तैयार किया था, वह जयमाला से पहले फूटफूट कर रो पड़ी थी. तब मैं ने उसे कलेजे से लगा लिया था.

बिदाई के समय पीछे मुड़मुड़ कर पूर्वा की आंखें किसे ढूंढ़ रही थीं वह भी मुझे मालूम था. उस समय दिल से आवाजें आ रही थीं :  पूर्वा, रूपरंग और दौलत ही सबकुछ नहीं होते, इस प्यार के सागर को ठुकराएगी तो उम्रभर प्यासी रह जाएगी.

पता नहीं ये आवाजें उस तक पहुंचीं कि नहीं, पर उस के जाने के बाद मानो सारा घरआंगन चीखचीख कर कह रहा था, मन के रिश्ते कोई और होते हैं, जो किसी को दिखाए नहीं जाते और निभाने के रिश्ते कोई और होते हैं जो सिर्फ निभाए जाते हैं. तब से जब भी रोहित को देखती हूं दिल फट जाता है.

पूर्वा की शादी को अब पूरे 7 बरस हो गए हैं और रोहित इन 7 वर्षों तक उस की याद में तिलतिल जलने के बाद अब ब्याह कर रहा है. कितने दिनों से उसे समझा रही थी कि अब नौकरी लग गई है. बेटा, तू भी शादी कर ले तो वह हंस कर टाल जाता था. पिता के रिटायर होने पर उन की जगह ही उसे काम मिला था और घर में बच्चों को ट्यूशन पढ़ाता है. उस से अच्छीखासी कमाई हो जाती है. 2 साल हुए उस ने छोटी बहन की अच्छे घर में शादी कर दी है और भाई को इंजीनियरिंग करवा रहा है. मां का काम उस ने छुड़वा दिया है और मुझे लगता है कि मां को आराम मिले इस के लिए ही उस ने शादी की सोची है.

रोहित जैसा गुणी और आज्ञाकारी पुत्र इस जमाने में मिलना कठिन है. मेरे तो बेटा ही नहीं है, उसे ही बेटे के समान मानती थी. उस की शादी फैजाबाद में थी. वहां जाना नहीं हो सकता था इसलिए बहू की मुंहदिखाई और स्वागत समारोह में जाना मैं ने उचित समझा.

रोहित के लिए सुंदर रिस्टवाच और बहू के लिए साड़ी और झुमके खरीदे थे. बहुत खुशी थी अब मन में. इन 7 वर्षों के अंतराल में रिश्ते उलटपुलट गए थे. रोहित, जिसे मैं दामाद मानती थी, बेटा बन चुका था. अब मेरी बहू आ रही थी. पता नहीं कैसी होगी बहू…पगले ने फोटो तक नहीं दिखाई.

स्वागत समारोह के उस भीड़- भड़क्के में रोहित ने पांव छू कर मुझे नमस्कार किया. उस की देखादेखी अर्चना भी नीचे झुकने लगी तो मैं ने उसे बांहों में भर झुकने से मना किया.

अर्चना सांवली थी पर तीखे नैननक्श के कारण भली लग रही थी. उपहार देते हुए मैं चंद पलों को उन्हें निहारती रह गई. परिचय कराते वक्त रोहित ने अर्चना से धीरे से कहा, ‘‘ये पूर्वा के मम्मीपापा हैं.

उस लड़की ने नमस्कार के लिए एक बार और हाथ जोड़ दिए. जेहन में फौरन सवाल उभरा, ‘क्या पूर्वा के बारे में सबकुछ रोहित ने इसे बता दिया है.’ मैं असमंजस में पड़ी खड़ी थी. तभी रोहित की मां हाथ पकड़ कर खाना खिलाने के लिए लिवा ले गईं.

अर्चना ने रोहित का घर खूब अच्छे से संभाल लिया था. अपनी सास को तो वह किसी काम को हाथ नहीं लगाने देती थी. कभीकभी मेरे पास आती तो पूर्वा के बारे में ही बातें करती रहती थी. न जाने कितने प्रकार के व्यंजन बनाने की विधियां मुझ से सीख कर गई और बड़े प्रयत्नपूर्वक कोई नया व्यंजन बना कर कटोरा भर मेरे लिए ले आती थी.

पूर्वा के पापा का ब्लडप्रेशर पिछले दिनों कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था, अत: हमारा लंदन जाने का कार्यक्रम स्थगित हो चुका था. अब की सितंबर में पूर्वा आ रही थी. विवेक को छुट्टी नहीं थी. पूर्वा और सोहम दोनों ही आ रहे थे. जिस रोहित से पूर्वा लड़तीझगड़ती रहती थी, जिस पर अपना पूरा हक समझती थी, अब उसे किसी दूसरी लड़की के साथ देख कर उस पर क्या बीतेगी, मैं यही सोच रही थी.

रोहित की शादी के बारे में मैं ने उसे फोन पर बताया था. सुन कर उस ने सिर्फ इतना कहा था कि चलो, अच्छा हुआ शादी कर ली और कितने दिन अकेले रहता.

अभी पूर्वा को आए एक दिन ही बीता था. रोहित और अर्चना तैयार हो कर कहीं जा रहे थे. मैं ने पूर्वा को खिड़की पर बुलाया तो रोहित के बाजू में अर्चना को चलते देख मानो उस के दिल पर सांप लोट रहा था. मैं ने कहा, ‘‘वह देख, रोहित की पत्नी अर्चना.’’

अर्चना को देख कर पूर्वा ने मुंह बना कर कहा, ‘‘ऊंह, इस कालीकलूटी से ब्याह रचाया है.’’

‘‘ऐसा नहीं बोलते, अर्चना बहुत गुणी लड़की है,’’ मैं ने उसे समझाते हुए कहा.

‘‘हूं, जब रूप नहीं मिलता तभी गुण के चर्चे किए जाते हैं,’’ उपेक्षित स्वर में पूर्वा बोली.

‘‘छोड़ यह सब, चल, सोहम को नहला कर खाना खिलाना है,’’ मैं ने उस का ध्यान इन सब बातों से हटाने के लिए कहा.

पर अर्चना को देखने के बाद पूर्वा अनमनी सी हो गई थी. दोपहर को बोली, ‘‘मम्मी, मुझे रोहित से मिलना है.’’

‘‘शाम 6 बजे के बाद जाना, तब तक वह आफिस से आ जाता है. हां, पर भूल कर भी अर्चना के सामने कुछ उलटासीधा न कहना.’’

‘‘नहीं, मम्मी,’’ पूर्वा मेरे गले में हाथ डाल कर बोली, ‘‘पागल समझा है मुझे.’’

मैं, सोहम और पूर्वा शाम को रोहित के घर गए. गले में फंसी हुई आवाज के साथ पूर्वा उसे विवाह की बधाई दे पाई. रोहित ने कुछ देर को उस के और विवेक के बारे में पूछा फिर सोहम के साथ खेलने लगा. इतने में अर्चना चायनाश्ता बना लाई. मैं, अर्चना और रोहित की मां बातें करने लगे.

खेलखेल में सोहम ने रोहित की जेब से पर्स निकाल कर जब हवा में उछाल दिया तो नोटों के साथ कुछ गिरा था. वह रोहित और पूर्वा के बचपन की तसवीर थी जिस में दोनों साथसाथ खडे़ थे.

तसवीर देख कर हम मांबेटी भौचक्के रह गए पर अर्चना ने पैसों के साथ वह तसवीर भी वापस पर्स में रख दी और हंस कर कहा, ‘‘पूर्वा दीदी, बचपन में कटे बालों में आप बहुत सुंदर दिखती थीं. रोहित को देख कर तो मैं बहुत हंसती हूं…इस ढीलेढाले हाफ पैंट में जोकर नजर आते हैं.’’

बात आईगई हो गई पर हम समझ चुके थे कि अर्चना पूर्वा के बारे में सब जानती है. पूर्वा जिस दिन लंदन वापस जा रही थी, अर्चना उपहार ले कर आई थी.

‘‘लो, दीदी, मेरी ओर से यह रखो. आप रोहित का पहला प्यार हैं, मैं जानती हूं, वह अभी तक आप को नहीं भूले हैं. वह आप को बहुत चाहते हैं और मैं उन्हें बहुत चाहती हूं. इसलिए वह जिसे चाहते हैं मैं भी उसे बहुत चाहती हूं.’’

उस की यह सोच पूर्वा की समझ से बाहर की थी. पूर्वा ने धीरे से ‘थैंक्यू’ कहा.

आज तक रोहित पर अपना एकाधिकार जताने वाली पूर्वा समझ चुकी थी कि प्रेम का दूसरा नाम त्याग है. आज अर्चना के प्रेम के समक्ष उसे अपना प्रेम बौना लग रहा था.

Social Story : फर्ज का एहसास – जवानी का हिसाब लगाती शालिनी

Social Story : शालिनी ने हिसाब लगाया. उस ने पूरी रात खन्ना, तिवारी और शर्मा के साथ गुजारी है. सुबह होते ही उस ने 10 हजार रुपए झटक लिए. वे तीनों उस के रंगरूप, जवानी के दीवाने हैं. शहर के माने हुए रईस हैं. तीनों की शहर में और शहर से बाहर कईकई प्लाईवुड की फैक्टरियां हैं. तीनों के पास माल आता भी 2 नंबर में है. तैयार प्लाई भी 2 नंबर में जाती है. वे सरकार को करोड़ों रुपए के टैक्स का चूना लगाते हैं. शालिनी ने उन तीनों के साथ रात गुजारने के 25 हजार रुपए मांगे थे. सुबह होने पर तिवारी के पास ही 10 हजार रुपए निकले. खन्ना और शर्मा खाली जेबों में हाथ घुमाते नजर आए. कमबख्त तीनों रात को 5 हजार रुपए की महंगी शराब पी गए थे. उस ने जब अपने बाकी के 15 हजार रुपए के लिए हंगामा किया, तो खन्ना ने वादा किया कि वह दोपहर को आ कर उस के दफ्तर से पैसे ले जाए.

सुबह के 10 बजने को थे. शालिनी ने पहले तो सस्ते से होटल पर ही पेट भर कर नाश्ता किया. कमरे पर जाना उस ने मुनासिब नहीं समझा. सोचा कि अगर कमरे पर गई, तो चारपाई पर लेटते ही नींद आ जाएगी. फिर तो बस्ती के कमरे से इंडस्ट्रियल एरिया आने का मन नहीं करेगा. पूरे 7 किलोमीटर दूर है. अभी खन्ना के दफ्तर से 15 हजार भी वसूल करने थे. गरमी बहुत हो रही थी. शालिनी ने सोचा कि रैस्टोरेंट में जा कर आइसक्रीम खाई जाए. एसी की ठंडक में घंटाभर गुजारा जाए. इतने में दोपहर हो जाएगी, फिर वह अपने रुपए ले कर ही कमरे पर जा कर आराम करेगी. रेस्टोरैंट में अगर कोई चाहने वाला मिल गया, तो खाना भी मुफ्त में हो जाएगा. अगली रात भी 5-10 हजार रुपए में बुक हो जाएगी. वैसे तो उस ने अपना मोबाइल नंबर 5-6 दलालों को दे रखा था.

शालिनी आइसक्रीम खा कर पूरे 2 घंटे के बाद रैस्टोरैंट से निकली. अगली 2 रातों के लिए एडवांस पैसा भी मिल गया था. पूरे 5 हजार रुपए. मोबाइल में समय देखा, तो दोपहर के एक बजने को था. शालिनी रिकशा पकड़ कर खन्ना के दफ्तर पहुंचना चाहती थी. शहर के चौराहे पर रिकशे के इंतजार में थी कि तभी थानेदार जालिम सिंह ने उस के सामने गाड़ी रोक दी. थानेदार जालिम सिंह को देख शालिनी ने निगाहें घुमा लीं, मानो उस ने पुलिस की गाड़ी को देखा ही न हो. वह जालिम सिंह को अच्छी तरह जानती थी. अपने नाम जैसा ही उस का बरताव था. रात में मजे लूटने को तो बुला लेगा, पर सुबह जाते समय 50 रुपए का नोट तक नहीं निकालता. उलटा दारू भी पल्ले से पिलानी पड़ती है. बेवजह अपना जिस्म कौन तुड़वाए. शालिनी वहां से आगे जाने लगी, तो जालिम सिंह ने रुकने को कहा.

शालिनी ने बहाना बनाया, ‘‘आज तबीयत ठीक नहीं है. रातभर बुखार से तपती रही हूं. किसी डाक्टर के पास दवा लेने जा रही हूं. अच्छा हुआ कि आप मिल गए. एक हजार रुपए चाहिए मुझे. अगर आप…’’ जालिम सिंह ने शालिनी की बाजू पकड़ी और उस के चेहरे को गौर से देखते हुए बड़ी बेशर्मी से गुर्राया, ‘‘हम पुलिस वालों को बेवकूफ बना रही है. रातभर मजे लूटे हैं. गाल पर दांत गड़े नजर आ रहे हैं. हमें बता रही है कि बीमार है. तुझे शहर में धंधा करना है या भागना है?’’

‘‘ठीक ही तो कह रही हूं. कभी 10-20 रुपए तो हम मजदूरों पर तुम खर्च नहीं करते,’’ शालिनी बोली. ‘‘तुझे धंधा करने की इजाजत दे दखी है, वरना हवालात में तड़पती नजर आएगी. आज हमारे लिए भी मजे लूटने वाला काम कर. पूरे 5 सौ रुपए दूंगा, लेकिन काम पूरा होने पर,’’ जालिम सिंह ने अपना इरादा जाहिर किया.

शालिनी समझ गई कि यह कमबख्त कोई खतरनाक साजिश रचने वाला है, तभी तो 5 सौ रुपए खर्च करने को कह रहा है, वरना 10 रुपए जेब से खर्च नहीं करता. शालिनी ने सोचा कि काम के बदले मोटी रकम की मांग करे. शायद मुरगा फंस जाए. मौका हाथ आया था.

शालिनी के पूछने पर थानेदार जालिम सिंह ने कहा, ‘‘तुम को एक प्रैस फोटोग्राफर अर्जुन की अक्ल ठिकाने लगानी है. उसे अपनी कातिल अदाओं का दीवाना बना कर अपने कमरे पर बुला लेना. नशा वगैरह पिला कर तुम वीडियो फिल्म बना कर उस की प्रैस पत्रकारिता पर फुल स्टौप लगाना है.’’ ‘‘अर्जुन ने ऐसा क्या कर दिया, जो आप इतना भाव खा रहे हैं?’’ शालिनी ने शरारत भरी अदा से जालिम सिंह की आंखों में झांकते हुए पूछा.

शालिनी के चाहने वाले बताया करते हैं कि उस की बिल्लौरी आंखों में जाद है. जिसे भी गहरी नजरों से देखती है, चारों खाने चित हो जाता है. जालिम सिंह भी उस के असर में आ गया था. ‘‘अरे, रात को अग्रसेन चौक पर नाका लगा रख था. 2 नंबर वाली गाडि़यों से थोड़ा मालपानी बना रहे थे. बस, पता नहीं अर्जुन को कैसे भनक लग गई. उस ने हमारी वीडियो फिल्म बना ली. कहता है कि पहले मुख्यमंत्री को दिखाऊंगा, फिर टैलीविजन चैनल पर और अखबार में खबर देगा. हमें सस्पैंड कराने का उस ने पूरा इंतजाम कर रखा है. एक बार उसे नंगा करो, फिर मैं उसे कहीं का नहीं छोड़ूंगा.’’

‘‘पहले तो तुम मुझे अपनी गाड़ी में बैठा कर खन्ना के दफ्तर ले चलो. कुछ हिसाब करना है. उस के बाद तुम्हारे काम को करूंगी. अभी मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा,’’ शालिनी ने मोबाइल फोन पर समय देखते हुए अपनी बात कही. ‘‘इधर अपना समय खराब चल रहा है और तेरे भाव ऊपर आ गए हैं. आ, बैठ गाड़ी में,’’ झुंझलाते हुए जालिम सिंह बोला.

वह शालिनी को खन्ना के दफ्तर ले गया. वहां से उस ने रुपए लिए. अब वे दोनों कमानी चौक पर आ गए. ‘‘तुम अर्जुन को जानती हो न?’’ जालिम सिंह ने पूछा.

‘‘हांहां, वही प्रैस फोटोग्राफर, जिस ने पिछले महीने पुलिस चौकी में हुए बलात्कार की वीडियो फिल्मी चैनल पर दिखा कर तहलका मचा दिया था,’’ शालिनी ने मुसकराते हुए उस के कारनामे का बखान किया, तो जालिम सिंह भद्दी सी गाली बकते हुए गुर्राया, ‘‘तू पहले उसे अपने जाल में फंसा, फिर तो उस की जिंदगी जेल में कटेगी.’’ ‘‘इस काम के मैं पूरे 50 हजार रुपए लूंगी और 10 हजार रुपए एडवांस,’’ शालिनी ने अपनी मांग रखी, तो जालिम सिंह उछल पड़ा, ‘‘अरे, कुछ तो लिहाज कर. तू हमें जानती नहीं?’’

‘‘लिहाज कर के ही तो 50 हजार रुपए मांगे हैं. इस काम का मेहनताना तो एक लाख रुपए है,’’ शालिनी भी बेशर्मी से सौदेबाजी पर उतर आई. ‘‘मजाक मत कर शालिनी. यह काम 5 हजार रुपए का है. ये संभाल एक हजार रुपए.’’

‘‘10 हजार पहले लूंगी, 40 बाद में. नकद. वरना तुम्हारी सारी मेहनत पर पानी फेर दूंगी. अगर रुपए नहीं दोगे, तो मैं अर्जुन को तुम्हारी साजिश के बारे में बता सकती हूं,’’ शालिनी ने शातिराना अंदाज में थानेदार जालिम सिंह को खौफजदा कर दिया. थानेदार ने 10 हजार रुपए शालिनी को दिए और चेतावनी भी दी कि अगर उस का काम नहीं हुआ, तो उस की फिल्म खत्म हुई समझे.

इस के बाद थानेदार जालिम सिंह शालिनी को गाड़ी से उतार कर चलता बना. शालिनी अपने पर्स में पूरे 25 हजार रुपए संभाले हुए थी. उस के 15 साल के बेटे ने मोटरसाइकिल लेने की जिद पकड़ रखी थी 2-4 दिन में वह बेटे को मोटरसाइकिल ले कर देगी. शालिनी गांव की रहने वाली थी, लेकिन उस का रहनसहन, पहनावा वगैरह रईस अमीर औरतों जैसा था. उस की शादी गांव के मजदूर आदमी से हुई थी. पति उसे जरा भी पसंद नहीं था. उस की बेरुखी के चलते पति मेहनतमजदूरी कर के जो कमाता, उस रुपए की शराब पी जाता था. शालिनी देहधंधा कर के अमीर बनना चाहती थी. बेटा आवारा हो गया था. स्कूल नहीं जाता था. सारासारा दिन आवारा लड़कों के साथ नशा करता रहता था. वह छोटेमोटे अपराध भी करने लगा था.

बाप शराबी और मां बदचलन हो, तो बेटे का भविष्य इस से बढ़ कर क्या हो सकता है? शालिनी अपने बिगड़ते परिवार से बेखबर पराए मर्दों की रातें रंगीन कर रही थी. अभी शालिनी का कमरा 4 किलोमीटर दूर था. सामने पेड़ की छांव में एक रिकशे वाला सीट पर बैठा रुपए गिन रहा था. उस के हाथों में नोट देख कर शालिनी की आंखों में चमक आ गई. शालिनी ने अपने पहने कसे ब्लाउज का ऊपर वाला हुक खोला और उस के सामने आ कर खड़ी हुई.

रिकशे वाला भी शालिनी की उम्र का था. उस की कामुक निगाहें भी उस के उभारों पर ठहर गईं. उस का दिल धड़क रहा था. अपने रुपए पर्स में रखे और पर्स को पतलून की पीछे वाली जेब में लापरवाही से ठूंस दिया. उस ने शालिनी को रोमांटिक नजरों से देखते हुए पूछा, ‘‘मैडम, आप को कहां चलना है?’’ ‘‘मोती चौक चलना है. कितने रुपए लोगे?’’

‘‘जो मरजी दे देना. मुझे भी उसी तरफ जाना है. मेरा कमरा भी उसी तरफ है. अकेला रहता हूं,’’ रिकशे वाले ने जवाब दिया, तो शालिनी समझ गई कि वह उस पर मरमिटा है. वह रिकशे पर बैठ गई और रिकशे वाले से मीठीमीठी बातें करने लगी. तभी उस ने देखा, रिकशे वाले की पतलून के पीछे वाली जेब से पर्स बाहर खिसका हुआ था. उसे बातों में उलझा कर शालिनी ने पर्स खिसका लिया.

मोती चौक आ गया था. शालिनी अपने कमरे से पहले ही चौराहे पर उतर गई. उस ने रिकशे वाले को किराया देना चाहा, मगर रिकशे वाले ने तो उस के मनचले उभारों को देखते हुए पैसे लेने से इनकार कर दिया. शालिनी चोर भी थी. वह तो पलक झपकते ही कालोनी की गलियों में गुम हो गई. शालिनी आज बहुत खुश थी. उस की अच्छीखासी कमाई हो गई थी. कमरा खोला. निढाल सी चारपाई पर लेट गई. पूरी रात और दिनभर की थकी हुई थी. कुछ देर बाद वह कपड़े उतार कर पहले अच्छी तरह नहाई. भूख लगी थी. खाना बनाने की हिम्मत नहीं थी. होटल से खाना पैक करा लाई और खा कर सो गई. इतनी गहरी नींद आई कि रात कैसे गुजरी, कुछ पता न चला.

शालिनी सुबह उठी, तो चायनाश्ता करते हुए उस ने रिकशे वाले का चुराया पर्स खोला. उस में छोटेबड़े नोटों की मोटी गड्डी थी. गिनने पर पूरे 4 हजार रुपए निकले. उस का मन खुश हो गया. उन रुपयों के साथ एक चिट्ठी भी थी, जो रिकशे वाले की घरवाली ने उसे लिखी थी. उस में लिखा था कि उस का बेटा बहुत बीमार है. अस्पताल में दाखिल कराया है. जितनी जल्दी हो सके, 10 हजार रुपए ले कर फौरन गांव आ जाओ. बेटे का इलाज रुक गया है. डाक्टर का कहना है कि अगर बच्चे की जिंदगी बचानी है, तो फौरन इलाज कराओ. जो 1-2 गहने थे, वे सब बेटे के इलाज की भेंट चढ़ गए हैं. जितना जल्दी हो सके, पैसे ले कर आ जाओ.

चिट्ठी पढ़ कर शालिनी को धक्का सा लगा. उस ने यह क्या किया? लालच में आ कर उस ने एक मजदूर आदमी की जेब काट कर उस के मासूम बेटे की जिंदगी को मौत के दलदल में धकेल दिया. पता नहीं, उस के बेटे का क्या हाल होगा? वह अपने बेटे को मोटरसाइकिल ले कर देने के लिए उलटेसीधे तरीके से पैसा इकट्ठा कर रही है, यह पाप की कमाई न जाने कैसा असर दिखाएगी? शालिनी ने रिकशे वाले को तलाश कर उस के रुपए वापस देने का मन बना लिया. वह यहां तक सोच रही थी कि उस गरीब को 10 हजार रुपए देगी, ताकि उस के बेटे का इलाज हो सके.

शालिनी सारा दिन पागलों की तरह रिकशे वाले को ढूंढ़ती रही, मगर वह नहीं मिला. जैसे कि वह रिकशे वाला शहर से गायब हो गया था. थानेदार जालिम सिंह का कितनी बार फोन आ चुका था. वह बारबार धमकी दे रहा था कि उस का काम कर, नहीं तो उसे टपका दिया जाएगा. मगर शालिनी ने थानेदार जालिम सिंह की धमकी को ठोकर पर रखा. वह जानती थी कि जालिम सिंह उस का कुछ नहीं बिगाड़ सकता, उलटा प्रैस फोटोग्राफर को बलात्कार के अपराध में फंसाने की सुपारी देने का मामला बनवा देगी.

2 दिन से शालिनी ने अपना धंधापानी भी बंद कर रखा था. उस के कितने चाहने वालों के फोन आ चुके थे. उस ने सब को न में जवाब दे दिया था. उस ने तीसरे दिन भी रिकशे वाले को तलाश करने की मुहिम जारी रखी. उस दिन उस ने अखबार में खबर पढ़ी कि थानेदार जालिम सिंह को 2 नंबर का सामान लाने वाली गाडि़यों से वसूली करने के आरोप में सस्पैंड कर दिया गया. अखबार में पत्रकार अर्जुन की खोजी पत्रकारिता की तारीफ हो रही थी.

अभी शालिनी अखबार में छपी यह खबर पढ़ ही रही थी कि तभी उस की नजर सड़क पर आते हुए उसी रिकशे वाले पर पड़ी. वह लपक कर आगे बढ़ी और उस का रिकशा रुकवा कर बोली, ‘‘अरे रिकशे वाले, मुझे माफ करना. मैं ने 3 दिन पहले तेरा पर्स चुराया था. उस में तेरे 4 हजार रुपए थे. अपनी गलती मानते हुए मैं तुम्हें 10 हजार रुपए वापस दे रही हूं. फौरन जाओ और अपने बेटे का इलाज कराओ.’’ रिकशा वाला खामोशी से उस की तरफ देखता रहा. जबान से कुछ नहीं बोला. शायद उस की आंखों से बहते आंसुओं ने समूची कहानी बता दी थी. मगर शालिनी अभी तक सचाई समझ न पाई. पर वह उस की खामोशी से सहम गई थी.

‘‘देखो भैया, पुलिस में शिकायत मत करना. तुम्हारे रुपए मैं ज्यादा कर के दे रही हूं. अपने बेटे का किसी बड़े अस्पताल में इलाज कराना,’’ शालिनी ने 10 हजार रुपए उस के सामने कर दिए. ‘‘अब रुपए ले कर क्या करूंगा मैडम. मेरा बेटा तो इलाज की कमी में मर गया. उस के गम में पत्नी भी चल बसी. अब तुम इतनी मेहरबानी करो कि किसी गरीब की जेब मत काटना, वरना किसी का मासूम बेटा फिर मरेगा,’’ भर्राई आवाज में रिकशे वाले ने कहा और रुपए लिए बिना ही आगे बढ़ गया.

अब शालिनी को अपनी बुरी आदतों पर भारी पछतावा हो रहा था.

Best Hindi Story : इजाबेला – एनी की कौन सी बात मौसी को अच्छी नहीं लगी

Best Hindi Story : ‘‘इजाबेला नाम है इस का,’’ एनी पौल ने बड़े प्यार से एक दुबलीपतली लड़की को अपने से सटाते हुए कहा, ‘‘हमारी बेटी.’’

यद्यपि किसी को उन की बात पर विश्वास नहीं हो रहा था लेकिन जब वह कह रही हैं तो मानना ही पड़ेगा. अत: सभी ने गरमागरम पकौड़े खाते हुए उन की और उन के पति की मुक्तकंठ से प्रशंसा की.

दरअसल मद्रास से लौटने के बाद उसी दिन शाम को एनी ने अपनी पड़ोसिनों को चाय पर बुलाया और सूचना दी कि उन्होंने एक लड़की गोद ली है.

उस 13 साल की दुबलीपतली लड़की को देख कर नहीं लगता था कि उस का नाम इजाबेला भी हो सकता है. एनी ने ही रखा होगा यह खूबसूरत नाम. उस की सेहत ही बता रही थी कि उस ने शायद ही कभी भरपेट भोजन किया हो.

इस अप्रत्याशित सूचना से पड़ोस की महिलाएं हैरान थीं. सब मन ही मन एनी पौल की घोषणा पर अटकलें लगा रही थीं कि आखिर समीरा ने झिझकते हुए पूछ ही लिया, ‘‘एनी, तुम्हारे 2 बेटे तो हैं ही, फिर आज की महंगाई में…’’

उस की बात को बीच में काटती हुई एनी बोलीं, ‘‘अरे, बेटे हैं न, बेटी कहां है. और तुम तो जानती हो कि बेटी के बिना भी घर में रौनक होती है क्या? आर्थर को एक बेटी की बहुत चाहत थी. हम ने 2 साल बहुत सोचविचार किया और खुद को बड़ी मुश्किल से मानसिक रूप से तैयार किया. सोचा, यदि गोद ही लेनी है तो क्यों न किसी गरीब परिवार की बच्ची को लिया जाए.’’

अपनी बात को खत्म करतेकरते एनी की आंखों में प्यार के आंसू उमड़ आए. इस दृश्य और बातचीत के अंदाज से सब का संदेह कुछकुछ दूर हो गया. कुछकुछ इसलिए क्योंकि ज्यादातर लोगों की सोच यह थी कि कामकाज के लिए एनी बेटी गोद लेने के बहाने नौकरानी ले आई हैं.

इजाबेला अब कभीकभी नए कपड़ों में दिखाई देने लगी. लेकिन उस के नए कपड़े ऐसे नहीं थे कि वह एनी पौल की बेटी लगे. एनी के बेटे आपस में खेलते नजर आते पर उन की दोस्ती इजाबेला से नहीं हुई थी. वह बरामदे के एक कोने में खड़ी रहती. उदास या खुश, पता नहीं चलता था. हां, सेहत जरूर कुछ सुधर गई थी…शायद ढंग से नहानेधोने के कारण रंग भी कुछ निखरानिखरा सा लगता था.

धीरेधीरे सब अपने कामों में मशगूल हो गए. फिर कभी वह लौन में से पत्तियां उठाती दिखाई देती तो कभी पौधों में पानी देती. एक बार झाड़ू लगाती भी नजर आई थी. घर में काम करने वाली गंगूबाई से कालोनी की औरतों को यह भी पता चला कि इजाबेला अब खाना भी बनाने लगी है.

महिलाओं की सभा जुड़ी और सब के चेहरे पर एक ही भाव था कि मैं ने कहा था न…

महिलाओं की यह सुगबुगाहट एनी तक पहुंच गई थी और उन्होंने सोने के टौप्स दिखा कर सब का शक दूर कर दिया. सभी उस के सामने एनी की तारीफ तो करती थीं पर मन एनी के दिखावे को सच मानने को तैयार न था.

समय धीरेधीरे सरकता रहा. एनी और इजाबेला की खबरें कालोनी की औरतों को मिलती रहती थीं. लगभग 10 माह बाद एक दिन मीरा मौसी ने कहा, ‘‘मुझे तो लगता है कि घर का सारा काम इज्जु ही करती है.’’

‘‘कौन इज्जु?’’ एक महिला ने पूछा.

‘‘अरे, वही इज्जाबेला.’’

‘इज्जाबेला नहीं मौसी, इजाबेला… और समीरा एनी उसे इजू कहती हैं, न कि इज्जु,’’ लक्ष्मी ने बात स्पष्ट की.

‘‘कुछ भी कह लक्ष्मी, अगर बेटी होती तो क्या स्कूल नहीं जाती? यदि गोद लिया है तो अपनी औलाद की तरह भी तो पालना चाहिए न. काम के लिए नौकरानी लानी थी तो इतना नाटक करने की क्या जरूरत थी. ऐसी बातें शोभा नहीं देतीं एनी पौल को,’’ मौसी ने कहा.

कभी कोई महिला इस लड़की के मांबाप पर गुस्सा निकालती कि कितनी दूर भेज दिया है लड़की को. ये लोग उसे कभी बाहर नहीं आने देते. किसी से बात नहीं करने देते. घर जाओ तो उसे दूसरे कमरे में भेज देते हैं. क्यों? मीरा मौसी को कुछ ही नहीं सबकुछ गड़बड़ लगता था. एक दिन एनी से पूछ ही लिया, ‘‘एनी, साल भर होने को आया, अभी तक अपनी बेटी का किसी स्कूल में एडमीशन नहीं करवाया.’’

एनी बड़ी नजाकत से बोली थीं, ‘‘मौसी, अब किसी ऐसेवैसे स्कूल में तो बेटी को भेजेंगे नहीं. जहां इस के भाई जाते हैं वहीं जाएगी न? और वहां दाखिला इतनी आसानी से कहां मिलता है. आर्थर प्रिंसिपल से मिला था. उम्र के हिसाब से इसे 9वीं में होना चाहिए. 14 की हो गई है. पर इसे कहां कुछ आता है. एकाध साल घर में ही तैयारी करवानी पड़ेगी. आर्थर पढ़ाता तो है.’’

मौसी कुछ और जानने की इच्छा लिए अंदर आतेआते बोलीं, ‘‘तो वहां कुछ नहीं पढ़ासीखा इस ने?’’

‘‘वहां सरकारी स्कूल में जाती थी. 5वीं तक पढ़ी है. फिर मां ने काम पर लगा दिया. अब यही तो कमी है न इन लोगों में. मुफ्त की आदत पड़ी हुई है फिर मैनर्स भी तो चाहिए. वैसे मौसी, इजाबेला चाय बहुत अच्छी बनाने लगी है,’’ फिर आवाज दे कर बोलीं, ‘‘इजू बेटे, मौसी को बढि़या सी चाय बना कर पिलाओ.’’

जब वह चाय बना कर लाई तो मौसी ने देखा कि उस ने बहुत सुंदर फ्राक पहनी हुई थी और करीने से बाल संवारे हुए थे. मौसी खुश हो गईं और संतुष्ट भी. उन्होंने प्यार से उस के सिर पर हाथ रखा तो एनी संतुष्ट हो गई.

‘‘इजू, शाम को बाहर खेला करो न. मेरी पोती भी तुम्हारी उम्र की है.’’

वह कुछ कहती उस से पहले एनी बोल उठीं, ‘‘मौसी, यह हिंदी, अंगरेजी नहीं जानती है. सिर्फ तमिल बोलती है. टूटीफूटी हिंदी की वजह से झिझकती है.’’

इजू अब सारा दिन घर में इधरउधर चक्कर काटती दिखाई देती और एनी घर से निश्ंिचत हो कर बाहर घूमती रहती. महल्ले की औरतों की हैरानी तब और बढ़ गई जब गंगूबाई छुट्टी पर थी और एनी ने एक बार भी किसी से कोई शिकायत नहीं की. मस्त थी वह. तो काम कौन करता है? पर अब कोई नहीं पूछता कुछ उस से क्योंकि जिन की बेटी है उन्हें ही कुछ परवा नहीं तो महल्ले वाले क्यों सोचें.

अब मौसी भी कुछ नहीं कह सकतीं. भई, जब बेटी बनाया है, घर दिया है तो वह कुछ काम तो करेगी ही न? और सब लोगों के बच्चे भी तो करते हैं. अब समीरा की बेटी को ही देख लो. 7वीं में पढ़ती है पर सुबह स्कूल जाने से पहले दूध ले कर आती है, डस्टिंग करती है और कोई घर पर आता है तो चाय वही बनाती है.

मीरा मौसी की पोती भी कुछ कम है क्या? टेबल लगाती है, दादीदादा को कौन सी दवा कब देनी है आदि बातों के साथसाथ मम्मी के आफिस से आने से पहले कितना काम कर के रखती है तो इजू क्यों नहीं अपने घर में काम कर सकती?

गंगूबाई बीमारी से लौट कर काम पर आई तो सब से पहले एनी के ही घर गई थी. लौट कर बाहर आई तो जोरजोर से बोलने लगी. किसी की समझ में कुछ नहीं आया. फिर समीरा के घर पर हाथ  नचानचा कर कहने लगी, ‘‘सब जानती हूं मैं, 1,500 रुपए में खरीद कर लाए हैं, काम करने के वास्ते.’’

‘‘तुम्हें कैसे पता, गंगूबाई?’’ समीरा ने पूछा.

‘‘अब कामधंधे पर निकलो तो सब की जानकारी रहती ही है. आप लोगों जैसे घर के अंदर बैठ कर बतियाते रहने से कहां कुछ पता चलता है,’’ फिर थोड़ा अकड़ कर गंगूबाई बोली, ‘‘मेरा भाई, आर्थर साहब के चपरासी का दोस्त है,’’ कह कर गंगूबाई मटकती हुई चली गई.

अब एनी पौल को घर और महल्लेवालों की परवा नहीं थी. वह नौकरी करने लगीं और इजू बिटिया घर की देखभाल. दत्तक बेटी से इजू नौकरानी बन गई थी. नौकरानी तो वह शुरू से ही थी पर पहले प्रशिक्षण चल रहा था अत: पता नहीं चलता था, अब फुल टाइम जौब है तो पता चल रहा है. इस तरह यह मुद्दा खत्म हो गया था कि बेटी है या नौकरानी. अब मुद्दा यह था कि उस के पास फुल टाइम मेड क्यों है? धीरेधीरे यह मुद्दा भी ठंडा पड़ने लगा.

इजाबेला ने नया माहौल स्वीकार कर लिया था. उस के पास और कोई चारा भी तो नहीं था. हंसतीमुसकराती इजाबेला सुबह काम में जुटती तो रात को 11-12 बजे ही बिस्तर पर जाने को मिलता. किसी दिन मेहमान आ जाते तो बस…

अपने कमरे में जा कर लेटती तो बोझिल पलकें लिए ‘रानी’ बन सुदूर गांव के अपने मांबाप के पास पहुंच जाती. सागर के किनारे खेलती रानी, रेत में घर बनाती रानी, छोटे भाईबहनों को संभालती रानी. बीमार मां की जगह राजश्री मैडम के घर बरतन मांजती… मां ने एक दिन उस के शराबी बाप से रोतेरोते कहा था, ‘शराब के लिए तू ने अपनी बेटी को बेच दिया है.’ उसे याद है एनी पौल का छुट्टियों में राजश्री के घर आना.

वह आंखें बंद कर मां के गले लग कर रोती. उसे इस तरह रोते 3 साल हो गए हैं. एनी मैडम ने कहा था कि हर साल छुट्टी पर उसे घर भेजेगी. कल वह जरूर बात करेगी.

अगली सुबह एडी को तेज बुखार था और वह सब भूल गई. एडी से तो उसे बहुत लगाव था. वह भी उस से खूब बातें करता था. इजाबेला पूरीपूरी रात एडी के कमरे में बैठ कर काट देती. पलक तक न झपकाती थी.

तीसरी रात जाने कैसे उसे नींद आ गई. और जब नींद खुली तो देखा आर्थर उस के ऊपर झुका हुआ था. वह जोरों से चीख पड़ी. पता नहीं किसी ने सुना या नहीं. अब इजाबेला आर्थर को जब भी देखती तो उस में अपने बाप का चेहरा नजर आता. इसीलिए वह बड़ी सहमी सी रहने लगी और फिर एक भरी दोपहरी में इजू बड़ी जोर से चीखी थी पर महानगरीय शिष्टता में उस की चीख किसी ने नहीं सुनी.

सुघड़, हंसमुख इजू अब सूखती जा रही थी. वह हर किसी को ऐसे देखती जैसे कुछ कहना चाह रही हो पर किसे क्या बताए, एनी को? वह मानेगी? और किसी से बात करे? पर ये लोग जिंदा नहीं छोड़ेंगे. ऐसे कई सवाल उस के मन में उमड़तेघुमड़ते रहे और ताड़ती निगाहों ने जो कुछ अनुमान लगाया उस की सुगबुगाहट घर के बाहर होने लगी. चर्चा में कालोनी की औरतें कहती थीं, ‘‘गंगूबाई पक्की खबर लाई थी.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘क्या आर्थर के चपरासी ने बताया?’’

‘‘नहीं, कल घर में कोई नहीं था. इजाबेला ने खुद ही बताया.’’

‘‘एनी मेम साहब को नहीं पता? आर्थर जबरदस्ती पैसे दे देता है और साथ में धमकी भी.’’

‘‘मैं बताऊंगी एनी मेम साहब को,’’ गंगूबाई बोली.

‘‘नहीं, गंगूबाई. वह बेचारी पिट जाएगी,’’ हमदर्दी जताते हुए समीरा बोली.

और एक दिन एनी ने भी देख लिया. उस का पति इतना गिर सकता है? उस ने अब ध्यान से बड़ी होती इजू को देखा. रंग पक्का होने पर भी आकर्षक लगती थी. एनी ने आर्थर को आड़े हाथों लिया. फिर अपने घर की इज्जत बखूबी बचाई थी. अगली सुबह ‘इजू बिटिया’ को पीटपीट कर बरामदे में लाया गया.

‘‘जिस थाली में खाती है उसी में छेद करती है,’’ गुस्से से एनी बोलीं, ‘‘हम इतने प्यार से रखते रहे और इसे देखो… यह ले अपना सामान, यह रहे तेरे पैसे… अब कभी मत आना यहां…’’

तभी गंगूबाई जाने कहां से आ पहुंची.

‘‘क्यों मार रही हो बेचारी को?’’

‘‘बेचारी? जानती हो क्या गुल खिला रही है?’’

‘‘गुल इस ने खिलाया है या तुम्हारे साहब ने?’’

‘‘गंगूबाई, यह मेरी बच्ची की तरह है. गलती करने पर पेट जाए को भी मारते हैं या नहीं? इस ने चोरी की है,’’ कहतेकहते उस की नजर इजू पर पड़ी.

इजू ने बस यही कहा, ‘‘मैं ने चोरी नहीं की.’’

गंगूबाई चिल्ला पड़ी थी, ‘‘मुझे पता है क्या बात है? ऐसे बाप होते हैं… सगी बेटी होती तो उसे देख कर भी लार टपकाता क्या?’’

जिन लोगों ने यह सुना सकते में आ गए.

‘‘एनी,’’ आर्थर का कहना था, ‘‘ऐसे ही होते हैं यह लोग. घटिया, जितना प्यार करो उतना ही सिर पर चढ़ते हैं. बदनाम करा दिया मुझे न,’’ आर्थर देख रहा था कि गंगूबाई की बात का लोगों ने लगभग यकीन कर लिया था.

और वे लोग जो उस के बेटी या नौकरानी होने के मुद्दे को ले कर कल तक परेशान थे, आज चुप थे. कल को उन के नौकरनौकरानी भी कुछ ऐसा कह सकते हैं न. भई, इन लोगों का क्या भरोसा? ये तो होते ही ऐसे हैं, झट से नई कहानी गढ़ लेते हैं. कल को कुछ भी हो सकता है, सच भी, झूठ भी. अगर इजू का साथ देते हैं तो कल उन का साथ कौन देगा.

एनी को लगा कि सभी उसे देख रहे हैं और उस का मजाक बना रहे हैं. इसलिए दरवाजा बंद करते हुए और जोर से बोली थीं, ‘‘शुक्र है पुलिस में नहीं दिया.’’

अपने ट्रंक पर बैठी इजाबेला गेट के बाहर रो रही थी.

गंगूबाई आगे आई थी.

‘‘चल मेरे साथ. पैसा नहीं दे सकती पर सहारा तो दे सकती हूं. सब से बड़ी बात मर्द नहीं है मेरे घर में. जो खाती हूं वही मिलेगा तुझे भी. एकदूसरे की मदद करेंगे हम दोनों. चल, पर मैं इज्जाबेला न कहूंगी. ये कोई नाम हुआ भला? या तो इज्जा या बेला… बेला ठीक है न?’’

बेला धीरेधीरे गंगूबाई के पीछेपीछे चल पड़ी. अपने जैसे लोगों के साथ रहना ही ठीक है.

कुछ दिन बाद सब ने देखा कि बेला अपनी नई मां गंगूबाई के साथ काम पर जाने लगी थी.

Emotional Story : नाराजगी – किससे मिलकर इमोशनल हो गया था हरि?

Emotional Story : कंपनी के टूर पर हरि मुंबई गया हुआ था. वह 3 दिन मुंबई में रुका. सारा दिन कंपनीकार्य में कट जाता और शाम के समय कंपनी गेस्टहाउस आ जाता. लेकिन मन में हर शाम एक खयाल आता. बहन यहीं रहती है, जा कर मिल ले. मगर हरि के पैर गेस्टहाउस से बाहर नहीं निकले.

टीवी देखते समय मस्तिष्क के किसी बंद कोने से पुरानी यादें बाहर आने लगीं. बड़ी बहन है, बचपन में एकसाथ हंसते, खेलते, लड़तेझगड़ते खूब मस्ती करते थे. लड़ाई होती लेकिन बस कुछ पलों की, आधा घंटा, 2 घंटे. फिर एकसाथ खेलने लगते. वो बचपन के प्यारे दिन, कोई छलकपट नहीं, क्या तेरा और मेरा. सब मिलबांट कर काम करते थे. बड़े होते हैं, तो दूरियां बनती जाती हैं. कभी सोचा नहीं था कि इतनी दूरियां हो जाएंगी. मिलना तो छोड़ो, फोन पर भी बात नहीं होती है.

जब दिल में खटास आ जाए, दरार पड़ जाए तब गांठ न तो खुलती है, न ही दिल मिलते हैं. दूरियां नदी के दो पाट होती हैं, जो मिलते ही नहीं. कोई सेतु भी तो नहीं बनता, जो मिला दे. हरि की इसी सोच ने उसे शाम के समय गेस्टहाउस से बाहर निकलने नहीं दिया. कुछ ही दूर जुहू बीच था, वहां भी नहीं गया.

हरि के कंपनी टूर हर महीने लगते थे, जहां भी जाता, बच्चों और पत्नी के लिए कुछ न कुछ छोटीमोटी खरीदारी अवश्य करता. मगर इस टूर पर कोई खरीदारी भी नहीं की. 3 दिनों बाद दिल्ली वापस जाने के लिए एयरपोर्ट पहुंचा. फ्लाइट में अभी समय था. कंपनी का जब काम समाप्त हुआ, हरि भरेमन से एयरपोर्ट पर गया.

सिक्योरिटी चैक के बाद एयरपोर्ट की दुकानों में रखे सामान देखने लगा. चाहिए तो कुछ भी नहीं था, फिर भी समय व्यतीत करने हेतु हर दुकान पर खड़ा हो जाता. खरीदना कुछ भी नहीं था, लेकिन तन्मयता के साथ दुकानों में रखे सामान के दाम देखने लगा, शायद कुछ कम कीमत का सामान मिल जाए जिस की उसे उम्मीद न के बराबर थी.

‘हरि, हरि.’ उसे ऐसा प्रतीत हुआ कोई उस को पुकार रहा है. कौन हो सकता है? एक प्रश्न उस के जेहन में उभरा. ‘हरि,’ अब आवाज एकदम निकट से थी. उस ने आवाज की दिशा में गरदन घुमा कर देखा, बहन. हरि के पीछे उस की बड़ी बहन सरिता खड़ी थी. वह बहन, जिस के बारे में हरि 3 दिनों से सोचता रहा, लेकिन न फोन किया, न मिलने गया. आज एक लंबे अरसे बाद हरि का बहन से मिलना हुआ और आश्चर्यभाव लिए उस ने बहन को गले लगाया. ‘बहन, कैसी हो?’

‘मैं तो अच्छी हूं. तुम यहां एयरपोर्ट पर. मुंबई कब आए और अब कहां जा रहे हो?’ बहन सरिता ने एकसाथ कई प्रश्न पूछ लिए.

‘मुंबई कंपनी के काम से आया था, अब वापस दिल्ली जा रहा हूं.’

‘घर मिलने नहीं आए और फोन भी नहीं किया? बहन से नाराजगी दूर नहीं हुई अब तक?’ सरिता के व्यवहार में उसे कुछ परिवर्तन दिखा.

‘गलत मत सोचो, बहन. नाराजगी कुछ नहीं है. सुबह कंपनी के काम से आया था और शाम वापस जा रहा हूं. काम समाप्त होने के बाद समय नहीं मिला,’ हरि ने बहन सरिता को स्पष्टीकरण दिया.

यहां हरि झूठ बोल गया, जबकि वह पिछले 3 दिनों से मुंबई में था और बहन की यादों की कशमकश भी थी. ‘अच्छा बहन, तुम एयरपोर्ट पर अकेली, जीजा कहां हैं?’

‘भाई, सब बेंगलुरु गए हैं. मैं भी वहीं जा रही हूं. सास की तबीयत ठीक नहीं है. बड़े भाईसाहब के घर में हैं. कभी भी अंतिम सांस ले सकती हैं. तुम्हारे जीजा एक सप्ताह से बेंगलुरु में हैं,’ सरिता ने हरी को बताया.

आज लगभग 10 वर्षों बाद हरी और सरिता मिल रहे थे. 55 वर्ष का हरी और उस की बड़ी बहन सरिता 61 वर्ष की. हरि कुछ यादों में खो गया. हरि और उस की बहन में आर्थिक अंतर बहुत अधिक था. हरि एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता था और उस का बहनोई एक सफल व्यापारी. बड़ी दुकान, बड़ा औफिस. नौकरी के कारण हरि की आर्थिक स्थिति व्यापार जगत में विशेष स्थान रखने वाली बहन और बहनोई के मुकाबले कुछ भी नहीं थी. बच्चों की उच्चशिक्षा और विवाह के लिए धनअर्जन की खातिर वह अपनी इच्छाओं को दबा देता था. 10 वर्षों पहले धनी बहन-बहनोई की बड़ी पुत्री के विवाह पर हरि कुछ अधिक उपहार नहीं दे सका, जिस कारण विवाह समारोह पर सरिता की सास के तानों पर हरि बहन-भाई के नाजुक रिश्ते की अहमियत को ध्यान में रखते हुए चुप रहा.

अपनी सास और दूसरे बड़ेबूढ़ों के आगे सरिता भी बेबस थी. उस ने मौके की नजाकत नहीं समझी. सास और घर के अन्य बूढ़ों के आगे उस ने भी हरि को खरीखोटी सुना दी कि खाली हाथ आने से अच्छा होता, शादी में न आता. कम से कम उसे ताने तो नहीं सुनने पड़ते. हरि अपनी हैसियत से अधिक उपहार ले कर गया था लेकिन बहन सरिता की सास और दूसरे बड़ेबूढ़ों की नाक के नीचे वे उपहार नहीं उतरे. उन के परिवार में भांजी की शादी पर मामा के घर से चूड़ा और अन्य कीमती उपहार की प्रथा थी. हरि मौके और रिश्ते की नजाकत समझता था, इसलिए चुपचाप खून का घूंट पी लिया. परंतु सरिता अपना आपा खो बैठी.

उस दिन जो दिलों में दूरियां बनीं, उन को आज 10 वर्ष हो गए. उस दिन के बाद वह बहन से कभी नहीं मिला और फोन भी नहीं किया. बहन-भाई का रिश्ता टूट गया. आज 10 वर्षों बाद सरिता की सास अंतिम सांस ले रही है. एयरपोर्ट पर दोनों की मुलाकात अचानक हो गई. 10 वर्ष की कुट्टी के पश्चात दोनों के मन की खटास खुद दूर हो गई, यह कुदरत का करिश्मा ही रहा जब सरिता ने एयरपोर्ट पर विंडो शौपिंग करते देख हरि को आवाज दी. और हरि ने पलट कर बहन को गले लगा लिया. हरि खयालों से बाहर आया, बोला, “बहन, खड़ेखड़े थक जाओगी. चलो, बैठ कर बात करते हैं.”

दोनों की फ्लाइट उड़ने में समय था. एक घंटे तक दोनों परिवार की कुशलक्षेम पूछते रहे और अपने दिल का हाल बांट कर पुराने गिलेशिकवे भुलाते रहे. समय ने दोनों को दूर किया और अचानक मिलवा कर नजदीक किया. दोनों ने पिछले 10 वर्षों में कभी नहीं सोचा था कि फिर कभी कहीं इतनी आत्मीयता से मिलना होगा.

फ्लाइट का समय हो गया. हरि दिल्ली आ गया और सरिता बेंगलुरु चली गई. दिल्ली आने के बाद हरि औफिस के काम में कुछ अधिक व्यस्त रहा, जिस कारण हरि पत्नी से सरिता के मिलने का जिक्र नहीं कर सका. सुबह जल्दी औफिस जाना और रात देर से घर वापस आना. रविवार की छुट्टी पर हरि ने पत्नी से एयरपोर्ट पर सरिता के मिलने का जिक्र किया. पत्नी हरिता चुप रही. उस ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की.

विवाह समारोह में अपने पति का अपमान वह नहीं भूली थी. हरि ने सरिता को माफ कर दिया था हालांकि बोलचाल 10 वर्षों बाद हवाईअड्डे पर हुई लेकिन हरिता ने ननद सरिता और उस की ससुराल को अभी भी माफ नहीं किया था. एक भारतीय नारी होने के कारण वह भरी बिरादरी में अपने पति का अपमान नहीं सहन कर सकी थी. हरिता के मन की दशा भांप कर हरि ने बात आगे नहीं बढ़ाई.

एक सप्ताह बाद रविवार के दिन टैलीफोन की घंटी बजी. लैंडलाइन पर फोन आया. लैंडलाइन फोन सिर्फ इसलिए नहीं कटवाया, घर पर मोबाइल के सिग्नल नहीं आते थे. हरी बाजार से फलसब्जी लेने गए थे. हरिता ने फोन उठाया. “भाभी,” हरिता की आवाज सुन सरिता ने कहा. हरिता कुछ नहीं बोली. फोन कान पर लगाए चुप रही. उस की आंखें नम हो गईं.

सरिता की सास के निधन का समाचार सुन कर हरिता रो पड़ी. “भाभी, रोते नहीं हैं. क्या मुझ से अभी भी नाराज हो?” सरिता का गला रुंध गया.

“नहीं दीदी. कोई नाराजगी नहीं. उठाला कब है?” हरिता ने पूछा.

“बुधवार को बेंगलुरु में है.” इतना सुन हरिता ने फोन रख दिया.

सरिता समझी कि हरिता अभी भी नाराज है. सरिता की सास की मृत्यु पर हरिता के मन में सभी गिलेशिकवे दूर हो गए. गिलेशिकवे की जो वजह थी वही चली गई तब किस बात की नाराजगी. सास और दूसरे बुजुर्गों के आगे सरिता बेबस थी. हरिता सब समझती थी. उस की नाराजगी भाई-बहन के संबंध तोड़ने पर थी. सरिता ने राखी भी भेजनी छोड़ दी थी. बांधने नहीं आती लेकिन डाक से भेज तो देती. 10 वर्षों से सरिता ने हरि को राखी भी नहीं भेजी थी. भरी बिरादरी में उस ने सास का साथ दिया, मगर भाई से राखी का संबंध तो न तोड़ती. डाक से भेज देती, कभीकभार फोन कर देती. यह सब वह सोच ही रही थी कि हरी फलसब्जी ले कर घर आए.

हरिता ने सरिता की सास की मृत्यु का समाचार दिया. हरी हमें उन के उठाले पर जाना चाहिए. तुम टिकट बुक करवा लो. “क्या तुम जाना चाहती हो?” हरि ने हैरत से पूछा.

“गमी के मौके पर हमें अवश्य जाना चाहिए. पूरी उम्र नाराजगी के बोझ के साथ नहीं जीना चाहिए. कारण चला गया, नाजरगी भी जानी चाहिए.”

हरिता ने अपने आने की सूचना सरिता को दी. यह सूचना सुन कर सरिता की आंखों में आंसू आ गए.

अपनी सास के उठाले पर हरि और हरिता को देख सरिता अति प्रसन्न हुई. गले लगा कर भाईभाभी का स्वागत किया. जिन बुजुर्गों ने हरि का मजाक सरिता की सास के साथ मिल कर उड़ाया था वे आज चुपचाप दांतों तले उंगली दबा कर हैरानी से देख रहे थे.

आज बुजुर्गों की परवा किए बिना हरि के बहन-बहनोई ने सब के सामने हरि और हरिता को गले लगा कर स्वागत किया. रिश्तों पर जमी बर्फ पिघल गई. हैरानपरेशान बुजुर्गों के सामने हरि और हरिता के मुख पर आत्मविश्वास की मुसकान थी

JNUSU Elections 2025 : छात्रों से चिढ़ती सरकारें

JNUSU Elections 2025 : दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के चुनाव इस बार काफी उत्सुकता से लड़े गए क्योंकि वामपंथी खेमे में विभाजन हो गया था और भगवा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को जीत की पूरी उम्मीद थी. हालांकि उन्हें वाम गुट की गुटबाजी का लाभ हुआ लेकिन अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सचिव के पद वामपंथियों का एक गुट बटोर ले ही गया.

यह बात इसलिए थोड़ी महत्त्व की हो जाती है क्योंकि इस समय अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप वहां के हारवर्ड समेत दूसरे विश्वविद्यालयों पर दबाव डाल रहे हैं कि वे लोकतंत्र समर्थक, गर्भपात समर्थक, पैलेस्टाइन समर्थक, पर्यावरण समर्थक, रंगभेद विरोधियों, धर्म विरोधियों और तानाशाही विरोधियों पर लगाम लगाएं और छात्रों से कहें कि वे विश्वविद्यालयों में पढ़ने आए हैं, राजनीति करने नहीं.

ऐसी ही बात भारत के राजनीतिबाज कहते हैं जब सत्ता में होते हैं. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय देश में अरसे से सत्ताविरोधी विचारों का केंद्र बना हुआ है और वहां निरंतर तानाशाही सोच व तानाशाहों के फैसलों पर चर्चा होती रहती है.

2014 के बाद से यह विश्वविद्यालय हारवर्ड विश्वविद्यालय की तरह सत्ता की आंखों में किरकिरी बना हुआ है, खासतौर पर इसलिए कि दोनों ही विश्वविद्यालयों को केंद्र सरकारों से सहायता मिलती है. अमेरिका में ट्रंप ने 2 अरब डौलर की सहायता बंद कर दी है पर भारत में भाजपा सरकार अभी सहायता तो बंद नहीं कर पाई लेकिन उस ने अपनी मरजी की नियुक्तियां करनी शुरू कर दी हैं ताकि सारी फैकल्टीज भगवा हो जाएं, चाहे माथे पर तिलक न लगा हो.

शिक्षा संस्थान में राजनीति पर खुली चर्चा किया जाना जरूरी है. यह वह जगह है जहां विचारों को आसानी से सम झा जा सकता है.

एक बार पढ़ाई खत्म की नहीं कि हर जना अपनी रोजीरोटी में इतना व्यस्त हो जाता है कि उस के पास किसी भी पनपते छोटे जहरीले अफीम के पौधे की ओर ध्यान देने का समय नहीं होता. जब तक वे छात्र रहते हैं, किताबों को पढ़ सकते हैं, तर्क कर सकते हैं, हर बात की मीनमेख निकालने में दक्ष होते हैं, उन के साथ सशक्त विज्ञान होता है और वे हर समस्या के हर पहलू पर विचार कर पाते हैं.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय इस मामले में काफी अग्रणी रहा है. अब उस पर सरकार की नजर है कि वहां केवल पोंगापंथी छात्र ही दाखिला ले सकें लेकिन हर वर्ग, जाति, वर्ण व धर्म के छात्र दाखिला लेते जा रहे हैं.

देश के अनेक विश्वविद्यालय हैं जो कट्टरवादियों को पैदा करने की फैक्ट्रियां हैं. वहां उन्हें एक ही पाठ पढ़ाया जाता है जिस में धर्मगुरु और राजा दोनों को सर्वोपरि माना जाता है. वे सरकारों के सब से बड़े सिपाही साबित होते हैं और वे ही क्रूर और निर्दयी शासक, प्रशासक, प्रबंधक, नेता बनते हैं. देशों में विवाद उन्हीं से पैदा होता है.

हारवर्ड और जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय विविधता और भौतिक अधिकारों के पाठ पढ़ाते हैं जिन से धर्म और राजसत्ता दोनों चिढ़ते हैं. समाज में हरकोई उपयोगी हो, हरकोई उत्पादक हो, तभी प्रगति होती है और ये विश्वविद्यालय इसी के बीज अपने छात्रों में रोपित करते हैं. हारवर्ड विश्वविद्यालय के प्रबंधकों और जेएनयू के छात्रों ने पैसे देने वाले कट्टरपंथियों से दुश्मनी मोल ले रखी है लेकिन फिर भी चल रहे हैं और कामयाब भी हैं, यही आवश्यक भी है.

Indian Penal Code 1860 : नई बोतल पुराना शरबत

Indian Penal Code 1860 : भारतीय जनता पार्टी ने बहुत ढोल पीटे हैं कि उस ने भारतीय न्याय संहिता बना कर गुलामी के दिनों के इंडियन पीनल कोड 1860 को हटा दिया. पर सिर्फ नाम बदलने में माहिर भाजपा सरकार ने इंडियन पीनल कोड 1860 की भाषा को, अपराधों को, सजाओं को, धाराओं को इधर से उधर कर के नई बोतल में पुराना शरबत ही रखा है, सिर्फ ढक्कन पर नया रंग लगाया है.

मई 2024 में दिए गए एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह बात पीनल कोड 1860 की धारा 498 ए के संदर्भ में कही. यह मामला हरियाणा के अचिन गुप्ता का था जो दिल्ली का रहने वाला है जिस का सांस्कारिक हिंदू विधियों से 2008 में विवाह हुआ.

2021 में तनु गुप्ता ने एक आपराधिक मामला हिसार में दर्ज कराया कि वह हरीश मनोचा की बेटी है जो अर्बन एस्टेट, हिसार में रहते हैं. उस के पति व सास उसे शादी के बाद ताने कसते थे, दहेज मांगते थे, पति शराब पीता था. पत्नी ने 498 ए के तहत मुकदमा चलाने की मांग की.

मुकदमे में 5 जनों के नाम दर्ज करवाए गए लेकिन पुलिस ने सिर्फ पति अचिन गुप्ता के नाम चार्जशीट दायर की. पति ने हाईकोर्ट से मुकदमा खारिज करने की प्रार्थना की. लेकिन हरियाणा पंजाब हाईकोर्ट ने मामला खारिज नहीं किया तो अचिन गुप्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा.

सुप्रीम कोर्ट ने अचिन गुप्ता को राहत दे दी और हिसार में मजिस्ट्रेट के पास चल रहे मुकदमे को खारिज कर दिया पर इसी मुकदमे में यह भी कहा कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 व 86 हूबहू गुलामी के दिनों के बने कानून इंडियन पीनल कोड की धारा 498 ए की नकल है.

वैसे, 498 ए स्वतंत्र भारत में कांग्रेस सरकार द्वारा औरतों को पतियों के अत्याचारों से बचाव के लिए जोड़ी गई थी लेकिन भारतीय जनता पार्टी के नीतिनिर्धारक और कानून बनाने वाले इतने अनपढ़ या अधूरे ज्ञान वाले हैं कि उन्होंने जरा सा बदलाव ही किया.

वर्ष 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कहा भी था कि धारा 498 ए का बहुत बुरी तरह से पत्नियों द्वारा दुरुपयोग किया जा रहा है. लेकिन अपनी योग्यता का दम भरने वाली भाजपा सरकार के मंत्री व विधि विशेषज्ञों ने न 2010 की सलाह मानी, न कांग्रेसी सरकार के इस समाज सुधार संशोधन में कोई बदलाव किया.

कानून बनाने का काम निरंतर चलता रहे, यही लोकतंत्र की खासीयत है जो इसे धर्मतंत्र से कहीं ज्यादा श्रेष्ठ बनाती है. धर्म को सर्वोपरि मानने वाली भारतीय जनता पार्टी के पास, अफसोस, इतने योग्य व्यक्ति नहीं हैं कि वे सही कानून बना सकें, तभी तो 2024 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट को ढोल पीटपीट कर बनाए गए भारतीय न्याय संहिता 2023 की पोल खोलनी पड़ी.

भाजपा चाहती तो 2010 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सम झ लेती पर लगता है कि उस में पढ़ेलिखे लोगों की कमी है, उस में वे ही लोग भरे हैं जो एक ही मंत्र, एक ही भजन, एक ही आरती को रोजाना, बारबार, लगातार बिना बदले दोहराने के ‘एक्सपर्ट’ हैं.

भाषण देना एक बात है, कानून बनाना, नई खोज करना दूसरी.

भाजपा को ऐसा कानून बनाना चाहिए था जो पतिपत्नी विवादों को आसानी से हल करने में सहायक हो और या तो विवाद हल कराए या संबंध तुड़वा दे लेकिन बिना कष्ट के.

अचिन गुप्ता के मामले से साफ है कि इस धारा का दुरुपयोग हो रहा है और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने के बाद भी अचिन गुप्ता को तनु गुप्ता के लगाए आरोपों से सिर्फ मुक्ति मिली है लेकिन तलाक नहीं मिला. वह प्रक्रिया अभी भी किसी अदालत में चल रही हो तो बड़ी बात नहीं. वर्ष 2024 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से अचिन गुप्ता सिर्फ जेल जाने से बचा, पत्नी तो तनु गुप्ता कानूनन बनी ही हुई है.

मजेदार बात यह है कि तनु गुप्ता ने माना था कि विवाह पूरे हिंदू रीतिरिवाजों के साथ हुआ. जब देवता विवाह में मौजूद थे तो विवाह में खटास क्यों हुई? क्या देवता अपने एजेंटों की मारफत सिर्फ पैसा लेने को विवाह में पधारते हैं, यह सवाल तो है.

India-Pakistan War : बदला सम्मान के लिए

India-Pakistan War : पाकिस्तान सरकार व उस के साए में पलते आतंकवादी आखिर यह सोच कैसे पाते हैं कि वे कहीं पर, कभी भी भारत के निहत्थे निर्दोषों को गोलियों से भून कर भाग जाएंगे और देश चुप बैठा रहेगा. वर्ष 1965 और 1971 के युद्धों और कारगिल की झड़पों ने साबित कर दिया है कि चाहे जो भी कीमत हो, पाकिस्तान हो या कोई और देश, भारत चुप न बैठेगा, चाहे उस का प्रधानमंत्री कोई भी हो, किसी भी पार्टी का हो.

आतंकवादियों से निबटने में बस एक खतरा हर प्रधानमंत्री को मोल लेना होता है कि कहीं बात इतनी न बढ़ जाए कि आणविक हथियार सामने आ जाएं.

भारत द्वारा 7 मई से 10 मई तक मिसाइलों से आतंकवादियों के 9 ठिकानों पर जो हमले किए गए हैं वे न आखिरी हैं न पूरे जोर वाले हैं. यह पक्का है कि भारत आतंकवाद का उत्तर देगा और इस का दंड हो सकता है उन को भी भुगतना पड़े जो इन आतंकवादियों के आसपास रह रहे हैं. आतंकवादी हमेशा जनता में घुलेमिले रहते हैं ताकि दुश्मन उन्हें मार न पाए. वे इतने कायर होते हैं कि न अपना नामपता बताते हैं, न यह तक बताते हैं कि वे किस गुट के हैं. आमतौर पर उन्हें भेजने वाले गुट भी छोटे सनकियों के होते हैं जो 100-200 लोगों को जमा कर के भारत जैसे देश पर हमला करने को तैयार हो जाते हैं.

उन्हें पकड़ने के लिए अगर वह देश, जहां ये पनप रहे हैं व पनाह ले रहे हैं, खुद आगे नहीं आता तो पीडि़त देश को पूरा हक है कि वह अपनी जानकारी और सम झ से बदले की कार्रवाई करे, चाहे उस से दोनों देशों के निहत्थों, निर्दोषों की जान भी चली जाए. आतंकवाद का मुकाबला करना हर सरकार का पहला कर्तव्य है और उस में कोई भी कसर छोड़ी नहीं जा सकती.

USA : ट्रंप का आदेश

USA : 22 अप्रैल को पहलगाम में जो कत्लेआम हुआ था वह आतंकवाद से भी ज्यादा क्रूर था क्योंकि आमतौर पर आतंकवादी अचानक आते हैं, गोलियां चलाते हैं, फिर भाग जाते हैं. 22 अप्रैल को वे काफी देर तक 2,000 लोगों से भरे मैदान में मौजूद रहे, लोगों से धर्म पूछा, हिंदू बताने पर गोली मारी, औरतों व बच्चों को कुछ कहा नहीं और फिर आराम से निकल गए. जाहिर तौर पर तो आतंकवादियों ने कुछ बेकुसूरों को मौत के घाट उतारा था लेकिन दरअसल उन के निशाने पर थे देश का सम्मान, देश की सुरक्षा और देश के लोगों का अस्तित्व.

इस के लिए अगर 7 मई को औपरेशन सिंदूर के अंतर्गत पाकिस्तान के कई ठिकानों पर भारतीय सीमा के अंदर उड़ते सेना के हवाई जहाजों ने मिसाइलें फेंक कर हमले किए तो उसे गलत नहीं कहा जा सकता अगर सरकार को पक्का पता था कि आतंकी, जिन्होंने 22 अप्रैल को बरसैन मैदान में निर्दोष भारतीयों का खून बहाया था, इन 9 जगहों से आए थे और यहीं कहीं पर शरण लिए हुए थे. वे ही नहीं, इन्हीं ठिकानों पर उन के सरगना व दूसरे आतंकी भी पनाह लिए हुए थे.

अगर यह औपरेशन केवल आतंक का प्रशिक्षण देने वाले केंद्रों को नष्ट करने के लिए किया गया था तो यह जरूरी था कि पाकिस्तान व भारत के सीमाई इलाके में ही नहीं, पूरे पाकिस्तान में जहां भी ऐसे केंद्र हैं सभी को नष्ट किया जाता तो औपरेशन सिंदूर की सफलता पूरी होती. जितना हुआ उस से नहीं लगता कि पाकिस्तान में आतंकियों की फैक्ट्रियां हमेशा के लिए जला डाली गई हैं.

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीच में पड़ कर, आदेश दे कर, यह युद्ध रुकवा दिया तो साफ जाहिर है कि भारत और पाकिस्तान के प्रधानमंत्रियों के और उन के सहायकों में रीढ़ की हड्डियां नहीं हैं कि वे डोनाल्ड ट्रंप से ‘न’ कह सकें.

यह तो बेहद अफसोस की बात है कि भारत ने ऐक्शन शुरू किया लेकिन 5,000 किलोमीटर दूर व्हाइट हाउस में बैठे डोनाल्ड ट्रंप की एक घुड़की पर दोनों पक्ष एकदम चुप हो गए. भारत जो आतंकवाद का लगातार शिकार रहा है वह अपना उद्देश्य पूरा नहीं कर पाया, ट्रंप के आगे झुक गया. आखिर क्यों?

भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में चौथी है. हमारी सेना की गिनती 4 बड़े देशों में आती है. हमारे पास लड़ाकू हवाई जहाज, तोपें, राडार, ड्रोन, नेवी, एयरक्राफ्ट कैरियर, मिसाइलें ही नहीं, न्यूक्लियर बमों का बड़ा स्टौक भी है. फिर हम अपना मकसद पूरा किए बिना रुके क्यों?

पाकिस्तान ने यह नहीं माना है कि पहलगाम में भेजे गए आतंकवादियों को वह पकड़ कर भारत को सौंप देगा. हम ने यह पता नहीं किया है कि उन आतंकवादियों को किस क्रूर शख्स ने भारत भेजा था. जिन 9 ठिकानों पर 7 मई की रात को हम ने मिसाइलों से हमले किए थे और जो नुकसान पहुंचाया था उन में पहलगाम के आतंकवादी या उन को भेजने वाले लीडर थे, हम इस पर पक्के तौर पर कुछ नहीं कह सकते.

हमें सही पता होता तो हम 9 पर नहीं बल्कि 1 ठिकाने पर ही हमला करते जैसे अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन को मार डालने के लिए रावलपिंडी के निकट एबटाबाद पर ही हमला किया था.

अगर सटीक पता नहीं था तो बेकार में अरबों रुपए खर्च कर के हम ने अंधेरे में तीर क्यों चलाए, यह सवाल तो पैदा होता है.

रामकथा के अनुसार, राम ने रावण की लंका पर युद्ध तब शुरू किया जब हनुमान ने पक्का कर लिया कि सीता उसी अशोकवाटिका में है जो रावण के राज में है. वहां राम को मालूम था कि रावण कौन सी लंका में है. अब की बार हमला हम ने क्या यों ही सिर्फ पाकिस्तान को दंड देने या देश की जनता को बहलाने-बहकाने के लिए किया था, फिर तो, डोनाल्ड ट्रंप के कहने पर रोक देना सही है. वैसे, उस डोनाल्ड ट्रंप को हमारे बीच में पड़ने की जरूरत नहीं थी क्योंकि ट्रंप के ट्वीट के कुछ घंटे पहले ही अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, जिन की पत्नी ऊषा भारतीय मूल की हैं, ने कहा था कि अमेरिका को कोई रुचि नहीं है कि वह इस मामले में दखल दे.

आतंकवादियों को सबक सिखाए बिना, उन के सरगनाओं को पकड़े बिना, पहलगाम में पहुंचे बंदूकधारियों को दंड दिए बिना सैनिक कार्रवाई रोक देना देश के मकसद को अधूरा छोड़ देने जैसा है जिस पर खर्च तो बहुत हुआ ही, आगे उसे पूरा करने के रास्ते भी बंद हो गए.

Best Hindi Story : मुखौटा – उर्मिला की बेटियों का असली चेहरा क्या था ?

Best Hindi Story : आदमी पीछे मुड़ कर भी देखता है. सिर्फ आगे देख कर हम आसमान छू तो लेते हैं मगर भूल जाते हैं कि हमारी जड़ें पीछे की तरफ हैं जिन से हम कटते जा रहे हैं. आज का दिन कुछ ऐसा ही था जब प्रदीप का फोन आया. यह मेरे लिए अकल्पनीय था. प्रदीप और मैं भले ही चचेरे भाईबहन हों, प्रदीप की ऊंची हैसियत के चलते उन के परिवार वालों ने हमारे परिवार को कभी तवज्जुह नहीं दी. एक तरह से हम उन के लिए अछूत थे.

कहते हैं न, कि वक्त सब सिखा देता है. कुछ ऐसा ही प्रदीप के साथ हुआ जिसे न जाने क्या सोच कर उस ने मुझ से साझा करना चाहा. न तब जब हम विपन्न थे न आज जबकि हमारा परिवार आर्थिक दृष्टि से संभल गया है, मैं ने कभी किसी से दुराव नहीं किया. लाख वे हम से कटते रहे मगर हम ने अपने रिश्तों की कशिश बनाए रखी. हो सकता है तब प्रदीप और उन की बहनों में परिपक्वता का अभाव हो. मगर उर्मिला चाची को क्या कहा जाए, वे तो अपने बच्चों को सामाजिकता सिखा सकती थीं. उन्हें सही रास्ता दिखा सकती थीं. मगर नहीं, वे खुद ऐंठ में रहतीं, उन के बच्चे भी. लेदे कर चाचाजी को घरखानदान का एहसास था. सो, कभीकभार समय निकाल कर वे हमारे घर आ जाते. प्रोफैसरी की ठनक तो थी ही.

रविवार का दिन था. घर का कामकाज निबटा कर जैसे ही मैं लेटने जा रही थी कि प्रदीप का फोन आया, ‘‘कैसी हो?’’ आवाज पहचानने में लमहा लगा पर अगले ही पल समझ गई कि कौन है. ‘‘प्रदीप,’’ मेरे मुख से निकला, ‘‘बहुत दिनों बाद फोन किया?’’

‘‘तुम तो फोन कभी करोगी नहीं,’’ प्रदीप का स्वर शिकायताना था.

‘‘समय नहीं मिलता,’’ मैं ने कहा.

‘‘मिलेगा भी क्यों, इतने बड़े स्कूल की टीचर जो हो?’’ प्रदीप के स्वर में व्यंग्य का पुट था. समझने के बाद भी मैं ने हंस कर कहा, ‘‘एक हद तक तुम ठीक कह रहे हो. दूसरे, घरगृहस्थी में इतनी व्यस्तता है कि अपनों के लिए समय निकाल पाना मुश्किल हो जाता है. कभीकभी बड़ी उलझन होती है. जी करता है, सबकुछ छोड़ कर कुछ दिनों के लिए कहीं चली जाऊं, कम से कम घरगृहस्थी की किचकिच से मुक्ति तो मिलेगी.’’

‘‘यहीं चली आओ. हम सब को बहुत अच्छा लगेगा,’’ प्रदीप ने मनुहार की. मुझे अच्छा लगा.

‘‘आज तो तुम्हारे यहां बहुत भीड़ लगी होगी.’’

‘‘भीड़ किस बात की. मोना आई हुई है. बाकी ने राखी डाक से भिजवा दी थीं.’’

‘‘ चाची का क्या हाल है?’’

‘‘अब क्या बताऊं,’’ उस का स्वर भरा हुआ था.

‘‘यहां आया हूं. उन का ब्लडप्रैशर और शुगर दोनों बढ़े हुए हैं.’’

‘‘यहां का क्या मतलब?’’

‘‘रायपुर.’’

‘‘क्या चाची तुम्हारे पास नहीं रहतीं?’’

‘‘अब तुम से क्या छिपाना. पापा के गुजर जाने के बाद उन्हें अपने साथ सतना ले जाना चाहता था. मगर गईं नहीं. कहती हैं कि वहां बंध कर रहना पड़ेगा.’’

‘‘कल को कुछ ऊंचनीच हो गई तो?’’

‘‘हो गई है,’’ उस ने ‘गई’ शब्द पर जोर दिया, आगे कहा, ‘‘ब्लडप्रैशर और शुगर दोनों के बढ़ने का मतलब जान सकती हो कि मेरे दिल पर क्या गुजर रही है.’’

मुझे सुन कर चिंता हुई. उम्र के 70वें साल में वे अकेली एक नौकर के साथ अपने दिवंगत पति यानी मेरे चाचा के बनाए मकान में रह रही थीं. यही नौकर उन की देखभाल करता था. लमहों के लिए मेरा मन अतीत के पन्नों में उलझ गया.

चाचा एक सरकारी स्कूल में प्रोफैसर थे. रुपयोंपैसों की कोई कमी नहीं थी. सब की बेहतर परवरिश हुई. वहीं मेरे पापाका अपना व्यापार था. व्यापार में आए घाटे के चलते एक समय ऐसा भी आया जब हमारा परिवार दानेदाने के लिए मुहताज हो गया. इस के बावजूद न तो हमारे संस्कारों में कोई कमी आई, न ही हमारी पढ़ाईलिखाई में. हम भले ही शहर के नामीगिरामी स्कूल में नहीं पर जहां भी पढ़े, अच्छे से पढ़े. मेरी मां की खासीयत यह थी कि वे कोई बात दिल में छिपाती नहीं थीं. वहीं, चाची में छिपाने की प्रवृत्ति थी. समझ में आया तो चाचा से बताया, नहीं तो छिपा गईं. बच्चों के साथ भी वही करतीं. व्यवहार में पारदर्शिता जैसी कोई बात ही नहीं थी उन में. यही संकीर्णता उन की तीनों बेटियों में भी आ गई. अपवादवश प्रदीप इस से अछूता रहा. मैं अतीत से उबरी.

‘‘तुम्हारे साथ न रहने का कारण?’’

‘‘सलोनी. वे कहती हैं कि वे मेरी बीवी के साथ नहीं रह सकतीं. उसे अपनी कमाई पर बहुत घमंड है.’’

‘‘क्या सचमुच में ऐसा ही है?’’ मैं ने प्रश्न किया.

‘‘अजीब सी बात करती हो,’’ प्रदीप तल्ख स्वर में बोला, ‘‘उस के पास समय ही नहीं बचता. तुम भी टीचर हो, क्या नहीं जानतीं कि एक प्रिंसिपल के ऊपर कितनी जिम्मेदारी होती है. पापा के घर में नौकर देखभाल करता है, तो ठीक है, वहीं, यहां नौकरानी खानानाश्ता तैयार कर के देती है तो वे इसे अपनी तौहीन समझती हैं.’’

‘‘चाची क्या चाहती हैं?’’

‘‘वे चाहती हैं कि सलोनी उन्हें वक्त दे. हमेशा उन की जीहुजूरी करे,’’ उस के स्वर में हताशा थी, ‘‘उन्हें मुझे टौर्चर करने में आनंद आ रहा है.’’

‘‘मां अपने बेटे के साथ ऐसा सुलूक कैसे कर सकती है?’’

‘‘क्यों नहीं कर सकती है. उन्हें लगता है कि मैं अब अपनी बीवी का हो कर रह गया हूं. वहीं उन की तीनों बेटियां, खासतौर से मोना तो साल के 6 महीने मां के पास ही रहती है. वही उन को ज्यादा बरगलाती है.’’

28 वर्ष की थी मोना जब आजिज आ कर चाचा ने उस की शादी एक किराना व्यापारी से कर दी. चाचा को यह शादी कतई पसंद नहीं थी. मगर क्या करते. जहां भी जाते, मोना का सांवला रंग समस्या बन कर सामने आ जाता. मोना ने सुना तो रोंआसी हो गई. यहीं से उस के मन में कुंठा ने जन्म लिया. उसे चाचा और प्रदीप दोनों से खुन्नस थी. उसे अपने पति से घिन्न आती. न ढंग से पहनना आता, न ही बोलना. दिनभर दुकान पर बैठा ग्राहक निबटाता रहता. मोना को अवसर मिलता, सो, दिनभर फोन से चाची को प्रदीप के खिलाफ भड़काती रहती.

‘‘तुम मां को समझाओ.’’

‘‘समझासमझा कर तंग आ चुका हूं.’’

‘‘शादी के बाद बेटियां मायके में दखल न दें, तभी उन की इज्जत बनी रहती है.’’

‘‘यह तुम कह रही हो न, मोना और मेरी मां के समझ में आए, तब न.’’

‘‘मोना को समझना चाहिए कि वह कब तक मां का साथ दे पाएगी. आखिरकार, मां को बेटेबहू के साथ ही जीवन गुजारना है. बेटियों के पास इतनी फुरसत कहां होती है कि वे अपने पतिबच्चों को छोड़ कर मां की सेवा करने आएं.’’

मेरी मां को अपनी मझली बेटी नीता से खासा लगाव था. लगाव का कारण था उस का संपन्न होना. वह जब भी ससुराल से आती, उन की जरूरतों का समान ले कर आती. वापस लौटते समय भी उन के हाथ में रुपया रख देती. वहीं, बनारस में रह कर मैं उन को समय नहीं दे पाती. एक तो मेरी आमदनी कम थी, उस पर बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी. उन्हें हमेशा मुझ से शिकायत रहती. कहतीं, क्या फायदा तुम्हारे बनारस में रहने से? काम तो आखिर नीता ही आती है. मुझे बुरा लगता. यही शिकायत उन्हें अपने इकलौते बेटे सोनू से भी थी जो कम ही उन से संपर्क रख पाता. इस का मतलब यह नहीं था कि उन का हालचाल नहीं लेता. बीमारी हो या कोई अन्य जरूरत, रुपएपैसे उन के खाते में समयसमय पर डालता रहता.

पापा की मृत्यु के बाद सोनू मम्मी से मजाकिया स्वर में बोला, ‘आप का मन नीता के यहां लगता है. चाहे तो वहीं रह सकती हो.’ नीता मां के पास बैठी सुन रही थी. वह मुसकरा दी. मां ने कोईर् जवाब नहीं दिया. इस का मतलब वह अच्छी तरह समझ रही थीं कि बेटीदामाद का साथ दोचार दिन का ही अच्छा होता है. एक दिन की नीता और हर दिन की नीता में फर्क होता है. तब वे कहां जाएंगी? नीता भी इसे अच्छी तरह से समझ रही थी. इसलिए कोई जोर नहीं दिया. न ही मां को अपने बेटेबहू के खिलाफ भड़काया.

अपनी बात कह कर प्रदीप ने फोन काट दिया. मैं सोचने लगी, क्यों नहीं मोना के मन में भी ऐसी समझ आती कि वह बिना वजह उर्मिला चाची की शेष जिंदगी में जहर न घोले. उस के साथ जो हुआ वह उस का समय था. वह अब उर्मिला चाची को क्यों मोहरा बना रही है? उर्मिला चाची से लगी रहने के पीछे मोना का अपना स्वार्थ था. इसी बहाने वह उन से जबतब रुपए ऐंठती. प्रदीप ने ही बताया था कि कैसे मम्मी ने उसे कुछ गहने भी दे रखे थे.

एक दिन अचानक उर्मिला चाची के सीने में दर्द उठा. मोना ने इस की खबर प्रदीप को दी. वह भागते हुए आया. शहर के एक निजी अस्पताल में भरती कराया. जांच में पता चला कि उन के हृदय के तीनों वाल्व जाम हैं. लादफांद कर उन्हें दिल्ली ले जाया गया. वहां उन की बाईपास सर्जरी हुई, तब कहीं जा कर उन की जान बची.

डाक्टर ने उन्हें डिस्चार्ज करने के साथ चेतावनी दी कि इन की नियमित देखभाल की जाए. और बीचबीच में दिखाने के लिए दिल्ली लाया जाए. अब सवाल उठा कि यह जिम्मेदारी कौन लेगा. प्रदीप को मौका मिला, उस ने इसी बहाने मोना को परखा. उर्मिला चाची के सामने ही मोना से पूछा, ‘‘मोना, तुम्हे मां के साथ कम से कम एक साल तक नियमित रहना होगा. उन की समयसमय पर देखभाल करनी होगी. क्या इस के लिए तुम तैयार हो?’’ मोना ने ऐंठ कर जवाब दिया, ‘‘आप क्या करेंगे?’’

‘‘मुझे जो करना था, वह कर दिया. मम्मी को तुम बहनों से ज्यादा लगाव है. इसलिए पूछ रहा हूं. क्या उन की जिम्मेदारी लोगी?’’ मोना जवाब से कन्नी काटने लगी.

उर्मिला चाची समझ गईं कि उन की बेटियों का असली चेहरा क्या है. उन्होंने ही हस्तक्षेप किया, ‘‘चाहे जैसा भी हो, बुरे समय में मेरे बेटेबहू ही काम आए, इसलिए अब मैं उन्हें छोड़ कर कहीं जाने वाली नहीं.’’

मोना का मुंह बन गया. उस के बाद वह जो अपनी ससुराल आईर् तो एक बार फोन कर के भी उर्मिला चाची का हाल नहीं पूछा.

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