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Future Concerns : मैं अपने भविष्य को ले कर चिंतित हूं, मेरी उम्र 47 वर्ष है

Future Concerns : सिंगल पेरैंट हूं. 2 छोटे बच्चे हैं, जिन की देखभाल मां करती है क्योंकि पत्नी की एक ऐक्सिडैंट में मृत्यु हो गई. हाल ही में मेरी एक महिला मित्र से गहरी दोस्ती हुई है. हम मिलते हैं, अपनी फीलिंग्स शेयर करते हैं. मैंटली, फिजिकली हम एकदूसरे से जुड़ गए हैं. वह सिंगल मदर है. उस की अपनी फैमिली है. अभी तो सब ठीक चल रहा है लेकिन कभीकभी मैं परेशान हो जाता हूं कि हमारा भविष्य क्या होगा? आप मुझे इस असमंजस की स्थिति से उबारें?

जवाब : आप और आप की महिला मित्र दोनों के बीच एक सहज और समझदारी भरा रिश्ता है. आप एकदूसरे के साथ भावनात्मक व शारीरिक रूप से जुड़े हैं. यह रिश्ता आप को सुख और सहारा देता है.

आप इस रिश्ते से खुश हैं, लेकिन भविष्य की अनिश्चितता आप को परेशान कर रही है. अपनी महिला मित्र के साथ इस रिश्ते के भविष्य के बारे में खुल कर बात करें, पूछें कि वे इस रिश्ते को कैसे देखती हैं. क्या यह केवल दोस्ती और सहारा है या वे भी इसे और गंभीरता से लेना चाहती हैं? यह बातचीत बिना किसी दबाव के, ईमानदारी और सम्मान के साथ होनी चाहिए. उदाहरण के लिए, आप कह सकते हैं, ‘हम दोनों एकदूसरे के साथ बहुत अच्छा समय बिताते हैं और मैं इस रिश्ते को बहुत महत्त्व देता हूं. मैं बस यह समझना चाहता हूं कि तुम इसे भविष्य में कैसे देखती हो.’ उन की अपेक्षाएं, डर और इच्छाएं समझने से आप को स्पष्टता मिलेगी.

आप के बच्चे छोटे हैं और आप की पत्नी के देहांत के बाद आप उन की सब से बड़ी ताकत हैं. कोई भी निर्णय लेने से पहले विचार करें कि यह उन के जीवन, भावनाओं और भविष्य पर क्या प्रभाव डालेगा. अगर यह रिश्ता गंभीर दिशा में जाता है (जैसे कि विवाह या साथ रहना), तो आप दोनों सिंगल पेरैंट्स हैं. आप दोनों की प्राथमिक जिम्मेदारी अपने बच्चों की है. बच्चों की परवरिश, उन की भावनाएं और उन की जरूरतें आप के निर्णयों को प्रभावित करेंगी.

बच्चों को धीरेधीरे इस बदलाव के लिए तैयार करना होगा. उन की भावनाएं और सहमति महत्त्वपूर्ण होगी. आप की महिला मित्र के बच्चे भी इस समीकरण का हिस्सा हैं. दोनों परिवारों के बच्चों के बीच तालमेल और स्वीकार्यता पर ध्यान देना होगा. अपनेआप से पूछें कि आप इस रिश्ते से क्या चाहते हैं. क्या आप केवल एक साथी की तलाश में हैं जो आप को भावनात्मक और शारीरिक सहारा दे या आप एक दीर्घकालिक रिश्ते (जैसे विवाह) की ओर बढ़ना चाहते हैं? अगर आप केवल दोस्ती और सहारे से खुश हैं तो इसे वैसे ही स्वीकार करें और भविष्य की चिंता को कम करें.

लेकिन सुनिश्चित करें कि आप दोनों की अपेक्षाएं एकजैसी हों, ताकि बाद में कोई गलतफहमी न हो. आप दोनों सिंगल पेरैंट्स हैं और आप की जिम्मेदारियां बहुत हैं. हो सकता है कि आप का रिश्ता पारंपरिक विवाह की तरह न हो जो ठीक भी है. अगर आप दोनों एकदूसरे के साथ खुश हैं और आप की जिम्मेदारियां पूरी हो रही हैं तो इसे जटिल बनाने की जरूरत नहीं है. भविष्य की अनिश्चितता को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं है. इसलिए वर्तमान में खुश रहने पर ध्यान दें.

अगर आप को लगता है कि यह रिश्ता आप के भविष्य के लिए उपयुक्त नहीं है या यह आप के बच्चों के लिए जटिलताएं पैदा कर सकता है तो आप इसे केवल दोस्ती तक सीमित कर सकते हैं.

यह रिश्ता आप को सहारा दे रहा है, लेकिन आप इस रिश्ते पर पूरी तरह निर्भर न हों. अपनी खुशी के लिए अन्य रास्ते भी तलाशें, जैसे दोस्तों के साथ समय बिताना, शौक पूरे करना या बच्चों के साथ क्वालिटी टाइम बिताना. अगर आप बहुत ज्यादा असमंजस में हैं तो किसी विश्वसनीय दोस्त, परिवार के सदस्य या काउंसलर से बात करें.

Parenting Tips : मैं शादी के 13 साल बाद मां बनी हूं, बच्चा 2 महीने का है

Parenting Tips : मैं उसे ले कर हमेशा डरी रहती हूं कि कहीं उसे कुछ हो न जाए. रूटीन इंजैक्शन के बाद उसे बुखार भी आ जाता है तो भी चिंतित रहती हूं. उस को किसी को देते हुए घबराती हूं. पति समझते हैं मैं ज्यादा पजेसिव हो रही हूं बच्चे को ले कर. लेकिन मैं अपनेआप को समझ नहीं पा रही. क्या करूं?

जवाब : 13 साल के लंबे इंतजार के बाद मां बनने से बच्चे के प्रति बेइंतहा प्यार होने के साथ आप का चिंतित होना स्वाभाविक है लेकिन एक हद तक. आप को अपने मन को शांत और स्थिति को बेहतर बनाने की जरूरत है ताकि आप सब एक संतुलित और खुशहाल जीवन जी सकें.

अपने पति या परिवार के अन्य सदस्यों को बच्चे की देखभाल में शामिल करें. शुरू में 10-15 मिनट के लिए, फिर धीरेधीरे समय बढ़ाएं. इस से आप को थोड़ा आराम मिलेगा और आप का डर भी कम होगा कि केवल आप ही बच्चे की जिम्मेदारी ले सकती हैं. इस दौरान खुद को किसी और काम में व्यस्त रखें.

बच्चे को लगने वाले इंजैक्शन लगवाते वक्त डाक्टर से बात करें कि किन स्थितियों में चिंता करनी चाहिए और किन में नहीं.

अगर संभव हो तो अपनी जैसी मदर्स से मिलें. उन के अनुभव सुनने से आप को लगेगा कि आप अकेली नहीं हैं जो ऐसी भावनाओं से गुजर रही हैं. बच्चे की देखभाल में पति का साथ लें. पति की समझ और सहयोग से आप का आत्मविश्वास बढ़ेगा.

इस बात को समझें कि बच्चे को भी आप की खुशी और मानसिक शांति की जरूरत है. अपने डाक्टर से भी इस बारे में बात कर सकती हैं, सही दिशा में मार्गदर्शन मिल सकता है.

अपनी समस्‍याओं को इस नंबर पर 8588843415 लिख कर भेजें, हम उसे सुलझाने की कोशिश करेंगे.

Online Hindi story : मेरे बेटे की गर्लफ्रैंड – राहुल को हर समय क्यों रहती थी स्वाति की चिंता?

Online Hindi story : बेटे राहुल के स्वभाव में मुझे कुछ बदलाव साफ दिखाई दे रहे थे, ये बदलाव तो प्राकृतिक थे इसलिए इस में कुछ हैरानी की बात नहीं थी और जब राहुल के 14वें जन्मदिन पर मैं ने घर पर उस के दोस्तों के लिए पार्टी रखी तो उस के ग्रुप में पहली बार 2-3 लड़कियां आईं. विजय मेरे कान में फुसफुसाए, ‘अरे वाह, बधाई हो, तुम्हारा लड़का जवान हो गया है.’ मैं ने उन्हें घूरा फिर मुसकरा दी. मुझे उन लड़कियों को देख कर अच्छा लगा. छोटी सी बच्चियां कोने में बैठ गईं, मैं ने उन्हें दिल से अटैंड किया. लड़के- लड़कियां आजकल साथ पढ़ते हैं, साथ खेलते हैं, मैं उन की दोस्ती को बुरा भी नहीं मानती.

उन तीनों में से 1 लड़की स्वाति कुछ ज्यादा ही संकोच में बैठी थी. बाकी 2 मुझे देख कर मुसकराती रहीं, दोचार बातें भी कीं, लेकिन स्वाति ने मुझ से नजरें भी नहीं मिलाईं तो मुझे बहुत अजीब सा लगा. मैं ने अपनी 17 वर्षीया बेटी स्नेहा से कहा भी, ‘‘यह लड़की इतना शरमा क्यों रही है?’’

स्नेहा बोली, ‘‘अरे मम्मी, छोड़ो भी, इतने बच्चों में 1 लड़की के व्यवहार पर इतना क्यों सोच रही हैं?’’ मेरी तसल्ली नहीं हुई. मैं ने विजय से कहा, ‘‘वह लड़की तो कुछ भी नहीं खा रही है, बहुत संकोच कर रही है, सब बच्चों को देखो, कितनी मस्ती कर रहे हैं.’’

विजय ने कहा, ‘‘हां, कुछ ज्यादा ही चुप है. खैर, छोड़ो, बाकी बच्चे तो मस्त हैं न.’’

राहुल ने केक काटा तो हमें खिलाने के बाद उस की नजरें सीधे स्वाति पर गईं तो मैं ने राहुल की मुसकराहट में एक पल के लिए कुछ नई सी बात नोट की, मां हूं उस की लेकिन किसी से कुछ कहने की बात नहीं थी. खैर, कुछ गेम्स फिर डिनर के बाद बच्चे खुशीखुशी अपने घर चले गए. मैं ने बाद में राहुल से पूछा, ‘‘सिया और रश्मि तो सब से अच्छी तरह बात कर रही थीं, यह स्वाति क्यों इतना शरमा रही थी?’’

राहुल मुसकराया, ‘‘हां, उसे शरम आ रही थी.’’

‘‘क्यों? शरमाने की क्या बात थी?’’

‘‘अरे मम्मी, हमारे सब दोस्त हम दोनों का साथ नाम ले कर खूब चिढ़ाते हैं न.’’

मैं चौंकी, ‘‘क्या? क्यों चिढ़ाते हैं?’’

‘‘अरे, आप को भी न हर बात समझा कर बतानी पड़ती है मम्मी. सब दोस्त एकदूसरे को किसी न किसी लड़की का नाम ले कर छेड़ते हैं.’’ मैं अपने युवा होते बेटे के समझाने के इतने स्पष्ट ढंग पर कुछ हैरान सी हुई, फिर मैं ने कहा, ‘‘यह कोई उम्र है इन मजाकों की, पढ़नेलिखने, खेलने की उम्र है.’’

‘‘लीव इट, मम्मी, आप हर बात को इतना सीरियसली क्यों लेती हैं…सभी ऐसी बातें करते हैं.’’

फिर मैं ने आने वाले दिनों में नोट किया कि राहुल का फोन पर बात करना बढ़ गया है. कई बार मैं उठाती तो फोन काट दिया जाता था, फिर राहुल के उठाने पर बात होती रहती थी. मेरे पूछने पर राहुल साफ बताता कि स्वाति का फोन है. मैं कहती, ‘‘इतनी क्या बात करनी होती है तुम दोनों को.’’

राहुल नाराज हो जाता, ‘‘मेरी फ्रैंड है, क्या मैं उस से बात नहीं कर सकता?’’ धीरेधीरे यह सब बढ़ता ही जा रहा था.

स्वाति हमारी ही सोसायटी में रहती थी. उस के मम्मीपापा दोनों नौकरीपेशा थे. मैं उन से कभी नहीं मिली थी. राहुल और स्वाति एक ही स्कूल में थे, एक ही बस में जाते थे. दोनों के शौक भी एक जैसे थे. राहुल अपने स्कूल की फुटबाल टीम का बहुत अच्छा प्लेयर था और स्वाति उस के हर मैच में उस का साहस बढ़ाने के लिए उपस्थित रहती. मैं विजय से कहती, ‘‘कुछ ज्यादा ही हो रहा है दोनों का.’’ विजय कहते, ‘‘तुम यह सब नहीं रोक पाओगी. अब तो उस की ऐसी उम्र भी नहीं है कि ज्यादा डांटडपट की जाए.’’

अब तक हमेशा 90 प्रतिशत से ऊपर अंक लाने वाला मेरा बेटा कहीं पढ़ाई में न पिछड़ जाए, इस बात की मुझे ज्यादा चिंता रहती. मैं रातदिन अब राहुल की हरकतों पर नजर रखती और महसूस करती कि मैं किसी भी तरह राहुल और स्वाति को एकदूसरे से मिलने से रोक ही नहीं सकती, सारा दिन तो साथ रहते थे दोनों. कुछ और समय बीता. राहुल और स्वाति दोनों ने 10वीं की बोर्ड की परीक्षाओं में 85 प्रतिशत अंक प्राप्त किए तो मेरी खुशी का ठिकाना न रहा.

विजय कहते, ‘‘देखा? इतने दिन तुम अपना खून जलाती रहीं, पढ़ाई तो दोनों ने अच्छी की.’’

मैं कुछ कह नहीं पाई. राहुल को हम ने गिफ्ट में एक मोबाइल फोन ले दिया तो वह बहुत खुश हुआ, कई दिनों से कह रहा था कि उसे फोन चाहिए. फिर मैं ने ही धीरेधीरे अपने मन को समझा लिया कि स्वाति राहुल की गर्लफ्रैंड है और मैं उसे कुछ नहीं कह सकती. सांवली सी, पतलीदुबली स्वाति महाराष्ट्रियन थी, हम उत्तर भारतीय कायस्थ. वह मुझ से अब भी कतराती थी. एक ही सोसायटी थी, कई बार सामना होता तो वह नजरें चुरा लेती. मुझे गुस्सा आता. राहुल से कहती, ‘‘और भी तो लड़कियां हैं, सब हायहलो करती हैं और इस लड़की को इतनी भी तमीज नहीं कि कभी विश कर दे.’’

राहुल तुरंत उस की साइड लेता, ‘‘वह आप से डरती है, मम्मी.’’

‘‘क्यों? क्या मैं उसे कुछ कहती हूं?’’

‘‘नहीं, मैं ने उसे बताया है कि आप को उस की और मेरी दोस्ती के बारे में पता है और आप को यह सब बिलकुल पसंद नहीं है.’’

मैं कहती, ‘‘दोस्ती को मैं थोड़े ही बुरा समझती हूं लेकिन हद से बाहर कुछ दिखता है तो गुस्सा तो आता ही है. सब खबर है मुझे.’’

राहुल पैर पटकता चला जाता. कुछ समय और बीता, दोनों की 12वीं भी हो गई. इस बार राहुल के 91 प्रतिशत और स्वाति के 93 प्रतिशत अंक आए. हम सब बहुत खुश थे. अब राहुल ने कौमर्स ली, स्वाति ने साइंस. अब तो कई मेरी करीबी सहेलियां सोसायटी के गार्डन में सैर करते हुए स्वाति को आतेजाते देख कर मुझे कोहनी मारतीं, ‘‘देख, तेरे बेटे की गर्लफैं्रड जा रही है.’’ मैं ऊपर से मुसकरा देती और दिल ही दिल में सोचती, इस का मतलब अच्छे- खासे मशहूर हैं दोनों. मुझे अच्छी तरह पता चल गया था कि दोनों एकदूसरे को बहुत सीरियसली लेते हैं. अब मैं ही विजय से कहती, ‘‘बचपन से ये दोनों साथ हैं, मुझे तो लगता है अपने पैरों पर खड़ा होने पर ये विवाह भी करेंगे.’’

विजय मेरी इतनी गंभीरता से कही गई बात को हलकेफुलके ढंग से लेते और हंस कर कहते, ‘‘वाह, क्या हमारे घर में महाराष्ट्रियन बहू आ रही है? क्या बुराई है?’’ अब तो मैं भी मानसिक रूप से उसे बहू के रूप में देखने के लिए तैयार हो गई थी. मन ही मन कई बातें उस के बारे में सोचती रहती. स्नेहा कभी अपनी टिप्पणी देती, कभी चुपचाप हमारी बात सुनती. वह भी हमें राहुल और स्वाति की कई बातें बताती रहती.

वक्त अपनी रफ्तार से चल रहा था. राहुल का यहीं मुंबई में ऐडमिशन हुआ, स्वाति का कोटा में. मैं सोचती अब तो बस फोन ही माध्यम होगा इन की बातचीत का. स्वाति कोटा चली गई. राहुल कई दिन चुप व गंभीर सा रहा. फोन पर बात कर रहा होता तो मैं समझ जाती उधर कौन है. वह कई बार फोन पर दोस्तों से बात करता लेकिन जब वह स्वाति से बात करता तो उस के बिना बताए मैं उस के चेहरे के भावों से समझ जाती कि उधर स्वाति है फोन पर.

अब राहुल बीकौम के साथसाथ सीए भी कर रहा था. मैं ने आश्चर्यजनक रूप से एक बड़ा परिवर्तन महसूस किया. अब किसी अवनि के फोन आने लगे थे. राहुल की बातों से पता चला कि उस की क्लासफैलो अवनि उस की खास दोस्त है. 1-2 बार वह उसे किसी प्रोजैक्ट की तैयारी के लिए 2-3 दोस्तों के साथ घर भी लाया. उन की दोस्ती साधारण दोस्ती से हट कर लगी. अवनि ने मुझ से पूरे कौन्फिडैंस से बात की, किचन में मेरा हाथ बंटाने भी आ गई. वह साउथइंडियन थी, स्मार्ट थी. जब तक घर में रही, राहुलराहुल करती रही. मैं चुपचाप उस की भावभंगिमाओं का निरीक्षण करती रही और इस नतीजे पर पहुंची कि जो संबंध अब तक राहुल का स्वाति से था, वही आज अवनि से है.

मुझे मन ही मन राहुल पर गुस्सा आने लगा कि यह क्या तमाशा है, कभी किसी लड़की से इतनी दोस्ती तो कभी किसी और से. वह अवनि के साथ फोन पर गप्पें मारता रहता. मैं ने 1-2 बार पूछ ही लिया, ‘‘स्वाति कैसी है?’’‘‘ठीक है, क्यों?’’‘‘उस से बात तो होती रहती होगी?’’‘‘हां, कभी फ्री होता हूं तो बात हो जाती है, वह भी बिजी है, मैं भी.’’मैं ने मन ही मन सोचा, ‘हां, मुझे पता है तुम कहां बिजी हो.’मैं ने इतना ही कहा, ‘‘तुम्हारी तो वह अच्छी फ्रैंड है न, उस के लिए तो टाइम मिल ही जाता होगा.’’

वह झुंझला गया, ‘‘तो क्या उस से रोज बात करता रहूं? और रोजरोज कोई क्या बात करे.’’मैं हैरान उस का मुंह देखती रह गई और वह पैर पटकता वहां से चला गया.अब राहुल पर मुझे हर समय गुस्सा आता रहता. अवनि कभी भी उस के दोस्तों के साथ आ जाती, लंच करती, हम सब से खूब बातें करती. रात को बैडरूम में विजय को देखते ही मेरे मन का गुबार निकलना शुरू हो जाता, ‘‘हुंह, पुरुष है न, किसी लड़की की भावनाओं से खेलना अपना हक समझता है, बचपन से जिस के साथ घूम रहा है, जिस के साथ सोसायटी में अच्छेखासे चर्चे हैं, अब इतने आराम से उसे भूल कर किसी और लड़की से दोस्ती कर ली है, आवारा कहीं का.’’

विजय कहते, ‘‘प्रीति, तुम क्यों बच्चों की बातों में अपना दिमाग खराब करती रहती हो. यह उम्र ही ऐसी है, ज्यादा ध्यान मत दिया करो.’’मैं चिढ़ जाती, ‘‘हां, आप तो उसी की साइड लेंगे, खुद भी तो एक पुरुष हो न.’’‘‘अरे, हम तो हमेशा से आप के गुलाम हैं, कभी शिकायत का मौका दिया है,’’ विजय नाटकीय स्वर में कहते तो भी मैं चुप रहती.

मेरा ध्यान स्वाति में रहता. मैं उसी के बारे में सोचती. कोई भी काम करते हुए मुझे उस का ध्यान आ जाता कि बेचारी को राहुल का व्यवहार कितना खलता होगा, उसे राहुल का बचपन का साथ याद आता होगा.

काफी समय बीतता चला गया. स्नेहा एमबीए कर रही थी, राहुल का भी सीए पूरा होने वाला था. यह पूरा समय मुझे स्वाति का ध्यान आता रहा था. राहुल के किसी फोन से मुझे अब यह न लगता कि वह स्वाति के संपर्क में भी है. अवनि से उस की घनिष्ठता बढ़ गई थी. एक दिन मुझे शौपिंग के लिए जाना था, विजय ने कहा, ‘‘तुम शाम को 6 बजे कैफे कौफी डे पहुंच जाना, वहीं कुछ खापी कर शौपिंग करने चलेंगे.’’

मैं वहां पहुंची, एक कार्नर में बैठ गई. विजय को फोन कर के पूछा कि कितनी देर में आ रहे हो. उन्होंने कहा, ‘‘तुम और्डर दे दो, मैं भी पहुंच ही रहा हूं.’’

मैं ने और्डर दे कर यों ही नजरें इधरउधर दौड़ाईं तो मैं चौंक पड़ी, स्वाति एक टेबल पर एक लड़के के साथ बैठी थी और दोनों चहकते हुए आसपास के माहौल से बेखबर अपनी बातों में व्यस्त थे. मैं गौर से स्वाति को देखती रही, वह काफी खुश लग रही थी. मेरी नजरें स्वाति से हट नहीं रही थीं, शायद उसे भी किसी की घूरती निगाहों का एहसास हुआ हो, उस ने इधरउधर देखा, चौंक कर उस लड़के को कुछ कहा, फिर उठ कर आई, मेरी टेबल के पास खड़ी हुई, मुझे नमस्ते की. मैं ने उसे बैठने का इशारा करते हुए उस के हालचाल पूछे.

वह बैठी तो नहीं लेकिन आज पहली बार वह मुझ से बात कर रही थी. मैं ने उस की पढ़ाई के बारे में पूछा. उस से बात करतेकरते मेरी नजर उस के पीछे आ कर खड़े हुए लड़के पर पड़ी. स्वाति ने उस से परिचय करवाया, ‘‘आंटी, यह आकाश है, कोटा में मेरे कालेज में ही है. यहीं मुंबई में ही रहता है.’’ मैं ने दोनों से कुछ हलकीफुलकी बात की, फिर वे दोनों ‘बाय आंटी’ कह कर चले गए.

मैं स्वाति को हंसतेमुसकराते जाते देखती रही. मैं सोच रही थी, यह लड़की कभी नहीं जान पाएगी कि यह कितने दिनों से मेरे दिमाग पर छाई थी. मैं ने मन ही मन पता नहीं क्या रिश्ता बना लिया था इस से, पता नहीं इस की कितनी भावनाओं से मेरा मन जुड़ गया था, लेकिन आज मैं स्वाति को खुश देख कर बेहद खुश थी.

Romantic Story : राजकुमार लाओगी न – योगिताजी की जिद्द ने क्या से क्या कर डाला

Romantic Story : ‘‘चेष्टा, पापा के लिए चाय बना देना. हो सके तो सैंडविच भी बना देना? मैं जा रही हूं, मुझे योगा के लिए देर हो रही है,’’ कहती हुई योगिताजी स्कूटी स्टार्ट कर चली गईं. उन्होंने पीछे मुड़ कर भी नहीं देखा, न उन्होंने चेष्टा के उत्तर की प्रतीक्षा की.

योगिताजी मध्यम- वर्गीय सांवले रंग की महिला हैं. पति योगेश बैंक में क्लर्क हैं, अच्छीखासी तनख्वाह है. उन का एक बेटा है. उस का नाम युग है. घर में किसी चीज की कमी नहीं है.

जैसा कि  सामान्य परिवारों में होता है घर पर योगिताजी का राज था. योगेशजी उन्हीं के इशारों पर नाचने वाले थे. बेटा युग भी बैंक में अधिकारी हो गया था. बेटी चेष्टा एक प्राइवेट स्कूल में अध्यापिका बन गई थी.

कालेज के दिनों में ही युग की दोस्ती अपने साथ पढ़ने वाली उत्तरा से हो गई. उत्तरा साधारण परिवार से थी. उस के पिता बैंक में चपरासी थे, इसलिए जीवन स्तर सामान्य था. उत्तरा की मां छोटेछोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के साथ ही कुछ सिलाई का काम कर के पैसे कमा लेती थीं.

उत्तरा के मातापिता ईमानदार और चरित्रवान थे इसलिए वह भी गुणवती थी. पढ़ने में काफी तेज थी. उत्तरा का व्यक्तित्व आकर्षक था. दुबलीपतली, सांवली उत्तरा सदा हंसती रहती थी. वह गाती भी अच्छा थी. कालेज के सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों में उद्घोषणा का कार्य वही करती थी. उस की बड़ीबड़ी कजरारी आंखों में गजब का आकर्षण था. उस की हंसी में युग ऐसा बंधा कि उस की मां के तमाम विरोध के आगे उस के पैर नहीं डगमगाए और वह उत्तरा के प्यार में मांबाप को भी छोड़ने को तैयार हो गया.

योगिताजी को मजबूरी में युग को शादी की इजाजत देनी पड़ी. कोर्टमैरिज कर चुके युग और उत्तरा के विवाह को समाज की स्वीकृति दिलाने के लिए योगिताजी ने एक भव्य पार्टी का आयोजन किया. समाज को दिखाने के लिए बेटे की जिद के आगे योगिताजी झुक तो गईं लेकिन दिल में बड़ी गांठ थी कि उत्तरा एक चपरासी की बेटी है.

दहेज में मिलने वाली नोटों की भारी गड्डियां और ट्रक भरे सामान के अरमान मन में ही रह गए. अपनी कुंठा के कारण वे उत्तरा को तरहतरह से सतातीं. उस के मातापिता के बारे में उलटासीधा बोलती रहतीं. उत्तरा के हर काम में मीनमेख निकालना उन का नित्य का काम था.

उत्तरा भी बैंक में नौकरी करती थी. सुबह पापा की चायब्रेड, फिर दोबारा मम्मी की चाय, फिर युग और चेष्टा को नाश्ता देने के बाद वह सब का लंच बना कर अलगअलग पैक करती. मम्मी का खाना डाइनिंग टेबल पर रखने के बाद ही वह घर से बाहर निकलती थी. इस भागदौड़ में उसे अपने मुंह में अन्न का दाना भी डालने को समय न मिलता था.

यद्यपि युग उस से अकसर कहता कि क्यों तुम इतना काम करती हो, लेकिन वह हमेशा हंस कर कहती, ‘‘काम ही कितना है, काम करने से मैं फिट रहती हूं.’’

योगिताजी के अलावा सभी लोग उत्तरा से बहुत खुश थे. योगेशजी तो उत्तरा की तारीफ करते नहीं अघाते. सभी से कहते, ‘‘बहू हो तो उत्तरा जैसी. मेरे बेटे युग ने बहुत अच्छी लड़की चुनी है. हमारे तो भाग्य ही जग गए जो उत्तरा जैसी लड़की हमारे घर आई है.’’

चेष्टा भी अपनी भाभी से घुलमिल गई थी. वह और उत्तरा अकसर खुसरफुसर करती रहती थीं. दोनों एकदूसरे से घंटों बातें करती रहतीं. सुबह उत्तरा को अकेले काम करते देख चेष्टा उस की मदद करने पहुंच जाती. उत्तरा को बहुत अच्छा लगता, ननदभावज दोनों मिल कर सब काम जल्दी निबटा लेतीं. उत्तरा बैंक चली जाती और चेष्टा स्कूल.

योगिताजी बेटी को बहू के साथ हंसहंस कर काम करते देखतीं तो कुढ़ कर रह जातीं…फौरन चेष्टा को आवाज दे कर बुला लेतीं. यही नहीं, बेटी को तरहतरह से भाभी के प्रति भड़कातीं और उलटीसीधी पट्टी पढ़ातीं.

उत्तरा की दृष्टि से कुछ छिपा नहीं था लेकिन वह सोचती थी कि कुछ दिन बाद सब सामान्य हो जाएगा. कभी तो मम्मीजी के मन में मेरे प्रति प्यार का पौधा पनपेगा. वह यथासंभव अच्छी तरह कार्य करने का प्रयास करती, लेकिन योगिताजी को खुश करना बहुत कठिन था. रोज किसी न किसी बात पर उन का नाराज होना आवश्यक था. कभी सब्जी में मसाला तेज तो कभी रोटी कड़ी, कभी दाल में घी ज्यादा तो कभी चाय ठंडी है, दूसरी ला आदि.

युग इन बातों से अनजान नहीं था. वह मां के हर अत्याचार को नित्य देखता रहता था. पर उत्तरा की जिद थी कि मैं मम्मीजी का प्यार पाने में एक न एक दिन अवश्य सफल हो जाऊंगी. और वे उसे अपना लेंगी.

योगिताजी को घर के कामों से कोई मतलब नहीं रह गया था, क्योंकि उत्तरा ने पूरे काम को संभाल लिया था, इसलिए वह कई सभासंगठनों से जुड़ कर समाजसेवा के नाम पर यहांवहां घूमती रहती थीं.

योगिताजी चेष्टा की शादी को ले कर परेशान रहती थीं, लेकिन उन के ख्वाब बहुत ऊंचे थे. कोई भी लड़का उन्हें अपने स्तर का नहीं लगता था. उन्होंने कई जगह शादी के लिए प्रयास किए लेकिन कहीं चेष्टा का सांवला रंग, कहीं दहेज का मामला…बात नहीं बन पाई.

योगिताजी के ऊंचेऊंचे सपने चेष्टा की शादी में आड़े आ रहे थे. धीरेधीरे चेष्टा के मन में कुंठा जन्म लेने लगी. उत्तरा और युग को हंसते देख कर उसे ईर्ष्या होने लगी थी. चेष्टा अकसर झुंझला उठती. उस के मन में भी अपनी शादी की इच्छा उठती थी. उस को भी सजनेसंवरने की इच्छा होती थी. चेष्टा के तैयार होते ही योगिताजी की आंखें टेढ़ी होने लगतीं. कहतीं, ‘‘शादी के बाद सजना. कुंआरी लड़कियों का सजना- धजना ठीक नहीं.’’

चेष्टा यह सुन कर क्रोध से उबल पड़ती लेकिन कुछ बोल न पाती. योगिताजी के कड़े अनुशासन की जंजीरों में जकड़ी रहती. योगिताजी उस के पलपल का हिसाब रखतीं. पूछतीं, ‘‘स्कूल से आने में देर क्यों हुई? कहां गई थी और किस से मिली थी?’’

योगिताजी के  मन में हर क्षण संशय का कांटा चुभता रहता था. उस कुंठा को जाहिर करते हुए वे उत्तरा को अनापशनाप बकने लग जाती थीं. उन की चीख- चिल्लाहट से घर गुलजार रहता. वे हर क्षण उत्तरा पर यही लांछन लगातीं कि यदि तू अपने साथ दहेज लाती तो में वही दहेज दे कर बेटी के लिए अच्छा सा घरवर ढूंढ़ सकती थी.

योगिताजी के 2 चेहरे थे. घर में उन का व्यक्तित्व अलग था लेकिन समाज में वह अत्यंत मृदुभाषी थीं. सब के सुखदुख में खड़ी होती थीं. यदि कोई बेटीबहू के बारे में पूछता था तो बिलकुल चुप हो जाती थीं. इसलिए उन की पारिवारिक स्थिति के बारे में कोई नहीं जानता था. योगिताजी के बारे में समाज में लोगों की अलगअलग धारणा थी. कोई उन्हें सहृदय तो कोई घाघ कहता.

एक दिन योगिताजी शाम को अपने चिरपरिचित अंदाज में उत्तरा पर नाराज हो रही थीं, उसे चपरासी की बेटी कह कर अपमानित कर रही थीं तभी युग क्रोधित हो उठा, ‘‘चलो उत्तरा, अब मैं यहां एक पल भी नहीं रह सकता.’’

घर में कोहराम मच गया. चेष्टा रोए जा रही थी. योगेशजी बेटे को समझाने का प्रयास कर रहे थे. परंतु युग रोजरोज की चिकचिक से तंग हो चुका था. उस ने किसी की न सुनी. दोचार कपड़े अटैची में डाले और उत्तरा का हाथ पकड़ कर घर से निकल गया.

योगिताजी के तो हाथों के तोते उड़ गए. वे स्तब्ध रह गईं…कुछ कहनेसुनने को बचा ही नहीं था. युग उत्तरा को ले कर जा चुका था. योगेशजी पत्नी की ओर देख कर बोले, ‘‘अच्छा हुआ, उन्हें इस नरक से छुटकारा तो मिला.’’

योगिताजी अनर्गल प्रलाप करती रहीं. सब रोतेधोते सो गए.

सुबह हुई. योगेशजी ने खुद चाय बनाई, बेटी और पत्नी को देने के बाद घर से निकल गए. चेष्टा ने जैसेतैसे अपना लंच बाक्स बंद किया और दौड़तीभागती स्कूल पहुंची.

घर में सन्नाटा पसर गया था. आपस में सभी एकदूसरे से मुंह चुराते. चेष्टा सुबहशाम रसोई में लगी रहती. घर के कामों का मोर्चा उस ने संभाल लिया था, इसलिए योगिताजी की दिनचर्या में कोई खास असर नहीं पड़ा था. वे वैसे भी सामाजिक कार्यों में ज्यादा व्यस्त रहती थीं. घर की परवा ही उन्हें कहां थी.

योगेशजी से जब भी योगिताजी की बातचीत होती चेष्टा की शादी के बारे में बहस हो जाती. उन का मापदंड था कि मेरी एक ही बेटी है, इसलिए दामाद इंजीनियर, डाक्टर या सी.ए. हो. उस का बड़ा सा घर हो. लड़का राजकुमार सा सुंदर हो, परिवार छोटा हो आदि, पर तमाम शर्तें पूरी होती नहीं दिखती थीं.

चेष्टा की उम्र 30 से ऊपर हो चुकी थी. उस का सांवला रंग अब काला पड़ता जा रहा था. तनाव के कारण चेहरे पर अजीब सा रूखापन झलकने लगा था. चिड़चिड़ेपन के कारण उम्र भी ज्यादा दिखने लगी थी.

उत्तरा के जाने के बाद चेष्टा गुमसुम हो गई थी. घर में उस से कोई बात करने वाला नहीं था. कभीकभी टेलीविजन देखती थी लेकिन मन ही मन मां के प्रति क्रोध की आग में झुलसती रहती थी. तभी उस को चैतन्य मिला जिस की स्कूल के पास ही एक किताबकापी की दुकान थी. आतेजाते चेष्टा और उस की आंखें चार होती थीं. चेष्टा के कदम अनायास ही वहां थम से जाते. कभी वहां वह मोबाइल रिचार्ज करवाती तो कभी पेन खरीदती. उस की और चैतन्य की दोस्ती बढ़ने लगी. आंखोंआंखों में प्यार पनपने लगा. वह मन ही मन चैतन्य के लिए सपने बुनने लगी थी. दोनों चुपकेचुपके मिलने लगे. कभीकभी शाम भी साथ ही गुजारते. चेष्टा चैतन्य के प्यार में खो गई. यद्यपि चैतन्य भी चेष्टा को प्यार करता था परंतु उस में इतनी हिम्मत न थी कि वह अपने प्यार का इजहार कर सके.

चेष्टा मां से कुछ बताती इस के पहले ही योगिताजी को चेष्टा और चैतन्य के बीच प्यार होने का समाचार नमकमिर्च के साथ मिल गया. योगिताजी तिलमिला उठीं. अपनी बहू उत्तरा के कारण पहले ही उन की बहुत हेठी हो चुकी थी, अब बेटी भी एक छोटे दुकानदार के साथ प्यार की पींगें बढ़ा रही है. यह सुनते ही वे अपना आपा खो बैठीं और चेष्टा पर लातघूंसों की बौछार कर दी.

क्रोध से तड़प कर चेष्टा बोली, ‘‘आप कुछ भी करो, मैं तो चैतन्य से मिलूंगी और जो मेरा मन होगा वही करूंगी.’’

योगिताजी ने मामला बिगड़ता देख कूटनीति से काम लिया. वे बेटी से प्यार से बोलीं, ‘‘मैं तो तेरे लिए राजकुमार ढूंढ़ रही थी. ठीक है, तुझे वह पसंद है तो मैं उस से मिलूंगी.’’

चेष्टा मां के बदले रुख से पहले तो हैरान हुई फिर मन ही मन अपनी जीत पर खुश हो गई. चेष्टा योगिताजी के छल को नहीं समझ पाई.

अगले दिन योगिताजी चैतन्य के पास गईं और उस को धमकी दी, ‘‘यदि तुम ने मेरी बेटी चेष्टा की ओर दोबारा देखा तो तुम्हारी व तुम्हारे परिवार की जो दशा होगी, उस के बारे में तुम कभी सोच भी नहीं सकते.’’

इस धमकी से सीधासादा चैतन्य डर गया. वह चेष्टा से नजरें चुराने लगा. चेष्टा के बारबार पूछने पर भी उस ने कुछ नहीं बताया बल्कि यह बोला कि तुम्हारी जैसी लड़कियों का क्या ठिकाना, आज मुझ में रुचि है कल किसी और में होगी.

चेष्टा समझ नहीं पाई कि आखिर चैतन्य को क्या हो गया. वह क्यों बदल गया है. चैतन्य ने तो सीधा उस के चरित्र पर ही लांछन लगाया है. वह टूट गई. घंटों रोती रही. अकेलेपन के कारण विक्षिप्त सी रहने लगी. इस मानसिक आघात से वह उबर नहीं पा रही थी. मन ही मन अकेले प्रलाप करती रहती थी. चैतन्य से सामना न हो, इस कारण स्कूल जाना भी बंद कर दिया.

योगिताजी बेटी की दशा देख कर चिंतित हुईं. उस को समझाती हुई बोलीं कि मैं अपनी बेटी के लिए राजकुमार लाऊंगी. फिर उसे डाक्टर के पास ले गईं. डाक्टर बोला, ‘‘आप की लड़की डिप्रेशन की मरीज है,’’ डाक्टर ने कुछ दवाएं दीं और कहा, ‘‘मैडमजी, इस का खास ध्यान रखें. अकेला न छोड़ें. हो सके तो विवाह कर दें.’’

थोड़े दिनों तक तो योगिताजी बेटी के खानेपीने का ध्यान रखती रहीं. चेष्टा जैसे ही थोड़ी ठीक हुई योगिताजी अपनी दुनिया में मस्त हो गईं. जीवन से निराश चेष्टा मन ही मन घुटती रही. एक दिन उस पर डिप्रेशन का दौरा पड़ा, उस ने अपने कमरे का सब सामान तोड़ डाला. योगिताजी ने कमरे की दशा देखी तो आव देखा न ताव, चेष्टा को पकड़ कर थप्पड़ जड़ती हुई बोलीं, ‘‘क्या हुआ…चैतन्य ने मना किया है तो क्या हुआ, मैं तुम्हारे लिए राजकुमार जैसा वर लाऊंगी.’’

यह सुनते ही चेष्टा समझ गई कि यह सब इन्हीं का कियाधरा है. कुंठा, तनाव, क्रोध और प्रतिशोध में जलती हुई चेष्टा में जाने कहां की ताकत आ गई. योगिताजी को तो अनुमान ही न था कि ऐसा भी कुछ हो सकता है. चेष्टा ने योगिताजी की गरदन पकड़ ली और उसे दबाती हुई बोली, ‘‘अच्छा…आप ने ही चैतन्य को भड़काया है…’’

उसे खुद नहीं पता था कि वह क्या कर रही है. उस के क्रोध ने अनहोनी कर दी. योगिताजी की आंखें आकाश में टंग गईं. चेष्टा विक्षिप्त हो कर चिल्लाती जा रही थी, ‘‘मेरे लिए राजकुमार लाओगी न…’’

Hindi Kahani : दीवार बोली – किशोर के कानों में अचानक कौन सी आवाज सुनाई देने लगी थी?

Hindi Kahani : वह किशोर भी आम किशोरों जैसा ही था. सारे काम वह भी वैसे ही करता था जैसे उस की उम्र के होशियार किशोर करते हैं, लेकिन वह हर काम थोड़ा जरूरत से ज्यादा कर दिया करता था. यदि अन्य किशोर नहाने में 7 से 10 मिनट लगाते तो वह 14 से 20 मिनट लगाता. शाम को स्कूल से आने के बाद 2 घंटे पढ़ने के लिए कहा जाए तो वह 4 घंटे से पहले उठने का नाम नहीं लेता. फुटबौल 1 घंटा खेलने के बजाय वह 2 घंटे तक खेलने का कायल था. मतलब यह कि हर काम जरूरत से ज्यादा किया करता था.

जब वह लिखने बैठता तो पूरी कौपी थोड़ी ही देर में भर डालता. अब खाली कौपियां इतनी ज्यादा तो होती नहीं थीं कि बस, कौपी पर कौपी मिलती जाए और वह उसे भरता चला जाए. आखिर हर चीज की कोई हद होती है, तो फिर वह करता क्या? घर की दीवारों, फर्श, स्कूल की दीवारों, कमरे के परदों, गरज यह कि जो कुछ भी उसे सामने दिखता उसी पर लिखना शुरू कर देता. कभीकभी अगर कोई चीज उसे लिखने के लिए नजर नहीं आती तो वह अपने हाथपैरों पर ही कुछ न कुछ लिखना शुरू कर देता. सब को उस की जो बात सब से बुरी लगती, वह थी कोयले से लिखलिख कर दीवारों को खराब करना. आखिर दीवारों की सफेदी इस तरह खराब होते देख कौन बरदाश्त करेगा, लेकिन वह किशोर क्योंकि पढ़नेलिखने और खेलने में भी होशियार था, इसलिए ये अच्छाइयां दीवारों पर लिखने की उस की बुरी आदत को दबा देती थीं. आप ने यह तो सुना ही होगा कि दूध देने वाले पशु की लात भी सहनी पड़ती है. यही बात उस किशोर के साथ भी थी.

एक दिन वह किशोर वक्त से पहले ही स्कूल पहुंच गया. उस ने सोचा कि कुछ करना चाहिए. वहीं नीचे जमीन पर कोयले के छोटेछोटे टुकड़े पड़े थे. बस, उस ने फौरन नीचे से कोयले का एक छोटा टुकड़ा उठाया और स्कूल की बड़ी दीवार पर एक आदमी का चित्र बनाना शुरू कर दिया. चित्र जैसे ही पूरा हुआ, वह आदमी सचमुच का आदमी बन गया. यह देख वह किशोर डर गया. वह उसे देख कर भागने लगा, लेकिन उस आदमी ने उसे दौड़ कर पकड़ लिया. पकड़ने के साथ ही किशोर के होश उड़ गए, वह बेहोश हो गया. जब उसे होश आया तो उस ने देखा कि वह एक बड़े से सजेधजे कमरे में सुर्ख रंग के मखमली कालीन पर लेटा हुआ है. उस के आसपास उस के जैसे ही कई छोटेछोटे किशोर लेटे हुए हैं. उस ने उठने की कोशिश की मगर उस से उठा नहीं गया. वह बोलना चाहता था, ताकि अपने आसपास लेटे बच्चों से बात कर सके और पूछे कि वे कौन हैं और यहां कैसे आए? उसे ऐसा महसूस हुआ कि वह बोल नहीं सकता है. उस की जबान तालू से इस तरह चिपक गई है कि वह कुछ बोल ही नहीं पा रहा. उस ने इधरउधर नजर दौड़ा कर उस आदमी को देखना चाहा, जिस ने उसे पकड़ लिया था, लेकिन वह उसे कहीं नजर नहीं आया. वह बड़ा परेशान हुआ कि आखिर वह है कहां? वह काफी देर तक इसी तरह लेटा रहा और फिर रोने लगा, लेकिन उसे लगा कि रोते वक्त जो आवाज निकलनी चाहिए थी वह नहीं निकल रही है. उस ने हाथ उठा कर अपने आंसू पोंछने चाहे लेकिन उस का हाथ भी नहीं उठा. वह कराहने लगा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि उसे किस जुर्म में यह सजा दी जा रही है और उस का सारा बदन इस तरह क्यों जकड़ गया है, जबान से आवाज क्यों नहीं निकलती, ये सब क्या हो रहा है?

वह अभी यह सोच ही रहा था कि एक अजीब सी गड़गड़ाहट की आवाज उस के कानों में पड़ी. इस आवाज के साथ ही कमरे में मौजूद सारे किशोर खुदबखुद उठ कर खड़े हुए, लेकिन अब भी उन की जबान बंद थी. उस ने देखा कि ठीक सामने कमरे की सफेद दीवार है, जो बिलकुल साफ है. उसे वह आदमी कमरे में आता दिखाई दिया जो उसे वहां ले आया था. उस के एक हाथ में कोयले का एक छोटा सा टुकड़ा था. उस ने कमरे की सफेद दीवार को कोयले से खराब करना शुरू कर दिया. किशोर को यह देख कर बड़ा ताज्जुब हुआ कि वह आदमी भी हूबहू वैसे ही चित्र दीवार पर बना रहा था जैसे वह खुद बनाया करता था. उसे दीवार खराब करने वाला वह आदमी अच्छा नहीं लगा. वह सोचने लगा, ‘इतनी सफेद दीवार को वह क्यों खराब कर रहा है?’ उसे उस आदमी पर बड़ा क्रोध आया. उस की इच्छा हुई कि दौड़ कर जाए और उस के हाथ से कोयले का टुकड़ा छीन ले, लेकिन फिर उसे खयाल आया कि वह खुद भी तो इसी तरह दीवारें, परदे, अलमारियों के शीशे वगैरा खराब करता रहा है. उसे आत्मग्लानि का अनुभव हुआ.

इधर वह आदमी दीवार खराब करता चला जा रहा था. कमरे में खड़े सभी किशोर उसे इस तरह दीवार खराब करते हुए देख रहे थे. एकाएक उस किशोर को न जाने क्या हुआ, न जाने उस में इतनी ताकत कहां से आ गई कि उस ने तेजी से आगे बढ़ कर उस आदमी के हाथ से कोयला छीन लिया और कहा, ‘‘इतनी अच्छी दीवार को आप इस तरह क्यों खराब कर रहे हैं?’’

‘‘लेकिन तुम भी तो अभी तक यही करते रहे हो. जो काम तुम खुद करते रहे हो, उसे करने से दूसरे को क्यों मना करते हो?’’ उस आदमी ने कहा और फिर दीवार खराब करने लग गया. किशोर को उस आदमी की इस बात पर बड़ा गुस्सा आया. उस ने कहा, ‘‘मैं अब कभी दीवारें और दूसरी चीजें खराब नहीं करूंगा. आप भी इसी वक्त इसे बंद कर दें.’’ इतना कहने के साथ ही वह दीवार की तरफ आगे बढ़ा और उस पर कोयले से बनाए चित्रों को अपने हाथ से मिटाने लगा, क्योंकि इस से सफेद दीवार की शोभा जाती रही थी. दीवार पर बने चित्र को हाथ लगाते ही कमरे की दीवार अचानक कुछ अजीब तरह से हिलने लगी, मानो कोई जलजला आ गया हो. वह किशोर बड़े गौर से वहां खड़ा यह सब देखता रहा. उस ने अपने आसपास खड़े बच्चों की तरफ नजर दौड़ाई. उसे सब परिचित चेहरे वहां खड़े हुए नजर आए. वे सभी उस के स्कूल के साथी थे.

उसे यह देख कर और भी ताज्जुब हुआ कि वह खड़ी दीवार किसी अनजान कमरे की दीवार नहीं, बल्कि उस के अपने स्कूल की ही दीवार है. वह अपनी इस करतूत पर मन ही मन शरमा गया और स्कूल की दीवार पर कोयले से बनाया हुआ चित्र मिटाने लगा. उसे लगा, जैसे दीवार कह रही हो, ‘‘मुझे आप इस तरह न बिगाड़ो.’’ कुछ देर बाद स्कूल की घंटी बजी और वह अपने दूसरे साथियों के साथ अपनी कक्षा में चला गया. यह तो बताने की जरूरत ही नहीं कि उस दिन के बाद उस ने कभी दीवार या फर्श खराब नहीं किया.

Hindi Story : दोस्ती – करोड़पति बनने के बाद सौम्या के जीवन में क्या बदलाव आया?

Hindi Story : आज जब सौम्या  झील के उस पार बने बड़े से बंगले में पहली बार प्रवेश कर रही थी तो जो बात उस के दिमाग में सब से ऊपर थी वह यह कि उस ने अपने जीवन में जो सपना देखा था क्या वह पूरा हुआ?

छोटे से शहर के साधारण परिवार की साधारण सी दिखने वाली एक आम लड़की जिस की आंखों में थे चंद सपने और मन में कुछ चाहतें. बचपन से आज तक उस ने कोई ऐसी प्रतिभा का परिचय नहीं दिया था जिस के आधार पर उस से कुछ खास कर गुजरने की उम्मीदें की जा सकें, बल्कि एक आम मध्यवर्गीय भारतीय परिवार की औसत लड़की की ही माफिक उस ने पहले उलटनापलटना, फिर 4 पैरों पर चलना और उस के बाद तुतलाती जबान में कुछ बोलना सीखा.

सभी घरों की तरह उस के घर में भी जब पहली बार उस की आवाज में मां… मां… शब्द उस के कंठ से फूट कर निकले तो एकसाथ सब लोगों की बांछें खिल गईं. कई दिनों तक घर में चर्चा चलती रही कि पहले सौम्या ने बोलना शुरू किया था या उस से 2 साल बड़ी बहन संगीता ने.

दरअसल परिवार में सौम्या दूसरी लड़की के रूप में आई थी. उस के पिता की पहली संतान थी संगीता. जब सौम्या होने वाली थी तो उस की मां ने उम्मीदें लगा रखी थीं कि इस बार बेटा होगा. इन मामलों की अच्छी सम  झ रखने वाले तथा कुछ परिचित ज्योतिषियों ने भी 100 प्रतिशत दावा किया था कि लड़का ही होगा. आखिर सारे लक्षण जो लड़के के ही दिख रहे थे, लेकिन हुआ अंत में वही जो कुदरती होना था. मांबाप तथा परिवार के बड़ेबुजुर्गों ने मन मार कर उस तोहफे को स्वीकार लिया जिस का कई दिनों की जद्दोजेहद तथा विचारविमर्श के बाद नाम पड़ा सौम्या. सौम्या यानी आकर्षक, प्रिय तथा मनोहारी.

समय के साथ पंख लगाए सौम्या पहले किंडरगार्टन गई, फिर स्कूल और उस के बाद कालेज, कालेज तक न तो उस ने कोई ऐसा काम किया और न ही कोई ऐसी उपलब्धि हासिल की थी जिसे किसी भी तरह से विशिष्ट कहा जा सके या फिर जिस के आधार पर उस से कोई खास उम्मीद की जा सके. आखिर देखनेसुनने में सपाट, पहनावेओढ़ावे में साधारण, पढ़ाईलिखाई में औसत और बाहरी गतिविधियों से बेखबर इस लड़की से कैसे यह उम्मीद की जा सकती थी कि वह आसमान से तारे तोड़ लाएगी?

जब वह बीए के फाइनल में पहुंची थी तो उस के पिता ने मन ही मन तय कर लिया था कि अब जल्दी से जल्दी कोई लायक लड़का खोज कर उस की शादी कर देंगे. पिछले ही साल सौम्या की बड़ी बहन का उन्होंने विवाह किया था. जिस बैंक में वे काम करते थे, वहीं उन्हें एक लड़का मिल गया था जिस के पिता भी हाल ही में उसी बैंक से रिटायर हुए थे.

लड़का देखने में काफी सुंदर था और साथ ही उन का पक्का भक्त भी. आखिर उन्होंने ही उसे बड़े जतन और स्नेह से नौकरी के सारे दांवपेंच सिखाए थे. इत्तेफाकन लड़के के पिता भी उन के पुराने परिचित निकल गए थे जिन के साथ उन्होंने कई साल पहले राजस्थान के सुदूर जैसलमेर जिले के छोटे से कसबे में बैंक की शाखा में काम किया था, इसीलिए विवाह तय करने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई थी.

जिस तरह की शादी संगीता की हुई थी, कुछ वैसा ही रिश्ता सौम्या की खातिर भी ढूंढ़ा जा रहा था. योजना थी कि सालदोसाल में कुछ रुपएपैसे जमा भी हो जाएंगे जो शादी में काम आएंगे. 1-2 लड़के दिमाग में भी थे, कोई म्युनिसिपलिटी का बाबू, कोई वन विभाग में रेंजर तो कोई सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर, लेकिन आजकल के लड़कों का दिमाग नौकरी पाते ही जैसे खराब हो जाता है वैसे ही इन लोगों का भी था. न जाने लड़की के रूप में क्या चाहते थे, ‘जन्नत की हूर या आसमान की कोई परी या कोई हीरोइन.’ ऊपर से पैसा बेशुमार और नखरे तो पूछो ही मत.

इधर सौम्या के पिता इन चिंताओं में घुले जा रहे थे उधर सौम्या की जिंदगी में एक नया तूफान उठ रहा था. वह आया तो इतने चुपके से कि आहट तक नहीं हुई लेकिन न जाने कब, देखते ही देखते वह सौम्या की हस्ती पर इस कदर छा गया कि सौम्या को उस के अलावा कोई और नजर ही नहीं आता था.

यह कोई नहीं जानता कि उस ने सौम्या में क्या देख लिया क्योंकि जहां तक सौम्या जानती थी और जो काफी हद तक सचाई भी थी, उस में कोई ऐसा विशेष आकर्षण नहीं था जिस से एक करोड़पति घर का एकलौता शहजादा उस पर लट्टू हो जाता. न तो सूरत ही ऐसी और न सीरत ही, लेकिन पवन को उस बड़े से कालेज में यदि कोई लड़की पसंद आई, किसी को देख कर उस का दिल धड़का, किसी का दीदार करने की लालसा जागी और किसी से गुफ्तगू करने का मन हुआ तो सिर्फ उसी लड़की से जो न केवल दूसरों की निगाहों में अतिसामान्य थी बल्कि जो खुद भी इसी खयालात की थी.

बहुत दिन बाद एक बार पवन ने यों ही बस, बातोंबातों में उस से कहा था कि उस की आंखों में एक अजीब सी मनमोहक कशिश है जो इंसान को अपनी ओर इस तरह खींच लेती है जैसे चुंबक लोहे को. उस दिन के बाद से सौम्या ने अपनी आंखों का खासा खयाल रखना शुरू कर दिया था और घंटों आईने के सामने अकेली बैठ कर उन्हें निहारती रहती.

पवन के पिता शहर के नामीगिरामी वकीलों में थे. उस के दादा भी वकील थे और दादा के पिता भी और उन के पिता भी. सभी हाईकोर्ट में और सभी सर्विस मैटर के. हिंदुस्तान के सब से बड़े मुकदमेबाज यहां के सरकारी सेवक होते हैं. यह राज पवन के दादा के दादा ही सम  झ गए थे. उन्होंने न सिर्फ खुद यह क्षेत्र चुना बल्कि अपनी औलादों को भी इसी क्षेत्र में लगाया.

वह अकसर कहा करते थे कि चूंकि यहां के सरकारी नुमाइंदों को एक तो न काम करने की मोटी तनख्वाह मिलती है ऊपर से काम करने की कीमत अलग से हराम के रूप में मिलती है. लिहाजा यह संभव ही नहीं कि कोई भी सरकारी नौकर कम से कम एक बार कानून के इस दंगल में नहीं कूदेगा. साथ ही उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि जब तक उन के खानदान के लोग वकालत के इस क्षेत्रविशेष को पकड़े रहेंगे तब तक तो परिवार की निरंतर तरक्की होगी और जिस दिन यह छोड़ दिया तभी से परिवार का गिरना शुरू हो जाएगा.

उन की बात को पत्थर की लकीर मानते हुए वह परिवार आज तक अपना परचम लहरा रहा था और न जाने कितने ही हाईकोर्ट तथा कुछेक सुप्रीम कोर्ट के जज तक दे चुके थे. इसी परंपरा का पालन करते हुए पवन भी कानून की पढ़ाई कर रहा था.

पवन और सौम्या की पहली कुछ मुलाकातें बेहद औपचारिक और  ि झ  झक भरी थीं. बस, परिचय प्राप्ति कह सकते हैं उसे. क्या नाम है, कहां के हैं, कहां, किस विषय में दाखिला है, जैसे सामान्य प्रश्न जिन में भावों तथा स्नेहबंधन की गहराई ऊपर से बिलकुल न दिखे. लेकिन कोई भी तजरबेकार यह आसानी से देख सकता कि मामला उतना सतही नहीं है जितना प्रश्नों और उत्तरों के सुनने से लगता है. यहां महत्त्व भाषा का नहीं, भाव का था और इन मुलाकातों में अंदरूनी छिपा भाव कहीं गहरा और असरदार था.

बातों से मुलाकातों और मुलाकातों से तादात्म्य और तादात्म्य से आत्मीयता और आत्मीयता से अंतरंगता और अंतरंगता से उन्माद और उन्माद से निर्णय, फिर विरोध. पवन के परिवार का भी और सौम्या के परिवार में भी. तर्कवितर्क, वादप्रतिवाद, नाराजगी, गुस्सा, अंतर्कलह, उठापटक, सामदामदंडभेद, धमकियां, देश, समाज और नातेरिश्तेदारों की गुहार. फिर बड़ेबुजुर्गों की हार. परस्पर सम  झौता और फिर विजातीय विवाह और कुछ ही सालों के अंदर दोनों परिवारों के बीच हर तरह के सामाजिक संबंधों तथा सरोकारों की पूरी तरह स्थापना.

आज सौम्या को वह दिन भी याद आ रहा था जब वह पहली बार पवन से मिली थी और वह दिन भी जब उस ने पहली बार लाल जोड़े में सज कर शर्मीली दुलहन के रूप में अपनी ससुराल में प्रवेश किया था. साथ ही वह दिन भी याद आ रहा था जब पवन ने उसे पहली बार सतीश से मिलाया था और वह दिन भी जब सतीश ने पहली बार मौका पा कर अकेले में उस के कान में मिश्री घोली थी.

वह दिन भी जब सतीश ने उस का हाथ हौले से पकड़ा था फिसलने से रोकने के बहाने, अब यह बात दूसरी है कि तब सौम्या सम  झ भी नहीं पाई थी कि वह संभलने के बजाय फिसल रही है किसी गहरी अंधेरी खाई में. अंत में वह दिन भी जब उस ने फिर कदम रखा था. खैर, वह तो कल ही की बात थी.

सतीश पवन का बहुत ही अजीज दोस्त था, कम से कम पवन तो यही सम  झता था. हालांकि दोनों की जानपहचान ज्यादा पुरानी नहीं थी लेकिन जिस तरह बहुत तेजी से कुछ ही दिनों में सौम्या उस के जीवन का हिस्सा बन गई थी, उसी तेजी से सतीश ने भी पवन के जीवन में प्रवेश कर के उस पर एक तरह का वर्चस्व हासिल कर लिया था. देखने में बहुत सुंदर, भोलीभाली सांवली सूरत वाला हंसमुख जवान, जबान में मानो शहद घुली हो. हमदर्द इतना कि चारों पहर एक पांव पर खड़ा. पवन की मां की बीमारी के समय रातभर अस्पताल में जाग कर रात गुजारी थी उस ने. साथ ही यारों का यार.

पवन और सौम्या की शादी के बाद जितनी बड़ी पार्टी खुद उस के परिवार वालों ने नहीं दी थी उस से बड़ी और भव्य पार्टी सतीश ने दी थी, शानोशौकत और मुहब्बत से. स्वाभाविक था कि ऐसे में आपसी सौहार्द और प्रेम दिन दूना रात चौगुना बढ़ता. यह नहीं था कि सतीश अकेले पवन की पसंद हो या फिर सिर्फ उस का साथी, वह तो पूरे परिवार का हमदम भी था. हमदर्द भी और दोस्त भी.

और सौम्या का, उस का तो सबसे खास, करीबी, अपना, फिक्रमंद, लाजवाब देवर था जो हर मौके के लिए, हर काम के लिए, हर आदेश पर, हर समय उस के सामने सिर  झुकाए मौजूद रहता.

हां, साथ ही वह सौम्या को उस की कुछ छिपी हुई अच्छाइयों और खूबियों के बारे में भी बताता जिन का स्वयं सौम्या को भी एहसास नहीं था लेकिन जो उसे सतीश के मुंह से सुन कर बहुत अच्छा लगता, उसे लगता मानो उसे सही अर्थों में सम  झनेबू  झने वाला कोई मिल गया है.

फिर एक दिन सौम्या ने उस की मौजूदगी में एक गाना सुनाया. गाने के बोल उसे आज तक बखूबी याद हैं, ‘मोरा गोरा रंग लई ले…’ साथ ही उसे यह भी याद है कि गाना खत्म होने के बाद भी सतीश न जाने कितनी देर तक तालियां बजा कर बधाई देता रहा था. रात में खाने की टेबल पर भी वह लगातार सौम्या की ही तारीफ करता रहा था और पहली बार पवन के चेहरे पर अजीब से खिंचाव और तनाव के भाव उभरे थे.

उस रोज के बाद से जहां पवन ने सतीश से मिलनाजुलना कम करना शुरू कर दिया था वहीं सौम्या और सतीश की मुलाकातों का सिलसिला बढ़ता ही चला गया था. सतीश ने ही सौम्या को बताया था कि मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में कई संगीतकार और गायकगायिका उस की मित्रमंडली में हैं. उसी ने सौम्या को फिल्मों में गाना गाने की भी सलाह दी थी इस टिप्पणी के साथ कि उस जैसी प्रतिभाशाली महिला का अपने गुणों को दबाए रखना कुदरत का अपमान करने के समान था.

लेकिन जब उस रोज रात को सौम्या ने यह बात पवन को बताई थी तो खुश होने के बजाय वह अचानक बिफर गया और गुस्से की हालत में न जाने क्याक्या अनापशनाप बकने लगा था. वैसे तो वह कई दिनों से कुछ खिंचाखिंचा सा रहता था पर उस दिन तो वास्तव में ही सारी हदें लांघ गया था.

सौम्या उस रात तो चुप रह गई लेकिन अलगाव की शुरुआत बखूबी हो चुकी थी. कुछ ही दिन बाद घर की हालत ऐसी हो गई मानो वह श्मशान हो तथा पवन और सौम्या उस में पड़ी 2 लाशें जिन का आपस में कोई वास्ता न हो.

इधर सौम्या और सतीश दिनोंदिन नजदीक आते ही गए. फिर जब पवन का व्यवहार बद से बदतर होने लगा, सतीश की निकटता बढ़ती गईर् और सौम्या की महत्त्वाकांक्षा पंख लगा कर उड़ने लगी तो एक दिन ऐसा आ ही गया जिस का वे दोनों शायद काफी दिनों से इंतजार कर रहे थे. काफी लड़ाई  झगड़े, आरोपप्रत्यारोप और गड़े मुरदे उखाड़ने के बाद सौम्या ने यह कहते हुए वह घर छोड़ दिया कि अब वह जीतेजी पवन का मुंह नहीं देखेगी और पवन ने भी लगभग वैसे ही शब्दों में उस का जवाब दिया.

घर छोड़ कर सौम्या सीधे सतीश के पास आई थी और उसे सारी बात बताई. सतीश ने भी उस की हिम्मत बढ़ाई और एक बार फिर मुंबई चलने की बात दोहराई, लेकिन यह भी साथ में जोड़ दिया कि जाने से पहले उसे अपने सारे गहने और जरूरत भर रुपए घर से लेने चाहिए. सौम्या के लाख सम  झाने पर भी कि अब वह उस घर में दोबारा कभी नहीं जाएगी, सतीश नहीं मान रहा था, इस बीच के समय के लिए ही सतीश उसे   झील के पार बने इस बड़े से खूबसूरत बंगले में ले आया था.

यह कुदरत का करिश्मा ही कहा जाए या सौम्या की नियति कि उस बंगले में घुसते ही उस की बुद्धि अचानक इस तरह जाग्रत हो गई जैसे उसे बिजली का तेज   झटका लगा हो. उस की अंतरात्मा चीखचीख कर उसे धिक्कारने लगी और वह आगे की सारी योजना समाप्त करते हुए चुपचाप तुरंत घर लौटने का आदेश देने लगी.

उसी आदेश में इतना तेज, इतनी ताकत और इतना अधिकारबोध था कि सौम्या चुपचाप, गूंगी गुडि़या की तरह उस का पालन करती हुई वहां से उठी और बंगले से निकल कर उस के कदम खुदबखुद अपने घर की ओर मुड़ गए.

घर आने पर पवन ने काफी कुछ कहा. उलाहना दिया. ताने दिए लेकिन सौम्या ने जवाब में एक शब्द भी नहीं कहा, मानो उस पर तो कोई दूसरी ही ताकत सवार थी. उसे अपनी गलती का एहसास हो रहा था. 2-4 दिनों में सबकुछ सामान्य होने लगा. सौम्या और पवन एकदूसरे से पहले सा व्यवहार करने लगे और महीना बीततेबीतते ऐसा लगने लगा मानो कभी कुछ हुआ ही न हो.

इस घटना के करीब ढाई साल बाद जब पवन और सौम्या घूमने शिमला गए थे तो उन्हें जानेपहचाने 2 चेहरे दिखाई दिए. थोड़ा गौर से देखने पर मालूम हुआ कि उन में से एक उन के करीबी साथी हरीश की बीवी संजना थी और दूसरा उस का पुराना दोस्त सतीश. दोनों बांहों में बांहें डाले ऐसे चले जा रहे थे मानो नवब्याहता हों.

यह देख कर पवन और सौम्या एकसाथ मुसकरा दिए और एकदूसरे का हाथ पकड़ कर अपनी मंजिल की ओर बढ़ गए.

Love Story : करवाचौथ – व्रत न रखने की अनुज की सलाह को क्या निशा मान गई

Love Story : ‘‘कितनी बार समझाया है तुम्हें इन सब झमेलों से दूर रहने को? तुम्हारी समझ में नहीं आता है क्या?’’ अनुज ने गुस्से से कहा.

‘‘गुस्सा क्यों करते हो? तुम्हारी लंबी उम्र के लिए ही तो रखती हूं यह व्रत. इस में मेरा कौन सा स्वार्थ है?’’ निशा बोली.

‘‘मां भी तो रखती थीं न यह व्रत हर साल. फिर पापा की अचानक क्यों मौत हो गई थी? क्यों नहीं व्रत का प्रभाव उन्हें बचा पाया? मैं ने तो उन्हें अपना खून तक दिया था,’’ अनुज ने अपनी बात समझानी चाही.

‘‘तुम्हें तो हर वक्त झगड़ने का बहाना चाहिए. ऐसा इनसान नहीं देखा जो परंपराएं निभाना भी नहीं जानता,’’ निशा बड़बड़ाती रही.

अनुज ने निशा की आंखों में आंखें डालते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे भूखा रहने से ही मेरी उम्र बढ़ेगी, ऐसा ग्रंथों में लिखा है तो क्या सच ही है? ग्रंथों में तो न जाने क्या अनापशनाप लिखा हुआ है. सब मानोगी तो मुंह दिखाने लायक न रहोगी.’’

निशा बुरा सा मुंह बना कर बोली, ‘‘आप तो बस रहने दो. आप को तो बस मौका चाहिए मुझ पर किसी न किसी बात को ले कर उंगली उठाने का… मौका मिला नहीं तो जाएंगे शुरू सुनाने के लिए.’’

‘‘बात मौके की नहीं अंधविश्वास पर टिकी आस्था की है. ब्राह्मणों द्वारा विभिन्न प्रकार की धार्मिक रूढियों के जरीए स्त्री को ब्राह्मणवादी पित्रसत्ता के अधीन बनाए रखने की है.’’

‘‘बसबस आप तो चुप ही करो. क्यों किसी के लिए अपशब्द कहते हो. इस में ब्राह्मणों का क्या कुसुर… बचपन से सभी औरतों को यह व्रत करते हुए देख रही हूं. हमारे घर में मेरी मां भी यह व्रत करती हैं… यह तो पीढ़ी दर पीढ़ी चल रहा है.’’

अनुज अपने गुस्से को काबू करते हुए बोला, ‘‘व्रत, पूजापाठ ये सब ब्राह्मणों ने ही बनाए ताकि ज्यादा से ज्यादा आम लोगों को ईश्वर और भाग्य का भय दिखा कर अपना उल्लू सीधा कर सकें. उन्हें शारीरिक बल से कमजोर कर उन पर पूरी तरह से कंट्रोल कर के मानसिक बेडि़यां पहनाई जा सकें. तुम तो नहीं मानती थीं ये सब… क्या हो गया शादी के बाद तुम्हारी मानसिकता को? इतना पढ़ने के बाद भी इन दकियानूसी बातों पर विश्वास?’’ यह आस्था, अंधविश्वास सिर्फ इसलिए ही तो है ताकि आस्था में कैद महिलाओं को किसी भी अनहोनी का भय दिखा कर ये ब्राह्मण, ये समाज के ठेकेदार हजारों वर्षों तक इन्हीं रीतिरिवाजों के जरीए गुलाम बनाए रख सकें. यही तो कहती थीं न तुम?’’

‘‘मैं ने करवाचौथ का व्रत आप से प्रेम की वजह से रखा है… आप की लंबी आयु के लिए.’’

‘‘तुम मेरे जीवन में मेरे संग हो यही काफी है. तुम्हें अपना प्यार साबित करने की कोई जरूरत नहीं. हम हमेशा हर तकलीफ में साथ हैं. यह एक दिन का उपवास कुछ साबित नहीं करेगा. वैसे भी तुम्हारे लिए भूखा रहना सही नहीं.’’

मुझे आप से कोई बहस नहीं करनी. हम जिस समाज में रहते हैं उस के सब कायदेकानून मानने होते हैं. आप जल में रह कर मगर से बैर करने के लिए मत कहो… कल को कोई ऐसीवैसी बात हो गई तो मैं अपनेआप को कभी माफ नहीं कर पाऊंगी. आप चुपचाप घर जल्दी आ जाओ… मैं एक दिन भूखी रहने से मरने वाली नहीं हूं,’’ निशा रोंआसे स्वर में बोली.पत्नी की जिद्द और करवाचौथ के दिन को महाभारत में बदल जाने की विकट स्थिति के बीच अनुज ने चुप हो जाना ही बेहतर समझा.

तभी मां ने आवाज लगाई, ‘‘क्यों बेकार की बहस कर रहा है निशा से… औफिस जा.’’

‘‘अनुज नाराजगी से चला गया. उसे निशा से ऐसी बेवकूफी की आशा नहीं थी पर उस से भी ज्यादा गुस्सा उसे अपनी मां पर आ रहा था, जो इस बेवकूफी में निशा का साथ दे रही थीं. कम से कम उन्हें तो यह समझना चाहिए था. वे खुद 32 साल की उम्र से वैधव्य का जीवन जी रही हैं. सिर्फ 2 साल का ही तो था जब अचानक बाप का साया सिर से उठ गया.

अनुज को आज महसूस हो रहा था कि स्त्री मुक्ति पर कही, लिखी जाने वाली बातों का तब तक कोई औचित्य नहीं जब तक कि वे खुद इस आस्था और अंधविश्वास के मायाजाल से न निकलें. सही कह रहा था संचित (दोस्त) कि शुरुआत अपने घर से करो. गर एक की भी सोच बदल सको तो समझ लेना बदलाव है.

Best Hindi Story : आई लव यू रिमी – रेपिस्ट को सजा दिलाते युवती की कहानी

Best Hindi Story : सबकुछ कितना अच्छा चल रहा था. लोगों की नजरों में हमारी फैमिली परफैक्ट थी. आज उन्हीं लोगों की नजरों में हमारे लिए तिरस्कार था. ऐसा क्या हो गया था?

रिमी 22 साल की हो गई थी. उस की वर्षगांठ पर देने के लिए सुर्ख लाल रंग की जयपुरी प्रिंट की एक चूनर खरीदी थी मैं ने. मुझे पता था कि रिमी को रंगबिरंगे दुपट्टे बहुत पसंद थे और वह इन दुपट्टों को अपने एक कलैक्शन में बहुत सहेज कर रखती थी.

आज सब दोस्तों के बीच होटल प्रेम विलास में रिमी ने केक काटा तो सब से पहला टुकड़ा मुझे खिलाया. वैसे भी, सभी दोस्तों के बीच मेरे और रिमी के रिश्ते की बात छिपी नहीं थी और हम इसे छिपाना भी नहीं चाहते थे. मैं बीकौम के द्वितीय वर्ष में था और थर्ड ईयर के पूरा होते ही कोई जौब तलाश कर रिमी के घरवालों के सामने शादी का प्रस्ताव रख देने का विचार था मेरा.

रिमी केक काटने के बाद गिफ्ट खोल कर देखने लगी और मेरा लाया हुआ दुपट्टा देख व उसे ओढ़ते हुए बोली, ‘‘अरे वाह, यह तो बिलकुल किसी दुलहन के लाल जोड़े के दुपट्टे जैसा है.’’
‘‘हां, दुलहन ही तो हो तुम मेरी,’’ मैं ने मुसकराते हुए कहा.
शरमा कर रह गई थी रिमी.

मेरे घर वालों को भी एक ऐसी बहू की तलाश थी जो सिर्फ साड़ी पहन कर घर में न बैठे बल्कि बाजार, हाट और बैंक आदि का काम भी बखूबी देख सके और मौका पड़ने पर अपनी व परिवार की सुरक्षा भी कर सके.

रिमी बिलकुल ऐसी ही थी. वह बातचीत में कुशल थी तो घर का कामकाज भी करना जानती थी और अपनी फिटनैस के लिए एक जिम में शाम को वर्कआउट भी करती थी. कुल मिला कर मेरे लिए एक परफैक्ट जीवनसाथी थी रिमी पर अभी तो मेरे बड़े भाई मोहनीश की शादी भी नहीं हुई थी. उन की शादी के बाद ही मैं अपनी शादी के बारे में सोच सकता था.

मोहनीश भैया की उम्र 32 साल, चेहरे का रंग गेहुआं और होंठों पर हमेशा एक चिपकी रहने वाली मुसकराहट उन के व्यक्तित्व का मुख्य हिस्सा थी. महल्ले वालों के बीच बड़े भैया की बहुत अच्छी छवि थी. अपने नाम के अनुसार वे लोगों के बीच अपनेआप को फिल्म ‘हम आप के हैं कौन’ के मोहनीश बहल की तरह एक निहायत ही शरीफ व्यक्ति की तरह प्रस्तुत भी करते थे.

मोहनीश भैया की कई खूबियों में एक खूबी यह भी थी कि वे किसी व्यक्ति की आवाज की नकल हूबहू उतार लेते थे. घर में अकसर वे मां और पापा को हंसाने के लिए अभिनेता दिलीप कुमार और मनोज कुमार की ऐक्टिंग करते और उन की आवाज की नकल करते हुए डायलौग सुनाते. उन के इस टेलैंट का हम सब खूब मजा लेते थे.

मोहनीश भैया हर किसी के काम के लिए सदा तत्पर रहते. भरी दोपहर या देररात किसी के फोन आने पर या किसी भी सहायता के लिए तुरंत जरूरतमंद व्यक्ति के पास पहुंच जाते.

हम 3 भाईबहनों में बड़े भैया मोहनीश के बाद रागिनी दीदी थीं जिन का 29वां जन्मदिन आने वाला था पर इस बार के जन्मदिन को ले कर वे बिलकुल भी उत्साहित नहीं थीं. लड़कियों की उम्र बढ़ने के साथसाथ अगर वे अविवाहित ही रहती हैं तो भला आता हुआ जन्मदिन किसे अच्छा लगेगा और इसीलिए रागिनी दीदी भी अपना जन्मदिन सैलिब्रेट करने के मूड में बिलकुल नहीं दिख रही थीं बल्कि आते दिनों के साथ उन की गंभीरता एक चिड़चिड़ेपन में बदलती जा रही थी.

मुझ में और मोहनीश भैया की उम्र में काफी अंतर था पर हम दोनों, भाई से ज्यादा दोस्त थे और हमारे रिश्ते में यह दोस्ताना लचीलापन बड़े भैया मोहनीश ने ही सिखाया था मुझे. ऐसी कोई बात नहीं थी जो वे मुझ से शेयर न करते थे और मैं भी अपनी सारी व्यक्तिगत बातें उन को बताया करता था.

हमारा रिश्ता इस कदर पारदर्शी था कि वे अपने जीवन में आई हुई महिला मित्रों के बारे में अकसर मुझे बताते और मैं उन के इस तरह से महिला मित्रों से लगातार हुए संबंध और विच्छेद के बारे में प्रश्न खड़ा करता तो वे एक तिरछी सी मुसकराहट के साथ मु?ो बताते कि जीवन का मजा तो उस को पूरी तरह से जी लेने में है. एक जगह रुका हुआ पानी तो सड़ जाता है, इसलिए सतत परिवर्तनशील रहो, ठीक किसी ?ारने की तरह. मोहनीश भैया की ये बातें मेरी समझ में तो न आतीं पर मैं भी ‘हूं’ और ‘हां’ में सिर जरूर हिला देता.

मम्मी और पापा अपने बुढ़ापे को ठीक से गुजारने का प्लान बनाना तो चाहते थे पर रागिनी दीदी की शादी का तय न हो पाना उन के मन में विषाद और दुख को बढ़ा देता था. मोहनीश भैया की शादी के लिए तो कई लड़की वालों के रिश्ते आ चुके थे पर वे हर बार लड़की न पसंद आने का बहाना बना देते थे. हालांकि मुझे पता था कि वे शादी ही नहीं करना चाहते थे. उन का मानना था कि वे किसी एक खूंटे से बंध कर रहने वालों में से नहीं हैं पर अपनी इस बात को उन्होंने मुझ तक ही सीमित रखा था.

पूरे महल्ले में हमारा परिवार एक हैप्पी परिवार दिखता था. लोगों को भला और चाहिए भी क्या. मेहताजी के 2 बेटे हैं और एक सुंदर सी बेटी और ये सब सुन कर मां बहुत खुश हो जातीं और उस दिन तो वे और भी खुश हो गईं जब रागिनी दीदी को देख कर गए लड़के वालों का फोन आया कि रागिनी दीदी उन्हें पसंद आ गई हैं और वे आती फरवरी में ही शादी करने को तैयार हैं.

‘‘पर इतनी सारी तैयारियां इतने कम समय में कैसे पूरी हो पाएंगी?’’ मां ने खुशीमिश्रित चिंता दिखाई तो मोहनीश ने विश्वास बंधाते हुए मां से चिंता न करने को कहा, ‘‘वक्त पर सब हो जाएगा मां. आप कोई चिंता मत करो.’’ जिस के बदले में मां ने मुसकराते हुए स्वीकृति में सिर हिलाया था.

मोहनीश भैया सब को मोटिवेट करने और दिलासा देने का काम बहुत अच्छे ढंग से कर लेते थे. सो, मैं ने अपनी और गर्लफ्रैंड रिमी की एक समस्या का हल मोहनीश भैया से जानना चाहा, ‘‘भैया, जैसा कि आप जानते हैं कि रिमी फिट रहने के लिए मेरे साथ जिम जाती है. लेकिन पिछले कुछ समय से उस का वर्कआउट करने का मोटिवेशन खत्म सा हो रहा है. इसी कारण वह जिम जाने से आनाकानी कर रही है.’’
मोहनीश भैया ने थोड़ा सोचते हुए कहा, ‘‘जरूरी नहीं कि खूबसूरत लोगों के पास जिम जाने की हिम्मत भी हो.’’

उन की यह बात सुन कर मैं थोड़ा चौंका तो वे अचकचा सा गए और इधरउधर की बातें करने लगे.

इतने में मेरे मोबाइल पर एक कौल आ गई और मैं फोन पर व्यस्त हो गया. जिम के मोटिवेशन वाली बात आईगई हो गई.

आज सुबह से ही रागिनी दीदी अपने फोन पर बात करते हुए दिख रही हैं. निश्चित ही अपने होने वाले पति से उन की हायहैलो हो रही है और इस बातचीत करने के चक्कर में आज भी उन्हें अपने औफिस जाने में देर हो जाएगी और आज ही मां और पापा को अपने ब्लडशुगर की नियमित होने वाली जांच के लिए अस्पताल भी जाना है.
‘‘बेटा, यूनिवर्सिटी जाते समय हमें रूमीगेट इलाके में डाक्टर गुप्ता के अस्पताल के पास छोड़ देना. वहां से हम दोनों टहलते हुए क्लीनिक पहुंच जाएंगे,’’ मां ने मु?ा से कहा तो मैं ने स्वीकृति में सिर हिला दिया और गाड़ी गैराज से बाहर निकाल कर उसे साफ करने लगा.

रागिनी दीदी, मैं और मांपापा घर से बाहर थे और घर में मोहनीश भैया ही रह गए थे जिस का मतलब साफ था कि दूध वाले के आने पर दूध उन को ही लेना होगा और उसे गरम कर के फ्रिज में रखना भी होगा.

मांपापा को अस्पताल छोड़ कर मैं यूनिवर्सिटी पहुंचा पर काफी देर तक इंतजार करने के बाद भी रिमी नहीं आई. रिमी ऐब्सैंट तो नहीं रहती है और यदि उसे नहीं आना होता तो मु?ो जरूर बताती, यह सोच कर मैं ने उस से बात करने के लिए मोबाइल निकालना चाहा पर यह क्या, मोबाइल तो शायद मैं घर पर ही भूल आया था.

आजकल हमें मोबाइल की इतनी आदत हो गई है और अगर कोई व्यक्ति अपना मोबाइल घर में भूल जाए तो उस का समूचा अस्तित्व ही डांवांडोल सा होता प्रतीत होता रहता है और वह अपनेआप को पूरे समाज से कटा हुआ महसूस करता है.

बड़े खीझे मन से मैं ने अपनी क्लासेज पूरी कीं और वापसी में रिमी का हालचाल लेने के लिए उस के घर की ओर रवाना हो गया.

अकसर ही रिमी के घर के दरवाजे पर उस की मां, पापा या रिमी का छोटा भाई मिल जाते थे पर आज तो यहां सन्नाटा छाया हुआ था. मकान का गेट और फिर कमरे का छोटा दरवाजा भी बंद था. मेरा मन किसी अनहोनी की आशंका से भर उठा था. कोई भी अनिष्ट सहज ही कोई एहसास सा देने लगता है. कई बार कौलबेल बजाने पर भी दरवाजा नहीं खुला. मेरा मन विचलित हो उठा था. जब कुछ समझ नहीं आया तो मैं दरवाजे के आगे वाली खिड़की के पास जा कर अंदर झांकने लगा और रिमी के नाम की आवाज लगाई.

कुछ देर बाद दरवाजा खुला. सामने रिमी का छोटा भाई खड़ा था. उस के चेहरे पर गुस्से के भाव देख कर कुछ समझ नहीं आया. मैं उसे साइड में हटा कर अंदर चला गया. सामने कोई भी नहीं नजर आ रहा था. मैं ने नजर घुमाई.

रिमी के कमरे से घुटीघुटी सी रोने की सी आवाज आ रही थी. मैं कमरे में प्रवेश कर गया. कमरे के अंदर का मंजर अजीब था. रिमी के बाल बिखरे हुए थे. उस के चेहरे पर चोट और खरोंच के निशान थे. वह लगातार रोए जा रही थी. उस की मां ने मु?ो घृणा से देखा और छाती पीट कर विलाप करने लगी.

‘‘क्या, क्या हुआ, रिमी?’’ बड़ी मुश्किल से अस्फुट स्वर में बोल सका मैं.

मेरे सवाल का जवाब किसी ने नहीं दिया. मैं ने फिर वही सवाल दोहराया तो रिमी के पापा, जो अब तक किसी उधेड़बुन में पड़े हुए थे, ने मेरे सीने पर हाथ मारते हुए कहा, ‘‘जैसे तुम्हें कुछ पता नहीं है कि उस के साथ क्या हुआ है?’’

यह सुन कर मेरे चेहरे पर कई प्रश्नचिह्न आतेजाते रहे पर कमरे का माहौल गमगीन और रुदन भरा था.

मैं भी इस तरह के अजीब व्यवहार से परेशान हो चुका था. रिमी के पापा से सख्ती पर धीमी आवाज में पूछा, ‘‘पर अंकल, बात है क्या आखिर?’’
‘‘हम लोगों ने रिमी को तुम्हारे निकट इसलिए आने दिया क्योंकि तुम उस से शादी करना चाहते थे पर हमें क्या पता था कि तुम उसे अपने घर बुला कर अपने भाई से रिमी का रेप करा दोगे,’’ इस से आगे वे बहुतकुछ और बोलना चाहते थे पर बोल न सके और फफक कर रोने लगे.

‘रेप’ शब्द ने मेरे अंदर एक भूचाल सा ला दिया. ये रिमी के पापा क्या कह रहे हैं? रिमी का मोहनीश भैया ने रेप किया, वे मोहनीश भैया जिन को मैं अपना आदर्श मानता था, वे मोहनीश भैया जो महल्ले में शराफत की मूर्ति माने जाते थे. नहीं, नहीं, वे ऐसा नहीं कर सकते, जरूर रिमी को कोई गलतफहमी हुई होगी पर रेप जैसे घृणित कृत्य में गलतफहमी कैसी? पर हां, पिछले दिनों उन की बातों से रिमी की खूबसूरती के प्रति आसक्ति भी ?ालक रही थी.

मोहनीश भैया की छवि मेरे सामने ध्वस्त होने लगी थी. हजारों जहर की सूइयां एकसाथ मेरे कलेजे में घोंप दी गई थीं. मेरी नजर रिमी के चेहरे पर गई. अब मुझे घर का सारा परिदृश्य समझ में आने लगा था.

रिमी से बात कर पाना तो मेरे लिए संभव न था और घर के सभी लोगों की नफरतभरी नजरों का सामना भी नहीं कर पा रहा था मैं, मुझे समझ में आ चुका था कि रिमी के साथ हुए कृत्य का जिम्मेदार ये लोग मुझे ही समझ रहे हैं पर मैं तो निर्दोष था पर इस समय मैं यहां रुकूं या जाऊं, कुछ समझ नहीं आया तो मैं ने रिमी के पास जा कर उस के कंधे पर हाथ रखा और उस की आंखों में झांकने की कोशिश की, पूछा, ‘‘कैसे क्या हुआ?’’

रिमी की आंखें अंगारों सी हो रही थीं. बहुत प्रयास करने के बाद हिचकीभरे स्वर में वह बोली, ‘‘मुझे अकेले घर बुला कर…?’’
आगे कुछ न कह सकी थी रिमी, स्वर हिचकियों में बंध गया था.

मैं हैरान था, आज तो रिमी से मेरी बात ही नहीं हुई. थोड़ी देर चुप रहने के बाद मैं ने कुछ सोच कर रिमी के मोबाइल की कौल डिटेल्स देखी. रिमी ने मुझे आज सुबह 10.30 पर कौल किया और कौल समरी दिखा रही थी कि मेरे मोबाइल से मेरे घर में किसी की बात भी हुई थी पर मैं तो अपना मोबाइल घर पर ही भूल गया था.

मैं सारे बिखरे तार जोड़ने लगा था. रिमी ने मुझे फोन किया तो क्या मोहनीश ने मेरे फोन से बात की है, मैं ने तुरंत कौल रिकौर्डिंग सुननी शुरू कर दी और जल्द ही मुझे पता लग गया कि मोहनीश भैया ने रिमी का नंबर देख कर उस से बात की है और वह भी मेरी आवाज की नकल कर के उन्होंने रिमी को घर पर आने को कहा और यह भी कहा कि रिमी के आते ही वे लोग यूनिवर्सिटी के लिए निकल लेंगे.

रिमी ने मोहनीश की आवाज को मेरी आवाज समझ कर भरोसा किया और घर चली आई होगी.

हालांकि मैं ने इस घटना की कडि़यां तो जोड़ ली थीं पर मोहनीश भैया, जिन्हें भैया कहने में मुझे घिन आ रही थी, मेरा मन कर रहा था कि मोहनीश के चेहरे पर जा कर थूक दूं, शराफत का झुठा चोला ओढ़ कर कितनी गंदगी भर रखी थी मोहनीश ने. निश्चित रूप से अंदर से उन की मानसिकता विकृत ही थी, तभी तो वे शादी नहीं करना चाह रहे थे पर ये सब बातें तो एक तरफ पर वे मेरी महिला मित्र के साथ ही रेप करेंगे, यह तो सोचा भी नहीं था.

उन्होंने ऐसा किया है तो उन को इस कृत्य की सजा मिलनी ही चाहिए पर सजा देने के लिए तो हमें कानून का सहारा लेना होगा और कानून हमारी मदद करे, इस के लिए सही सुबूत पुलिस को देने होंगे. कोई भी रेप पीडि़ता सब से पहले यही गलती करती है कि वह अपने साथ हुए कुकृत्य के कारण परेशान हो कर नहा लेती है या अपनेआप को धो डालती है जिस से उस के शरीर पर हिंसा और चोट के मौजूद सुबूत नष्ट हो जाते हैं.
‘‘हमें पुलिस बुलानी होगी,’’ यह कहते हुए मैं ने पूरे अधिकार और दृढ़ता के साथ पुलिस स्टेशन को फोन लगा दिया था.

पुलिस का रवैया ढुलमुल न रहे, इस के लिए मैं ने महिला अधिकार और अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने वाली एक एनजीओ को भी फोन कर के बुला लिया था. मेरी यह सारी कार्यवाही देख कर रिमी के चेहरे पर लाचारी की जगह एक दृढ़ता ने ले ली थी जिस का मतलब साफ था कि वह पुलिसिया कार्यवाही से बिना घबराए मोहनीश के खिलाफ बयान देने के लिए तैयार है.

पुलिस ने आ कर रिमी से पूछताछ की और मेरे सम?ाए अनुसार रिमी ने बताया कि यह मोहनीश ही था जिस ने रिमी को मेरी आवाज निकाल कर उसे घर में बुला कर उस के साथ गलत काम किया.

पुलिस ने रिमी के बयान ले कर केस दर्ज करते हुए फौरन मोहनीश भैया को गिरफ्तार कर लिया.

पर मात्र गिरफ्तारी ही रिमी के दिल को ठंडक नहीं देने वाली थी. वह तो मोहनीश को सजा दिलाना चाहती थी पर अदालती कार्यवाही की प्रक्रिया लंबी चलती है, इसलिए रिमी को धैर्य रखना था.

एक रेपिस्ट के घृणित कृत्य के बाद उस के परिवार को क्याक्या भुगतना पड़ता है, यह हमें अब पता चल रहा था क्योंकि मेरे मांपापा से महल्ले वालों ने दूरी बना ली थी, रागिनी दीदी को यह कह कर नौकरी से निकाल दिया गया कि हम एक रेपिस्ट की बहन को काम पर नहीं रख सकते और फिर एक शाम को रागिनी दीदी के मोबाइल पर उन के होने वाले हसबैंड का फोन आया कि वे रागिनी दीदी से शादी नहीं कर सकते. बेचारी दीदी अवसाद में आ चुकी थीं.

मेरे दोस्त भी मुझ से कन्नी काटने लगे थे. मेरा ग्रेजुएशन पूरा नहीं हो सका और मैं ने पढ़ाई छोड़ कर एक कार के शोरूम में प्राइवेट नौकरी कर ली.

रिमी केस की हर तारीख पर कोर्ट जाती रही और बेबाकी से वकीलों के हर उलटेसीधे सवाल का जवाब देती रही, साथ ही, समाज की चुभती नजरों का सामना भी बखूबी किया रिमी ने. रिमी के रवैए ने समाज को एहसास कराया कि यदि उस के साथ रेप हुआ है तो इस में गलती रेपिस्ट की है, न कि रिमी की और इस बात की सजा भी रेपिस्ट को ही मिलनी चाहिए.

यह रिमी की साधना का ही परिणाम था कि पूरे 2 साल बाद मोहनीश को रेप के केस में कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी. रिमी के उदासीभरे चेहरे पर संतुष्टि का भाव तो जरूर था पर भला इन बीते 2 वर्षों में रिमी और उस के परिवार ने जो कुछ भी खोया था उस की भरपाई तो कोई भी नहीं कर सकता था. खोया तो मेरे परिवार ने भी बहुतकुछ था- मानसम्मान, रिश्तेनाते और दीदी की नौकरी भी तो मोहनीश के इस कृत्य के कारण ही गई थी.

उधर रिमी समाज के तानों से डरी नहीं, दबी नहीं और न ही उस ने आत्महत्या जैसा कोई कायराना कदम भी न उठाया. बस, यही उस की जीत थी. आज समाज और मोहनीश जैसे भेडि़यों का कद रिमी के सामने बौना हो गया था.

आज मैं रिमी के घर पहुंचा था. मैं ने खुद ही किचन में जा कर चाय बनाई और रिमी की तरफ बढ़ा दी, रिमी की मां और पापा ने चाय पीने के लिए पहले से ही मना कर दिया था, सो उन्हें
चाय नहीं औफर की और खुद चाय पीने लगा.

‘‘मोहनीश ने जो किया उस के लिए मैं बहुत शर्मिंदा हूं और आप सब से माफी मांगता हूं, देर से ही सही पर अब जबकि रिमी को इंसाफ मिल चुका है तो ऐसे में रिमी की शादी के लिए…?’’ आगे की बात मैं पूरी नहीं कर सका और चुप हो गया.
मेरे सवाल के बदले में कमरे में एक नीरवता छाई रही.
‘‘समाज, रिश्तेदार और महल्ले के लोगों ने तो हम से दूरी बना ली है और भला एक रेप पीडि़ता से कौन शादी करना चाहेगा?’’ यह रिमी के पापा की मुरझाई सी आवाज थी.
मैं ने अपने साथ लाई हुई जयपुरी प्रिंट की एक सुर्ख लाल रंग की चुनर रिमी के कंधे पर ओढ़ा दी.

रिमी ने चूनर देख कर आंखें बंद कर ली थीं, शायद यह रिमी की स्वीकृति थी. मु?ो लगा कि लाल चुनर के सुर्ख रंग से रिमी पूरी तरह खिल उठी है.
‘‘तुम ने ही तो कहा था कि यह चुनरी तो किसी दुलहन की लग रही है. देखो न, इसे मेरी होने वाली दुलहन ने ओढ़ रखा है,’’ यह कहते हुए मैं ने एक छोटा सा आईना रिमी के चेहरे के सामने
रख दिया.

जिस तरह रात के अंधेरे को चीर कर सुबह का सूरज उदय होता है, रिमी के चेहरे पर भी छिपे दर्द के बीच से एक मुसकराहट उभरती आ रही थी.

अपनी होने वाली पत्नी के लिए मेरी कसौटी अब बदल चुकी थी.

एक पत्नी भले सुंदर न हो, घरबाहर का काम भी न आता हो पर उसे अन्याय और अत्याचार के खिलाफ संघर्ष करना आना चाहिए, आवाज उठानी आनी चाहिए, हक के लिए लड़ना आना चाहिए.

रिमी बिलकुल ऐसी ही तो थी.

आई लव यू, रिमी.

Artifical Intelligence का डर

Artifical Intelligence : साल 1949 में मशहूर इंग्लिश उपन्यासकार जोर्ज ओरवेल की एक उपन्यास ‘1984’ पब्लिश हुई. कहानी एक ऐसे यूटोपियन सोसाइटी की थी जहां निरंकुश सत्ता लोगों पर अपना नियंत्रण रखती है. नियंत्रण के लिए ‘थिंकपोल’ ईकाई होती है जिस का काम उन लोगों की पहचान करना होता है जो विरोधी विचारों के हैं. यहां तक कि सत्ता ‘न्यूस्पीक’ नाम की भाषा भी विकसित करती है, जिस में ऐसे शब्द हमेशा के लिए मिटा दिए जाते हैं जो सत्ता विरोधी हों या सरकार से मेल न खाते हों. इस के अलावा सरकार लोगों की निजी जिंदगी, सोचने के तरीके, भाषा और इतिहास को नियंत्रित करती है.

यह उपन्यास जब बाजार में आई तो लोकतांत्रिक मूल्यों पर विश्वास करने वालों को चिंता में डाल गई. चिंता इसलिए, कि क्या हो अगर ये सब सच होने लगे? क्या हो जब उन की पलपल की हरकतों पर गोल्डस्टीन जैसे किसी शासक की नजर हो? क्या हो जब उन का पूरा डाटा सरकार के पास हो? और क्या हो कि जब उन की भाषा, उन के शब्द, उन के विचार सीमित हो जाएं?

सवाल 75 साल पुराने हैं मगर आज 21वीं सदी में आर्टिफिशियल इंटेलिजैंस के दौर में ज्यादा वाजिब बन पड़े हैं. वाजिब इसलिए कि लोगों की निर्भरता इस पर बढ़ती जा रही है. उन की अपनी राय, अपनी समझ और अपने विचार सिकुड़ते जा रहे हैं. लोग हर चीज एआई से पूछ रहे हैं. मानो एआई ‘सर्वज्ञ’ बन पड़ी हो.

कोई उपयोगकर्ता एक्स पर अपना ट्वीट एआई की मदद से करता है तो दूसरा कमेंट में फैक्ट चेकिंग के लिए एआई से ही पूछ रहा है. लोग अपना ईमेल, पत्र, डिजाइन, ट्रांसलेशन, जानकारी लेना, जो बन पड़ता है सब एआई से कर रहे हैं. एआई सवाल पैदा कर रहा है और उस सवाल का जवाब भी खुद ही दे रहा है. इस ने लोगों के विवेक और विश्लेषण पर हमले करने शुरू कर दिए हैं. एक तरह से लोगों को निष्क्रिय कर दिया है. यह उन की भाषा, शब्दों की सीमाओं, वाक्यों की फोरमेशन और सब से जरूरी विचारों तक को ओर्गनाइज करने लगा है. यानी सब व्यवस्थित तरीके से. यह व्यवस्थित तरीका ही पहला हमला है सोच पर.

समस्या यह कि एआई वही जानकारी लेता है जो वह इंटरनेट से ढूंढता है. उस का सहीगलत इंटरनेट के विवेक पर ही है. यानी इंटरनेट पर यदि कोई राय बदल दी जाए तो वह उसी राय को आम लोगों में बांटने लगेगा.

मगर इस की खतरनाक संभावना अभी बाकी है. संभावना उस समाज की जहां उपन्यास ‘1984’ का यूटोपिया समाज सामने बनते दिखता है. यानी सत्ता की भूमिका. सरकार या कुछ गिनेचुने टैक जाइंट्स, जो इस एआई को चला रहे हैं, उन के पास लोगों की क्या कुछ जानकारी नहीं है, यह सोच से भी बाहर है. वे सब जानते हैं. वे जानते हैं कि नंबर ‘1’ को कौन से रंग के जूते पसंद हैं, नंबर ‘2’ के फ्रीज में क्या पड़ा है, नंबर ‘3’ का किस से प्रेम संबंध है, नंबर ‘4’ के घर में किस तरह का लिटरेचर है और नंबर ‘5’ की विचारधारा क्या है.

आम लोग तो सिर्फ एआई के उपयोगकर्ता हैं, मगर जिन के पास इस का एक्सेस है, वे लोगों के जीवन में एक कुरसी पर बैठे बारीक नजर बना सकते हैं. वे उसी कुरसी से देश भर में लगाए गए लाखों सीसीटीवी कैमरे से सब कुछ देख सकते हैं और उसी कुरसी पर बैठे किसी भी देश में बम गिरा सकते हैं. एआई का डर इस का ‘गोल्डस्टीन’ बन जाना है.

Prenuptial Agreement : विवाहपूर्व अनुबंध यानी प्रीनप एग्रीमैंट

Prenuptial Agreement : देश में तेजी से तलाक के मामले बढ़ रहे हैं. अदालत से ले कर परिवार तक हर किसी की मंशा तलाक को बुरा साबित करने की होती है. जबकि बढ़ते तलाक बढ़ती जागरूकता की निशानी हैं. इस में प्रीनप यानी विवाहपूर्व अनुबंध कैसे सहायक हो सकता है, आइए, जानें.

मैं शोभित कुमार पुत्र श्री राजीव कुमार और अर्पिता कुमारी पुत्री श्री राजीव कुमार, उम्र वयस्क, निवासी भोपाल आज एक खास मकसद से यह अनुबंधपत्र साइन कर रहे हैं. हम दोनों एकदूसरे से बेहद प्यार करते हैं और जल्द ही शादी करने का फैसला ले चुके हैं. शादी के बाद भी हमारी जिंदगी इसी तरह हंसीखुशी और तनाव व विवाद रहित गुजरे, इस के लिए हम दोनों विवाहपूर्व इस अनुबंध की कुछ शर्तें संयुक्त रूप से जिन्हें वचन कहा जा सकता है, एकदूसरे को स्वस्थ मन से पूरे होशोहवास में बिना किसी दबाब के स्वीकार कर रहे हैं.यह अनुबंध इसलिए भी कि कल को हम दोनों के बीच ऐसे कोई विवाद या मतभेद होते हैं जो इन शर्तों का उल्लंघन करते हुए हों तो हम दोनों एकदूसरे को यह याद दिला सकें कि हम ने और तुम ने ऐसा कहा था या नहीं कहा था.

मैं शोभित कुमार पक्ष क्रमांक -1 और अर्पिता कुमारी पक्ष क्रमांक -2 पूरे आत्मविश्वास से घोषित कर अनुबंधित होते हैं कि-

1. हम कभी भी एकदूसरे की आजादी में दखल नहीं देंगे बशर्ते वह हमारे वैवाहिक जीवन को किसी भी रूप में बाधित न करती हो.

2. शादी के बाद पक्ष क्रमांक 1 शोभित, पक्ष क्रमांक 2 अर्पिता को बाध्य नहीं करेगा कि वह उस के पेरैंट्स के साथ उन के घर में ही रहे. लेकिन शुरू के 3 साल हम पेरैंट्स के घर में ही रहेंगे, ऐसा हम दोनों ने तय कर सहमति जताई है. इस दौरान पक्ष क्रमांक 2 साल में 2-3 बार मायके जाने को स्वतंत्र रहेगी. आनेजाने का पूरा खर्च वह अपनी सैलरी से उठाएगी.

3. घर पर हम दोनों का खर्च हम दोनों ही मिल कर उठाएंगे जोकि सैलरी का फिफ्टीफिफ्टी होगा न कि कुल खर्च का फिफ्टीफिफ्टी. अगर मेरी सैलरी 1 लाख रुपए है तो मैं उस में से 50 हजार दूंगा और अर्पिता की सैलरी अगर 80 हजार रुपए महीना है तो वह 40 हजार रुपए देगी. बाकी बचे पैसों में से हम दोनों जैसे चाहें अपनी मरजी से खर्च कर सकेंगे, फिर चाहें तो उस की सेविंग्स करें, कहीं इन्वैस्ट करें या फिर मौजमस्ती में उड़ा दें. इस पर दूसरा पक्ष एतराज नहीं जताएगा. हां, कुछ गलत लगे तो समझ जरूर सकता है लेकिन यह समझाइश बाध्यकारी नहीं होगी.

4. हम दोनों जो भी संपत्ति खरीदेंगे वह संयुक्त होगी जिस में दोनों बराबरी से अपनाअपना पैसा मिलाएंगे. संपत्ति दोनों की सहमति से ही खरीदी जाएगी. संपत्ति या वाहन के लिए लोन भी संयुक्त रूप से ही लिया जाएगा और संयुक्त रूप से ही चुकाया जाएगा.

5. शादी के 5 साल बाद तक हम बच्चा प्लान नहीं करेंगे. बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए हम एक संयुक्त बैंक अकाउंट अलग से खोलेंगे जिस में दोनों 10-10 हजार रुपए महीना डालेंगे. इस राशि को निकालने का अधिकार दोनों में से किसी एक को नहीं रहेगा. जरूरत पड़ी तो इसे निकालने के लिए दोनों की सहमति आवश्यक होगी.

6. अगर भविष्य में कभी हम दोनों के बीच किसी तरह का मनमुटाव या मतभेद होते हैं तो हम उन्हें आपसी बातचीत के जरिए सुलझने की कोशिश करेंगे. अगर नहीं सुलझते हैं तो हम बिना किसी हिचक के स्वस्थ मन से अलग हो जाएंगे और अगर तलाक लेने की नौबत आती है तो कोर्ट में एकदूसरे पर आरोपप्रत्यारोप न लगा कर सहमति से हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13 बी के तहत तलाक लेंगे. तलाक के बाद किस का क्या होगा और किस को क्या मिलेगा, यह सिर्फ हम दोनों तय करेंगे. अमूमन यह फिफ्टीफिफ्टी ही होगा.

7. पक्ष क्रमांक 2 अर्पिता तलाक के वक्त या बाद में भरणपोषण या गुजारा भत्ते का दावा नहीं करेगी क्योंकि वह खुद नौकरीपेशा है.

8. वैसे हम दोनों की पूरी कोशिश यह रहेगी कि तलाक न हो लेकिन अगर होता है, और बच्चे के जन्म के बाद होता है तो वह पक्ष क्रमांक 2 के पास रहेगा जो कभी पक्ष क्रमांक 1 को बच्चे से मिलने से रोकेगी नहीं. तलाक को हम दोनों बतौर दुश्मनी नहीं बल्कि बतौर दोस्त लेंगे. बच्चे का आधा खर्च पक्ष क्रमांक 1 वहन करेगा.
आज दिनांक ………… को हम दोनों ने अपनेअपने गवाहों के सामने दस्तखत किए ताकि सनद रहे और वक्तजरूरत काम आए. इस अनुबंध की एकएक प्रति हम दोनों ने अपने पास रखी है. हम दोनों ही अनुबंध की शर्तों का पूरी ईमानदारी से पालन करेंगे.
हस्ताक्षर पक्ष क्रमांक -1 हस्ताक्षर पक्ष क्रमांक -2.
गवाहों के हस्ताक्षर मय पूरा नाम, पता व मोबाइल नंबर सहित.
गवाह क्रमांक -1 गवाह क्रमांक -2

(अगर इस तरह का कोई अनुबंध इस शोभित और अर्पिता ने प्यार करने के दौरान किया होता तो क्या आज वे इतनी तकलीफें भुगत रहे होते जिन की उम्मीद भी उन्होंने नही की थी. इस तरह का अनुबंध जिसे प्रीनप या प्रीनप्शल एग्रीमैंट भी कहा जाता है भारत में कानूनी तौर पर मान्य नहीं है, इसलिए चलन में भी नहीं है. लेकिन यह अगर किया जाए तो पतिपत्नी कई दुश्वारियों से बच सकते हैं. वजह, यह एक नैतिक दबाब का काम तो करेगा. मुमकिन है अदालत भी इस पर गौर करे. खैर, आगे हम 2 मामले विस्तार से बता रहे हैं जिन में पतिपत्नी तलाक की कगार पर हैं)

25 साल का वह हट्टाकट्टा स्मार्ट नौजवान बिलकुल टूटा हुआ लग रहा था. सुर्ख गुलाबी रंगत वाले चेहरे पर बेतरतीब बढ़ी दाड़ी, सूखे होंठों पर बारबार जीभ फेरता वह शहर के नामी वकील के चैंबर की कुरसी में धंसा उन के सवालों का अटकअटक कर जवाब देते कई बार असहज हो जाता था, तब नजदीक की कुरसियों पर स्लेट सा चेहरा लिए बैठे उस के मम्मीपापा उसे हिम्मत बंधाते थे.

मामला एक और तलाक का था जिस की अपनी अलग कहानी थी. इस युवा नाम मान लें शोभित ने अब से कोई 6 साल पहले अर्पिता नाम की अपनी सहपाठी से शादी की थी. इस लव मैरिज की खास बात यह थी कि दोनों को फर्स्ट ईयर में ही प्यार हो गया था. ठीक वैसा ही जैसा ‘बौबी’ फिल्म में ऋषि कपूर को डिंपल कपाडि़या से और लव स्टोरी में कुमार गौरव और विजयेता पंडित को हुआ था.

दोनों की जातियां अलगअलग थीं. शोभित ठाकुर खानदान का था तो अर्पिता ब्राह्मण. दोनों के ही पेरैंट्स खासे इज्जतदार, पैसे वाले, दिखनेदिखाने में आधुनिक थे लेकिन हकीकत में एक हद तक परंपरावादी थे. लव मैरिज के खिलाफ थे या नहीं, यह कहा नहीं जा सकता लेकिन दोनों ही युवाओं ने अपने मांबाप पर भरोसा नहीं किया था और गुपचुप कोर्ट में शादी कर ली थी.

दिलचस्प बात यह है कि दोनों को इतना ज्ञान तो मिल चुका था कि बाद की जिंदगी आसान नहीं रहेगी क्योंकि पैसों के लिए पेरैंट्स की मुहताजी थी. शादी कर शोभित अर्पिता को ले कर फिल्मी स्टाइल में घर पहुंचा तो कैब से उतरते वक्त उस के पैर कांप रहे थे. पता नहीं मम्मीपापा का रिऐक्शन क्या होगा, रखेंगे या घर से निकाल देंगे. हुआ वही जो आज के पेरैंट्स की मजबूरी होती है. थोड़े से सवालजवाबों और नाराजगी के बाद घर में एंट्री दे दी गई.

मांबाप दोनों हालांकि सदमे की सी हालत में थे लेकिन खुद को काबू में किए रहे थे क्योंकि अब कुछ नहीं हो सकता था और जो हो सकता था वह करने की उन में न हिम्मत थी और न ही इच्छा थी.

उन के सामने अपनी दुनिया और समाज थे जिसे मैनेज करने के लिए अगले सप्ताह ही एक नामी होटल में शानदार रिसैप्शन दे दिया गया. अर्पिता के पेरैंट्स और कुछ रिश्तेदार भी उस में शामिल हुए लेकिन साफ दिख रहा था कि राजीखुशी नहीं हुए थे. उन्होंने बेटी को भोपाल भेजा था पढ़ने के लिए पर वह शोभित पर कुछ ऐसे मरमिटी थी कि पढ़ाई, कैरियर वगैरह सब प्यार के हवनकुंड में स्वाहा हो गया था जिस में आहुति शोभित ने भी दी थी.

तमाम दुश्वारियों के बाद भी यह नया ताजा कपल सभी को पसंद आया था. हालांकि उन की मासूमियत और बौडी लैंग्वेज बता रही थी कि वे अपनी अपरिपक्वता और उस के नतीजों से अभी वाकिफ नहीं हैं. स्टेज पर दोनों एकदूसरे में खोए हुए, एकदूसरे से सटे हुए दीनदुनिया से बेखबर मेहमानों का आशीर्वाद और उपहार लिए जा रहे थे मानो उन्हें सबकुछ मिल गया हो.

शोभित को पेरैंट्स पर गर्व हो रहा था जिन्होंने उस से कहा था कि ठीक है जो हुआ सो हुआ लेकिन अब दोनों पढ़ाई और कैरियर पर ध्यान दो. अर्पिता के पेरैंट्स और रिश्तेदार कुछ सस्तेमहंगे उपहार बेटीदामाद को दे कर चलते बने. उन्हें अपनी बेटी के भविष्य को ले कर बेफिक्री नहीं थी जिस ने हमेशा अपने मन की की थी, कभी किसी की नहीं सुनी थी और शादी की इतनी जल्दी थी कि अपने बालिग होने के दूसरे दिन ही शादी कर ली थी.

शोभित के पेरैंट्स ने बेमन से ही सही अर्पिता को अपना लिया था. बेटाबहू दोनों अब साथसाथ कार से कालेज जाते थे जिस का खर्च भी पढ़ाई की तरह वे ही उठा रहे थे लेकिन अर्पिता के खर्चे शाही थे. नौकरीपेशा औफिसर सास से जबतब शौपिंग के लिए पैसे मांग ले जाती थी. मौजमस्ती और दूसरे शौक भी उन्हीं की कमाई से पूरे होते थे.

शादी के दूसरे साल यानी सैकंड ईयर में ही अर्पिता प्रैंगनैंट हो गई. जल्द ही उस ने एक खूबसूरत बेटे को जन्म दिया. अब शोभित के पेरैंट्स पर एक नई जिम्मेदारी आ गई लेकिन वे खुश थे क्योंकि उम्मीद से कम वक्त में दादादादी बन गए थे. नए बच्चे में उन का सारा वक्त बीतने लगा.

क्या आप दोनों ने बच्चे की बाबत भी जल्दबाजी नहीं की, वकील साहब ने शोभित से सवाल किया तो वह फिर सकपका गया. सिंह दंपती को भी समझ नहीं आया कि इस सवाल से तलाक के मुकदमे का क्या संबंध हो सकता है.

विवाद बढ़ने के बाद अर्पिता बच्चे को साथ ले कर अलग रहने लगी थी. बच्चा होने के बाद की कहानी अलगाव और तलाक के आम किस्सों जैसी ही थी जिस में हुआ इतनाभर था कि अर्पिता जम कर कलह करने लगी थी. अलग रहने की जिद पर अड़ गई थी तो शोभित के पेरैंट्स ने उन्हें अलग फ्लैट खरीद कर दे दिया था ताकि रोजरोज की कलह से मुक्ति मिले.

पर कलह खत्म नहीं हुई क्योंकि डिग्री लेने के बाद भी शोभित को नौकरी नहीं मिली थी. लिहाजा, बातबात पर पैसा मम्मीपापा से ही लेना पड़ता था जो आमतौर वे दे देते थे. फ्लैट में शिफ्ट होने के बाद भी संबंध खत्म नहीं हुए थे. सिंह दंपती पोते का मोह नहीं छोड़ पा रहे थे, इसलिए जबतब फ्लैट पर पहुंच जाते थे, बच्चे के साथ खेलते थे और उसी के नाम पर पैसे भी दे आते थे.

बच्चा पैदा करना अर्पिता की जिद थी, शोभित बोला उस का कहना था कि इस से मम्मीपापा को खुशी मिलेगी और हमारे बीच बौंडिंग बढ़ेगी. जवाब सुन कर वकील साहब ने सिर सा पकड़ लिया और बोले, आप लोग शुरू से ही उस लड़की की चालाकी का शिकार होते रहे हैं. उस ने शादी के लिए जल्दबाजी की. फिर बच्चे के लिए की और अलग हो गई. इस से बौंडिंग बढ़ी या खत्म हुई.

अब इतना हो सकता है कि आप लोग बच्चे का मोह छोड़ें और लड़की के खिलाफ सबूत जुटाएं. इस हफ्ते मुकदमा दायर हो जाएगा, वकील साहब ने बात कुछ इस अंदाज में कही थी कि अब आप लोग बढ़ लो. मुकदमे का ड्राफ्ट तैयार होते ही आप लोगों को बुला लिया जाएगा.

अब याद करने से क्या फायदा

बुझे मन से शोभित मम्मीपापा के साथ घर आ गया और अपने कमरे में बंद हो गया. बिस्तर पर पड़ेपड़े वह याद कर रहा था कि शादी के पहले अर्पिता उस की हर शर्त और बात पर थोड़ी सी नानुकुर के बाद राजी हो जाती थी. मसलन यह कि हम लोग जिंदगीभर मम्मीपापा के पास ही रहेंगे, उन की सेवा करेंगे, अपने खर्चे के लिए उन से ज्यादा पैसे नहीं लेंगे यानी उन पर बोझ नहीं डालेंगे और अहम बात, बच्चा तभी प्लान करेंगे जब दोनों या दोनों में से कोई एक कमाने लगेगा.

अब उसे अपनी बेवकूफी और बेबसी पर खीझ हो रही थी कि कैसे वह अर्पिता की धूर्तता का शिकार होता रहा था. वह अव्वल दर्जे की चालाक निकली जो अब 50 लाख रुपए और फ्लैट अपने नाम चाह रही है. 2 बार थाने में घरेलू हिंसा और प्रताड़ना की रिपोर्ट लिखा चुकी है और अब मैंटिनैंस का भी मुकदमा ठोंक दिया है.

वकील लोग लाख हिम्मत बधाएं कि कुछ नहीं होगा, ऐसे मामलों में तो ये बातें आम हैं. हम तो दिनरात यही सब तमाशे देखते रहते हैं, तुम्हें या तुम्हारे पेरैंट्स को कोई गुजाराभत्ता नहीं देना पड़ेगा क्योंकि तुम्हारी कोई आमदनी या रोजगार नहीं है. हम सब संभाल लेंगे.

पर शोभित का दिल संभालने वाला कोई न था जिस के दिमाग में रहरह कर यह खयाल कौंध रहा था कि उसे शादी से पहले ही अर्पिता से वह सब लिखवा लेना चाहिए था जिस पर उस ने हामी भरी थी और अब सरासर मुकर रही है. उस कागज को वह वकील और जज को दिखाता तो एक झटके में उस की हकीकत सामने आ जाती और तलाक भी आसानी से मिल जाता.

हैरानपरेशान शोभित जो सोच रहा है वही वे लाखों लोग सोचते हैं जिन की वैवाहिक जिंदगी, वजह कुछ भी हो, टूटने की कगार पर है. साथी की वादाखिलाफी, बेवफाई और किसी भी किस्म की बेईमानी कैसे आदमी को तोड़मोड़ कर देती है, यह तो शोभित जैसे पीडि़त ही बता सकते हैं या फिर इंदौर की नेहा जैसी युवतियां जो बहुत परिपक्व और अच्छे जौब में हैं. नेहा ने अपने सहकर्मी रांची के असित से बेंगलुरु में शादी की थी. लेकिन दोनों ने पेरैंट्स की अनुमति और सहमति ले ली थी जो एक तरह की फौर्मेलिटी थी.

शुरू से अकेले रहने की आदी रही नेहा ने असित को 3 साल डेट किया था. इस दौरान दोनों समझ रहे थे कि उन्होंने एकदूसरे को इतना तो समझ लिया है कि शादी के बाद कोई दिक्कत पेश नहीं आएगी. एकएक बात पर दोनों एकमत हुए थे, मसलन घर का किराया कौन देगा, किस की सैलरी में कितनी सेविंग अलगअलग और संयुक्त होगी, पैसा कहांकहां इन्वैस्ट किया जाएगा, रिश्तेदारी कितनी और कैसे निभाई जाएगी और बच्चा कब पैदा करेंगे वगैरहवगैरह.

असित अपने घर वालों को बहुत चाहता, इसलिए नेहा को शक था कि शादी के बाद कहीं वह अपनी विधवा मां को बेंगलुरु न ले आए. इसलिए उस ने एक नहीं बल्कि दर्जनों बार असित को बता दिया था कि वह किसी के साथ भी रहना अफोर्ड नहीं कर सकती.

इस से उसे असुविधा ही नहीं बल्कि कोफ्त भी होती है. तुम्हारी मां आए, साल में दोचार दिन साथ रहे, यहां तक तो मैं झेल लूंगी लेकिन इस से ज्यादा मैनेज नहीं कर पाऊंगी. इसलिए अच्छी तरह सोच लो, बाद में मुझे दोष मत देना.

असित को नेहा की यह बात यानी साफगोई भी अच्छी लगी थी और उस ने नेहा को आश्वस्त किया था कि ऐसा कुछ नहीं होगा. मां को यहां लाने का उस का कोई इरादा नहीं है और वे खुद भी रांची नहीं छोड़ने वाली. सबकुछ तय हो जाने के बाद शादी हो गई और दोनों अपनेअपने फ्लैट छोड़ कर नए फ्लैट में आ गए. शुरुआती दिन तो गृहस्थी जमाने और शौपिंग में बीत गए. हनीमून प्लान के मुताबिक मनाली में मनाया गया जिस में दोनों ने आधाआधा खर्च उठाया.

3 साल बेहद अच्छे गुजरे. दोनों खुश थे कि तभी असित की मां यों ही घूमनेफिरने के इरादे से बेंगलुरु आ गई. नेहा ने उन का यथासंभव ध्यान रखा क्योंकि वे वाकई में 8 दिनों के लिए आई थीं. लेकिन रांची वापस जाने के कुछ दिनों बाद उन्होंने स्थाई रूप से बेंगलुरु आने की इच्छा जताई तो असित घबरा उठा. मन में इच्छा थी कि अगर नेहा मान जाए तो कितना अच्छा रहेगा, मां का साथ मिल जाएगा जिन्होंने पापा की मौत के बाद उस की पढ़ाईलिखाई के लिए क्या नहीं किया. नानाजी से मिला जमीन का एक टुकड़ा था, वह भी बेच दिया था.

लेकिन नेहा नहीं मानी. उस ने याद दिलाया कि मैं ने इसलिए पहले ही कह दिया था. असित को याद था, इसलिए वह कसमसा कर रह गया. मां को हांहूं कर तरहतरह के बहाने बनाते टरकाता रहा. लेकिन ऐसा बहुत दिनों तक कर पाना मुमकिन नहीं था. हुआ वही जिस का डर था. एक दिन असित की मां अपना बोरियाबिस्तर बांध कर बेंगलुरु आ गईं.

इस के बाद जो हुआ उसे हरकोई समझ सकता है कि इस मामले में असल में गलती असित की थी जिसे मां को पहले ही बता देना चाहिए था. कुछ दिन नेहा उस के साथ रही, फिर समस्या का कोई हल न निकलते देख एक दिन खामोशी से अपना सामान समेट कर दूसरे फ्लैट में रहने चली गई.

अब असित 2 पाटों के बीच पिस रहा था क्योंकि मां सबकुछ जाननेसुनने के बाद भी अपनी जगह से हिलने को तैयार नहीं थीं और नेहा ने उसे वकील के जरिए तलाक का नोटिस भिजवा दिया था. मुकदमा अभी चल रहा है लेकिन ऐसा लग नहीं रहा कि नेहा को आसानी से तलाक मिल पाएगा.

उस के वकील ने उसे सुझाव दिया था कि अगर कुछ जोरदार और गंभीर आरोप लगाए जाएं तो सरलता से तलाक मिल सकता है वरना तो इस ग्राउंड में कोई खास दम नहीं है कि चूंकि सास रहने चली आई इसलिए तलाक चाहिए. दिक्कत यह है कि असित तलाक के लिए तैयार नहीं और अपनी बात वह अदालत में कहेगा भी. मुमकिन यह भी है कि वह अपना पक्ष मजबूत दिखाने के लिए नेहा को ही जिद्दी, गुस्सैल और झगड़ालू बताने लगे.

अगर नेहा ने विवाह पूर्व अनुबंध किया होता तो शायद असित पर ज्यादा दबाव पड़ता क्योंकि अब वह नेहा से कहता है कि शादी के पहले की गई ऐसी बातों के कोई माने नहीं होते. जब मैं ने हां की थी तब मां के परमानैंटली आने की कतई उम्मीद नहीं थी. अब क्या तुम्हारे लिए उन्हें भगा दूं और जिंदगीभर खुद से आखें न मिला पाऊं, मैं कोर्ट में भी नहीं मानूंगा कि कभी ऐसा कोई वादा मैं ने तुम से किया था.

मैं ने तो ऐसी कोई शर्त तुम पर नहीं थोपी थी. इस पर नेहा का जवाब भी ?ाठलाया नहीं जा सकता कि किसी के साथ रहने व न रहने की मेरी अपनी प्रौब्लम है, इसीलिए मैं ने तुम्हें एक नहीं बल्कि हजार बार आगाह किया था. यह तो सरासर प्रौमिस तोड़ने वाली बात हुई, फिर कैसा प्यार और कैसी शादी.

जानें क्या है प्रीनप या प्रीनप्शल एग्रीमैंट

ऊपर सब से शुरू में जो प्रोफार्मा दिया गया है वह शादी से पहले करार का है जिसे प्रीनप या प्रीनप्शल एग्रीमैंट भी कहते हैं. इस में कुछ भी खास नहीं है सिवा इस के कि शादी के पहले जो वादेइरादे और समझते मौखिक तौर पर किए जाते हैं उन का दस्तावेजीकरण कर दिया गया है.

इस तरह का अनुबंध भारत में चलन में नहीं है क्योंकि हम ने शादी को एक धार्मिक संस्कार मान रखा है जबकि है यह मूलतया एक अनुबंध या समझता ही. इसीलिए तलाक को हमारे समाज व देश में अच्छा नहीं माना जाता क्योंकि हर तलाक इस धार्मिक धारणा पर प्रहार होता है.

अब देश में तेजी से तलाक के मामले बढ़ रहे हैं जिन पर आएदिन हरकोई बेकार की चिंता जता रहा होता है. अदालत से ले कर परिवार तक हर किसी की मंशा तलाक को बुरा साबित करने की होती है. जबकि, बढ़ते तलाक बढ़ती जागरूकता की निशानी हैं. प्रीनप का रिवाज विकसित देशों में ज्यादा इसीलिए हैं कि वहां महिलाएं शिक्षित, जागरूक और कमाऊ हैं.

वे अपने अधिकार जानतीसमझती हैं, इसलिए तलाक पर हिचकिचातीं नहीं. कई यूरोपीय देशों बेल्जियम और नीदरलैंड सहित कनाडा व यूएसए आदि में कानूनन प्रीनप को मान्यता मिली हुई है.

भारत में आजादी से पहले तलाक चलन में ही नहीं था. लेकिन हिंदू मैरिज एक्ट 1956 में इस की व्यवस्था की गई तो लोगों, खासतौर से महिलाओं, को घुटनभरी जिंदगी से छुटकारा मिलने लगा क्योंकि वे हर तरह से शोषण का शिकार थीं.

अब हालात उलट हैं. 75 सालों में काफीकुछ बदलाव आए हैं पर पहली बड़ी उल?ान कानूनी प्रक्रिया की तरफ से है जिस ने तलाक की प्रक्रिया को जटिल बना दिया है. दूसरी उल?ान अभी भी यह मान बैठना है कि वैवाहिक जीवन ऊपर वाला चलाता है.

शादी के वक्त मंडप में अग्नि के सामने लिए गए सात फेरों और वचनों को नकारने की हिम्मत कपल्स आसानी से नहीं कर पाते. इसलिए लंबे समय तक वे तलाक से बचने की कोशिश करते रहते हैं और जब हिम्मत जुटा लेते हैं तो उन का सामना कानूनी दुश्वारियों से होता है. तब उन्हें फेरों में लिएदिए वचन याद आएं न आएं लेकिन डेट्स और औपचारिक मुलाकातों में किए वादेइरादे जरूर याद आते हैं जिन की कानून की नजर में कोई अहमियत नहीं होती. जबकि अधिकतर तलाक की बुनियाद इन्हीं पर रखी होती है कि शादी से पहले तुम ने इस बात पर हामी भरी थी, उस बात पर रजामंदी जताई थी. चूंकि यह लिखित में नहीं होती, इसलिए कोई मानसिक या नैतिक दबाव भी दोनों के ऊपर नहीं होता जिस का प्रीनप से होना संभव है.

असित कितनी आसानी और सहजता से अपने वादे से मुकर जाएगा, यह कोई कहने की बात नहीं, तिस पर दिक्कत यह कि वह नेहा व कुछ ?ाठे आरोप भी लगाएगा. नेहा इस से और तिलमिलाएगी और पति पर सास पर वह भी हिंसा और दहेज के आरोप लगा सकती है. शोभित खुद को ठगा महसूस कर रहा है क्योंकि उस के पास खुद को तसल्ली देने के लिए भी कोई लिखित सुबूत नहीं. अर्पिता इसी का फायदा उठा कर उसे व उस के पेरैंट्स को घेरती जा रही है.

अदालतों की बढ़ती दिलचस्पी

यह सब लिखित में होता तो जरूरी नहीं कि अप्रिय नौबत न आती और अदालत लिखे को संविधान की धारा या वेदों की ऋचाएं मान लेती. वह तो दोटूक कहती कि कागज के इस टुकड़े की कानूनन कोई अहमियत नहीं. लेकिन अगर होती या यह व्यवस्था कर दी जाए तो किसी के लिए भी मुकरना आसान नहीं रह जाएगा.

वैसी भी उन पर वही दबाव या गिल्ट रहता जो इन दिनों सोशल मीडिया पर फर्जी या झुठी पोस्ट किसी को भेजने के बाद भेजने वाले के मन में एक शक और डर रहता है कि कहीं कोई गड़बड़ या फसाद न हो जाए. यानी, दाढ़ी में तिनका तो रहता है. यह डर भी कपल्स को रहेगा कि अदालत के फैसले पर इस का फर्क पड़ सकता है.

भोपाल के एक नामी अधिवक्ता महेंद्र श्रीवास्तव की मानें तो कानूनी तौर पर विवाहपूर्व किए गए समझते लागू नहीं होते. लेकिन कोर्ट निश्चित रूप से इस पर विचार करेगा कि आखिर शादी करने से पहले किन मुद्दों पर पतिपत्नी ने सहमति या असहमति जताई थी. बकौल महेंद्र, यह संपन्न, पर्याप्त शिक्षित और अभिजात्य वर्ग में लोकप्रिय है क्योंकि उन्हें अपनी प्रतिष्ठा और पैसों का खयाल रहता है. अदालत कुछ और करे न करे लेकिन यह सवाल कर सकती है कि आप क्यों विवाहपूर्व किए समझते या अनुबंध को नकारना चाहते हैं.

कई मुकदमों में अदालतों ने भी प्रीनप की जरूरत और अहमियत की तरफ इशारा किया है. मसलन, सुनीता देवेंद्र देशप्रभु बनाम सीतादेवी देशप्रभु 2016 में बौम्बे हाईकोर्ट ने विवाह पूर्व अनुबंध को संपत्ति के बंटवारे में गौर किया था. इस से लगता है कि अदालतें ऐसे अनुबंधों को हालात की बिना पर मान्यता दे सकती हैं. एक और मामले मोहम्मद खान बनाम शाहमल में जम्मू और कश्मीर हाईकोर्ट ने जायज माना था. इस मामले में पति ने खाना दामाद (एक तरह से घरजंवाई) बनने की शर्त पर निकाह किया था. अदालत ने इसे मुसलिम कानून के अनुरूप पाया था.

ज्यादा नहीं अब से 2 साल पहले मुंबई की एक फैमिली कोर्ट ने विवाहपूर्व अनुबंध को बाध्यकारी तो नहीं माना लेकिन इसे दोनों पक्षों की मंशा समझने के लिए विचार किया था. कोर्ट ने पति को क्रूरता के आधार पर तलाक दिया और अनुबंध को उन के इरादों की पुष्टि के रूप में देखा.

इस मामले में पति ने अदालत में प्रीनप पेश किया था जिस में उल्लेखित था कि दोनों पक्षकार किसी भी समस्या की स्थिति में आपसी आधार पर अलग होने के लिए सहमत हुए थे.

यानी, प्रीनप में ऐसी कोई शर्त है जो कानून का या सार्वजनिक नीति का उल्लंघन नहीं करती है तो अदालत उस पर गौर कर सकती है लेकिन ऐसा तभी होगा जब कपल्स प्रीनप की अहमियत समझते उस पर अमल शुरू करें. यह उन के भविष्य और सुकून के लिए बेहद जरूरी है.

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