एस बैंक के खतरे में आते ही सोशल मीडिया में एक बार फिर आम लोगों के बीच बैंक खातों में जमा अपने पैसों के डूब जाने की चिंता पर जबरदस्त चर्चा है.ऐसा हो भी क्यों न? जब महज छह महीने के भीतर देश का चौथा सबसे बड़ा प्राइवेट बैंक डूबने की कगार पर पहुंच गया हो तो न तो इस तरह के डर को महज लोगों के साहस के बल पर रोका जा सकता है और न ही बिना किसी विश्वसनीय ठोस आश्वसन के इस तरह के डर को पैनिक होने से बचाया जा सकता है. करीब 6 महीने पहले जब रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने पंजाब एंड महाराष्ट्र कोआपरेटिव बैंक (पीएमसी) पर प्रतिबंध लगाकर खाताधारकों की विदड्रोल लिमिट 10,000 रुपये तय कर दी थी, तभी से मीडिया में एक और बैंक पर मंडराते खतरे की खबरें आ रही थीं. यह बैंक कोई और नहीं यही यस बैंक था, जिस पर अंततः 5 मार्च 2020 को रिजर्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने 3 अप्रैल 2020 तक के लिए खाताधारकों की अधिकतम विदड्रोल राशि 50,000 रुपये तय कर दी.
कहने की जरूरत नहीं है कि इस खबर के आते ही लोगों में अफरा-तफरी मच गई है. चूंकि यस बैंक की देश के 28 राज्यों और 9 केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 1000 शाखाएं और देशभर में 1800 के आसपास इसके एटीएम हैं. इसलिए इसके ग्राहक भी पूरे भारत में हैं और यह अफरा-तफरी भी पूरे भारत में है.
इसी दौरान सोशल मीडिया में लोगों के बीच यह डर और चर्चा भी स्वभाविक है कि क्या बैंक में जमा उनकी रकम डूब जायेगी? करीब करीब हर घबराया हुआ आम आदमी एक दूसरे से यही सवाल पूछ रहा है. ऐसे में कुछ आम सवाल और उनके विश्वसनीय जवाब जरूरी हैं.
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सवाल- अगर बैंक डिफाल्ट कर जाये क्या तब भी किसी खातेदार के बैंक में जमा पूरे पैसे उसे वापस मिलते हैं?
जवाब- अगर किसी बैंक में किसी खातेदार के पांच लाख रुपये तक जमा हैं तो वे वापस मिलेंगे। वास्तव में पांच लाख की यह धनराशि अभी अभी बढ़ी है. इस आम बजट के पहले तक यह धनराशि सिर्फ एक लाख रूपये थी.किसी भी खाताधारक को अपने कुल जमा पर यह अधिकतम राशि इसलिए मिल जायेगी; क्योंकि बैंक में जो भी पैसा जमा होता है, वह डिपोजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिड गारंटी कारपोरेशन (डीआईसीजीसी) द्वारा बीमित होता है.पिछले आम बजट के पहले तक यह अधिकत राशि एक लाख रुपये तक हुआ करती थी.लेकिन बैंकों के डिफाल्ट होने पर मिलने वाली इस अधिकतम राशि के बारे में कुछ बातें और जान लीजिए.
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सवाल- ऐसी स्थिति को ध्यान में रखकर आम लोग आखिर ऐसा क्या करें जिससे कि बैंकों में उनकी जमा राशि पूरी तरह से सुरक्षित हो?
जवाब- इस सवाल के कई जवाब हैं.पहला तो यह कि हर खाताधारक सुनिश्चित करे कि किसी भी एक बैंक में उसकी अधिकतम जमा धनराशि, मूल और ब्याज के साथ मिलकर पांच लाख से कम हो. जिससे कि बैंक के डिफाल्ट होने पर उसे उसकी पूरी राशि मिल जाए.
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दुनियाभर में कोहराम मचाने वाला कोरोना वायरस हिंदुस्तान में भी पहुंच चुका है. हालांकि यहां अभी तक इसके वजह से किसी की भी मौत नहीं हुई है. यहां अलग-अलग शहरों में 30 लोगों के संक्रमित होने की खबर आ रही है. दिल्ली से सटे गाजियाबाद में नोवेल कोरोना वायरस (कोविड-19) का एक नया मामला सामने आने के साथ ही देश में वायरस से संक्रमित लोगों की कुल संख्या 30 तक पहुंच चुकी है. इनमें से तीन मामले दिल्ली-एनसीआर के हैं.
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने गुरुवार को पुष्टि की कि अभी तक देश में कोविड-19 के कुल पॉजिटिव मामलों की संख्या 30 हो गई है.
बच्चों पर नहीं हो रहा असर…
इन सबके बीच एक सबसे अच्छी बात ये है कि बच्चों में इस वायरस का कोई असर नहीं देखा जा रहा है. इसलिए बच्चों की सेफ्टी तो करना है लेकिन इससे बहुत ज्यादा चिंतित होने की जरुरत नहीं है.
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नोएडा में सामने आया मामला…
बुधवार को दिल्ली में कोरोना वायरस का पहला मामला सामने आया. इसके तुरंत बाद ही नोएडा के एक स्कूल को कुछ दिनों के लिए बंद कर दिया गया, क्योंकि वहां पर कोरोना वायरस से संक्रमित शख्स के बच्चे पढ़ते थे.
इसके बाद से ही दिल्ली-एनसीआर में माता-पिता अपने स्कूल जाने वाले बच्चों को लेकर काफी चिंतित हैं. उनमें एक पैनिक की स्थिति पैदा हो गई है. हालांकि, इस बीच स्कूल और सरकारें सभी ये कह रही हैं कि घबराने की जरूरत नहीं है, तैयारी पूरी है, लेकिन एक के बाद एक तेजी से कोरोना वायरस के मामले सामने आने से माता-पिता की चिंता न चाहते हुए भी बढ़ रही है.
नोएडा में कई पैरेंट्स ने अपने बच्चों को स्कूल भेजना बंद कर दिया तो कई ने तो शहर तक छोड़ने का फैसला कर लिया. हालांकि यहां कुछ आंकड़ें हैं जिससे पता चलता है कि बच्चों में इस वायरस का असर बहुत कम या यूं कहूं कि न के बराबर है.
दुनियाभर में 3100 से ज्यादा मौतें…
अब तक दुनिया भर में कोरोना वायरस के 3100 से अधिक लोगों की जान जा चुकी है और 91,700 से भी अधिक लोग इससे संक्रमित हो गए हैं, लेकिन अगर उम्र के हिसाब से देखा जाए तो पता चलता है कि 0-9 साल के एक भी बच्चे की मौत कोरोना वायरस से नहीं हुई है. वहीं 10-19 साल के बच्चों और किशोरों में सिर्फ 0.2 फीसदी मौतें ही कोरोना वायरस की वजह से हुई हैं. इसी तरह 20-29 साल और 30-39 साल के लोगों में सिर्फ 0.2 फीसदी लोग ही कोरोना वायरस से मरे हैं.
ज्यादा उम्र वालों पर ज्यादा असर…
इस वायरस से ये ट्रेंड सामने आया है कि जिसकी उम्र अधिक है, उस उम्र के लोगों की कोरोना वायरस से अधिक मौतें हुई हैं. जैसे 70-79 साल के करीब 8 फीसदी लोग कोरोना वायरस से मारे गए हैं और 80 साल से अधिक के 14.8 फीसदी की मौत कोरोना वायरस ने ली है.
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ये है कारण…
ऐसा क्यों होता है. ये सवाल सबके मन में आता होगा. इसका उम्र से कोई खास रिश्ता नहीं है बल्कि इसका कारण आपका इम्यून क्षमता यानि (प्रतिरोधक क्षमता) है. बच्चों में इम्यून क्षमता सबसे ज्यादा होती है इसलिए इस वायरस का असर उन पर नहीं होता.
भारत में कोरोना वायरस का असर…
कोरोना वायरस में केरल के वह तीन संक्रमित लोग भी शामिल हैं, जो अब ठीक हो चुके हैं और उन्हें अस्पताल से भी छुट्टी दे दी गई है. दिल्ली-एनसीआर में तीन पॉजिटिव रिपोर्ट वाले मामले हैं, जिनमें से दो लोगों ने इटली की यात्रा की थी. एक व्यक्ति ईरान गया था. दिल्ली में संक्रमित पहले व्यक्ति से एक जन्मदिन की पार्टी के दौरान आगरा के छह लोगों को कथित तौर पर संक्रमण हुआ.
तेलंगाना में भी कोरोना के एक मामले की पुष्टि हुई है. संक्रमित व्यक्ति ने दुबई का दौरा किया था, जहां उसे सिंगापुर के एक व्यक्ति से संक्रमण हुआ था. इन मामलों के अलावा 16 इतालवी पर्यटक भी संक्रमित हैं, जो भारत में घूमने आए थे. उनके साथ रह रहा एक भारतीय ड्राइवर भी संक्रमित हुआ है. तेलंगाना के पहले के दो संदिग्ध मामलों की रिपोर्ट नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) पुणे में नकारात्मक पाई गई है.
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8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस है. इस मौके का लाभ अपने आस-पास वालों को शिक्षित करने के लिए उठाएं. हम महिलाओं को होने वाली कुछ सबसे आम बीमारियों के बारे में जागरूकता फैलाकर भी सहायता कर सकते है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का मकसद जागरूकता पैदा करना और महिलाओं के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक उपलब्धियों का प्रचार-प्रसार करना है.
एक महिला के रूप में आप समाज के भिन्न वर्गों के लिए अच्छा-खासा योगदान कर रही हैं पर उस प्रयास का सम्मान तभी हो सकेगा जब हम महिला-पुरुष का भेद मिटाने के लिए काम करना जारी रखेंगे. इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर आइए हम लोग उन आम बीमारियों के बारे में जानें तथा खुद को और अपने आस-पास के लोगों को सुरक्षित करने के लिए कदम उठाएं. इस बारे में बता रहें हैं क्लिनिकऐप्प के सीईओ, श्री सत्काम दिव्य.
1 हृदय की बीमारी
हृदय की स्थिति पुरुषों और महिलाओं की मौत के अग्रणी करणों में से एक है. महिलाओं की मौते के 29% मामले इस कारण होते हैं. हालांकि, असली खतरा यह है कि हृदय से संबंधित बीमारियों के कारण मनुष्य विकलांग हो सकता है और समय से पहले उसकी मौत हो सकती है.
अगर आप आंकड़े देखें तो पाएंगे कि हृदय की स्थिति के कारण महिलाओं के मुकाबले ज्यादा पुरुषों की मौत होती है. पर महिलाओं की बीमारी का पता ही नहीं चलता है. कई मामलों में जब बीमारी का पता चला तो काफी देर हो चुकी थी. जब हम हार्ट अटैक के बारे में सोचते हैं तो जो मुख्य लक्षण दिमाग में आता है वह सीने में दर्द होता है. पर हार्ट अटैक अक्सर असामान्य लक्षणों के जरिए आता है जैसे जबड़े में दर्द, मितली आना, सांस फूलना आदि.
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2 कैंसर
बच्चेदानी, स्तन और ग्रीवा के कैंसर महिलाओं में आम हैं. अगर हम ग्रीवा या गर्भाशय के कैंसर की बात करते हैं तो ज्यादातर महिलाओं को इसकी जानकारी नहीं होती है. डिम्बग्रंथि का कैंसर फैलोपियन ट्यूब में विकसित होता है. पर ग्रीवा का कैंसर गर्भाशय के निचले हिस्से से शुरू होता है. महिलाओं में स्तन कैंसर भी आम है. इसका पता लगाने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि आप खुद भी अपने घर पर स्तन की जांच कर सकती हैं. स्तन कैंसर की शिकार महिलाओं के स्तन में अक्सर गांठ विकसित हो जाता है. कैंसर से बचने की सबसे अच्छी संभावना यह है कि इसका पता जल्दी चल जाए और समय रहते इलाज शुरू हो जाए.
3 अल्जाइमर्स डिजीज
अल्जाइमर्स डिजीज (भूलने की बीमारी) अनुमान है कि देश भर में करीब 40 लाख लोग किसी ना किसी तरह की अल्जाइमर्स डिजीज (भूलने की बीमारी) से ग्रस्त हैं. यह बीमारी धीरे-धीरे बढ़ने वाली क्षरण की गड़बड़ी है जो महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले ज्यादा होता है. इसकी शुरुआत अक्सर भूलने या भ्रम से होती है. यह लक्षण धीरे-धीरे बढ़ता हुआ मानसिक खराबी का रूप ले सकता है और तब यह ठीक होने की स्थिति में नहीं रहता है. अगर आपको लगता है कि ऐसे कुछ लक्षण आपमें हैं तो यह महत्वपूर्ण है कि आप अपनी जांच कराएं. इससे अन्य कारणों की आंशका खत्म करने में मदद मिलेगी.
4 ऑस्टियोपोरोसिस
क्या आपने किसी ऐसे बूढ़े व्यक्ति को देखा है जिसकी कमर झुकी हुई हो? मुमकिन है कि वे ऑस्टियोपोरोसिस के शिकार. कमर दर्द और झुकी हुई कमर ऑस्टियोपोरोसिस के कुछ आम संकेतों में है. हालांकि इस बीमारी को रोका जा सकता है. ऑस्टियोपोरोसिस तब होती है जब शरीर हड्डी की देख-रेख छोड़ देता है या बहुत कम कर देता है. नतीजतन समय के साथ-साथ हड्डी कमजोर होती जाती है. ऐसे में ऑस्टियोपोरोसिसके शिकार लोग दूसरों के मुकाबले अपनी हड्डी ज्यादा आसानी से तोड़ लेते हैं. हड्डी बनने और मजबूर होने का ज्यादातर काम 30 साल की आयु तक होता है. बाद में आप अपनी हड्डियों का ख्याल खुद भी रख सकते हैं. उन्हें मजबूत करने के लिए आप पोषण और सप्लीमेंट्स ले सकते हैं.
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5 अवसाद और चिन्ता
मानसिक संघर्ष अब हरेक आयु के लोगों में बहुत आम है. हालांकि, हमारे हारमोन बढ़ते-घटते रहने के कारण यह महिलाओं को ज्यादा प्रभावित कर सकता है. उदाहरण के लिए, नई माएं प्रसाव के बाद प्रसवोत्तर अवसाद में चली जाएं यह आम है. हर महीने, प्री मेनसुरल सिनड्रोम (पीएमएस) से मूड बदल सकता है, चिड़चिड़ापन आ सकता है, दुख हो सकता है, आलस्य आदि आ सकता है. इसी तरह, मासिक होना खत्म होने यानी (रजोनिवृत्ति) की स्थिति में पहुंचने पर महिला की भावनाएं बढ़ सकती हैं और वे अवसाद में भी जा सकती है.
6 डायबिटीज (मधुमेह)
डायबिटीज (मधुमेह) बुजुर्गों की बीमारी हुआ करती थी. पर अब यह युवाओं को भी प्रभावित करती है. यह एक गंभीर स्थिति है जब शरीर में ग्लूकोज आवश्यक मात्र से ज्यादा होता है. भारत में 60 मिलियन लोग डायबिटिक हैं. इनमें से करीब 30 मिलियन को यह पता नहीं है कि वे डायबिटिक हैं या उन्हें यह बीमारी है. इसे अक्सर सायलेंट किलर कहा जाता है. इसमें ढेर सारे लक्षण नहीं होते हैं. जिन पर आपको ध्यान देना है. हालंकि, अगर आपको अक्सर भूख लगती है, बार-बार पेशाब आता है तो आपको इन लक्षणों की जांच
कराना चाहिए.
टीकाकरण के पूर्व कोचिंग करण…
जब मेरा बेटा 7वीं कक्षा में पहुंचा और मैं बदली पर भोपाल पहुंचा, तो सयानजनों ने कहा कि यह सही सत्य है कि आने वाले समय व उस समय की प्रतियोगिता की धार को देखते हुए बेटे को आईआईटी, ट्रिपलआईटी आदि परीक्षाओं में सफलता अर्जित करने के अवसर बढ़ाने की गरज से आप कोचिंग में डाल दो.
लेकिन उस समय मुझे 7वीं कक्षा के बच्चे को कोचिंग में डालना बेकार का काम लगा और कोचिंग वालों की सोच व उन मांबाप पर भी मुझे तरस आया जिन्होंने अपने इतने छोटे बच्चों को कोचिंग संस्थानों में कैसे भी दाखिला करवा दिया है. इस बात को कई साल बीत गए. अब पेरैंट्स के बीच कोटा का बहुत नाम है, कम से कम जिन के बच्चे 9वीं में पहुंच गए हैं.
यह बात अलग है कि कोटा के स्वयं के हाल बेहाल हैं. हर माह वहां बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं. इसी कोटा की एक विख्यात कोचिंग संस्थान की शाखा भोपाल में खुली. अब जब हमारा बेटा 11वीं में पहुंच चुका था, इन का लटकेदार व झटकेदार विज्ञापन पढ़ कर यों ही इस संस्थान में एक दिन पहुंच गए.
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मेरे आते ही सुंदर, सुशील, गौरवर्ण, लंबी व अपने कार्य में दक्ष रिसैप्शनिस्ट ने पूछा, ‘‘आप ने अपौइंटमैंट लिया है?’’ मैं ने मजाक में कहा, ‘‘हां, मुझ से मिलने के लिए कई लोग अपौइंटमैंट लेते हैं?’’ फिर वे बोलीं, ‘‘नहीं, मैं यहां की बात कर रही हूं?’’ मैं ने कहा, ‘‘जी नहीं.’’ तो वे बोलीं, ‘‘अभी सर काफी बिजी हैं. मुलाकात में समय लगेगा.’’ मैं ने सोचा, अब वापस इतनी दूर जा कर क्या करेंगे, इंतजार करते हैं.
इंतजार के दौरान व्यक्ति जहां बैठा हो, वहां की दीवारों आदि पर उस की नजर जाती ही है. सामने दीवार पर टंगे एक पोस्टर में बड़े-बड़े शब्दों में लिखा था – ‘जेईई शर्तिया प्लान.’ नीचे उस का विवरण था- ‘प्रवेश तीसरी कक्षा से आवश्यक है.’ बवासीर व भगंदर के शर्तिया इलाज के विज्ञापन तो सुने थे लेकिन आईआईटी प्रवेश परीक्षा में पास होने का शर्तिया प्लान पहली बार सुना था.
इस प्लान की खास बात यह थी कि बच्चे का स्कूल साथसाथ चलता रहेगा, मगर कोचिंग दौड़ती रहेगी. मैं कहां पहले 7वीं कक्षा के बच्चे को कोचिंग में दाखिले को बकवास बात मान रहा था और ये महानुभव तीसरी कक्षा से ही बच्चे पर कब्जा चाहते हैं. तीसरी कक्षा का बच्चा मतलब 8-9 साल का नौनिहाल.
बात यहीं रुकती, तो ठीक थी. काफी देर बाद जब मेरा नंबर आया तो सर से मुलाकात हुई. वैसे आजकल सब से बड़े ‘सर’ कोचिंग वाले ही हो गए हैं. बातों ही बातों में उन्होंने इशारा किया कि तीसरी कक्षा वाले उन के विशेष प्लान में प्रवेश बहुत मुश्किल है. जबकि, मैं ने अभी यह प्रकट ही नहीं किया था कि मेरा बेटा कौन सी कक्षा में है. हां, मुझे यह जरूर अच्छा लगा कि वे मुझे मेरी उम्र से काफी छोटा समझते रहे थे.
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वैसे भी, इस समय बड़ी उम्र के ऐसे बापों का जमाना है जिन के बच्चे बहुत छोटे हों. जब उम्रदराज डोनाल्ड ट्रंप का बेटा मात्र 13 साल का हो सकता है तो मेरा क्यों नहीं. सर अतिउत्साहित थे, बोले, ‘‘तीसरी कक्षा से ही फुल कोचिंग वाले प्लान को इतना अच्छा रिस्पौंस आप जैसे जागरूक पेरैंट्स दे रहे हैं कि हम अब एक और नया प्लान लौंच कर रहे हैं.’’ मैं ने उत्सुकतावश पूछ लिया, ‘‘वह कौन सा है?’’ वे बोले, ‘‘अब पहली कक्षा से ही हम होनहार बच्चों का अपने यहां दाखिला कर लेंगे और फिर उन्हें 12वीं तक की कोचिंग देंगे. उस की स्कूली शिक्षा भी हमारे चलती का नाम गाड़ी ब्रैंड चयनित स्कूल में चलती रहेगी. हम पहली से ही उसे भविष्य की कड़ी प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार करेंगे.’’
इस कोचिंग संस्थान की कल्पनाशीलता का मैं कायल हो गया, लेकिन तुरंत इस से मेरी कल्पनाशीलता भी जाग गई. मैं अपनी आम भारतीय की तरह दिन में सपने देखने की आदत के मुताबिक तुरंत किसी दूसरी दुनिया में पहुंच गया. मैं एक ऐसे कोचिंग संस्थान में पहुंच गया था जहां कि पहली कक्षा क्या, बल्कि नर्सरी से ही बच्चों को कोचिंग संस्थान में ले लिया जाता था.
उन का कहना था कि उन का ‘प्ले कोचिंग स्कूल’ का मौडल ऐसा है कि बच्चे को इसी उम्र से हम कोचिंग की तथा यहीं से आईआईटी की ओर मोड़ देते हैं. उस के मन को हम अपने विजन से जोड़ लेते हैं. प्ले कोचिंग स्कूल के सारे गेम्स व प्ले आईआईटी से ही जुड़े रचेबुने हैं. मैं ने उत्सुकता से पूछा, ‘इतने छोटे बच्चे पर इतनी पढ़ाईलिखाई का क्या बोझ डालना?’
उन्होंने कहा, ‘आप सही हैं, लेकिन यह बोझ नहीं है. खेलखेल में हम उसे नर्सरी से ही आईआईटी ही ‘जीवन का लक्ष्य है’ का संदेश उस के कोमल दिमाग में प्रविष्ट करा देते हैं. बचपन में ही हम उसे सपने बुनने सिखा देंगे तो उसे सफल तो होना ही है. यह उस का एक तरह से ब्रेनवाश होता है.’ मैं ने कहा, ‘कोमल दिमाग में क्या ऐसी कठोर बात डालनी जरूरी है?’ वे बोले, ‘नहीं डालोगे तो आप का बच्चा फिर भविष्य के कंपीटिशन में कहां ठहरेगा?’
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यहीं तक बात होती, तो भी हम मान जाते, लेकिन इन का आगे का एक और भी लेकिन वाकई डरावना प्लान था. वह यह था कि बच्चा एक साल का हुआ और वह मांबाप का नहीं, इन का हुआ. ये उसे उसी दिन से कोचिंग संस्थान में रख लेंगे. प्रीनर्सरी के समय ही उस का जेईई के लक्ष्य हेतु ब्रेनवाश करना जरूरी होगा. मैं ने सोचा कि उस के बचपन का क्या होगा. उन की सोच थी कि बचपन तो 55 में भी आ जाता है. अभी तो कंपीटिशन के माहौल में बचपन से ही ढालना होगा.
मैंने कहा, ‘इतनी कम उम्र का बच्चा तो मां की गोद में ही रहता है. और फिर मां का ही दूध बच्चे के लिए सब से अच्छा आहार होता है. सो, इस का क्या होगा?’ तो वे मुसकरा कर बोले, ‘महाशय, हम ऐसे ही इतने नामधारी नहीं हैं, इस के बारे में हमारी योजना बन चुकी है. हम पन्ना धाय की तरह यहां आयाएं रखेंगे और हम मांओं को भी सुविधा उपलब्ध कराएंगे कि वे समयसमय पर आ कर अपने बच्चे को देख सकती हैं, फीड भी करा सकती हैं. वैसे, आज की मांएं फिगर के चक्कर में फीडिंग कराने का जिगर नहीं रखतीं.’
अब मैं और आगे की सोचने लगा कि भविष्य में ऐसा होने वाला है कि कोई स्त्री गर्भवती हुई नहीं कि कोचिंग वाले चक्कर लगाना शुरू कर देंगे, टीकाकरण वगैरह बाद में हो सकता है. कोचिंगकरण तो बच्चे के पेट में रहते ही अब जरूरी रहेगा. कंपीटिशन इतना गलाकाट हो गया है कि इन के प्लान की कोई काट भी नहीं होगी. उस समय तक जनसंख्या भी बढ़ कर 200 करोड़ हो चुकी होगी. लेकिन अच्छे संस्थानों में सीट्स उतनी ही रहेंगी. थोड़ीबहुत बढ़ेंगी और जब हर मांबाप अपने अंदर यह जिजीविषा पाले हैं कि उन का बच्चा आईआईटी में दाखिला ले तो इन की बात भी लोग पूरी तरह नकार नहीं पाएंगे.
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वैसे भी, पेरैंट्स की एक खास बात होती है कि वे जब बच्चे थे तो उतने महत्त्वाकांक्षी नहीं थे, लेकिन जब बालबच्चेदार बन जाते हैं तो अति महत्त्वाकांक्षी हो जाते हैं. कुछ ऐसे लोग भी होंगे जोकि अजन्मे बच्चे की कोचिंग की व्यवस्था कर लेंगे. कोचिंग वाले स्कीम भी इस तरह की डिजाइन कर देंगे कि यदि आप को जुड़वां हो गए, तो दूसरे की कोचिंग मुफ्त रहेगी. लेकिन कल्पनाशीलता की कोई सीमा नहीं होती है. ये
कोचिंग वाले इस के आगे भी, आगे के जमाने में चले जाएंगे. ये जिस की शादी हुई, उस के ये पीछे लग जाएंगे. या, यों कहिए कि हनीमून टूर का भी पीछा करने में इन्हें गुरेज नहीं होगी. ये पूछ भी सकते हैं कि महाशय, परिवार बढ़ाने की कब सोच रहे हैं?
हर कोचिंग संस्थान में एक सैल ऐसा होगा जोकि नए विवाहित जोड़ों में अपने बिजनैस की जोड़तोड़ का स्कोप देखेगा. इस के एक्जिक्यूटिव इन से अपौइंटमैंट ले कर अपनी बात सामने रखेंगे. लोगों को बताएंगे कि कोचिंग का कितना महत्त्व है.
जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचेंगे कोचिंग वाले. और गंगू तो यह सोचता है कि आगे यह भी हो सकता है कि जो बच्चा उन के यहां कोचिंग ले रहा है, 12वीं में पहुंच गया है, उस के साथ भी वे कहीं एग्रीमैंट न कर लें कि जब तुम्हारा ब्याह होगा और बालबच्चों वाले होगे तो तुम भी अपनी आलौद हमें कोचिंग के पुनीत काम के लिए सौंप दोगे, ताकि हम उसे कंपीटिशन फेस करने के लिए फौलाद जैसा बना सकें.
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भविष्य कितना सुनहरा होगा, देखते जाएं. 12वीं का विद्यार्थी जिस की पूरी दाढ़ीमूंछ भी नहीं आई है उस की शादी व उस के बाद उस की औलाद की कोचिंग का प्लान. नीति आयोग भी इतना आगे की नहीं सोचता होगा.
इलाहाबाद के पंडों की तरह इन के पास अब 3 पीढि़यों का कोचिंग का इतिहास होगा और ये आपस में लड़ेंगे कि इस परिवार का कोचिंग का पीढ़ीदरपीढ़ी क्रियाकर्म वे ही करते आ रहे हैं, कोई दूसरा नहीं कर सकता. मुझे वाकई लग रहा था कि यदि भारत में विजन किसी के पास है, तो वह कोचिंग वाले ही हैं.
कभी केले के छिलके पर जानबूझ कर फिसल कर हंसाते हैं तो कभी, ऊटपटांग शक्लों से गुदगुदाते हैं. कभी आप पर भी छींटाकशी करने की हिमाकत तो कभी महंगाई, भ्रष्टाचार और सियासत को सटायर की लुगदी में लपेट कर आप के हंसोड़ जबड़ों में चस्पां कर देते हैं. इन के चेहरे पर हर वक्त हंसताखिलखिलाता मुखौटा चढ़ा रहता है. मुखौटे के पीछे का चेहरा खुश हो या गमगीन, बाहरी मुखौटे पर खुली बत्तीसी ही दिखना इन की मजबूरी और पेशा दोनों है.
आज दुनियाभर के टीवी चैनल, अखबार, पत्रपत्रिकाएं, रेडियो और सार्वजनिक मंचों पर हास्य कलाकारों की उपस्थिति अनिवार्य होती जा रही है. इन्हीं की हंसी के फौआरों से महफिल का आगाज होता है. इसी लोकप्रिय होती हंसोड़ संस्कृति से हास्य की दुनिया के कई नामी कलाकार अस्तित्व में आए. इन्हीं में से एक हैं कपिल शर्मा. पिछले कुछ सालों से कौमेडी की दुनिया में इन का सिक्का चल रहा है. इन की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन के शो ‘कौमेडी नाइट्स विद कपिल’ ने बिग बी के ‘केबीसी’ को टीआरपी के मामले में पीछे ढकेल दिया. कपिल के अलावा देश में हास्य के भूगोल और इतिहास को बदलने में किनकिन कारकों और चेहरों ने योगदान दिया है, उस पर गौर फरमाने के बाद ही हास्य के बदलते ट्रैंड और कल्चर को समझा जा सकता है.
कपिल, कौमेडी और टीवी
हाल ही में ‘सीएनएन इंडियन औफ द इयर’ के अवार्ड से नवाजे गए स्टैंडअप आर्टिस्ट कपिल शर्मा आज किसी सुपरस्टार्स से कम रुतबा नहीं रखते. इन के जैसे कई और नाम हैं जिन्होंने लोगों की थकान और टैंशनभरी जीवनशैली में मुसकान घोलने का काम किया है. सासबहू और साजिश की थीम पर चुइंगम की तरह जबरन खींचे जा रहे फुजूल कार्यक्रमों के बीच इन की कौमेडी औडियंस का मिजाज भी बदलने का काम की रही है. कपिल शर्मा कहते हैं, ‘‘मैं अपने अधिकतर पात्र अपने जीवन से ही उठाता हूं. शमशेर नाम का जो मेरा पात्र काफी फेमस हुआ है, वह मेरे साथ हुई एक घटना से जुड़ा है.’’
कपिल का यह स्टारडम भले ही बहुत पुराना न हो लेकिन इन के जैसे स्टैंडअप कौमेडियन के उद्भव को जानने के लिए जरा पीछे जाना पड़ेगा. इस की शुरुआत लगभग 2005 के आसपास हुई जब ‘स्टार वन’ चैनल पर पहली बार इतने बड़े पैमाने पर ‘द गे्रट इंडियन लाफ्टर चैलेंज’ प्रोग्राम के जरिए स्टैंडअप आर्टिस्टों का मुकाबला हुआ. इस प्रोग्राम ने कौमेडी की शक्लोसूरत बदल कर रख दी. इस में भाग लेने वाले कई प्रतिभागियों को दुनिया ने टीवी पर देखा. इस कल्चर को ‘सोनी टीवी’ के प्रोग्राम ‘कौमेडी सर्कस’ ने आगे बढ़ाया.
आज इन हास्य कार्यक्रमों की बदौलत सुनील पाल, राजू श्रीवास्तव, कपिल शर्मा, सुदेश लहरी, एहसान कुरैशी, नवीन प्रभाकर, भारती सिंह, खयाली घरघर में अपनी पहचान बना चुके हैं. ‘गजोधर भैया’, ‘रतन नूरा’ और ‘पहचान कौन’ की बातें आम बोलचाल का अगर हिस्सा बनीं तो इस के पीछे भारत में हास्य के बढ़ते बाजार का हाथ था.
हास्य का इतिहास
अगर इन स्टैंडअप से इतर सिर्फ हास्य की बात करें तो उस का दायरा बेहद विशाल है. भारतीय संस्कृति व इतिहास में हास्य का सही अध्ययन कपिल के जरिए करना बेहद संकरी गली से गुजरना होगा. दरअसल, इतिहास के हर कालखंड में विदूषकों या कहें हास्य कलाकारों की मौजूदगी व प्रासंगिकता रही है. पंचतंत्र की कहानियों के दिलचस्प किस्से, अकबरबीरबल के चुटकुले और खुसरो की कहमुकरियां हंसी के बदलते चेहरे की शुरुआती तसवीरें कही जा सकती हैं.
बाद के दौर में हास्य ने साहित्य का मुखौटा पहना. नतीजतन, हास्यव्यंग्य की चाशनी में डूबे साहित्य के कई हंसोड़ लेखक या कहें व्यंग्यकार पैदा हुए. इस परंपरा को हरिशंकर परसाई, काका हाथरसी से ले कर आधुनिक दौर में शरद जोशी और अशोक चक्रधर जैसी आधुनिक हस्तियां बखूबी आगे बढ़ा रही हैं.
साहित्य से सिनेमा तक
साहित्य के ही साथसाथ आजादी से कुछ वक्त पहले भारतीय सिनेमा भी शैशव अवस्था में करवट ले रहा था. चलतीफिरती तसवीरों के जरिए बनती धार्मिक कहानियों में भी हास्य को कामयाबी की गारंटी माना जाता था. यहां तक कि कई धार्मिक प्रसंगों के फिल्मी संस्करणों में नारद मुनि को ऐसे खुराफाती और इधर की उधर करने वाले चरित्र के तौर पर पेश किया गया जो तथाकथित भगवानों के घरघर जा कर हास्य स्थितियां पैदा करने में माहिर था.
जैसेजैसे सिनेमा ने धार्मिक चोला उतार कर व्यावसायिक जामा पहना वैसेवैसे कौमेडी और कौमेडियन की परिभाषा भी बदलने लगी. हर फिल्म में हीरो, हीरोइन व विलेन के साथ हास्य कलाकार की ऐंट्री जरूरी हो गई. यहां तक कि गुरुदत्त की क्लासिक फिल्मों में भी जौनी वाकर की हंसोड़ छवि अनिवार्य होती थी. ‘प्यासा’ जैसी संजीदा फिल्म में भी ‘सर जो तेरा चकराए…’ जैसी दिलचस्प प्रस्तुति इस बात की तसदीक करती है कि सिनेमा में हास्य की कितनी महती भूमिका थी.
जौनी वाकर, मुकरी, केश्टो मुखर्जी, टुनटुन, महमूद, जगदीप, असरानी, जूनियर महमूद, देवेन वर्मा जैसे चरित्र कलाकार अब पूरी तरह से हास्य कलाकार की छवि में कैद हो चुके थे. इस सिलसिले को आज भी शक्ति कपूर, परेश रावल, टीनू आनंद, अनुपम खेर, बोमन ईरानी, जौनी लीवर, संजय मिश्रा आदि कायम रखे हुए हैं.
बदलते चेहरे और तेवर
हां, मल्टीप्लैक्स कल्चर ने इस सिलसिले को जरूर बदल दिया. इस के आने से गोविंदा, अक्षय कुमार, रितेश देशमुख, जौन अब्राहम, नाना पाटेकर, अनिल कपूर और मिथुन चक्रवर्ती जैसे मुख्य कलाकार भी कौमेडी में हाथ आजमाने लगे. यानी जो चलन चरित्र अभिनेताओं से शुरू हुआ, उस ने करवट लेते हुए परंपरागत अभिनेताओं के चेहरे पर हास्य का मुखौटा चढ़ा दिया. इस चलन का श्रेय गोविंदा को जाता है. गोविंदा ने ही कादर खान, शक्ति कपूर और जौनी लीवर के साथ 90 के दशक में कौमेडी की चौकड़ी जमाई. जब गोविंदा का सितारा गर्दिश में आया तो बौलीवुड के ऐक्शनजैक्शन खिलाड़ी अक्षय कुमार ने कौमेडी की हेराफेरी शुरू कर दी. अपनी बेहतरीन कौमिक टाइमिंग के चलते उन की कौमेडी के गरममसाले में हंसी का देदनादन डोज आज की भागमभाग जिंदगी में खट्टामीठा हास्य परोस रहा है.
आलम यह है कि ‘दबंग’, ‘बरफी’ जैसी ऐक्शन और भावना प्रधान फिल्में भी पूरी तरह से कौमिक थीम पर आधारित रहीं और सफल भी.
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स्टैंडअप से मिली पहचान
हास्य के बढ़ते बाजार ने कई कलाकारों की न सिर्फ आमदनी बढ़ाई बल्कि उन्हें फिल्मों में भी अवसर उपलब्ध कराए. राजू श्रीवास्तव, सुनील पाल, सुदेश और कृष्णा कई बड़ी फिल्मों में अपनी छवि के चलते मौका पा चुके हैं. इसी लिस्ट में स्टैंडअप आर्टिस्ट वीरदास भी हैं. सालों से स्टैंडअप करते आ रहे वीरदास को लोग उन की फिल्म डेल्हीबेली के लिए जानते हैं. डेल्हीबेली में उन के सह कलाकार रहे कुणाल राय कपूर, जो इस से पहले ‘प्रैसिडैंट इज कमिंग’ फिल्म का निर्देशन कर चुके हैं, खाली वक्त में स्टैंडअप ही करते हैं.
चार्ली चैपलिन की हास्य छवि
भारतीय सिनेमा में हास्य देसी न हो कर हौलीवुड या कहें वैस्टर्न सिनेमा से आयातित था. जब भारतीय सिनेमा पूरी तरह से स्थापित नहीं हुआ था तब वैस्टर्न सिनेमा युवावय था. उस दौर में चार्ली चैपलिन मूक व ब्लैक ऐंड ह्वाइट परदे के जरिए अपनी यूनीवर्सल स्टाइल में दुनियाभर को मनोरंजित कर रहे थे. तब उन की कौमेडी के जरिए सामाजिक संदेश कहने की अदा, भावभंगिमाओं तक को विश्व सिनेमा में फौलो किया गया. बौलीवुड के पहले शोमैन राज कपूर ताउम्र चार्ली चैपलिन की छवि के इर्दगिर्द अपने सिनेमा रचते रहे. चैपलिन की हास्य छवि आज भी अलगअलग रंगों व माध्यमों में दोहराई जा रही है.
जारी है सफर
साहित्य, सिनेमा और सार्वजनिक मंचों से इतर अगर हास्य को टीवी ने पुख्ता पहचान दी है. छोटे परदे के कौमेडी शोज ने इन हास्य कलाकारों को दर्शकों के ड्राइंगरूम तक पहुंचा दिया. ‘लाफ्टर चैलेंज’, ‘कौमेडी सर्कस’, ‘कौमेडी नाइट्स विद कपिल’, ‘लापतागंज’, ‘एफआईआर’, ‘चिडि़याघर’, ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ जैसे प्रोग्राम आज रोनेधोने वाले सीरियल्स से कहीं ज्यादा देखे जा रहे हैं. ऐसे में अगर आप टीवी देख रहे हों और अजय देवगन, ‘मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो गया’ का अंगरेजी अनुवाद ‘माइ चैस्ट बिकम ब्लाउज’ के तौर पर करें तो यकीनन आप का पेट हंसहंस कर दुखने लगेगा. इसी तरह कपिल का ‘बाबा जी का ठुल्लू’, राजू श्रीवास्तव का ‘गजोधर भैया’, अक्षय कुमार का ‘बच्चे की जान लेगा क्या’, भारती का ‘गंगू बाई’, कृष्णा का ‘ताकी ओ ताकी’, सुदेश का ‘मैं ने जिंदगी में बस इतनी इज्जत कमाई है, मेरी एक बेटी है और दो जमाई है’ जैसे जुमले पूरे देश को हंसा रहे हैं. वैसे भी आज की टैंशन, थकान और भागदौड़भरी जिंदगी में दवाओं की जरूरत ही क्या है, जब हंसी की एक गोली की डोज ही काफी है जनाब.
गांव से शहर 350 किलोमीटर दूर था. बस मात्र एक स्थान पर रुकी. वहां पति लघुशंका के लिए अन्य पुरुष यात्रियों की तरह होटल के पीछे कचरे के ढेर के पास जा कर निवृत्त हुआ.
पत्नी ने कहा, ‘‘मुझे भी जाना है.’’
पति ने दुकानदार से पूछा, ‘‘यहां स्त्रियों के लिए कोई अलग से शौचालय नहीं है?’’
होटल वाले ने कहा, ‘‘जो है वह यही है कचरे और गंदगी का ढेर. पुरुष फुरसत हो जाएं तो भेज देना. अलग से सुविधा का सवाल ही नहीं उठता. छोटी सी जगह है. कोई शहर तो है नहीं.’’
पति ने जा कर पत्नी से कहा. पत्नी ने इनकार कर दिया शर्म के कारण और कहा, ‘‘आगे देख लेंगे.’’
आगे बस कहीं रुकी नहीं. प्राइवेट बस थी. ड्राइवर का काम था कि बस को ठीक टाइम पर पहुंचाए ताकि अगली फेरी के लिए बस जा सके. पहले से रिजर्वेशन करवाने वाले भी ठीक समय के इंतजार के बाद चिल्लाने लगते हैं. फिर अन्य सवारी दूसरी बस में बैठ जाती है, इस से फिर सवारी मिलने में समस्या होती है. ड्राइवर सड़कों पर बने गड्ढों की परवा किए बिना उसी रफ्तार से तेजी से गाड़ी चलाता रहा. पतिपत्नी उम्मीद ही करते रह गए कि बस कहीं रुकेगी. रुकी भी तो रास्ते के यात्रियों को उतारने और तैयार बैठी रोड के पास सवारी को लेने के लिए. वह भी एकाध मिनट. पत्नी के चेहरे पर तनाव सा आ गया जो प्राकृतिक चीज को रोकने के कारण था. पति ने एकदो बार कंडक्टर से पूछा भी कि बस रुकेगी कहीं या रोक सकते हैं दो मिनट के लिए.
कंडक्टर ने कहा, ‘‘बहुत देर हो गई है पहले ही. मालिक चिल्लाएगा. बस पहुंचने ही वाले हैं थोड़ी देर में. आप रुकोगे तो और लोग भी उतरेंगे. टाइम हो जाएगा. अब बस गंतव्य पर ही रुकेगी.’’
खराब गड्ढेदार रोड पर बस के उछलने से पत्नी के पेट पर धक्के से लगते और पेशाब रोकने के प्रयास में उसे ज्यादा कस कर शरीर को सिकोड़ना पड़ता. शहर आ गया तो पत्नी के चेहरे पर खुशी सी छा गई. वे जल्दीजल्दी उतरे. उन्हें इस शहर से आगे जाना था. अगली बस भी पकड़नी थी. पेशाब रोकना मुश्किल था तो वे बस स्टैंड पर उतर कर सब से पहले सुलभ शौचालय ढूंढ़ने लगे.
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आमतौर पर छोटे शहर के बस स्टैंड पर शौचालय अब होने लगे हैं. पति, पत्नी को ले कर जैसे ही शौचालय की ओर बढ़ा, वहां ताला लगा पाया. वहां खड़े एक आदमी ने बताया कि कोर्ट के स्टे पर बंद है. सामने हनुमानजी की प्रतिमा स्थापित है. सो, धार्मिक लोगों ने इसे जबरन बंद करवा दिया. चूंकि सरकारी शौचालय था, सो कोर्ट में केस चल रहा है. आखिर धर्म भी कोई चीज है.’’
पति ने पूछा, ‘‘और कहां है?’’
उस व्यक्ति ने कहा, ‘‘बाहर देख लो बस स्टैंड के आसपास.’’
वे बाहर निकले तो बड़ीबड़ी दुकानें, लाइटिंग से जगमगाता शहर. वे दोनों तलाशने लगे आसपास. लेकिन उन्हें नजर नहीं आया. वे आगे बढ़ते गए. बड़ेबड़े शौपिंग मौल नजर आ रहे थे.
पति ने एक व्यक्ति से पूछा, ‘‘भाई, यहां कहीं शौचालय नहीं है?’’
उस ने कहा, ‘‘मर्द हो कहीं भी कोना पकड़ कर शुरू हो जाओ.’’
पति के पीछेपीछे पत्नी बड़ी मुश्किल से चल रही थी. उस का चलना दूभर हो रहा था. पति सड़क के पास एक नाली के पास पहुंचा. जहां भारी मात्रा में कुत्ते और सूअरों का झुंड विचरण कर रहा था. आवागमन भारी मात्रा में जारी था. नाली के किनारे बड़ी संख्या में मलमूत्र पर कीड़े, मक्खियां भिनभिना रही थीं. पत्नी की तरफ पति ने इशारा किया. पत्नी ने कहा, ‘‘इतनी भीड़, गंदगी फिर ये जानवर, यहां कैसे?’’
उन्होंने एक रिकशेवाले से कहा, ‘‘यहां पास में कोई सुलभ शौचालय हो तो ले चलो.’’
रिकशेवाले ने कहा, ‘‘यहां पास में नहीं है. नगरपालिका मार्केट में है, जो
1 किलोमीटर दूर है. अभी रात हो गई है तो वह भी बंद हो गया होगा. दूसरा रेलवे स्टेशन में है. वह यहां से 12 किलोमीटर दूर है. 50 रुपए लगेंगे.’’
वे गांव से शहर मजदूरी करने निकले थे. फिर आना भी तो था वापस. आगे जाने के लिए पैसे कम पड़ जाते. फिर बस भी आगे के लिए पकड़नी थी.
वे थोड़ा और आगे बढ़े. एक बुजुर्ग व्यक्ति को अपनी समस्या बताई. उस ने कहा ‘‘यहां से बाईं वाली सड़क पकडि़ए. दोचार किलोमीटर के बाद सुनसान रास्ता है. कहीं भी निवृत्त हो लेना.’’
उन्होंने बुजुर्ग को धन्यवाद दिया. पति तेजी से आगे बढ़ा और पत्नी उतनी ही तेजी से उस के पीछे. 3 किलोमीटर पैदल चलने के बाद कुछ सुनसान सा था. पति ने पत्नी से कहा, ‘‘जाओ.’’
पत्नी तेजी से रोड किनारे बढ़ी कि तभी एक पुरुष के चीखने की आवाज आई, ‘‘देखते नहीं, भैरो बाबा की कुटी बनी है. आगे जाओ.’’
पत्नी ने देखा कि एक वृक्ष के नीचे काले रंग का पत्थर रखा हुआ था. वह पति के पास आई. पति ने कहा, ‘‘चिंता मत कर, थोड़ा सा आगे चलते हैं.’’
पत्नी के सिर में तकलीफ होने लगी. पेट और नीचे का हिस्सा बहुत भारी हो चला था. उसे चक्कर आ रहे थे. आगे कुछ सुनसान सा देख कर पति ने पत्नी को इशारा किया. पत्नी आगे बढ़ी ही थी कि फिर एक आवाज आई, ‘‘मैडम आप को शर्मवर्म है कि नहीं. हनुमानजी की कुटी बनी है. एक तो आप औरत, उस पर पेशाब करने आई हैं. इस कुटी को मंदिर बनाने के लिए हम लोग दिनरात चंदा कर रहे हैं, सरकार से लड़ रहे हैं और आप हैं कि…’’ पत्नी तेजी से वापस लौटी.
थोड़ा और चलने पर सुनसान तो था लेकिन एक छोटा सा शिव मंदिर था जहां गंजेडी लोग गांजा पी कर आतीजाती महिलाओं पर अश्लील ताने कस रहे थे. वे आगे बढ़े. उन्हें एक दरगाह दिखाई दी. वे और आगे बढ़े तो आईएएस, आईपीएस के बड़ेबड़े बंगले, भूंकते विदेशी कुत्ते. घबरा कर और आगे भागे तेजी से, तो एक विशाल मसजिद थी. और आगे बढ़े तो फिर मंदिर उस के बाद फिर मसजिद. फिर मंदिर, फिर मसजिद, फिर गुरुद्वारा, फिर आगे चर्च. वे तेजी से आगे बढ़ते रहे यह सोच कर कि शायद खाली जगह मिल जाए. लेकिन फिर मकान, दुकानें. और आगे बढ़े तो एक उद्यान दिखाई दिया.
पति ने माली से पूछा, ‘‘यहां शौचालय होगा?’’
माली गुस्से में बोला, ‘‘यह लाखों की लागत से बना पार्क है. लोग यहां घूमने आते हैं. बच्चे खेलने आते हैं. प्रेमीप्रेमिका प्रेम करने आते हैं. आगे जाओ.’’
वे थोड़ा और आगे बढ़े. उन्हें खाली विशाल मैदान दिखाई दिया. इस बार पत्नी, पति से पूछे बगैर आगे बढ़ी और जैसे ही बैठने को हुई कि एक टौर्च की तेज रोशनी के साथ आवाज आई, ‘‘कौन है, क्या कर रहा है?’’
वह घबरा कर उठ गई. एक गार्ड डंडा लिए सामने खड़ा चिल्ला रहा था, ‘‘सरकार लाखोंकरोड़ों खर्च कर के ग्राउंड बना रही है ताकि भविष्य में मैच हो सकें और इन्हें देखो अक्ल नाम की चीज ही नहीं है. खबरदार, मेरी बात नहीं मानी तो और यहां कुछ किया तो पुलिस को बुला कर अंदर कर दूंगा.’’
वे दोनों बेचारे आगे बढ़ गए. लेकिन हर जगह देवीदेवताओं के मंदिर, कुटी, दरगाह, मकान, दुकान, धार्मिक स्थल बने हुए थे. वे कहां जाएं. पत्नी की तो हालत खराब हो चुकी थी. पति खाली जगह तलाश रहा था. इतने में पत्नी बेचारी पेशाब को लंबे समय रोकने से चक्कर खा कर गिर पड़ी. उस का शरीर ढीला पड़ गया और वहीं सड़क पर कपड़ों में ही पेशाब निकल गया.
एक पत्रकार होने के नाते मैं ने कई इंटरव्यू लिए हैं. कुछेक बागी नेताओं से भी मुलाकात की. उन नेताओं के तेवर, तल्खी अंदाज जो देखने में आए, पेश हैं आप की नजर.
जैसा कि आप सभी जानते हैं कि मैं अपने महल्ले का वर्ल्डफेमस पत्रकार हूं, तो कभीकभी मेरे अंदर का पत्रकारी कीड़ा कुलबुलाने लगता है. इसलिए कभीकभार लोगों के छोटेमोटे इंटरव्यू कर लेता हूं. कई बागी नेताओं के इंटरव्यू के कुछ अंश यहां पेश करता हूं. ये इंटरव्यू नेताओं से अलगअलग मौकों पर लिए गए हैं. इन्हें नेताओं के निजी विचार माने जाएं. इन से पत्रकार का कोई लेनादेना नहीं है. और पत्रकार तथा जनता का इन से सहमत होना जरूरी नहीं है. इंटरव्यूज का किसी भारतीय नेता से कोई संबंध नहीं है, और इन का किसी भी नेता के विचारों के समान होना, संयोग मात्र है.
पहला इंटरव्यू जनसेवकजी का है, जो चुनाव से पहले अपनी पार्टी के खिलाफ बिगुल बजा कर दूसरी पार्टी में शामिल हो गए.
प्रश्न : जनसेवकजी, अभी आप दूसरी पार्टी में क्यों शामिल हो रहे हैं? क्या इसलिए कि सर्वेक्षणों में आप की वर्तमान पार्टी हारती हुई दिखाई जा
रही है?
ज.से.जी : देखिए, मैं जनता का सेवक हूं. अब तक मैं जिस पार्टी में था उस में जरा सा भी लोकतंत्र नहीं है. पार्टी अपने मुद्दों से भटक गई है. कुछ लोग पार्टी पर हावी हो गए हैं. कार्यकर्ताओं की पार्टी में कोई सुनवाई नहीं होती. सारे फैसले एक ही व्यक्ति और परिवार लेता है. जनता के लिए इस पार्टी ने कुछ नहीं किया.
प्रश्न : तो आप ने 5 साल तक क्यों इंतजार किया? क्या आप अब इसलिए पार्टी छोड़ रहे हैं क्योंकि आप को लगता है कि दूसरी पार्टी जीतने वाली है?
ज.से.जी : देखिए, मैं ने पूरी जिंदगी जनता की सेवा की है. जनता आज महंगाई और भ्रष्टाचार से त्रस्त है और इस पार्टी ने जनता के लिए कुछ नहीं किया अब इस पार्टी में मेरा दम घुटता है. मैं जनता के लिए अपने प्राण दे सकता हूं, यह पार्टी छोड़ना कौन सी बड़ी बात है.
प्रश्न : नेताजी, आप पर आरोप है कि आप इसलिए पार्टी छोड़ रहे हैं क्योंकि आप की पार्टी अगले चुनाव में आप को टिकट नहीं देने का फैसला कर चुकी है?
ज.से.जी : मैं ने बहुत सालों तक जनता और इस पार्टी की सेवा की है. लेकिन आज पार्टी अपने सिद्धांतों से भटक गई है. पार्टी में बहुत से दागी और बागी आज ऊंचे पदों पर आसीन हो गए हैं. जनता भूख और भ्रष्टाचार से कराह रही है. इसलिए मैं ने इस पार्टी को छोड़ दिया है.
प्रश्न : नेताजी, पार्टी ने जनता के लिए कुछ नहीं किया, तो आप ने क्याक्या काम जनता के लिए पिछले 5 सालों में किए?
ज.से.जी : देखिए, पिछले 5 साल क्या, मैं ने तो अपना पूरा राजनीतिक जीवन ही जनता की सेवा में लगा दिया. लेकिन इस पार्टी ने जनता की कोई सुध नहीं ली. जनता इस को सबक सिखाएगी. जनता सब समझती है.
प्रश्न : नेताजी, कोई भी एक काम आप गिना सकते हैं जो आप ने इतने वर्षों में जनता के लिए किया हो?
ज.से.जी : देखिए, मुझे जनता की सेवा में जाना है, मेरे पास अभी इन फालतू सवालों के लिए वक्त नहीं है.
यह कहते हुए नेताजी आगे बढ़ गए.
दूसरा इंटरव्यू देशभक्तजी का है, जो चुनाव के बाद अपनी पार्टी से बगावत कर के, सरकार बनाने वाली पार्टी में शामिल हो गए.
प्रश्न : नेताजी, आप ने पार्टी क्यों छोड़ी?
दे.भ.जी : देखिए, मैं ने जनता की सेवा के लिए यह पार्टी छोड़ी है. मैं ने अपने पूरे राजनीतिक कैरियर में जनता के हित को हमेशा सर्वोपरि रखा. मेरे लिए जनता और देश पहले है, बाकी सब बाद में.
प्रश्न : नेताजी, चुनाव में आप ने जिस पार्टी के खिलाफ लड़ा था, अब उसी में शामिल हो गए? ऐसा क्यों?
दे.भ.जी : देखिए, मैं उस पार्टी में मुद्दों के आधार पर आया था. जनता के मुद्दे मेरे लिए ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं, मैं जनहित के लिए ही दूसरी पार्टी में गया हूं. मुझे अब समझ में आ गया है कि वह पार्टी सिर्फ अपने लाभ के लिए काम करती है, जनता के लिए नहीं.
प्रश्न : तो आप दूसरी पार्टी में जनता के हित के लिए शामिल हुए हैं या अपने हित के लिए? आप पर आरोप है कि आप मंत्री बनने के लिए दूसरी पार्टी में शामिल हुए हैं. आप का इस पर क्या कहना है?
दे.भ.जी : देखिए, ये सब विरोधियों की साजिशें हैं, उन का प्रोपोगंडा है. जनता सब समझती है. मैं ने हमेशा जनता की सेवा की है और मरते दम तक करता रहूंगा. अभी मेरे पास फालतू के सवालों के लिए वक्त नहीं है, मुझे जनता की सेवा में जाना है. यह कहते हुए देशभक्तजी उठ कर चले गए.
तीसरा इंटरव्यू उस नेता का है जो मंत्री न बनने पर नाराज हो कर पार्टी से बगावत कर बैठे.
प्रश्न : नेताजी, आप अपनी ही पार्टी के खिलाफ क्यों बोल रहे हैं? क्या आप को पार्टी ने मंत्री नहीं बनाया इसलिए?
नेताजी : मैं पद का लालची नहीं हूं. मेरे लिए जनता और जनता के मुद्दे पहले आते हैं, पार्टी बाद में. पार्टी ने जनता से जो वादे किए थे वे पूरे नहीं कर रही है. पार्टी ने जनता को धोखा दिया है.
प्रश्न : लेकिन सरकार अभीअभी तो बनी है. वादे पूरे करने के लिए तो 5 साल हैं, आप अभी से पार्टी की बुराई क्यों करने लगे?
नेताजी : मैं जनता के मुद्दों के लिए पार्टी में शामिल हुआ था. लेकिन पार्टी ने सरकार बनाने के बाद अपने वादों को पूरा नहीं किया. पानी और बिजली फ्री देने की बात की थी, अब सरकार ने उस में शर्तें लगा दीं. यह तो जनता के साथ धोखा है.
प्रश्न : नेताजी, सरकार बने तो अभी कुछ ही दिन हुए हैं, सरकार अपने वादों को पूरा करने की दिशा में तो बढ़ रही है. आप को इतनी जल्दबाजी क्यों है? क्या 5 साल के काम 5 दिन में हो सकते हैं?
नेताजी : हमारी सरकार मुद्दों से भटक गई है. सरकार ने जनता से धोखा किया है. न भ्रष्टाचार दूर हुआ न ही गरीबी और न ही बेरोजगारी. सरकार जनता और जनता के मुद्दों से कट गई है.
प्रश्न : तो फिर आप पार्टी को छोड़ क्यों नहीं देते?
नेताजी : मैं ने पार्टी को मुद्दों के आधार पर जौइन किया था. मैं ने भी पार्टी को अपने खूनपसीने से सींचा है. मैं पार्टी क्यों छोड़ूं? मेरे लिए जनता के मुद्दे आगे हैं, पार्टी पीछे.
प्रश्न : तो फिर आप ऐसी धोखेबाज सरकार के साथ क्यों हैं? क्या आप को चुनाव के समय वादों के बारे में सबकुछ नहीं पता था? क्या आप की पार्टी की फ्री पानीबिजली की शर्तें आप को नहीं पता थीं? क्या आप ने भी जनता से उन शर्तों को छिपा कर जनता से धोखा नहीं किया?
नेताजी : पार्टी अब व्यक्ति आधारित हो गई है. एक ही आदमी सभी नियमकायदे बनाता है और सब से वही फालो करवाया जाता है. पार्टी के भीतर लोकतंत्र नहीं है. किसी को अपनी बातें कहने का हक नहीं है. मैं जनता और उस के मुद्दों के लिए लड़ता रहूंगा. मुझे किसी पद का लालच नहीं है. मैं सेवा करने आया हूं और सेवा करता रहूंगा.
प्रश्न : तो क्या आप इस्तीफा दे कर जनता की सेवा नहीं कर सकते?
यह सवाल सुन कर नेताजी उठते हुए बोले कि भाई, मुझे जनता की सेवा में जाना है. मेरे पास वक्त नहीं है, फिर कभी आना. और नेताजी चल दिए.
फिर उस ने उस वृद्ध का नंबर पूछा और अपने फोन से मिला कर उसे फोन कर दिया. वृद्ध का फोन बजा तो उस ने उसे सेव कर लिया.
‘‘अगर किसी कारण मैं इसे रख न सकी तो आप को वापस दे जाऊंगी. कम से कम यह जीवित तो रहेगा.’’
‘‘आप इसे बस से तो ले जा नहीं सकेंगी. बस वाले इसे भीतर नहीं ले जाने देंगे,’’ वृद्ध ने पूछा, ‘‘तब?’’
‘‘आटो कर लूंगी,’’ संक्षेप में कह वह सड़क की तरफ पलटी और एक खाली आटो ले अपने घर चल दी.
रास्ते में सोचती भी रही, अगर कल को नौकरी पर जाने लगी तो यह अकेला फ्लैट में कैसे रहेगा? अपने खाने की तो उसे बहुत चिंता नहीं होती पर इस के लिए तो कुछ न कुछ बनाना ही पड़ेगा. किसी जानवर को घर लाना आसान है, पर उसे पालना, उस के खानेपीने का प्रबंधन, पूरे एक बच्चे का पालना और उस का खयाल रखना है. वह वृद्ध सही कह रहा था, अगर न पाल सकी तो इसे उसी महल्ले में छोड़ना पड़ेगा. कम से कम जिंदा तो रहेगा.
रास्ते में पडे़ बाजार से सुलभा ने उस कुत्ते के लिए गले का पट्टा और जंजीर खरीदी. पानी के लिए एक बड़ा बरतन खाने के लिए घर में कटोरा था ही. पौटी के लिए क्या करेगी, सुबह इसे ले कर सड़क पर जाना पड़ेगा, वह यह सोचतेसोचते अतीत में चली गई.
पिता जब मां को अकेला छोड़ कर दूसरी औरत के पास चले गए तो मां पर जैसे मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था. कुल हाईस्कूल पास थीं. न कोई टे्रनिंग न हुनर. वे 2 बहनें और एक छोटा भाई, 3 बच्चों को अकेली मां कैसे पाले, कई दिनों तक मां कुछ सोच ही नहीं पाईं. परंतु उन्होंने जिंदगी का सामना बड़ी बहादुरी से किया.
अपने गहने बेच कर मां ने अपने कसबाई क्षेत्र के शहर में एक नया काम शुरू किया था. जाति और परिवार वालों ने उन का बहुत विरोध किया था पर उन का स्पष्ट उत्तर होता था, ‘फिर क्या करूं मैं? 2 लड़कियां हैं और 1 लड़का. 3 बच्चों को कैसे पालूं? कल को उन के शादीब्याह, पढ़ाईलिखाई. बाप तो साथ छोड़ भागा. दूसरी औरत के पास चला गया. क्या मैं भी इन्हें बेसहारा छोड़ किसी के साथ भाग जाऊं?’
कुंआरे या अकेले रहने वाले नौकरी कर रहे लोगों को टिफिन में खाना पहुंचाने का काम शुरू किया. शुरू में मुश्किलें आईं. पर उन के हल भी मां ने सोचे. काम चल निकला. सागदाल वे खुद बनातीं. रोटी बनाने के लिए एक सहायक औरत रख ली. टिफिन लोगों को घर तक पहुंचाने के लिए एक विक्की चलाने वाले लड़के को रख लिया. कुछ हजार लगा कर यह धंधा शुरू किया था मां ने. न खास शिक्षा, न कोई तकनीकी ज्ञान. फिर क्या करतीं वे?
मां ने उसी धंधे की आमदनी से सुलभा को बीएससी कराया. फिर उसे नर्स की टे्रनिंग दिलवाई. उस की छोटी बहन को पढ़ाया. अब उस का भाई भी आगरा में इंजीनियर की पढ़ाई कर रहा है. यह सब मां ने अपने भीतर के साहस से कर के दिखाया. न डरीं, न हिचकीं, न अपनी आलोचनाओं की परवा की. बाद में टिफिन मांजने और किचन के खाना पकाने वाले बड़े बरतनों को मांजने के लिए अलग से एक महिला रख ली. अपने ग्राहकों को वे घर भी जबतब बुलाती थीं और उन्हें विश्वास दिलाती थीं कि जो वे टिफिन में खाने के रूप में भेजती हैं, उसे बहुत ही सफाई से बनाया जाता है. लोग प्रभावित होते. शुरू में मां का हाथ सुलभा, बहन और भाई ने भी बटाया. बाद में बहुतकुछ काम के लिए रखी गई औरतों ने संभाल लिया. खाना एकदम घर जैसा बनता, इसलिए लोगों को पसंद आता. फिर लोगों ने सुबह नाश्ता भी चाहा, जिस का मेन्यू मां ने नाश्ता चाहने वालों की राय से ही बनाया. काम और अधिक बढ़ गया.
मां इसीलिए सुलभा के साथ इस हादसे के बाद अधिक दिन नहीं रह सकीं. लोगों को अकसर अपने से मतलब होता है. दूसरों की क्या जरूरतें, विवशताएं और परेशानियां हैं, इन से उन्हें कुछ लेनादेना नहीं होता. 250 से अधिक ग्राहक थे टिफिन और नाश्ते के, व्यक्तिगत रूप से कोई कुछ अलग चाहता था तो वह भी मां बना कर उसे भिजवाती थीं. संतोष और जिम्मेदारी का अच्छा नतीजा भी हुआ.
सुलभा का मनीष से परिचय एक दिन यों ही ट्रेन की यात्रा में हुआ था. मुरादाबाद में नर्स की ट्रेनिंग कर रही थी वह. छुट्टियों में घर आ रही थी कि ट्रेन
में अचानक लुटेरों ने उत्पात मचाना शुरू कर दिया. लुटेरों की अश्लील हरकतों से सुलभा को उस दिन मनीष ने ही बचाया था. फिर अगले स्टेशन पर सुलभा को अपने साथ उतार टे्रन के चेयरकार वाले डब्बे में बैठाया. ‘मेरे पास टिकट के इतने पैसे नहीं हैं,’ उस ने हिचकते हुए कहा था.
‘जब नौकरी करने लगो तो लौटा देना,’ मनीष मुसकराए थे. बस, वह मुसकान ही सुलभा को इतनी प्यारी लगी कि देर तक ठगी सी ताकती रही मनीष की तरफ. उसी दिन मनीष ने सुलभा का पूरा परिचय प्राप्त किया. सुलभा ने भी कुछ छिपाया नहीं. जो सच था, सब बता दिया.
सुन कर मनीष देर तक कुछ सोचते रहे. फिर पूछा, ‘अब आगे क्या इरादा है?’
‘नौकरी. किसी अच्छे अस्पताल में मिली तो तनख्वाह भी शायद इतनी मिले कि अपनी छोटी बहन को साथ रख कर पढ़ा सकूं.’
‘और अगर मैं तुम्हें नौकरी करने की इजाजत न दूं तो क्या करोगी?’ मनीष के होंठों पर सहज मुसकान थी.
सुलभा पूछना चाहती थी, किस अधिकार से आप रोकेंगे? पर वह संकोचवश पूछ न सकी. सिर झुकाए हुए बोली, ‘आप को अपने परिवार का इतिहास बता दिया. नौकरी करना मेरी मजबूरी नहीं लग रही आप को?’
‘इतिहास जान चुका हूं. भूगोल अपने सामने देख रहा हूं और सोच रहा हूं कि ऐसी आत्मविश्वास से भरी लड़की को अपना जीवनसाथी बना कर मैं कोई गलती नहीं करूंगा.’ मनीष हंसने लगे थे, ‘तुम्हारे शहर चल रहा हूं. तुम्हारी मां से बात करूंगा. अगर वे मान गईं तो अगले कुछ महीनों में ही तुम्हें मेरे साथ महानगर में रहना पड़ेगा. नौकरी मिल रही है वहां एक मल्टीनैशनल कंपनी में, अगर सबकुछ ठीकठाक रहा तो जल्दी हमारे पास रहने को अपना फ्लैट होगा और…’
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‘आप को ऐसा नहीं लग रहा कि आप ने यह फैसला बहुत जल्दबाजी में ले लिया है? मां खाना बना कर खिलाने वाली एक परित्यक्ता हैं. बाप दूसरी औरत के साथ रहता है. यह सब जान कर भी आप को हिचक नहीं हो रही?’
‘कुछ फैसले दिमाग से नहीं, दिल से किए जाते हैं, सुलभा. और एक बार जो दिल कह दे उस में बहुत मीनमेख नहीं करना चाहिए,’ मनीष बोले थे.
मां से उस दिन सारी बातें कर लीं मनीष ने. घरद्वार भी देख लिया. कामधंधा भी. मां को आशा ही नहीं थी कि उस के लिए इस तरह अचानक कोई योग्य वर मिल जाएगा. अवसर को उन्होंने जाने नहीं दिया. हालांकि पिता ने जाना तो वे बाधक बनने के लिए आगे आए. मां ने उन्हें आड़े हाथों लिया, ‘हम लोगों से आप को क्या लेनादेना? जब हमारे जिंदा रहने, मरने की आप को कतई चिंता नहीं हुई तो बेटी के ब्याह में बाधक बनने का आप को क्या अधिकार है?’
गुस्से में पिता कह गए, ‘भाड़ में जाओ तुम सब, मेरे लिए मर गए तुम लोग.’
कुत्ते की भूंक के साथ वह वर्तमान में लौटी. घर ला कर सुलभा ने उसे दूध में रोटी मसल कर खिलाई तो वह खाने में ऐसे जुटा, मानो महीनों से कुछ खाने को न मिला हो. पानी के बरतन में पानी रखा. पूरे फ्लैट में वह घूमफिर कर निरीक्षण कर आया. फिर वह सुलभा के बैड के पास आ बैठा. एक झटका सा लगा सुलभा को. शायद इसी तरह उस मृत वृद्धा के पलंग के पास बैठा यह रोया होगा है. क्या रात को भी वह…? इस सवाल को आगे और सोचने का साहस नहीं जुटा पाई सुलभा.
रात को सोने से पहले उसे सचमुच एक अजीब भय ने जकड़ लिया. नहीं, यह सामान्य जंतु हरकत है. चूंकि यह उस वृद्धा के पलंग के पास ही रहता और सोता रहा होगा, इसलिए वही माहौल पा कर उसी तरह ये पसर कर बैठ गया है.
लेकिन सुलभा अब मौत के खयाल से डरने क्यों लगी है? अपनेआप से पूछा उस ने. पति की दुर्घटना में मौत और गर्भ में बच्चा न होने की मारक सूचनाएं सुलभा को जिंदगी से बेजार कर गई थीं, वही सुलभा अब जीना चाहती थी. क्यों? यह सवाल स्वयं उस के मन ने उस से पूछा.
आशा के विपरीत वह सुबह सचेत हुई. एक क्षण को भय भी लगा. कुत्ता सुबह एक विशेष आवाज में कुकियाने लगा था. कुकियाने के साथ वह अपने नन्हे पंजों से सुलभा के पलंग को खरोंचने लगा था. खरोंचने की आवाज से ही उस की आंख खुली थी और वह भय व आतंक से सहम सी गई थी.
कुछ ही पल में उस ने समझ लिया, कुत्ते को बाहर जाने की जरूरत है. वह उस के गले की बैल्ट में जंजीर बांध उसे ले कर बाहर सड़क पर आई तो कुत्ते ने मलमूत्र त्याग करने में देरी नहीं की. वृद्धा ने इसे सही शिक्षा दी है. वह उसे कुछ और देर तक टहलाती रही. वहां उस ने कुछ भागदौड़ की, अपने शरीर को खींचाताना. अचरज से देखती रही सुलभा. जानवर अपनी जिंदगी को कितनी सावधानी से जीने लायक बनाते हैं.
अचानक एक जबर कुत्ता भौंकता हुआ उस नन्हे कुत्ते की तरफ दौड़ कर आया तो निहत्थी सुलभा सहम गई. कैसे इस हमले से अपने कुत्ते की रक्षा करे? कुछ सोच न पाई तो सड़क के किनारे पड़ा पत्थर का टुकड़ा उठा लिया उस ने और हमलावर कुत्ते को ललकारा. नन्हा कुत्ता भय से सिहर कर उस के पांवों के नीचे आ छिपा. कल से वह एक डंडा साथ रखेगी. सुलभा ने पमेरियन को हाथों में उठा, सीने से लगा लिया. अपनेआप को सुरक्षित समझ वह भी निश्चिंत हो गया.
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फ्लैट में आ वह कुत्ते को उपयुक्त नाम व रिश्ता देने पर सोचने लगी, जब वह नौकरी पर जाने लगेगी, यह अकेला यहां कैसे रहेगा, यह समस्या उस का सिरदर्द बन रही थी, पर कोई न कोई तरीका उसे सोचना पड़ेगा. 2 उजड़े हुए साथी जैसे अनायास ही साथ हो गए हों एकदूसरे के सहारे को. आदमी हो या जानवर, बिना आपसी सहयोग के जीने में असमर्थ हैं. एक साथी चाहिए ही, चाहे साथी नन्हा ही हो.