धारावाहिक कहानी: अभिनेता भाग-1

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भाग-2

दूसरे दिन अनिल त्यागी के आग्रह पर इंटरव्यू देने के लिए साहिल शर्मा नियत समय पर रेडियो स्टेशन पहुंच गया. सागर कपूर स्टूडियो में उसका इंतजार कर रहे थे. अनिल त्यागी के साथ अन्दर आते उस नौजवान को देखकर एकबारगी तो सागर कपूर हक्का-बक्का से रह गये. अनिल त्यागी ने दोनों का परिचय कराया. साहिल को देखकर सागर कपूर को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह साहिल नहीं, बल्कि उसकी जगह पर वह स्वयं खड़े हों… पच्चीस-छब्बीस साल पहले का सागर… ऐसा ही लम्बा… खूबसूरत… वही चेहरा… वही आंखें…

आज सफेद बालों और झुर्रियों वाले पचपन साला सागर को देखकर कोई अनुमान भी नहीं लगा सकता कि पच्चीस साल पहले वे बिल्कुल इस नौजवान की तरह दिखते थे. साहिल को देखकर तो सागर कपूर सारे सवाल ही भूल गये. वे टकटकी लगाये उस चेहरे में डूब गये. साहिल अनिल त्यागी से बातें कर रहा था… उसकी खिलखिलाहट, उसकी उन्मुक्त हंसी, उसकी बातचीत का ढंग हर चीज में सागर को बार-बार कोई जानी-पहचानी सी छवि दिख रही थी… कौन…? उसे याद नहीं आ रहा था.

उस दिन सागर कपूर ने बड़ी मुश्किल से साहिल का इंटरव्यू खत्म किया. बीस मिनट के अपने कार्यक्रम के लिए उन्होंने मॉडलिंग और रैम्प से जुड़े साहिल के अनुभवों और स्ट्रगल के बारे में बातें कीं… उसकी पसन्द के कई गानों के रिकॉर्ड्स भी बजाए… लेकिन कुछ सवाल रह गये जो सागर कपूर के सीने में तूफान बन कर उठ रहे थे… होंठों पर आने के लिए मचल रहे थे… मगर कैसे? हिम्मत नहीं हो रही थी….

इंटरव्यू खत्म हो चुका था. साहिल जाने की तैयारी में था. उसने सागर कपूर से हाथ मिलाया, ‘थैंक यू’ कहा और बाहर की ओर चल पड़ा. सागर कपूर उसके साथ ही उठ खड़े हुए.

स्टूडियो से बाहर निकलते हुए उन्होंने हौले से पुकारा, ‘साहिल…’

‘यस…!’ साहिल ने पलट कर पूछा.

‘एक सवाल रह गया था…’ उन्होंने झिझकते हुए कहा, ‘आपके माता-पिता… उनके बारे में मैंने कुछ नहीं पूछा… क्या मैं उनके बारे में जान सकता हूं….?’

‘सर, मेरे पिता नहीं हैं… सात-आठ बरस का था मैं, जब उनका देहान्त हो गया… मां हैं… यहीं इसी शहर में रहती हैं… आज उन्हीं का स्नेह और आशीर्वाद है जो मैं यहां तक पहुंच पाया हूं… मां ही मेरा सबकुछ हैं… मैं उनसे बहुत प्यार करता हूं…’

‘क्या मैं उनका नाम…?’ सागर की जुबान लड़खड़ा गयी.

‘मेरी मां का नाम सरिता शर्मा है… मौका मिले तो घर आइये… मैं अभी हफ्ते भर यहीं हूं… ये रहा मेरा एड्रेस…’ साहिल ने अपना विजिटिंग कार्ड निकाल कर सागर कपूर को थमा दिया और लम्बे-लम्बे डग भरता अपनी कार की तरफ बढ़ गया.

‘सरिता शर्मा… सरिता… सरिता…’ यह नाम सागर कपूर के दिमाग पर हथौड़े की तरह बज रहा था. उनका सारा शरीर सुन्न हो गया, खून जैसे नसों में जम गया था. ‘तो क्या सरिता इसी शहर में है…? और यह साहिल… बिल्कुल मेरी जेरॉक्स कॉपी… सरिता शर्मा का बेटा….? सरिता शर्मा और विनय शर्मा का…? या सरिता और सागर कपूर का…?’

वक्त भी इंसान को क्या-क्या रंग दिखाता है. इंटरव्यू के जरिये दूसरों की जिन्दगी खंगालने वाले सागर कपूर की अपनी जिन्दगी के पन्ने अगर कोई उलट दे तो शायद एक ऐसा किरदार उभर कर सामने आये जो अपनी जवानी के दिनों में न सिर्फ रंगमंच पर अभिनय करता था, वरन उसने अपनी निजी जिन्दगी में भी कई नाटक खेले थे. हुस्न की आगोश और सपनों की दुनिया में विचरण करने वाला सागर… दौलत से दुनिया खरीदने का दम रखने वाला सागर… खूबसूरत लड़कियां जिसकी कमजोरी थीं. अब तो उसे गिनती भी याद नहीं कि कितनी लड़कियां उसकी जिन्दगी में आयीं-गयीं… मगर एक लड़की… जिसे वह कभी भुला नहीं पाया… सरिता शास्त्री… एक कुशल लेखिका और पत्रकार… मुम्बई के एक ख्यात अखबार की रिपोर्टर थी सरिता…

सागर का मुम्बई में अभिनय का सफर अभी शुरू ही हुआ था, जब एक नाटक की समाप्ति के पश्चात सरिता शास्त्री बैकस्टेज उसका इंटरव्यू लेने पहुंची थी. सागर के अभिनय से वह बेहद प्रभावित दिख रही थी. बार-बार उसकी तारीफ कर रही थी. मगर उसकी तारीफ में कोई चापलूसी नहीं थी, जो आमतौर पर उसके जवां हैंडसम लुक को देखकर लड़कियां करने लगती थीं. सरिता की बातों में सच्चाई समाहित थी. कुछ सीन पर उसने विस्तार से बात भी की थी. इसका मतलब था कि सरिता ने नाटक को काफी गम्भीरता से देखा और समझा था. उस रोज सागर ने मंच पर वाकयी बहुत अच्छा काम किया था. वह उस दिन खेले गये नाटक का नायक था और अपनी एक्टिंग को लेकर वह खुद भी काफी संतुष्ट महसूस कर रहा था. मेकअप रूम में बैठ कर वह सरिता के सवालों का जवाब विस्तार से दे रहा था. सरिता के सवाल दूसरे रिपोटर्स के सवालों से भिन्न थे. गहरे थे. सरिता के फीचर्स तो बहुत शार्प नहीं थे, रंग भी गेहुआं था, मगर उसका व्यक्तित्व और उसकी बातें बहुत आकर्षित करने वाली थीं. उसकी बोलती हुई सी बड़ी-बड़ी आंखें, लम्बे बाल, मीठी आवाज और कसे हुए सवाल. आमतौर पर कल्चरल बीट कवर करने वाले पत्रकार चाहे वह प्रिंट के हों या टीवी के, काफी बन-संवर कर रहते हैं. मेकअप और उत्तेजक कपड़ों में बेहद ग्लैमरस दिखते हैं, मगर सरिता उनसे भिन्न थी… उसके चेहरे पर कोई लीपापोती नहीं थी… कोई बनावटीपन नहीं था…. वह बेहद सीधी और सहज नजर आती थी.

पूरे एक घंटे की बातचीत के दौरान सागर को पल भर के लिए भी अनकम्फर्टेबल महसूस नहीं हुआ. एक घंटे में वह अपने तमाम सपनों और ख्वाहिशों के बारे में सरिता को बताता चला गया. उस सरिता के बुद्धिमत्ता भरे सवालों के जवाब देने में उसे बहुत खुशी महसूस हो रही थी. इससे पहले किसी ने इतने विस्तार से उसका इंटरव्यू नहीं लिया था. अक्सर नाटक खत्म होने के बाद रिपोटर्स की भीड़ कलाकारों को घेर लेती थी और चंद उड़ते-उड़ते सवाल पूछ कर छंट जाती थी.

दूसरे दिन अखबार का पूरा अन्तिम पेज सागर कपूर के फोटोग्राफ्स और उसके अभिनय की तारीफों से रंगा हुआ था. यह पहली बार था जब किसी प्रमुख अखबार ने उसे इतना स्पेस दिया था. उस एक इंटरव्यू ने रातों-रात सागर को इतनी शोहरत दे दी, कि चंद दिनों में ही उसकी झोली में कई नये प्रोजेक्ट्स आ गिरे. यह सब सरिता की लेखनी का कमाल था. सागर खुशी से फूला नहीं समा रहा था. उसने सरिता शास्त्री को फोन करके धन्यवाद दिया और दोबारा उससे मिलने की ख्वाहिश प्रकट की.

‘अब तो आपके अगले नाटक में ही मुलाकात होगी…’ सरिता ने हंसते हुए कहा था.

‘हां-हां, मेरा अगला नाटक तीस तारीख को है, आप जरूर आइयेगा…’ वह बड़ी उत्सुकता से बोला.

‘इंविटेशन कार्ड भेजेंगे तो जरूर आऊंगी…’ वह हंसती हुई बोली.

और फिर तीस तारीख से हफ्ता भर पहले ही सागर स्वयं कार्ड लेकर उसके अखबार के दफ्तर में पहुंच गया. अखबार की कैंटीन में सरिता के साथ बातचीत करते और कॉफी पीते हुए सागर इस बात को अच्छी तरह समझ रहा था कि ग्लैमर की दुनिया में पैर जमाने हैं तो मीडिया को अपना साथी बनाना पड़ेगा.

सरिता ने सागर को अपने अखबार में जगह दी तो शहर के अन्य अखबारवाले भी उसको कवर करने लगे थे. अब सागर कपूर के प्रत्येक नाटक की समीक्षा, उसके अभिनय की प्रशंसा नित्य ही समाचार पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी थी. यह सब सरिता की बदौलत था कि एक अदना सा रंगमंच का कलाकार तेजी से शोहरत की ओर बढ़ रहा था. उसके लिए कामयाबी के दरवाजे एक के बाद एक खुलते जा रहे थे. दूसरी तरफ सागर और सरिता की दोस्ती भी गहरी होती जा रही थी. वे फोन पर खूब बातें करते, मौका मिलते ही एक दूसरे से मिलने पहुंच जाते. साथ घूमने जाते, शॉपिंग करते और अपनी पसंद-नापसंद, करियर के बारे में तमाम बातें करते. तकल्लुफ की कोई दीवार अब उनके बीच नहीं रह गयी थी, दोस्ती बढ़ते-बढ़ते प्यार के दायरे में जा पहुंची थी.

(धारावाहिक के तीसरे भाग में पढ़िये कि सरिता की दोस्ती और प्यार ने सागर को कहां से कहां पहुंचा दिया, और उसके बदले में सरिता को क्या मिला…)

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