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China : उइगर मुसलमानों पर चीन का जुल्म – कितना सच कितना झूठ

China : चीन के शिनजियांग इलाके में बसने वाले उइगर मुसलमानों को ले कर बहुत सी खबरें पढ़ने को मिलती हैं. इस मामले में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन की बहुत आलोचना होती है. कहा जाता है कि चीन की सरकार ने बड़े स्तर पर उइगर मुसलमानों का नरसंहार किया, उन्हें बेवजह जेलों में ठूंसा. इन बातों में कितना सच है और कितना प्रोपगंडा, जानें आप भी.

चाइना यानी चीन घोषिततौर पर एक नास्तिक देश है. धर्म या ईश्वर की किसी फिलौसफी को चीन की सरकार नहीं मानती. चीन की कम्युनिस्ट पार्टी यह तय करती है कि उस की पार्टी का प्राथमिक सदस्य भी नास्तिक हो. चीन की एक बड़ी आबादी बुद्धिस्ट है. इस के बावजूद चीन की सरकार बुद्धिज्म के खिलाफ भी मोरचा खोले हुए नजर आती है. चीन ने पिछले कुछ दशकों में बड़ी संख्या में बुद्धिस्ट गुरुओं को जेलों में ठूंसा, बौद्धमठों को ध्वस्त किया और आसपास के बौद्ध देशों से आने वाले भिक्षुओं पर प्रतिबंध लगाया है. बहुसंख्यक आबादी बुद्धिस्ट होने के बावजूद चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने धर्म को राजनीति का हथियार नहीं बनने दिया बल्कि हर वह कोशिश की जिस से धर्म की उद्दंडता को काबू में किया जा सके.

पिछले 10 सालों में चीन ने 80 हजार से ज्यादा बौद्धमठों को खत्म किया. 2 हजार से ज्यादा गिरजाघरों को मिट्टी में मिला दिया और तकरीबन 16 हजार मसजिदों को रातोंरात गायब कर दिया. इस से यह बात तो स्पष्ट हो जाती है कि सभी धर्मों को ले कर चीन का रवैया एक सा है. यही कारण है कि और देशों की तरह चीन की सड़कों पर धर्म का नंगा नाच नहीं होता और चीन में कभी सांप्रदायिक दंगे या बम विस्फोट की घटनाएं भी घटित नहीं होतीं.

सैक्युलरिज्म किसी भी डैमोक्रेसी की रीढ़ की हड्डी होती है लेकिन यह तभी सफल होता है जब सत्ता और धर्मों के बीच दूरी बनी रहे. धर्म और राजनीति दोनों का गठजोड़ किसी भी लोकतंत्र को तबाही की ओर ही ले जाता है. सियासत में मजहब की घुसपैठ न हो, यह डैमोक्रेसी की पहली शर्त है लेकिन इस शर्त पर दुनिया के बड़ेबड़े लोकतंत्र भी फेल होते नजर आते हैं. भारत, रूस, यूरोप और अमेरिका भी डैमोक्रेसी की इस बुनियादी शर्त पर खरे न उतर सके. वहीं चीन इस मामले में दुनिया के लिए एक मिसाल बन कर उभरा है. सैकुलरिज्म के नाम पर मजहबों को मनमानी करने की छूट देने के बुरे नतीजे आज दुनिया झेलने को मजबूर है. चीन ने धर्मों की उस भयानक उद्दंडता से तो छुटकारा पा ही लिया है.

लेकिन जैसा कि हम देखते हैं कि तिब्बत के साथ चीन का बरताव इंसानियत के खिलाफ रहा है तो भारत के साथ भी चीन ने हमेशा धोखे की नीति अपनाए रखी है. इतना ही नहीं, श्रीलंका, म्यांमार, ताइवान या दूसरे पड़ोसी देशों के साथ भी चीन का षड्यंत्रपूर्ण व्यवहार रहा है. इन सब के अलावा और भी कई ऐसे कारण हैं जिन की वजह से चीन की जम कर आलोचना होनी चाहिए लेकिन धर्मों की उद्दंडता को काबू में रखने की चीन की काबिलीयत पर तो उस की तारीफ होनी ही चाहिए.

उइगर मुसलमानों की पृष्ठभूमि

कौन हैं उइगर मुसलमान? चीन उन पर जुल्म क्यों ढा रहा है? इसे समझने के लिए पहले उइगर मुसलमानों की पृष्ठभूमि को सम झना जरूरी है. तुर्कमेनिस्तान, उजबेकिस्तान, काजाखस्तान, किर्गिजिस्तान, तजाकिस्तान और चीन का शिनजियांग. यह पूरा इलाका कभी तुर्किस्तान के नाम से जाना जाता था. उइगर इसी तुर्किस्तान के मूल निवासी हैं और आज भी इस पूरे इलाके में फैले हुए हैं.

1912 में चीन की राजशाही खत्म हुई और यह एक लोकतांत्रिक देश बना लेकिन कई ऐसे कबीले थे जिन्हें यह बदलाव पसंद नहीं आया और वे चीन की इस लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ खड़े हो गए. इन में उइगर भी शामिल थे. उइगरों ने चीनी शासन के खिलाफ कई विद्रोह किए जिन में सब से बड़ा विद्रोह था 1931 का कुमुल विद्रोह.

उइगरों का यह रिवोल्ट सफल रहा जिस के कारण 1932 में फर्स्ट ईस्ट तुर्किस्तान रिपब्लिक की स्थापना हुई. इसे इसलामिक रिपब्लिक औफ तुर्की भी कहा गया. उइगर मुसलमानों ने इस इलाके में रहने वाले दूसरे कबीलों उज्बेक, कजाख और किर्गिज को साथ मिला कर 12 नवंबर, 1933 को अपने अलग देश की घोषणा कर दी लेकिन यह नया देश ज्यादा समय तक टिक नहीं पाया और इस के ज्यादातर इलाकों पर चीन का कब्जा हो गया.

अप्रैल 1937 में ईस्ट तुर्किस्तान रिपब्लिक को फिर से स्थापित करने के नाम पर उइगर एकजुट हुए और उइगरों ने कई दूसरे कबीलों के साथ मिल कर विद्रोह कर दिया. इसे ‘इली विद्रोह’ के रूप में जाना जाता है. इली विद्रोह के कारण 12 नवंबर, 1944 को ‘सैकंड ईस्ट तुर्किस्तान रिपब्लिक’ की स्थापना हुई लेकिन यह देश अपना वजूद बनाए रखने में दूसरी बार भी नाकामयाब हो गया.

‘सैकंड ईस्ट तुर्किस्तान रिपब्लिक’ बनने के सिर्फ 5 साल के अंदर ही 13 अक्तूबर, 1949 को पीपल्स लिबरेशन आर्मी ने इस नए देश पर कब्जा कर लिया और 22 दिसंबर, 1949 को ‘सैकंड ईस्ट तुर्किस्तान रिपब्लिक’ का वजूद हमेशा के लिए धरती के नकशे से मिट गया.

माओत्से तुंग ने 1 अक्तूबर, 1949 को पीपल्स रिपब्लिक औफ चाइना की स्थापना की. उन्होंने ‘सैकंड ईस्ट तुर्किस्तान रिपब्लिक’ को चीन का हिस्सा घोषित कर इसे इली कजाख प्रांत बना दिया. जल्द ही तुर्किस्तान रिपब्लिक का समर्थन करने वाले लोगों का सफाया कर दिया गया और इलाके का नाम बदल कर ‘शिनजियांग’ कर दिया गया.

उइगर मुसलमानों से चीन की क्या दुश्मनी है

उइगर मुसलमानों को ले कर चीन हमेशा विवादों में क्यों रहता है? क्या सच में चीन उइगर मुसलमानों के साथ ज्यादती कर रहा है? आइए इस विषय पर भी थोड़ी पड़ताल कर लेते हैं.

1949 से ले कर 2009 के बीच उइगर मुसलमानों के कई छोटेबड़े आंदोलन हुए. चीन से आजाद हो कर तुर्किस्तान रिपब्लिक बनाने के नाम पर कई उइगर नेता उभरे लेकिन वे नेतागीरी से ज्यादा कुछ न कर सके. 2009 में रेबिया कदिर नाम के एक अलगाववादी नेता ने भी ऐसा ही एक आंदोलन खड़ा कर दिया.

इस आंदोलन के दौरान लोग बड़ी तादाद में सड़कों पर उतर गए लेकिन चीन की सरकार ने बड़ी आसानी से इस आंदोलन को भी शांत कर दिया और रेबिया कदिर को नजरबंद कर दिया. इसी घटना के बाद चीन ने उइगर मुसलमानों को चीन के समाजवादी उसूलों के अनुसार ढालने की नीति पर काम करना शुरू कर दिया.

चीन की सरकार ने तय किया कि उइगर मुसलमानों की धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक पहचान चीन के समाजवादी ढांचे के अनुसार हो और उइगर मुसलमानों की ओर से फिर कोई धार्मिक अतिवाद न हो. चीन सरकार ने 2014 से उइगर मुसलमानों के लिए धार्मिक किताबों को घर में रखना, दाढ़ी बढ़ाना, मसजिदों की तामीर, जमात, अजान और नमाज पर रोक लगा दी और इस रोक को सख्ती से लागू भी कर दिया. नियम तोड़ने वालों को सुधारने के लिए सुधार कैंप बनाए गए जहां लोगों को हिरासत में रख कर उन्हें मजहबी कुंए से बाहर निकालने की कवायदें शुरू हो गईं.

इन सुधार कैंपों में कुछ बंदियों को चौबीसों घंटे हिरासत में रखा जाता तो कुछ को रात में घर लौटने के लिए छोड़ दिया जाता. जल्द ही उइगर मुसलमानों के साथ चीन के इस बरताव की आलोचना दुनियाभर में होने लगी.

दुनियाभर का मीडिया चीन के विरुद्ध

2017 में ह्यूमन राइट्स वाच ने एक रिपोर्ट जारी करते हुए कहा कि ‘‘चीन की सरकार झिंजियांग के डिटैंशन कैंपों में बंद लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार कर रही है. इस के बाद कई अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने उइगरों के साथ चीन के व्यवहार को मानवाधिकारों के हनन का मामला बता दिया. इतना ही नहीं, जापान और अमेरिका के मीडिया ने तो उइगर मुसलमानों के नरसंहार की खबरें भी जारी कर दीं. जवाब में चीन की सरकार ने शिनजियांग में दुनियाभर के मीडिया को चैलेंज किया कि वे आएं और आ कर खुद से उस के सुधार कैंपों का मुआयना करें. चीन के बुलावे के बावजूद तब कोई भी अंतर्राष्ट्रीय न्यूज एजेंसी शिनजियांग जाने की जहमत न उठा पाई.

अक्तूबर 2018 में कुछ सालों के सैटेलाइट डेटा की एनालिसिस के आधार पर बीबीसी ने दावा किया कि चीन में डिटैंशन कैंपों की संख्या बढ़ रही है और तेजी से बढ़ते इन शिविरों में सैकड़ों हजारों उइगरों को नजरबंद किए जाने की संभावना है. इस इमेजनरी डाटा के जारी होने के एक साल बाद 2019 में बीबीसी ने यह दावा किया कि उइगर मुसलमानों के बीच से सैकड़ों लेखकों, कलाकारों और इंटेलैक्चुअल्स को भी डिटैंशन कैंपों में रखा गया है.

2019 में न्यूयौर्क टाइम्स ने लिखा कि चीनी सरकार उइगर लोगों का डीएनए इकट्ठा कर रही है और इस बड़े प्रोजैक्ट को पूरा करने के लिए चीन की सरकार ने कई अमेरिकी कंपनियों को अप्रोच किया है. जुलाई 2019 में आस्ट्रेलिया, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, फ्रांस, जरमनी और जापान सहित दुनिया के 22 ताकतवर देशों ने उइगर मुसलमानों के खिलाफ चीन के बरताव पर चिंता जताई और चीन के इस रवैए के खिलाफ सा झा दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए.

12 जुलाई, 2019 को 50 देशों के राजदूतों ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के अध्यक्ष और संयुक्त राष्ट्र के उच्चायुक्त को एक संयुक्त पत्र जारी किया जिस में कहा गया कि चीन ने मानवाधिकारों की परवा न करते हुए तकरीबन 20 लाख लोगों को डिटैंशन कैंपों में जबरन बंद कर रखा है.

जून 2020 में जरमन मानवविज्ञानी एड्रियन जेंज ने एक रिपोर्ट जारी की जिस में उन्होंने चीन पर आरोप लगाया कि चीन उइगर महिलाओं की जबरन नसबंदी कर रहा है जिस से इस इलाके में उइगरों की जन्मदर में 60 प्रतिशत की गिरावट आ चुकी है. एड्रियन जेंज ने शिनजियांग में मुसलमानों की जन्मदर में हुई गिरावट को चीन द्वारा किया गया उइगरों का नरसंहार घोषित कर दिया लेकिन एड्रियन जेन्ज की इस रिपोर्ट को इसलामिक देश पाकिस्तान के प्रतिष्ठित अखबार ‘औब्जर्वर’ ने गलत बताया. औब्जर्वर की रिसर्च एड्रियन जेन्ज के आरोपों से बिलकुल उलट थी. ‘औब्जर्वर’ के अनुसार शिनजियांग में उइगर मुसलमानों की जन्मदर पहले के मुकाबले बढ़ी थी.

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चीन के खिलाफ लगातार हो रहे इस दुष्प्रचार में अमेरिका और जापान ने सब से बढ़चढ़ कर भूमिका निभाई. नतीजतन, 13 जुलाई, 2020 को चीन ने शिनजियांग में अमेरिका और जापान के नेताओं के आने पर रोक लगा दी.

जनवरी 2021 में ब्रिटिश विदेश सचिव डोमिनिक रैब ने कहा कि उइगरों के साथ चीन यातना की सीमाओं को पार कर चुका है. उन के इस बयान के बाद अमेरिकी सरकार ने उइगरों के साथ चीन के बरताव को नरसंहार घोषित कर दिया.

अगस्त 2022 में जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि शिनजियांग में उइगर मुसलमानों को चीन की सरकार द्वारा जबरन नजरबंद रखना मानवता के खिलाफ जघन्य अपराध है. चीन ने इस रिपोर्ट को ‘चीन विरोधी तत्त्वों का कृत्य’ करार दिया और कहा कि यह गलत जानकारी व झूठ पर आधारित है, जिस का उद्देश्य चीन की छवि धूमिल करना है.

मुसलिम देशों का रवैया

पिछले 20 सालों के दौरान हजारों की तादाद में उइगर मुसलमान चीन से भाग कर मुसलिम देशों में पलायन कर गए. उन्हें यकीन था कि मुसलिम होने के कारण उन्हें मुसलिम देशों में शरण मिल जाएगी लेकिन संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, दुबई और मिस्र जैसे मुसलिम देशों ने उइगर मुसलमानों को वापस चीन भेज दिया. इतना ही नहीं, जब अमेरिका और अमेरिका के पिट्ठू देश उइगरों के साथ चीन के बरताव को ‘नरसंहार’ कह रहे थे तब ज्यादातर अरब देश चीन का समर्थन कर रहे थे.

अक्तूबर 2020 में अमेरिका के नेतृत्व में 39 देशों ने चीन की नीतियों को मानवता के खिलाफ एक जघन्यतम अपराध घोषित किया. इस के तुरंत बाद ही 54 देशों ने इस मामले में चीन का समर्थन किया. हैरानी की बात है कि उइगर के मामले में चीन का समर्थन करने वालों में ज्यादातर मुसलिम देश थे.

उइगर मुसलमानों के खिलाफ चीन के बरताव पर अमेरिकी मीडिया दुनियाभर में भ्रम पैदा करता रहा जिस का नतीजा भी दिखाई देने लगा. दुनियाभर में चीन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन होने लगे. मुसलिम ही नहीं बल्कि दूसरे समुदाय के लोग भी बड़ी तादाद में चीन के खिलाफ इस प्रोटैस्ट में शामिल हुए लेकिन मुसलमानों के सब से बड़े संगठन ‘और्गेनाइजेशन औफ इसलामिक कोऔपरेशन’ ने उइगर मुसलमानों के साथ चीन के बरताव को सही ठहराया और चीन के इस काम की तारीफ भी की.

सऊदी अरब ने भी इस मामले में चीन की सरकार का समर्थन किया. इतना ही नहीं, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोगन ने चीन का समर्थन करते हुए कहा कि ‘‘अपनी शिनजियांग यात्रा के दौरान मैं ने खुद देखा कि चीन की सरकार सभी जातीय समुदाय के विकास और समृद्धि के लिए बहुत बेहतर काम कर रही है.’’

धर्म की उद्दंडता पर रोक क्यों जरूरी

धर्म व्यक्ति के विश्वास तक ही सीमित रहे तो यह समाज और राष्ट्र के लिए नुकसानदेह नहीं होता लेकिन जब मजहब, समाज पर हावी हो जाता है तब यह उद्दंड हो कर समाज की गति को रोक देता है. समाज भीड़ में बदल जाता है और लोकतंत्र भीड़तंत्र बन जाता है. समाज के भीड़ बनते ही धर्म तांडव करने लगता है. इस तरह न डैमोक्रेसी जिंदा रहती है न समाज.

चीन की सरकार इस बात को बखूबी सम झती है, इसलिए वह जहालत के कुंए में फंसे मेढकों को सभ्य समाज का हिस्सा बनाने का प्रयास करती है. सो, इस में गलत क्या है?

चीन में इसलाम कैसा होना चाहिए, चीन के राष्ट्रपति के हाल ही में दिए एक बयान से आप इस बात को बखूबी सम झ सकते हैं. अगस्त 2022 में शिनजियांग की यात्रा पर गए चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा, ‘‘इसलाम को चीन के अनुकूल बनना चाहिए और समाजवादी ढांचे को अपनाना चाहिए और इस समाज को चीन के दूसरे समाजों के साथ भी अपने भरोसे को बढ़ाने के लिए काम करना चाहिए.’’

जरूरी नहीं कि मीडिया द्वारा परोसी गई हर बात झूठी हो लेकिन आज के दौर में मीडिया की खबरों में षड्यंत्र न हो, यह भी शायद मुमकिन नहीं. धर्म और सत्ता के गठजोड़ में मीडिया कठपुतली बन चुका है. पूरी दुनिया में मीडिया ने लगातार अपनी साख खोई है. इसलिए मीडिया द्वारा परोसी गई हर बात को सही मान लेना यह हमारी भूल ही साबित होती है.

World War : मजहबों ने अपनों या पड़ोसियों से लड़वाया ही

World War : भारत और पाकिस्तान के बीच कई युद्ध हो चुके हैं. इजराइल और फिलिस्तीन पिछले 80 सालों से लड़ रहे हैं. इतिहास में कभी शांति कायम नहीं हुई और

आज भी दुनिया मिसाइलों व परमाणुओं के ढेर पर बैठी है. यूक्रेन व रूस के बीच युद्ध चल रहा है तो वहीं इजराइल और ईरान के मध्य भी युद्ध हुआ. युद्धों की यह मानसिकता कहां से आती है? युद्धोन्माद की प्रवृत्ति को कैसे रोका जा सकता है? आज दुनियाभर में जारी युद्धों के पीछे राजनीति है या धर्म? इन्हीं सवालों पर पेश है यह पड़ताल.

इजराइल और ईरान के बीच फिलहाल युद्धविराम हो गया है लेकिन दोनों के मध्य शीतयुद्ध तो जारी रहेगा ही. इजराइल और ईरान के बीच की जंग में धर्म की भूमिका महत्त्वपूर्ण है. यह कहा जाए कि दोनों देशों के विवाद में धर्म प्रमुख कारण है तो इस में अतिशयोक्ति न होगी. पूरी दुनिया के मुसलिम देश इजराइल से नफरत करते हैं और इजराइल भी तमाम मुसलिम देशों को अपना दुश्मन मानता है. हालांकि सऊदी अरब और जौर्डन जैसे इसलामिक देशों के साथ इजराइल के रिश्ते अच्छे हैं. इस नफरत के पीछे कई ऐतिहासिक कारण भी हैं लेकिन दोनों ओर की इस नफरत में सब से बड़ा कारण धर्म ही है.

इजराइल यहूदी धर्म के नाम पर बना है और इस धर्म के मूल में ही विधर्मियों से नफरत के एलिमैंट्स मौजूद हैं. यहूदियों के पवित्र ग्रंथ के अनुसार, ‘जब तेरा परमेश्वर विधर्मियों पर जीत हासिल करा दे तो दुश्मन कबीले के सब पुरुषों को मार डालना और स्त्रियां, बच्चे व पशुओं को लूट लेना.’ -व्यवस्थाविवरण 20:10-14.

यहूदियों का धर्म विधर्मियों की हत्याओं को जायज मानता है. वह दुश्मन को बर्बरतापूर्ण तरीके से मारने को ईश्वर का आदेश समझता है. यही कारण है कि इजराइल ने महज डेढ़ साल में गाजा शहर को तबाह कर दिया. 55 हजार से ज्यादा लोगों की नृशंस हत्याएं कर डालीं. इजराइल की ओर से गाजा शहर के हौस्पिटल, स्कूल और लोगों के सिर छिपाने के ठिकानों पर लगातार बमबारी की जा रही है.

यह नफरत दोनों ओर बराबर है और इस नफरत के पीछे दोनों ओर धर्म ही जिम्मेदार हैं. इजराइल के प्रति इसलामिक देशों की नफरत के पीछे कई राजनीतिक और ऐतिहासिक कारण हो सकते हैं लेकिन इन कारणों के पीछे भी धर्म की ही भूमिका है.

  • कुरान के अनुसार, तुम पाओगे कि सभी मनुष्यों में यहूदी, मुसलमानों के सब से बड़े विरोधी हैं. -(5:82)
  • यहूदी बुरे होते हैं. -(2:113)
  • यहूदी झूठे होते हैं. : (2:140, 3:67)
  • यहूदियों पर अल्लाह का अपमान करने का आरोप :(3:181)
  • यहूदियों पर दूसरों को अल्लाह का अनुसरण करने से रोकने का आरोप :
    (4:160)
  • अल्लाह मुसलमानों से कहता है कि वे यहूदियों को अपना मित्र न बनाएं :
    (5:51)
  • यहूदियों पर झूठ बोलने और सच्चाई छिपाने का आरोप :(3:71)
  • यहूदियों और ईसाइयों को अपना नियम/संरक्षक मत बनाओ क्योंकि वे तुम्हारे धर्म का मजाक उड़ाते हैं :(5:57)

कुरान में लिखी यहूदी विरोधी इन आयतों के रहते कट्टर मुसलिम देश कभी भी इजराइल के साथ शांति और सहअस्तित्व कायम नहीं कर सकते. यहूदियों के खिलाफ नफरत इसलाम के मूल में ही मौजूद है, इसलिए जब तक दोनों ओर धर्म की घृणास्पद मानसिकता कायम रहेगी, यह लड़ाई कभी खत्म नहीं हो सकती.

धर्म की दीवारें

भारत और पाकिस्तान के बीच की दुश्मनी के मूल में धर्म ही है क्योंकि पाकिस्तान का जन्म ही धर्म के कारण हुआ था. जमीन के बंटवारे के बीच हिंदू और मुसलमानों का भी बंटवारा हुआ और इंसानियत के इस बंटवारे के वक्त बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई जिस में अनुमानतया 40 लाख लोग मारे गए. धर्म के इस बंटवारे में जो लोग मारे गए उन की कहानियां खत्म हो गईं लेकिन दोनों देशों के बीच जमीन का जो बंटवारा हुआ वह ऐसा नासूर बन गया जिस के घाव आज तक नहीं भर पाए.

पाकिस्तान और भारत दोनों कश्मीर पर दावा करते हैं, जिस के कारण 1947-48, 1965, और 1999 (कारगिल युद्ध) में युद्ध हुए. दो माह पहले ही पाकिस्तान समर्थित आतंकियों ने पहलगाम में लोगों को धर्म पूछ कर निशाना बनाया जिस में 26 लोग मारे गए. इस जघन्यतम आतंकी हमले के बाद भारत की ओर से ‘औपरेशन सिंदूर’ के तहत पाकिस्तान में स्थित कई आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया.

पाकिस्तान अपनी सीमाओं के भीतर आतंकवादी गतिविधियों को सपोर्ट करता है. ये इसलामिक आतंकी संगठन भारत के खिलाफ षड्यंत्र करते हैं और कई बार ये अपने खतरनाक मंसूबों में कामयाब भी होते हैं. पाकिस्तान की इन तमाम हरकतों के पीछे धर्म ही जिम्मेदार है. धर्म न होता तो धर्म के नाम पर बंटवारा भी न होता.

दोनों देशों में भयंकर गरीबी है लेकिन दोनों देश अपनीअपनी सेनाओं को समृद्ध बनाने के लिए सेना के नाम पर बेतहाशा खर्च करते हैं. भारत का वार्षिक सैन्य खर्च 2025-26 के केंद्रीय बजट के अनुसार लगभग 6.22 लाख करोड़ रुपए है. यह राशि रक्षा मंत्रालय के लिए आवंटित बजट का हिस्सा है. स्टौकहोम इंटरनैशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट के 2024 के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में भारत का सैन्य खर्च लगभग 7.19 लाख करोड़ रुपए था.

पाकिस्तान का सालाना सैन्य खर्च वित्त वर्ष 2025-26 के लिए लगभग 2.5 ट्रिलियन पाकिस्तानी रुपए (लगभग 9.04 अरब अमेरिकी डौलर) है. यह पिछले वित्त वर्ष (2024-25) के 2,122 अरब रुपए की तुलना में 18 फीसदी अधिक है. स्टौकहोम इंटरनैशनल पीस रिसर्च इंस्टिट्यूट की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान का सैन्य खर्च लगभग 85,170 करोड़ रुपए था.

दोनों देशों में भयंकर गरीबी है. रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मामलों में दोनों देश दुनियाभर में फिसड्डी साबित हो रहे हैं. दोनों देशों पर खरबों रुपए का विदेशी कर्ज चढ़ा हुआ है. ऐसे में एकदूसरे को तबाह करने के नाम पर भारीभरकम सैन्य खर्च का क्या औचित्य है?

पिछले 78 सालों से एकदूसरे से लड़ने का नतीजा क्या हुआ? दोनों देशों को हथियार बेचबेच कर दूसरे देश मालामाल हो गए लेकिन इस नफरत से भारत और पाकिस्तान को हासिल क्या हुआ? दोनों देश अपने भारीभरकम रक्षा बजट से अपनेअपने देश की गरीबी दूर कर सकते हैं लेकिन दोनों देशों में नफरतों के नाम पर राजनीति होती है और इस राजनीति से धर्म को पोषण मिलता है. धर्म और राजनीति के गठजोड़ से आम आदमी को भ्रमित रखना आसान हो जाता है. असली मुद्दे हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं और नकली मुद्दों पर बेतहाशा रक्त व पैसा बहाया जाता है. दोनों देशों के बीच धर्म की सरहदें न होतीं तो दोनों ही देश विकसित देशों की श्रेणी में पहुंच चुके होते.

विश्व युद्धों में धर्म

प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) राजनीतिक, आर्थिक और साम्राज्यवादी कारणों से लड़ा गया था लेकिन इस युद्ध में धर्म ने महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की. अगर प्रथम विश्व युद्ध में राजनीति के साथ धर्म का घालमेल न हुआ होता तो शायद इतनी बड़ी तबाही न हुई होती.

ब्रिटेन और जरमनी जैसे देशों में युद्ध के लिए लोगों को तैयार करने हेतु ईसाई धर्म का इस्तेमाल किया गया. युद्ध को ‘न्यायपूर्ण’ या ‘पवित्र’ साबित किया जा सके, इस के लिए पादरियों ने जम कर मेहनत की. अलगअलग देशों के धर्मगुरुओं, पादरियों ने अपने स्वार्थों की खातिर इस नाजायज युद्ध को ‘ईश्वर की इच्छा’ या ‘बुराई के खिलाफ लड़ाई’ के रूप में पेश किया. जरमनी में ‘गोट मिट उनस’ यानी ‘ईश्वर हमारे साथ है’ का नारा प्रचारित किया गया.

ओटोमन साम्राज्य ने इस युद्ध में मुसलमानों को शामिल होने के लिए इसे ‘जिहाद’ घोषित कर दिया. ईसाई देशों में पादरी काम पर लगे थे तो ओटोमन साम्राज्य में मुल्लाओं को ‘जिहाद’ के नाम पर लोगों को सेना में शामिल होने लिए उकसाने के काम पर लगाया गया. धर्म के नाम पर बड़ी तादाद में नौसिखिए नौजवान फौज में शामिल हुए और उन्होंने खुशीखुशी अपनी जान गंवा दी. धर्म के लिए जान देने की प्रवृत्ति के कारण ही प्रथम युद्ध में लगभग 1.6 करोड़ लोग मारे गए. अगर प्रथम विश्व युद्ध में धर्म शामिल न हुआ होता तो मरने वाले लोग बस कुछ लाख तक ही सीमित रहते.

प्रथम विश्व युद्ध में भले ही धर्म सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं था लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत ही धर्म आधारित नफरत से हुई. नाजी जरमनी की ईसाई समर्थित विचारधारा यहूदियों के खिलाफ थी. यहूदियों के खिलाफ इस नफरत को हिटलर ने बढ़ावा दिया. हिटलर की इस मानसिकता में जरमनी के चर्चों और पादरियों का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा. पादरियों ने लोगों को भड़काया कि यहूदी जीसस के हत्यारे हैं.

इस तरह आम ईसाई भी यहूदियों से नफरत करने लगा. इस से हिटलर की फासीवादी सोच को ताकत मिली और उस ने होलोकास्ट के नाम पर लाखों यहूदियों का नरसंहार किया. नाजियों ने ईसाई धर्म को यहूदियों के खिलाफ नैरेटिव गढ़ने में इस्तेमाल किया. जरमन ईसाई चर्चों ने नाजी शासन को ईश्वर का शासन घोषित कर दिया. जरमनी के चर्चों में हिटलर के लिए प्रार्थनाएं होने लगीं. चर्च नाजीवाद का गुणगान करने लगे. हिटलर की चापलूसी में पादरियों ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया. इस तरह ईसाई धर्मगुरुओं ने हिटलर की तानाशाही और उस के कुकर्मों को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी.

द्वितीय विश्व युद्ध में पोप पायस Xll का हिटलर के द्वारा यहूदियों के खिलाफ किए गए होलोकास्ट को मौन समर्थन हासिल था. पोप ने जरमनी के चर्चों को होलोकास्ट के लिए उकसाने से रोका नहीं बल्कि कई मामलों में गुप्त रूप से जरमनी की मदद की. जापान में शिंटो धर्म का इस्तेमाल कर लोगों को युद्ध में मरने के लिए प्रेरित किया गया.

युद्ध और हिंसा की मानसिकता

सभी धर्मों में युद्ध और हिंसा की मानसिकता भरी पड़ी है. पुरोहितों ने अपने धर्म की घेराबंदी के लिए घृणा का इस्तेमाल किया ताकि बाहरी लोगों से धर्म की रक्षा की जा सके. हर धर्म का पुरोहित अपने धर्म को मानने वालों को मानसिक तौर पर दिवालिया बना कर छोड़ता है ताकि बौद्धिक तौर पर दिवालिया लोग धर्म के मामले में सवाल न कर सकें लेकिन विधर्मी, नास्तिक और काफिर जैसे बाहरी लोगों से पुरोहितों को हमेशा डर बना रहता है. इन से धर्म के धंधे को खतरा बना रहता है, इसलिए बाहरी लोगों से घृणा सभी धर्मों के मूल में मौजूद है. धर्मों की इसी नफरत के कारण ही भीषण युद्ध की विभीषिकाएं पैदा होती हैं. कभी क्रूसेड के नाम पर तो कहीं जिहाद और धर्मयुद्ध के नाम पर युद्ध होते आए हैं. इन युद्धों को खत्म करने का कोई उपाय धर्म के पास नहीं है बल्कि कई युद्धों में तो धर्म ने आग में घी का काम किया है.

इसलाम और ईसाइयत का इतिहास लाल रंग से पुता हुआ है तो हिंदू धर्म भी इस कत्लेआम से अछूता नहीं है. भगवान कृष्ण के हाथों खंडवा वन के बाशिंदों को जिंदा जलाया जाता है. इसी भगवान के हाथों एक महिला पूतना की हत्या कर दी जाती है. भगवान राम द्वारा एक महिला ताड़का और उस के बेटे की नृशंस हत्या कर दी जाती है. एक महिला शूर्पणखा के नाक और कान काट कर उसे कुरूप बना दिया जाता है. रात के अंधेरे में एक नगर को जला दिया जाता है. एक भाई को अपने साथ मिला कर धोखे से उस के बड़े भाई बाली की हत्या कर दी जाती है. विभीषण को अपने साथ मिला कर उस के पूरे परिवार का विनाश कर दिया जाता है और शंबूक की हत्या कर दी जाती है.

धर्म के नाम पर नरसंहार और हैवानियत की ये कहानियां आस्थाओं के मखमली परदे से ढक दी गई हैं, इसलिए इन हत्याओं को हम हत्या मानते ही नहीं.

नबियों और अवतारों के महान कुकर्मों को आदर्शवाद के खूबसूरत तिलिस्म के पीछे छिपा दिया जाता है. युद्ध में हारे हुए लोग धर्मविरोधी साबित कर दिए जाते हैं और जीतने वाले हमारे अंत:करण में आदर्श पुरुष के रूप में स्थापित कर दिए जाते हैं. जीतने वालों के पक्ष में बड़ेबड़े ग्रंथ लिखे जाते हैं और हारने वाले लोग इन ग्रंथों में सदा के लिए विलेन के रूप में तिरस्कृत हो कर रह जाते हैं.

युद्धोन्माद की प्रवृत्ति

युद्धों की विभीषिका को खत्म करना फिलहाल नामुमकिन है. संसाधनों की लूट, ताकत का दंभ और दूसरे को नीच समझने की मानसिकता जब तक कायम रहेगी, युद्ध होते रहेंगे. अगर युद्ध की विभीषिकाओं को खत्म करना है तो धर्म के विद्रूपों और उस की प्रासंगिकताओं पर विमर्श जरूरी है, साथ ही, भौगोलिक कारणों से उत्पन्न विवादों को खत्म करना भी उतना ही आवश्यक है. विज्ञान, तकनीक और मानवता के साझा प्रयासों से दुनिया की गरीबी, बेरोजगारी, असमानता और अन्याय को कम करना होगा.

इस के साथ ही दुनिया की विभिन्न संस्कृतियों और समुदायों के बीच समझ और सम्मान को बढ़ावा देना होगा. इस के लिए दुनियाभर की जनता को जागरूक हो कर अपने देश में मानवता और लोकतांत्रिक मूल्यों का सम्मान करने वाले लोगों को चुनना होगा.

धार्मिक और पोंगापंथी लोग जनता को धर्म के नाम पर बरगला कर सत्ता पर काबिज हो जाते हैं और फिर वे जनता को बुनियादी मुद्दों से भटका कर उन्माद की ओर ले जाते हैं. कट्टरपंथी लोगों को राजनीति से दूर रखना जनता की जिम्मेदारी है.

समझदार और डैमोक्रेटिक लोग सत्ता में आएंगे तो वे व्यापार, निवेश और साझा आर्थिक हितों को ध्यान में रख कर ही काम करेंगे, आपसी कटुता छोड़ कर सहयोग की नीति अपनाएंगे जिस से दुनिया में युद्ध की विभीषिकाएं दम तोड़ देंगी.

Iran-Israel War : धर्म के बहाने हिंसक होता इंसान

Iran-Israel War : इजराइल व ईरान के बीच फिलहाल युद्धविराम हो गया है मगर कब तक यह विराम रहेगा, कहा नहीं जा सकता क्योंकि इस की मूल वजह सदियों से चले आ रहे धार्मिक विवाद हैं जो सुलझाए नहीं सुलझ रहे. युद्ध की आग सुलगाने और बुझाने में डोनाल्ड ट्रंप की भूमिका रही है. उन्होंने उन आशंकाओं को हवा दी जो दुनिया को एक और विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर सकती थीं.

इजराइल व ईरान के बीच चली जंग में जिस बात की आशंका थी, वह सच हो गई है. कहने को दोनों देशों के बीच सीजफायर हो गया है मगर इस युद्ध ने पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया. दुनिया का बाप बन कर सब के फैसले कराने की झक पालने वाला अमेरिका आखिर दो बिल्लियों की लड़ाई में कूद ही पड़ा. ईरान के 3 परमाणु केंद्रों- फोर्डो, नतांज और इस्फहान पर हमला कर उस ने इस बात का ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया कि उस ने ईरान को बड़ा नुकसान पहुंचाया है, मगर उस के इस कदम ने पूरी दुनिया के लिए मुसीबत खड़ी कर दी है, यह उसे नजर नहीं आ रहा. क्या ईरान इतना कमजोर है कि वह अमेरिकी हमले से डर कर चुप हो जाए. नहीं. कतर में अमेरिकी एयरबेस को तबाह कर उस ने जवाब दे दिया. ईरान ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि उस के न्यूक्लियर प्रोग्राम पर हमला हुआ तो वह अमेरिका के रीजन टारगेट्स को निशाना बनाएगा और उस ने यह कर दिखाया भी.

इस हमले के बाद अमेरिका में ट्रंप के खिलाफ ही आवाज बुलंद होने लगी है. ट्रंप को भी शायद इस बात का एहसास हो गया कि ईरान को कमतर समझ कर गलती हो गई है. लिहाजा, अब उन्होंने दबाव डाला और ईरान व इजराइल को सीजफायर करने के लिए मनवाया. हालांकि, यह सीजफायर कमजोर लग रहा है. ईरान-इजरायल युद्ध में अपनी टांग फंसा कर और अब वापस खींच कर ट्रंप दोनों देशों के बीच शांति बहाली कर पाएंगे, उन का ऐसा सोचना हास्यास्पद है.

दरअसल वे ऐसा सोच नहीं रहे, वे तो अपने ही देश में अपने खिलाफ उठ खड़ी हुई आवाजों से डर गए हैं और उन्हें डर है कि अगर ईरान पर बमबारी के बाद अमेरिका में कोई आतंकी हमला हुआ तो उन का राजनीतिक कैरियर रसातल में चला जाएगा. ईरान व इजराइल तो लड़ते ही रहेंगे क्योंकि उन की लड़ाई धर्म द्वारा पैदा की गई नफरत और जमीन कब्जाने की है जो कभी थमेगी, कभी चालू हो जाएगी.

पुराना है संघर्ष

इजराइल का ईरान और फिलिस्तीन से संघर्ष कोई नया नहीं है, परंतु हाल के वर्षों में यह टकराव बहुत गंभीर हो गया है. यह लगातार जटिल, खतरनाक और वैश्विक रूप से प्रभावशाली होता जा रहा है. बीते कई दशकों से इजराइल खुद को एक यहूदी राष्ट्र के रूप में मजबूत करना चाहता है. वह लगातार अपनी जमीन, अपनी शक्ति और अपनी जनसंख्या बढ़ाने की कोशिश में है और इसीलिए उस ने फिलिस्तीनियों को उन की जमीन से खदेड़ कर, उन की औरतों-बच्चों को बमों व गोलियों से उड़ा कर अपना दायरा बढ़ाने में जुटा है.

बीते ढाई सालों से वह हमास को खत्म करने का बहाना ले कर गाजा पट्टी पर बम बरसा रहा है. जिस में आम फिलिस्तीनी नागरिक मारे जा रहे हैं. इजराइल-फिलिस्तीन युद्ध में मौतों का अनुपात भयावह है.

एसीएलईडी (सशस्त्र संघर्ष स्थान और घटना डेटा) के अनुसार, 7 अक्तूबर, 2023 से अब तक फिलिस्तीन पर इजरायली हमलों में 57,000 से अधिक फिलिस्तीनी नागरिक मारे जा चुके हैं, जिन में बूढ़ों, बच्चों, महिलाओं और युवाओं के साथ ही 180 पत्रकार और मीडियाकर्मी, 120 शिक्षाविद और 224 से अधिक मानवीय सहायता कार्यकर्ता हलाक हुए हैं जबकि हमास के हमलों में कोई 1,726 इजराइली नागरिक ही मारे गए हैं. यह अनुपात 33:1 का है. यानी, एक इजरायली पर 33 फिलिस्तीनी मारे गए हैं. सोशल मीडिया पर खून से लथपथ मासूम बच्चे, बच्चों की लाशों पर रोतीबिलखती मांएं, बमों से ढहती इमारतों के मलबे में दब कर दम तोड़ते आम लोग और इजराइल द्वारा किए जा रहे इस नरसंहार पर दुनिया के तमाम देशों की चुप्पी दुनिया में इंसानियत और संवेदना की मरती हुई तसवीर सामने लाती है.

यहूदी और ईसाई का टकराव

इजराइल न सिर्फ अपने देश की सीमाएं बढ़ाना चाहता है बल्कि संघर्ष की एक वजह यरूशलम पर आधिपत्य स्थापित करना भी है, क्योंकि यह यहूदी, ईसाई और इसलाम तीनों का धार्मिक स्थल है. इजराइल इसे अपनी राजधानी बनाना चाहता है. पहले यरूशलम को ले कर लड़ाई और नफरत यहूदियों और ईसाईयों के बीच थी. यहूदियों के प्रति घृणा ईसाई इतिहास में एक प्रमुख विषय रहा है. ईसाईयों ने यहूदियों को शैतान बताया क्योंकि यहूदियों के धार्मिक नेताओं और भीड़ के दबाव में ही रोमन गवर्नर पोंटियस पिलातुस ने ईसा मसीह को सलीब पर चढ़ाया था. इसलिए ईसाई यहूदियों के प्रति नफरत का भाव रखते हैं.

ईसाईयों के मन में यहूदीविरोधी भावना का एकमात्र कारण धार्मिक ही नहीं था, बल्कि यह राजनीतिक और आर्थिक कारकों से भी प्रेरित था. यहूदियों को उन के आर्थिक रूप से सफल होने के कारण ईसाई उन से ईर्ष्या करते थे. गोरी चमड़ी वाला ईसाई खुद को ऊंची नस्ल का मनुष्य मानता है. यहूदियों के प्रति ईसाइयों की नफरत का सब से बड़ा उदाहरण नाजी जरमनी में हुआ नरसंहार है.

नाजी शासन ने यहूदियों को नस्लीय रूप से हीन माना और उन्हें मारने का फैसला किया. नाजी नेता एडोल्फ हिटलर ने यहूदियों को बड़ी संख्या में गैस चैंबर में डाल कर मौत की नींद सुला दिया. नाजियों ने तकरीबन 60 लाख यहूदियों की हत्या की, जिन में 15 लाख बच्चे थे. यहूदियों को जड़ से मिटाने के अपने मकसद को हिटलर ने इतने प्रभावी ढंग से अंजाम दिया कि दुनिया की एकतिहाई यहूदी आबादी खत्म हो गई. हिटलर खुद को ऊंची नस्ल का जरमन ईसाई मानता था और उस की नजर में यहूदी इंसान कहलाने के लायक भी न थे.

तो शुरू में यहूदियों और ईसाईयों के बीच नफरत और हिंसा का दौर रहा मगर कालांतर में यह संघर्ष और नफरत खिसक कर यहूदियों और मुसलमानों के बीच पहुंच गई. आज यहूदियों की लड़ाई मुसलमानों से ज्यादा है और बीते कई दशकों से जारी इस संघर्ष व नरसंहार की जड़ में सिर्फ धर्म है जिस ने इंसान के भीतर की इंसानियत को खत्म कर दिया है.

इजराइल कब और कैसे अस्तित्व में आया

प्रथम विश्व युद्ध में ब्रिटेन ने फिलिस्तीन के नाम से जाने जाने वाले क्षेत्र पर नियंत्रण कर लिया था, जो मध्यपूर्व के उस हिस्से पर शासन करने वाले ओटोमन साम्राज्य की हार के बाद मिला था. वहां अरब बहुसंख्यक और यहूदी अल्पसंख्यक थे. अन्य जातीय समूह भी वहां रहते थे. यहूदी और अरब आबादी के बीच तनाव तब और गहरा हुआ जब ब्रिटेन ने यहूदी लोगों के लिए फिलिस्तीन में एक ‘राष्ट्रीय घर’ की स्थापना पर सिद्धांत रूप से सहमति व्यक्त की. इस घटना को ‘बाल्फोर घोषणा’ के रूप में जाना जाता है.

यहूदियों का इस भूमि से ऐतिहासिक संबंध था, लेकिन फिलिस्तीनी अरबों का भी इस पर सदियों पुराना दावा था. लिहाजा, फिलिस्तीनी अरबों ने ब्रिटेन के इस कदम का विरोध किया.

1920 और 1940 के बीच यूरोप में उत्पीड़न से बचने के लिए यहूदियों ने अपनी संख्या में वृद्धि की. होलोकास्ट के दौरान लगभग 6 मिलियन यहूदियों की हत्या ने सुरक्षित आश्रय की मांग को और तीव्रता से उठाना शुरू किया. 1947 तक यहूदियों की जनसंख्या 6,30,000 तक पहुंच गई, जो कुल जनसंख्या का लगभग 30 फीसदी थी.

1947 में, यहूदियों और अरबों के बीच बढ़ती हिंसा की पृष्ठभूमि में – और ब्रिटिश शासन के खिलाफ – संयुक्त राष्ट्र (यूएन) ने फिलिस्तीन को अलगअलग यहूदी और अरब राज्यों में विभाजित करने के लिए मतदान किया और यरूशलम को एक अंतर्राष्ट्रीय शहर बनाने की राय रखी. मगर किसी भी अरब देश ने इस का समर्थन नहीं किया. उन का तर्क था कि इस योजना से यहूदियों को ज्यादा जमीन मिलेगी, भले ही उन की आबादी कम हो.

विरोध के बावजूद फिलिस्तीन में यहूदी नेताओं ने ब्रिटिश शासन समाप्त होने से कुछ घंटे पहले इजराइल नामक एक स्वतंत्र राज्य की घोषणा कर दी. उस के अगले वर्ष संयुक्त राष्ट्र ने इजराइल को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता भी दे दी. उस समय फिलिस्तीन और ईरान सहित 13 देशों ने इस का विरोध किया था. बावजूद इस के, इजराइल के रूप में एक नए राष्ट्र की आधारशिला रखी जा चुकी थी.

14 मई, 1948 को इजराइल ने खुद को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता दी. इस से नाराज फिलिस्तीन ने अरब देशों के साथ मिल कर इजराइल पर आक्रमण कर दिया. लेकिन उसे इस युद्ध में हार का सामना करना पड़ा. हार के बाद 1949 में फिलिस्तीन 3 हिस्सों बंट गया. साथ ही, 7 लाख फिलिस्तीनी विस्थापित हुए. तब से आज तक इजराइल फिलिस्तीन से शिया मुसलमानों को मारने और खदेड़ने में लगा हुआ है, जो ईरान सहित तमाम शिया बाहुल्य देशों को नागवार गुजर रहा है.

1949 में जब युद्धविराम के साथ लड़ाई समाप्त हुई थी, तब तक अधिकांश क्षेत्र पर इजराइल का नियंत्रण हो चुका था. समझते के तहत मिस्र ने गाजा पट्टी पर, जोर्डन ने पश्चिमी तट और पूर्वी यरूशलम पर तथा इजराइल ने पश्चिमी यरूशलम पर कब्जा कर लिया था. लगभग 7,50,000 फिलिस्तीनी अपने घरों से भाग गए या उन्हें वहां से चले जाने के लिए मजबूर किया गया. जो बचे वे इजराइल की जमीन पर शरणार्थी बन गए. इस घटना को अरबी में नक्बा (विपत्ति) के नाम से जाना जाता है.

1967 का मध्यपूर्व युद्ध 6 दिवसीय युद्ध के रूप में जाना जाता है. उस ने मध्यपूर्व में सीमाओं को बदल दिया और फिलिस्तीनियों के लिए इस के बड़े परिणाम हुए. इस युद्ध में इजराइल ने मिस्र, सीरिया और जोर्डन के साथ युद्ध किया. इस की शुरुआत तब हुई जब मिस्र और सीरिया के हमले के डर से इजराइल ने मिस्र की वायुसेना पर हमला कर दिया. जब तक लड़ाई समाप्त हुई, तब तक इजराइल ने मिस्र से सिनाई प्रायद्वीप और गाजा, सीरिया से गोलान हाइट्स के अधिकांश भाग तथा जोर्डन से पूर्वी यरूशलम छीन कर पश्चिमी तट पर कब्जा कर लिया. पश्चिमी तट, गाजा और पूर्वी यरूशलम में लगभग 10 लाख फिलिस्तीनी इजराइल के नियंत्रण में आ गए.

1967 में छह दिवसीय युद्ध के दौरान इजराइली सैन्य कमांडर पूर्वी यरूशलम पहुंचे और इन क्षेत्रों पर इजराइल का कब्जा आज तक कायम है.

ईरान व इजराइल में टकराव क्यों

ईरान, जोकि इजराइल की मंशा को बखूबी समझता है, ने हमेशा इसलामवादी व शिया लेबनानी दलों को अपना समर्थन और उन्हें इजराइली व अमेरिकी लक्ष्यों पर हमला करने के लिए वैचारिक प्रशिक्षण, सैन्य प्रशिक्षण और उपकरण प्रदान किए. यही नहीं, उस ने उन्हें एक एकल राजनीतिक और सैन्य संगठन, हिजबुल्लाह में एकीकृत करने में भी मदद की. इजराइल इस वजह से भी ईरान से दुश्मनी रखने लगा. अपने मंसूबे पूरे करने की राह में इजराइल ईरान को बड़ी बाधा के रूप में देखता है.

शिया इसलामी सिद्धांतों द्वारा शासित ईरान और मुख्यतया यहूदी राज्य इजराइल, धार्मिक एवं वैचारिक मतभेदों के कारण तो दुश्मन हैं ही, इजराइल ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने लिए एक गंभीर खतरा मानता है और उसे भय है कि ईरान के परमाणु हथियारों के विकास से उस का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है. ईरान परमाणु समझते (संयुक्त व्यापक कार्ययोजना) का इजराइल कट्टर आलोचक रहा है और उस ने ईरान की परमाणु प्रगति को बाधित करने के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से कई कोशिशें की हैं.

पिछले साल के आखिर में जब इजराइल ने ईरान के सब से मजबूत सहयोगी हिजबुल्लाह को कमजोर कर दिया. उस के बाद यह साफ हो गया कि अब ईरान जल्द से जल्द परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करेगा. इस आशंका को ले कर इजराइल ईरान पर और ज्यादा आक्रामक हो गया. इजराइल और ईरान के बीच अब तक का सब से बुरा संघर्ष उस समय शुरू हुआ जब इजराइली सेना ने यह कहते हुए ईरान पर हमला बोला कि तेहरान परमाणु हथियार बनाने के बेहद करीब है. इजराइल ने इस मिशन को औपरेशन राइजिंग लौयन नाम दिया.

इजराइल ने ईरान पर कई बार हमले बोले और अब तक ईरान के 600 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हैं. खुद को दुनिया समझने का भरम पालने वाला अमेरिका भी इस युद्ध में कूद पड़ा. दरअसल ईरान व इजराइल जंग में नेतन्याहू ने बड़बोले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फंसा दिया था.

डोनाल्ड ट्रंप को यह समझ में नहीं आया कि ईरान की जंग में घुस तो गए मगर बाहर कैसे और किन हालात में निकलेंगे? इजराइल तो ईरान पर हमला कभी भी रोक सकता है लेकिन अमेरिका के सामने मजबूरी यह आ गई कि वह ईरान के परमाणु कार्यक्रम और वहां के नेतृत्व को खत्म किए बिना युद्ध खत्म नहीं कर पाएगा.

अब चूंकि ये दोनों काम नहीं हो पाए और सीजफायर की घोषणा हो गई तो समझा जा सकता है कि युद्ध के कारण खत्म नहीं हुए. युद्ध भले टला हो पर हालात नहीं टले. मगर सोचने वाली बात यह है कि यदि अमेरिका परमाणु कार्यक्रम और नेतृत्व को खत्म कर भी देता तो क्या हमेशा के लिए समस्या का अंत हो जाता, या इस से ईरान के भीतर परमाणु हथियार पाने की लालसा और बढ़ जाती? ईरान के परमाणु कार्यक्रम और वहां के नेतृत्व तक पहुंचना अमेरिका के लिए आसान नहीं. जानकारों की मानें तो ईरान ने अपने परमाणु संसाधन फार्द के जिन पहाड़ों के नीचे छिपा रखे हैं वहां अमेरिका का कोई बम मार नहीं कर सकता. यानी, अमेरिका को अपने सैनिक भी ईरान की सरजमीं पर उतारने होंगे.

जहां तक ईरान में अमेरिकी सैनिक भेजने की बात है तो यह समझ लीजिए कि ईरान का बड़ा इलाका पहाड़ों से पटा हुआ है. जहां पर जंग करना अमेरिका के लिए बहुत खूनखराबा ले कर आएगा और यह डोनाल्ड ट्रंप के उन वादों के खिलाफ होगा जो उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में किया था कि अमेरिका अब दूसरों की जंग में नहीं पड़ेगा क्योंकि अमेरिका अब अपने सैनिकों की लाशें उठाने के लिए तैयार नहीं है.

ट्रंप ने बिना सोचविचार किए ईरान पर बम वर्षा की. उस के बाद से अमेरिका के भीतर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भद्द पिटने लगी. सवाल उठे कि आखिर कोई राष्ट्रपति अपने देश की अन्य पौलिटिकल पार्टियों से रायमशवरा किए बगैर एकतरफा फैसला ले कर देश को युद्ध जैसी परिणामकारी स्थिति में कैसे झोंक सकता है?

अमेरिका के डैमोक्रेटिक पार्टी के नेता चक शूमर ने आशंका जताई थी कि अमेरिका द्वारा ईरान में 3 प्रमुख परमाणु केंद्रों पर बमबारी करने के बाद व्यापक, लंबे और अधिक विनाशकारी युद्ध का खतरा बढ़ गया है. शूमर युद्ध शक्ति अधिनियम लागू करने की बात करते हैं जिस के तहत विदेश कार्रवाई शुरू करने या इसे बढ़ाने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति की क्षमता को सीमित किया जा सकता है. जाहिर है, दूसरों के फटे में टांग अड़ाने और बातबात पर उछलने की ट्रंप की आदतों से अमेरिकी परेशान ही नहीं हो रहे बल्कि अब उन्हें ट्रंप के फैसलों से देश और देशवासियों पर गहरा खतरा मंडराता हुआ भी नजर आ रहा है.

अमेरिका की विपक्षी पार्टी का मानना है कि अमेरिका को युद्ध जैसी स्थिति में डालने की एकतरफा अनुमति राष्ट्रपति ट्रंप को नहीं दी जा सकती. ईरान के आतंक, परमाणु महत्त्वाकांक्षाओं और क्षेत्रीय आक्रामकता के क्रूर अभियान का सामना करने के लिए ताकत, संकल्प और रणनीतिक स्पष्टता की जरूरत है. ट्रंप ने संसद की अनुमति के बिना एकतरफा तौर से अमेरिकी सेना की तैनाती कर के न सिर्फ संविधान की अनदेखी की बल्कि अमेरिकी लोगों के जीवन और दुनिया के कई देशों को खतरे में डाल दिया था.

आमतौर पर अमेरिका ने अपने इतिहास में युद्ध के समय, जमीन और हालात खुद तय किए. यह पहला मौका था कि जब किसी देश ने उस को जरा सा उकसा कर जबरन युद्ध में घसीट लिया. भारत व पाकिस्तान जंग में सीजफायर करवाने की बड़ीबड़ी बातें करने वाले ट्रंप इतने उत्तेजित कैसे हो गए कि सीजफायर करवाने से पहले खुद फायर करने लगे.

डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी राष्ट्रपति बने आज ठीक 6 महीने हो गए हैं. लेकिन, इन 6 महीनों में पूरी दुनिया ने अमेरिकी राष्ट्रपति की जबरदस्त भद पिटती देखी है. पहले दौर की टैरिफ वार लगभग बेनतीजा रही. यूक्रेन व रूस युद्ध रुकवाने को ले कर ट्रंप के सारे दावे धरे रह गए. यूरोपीय यूनियन में ट्रंप की साख दो कौड़ी की हो कर रह गई. भारत व पाकिस्तान के बीच सीजफायर करवाने का जश्न ट्रंप को भारी पड़ गया और अब इजराइल व ईरान वार, जोकि ट्रंप की समझ से बाहर निकल गया, में भी बीच में पड़ कर व सीजफायर की घोषणा कर वे अपनी व अमेरिका की भद पिटवा रहे हैं.

Tourism : हाइपर लोकल ट्रेवल में लीजिए देसीपन का आनंद

Tourism : अगर आप जीवन और समाज को समझना चाहते हैं तो पर्यटन से बड़ी कोई चीज नहीं हो सकती है. अगर पर्यटन नहीं होता तो दुनिया भर के तमाम देश एक दूसरे से जुड़ ही नहीं सकते थे.

पर्यटन का अंदाज बदल रहा है. पहले जहां लोग देश विदेश में घूमने और वहां खरीददारी करने को महत्व देते थे अब हाईपर लोकल ट्रेवल को बढ़ावा मिल रहा है. पर्यटकों के बदलते मूड को देखते हुए सरकारें भी अपनी योजना में बदलाव कर रही हैं. उत्तर प्रदेश की सरकार ने ओडीओपी योजना शुरू की है. इस के तहत हर जिले के खास उत्पाद को महत्व दे रही है. जैसे आगरा मे ताज महल देखने वालों को वहां का मशहूर पेठा बेचा जा रहा है. इसी तरह से बनारस की साड़ी, भदोही का कालीन और मेरठ की नान खटाई. इस तरह से पूरे प्रदेश के जिलों मे खास चीजों को महत्व दिया जा रहा है. पर्यटकों को इस तरफ जोड़ा जा रहा है.

हाइपर लोकल ट्रैवल का मतलब है, अपने आसपास के क्षेत्र में ही यात्रा करना और आसपास की घूमने वाली अच्छी जगहों को खोजना. इस के साथ ही साथ अगर दूर के पर्यटन वाले शहरों में घूमने जाए तो वहां के लोकल बाजारों में खरीददारी करें. साधारण होटल या होम स्टे में रुकें. वही की लोकल स्वाद वाली डिश का स्वाद लें. आजकल पर्यटकों के लिए कई शहरों में एयर बीएनबी जैसी तमाम कंपनियां होम स्टे का प्लान लेकर आ गई है. जहां घर जैसी जगह पर रुका जा सकता है. अपने हाथ से किचन में खाना बना कर खा सकते हैं.

बड़े होटलों के मुकाबले होम स्टे काफी सस्ता पड़ता है. खासकर जब आप ग्रुप में घूमने जा रहे हों तो यह बेहतर होता है. होम स्टे के लिए जगह का चुनाव करते समय सर्तक रहे. सीधे बुक न करें. किसी कंपनी के जरीए बुक करने से यह सुरक्षित होता है. जैसे सफर करते समय ओला उबर से टैक्सी बुक करना सुरक्षित होता है, लेकिन जब थोड़े से लालच में पड़ कर सीधे टैक्सी ड्राइवर से बुक किया जाता है तो खतरा बढ़ जाता है.

हाइपर लोकल ट्रैवल के लाभ

हाइपर लोकल ट्रैवल में पर्यटन के जरीए उन संस्कृति, कला, भोजन और पर्यटन स्थलों को बढ़ावा दिया जाता है, जो आप के घर के करीब होते हैं. इस से स्थानीय बाजार को भी बढ़ावा मिलता है. जैसे लखनऊ घूमने वाले यहां की चिकनकारी को पंसद करते हैं. चिकन से बने पहनने के कपड़े खरीददते हैं. बड़े होटलों में रुकने के बाद भी लोकल खाना खाना पसंद करते हैं. इस से घूमने वाले को तो तरह तरह के स्वाद मिलते ही है. स्थानीय लोगों को भी रोजगार मिलता है.

कई शहर पर्यटकों के लिए स्थानीय त्योहारों, समारोहों, और रीति-रिवाजों का आयोजन करते हैं. जिस में पर्यटक हिस्सा लेते हैं. वह उसी समय घूमने जाते हैं जब ऐसे आयोजन का समय होता है. जैसे गुजरात के कच्छ में रण उत्सव का आयोजन होता है. अधिकतर पर्यटक इसी समय यहां घूमने आते हैं. इस में स्थानीय कलाकारों, शिल्पकारों और उन की कलाकृतियों को नया बाजार मिलता है. पर्यटक मेले में स्थानीय रेस्तरां, कैफे और होटलों में पारंपरिक भोजन का स्वाद लेता है. साथ आस पास के ऐतिहासिक स्थलों, पार्कों, संग्रहालयों और अन्य दर्शनीय स्थलों को घूमता है.

इस तरह का पर्यटन स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देता है. जब लोग स्थानीय व्यवसायों और पर्यटन स्थलों पर जाते हैं, तो इस से स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है. यहां की कला और संस्कृति को संरक्षण मिलता है. कम दूरी की यात्रा में पर्यटकों का खर्च कम होता है. जिस से कम बजट में पर्यटक अधिक से अधिक जगहो को घूम लेता है. असल में पर्यटन के शौकीन लोग अपना खर्च कम से करना चाहते हैं. ऐसे में मंहगे होटल में रूकने से पर्यटन का असल मजा नहीं मिलता है. जब किसी बड़े होटल में रुकते हैं तो खाने का स्वाद एक जैसा मिलता है. क्योंकि बड़े होटलों में रैसेपी एक जैसी होती है.

बाजार के बदलते दौर में अब फाइव स्टार होटलों में भी लोकल स्वाद वाले भोजन तैयार किए जाते हैं. इन में वह स्वाद नहीं मिलता जो ढाबे पर मिलता है. ढाबे और होटल के खाने के बजट में अंतर होता है. यह किसी शहर या क्षेत्र को एक नए तरीके से देखने और अनुभव करने का अवसर देता है. इस तरह का पर्यटन पूरी दुनिया में मशहूर हो रहा है.

क्या कहते हैं आंकड़े ?

2024 में बुकिंग डौट काम की रिपोर्ट में बताया गया है कि 75 फीसदी पर्यटकों ने कहा कि उन को हाइपर लोकल ट्रैवल पसंद है. इस को ‘जीवन दर्शन’ या ‘पर्यटन दर्शन’ भी कहा जाता है. अमेरिकन एक्सप्रेस की 2024 की वल्र्ड टूर रिपोर्ट में कहा गया है कि पर्यटकों को घूमने वाले शहरों में लोकल बजारों से सामान खरीदने में अच्छा लगता है. यही नहीं वह होटलों की जगह वहां रुकना पंसद करते हैं जहां पर उन को घर जैसा अनुभव हो सके. वह अपने करीबी दोस्तों के साथ वक्त गुजारना अच्छा समझते हैं. पर्यटन के प्रति बदलती सोच ने पर्यटन विभाग को उस के हिसाब से योजनाए बनाने के लिए विवश कर दिया है.

वियना टूरिस्ट बोर्ड के सीईओ नोर्बर्ट केटनर ने कहा ‘पर्यटक लोकल लाइफ स्टाइल को पंसद करने लगे हैं. ज्यादातर पर्यटक भीड़भाड़ से दूर सकून भरी जगहों को पंसद करने लगे हैं. इस कारण ही लोगों ने अपने घरों के दरवाजे पर्यटकों के लिए खोल दिए हैं. पर्यटक पुराने शहरी इलाकों की तरफ जाने लगे हैं. फोकस राइट और द आउटलुक फोर ट्रैवल एक्सपीरियंस ने यूरोप और अमेरिका में 4,000 से अधिक यात्रियों का सर्वेक्षण किया. जिस में 42 फीसदी यात्रियों का कहना था कि यात्रा करते समय बड़े पर्यटक शहरों के मुकाबले छोटे शहरों में घूमने में उनको ज्यादा अच्छा लगा.

ट्रैवल प्लानर हिना शिराज जैदी कहती है ‘घूमना लोग पंसद करने वाले लोग चाहते हैं कि उन के टूर प्लान में बड़े शहर और मौल के साथ छोटे शहर और लोकल मार्केट को भी शामिल किया जाए. पहले लोग बड़े शहरों तक सीमित रहते थे. अब छोटे शहर भी विकसित हो गए हैं. वहां भी सुरक्षा और विकास हो गया है. किसी तरह का खतरा और असुविधा नहीं रह गई है. हिना कहती है ‘बड़े शहर जाना मजबूरी जैसा हो गया है. क्योंकि इन की अपनी पहचान हो गई है. इस के बाद भी लोग छोटे शहर और बाजार पसंद करने लगे हैं. सोशल मीडिया के जमाने में नए और पुराने पर्यटक स्थलों का अंतर खत्म हो गया है.’

पर्यटक जब किसी शहर घूमने जाता है. तो यादगार के रूप में कोई न कोई सामान खरीद कर लाता है. भले ही वह कुछ दिन में खराब हो जाए. इस से उस को याद रहता है वह कहां घूमने गया था. पहले लोग बड़े शहर जाते थे तो वहां से कपड़े, मेकअप का सामान और बहुत कुछ खरीद कर लाते थे. अब हर शहर में बड़ी कंपनियों के सामान मिलते हैं. ऐसे में वहां से लोकल सामान ही ले कर आएं. यह सस्ते भी मिलते हैं और इन की खरीददारी से लोकल लेवल के कारीगरों को लाभ होता है. घूमने वाले को उस शहर से जोड़ती भी है.

किस तरह के शहर घूमना पंसद करते है लोग

आमतौर पर पर्यटक विभिन्न प्रकार के शहरों में घूमना पसंद करते हैं, जिन में ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, प्राकृतिक सुंदरता और आधुनिकता वाले शहर शामिल हैं. कुछ पर्यटक पहाड़ या समुद्र तटों जैसे शांत और प्राकृतिक स्थानों में घूमना पसंद करते हैं. वहीं कुछ लोगों को बड़े शहरों की आधुनिकता पसंद होती है. ऐतिहासिक शहर भी घूमने वालों को बहुत पंसद आते हैं. भारत के दिल्ली, जयपुर, आगरा, वाराणसी और उदयपुर जैसे शहर खास हैं. लोग इन शहरों में ऐतिहासिक स्मारकों, संग्रहालयों, और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आनंद लेते हैं. इसी तरह नेचर को पंसद करने वाले पर्यटकों को मनाली, शिमला, लद्दाख, नैनीताल, कश्मीर, केरल, उदयपुर जैसे शहरों की प्राकृतिक सुंदरता, जैसे पहाड़, झीलें, समुद्र तट, या जंगल पंसद आते हैं. इन शहरों में ट्रेकिंग और वाटर स्पोर्ट्स का भी आनंद लेते हैं

आधुनिक शहरों में मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहर पसंद आते हैं. यह शहर अपनी आधुनिक वास्तुकला, शौपिंग मौल, रेस्तरां, और नाइटलाइफ के लिए जाने जाते हैं. लोग इन शहरों में आधुनिक जीवनशैली, मनोरंजन, और खरीदारी का आनंद लेते हैं. शांत और छोटे शहरों में शांत वातावरण, कम भीड़भाड़, और स्थानीय संस्कृति को लोग पंसद करते हैं. इन शहरों में शांति, सुकून, और स्थानीय जीवनशैली का अनुभव करते हैं. कुछ लोगों को एक ही यात्रा में विभिन्न प्रकार के शहरों का अनुभव करना पसंद होता है, जबकि कुछ लोगों को एक ही प्रकार के शहर में बारबार जाना पसंद होता है.

अगर आप जीवन और समाज को समझना चाहते हैं तो पर्यटन से बड़ी कोई चीज नहीं हो सकती है. अगर पर्यटन नहीं होता तो दुनिया भर के तमाम देश एक दूसरे से जुड़ ही नहीं सकते थे. हम एकदूसरे की कला और संस्कृति को समझ ही नहीं पाते. ऐसे में पर्यटन समाज के विकास के लिए भी बेहद जरूरी होता है. नई नई जगहों की खोज करना ही असल पर्यटन होता है. हाइपर लोकल ट्रैवल इसमें एक बड़ी भूमिका निभा रहा है. इस में कम खर्च में घूमने अधिक आंनद मिलता है. मेले ठेले में जुटने वाली भी इसी तरह के पर्यटन के जरीए अपना मनोरंजन करती है.

Hindi Kahani : चिड़िया का बच्चा – क्या यह उस का पागलपन था

Hindi Kahani : उस चिड़िया के बच्चे की करण जीजान से देखभाल कर रही थी पर बाकी सभी लोगों को उस के इस व्यवहार पर हंसी आ रही थी. क्या यह उस का पागलपन था कि वह उस तुच्छ से चिडि़या के बच्चे को इतना महत्त्व दे रही थी या वास्तव में जीव प्रेम.

‘टिंग टांग…टिंग टांग’…घंटी बजते ही मैं बोली, ‘‘आई दीपू.’’

मगर जब तक दरवाजा न खुल जाए, दीपू की आदत है कि घंटी बजाता ही रहता है. बड़ा ही शैतान है. दरवाजा खुलते ही वह चहकने लगा, ‘‘मौसी, आप को कैसे पता चलता है कि बाहर कौन है?’’

मैं ने हंसते हुए कहा, ‘‘पता कैसे नहीं चलेगा.’’

तभी अचानक मेरे मुंह से चीख निकल गई, मैं ने फौरन दीपू को उस जगह से सावधानी से परे कर दिया. वह हैरान हो कर बोला, ‘‘क्या हुआ, मौसी?’’

मैं आंगन में वहीं बैठ गई जहां अभीअभी एक चिडि़या का बच्चा गिरा था. मैं ने ध्यान से उसे देखा. वह जिंदा था. मैं फौरन ठंडा पानी ले आई और उसे चिडि़या के बच्चे की चोंच में डाला. पानी मिलते ही उसे कुछ आराम मिला. मैं ने फर्श से उठा कर उसे एक डब्बे पर रख दिया. फिर सोच में पड़ गई कि अगर दीपू का पांव इस के ऊपर पड़ गया होता तो? कल्पना मात्र से ही मैं सिहर उठी.

मैं ने ऊपर देखा. पड़ोसियों का वृक्ष हमारे आंगन की ओर झुका हुआ था. शायद उस में कोई घोंसला होगा. बहुत सारी चिडि़यां चूंचूं कर रही थीं. मुझे लगा, जैसे वे अपनी भाषा में रो रही हैं. पशुपक्षी बेचारे कितने मजबूर होते हैं. उन का बच्चा उन से जुदा हो गया पर वह कुछ नहीं कर पा रहे थे.

‘‘करुणा…’’ कमला दीदी की आवाज ने मुझे चौंका दिया. मैं ने फौरन चिडि़या के बच्चे को उठाया और नल के पास ऊंचाई पर बनी एक सुरक्षित जगह पर रख दिया.

छुट्टियों में हमारे घर बड़ी रौनक रहती है. इस बार तो मेरी दीदी और उस के बच्चे भी अहमदाबाद से आए थे. इत्तफाक से विदेश से फूफाजी भी आए हुए थे. फूफाजी को सब लोग ‘दादाजी’ कहते थे. यह विदेशी दादाजी हमारे छोटे शहर के लिए बहुत बड़ी चीज थे. सुबह से शाम तक लोग उन्हें घेरे ही रहते. कभी लोग मेहमानों से मिलने आते तो कभी मेहमान लोग घूमनेफिरने निकल जाते.

मेहमानों के लिए शाम का नाश्ता तैयार कर के मैं फिर चिडि़या के बच्चे के पास चली आई. वह अपना छोटा सा मुंह पूरा खोले हुए था. ऐसा लगता था जैसे वह पानी पीना चाहता है. पर नहीं, पानी तो बहुत पिलाया था. मुझे अच्छी तरह पता भी तो नहीं था कि यह क्या खाएगा?

‘‘ओ करुणा मौसी, चिडि़या को पानी में डाल दो,’’ दीपू ने मेरे पास रखी गेंद उठाते हुए कहा.

मैं ने उसे पकड़ा, ‘‘अरे दीपू, सामने जो सफेद प्याला पड़ा है, उसे ले आ. मैं ने उस में दूधचीनी घोल कर रखी है. इसे भूख लगी होगी.’’

मेरी बात सुन कर दीपू जोर से हंसा, ‘‘मौसी, इसे उठा कर बाहर फेंक दो,’’ कहते हुए वह गेंद नचाते हुए बाहर चला गया.

मैं दूध ले आई, चिडि़या का बच्चा बारबार मुंह खोल रहा था. मैं अपनी उंगली दूध में डुबो कर दूध की बूंदें उस की चोंच में डालने लगी.

‘‘बूआ…’’ मेरी भतीजी उर्मिला की आवाज थी, ‘‘अरे बूआ, यहां क्या कर रही हो?’’ वह करीब आ कर बोली.

मैं ने उसे चिडि़या के बच्चे के बारे में बताया. मैं चाहती थी कि मेरी गैरमौजूदगी में उर्मिला जरा उस का खयाल रखे.

‘‘वाह बूआ, वाह, भला चिडि़या के बच्चे के पास बैठने से क्या फायदा?’’ कह कर वह अंदर चली गई. नल के पास बैठे हुए जो भी मुझे देखता वह खिलखिला कर हंस पड़ता. सब के लिए चिडि़या का बच्चा मजाक का विषय बन गया था.

मैं फिर रसोई में चली गई. थोड़ी देर बाद मैं ने बाहर झांका तो देखा कि मेरी भतीजी जूली, उर्मिला और कुछ अन्य लड़कियां नल के पास आ कर खड़ी हो गई थीं. मैं एकदम चिल्लाई, ‘‘अरे, रुको.’’

मैं उन के पास आई तो वे बोलीं, ‘‘क्या बात है?’’

‘‘वहां एक चिडि़या का बच्चा है.’’

‘‘चिडि़या का बच्चा? अरे हम ने सोचा, पता नहीं क्या बात है जो आप इतनी घबराई हुई हैं,’’ वे भी जोरदार ठहाके मारती हुई चली गईं.

मैं खीज उठी और शीघ्र ही ऊपर चली गई. वहां आले में रखे एक घोंसले को देखा,जो इत्तफाक से खाली था. मैं ने उस में चिडि़या के बच्चे को रख कर घोंसले को ऊपर एक कोने में रख दिया.

मैं रसोई में आ गई और सब्जी काटने लगी. तभी पड़ोसन सुषमा बोली, ‘‘आज तो पता नहीं, करुणा का ध्यान कहां है? मैं रसोई में आ गई और इसे पता नहीं चला.’’

‘‘इस का ध्यान चिडि़या के बच्चे में है,’’ नमिता ने उसे चिडि़या के बच्चे के बारे में बताया.

‘‘अरे, पक्षी बिना घोंसले के बड़ा नहीं होगा. उसे किसी घोंसले में रखो,’’ सुषमा सलाह देती हुई बोली.

‘‘मैं उसे घोंसले में ही रख कर आई हूं,’’ मैं ने खुश होते हुए कहा.

रात को सब लोग खाना खाने के बाद घूमने गए. शायद किशनचंद के यहां से भी हो कर आए थे, ‘‘भई, हद हो गई, किशनचंद की औरत इतनी बीमार है. इतनी छटपटाहट घर के लोग कैसे देख रहे थे?’’ यह दादाजी की आवाज थी.

सब लोग आंगन में बैठे बातचीत कर रहे थे. दादाजी विदेश की बातें सुना रहे थे, ‘‘भई, हमारे अमेरिका में तो कोई इस कदर छटपटाए तो उसे ऐसा इंजेक्शन दे देते हैं कि वह फौरन शांत हो जाए. भारत न तो कभी बदला है और न ही बदलेगा. अभी मैं मुंबई से हो कर ही राजस्थान आया हूं. वहां मूलचंद की दादी की मृत्यु हो गई. अजीब बात है, अभी तक यहां लोग अग्निसंस्कार करते हैं.’’

सुनते ही अम्मां बोलीं, ‘‘आप लोग मृत व्यक्ति का क्या करते हैं?’’

‘‘अरे, बस एक बटन दबाते हैं और सारा झंझट खत्म. अमेरिका में तो…’’ दादाजी पता नहीं कैसी विचित्र बातें सुना रहे थे.

मैं ने सोने से पहले चिडि़या के बच्चे की देखभाल की और फिर सो गई. सुबह उठते ही देखा, चिडि़या का बच्चा बड़ा ही खुश हो कर फुदक रहा था. दीपू ने उस की ओर पांव बढ़ाते हुए कहा, ‘‘मौसी, रख दूं पैर इस के ऊपर?’’

‘‘अरे, नहीं…’’ मैं उस का पैर हटाते हुए चीख पड़ी. अचानक मैं ने सामने देखा, ‘‘अरे, यह तो वही आदमी है…’’

शायद जीजाजी ने मेरी बात सुन ली थी. वह बाहर ‘विजय स्टोर’ की तरफ देखते हुए बोले, ‘‘तुम जानती हो क्या उस आदमी को?’’

मेरे सामने एक दर्दनाक दृश्य ताजा हो उठा, ‘‘हां,’’ मैं ने कहा, ‘‘यह वही आदमी है. एक प्यारा सा कुत्ता लगभग मेरे ही पास पलता था, क्योंकि मैं उसे कुछ न कुछ खिलाती रहती थी. एक दिन वह सामने भाभी के घर से दीदी के घर की तरफ आ रहा था कि इस आदमी का स्कूटर उसे तेजी से कुचलता हुआ निकल गया. कुत्ता बुरी तरह तड़प कर शांत हो गया. हैरत की बात यह थी कि इस आदमी ने एक बार भी मुड़ कर नहीं देखा था.’’

जीजाजी पहले तो ठहाका मार कर हंसे फिर जरा क्र्रोधित होते हुए बोले, ‘‘अब कहीं वह फिर तुम्हें नजर आ जाए तो उसे कुछ कह मत देना. हम कुत्ते वाली फालतू बात के लिए किसी से कहासुनी करेंगे क्या?’’

कुछ दिन पहले की ही तो बात है. पड़ोस में शोर उठा, ‘अरे पास वाली झाडि़यों से सांप निकला है,’ सुनते ही मेरा बड़ा भतीजा फौरन एक लाठी ले कर गया और कुछ ही पलों में खुश होते हुए उस ने बताया कि सांप को मार कर उस ने तालाब में फेंक दिया है.

‘‘क्या?…तुम ने उसे जान से मार दिया है?’’ मैं ने सहमे स्वर में पूछा.

‘‘मारता नहीं तो क्या उसे घर ले आता? अगर किसी को काट लेता तो?’’

एक दिन दादाजी बालकनी में कुछ लोगों के साथ बैठे कौफी पी रहे थे, बाहर का दृश्य देखते हुए बोले, ‘‘अफ्रीका में सूअर को घंटों खौलते हुए पानी में डालते हैं और फिर उसे पकाने के लिए…’’ दादाजी बोले जा रहे थे और मैं सूअर की दशा की कल्पना मात्र से ही तड़प उठी थी. मुझे डर लगने लगा कि कहीं चिडि़या के बच्चे को कोई बाहर न फेंक दे.

घोंसले में झांका तो देखा कि बच्चा उलटा पड़ा था. मैं ने डरतेडरते हाथों में कपड़ा ले कर उसे सीधा किया. बिना कपड़ा लिए मेरे नाखून उसे चुभ जाते.

‘‘करुणा मौसी, आप ने चिडि़या के बच्चे को हाथ लगाया?’’ ज्योति ने पूछा.

‘‘हां, क्यों?’’ मैं ने उसे आश्चर्य से देखा.

‘‘अब देखना मौसी, चिडि़या के बच्चे को उस की मां अपनाएगी नहीं. मनुष्य के हाथ लगाने के बाद दूसरे पक्षी उस की ओर देखते भी नहीं.’’

‘‘अरे, उठाती कैसे नहीं, आंगन के बीचोबीच पड़ा था. किसी का पांव आ जाता तो?’’ मैं ने कहा और अपने काम में लग गई.

3 दिन गुजर गए. जराजरा सी देर में मैं चिडि़या के बच्चे की देखभाल करती. चौथे दिन बहुत सवेरे ही चिडि़यों के झुंड के झुंड घोंसले के पास आ कर जोरजोर से चींचीं, चूंचूं करने लगे. मुझे लगा जैसे वे रो रहे हों. मैं ने घोंसले के अंदर देखा. चिडि़या का बच्चा बिलकुल शांत पड़ा था. मेरा दिल भर आया. तरहतरह के खयाल मन में उठे. रात को वह बिलकुल ठीक था. कहीं सच में दीपू ने उस के ऊपर पांव तो नहीं रख दिया?

चिडि़या के बच्चे पर किसी तरह के हमले का कोई निशान नहीं था. मगर फिर भी मैं ने दीपू से पूछा, ‘‘सच बता दीपू, तू ने चिडि़या के बच्चे को कुछ किया तो नहीं?’’

पर दीपू ने तो जैसे सोच ही रखा था कि मौसी को दुखी करना है. वह बोला, ‘‘मौसी, मैं ने सुबह उठते ही पहले उस का गला दबाया और फिर सैर करने चला गया.’’

मैं सरला दीदी से बोली, ‘‘दीदी, ऐसा नहीं लगता कि यह आराम से सो रहा है?’’

दीपू ने मुझे दुखी देख कर फिर कहा, ‘‘मौसी, मैं ने इसे मारा ही ऐसे है कि जैसे हत्या न लग कर स्वाभाविक मौत लगे.’’

पता नहीं क्यों, मुझ से उस दिन कुछ खायापिया नहीं गया. संगीतशाला भी नहीं गई. दिल भर आया था. कागजकलम ले कर दिल के दर्द को रचना के जरिए कागज की जमीन पर उतारने लगी. रचना भेजने के बाद लगा कि जैसे मैं ने उस चिडि़या के बच्चे को अपनी श्रद्धांजलि दे दी है. Hindi Kahani

Social Story : बांझ – बाबा ने राधा के साथ क्या किया ?

Social Story : रोज की तरह आज की सुबह भी सास की गाली और ताने से ही शुरू हुई. राधा रोजरोज के झगड़े से तंग आ चुकी थी, लेकिन वह और कर भी क्या सकती थी? उसे तो सुनना था. वह चुपचाप सासससुर और पड़ोसियों के ताने सुनती और रोती. राधा की शादी राजेश के साथ 6 साल पहले हुई थी. इन 6 सालों में जिन लोगों की शादी हुई थी, वे 1-2 बच्चे के मांबाप बन गए थे. लेकिन राधा अभी तक मां नहीं बन पाई थी. इस के चलते उसे बांझ जैसी उपाधि मिल गई थी. राह चलती औरतें भी राधा को तरहतरह के ताने देतीं और बांझ कह कर चिढ़ातीं. राधा को यह सब बहुत खराब लगता, लेकिन वह किसकिस का मुंह बंद करती, आखिर वे लोग भी तो ठीक ही कहते हैं.

राधा सोचती, ‘मैं क्या करूं? अपना इलाज तो करा रही हूं. डाक्टर ने लगातार इलाज कराने को कहा है, जो मैं कर रही हूं. लेकिन जो मेरे वश में नहीं है, उसे मैं कैसे कर सकती हूं?’ एक दिन पड़ोस का एक बच्चा खेलतेखेलते राधा के घर आ गया. बच्चे को देख राधा ने उसे अपनी गोद में बिठा लिया और उसे प्यार से चूमने लगी. जब सास ने राधा को दूसरे के बच्चे को चूमते हुए देखा, तो वह बिफर पड़ी. वह उस की गोद से बच्चे को छीनते हुए बोली, ‘‘कलमुंही, बच्चा पैदा करने की तो ताकत है नहीं, दूसरों के बच्चों से अपना मन बहलाती है.

‘‘अरी, तू क्यों डालती है अपना मनहूस साया दूसरों के बच्चे पर…?

‘‘तू तो उस बंजर जमीन की तरह है, जहां फसल तो दूर घास भी उगना पसंद नहीं करती.’’ जब राधा से सास की बातें नहीं सुनी गईं, तो वह अपने कमरे में जा कर अंदर से दरवाजा बंद कर रोने लगी. रात को राजेश के आने पर राधा ने रोते हुए सारी बात उसे बता दी और बोली, ‘‘मैं बड़ी अभागिन हूं. मैं किसी की इच्छा पूरी नहीं कर सकती, ऊपर से मुझ पर बांझ होने का धब्बा भी लग चुका है.’’ राधा की बातें सुन कर राजेश ने कहा, ‘‘तुम मां की बातों का बुरा मत मानो. उन्हें ऐसा नहीं कहना चाहिए. हर मांबाप की इच्छा होती है कि उन के परिवार को आगे बढ़ाने वाला उन के रहते हुए ही आ जाए. तुम से यह इच्छा पूरी नहीं होते देख कर मां तुम से उलटीसीधी बातें बोलती हैं. तुम चिंता मत करो, तुम्हारा इलाज चल रहा है. तुम जरूर मां बनोगी.’’

राधा बोली, ‘‘मेरी एक सहेली थी, वह भी बहुत दिनों बाद मां बनी थी. मां बनने में देर होते देख कर जब उस ने अपना इलाज कराया, तो जांच में उस में कोई कमी नहीं पाई गई. कमी उस के पति में थी. जब उस के पति ने इलाज कराया, तभी वह मां बन सकी.

‘‘हो सकता है, उसी की तरह आप में भी कोई कमी हो. इसलिए मैं चाहती हूं कि आप भी एक बार अपना इलाज करा लेते.’’ राधा की बात सुन कर राजेश भड़क उठा, ‘‘मुझ में भला क्या कमी हो सकती है? मैं तो बिलकुल ठीक हूं. मुझ में कोई कमी नहीं है. ‘‘मेरी चिंता छोड़ो, तुम अपना अच्छी तरह इलाज कराओ.’’

‘‘मैं मानती हूं कि आप में कोई कमी नहीं है, लेकिन तसल्ली की खातिर…’’ राधा ने सलाह देने के खयाल से ऐसा कहा, लेकिन राजेश ने उस की बात को बीच में ही काट दिया, ‘‘नहीं राधा, तसल्ली वगैरह कुछ नहीं. मैं ने कहा न कि मुझ में कोई कमी नहीं है,’’ राजेश ने उसे डांट दिया. पति के भड़के मिजाज को देख राधा ने चुप रहना ही उचित समझा. शहर के बड़े से बड़े डाक्टर से उस का इलाज हुआ, फिर भी उस की कोख सूनी ही रही. डाक्टर ने जांच के दौरान उस में कोई कमी नहीं पाई.

‘‘देखो राधा, रिपोर्ट देखने के बाद तुम में कोई कमी नजर नहीं आती. शायद तुम्हारे पति में कोई कमी होगी. तुम एक बार उसे भी इलाज कराने की सलाह दो,’’ डाक्टर ने उसे समझाया. अब राधा को पूरा भरोसा हो गया था कि उस में कोई कमी नहीं है. मां बनने के लिए कमी उस के पति में ही है, लेकिन उसे कौन समझाए. उसे राजेश के गुस्से से भी डर लगता था. एक दिन किसी ने राधा की सास को बताया कि पास ही गांव के मंदिर में एक बाबा रहते हैं, जिस की दुआ से हर किसी का दुख दूर हो जाता है. सास ने यह बात अपने बेटे राजेश को बता दी और राधा को बाबा के पास भेजने को कहा. रात को राजेश ने राधा से कहा, ‘‘कल तुम मंदिर चली जाना.’’

‘‘ठीक है, मैं चली जाऊंगी, लेकिन मैं डाक्टर के पास गई थी. डाक्टर ने मुझ में कोई कमी नहीं बताई. इसलिए मैं चाहती हूं कि आप भी एक बार अपना…’’ डरतेडरते राधा कह रही थी, लेकिन राजेश ने उस की बात को अनसुना कर दिया.

‘‘राधा, मैं कहीं नहीं जाऊंगा. तुम कल मंदिर में बाबा के पास चली जाना,’’ ऐसा कह कर राजेश सो गया. राधा ने भी अपने माथे पर लगा बांझपन का धब्बा मिटाने के लिए बाबा के पास जा कर उन से दुआ लेने की सोच ली. दूसरे दिन सवेरे नहाधो कर वह बाबा के पास चली गई. मंदिर में लगी भीड़ को देख कर उसे भरोसा हो गया कि वह भी बाबा की दुआ पा कर मां बन सकती है. राधा बाबा के पैरों पर गिर पड़ी और कहने लगी, ‘‘बाबा, मेरा दुख दूर करें. मैं 6 साल से बच्चे का मुंह देखने के लिए तड़प रही हूं.’’

‘‘उठो बेटी, निराश मत हो. तुम्हें औलाद का सुख जरूर मिलेगा.

‘‘लेकिन, इस के लिए तुम्हें माहवारी होने के बाद यहां 4 दिनों तक रह कर लगातार पूजा करनी होगी.’’

‘‘ठीक है बाबा, मैं जरूर आऊंगी.’’ राधा खुशी से घर गई. घर आ कर उस ने सारी बातें अपने पति को बताईं.

‘‘मैं कहता था न कि जो काम दवा नहीं कर सकती, कभीकभी दुआ से हो जाती है. बाबा की दुआ पा कर अब तुम जरूर मां बनोगी, ऐसा मुझे भरोसा है. तुम ठीक समय पर बाबा के पास चली जाना,’’ राजेश ने खुश होते हुए कहा.

राधा अब बेसब्री से माहवारी होने का इंतजार करने लगी. कुछ दिन बाद उसे माहवारी हो गई. माहवारी पूरी होने के बाद राधा फिर बाबा के पास गई. उसे देखते ही बाबा ने कहा, ‘‘बेटी, जैसा कि मैं ने तुम्हें पहले भी कहा था कि यहीं रह कर 4 दिनों तक लगातार पूजा करनी पड़ेगी, तभी तुम मां बन सकोगी.’’

‘‘जी बाबा, मैं रहने के लिए तैयार हूं,’’ राधा ने कहा.

‘‘ठीक है, अभी तुम अंदर चली जाओ. रात से तुम्हारे लिए पूजा करनी शुरू करूंगा,’’ अपनी चाल को कामयाब होते देख बाबा मन ही मन खुश होते हुए बोला. रात को बाबा ने राधा से कहा, ‘‘बेटी, इस पूजा के दौरान कोई भी देवता खुश हो कर तुम्हें औलाद दे सकता है. इस के लिए तुम्हें सबकुछ चुपचाप सहन करना पड़ेगा, नहीं तो तुम कभी मां नहीं बन पाओगी.’’ ‘‘जी बाबा, मैं सबकुछ करने को तैयार हूं. बस, मुझे औलाद हो जानी चाहिए.’’ राधा के इतना कहने के बाद बाबा उसे एक कोठरी में ले गए, जहां हवनकुंड बना हुआ था. उस में आग जल रही थी. बाबा ने उसे वहीं पर बिठा दिया और वह भी बैठ कर जाप करने लगा. कुछ देर तक जाप करने के बाद बाबा ने कहा, ‘‘राधा, देवता मुझ में समा चुके हैं. वह तुम्हें औलाद का सुख देना चाहते हैं, इसलिए तुम चुपचाप अपने बदन के सारे कपड़े उतार दो और औलाद पाने के लिए मेरे पास आ जाओ. वह तुम्हें दुआ देना चाहते हैं.’’

राधा ने यह सोच कर कि बाबा में देवता समा चुके हैं और देवता जो भी करते हैं, गलत नहीं करते, इसलिए उस ने अपने बदन के सारे कपड़े उतार दिए. बाबा उस के अंगों से खेलने लगा और उसे दुआ देने के नाम पर उस की इज्जत पर डाका डाल दिया. 4 दिनों तक लगातार बाबा ने इस पूजा के बहाने राधा से जिस्मानी संबंध बनाए. 5वें दिन बाबा ने कहा, ‘‘राधा बेटी, हमारी दुआ कबूल हो गई. पूजा भी पूरी हो गई. अब तुम जरूर मां बनोगी. तुम घर जा सकती हो.’’

बाबा की दुआ ले कर वह खुशीखुशी घर लौट आई. 9 महीने बाद राधा मां बन गई. उसे बाबा की दुआ लग गई थी. उस के माथे से बांझपन का धब्बा मिट चुका था. घर के सारे लोग बहुत खुश थे. राजेश को अब पूरा यकीन हो गया था कि उस में भी बाप बनने की ताकत है, लेकिन सचाई से सभी अनजान थे. Social Story

Story In Hindi : बेकरी की यादें – क्यों दिप्ती ने काम करना शुरू किया?

Story In Hindi : मिहिरऔर दीप्ति की शादी को 2 साल हो गए थे, दोनों बेहद खुश थे. अभी वे नई शादी की खुमारी से उभर ही रहे थे कि मिहिर को कैलिफोर्निया की एक कंपनी में 5 सालों के लिए नियुक्ति मिल गई. दोनों ने खुशीखुशी इस बदलाव को स्वीकार कर लिया और फिर कैलिफोर्निया पहुंच गए.

दीप्ति को शुरूशुरू में बहुत अच्छा लगा. सब काम अपने आप करना, किसी तीसरे का आसपास न होना… सुबह उठ कर चाय के साथ ही वह नाश्ता और लंच बना लेती. फिर जैसे ही मिहिर दफ्तर जाता वह बरतन साफ कर लेती. बिस्तर ठीक कर के नहाधो लेती, इस के बाद सारा दिन अपना. अकेले बाजार जाना और पार्क के चक्कर लगाना, यही उस का नियम था. अब वह पैंट, स्कर्ट और स्लीवलैस कमीज पहनती तो अपनी तसवीरें फेसबुक पर जरूर डालती और पूरा दिन फेसबुक पर चैक करती रहती कि किस ने उसे लाइक या कमैंट किया है. 100-200 लाइक्स देख कर अपने जीवन के  इस आधुनिक बदलाव से निहाल हो उठती.

मगर यह जिंदगी भी चंद दिनों तक ही मजेदार लगती है. कुछ ही दिनों में यही रूटीन वाली जिंदगी उबाऊ हो जाती है, क्योंकि इस में हासिल करने को कुछ नहीं होता. दीप्ति के साथ भी ऐसा ही हुआ, फिर उस ने कुछ देशी लोगों से भी दोस्ती कर ली.

अब भारतीय तो हर जगह होते हैं और फिर इस अपरिचित ातावरण में परिचय की गांठ लगाना कौन सी बड़ी बात थी. घर के आसपास टहलते हुए ही काफी लोग मिल जाते हैं. दीप्ति ने उन्हीं लोगों के साथ मौल जाना, घूमनाफिरना शुरू कर दिया.

यूट्यूब देख कर कुछ नए व्यंजन बना कर वह अपने दिन काटने लगी, लेकिन जैसेजैसे मिहिर अपने काम में व्यस्त होता गया, वैसेवैसे दीप्ति का सूनापन भी बढ़ता गया. उसे अब भारत की बहुत याद आने लगी. वह परिवार के साथ रहने का सुख याद कर के और भी अकेला महसूस करने लगी.

एक दिन उस ने बैठेबैठे सोचा कि अब उसे कुछ काम करना चाहिए. काम करने का उसे परमिट मिला हुआ था. अत: कई जगह आवेदन कर दिया. राजनीति शास्त्र में एमए की डिग्री लिए हुए दीप्ति कई जगह भटकी. औनलाइन भी आवेदन किया, लेकिन कहीं से भी कोई जवाब नहीं आया. उस की बेचैनी बहुत बढ़ने लगी. वह किसी दफ्तर में डाटा ऐंट्री का काम करने को भी तैयार थी, लेकिन काम का कोई अनुभव न होने के कारण कहीं काम नहीं बना.

एक दिन पास की ग्रोसरी में शौपिंग करते हुए उस ने देखा कि बेकरी में एक जगह खाली है. उस ने वहीं खड़ेखड़े आवेदन कर दिया. 2 दिन बाद उस का इंटरव्यू हुआ. इंग्लिश उस की बहुत अच्छी नहीं थी. बस कामचलाऊ थी. लेकिन उस का इंटरव्यू ठीकठाक हुआ, क्योंकि उस में बोलना कम और सुनना अधिक था.

बेकरी के मैनेजर ने कहा, ‘‘तुम यहां काम कर सकती हो, लेकिन बेकरी में काम करने के लिए नाक की लौंग और मंगलसूत्र उतारना पड़ेगा, क्योंकि साफसफाई के नजरिए से यह बहुत जरूरी है.’’

दीप्ति को यह बहुत नागवार लगा. उस ने सोचा कि अगर ये लोग दूसरों की संस्कृति और भावनाओं का खयाल करते तो वह ऐसा न कहता. क्या मेरे मंगलसूत्र और लौंग में गंद भरा है, जो उड़ कर इन के खाने में चला जाएगा? फिर खुद को नियंत्रित करते हुए उस ने कहा कि वह सोच कर बताएगी.

मिहिर से पूछा तो उस ने कहा, ‘‘जो तुम ठीक समझो, करो. मुझे कोई आपत्ति नहीं है. बस शाम को मेरे आने से पहले घर वापस आ जाया करना.’’

दीप्ति ने वहां नौकरी शुरू कर दी. नाक की लौंग तो उस ने बहुत पीड़ा के साथ उतार दी. अभी शादी के कुछ दिन पहले ही उस ने नाक छिदवाई थी और बड़ी मुश्किल से वह लौंग नाक में फिट हुईर् थी, लेकिन मंगलसूत्र नहीं उतार पाई, इसलिए कमीज के बटन गले तक बंद कर के रखती ताकि वह दिखे न. पहले दिन वह बहुत खुशीखुशी बेकरी पर गई. वहां जा कर उस ने बेकरी का ऐप्रन पहन लिया.

मैनेजर ने पूछा, ‘‘क्या पहले कभी काम किया है?’’

‘‘नहीं, लेकिन मैं कोई भी काम कर सकती हूं.’’

मैनेजर ने हंसते हुए कहा, ‘‘ठीक है अभी सिर्फ देखो और काम समझो… कुछ दिन सिर्फ बरतन ही धोओ.’’

दीप्ति ने देखा बड़ीबड़ी ट्रे धोने के लिए रखी थीं. उस ने सब धो दीं. जब मैनेजर ने देखा कि वह खाली खड़ी है तो कहा, ‘‘जाओ और बिस्कुट के डब्बे बाहर डिसप्ले में लगाओ, लेकिन पहले सभी मेजों को साफ कर देना,’’ और उस ने आंखों के इशारे से मेज साफ करने का सामान उसे दिखा दिया.

4 घंटों तक यही काम करतेकरते दीप्ति को ऊब होने लगी. लेकिन मन में कुछ संतुष्टि थी.

दीप्ति को वहां काम करना ठीकठाक ही लगा. काम करने से एक तो यहां की दुकानों के बारे में और जानकारी मिली वहीं बेकिंग के कुछ राज भी उस के हाथ लग गए. लेकिन उस के मन में बेकरी पर नौकरी करना एक निचते दर्जे का काम था. उस की जाति और खानदान के संस्कार उसे यह करने से रोक रहे थे.

वह इस काम के बारे में अपने घर या ससुराल में शर्म के मारे कुछ नहीं बता पाई. उस के लिए यह कोई इज्जत की नौकरी तो थी नहीं.

खैर, वह कुछ भी सोचे लेकिन काम तो वह बेकरी पर ही कर रही थी और उस में मुख्य काम था हर ग्राहक का अभिवादन करना और सैंपल चखने के लिए प्रेरित करना. दूसरा काम था ब्रैड और बिस्कुट को गिन कर डब्बों में भरना और बेकरी के बरतनों को धोना.

धीरेधीरे उस ने महसूस किया कि वहां भी प्रतिद्वंद्विता की होड़ थी, एकदूसरे की चुगली की जाती थी. परनिंदा में परम आनंद का अनुभव किया जाता था. लगभग 50 फीसदी बेकरी पर काम करने वाले लोग मैक्सिकन थे जो सिर्फ स्पैनिश में पटरपटर करते थे. दीप्ति उन की बातों का हिस्सा नहीं बन पाती.

बरहाल दीप्ति को बिस्कुट भरने में मजा आता, लेकिन बरतन धोने में बहुत शर्म आती. उसे अपना घर याद आता. उस ने भारत में कभी बरतन नहीं धोए थे. कामवाली या मां सब काम करती थीं. अब यहां बरतन धोते हुए उसे लगता उस का दर्जा कम हो गया है.

एक दिन वहां काम करने वाली एक महिला ने उसे झाड़ू लगाने का आदेश दिया. पहले तो दीप्ति ने कुछ ऐसा भाव दिखाया कि बात उस की समझ में नहीं आई, लेकिन वह महिला तो उस के पीछे ही पड़ गई.

दीप्ति ने मन कड़ा कर के कहा, ‘‘दिस इज नौट माई जौब.’’

यह सुनते ही वह मैनेजर के पास गई और उस की शिकायत करनी लगी. दीप्ति ने भी सोचा कि जो करना है कर ले.

शाम को जब दीप्ति बरतन धो रही थी तो एक देशी आंटी पीछे आ कर खड़ी हो गईं और उसे पुकारने लगीं. उस ने अपनी कनखियों से पहले ही उसे आते देख लिया था. अब जानबूझ कर पीछे नहीं मुड़ रही थी. आंटी भी तोते की तरह ऐक्सक्यूज मी की रट लगाए खड़ी थीं, वहां कोई नहीं था सिवाए रौबर्ट के, जो बिस्कुट बना रहा था.

आखिर रौबर्ट ने भी दीप्ति को पुकार कर कहा, ‘‘जा कर देखो कस्टमर को क्या चाहिए.’’

हार कर दीप्ति को अपना न सुनने का अभिनय बंद कर के काउंटर पर आना पड़ा. बातचीत शुरू हुई. बिस्कुट के दाम से और ले

गई फिर वही कि तुम कहां से हो? तुम्हारे घर

में कौनकौन है? यहां कब आई? पति क्या

करते हैं? हिचकिचाते हुए उसे प्रश्नों के उत्तर

देने पड़े जैसे यह भी उस के काम का हिस्सा हो.

खैर, आंटी ने कुछ बिस्कुट के सैंपल खाए और बिना कुछ खरीदे खिसक गई.

अभी दीप्ति आंटी के सवालों और जवाबों से उभरी ही थी कि बेकरी का फोन घनघना उठा. रिसीवर उसी को उठाना पड़ा. फोन पर लग रहा था कि कोई बूढ़ी महिला केक का और्डर देना चाह रही है. जैसे ही दीप्ति ने थोड़ी देर बात की, बूढ़ी महिला ने कहा, ‘‘कैन यू गिव द फोन टू समबौडी हू स्पीक्स इंग्लिश?’’

दीप्ति को काटो तो खून नहीं. इस का मतलब क्या? क्या वह अब तक उस से इंग्लिश में बात नहीं कर रही थी? उस ने पहले कभी इंग्लिश को ले कर इतना अपमानित महसूस नहीं किया था. इतनी तहजीब और सब्र से वह ‘मैडममैडम’ कह कर बात कर रही थी.

लेकिन उस का उच्चारण बता देता है कि इंग्लिश उस की भाषा नहीं है. उसे बहुत कोफ्त हुई,

उस ने रौबर्ट को बुलाया और रिसीवर उस के हवाले कर दिया और कहा, ‘‘आई विल नौट वर्क हियर एनीमोर.’’

इस के बाद दनदनाती हुई वह अपना बेकरी का ऐप्रन उतार कर समय से पहले ही बेकरी से बाहर निकल आई. अगर वह न जाती तो उस की आंखों के आंसू वहीं छलछला पड़ते.

घर जा कर दीप्ति खूब रोई. पति के सामने अपना गुबार निकाला. पति ने प्यार से उस के

सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘‘बस इतने में ही डर गई. अरे, अपनी भाषा का हम ही आदर नहीं करते, लेकिन अन्य लोग तो अपनी भाषा ही पसंद करते हैं और वह भी सही उच्चारण के साथ.

‘‘जिस इंग्लिश की हम भारत में पूजा करते हैं वह हमें देती क्या है और इस बात को भी समझो कि सभी लोग एकजैसे नहीं होते. शायद उस औरत को विदेशी लोग पसंद न हों.

‘‘भाषा तो सिर्फ अपनी बात दूसरे तक पहुंचाने का माध्यम है. तुम ने कोशिश की. तुम इतना निराश मत हो. ये सब तो विदेश में होता ही रहता है.’’

मिहिर की बातों का दीप्ति पर असर यह हुआ कि अगले दिन वह समय पर अपना ऐप्रन पहन कर बेकरी के काम में लग गई जैसे कुछ हुआ ही न हो. किसी ने भी उस से सवालजवाब नहीं किया. अब उसे लगा कि वह किसी से नहीं डरती. अपने अहं को दरकिनार कर उस ने नए सिरे से काम शुरू कर दिया. उस ने अपने काम को पूरे दिल से अपना लिया. अपनी मेहनत पर उसे गर्व महसूस होने लगा.

Love Story In Hindi : गलतफहमी – क्या नीना को उसका प्यार मिल पाया

Love Story In Hindi : नीना के प्रति मेरा आकर्षण चुंबक की तरह मुझे खींच रहा था. एक दिन मैं ने हंस कर सीधेसीधे उस से कहा, ‘‘मैं तुम से प्यार करता हूं.’’ वह ठहाका मार कर हंसी, ‘‘तुम बड़े नादान हो रविजी. महानगर में प्यार मत करो, लुट जाओेगे.’’ उस ने फिर कहीं दूर भटकते हुए कहा, ‘‘इस शहर में रहो, पर सपने मत देखो. छोटे लोगों के सपने यों ही जल जाते हैं. जिंदगी में सिर्फ राख और धुआं बचते हैं. सच तो यह है कि प्यार यहां जांघों के बीच से फिसल जाता है.’’ ‘‘कितना बेहूदा खयाल है नीना…’’ ‘‘किस का…?’’ ‘‘तुम्हारा,’’ मैं ने तल्ख हो कर कहा, ‘‘और किस का?’’ ‘‘यह मेरा खयाल है?’’ वह हैरान सी हुई, ‘‘तुम यही समझे…?’’ ‘‘तो मेरा है?’’ ‘‘ओह…’’ उस ने दुखी हो कर कहा, ‘‘फिर भी मैं कह सकती हूं कि तुम कितने अच्छे हो… काश, मैं तुम्हें समझा पाती.’’ ‘‘नहीं ही समझाओ तो अच्छा,’’ मैं ने उस से विदा लेते हुए कहा, ‘‘मैं समझ गया…’’ रास्तेभर तरहतरह के खयाल आते रहे.

आखिरकार मैं ने तय किया कि सपने कितने भी हसीन हों, अगर आप बेदखल हो गए हों, तो उन हसरतों के बारे में सोचना छोड़ देना चाहिए. मैं नीना की जिंदगी से कट सा गया था. मैं नीना को एक बस के सफर में मिला था. वह भी वहीं से चढ़ी थी, जहां से मैं चढ़ा था और वहीं उतरी भी थी. कुछ दिन में हैलोहाय से बात आगे बढ़ गई. वह एक औफिस में असिस्टैंट की नौकरी कर रही थी. बैठनाउठना हो गया. वह बिंदास थी, पर बेहद प्रैक्टिकल. कुछ जुगाड़ू भी थी. मेरे छोटेमोटे काम उस ने फोन पर ही करा दिए थे. उस दिन मैं फैक्टरी से देर से निकला, तो जैक्सन रोड की ओर निकल गया. दिल यों भी दुखी था, क्योंकि फैक्टरी में एक हादसा हो गया था. बारबार दिमाग में उस लड़के का घायल चेहरा आ रहा था. मैं एक मसाज पार्लर के पास रुक गया. यह पुराना शहर था अपनी स्मृति में, इतिहास को समेटे हुए.

मैं ने घड़ी देखी. 7 बज रहे थे. मैं थकान दूर करने के लिए घुस गया. अभी मैं जायजा ले ही रहा था कि मेरी नजर नीना पर पड़ी, ‘‘तुम यहां…?’’ ‘‘मैं इसी पार्लर में काम करती हूं.’’ ‘‘पर, तुम ने तो बताया था कि किसी औफिस में काम करती हो…’’ ‘‘हां, करती थी.’’ ‘‘फिर…?’’ ‘‘सब यहीं पूछ लोगे क्या…?’’ कहते हुए वह दूसरे ग्राहक की ओर बढ़ गई. नशे से लुढ़कतेथुलथुले लोगों के बीच से वह उन्हें गरम बदन का अहसास दे रही थी. यह देख मुझे गहरा अफसोस हुआ. मैं सिर्फ हैड मसाज ले कर वापस आ गया. रास्ते में मैं ने फ्राई चिकन और रोटी ले ली थी. कमरे में पहुंच कर मैं ने अभी खाने का एक गस्सा तोड़ा ही था कि मोहन आ गया. ‘‘आओ मोहन,’’ मैं ने कहा, ‘‘बड़े मौके से आए हो तुम.’’ ‘‘क्या है?’’ मोहन ने मुसकराते हुए पूछा. वह एक दवा की दुकान पर सेल्समैन था. पूरा कंजूस और मजबूर आदमी. अकसर उसे घर से फोन आता था, जिस में पैसे की मांग होती थी.

इस कबूतरखाने में इसी तरह के लोग किराएदार थे, जो दूर कहीं गांवघर में अपने परिवार को छोड़ कर अपना सलीब उठाए चले आए थे. मैं ने थाली मोहन की ओर खिसकाई. बिना चूंचूं किए वह खाने लगा. मोहन बोला, ‘‘यार रवि, तुम्हीं ठीक हो. तुम्हारे घर वाले तुम्हें नोचते नहीं. मैं तो सोचता हूं कि मेरी जिंदगी इसी तरह खत्म हो जाएगी कि मैं वापस भी नहीं जा सकूंगा गांव… पहले यह सोच कर आया था कि 2-4 साल कमा कर लौट जाऊंगा… मगर, 10 साल होने को हैं, मैं यहीं हूं…’’ ‘‘सुनो मोहन, मुझे फोन इसलिए नहीं आते हैं कि मेरे घर में लोग नहीं हैं… बल्कि उन्हें पता ही नहीं है कि मैं कहां हूं… इस दुनिया में हूं भी कि नहीं… यह अच्छा है… आज जिस लड़के के साथ हादसा हुआ, अगर मेरी तरह होता तो किस्सा खत्म था, पर अब जाने क्या गुजर रही होगी उस के घर वालों पर…’’ ‘‘एक बात बोलूं?’’ ‘‘बोलो.’’ ‘‘तुम शादी कर लो.’’ ‘‘किस से?’’ ‘‘अरे, मिल जाएगी…’’ ‘‘मिली थी…’’ मैं ने कहा. ‘‘फिर क्या हुआ?’’ ‘‘टूट गया.’’ रात काफी हो गई थी. मोहन उठ गया. सवेरे मेरी नींद देर से खुली, मगर फैक्टरी में मैं समय से पहुंच गया.

मुझे वहीं पता चला कि उस ने अस्पताल में रात तकरीबन 3 बजे दम तोड़ दिया. मैनेजर ने एक मुआवजे का चैक दिखा कर हमदर्दी बटोरने के बाद फैक्टरी में चालाकी से छुट्टी कर दी. मैं वापस लौटने ही वाला था कि नीना का फोन आया. चौरंगी बाजार में एक जगह वह इंतजार कर रही थी. ‘‘क्या बात है?’’ मैं ने पूछा. ‘‘कुछ नहीं,’’ वह हंसी. ‘‘बुलाया क्यों?’’ ‘‘गुस्से में हो?’’ ‘‘किस बात के लिए?’’ ‘‘अरे, बोलो भी.’’ ‘‘बोलूं?’’ ‘‘हां.’’ ‘‘झूठ क्यों बोली?’’ ‘‘क्या झूठ?’’ ‘‘कि औफिस में…’ ‘‘नहीं, सच कहा था.’’ ‘‘तो वहीं रहती.’’ ‘‘बौस देह मांग रहा था,’’ उस ने साफसाफ कहा. ‘‘क्या…?’’ मैं अवाक रह गया. काफी देर बाद मैं ने कहा, ‘‘चलो, मुझे माफ कर दो. गलतफहमी हुई.’’ ‘‘गलतफहमी में तो तुम अभी भी हो…’’ ‘‘मतलब…?’’ मैं इस बार चौंका, ‘‘कैसे?’’ ‘‘फिर कभी,’’ नीना ने हंस कर कहा. उस दिन नीना के प्रति यह गलतफहमी रह जाती, अगर मैं उस के साथ जिद कर के उस के घर नहीं गया होता. मेरे घर की तरह दड़बेनुमा मकान था.

एक बिल्डिंग में 30-40 परिवार होंगे. सचमुच कभीकभी जिंदगी भी क्या खूब मजाक करती है. वह 2 बूढ़ों को पालते हुए खुद बूढ़ी हो रही थी. उस की मां की आंखों में एक चमक उठी. कुछ अपना रोना रोया, कुछ नीना का. मेरा भी कोई अपना कहने वाला नहीं था. भाई कब का न जाने कहां छोड़ गया था. मांबाप गुजर चुके थे. चाचाताऊ थे, पर कभी साल 2 साल में कोई खबर मिलती. उस दिन नीना का हाथ अपने हाथ में ले कर मैं ने कहा, ‘‘मुझे अब कोई गलतफहमी नहीं है, तुम्हें हो, तो कह सकती हो.’’ ‘‘मुझे है,’’ उस ने हंस कर कहा, ‘‘पर, कहूंगी नहीं.’’ एक खूबसूरत रंग फिजा में फैल कर बिखर गया. उस दिन उस के छोटे बिस्तर पर जो अपनापन मिला, मां की गोद के बाद कभी नहीं मिला था. दो महीने बाद दोनों ने शादी कर ली, बस 10 जने थे. न घोड़ी, न बरात, पर मुझे और नीना को लग रहा था कि सारी दुनिया जीत ली. अगली सुबह मैं अपने साथ खाने का डब्बा ले गया था. इस से बढ़ कर दहेज होता है क्या? Love Story In Hindi

लेखक : संजय कुमार सिंह

Kahani In Hindi : कौन चरित्रहीन – क्यों आभा ने बच्चों की कस्टडी मांगी?

Kahani In Hindi : उसके हाथों में कोर्ट का नोटिस फड़फड़ा रहा था. हत्प्रभ सी बैठी थी वह… उसे एकदम जड़वत बैठा देख कर उस के दोनों बच्चे उस से चिपक गए. उन के स्पर्श मात्र से उस की ममता का सैलाब उमड़ आया और आंसू बहने लगे. आंसुओं की धार उस के चेहरे को ही नहीं, उस के मन को भी भिगो रही थी. न जाने इस समय वह कितनी भावनाओं की लहरों पर चढ़उतर रही थी. घबराहट, दुख, डर, अपमान, असमंजस… और न जाने क्याक्या झेलना बाकी है अभी. संघर्षों का दौर है कि थमने का नाम ही नहीं ले रहा है. जब भी उसे लगता कि उस की जिंदगी में अब ठहराव आ गया है, सबकुछ सामान्य हो गया है कि फिर उथलपुथल शुरू हो जाती है.

दोनों बच्चों को अकेले पालने में जो उस ने मुसीबतें झेली थीं, उन के स्थितियों को समझने लायक बड़े होने के बाद उस ने सोचा था कि वे कम हो जाएंगी और ऐसा हुआ भी था. पल्लवी 11 साल की हो गई थी और पल्लव 9 साल का. दोनों अपनी मां की परेशानियों को न सिर्फ समझने लगे थे वरन सचाई से अवगत होने के बाद उन्होंने अपने पापा के बारे में पूछना भी छोड़ दिया था. पिता की कमी वे भी महसूस करते थे, पर नानी और मामा से उन के बारे में थोड़ाबहुत जानने के बाद वे दोनों एक तरह से मां की ढाल बन गए थे. वह नहीं चाहती थी कि उस के बच्चों को अपने पापा का पूरा सच मालूम हो, इसलिए कभी विस्तार से इस बारे में बात नहीं की थी. उसे अपनी ममता पर भरोसा था कि उस के बच्चे उसे गलत नहीं समझेंगे.

कागज पर लिखे शब्द मानो शोर बन कर उस के आसपास चक्कर लगा रहे थे, ‘चरित्रहीन, चरित्रहीन है यह… चरित्रहीन है इसलिए इसे बच्चों को अपने पास रखने का भी हक नहीं है. ऐसी स्त्री के पास बच्चे सुरक्षित कैसे रह सकते हैं? उन्हें अच्छे संस्कार कैसे मिल सकते हैं? इसलिए बच्चों की कस्टडी मुझे मिलनी चाहिए… एक पिता होने के नाते मैं उन का ध्यान ज्यादा अच्छी तरह रख सकता हूं और उन का भविष्य भी सुरक्षित कर सकता हूं…’

चरित्रहीन शब्द किसी हथौड़े की तरह उस के अंतस पर प्रहार कर रहा था. मां को रोता देख पल्लवी ने कोर्ट का कागज मां के हाथों से ले लिया. ज्यादा कुछ तो समझ नहीं आया. पर इतना अवश्य जान गई कि मां पर इलजाम लगाए जा रहे हैं.

‘‘पल्लव तू सोने जा,’’ पल्लवी ने कहा तो वह बोला, ‘‘मैं कोई छोटा बच्चा नहीं हूं. सब जानता हूं. हमारे पापा ने नोटिस भेजा है और वे चाहते हैं कि हम उन के पास जा कर रहें. ऐसा कभी नहीं होगा. मम्मी आप चिंता न करें. मैं ने टीवी में एक सीरियल में देखा था कि कैसे कोर्ट में बच्चों को लेने के लिए लड़ाई होती है. मैं नहीं जाऊंगा पापा के पास. दीदी आप भी नहीं जाना.’’

पल्लव की बात सुन कर वह हैरान रह गई. सही कहते हैं लोग कि वक्त किसी को भी परिपक्व बना सकता है.

‘‘मैं भी नहीं जाऊंगी उन के पास और कोर्ट में जा कर कह दूंगी कि हमें मम्मी के पास ही रहना है. फिर कैसे ले जाएंगे वे हमें. मुझे तो उन की शक्ल तक याद नहीं. इतने सालों तक एक बार भी हम से मिलने नहीं आए. फिर अब क्यों ड्रामा कर रहे हैं?’’ पल्लवी के स्वर में रोष था.

कोई गलती न होने पर भी वह इस समय बच्चों से आंख नहीं मिला पा रही थी. छि: कितने गंदे शब्द लिखे हैं नोटिस में… किसी तरह उस ने उन दोनों को सुलाया.

रात की कालिमा परिवेश में पसर चुकी थी. उसे लगा कि अंधेरा जैसे धीरेधीरे उस की ओर बढ़ रहा है. इस बार यह अंधेरा उस के बच्चों को छीनने के लिए आ रहा है. भयभीत हो उस ने बच्चों की ओर देखा… नहीं, वह अपने बच्चों को अपने से दूर नहीं होने देगी… अपने जिगर के टुकड़ों को कैसे अलग कर सकती है वह?

तब कहां गया था पिता का अधिकार जब उसे बच्चों के साथ घर छोड़ने पर मजबूर किया गया था? बच्चों की बगल में लेट कर उस ने उन के ऊपर हाथ रख दिया जैसे कोई सुरक्षाकवच डाल दिया हो.

उस के दिलोदिमाग में बारबार चरित्रहीन शब्द किसी पैने शीशे की तरह चुभ रहा था. कितनी आसानी से इस बार उस पर एक और आरोप लगा दिया गया है और विडंबना तो यह है कि उस पर चरित्रहीन होने का आरोप लगाया गया है जिसे कभी झल्ली, मूर्ख, बेअक्ल और गंवारकहा जाता था. आभा को लगा कि नरेश का स्वर इस कमरे में भी गूंज रहा है कि तुम चरित्रहीन हो… तुम चरित्रहीन हो… उस ने अपने कानों पर हाथ रख लिए. सिर में तेज दर्द होने लगा था.

समय के साथ शब्दों ने नया रूप ले लिया, पर शब्दों की व्यूह रचना तो बरसों पहले ही हो चुकी थी. अचानक ‘तुम गंवार हो… तुम गंवार हो…’ शब्द गूंजने लगे… आभा घिरी हुई रात के बीच अतीत के गलियारों में भटकने लगी…

‘‘मांबाप ने तुम जैसी गंवार मेरे पल्ले बांध मेरी जिंदगी खराब कर दी है. तुम्हारी जगह कोई पढ़ीलिखी, नौकरीपेशा बीवी होती तो मुझे कितनी मदद मिल जाती. एक की कमाई से घर कहां चलता है. तुम्हें तो लगता है कि घर संभाल रही हो तो यही तुम्हारी बहुत बड़ी क्वालिफिकेशन है. अरे घर का काम तो मेड भी कर सकती है, पर कमा कर तो बीवी ही दे सकती है,’’ नरेश हमेशा उस पर झल्लाता रहता.

आभा ज्यादातर चुप ही रहती थी. बहुत पढ़ीलिखी न सही पर ग्रैजुएट थी. बस आगे कोई प्रोफैशनल कोर्स करने का मौका ही नहीं मिला. कालेज खत्म होते ही शादी कर दी गई. सोचा था शादी के बाद पढ़ेगी, पर सासससुर, देवर, ननद और गृहस्थी के कामों में ऐसी उलझी कि अपने बारे में सोच ही नहीं पाई. टेलैंट उस में भी है. मूर्ख नहीं है. कई बार उस का मन करता कि चिल्ला कर एक बार नरेश को चुप ही करा दे, पर सासससुर की इज्जत का मान रखते हुए उस ने अपना मुंह ही सी लिया. घर में विवाद हो, यह वह नहीं चाहती थी.

मगर मन ही मन ठान जरूर लिया था कि वह पढ़ेगी और स्मार्ट बन कर दिखाएगी…

स्मार्ट यानी मौडर्न और वह भी कपड़ों से…

ऐसी नरेश की सोच थी… पर वह स्मार्टनैस सोच में लाने में विश्वास करती थी. जल्दीजल्दी 2 बच्चे हो गए, तो उस की कोशिशें फिर ठहर गईं. बच्चों की अच्छी परवरिश प्राथमिकता बन गई. मगर खर्चे बढ़े तो नरेश की झल्लाहट भी बढ़ गई. बहन की शादी पर लिया कर्ज, भाई की भी पढ़ाई और मांबाप की भी जिम्मेदारी… गलती उस की भी नहीं थी. वह समझ रही थी इसलिए उस ने सिलाई का काम करने का प्रस्ताव रखा, ट्यूशन पढ़ाने का प्रस्ताव रखा पर गालियां ही मिलीं.

‘‘कोई सौफिस्टिकेटेड जौब कर सकती हो तो करो… पर तुम जैसी गंवार को कौन नौकरी देगा. बाहर निकल कर उन वर्किंग वूमन को देखो… क्या बढि़या जिंदगी जीती हैं. पति का हाथ भी बंटाती हैं और उन की शान भी बढ़ाती हैं.’’

आभा सचमुच चाहती थी कि कुछ करे. मगर वह कुछ सोच पाती उस से पहले ही विस्फोट हो गया.

‘‘निकल जा मेरे घर से… और अपने इन बच्चों को भी ले जा. मुझे तेरी जैसी गंवार की जरूरत नहीं… मैं किसी नौकरीपेशा से शादी करूंगा. तेरी जैसी फूहड़ की मुझे कोई जरूरत नहीं.’’

सकते में आ गई थी वह. फूहड़ और गंवार मैं हूं कि नरेश… कह ही नहीं पाई वह.

सासससुर के समझाने पर भी नरेश नहीं माना. उस के खौफ से सभी डरते थे. उस के चेहरे पर उभरे एक राक्षस को देख उस समय वह भी डर गई थी. सोचा कुछ दिनों में जब उस का गुस्सा शांत हो जाएगा, वह वापस आ जाएगी. 2 साल की पल्लवी और 1 साल के पल्लव को ले कर जब उस ने घर की देहरी के बाहर पांव रखा था तब उसे क्या पता था कि नरेश का गुस्सा कभी शांत होगा ही नहीं.

मायके में आ कर भाईभाभी की मदद व स्नेह पा कर उस ने ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमैंट की पढ़ाई की. फिर जब एक कंपनी में उसे नौकरी मिली तो लगा कि अब उस के सारे संघर्ष खत्म हो गए हैं. बच्चों को अच्छे स्कूल में डाल दिया. खुद का किराए पर घर ले लिया.

इतने सालों बाद फिर से यह झंझावात कहां से आ गया. यह सच है कि नरेश ने तलाक नहीं लिया था, पर सुनने में आया था कि किसी पैसे वाली औरत के साथ ऐसे ही रह रहा था. सासससुर गांव चले गए थे और देवर अपना घर बसा कर दूसरे शहर में चला गया था. फिर अब बच्चे क्यों चाहिए उसे…

वह इस बार हार नहीं मानेगी… वह लड़ेगी अपने हक के लिए. अपने बच्चों की खातिर. आखिर कब तक उसे नरेश के हिसाब से स्वयं को सांचे में ढालते रहना होगा. उसे अपने अस्तित्व की लड़ाई तो लड़नी ही होगी. आखिर कैसे वह जब चाहे जैसा मरजी इलजाम लगा सकता है और फिर किस हक से… अब वह तलाक लेगी नरेश से.

अदालत में जज के सामने खड़ी थी आभा. ‘‘मैं अपने बच्चों को किसी भी हालत में इसे नहीं सौंप सकती हूं. मेरे बच्चे सिर्फ मेरे हैं. पिता का कोई दायित्व कब निभाया है इस आदमी ने…’’

‘‘तुम्हारी जैसी महत्त्वाकांक्षी, रातों को देर तक बाहर रहने वाली, जरूरत से ज्यादा स्मार्ट और मौडर्न औरत के साथ बच्चे कैसे सुरक्षित रह सकते हैं? पुरुषों के साथ मीटिंग के बहाने बाहर जाती है, उन से हंसहंस कर बातें करती है… मैं ने इसे छोड़ दिया तो क्या यह अब किसी भी आदमी के साथ घूमने के लिए आजाद है? जज साहब, मैं इसे अभी भी माफ करने को तैयार हूं. यह चाहे तो वापस आ सकती है. मैं इसे अपना लूंगा.’’

‘‘नहीं. कभी नहीं. तुम इसलिए मुझे अपनाना चाहते हो न, क्योंकि मैं अब कमाती हूं. तुम्हें उस अमीर औरत ने बेइज्जत कर के बाहर निकाल दिया है और तुम चाहते हो कि मैं तुम्हें कमा कर खिलाऊं? नरेश मैं तुम्हारे हाथों की कठपुतली बनने को तैयार नहीं हूं और न ही तुम्हें बच्चों की कस्टडी दूंगी. हां, तुम से तलाक जरूर लूंगी.

‘‘जज साहब अगर बच्चों को अच्छी जिंदगी देने के लिए मेहनत कर पैसा कमाना चारित्रहीनता की निशानी है तो मैं चरित्रहीन हूं. जब मैं घर की देहरी के अंदर खुश थी तो मुझे गंवार कहा गया, जब मैं ने घर की देहरी के बाहर पांव रखा तो मैं चरत्रिहीन हो गई. आखिर यह कैसी पुरुष मानसिकता है… अपने हिसाब से तोड़तीमरोड़ती रहती है औरत के अस्तित्व को, उस की भावनाओं को अपने दंभ के नीचे कुचलती रहती है… मुझे बताइए मैं चरित्रहीन हूं या नरेश जैसा पुरुष?’’ आभा के आंसू बांध तोड़ने को आतुर हो उठे थे. पर उस ने खुद को मजबूती से संभाला.

‘‘मैं तुम्हें तलाक देने को तैयार नहीं हूं. तुम भिजवा दो तलाक का नोटिस. चक्कर लगाती रहना फिर अदालत के बरसों तक,’’ नरेश फुफकारा था.

केस चलता जा रहा था. पल्लवी और पल्लव को आभा को न चाहते हुए भी केस में घसीटना पड़ा. जज ने कहा कि बच्चे इतने बड़े हैं कि उन से पूछना जरूरी है कि वे किस के साथ रहना चाहते हैं.

‘‘हम इस आदमी को जानते तक नहीं हैं. आज पहली बार देख रहे हैं. फिर इस के साथ कैसे जा सकते हैं? हम अपनी मां के साथ ही रहेंगे.’’

अदालत में 2 साल तक केस चलने के बाद जज साहब ने फैसला सुनाया, ‘‘नरेश को बच्चों की कस्टडी नहीं मिल सकती और आभा पर मानसिक रूप से अत्याचार करने व उस की इज्जत पर कीचड़ उछालने के जुर्म में उस पर मानहानि का मुकदमा चलाया जाए. ऐसी घृणित सोच वाले पुरुष ही औरत की अस्मिता को लहूलुहान करते हैं और समाज में उसे सम्मान दिलाने के बजाय उस के सम्मान को तारतार कर जीवन में आगे बढ़ने से रोकते हैं. आभा को परेशान करने के एवज में नरेश को उन्हें क्व5 लाख का हरजाना भी देना होगा.’’

आभा ने नरेश के आगे तलाक के पेपर रख दिए. बुरी तरह से हारे हुए नरेश के सामने कोई विकल्प ही नहीं बचा था. दोनों बच्चों के लिए तो वह एक अजनबी ही था. कांपते हाथों से उस ने पेपर्स पर साइन कर दिए. अदालत से बाहर निकलते हुए आभा के कदमों में एक दृढ़ता थी. दोनों बच्चों ने उसे कस कर पकड़ा था. Kahani In Hindi

Hindi Stories Love : ऐसे ही आती रहना – स्त्रीपुरुष की संदेहजनक दोस्ती

Hindi Stories Love : शुभी का शक करना भी सही था लेकिन विशाखा ने जिस निर्मल और सहज हृदय के साथ शुभी की सेवापानी की, उस से उस ने प्रोफैसर और शुभी के दिलों में अपनी जगह बना ली.

वह आज आ रही है, यह सोच कर ही मेरा मन बल्लियों उछल रहा है. वह आएगी, मेरे सामने बैठेगी, उस के बारे में सोच कर और किसी बहाने से उस से फोन पर बात करने के बाद मेरे लिए खुद को संभालना काफी मुश्किल होता है. फिर, आज तो वह मेरे सामने होगी, यह सोच कर ही मैं रोमांच से भर उठता हूं. यद्यपि मैं जानता हूं कि इस अवसर पर मुझे रोमांच से नहीं भरना चाहिए पर क्या करूं, उस के आने की सूचना मात्र से ही मेरा रोमरोम हर्षित हो उठता है. मुझे आज भी याद है, 3 वर्ष पहले भी वह जब आने वाली थी तब भी सुबह से ही मैं ने घर सिर पर उठा रखा था और वही हाल मेरा आज भी है. जब से उस के आने की सूचना मिली है, मैं थोड़ीथोड़ी देर में किचन में जाता हूं और शुभी से कहने लगता हूं, ‘‘शुभि, उन्हें ये पसंद है, उन्हें खाने में बिना मिर्चमसाले की सब्जी पसंद है. शुभी, तुम्हें याद है न जब वे यहां थे तब वह अकसर बिना प्याजलहसुन की सब्जी बनाती थी. मेरी इतनी उत्सुकता और उतावलापन देख कर शुभी हंसते हुए कुछ मजाकिया अंदाज में बोल पड़ी, ‘‘इतना तो आप अपनी बेटी के आने पर उतावले नहीं होते जितने आज हो रहे हो.’’
‘‘तुम्हीं तो कहती हो कि कोई आता है तो उस का ध्यान रखना अपनी जिम्मेदारी है. अब तुम अकेली परेशान न हो, इसलिए ही तो मैं तुम्हारी मदद करने की कोशिश कर रहा था. अगर तुम्हें अच्छा नहीं लग रहा तो ठीक है, मैं जा कर टीवी देखता हूं. करो तुम अकेली ही सारा काम, मुझे क्या,’’ कुछ बनावटी सा गुस्सा दिखाते हुए मैं ने कहा.
‘‘अरे नहींनहीं, चलो जब तक मैं किचन का बाकी काम निबटा व नहा कर आऊं, तुम डाइनिंग टेबल सैट कर दो. वे लोग आएंगे तो सभी बैठ कर बातें करेंगे.’’ यह कह कर शुभी नहाने चली गई और डाइनिंग टेबल पर जरूरी सामान रख कर मैं बालकनी में आ कर बैठ गया. कुछ देर बाद शुभी 2 कप चाय ले कर मेरे बगल में आ कर बैठ गई. शुभी को पता है कि मौसम कोई भी हो, चाय मेरी कमजोरी है. चाय पीतेपीते शुभी बोली, ‘‘विशाखा अपने पति के साथ पहली बार आ रही है. चलो अच्छा ही हुआ कि उस ने शादी कर ली वरना मातापिता का साथ कब तक रहता है.’’
‘‘हूं, बात तो सही है.’’ इस के बाद शुभी बाकी के काम करने चली गई और मैं खो सा गया कुछ पुरानी यादों में.

हां, तो मैं आप को बता दूं कि वर्तमान में मैं यानी अंशुमान मिश्रा एक कालेज से रिटायर्ड प्रोफैसर हूं. मेरे परिवार में एक बेटी और एक बेटा हैं, दोनों विवाहित हैं और अमेरिका में सैटल्ड हैं. शुभी मेरी पत्नी है और सेवानिवृत्त होने के बाद पत्नी के साथ सुखी वैवाहिक जीवन का आनंद ले रहा हूं. उन दिनों मैं आगरा के सैंट जौंस कालेज में इतिहास विषय का हैड औफ द डिपार्टमैंट था जब मेरा परिचय विशाखा से हुआ था. मेरी सेवानिवृत्ति में 3 वर्ष थे और उस दिन मैं कुछ दिनों बाद ही कालेज में होने वाले इतिहास के एक सैमिनार की तैयारी में बिजी था कि उसी समय मेरे दरवाजे पर ‘मे आई कम इन, सर’ की आवाज सुन कर चौंक गया था.

जब सिर उठा कर देखा तो सामने एक सुंदर बाला को देख कर मन हर्षमिश्रित आश्चर्य से भर गया. दूधिया सफेद रंग, कंजी आंखें, कमर तक सर्प जैसी लहराती चोटी, लगभग 6 फुट की लंबाई और करीने से बांधी गई प्रिंट की प्योर सिल्क की साड़ी में वह बाला मु?ो किसी आसमान से उतरी परी जैसी प्रतीत हुई थी. मैं अपलक उसे देखने में इस कदर खो गया कि विशाखा का ‘मे आई कम इन सर,’ ?भी मुझे सुनाई ही नहीं पड़ा था.

जब विशाखा ने फिर से अपना प्रश्न दोहराया तो मैं ने कहा, ‘‘ओह, आइएआइए मैडम, प्लीज कम.’’
‘‘सर, आई एम विशाखा शर्मा, इतिहास की न्यू लैक्चरर.’’
‘‘यस, आई नो अबाउट यू, प्लीज सिट,’’ मैं ने अपने सामने पड़ी कुरसी की तरफ इशारा कर के विशाखा से कहा.
उस दिन की औपचारिक बातचीत के बाद विशाखा तो चली गई पर 59 साल की उम्र में भी मेरे ऊपर मानो उस का जादू चढ़ गया था. उस के बोलने के अंदाज और बला की खूबसूरती पर मैं तो पहली नजर में ही बोल्ड हो गया था. इस के बाद अकसर विशाखा से मिलना होता ही रहता था. आश्चर्य की बात यह थी कि तन के साथसाथ विशाखा इंटैलिजैंसी में भी किसी से कम न थी. यही नहीं, थोड़े ही समय में कालेज में भी उस ने खासी लोकप्रियता हासिल कर ली थी.

कालेज में आगामी कुछ दिनों में ‘भारतीय स्वतंत्रता संग्राम’ विषय पर एक राष्ट्रीय स्तर का सैमिनार होने वाला था, चूंकि मैं हैड औफ द डिपार्टमैंट था और इतिहास विषय के फिलहाल हम 2 ही प्रोफैसर थे, सो आजकल तैयारी के सिलसिले में विशाखा से अकसर मुलाकात होने लगी थी. हमेशा वैल ड्रैस्ड रहना, किसी भी मुद्दे पर अपनी स्पष्ट राय देना, खिलखिला कर हंसना और देशदुनिया के बारे में उस की जागरूकता देख कर मैं अकसर दंग रह जाता था. उस दिन काम करतेकरते काफी देर हो गई.
जब हम दोनों कालेज से निकले तो मैं ने उसे उस के घर छोड़ने का औफर दिया जिसे उस ने बड़ी सहजता से स्वीकार कर लिया. रास्ते में कार चलाते हुए मैं ने उस के परिवार के सदस्यों के बारे में पूछा तो उस ने बहुत अल्प शब्दों में उत्तर दिया, ‘‘सर, मैं मूलतया कानपुर की रहने वाली हूं, यहां अपने मातापिता के साथ रहती हूं.’’

संक्षिप्त सा उत्तर दे कर वह चुप हो गई. मुझे लगा कि शायद वह इस के आगे कुछ और नहीं बताना चाहती, इसलिए मैं भी चुप हो गया पर तो क्या लगभग 40 की होने के बाद भी विशाखा अविवाहित है या फिर कोई और बात है, मैं इसी विचार में पड़ा था कि अचानक विशाखा की आवाज सुनाई दी, ‘‘सर, बस यहीं छोड़ दीजिए, अगले टर्न के कौर्नर पर मेरा घर है.’’
विशाखा की आवाज से मैं एकदम चौंका और बोला, ‘‘अरे नहींनहीं, मैं घर पर ही छोड़ देता हूं.’’ यह कह कर मैं ने गाड़ी मोड़ दी. विशाखा को उस के घर पर छोड़ कर मैं अपने घर की तरफ चल दिया. रात के 9 बजे का समय सभी के अपने घर लौटने का समय होता है. आजकल ट्रैफिक ने हर जगह अपने पांव इतने अधिक पसार लिए हैं कि हर शहर दिल्ली के ट्रैफिक को मात देने लगा है. सो, मेरी गाड़ी भी मंदमंद गति से ही चल रही थी.
जैसे ही घर पहुंचा, हैरानपरेशान सी शुभी को बालकनी में चक्कर काटते हुए पाया. मुझे देखते ही उस ने ‘कहां चले गए थे आज? कब से फोन लगा रही हूं? उठा क्यों नहीं रहे थे?’ जैसे अनेक सवाल दाग दिए.
‘‘अरे भाई, मुझे घर के अंदर आने दोगी कि नहीं,’’ कह कर मैं ने घर में प्रवेश किया और शुभी मेरे पीछेपीछे आ गई.
‘‘अरे, आज जो नई लैक्चरर आई है, उस को घर छोड़ना था, इसलिए देर हो गई.’’
‘‘और फोन क्यों नहीं उठा रहे थे. जब उठाते नहीं हो तो फोन खरीदा क्यों है,’’ शुभी कुछ तैश में बोली.
‘‘सैमिनार की तैयारी कर रहे थे, इसलिए फोन साइलैंट मोड पर कर दिया था और औन करना भूल गया था. अब चाय भी पिलाओगी या झगड़ा ही करती रहोगी, मेरी जानेमन.’’ मैं ने कुछ प्यार से शुभी के गाल पर एक किस्सी जड़ दी थी और शुभी ‘‘तुम भी न, इस उम्र में भी’’ कह कर शरमाती हुई चली गई थी और मैं फ्रैश होने बाथरूम में.

शुभी के साथ यही समस्या थी कि 55 की उम्र में ही वह खुद को 80 की समझने लगी थी. जरा भी रोमांस का मूड बनाओ तो झिड़क देती थी. मैं अभी कुछ और मधुर स्मृतियों में गोता लगाता कि तभी शुभी का स्वर मेरे कानों में पड़ा, ‘‘अरे आप को बाजार से कुछ मिठाइयां लानी थीं न, भूल गए क्या?’’
‘‘अरे हां, जाता हूं बस,’’ कह कर मैं ने बैग और कार की चाबी ली और चल दिया बाजार.
बाजार से आ कर मैं ने शुभी से पूरी तैयारियों का जायजा लिया और आ कर अपने बैडरूम में टीवी के सामने जम गया. मेरी आंखें तो टीवी स्क्रीन पर थीं पर मन फिर दौड़ लगाते हुए आज से लगभग 8 वर्ष पहले जा पहुंचा जब विशाखा से मेरी अनौपचारिक मुलाकातें होने लगी थीं. मुझे उस की नजदीकी एक सुकून देने लगी थी, मेरी हर समस्या का सौल्यूशन उस के पास होता था. उस के चेहरे की जरा सी उदासी मुझे परेशान कर देती थी. चूंकि इतिहास के हम 2 ही प्रोफैसर थे, सो विभिन्न शहरों में होने वाले कालेज के सैमिनारों में भी हम दोनों ही जाते थे.

मेरी विशाखा से बढ़ती नजदीकियों ने कब शुभी के मन में शक का बीज बो दिया, मुझे पता ही न चला जबकि शुभी के प्रति मेरे व्यवहार में लेशमात्र भी बदलाव नहीं था. एक दिन जब रात को मैं काफी लेट घर पहुंचा तो दरवाजा खोलते ही शुभी के बदले तेवर देख कर हैरान रह गया, ‘‘इतनी देर कैसे हो गई?’’
‘‘अरे, तुम्हें बताया तो था कि आजकल कालेज में बहुत काम है.’’
‘‘क्या हर समय कामकाम लगाए रहते हो, मुझे सब पता है क्या, कितना और कैसा काम चल रहा है आजकल.’’
‘‘क्या हुआ शुभी, ये उलटीसीधी बातें क्यों कर रही हो?’’ मैं ने आश्चर्य से कहा.

‘‘इतने दिनों से देख रही हूं, तुम उस नई लड़की विशाखा को ले कर कुछ ज्यादा उत्साहित नहीं रहते हो. मिसेज बंसल भी आज मुझे बता रही थीं कि आजकल तुम दोनों बस आपस में ही लगे रहते हो. घंटों स्टाफरूम में बैठ कर अपनी ही बातें करते रहते हो. आज ही मुझे समझ आया कि आजकल तुम देर से क्यों आते हो,’’ शुभी ने हम दोनों पर आरोप लगाते हुए कहा.
‘‘ओहो, क्या हो गया है तुम्हारी बुद्धि को, जियोग्राफी के प्रोफैसर बंसल की पत्नी मिसेज बंसल को तुम जानतीं नहीं क्या कितनी पंचायती है, कालेज के हर इंसान के बारे में तरहतरह की बातें बनाना उस का काम है. तुम उस की बातों पर भरोसा कर रही हो. मुझ से लगभग 20 वर्ष छोटी होगी वह और तुम.’’ मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था कि इस समस्या का निदान कैसे करूं. खैर, गुस्से में डाइनिंग टेबल पर चाय छोड़ कर मैं अपने रूम में आ गया.

विशाखा को कालेज जौइन किए 8 माह हो गए थे. विशाखा मुझे अच्छी लगती थी, यह सही था परंतु उस में प्यार, प्रेम या वासना जैसा भाव कभी नहीं था. हम स्टाफरूम में बैठ कर देश, दुनिया और समाज के विभिन्न मुद्दों पर घंटों बातें करते रहते थे. विशाखा का व्यक्तित्व ही ऐसा था कि मैं खुद उस तरफ खिंच जाता था. एक दिन जब मैं विशाखा को घर छोड़ने आ रहा था तो वह बोली, ‘सर, आप के परिवार में कौनकौन है?’
‘विशाखा, मेरी एक बेटी और बेटा है. दोनों ही अपने परिवार के साथ यूएस में सैटल्ड हैं. यहां पर मैं अपनी पत्नी शुभी के साथ रहता हूं. चलो, आज मैं तुम्हें शुभी से मिलवाता हूं.’ शायद विशाखा से मिलने के बाद शुभी का शक का कीड़ा निकल जाए, इसलिए मैं ने विशाखा के सामने घर चलने का प्रस्ताव रख दिया.
‘सर, मैं श्योर आप के साथ चलती पर आज मुझे घर जा कर मांपापा को डाक्टर के पास ले जाना है. अगली बार मैं मेम से मिलने जरूर चलूंगी.’
‘क्यों, क्या हुआ पापामम्मी को?’
‘नहीं सर, हुआ तो कुछ नहीं है पर रूटीन चैकअप करवाना है ताकि एकदम से कोई मुसीबत न आ जाए वैसे भी यह शहर मेरे लिए नया है.’

‘अरे, तुम चिंता क्यों करती हो, जब कभी कोई भी जरूरत हो तो जरूर बताना. कभी भी अकेला मत समझना खुद को. वैसे, तुम बुरा न मानो तो एक बात पूछूं. तुम्हारे परिवार में और कौनकौन है.’’ न जाने क्यों मैं उस के परिवार के बारे में जानने को बहुत उत्सुक था.’
‘सर, मैं ने बताया था न आप को, बस मैं और मेरे मातापिता,’ विशाखा ने कहा तो इस बार मैं थोड़ा ज्यादा खुल गया और कहा, ‘तो आप ने विवाह…’ आगे के शब्द लाख चाहने पर भी मेरे मुंह से निकल ही नहीं पाए.
‘सर, बहुत लंबी दास्तान है, क्या करेंगे सुन कर,’ विशाखा ने उदास स्वर में कहा.
‘विशाखा, एक बात कहूं, कभीकभी कहने से मन हलका हो जाता है, इसलिए चाहो तो कह डालो. अभी तो तुम्हारा घर दूर है.’ मैं मानो विशाखा की जिंदगी का सबकुछ जान लेना चाहता था.

‘सर, आम लड़कियों की भांति मेरी भी शादी एक अच्छे खातेपीते परिवार में हुई थी. उस समय मैं ग्रेजुएशन कर रही थी और पोस्टग्रेजुएट कर के आगे नैट की परीक्षा देना चाहती थी पर अचानक से मेरी मौसी एक रिश्ता ले कर आ गईं. लड़के वाले उन के दूर के किसी रिश्तेदारी में थे. वे एक दिन आए और मैं उन्हें पसंद आ गई थी. उन लोगों का एक्सपोर्टइंपोर्ट का बिजनैस था. पैसे वाले लोग थे. पापामम्मी को लगा कि इकलौती लड़की है, अच्छा घरपरिवार मिल रहा है तो आननफानन शादी कर दी.
‘शादी के समय मुझे आगे पढ़ने के लिए भी सहमति दी गई थी पर बाद में सब भुला दिया गया. उन के परिवार में महिलाओं को बिजनैस के लिए यूज किया जाता था. पार्टियों में सजाधजा कर मूर्तियों की तरह बैठा देते और विरोध करने का मतलब मारपीट और गालीगलौज. महिलाओं का अस्तित्व ही सिर्फ यही था कि वे बिजनस के लिए आने वाले क्लाइंट्स के लिए पार्टियों की व्यवस्था करें. हम महिलाओं को तो अपनी बात कहना दूर, मुंह खोलने तक की इजाजत न थी.
‘मेरे लिए ये सब बहुत असहनीय था. जिस परिवार में मेरी ही इज्जत नहीं थी वहां आगे चल कर मेरे मातापिता की क्या इज्जत होगी. ऐसे में जरूरत पड़ने पर मैं अपने मातापिता के लिए क्या कर पाऊंगी, यह सब सोच कर दिल घबरा उठता था. फिर एक दिन पिताजी को हार्ट अटैक आया. मां के अकेले होने के बाद भी मुझे रुकने की परमिशन नहीं दी गई क्योंकि कोई विदेशी क्लाइंट आने वाला था जिस के लिए मेरा वहां रहना जरूरी था. इस स्थिति में मां को अकेला छोड़ कर जाने से मैं ने मना कर दिया तो मेरे पति ने गुस्से से कहा कि फिर दोबारा घर आना भी मत.
‘उस के बाद मेरा जाने का भी मन नहीं किया और जब मेरे मातापिता को सच्चाई का पता चला तो उन्होंने कहा, ‘अब तुम्हें भी वहां जाने की जरूरत नहीं है, ऐसे घर में जीवन नहीं काटा जा सकता जहां इंसान की भावनाओं की कोई कीमत न हो. उस के बाद सर, मैं ने पोस्टग्रेजुएट किया, फिर एक तरफ नैट की परीक्षा दी और दूसरी तरफ पति को तलाक का नोटिस. सर, मैं भी ऐसा कलहपूर्ण जीवन नहीं जीना चाहती थी क्योंकि मुझे हमेशा लगता है कि जिंदगी जीने के लिए है न कि ढोने के लिए. नैट में मेरा पहली बार में ही चयन हो गया था और पीएचडी कर के अब आप के जैसे विद्वान प्रोफैसर के अंडर में काम कर रही हूं,’ कह कर विशाखा चुप हो गई.
‘ओह, यू कैन कौल मी एनी टाइम.’ अब तक विशाखा का घर भी आ चुका था. सो, मैं ने उसे उतारा और आगे गाड़ी बढ़ा दी. विशाखा की दास्तान सुनने के बाद मेरी उस के प्रति सहानुभूति बढ़ गई थी. इस के बाद तो विशाखा भी मुझ से काफी खुल गई थी और मैं भी. अकसर लोग एक स्त्रीपुरुष की मित्रता को संदेहास्पद नजरों से देखने लगते हैं पर मुझे हमेशा लगता है कि तन की भूख से अधिक आवश्यक है इंसान की दिमागी भूख का शांत होना.

शुभी एक बहुत अच्छी पत्नी है, इस में कोई शक नहीं है लेकिन उस की दुनिया घरपरिवार, बच्चे, किटी पार्टियों, साड़ीगहनों तक सीमित है. यह सही है कि जिंदगी के हर मोड़ पर उस ने मेरा खुशीखुशी साथ दिया है लेकिन फिर भी कुछ है जो विशाखा में शुभी से अलग है, कुछ है जिसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता. आम महिलाओं से उस में कुछ अलग है जिस से मुझे उस से बात करना अच्छा लगता है. विशाखा एकदम खुले विचारों वाली महिला थी. हां, कभी भी मेरे मन में उस के प्रति गलत भाव या आसक्ति के भाव नहीं आए. हमारी दोस्ती थी गंगा की तरह निर्मल, पवित्र, सरल और सहज जिसे जीना अच्छा लगता था. जो बोरिंग जिंदगी में रंग भर देती थी. वह मुझ से बहुत छोटी लेकिन फिर भी कुछ साम्य था जो हमें किसी मोड़ पर नजदीक ला देता था, जो मुझे अच्छा लगता था पर अब शुभी को समझना सब से बड़ी समस्या थी.

जिंदगी अपने तरीके से अपने ही ढर्रे पर चल रही थी पर कहते हैं न कि जिंदगी हर दिन नए सवाल और नए चैलेंज ले कर आती है. सो, एक दिन रात को शुभी के पेट में भयंकर दर्द उठा. मैं तुरंत उसे हौस्पिटल ले कर पहुंचा. 2 दिन तक तमाम टैस्ट होने के बाद डाक्टर ने उस के यूट्रस की लेयर के काफी मोटी होने के कारण कैंसर की आशंका जताई. कैंसर नाम सुनते ही मेरे होश उड़ गए. मेरे चेहरे के उड़े रंग को देख कर डाक्टर बोले, ‘नथिंग अबाउट वरी. वी विल रिमूव यूट्रस एंड आफ्टर देन वी सेंट इट फौर कैंसर डायग्नोसिस. मे बी इट इज नौट कैंसरस.’

अपनी मां के बारे में जान कर दोनों बच्चों ने इंडिया आने की इच्छा जताई पर मैं ने कहा, ‘अभी तो सारा काम हौस्पिटल का ही रहेगा. आजकल बहुत अच्छे हौस्पिटल होते हैं जहां केवल पैसा देना होता है. जब तुम्हारी मां ठीक हो कर घर आ जाए तब आना तो उस के साथ रहोगे तो उसे अच्छा लगेगा.’

बच्चों को भी मेरी बात समझ आ गई और उन्होंने अगले माह का आने का टिकट करवा लिया. 3 दिन से मैं कालेज नहीं गया था और इस बीच व्यस्तता के कारण आने वाले फोन कौल्स का जवाब भी नहीं दिया था. विशाखा के 10 फोन कौल्स देख कर मैं ने उसे फोन लगाया तो वह लगभग मुझे डांटती हुई बोली, ‘क्या सर, फोन आप रखते किसलिए हैं जब उठाना नहीं होता. कितने कौल्स किए मैं ने आप को.’
‘‘अरे, वह शुभी को…’’ कहते हुए मैं ने पूरी दास्तान उसे सुना दी.
‘‘अरे, इतनी बड़ी बात हो गई और आप ने मुझे बताया तक नहीं. एक फोन तो करना था,’’ कह कर उस ने फोन रख दिया.
इस के एक घंटे बाद ही विशाखा मेरे सामने थी. ‘अरे सर, दीदी को इतनी परेशानी थी, आप अकेले थे पर बताया क्यों नहीं?’

इस के बाद तो विशाखा ने शुभी की पूरी जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी. उस के औपरेशन होने से ले कर घर आने तक विशाखा उस के साथ छाया की तरह रही. उस की हर छोटीछोटी बात का ध्यान रखती थी विशाखा. ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर आदि भी अकसर वह अपने घर से ले कर आती या फिर हमारे घर आ कर बना देती थी. धीरेधीरे शुभी और विशाखा की बढ़ती नजदीकी मुझे बड़ा सुकून दे रही थी कि शायद अब शुभी के मन का संदेह दूर हो पाए. लगभग एक माह बाद शुभी पूरी तरह ठीक हो गई थी और सब से बड़ी संतोषजनक बात यह थी कि शुभी के यूट्रस की रिपोर्ट भी कैंसरस नहीं थी.

ठीक होने के लगभग एक सप्ताह बाद शुभी ने एक दिन सुबह मुझ से कहा, ‘आज शाम को कुछ गेस्ट डिनर पर आने वाले हैं. आते समय रसमलाई और बटरस्कौच आइसक्रीम लेते आना. यह मत पूछना कि कौन आ रहा है. यह मेरी तरफ से तुम्हारे लिए सरप्राइज है.’ मैं ने सोचा कि शायद शुभी की कुछ फ्रैंड्स आ रही होंगी और ज्यादा दिमाग न लगा कर मैं कालेज चला गया.

शाम को जब मैं कालेज से लौटा तो देखा, शुभी ने घर को बहुत खूबसूरती से सजा रखा था. मैं कुछ समझ पाता, उस से पहले ही कौलबेल बजी और किचन में से शुभी ने मुझ से दरवाजा खोलने को कहा. मैं ने जैसे ही दरवाजा खोला तो विशाखा को अपने मातापिता के साथ देख कर हैरान रह गया. तभी शुभी मेरे पीछे से आई और बोली, ‘मिश्राजी, चौंकिए मत, मिलिए मेरी छोटी बहन विशाखा और उस के मम्मीपापा यानी मेरे अंकलआंटीजी.’

मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था. सो, यंत्रवत मैं ने अपने दोनों हाथ नमस्ते की मुद्रा में उन के सामने जोड़ दिए थे. शुभी का बदला स्वरूप मुझे सुकून देने वाला भी था और हैरत करने वाला भी. उस दिन जब वे लोग खाना खा कर चले गए तो कुछ अंतरंग क्षणों में शुभी ने मेरे दोनों हाथों को अपने हाथ में ले लिया और बोली, ‘मुझे माफ कर दो, मिश्राजी. मुझे आज खुद अपनी छोटी सोच पर शर्म आ रही है. विशाखा बहुत अच्छी लड़की है.’
‘मुझे अच्छा लगा कि तुम ने शक किया, आखिर मुझे पता तो चला कि इस उम्र में भी तुम मेरे ऊपर अपना पूरा अधिकार समझती हो,’ कहते हुए मैं ने शुभी को अपनी तरफ खींच कर बांहों में कैद कर लिया. उस दिन शुभी भी बिलकुल नवविवाहिता की तरह मेरे सीने से चिपक गई.

मेरे रिटायरमैंट के 3 साल बाद तक भी विशाखा आगरा में ही रही. इन 3 सालों में अकसर वह मेरे पास आती रहती थी कालेज के किसी न किसी काम से और यदि कभी वह नहीं आ पाती थी तो मैं ही इतिहास विभाग में जा कर बैठ जाता था जिस से विशाखा के साथसाथ अन्य लोगों से भी मुलाकात हो जाया करती थी. 6 साल तक आगरा में रहने के बाद विशाखा का ट्रांसफर आगरा से दिल्ली हो गया था.

रिटायर्ड हैड औफ द डिपार्टमैंट होने के कारण मुझे भी उस की फेयरवेल में बुलाया गया था. उस दिन जब मैं घर आया था तो मेरा उदास चेहरा देख कर शुभी कुछ व्यंग्य सा करते हुए बोली, ‘‘आज आप बहुत दुखी लग रहे हो. चिंता मत करो, विशाखा मुझे दीदी कहती है, कभी भी बुला लूंगी.’’

कुछ दिनों बाद वहीं पर उस ने अपने एक सहकर्मी के साथ विवाह कर लिया था. उस के जाने के बाद सच कहूं तो मैं बहुत अकेला सा हो गया था. अब कोई ऐसा नहीं था जिस से मैं खुल कर बातें कर सकूं. एक दिन मेरा बहुत मन कर रहा था कि उस से बात करूं पर वह क्या सोचेगी, यह सोच कर रुक गया. फिर मन नहीं माना तो मैं ने विवाह की बधाई देने के बहाने मोबाइल पर उस का नंबर घुमा दिया था.

इस तरह किसी महिला को मैं पहली बार फोन कर रहा था, सो, न जाने क्यों मेरी आवाज उस दिन कांप सी गई थी पर जैसे ही उस ने उधर से फोन उठाया, ‘‘हैलो सर, कैसे हैं आप? और शुभी दी कैसी हैं?’’

वही जानीपहचानी खिलखिलाहट सुन कर दिल खुश हो गया. यही नहीं, उस की आवाज कानों में पड़ते ही मानो मेरे दिल की अनेक घंटियां बजने लगी थीं. दिल बाघबाघ हो गया था. दिल के सोए तार झंकृत होने लगे थे. खुद को कुछ संभालते हुए मैं ने कहा, ‘‘विशाखा, बहुतबहुत बधाई. मैं ने सोचा, मैसेज की जगह फोन पर ही बधाई दी जाए ताकि आप की आवाज भी सुनने को मिल जाए.’’

यह सुनते ही वह खिलखिला कर हंस पड़ी थी और मैं उस की खिलखिलाहट में खो सा गया था. अभी मैं उस की खिलखिलाहट में खोया ही था कि विशाखा ने अपने पति से बात करवाई. काफी खुश लग रही थी वह. मुझे इस से कोई फर्क ही नहीं था कि वह अब शादीशुदा है पर मुझे उस का साथ अच्छा लगता था और वह भी खुले विचारों वाली थी और हमारी दोस्ती को सम्मानजनक नजरिए से देखती थी.

मेरा और उस का बौद्धिक स्तर कुछ हद तक एक था, जिस से मुझे उस से बातें करना अच्छा लगता था. यही कारण था कि जब 3 दिनों पहले उस का फोन आया, ‘‘सर, परसों कालेज में एक सैमिनार है, मैं और सोमेश आ रहे
हैं आगरा.’’
‘‘अरेअरे, मोस्ट वैलकम. बताओ कौन सी ट्रेन से आ रही हो, मैं लेने स्टेशन पर आ जाऊंगा. रुकना घर पर ही है. तुम से मिल कर शुभी बहुत खुश होगी,’’ मैं ने खुश होते हुए कहा तो वह बोली, ‘‘सर, आप और दीदी परेशान क्यों होते हैं, कालेज वालों ने रुकने का इंतजाम ताज होटल में किया है.’’
‘‘अरे नहींनहीं, कोई परेशानी नहीं है. हां, ताज होटल जैसा तो नहीं है मेरा घर.’’
‘‘नहीं सर, वह बात नहीं है. ठीक है, सर, परसों मिलते हैं. मुझे भी आप लोगों से मिलना बहुत अच्छा लगता है.’’
और तब से ही मेरी खुशी का ठिकाना नहीं है. मैं तो अभी भी विशाखा के खयालों में खोया था तभी शुभी की आवाज मेरे कानों में पड़ी, ‘‘देखो न, घंटी कब से बज रही है. तुम भी न, कानों में रुई लगाए हो क्या.’’
शुभी की आवाज सुन कर मैं ने झट दौड़ लगाई और पट से दरवाजा खोल दिया. सामने वही वैल ड्रैस्ड, हंसता हुआ चेहरा लिए विशाखा खड़ी थी.
‘‘आओआओ,’’ कह कर मैं ने उन्हें अंदर बुलाया.
विशाखा का पति सोमेश भी बहुत हैंडसम था. विशाखा जहां शुभी से बातें करने में व्यस्त थी वहीं मैं सोमेश से. विशाखा अब पहले से और भी अधिक खूबसूरत हो गई थी. शादी के बाद उस का रूप निखर गया था. मैं भले ही सोमेश से बातें कर रहा था पर कनखियों से विशाखा को भी जीभर कर देख लेता था. 2 दिनों तक विशाखा हमारे साथ रही. आज विशाखा के जाने का दिन था. जाते समय मैं ने भारी मन से उस से कहा कि ऐसे ही आती रहना. मिलनाजुलना होता रहेगा तो अच्छा रहेगा. Hindi Stories Love

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