हर साल अक्टूबर-नवंबर महीने में वायु प्रदूषण सूचकांक में भारी इजाफा होता है. दिल्ली एनसीआर में तो सांस लेना दूभर हो जाता है. इसका प्रमुख कारण बताया जाता है पराली का जलाना. पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में इन्हीं महीनों में धान की फसल की कटाई होती है. फसल कटने के बाद खेत में पराली का जमाव हो जाता है. चूंकि तुरंत किसानों को दूसरी फसल की बुआई करनी होती है इस वजह से उस पर आग लगा देते हैं. जिसके कारण पर्यावरण प्रदूषित होता है.

किसानों की मजबूरी ये है कि वो इस पराली को कैसे खेत से हटाएं वहीं सरकार पूरा ठीकरा किसानों पर ही फोड़ रही है. देशभर में हजारों किसानों पर मुकदमें भी दर्ज किए गए हैं. लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए. देश का अन्नदाता पहले से ही मौसम और सरकार की गलत नीतियों का शिकार हो रहा है ऐसे में उसको ये सब झेलना उनके साथ ज्यादती ही है.

खैर, इस समस्या से निजात पाया जा सकता है. कितना अच्छा होगा, अगर दिल्ली की हवा को अत्यधिक प्रदूषित करने वाले पराली को जलाने के बदले उसका किसी और काम में उपयोग किया जाए? स्वीडन ने पराली को हरित कोयला या ऊर्जा पैलेट्स में बदलने का उपाय सुझाया है, जिसका ईंधन के तौर पर इस्तेमाल हो सकता है.

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सोमवार को, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आगंतुक स्वीडन के राजा कार्ल सोलहवें गुस्ताफ पंजाब के मोहाली में बटन दबाकर धान की पराली से हरित कोयला बनाने की पायलट परियोजना की आधिकारिक रूप से शुरुआत करेंगे. इस परियोजना में स्वीडिश कंपनी बावेनडेव सहयोग करेगी.

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