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Romantic Story in Hindi : इंतजार

Romantic Story in Hindi : एक पार्टी में देखा था उसे। सफेद चिकन का कुर्ता, बड़े इयररिंग्स, लाल बिंदी,नीली समुद्र सी गहराई लिए बड़ी– बड़ी आंखे,घुंघरू वाला ब्रेसलेट पहने, अपने लंबे खुले बालों की लट को संभालती हुई ,भीड़ में वह अलग सी रोशनी बिखेर रही थी।

उसकी उन्मुक्त हंसी ने ही रवि का ध्यान खींचा ।दोनों गालों पर पड़ते डिंपल उसकी मुस्कुराहट को दुगना खूबसूरत कर रहे थे।

उसकी छवि ने मानो रवि की आंखों को बांध रखा था। उसके सिवा उसे कोई नजर ही नहीं आ रहा था।

“अरे रवि !कोल्ड ड्रिंक लिया कि नहीं?” रवि ने यंत्र चलित सा नहीं में सर हिलाया।

“अरे तो चल ना यार! एक-एक लेते हैं” और सूरज उसे खींचता सा ड्रिंक काउंटर की तरफ ले गया।

रवि ने ड्रिंक लेकर पलट कर देखा तो वह नहीं थी। रवि बेचैनी से चारों तरफ ढूंढ रहा था,अभी तो उसे जी भरकर देखा भी नहीं पता नहीं कहां ओझल हो गई।

“जब बेटी उठ खड़ी होती है, तभी विजय बड़ी होती है” रवि ने अगले दिन, कॉलेज के थिएटर के अंदर जैसे ही प्रवेश किया, उसके कानों में एक बुलंद आवाज गूंजी।

रवि की नजर सीधा स्टेज पर खड़ी उस लड़की पर पड़ी,स्पॉटलाइट की रोशनी में जगमगाती,अपने संवादों का शायद अभ्यास कर रही थी। लंबे खुले बाल, सलवार कुर्ते में पसीने से तरबतर अपने पात्र में खोई हुई।

रवि उसे अवाक सा देखता रह गया।
“क्या ये वही है?नहीं–नहीं रवि! तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है.तुम्हे हर तरफ वही दिखाई दे रही है।”रवि खुद से ही बाते कर रहा था

तभी पीछे से उसकी सारी नाटक मंडली शोर मचाते हुए पहुंच गई। वह लड़की इन सबको देख सकुचाकर भाग गई।

रवि और उसके साथी कॉलेज में हो रही थिएटर प्रतियोगिता में शामिल होने आए थे।

प्रेक्टिस खत्म कर जब सब थिएटर से बाहर निकले,रवि को एक झुंड में से फिर वही आवाज सुनाई दी। रवि उस चेहरे को देखना चाह रहा था पर उसके साथी उसे खींचते हुए कैंटीन ले गए।

अगले दिन प्रतियोगिता थी।रवि उस लड़की को अपने विचारों से हटा नहीं पा रहा था। एक-एक कर सारे कॉलेज अपनी-अपनी प्रस्तुति दे रहे थे। तभी मंच पर रानी लक्ष्मीबाई नाटक का मंचन हुआ और वही लड़की रानी लक्ष्मी बाई के अवतार में थी।

उस लड़की ने अपने किरदार में जान डाल दी थी मानो साक्षात् रानी लक्ष्मीबाई सामने हो। नाटक के बाद अन्ततः पात्र परिचय में रवि को उस लड़की का नाम और शहर का पता लग ही गया।

“अपराजिता” यथा नाम तथा गुण.

आत्मनिर्भर और आत्म सम्मान से भरी हुई। अपराजिता इसी शहर के नर्सिंग कॉलेज की है जानकर रवि अनायास ही खुशी से भर उठा।
प्रतियोगिता समाप्त हुई. सब अपने घर वापस चले गए पर रवि अपराजिता की स्मृतियां भी वहां से साथ ले आया।

अगले दिन रवि कॉलेज के लिए निकला तो रास्ते में एक्सीडेंट के कारण ट्रैफिक जाम लगा था। उसने आगे बढ़कर मदद करनी चाही तो वहां अपराजिता पहले ही घायल को फर्स्ट एड दे रही थी।
रवि को देखकर अपराजिता ने घायल को अस्पताल ले चलने का निवेदन किया। दोनों ने घायल को अस्पताल पहुंचाया और वेटिंग लाउंज में इंतजार करने लगे।

“ हैलो…मैं अपराजिता. मैं इसी मेडिकल कॉलेज में नर्सिंग की स्टूडेंट हूं। आपका मदद के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद ”।

रवि बस उसे देखे ही जा रहा था । “आपका शुभ नाम?” अपराजित ने बड़ी –बड़ी पलके झपकाते हुए पूछा. तब उसने हड़बड़ा कर उत्तर दिया “रवि,मैं इंजीनियरिंग कॉलेज का स्टूडेंट हूं।” तभी नर्स भागती हुई आई ।“
पेशेंट का काफी ब्लड लॉस हो गया है .क्या आप ब्लड डोनेट करना चाहेंगे?”

दोनों ने एक सुर में “हां” कहा और नर्स के साथ चल दिए ।फिर तो बस जैसे बातों का सिलसिला चल निकला, बातों – बातों में रवि ने अपराजिता से नाटक प्रतियोगिता का जिक्र किया.“ क्या सच में! आप उस प्रतियोगिता में शामिल थे? अपराजिता ने आश्चर्य से कहा।
“यह कैसा संयोग है?”
“आपने तो रानी लक्ष्मी बाई को मंच पर जीवंत कर दिया था!” रवि ने अपराजिता से कहा
“धन्यवाद” अपराजिता ने आंखे झुकाते हुए कहा अस्पताल से निकलते वक्त दोनों ने फिर मिलने का वादा कर फोन नंबर एक्सचेंज किए और अपनी अपनी राह पर चल दिए।

आज तो रवि जैसे सातवें आसमान पर था। उसे बिल्कुल भी अपेक्षा नहीं थी कि अपराजिता से यूं मुलाकात हो जाएगी। घर आकर भी उसे नींद नहीं आ रही थी। वह अपराजिता के ख्यालों में ही खोया हुआ था।

फिर कुछ समय अपराजिता से कोई संपर्क ही नहीं हुआ। दोनों अपने एग्जाम्स की तैयारी में जुट गए।
अपराजिता का ख्याल रवि के मन में हमेशा ही रहता। एक दिन रवि एक स्टूडियो में, नाटक के लिए ऑडिशन देने पहुंचा। सारे हॉल में कोई इधर-उधर चहल कदमी कर रहा है,तो कोई अपनी स्क्रिप्ट याद कर रहा है, कोई अपने बाल बना रहा है, तो कोई डायलॉग्स की प्रैक्टिस कर रहा है।
तभी ऑडिशन रूम से तड़ाक की आवाज आई। थप्पड़ की गूंज दूसरे कमरे तक आ गई थी। दरवाजा जोर से खुला और रवि ने देखा ,अपराजिता वहां से बेहद गुस्से में बड़बड़ाती हुई हॉल से बाहर निकली। उसका चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था। रवि उसे देखकर उसके पीछे भागता है।“अपराजिता.. अपराजिता रुको! क्या हुआ?”

अपराजिता गुस्से में तमतमाई हुई अपनी ही रौ में बोले चली जा रही थी “वह डायरेक्टर खुद को समझता क्या है? एक्टिंग करने आए हैं, तो क्या वह हमसे बदतमीजी कर सकता है ?उसने एक कोशिश की और मैंने उसे वही सबक सिखा दिया. अब वह ऐसी हरकत किसी और के साथ कभी नहीं करेगा.”

रवि ने उसे शांत किया और कहा “तुमने जो किया बिल्कुल ठीक किया. अब तुम घर जाकर आराम करो”.

“सॉरी रवि, मैंने अपनी परेशानी में तुम्हें भी इंवॉल्व कर लिया.वैसे क्या तुम भी यहां ऑडिशन देने आए थे?”
“हां, पर अब ऐसा कोई इरादा नहीं है.”रवि ने कहा।
“ओके, बाय…टेक केयर.” कहकर दोनों ने विदा ली .

रातभर रवि अपराजिता के बारे में ही सोचता रहा।वह ठीक तो होगी ना। सुबह सबसे पहले उससे मिलकर अपने दिल की बात रख दूंगा।

सुबह रवि ने अपराजिता को फोन कर हाल-चाल पूछा और शाम को पास के कैफे में मिलने की रिक्वेस्ट की। अपराजिता ने भी हामी भर दी। पूरे रास्ते रवि यही सोचता जा रहा था कि अपराजिता से कैसे कहे कि उसके व्यवहार और समझदारी से प्रभावित हो वह उसे पसंद करने लगा है और जीवन साथ गुजारना चाहता है।

रवि कैफे में पहुंचकर अपराजिता की राह देखता है। तभी उसे सामने से बलखाती , इठलाती नदी सा आता देखकर वह मंत्रमुग्ध हो जाता है। उसके परफ्यूम की मंद– मंद सुगंध कैफे में एक ताजा बयार का झोंका ले आई.
“हेलो रवि”
“हैलो ,तुम कैसी हो?”
“हां, अब मैं ठीक हूं. बताओ तुमने मुझे यहां क्यों बुलाया?”

“अपराजिता,मुझे पता नहीं तुम कैसे रिएक्ट करोगी पर मैं तुमसे अपने दिल की बात करना चाहता हूं. मैं तुम्हें पहले दिन से पसंद करता हूं और साथ जीवन गुजारना चाहता हूं.” यह कह कर रवि याचक की तरह अपराजिता की तरफ देखता है ।

अपराजिता को इस प्रपोजल की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। कुछ क्षण एक मौन सा पसार गया दोनों के बीच।रवि को खुद पर ही ग्लानि हो रही थी कि उसने इतनी जल्दी अपनी भावनाएं क्यों व्यक्त कर दी।एक –एक गुजरता सेकंड पहाड़ सा लग रहा था।

“रवि, मैं तुम्हारी भावनाओं की कद्र करती हूं ।हम अभी –अभी तो मिले हैं।मै तुम्हे अभी ठीक से जान भी नहीं पाई।मैंने अपना जीवन पहले ही अपने नर्सिंग प्रोफेशन को दे दिया है ।

मेरी मां को कैंसर था और मैं बचपन से उनके साथ हॉस्पिटल जाती थी। वहां पर नर्स जैसे मेरी मां की सेवा करती थी वह मुझे बहुत प्रेरणादायक लगा। तभी मैंने यह डिसाइड कर लिया था कि मैं अपना जीवन बीमारों की सेवा में लगाऊंगी।

थिएटर मेरा शौक है, पर नर्सिंग ही मेरा जीवन है। मेरे हिसाब से तुम्हें मेरा ख्याल छोड़कर जीवन का एक उद्देश्य बनाना चाहिए।”अपराजिता ने बहुत ही शांत स्वर में कहा

“तुम्हारे हिसाब से यह ठीक है, पर मैं तुम्हारे पथ की बाधा नहीं,तुम्हारा साथी बनना चाहता हूं। तुम्हे मजबूर नहीं करना चाहता, मजबूती से तुम्हारे साथ रहना चाहता हूं। तुम्हे जितना चाहिए उतना वक्त लो। अच्छा चलता हूं।” रुंधे गले से यह कहकर रवि बाहर निकल आया।

मौसम बदले,साल बदले रवि का कभी न खत्म होने वाला इंतजार वही उसी कैफे में ठहरा हुआ था। रवि ने खुद को थिएटर में डुबा लिया था।हर किरदार को निभाते हुए उसे अपराजिता का इंतजार रहता।कभी अपने सहकलाकारो में,कभी दर्शकों में,जमीन–आसमान,भीड़ –एकांत उसे बस एक झलक की आस थी।किसी प्यासे चकोर सा चांद की याद में तड़प रहा था। फैंस की भीड़ में,पार्टीज, प्रमोशन में भी उसके मन में एक खालीपन था।

आज रवि अपने ६०वें जन्मदिन पर एक नाटक में एकाकी बुजुर्ग का किरदार निभा रहा था।दर्शक उसके साथ हँस,रो रहे थे।

तभी अचानक रवि स्टेज पर ही धड़ाम से गिर जाता है।कुछ सेकंड्स में नहीं उठने पर दर्शक उसकी एक्टिंग को प्रोत्साहित करने जोर से तालियां बजाते हैं।फिर भी कोई हरकत न होने पर स्टेज में भगदड़ मच जाती है।कोई रवि को उठाने की कोशिश करता है,कोई डॉक्टर और एम्बुलेंस बुलाता है।

रवि की आंख हॉस्पिटल में खुलती है।इतनी कमजोरी महसूस होती है मानो शरीर में जान ही नहीं।

“कैसे हो रवि?”

उफ्फ वही मधुर आवाज।इतने सालों में उसके कान तरस गए इस आवाज के लिए।

धीरे से आंखे खोलते हुए उसे वही सफेद धुंधली झलक दिखाई पड़ती है जो सालों से उसके हृदय कर छपी है।

“अपराजिता क्या ये तुम हो?”कमजोर सी आवाज में रवि ने कहा
“मै कोई सपना तो नहीं देख रहा!”
“मै कहां हूं ?मुझे क्या हुआ?”
“रवि अभी तुम आराम करो ।कल बात करते हैं ”अपराजिता ने उसके हाथों पर हौले से अपना हाथ रखते हुए कहा
“नहीं अपराजिता!मत जाओ”कहते हुए रवि फिर नींद के आगोश में चल गया।

अगली सुबह से ही रवि अपराजिता का इंतजार कर रहा था।उसे देखते ही रवि में जान आ गई।
“अब कैसी तबियत है रवि?कितने कमजोर हो गए हो।अपना बिल्कुल ध्यान नहीं रखते न!”
“किसके लिए रखता!”रवि की आवाज में नाराजगी का पुट था।
“तुम कहां चली गई थी,न फोन, न पता।कहां–कहां नहीं ढूंढा तुम्हे मैने”
“तुम्हारी निश्छल स्वीकारोक्ति ने मेरे मन में भी तुम्हारे लिए आकर्षण जगा दिया था।तुम्हारा कैफे से उठ के जाना ऐसा लग रहा था जैसे मेरा कोई हिस्सा मुझसे जुदा हो रहा हो”
“मै किसी भी रिश्ते में बंध कर अपने उद्देश्य की प्राप्ति नहीं कर सकती थी।यह दोनों के साथ अन्याय होता।”अपराजिता ने नीची नजरें किए एक उसांस छोड़ा
“तुम मुझ पर भरोसा तो करती!”रवि ने उदास होते हुए कहा
“पर ऐसा नहीं है कि मैं तुम्हें एक क्षण के लिए भुला पाई।तुम्हारे सारे नाटक,पुरस्कार समारोहों की एक–एक पेपर कटिंग मैने संजो कर रखी है।”अपराजिता ने कहा
रवि ने उसकी तरफ प्रशंसा की दृष्टि से देखा।
“रवि,क्या मै अब तुम्हारी सेवा का अधिकार मांग सकती हूं?”अपराजिता के शब्दों में याचना थी।
रवि ने धीमे से उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए हां में सर हिलाया। दोनों की आंखों से निर्मल अश्रुधारा के साथ सालों का इंतजार भी बह निकला। Romantic Story in Hindi 

लेखक : अश्विनी देशपांडे

Romantic Story In Hindi : दिल्ली त्रिवेंद्रम दिल्ली – एक जैसी थी समीर और राधिका की कहानी

Romantic Story In Hindi : समीर टैक्सी से उतर कर तेज कदमों से इंदिरा गांधी हवाईअड्डे की ओर बढ़ा, क्योंकि रास्ते में काफी देर हो चुकी थी.

काउंटर पर बैठी युवती ने उस से टिकट ले कर कहा, ‘‘आप की सीट है 12वी, आपातकालीन द्वार के पास.’’

बोर्डिंग कार्ड ले कर वह सुरक्षा कक्ष में चला गया. फ्लाइट जाने वाली थी, इसलिए

वह तुरंत विमान तक ले जाने वाली बस में बैठ गया.

‘‘नमस्ते,’’ विमान परिचारिका ने उस का हाथ जोड़ कर स्वागत किया.

समीर उसे देखता रह गया.

‘‘सर, आप का बोर्डिंग कार्ड?’’ परिचारिका मुसकरा कर बोली.

समीर ने उसे अपना बोर्डिंग कार्ड पकड़ा दिया.

वह उसे उस की सीट 12बी पर ले गई. समीर ने अपने बैग से काले रंग की डायरी निकाली और बैग ऊपर रख कर सीट पर बैठ गया.

उस की बगल वाली सीट, जो बीच के रास्ते के पास थी, खाली थी. समीर अपनी डायरी देखने लगा. पहले ही पन्ने पर विधि की तसवीर चिपकी थी. उस के जेहन में विधि का स्वर गूंज गया…

‘समीर मैं तुम से प्यार नहीं करती. यदि तुम ने कभी सोचा तो यह सिर्फ तुम्हारी गलती है. मैं तुम से शादी नहीं कर सकती…’

‘‘नमस्कार,’’ आवाज सुन समीर ने चौंक कर आंखें खोलीं. विमान परिचारिका उद्घोषणा कर रही थी, ‘‘आप का विमान संख्या आईसी 167 में, जो मुंबई होता हुआ त्रिवेंद्रम जा रहा है, स्वागत है. आप सभी अपनीअपनी कुरसी की पेटी बांध लीजिए…’’

समीर ने एक गहरी सांस ली. अपनी कुरसी की पेटी बांधी और आंखें मूंद लीं. आंखों के सामने विधि का मुसकराता हुआ चेहरा घूमने लगा…

‘‘माफ कीजिए…’’

समीर ने चौंक कर आंखें खोलीं. सामने वही परिचारिका खड़ी थी.

‘‘आप मेरी सीट बैल्ट के ऊपर बैठे हैं.’’

समीर थोड़ा झेंप गया. उस ने चुपचाप अपने नीचे से सीट बैल्ट निकाल कर उसे पकड़ा दी. वह मुसकरा कर बैठ गई. उस के हाथ में भी समीर की डायरी के समान एक काले रंग की डायरी थी. वह अपनी डायरी पढ़ने लगी.

समीर ने फिर आंखें मूंद लीं और सोचने लगा, ‘विधि, क्या यह सब झूठ था? हमारा रोज मिलना, तुम्हारा पत्र लिखना क्या यह सब एक खेल था? क्या तुम्हें कभी मेरी याद नहीं आएगी?’

उसी समय सीट बैल्ट खोलने की उद्घोषणा हुई तो परिचारिका खड़ी हुई.

‘‘सुनिए,’’ वह समीर को देख कर धीरे से बोली.

समीर ने उस की ओर देखा.

‘‘आप की आंखों में आंसू हैं. इन्हें पोंछ लीजिए,’’ उस के स्वर में गंभीरता थी.

आंसुओं की धार ने उस के दोनों गालों पर रास्ते के निशान बना दिए थे. उस ने झट

से रूमाल से अपनी आंखों और चेहरे को पोंछ लिया.

‘‘सुबह नाश्ते में मिर्च ज्यादा थी.’’

वह बिना कुछ बोले चली गई.

थोड़ी देर बाद वह नाश्ते की ट्राली घसीटते हुए लाई और यात्रियों को नाश्ता देने लगी.

‘‘सर, आप क्या लेंगे, वैज या नौनवैज?’’ उस ने समीर से पूछा.

‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘चाय या कौफी?’’

‘‘नहीं, कुछ नहीं.’’

वह बिना कुछ बोले आगे बढ़ गई. उस के भावों से लगा कि उसे थोड़ी सी खीज हुई है.

थोड़ी देर बाद वह फिर आई और बिना कुछ बोले एक प्लेट में चाय और कुछ बिस्कुट रख कर चली गई.

समीर को उस का आग्रह भरा मौन आदेश लगा, क्योंकि इस में अपनत्व था. उस ने चुपचाप चाय पी और बिस्कुट खा लिए. कुछ देर बाद वह दोबारा आई और प्लेट ले कर जाने लगी. प्लेट लेते समय दोनों की नजरें मिलीं.

समीर ने देखा कि उस की साड़ी पर राधिका नाम का टैग लगा था. वह थोड़ा मुसकरा दी. समीर को एक क्षण के लिए लगा कि उस की मुसकराहट में उदासी की छाया है.

उसे फिर विधि की याद सताने लगी. उस ने डायरी खोल ली और लिखने लगा, ‘क्या लड़की का प्यार सिर्फ शादी के बाद दौलत और सुविधाओं के लिए होता है? विधि मुझे छोड़ कर अरुण से शादी इसलिए कर रही है, क्योंकि उस के पास बंगला और कार है, जबकि मैं अभी किराए के मकान में हूं. आज ही उस की शादी है. अच्छा है कि मैं दिल्ली में नहीं रहूंगा. उसे अपने सामने विदा होते देखता तो न जाने क्या कर बैठता.’

समीर की आंखों में एक बार फिर आंसू आ गए. उस ने आंसू पोंछ लिए, डायरी बंद

कर के बगल वाली सीट पर रख दी और आंखें बंद कर लीं.

‘‘कृपया ध्यान दीजिए. अब हमारा विमान मुंबई के छत्रपति शिवाजी हवाईअड्डे पर उतरेगा. आप अपनीअपनी कुरसी की पेटी बांध लें. त्रिवेंद्रम जाने वाले यात्रियों से निवेदन है कि वे विमान में ही रहें,’’ उद्घोषणा हो रही थी.

राधिका उस की बगल में आ कर बैठ गई. समीर की डायरी उस ने सामने सीट की जेब में रख दी. समीर ने आंखें खोल कर राधिका को देखा, तो वह मुसकरा कर धीरे से बोली, ‘‘जिंदगी के सारे गमों को पी कर मुसकराना होता है.’’

समीर की इच्छा हुई कि बोले उपदेश देना सरल है, लेकिन जब खुद पर गुजरती है तब सारे उपदेश धरे रह जाते हैं, मगर वह चुप रहा.

‘‘मैं ने शायद कुछ गलत कह दिया. आई एम सौरी, सर,’’ वह थोड़ी देर बाद फिर बोली.

‘‘ऐसी बात नहीं है. आप ने बोला तो सही है. मुझे इस का बिलकुल बुरा नहीं लगा,’’ समीर के मुंह से निकला, ‘‘आप त्रिवेंद्रम तक मेरे साथ चलेंगी न?’’ समीर ने पूछा और फिर सकुचा गया.

‘‘आप खाना खाएंगे, तब जरूर चलूंगी,’’ वह मुसकरा कर बोली.

उसी समय विमान मुंबई उतर गया. राधिका अपनी डायरी ले कर चली गई.

समीर ने अपनी डायरी बैग में रख दी और औफिस की फाइल निकाल कर मीटिंग की तैयारी करने लगा.

बीच में उसे पानी की जरूरत महसूस हुई. वह पीछे की ओर गया परंतु राधिका की जगह कोई और परिचारिका थी. वह बिना पानी मांगे ही अपनी सीट पर आ गया.

थोड़ी देर बाद राधिका उस की बगल से गुजरी, तो वह बोला, ‘‘राधिका, एक गिलास पानी चाहिए.’’

‘‘जरूर,’’ राधिका ने मुसकरा कर कहा. लगता था कि उसे अपने नाम के संबोधन से आश्चर्य भी हुआ और खुशी भी.

पीछे से खिलखिलाने की आवाज आई. शायद दूसरी परिचारिका ने भांप लिया था कि समीर ने पानी के लिए राधिका का इंतजार किया. वह राधिका को छेड़ रही थी.

राधिका ने उसे पानी की बोतल दे दी. बोतल लेते समय दोनों के हाथ स्पर्श हुए तो दोनों के शरीर में सिहरन दौड़ गई. उस ने राधिका को देखा. वह कुछ उदास हो गई थी.

उसी समय मुंबई में यात्री चढ़ने लगे. विमान जब मुंबई से चला तो राधिका उस की बगल वाली सीट पर ही थी, पर न जाने किन खयालों में खोई थी.

‘‘यह बहुत थकाने वाली फ्लाइट है,’’ समीर ने बात शुरू करने के इरादे से कहा.

‘‘हां,’’ कह कर वह फिर अपने खयालों में खो गई.

समीर ने अपनी आंखें बंद कर लीं.

‘‘सर, आप वैज लेंगे या नौनवैज?’’

समीर चौंक कर उठा. राधिका उस के कंधे को हलके से थपथपा कर पूछ रही

थी. वह बीच में कब सो गया, उसे पता ही नहीं चला.

‘‘वैज,’’ समीर के मुंह से निकला.

राधिका ने चुपचाप उसे वैज खाने की ट्रे दे दी. उस समय दोनों की नजरें टकराईं. नजरों में ही बातें हो गईं कि समीर उस के कहने पर ही खाना खा रहा है.

‘बनावटी मुसकानों और खोखले वाक्यों के पीछे विमान परिचारिकाओं के पास दिल भी होता है, जो दूसरों का दर्द महसूस कर सकता है,’ समीर ने सोचा.

‘इसे कम से कम मेरा कहना याद तो है. भूखा रहने से कोई दुख कम नहीं होता, इतना तो इसे पता होना चाहिए,’ राधिका सोच रही थी.

खाना खाने के बाद समीर की आंख फिर लग गई.

‘‘अब हम त्रिवेंद्रम हवाईअड्डे पर आ पहुंचे हैं. आशा है कि आप की यात्रा सुखद रही. आप हमारे साथ फिर यात्रा करें तो हमें खुशी होगी,’’ उद्घोषणा हो रही थी.

विमान से उतरते समय समीर की नजरें राधिका से मिलीं तो वह मुसकरा दी. ऐसा लगा कि शायद कुछ कहना चाहती है.

पूरा दिन समीर मीटिंग में व्यस्त रहा. शाम को समय काटने के लिए वह कोवलम बीच चला गया और वहां समुद्र के किनारे टहलने लगा. बरबस ही उसे विधि की याद आने लगी. उस ने और विधि ने शादी के बाद ऐसी ही किसी जगह जाने का प्रोग्राम बनाया था, वह सोचने लगा.

उसे लगा कि कोई पहचाना हुआ चेहरा उस के सामने से गुजरा. अरे यह तो वही है, सुबह वाली विमान परिचारिका. क्या नाम था इस का? हां, राधिका, उसे याद आया.

राधिका आगे जा कर रेत पर बैठ गई. समुद्र की लहरें उस के पैरों को छू रही थीं. जब भी वह त्रिवेंद्रम आती थी, कोवलम बीच जरूर आती थी. समुद्र में सूर्य का विलीन होते देखना उसे बहुत अच्छा लगता था.

राधिका को यह दृश्य आदित्य से बिछड़ने के बाद अपनी जिंदगी के बहुत करीब लगता था. वह सोचने लगी, ‘कब उस ने आदित्य को आखिरी बार देखा था? शायद

2 साल से ज्यादा हो गए. वह अपनी नईनवेली दुलहन के साथ गोवा घूमने जा रहा था.

विमान में उसे देख कर व्यंग्यपूर्वक मुसकरा दिया था.’ ‘‘आप के सुंदर चेहरे पर आंसू शोभा नहीं देते,’’ सुन कर राधिका चौंक पड़ी. सामने एक पहचाना सा चेहरा था. यह तो सुबह की फ्लाइट में था. आंसुओं की धार उस के चेहरे को भिगो रही थी. उस ने आंसू पोंछ लिए.

‘‘लगता है, आंख में रेत का कण चला गया था,’’ वह बोली.

‘‘आप क्या पहली बार त्रिवेंद्रम आए हैं?’’ राधिका ने बात बदलने के लिहाज से पूछा.

‘‘राधिका, मेरा नाम समीर है. मैं साल में 2-3 बार यहां आता हूं.’’

उसी समय पास से मूंगफली वाला गुजरा. समीर ने एक पैकेट मूंगफली खरीद कर राधिका को आधी मूंगफली दीं. राधिका ने बताया कि इतनी लंबी फ्लाइट के बाद उसे एक दिन का विश्राम मिलता है. कल फिर वह उसी फ्लाइट से दिल्ली जाएगी.

मूंगफली खातेखाते वे इधरउधर की बातें करते रहे. अंधेरा होने पर दोनों ने मुसकरा कर एकदूसरे से विदा ली. राधिका को यह बहुत अच्छा लगा कि समीर ने उस के आंसुओं का कारण जानने की कोशिश नहीं की.

समीर ने अपने गैस्टहाउस में लौट कर हमेशा की तरह अपनी डायरी निकाली. उस ने सोचा कि वह आज राधिका से मुलाकात का पूरा विवरण लिखेगा. डायरी खोलते ही उस के अंदर से फोटो गिर पड़ा. फोटो में राधिका किसी लड़के के साथ थी.

‘तो मेरी डायरी राधिका की डायरी से बदल गई है,’ उस ने सोचा. पहले तो उसे

लगा कि उसे डायरी नहीं पढ़नी चाहिए, परंतु उस के मन में राधिका की उदासी का राज जानने की इच्छा थी, इसलिए उस ने पढ़ना शुरू किया.

दिनांक ………..मैं आज बहुत खुश हूं. मुझे इंडियन एअरलाइंस में विमान परिचारिका के लिए चुन लिया गया है. मम्मीपापा ने कहा कि उन्हें मुझ पर गर्व है.

दिनांक ………..

आज मुझे आदित्य ने लोदी गार्डन में मिलने के लिए बुलाया. मेरा हाथ पकड़ कर बोला कि वह मुझ से प्यार करता है और शादी करना चाहता है. पता नहीं कितने वर्षों से मैं आदित्य के मुंह से यह वाक्य सुनने का इंतजार कर रही थी. लगता है कि आज रात नींद नहीं आएगी.

दिनांक ………..

मेरी जिंदगी बंध गई है आदित्य और इंडियन एयरलाइंस के बीच में, परंतु मन हमेशा आदित्य में ही लगा रहता है.

दिनांक ………..

आज मैं ने अपनी सहेली शीला को आदित्य से अपने प्यार और शादी के बारे में बताया तो वह चुप रही. लगता है कि उसे मुझ से जलन हुई है.

दिनांक ………..

कई दिनों से आदित्य के स्वभाव में परिवर्तन देख रही हूं. कई बार मिलने का वादा कर के भी वह नहीं आता. लेकिन वादा तोड़ने का उसे कोई पछतावा नहीं होता. लगता है कि उसे कोई परेशानी है, जिसे मैं समझ नहीं पा रही.

दिनांक ………..

शीला ने मुझे कल शाम 6.00 बजे नेहरू पार्क में मिलने के लिए बुलाया है. मैं ने मना करने की कोशिश की, परंतु उस ने दोस्ती का वास्ता दिया है.

दिनांक ………..

आज मेरे सारे सपने चकनाचूर हो गए. शीला मुझे नेहरू पार्क में एक कोने में ले गई और मुझे मेरे प्यार की असलियत बता दी. आदित्य किसी युवती को अपने आलिंगन में ले कर प्यार भरी बातें कर रहा था. हमें देख कर बेशर्मों की तरह मुसकरा दिया.

शीला ने बाद में बताया कि आदित्य ने शीला के साथ भी खेल खेला था. मैं शीला की एहसानमंद हूं कि उस ने मुझे बरबाद होने से बचा लिया.

दिनांक ………..

जिंदगी में एक सूनापन सा भर गया है. दिन तो किसी तरह कट जाता है, लेकिन रात नहीं कटती. लगता है कि नींद आंखों से रूठ चुकी है.

दिनांक ………..

आज मेरी दिल्लीगोवा फ्लाइट पर ड्यूटी थी. अचानक देखा कि आदित्य अपनी नईनवेली दुलहन के साथ बैठा है. मुझे देख कर व्यंग्य से मुसकरा दिया. मन में तो तूफान उठ रहे थे परंतु मैं ने अपने चेहरे पर भाव नहीं आने दिए.

समीर ने पाया कि वह राधिका के दर्द को महसूस कर सकता है, क्योंकि वह भी इसी तरह के दर्द से गुजर रहा है.

राधिका ने अपने होटल में समीर की डायरी बंद कर दी और बालकनी में आ कर बैठ गई. वह सोचने लगी, ‘अब तक मैं पुरुषों को ही बेवफा और धोखेबाज समझती थी. क्या विधि के लिए सुखसुविधाओं की कीमत समीर के सच्चे प्यार से ज्यादा थी?’

दूसरे दिन सुबह समीर औफिस पहुंचा तो उस के निदेशक ने कहा कि उस के साथ

2 और साथी त्रिवेंद्रम से दिल्ली जाएंगे. उसे उन्हीं लोगों के साथ बैठना पड़ा. राधिका से नजरें चार हुईं तो दोनों समझ गए कि वे एकदूसरे की डायरी पढ़ चुके हैं.

वह 1-2 बार बाथरूम के बहाने पीछे गया परंतु राधिका के साथ दूसरी परिचारिकाएं थीं, इसलिए कुछ नहीं कह पाया.

मुंबई में हवाईजहाज रुका तब उस ने राधिका की डायरी निकाली और पीछे की ओर गया. राधिका ने उसे देख लिया. चुपचाप उन्होंने एकदूसरे की डायरी वापस कर दी.

राधिका ने अपनी डायरी खोली. उसमें समीर का संदेश था, ‘मैं आप का दर्द अनुभव कर सकता हूं. मुझे विश्वास है कि आप को जिंदगी में सच्चा प्यार अवश्य मिलेगा. यदि मैं आप के लिए कुछ कर सका तो मुझे खुशी होगी.’

– समीर

समीर अपनी सीट पर आ गया और डायरी पलटने लगा. अंदर राधिका ने लिखा था, ‘जिंदगी में सुख एवं दुख दोनों होते हैं. आशा करती हूं कि आप जिंदगी भर विधि का रोना नहीं रोएंगे.’

– राधिका

जब समीर दिल्ली आने पर विमान से उतरने लगा तो राधिका जैसे दरवाजे पर उस का इंतजार कर रही थी. दोनों की आंखों में चमक थी. इस बात को 2 साल गुजर गए. राधिका और समीर पहले अच्छे दोस्त और फिर पतिपत्नी बन गए. उन के स्मृतिपटल पर दिल्ली त्रिवेंद्रम दिल्ली फ्लाइट हमेशा रहेगी, क्योंकि यहीं से उन्हें अपनी जिंदगी की दिशा मिली. Romantic Story In Hindi 

Hindi Love Stories : दुनिया – जब पड़ोसिन ने असमा की दुखती रग पर रखा हाथ

Hindi Love Stories : यह फ्लैट सिस्टम भी खूब होता है. कंपाउंड में सब्जी वाला आवाजें लगाता तो मैं पैसे डाल कर तीसरी मंजिल से टोकरी नीचे उतार देती, लेकिन मेरे लाख चीखनेचिल्लाने पर भी सब्जी वाला 2-4 टेढ़ीमेढ़ी दाग लगी सब्जियां व टमाटर चढ़ा ही देता. एक दिन मामूली सी गलती पर पोस्टमैन 1,800 रुपए का मनीऔर्डर ले कर मेरे सिर पर सवार हो गया और आज हौकर हमारा अखबार फ्लैट नंबर 111 में डाल गया.

मिसेज अनवर वही अखबार लौटाने आई थीं. मैं ने शुक्रिया कह कर उन से अखबार लिया और फौर्मैलिटी के तौर पर उन्हें अंदर आने के लिए कहा तो वे झट से अंदर आ गईं और फैल कर बैठ गईं. कुछ देर इधरउधर की बातें कर के मैं उन के लिए कौफी लेने किचन की तरफ बढ़ी तो वे भी मेरे पीछे ही चली आईं और लाउंज में मौजूद चेयर संभाल ली. मैं ने वहीं उन्हें कौफी का कप थमाया और लंच की तैयारी में जुट गई.

वे बोलीं, ‘‘कुछ देर पहले मैं ने तुम्हारे फ्लैट से एक साहब को निकलते देखा था. उन्हें लाख आवाजें दी मगर उन्होंने सुनी नहीं, इसलिए मुझे खुद ही आना पड़ा.’’

‘‘चलिए अच्छी बात है, इसी बहाने आप से मुलाकात तो हो गई,’’ कह कर मैं मुसकरा दी. फिर गोश्त कुकर में चढ़ाया, फ्रिज से

सब्जी निकाली और उन के सामने बैठ कर छीलने लगी.

‘‘सच कहती हूं, जब से तुम आई हो तब से ही तुम से मिलने को दिल करता था, मगर इस जोड़ों के दर्द ने कहीं आनेजाने के काबिल कहां छोड़ा है.’’

मैं खामोशी से लौकी के बीज निकालती रही. तब उन्होंने पूछा, ‘‘तुम्हारे शौहर तो मुल्क से बाहर हैं न?’’

‘‘जी…?’’ मैं ने चौंक कर उन्हें देखा, ‘‘जिन साहब को आप ने सुबह देखा, वही तो…’’

‘‘हैं… वे तुम्हारे शौहर हैं?’’

मिसेज अनवर जैसे करंट खा कर उछलीं और मैं ने ऐसे सिर झुका लिया जैसे आफताब सय्यद मेरे शौहर नहीं, मेरा जुर्म हों. वैसे इस किस्म के जुमले मेरे लिए नए नहीं थे मगर हर बार जैसे मुझे जमीन में धंसा देते थे. मैं ने लाख बार उन्हें टोका है कि कम से कम बाल ही डाई कर लिया करें, मगर बनावट उन्हें पसंद ही नहीं है.

मिसेज अनवर ने यों तकलीफ भरी सांस ली जैसे मेरी सगी हों. फिर बोलीं, ‘‘कितनी प्यारी दिखती हो तुम, क्या तुम्हारे घर वालों को तुम्हें जहन्नुम में धकेलते वक्त जरा भी खयाल नहीं आया?’’

फिर वे लगातार व्यंग्य भरे वाक्य मुझ पर बरसाती रहीं और कौफी पीती रहीं. मेरी अम्मी को सारी जिंदगी ऐसे ही लोगों की जलीकटी बातें सताती रहीं. अब्बा बैंकर थे और बहुत जल्दी दुनिया छोड़ गए थे. अम्मी पढ़ीलिखी थीं, इसलिए अब्बा की बैंकरी उन के हिस्से में आ गई. अम्मी की आधी जिंदगी 2-2 पैसे जमा करते गुजरी. उन्होंने अपने लहू से अपने पौधों की परवरिश की, मगर जब फल खाने का वक्त आया तो…

बड़ी आपा शक्ल की प्यारी मगर, मिजाज की ऊंची निकलीं. उन के लिए रिश्ते तो आते रहे मगर उन की उड़ान बहुत ऊंची थी. मास्टर डिगरी लेने के बाद उन्हें लैक्चररशिप मिल गई तो उन की गरदन में कुछ ज्यादा ही अकड़ आ गई और अम्मी के खाते में बेटी की कमाई खाने का इलजाम आ पड़ा.

‘‘बेटी की शादी कब कर रही हैं आप? अब कर ही डालिए. इतनी देर भी सही नहीं.’’ लोग ऐसे कहते जैसे अम्मी के कान और आंखें तो बंद हैं. वे मशवरे के इंतजार में बैठी हैं. अम्मी बेटी की बात मुंह पर कैसे लातीं. किसकिस को बड़ी आपा के मिजाज के बारे में बतातीं.

अम्मी पाईपाई पर जान देती थीं और सारा जमाजोड़ बेटियों के लिए बैंक में रखवा देती थीं. आपा हर रिश्ते पर नाक चढ़ा कर कह देतीं, ‘‘असमा या हुमा की कर दीजिए न, आखिर उन्हें भी तो आप को ब्याहना ही है.’’

और इस से पहले कि असमा या हुमा के लिए कुछ होता बड़े भैया उछलने लगे. मेरी शादी होगी तो जारा सरदरी से ही. अम्मी भौचक्की रह गईं. अभी तो पेड़ का पहला फल भी न खाया था. अभी दिन ही कितने हुए थे बड़े भाई को नौकरी करते हुए. जारा सरदारी भैया की कुलीग थी. अम्मी ने ताड़ लिया कि बेटा बगावत के लिए आमादा है. ऐसे में हथियार डाल देने के अलावा कोई चारा न था. फिर वही हुआ जो भाई ने चाहा था.

जारा सरदरी को अपनी कमाई पर बड़ा घमंड और शौहर पर पूरा कंट्रोल था. ससुराल वालों से उस का कोई मतलब न था. बहुत जल्दी उस ने अपने लिए अलग घर बनवा लिया.

अम्मी को बड़ी आपा की तरफ से बड़ी मायूसी हो रही थी लेकिन हुमा के लिए एक ऐसा रिश्ता आ गया, जो अम्मी को भला लगा. आखिरकार बड़ी आपा के नाम की सारी जमापूंजी खर्च कर उसे ब्याह दिया. हुमा का भरापूरा ससुराल था. ससुराल के लोगों के मिजाज अनूठे थे. इस पर शौहर निखट्टू.

उस की सारी उम्मीदें ससुराल वालों से थीं कि वे उसे घरजमाई रख लें, कारोबार करवा दें या घर दिलवा दें. यह कलई बाद में खुली. झूठ पर झूठ बोल कर अम्मी को दोनों हाथों से लूटा गया. मगर ससुराल वालों की हवस पूरी न हुई.

हुमा बहुत जल्दी घर लौट आई. उस का सारा दहेज ननदों के काम आया. फिर बहुत मुश्किल से तलाक मिलने पर उसे छुटकारा मिला. लेकिन इस पर खानदान के कई लोगों ने अम्मी को यों लताड़ा जैसे अम्मी को पहले से सब कुछ पता था.

हुमा का उजड़ना उन्हें मरीज बना गया. वे आहिस्ताआहिस्ता घुल रही थीं. एक रोज वे बिस्तर से जा लगीं, मगर सांसें जैसे हम दोनों बहनों में अटकी थीं.

कभी-कभी बड़े भैया बीवीबच्चे समेत घर आते तो अम्मी की परेशानियां जबान पर आ जातीं. लेकिन वे हर बात उड़ा जाते. ‘‘अम्मी, हो जाएगा सब कुछ. आप फिक्र न किया करें.’’

परेशानियों के इसी दौर में छोटे भैया से मायूस हो कर अम्मी ने उन्हें ब्याहा. छोटे भैया अपने पैरों पर खड़े थे. लेकिन घर की जिम्मेदारियों से दूर भागते थे. घर की गाड़ी अम्मी के बचाए पैसों पर ही चल रही थी. लेकिन घर चलाने के लिए एक जिम्मेदार औरत का होना जरूरी होता है, यह सोच कर ही अम्मी ने छोटे भैया को ब्याह दिया था.

लेकिन अम्मी एक बार फिर मात खा गईं. छोटी भाभी बहुत होशियार और समझदार साबित हुईं, मगर मायके के लिए. उन के दिलोदिमाग पर मायके का कब्जा था. कोई न कोई बहाना बना कर मायके की तरफ दौड़ लगाना और कई दिन डेरा डाल कर वहां पड़ी रहना उन की फितरत थी. ससुराल में वे कभीकभी ही नजर आतीं. अचानक छोटे भैया को दुबई में नौकरी का चांस मिल गया और भाभी का पड़ाव हमेशा के लिए मायके में बन गया.

इस दौरान एक खुशी की बात यह हुई कि बड़ी आपा के लिए एक भला रिश्ता मिल गया. संजीदा, सोबर और जिम्मेदार एहसान अलवी. पढ़ेलिखे होने के साथसाथ अरसे से अमेरिका में रहते थे. आपा जितनी उस उम्र की थीं, उस से कम की ही नजर आती थीं और एहसान अलवी अपनी उम्र से 2-4 साल ज्यादा के दिखते थे.

अम्मी को फिर इनकार का अंदेशा था. उन्होंने आपा को समझाया, ‘‘ऐसा रिश्ता फिर मिलने वाला नहीं. समझो कि गोल्डन चांस है. पानी पल्लू के नीचे से गुजर जाए तो लौट कर नहीं आता.’’

पता नहीं क्या हुआ कि यह बात आपा की अक्ल में समा गई. फिर चट मंगनी, पट ब्याह. आपा अमेरिका चली गईं.

शादी के नाम पर हुमा रोने बैठ जातीऔर एक ही रट लगाती, ‘‘मुझे नहीं करनी शादीवादी.’’

मैं आईने के समाने खड़ी होती तो आठआठ आंसू रोती. हमारे खानदान के हर घर में रिश्ता मौजूद था, मगर लड़के 4 अक्षर पढ़ कर किसी काबिल हो जाते हैं, तो खानदान की फीकी सीधी लड़कियों पर हाथ नहीं रखते हैं. ऐसे में सारी रिश्तेदारी धरी की धरी रह जाती है. फिर अब उन्हें बदला भी लेना था. अम्मी ने भी तो खानदान की किसी लड़की पर हाथ नहीं रखा था. उन के दोनों बेटों की बीवियां तो पराए खानदान की थीं. इस धक्कमपेल में मेरी उम्र 30 पार कर गई.

फिर अचानक बड़ी आपा की ससुराल के किसी फंक्शन में आफताब सय्यद के रिश्तेदारों ने मुझे पसंद किया. आफताब की सारी फैमिली कनाडा में रहती थी और उन के सभी भाईबहन शादीशुदा थे. आफताब की पहली शादी नाकाम हो चुकी थी. बीवी ने नया घर बसा लिया था. उन के 2 बच्चे थे, जो आफताब के पास ही थे. अम्मी को मेरी नेक सीरत पर भरोसा था. और मुझे भी कहीं न कहीं तो समझौता करना ही था. पानी पल्लू के नीचे से गुजर जाए तो लौट कर नहीं आता, यह बात मैं ने गिरह में बांध ली थी.

आफताब बहुत खयाल रखने वाले शौहर साबित हुए. हमारी उम्र में फर्क बहुत ज्यादा न था. मगर दुनिया तो यही समझती थी कि वे मुझ से बहुत बड़े हैं और बच्चों समेत सारी गृहस्थी मेरी मुट्ठी में है. इस एहसास की झील में कोई न कोई कंकड़ डाल कर हलचल मचा ही देता था. तब मुझे लगता था कि इंसान अपनी जिंदगी से समझौता कर भी ले तो दुनिया उसे कहां छोड़ती है? Hindi Love Stories 

लेखिका : गुलनाज

Social Story : राशनकार्ड की महिमा

Social Story : ‘‘साहब, सिलेंडर खाली हो गया है,’’ रसोईघर से रामकिशन के शब्द किसी फोन की घंटी की तरह मुझे चौंका गए.

हम ने एजेंसी को फोन खड़खड़ाया, ‘‘गैस सिलेंडर बुक करवाना है.’’

‘‘नंबर?’’ किसी मैडम की आवाज थी.

‘‘9242,’’ मैं ने भी ऐसे बोला जैसे फोन में नंबर पहले से ही फीड हो.

‘‘राजगोपालजी?’’

‘‘जी हां, देवीजी.’’

‘‘आप को अपना राशनकार्ड दिखाना होगा,’’ मधुर आवाज में मैडम बोलीं.

‘‘क…क्या?’’ हम हकलाए, ‘‘राशनकार्ड?’’

‘‘जी हां.’’

‘‘किस खुशी में?’’

‘‘बस, हमारी खुशी है. इसी खुशी में.’’

हम घबरा गए. यह तो नहले पे दहला मार रही है, ‘‘लेकिन वह तो मैं ने कभी बनवाया ही नहीं?’’

अब की बारी उन की थी, ‘‘क्या कहा?’’

‘‘हां. कभी बनवाया ही नहीं तो लाने का सवाल ही नहीं उठता.’’

‘‘कमाल है,’’ मैडमजी बोलीं, ‘‘अच्छा, ऐसा कीजिए, अपनी सिलेंडर बुक ले कर हमारी एजेंसी के दफ्तर में आ जाइए. पता जानते हैं न कि एजेंसी कहां है? बहुचरजी के पास.’’

‘‘जी हां, उस जगह को आबाद कर चुका हूं.’’

हम जब सिलेंडर बुक ले कर वहां पहुंचे तो मैडमजी ने हमेें घूरा और बोलीं, ‘‘आप ही राजगोपालजी हैं.’’

हम ने हां में गरदन हिलाई तो एक मोटा रजिस्टर हमारे सामने कर दिया गया.

‘‘इस में आप अपनी सिलेंडर बुक का नंबर लिखिए फिर यह भी लिखिए कि अगली बार राशनकार्ड दिखाऊंगा और यहां हस्ताक्षर कर दीजिए. इस बार हम आप का सिलेंडर बुक कर देते हैं लेकिन अगली बार राशनकार्ड दिखाना पड़ेगा.’’

‘‘लेकिन क्यों? यह सिलेंडर बुक देखिए. 1988 से मैं आप से सिलेंडर लेता आ रहा हूं तो अब की यह राशनकार्ड की आफत कैसे आ गई?’’

‘‘सर, ऊपर से आदेश आया है कि बिना राशनकार्ड देखे किसी को सिलेंडर न दिया जाए.’’

‘‘लेकिन मेरी समझ से तो राशन- कार्ड केवल गरीबों की मदद के लिए होता है ताकि उन्हें सरकारी रियायत से सस्ते खाद्य पदार्थ जैसे चावल, गेहूं, तेल, चीनी आदि मिल जाएं. मैं इस श्रेणी में नहीं आता. यहां बड़ौदा में कभी राशनकार्ड का उल्लेख नहीं हुआ. पासपोर्ट है, बिजली, टेलीफोन, हाउस टैक्स के बिल हैं, पैनकार्ड व ड्राइविंग लाइसेंस हैं. इन सब से ही हमारा काम चल जाता है.’’

‘‘अरे साहब, कई लोगों ने कईकई जाली कनेक्शन ले रखे हैं इसलिए सरकार को यह कदम उठाना पड़ा. कोई गैरकानूनी ढंग से तिपहिए में गैस लगा रहा है तो कोई मोटर में. कोई कईकई सिलेंडरों की ब्लैक कर रहा है.’’

‘‘अच्छा? तो हम बेचारे सीधेसादे पुरुष लोग पकड़ गए? कमाल है.’’

वे हंस पड़ीं.

‘‘यह तो बताइए कि यह कम्बख्त कार्ड बनता कहां है?’’

‘‘कुबेर भवन में.’’

‘‘ठीक,’’ कह कर हम ने स्कूटर दौड़ाया. बहू कुबेर भवन में ही 8वीं मंजिल पर काम करती है, यह सोच कर मन में तसल्ली मिली.

वैसे हमें अजनबियों से पूछताछ करने में कोई झिझक नहीं होती. अधिक से अधिक ‘न’ या ‘नहीं मालूम’ यही तो कोई कहेगा. ?ांपड़ तो नहीं मारेगा. और इसी बहाने कई बार नए मित्र भी बन जाते हैं.

जानकारी के बाद हम राशन कार्ड आफिस पहुंच गए. क्लर्क से आवेदनपत्र (फार्म) मांगा, मिल गया. फिर पूछा, ‘‘भैया, क्याक्या भरना है और क्याक्या प्रमाणपत्र इस के साथ देने हैं?’’

‘‘बिजली का बिल, पुराना राशन- कार्ड और उस में क्याक्या बदलना है, पता या प्राणियों की संख्या,’’ भैया एक सांस में बोल गया.

हम घबरा गए, ‘‘लेकिन मैं ने तो कभी राशनकार्ड बनवाया ही नहीं.’’

‘‘क्यों, कहां से आए हो?’’

‘‘बरेली, यू.पी. से.’’

‘‘तो वहां का राशनकार्ड लाओ,’’ भैया ने फरमाया.

‘‘अरे, वहां भी कभी बनवाया नहीं और वह तो बहुत पुरानी बात हो गई. बड़ौदा में 22 साल से रह रहा हूं. तो अब मैं बड़ौदा का ही रहने वाला हो गया.’’

उस ने हमें ऐसे घूरा जैसे हम कोई अजायबघर के जीव हों. फिर बोला, ‘‘तो फिर साहब से मिलो,’’ और दाईं तरफ इशारा किया.

हमारी भृकुटि तन गईं, ‘‘वहां तो कोई है ही नहीं?’’

‘‘साहब हर सोमवार को आते हैं और 11 से 2 बजे तक, तभी मिलो. आज गुरुवार है,’’ और हमें दरवाजा नापने का इशारा किया.

सोमवार को सवा 11 बजे पहुंचे तो देखा छोटे से दरवाजे के सामने करीब 60 लोग लाइन लगाए खड़े हैं. हम भी उन के पीछे खड़े हो गए. कुछ देर गिनती करते रहे और पाया कि एक प्राणी हर 4 मिनट में अंदर जाता है यानी हमारा नंबर 4 घंटे बाद आएगा. दिल टूट गया, कुछ तिकड़म लगाना पड़ेगा.

वहां से बाहर आए और मित्र सागरभाई को अपनी दुखभरी कहानी सुनाई. वे फोन पर बोले, ‘‘काटजू साहब, चिंता की कोई बात नहीं, सब पैसे बनाने के धंधे हैं. आप अपने कागज मुझे दे दीजिए. मैं अपने एक एजेंट मित्र से काम करवा दूंगा. 3 साल पहले मैं ने अपना भी राशनकार्ड ऐसे ही बनवाया था.’’

हम बड़े खुश हुए कि चलो, बला टली. मन ही मन कहा कि सागरभाई, दोस्त हो तो आप जैसा. जा कर उन्हें सब कागजों की एकएक प्रतिलिपि दे दी.

एक बात और, ‘एक हथियार काम न करे तो दूसरा तो काम करे,’ यह सोच कर अपने एक और मित्र गोबिंदभाई से भी संपर्क किया. उन्होंने तो अपने एक पुराने मामलतदार मित्र से मुलाकात भी करवा दी.

पटेल साहब बोले, ‘‘आप को कब तक राशनकार्र्ड चाहिए?’’

‘‘यही 8-10 दिन में.’’

वे बेफिक्री से बोले, ‘‘ठीक है, अपने सब कागजात दे दीजिएगा.’’

वापस लौटते समय गोबिंदभाई ने समझाया कि पटेल साहब को कुछ दक्षिणा भी देनी पड़ेगी और दक्षिणा समय पर निर्भर रहेगी, कम समय माने अधिक दक्षिणा. हम समझ गए, सिर हिला दिया.

2 दिन बाद हम ने फोन किया, ‘‘सागरभाई, मामला तय हो गया?’’

फोन पर रोनी आवाज सुनाई दी, ‘‘नहीं साहब, उस ने कहा है कि अब यह काम बहुत मुश्किल हो गया है. वह नहीं बनवा सकता. राशन विभाग के भाईलोग बहुत सख्त हो गए हैं, उस को घास भी नहीं डालते.’’

 

मन ही मन हम ने सागरभाई और उन के एजेंट को गाली देते हुए फोन रख दिया. यह दांव तो खाली गया.

अब हम पहुंचे पटेल साहब के यहां. उन की बहू घंटी सुनने पर बाहर निकली.

‘‘साहब हैं?’’ हम ने पूछा.

‘‘नहीं.’’

‘‘अरे, कहां गए?’’

‘‘भारगाम.’’

‘‘कब आएंगे?’’

‘‘5 दिन बाद.’’

हम ने फिर माथा पकड़ लिया. लगता है यह सोमवार भी गया. दर्देदिल लिए हुए गोबिंदभाई को मामला-ए-राशन कार्ड की रिपोर्ट दी. उन्होंने दिलासा दिया, ‘‘कोई बात नहीं काटजू साहब, 5 दिन बाद पटेल साहब आप का काम जरूर करवा देंगे.’’

हम ने घर की राह ली.

मंगलवार को फिर पटेल साहब के दर्शन हेतु निकल पड़े. अब की किस्मत से साहब घर पर ही थे.

‘‘साहब, मेरे राशनकार्ड का काम?’’

पटेल साहब ने दुखभरी मुद्रा बनाई, ‘‘काटजू साहब, 2-3 महीने लग जाएंगे. डिपार्टमेंट में कुछ अंदरूनी जांच चल रही है. मेरी समझ से आप खुद ही कार्ड के लिए जाएं तो ठीक होगा.’’

हम ने मन ही मन अपनेआप को कोसा और पटेल साहब को भी. बड़ा तीसमार खां बना फिरता था. कहता था, ‘कितने दिनों में कार्ड चाहिए?’ मेरे 2 सोमवारों का खून कर दिया. सोचा भीम और अर्जुन तो फेल हो गए, अब शेर की मांद में खुद ही जाना पड़ेगा और कोई चारा बचा ही नहीं था. चलो, इस को भी आजमा लिया जाए.

खैर, सोमवार को पौने 11 बजे राशनकार्ड के दफ्तर पहुंचे तो देखा लंबी लाइन लगी हुई है, जबकि दरवाजा बंद है, हम भी लाइन में लग गए. बुढ़ापे में समय की कोई तकलीफ नहीं और करना भी क्या है? हां, स्टैमिना अवश्य चाहिए, कहीं खड़ेखड़े दिल धड़कना न बंद कर दे.

गिनती की तो सामने 55 जवान व बूढ़े खड़े थे. अगर हरेक पर 3-3 मिनट लगता है तो ढाई या 3 घंटे लगेंगे. खैर, देखते हैं क्या होता है?

?ोले से यह सोच कर किताब निकाली कि चलो, 2-3 अध्याय ही पढ़ लिए जाएं. वैसे भी हमारी आदत है कि जहां किसी काम के लिए बैठना या खड़े रहना पड़ेगा वहां हम कोई किताब जरूर ले जाते हैं, टाइम पास के लिए. अभी 3 पन्ने पढ़े ही थे कि दफ्तर खुला. आधे घंटे में 5 प्राणी अंदर घुसे. हम गम में डूब गए, अब क्या होगा? सामने वाले पुरुष ज्ञानी व दयालु निकले. पूछा तो उन्होंने सवाल किया, ‘‘आप को क्या करवाना है?’’

‘‘नया राशनकार्ड बनवाना है.’’

‘‘सौगंधपत्र बनवा लिया है?’’

‘‘यह क्या बला है.’’

वे हंसे (हमारे दुख पर), ‘‘अरे, ऐफिडेविट. इस के बिना कुछ नहीं होगा. आप इसे बनवा लीजिए.’’

‘‘बगल वाली इमारत में इस का दफ्तर है. वहां आवेदनपत्र भी मिल जाएगा और स्टैंपपेपर भी.’’

हम उस ओर भागे.

रास्ते में एक और सज्जन से पूछा, ‘‘सौगंधपत्र यहां कहां पर बनता है?’’

वे भी ज्ञानी व मार्गदर्शक निकले. बोले, ‘‘यहीं बनता था, किंतु गांधी- जयंती के बाद से अब नर्मदा भवन में बनता है.’’

वडोदरा शहर की खासीयत है कि सभी सरकारी आफिस, दोचार किलोमीटर के भीतर ही मिल जाते हैं. उन्हें धन्यवाद दे कर हम नर्मदा भवन भागे.

नर्मदा भवन में 3 देवियों ने हमारी बहुत सहायता की. एक सज्जन ने फार्म तो दे दिया किंतु कुबेर भवन जाने की सलाह दी. हम अब तक काफी अनुभव प्राप्त कर चुके थे. कुछ शंका हुई और पास खड़े चौकीदार की तरफ देखा. वह भी अनुभवप्राप्त प्राणी था उस ने अपने पास बुलाया फिर अंदर इशारा किया, ‘‘उस महिला से मिलो.’’

उस युवती ने फार्म भरवाया फिर बिजली बिल, पासपोर्ट की कापी इत्यादि नत्थी की और अंदर दाईं तरफ की मेज पर जाने को कहा.

वहां एक मुहर लगाई गई, रजिस्टर में कुछ लिखा गया और 11 नंबर का सिक्का दिया और कहा, ‘‘उस 11 नंबर के काउंटर पर जाइए, वहां आप का सब काम हो जाएगा.’’

11 नंबर काउंटर की कुमारी मुसकराई तो बड़ी भोली लगी. वह थी तो दुबलीपतली पर बहुत खूबसूरत थी. बोली, ‘‘कहिए?’’

‘‘पहले अपना नाम बताइए.’’

वह खिले चेहरे से बोली, ‘‘निकी.’’

‘‘आगे?’’

‘‘पाटिल.’’

‘‘कुछ खातीपीती नहीं हो क्या? देखो, हाथ की हड्डी भी उभरी हुई दिख रही है और उम्र तो 17 की होगी.’’

मुसकरा कर बोली, ‘‘अंकल, खाती बहुत हूं किंतु वजन नहीं बढ़ता, और 22 वर्ष की हूं.’’

‘‘पढ़ाई कितनी की, बी.कौम या 12वीं?’’

‘‘नहीं, कंप्यूटर साइंस में डिप्लोमा किया है.’’

‘‘और शादी?’’

उस ने सिर हिला दिया.

हम ने सोचा कि इसे अपने बेटे के लिए गांठ लें तो बहुत भाग्यवान सम?ोंगे.

अपने काम के बीच में बोल पड़ी, ‘‘क्या सोच रहे हैं, अंकल?’’

लगता है, हमारे मन के विचारों को उस ने पढ़ लिया था. सो बोला, ‘‘सोच रहा था कि तुम्हारी व मेरे बेटे की जोड़ी कैसी रहेगी? वह भी अविवाहित है. वैसे तुम मेरा काम पूरा करो नहीं तो बातों ही बातों में पूरा दिन बीत जाएगा.’’

उस ने कनखियों से हमें घूरा, आंखों से आश्चर्य जाहिर किया. सोचा होगा कि कैसे अंकल से पाला पड़ा है, काम के साथ रिश्ता भी ले आए. फिर कहा, ‘‘20 रुपए दीजिए, अंकल. यहां हस्ताक्षर कीजिए और सीधे खड़े रहिए. मुझे आप की फोटो खींचनी है, सौगंधपत्र पर जाएगी.’’

फोटो खींचने के बाद निकी ने भरा फार्म हमें थमाते हुए उप मामलतदार की तख्ती की तरफ इशारा किया कि वहां यह दे दीजिए. वे रजिस्टर में इसे दर्ज व हस्ताक्षर कर आप को दे देंगी.

उस को धन्यवाद दे हम आगे बढ़े.

कुछ ही देर में नर्मदा भवन का सारा काम समाप्त हुआ. सौगंधपत्र हमारे हाथ में था.

घड़ी में देखा तो साढ़े 12 बज चुके थे. सोचा, शायद आज ही काम बन जाए और हम कुबेर भवन जा पहुंचे.

देखा, भीड़ तो कम थी. करीब 20 प्राणी. हम भी उन्हीं में लग गए, 21वें. सामने एक जवान था. परिचय किया, ‘‘आप का नाम?’’

‘‘हितेनभाई.’’

हम ने कहा, ‘‘यार, जरा आगे जा कर पता लगा लो कि भीड़ कितनी रफ्तार से चल रही है और नए राशनकार्ड के लिए कुछ और ?ामेला यानी कुछ और कागजात तो नहीं चाहिए. मैं कतार में तुम्हारी जगह सुरक्षित रखता हूं.’’

हितेन मान गया और आगे दरियाफ्त कर के बदहवास हालत में वापस लौटा. बोला, ‘‘नया राशनकार्ड यहां नहीं भुतड़ी कचहरी में बनता है. यहां केवल पुराने कार्डों के नाम या बदले पते ठीक किए जाते हैं.’’

‘‘अच्छा, यह भूत की कचहरी है कहां?’’

‘‘मुझे नहीं मालूम.’’

हमारा यह वार्त्तालाप एक और सज्जन सुन रहे थे. बीच में आ गए, ‘‘मैं जानता हूं और मुझे भी वहीं जाना है. जुबली बाग यहां से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर है.’’

हितेनभाई के पास मोटरसाइकिल थी, हमारे पास स्कूटर तो हम ने उस सज्जन से कहा, ‘‘चलिए, आप को ले चलते हैं. रास्ता बता दीजिएगा.’’

भुतड़ी कचहरी में केवल 4 लोग कतार में थे. हमारा नंबर आने पर अधिकारी बदतमीजी से बोला, ‘‘यह क्या है? आवेदनपत्र कहां है, ऐफिडेविट व मतदाता पहचानपत्र कहां है?’’

‘‘यह रहा आवेदनपत्र और यह ऐफिडेविट है. मतदाता पहचानपत्र खो गया.’’

‘‘उस के बिना कुछ नहीं होगा. वह लाओ. कहां से आए हो?’’

‘‘वैसे तो बरेली, यू.पी. का रहने वाला हूं लेकिन वडोदरा में 22 साल से रह रहा हूं. अभी तक राशनकार्ड की कभी कोई जरूरत नहीं पड़ी. इसलिए बनवाया नहीं था.’’

‘‘तो अब कौन सी जरूरत आन पड़ी है?’’

‘‘गैस सिलेंडर वाला राशनकार्ड दिखाने को कह रहा है.’’

उस ने हमारे सारे कागज वापस करते हुए कहा, ‘‘जाओ, मेरा समय बरबाद न करो. बाहर दाईं तरफ दरवाजे पर एक आदमी बैठा है. वह आप को सब सम?ा देगा कि क्याक्या लाना है.’’

हम निराश हो बाहर निकले. देखा हितेन भी मुंह लटकाए खड़ा था. उस को भी अधिकारी ने ?िड़क दिया था. बाहर के आदमी से पूछा तो वह ज्ञानी निकला. हमारे कागजात देखे और सुझाव दिया.

‘‘यहां कुछ नहीं होगा. आप कुबेर भवन के नीचे कमरा नं. 23 में जाइए. वहीं सब काम होगा.’’

‘‘लेकिन वहां से तो हम आए हैं. और यहां उस अंदर के बाबू ने यह सब और मांग लिया. कहां से लाएंगे?’’

‘‘आप उन की परवा न कीजिए. जैसा मैं कहता हूं वैसा कीजिए.’’

वहां से हट कर हम उबल पड़े. ‘‘सच, हम भारतवासियों को एकदूसरे को तड़पाने व तड़पते देख खूब आनंद आता है. कभी कहते हैं यह लाओ, कभी कहते हैं वह लाओ.’’

हमारे समाज में पुरुषों को रोना वर्जित है, स्त्री होते तो दहाड़ मारमार कर रो लेते. गम में डूबे हुए जब कुबेर भवन पहुंचे तो देखा कमरा नंबर 23 बंद हो चुका था.

8वीं मंजिल पर बहू से जा कर मिले तो उस ने कहा, ‘‘पापा, अपने कागज मुझे दीजिए. मैं अपनी एक मित्र से पूछताछ करवाऊंगी. वह नीचे की पहली मंजिल पर काम करती है और ऐसे मामलों को निबटाती भी है.’’

हम बोले, ‘‘ठीक है, बेटी. कोशिश करो. 400-500 तक खर्च करने को मैं तैयार हूं.’’

2 दिन बाद बहू का फोन आया, ‘‘मैं अपनी दोस्त के साथ राशन अधिकारी से मिली थी. बड़ा बदतमीज आदमी है. पहले तो एकदम मना कर दिया. फिर जब मैं ने कहा कि मैं भी राज्य सरकार में काम करती हूं तब माना. उस का रेट 500 रुपए है. आप अगले सोमवार को आइएगा.’’

हम ने बहू को धन्यवाद दिया. विक्रम और बेताल की कहानी में विक्रम की तरह सोमवार को हम फिर दफ्तर पहुंचे. बहू को फोन मिलाया तो वह नीचे उतर कर आई और लाइन में हमें खड़े देख संतुष्ट हुई. बोली, ‘‘मेरी दोस्त की किसी करीबी रिश्तेदार की 2 दिन पहले मौत हो गई है. वह कई दिन नहीं आ पाएगी. अच्छा किया आप लाइन में लग गए.’’

कतार में करीब 25 लोग लगे थे. 40 मिनट में अपना नंबर आ गया. साहब के पास कागज का पुलिंदा रख चुपचाप खड़े हो गए. सब पन्नों पर उन्होंने एक निगाह डाली फिर कुछ कहे बिना हस्ताक्षर कर हमें बाहर की तरफ इशारा कर दिया.

बाहर गए. पावती पाने वालों की कतार लगी थी, यानी कागज व रुपए जमा कर रसीद लेना. इस कतार मेें हम घंटे भर तक धीरेधीरे सरकते रहे फिर आफिस के अंदर दाखिल हुए. 20 रुपए दिए, रसीद मिली और आदेश मिला कि 5 नवंबर को शाम 4 से 6 बजे के बीच कार्ड लेने आ जाना.

रसीद को पर्स में संभाल कर रखा (खरा सोना जो हो गया था) ऊपर भागे बहू को धन्यवाद देने. देखें, अब 5 नवंबर को क्याक्या गुल खिलते हैं.

5 नवंबर को राशनकार्ड मिल गया, आप को आश्चर्य हुआ न? हमें भी हो रहा है, आज तक. Social Story

Family Story : सालते क्षण – सड़ेगले रिश्तों के पसोपेश की उधेड़बुन भरी कहानी

Family Story : पुराने सालते क्षण जीवनभर के लिए रह जाते हैं, खासकर तब, जब ऐसे पारिवारिक रिश्ते हों जो उन क्षणों को घटाने की जगह एक ऐसा क्षण और जोड़ दें जो ताउम्र कचोटता रहे. ऐसे ही सड़ेगले रिश्तों के पसोपेश की उधेड़बुन है यह कहानी 5 वर्षों के निर्वासन के बाद मैं फिर यहां आया हूं. सोचा था, यहां कभी नहीं आऊंगा लेकिन प्राचीन सालते क्षणों को नए परिवेश में देखने के मोह का मैं संवरण न कर पाया था. जीवन के हर निर्वासित क्षण में भी इस मोह की स्मृति मेरे मन के भीतर बनी रही थी और मैं इसी के उतारचढ़ाव संग घटताबढ़ता रहा था. फिर भी आज तक मैं यह न जान पाया कि यह मोह क्यों और किस के प्रति है? हां, एक नन्ही सी अनुभूति मेरे मन के भीतर अवश्य है जो मु झे बारबार यहां आने के लिए बाध्य करती रही है. यह अनुभूति मां के प्रति भी हो सकती है और अमृतसर की इस धरती के प्रति भी जिस की मिट्टी में लोटपोट कर मैं बढ़ा हुआ.

इसे ले कर मैं कभी एक मन नहीं हो पाया था. यदि हो भी पाता तो भी मु झे बारबार यहां आना पड़ता. बस से मैं बड़ी बदहवासी में उतरा. बदहवासी यहां आने की कि वे क्षण जिन के लिए मैं यहां आया हूं, अपने परिवेश में यदि ज्यों के त्यों हुए तो जो निरर्थकता मन के भीतर आएगी, उस का सामना कैसे कर पाऊंगा? बाद में हाथ में पकड़े ब्रीफकेस में सहेज कर रखी नोटों की गड्डी से मु झे बल मिलता है. थोड़ी देर के लिए मैं इस एहसास से मुक्त हो जाता हूं कि अब मैं मां का निखट्टू पुत्र नहीं हूं. निखट्टू मेरा उपनाम है. इस के साथ ही मु झे याद हो आते हैं मेरे दूसरे उपनाम भी. सीधा और भोला होने के वश रखा गया ‘भलोल’ उपनाम. सदा नाक बहती रहने के वश रखा ‘दोमुंही’ उपनाम. इन उपनामों से बारबार चिढ़ाने से मेरा जो रुदन निकलता तो मां से ले कर छोटे भाई तक को गली में लड़ती कौशल्या की आवाज का आभास होता था. 9वीं में मेरे कौशल्या उपनाम की बड़ी चर्चा थी.

मेरे मन में यह प्रश्न उस समय भी था और आज भी है कि अगर मैं भलोल हूं या मेरी नाक बहती है तो इस में मैं कहां दोषी हूं? और यह भी कि, मेरी दुर्दशा करने वाले मेरे अपने कहां हुए? अब सोचता हूं मेरा इन के साथ केवल रोटीकपड़े तक का संबंध रहा है. वह भी इस घर में पैदा हुआ हूं शायद इसलिए. मु झे पता ही नहीं चला कि कब संगम सिनेमा से गुजर कर पिंगलबाड़े तक पहुंच गया था. पिंगलबाड़े से मुड़ने पर पहले तहसील आती है. छुट्टी के रोज भी यहां भीड़ रहती है. जमघट लगा रहता है. मुकदमे ही मुकदमे. मुकदमे अपनों पर जमीनों के लिए. कत्लों के मुकदमे. तारतार होते रिश्ते. बेहिसाब दुश्मनी, कोई अंत नहीं. मैं जल्दी से आगे बढ़ जाता हूं. आगे वह क्रिकेट ग्राउंड आता है जिस पर मैं बचपन में अपने साथियों संग क्रिकेट खेला करता था. मां कहती, क्रिकेट ने मेरी पढ़ाई ले ली.

मैं कैसे कहता कि बड़े भाई की नईनई शादी, एक ही कमरे में परदे लगा कर उन के सोने का बंदोबस्त, रातभर चारपाई की चरमराहट, परदे के पीछे के दृश्यों की परिकल्पनाओं ने मु झे पढ़ने नहीं दिया था. पढ़ने के लिए मैं मौडल टाउन चाचाजी के पास और चालीस कुओं पर भी जाता पर परदे के पीछे की परिकल्पनाएं मेरा पीछा नहीं छोड़ती थीं. धीरेधीरे मैं पढ़ने में खंडित होता गया था. परीक्षा परिणाम आया तो मैं फेल था. पढ़ने के लिए जब फिर दाखिला भरा तो बड़े भाई का मत बड़ा साफ था, ‘तुम्हें अब की बार याद रखना होगा. व्यक्ति कारखाने में पैसा तब लगाता है जब उसे लाभ दिखाई दे.’ विडंबना देखें, जब यही बात राजू भाई ने इन्हें कही थी तो सब के सम झाने और मनाने पर भी पढ़ाई छोड़ दी थी. राजू भाई केवल यही चाहते थे कि कुक्कु का चक्कर छोड़ कर अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे. आज वही शब्द कहने से वे बिलकुल नहीं हिचकचाए थे. राजू भाई ठीक कहते थे, जिस बात का विरोध आज हम अपनी जान दे कर करते हैं, कोई समय आता है हम परिस्थितियों द्वारा इतने असहाय होते हैं कि उसी बात को बिना शर्त स्वीकार कर लेते हैं. उस समय उन की यह बात सम झ में नहीं आई थी.

आज समझ में आती है. मैं ने भी पढ़ाई छोड़ दी थी. इसलिए नहीं कि मु झे उन की बात सम झ में आ गई थी, बल्कि इसलिए कि बड़े भाई के शब्द मु झ से सहन नहीं हुए थे. बड़े भाई को भी शायद राजू भाई के यही शब्द सहन नहीं हुए होंगे. हम दोनों एकदूसरे की बात सहन कर लेते तो शायद हालात दूसरे होते. देखता हूं क्रिकेट ग्राउंड भी अब वहां नहीं है. सोचा था, जब मैं वहां पहुंचूंगा तो बच्चे पहले की तरह खेलते मिलेंगे. उन को खेलते देख मैं अपने बचपन के दिनों को याद कर लूंगा. वहां एक सुंदर बंगला हुआ करता था. और भी कई सुंदर बंगले बन गए थे. मैं किसी को कुछ कह नहीं सकता था. बच्चों के उल्लास तो आएदिन खत्म किए जाते हैं. बड़े भारी मन से मैं अपनी गली की ओर बढ़ता हूं. गली के मोड़ तक आतेआते मेरे पांव ढीले पड़ जाते हैं. आगे बढ़ने की इच्छा नहीं होती. गली के लोग मु झे निखट्टू नाम से जानते हैं. मु झे देखते ही आग की तरह यह खबर फैल जाएगी. न जाने समय के कौन से क्षणों में मेरा नाम निखट्टू पड़ा.

इस नाम से पीछा छुड़ाने के लिए मैंने मोटर मैकेनिकी, कुलीगीरी, रिक्शा चलाने से ले कर होटल में बरतन मांजने तक के काम किए. पर इस निखट्टू नाम से पीछा नहीं छूटा, चाहे तन के सुंदर कपड़े और नोटों से भरा ब्रीफकेस मु झे एहसास दिलाता है कि अब मैं मां का निखट्टू पुत्र नहीं रहा हूं. जानता हूं मैं मन की हीनभावना से छला गया हूं. यही भावना मु झे बल देती है. गली में झांक कर देखता हूं कि जिस बात की अपेक्षा थी वैसा कुछ नहीं था. गली में मु झे कोई दिखाई नहीं दिया था. सबकुछ बदल गया था. महाजनों का घर और बड़ा हो गया था. पहले हौजरी की एक मशीन हुआ करती थी, अब बहुत सी मशीनें लग गई हैं. गली भी पक्की हो गई है. मंसो की भैंसों के कारण जहां गंदगी फैली रहती थी, मु झे गली में कहीं भैंस दिखाई नहीं दी थी. घर के समीप पहुंचा तो मैं चकरा गया. हमारा घर कहां गया? उस की जगह खूबसूरत दोमंजिला मकान खड़ा था. मैं ने इधरउधर देखा कि कोई पहचान वाला मिले तो पूछूं कि दिनेश साहनी का घर यही है? एकाएक ऊपर लिखे ‘साहनी विला’ पर मेरी नजर पड़ी. दरवाजे पर एक ओर बड़े भाई के नाम की तख्ती भी दिखाई दे गई. भाई के नाम के नीचे लगी घंटी दबाने पर किसी अंजान महिला ने दरवाजा खोला. वह कपड़ों से नौकरानी लग रही थी. मु झे देख कर शायद वह यह पूछती कि आप को किस से मिलना है कि इतने में ‘‘कौन है?’’ कहती हुई मां दरवाजे तक चली आईं. मु झे देख कर आश्चर्य के भाव उन के चेहरे पर आए, फिर सामान्य हो गईं. मुख से निखट्टू निकलतेनिकलते रह गया पर निकला नहीं.

मां को देख कर नौकरानी सी लगने वाली भीतर चली गई. मां ने दरवाजा पूरा खोल दिया. मैं उस को प्रणाम करने के बाद बड़े अनमने भाव से भीतर चला आया. कदम रखते ही आंखें चुंधिया गईं. पूरे कमरे में ईरानी कालीन, एक ओर बड़ी सी डाइनिंग टेबल, दरवाजे के पास चमकदार फ्रिज, एक तरफ सोफा व बैड, गद्देदार कुरसियां और टीवी. टीवी के पीछे वाली दीवार पर मोतियों से बनाई गई एक औरत की आकृति फ्रेम की गई थी. मैं आगे नहीं बढ़ पाया. न ही मां ने मु झे बढ़ने के लिए कहा. बैठने के लिए भी नहीं कहा. मैं ने महसूस किया कि मु झे बैठाने से ज्यादा उस को यह बताने की चिंता है कि सारा सामान जिसे देख कर हैरान हूं, कहां से और कैसे आया है? मां बोली, ‘‘ये सारा सामान दिनेश ने फौरेन से मंगवाया है. यह ईरानी कालीन अभी पिछले महीने ही आया है. टीवी और फ्रिज बहुत पहले आ गया था.

पूरे 10 लाख रुपए लगे हैं.’’ मैं ने महसूस किया, मेरे ब्रीफकेस में पड़ी रकम एकदम छोटी है. जो रकम मां ने बताई थी, उस से दोगुनी छोटी. इन 5 वर्षों में जो क्षण मु झे सालते रहे हैं वे और बड़े हो गए हैं. जाने कहां से पीड़ा की एक तीखी अनुभूति भीतर से उठी और भीतर तक चीरती चली गई. पीड़ा इसलिए कि निखट्टू उपनाम से मुक्ति पाने की जो इच्छा ले कर यहां आया था, वह जाती रही. बैठक और ड्योढ़ी मिला कर ड्राइंगरूम में इतनी कीमत की चीजें हैं तो भीतर के कमरों में जाने क्याक्या देखने को मिले. मां ने बताया, ‘‘अपनी पत्नी के सारे गहने बेच कर जिस होटल में तुम बरतन मांजते थे उसी होटल को खरीद लिया था. यह उसी की करामात है कि हमें कोई कमी नहीं है.’’ ऐसे कहा जैसे अब भी उसी होटल में बरतन मांजता होऊं. ‘‘गांव की जमीन उस ने छेड़ी तक नहीं. कहता था जिस में सब हिस्सेदार हों उस में वह कुछ नहीं करेगा.’’ मां को भय हुआ कि कहीं मैं होटल में अपने हिस्से का दावा न करने लगूं. इसलिए साफ बात करना ठीक सम झी. मैं कहने को हुआ कि इस मकान में भी तो मेरा हिस्सा है, पर चुप रहा. बाद में मां ने महसूस किया कि उन्होंने मु झे बैठने को नहीं कहा. ‘‘बूट उतार कर सोफे पर बैठ जाओ.’’ यह सुन कर मैं संकुचित हो उठा कि उस का अपना बेटा, अपने भाई की ईरानी कालीन पर बूट पहन कर बैठ नहीं सकता.

कालीन पर तो बूट पहन कर ही बैठा जाता है. मैं ने यह भी महसूस किया कि घर छोड़ते समय जिस तरह मु झे ले कर मां भावशून्य थी उस में और वृद्धि हो गई है. न मैं बैठा और न ही मैं ने बूट उतारे. कहा, ‘‘चलूंगा मां. देखने आया था कि शायद तुम्हें मेरा अभाव खटकता हो. पर नहीं, यहां सबकुछ उलट है. तुम्हें मेरा अभाव नहीं था बल्कि मु झे तुम्हारा अभाव था. कितना विलक्षण है कि बेटे को मां का अभाव है पर मां को नहीं.’’ वहां से निकलने के बाद भी पीछे से मां की आवाज आती रही, ‘‘कुछ खातेपीते जाओ. भाई से नहीं मिलोगे? होटल नहीं देखोगे?’’ मु झे मां की आवाज किसी कुएं से आती सुनाई दी. मां, दिनेश भाई के साथ इसलिए है कि दोनों एक ही वृत्ति के हैं. बेईमान और धोखेबाज. मैं ने तो यह महसूस किया कि अब तक के सालते क्षणों में कुछ और क्षण समावेश कर गए हैं. और यह भी कि क्षण यदि खुद में बदल भी जाएं तो निरथर्कता और बढ़ जाती है जो आदमी को जीवनभर सालती है. Family Story

Social Story In Hindi : सीता की लट

Social Story In Hindi : सीता की लट…यही नाम था उस सांप का. कहने को यह जगह राजधानी की सीमा में था लेकिन वह इलाका बाहरी शहर का अविकसित गांव था, जहां के खेतताल से ले कर श्मशान भूमि तक छोटेछोटे प्लौटों में तबदील होती चली जा रही थी.

8 सौ स्क्वायर फीट प्लौट में 1 हौल, 2 कमरे और नाममात्र के गार्डन, बाऊंड्री शहरी मकान अभी बन कर पूरा ही हुआ था. किसी प्राइवेट कंपनी का एरिया सेल्स मैनेजर पंकज, उस की पत्नी काया और 2 नन्हें बच्चे सफल और प्रबल अभी हाल ही में वहां रहने आए थे.

पति सुबह लंच बौक्स ले कर काम पर रवाना हो चुका था. 5 साल के सफल को वह 8 मिनट स्कूटी चला कर स्कूल बस में चढ़ा आई है. अब दोपहर 1 बजे उसे लेने जाना होगा. यहां से सब जगहें दूरदूर हैं पर काया को विश्वास है कि जब खाली कालोनियां बस जाएंगी, यह मिटता हुआ गांव पूरी तरह मिट जाएगा, घर के आगे की पतली सड़क प्रस्तावित बाईपास 40 फुट रोड में बदल जाएगी. हां, तब सफल की स्कूल बस का रूट जरूर बदलेगा और वह बिलकुल घर के बाहर आ कर हौर्न बजा दिया करेगी. बस, 2-4 साल में ही इस गांव की जगह पूरी एक पौश कालोनी होगी, यह तय है.

‘तब हम कह सकेंगे कि इस कालोनी को बसाने वाले हम हैं. हम यहां तब से हैं जब कालोनी का कोई नामोनिशान न था और घर के पते में गांव मेंहदी खेड़ा लिखना पड़ता था,’ काया मन ही मन हंस कर कहती और मामूली प्राइवेट नौकरीदार मैनेजर पति होमलोन, पेंशन प्लान से ले कर कंपनी का इस मंथ का दिया बिक्री टारगेट पूरा कर पाने, न कर पाने की चिंताओं से दबा, भ्रम की तरह मुसकरा कर फिर उदास हो जाता.

पति का लंच बौक्स और बेटे की स्कूल बस सुबह के दोनों महान लक्ष्य पूरे हुए. बड़ा संयोग यह कि कुछ देर तंग करने के बाद अब छोटू प्रबल गहरी नींद सो गया है. काया जल्दीजल्दी घर के काम निबटाने में लगी है. बरतन मांज लिए हैं. पोंछा लगा रही है.

इस गंवई इलाके की गरीबनें अब तक महरी नहीं बनी हैं. यहां आते ही काया ने हफ्ते 2 हफ्ते बड़ी कोशिश की थी. सड़क से गुजरतीं 2-4 फटेहाल, निहायत गरीब दिखने वाली मजदूर औरतों से पूछा भी था और उन के जवाब थे कि गांव में किसी के जूठे बरतन मांजने जाना बड़ा बुरा माना जाता है. हां, गेहूं बीनने जैसा काम हो तो वे खुशीखुशी कर देंगी.

‘‘पर हम तो ब्रैंडेड आटा इस्तेमाल करती हैं,” काया के इस जवाब पर बकरियां चराने वाली एक औरत संतोष बहुत चौंकी थी. अब आटा बेचने की भी कंपनियां खुल गई हैं. क्या भाव पसेरी का? आटा बेचते हैं कि चांदी?

लब्बोलुआब यह कि यहां आ कर नन्हें बच्चों की मां काया को अपने घर में झाडूपोंछा, बरतन, कपड़े वगैरह सब कामों में खुद के ही हाथ घिसने पड़ते हैं तिस पर यह छोटू. इतना ज्यादा सक्रिय शैतान जैसे कोई जिन्न…उस दिन छत की रेलिंग पकड़ कर हवा में लटक गया था… उस दिन सड़क पर उतनी दूर अकेला घुटनों पर चलता मिला था. एक दिन अचानक गायब हो गया. मां ढूंढ़ती, घबराती, हलकान और वह मजे से सोफे के नीचे सरक कर सो गया था.

पोंछा लगा कर पानी बाहर फेंकने आई वह एक पल को ठिठक गई. बगल के श्मशान में, जो घर से बस इतने प्लौट्स के बाद है कि धुआं यहां नहीं लगता, धूप में दाह की ऊंची आग तेज गरम चमक के साथ झिलमिला रही है. इंसान जीवन में कितनेकितने दंभ और मिथ्या पालता है कि यह मेरा, यह मैं…

काया को सहसा याद आया कि उस की नानी और उस की मां भी हमेशा यही करती थीं कि घर के सामने से कभी अर्थी निकले तो मुट्ठी भर बारीक राई फेंक देती थीं ताकि मृतक की आत्मा इधर नहीं आने पाएं. इन सब ढकोसलों में पड़ने का वक्त किस के पास है. काया ने पोंछे का धूल फिनायल भरे पानी से दूसरी तरफ बहा दिया. मांनानी की किसी भी मान्यता को मानना उस डर को एक पहचान दे देना होगा जिसे वह भरसक झुठलाया करती है. पति अकसर टूर पर रहते हैं. श्मशान की तरफ कड़कती बिजली की खौफनाक रोशनी और हाहाकार सा पानी बरसाती अंधेरी रातों में, अपने दोनों बच्चों को चिपकाए काया दिल में लगातार दोहराती है,’मुझे डर नहीं लगता, मुझे डर नहीं लगता, मुझे डर नहीं लगता…’

निडर होना भी एक भयानक विवशता है और पीछे एक नया डर उस के इंतजार में है. पोंछे का पानी बाऊंड्री के बाहर फेंक लोहे का गेट बंद कर वह पलटी ही थी कि अचानक उस के मुंह से चीख निकल गई, “सांप…”

सामने एक सांप था. बाऊंड्री के बीचोंबीच पूरे रोबदार से रेंग कर आता हुआ.

‘अंदर मेरा बच्चा है,’ उस का पांव उठता है फिर ठिठक जाता है. सामने सांप है और अंदर मेरा बच्चा है. फिर किसी ने दोहराया उस के भीतर और वह सांप को लगभग फांदती हुई दौड़ गई. सोए बच्चे को समेटे वह वापस दौड़ आई. सांप ऐन बीच में कुंडली जमा चुका था.

चिल्लाना यहां कौन सुनता…खेत व प्लौटों का सूनापन उस ने पहली बार सच की रोशनी में देखा. सड़क पार 2 सौ कदम की दूरी पर गांव की किराने की दुकान है. बच्चे को चिपकाए वह भाग कर वहां पहुंची,”भैया, हमारे घर सांप निकला है. आप जल्दी चलिए प्लीज…’’

दुकान खुली ही छोड़ दुकानदार दौड़ आया, साथ में उस के दोनों ग्राहक भी. सहायता की यही सच्ची तत्परता उन्हें ग्रामीण साबित करती है. बाऊंड्री में बैठे सांप को देखते ही डंडों पर कसी उन की मुट्ठियां ढीली पड़ गईं,”अरे, जे तो सीता की लट है,’’ वे हलके हो कर बोले जैसे किसी गुंडे हत्यारे को ढूंढ़ते आए हों और मिला कोई नन्हा सा शरारती बच्चा.

‘‘सांप है…’’ काया उसी घबराहट के वशीभूत थी अब भी.

‘‘जे सांप कछू न करे…’’

‘‘यह जो भी है, है तो सांप ही न. आप इसे मार क्यों नहीं देते?’’

‘‘है तो जे सीता की लट ही. न होय तो भी आप जाने दो. कौन बड़ा सांप है… काहे हत्या का पाप सिर लेना.’’ वे जाने लगे. उस की घबराहट कुछ और गाढ़ी हो गई,”यह सिर्फ एक सांप है.’’

‘‘इसे न मारना, बहनजी. यदि सीता की एक लट को आप ने मार दओ तो ऐसी 7 निकलेंगी जहीं, आप के घर भीतर से.’’

वह रोकती रह गई. मददगार वापस लौट गए. अब बाऊंड्री में बची काया और वह सांप जो सरक कर गुलाब के गमले के पीछे जा छिपा था. काया को समझ नहीं आ रहा, करे तो करे क्या? पति को फोन करने का कोई अर्थ नहीं निकलेगा. अब क्या? धड़कते दिल से काया सांप से हरसंभव दूरी बनाए, चौकन्ने पंजों पर चलती निकली और इस पार आ कर दरवाजा झट बंद कर लिया. हरएक खिड़की की सिटकनी चढ़ा ली. दरवाजे के नीचे अखबार लगा दिया. अब हवा तक अंदर नहीं आ सकती. इस अकेलेपन में उस सांप का भय जैसे कालिया दह का राजा, जैसे शेषनाग, जैसे साक्षात मौत…

अभी तक तो छोटा बच्चा सो रहा है, अभी तक तो बड़ा बच्चा स्कूल में है लेकिन कितनी देर…कितना समय है उस के पास इन हालातों से अपने बच्चों को और अपनेआप को बचाने के लिए… दिमाग फिरकी की तरह घूम रहा है कि क्या करें…काया का सिर दुखने लगा. उस ने खिड़की से झांक कर देखा. वहीं है वह सांप…

बाहर से बकरियों का इक्कादुक्का स्वर आना शुरू हो गया है. संतोष बकरियां चरा कर आ गई है. काया उम्मीद और हिम्मत से दरवाजा खोली और बोली,”संतोष, ओ संतोष…’’ अपनी एकमात्र जानपहचानदारिन को वह भरसक ऊंची आवाज में पुकारती है.

संतोष लोहे के फाटक तक आ कर रुक जाती है, हमेशा की तरह. इधर घर के मुख्यद्वार पर काया है. उन दोनों के बीच रास्ते पर सांप है.

‘‘संतोष, इसे मार दो प्लीज,’’ डर भरी उंगली से आधुनिका ने जिस की ओर इंगित किया है, ग्रामीण युवती उसे देख सहजता से कहती है,”जे, सीता की लट. जाको भगा दीजिए. जे काटती नहीं है. जब रावण सीता मैया का हरण कर लिए जा रहो, तो मैया के कछू केस वन में गिर गए, वे ही लटें जे नागिनें होती हैं, बड़ी पवित्तर और निर्दोष. मारना नहीं, बाईजी. डंडा भी नहीं दिखाना. नहीं तो इत्ती निकलेंगी कि आप गिन नहीं पाओगी.”

“अनगिनत निकलेंगी या सिर्फ 7 और निकलेंगी? क्या बकवास है,” पूछतेपूछते ही साइंस पढ़ा हुआ काया का जेहन झुंझला उठा.

संतोष भी चली गई तो मदद की कहीं से कोई उम्मीद नहीं रही. दरवाजा बंद कर उस ने नीचे अखबार से रास्ता बंद किया और भीतरी कमरे में सोए बच्चे को एक नजर देखा. जब तक यह सोया है, तभी तक दरवाजा बंद रखा जा सकता है. न जाने वह कब जाग जाए. कुछ करना होगा उसे अभी.

वह परेशान हो कर शून्य दिमाग से सोफे पर बैठी है. अपनी हर परेशानी में हमेशा वह अकेली ही क्यों है? कभी जब बेटे की स्कूल बस समय पर नहीं आती है, तो वह बस स्टौप पर नन्हें प्रबल को चिपकाए धूपबारिश से बचतीजूझती बस, ड्राइवर से ले कर स्कूल के तय जिम्मेदारों तक को फोन करती परेशान होती है, अकेली ही. कभी जब उसे हरारत, बुखार जैसा कुछ हो जाता है तो उस पस्त हाल में भी तयशुदा रूटीन से घर के सब काम पूरे कर रही होती है अकेली. जानलेवा धूप में भी अपने दोनों बच्चों को स्कूटी पर संग लिए, एक को आगे खड़ा किए, दूसरे को कंगारू बैग में सीने से बांधे, वह भरे ट्रैफिक में चली जा रही होती है, कभी घर का राशन लाने, कभी पेरैंट्स मीट, कभी कोई बिल भरने अकेली ही.

पति नाम का जीव जैसे सिर्फ रुपए कमाने वाला और मूड के मुताबिक कुछेक और काम करने वाला रोबोट है कोई. और मन न होने पर भी करने वाले सारे काम तो पत्नी को ही करने पड़ते हैं. काया सोफे से उठ खड़ी हुई. कितनी ही बार उस ने साबित किया है कि अपने बच्चों की परवरिश व हिफाजत के लिए वह किसी मर्द के आसरे की मुहताज नहीं.

तब जब वे किराए के एक कमरे में रहते थे जो दूसरी मंजिल का कोना था, कोने पर घनी, ऊपर को जाती, फूलों लदी एक बेल थी जिस में एक विराट छत्ता छिपा था मधुमक्खियों का और यह बात उस ने तब जानी थी जब सामान वहां जल्दीजल्दी शिफ्ट करने के बाद पति को टूर पर जाना पड़ा था. इस से पहले कि कोई मधुमक्खी उस के बेटे को नुकसान पहुंचा पाती, उस ने कौकरोच मारने वाले स्प्रे से पूरा का पूरा छत्ता इस फुरती से नहला दिया था कि एक डंक भी हिल न सका था छत्तेभर मधुमक्खियों का.

तब जब वे उस घुप्प अंधेरे एलआईजी फ्लैट में रहते थे, जो नाले के पास था, नन्हा सफल मच्छरनाशक कौइल खा लिया था. बिना घबराए उस ने बच्चे को नमक का पानी इतना पिलाया था कि उस ने उलटी कर के पूरे जहर को बाहर निकाल दिया था.

तब जब वह दूसरी बार प्रैगनैंट थी और स्कूल बस मिस हो जाने पर बेटे के टेस्ट के दिन स्कूटी से उस को ले कर स्कूल जा रही थी, तो अचानक स्कूटी गिर गई थी. सारी खरोचें उसी को आई थीं, सफल साफ बच गया था. अपनी छिली कनपटी और रिसती कुहनी की परवाह किए बिना किस हौंसले से वह पलभर में फिर स्कूटी स्टार्ट कर रही थी. फुरती से, बिना घबराए.

गृहिणी ने सांप का सामना करने के लिए दिलदिमाग स्थिर किया, अपना कुल साहस बटोरा और दरवाजा खोल दिया.

सांप वहीं छिपा बैठा है, ऐन वहां जहां से वह उस के किसी भी बच्चे पर सरलता से हमला कर सकता है. लेकिन गांव के लोग अगर कह रहे हैं कि यह काटता नहीं तो क्या इसे सिर्फ भगाया नहीं जा सकता? निहत्थी काया बेआवाज पांवों से 2-4 कदम उस तरफ को बढ़ती है. सांप चौंक कर फन उठा लेता है. निर्णय हो चुका है. इस का नाम सीता की लट हो या गंगा की तट, यह सिर्फ एक सांप है और काया एक जिम्मेदार मां है… गांव माफ कर देता है, उसे जो नुकसान नहीं पहुंचाता, शहर नहीं कर पाता, उसे भी जो सीधा फायदा नहीं देता.

धड़कते दिल और पुख्ता हौंसले से उस ने 1 बालटीभर पानी जोर से फेंका. सांप सरसराता निकल आया. बला की फुरती है उस में. उस ने फन फैला लिया और फुफकारने लगा.
सांप में मौत सरीखी फुरती है और बच्चों की मां में सब हदों के पार आ चुका साहस. न जाने कितने ही वार किए उस ने हाथ के रैकेट से सांप पर, अंधाधुंध…

सांप सामने है पर अब भी उस के अंगों में हरकत बाकी है. एक पौलिथिन में सांप को डाल कर संतोष मन ही मन बोल पङी कि मरे सांप को अग्नि देनी चाहिए. अग्नि का पवित्र द्वार मिलता है तो अगली योनि मानव की पाता है सर्प. काया को यह मिथक नुकसानदेह नहीं लगता लेकिन सच में उस के पास बिलकुल समय नहीं है. यह जगह फिनायल से धोनी है, अपने हाथ और रैकेट ऐंटीसैप्टिक से साफ भी.बेटे को स्टौप पर लेने जाने का समय होने ही वाला है. सोए छोटू को जगा कर साथ लेना है. स्कूटी बाहर निकालनी है.

काया ने बंद पौलिथीन ताकत भर के उधर फेंकी जिधर प्रज्वलित श्मशान है. खाली पड़े खेतप्लौटों को देख विजयी मगर विवश हत्यारिन काया अपनेआप को तसल्ली दे रही है कि बस, कुछ ही सालों में यह गांव मिट जाएगा और यहां उस के मकान की तरह के सैंकड़ों शहरी मकान बन जाएंगे. Social Story In Hindi

Family Story In Hindi : मोको कहां ढूंढे रे बंदे

Family Story In Hindi : आज फिर कांता ने छुट्टी कर ली थी और वो भी बिना बताए. रसोई से ज़ोर – ज़ोर से बर्तनों का शोर आ रहा था. बेचारे गुस्से के कारण बहुत पिटाई खा रहे थे. पर इस गुस्से के कारण कुछ बर्तनों पर इतनी जम के हाथ पड़ रहा था कि मानो उनका भी  रंग रूप निखर आया हो. वही जैसे फेशियल के बाद चेहरे पर आता है. अरे, “आज मुझे पार्लर भी तो जाना है.” अचानक याद आया. सारा काम जल्दी – जल्दी निपटा  दिया. थकान भी लग रही थी. पर सोचा चलो, वही रिलैक्स हो जाऊंगी. घर का सारा काम निपटा कर मैं पार्लर पहुंच गई.

जब फेशियल हो गया तो पार्लर वाली बोली…….
“दीदी कल देखना, क्या ग्लो आता है.” उफ़….एक तो उसका “दीदी” बोलना और दूसरा अंग्रेजी का “ग्लो” ग्लो~~ वाह!! सच, मन कितना आनंद से भर जाता है. खुश होकर मैंने कुछ टिप उसके हाथ में रख दी, “थैंक यू दीदी” उसने कहा.सच में अपने आप पर बड़ा गर्व महसूस होने लगा, जैसे न जाने कितना महान काम कर दिया हो.घर वापसी के लिए पार्लर का दरवाज़ा खोलते समय सचमुच में एक सेलेब्रिटी वाली फीलिंग आने लगती है. लगता है जैसे बाहर कई सारे फोटोग्राफर और ऑटोग्राफ लेने वाले इंतजार में खड़े होंगे… मैडम, मैडम!हेल्लो.. हेल्लो.. प्लीज़ प्लीज़ एक फोटो. इधर,  इधर, मैडम. ऐसा सोचते ही एक गर्वीली मुस्कुराहट अनायास ही चेहरे पर आ गई.

पर ये क्या? पार्लर से निकलते ही सब्ज़ी वाला भईया दिख गया। उफ़…मेरे ख्यालों की
दुनिया जैसे पल भर में गायब हो गई. मुझे देखते ही वो अपने चिरपरिचित अंदाज़ में बोला “हां,…. चाहिए कुछ?” मैं जैसे सपने से जागी.अरे हां,आलू तो खत्म हो ही गए है. परांठे कैसे बनेंगे कल.सन्डे को कुछ स्पेशल तो सबको चाहिए ही. फिर चाहे लंच में छोले चावल बन जाएंगे. टमाटर भी लेे ही लेती हूं. रखे रहेंगे, बिगड़ते थोड़े ही है. कुछ और सब्जियां भी ‘सेफर साइड योजना’ के तहत लेे ली जाती है.अब आती है असली जिम्मेदारी निभाने की बारी..यानी हिसाब लगवाने की बारी “क्या भईया, क्यूं इतनी मंहगी  लगा रहे हो?”
“हमेशा तो आपसे ही लेती हूं.”

“आज क्या कोई पहली बार सब्ज़ी थोड़े खरीद रही हूं आपसे?”
“उधर, बाहर मार्केट में बैठते हो तो कम भाव लगाते हो”
“हमारी कॉलोनी में आते ही सबके भाव बढ़ जाते है”
अन्तिम डायलॉग बोलते समय थोड़ा फक्र महसूस होता है. देखा हम कितनी पॉश कॉलोनी के वासी है. परन्तु फ्री का धनिया और हरी मिर्च मांगते वक्त मैं अपने वास्तविक रूप में लौट आती.बनावट तो अस्थाई होती है, वास्तविकता ही हमारे साथ स्थाई रूप से रहती है.पर ये हमें शायद बहुत कम या कहिए देर से समझ आता है.

खैर….सब्जी वाले के साथ मोल भाव करने और कुछ एक्स्ट्रा लेने में अपनी कला पर खुद को ही शाबाशी दे डाली, हमेशा की तरह। वरना, घर पर ये सब बताओ तो इन समझदारी की बातों को भला कौन समझता है? उल्टा प्रवचन अलग मिल जाता है पतिदेव से …”क्या तुम भी, यूं दो – चार रुपयों के लिए इन मेहनतकश लोगो से इतना तोल मोल करती हो” इतनी सुबह- सुबह दूर मंडी से तुम्हें ये सब घर बैठे ही मिल जाता है. ये भी तो फ्री होम डिलीवर ही है. हमें तो इनका शुक्रगुज़ार होना चाहिए.

उहं मैंने मन ही मन  मुंह बनाया. अरे, घर चलाना कोई खेल नहीं है. बहुत सारी बातें सोचनी पड़ती है. ये मर्दों के बस की बात नहीं है. अपने और उनके दोनों के ही हिस्से की बातें मैं मन ही मन सोच रही थी.
जब सब्ज़ियां खरीद ली तो याद आया. ओह, हां.. .’ब्रेड और मख्खन भी तो नहीं है और छोटे बेटे ने अपना शैंपू लाने के लिए भी तो कहा था।’ कुछ चिप्स और चॉकलेट भी लेे लूंगी उसके लिए. घर पहुंचते ही  बोलता है “मेरे लिए क्या लाई हो मम्मी?” दुकान पर पहुंची तो कुछ अन्य वस्तुओं पर भी नज़र गई । उन्हें देख कर सोचा..”अच्छा हुआ जो नजर पड़ गई, ये सामान भी तो लगभग खत्म ही होने लगा है.” ये तो बहुत अच्छा हुआ, जो देखकर याद आ गया। वरना फिर से आना पड़ता.
सारा सामान लेे कर  थकी – हारी घर पहुंची। रिक्शे वाले से भी थोड़ी बहस हो गई किराए को लेकर. आज तो सारा मूड ही खराब हो गया.

डोरबेल बजाई तो चीकू ने दरवाज़ा खोला और चिल्ला कर बोला… पापा,  “मम्मी आ गई हैं.” “पता नहीं क्यूं ये हमेशा अपने पापा को सावधान होने का संकेत देता है.” जैसे, “मैं नहीं, कोई खतरे की घड़ी आ गई हो.”
हमेशा की तरह मैंने इस बात को नजर अंदाज़ किया.
चीकू बोला ,”मेरे लिए क्या लाई हो मम्मी?” हर बार उसकी यही जिज्ञासा होती.
अरे। “हर बार क्यूं पूछते हो?” “मैं कोई विदेश यात्रा से आती हूं.” थकान अब तल्खी में बदल रही थी.
पतिदेव ने शायद इसे महसूस कर लिया था. वे कमरे से बाहर आये और माहौल की नज़ाकत को समझते हुए चिंटू को अंदर जाने का इशारा किया और सामान भीतर लेे जाने के लिए उठाने लगे. फिर अचानक जैसे उन्हें कुछ याद आया. वे  सहानुभूति जताते हुए बोले…अरे,,”तुम तो पार्लर गई थी ना?”
“क्या पार्लर बंद था?” ओह! “लगता है सारा समय घर की खरीदी में ही निकल गया.”

क्या इन्हें मेरा “ग्लो” नजर नहीं आ रहा? बाल भी तो ठीक कराए थे, क्या वो भी दिखाई नहीं पड़  रहे?
एक वो पार्लर वाली है जो बोल रही थी….”दीदी”, “आप अपने पर बिल्कुल ध्यान नहीं दे रही हो” “देखो तो कितनी ड्रायनेस आ गई है हाथों पर और बाल भी कितने हल्के होते जा रहे है”
“आप थोड़ा जल्दी जल्दी विजिट किया करे” सच में मेरा कितना ख्याल करती है, और इन्हें देखो, इतना कुछ करवा कर आने के बाद भी पूछ रहे है…”क्या पार्लर नहीं गई?”
हद है. दिनभर की थकान,  सबसे हुई बहस और पति की नज़र का दोष.एक धमाके का रूप ले चुका था. मैंने जोर से पांव पटके और धड़ाम से दरवाज़ा बंद किया और कहा..

“कभी तो मुझ पर ध्यान दीजिए, कभी तो फुरसत निकालिए” “क्या आपको कहीं भी?… कुछ?.. सुंदरता नजर आती है?” मैंने एक – एक शब्द पर ज़ोर देते हुए कहा “हर समय बस, ये अख़बार और टीवी”
“क्या बार बार वही न्यूज सुनते रहते हो””घर -बाहर का सारा काम कर करके मेरे चेहरे का ग्लो ही खत्म हो गया” ये देखो, बर्तन मांज – मांज कर मेरे हाथ कितने ड्राई हो गए है”

“ये नाखून तो जैसे सारे ही टूट गए है.” मैं  गुस्से में बोल रही थी.
आवाज़ से लग रहा था, बस रो ही पडूंगी, पर उनके सामने रोना अपनी बात को कमज़ोर बनाना था। मैं सीधे अपने कमरे में चली गई. अचानक एक छोटे से प्रश्न पर इतना भड़क जाना? उनकी कुछ समझ नहीं आ रहा था. पतिदेव ज्यादा बहस के मूड में नहीं  थे. चुपचाप सारा सामान रसोई में रख अख़बार उठा कर पढ़ने लगे.

कुछ देर बाद मैंने अपने कमरे का दरवाज़ा खोला। देखा रसोई में कुछ खुसुर – पुसुर हो रही थी.
चीकू की आवाज़ आ रही थी….”पापा आज बाहर से कुछ मंगवा  ले?”और पतिदेव बोल रहे थे..”यार चीकू मैगी ही बना लेते है।” “अब, मम्मी से कौन पता करे कि उन्हें क्या खाना है?”

अब मुझे अपने आप पर भी गुस्सा आने। आखिर इतना बवाल करने की क्या जरूरत थी.
मैंने रसोई में जाकर बिना प्यास के पानी पिया। बस टोह लेने के लिए कि क्या चल रहा है. फिर सपाट और संयमित स्वर में पूछा..”क्या खाओगे?” दोनों एक साथ बोल उठे…”खिचड़ी”
“ये तो कमाल हो गया, यार चीकू ” पापा ने बड़ी प्रशंसा भरी नज़रों से चीकू को शाबाशी दी और चीकू ने भी अपनी आंखे झपकाकर पापा को “टू गुड” कहा।  “वाह!”
“इतनी अंडरस्टैंडिंग” सच में कमाल ही है. जो खिचड़ी के नाम से ही बिदकते हो आज खुद खिचड़ी खाने के लिए कह रहे हैं. जो मैं अपनी थकान की स्थिति के विकल्प रूप में बनाती हूं. मैं मन ही मन मुस्कुराई पर स्वयं की प्रतिष्ठा के मद्देनजर चेहरा संजीदा ही बनाए रखा.

अब वे दोनों चुपचाप रसोई से बाहर निकल कर टेबल लगाने लगे. खाने के बाद के सारे काम निपटा कर जब मैं चीकू के कमरे में गई तो वो सो चुका था. आज इसे अकारण ही डांट दिया. बहुत बुरा लग रहा था. कॉमिक्स उसके हाथ से निकाल कर हौले से उसके बालों को सहलाया. बत्ती बंद कर  मैंने अपने कमरे की ओर रुख किया.

आश्चर्य है आज उनके हाथ में न अख़बार था न मोबाइल मुझे देख कर वे थोड़ा मुस्कराए मुझे थोड़ा अटपटा लगा. पता नहीं क्या बात है? मैं उनकी ओर पीठ घुमाकर  अपने ड्राई हाथों पर क्रीम मलने लगी. आज थोड़ी ज्यादा देर तक हाथों को क्रीम मलती रही. शायद उनके बुलाने का इंतजार कर रही थी. सोचे जा रही थी…”इतना धैर्य भी भला किस काम का? जो बोलने में भी इतना समय लगे।” मन में बोले गए वाक्य के पूरा होने की देर थी कि आवाज़ आई…”आओ!” “तुम्हें कुछ दिखाना है” ये हो क्या रहा है? शाम के खाने से लेकर अभी तक आश्चर्य ही आश्चर्य इतने आश्चर्य वाली धाराएं तो पहले कभी नहीं देखी.

मैं बिना कुछ कहे बैठ गई..वे अलमारी से एक बड़ा सा लिफाफा निकाल रहे थे. मैं सोच रहीं थीं, अभी न तो मेरा जन्मदिन है, न शादी की सालगिरह. फिर तोहफे लेने देने वाली परंपरा भी तो ज़रा कम ही है हमारे बीच.उन्होंने वो बड़ा सा लिफाफा मेरे सामने रख दिया. “ये क्या?”  “लिफाफा तो पुराना सा दिख रहा है” मुझे कुछ अजीब लगा.
मैंने धीरे से पूछा… ..
…..”क्या है इसमें ?”
“आज तुम पार्लर से आकर पूछ रही थी ना…. कि क्या मुझे  कहीं भी, किसी भी रूप में कुछ सुंदरता दिखाई देती है?”
“ये वही सुंदरता वाला लिफाफा है.”
वे एकदम शांत और संयत आवाज़ में बोले।

अब तो सच में, मैं आश्चर्य के समुद्र में गोते लगाने लगी।
देखो, अनु, “सुंदरता की सबकी अपनी परिभाषा होती है।” “सुंदरता देखने का सबका अपना अलग – अलग नज़रिया होता है।”
“किसी को तन की सुंदरता मोहित करती है, तो किसी को मन की, कोई स्वभाव की सुंदरता देखता है तो कोई भाषा की।”
“कोई  प्रकृति की सुंदरता में खो जाता है, तो किसी को खेत – खलिहान में काम करने वाले उन मेहनतकश मजदूर और उन पर लगी उस माटी की सुंदरता मोहित करती है।” “कोई रसोई में खाना बनाती उस गृहिणी और उसके माथे पर आने वालेे पसीने की बूंदों में सुंदरता देखता है, जिसमें परिवार के लिए स्नेह झलकता है, जो मैं तुममें भी अक्सर देखता हूं।” “मुझे तुम्हारा वो ग्लो ज्यादा अच्छा लगता है, तो इसमें मेरा क्या कसूर है?” वे बोलते जा रहे थे। मैं अपना सिर नीचे किए बस उन्हें सुन रही थी। आंखों में आंसू डबडबाने लगे थे।
तभी लिफाफे के खुलने की आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।
“ये देखो।” मैंने पनीली आंखों से देखा….”ये मां की बरसों पुरानी तस्वीर है।” मैंने देखा सासू मां की उस ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर को … एक सादी सी सुती साड़ी पहने, माथे पर बड़ी सी बिंदी, बालों की एक लंबी ढीली सी चोटी।इतनी सादगी और कितनी सुंदर। मैं मोहित हो कर देखने लगी। सचमुच सुंदर।
फिर निकली एक बड़ी सी राखी जो बचपन में बहन ने बांधी थी। उस समय वो कलाई से भी काफी बड़ी रही होगी। मुझे अपने भाई की याद गई वो भी तो ऐसी ही बड़ी सी राखी बंधवाता था और फिर सारे मोहल्ले को दिखता था। उसे याद कर मैं धीरे से हंस पड़ी।
फिर निकली एक पुरानी सी कैसेट जिसमें मेरी नानी के गाए भजन और उनके साथ की गई बातचीत की पर्ची लगी हुई थी।
पिताजी जी के साथ देखी गई फिल्म का पोस्टर। सचमुच कमाल।
हमारी पहली यात्रा के टिकिट, चीकू की पहली पेंटिंग वाला कागज़। सारी चीजे इतने जतन से संभाली हुई।
अब तो मेरी बहुत कोशिश से रोकी हुई रुलाई फूट पड़ी।
“देखो अनु,” “मैं तुम्हारा दिल दुखना हरगिज़ नहीं चाहता।” “पार्लर जाना कोई बुरी बात नहीं है।” “न ही मैंने तुम्हें कभी रोका है।”
“अपने आप को अच्छा रखना और लगना कोई गुनाह नहीं है।”
“दरसअल, हमें जो अच्छा लगता है, हम चाहते है सामने वाले को भी वो, उसी रूप में अच्छा लगे और वो उसकी तारीफ करे,पर ऐसा हर बार जरूरी तो नहीं।”
“उसकी अपनी सोच हमसे अलग भी तो हो सकती है।”
“मुझे लगता है, जब हम सुंदरता का कोई रूप देख कर खुश होते है,तो आपकी आंतरिक खुशी  चेहरे पर अपने आप आ जाती है।”
उस खुशी से चेहरा दमकने लगता है। शायद तभी चेहरे को दर्पण कहा   जाता है। बिना बोले ही कितनी बातें कह जाता है।
“मेरा अपना सुंदरता का क्या नज़रिया है, वो मैंने तुम्हें बता दिया।”
“मेरा तुम्हारा मन दुखाने का कभी भी कोई मकसद नहीं होता।”  एक गहरे निःश्वास के साथ वे चुप हो गए।

उस दिन मैं एक नए संवेदनशील इंसान से मिली।अब मेरी आंखों में खुशी के आंसू झिलमिला रहे थे। सुंदरता की ऐसी परिभाषा तो शायद मैंने पहले कभी सोची ही नहीं।आज कुछ अलग सा महसूस किया था। सच,एक नया अर्थ समझ आया था.
मुझे लगा जैसे आज संवेदनाओं की कितनी उलझने सुलझ गई थी।
दूर बादलों की ओट से चांद बाहर निकल रहा था। ठीक मेरे मन की तरह। शिकवे- शिकायतों के सारे काले बादल शांत, श्वेत चांदनी में बदल गए थे। खिड़की से झांकती चांदनी मुस्कुरा रही थी।
हम दोनों खामोश थे।बस आंखें बोल रही थी।
मैंने उनकी ओर देखा और  झूठ – मूठ का गुस्सा दिखाते हुए कहा… चलिए, “अब सो जाइए। कल सुबह मुझे आलू के परांठे भी बनाने है।”
“वाकई। तुम्हारे आलू परांठे होते बहुत सुंदर है।” पतिदेव एक शरारती मुस्कान लिए बोले।
देखा नहीं? “उन्हें देखते ही मेरे और चीकू के चेहरे पर कितना “ग्लो”~~ आ जाता है।”
हम दोनों खिलखिला कर हंस पड़े। Family Story In Hindi 

Government of India : सरकार, स्लम और बुल्डोजर

Government of India : कुछ सालों से कोर्ट्स लगातार कह रही हैं कि सरकारी जमीन पर घर बनाने वालों को सिर्फ इसलिए परमानैंट रहने का अधिकार नहीं मिल जाता कि वे वहां वर्षों से रह रहे हैं, उन के पास बिजली के कनैक्शन हैं, बस्ती में पानी का नल है, आधारकार्ड या पैनकार्ड हैं, बच्चों के स्कूल पास में हैं आदि. दिल्ली की सत्ता में नई आई भारतीय जनता पार्टी, चूंकि अगले चुनाव होने में काफी समय है इसलिए, भयंकर तोड़फोड़ कर रही है. वह मुख्यतया मुसलिम बस्तियों को नष्ट कर रही है हालांकि साथसाथ हिंदुओं की भी कुछ बस्तियों का सफाया हो रहा है. इसी कारण मामले कोर्ट में दायर किए जा रहे हैं.

हर शहर में बनी स्लम बस्ती असल में शहर का लेती कम है, शहरियों को देती ज्यादा है. सरकारी मुफ्त की जमीन पर बनी झुग्गियों को शुरू में सिर्फ तिरपाल बांध कर बसाया जाता है. धीरेधीरे हर घर 50 फुट से बढ़ कर 500 फुट तक का ही नहीं हो जाता बल्कि कुछ 2-3 मंजिलों तक हो जाते हैं. पास का कोई नाला इन लोगों का सीवर बन जाता है. चूंकि इन्हें मकान का किराया कम देना होता है, ये लोग शहरियों को सस्ते में सेवाएं देते रहते हैं. शहरी इन स्लमों को देख कर नाकभौं चढ़ाते हैं पर अगर यहां के कामगार उन शहरियों जैसे पक्के मकानों का किराया देने लगें तो उन के वेतन तीनगुना बढ़ जाएंगे.

शहरों के विकास में स्लमों का बड़ा योगदान है और ऐसा दुनिया के हर बड़े शहर में हुआ है. हर शहर में स्लम हैं जो सरकारी जमीन पर ही बनाए गए हैं.

कुछ शहरों में किसानों ने बिना शहरी अधिकारियों की अनुमति के अपनी जमीन पर मकान बना लिए हैं, इन्हें भी अधिकारी तोड़ते रहते हैं. लेकिन चूंकि यह जमीन सरकारी नहीं होती, इसलिए अफसरों के हाथ बंधे होते हैं.

भारत में 1950 के आसपास लैंड एक्विजिशन एक्ट के अंतर्गत शहरों के चारों ओर किसानों की जमीनें कौडि़यों के भावों में खरीद कर वहां ऊंचे लोगों के लिए बस्तियां बसाई गईं और तब सरकारों ने आज के दामों में खरबों बनाए थे. इस पर शायद ही किसी कोर्ट ने आपत्ति की थी क्योंकि तब किसानों की जमीन का बाजार भाव भी कोई ज्यादा नहीं था. अब स्थिति बदल चुकी है. जिन जमीनों को सरकारों ने 1950 के दशक में जबरन लिया था उन में से कुछ जमीनों पर बने घर तो रैगुलर बस्तियां बन गईं पर कुछ पर स्लम उग आए हैं जिन्हें अब देशभर में उखाड़ा जा रहा है.

सोनिया गांधी ने 2005 में और 2013 में लैंड एक्विजिशन कानूनों में बदलाव कर के मुआवजे में मोटी रकम देनी शुरू की तो यह सरकारी धांधली रुकी. पर जहां कब्जा हो चुका है, वहां से लोगों को निकालना टेढ़ी खीर है और कोई राजनीतिक दल इस जलती खीर को निगलना नहीं चाहता. भाजपा यह कदम उठा रही है तो सिर्फ इसलिए कि वह ज्यादातर यह काम मुसलिमबहुल बस्तियों में कर रही है.

सरकारी या निजी जमीन पर बिना सरकारी अनुमति के मकान बनाने की छूट का समर्थन नहीं किया जा सकता पर यह नहीं भूलना चाहिए कि घरों और फैक्ट्रियों के मजदूर, डिलीवरी बौय, सफाई करने वाली मेड्स, बढ़ई, मिस्त्री, माली, चौकीदार इन्हीं बस्तियों में रहते हैं. उन्हें गांवों में इतनी सुविधाएं भी नहीं मिलतीं, इसलिए वे स्लमों में रहते हैं. ऐसे में उन्हें उखाड़ना शहर का उस डाल पर कुल्हाड़ी मारना है जिस पर शहर खुद बैठा है.

अंगरेजों के जमाने में मुंबई और अहमदाबाद जैसे शहरों में मिलों में ही रिहायशी मकान भी बनाए जाते थे. यही परंपरा फिर शुरू करनी होगी. यह कैसे होगी, कैसे किस के हक होंगे, यह तय करना होगा. सरकारी जमीन पर जबरन कब्जा मंजूर नहीं है पर इन लोगों को उखाड़ते ही शहर ठप हो जाएंगे.

S Jaishankar : विदेश मंत्री या विदेश सचिव

S Jaishankar : विश्वगुरु का दम भरने वाले भारत की विदेश नीति आजकल उसी तरह गड्ढे में है जैसी देशी आर्थिक प्रगति और रोजगारों की नीतियां हैं. भारत सरकार का असल ध्यान धर्मकर्म में है, विदेश नीति, आर्थिक मामलों, शिक्षा, अनुशासन में नहीं.

जो चमक नरेंद्र मोदी के प्रथम शासनाकाल में आई थी वह भारतीय मूल के विदेशों में बसे ऊंची जातियों के नागरिकों के अपने देशों की सरकारों पर बनाए दबाव के कारण आई थी. लेकिन अब इस ‘महान’ भारत की पोल खुल गई है कि 5वीं से चौथी बनी अर्थव्यवस्था प्रतिव्यक्ति आय में नीचे से 20 के अंदर है. अर्थव्यवस्था की थोड़ीबहुत जो धौंस है वह सैन्य या उपभोक्ता सामान की खरीद के कारण है.

अब विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों का भारत सरकार से मोह भंग हो गया है क्योंकि हर गोरों के देश में भूरों, कालों, बाहरियों को शक से देखा जाने लगा है. भारतीय मूल के लोग अब अपने नए देशों में ज्यादा लाइमलाइट में नहीं आना चाहते और वहां अब भारत सरकार की वकालत वे कम कर रहे हैं.

नरेंद्र मोदी जी-7 की मीटिंग के लिए न सिर्फ बहुत देर से बुलाए गए बल्कि वहां अमेरिकी राष्ट्रपति उन से मिले बिना वाशिंगटन चले गए और भारत के विरोध के बावजूद कहते रहे कि उन्होंने ही भारत-पाक युद्ध रुकवाया. भारत में लोग इस मूड में थे कि सिंदूर औपरेशन के बहाने पाकिस्तान की कमर तोड़ दी जाए पर युद्ध बिना लाहौर, कराची पर कब्जा किए खत्म हो गया तो देश के भारतीय भी और विदेशों में बसे भारतीय भी मुंह लटका कर बैठ गए हैं. उन की पैरवी अब कम हो गई है क्योंकि वे जानते हैं कि अब चलनी तो अमेरिका और चीन की ही है चाहे हमारी अर्थव्यवस्था आबादी के कारण कितनी ही बड़ी क्यों न हो या हो जाए.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के फील्डमार्शल आसिम मुनीर के साथ प्रैस की गैरमौजूदगी में जो लंच कैबिनटरूम में किया, उस से साफ है कि ट्रंप, जिन के लिए मोदी ने 2019 में अहमदाबाद में ‘एक बार फिर ट्रंप सरकार’ के नारे लगवाए थे, मोदी या भारत को खास भाव नहीं दे रहे. ट्रंप के लिए भारत दूसरे देशों की तरह का ही है.

भारत ने औपरेशन सिंदूर के लिए छोटेछोटे देशों में सांसदों के जो प्रतिनिधिमंडल भेजे थे वे हैलोहाय कर और केकपेस्ट्री खा कर लौट आए हैं. उन्होंने कुछ खास पाया हो, ऐसा उन के बयानों से स्पष्ट नहीं हुआ. ये सांसद सरकारी खर्च पर देशों की सैर कर आए.

भारत का प्रतिद्वंद्वी असल में चीन है पर भारत अपने से कहीं छोटे पाकिस्तान का राग आलापता रहता है और हमारी विदेश नीति, जनता में चल रहे नैरेटिव के अनुसार, पाकिस्तान को केंद्र में रख रही. हमें तो चीन से सबक लेना है, चीन के बराबर रहना है, चीन जैसा बनना है. हमारी आंतरिक और विदेशी बातें हिंदूमुसलिम करने के कारण पाकिस्तान तक ही सीमित हैं और 11 साल बाद अब यह नीति बेकार हो गई है. पाकिस्तान के प्रति दुनिया के किसी देश में रुचि नहीं रह गई है क्योंकि सब ने अब अफगानिस्तान को अपने हाल पर छोड़ दिया है.

1990 तक भारत के बराबर रहा चीन आज दुनियाभर में धौंस जमा सकता है क्योंकि उस ने शिक्षा पर ध्यान दिया, देश की सड़कों पर ध्यान दिया, बराबरी पर ध्यान दिया जबकि धार्मिक बरबादी नहीं होने दी. आज दुनिया चीनी इशारों पर चल रही है. भारत की कोई जगह नहीं है. हमारे बौने विदेश मंत्री ने रहीसही कसर पूरी कर दी है क्योंकि वे, दरअसल, जननेता नहीं, सिर्फ अफसर हैं. वहीं, सभी देशों में विदेश मंत्री आमतौर पर राजनीति से जुड़ा व्यक्ति होता है जिस से उस का वजन भी होता है. हमारे विदेश मंत्री का दुनिया के दूसरे देशों में विदेश सचिव जैसा रुतबा मात्र है जो हर बात को बौस से एप्रूव कराएगा. यह एक बड़ी खराबी है.

Donald Trump : अमेरिकी-अमेरिकी में खाई 

Donald Trump : अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की खब्ती नीतियां पूरे देश में ऐसा वायरस उगा रही हैं जिस से अमेरिका 10-15 सालों में थर्ड वर्ल्ड कंट्री बन जाए तो बड़ी बात नहीं. जैसे भारत में हिंदू मुसलमान कर के समाज को 2 हिस्सों में बांट दिया गया है कुछ वैसे ही ट्रंप ने अमेरिका में लोगों को बांट डाला है. दूसरी बार सत्ता में आने के बाद ट्रंप ने अवैध घुसपैठियों को पकड़ने के लिए भारी हथियार लिए, बुलेटप्रूफ वरदी पहने, मास्क लगाए अर्धसैनिकों को कैलिफोर्निया के लौस एंजेल्स में भेज दिया जिस से वहां के स्थानीय लोग उबल पड़े.

यह न सिर्फ जनता की इच्छा जाने बिना किया गया बल्कि वहां के चुने हुए गवर्नर को भी बताए बिना किया गया. वाशिंगटन की पुलिस को राज्य की पुलिस का कोई सहयोग नहीं मिला और अब इस खूबसूरत शहर में दंगों, आगजनी, गिरफ्तारियों, जुलूसों, धरनों, हाथापाई का दौर चल रहा है जहां का हौलीवुड सारी दुनिया में जाना जाता है.

घुसपैठिए अमेरिका का भला ही कर रहे हैं, बुरा नहीं. ये गरीब, अनपढ़अधपढ़, छोटे काम करने वाले सौदोसौ डौलर महीना कमाने के लिए हजारों डौलर खर्च कर के खुशहाल देश अमेरिका में आए थे पर अब ट्रंप प्रशासन द्वारा उन्हें खलनायक बना डाला गया है व जंजीरों में बांध कर मवेशियों की तरह गाडि़यों में ठूंसा जा रहा है. उन्हें कईकई दिनों तक भूखा रखा जा रहा है. उन के साथ वही बरताव हो रहा है जो 400 साल पहले अफ्रीका से काले गुलामों को यूरोपीय बंदूकों के बल पर जहाजों में भर अमेरिका लाने के लिए किया गया था.

आधे से ज्यादा अमेरिकी इस से सहमत नहीं पर ये वे अमेरिकी हैं जो पढ़ेलिखे हैं और सड़कों पर एक बेवकूफ नेता के नाम पर नारे नहीं लगा सकते. रेड हैट पहने मागा (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) एक तरह का संप्रदाय बन गया है जो जरमनी के नाजियों की तरह अमेरिका को शुद्ध गोरे ईसाइयों का देश बनाना चाहता है. शिक्षित अमेरिकी समझते हैं कि अमेरिका ने हर तरह के लोगों का खुल कर स्वागत किया था. बहुतों को तो अपने यूरोपीय जन्म का इतिहास भी नहीं मालूम.

यही कट्टर लोग अब, सिर्फ चर्च के कहने पर, अमेरिकी-अमेरिकी में खाई पैदा कर रहे हैं. वे बहाना यह कर रहे हैं कि पुलिस उन्हें ही पकड़ रही है जो बिना कागजों के अमेरिका में रह रहे हैं. असल में निशाना हर गैरगोरा है, वे काले भी हैं जो 400 साल पहले आए थे. उन्हें यह कह कर डराया जा रहा है कि अगर उन्होंने बाद में अपनी मरजी से आए लोगों का साथ दिया, तो उन की खैर नहीं.

लौस एंजेल्स के निवासी इस बात को समझ रहे हैं और हर कदम पर ट्रंप की बिगड़ैल फोर्स का विरोध कर रहे हैं. वे उन गोरों का विरोध कर रहे हैं जो अनर्गल झुठ फैला रहे हैं कि ये लोग अपराधी हैं, जुर्म करते हैं, पालतू कुत्तेबिल्लियां खा जाते हैं, सड़कों पर लूट के लिए जिम्मेदार हैं वगैरह.

आंकड़े बताते हैं कि गोरों और गैरगोरों के अपराधी होने में फर्क नहीं. फर्क इतना है कि अदालतें गोरों को बरी कर देती हैं, गैरगोरों को लंबी सजा दे देती हैं. अदालतों में जज, वकील, जूरी चाहे गैरगोरे हों लेकिन वे अपने को गोरों के एहसान तले होना दर्शाते हुए पकड़े गए अपराधी को उस की स्किन के रंग से ही उसे वास्तविक अपराधी करार दे देते हैं.

लौस एंजेल्स के बाद ऐसे प्रदर्शन अमेरिकाभर में हो रहे हैं. वे जुलाई, जो अमेरिका का स्वंत्रता दिवस है, को भी हुए. अगर ये ट्रंप के अमेरिका के नष्ट होने से बचा सकें तो बड़ी बात होगी वरना अमेरिका भी ईरान, उत्तरी कोरिया और अफगानिस्तान की तरह ‘महान’ बनेगा, इस में शक नहीं.

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