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Love Story : भेलपुरी और सैंडविच – प्यार का सुखद अहसास रोमांस

Love Story : मैं उबले आलू की भरावन तैयार करते हुए सामने वाली कंपनी के गेट को भी देखे जा रहा था, दोनों अभी तक आए नहीं. मैं ने मन में उन दोनों का नाम भेलपुरी और सैंडविच रख लिया है. आज औफिस आए भी हैं या नहीं, 10 तो बज रहे हैं. इतने में दोनों आते दिख ही गए, मेरे हाथ जल्दीजल्दी चलने लगे, अभी लड़की आते ही कहेगी, “भैया, जरा जल्दी से एक कप चाय और एक सैंडविच दे दो.”

वही हुआ भी. लड़की ने आते ही कहा, “भैया, जरा जल्दी से एक कप चाय और एक सैंडविच दे दो.”

मैं ने मुसकराते हुए बस सिर हिला दिया, ‘कैसे कहूं, मैं उन के लिए चाय का पानी चढ़ा चुका हूं. और सैंडविच बनाने की तैयारी भी कर चुका हूं.’

मैं ने 2 ब्रेड स्लाइस के बीच में आलू की भरावन रखी, पतले गोल प्याज के टुकड़े रखे, एक टमाटर का गोल कटा टुकड़ा रख कर उस पर चाट मसाला छिड़का, ब्रेड के दोनों तरफ खूब मक्खन लगा कर जलते स्टोव पर सैंडविचर में रख कर उलटपुलट कर सेंकने लगा. 3-4 मिनट में ही सैंडविच अच्छी तरह से सिंक गया, फिर मक्खन लगाया, एक पेपर प्लेट में रख कर उस के 4 टुकड़े किए, एक कप में चाय छानी और उन्हें दे दी.

लड़की इस समय बस चाय पीती है, लड़का सैंडविच खाता है. दोनों एक साल से मेरे ठेले पर आते हैं, सामने की कंपनी में ही साथ काम करते हैं. रोज दिखने वाले चेहरे इतने परिचित हो जाते हैं कि कोई रिश्ता न होते हुए भी सब एकदूसरे को जानते चले जाते हैं.

मुझे तो इन दोनों की इतनी आदत हो गई है कि चाहे ठेले पर कितनी भी भीड़ हो जाए, मुझे इन का इंतजार रहता है. इन के साथ के बाकी लोग आतेजाते रहते हैं, कभी आते हैं, कभी नहीं.

यह लड़की घर से नाश्ता कर के आती है, लड़का शायद अकेला रहता है, यहीं नाश्ता करता है. दोनों शाम को एक बार फिर 6 बजे आते हैं. लड़की उस समय भेलपूरी खाती है. दोनों की बातों से मुझे इतना अंदाजा लग चुका है कि लड़का दिल्ली से आया हुआ है और लड़की यहीं की है, फोन पर घर वालों से मराठी बोलती है. मैं भी मराठी समझने लगा हूं. लड़के को मराठी नहीं आती.

“आज तुम क्या नाश्ता कर के आई?” लड़का पूछ रहा था.

“वही, पोहा. हर दूसरे दिन पोहा बनता है घर में, बाबा तो रोज खा सकते हैं.”

“अरे, मुझे तो पोहा बहुत पसंद है. तुम कितनी लकी हो, सब कियाकराया मिल जाता है. यहां तो न बनाना आता है, न टाइम है. तुम्हें पता है, अनिल ने कल रात मुझे फोन किया था, उस क्लाइंट ने मेरा जीना हराम कर रखा है, यार. यह अनिल मैरिड है, इस की कोई फैमिली लाइफ है या नहीं. इस की वाइफ इसे कुछ कहती नहीं क्या? यह मेरे साथ रात 11 बजे तक फोन पर था.”

मैं और लोगों के लिए चाय और सैंडविच बनाता जा रहा था, पर मेरे कान हमेशा की तरह इन दोनों की बातों पर थे. ये मेरे थोड़ा पास ही साइड में खड़े होते हैं.

यह सुनते ही लड़की हंसी, “अब जब तक यह डील फाइनल नहीं करवा लेगा, तुम ही हो इस की वाइफ. यार, ये जितने भी सीनियर हैं, इन के चेहरे देखे हैं, आजकल उड़े ही रहते हैं. काम ही नहीं खत्म हो रहा है.”

“तुम लड़कियों के साथ कम से कम हंसता तो है अनिल. हमें देख कर तो जम्हाइयां लेता है.”

दोनों इस बात पर खूब हंसे और फिर मुझे रोज की तरह पैसे दे कर चले गए. अब ये शाम को आएंगे. शाम को मेरी बनाई भेलपुरी खाने के लिए औफिस से निकलते हुए कई लोग आते हैं, जो घर जाते हुए यहां खड़े हो कर गप्पें मारते हुए दिनभर की भड़ास निकालते हैं. कोईकोई तो भेलपुरी पैक करवा कर घर भी ले जाता है.

मुझे इन दोनों को साथ देखना अच्छा लगता है, इन की बातें सुनना और भी अच्छा लगता है. ज्यादा पढ़ालिखा तो हूं नहीं, वरना गांव से यहां आ कर यह ठेला क्यों लगाता. 2 बजे तक ही मैं यहां खड़ा होता हूं, उस के बाद कोई आता नहीं. शाम को मैं सैंडविच और चाय के साथ भेलपुरी भी रखता हूं.

इस जगह खड़े होने से फायदा होता है, सामने औफिस ही औफिस हैं, यह एक छोटी सी सड़क है, इस के आगे एक मौल है, मौल के अंदर जाने वाले वहां के महंगे खाने से बचने के लिए कई बार यहीं कुछ खा कर आगे बढ़ते हैं. इस सड़क पर बस एक मैं हूं और थोड़ी दूर पर एक डोसे वाला. वह दीपक भी मेरे ही गांव का है. पूर्वी उत्तर प्रदेश के जौनपुर से 20 किलोमीटर दूर गांव है हमारा, मरियाहू. यहां हम ने एक कमरा किराए पर लिया है, जहां हम 4 लोग रहते हैं. साल में 2 बार हम गांव जाते हैं.

गांव में मेरी पत्नी है रमा, जो मेरी अम्मांबाबू के साथ रहती है. अब उस के 5 महीने का पेट है, बच्चा होने के टाइम मैं जाऊंगा. हम ठीकठाक गुजारे लायक कमा लेते हैं. यहां मुंबई में कई लोग ऐसे हैं, जिन का पेट हमारे जैसे खानों से ही भरता है. कुछ को सस्ता लगता है, कुछ टाइमपास में खाते हैं, कुछ जवान बच्चों को घर का खाना नहीं पसंद. शाम को लड़केलड़कियां खूब आते हैं. जवान लड़के तो दरियादिली से लड़की से ऐसे पूछते हैं कि बोलो, क्या खाओगी, अरे, और खाओ न. इतना कम क्यों? पहले ही इतनी शेप में हो.

थोड़ी बहुत अंगरेजी मैं भी समझने लगा हूं. शादीशुदा आते हैं, आदमी हमेशा ही जल्दी में रहता है, आते ही कहता है, जरा जल्दी देना. उन्हें साथ टाइम बिताने की तो कोई जल्दी होती नहीं है. उन के पास घर है ही. वहीं उस की पत्नी इतने शौक से खा रही होती है, लगता है, आज कुछ बनाने से इस की जान छूटी.

सारे ग्राहक एक तरफ, इन दोनों से मुझे खास लगाव हो गया है. अब शाम हो गई है, मैं फिर सामने देख रहा हूं, अब दोनों आने ही वाले हैं. दोनों आ रहे हैं. लड़की अभी आ कर कहेगी, “भैया, जरा तीखी भेल बना देना.” लड़का फिर कहेगा, “मेरे लिए मीडियम.”

लड़की ने पास आते हुए कहा, “भैया, जरा तीखी भेल बना देना.” लड़का बोला, “मेरे लिए मीडियम.”

यह सुन मैं मन ही मन मुसकराता हुआ दोनों के लिए भेलपूरी बनाने लगा. तैयारी तो सब कर के ही लाता हूं, छोटाछोटा प्याज, हरी मिर्च, धनिया घर से ही काट कर ले आता हूं, खट्टीमीठी चटनी तो बना कर रख लेता हूं. बस सब यहां मिलाना ही होता है. गांव जाता हूं, तो कई बार घर में सब को बना कर भी खिला देता हूं.

रमा को आजकल तीखा बहुत भाता है. उस के दिन ही ऐसे हैं. कमाने के चक्कर में दूर पड़ा हुआ हूं सब से, फिर सोचता हूं, जो भी ठेले पर खाने आते हैं, उन में से काफी लोग घर से दूर ही तो हैं. यह लड़का भी तो अकेला ही रहता है.

आज दोनों का मूड खराब लग रहा है, शायद झगड़ा हुआ हो. पर झगड़ा होता तो साथ क्यों आते. दोनों बात ही नहीं कर रहे, मैं ने उन दोनों को उन की भेलपुरी दी, दोनों ने चुपचाप पकड़ ली. लड़के ने लड़की को इतना तीखा खाने पर छेड़ा भी नहीं. बस थोड़ी देर बाद उस ने धीरे से पूछ लिया, “मतलब, तुम्हारी फैमिली मना करेगी तो हमारी शादी नहीं होगी?”

“अरशद, कैसे होगी, बताओ? आईबाबा बिलकुल तैयार नहीं.”

“मैं एक बार मिल लूं?”

“नहीं, तुम्हारी इंसल्ट कर देंगे, तो मुझे बहुत दुख होगा.”

“तुम ने पहले क्यों नहीं यह सब सोचा, नेहा?”

“प्यार सोचसमझ कर होता है क्या?”

यह सुन लड़के का मुंह लटक गया था. दोनों मेरे पीछे ही एक तरफ हट कर बात कर रहे थे. मेरे हाथों की स्पीड कम हो गई. कान पीछे ही लगे थे. इतना सुंदर जोड़ा… इतने बड़े शहर में पढ़ेलिखों में भी यह सब आज भी चलता जा रहा है, फिर हम गांव के लोगों की तो बात ही क्या सोचूं…

दोनों पैसे दे कर उखड़े से वापस चले गए. लड़का बाइक पर शायद लड़की को उस के घर के पास छोड़ता होगा. अगला पूरा हफ्ता दोनों साथ नहीं आए. मेरा दिल तो उन्हीं में रमा था, वे दोनों मेरे जीवन का ऐसा हिस्सा हो चुके थे कि मुझे पता ही नहीं चला था. आतेजाते दोनों अलगअलग दिखते, बिलकुल उदास, उतरे चेहरे.

धीरेधीरे एक महीना बीत गया. मुझे घर जा कर भी उन दोनों के बारे में सोच कर दुख होता रहा. क्या जाति, धर्म की बातें हमेशा ऐसे ही जवां दिलों के प्यार भरे दिलों को तोड़ती रहेगी. इतने पढ़ेलिखे बच्चों की बात इन के मातापिता के लिए माने नहीं रखती? इस लड़की के घर वालों को इस के चेहरे की उदासी नहीं दिखती? अरशद नाम है तो क्या हुआ, कितना प्यार करता है इस लड़की को. यह लड़की अरशद के साथ कितनी खुश रहती थी. इस की शादी इस के घर वाले किसी और के साथ कर देंगे, तो क्या इसे अरशद की याद नहीं आया करेगी?

दोनों मेरे दिलोदिमाग पर हावी रहने लगे, मैं हर समय उन दोनों को साथ देखने का इंतजार करता रहा. कितने ग्राहक आते, चले जाते. पर ऐसा लगाव मुझे किसी से न हुआ था.

मैं ने रमा को फोन पर उन की कहानी सुनाई. उस ने इतना ही कहा, “यह तो लड़कियों के साथ होता ही रहता है. यह कौन सी बड़ी बात है.”

रमा समझदार है, कम शब्दों में बहुतकुछ कह जाती है. मैं ने उसे छेड़ा, “तुम्हारे साथ तो यह नहीं हुआ न…?”

अब की बार रमा हंस दी, “नहीं, किसी और को पसंद करने का कभी मौका ही नहीं मिला. अब तो तुम ही सबकुछ हो,” उस की आवाज भर्रा गई, जानता हूं, वह मुझे बहुत प्यार करती है.

दिन गुजरते गए. बीचबीच में तो कभी अरशद और लड़की दिख भी जाते थे, अब तो कई दिन से नहीं दिखे थे. अब आतेजाते लोगों की भीड़ में कहीं गुम से हो जाते होंगे.

अचानक सुबह एक बाइक जब ठेले के सामने आ कर रुकी, मेरे हाथ रुक गए, मैं मुंहबाए उन्हें देखता रहा. लड़की नई दुलहन जैसी दमक रही थी, हाथों में मेहंदी लगी थी, आज जींसटौप नहीं, एक सुंदर सी साड़ी में थी. अरशद का चेहरा चमक रहा था. दोनों ने पास आ कर कहा, “दो चाय, दो सैंडविच देना भैया.”

मैं हंस दिया, पूछ ही लिया, “भैयाजी, बहुत दिनों बाद आए हो?”

“हां, हम ने शादी कर ली.”

“बधाई हो.”

दोनों ने हंसते हुए ‘थैंक यू’ कहा.

इतने में उन के एक साथी ने आ कर पूछा, “नेहा के घर वाले आराम से तैयार हो गए?”

नेहा हंसी, “अभी नाराज हैं. टाइम लगेगा. उन के तैयार होने में अपना टाइम खराब नहीं कर सकते थे. इतना पढ़लिख कर भी अगर धर्मजाति के चक्कर में पड़ कर एकदूसरे को खो दिया, तो हमारे समझदार होने पर लानत है.”

‘शाबाश नेहा,’ मैं ने मन ही मन कहा. और साथी आते गए, उन्हें बधाई दे कर पार्टी मांगते रहे. हंसीमजाक चलता रहा.

अरशद मुझे पैसे देने लगा, तो मैं ने कहा, “नहीं भैयाजी, आज नहीं. आज मेरी तरफ से,” कह कर वह हंस दिया. मेरे कंधे पर हाथ रख आ कर ‘ओके, दोस्त. थैंक यू…’ कह कर नेहा का हाथ पकड़ कर सामने अपने औफिस चला गया.

मैं उन्हें देखता रहा, मुसकराता रहा. पता नहीं क्यों, आज मैं बहुत खुश था.

Romantic Story : एक प्रेम कहानी का अंत – क्यों हुआ इस लव स्टोरी का खात्मा

Romantic Story : डा. सान्याल के नर्सिंग होम के आईसीयू में बिस्तर पर सिरहाना ऊंचा किए अधखुली आंखों में रुकी हुई आंसू की बड़ी सी बूंद. आज बेसुध है प्रियंवदा. गंभीर संकट में है जीवन उस का. जिसे भी पता चल रहा है वह भागा चला आ रहा है उसे देखने. आसपास कितने लोग जुट आए हैं, जो एकएक कर उसे देखने आईसीयू के अंदर आजा रहे हैं, पर वह किसी को नहीं देख रही, कुछ भी नहीं बोल रही. कभी किसी की निंदा तो कभी किसी की प्रशंसा में पंचमुख होने वाली, कभी मौन न बैठने वाली, लड़तीझगड़ती व हंसतीखिलखिलाती प्रियम आज बड़े कष्ट से सांस ले पा रही है. बाहर शेखर दौड़ रहे हैं, सुंदर, सुदर्शन पति, बूढ़े होने पर भी न सजधज में कमी न सौंदर्य में. और आज तो कुछ अधिक ही सुंदर लग रहे हैं. इतनी परेशान स्थिति में भी. मां कहती थीं कि ऐसे समय में यदि सुंदरता चढ़ती है तो सुहाग ले कर ही उतरती है. तो क्या प्रियम बचेगी नहीं? संजना के मन में धक से हुआ और ठक से वह दिन याद हो आया जब प्रियंवदा और शेखर का विवाह हुआ था आज से ठीक 10 वर्ष, 2 माह और 4 दिन पूर्व. पर उन की प्रेम कहानी तो इस से भी कई वर्ष पुरानी है.

पहली बार वे दोनों किसी इंटरव्यू के दौरान मिले. संयोग से उसी औफिस में दोनों की नियुक्ति हुई, साथसाथ ट्रेनिंग भी हुई और पोस्ंिटग भी एक ही विंग में हो गई. फिर क्या, वे एकसाथ लंच करते. जहां जाते, साथ ही जाते. प्रियम तो शेखर को देखते ही रीझ गई. उस गौरवर्ण, सुंदर नैननक्श और गुलाब से खिले व्यक्तित्व के स्वामी को उसी क्षण उस ने अपना बनाने की ठान ली. ‘कहां वह और कहां तू? उस पर से वह दूसरी जातिधर्म का है, उसे कैसे अपने वश में कर लेगी,’ अपनी सखियों के ऐसे प्रश्नों पर प्रियम कहती, ‘अरे, कोशिश करने में क्या जाता है.’

वे दोनों एक ऐसे बेमेल जोड़े के रूप में जाने जाते जिस में कहीं कोई समानता नहीं. लड़का अत्यंत सुंदर और आकर्षक जबकि लड़की सामान्य रंगरूप के लिए भी मुहताज. लड़का सुरुचिसंपन्न और शौकीन स्वभाव का, लड़की लटरसटर बनी रहती, मेकअप करती तो भी शेखर के पार्श्व में बदसूरत ही दिखती. प्रियम का सांवला, रूखा चेहरा, बड़ीबड़ी आंखों के सर्द भाव, खुले अधरों से बाहर झांकते हुए ऊंचे दांत देख लोग उन की उपमा कौए और हंस से दिया करते. राह चलते उस पर छींटाकशी होती, गीत गाए जाते. प्रियम के ऊपर इन बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता. ‘मैया मैं तो चंद्र खिलौना लेहौं’ जैसा उस का हठ देख सब मुंह फेर कर हंसते. सोचते कि इतने अच्छे घर का शेखर, जो नाक पर मक्खी तक नहीं बैठने देता, प्रियम को कैसे अपनी जीवनसंगिनी बनाएगा? पर असंभव कुछ नहीं है. कहते ही हैं : ‘रसरी आवत जात ते सिल पर पड़त निशान.’

निरंतर शेखर के आगेपीछे घूमती प्रियम ने शेखर पर अपना अधिकार जताते हुए उस की दीवानियों को लड़लड़ कर पीछे ठेल दिया. वह कभी उस के लिए चिकन तो कभी बिरयानी बना कर लाती. उसे रंगबिरंगी शर्ट्स या बहुमूल्य परफ्यूम्स इत्यादि गिफ्ट्स दिया करती. तो कभी उस के अत्यंत समीप आ बैठती. वह उसे वश में करने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहती. प्रियम का ऊंचा मनोबल, अपने प्यार पर दृढ़ विश्वास और शेखर के पीछे सतत पड़े रहना रंग लाया. धीरेधीरे उन में प्रगाढ़ता बढ़ती गई. जीवन के रंगों व उमंगों से भरे गोपन रहस्य परत दर परत खुलने लगे तो ‘सादा जीवन उच्च विचार’ की पृष्ठभूमि वाले शेखर की सारी सुप्त कामनाएं जाग उठीं. एक दिन लोगों ने घोर आश्चर्य से शेखर को अपने सात्विक घर के सारे नियमसंयम को धता बताते हुए प्रियम के आगेपीछे घूमते हुए, लट्टू सा नाचते हुए देखा. फिर तो लोग उन की बातें करने लगे, दूरदूर तक उन के चर्चे होने लगे.

शेखर भरपूर प्यार तो करता प्रियम से, पर उसे मारता भी खूब अच्छी तरह. अचरज तो इस बात पर होता कि विवाह होने से पहले भी शेखर ने उस पर कई बार हाथ उठाया, उस पर चिल्लाया भी. फिर भी प्रियम अपने निश्चय से डिगी नहीं. यह सब देख कर उस की परमप्रिय सखी संजना ने कहा भी, ‘अपने पापा के बताए लड़के से विवाह कर ले, खुश रहेगी,’ पर प्रियम को या तो शेखर की मार भी अच्छी लगती रही होगी या वह अपने दिल के हाथों इतनी विवश थी कि संजना की बात मानने के बजाय वह उस से ही रूठ गई.

शेखर की मां ने बड़ेबड़े सपने संजोए थे कि वह अपने राजा बेटे के लिए परियों की राजकुमारी लाएगी. अपने गुड्डे के लिए प्यारी सी गुडि़या लाएगी. पिता तो जबतब अपने कुलदीपक के विवाह में होने वाले मानसम्मान की परिकल्पनाएं कर और मिलने वाले साजसामान की गणना कर मन ही मन पुलकित हुआ करते. पर उन लोगों के सारे सपने धूलधूसरित हो गए. एक से बढ़ कर एक रिश्ते आ रहे थे शेखर के लिए. पर उसे प्रियंवदा इतनी अधिक पसंद आ गई थी कि वह किसी और से विवाह करने हेतु किसी भी दशा में तैयार न था. मांपिता ने हर तरह से शेखर को समझाने की चेष्टा की, पर उस ने इतना बवंडर मचाया कि उन्हें कलेजे पर पत्थर रख कर आखिरकार झुकना ही पड़ा.

शेखर ने मांपिता, कुल परंपरा, रिश्तेनाते किसी की चिंतापरवा किए बिना आगे बढ़ कर प्रियम का हाथ थाम लिया. प्रियम वधू बन कर पिया के घर आ गई. ऐसी बेमेल जोड़ी को जो देखता, उसे धक्का लगता. यदि मांपिता ने ऐसी लड़की ढूंढ़ी होती तो लोग यही कहते कि दहेज के लालच में लड़के को बलि चढ़ा दिया, पर जब लड़का ही इसे स्वयं पसंद कर के लाया है तो इस पर क्या कहे कोई? प्रेम अंधा होता है और दिल को जो भाए वही सुंदर. कहते हैं न, ‘ब्यूटी लाइज इन द आईज औफ बिहोल्डर.’ रूपगुण से शून्य प्रियंवदा की वाणी भी कर्कश थी. फिर भी उस का इतना दबदबा था कि कोई भी व्यक्ति उस का तिरस्कार या अवहेलना नहीं कर सकता, उस से ऊंचा भी नहीं बोल सकता. शेखर के सामने तो क्या, उस के पीठ पीछे भी नहीं.

शेखर के सीधेसरल मांपिता अधिक दिन नहीं जिए. इस आघात को मन में छिपाए, सिर झुकाए वे संसार से प्रस्थान कर गए. अपने घर का दुलारा शेखर व्यवहार में बड़ा सौम्य, शांत और सज्जन प्रतीत होता था. पर था वह प्रारंभ से ही उच्छृंखल और क्रोधी स्वभाव का. आत्ममुग्ध मनोवृत्ति थी उस की. घंटों दर्पण के सामने खड़ा रहता वह. ड्रैसिंग टेबल पुरुषों के सौंदर्यप्रसाधनों से लदी रहती. प्रियम का तो दर्पण देखने का कभी मन ही नहीं करता. अपने किंचित केश भी यों ही समेट कर रबरबैंड लगा लिया करती. दर्पण में झांक कर वह कभीकभार अपनी बिंदी या लिपस्टिक ठीक कर लेती, बस इतना ही. धीरेधीरे दिन बीतते गए. वक्त के साथसाथ उन की भी स्थितियांपरिस्थितियां बदलती गईं. आपसी अंतर्विरोध उभरने लगे. एकदूसरे को पाने हेतु जो भी त्यागा था वह उन के मन की अधूरी अचेतन गुफा से बाहर निकल आया. तूफानी प्रेमविवाह था उन का. जो चाहा था वह पा लिया था, पर इस पाने पर प्रसन्न होने के बजाय अब वे यह दंभ जताते हुए झगड़ने लगे थे, ‘उन्हें किसी अच्छे की कमी थोड़े न थी.’

प्रेम ओझल हो चुका था, रिश्ते बोझ बन गए थे.  प्रियम को पता ही नहीं चला, कब शेखर को कोई और भा गई. जिस पति को इतनी कठिनता से पाया, इतना सहेजसंभाल कर रखा, उसे कोई और आकृष्ट कर ले, उस के स्वत्वसुख में सेंध लगा दे, इस का भयानक दुख था उसे. ऊपर से मुसकान ओढ़े भीतरभीतर वह असह्य यंत्रणा से गुजर रही थी. किसी काम में मन नहीं लगता उस का. प्रतिपल मन में आंधियां, भांतिभांति की अनर्गल बातें चलती रहतीं. पति में आए परिवर्तन को देखदेख रोया करती. अब उन्हें सजते देख कर मुग्ध होने के बजाय जलभुन कर राख हो जाती. कभी उस के लिए दुनिया में उथलपुथल मचा दी थी शेखर ने, किसी सपने जैसा लगता वह कालखंड उसे. अब प्रेम सूख गया था, कीचड़ बचा था, जिस में दोनों मेढ़क की तरह हरदम टर्राया करते ऊंचे कर्कश स्वर में :

‘शेखर, तुम सुनते क्यों नहीं? मेरी बात का कोई असर क्यों नहीं होता?’

‘तुम्हारे पास एक ही राग है, जब देखो वही बजाया करती हो.’

‘तो सुधर जाओ न, क्यों करते हो ये सब.’

‘तुम सुधर जाओ वरना एक दिन बहुत पछताओगी,’ शेखर तमतमा जाते, क्रोध से पांव पटकते और फिर जो व्यंग्य बुझे तीर चलते और भयानक गृह युद्ध आरंभ होता वह समाप्त होने को न आता.

अब थकीहारी, टूटी प्रियम ने यही मान लिया कि निश्चय ही उस कलमुंही ने शेखर पर कोई वशीकरण किया होगा. वे इसे सब को बताती फिरतीं, सरेआम किसी को कोसा करतीं. पता नहीं कितनी सच थीं उन की बातें. कुछ कण बोए हुए और पालेपोसे हुए भी थे जिन से उबर पाना अब उन के वश में न रहा. संबंधों की चादर में इतने छेद हो चुके थे कि पैबंद लगाने का स्थान भी शेष न था. एक दिन जब वह संजना के पास आई थी, बड़ी परेशान सी थी. आते ही बिना किसी भूमिका के वह कंपित स्वर में बोली:

‘तू ठीक कहती थी संजू. तेरी बात मान लेती तो आज मेरा यह हाल न होता.’

‘हां रे, पर तब तो तेरे ऊपर प्रेम का भूत सवार था.’

‘मति मारी गई थी मेरी और क्या? अब तो लगता है कि कोई किसी से प्यार न करे, प्यार करे भी तो उस से विवाह न करे.’

संजना अचरज से प्रियम को देखती रह गई थी. शेखर से विवाह करने के लिए जब मना किया था, रोका था तो उस से रूठ गई थी प्रियम. इतने वर्षों बाद आज वह अपना हितअनहित जान रही है, पर अब तो बड़ी देर हो गई. जीवन में पीछे नहीं लौटा जा सकता. प्रियम की आंखों से अविरल अश्रुधारा बहे जा रही है. देह पर कीमती परिधान और आभूषण धारण किए, अकूत चलअचल संपत्ति की स्वामिनी होने पर भी प्रियम को आज कुछ भी अपना नहीं लग रहा है. अपनी ही रची विपत्ति के तूफान के भीतर से गुजरती हुई छटपटा रही प्रियम डरी हुई है. बारबार वह एक ही बात दोहरा रही है :

‘मुझे मार डालेंगे वे, तुम देख लेना एक दिन.’

‘ऐसा क्यों कह रही हो? शेखर तो कितना प्यार करते हैं तुम्हें. सारे बंधन तोड़ दिए तुम्हारे लिए. याद है जब तुम एक दिन औफिस नहीं आई थीं, तब क्या किया था उन्होंने…’

बात बीच में रोकते हुए प्रियम ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘वह कोई और ही शेखर थे संजू. अब तो बहुत तकलीफ देते हैं वे. मुझे देखना भी नहीं चाहते वे.’

उसे दुख हो रहा था कि जीवन जिस रूप में आया उसे सुंदर न बना सकी, हाथ में आए चांद को रोक नहीं पा रही. अपनी असमर्थता का बोझ उस ने सदा की भांति दूसरों के कंधों पर रख देना चाहा. कहने लगी, ‘संजू, तुम समझाओ न शेखर को. हो सकता है तुम्हारी बात मान जाए.’

‘ना बाबा ना, ऐसा मैं कैसे कर सकती हूं? एक बार तुम्हें समझाया तो था, उस दिन के बाद आज मिली हो और वैसे भी पतिपत्नी के मध्य तो कभी बोलना भी नहीं चाहिए,’ कान पकड़ते हुए संजना ने कहा. यह भी कहा, ‘तुम स्वयं इन बातों का समाधान तलाशो. बीती कड़वी बातें भुला कर नवजीवन आरंभ करो.’

तब ढेर सारी शुभकामनाओं के साथ प्रियम को विदा करते समय संजना ने यह कहां सोचा था कि प्रियम को इस रूप में देखेगी वह. सांझ अपनी किरणें समेट रही थी. प्रियम भी अपनी अंतिम सांसें गिन रही थी, लगा जैसे सांसें अभी थम जाएंगी. और एक झटके से प्रियम की सांसों की डोर टूट गई. संजना विह्वल हो कर रो पड़ी, पर जैसे ही उस ने अश्रुपूरित दृष्टि से शेखर की ओर देखा, उस की रुलाई कंठ में ही अटक गई. चिरवियोग की इस कठिन घड़ी में शेखर के चेहरे पर कोई शिकन नहीं, दुख की मद्धम सी भी छाया नहीं. एकबारगी तो ऐसा लगा जैसे उस ने छुटकारा पा कर चैन की सांस ली हो. धिक्कार है, कुत्ताबिल्ली भी पालो तो उस का बिछोह सहन नहीं होता और यहां इतने बरसों का साथ छूटने का कोई गम नहीं. यदि प्रियम ने न बताया होता तो वह उस की ऐसी दशा को सामान्य ही समझती. पर अब उसे सब गड़बड़ लग रहा है. डाक्टर भी यही कह रहे थे, यह सामान्य मृत्यु नहीं थी. तो क्या थी? राह से हटाने का कुचक्र? पर ऐसे चालाक लोगों का झूठ तो मशीन भी नहीं पकड़ पाती है और सच बोलने वाले झूठे सिद्ध हो जाते हैं.

शायद ही कभी कोई जान पाए कि प्रियम के साथ क्या घटा था. जो हुआ अच्छा तो नहीं हुआ, पर कोई कर भी क्या सकता है. संजना का हृदय भर आया. कितना क्षणभंगुर है यह जीवन. कुछ भी स्थायी नहीं यहां. फिर भी न जाने किस बात का मानअभिमान करते हैं हम? आज प्रियम नहीं रही और उसी शेखर की आंखों में आंसू की एक बूंद तक नहीं.

Family Story : रीवा की लीना – कैसी थी रीवा और लीना की दोस्ती

Family Story : डलास (टैक्सास) में लीना से रीवा की दोस्ती बड़ी अजीबोगरीब ढंग से हुई थी. मार्च महीने के शुरुआती दिन थे. ठंड की वापसी हो रही थी. प्रकृति ने इंद्रधनुषी फूलों की चुनरी ओढ़ ली थी. घर से थोड़ी दूर पर झील के किनारे बने लोहे की बैंच पर बैठ कर धूप तापने के साथ चारों ओर प्रकृति की फैली हुई अनुपम सुंदरता को रीवा अपलक निहारा करती थी. उस दिन धूप खिली हुई थी और उस का आनंद लेने को झील के किनारे के लिए दोपहर में ही निकल गई.

सड़क किनारे ही एक दक्षिण अफ्रीकी जोड़े को खुलेआम कसे आलिंगन में बंधे प्रेमालाप करते देख कर वह शरमाती, सकुचाती चौराहे की ओर तेजी से आगे बढ़ कर सड़क पार करने लगी थी कि न जाने कहां से आ कर दो बांहों ने उसे पीछे की ओर खींच लिया था.

तेजी से एक गाड़ी उस के पास से निकल गई. तब जा कर उसे एहसास हुआ कि सड़क पार करने की जल्दबाजी में नियमानुसार वह चारों दिशाओं की ओर देखना ही भूल गई थी. डर से आंखें ही मुंद गई थीं. आंखें खोलीं तो उस ने स्वयं को परी सी सुंदर, गोरीचिट्टी, कोमल सी महिला की बांहों में पाया, जो बड़े प्यार से उस के कंधों को थपथपा रही थी. अगर समय पर उस महिला ने उसे पीछे नहीं खींचा होता तो रक्त में डूबा उस का शरीर सड़क पर क्षतविक्षत हो कर पड़ा होता.

सोच कर ही वह कांप उठी और भावावेश में आ कर अपनी ही हमउम्र उस महिला से चिपक गई. अपनी दुबलीपतली बांहों में ही रीवा को लिए सड़क के किनारे बने बैंच पर ले जा कर उसे बैठाते हुए उस की कलाइयों को सहलाती रही.

‘‘ओके?’’ रीवा से उस ने बड़ी बेसब्री से पूछा तो उस ने अपने आंचल में अपना चेहरा छिपा लिया और रो पड़ी. मन का सारा डर आंसुओं में बह गया तो रीवा इंग्लिश में न जाने कितनी देर तक धन्यवाद देती रही लेकिन प्रत्युत्तर में वह मुसकराती ही रही. अपनी ओर इशारा करते हुए उस ने अपना परिचय दिया. ‘लीना, मैक्सिको.’ फिर अपने सिर को हिलाते हुए राज को बताया, ‘इंग्लिश नो’, अपनी 2 उंगलियों को उठा कर उस ने रीवा को कुछ बताने की कोशिश की, जिस का मतलब रीवा ने यही निकाला कि शायद वह 2 साल पहले ही मैक्सिको से टैक्सास आई थी. जो भी हो, इतने छोटे पल में ही रीवा लीना की हो गई थी.

लीना भी शायद बहुत खुश थी. अपनी भाषा में इशारों के साथ लगातार कुछ न कुछ बोले जा रही थी. कभी उसे अपनी दुबलीपतली बांहों में बांधती, तो कभी उस के उड़ते बालों को ठीक करती. उस शब्दहीन लाड़दुलार में रीवा को बड़ा ही आनंद आ रहा था. भाषा के अलग होने के बावजूद उन के हृदय प्यार की अनजानी सी डोर से बंध रहे थे. इतनी बड़ी दुर्घटना के बाद रीवा के पैरों में चलने की शक्ति ही कहां थी, वह तो लीना के पैरों से ही चल रही थी.

कुछ दूर चलने के बाद लीना ने एक घर की ओर उंगली से इंगित करते हुए कहा, हाउस और रीवा का हाथ पकड़ कर उस घर की ओर बढ़ गई. फिर तो रीवा न कोई प्रतिरोध कर सकी और न कोई प्रतिवाद. उस के साथ चल पड़ी. अपने घर ले जा कर लीना ने स्नैक्स के साथ कौफी पिलाई और बड़ी देर तक खुश हो कर अपनी भाषा में कुछकुछ बताती रही.

मंत्रमुग्ध हुई रीवा भी उस की बातों को ऐसे सुन रही थी मानो वह कुछ समझ रही हो. बड़े प्यार से अपनी बेटियों, दामादों एवं 3 नातिनों की तसवीरें अश्रुपूरित नेत्रों से उसे दिखाती भी जा रही थी और धाराप्रवाह बोलती भी जा रही थी. बीचबीच में एकाध शब्द इंग्लिश के होते थे जो अनजान भाषा की अंधेरी गलियारों में बिजली की तरह चमक कर राज को धैर्य बंधा जाते थे.

बच्चों को याद कर लीना के तनमन से अपार खुशियों के सागर छलक रहे थे. कैसा अजीब इत्तफाक था कि एकदूसरे की भाषा से अनजान, कहीं 2 सुदूर देश की महिलाओं की एक सी कहानी थी, एकसमान दर्द थे तो ममता ए दास्तान भी एक सी थी. बस, अंतर इतना था कि वे अपनी बेटियों के देश में रहती थी और जब चाहा मिल लेती थी या बेटियां भी अपने परिवार के साथ हमेशा आतीजाती रहती थीं.

रीवा ने भी अमेरिका में रह रही अपनी तीनों बेटियों, दामादों एवं अपनी 2 नातिनों के बारे में इशारों से ही बताया तो वह खुशी के प्रवाह में बह कर उस के गले ही लग गई. लीना ने अपने पति से रीवा को मिलवाया. रीवा को ऐसा लगा कि लीना अपने पति से अब तक की सारी बातें कह चुकी थी. सुखदुख की सरिता में डूबतेउतरते कितना वक्त पलक झपकते ही बीत गया. इशारों में ही रीवा ने घर जाने की इच्छा जताई तो वह उसे साथ लिए निकल गई.

झील का चक्कर लगाते हुए लीना रीवा को उस के घर तक छोड़ आई. बेटी से इस घटना की चर्चा नहीं करने के लिए रास्ते में ही रीवा लीना को समझा चुकी थी. रीवा की बेटी स्मिता भी लीना से मिल कर बहुत खुश हुई. जहां पर हर उम्र को नाम से ही संबोधित किया जाता है वहीं पर लीना पलभर में स्मिता की आंटी बन गई. लीना भी इस नए रिश्ते से अभिभूत हो उठी.

समय के साथ रीवा और लीना की दोस्ती से झील ही नहीं, डलास का चप्पाचप्पा भर उठा. एकदूसरे का हाथ थामे इंग्लिश के एकआध शब्दों के सहारे वे दोनों दुनियाजहान की बातें घंटों किया करते थे.

घर में जो भी व्यंजन रीवा बनाती, लीना के लिए ले जाना नहीं भूलती. लीना भी उस के लिए ड्राईफू्रट लाना कभी नहीं भूली. दोनों हाथ में हाथ डाले झील की मछलियों एवं कछुओं को निहारा करती थीं. लीना उन्हें हमेशा ब्रैड के टुकड़े खिलाया करती थी. सफेद हंस और कबूतरों की तरह पंक्षियों के समूह का आनंद भी वे दोनों खूब उठाती थीं.

उसी झील के किनारे न जाने कितने भारतीय समुदाय के लोग आते थे जिन के पास हायहैलो कहने के सिवा कुछ नहीं रहता था.

किसीकिसी घर के बाहर केले और अमरूद से भरे पेड़ बड़े मनमोहक होते थे. हाथ बढ़ा कर रीवा उन्हें छूने की कोशिश करती तो हंस कर नोनो कहती हुई लीना उस की बांहों को थाम लेती थी.

लीना के साथ जा कर रीवा ग्रौसरी शौपिंग वगैरह कर लिया करती थी. फूड मार्ट में जा कर अपनी पसंद के फल और सब्जियां ले आती थी. लाइब्रेरी से भी किताबें लाने और लौटाने के लिए रीवा को अब सप्ताहांत की राह नहीं देखनी पड़ती थी. जब चाहा लीना के साथ निकल गई. हर रविवार को लीना रीवा को डलास के किसी न किसी दर्शनीय स्थल पर अवश्य ही ले जाती थी जहां पर वे दोनों खूब ही मस्ती किया करती थीं.

हाईलैंड पार्क में कभी वे दोनों मूर्तियों से सजे बड़ेबड़े महलों को निहारा करती थीं तो कभी दिन में ही बिजली की लडि़यों से सजे अरबपतियों के घरों को देख कर बच्चों की तरह किलकारियां भरती थीं. जीवंत मूर्तियों से लिपट कर न जाने उन्होंने एकदूसरे की कितनी तसवीरें ली होंगी.

पीले कमल से भरी हुई झील भी 10 साल की महिलाओं की बालसुलभ लीलाओं को देख कर बिहस रही होती थी. झील के किनारे बड़े से पार्क में जीवंत मूर्तियों पर रीवा मोहित हो उठी थी. लकड़ी का पुल पार कर के उस पार जाना, भूरे काले पत्थरों से बने छोटेबड़े भालुओं के साथ वे इस तरह खेलती थीं मानो दोनों का बचपन ही लौट आया हो.

स्विमिंग पूल एवं रंगबिरंगे फूलों से सजे कितने घरों के अंदर लीना रीवा को ले गई थी, जहां की सुघड़ सजावट देख कर रीवा मुग्ध हो गई थी. रीवा तो घर के लिए भी खाना पैक कर के ले जाती थी. इंडियन, अमेरिकन, मैक्सिकन, अफ्रीका आदि समुदाय के लोग बिना किसी भेदभाव के खाने का लुत्फ उठाते थे.

लीना के साथ रीवा ने ट्रेन में सैर कर के खूब आनंद उठाया था. भारी ट्रैफिक होने के बावजूद लीना रीवा को उस स्थान पर ले गई जहां अमेरिकन प्रैसिडैंट जौन कैनेडी की हत्या हुई थी. उस लाइब्रेरी में भी ले गई जहां पर उन की हत्या के षड्यंत्र रचे गए थे.

ऐेसे तो इन सारे स्थलों पर अनेक बार रीवा आ चुकी थी पर लीना के साथ आना उत्साह व उमंग से भर देता था. इंडियन स्टोर के पास ही लीना का मैक्सिकन रैस्तरां था. जहां खाने वालों की कतार शाम से पहले ही लग जाती थी. जब भी रीवा उधर आती, लीना चीपोटल पैक कर के देना नहीं भूलती थी.

मैक्सिकन रैस्तरां में रीवा ने जितना चीपोटल नहीं खाया होगा उतने चाट, पकौड़े, समोसे, जलेबी लीना ने इंडियन रैस्तरां में खाए थे. ऐसा कोई स्टारबक्स नहीं होगा जहां उन दोनों ने कौफी का आनंद नहीं उठाया. डलास का शायद ही ऐसा कोई दर्शनीय स्थल होगा जहां के नजारों का आनंद उन दोनों ने नहीं लिया था.

मौल्स में वे जीभर कर चहलकदमी किया करती थीं. नए साल के आगमन के उपलक्ष्य में मौल के अंदर ही टैक्सास का सब से बड़ा क्रिसमस ट्री सजाया गया था. जिस के चारों और बिछे हुए स्नो पर सभी स्कीइंग कर रहे थे. रीवा और लीना बच्चों की तरह किलस कर यह सब देख रही थीं.

कैसी अनोखी दास्तान थी कि कुछ शब्दों के सहारे लीना और रीवा ने दोस्ती का एक लंबा समय जी लिया. जहां भी शब्दों पर अटकती थीं, इशारों से काम चला लेती थीं.

समय का पखेरू पंख लगा कर उड़ गया. हफ्ताभर बाद ही रीवा को इंडिया लौटना था. लीना के दुख का ठिकाना नहीं था. उस की नाजुक कलाइयों को थाम कर रीवा ने जीभर कर आंसू बहाए, उस में अपनी बेटियों से बिछुड़ने की असहनीय वेदना भी थी. लौटने के एक दिन पहले रीवा और लीना उसी झील के किनारे हाथों में हाथ दिए घंटाभर बैठी रहीं. दोनों के बीच पसरा हुआ मौन तब कितना मुखर हो उठा था. ऐसा प्रतीत हो रहा था जैसे उस की अनंत प्रतिध्वनियां उन दोनों से टकरा कर चारों ओर बिखर रही हों.

दोनों के नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित हो रही थी. शब्द थे ही नहीं कि जिन्हें उच्चारित कर के दोस्ती के जलधार को बांध सकें. प्रेमप्रीत की शब्दहीन सरिता बहती रही. समय के इतने लंबे प्रवाह में उन्हें कभी भी एकदूसरे की भाषा नहीं जानने के कारण कोई असुविधा हुई हो, ऐसा कभी नहीं लगा. एकदूसरे की आंखों में झांक कर ही वे सबकुछ जान लिया करती थीं. दोस्ती की अजीब पर अतिसुंदर दास्तान थी. कभी रूठनेमनाने के अवसर ही नहीं आए. हंसी से खिले रहे.

एकदूसरे से विदा लेने का वक्त आ गया था. लीना ने अपने पर्स से सफेद धवल शौल निकाल कर रीवा को उठाते हुए गले में डाला, तो रीवा ने भी अपनी कलाइयों से रंगबिरंगी चूडि़यों को निकाल लीना की गोरी कलाइयों में पहना दिया जिसे पहन कर वह निहाल हो उठी थी. मूक मित्रता के बीच उपहारों के आदानप्रदान देख कर निश्चय ही डलास की वह मूक मगर चंचल झील रो पड़ी होगी.

भीगी पलकों एवं हृदय में एकदूसरे के लिए बेशुमार शुभकामनाओं को लिए हुए दोनों ने एकदूसरे से विदाई तो ली पर अलविदा नहीं कहा.

Writer- Renu Srivastava

Social Story : उज्ज्वला – अपने रंग को लेकर वह बचपन से ही अपमानित होती थी

Social Story : अपने रूपसौंदर्य पर घमंड करने वाले सुनील की नजरों में केवल दैहिक सुंदरता ही माने रखती थी, इसीलिए उज्ज्वला जैसी सांवली पत्नी को पा कर उस का मन खिन्न हो गया.

सुनील के जाते ही उज्ज्वला कमरे में आ गई और तकिए में मुंह गड़ा कर थकी सी लेट गई. सुनील के व्यवहार से मन का हर कोना कड़वाहट से भर गया था. जितनी बार उस ने सुनील से जुड़ने का प्रयत्न किया था उतनी बार सुनील ने उसे बेदर्दी से झटक डाला था. उस ने कभी सोचा भी नहीं था कि जीवन में यह मोड़ भी आ सकता है. शादी से पहले कई बार उपहास भरी नजरें और फब्तियां झेली थीं, पर उस समय कभी ऐसा नहीं सोचा था कि स्वयं पति भी उस के प्रति उपेक्षा और घृणा प्रदर्शित करते रहेंगे.

बचपन कितना आनंददायी था. स्कूल में बहुत सारी लड़कियां उस की सहेलियां बनने को आतुर थीं. अध्यापिकाएं भी उसे कितना प्यार करती थीं. वह हंसमुख, मिलनसार होने के साथसाथ पढ़ने में अव्वल जो थी. पर ऐसे निश्ंिचत जीवन में भी मन कभीकभी कितना खिन्न हो जाया करता था.

उसे बचपन की वह बात आज भी कितनी अच्छी तरह याद है, जब पहली बार उस ने अपनेआप में हीनता की भावना को महसूस किया था. मां की एक सहेली ने स्नेह से गाल थपथपा कर पूछा था, ‘क्या नाम है तुम्हारा, बेटी?’

‘जी, उज्ज्वला,’ उस ने सरलता से कहा. इस पर सहेली के होंठों पर व्यंग्यात्मक हंसी उभर आई और उस ने पास खड़ी महिला से कहा, ‘लोग न जाने क्यों इतने बेमेल नाम रख देते हैं?’ और वे दोनों हंस पड़ी थीं. वह पूरी बात समझ नहीं सकी थी. फिर भी उस ने खुद को अपमानित महसूस किया था और चुपचाप वहां से खिसक गई थी.

फिर तो कई बार ऐसे अवसर आए, जब उस ने इस तरह के व्यवहार से शर्मिंदगी महसूस की. उसे अपने मातापिता पर गुस्सा आता था कि प्रकृति ने तो उसे रंगरूप देने में कंजूसी की ही पर उन्होंने क्यों उस के काले रंग पर उज्ज्वला का नाम दे कर व्यंग्य किया और उसे ज्यादा से ज्यादा उपहास का पात्र बना दिया. मात्र नाम दे कर क्या वे उज्ज्वला की निरर्थकता को सार्थकता में बदल पाए थे. जब वह स्कूल के स्नेहिल प्रांगण को छोड़ कर कालिज गई थी तो कितना तिरस्कार मिला था. छोटीछोटी बातें भी उस के मर्म पर चोट पहुंचा देती थीं. अपने नाम और रंग को ले कर किया गया कोई भी मजाक उसे उत्तेजित कर देता था.

आखिर उस ने किसी से भी दोस्ती करने का प्रयत्न छोड़ दिया था. फिर भी उसे कितने कटु अनुभव हुए थे, जो आज भी उस के दिल में कांटे की तरह चुभते हैं. सहपाठी विनोद का हाथ जोड़ कर टेढ़ी मुसकान के साथ ‘उज्ज्वलाजी, नमस्ते’ कहना और सभी का हंस पड़ना, क्या भूल सकेगी कभी वह? शर्म और गुस्से से मुंह लाल हो जाता था. न जाने कितनी बातें थीं, जिन से उस का हर रोज सामना होता था. ऐसे माहौल में वह ज्यादा से ज्यादा अंतर्मुखी होती गई थी.

वे दमघोंटू वर्ष गुजारने के बाद जब कुछ समय के लिए फिर से घर का सहज वातावरण मिला तो मन शांत होने लगा था. रेणु और दीपक उस की बौद्धिकता के कायल थे और उसे बहुत मानते थे. मातापिता भी उस के प्रति अतिरिक्त प्यार प्रदर्शित करते थे. ऐसे वातावरण में वह बीते दिनों की कड़वाहट भूल कर सुखद कल्पनाएं संजोने लगी थी.

उज्ज्वला के पिता राजकिशोर जूट का व्यापार करते थे और व्यापारी वर्ग में उन की विशेष धाक थी. उन के व्यापारी संस्कार लड़कियों को पढ़ाने के पक्ष में न थे. पर उज्ज्वला की जिद और योग्यता के कारण उसे कालिज भेजा था. अब जल्दी से जल्दी उस की शादी कर के निवृत्त हो जाना चाहते थे. अच्छा घराना और वर्षों से जमी प्रतिष्ठा के कारण उज्ज्वला का साधारण रंगरूप होने के बावजूद अच्छा वर और समृद्ध घर मिलने में कोई विशेष दिक्कत नहीें हुई.

दीनदयाल, राजकिशोर के बचपन के सहपाठी और अच्छे दोस्त भी थे. दोस्ती को संबंध में परिवर्तित कर के दोनों ही प्रसन्न थे. दीनदयाल कठोर अनुशासन- प्रिय व्यक्ति थे तथा घर में उन का रोबदाब था. वह लड़कालड़की को आपस में देखनेदिखाने तथा शादी से पूर्व किसी तरह की छूट देने के सख्त खिलाफ थे.

सुनील सुंदर, आकर्षक और सुशिक्षित नौजवान था. फिर सी.ए. की परीक्षा में उत्तीर्ण हो कर तो वह राजकिशोर की नजरों में और भी चढ़ गया था. ऐसा सुदर्शन जामाता पा कर राजकिशोर फूले नहीं समा रहे थे. सुनील को भी पूरा विश्वास था कि उस के पिता जो भी निर्णय लेंगे, उस के हित में ही लेंगे. पर सुहागरात को दुबलीपतली, श्यामवर्ण, आकर्षणहीन उज्ज्वला को देखते ही उस की सारी रंगीन कल्पनाएं धराशायी हो गईं. वह चाह कर भी प्यार प्रदर्शित करने का नाटक नहीं कर सका. बाबूजी के प्रति मन में बेहद कटुता घुल गई और बिना कुछ कहे एक ओर मुंह फेर कर नाराज सा सो गया. पैसे वाले प्रतिष्ठित व्यापारियों का समझौता बेमेल वरवधू में सामंजस्य स्थापित नहीं करा पाया था.

उज्ज्वला धड़कते दिल से पति की खामोशी के टूटने का इंतजार करती रही. सबकुछ जानते हुए भी इच्छा हुई थी कि सुनील की नाराजगी का कारण पूछे, माफी भी मांगे, पर सुनील के आकर्षक व्यक्तित्व से सहमी वह कुछ नहीं बोल पाई थी. आखिर घुटनों में सिर रख कर तब तक आंसू बहाती रही थी जब तक नींद न आ गई थी.

‘‘बहू, खाना नहीं खाना क्या?’’ सास के स्वर से उज्ज्वला अतीत के उन दुखद भंवरों से एक झटके से निकल कर पुन: वर्तमान से आ जुड़ी. न जाने उसे इस तरह कितनी देर हो गई. हड़बड़ा कर गीली आंखें पोंछ लीं और अपनेआप को संयत करती नीचे आ गई.

निवृत्त हो कर फिर कमरे में आई तो सहज ही चांदी के फ्रेम में जड़ी सुनील की तसवीर पर दृष्टि अटक गई. मन में फिर कोई कांटा खटकने लगा. सोचने लगी, इन 2 सालों में किस तरह सुनील छोटीछोटी बातों से भी दिल दुखाते रहे हैं. कभीकभार अच्छे मूड में होते हैं तो दोचार औपचारिक बातें कर लेते हैं, वरना उस के बाहुपाश को बेदर्दी से झटक कर करवट बदल लेते हैं.

अब तक एक बार भी तो संपूर्ण रूप से वह उस के प्रति समर्पित नहीं हो पाए हैं. आखिर क्या गलती की है उस ने? शिकायत तो उन्हें अपने पिताजी से होनी चाहिए थी. क्यों उन के निर्णय को आंख मूंद कर सर्वोपरि मान लिया? यदि वह पसंद नहीं थी तो शादी करने की कोई मजबूरी तो नहीं थी. इस तरह घुटघुट कर जीने के लिए मजबूर कर के वह मुझे किस बात की सजा दे रहे हैं?

बहुत से प्रश्न मन को उद्वेलित कर रहे थे. पर सुनील से पूछने का कभी साहस ही नहीं कर सकी थी. नहीं, अब नहीं सहेगी वह. आज सारी बात अवश्य कहेगी. कब तक आज की तरह अपनी इच्छाएं दबाती रहेगी? उस ने कितने अरमानों से आज रेणु और दीपक के साथ पिकनिक के लिए कहीं बाहर जाने का कार्यक्रम बनाया था. बड़े ही अपनत्व से सुबह सुनील को सहलाते हुए बोली थी, ‘‘आज इतवार है. मैं ने रेणु और दीपक को बुलाया है. सब मिल कर कहीं पिकनिक पर चलते हैं.’’

‘‘आज ही क्यों, फिर कभी सही,’’ उनींदा सा सुनील बोला.

‘‘पर आज आप को क्या काम है? मेरे लिए न सही उन के लिए ही सही. अगर आप नहीं चलेंगे तो वे क्या सोचेंगे? मैं ने उन से पिकनिक पर चलने का कार्यक्रम भी तय कर रखा है,’’ उज्ज्वला ने बुझे मन से आग्रह किया.

‘‘जब तुम्हारे सारे कार्यक्रम तय ही थे तो फिर मेरी क्या जरूरत पड़ गई? तुम चली जाओ, मेरी तरफ से कोई मनाही नहीं है. मैं घर पर गाड़ी भी छोड़ दूंगा,’’ कह कर सुनील ने मुंह फेर लिया. उसे बेहद ठेस पहुंची.

पहली बार उस ने स्वेच्छा से कोई कार्यक्रम बनाया था और सुनील ने बात को इस कदर उलटा ले लिया. न तो वह कोई कार्यक्रम बनाती और न ही यह स्थिति आती. उज्ज्वला ने उसी समय दीपक को फोन कर के कह दिया, ‘‘तेरे जीजाजी को कोई जरूरी काम है, इसलिए फिर कभी चलेंगे.’’

मन बहुत खराब हो गया था. फिर किसी भी काम में जी नहीं लगा. बारबार अपनी स्थिति को याद कर के आंखें भरती रहीं. क्या उसे इतना भी अधिकार नहीं है कि अपने किसी शौक में सुनील को भी शामिल करने की सोच सके? आज वह सुनील से अवश्य कहेगी कि क्यों वह उस से इस कदर घृणा करते हैं और उस के साथ कहीं भी जाना पसंद नहीं करते.

शाम उतरने लगी थी. लंबी परछाइयां दरवाजों में से रेंगने लगीं तो उज्ज्वला शिथिल कदमों से रसोई में आ कर खाना बनाने में जुट गई. हाथों के साथसाथ विचार भी तेज गति से दौड़ने लगे. रोज की यह बंधीबंधाई जिंदगी, जिस में जीवन की जरा भी हसरत नहीं थी. बस, भावहीनता मशीनी मानव की तरह से एक के बाद एक काम निबटाते रहो. कितनी महत्त्वहीन और नीरस है यह जिंदगी.

मातापिता खाना खा चुके थे. सुनील अभी तक नहीं आया था. उज्ज्वला बचा खाना ढक कर मन बहलाने के लिए टीवी के आगे बैठ गई. घंटी बजी तो भी वैसे ही कार्यक्रम में खोई बैठी रहने का उपक्रम करती रही. नौकर ने दरवाजा खोला. सुनील आया और जूते खोल कर सोफे पर लेट सा गया.

‘‘बड़ी देर कर दी. चल, हाथमुंह धो कर खाना खा ले. बहू इंतजार कर रही है तेरा,’’ मां ने कहा.

‘‘बचपन का एक दोस्त मिल गया था. इसलिए कुछ देर हो गई. वह खाना खाने का बहुत आग्रह करने लगा, इसलिए उस के घर खाना खा लिया था,’’ सुनील ने लापरवाही से कहा.

उज्ज्वला अनमनी सी उठी और थोड़ाबहुत खा कर, बाकी नौकर को दे कर अपने कमरे में आ गई, ‘सुनील जैसे आदमी को कुछ भी कहना व्यर्थ होगा. यदि मन की भड़ास निकाल ही देगी तो भी क्या ये दरारें पाटी जा सकेंगी? कहीं सुनील उस से और ज्यादा दूर न हो जाए? नहीं, वह कभी भी अपनी कमजोरी जाहिर नहीं करेगी. आखिर कभी न कभी तो उस के अच्छे बरताव से सुनील पिघलेंगे ही,’ मन को सांत्वना देती उज्ज्वला सोने का प्रयत्न करने लगी.

सुबह का सुखद वातावरण, ठंडी- ठंडी समीर और तरहतरह के पक्षियों के मिलेजुले स्वर जैसे कानों में रस घोलते हुए. ‘सुबह नींद कितनी जल्दी टूट जाती है,’ बिस्तर से उठ कर बेतरतीब कपड़ों को ठीक करती उज्ज्वला सोचने लगी, ‘कितनी सुखी होती हैं वे लड़कियां जो देर सुबह तक अलसाई सी पति की बांहों में पड़ी रहती हैं.’ वह कमरे के कपाट हौले से भिड़ा कर रसोई में आ गई. उस ने घर की सारी जिम्मेदारियों को स्वेच्छा से ओढ़ लिया था. उसे इस में संतोष महसूस होता था. वह सासससुर की हर जरूरत का खयाल रखती थी, इसलिए थोड़े से समय में ही दोनों का दिल जीत लिया था.

भजन कब के बंद हो चुके थे. कोहरे का झीना आंचल हटा कर सूरज आकाश में चमकने लगा था. कमरे के रोशनदानों से धूप अंदर तक सरक आई थी.

‘‘सुनिए जी, अब उठ जाइए. साढ़े 8 बज रहे हैं,’’ उज्ज्वला ने हौले से सुनील की बांह पर हाथ रख कर कहा. चाह कर भी वह रजाई में ठंडे हाथ डाल कर अधिकारपूर्वक छेड़ते हुए नहीं कह सकी कि उठिए, वरना ठंडे हाथ लगा दूंगी.

बिना कोई प्रतिकार किए सुनील उठ गया तो उज्ज्वला ने स्नानघर में पहनने के कपड़े टांग दिए और शेविंग का सामान शृंगार मेज पर लगाने लगी. जरूरी कामों को निबटा कर सुनील दाढ़ी बनाने लगा. उज्ज्वला वहीं खड़ी रही. शायद किसी चीज की जरूरत पड़ जाए. सोचने लगी, ‘सुनील डांटते हैं तो बुरा लगता है. पर खामोश हो कर उपेक्षा जाहिर करते हैं, तब तो और भी ज्यादा बुरा लगता है.’

‘‘जरा तौलिया देना तो,’’ विचारों की शृंखला भंग करते हुए ठंडे स्वर में सुनील ने कहा.

उज्ज्वला ने चुपचाप अलमारी में से तौलिया निकाल कर सुनील को थमा दिया. सुनील मुंह पोंछने लगा. अचानक ही उज्ज्वला की निगाह सुनील के चेहरे पर बने हलकेहलके से सफेद दागों पर अटक गई. मुंह से खुद ब खुद निकल गया, ‘‘आप के चेहरे पर ये दाग पहले तो नहीं थे.’’

‘‘ऐसे ही कई बार सर्दी के कारण हो जाते हैं. बचपन से ही होते आए हैं,’’ सुनील ने लापरवाही से कहा.

‘‘फिर भी डाक्टर से राय लेने में हर्ज ही क्या है?’’

‘‘तुम बेवजह वहम मत किया करो. हमेशा अपनेआप मिटते रहे हैं,’’ कह कर सुनील स्नानघर में घुस गया तो उज्ज्वला भी बात को वहीं छोड़ कर रसोई में आ गई और नाश्ते की तैयारी में लग गई.

पर इस बार सुनील के चेहरे के वे दाग ठीक नहीं हुए थे. धीरेधीरे इतने गहरे होते गए थे कि चेहरे का आकर्षण नष्ट होने लगा था. सुनील पहले जितना लापरवाह था, अब उतना ही चिंतित रहने लगा. इस स्थिति में उज्ज्वला बराबर सांत्वना देती और डाक्टरों की बताई तरहतरह की दवाइयां यथासमय देती रही.

अब सुनील उज्ज्वला से चिढ़ाचिढ़ा नहीं रहता था. अधिकतर किसी सोच में डूबा रहता था, पर उज्ज्वला जो भी पूछती, शांति से उस का जवाब देता था. उज्ज्वला को न जाने क्यों इस आकस्मिक परिवर्तन से डर लगने लगा था.

रात गहरा चुकी थी. सभी टीवी के आगे जमे बैठे थे. आखिर उकता कर उज्ज्वला ऊपर अपने कमरे में आ गई तो सुनील भी मातापिता को हाल में छोड़ कर पीछेपीछे आ गया. हमेशा की तरह उज्ज्वला चुपचाप लेट गई थी. चुपचाप, मानो वह सुनील की उपेक्षा की आदी हो गई हो. सुनील ने बत्ती बंद कर के स्नेह से उसे बांहों में कस लिया और मीठे स्वर में बोला, ‘‘सच बताओ, उज्ज्वला, तुम मुझ से नफरत तो नहीं करतीं?’’

उस स्नेहस्पर्श और आवाज की मिठास से उज्ज्वला का रोमरोम आनंद से तरंगित हो उठा था. पहली बार प्यार की स्निग्धता से परिचित हुई थी वह. खुशी से अवरुद्ध कंठ से फुसफुसाई, ‘‘आप ने ऐसा कैसे सोच लिया?’’

‘‘अब तक बुरा बरताव जो करता रहा हूं तुम्हारे साथ. पिताजी के प्रति जो आक्रोश था, उस को तुम पर निकाल कर मैं संतोष महसूस करता रहा. सोचता था, मेरे साथ धोखा हुआ और बेवजह ही इस के लिए मैं तुम को दोषी मानता रहा. पर तुम मेरे लिए हमेशा प्यार लुटाती रहीं. मैं मात्र दैहिक सौंदर्य की छलना में मन के सौंदर्य से अनजान बना रहा. अब मैं जान गया कि तुम्हारा मन कितना सुंदर और प्यार से लबालब है. मैं तुम्हें सिर्फ कांटों की चुभन ही देता रहा और तुम सहती रहीं. कैसे सहन किया तुम ने मुझे? मैं अपनी इन भूलों के लिए माफी मांगने लायक भी नहीं रहा.’’

‘‘बस, बस, आगे कुछ कहा तो मैं रो पडं़ ूगी,’’ सुनील के होंठों पर हथेली रखते हुए उज्ज्वला बोली, ‘‘मुझे पूरा विश्वास था कि एक न एक दिन मुझे मेरी तपस्या का फल अवश्य मिलेगा. आप ऐसा विचार कभी न लाना कि मैं आप से घृणा करती हूं. मेरे मन में आप का प्यार पाने की तड़प जरूर थी, पर मैं ने कभी भी अपनेआप को आप के काबिल समझा ही नहीं. आज मुझे ऐसा लगता है मानो मैं ने सबकुछ पा लिया हो.’’

‘‘उज्ज्वला, तुम सचमुच उज्ज्वला हो, निर्मल हो. मैं तुम्हारा अपराधी हूं. आज मैं अपनेआप को कंगाल महसूस कर रहा हूं. न तो मेरे पास सुंदर दिल है और न ही वह सुंदर देह रही जिस पर मुझे इतना घमंड था,’’ सुनील ने ठंडी सांस ले कर उदासी से कहा.

‘‘जी छोटा क्यों करते हैं आप? हम इलाज की हर संभव कोशिश करेंगे. फिर भी ये सफेद दाग ठीक नहीं हुए तो भी मुझे कोई गम नहीं. यह कोई खतरनाक बीमारी नहीं है. प्यार इतना सतही नहीं होता कि इन छोटीछोटी बातों से घृणा में बदल जाए. मैं तो हमेशाहमेशा के लिए आप की हूं,’’ उज्ज्वला ने कहा.

सुनील ने भावविह्वल हो कर उसे इस तरह आलिंगनबद्ध कर लिया मानो अचानक उसे कोई अमूल्य निधि मिल गई हो.

Best Hindi Story : शक की निगाह – नीरा स्टूडैंट्स के आने से परेशान क्यों थी

Best Hindi Story : शाम को औफिस से घर आया तो पत्नी का उतरा हुआ चेहरा देख कर कुछ न कुछ गड़बड़ होने का अंदेशा हो गया. बिना कुछ पूछे मैं हाथमुंह धोने के लिए बाथरूम में चला गया. वापस आया तो नीरा चाय ले कर बैठी मेरा इंतजार कर रही थी. चाय के कप के साथ ही मैं ने अपनी प्रश्नवाचक निगाह उस के चेहरे पर टिका दी. प्रश्न स्पष्ट था, ‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘सामने वाले फ्लैट को रामवीर सहायजी ने स्टूडैंट्स को किराए पर दे दिया है,’’ नीरा के स्वर में झल्लाहट और रोष दोनों ही टपक रहे थे. ‘‘यह तो बहुत ही अच्छा हुआ. इतने महीने से फ्लैट खाली पड़ा हुआ था, अब चहलपहल रहेगी. वैसे भी जहां स्टूडैंट्स रहते हैं वहां चौबीसों घंटे रौनक रहती है. न कभी रात होती है न कभी दिन. एक सोता है तो दूसरा जागता है. पर तुम इतना परेशान क्यों हो रही हो?’’ मैं ने पूछा तो नीरा बिफर पड़ी, ‘‘तुम आदमियों का दिमाग तो जैसे घुटने में रहता है. आजकल के लड़के पढ़ाई के नाम पर घरों से दूर रह कर क्याक्या गुल खिलाते रहते हैं, क्या कभी सुना नहीं? मांबाप सोचते हैं उन का बेटा दिनरात एक कर के पढ़ाई में लगा होगा जबकि लड़के उन के पैसों पर गुलछर्रे उड़ाते रहते हैं.’’

‘‘मुझे समझ नहीं आ रहा नीरा, बच्चे किसी और के हैं, पैसे किसी और के हैं, पर परेशान तुम हो रही हो. आखिर वजह क्या है, साफसाफ बताओ.’’ ‘‘तुम्हारी तो, जब तक साफसाफ न बताओ तब तक, कोई बात समझ में ही नहीं आती. अपने घर में 3-3 जवान होती बेटियां हैं. हम दोनों पतिपत्नी सुबह ही औफिस निकल जाते हैं और घर के ठीक सामने जवान होते लड़के आ कर बस गए. चिंता न करूं तो क्या करूं?’’ ‘‘देखो नीरा, वे लड़के पराए हैं पर बेटियां तो अपनी हैं. उन्हें तो हम ने अच्छे संस्कार दिए हैं. फिर उन लड़कों के बारे में बिना कुछ जानेसमझे गलत धारणा बनाना भी ठीक नहीं है. अब चिंता छोड़ो और जाओ, अपना काम करो,’’ कह कर मैं पेपर पढ़ने लगा.

‘‘देखोजी, जवान लड़केलड़कियां आग और फूस के समान होते हैं. आसपास रहेंगे तो कभी भी आग पकड़ लेने का अंदेशा बना रहता है. तुम या तो सहायजी से कहो कि लड़कों के बजाय किसी परिवार वाले को घर दे दें, या तुम ही कोई दूसरा घर देखो. हमें नहीं रहना अब यहां.’’ सोते वक्त भी नीरा घर बदलने पर विचार करने की हिदायत देने लगी. मुझे आंखकान खुले रखने और लड़कों को मुंह न लगाने को कह कर नीरा तो सो गई पर मैं सोचने लगा कि क्या सचमुच बात इतनी चिंता करने लायक है जितनी नीरा कर रही है. यह सच है कि आजकल अच्छेबुरे दोनों तरह के लोग होते हैं पर बिना किसी से मिले, समझे उस के बारे में यह धारणा बना लेना कि वे बुरे ही हैं और यहां पढ़ने नहीं गुलछर्रे उड़ाने आए हैं, सरासर गलत है. फिर वे भले ही पराए हैं पर हमें अपनी बेटियों पर तो विश्वास करना ही चाहिए. आखिर उन्हें तो हम ने ही संस्कार दिए हैं.

फिर भी मैं कल उन लड़कों से मिलूंगा और निर्णय पर पहुंचूंगा कि हमें आगे उन के साथ किस तरह का संबंध बना कर रखना है. दूसरे दिन रविवार था, मैं ने जानबूझ कर बाहर का दरवाजा खुला छोड़ दिया और वहीं कुरसी डाल कर पेपर पढ़ने बैठ गया. उन लड़कों को अपने काम से अंदरबाहर आतेजाते देखता रहा. इस दौरान उन्होंने एक बार भी अनायास घर में ताकझांक करने की कोशिश नहीं की. जब मेरी नजर एक लड़के से मिली तो उस ने ‘अंकल नमस्ते’ कह कर मेरा अभिवादन किया, तो मैं ने भी मौका हाथ से जाने न दिया, ‘‘अरे बच्चो आओ, हमारे साथ एकएक कप चाय पीओ, इसी बहाने हम लोग एकदूसरे के बारे में भी जानसमझ लें.’’ मैं ने नीरा से पूछे बगैर ही उन लड़कों को चाय पीने के लिए बुला लिया.

मुझे पता था नीरा को यह बिलकुल नागवार गुजरा होगा कि मैं ने उन लड़कों को घर में ही बुला लिया. इसीलिए मैं ने नीरा को कोई औपचारिक सूचना देने के बजाय चुपचाप पेपर पढ़ते रहने में ही अपनी भलाई समझी. इस बात का विश्वास भी था कि लड़कों के आने पर चाय के साथ कुछ नाश्ता भी ले कर अपनेआप ही आ जाएगी नीरा. हुआ भी वही. एकएक कर के पांचों लड़के अंकल नमस्ते कहते हुए आ कर बैठ गए. थोड़ी ही देर में नीरा भी चाय की ट्रे ले कर आ गई. मुझे आश्चर्य भी हुआ देख कर कि सुबह के नाश्ते में बनाया हुआ पोहा पांचों लड़कों के बीच बांट दिया था नीरा ने. हम ने उन से बातोंबातों में उन के पूरे खानदान की जानकारी हासिल कर ली. और होनीअनहोनी पर तुरंत संपर्क कर सकूं इस का हवाला दे कर मैं ने उन पांचों के घरों का पता और फोन नंबर भी नोट कर लिए.

उसी समय उन के सामने ही एकएक के घर फोन मिला कर मैं ने बात भी कर ली. मेरे इस आश्वासन से कि मैं उन के बच्चों का एक अभिभावक की तरह खयाल रखूंगा, वे लोग बहुत ही आभारी होने लगे. सभी से बात कर के मैं पूरी तरह आश्वस्त हो गया कि बच्चे संस्कारी व सुशिक्षित घरों के हैं और यहां पर सचमुच प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने ही आए हैं. कुछ आश्वस्त तो नीरा भी हुई पर पता नहीं पिता की तुलना में मां बच्चों के प्रति ज्यादा शंकालु होती हैं या पिता से ज्यादा बच्चों को प्यार करती हैं कि हर वक्त उन की सुरक्षा को ले कर चिंतित रहती हैं. नीरा ने बेटियों पर कई तरह की बंदिशें लगा डालीं, जैसे जोरजोर से ठहाके न लगाओ, अनायास बालकनी में न खड़ी हो, बाहर का सिर्फ जाली वाला ही नहीं लकड़ी वाला दरवाजा भी हमेशा बंद रखा करो आदि.

समय के साथसाथ सबकुछ सामान्य ढंग से चलता रहा. लड़के घर पर कम ही रहते. सारा दिन कोचिंग सैंटर में होते. घर आते तो सो जाते और फिर रात को जग कर पढ़ाई करते. हमारे जीवन में तथा हमारी दिनचर्या में उन के होने, न होने का कोई फर्क नहीं पड़ा. हां, कुछ तकनीकी बातों जैसे इंटरनैट, मोबाइल आदि की खास समस्याओं के लिए हम उन पर निर्भर हो गए थे और वे भी आम पड़ोसियों की तरह कभीकभार चायपत्ती, चीनी या 1-2 आलूटमाटर के लेनदेन से ज्यादा और कुछ दखलंदाजी नहीं करते. कल को हमारा छोटा सा बेटा बड़ा होगा और वह भी कहीं न कहीं पढ़ने या नौकरी करने बाहर जाएगा ही, तब कोई उस के साथ अच्छी तरह पेश आए, हम यही चाहेंगे, इसीलिए मैं उन लड़कों के साथ और भी अच्छी तरह व्यवहार करता.

मेरे अलावा नीरा की भी शंका उन लड़कों के प्रति कम हो ही रही थी कि एक दिन रात के 2 बजे घर में कुछ हलचल सी सुनाई दी तो मैं और नीरा घबरा कर अपने कमरे से बाहर निकले. देखा तो हमारी बड़ी और छोटी बेटियां घबराई हुई सी खड़ी थीं. बाहर का दरवाजा खुला था और सामने वाले फ्लैट में भी कुछ असामान्य सी हलचल दिख रही थी. ‘‘क्या हुआ? तुम दोनों इतनी घबराई हुई क्यों हो और स्नेहा और सौरभ कहां हैं?’’ हम दोनों ने एकसाथ ही सारे सवाल पूछ डाले. ‘‘मां, पापा, सौरभ तो सो रहा है पर स्नेहा घर में नहीं है. मैं अभी वाशरूम जाने के लिए उठी तो देखा दरवाजा खुला है, और स्नेहा नहीं है.’’ हमारे तो पैरों तले से जमीन ही खिसक गई, ‘‘दिखा ही दिया इन शरीफजादों ने अपना रंग,’’ कह कर नीरा सोफे पर निढाल पड़ गई. मैं दौड़ता हुआ बाहर की ओर भागा. लड़कों के फ्लैट का दरवाजा भी खुला हुआ था. मैं अपने वश में नहीं रह गया था. चीखते हुए मैं उन के घर में घुस गया. पांचों में से 3 लड़के सामने ही खड़े थे और वे खुद भी परेशान लग रहे थे. ‘‘विनय और राहुल कहां हैं?’’ मैं ने चीखते हुए पूछा. ‘‘जी, अंकल, वे अभीअभी गए हैं, बस आते ही होंगे,’’ वे तीनों एकसाथ बोल पड़े. ‘‘कहां ले कर गए हैं वे मेरी बेटी को? मुझे जल्दी बताओ वरना मैं तुम सब को पुलिस के हवाले कर दूंगा,’’ मैं अपना आपा खोता जा रहा था. ‘‘अंकल, वे स्नेहा को ले कर नहीं गए हैं, आप को गलतफहमी हो रही है.’’ ‘‘गलतफहमी हो रही है? अगर वे स्नेहा को ले कर नहीं गए हैं तो तुम्हें कैसे पता कि स्नेहा कहीं गई है? हम ने तो नहीं बताया तुम्हें कि स्नेहा घर में नहीं है.’’

जिन लड़कों को मैं अपनी पत्नी की इच्छा के विरुद्ध जा कर मानसम्मान और स्नेह दे रहा था उन्होंने आज मेरे मुंह पर ऐसी कालिख पोत दी, सोच कर मेरा आत्मनियंत्रण समाप्त होता गया और मैं ने पास पड़ा बैट उठा कर उन के ऊपर बरसाना शुरू कर दिया. अचानक उन लड़कों के तेवर बदल गए. उन्होंने मेरे हाथ से बैट छीन कर फेंक दिया. ‘‘अंकल, अभी तक हम आप के आदरवश चुप थे. आप के सम्मान की खातिर हमारा दोस्त अपनी जान की परवा किए बिना ही इस समय यहां से गया हुआ है और आप उस पर ही शक कर रहे हैं? हमें ही दोषी ठहरा रहे हैं? आंटी ने हमेशा हमें ही शक की निगाह से देखा पर कभी अपनी बेटियों पर भी निगरानी रखी? अगर निगरानी रखी होती तो यह दिन नहीं आता. स्नेहा विनय या राहुल के साथ नहीं भागी है, बल्कि किसी और के साथ गई है, पर आप चिंता न कीजिए. विनय और राहुल उसे वापस ले कर आते ही होंगे.’’

उन की बात सुन कर मैं असमंजस में पड़ गया कि ये सच बोल रहे हैं या झूठ. पर तभी पीछे से नीरा दहाड़ी, ‘‘इन की झूठी बातों में मत आइए. ये सब इन की साजिश का हिस्सा है. ये हमें ऐसे ही उलझा कर तब तक रखना चाहते हैं जब तक वेदोनों स्नेहा को ले कर दूर न निकल जाएं. आप तुरंत पुलिस को फोन लगाइए वरना हम कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह जाएंगे,’’ नीरा जोरजोर रोए जा रही थी. ‘‘प्लीज अंकल, आप हमारी बात पर यकीन कीजिए. पुलिस को बुला लेंगे तो बात सभी को पता चल जाएगी. स्नेहा तो बदनाम होगी ही, आप सब का भी घर से निकलना मुश्किल हो जाएगा. आप बस थोड़ी देर हमारी बात का यकीन कीजिए. अगर 10 मिनट तक वे स्नेहा को ले कर वापस नहीं आ जाते हैं तो आप को जो दिल आए करिएगा. पर अभी बस हमारी इस बात का यकीन करिए कि राहुल और विनय स्नेहा को भगा कर नहीं ले गए हैं बल्कि उसे किसी और के साथ इस समय जाता देख वापस ले आने के लिए गए हैं.’’

हालांकि मेरी सोचनेसमझने की शक्ति पूरी तरह खत्म हो चुकी थी फिर भी उन लड़कों की बात पर यकीन कर कुछ देर इंतजार कर लेने में ही मैं ने भलाई समझी. पुलिस के आने से सिवा बदनामी और बात के बतंगड़ के अलावा और कुछ हासिल नहीं होना था. मैं घड़ी देखता, चहलकदमी करने लगा.

नीरा और बच्चे अंदरबाहर करते रहे. ‘‘अंकल, आप सब को पता है कि हम सब रात को जग कर पढ़ाई करते हैं. पिछले कई दिनों से हम स्नेहा को अपनी बालकनी में धीरेधीरे फोन पर बात करते हुए देखते थे पर हम ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया. ‘‘इधर 2-3 दिनों से 2 लड़कों को रात को बिल्ंिडग के आसपास चक्कर लगाते देख हमें कुछ शक हो रहा था. हम आप से बात करें या न करें, और आप हमारी बातों का यकीन करेंगे या नहीं, हम सब आपस में यह विचारविमर्श कर ही रहे थे कि अचानक जब विनय चाय पीने के लिए बालकनी में निकला तो उसे नीचे 2 लड़कों के साथ एक लड़की दिखी. उस ने ध्यान से देखा तो वह स्नेहा ही लगी. विनय चाय का कप अंदर रख कर तुरंत उन के पीछे भागा. जाते वक्त सिर्फ इतना ही बोला, ‘शायद स्नेहा कहीं जा रही है, मैं उसे ले कर आता हूं,’ उसे अकेला जाता देख राहुल भी पीछेपीछे भागा. चूंकि सबकुछ अस्पष्ट था, वह स्नेहा ही है या कोई और थी? यह भी पक्का नहीं था, इसलिए हम आप को जगा कर क्या बताएं, बताएं या नहीं, यह सोच ही रहे थे कि आप सब स्वयं जग गए.

‘‘अंकल, आप लोगों ने इस अनजान शहर में हमें जितना स्नेह और संरक्षण दिया है उस के बदले में हमें अपनी जान की बाजी लगा कर भी आप लोगों के सम्मान की रक्षा करनी पड़े तो कम है. हमें पता है कि स्नेहा का कोई बड़ा भाई नहीं है, ऐसे में बड़े भाई का कर्तव्य हमें ही निभाना है.’’ उन की बातें पूरी भी नहीं हुई थीं कि राहुल और विनय वापस आ गए. उन के साथ डरीसहमी सी स्नेहा भी खड़ी थी. विनय ने उस का हाथ जोर से पकड़ रखा था, ‘‘अंकल, स्नेहा किसी सड़कछाप के साथ जा रही थी कहीं, मैं ने आज इसे न जाने कितने चांटे मारे हैं. मुझे माफ कर दीजिएगा. मैं अपने पर नियंत्रण न रख सका. जो पिता अनजान, अपरिचित बच्चों पर इतना प्यार न्योछावर करता हो उस पिता की बेटी ने उन के मुंह पर कालिख पोतने से पहले जरा भी न सोचा. बस, यही सोच कर मैं अपना आपा खो बैठा था. मुझे अफसोस है तो बस इस बात का कि इस की हरकतों पर शक होते ही मैं ने एक बड़े भाई की भूमिका अदा करने में देर कर दी. अगर मैं ने उसी वक्त इसे थप्पड़ मार दिया होता तो आज न यह इतनी बड़ी गलती करती और न आप लोगों को शर्मिंदा करती.’’

उन लड़कों को धन्यवाद, शुक्रिया कहने के लिए न तो हमारे पास शब्द थे न ही जबान. हम स्नेहा को सहीसलामत ले कर घर में आ गए. दिनचर्या धीरेधीरे फिर सामान्य होने लगी. सबकुछ पूर्ववत चलने लगा. बदलाव बस इतना आया कि नीरा अब उन लड़कों के बजाय अपनी बेटियों को शक की निगाह से देखने लगी. पहले उन लड़कों से सामना हो, वह नहीं चाहती थी और अब उन का सामना कैसे करेगी, यह सोच कर परेशान रहने लगी.

Romantic Story : टूटा कप – सुनीता ने विनीता को क्यों दी टूटे कप में चाय

Romantic Story : ‘‘विनी, दिव्या का विवाह पास आ गया है, पहले सोच रही थी सब काम समय से निबट जाएंगे पर ऐसा नहीं हो पा रहा है. थोड़ा जल्दी आ सको तो अच्छा है. बहुत काम है, समझ नहीं पा रही हूं कहां से प्रारंभ करूं, कुछ शौपिंग कर ली है और कुछ बाकी है.’’

‘‘दीदी, आप चिंता न करें, मैं अवश्य पहुंच जाऊंगी. आखिर मेरी बेटी का भी तो विवाह है,’’ विनीता ने उत्तर दिया.

विनीता अपनी बड़ी बहन सुनीता की बात मान कर विवाह से लगभग 15 दिन पूर्व ही चली आई थी. उस की 7 वर्षीय बेटी पूर्वा भी उस के साथ आ गई थी. विशाल, विक्रांत की पढ़ाई के कारण बाद में आने वाले थे. विनीता को आया देख कर सुनीता ने चैन की सांस ली. चाय का प्याला उस के हाथ में देते हुए बोली, ‘‘पहले चाय पी ले, बाकी बातें बाद में करेंगे.’’

विनीता ने चाय का प्याला उठाया, टूटा हैंडिल देख कर वह आश्चर्य से भर उठी. ऐसे कप में किसी को चाय देना तो दूर वह उसे उठा कर फेंक दिया करती थी पर इतने शानोशौकत से रहने वाली दीदी के घर भला ऐसी क्या कमी है जो उन्होंने उसे ऐसे कप में चाय दी. मन किया वह चाय न पीए पर रिश्ते की मर्यादा को ध्यान में रखते हुए खून का घूंट पी कर चाय सिप करने लगी पर उस की पुत्री पूर्वा से नहीं रहा गया. वह बोली, ‘‘मौसी, इस कप का हैंडिल टूटा हुआ है.’’

‘‘क्या, मैं ने ध्यान ही नहीं दिया. सारे कप गंदे पड़े हैं, मुनिया भी पता नहीं कहां चली गई. चाय की पत्ती लाने भेजा था, एक घंटे से ज्यादा हो गया, अभी तक नहीं आई. नौकरानियों से कप ही नहीं बचते. अभी कुछ दिन पहले ही तो खरीद कर लाई थी. दूसरा निकालूंगी तो उस का भी यही हाल होगा. वैसे भी विवाह से 3 दिन पहले होटल में शिफ्ट होना ही है. अभी तो हम लोग ही हैं, इन्हीं से काम चला लेते हैं,’’ सुनीता ने सफाई देते हुए कहा.

विनीता ने कुछ नहीं कहा. पूर्वा खेलने में लग गई. विनीता भी सुनीता के साथ विवाह के कार्यों की समीक्षा करने व उन्हें पूर्ण करने में जुट गई. कुछ दिन बाद नंदिता भी आ गई. उसे देखते ही सुनीता और विनीता की खुशी की सीमा न रही, दोनों एकसाथ बोल उठीं, ‘‘अरे, अचानक तुम कैसे, कोई सूचना भी नहीं दी.’’

‘‘मैं सरप्राइज देना चाहती थी, मुझे पता चला कि तुम दोनों अभी एकसाथ हो तो मुझ से रहा नहीं गया. मैं ने सुजय से कहा कि विक्की की परीक्षा की सारी तैयारी करा दी है, आप बाद में आ जाना. मैं जा रही हूं. कम से कम हम तीनों बहनें दिव्या के विवाह के बहाने ही कुछ दिनों साथसाथ रह लेंगी.’’

‘‘बहुत अच्छा किया, हम दोनों तुम्हें ही याद कर रहे थे. मुनिया, 3 कप चाय बना देना और हां, नए कप में लाना,’’ सुनीता ने नौकरानी को आवाज लगाते हुए कहा, फिर नंदिता की ओर मुखातिब हो कर बोली, ‘‘अगर पहले सूचना दी होती तो गाड़ी भिजवा देती.’’ सुनीता दीदी की बात सुन कर विनीता के मन में कुछ दरक गया. नन्ही पूर्वा के कान भी खड़े हो गए. नंदिता के आते ही दूसरे कप निकालने के आदेश के साथ गाड़ी भिजवाने की बात ने उस के शांत दिल में हलचल पैदा कर दी थी. जब वह आई थी तब तो दीदी को पता था, फिर भी उन्होंने किसी को नहीं भेजा. वह स्वयं ही आटो कर के घर पहुंची थी. बात साधारण थी पर विनीता को ऐसा महसूस हो रहा था कि अनचाहे ही सुनीता दीदी ने उस की हैसियत का एहसास करा दिया है. वह पिछले 8 दिनों से उसी टूटे कप में चाय पीती रही थी पर नंदिता के आते ही दूसरे कप निकालने के आदेश के साथ गाड़ी भिजवाने की बात को वह पचा नहीं पा रही थी. मन कर रहा था वह वहां से उठ कर चली जाए पर न जाने किस मजबूरी के कारण उस के शरीर ने उस के मन की बात मानने से इनकार कर दिया. विनीता तीनों बहनों में छोटी है. सुनीता और नंदिता के विवाह संपन्न परिवारों में हुए थे पर पिताजी की मृत्यु के बाद घर की स्थिति दयनीय हो गई थी.

भाई ने अपनी हैसियत के अनुसार घरवर ढूंढ़ा और विवाह कर दिया. यद्यपि विशाल की नौकरी उस के जीजाजी की तुलना में कम थी. संपत्ति भी उन के बराबर नहीं थी पर वह अत्यंत परिश्रमी, सुलझे हुए व स्वभाव के बहुत अच्छे इंसान हैं. उन्होंने उसे कभी किसी कमी का एहसास नहीं होने दिया था और उस ने भी अपने छोटे से घर को इतने सुरुचिपूर्ण ढंग से सजा रखा है कि विशाल के सहकर्मी उस से ईर्ष्या करते थे. स्वयं काम करने के कारण उस के घर में कहीं भी गंदगी का नामोनिशान नहीं रहता था और न ही टूटेफूटे बरतनों का जमावड़ा. यह बात अलग है कि ऐसे ही पारिवारिक आयोजन उसे चाहेअनचाहे उस की हैसियत का एहसास करा जाते हैं पर अपनी सगी बहन को अपने साथ ऐसा व्यवहार करते देख कर वह स्तब्ध रह गई. क्या अब नया सैट खराब नहीं होगा? हमेशा की तरह इस बार भी सुनीता व नंदिता गप मारने लग जातीं और विनीता काम में लगी रहती थी. अगर वह समय निकाल कर उन के पास बैठती तो थोड़ी ही देर बाद कोई काम आने पर उसे ही उठना पड़ता था. पहले वह इन सब बातों पर इतना ध्यान नहीं दिया करती थी पर इस बार उसे काम में लगा देख कर एक दिन उस की पुत्री पूर्वा ने कहा, ‘‘ममा, दोनों मौसियां बातें करती रहती हैं और आप काम में लगी रहती हो, मुझे अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘बेटा, वे दोनों बड़ी हैं, मुझे उन का काम करने में खुशी मिलती है,’’ पूर्वा की बात सुन कर वह चौंकी पर संतुलित उत्तर दिया.

उस ने उत्तर तो दे दिया पर पूर्वा की बातें चाहेअनचाहे उस के दिमाग में गूंजने लगीं. पहले भी इस तरह की बातें उस के मन में उठा करती थीं पर यह सोच कर अपनी आवाज दबा दिया करती थी कि आखिर वे उस की बड़ी बहनें हैं, अगर वे उस से कोई काम करने के लिए कहती हैं तो इस में बुराई क्या है. पर इस बार बात कुछ और ही थी जो उसे बारबार चुभ रही थी. न चाहते हुए भी दीदी का नंदिता के आते ही नए कप में चाय लाने व गाड़ी भेजने का आग्रह उस के दिल और दिमाग में हथौड़े मारने लगता.

जबजब ऐसा होता वह यह सोच कर मन को समझाने का प्रयत्न करती कि हो सकता है वह सब दीदी से अनजाने में हुआ हो, उन का वह मंतव्य न हो जो वह सोच रही है. आखिर वह उन की छोटी बहन है, वे उस के साथ भेदभाव क्यों करेंगी. सच तो यह है कि दीदी का उस पर अत्यंत ही विश्वास है तभी तो अपनी सहायता के लिए दीदी ने उसे ही बुलाया. उन का उस के बिना कोई काम नहीं हो पाता है. चाहे वह दुलहन की ड्रैस की पैकिंग हो या बक्से को अरेंज करना हो, चाहे मिठाई के डब्बे रखने की व्यवस्था करनी हो. और तो और, विवाह के समय काम आने वाली सारी सामग्री की जिम्मेदारी भी उसी पर थी.

दिव्या भी अकसर उस से ही आ कर सलाह लेते हुए पूछती,

‘‘मौसी, इस ड्रैस के साथ कौन सी ज्वैलरी पहनूंगी या ये चूडि़यां, पर्स और सैंडिल मैच कर रही हैं या नहीं?’’

विवाह की लगभग आधी से अधिक शौपिंग तो दिव्या ने उस के साथ ही जा कर की थी. वह कहती, ‘मौसी, आप का ड्रैस सैंस बहुत अच्छा है वरना ममा और नंदिता मौसी को तो भारीभरकम कपड़े या हैवी ज्वैलरी ही पसंद आती हैं. अब भला मैं उन को पहन कर औफिस तो जा नहीं सकती, फिर लेने से क्या फायदा?’ कहते हैं मन अच्छा न हो तो छोटी से छोटी बात भी बुरी लगने लग जाती है. शायद यही कारण था कि आजकल वह हर बात का अलग ही अर्थ निकाल रही थी. यह सच है कि दिव्या का निश्छल व्यवहार उस के दिल पर लगे घावों पर मरहम का काम कर रहा था पर दीदी की टोकाटाकी असहनीय होती जा रही थी. उसे लग रहा था कि काम निकालना भी एक कला है. बस, थोड़ी सी प्रशंसा कर दो, और उस के जैसे बेवकूफ बेदाम के गुलाम बन जाते हैं. मन कह रहा था व्यर्थ ही जल्दी आ गई. काम तो सारे होते ही, कम से कम यह मानसिक यंत्रणा तो न झेलनी पड़ती.

‘‘विनीता, जरा इधर आना,’’ सुनीता ने आवाज लगाई.

‘‘देख, यह सैट, नंदिता लाई है दिव्या को देने के लिए,’’ विनीता के आते ही सुनीता ने नंदिता का लाया सैट उसे दिखाते हुए कहा.

‘‘बहुत खूबसूरत है,’’ विनीता ने उसे हाथ में ले कर देखते हुए निश्छल मन से कहा.

‘‘पूरे ढाई लाख रुपए का है,’’ नंदिता ने दर्प से सब को दिखाते हुए कहा.

‘‘मौसी, आप मेरे लिए क्या लाई हो?’’ वहीं खड़ी दिव्या ने विनीता की तरफ देख कर बच्चों सी मनुहार की.

नंदिता का यह वाक्य सुन कर विनीता का मन बुझ गया. अपना लाया गिफ्ट उस बहुमूल्य सैट की तुलना में नगण्य लगने लगा पर दिव्या के आग्रह को वह कैसे ठुकराती, उस ने सकुचाते हुए सूटकेस से अपना लाया उपहार निकाल कर दिखाया. उस का उपहार देख कर दिव्या खुशी से बोली, ‘‘वाउ, मौसी, आप का जवाब नहीं, यह पैंडेंट बहुत ही खूबसूरत है, साथ ही व्हाइट गोल्ड की चेन. ऐसा ही कुछ तो मैं चाहती थी. इसे तो मैं हमेशा पहन सकती हूं.’’ दिव्या की बात सुन कर विनीता के चेहरे पर रौनक लौट आई. लाखों के उस डायमंड सैट की जगह हजारों का उपहार दिव्या को पसंद आया. यही उस के लिए बहुत था.

विवाह खुशीखुशी संपन्न हो गया और सभी अपनेअपने घर चले गए, विनीता भी धीरेधीरे सब भूलने लगी. समय बड़े से बड़े घाव को भर देता है, वैसे भी दिव्या के विवाह के बाद मिलना भी नहीं हो पाया. न ही दीदी आईं और न ही उस ने प्रयत्न किया, बस फोन पर ही बातें हो जाया करती थीं. समय के साथ विक्की को आईआईटी कानपुर में दाखिला मिल गया और पूर्वा प्लस टू में आ गई, इस के साथ ही वह मैडिकल की तैयारी कर रही थी. समय के साथ विशाल के प्रमोशन होते गए और अब वे मैनेजर बन गए थे. एक दिन सुनीता दीदी का फोन आया कि तुम्हारे जीजाजी को वहां किसी प्रोजैक्ट के सिलसिले में आना है. मैं भी आ रही हूं, बहुत दिन हो गए तुम सब से मिले हुए.

दीदी पहली बार उस के घर आ रही हैं, सो पिछली सारी बातें भूल कर उत्सुकता से विनीता उन के आने का इंतजार करने के साथ तैयारियां भी करने लगी. सोने के कमरे को उन के अनुसार सैट कर लिया और दीदी की पसंद की खस्ता कचौड़ी बना लीं व रसगुल्ले मंगा लिए. खाने में जीजाजी की पसंद का मलाई कोफ्ता व पनीर भुर्जी भी बना ली थी. उस ने दीदी, जीजाजी की खातिरदारी का पूरा इंतजाम कर रखा था. पर न जाने क्यों पूर्वा को उस का इतना उत्साह पसंद नहीं आ रहा था. जीजाजी दीदी को ड्रौप कर यह कहते हुए चले गए, ‘‘मुझे देर हो रही है, विनीता, मैं निकलता हूं, आतेआते शाम हो जाएगी, तब तक तुम अपनी बहन से खूब बात कर लो. बहुत तरस रही थीं ये तुम से मिलने के लिए. शाम को आ कर तुम सब से मिलता हूं.’’

दीदी ने उस का घर देख कर कहा, ‘‘छोटे घर को भी तू ने बहुत ही करीने से सजा रखा है,’’ विशेषतया उन्हें पूर्वा का कमरा बहुत पसंद आया.

तब तक पूर्वा ने नाश्ता लगा दिया. नाश्ते के बाद पूर्वा चाय ले आई. चाय का कप मौसी को पकड़ाया. सुनीता उस कप को देख कर चौंकी, विनीता कुछ कहने के लिए मुंह खोलती उस से पहले ही पूर्वा ने कहा, ‘‘मौसी, इस कप को देख कर आप को आश्चर्य हो रहा होगा. पर दिव्या दीदी के विवाह में आप ने ममा को ऐसे ही कप में चाय दी थी. हफ्तेभर तक वे ऐसे ही कपों में चाय पीती रहीं जबकि नंदिता मौसी के आते ही आप ने नया टी सैट निकलवा दिया था.

‘‘तब से मेरे मन में यह बात रहरह कर टीस देती रहती थी. वैसे तो टूटे कप हम फेंक दिया करते हैं पर यह कप मैं ने बहुत सहेज कर रखा था, उस याद को जीवित रखने के लिए कि कैसे कुछ अमीर लोग अपनी करनी से लोगों को उन की हैसियत बता देते हैं, चाहे वे उन के अपने ही क्यों न हों और आज उस अपमान के साथ अपनी बात कहने का अवसर भी मिल गया.’’

सुनीता चुप रह गई. बाद में वह पूर्वा के कमरे में गई और बोली, ‘‘सौरी बेटा, आज तू ने मुझे आईना ही नहीं दिखाया, सबक भी सिखा दिया है. शायद मैं नासमझ थी, मैं यह सोच ही नहीं पाई थी कि हमारे हर क्रियाकलाप को बच्चे बहुत ध्यान से देखते हैं और हमारी हर छोटीबड़ी बात का वे अपनी बुद्धि के अनुसार अर्थ भी निकालते हैं. मुझे इस बात का एहसास ही नहीं था कि व्यक्ति चाहे छोटा हो या बड़ा, सब में आत्मसम्मान होता है. बड़े एक बार आत्मसम्मान पर लगी चोट को रिश्तों की परवा करते हुए भूलने का प्रयत्न कर भी लेते हैं किंतु बच्चे अपने या अपने घर वालों के प्रति होते अन्याय को सहन नहीं कर पाते और  अपना आक्रोश किसी न किसी रूप में निकालने की कोशिश करते हैं.

‘‘पूर्वा, तुम ने अपने मन की व्यथा को इतने दिनों तक स्वयं तक ही सीमित रखा और आज इतने वर्षों बाद अवसर मिलते ही प्रकट भी कर दिया. मुझे खुशी तो इस बात की है कि तुम ने अपनी बात इतने सहज और सरल ढंग से कह दी. आज तुम ने मुझे एहसास करा दिया बेटे कि उस समय मैं ने जो किया, गलत था. एक बार फिर से सौरी बेटा,’’ यह कह कर उन्होंने पूर्वा को गले से लगा लिया.

जहां सुनीता अपने पिछले व्यवहार पर शर्मिंदा थी वहीं विनीता पूर्वा के कटु वचनों को सुन कर उसे डांटना चाह कर भी नहीं डांट पा रही थी. संतोष था तो सिर्फ इतना कि दीदी ने अपना बड़प्पन दिखाते हुए अपनी गलती मान ली थी.

सच तो यह था कि आज उस के दिल से भी वर्षों पुराना बोझ उतर गया था, आखिर आत्मसम्मान तो हर एक में होता है. उस पर लगी चोट व्यक्ति के दिन का चैन और रात की नींद चुरा लेती है. शायद उस की पुत्री के साथ भी ऐसा ही हुआ था. आज उसे यह भी एहसास हो गया कि आज की पीढ़ी अन्याय का उत्तर देना जानती है, साथ ही बड़ों का सम्मान करना भी. अगर ऐसा न होता तो पूर्वा ‘सौरी मौसी’ कह कर उन के कदमों में न झुकती.

Good Vibes : बुरी नजर नहीं, बुरी एनर्जी हटाइए – घर की वाइब बदलने के आसान तरीके

Good Vibes : बुरी नजर या अच्छी नजर जैसी कोई चीज नहीं होती. मायने रखती है घर में रखी हर वो चीज जो खुशी दे.

हम सब चाहते हैं कि हमारा घर शांति, सुख और पोजिटिव एनर्जी से भरा हो. लेकिन कभीकभी बिना किसी साफ वजह के मन भारी रहता है, घर का माहौल तनावपूर्ण लगता है या बारबार छोटीमोटी परेशानियां आने लगती हैं. ऐसी स्थितियां कई बार नकारात्मक ऊर्जा या बुरी वाइब्स का संकेत हो सकती हैं. अच्छी बात ये है कि इसे दूर करने के लिए महंगे पूजापाठ की नहीं, बल्कि कुछ छोटे और प्रभावी उपायों की ज़रूरत होती है.

घर की वाइब्स को ठीक करने के लिए बहुत से आसान और देसी उपाय हैं, जो न सिर्फ माहौल को हल्का बनाते हैं बल्कि मानसिक शांति और सुख समृद्धि को भी बढ़ाते हैं. इस में साफसफाई, सुगंधित चीजों का प्रयोग, पौधों की भूमिका, लाइटिंग और सकारात्मक सोच जैसी चीजें शामिल हैं. आइए जानें कि कैसे आप कुछ छोटेछोटे बदलावों से अपने घर में पोजिटिव एनर्जी ला सकते हैं.

घर की साफसफाई से शुरू करें पोजिटिविटी का सफर

नकारात्मक ऊर्जा सबसे पहले वहां टिकती है जहां गंदगी, बिखराव और अव्यवस्था होती है. अगर आप के घर में चीजें इधरउधर फैली रहती हैं, धूल जमी रहती है या पुरानी, टूटीफूटी चीजें बिना जरूरत के पड़ी हैं, तो वो घर की वाइब्स को खराब कर सकती हैं. रोजाना या हफ्ते में एक बार डीप क्लीनिंग करने से न सिर्फ घर ताज़ा महसूस होता है बल्कि ऊर्जा का प्रवाह भी बेहतर होता है. खासकर दरवाजे, खिड़कियां और रसोई जैसे मुख्य स्थानों की सफाई पोजिटिव एनर्जी को आकर्षित करती है.

प्राकृतिक खुशबुओं से भरें घर में नई ऊर्जा

सुगंधों का सीधा असर हमारे मूड और ऊर्जा पर पड़ता है. अगर घर में हर समय ताजगी भरी खुशबू रहे तो मन भी शांत और खुश रहता है. आप धूप, अगरबत्ती, एसेंशियल औयल डिफ्यूजर या फूलों की प्राकृतिक महक का इस्तेमाल कर सकते हैं. खासकर तुलसी, चंदन, लैवेंडर या नींबू जैसी खुशबू वाली चीजें नकारात्मकता को दूर करती हैं और पोजिटिव वाइब्स बढ़ाती हैं. रसोई और लिविंग एरिया में हल्की और ताजगी भरी खुशबू का होना पूरे परिवार को रिलैक्स महसूस कराता है.

हरेभरे पौधों से सजाएं घर, बढ़ेगी जीवन की ऊर्जा

पौधे न सिर्फ औक्सीजन देते हैं बल्कि घर की एनर्जी को भी साफ और पोजिटिव बनाते हैं. तुलसी, मनी प्लांट, स्नेक प्लांट और एलोवेरा जैसे पौधे घर में लगाने से नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है. साथ ही ये तनाव कम करने में भी मदद करते हैं. पौधों की देखभाल करने से जुड़ाव की भावना पैदा होती है और मन को सुकून मिलता है. बालकनी, खिड़की के पास या लिविंग एरिया में कुछ हरे पौधे लगाने से घर में हरियाली और तरोताज़गी बनी रहती है.

रोशनी का असर : नेचुरल लाइट और सही लाइटिंग से बदलें माहौल

अंधेरा वातावरण अक्सर भारीपन और सुस्ती को बढ़ाता है, जबकि अच्छी रोशनी ऊर्जा को जागृत करती है. दिन के समय कोशिश करें कि घर में प्राकृतिक धूप आए. यह न केवल बैक्टीरिया को मारती है बल्कि पोजिटिव वाइब्स भी लाती है. शाम को आप वार्म लाइट्स, नमक के लैंप या रंगीन झूमर का प्रयोग कर सकते हैं. बेडरूम और पूजा स्थान में सौफ्ट और शांत रोशनी रखने से वहां शांति बनी रहती है और मन को सुकून मिलता है.

सकारात्मक सोच और शब्दों से बनाएं घर को ऊर्जा का केंद्र 

घर सिर्फ ईंट और पत्थरों से नहीं, बल्कि वहां रहने वालों की सोच और भावना से बनता है. अगर रोज़ाना झगड़ा, शिकायतें या नेगेटिव बातों का माहौल बना रहे तो वहां कोई उपाय असर नहीं करेगा. कोशिश करें कि घर में प्यार, सम्मान और सकारात्मक संवाद बना रहे. ‘थैंक यू’, ‘सौरी’, और ‘आई लव यू’ जैसे शब्द रोजमर्रा में शामिल करें. रोज़ सुबह कुछ समय एक्सरसाइज ऊर्जा को सकारात्मक बनाए रखने में मदद करता है.

Delhi Police : शस्त्रों की हेराफेर

Delhi Police : सरकारी व सरकार के भोंपू टीवी चैनल चिल्लाचिल्ला कर कह रहे हैं कि पहलगाम में किए गए हमले के लिए पाकिस्तान से हथियार आए थे. वहीं, सरकार भी पाकिस्तान को ही दोषी मान रही है. इस बीच, दिल्ली पुलिस ने 25 अप्रैल को एक सूचना दी कि उस ने भारतीय शस्त्र फैक्ट्रियों से चोरी से निकाले व बेचे गए दूर तक मार कर सकने वाले आधुनिक शस्त्रों का व्यापार कर रहे 5 लोगों को पकड़ा.

पुलिस के अनुसार, शस्त्र विक्रेता और्डनैंस फैक्ट्रियों से शस्त्र मंगाते और उन के नंबर मिटा कर उन्हें अपराधियों को दे देते है. इस से साफ है कि भारत में मौजूद किसी आतंकवादी को पाकिस्तान या दूसरे देश पर ज्यादा निर्भर रहने की जरूरत नहीं क्योंकि वे जितना उत्पात यहां मचा रहे हैं उस के लिए तो यहीं के कारखानों में बने शस्त्र नजर आ रहे हैं.

आतंकवादी ही नहीं, नक्सलियों के पास भी बहुत से शस्त्र मिलते हैं. सशस्त्र बलों के यहां से जो शस्त्र चोरी होते हैं और जिन की रिपोर्ट नहीं की जाती, वे ही आतंकवादियों के लिए काफी हैं.
जब पुलिस वालों के पास काफी शस्त्र आम चलते हुए दिख रहे हों तो यह कहना कि पहलगाम में 4-5 आतंवादियों को पाकिस्तान से ही शस्त्र मिले होंगे, असल में अपने निकम्मेपन को छिपाना भी हो सकता है.

यह नहीं भूलना चाहिए कि अकेले दिल्ली में, सुप्रीम कोर्ट को 24 अप्रैल, 2025 को दी गई जानकारी के अनुसार, 95 गैंग हैं जिन के 1,100 सदस्य हैं और सब के पास गैरलाइसैंसधारी शस्त्र हैं. इन्होंने, एडीशनल सौलिसीटर जनरल एस डी संजय के अनुसार, 10 सालों में दिल्ली व उस के आसपास 5,000 वारदातें अंजाम दीं.

जब केंद्र सरकार और केंद्रीय गृहमंत्री की नाक के नीचे उन के कंट्रोल वाली दिल्ली पुलिस इतने गैंगों को निबटा नहीं सकती और वे आसानी से पनप सकते हैं तो पहलगाम में हुए हादसे में सिर्फ पाकिस्तान को 2 घंटे में दोषी ठहरा देना और खुद को क्लीन चिट दे देना जनता को मूर्ख बनाना है.

पाकिस्तान, जहां भी संभव होगा, भारत में उत्पात मचाएगा, इस में शक नहीं है. पाकिस्तान की राजनीति उसी तरह भारत के विरुद्ध मोरचा खोले रखने पर चलती है जैसी भारत की राजनीति हिंदूमुसलिम करने पर चलती है. भारत का भय दिखा कर पाकिस्तान अपनी अर्थव्यवस्था का 5-7 फीसदी सेना पर उड़ा देता है, जैसे भारत की जनता अपनी कमाई का 10-15 फीसदी हिंदूमुसलिम के नारों के बीच पनपतेचमकते मंदिरों पर और मेलों पर खर्च कर डालती है.

दोनों देश धर्म के नाम पर पैसा भी खर्च कर रहे है, जाने ले भी रहे हैं, दे भी रहे हैं ताकि एक तरफ सेना और दूसरी तरफ पुजारी मौज में रह सकें.

Online Hindi Story : नेकी वाला पेड़ – क्या हुआ जब यादों से बना पेड़ गिरा?

Online Hindi Story : टन…टन… टन… बड़ी बेसब्री से दरवाजे की घंटी बज रही थी. गरमी की दोपहर और लौकडाउन के दिनों में थोड़ा असामान्य लग रहा था. जैसे कोई मुसीबत के समय या फिर आप को सावधान करने के लिए बजाता हो, ठीक वैसी ही घंटी बज रही थी. हम सभी चौंक उठे और दरवाजे की ओर लपके.

मैं लगभग दौड़ते हुए दरवाजे की ओर बढ़ी. एक आदमी मास्क पहने दिखाई दिया. मैं ने दरवाजे से ही पूछा, ‘‘क्या बात है?’’

वह जल्दी से हड़बड़ाहट में बोला, ‘‘मैडम, आप का पेड़ गिर गया.’’

‘‘क्या…’’ हम सभी जल्दी से आंगन वाले गेट की ओर बढ़े. वहां का दृश्य देखते ही हम सभी हैरान रह गए.

‘‘अरे, यह कब…? कैसे हुआ…?’’

पेड़ बिलकुल सड़क के बीचोबीच गिरा पड़ा था. कुछ सूखी हुई कमजोर डालियां इधरउधर टूट कर बिखरी हुई थीं. पेड़ के नीचे मैं ने छोटे गमले क्यारी के किनारेकिनारे लगा रखे थे, वे उस के तने के नीचे दबे पड़े थे. पेड़ पर बंधी टीवी केबल की तारें भी पेड़ के साथ ही टूट कर लटक गई थीं. घर के सामने रहने वाले पड़ोसियों की कारें बिलकुल सुरक्षित थीं. पेड़ ने उन्हें एक खरोंच भी नहीं पहुंचाई थी.

गरमी की दोपहर में उस समय कोई सड़क पर भी नहीं था. मैं ने मन ही मन उस सूखे हुए नेक पेड़ को निहारा. उसे देख कर मुझे 30 वर्ष पुरानी सारी यादें ताजा हो आईं.

हम कुछ समय पहले ही इस घर में रहने को आए थे. हमारी एक पड़ोसिन ने लगभग 30 वर्ष पहले एक छोटा सा पौधा लगाते हुए मुझ से कहा था, ‘‘सारी गली में ऐसे ही पेड़ हैं. सोचा, एक आप के यहां भी लगा देती हूं. अच्छे लगेंगे सभी एकजैसे पेड़.’’

पेड़ धीरेधीरे बड़ा होने लगा. कमाल का पेड़ था. हमेशा हराभरा रहता. छोटे सफेद फूल खिलते, जिन की तेज गंध कुछ अजीब सी लगती थी. गरमी के दिनों में लंबीपतली फलियों से छोटे हलके उड़ने वाले बीज सब को बहुत परेशान करते. सब के घरों में बिन बुलाए घुस जाते और उड़ते रहते. पर यह पेड़ सदा हराभरा रहता तो ये सब थोड़े दिन चलने वाली परेशानियां कुछ खास माने नहीं रखती थीं.

मैं ने पता किया कि आखिर इस पौधे का नाम क्या है? पूछने पर वनस्पतिशास्त्र के एक प्राध्यापक ने बताया कि इस का नाम ‘सप्तपर्णी’ है. एक ही गुच्छे में एकसाथ 7 पत्तियां होने के कारण इस का यह नाम पड़ा.

मुझे उस पेड़ का नाम ‘सप्तपर्णी’ बेहद प्यारा लगा. साथ ही, तेज गंध वाले फूलों की वजह से आम भाषा में इसे लोग ‘लहसुनिया’ भी कहते हैं. सचमुच पेड़ों और फूलों के नाम उन की खूबसूरती को और बढ़ा देते हैं. उन के नाम लेते ही हमें वे दिखाई पड़ने लगते हैं, साथ ही हम उन की खुशबू को भी महसूस करने लगते हैं. मन को कितनी प्रसन्नता दे जाते हैं.

यह धराशायी हुआ ‘सप्तपर्णी’ भी कुछ ऐसा ही था. तेज गरमी में जब भी डाक या कुरियर वाला आता तो उन्हें अकसर मैं इस पेड़ के नीचे खड़ा पाती. फल या सब्जी बेचने वाले भी इसी पेड़ की छाया में खड़े दिखते. कोई अपनी कार धूप से बचाने के लिए पेड़ के ठीक नीचे खड़ी कर देता, तो कभी कोई मेहनतकश कुछ देर इस पेड़ के नीचे खड़े हो कर सुस्ता लेता. कुछ सुंदर पंछियों ने अपने घोंसले बना कर पेड की रौनक और बढ़ा दी थी. वे पेड़ से बातें करते नजर आते थे. टीवी केबल वाले इस की डालियों में अपने तार बांध कर चले जाते. कभीकभी बच्चों की पतंगें इस में अटक जातीं तो लगता जैसे ये भी बच्चों के साथ पतंगबाजी का मजा ले रहा हो.

दीवाली के दिनों में मैं इस के तने के नीचे भी दीपक जलाती. मुझे बड़ा सुकून मिलता. बच्चों ने इस के नीचे खड़े हो कर जो तसवीरें खिंचवाई थीं, वे कितनी सुंदर हैं. जब भी मैं कहीं से घर लौटती तो रिकशे वाले से बोलती, ‘‘भैया,

वहां उस पेड़ के पास वाले घर पर रोक देना.’’

लगता, जैसे ये पेड़ मेरा पता बन गया था. बरसात में जब बूंदें इस के पत्तों पर गिरतीं तो वे आवाज मुझे बेहद प्यारी लगती. ओले गिरे या सर्दी का पाला, यह क्यारी के किनारे रखे छोटे पौधों की ढाल बन कर सब झेलता रहता.

30 वर्ष की कितनी यादें इस पेड़ से जुड़ी थीं. कितनी सारी घटनाओं का साक्षी यह पेड़ हमारे साथ था भी तो इतने वर्षों से… दिनरात, हर मौसम में तटस्थता से खड़ा.

पता नहीं, कितने लोगों को सुकून भरी छाया देने वाले इस पेड़ को पिछले 2 वर्ष से क्या हुआ कि यह दिन ब दिन सूखता चला गया. पहले कुछ दिनों में जब इस की टहनियां सूखने लगीं, तो मैं ने कुछ मोटी, मजबूत डालियों को देखा. उस पर अभी भी पत्ते हरे थे.

मैं थोड़ी आश्वस्त हो गई कि अभी सब ठीक है, परंतु कुछ ही समय में वे पत्ते भी मुरझाने लगे. मुझे अब चिंता होने लगी. सोचा, बारिश आने पर पेड़ फिर ठीक हो जाएगा, पर सावनभादों सब बीत गए, वह सूखा ही बना रहा. अंदर ही अंदर से वह कमजोर होने लगा. कभी आंधी आती तो उसे और झकझोर जाती. मैं भाग कर सारे खिड़कीदरवाजे बंद करती, पर बाहर खड़े उस सूखे पेड़ की चिंता मुझे लगी रहती.

पेड़ अब पूरा सूख गया था. संबंधित विभाग को भी इस की जानकारी दे दी गई थी.

जब इस के पुन: हरे होने की उम्मीद बिलकुल टूट गई, तो मैं ने एक फूलों की बेल इस के साथ लगा दी. बेल दिन ब दिन बढ़ती गई. माली ने बेल को पेड़ के तने और टहनियों पर लपेट दिया. अब बेल पर सुर्ख लाल फूल खिलने लगे.

यह देख मुझे अच्छा लगा कि इस उपाय से पेड़ पर कुछ बहार तो नजर आ रही है… पंछी भी वापस आने लगे थे, पर घोंसले नहीं बना रहे थे. कुछ देर ठहरते, पेड़ से बातें करते और वापस उड़ जाते. अब बेल भी घनी होने लगी थी. उस की छाया पेड़ जितनी घनी तो नहीं थी, पर कुछ राहत तो मिल ही जाती थी. पेड़ सूख जरूर गया, पर अभी भी कितने नेक काम कर रहा था.

टीवी केबल के तार अभी भी उस के सूखे तने से बंधे थे. सुर्ख फूलों की बेल को उस के सूखे तने ने सहारा दे रखा था. बेल को सहारा मिला तो उस की छाया में क्यारी के छोटे पौधे सहारा पा कर सुरक्षित थे. पेड़ सूख कर भी कितनी भलाई के काम कर रहा था. इसीलिए मैं इसे नेकी वाला पेड़ कहती. मैं ने इस पेड़ को पलपल बढ़ते हुए देखा था. इस से लगाव होना बहुत स्वाभाविक था.

परंतु आज इसे यों धरती पर चित्त पड़े देख कर मेरा मन बहुत उदास हो गया. लगा, जैसे आज सारी नेकी धराशायी हो कर जमीन पर पड़ी हो. पेड़ के साथ सुर्ख लाल फूलों वाली बेल भी दबी हुई पड़ी थी. उस के नीचे छोटे पौधे वाले गमले तो दिखाई ही नहीं दे रहे थे. मुझे और भी ज्यादा दुख हो रहा था.

घंटी बजाने वाले ने बताया कि अचानक ही यह पेड़ गिर पड़ा. कुछ देर बाद केबल वाले आ गए. वे तारें ठीक करने लगे. पेड़ की सूखी टहनियों को काटकाट कर तार निकाल रहे थे.

यह मुझ से देखा नहीं जा रहा था. मैं घर के अंदर आ गई, परंतु मन बैचेन हो रहा था. सोच रही थी, जगलों में भी तो कितने सूखे पेड़ ऐसे गिरे रहते हैं. मन तो तब भी दुखता है, परंतु जो लगातार आप के साथ हो वह आप के जीवन का हिस्सा बन जाता है.

याद आ रहा था, जब गली की जमीनको पक्की सड़क में तबदील किया जा रहा था, तो मैं खड़ी हुई पेड़ के आसपास की जगह को वैसा ही बनाए रखने के लिए बोल रही थी.

लगा, इसे भी सांस लेने के लिए कुछ जगह तो चाहिए. क्यों हम पेड़ों को सीमेंट के पिंजड़ों में कैद करना चाहते हैं? हमें जीवनदान देने वाले पेड़ों को क्या हम इतनी जमीन भी नहीं दे सकते? बड़ेबुजुर्गों ने भी पेड़ लगाने के महत्त्व को समझाया है.

बचपन में मैं अकसर अपनी दादी से कहती कि यह आम का पेड़, जो आप ने लगाया है, इस के आम आप को तो खाने को मिलेंगे नहीं.

यह सुन कर दादी हंस कर कहतीं कि यह तो मैं तुम सब बच्चों के लिए लगा रही हूं. उस समय मुझे यह बात समझ में नहीं आती थी, पर अब स्वार्थ से ऊपर उठ कर हमारे पूर्वजों की परमार्थ भावना समझ आती हैं. क्यों न हम भी कुछ ऐसी ही भावनाएं अगली पीढ़ी को विरासत के रूप में दे जाएं.

मैं ने पेड़ के आसपास काफी बड़ी क्यारी बनवा दी थी. दीवाली के दिनों में उस पर भी नया लाल रंग किया जाता तो पेड़ और भी खिल जाता.

पर आज मन व्यथित हो रहा था. पुन: बाहर गई. कुछ देर में ही संबंधित विभाग के कर्मचारी भी आ गए. वे सब काम में जुट गए. सभी छोटीबड़ी सूखी हुई सारी टहनियां एक ओर पड़ी हुई थीं. मैं ने पास से देखा, पेड़ का पूरा तना उखड़ चुका था. वे उस के तने को एक मोटी रस्सी से खींच कर ले जा रहे थे.

आश्चर्य तो तब हुआ, जब क्यारी के किनारे रखे सारे छोटे गमले सुरक्षित थे. एक भी गमला नहीं टूटा था. जातेजाते भी नेकी करना नहीं भूला था ‘सप्तपर्णी’. लगा, सच में नेकी कभी धराशायी हो कर जमीन पर नहीं गिर सकती.

मैं उदास खड़ी उन्हें उस यादों के दरफ्त को ले जाते हुए देख रही थी. मेरी आंखों में आंसू थे.

पेड़ का पूरा तना और डालियां वे ले जा चुके थे, पर उस की गहरी जड़ें अभी भी वहीं, उसी जगह हैं. मुझे पूरा यकीन है कि किसी सावन में उस की जड़ें फिर से फूटेंगी, फिर वापस आएगा ‘सप्तपर्णी.’

लेखिका : मंजुला अमिय गंगराड़े

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