Social Story In Hindi : आज मेरा जी चाह रहा है कि उस का माथा चूम कर मैं उसे गले से लगा लूं और उस पर सारा प्यार लुटा दूं, जो मैं ने अपने आंचल में समेट कर जमा कर रखा था. चकनाचूर कर दूं उस शीशे की दीवार को जो मेरे और उस के बीच थी. आज मैं उसे जी भर कर प्यार करना चाहती हूं.
मुझे बहुत जोर की भूख लगी थी. भूख से मेरी आंतें कुलबुला रही थीं. मैं लेटेलेटे भुनभुना रही थी, ‘‘यह मरी रेनू भी ना जाने कब आएगी. सुबह के 10 बजने को हैं, पर महारानी का अतापता ही नहीं. यह लौकडाउन ना होता तो ना जाने कब का इसे भगा देती और दूसरी रख लेती. जब इसे काम की जरूरत थी तो कैसे गिड़गिड़ा मेरे पास आई थी और अब नखरे देखो मैडम के.’’
अरविंद सुबहसुबह मुझे चाय के साथ ब्रेड या बिसकुट दे कर दवा खिलाते और खुद दूध कौर्नफ्लैक्स खा कर अस्पताल चले जाते हैं. डाक्टरों की छुट्टियां कैंसिल हैं, इसलिए ज्यादा मरीज ना होने पर भी उन्हें अस्पताल जाना ही पड़ता है.
मैं डेढ़ महीने से टाइफाइड के कारण बिस्तर पर पड़ी हूं. घर का सारा काम रेनू ही देखती है. मैं इतनी कमजोर हो गई हूं कि उठ कर अपने काम करने की भी हिम्मत नहीं होती. पड़ेपड़े न जाने कैसेकैसे खयाल मन में आ रहे थे, तभी सुहानी की मधुर आवाज मेरे कानों में पड़ी, ‘‘मां आप जाग रही हैं क्या? मैं आप के लिए चाय बना लाऊं.’’
मैं ने कहा, ‘‘नहीं, चाय और दवा तो तेरे बड़े पापा दे गए हैं, पर बहुत जोर की भूख लगी है. रेनू भी ना जाने कब आएगी. कितना भी डांट लो, इस पर कोई असर नहीं होता.’’
सुहानी बोली, ‘‘मां, आप उस पर चिल्लाना मत, आप की तबीयत और ज्यादा खराब हो जाएगी.’’
उस ने टीवी औन कर के लाइट म्यूजिक चला दिया. मैं गाने सुन कर अपना ध्यान बंटाने की कोशिश करने लगी.
थोड़ी ही देर में सुहानी एक प्लेट में पोहा और चाय ले कर मेरे पास खड़ी थी. मैं हैरानी से उसे देख कर बोली, ‘‘अरे, यह क्या किया तुम ने, अभी रेनू आ कर बनाती ना.’’
सुहानी ने बड़े धीमे से कहा, ‘‘मां, आप को भूख लगी थी, इसीलिए सोचा कि मैं ही कुछ बना देती हूं.’’
मेरा पेट सच में ही भूख के कारण पीठ से चिपका जा रहा था, इसलिए मैं प्लेट उस के हाथ से ले कर चुपचाप पोहा खाने लगी. उस ने मुझ से पूछा, ‘‘मां, पोहा ठीक से बना है ना?’’
नमक थोड़ा कम था, पर मैं मुसकरा कर बोली, ‘‘हां, बहुत अच्छा बना है, तुम ने यह कब बनाना सीखा.’’
यह सुन कर उस की आंखों में जो संतोष और खुशी की चमक मुझे दिखी, वह मेरे मन को छू गई.
जब से मैं बीमार पड़ी हूं, मेरे पति और बच्चों से भी ज्यादा मेरा ध्यान सुहानी रखती है. मेरे कुछ बोलने से पहले ही वह समझ जाती है कि मुझे क्या चाहिए.
मुझे याद आने लगा वह दिन, जब मेरे देवरदेवरानी अपनी नन्ही सी बिटिया के साथ शौपिंग कर के लौट रहे थे. सामने से आती एक तेज रफ्तार कार ने उन की कार में टक्कर मार दी. वे दोनों बुरी तरह घायल हो गए.
देवर ने तो अस्पताल ले जाते समय रास्ते में ही दम तोड़ दिया था और देवरानी एक हफ्ते तक अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझने के बाद भगवान को प्यारी हो गई.
अस्पताल में जब अर्धचैतन्य अवस्था में देवरानी ने नन्ही सलोनी का हाथ अरविंद के हाथों में थमाते हुए कातर निगाहों से देखा तो वह फफकफफक कर रो पड़े. उन की मृत्यु के बाद लखनऊ में उन के घर, औफिस, फंड, ग्रेच्युटी वगैरह के तमाम झमेलों का निबटारा करने के लिए लगभग 2 महीने तक अरविंद को लखनऊ में काफी भागदौड़ करनी पड़ी. सारी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद सलोनी की कस्टडी का प्रश्न उठा.
देवरानी का मायका रायबरेली में 3 भाइयों और मातापिता का सम्मिलित परिवार और व्यवसाय था. वे चाहते थे कि सलोनी की कस्टडी उन्हें दे दी जाए. उन के बड़े भैया बोले, ‘‘सलोनी हमारी बहन की एकमात्र निशानी है, हम उसे अपने साथ ले जाना चाहते हैं.’’
इस पर अरविंद ने कहा कि सलोनी मेरे भाई की भी एकमात्र निशानी है. वहीं अरविंद के पिताजी बोले, ‘‘सलोनी कहीं नहीं जाएगी. मेरे बेटे अनिल की बिटिया हमारे घर में ही रहेगी.”
इस पर देवरानी का छोटा भाई बिगड़ कर बोला, ‘‘मैं अपनी भांजी का हक किसी को नहीं मारने दूंगा. आप लोग मेरे बहनबहनोई की सारी संपत्ति पर कब्जा करना चाहते हैं, इसीलिए सलोनी को अपने पास रखना चाहते हैं.’’
इस विषय पर अरविंद और मांबाबूजी की उन से बहुत बहस हुई. अरविंद और बाबूजी जानते थे कि उन लोगों की नजर मेरे देवर के लखनऊ वाले मकान और रुपयोंपैसों पर थी. सलोनी के नानानानी बहुत बुजुर्ग थे, वे उस की देखभाल करने में सक्षम नहीं थे. अंत में अरविंद ने सब को बैठा कर निर्णय लिया कि अम्मांबाबूजी बहुत बुजुर्ग हैं और गांव में सलोनी की पढ़ाईलिखाई का उचित इंतजाम नहीं हो सकता, इसलिए सलोनी मेरे साथ रहेगी. अनिल का लखनऊ वाला मकान सलोनी के नाम पर कर दिया जाएगा और उसे किराए पर उठा दिया जाएगा. उस का जो भी किराया आएगा, उसे सलोनी के अकाउंट में जमा कर दिया जाएगा.
अनिल के औफिस से मिला फंड वगैरह का रुपया भी सलोनी के नाम से फिक्स कर दिया जाएगा, जो उस की पढ़ाईलिखाई और शादीब्याह में खर्च होगा.
अरविंद के इस फैसले से मैं सहम गई. उस समय तो कुछ न कह पाई, पर अपने 2 छोटे बच्चों के साथ एक और बच्चे की जिम्मेदारी उठाने के लिए मैं बिलकुल तैयार नहीं थी. अभी तक जिस सहानुभूति के साथ मैं उस की देखभाल कर रही थी, वह विलुप्त होने लगी.
मैं ने डरतेडरते अरविंद से कहा, ‘‘सुनिए, मुझे लगता है कि आप को सलोनी को उस के नानानानी को दे देना चाहिए. नानानानी और मामा के बच्चों के साथ वह ज्यादा खुश रहेगी.’’
अरविंद शायद मेरी मंशा भांप गए और मेरे कंधे पर सिर रख कर रो पड़े. कातर नजरों से मेरी ओर देखते हुए बोले, ‘‘रंजू, अनिल मेरा एकलौता भाई था. वह मुझे इस तरह छोड़ जाएगा, यह सपने में भी नहीं सोचा था. सलोनी मेरे पास रहेगी तो मुझे लगेगा मानो मेरा भाई मेरे पास है.’’
मैं ने उन्हें जीवन में पहली बार इतना मायूस और लाचार देखा था. वह बच्चों की तरह बिलखते हुए बोले, ‘‘रंजू, मेरे मातापिता और सलोनी को अब तुम्हें ही संभालना है.’’
उन को इतना व्यथित देख मैं ने चुपचाप नियति को स्वीकार कर लिया. बाबूजी इस गम को सह न पाए. हार्ट पेशेंट तो थे ही, महीनेभर बाद दिल का दौरा पड़ने से परलोक सिधार गए.
बाबूजी के जाने के बाद तो अम्मां मानो अपनी सुधबुध ही खो बैठीं, न खाने का होश रहता, न नहानेधोने का. हर समय पूजापाठ में व्यस्त रहने वाली अम्मां अब आरती का दीया भी ना जलाती थीं. वे कहतीं, ‘‘बहू, अब कौनो भगवान पर भरोसा नाही रही गओ है, का फायदा ई पूजापाठ का जब इहै दिन दिखबे का रहै.’’
उन्हें कुछ भी समझाने का कोई फायदा नहीं था. वे अंदर ही अंदर घुलती जा रही थीं. एक बरस बाद वे भी इस दुनिया को छोड़ कर चली गईं.
अरविंद अपने काम में बहुत व्यस्त रहने लगे. सामान्य होने में उन्हें दोतीन वर्ष का समय लग गया.
नन्ही सलोनी मुझे मेरे घर में सदैव अवांछित सदस्य की तरह लगती थी. उस के सामने न जाने क्यों मैं अपने बच्चों को खुल कर न तो दुलरा ही पाती और न ही खुल कर गले लगा पाती थी. मैं अपने बच्चों के साथसाथ उसे भी तैयार कर के स्कूल भेजती और उस की सारी जरूरतों का ध्यान रखती, पर कभी गले से लगा कर दुलार ना कर पाती.
समय कब हथेलियों से सरक कर चुपकेचुपके पंख लगा कर उड़ जाता है, इस का हमें एहसास ही नहीं होता. कब तीनों बच्चे बड़े हो गए और कब मैं सलोनी की बड़ी मां से सिर्फ मां हो गई, मुझे पता ही ना चला. मैं उसे कुछ भी नहीं कहती थी, पर सुमित और स्मिता को जो भी इंस्ट्रक्शंस देती, वह उन्हें चुपचाप फौलो करती. उन दोनों को तो मुझे होमवर्क करने, दूध पीने और खाने के लिए टोकना पड़ता था, पर सलोनी अपना सारा काम समय से करती थी.
मुझे पेंटिंग्स बनाने का बड़ा शौक था. घर की जिम्मेदारियों की वजह से मैं अपने इस शौक को आगे तो नहीं बढ़ा पाई, पर बच्चों के प्रोजैक्ट में और जबतब साड़ियों, कुरतों और कपड़ों के बैग वगैरह पर अपना हुनर आजमाया करती थी.
जब भी मैं कुछ इस तरह का काम करती, तो सुहानी भी अपनी ड्राइंग बुक और कलर्स के साथ मेरे पास आ कर बैठ जाती और अपनी कल्पनाओं को रंग देने का प्रयास करती. यदि कहीं कुछ समझ में ना आता, तो बड़ी मासूमियत से पूछती, ‘‘बड़ी मां, इस में यह वाला रंग करूं अथवा ये वाला ज्यादा अच्छा लगेगा.’’ उस की कला में दिनोंदिन निखार आता गया. विद्यालय की ओर से उसे सभी प्रतियोगिताओं के लिए भेजा जाने लगा और हर प्रतियोगिता में उसे कोई ना कोई पुरस्कार अवश्य मिलता. पढ़ाई में भी अव्वल सलोनी अपने सभी शिक्षकशिक्षिकाओं की लाड़ली थी.
जब कभी सुमित, स्मिता और सुहानी तीनों आपस में झगड़ा करते, तो सुहानी समझदारी दिखाते हुए उन से समझौता कर लेती. मैं बच्चों के खेल और लड़ाई के बीच में कोई दखलअंदाजी नहीं करती थी.
डेढ़ महीने पहले जब डाक्टर ने मेरी रिपोर्ट देख कर बताया कि मुझे टाइफाइड है तो सभी चिंतित हो गए. सुमित, स्मिता और अरविंद हर समय मेरे पास ही रहते और मेरा बहुत ध्यान रखते थे, पर धीरेधीरे सब अपनी दिनचर्या में बिजी हो गए.
अभी परसों की ही बात है, मैं स्मिता को आवाज लगा रही थी, ‘‘स्मिता, मेरी बोतल में पानी खत्म हो गया है, थोड़ा पानी कुनकुना कर के बोतल में भर कर रख दो.”
इस पर वह खीझ कर बोली, ‘‘ओफ्फो मम्मा, आप थोड़ा वेट नहीं कर सकतीं. कितनी अच्छी मूवी आ रही है, आप तो बस रट लगा कर रह जाती हैं.’’
इस पर सुहानी ने उठ कर चुपचाप मेरे लिए पानी गरम कर दिया. मेरी खिसियाई सी शक्ल देख कर वह बोली, ‘‘मां क्या आप का सिरदर्द हो रहा है, लाइए मैं दबा देती हूं.”
मैं ने मना कर दिया. सुमित बीचबीच में आ कर मुझ से पूछ जाता है, ‘‘मां, आप ने दवा ली, कुछ खाया कि नहीं वगैरह.”
स्मिता भी अपने तरीके से मेरा ध्यान रखती है और अरविंद भी, किंतु सलोनी उस के तो जैसे ध्यान में ही मैं रहती हूं.
आज मुझे आत्मग्लानि महसूस हो रही है. 11वीं कक्षा में पढ़ने वाली सलोनी कितनी समझदार है. मैं सदैव अपने घर में उसे अवांछित सदस्य ही मानती थी, कभी मन से उसे बेटी न मान पाई. लेकिन वह मासूम मेरी थोड़ी सी देखभाल के बदले में मुझे अपना सबकुछ मान बैठी. कितने गहरे मन के तार उस ने मुझ से जोड़ लिए थे.
मुझे याद आ रहा है उस का वह अबोध चेहरा, जब सुमित और स्मिता स्कूल से आ कर मेरे गले से झूल जाते और वह दूर खड़ी मुझे टुकुरटुकुर निहारती तो मैं बस उस के सिर पर हाथ फेर कर सब को बैग रख कर हाथमुंह धोने की हिदायत दे देती थी.
उस ने मेरी थोड़ी सी सहानुभूति को ही शायद मेरा प्यार मान लिया था. अपनी मां की तो उसे ज्यादा याद नहीं, पर मुझे ही मानो मां मान कर चुपचाप अपना सारा प्यार उड़ेल देना चाह रही है.
आज मेरा जी चाह रहा है कि मैं उसे अपने गले से लगा कर फूटफूट कर रोऊं और अपने मन का सारा मैल और परायापन अपने आंसुओं से धो डालूं. मैं उसे अपने सीने से लगा कर ढेर सारा प्यार करना चाह रही हूं. मैं उस से कहना चाहती हूं, ‘‘मैं तेरी बड़ी मां नहीं सिर्फ मां हूं. मेरी एक नहीं दोदो बेटियां हैं. अपने और सलोनी के बीच जो कांच की दीवार मैं ने खड़ीकर रखी थी, वह आज भरभरा कर टूट गई है. सलोनी मेरी गुड़िया मुझे माफ कर दो.‘‘ Social Story In Hindi
Family Story In Hindi : भाग्यश्री अपने नाम के विपरीत थी. कुछ भी नहीं था उस के पास अपने नाम जैसा. बचपन से ले कर अब तक मातापिता की उपेक्षा ही सही, लेकिन फिर भी मायके में प्यार पाने की उम्मीद उस ने कभी नहीं छोड़ी.
ब तबीयत कैसी है मां?’’ दयनीय दृष्टि से देखती भाग्यश्री ने पूछा.
मां ने सिर हिला कर इशारा किया, ‘‘ठीक है.’’ कुछ पल मां जमीन की ओर देखती रही. अनायास आंखों से आंसू की झड़ी झड़ने लगी. सुस्त हाथों को धीरेधीरे ऊपर उठा कर अपने सिकुड़े कपोलों तक ले गई. आंसू पोंछ कर बोली, ‘‘प्रकृति की मरजी है बेटा.’’
परिवार के प्रति आक्रोश दबाती हुई भाग्यश्री ने कहा, ‘‘प्रकृति की मरजी कोई नहीं जानता, किंतु तुम्हारे लापरवाह बेटे को सभी जानते हैं और… और पिताजी की तानाशाही. दोनों के प्रति तुम्हारे समर्पित भाव का प्रतिदान तुम्हें यह मिला कि तुम दोनों की मानसिक चोट से आहत हो कर यहां तक पहुंच गईं? जिंदगी जकड़ कर रखना चाहती है, लेकिन मौत तुम्हें अपनी ओर खींच रही है.’’
मां ने आहत स्वर में कहा, ‘‘क्या किया जाए, सब समय की बात है.’’
भाग्यश्री ने अपनी आर्द्र आंखों को पोंछ कर कहा, ‘‘दवा तो ठीक से ले रही हो न, कोई कमी तो नहीं है न?’’
पलभर मां चुप रही, फिर बोली, ‘‘नहीं, दवा तो लाता ही है.’’
‘‘कौन? बाबू?’’ भाग्यश्री ने पूछा.
‘‘और नहीं तो कौन, तुम्हारे पिताजी लाएंगे क्या, गोबर भी काम में आ जाता है, गोथठे के रूप में. लेकिन वे? इस से भी गएगुजरे हैं. वही ठीक रहते तो किस बात का रोना था?’’ कुछ आक्रोश में मां ने कहा.
भाग्यश्री सिर झुका कर बातें सुनती रही.
‘‘और एक बेटा है, वह अपनेआप में लीन रहता है, कमरे में झांक कर भी नहीं देखता. आने में देरी हो जाए, तो मन घबराता है. देरी का कारण पूछती हूं, तो बरस पड़ता है. घर में नहीं रहने पर इधर बाप की चिल्लाहट सुनो और आने पर कुछ पूछो, तो बेटे की िझड़की सुनो. बस, ऐसे ही दिन काट रही हूं,’’ आंसू पोंछती हुई मां ने कहा, ‘‘हां, लेकिन सेवा तुम्हारे पिताजी करते हैं मूड ठीक रहा तो, ठीक नहीं तो चार बातें सुना कर ही सही, मगर करते हैं.’’
भाग्यश्री ने कई बार सोचा कि मां की सेवा के लिए एक आया रख दे, मगर इस में भी समस्याएं थीं. एक तो यह कि इस माहौल में आया रहेगी नहीं, हरवक्त तनाव की स्थिति, बापबेटे के बीच वाकयुद्ध, अशांति ही अशांति. स्वयं कुछ भी खा लें, मगर आया को तो ढंग से खिलाना पड़ेगा न. दूसरा यह कि भाग्यश्री की सहायता घरवाले स्वीकार करेंगे? इन सब कारणों से वह लाचार थी. वह मां के पास बैठी थी, तभी उस के पिताजी आए. औपचारिकतावश भाग्यश्री ने प्रणाम किया. फिर चुपचाप बैठी रही.
भाग्यश्री ने अपने पिताजी की ओर देखा. उन के चेहरे पर क्रोध का भाव था. निसंदेह वह भाग्यश्री के प्रति था.
पिछले 10 वर्षों में वह बहुत कम यहां आईर् थी. जब उस ने अपनी मरजी से शादी की, पिताजी ने उसे त्याग दिया. मां भी पिताजी का समर्थन करती, किंतु मां तो मां होती है. मां अपना मोह त्याग नहीं पाई थी. शादी भी एक संयोग था. स्नेहदीप के बिना जीवन अंधकारमय रहता है. प्रकाश की खोज करना हर व्यक्ति की प्रवृत्ति है.
व्यक्ति को यदि अपने परिवेश में स्नेह न मिले तो बूंदभर स्नेह की लालसा लिए उस की दृष्टि आकाश को निहारती है, शायद स्वाति बूंद उस पर गिर पड़े. जहां आशा बंधती है, वहां वह स्वयं भी बंध जाता है. भाग्यश्री के साथ भी ऐसी ही बात थी. नाम के विपरीत विधाता का लिखा. दोष किस का है- इस सर्वेक्षण का अब समय नहीं रहा, लेकिन एक ओर जहां भाग्यश्री का खूबसूरत न होना उस के बुरे समय का कारण बना, वहीं, दूसरी ओर पिता का गुस्सैल स्वभाव भी. कभी भी उन्होंने घर की परिस्थिति को देखा ही नहीं, बस, जो चाहिए, मिलना चाहिए अन्यथा घर सिर पर उठा लेते.
घर की विषम परिस्थितियों ने ही भाग्यश्री को सम झदार बना दिया. न कोई इच्छा, न शौक. बस, उदासीनता की चादर ओढ़ कर वह वर्तमान में जीती गई. परिश्रमी तो वह बचपन से ही थी. छोटे बच्चों को पढ़ा कर उस ने अपनी पढ़ाई पूरी की. उस का एक छोटा भाई था. बहुत मन्नत के बाद उस का जन्म हुआ था. इसलिए उसे पा कर मातापिता का दर्प आसमान छूने लगा था. पुत्र के प्रति आसक्ति और भाग्यश्री के प्रति विरक्ति यह इस घर की पहचान थी.
लेकिन, उसे अपने एकांत जीवन से कभी ऊब नहीं हुई, बल्कि अपने एकाकीपन को उस ने जीवन का पर्याय बना लिया था. कालांतर में हरदेव के आत्मीय संसर्ग के कारण उस के जीवन की दिशा ही नहीं बल्कि परिभाषा भी बदल गई. बहुत ही साधारण युवक था वह, लेकिन विचारउदात्त था. सादगी में विचित्र आकर्षण था.
भाग्यश्री न तो खूबसूरत थी, न पिता के पास रुपए थे और न ही वह सभ्य माहौल में पलीबढ़ी थी. किंतु पता नहीं, हरदेव ने उस के हृदय में कौन सा अमृतरस का स्रोत देखा, जिस के आजीवन पान के लिए वह परिणयसूत्र में बंध गया. हरदेव के मातापिता ने इस रिश्ते को सहर्ष स्वीकार किया. भाग्यश्री के मातापिता ने उस के सामने कोई आपत्ति जाहिर नहीं की, मगर पीठपीछे बहुत कोसा. यहां तक कि वे लोग न इस से मिलने आए, न ही उन्होंने इसे घर बुलाया. खुश रह कर भी भाग्यश्री मायके के संभावित दुखद माहौल से दुखी हो जाती. उपेक्षा के बाद भी वह अपने मायके के प्रति लगाव को जब्त नहीं कर पाती और यदाकदा मांपिताजी, भाई से मिलने आती, किंतु लौटती तो अपमान के आंसू ले कर.
कुछ माह बाद ही भाग्यश्री को मालूम हुआ कि उस की मां लकवे का शिकार हो गई है. घबरा कर वह मायके आई. अपाहिज मां उसे देख कर रोने लगी, मानो बेटी के प्रति जितना भी दुर्भाव था, वह बह रहा हो. किंतु, पिताजी की मुद्रा कठोर थी. मां अपनी व्यथा सुनाती रही, लेकिन पिताजी मौन थे. आर्थिक तंगी तो घर में पहले से ही थी, अब तो कंगाली में आटा भी गीला हो गया था. मां के पास वह कुछ देर बैठी रही, फिर बहुत साहस जोड़ कर, मां को रुपए दे कर कहने लगी, ‘इलाज में कमी न करना मां. मैं तुम्हारा इलाज कराऊंगी, तुम चिंता न करना.’
उस की बातों को सुनते ही पिताजी का मौन भंग हुआ. बहुत ही उपेक्षित ढंग से उन्होंने कहा, ‘हम लोग यहां जैसे भी हैं, ठीक हैं. तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है. मिट्टी में इज्जत मिला कर आई है जान बचाने.’ विकृत भाव चेहरे पर आच्छादित था. कुछ पल चुप रहे, फिर उन्होंने कहा, ‘तुम्हारे आने पर यह रोएगी ही, इसलिए न आओ तो अच्छा रहेगा.’
घर में उस की उपेक्षा नई बात नहीं थी. आंसूभरी आंखों से मां को देखती हुई उदासी के साथ वह लौट गई. मातापिता ने उसे त्याग दिया. मगर वह त्याग नहीं पाई थी. इस बार 5वीं बार वह सहमीसहमी मां के घर आई थी. इस बार न उसे उपेक्षा की चिंता थी, न पिताजी के क्रोध का भय था. और न आने पर संकोच. मां के दुख के आगे सभी मौन थे.
उसे याद आई. छोटे भाई के प्रति मातापिता का लगाव देख कर वह यही सम झ बैठी थी कि यह घर उस का नहीं. खिलौने आए तो उस भाई के लिए ही. उसे याद नहीं कि उस ने कभी खिलौने से खेला भी था. खीर बनी, तो पहले भाई ने ही खाई. उस के खाने के बाद ही उसे मिली. मां से पूछती, ‘हर बार उसी की सुनी जाती, मेरी बात क्यों नहीं? गलती अगर बाबू करे तो दोषी मैं ही हूं, क्यों?’
लापरवाही के साथ बड़े गर्व से मां कहती, ‘उस की बराबरी करोगी? वह बेटा है. मरने पर पिंडदान करेगा.’ मां के इस दुर्भाव को वह नहीं भूली. पति के घर में हर सुख होने के बाद भी वह अतीत से निकल नहीं पाई. बारबार उसे चुभन का एहसास होता रहा. लेकिन अब? मां की विवशता, लाचारी और कष्ट के सामने उस का अपना दुख तुच्छ था.
कुछ पल वह मां के पास बैठी रही. फिर बोली, ‘‘बाबू कहां है?’’ बचपन से ही, वह भाई को बाबू बोलती आई थी. यही उसे सिखाया गया था.
‘‘होगा अपने कमरे में,’’ विरक्तभाव से मां ने कहा.
भाग्यश्री कमरे में जा कर बाबू के पास बैठ गई. पत्थर पर फूल की क्यारी लगाने की लालसा में उसे कुछ पल अपलक देखती रही. फिर साहस समेट कर बोली, ‘‘आज तक इस घर ने मु झे कुछ नहीं दिया है. बहनबेटी को देना बड़ा पुण्य का काम होता है.’’
बाबू आश्चर्य से उसे देखने लगा, क्योंकि किसी से कुछ मांगना उस का स्वभाव नहीं था.
‘‘क्या कहती हो दीदी? क्या दूं,’’ बाबू ने पूछा.
‘‘मन का चैन,’’ याचक बन कर उस ने कहा.
बाबू चुप रहा. बाबू के चेहरे का भाव पढ़ कर उस ने आगे कहा, ‘‘देखो बाबू, हम दोनों यहीं पलेबढ़े. लेकिन, तुम्हें याद है? मांपिताजी का सारा ध्यान तुम्हीं पर रहता था. तुम्हीं उन के लिए सबकुछ हो. उन के विश्वास का मान रख लो. मु झे मेरे मन का चैन मिल जाएगा.’’ बोलतेबोलते उस का गला भर आया. कुछ रुक कर फिर बोली, ‘‘याद है न? मां तुम्हें छिप कर पैसा देती थीं जलेबियां खाने के लिए. मैं मांगती, तो कहतीं ‘इस की बराबरी करोगी? यह बेटा है, आजीवन मु झे देखेगा.’ और मैं चुप हो जाती. मां के इस प्रेम का मान रख लो बाबू. पहले उस के दुर्भाव पर दुख होता था और अब उस की विवशता पर. दुख मेरे समय में ही रहा.’’
‘‘तुम क्या कह रही हो, मैं सम झ नहीं पा रहा हूं,’’ कुछ खी झ कर बाबू ने कहा, ‘‘क्या कमी करता हूं? दवा, उचित खानापीना, सभी तो हो रहा है. क्या कमी है?’’
‘‘आत्मीयता की कमी है,’’ भाग्यश्री का संक्षिप्त उत्तर था. ‘चोर बोले जोर से’ यह लोकोक्ति प्रसिद्ध है. खी झ कर बाबू बोला, ‘‘हांहां, मैं गलत हूं. मगर तुम ने कौन सी आत्मीयता दिखाई? आज भी कोई पूछता है कि भाग्यश्री कैसी है, तो लगता है कि व्यंग्य से पूछ रहा है.’’
बाबू की यह बात उसे चुभ गई. आंखें नम हो गईं. मगर धीरे से कहने लगी, ‘‘हां, मैं ने गलत काम किया है. तुम लोगों के सताने पर भी मैं ने आत्माहत्या नहीं की, बल्कि जिंदगी को तलाशा है, यही गलती हुई है न?’’
बाबू चुप रहा.
‘‘देखो बाबू,’’ भरे हुए कंठ से उस ने कहा, ‘‘बहस नहीं करो. मैं इतना ही जानती हूं कि मांपिताजी, मांपिताजी होते हैं. मैं ने इतना अन्याय सह कर भी मन मैला न किया. फिर तुम्हें क्या शिकायत है कि इन के दुखसुख में हाल भी न पूछो? दवा से ज्यादा सद्भाव का असर होता है.’’
‘‘कौन कहता है?’’ बात का रुख बदलते हुए बाबू ने कहा, ‘‘कौन शिकायत करता है? क्या नहीं करता? तुम्हें पता है सारी बातें? कौन सा ऐसा दिन है, जब पिताजी मु झे नहीं कोसते? एक सरकारी नौकरी न मिली कि नालायक, निकम्मा विशेषणों से अलंकृत करते रहते हैं. बीती बातों को उखाड़उखाड़ कर घर में कुहराम मचाए रहते हैं. घर की शांति भंग हो गई है.’’ वह अपने आंसू पोंछने लगा.
बात जब पिताजी पर आई, तो कमरे में आ कर चीखते हुए भाग्यश्री को बोलने लगे, ‘‘हमारे घर के मामले में तुम कौन हो बोलने वाली? कौन तुम्हें यहां की बातें बताता है? यह मेरा बेटा है, मैं इसे कुछ बोलूं तो तुम्हें क्या? यह हमें लात मारे, तुम्हें क्या मतलब?’’
बात कहां से कहां पहुंच गई. भाग्यश्री को भी क्रोध आ गया. वह कुछ बोली नहीं, बस, आक्रोश से अपने पिताजी को देखती रही. पिताजी का चीखना जारी था, ‘‘तुम अपने घर में खुश रहो. हमारे घर के मामले में तुम्हें बोलने का अधिकार नहीं है.’’
‘हमारा घर?
‘पिताजी का घर?
‘बाबू का घर? मेरा नहीं? हां, पहले भी तो नहीं था. और अब? शादी के बाद?’ भाग्यश्री मन में सोच रही थी.
पिताजी को बोलते देख, मां ने आवाज लगाई. भाग्यश्री मां के पास चली गई. मां ने रोते हुए कहा, ‘‘समय तो किसी का कोई बदल नहीं सकता न बेटा? मेरे समय में ही दुख लिखा है, इसलिए तो बापबेटे की मत मारी गई. आपस में भिड़ कर एकदूसरे का सिर फोड़ते रहते हैं. तुम बेकार मेरी चिंता करती हो. तुम्हें यहां कोई नहीं सराहता, फिर क्यों आती हो.’’ यह कहती हुई वह फूटफूट कर रो पड़ी.
पिताजी के प्रति उत्पन्न आक्रोश ममता में घुल गया. कुछ देर तक भाग्यश्री सिर नीचे किए बैठी रही. आंखों से आंसू बहते रहे. अचानक उठी और बाबू से बोली, ‘‘मां, मेरी भी है. इस की हालत में सुधार यदि नहीं हुआ, तो बलपूर्वक मैं अपने साथ ले जाऊंगी,’’ कहती हुई वह चली गई.
महल्ले में ही उस का मुंहबोला एक भाई था, कुंदन. वह बाबू का दोस्त भी था. उदास हो कर लौटती भाग्यश्री को देख कर वह उस के पीछे दौड़ा, ‘‘दीदी, ओ दीदी.’’
भाग्यश्री ने पीछे मुड़ कर देखा. बनावटी मुसकान अधरों पर बिखेर कर हालचाल पूछने लगी. उसे मालूम हुआ कि फिजियोथेरैपी द्वारा वह इलाज करने लगा है. उस की उदास आंखें चमक उठीं. याचनाभरी आवाज में कहा, ‘‘भाई, मेरी मां को भी देख लो.’’
‘‘चाचीजी को? हां, स्थिति ठीक नहीं है, यह सुना, लेकिन किसी ने मु झ से कहा ही नहीं,’’ कुंदन ने कहा.
‘‘मैं कह रही हूं न,’’ व्यग्र होते हुए भाग्यश्री ने कहा.
दो पल दोनों चुप रहे. कुछ सोच कर भाग्यश्री ने फिर कहा, ‘‘लेकिन भाई, यह बताना नहीं कि मैं ने तुम्हें भेजा है. नहीं तो मां का इलाज करवाने नहीं देंगे सब.’’
‘‘लेकिन, लेकिन क्या कहूंगा?’’
‘‘यही कि, बाबू के मित्र हो, इसलिए इंसानियतवश. और हां,’’ भाग्यश्री ने अपने बटुए में से एक हजार रुपया निकाल कर देते हुए कहा, ‘‘तुम मेरा पता लिख लो, मेरे घर आ कर ही अपना मेहनताना ले लेना.’’
कुंदन उसे देखता रहा. भाग्यश्री की आंखों में कृतज्ञता छाई थी, बोली, ‘‘भाई, तुम्हारा एहसान मैं याद रखूंगी. बस, मेरी मां को ठीक कर दो.’’
कुंदन सिर हिला कर कह रहा था, ‘‘ठीक है.’’
दो माह बाद वह फिर से मायके आई. हालांकि कुंदन से उसे मालूम हो गया था कि मां की स्थिति में बहुत सुधार है, फिर भी वह देखना चाहती थी. भाग्यश्री के मन में एक अज्ञात भय था. जैसे कोई किसी दूसरे के घर में प्रवेश कर रहा हो वह भी चोरीचोरी. जैसेजैसे घर निकट आ रहा था, उस के कदम की गति धीमी होती जा रही थी और हृदय की धड़कन बढ़ती जा रही थी.
वहां पहुंच कर उस ने बरामदे में झांका. मां, पिताजी और बाबू तीनों बैठ कर चाय पी रहे थे. सभी प्रसन्न थे. आपस में बातें करते हुए हंस रहे थे. भाग्यश्री ने शायद ही कभी ऐसा दृश्य देखा होगा. भाग्यश्री वहीं ठहर गई. उस ने अपने भाई से ‘मन का चैन’ मांगा था, भाई ने उसे दे दिया. मायके से प्राप्त उपेक्षा, तो उस का दुख था ही, लेकिन यह ‘मन का चैन’ उस का सुख था.
‘ठीक ही है,’ उस ने सोचा, मैं तो इस घर के लिए कभी थी ही नहीं. फिर अपना स्थान क्यों ढूढ़ूं? आज मन का चैन मिला, इस से बड़ा मायके का उपहार क्या होगा. मन का चैन ले कर वह वहीं से लौट आई, बिन बुलाए कभी न जाने के लिए.
बाहर निकल कर नम आंखों से अपने मायके का घर देख रही थी. अनायास उस के अधरों पर वेदना के साथ एक मुसकान दौड़ आई. उंगली से इशारा करती हुई, भरे हुए कंठ से वह बुदबुदाई, ‘मुझे पता है पिताजी, एक दिन आप मु झे बुलाएंगे जरूर. मन का चैन पा कर वह प्रसन्न थी, किंतु मायके के विद्रोह से उस का अंतर्मन बिलख रहा था. उस ने मन से पूछा, ‘लेकिन कहां बुलाएंगे?’ मन ने उत्तर भी दे दिया, ‘जल्द ही बुलाएंगे.’
अपनी आंखों को पोंछती हुई वह एकाएक मुड़ी और अपने घर की ओर चल दी. मन में विश्वास था कि एक दिन बुलावा आएगा, हां, बुलावा आएगा जरूर. Family Story In Hindi
Romantic Story : पतिपत्नी का साथ जीवनभर का एक वादा है, जिस में हर भाव छिपा होता है. भारती और प्रेम के बीच चाहे कितनी ही लड़ाइयां होती थीं लेकिन जब जरूरत पड़ी तो दोनों हर दर्द और परेशानी को मिल कर झेलने को तैयार थे.
भारती और प्रेम के बीच महसंग्राम फिर से जारी था. आएदिन दोनों का झगड़ा महिलाओं के उन मुश्किल दिनों के जैसा हो गया जो हर महीने आ ही धमकते. रजोनिवृत्ति की संभावना दूरदूर तक दिखाई नहीं देती थी. झगड़ा ऐसा कि लगता मानो अब दोनों एकदूसरे को शारीरिक हानि पहुंचा कर ही दम लेंगे. शब्दों के बाण इतने तीखे कि उस से होने वाले घाव कभी न भर सकें.
तभी भारती के मोबाइल फोन की घंटी बजी. भारती ने देखा और नजरअंदाज कर दिया. घंटी फिर बजी. इस बार भारती ने फोन रिसीव कर लिया. भारती मोबाइल फोन पर ऐसे बात करने लगी मानो घर में अभी कुछ हुआ ही नहीं. चंद मिनट पहले की तीखी वाणी मोबाइल फोन पर किसी दूसरे से बात करने में मधुर हो गई. अगर अभी कोई घर में दाखिल होता तो उसे कुछ देर पहले की स्थिति झुठी लगती.
भारती पूरी दुनिया वालों से अच्छे से बात करती सिवा प्रेम के, प्रतिक्रिया में प्रेम का भी वही रवैया. एकदूसरे से बात करने की जब बारी आती तो ऐसा लगता मानो दोनों के मन में ढेरों गुस्सा भरा पड़ा है. न तो सीधे सवाल निकल कर आते और न ही सीधे जवाब.
बड़े होते 2 बच्चों की जिम्मेदारियों ने दोनों के रिश्तों में इतनी नीरसता ला दी कि लगता ही नहीं कि दोनों ने कभी साथ जीनेमरने की कसमें खाई थीं. भारती बच्चों की ख्वाहिशों को पूरी करने में ऐसी उल?ा कि उसे प्रेम के पसंदनापसंद का खयाल ही नहीं रहा. दोनों एक अच्छे मांबाप तो बन गए मगर इस चक्कर में एक अच्छे पतिपत्नी कहीं दफन हो कर रह गए.
बच्चे अगर कुछ खाने की फरमाइश कर दें तो सुबह 7 बजे बच्चों के स्कूल जाने से पहले ही भारती बना कर तैयार कर देती जबकि प्रेम की छोटी सी फरमाइश को पूरी होने में महीनों लग जाते. इस वजह से प्रेम खुद को कुछ ज्यादा ही उपेक्षित महसूस करने लगा. उसे लगता कि घर में और साथसाथ भारती के दिल में अब उस के लिए कोई जगह नहीं. उसे ऐसा लगने लगा कि घर में हो रही हर चीज उस के लिए नहीं है या हर वह चीज जो वह चाहता है खासकर वही पूरी नहीं की जाती.
दोनों अपनेअपने हिसाब से ताना देने का जोड़घटाव करते रहते, कोई पीछे नहीं रहना चाहता. गुजरे वक्त की न जाने कौनकौन सी बुरी यादें दोनों ने बीमा की तरह अपने मन में जमा कर रखी थीं जो किस्तदरकिस्त दोनों के कड़वाहट वाले रिश्तों में जमा होती रहतीं. अच्छी चीजों का निकल कर आने वाला रास्ता बंद हो चुका था.
बारिश की वजह से डेंगू के बढ़ते कहर ने भारती को भी नहीं छोड़ा. प्लेटलेट्स इतनी कम हो गए कि उसे आईसीयू में भरती करने की नौबत आ गई. पूरा घर प्रेम को अकेले ही संभालना पड़ रहा था. सुबह 7 बजे बच्चे घर का खाना खा कर और लंच में भी घर का ही खाना ले कर स्कूल जाएं, इस के लिए भारती तड़के 4 बजे ही जग जाती थी. प्रेम ने भी पूरी कोशिश की और उस की कोशिश सफल भी रही पर सुबह 4 बजे जब वह जगता तो उस समय का सन्नाटा उसे काटने को दौड़ता.
इस सन्नाटे में उस का मन करता कि घर के किसी कोने में सिर्फ वह और भारती चंद मिनट साथ बैठें. उस की गोद में भारती का सिर हो और दोनों ढेर सारी सिर्फ प्यारभरी बातें करें पर वह जानता था कि आईसीयू से भारती के लौट आने के बाद भी वह पल अब कभी नहीं आने वाला. डाक्टर की देखरेख से भारती की हालत सुधरने लगी. जब भारती घर लौट कर आई तो मन में लाख द्वेष रहने के बावजूद प्रेम ने उस का पूरा खयाल रखा.
घर, अस्पताल और औफिस संभालतेसंभालते प्रेम के अंदर भी नीरसता पैदा हो गई. उसे बस इस बात की जल्दी रहती कि कैसे 7 बजे तक बच्चों को तैयार कर स्कूल भेज सके, फिर भारती की सभी जरूरतों को पूरा कर खुद भी औफिस के लिए निकल सके. उसे कुछ और सोचने का वक्त ही नहीं मिलता और कितना भी जल्दी कर ले, 5-10 मिनट की देर हो ही जाती.
वह खुद को भारती की जगह महसूस करने लगा. धीरेधीरे उसे भारती की मनोस्थिति समझ आने लगी. उस ने कभी कोशिश ही नहीं की कि भारती के साथ चंद मिनट बैठ कर कुछ बातें करे और वहीं भारती की जलीकटी बातें उसे ऐसा सोचने की भी फुरसत न देती थीं. धीरेधीरे भारती की सेहत में सबलता आने लगी. थोड़ाबहुत घर के काम में वह भी हाथ बंटाने लगी लेकिन पारिवारिक स्थिति पहले जैसी ही थी.
इधर भारती को भी अपने रवैए के प्रति मन में ग्लानि महसूस होने लगी. उस ने देखा कि प्रेम उस का खयाल रखते हुए घर का सब काम संभाल ले रहा है तो फिर वह क्यों नहीं. उसे तो औफिस जाने की भी चिंता नहीं. प्रेम को उस से बस इतनी ही शिकायत रहती थी न, कि उस के जीवन में अब उस के लिए कोई जगह नहीं रही क्योंकि वह उस को अपना समय नहीं दे पाती. अब भारती को प्रेम की शिकायत सही लगने लगी थी.
दोनों के मन के अंदर भावुकता अंकुरण का असफल प्रयास जारी था परंतु पुरानी बुरी यादों की परत इतनी मोटी थी कि वह भाव अंकुरित नहीं हो पा रहा था. दोनों में बगैर जरूरत कोई बातचीत न होती. हां, लेकिन, तीखी वाणी और टेढ़ी बातें अपना अस्तित्व खो चुकी थीं.
एक दिन भारती का रैगुलर चैकअप करा जब दोनों अस्पताल से लौट रहे थे तो ग्राइंडर मशीन की जार, जो उन्होंने ठीक होने को दिया था, उस दुकान पर रुके. दुकानदार ने जार ठीक करने का जो खर्च बताया उस पर प्रेम ने कहा, ‘‘भाईसाहब, ठीकठीक खर्च बताओ, आप जो खर्च बता रहे हो उस में थोड़े पैसे और मिला दें तो नया जार मिल जाएगा.’’
‘‘साहब, ऐसा है कि आप के घर का ज्यादातर सामान धीरेधीरे पुराना हो रहा होगा. उन सब की अब मरम्मत की जरूरत पड़ती होगी. ऐसे में आप कितना नया सामान खरीदेंगे. चीजों का बदलाव सब से आसान है पर उस की मरम्मत करवा लेने से उस से जुड़ी यादें घर में ही रह जाती हैं.’’
इतनी बड़ी बात दुकानदार कितनी सहजता से बोल गया. ऐसे कितने ही पल दोनों को याद आ गए जब दोनों अलग होना चाहते थे, रिश्ता खत्म कर जीवन में बदलाव चाहते थे लेकिन दरअसल उसे मरम्मत की जरूरत थी. दोनों आपसी सहमति से दुकानदार को जार की मरम्मत करने की इजाजत दे अपनी स्कूटी की तरफ बढ़ गए.
प्रेम ने स्कूटी के दोनों हैंडल पकड़ खुद को संतुलित किया और पीछे भारती लेडीस्टेप पर कम भार देते हुए बैठ गई. दोनों एकदूसरे की सहजता का खयाल रखने की पूरी कोशिश कर रहे थे पर दोनों के दिमाग में दुकानदार की बातें घूम रही थीं और उन्हें समझ आ चुका था कि सिर्फ चीजों को ही नहीं, रिश्तों को भी मरम्मत की जरूरत होती है.
स्कूटी स्टार्ट कर प्रेम हैंडल संभालते हुए दुपहिया चला रहा था और पीछे भारती ऊंचेनीचे रास्तों पर खुद को बैलेंस करने की कोशिश कर रही थी.
Family Story : एक डाक्टर होते हुए भी पत्नी को मौत के मुंह में जाते हुए देखते रह गए थे डाक्टर सुमित. कितने व्यथित थे वे लेकिन उन का बेटा मुदित शायद पापा का दुख समझ नहीं पा रहा था.
कौफी का मग सामने था. मग में पहले की तरह ही झाग के बुलबुले दिख रहे थे. एक घूंट भरा और मुंह कड़वा हो गया. डाक्टर सुमित ने मग नीचे रख दिया, ‘कैंटीन वाले रवि की कौफी पर भी असर हो रहा है,’ सोचते हुए डाक्टर सुमित के चेहरे पर एक खिन्न सी मुसकान आई और चली गई. असर सब ओर था. हर तरफ उदासी पंजे गाढ़ कर जमी थी. अभी 2 ही बजे थे, अगली शिफ्ट शुरू होने में एक घंटा था. इन दिनों सभी 2 शिफ्टों में काम कर रहे हैं, इन दिनों मरीज बढ़ने लगे हैं. डाक्टर सुमित ने आसपास नजर दौड़ाई, कैंटीन लगभग खाली थी. अधिकतर डाक्टर्स लंच के लिए चले गए होंगे.
कैंटीन में इस वक्त डाक्टर सुमित के अलावा चारपांच लोग ही थे. खांसी की आवाज सुन कर उन का ध्यान कोने की मेज पर चला गया, दसबारह साल का बच्चा मातापिता के साथ बैठा था. मां के हाथ में बिसकुट का पैकेट था, वह हाथ में बिसकुट ले कर बच्चे को खिला रही थी. मां के बारबार कहने पर बच्चे ने जरा सा बिसकुट कुतरा और फिर खांसने लगा. मां ने बच्चे की पीठ सहलानी शुरू कर दी. पिता ने फौरन बैग से फ्लास्क निकाला और मां को थमा दिया. मां ने फ्लास्क खोल कर पानी निकाला और बच्चे को अपने हाथ से पिलाने लगी.
डाक्टर सुमित ने वहां से दृष्टि हटा ली. कितने बेचैन लग रहे हैं दोनों, मातापिता हैं न, बच्चे की तकलीफ देख कर उस से ज्यादा परेशान हो जाते हैं और यही बच्चे बड़े हो कर कितने दूर हो जाते हैं, यह सोचते हुए डाक्टर सुमित ने कौफी का एक और घूंट भरा और मुंह फिर कड़वा हो गया.
कौफी छोड़ कर वे उठ खड़े हुए. बाहर निकलते हुए उन की नजर एक बार फिर कोने वाली मेज की तरफ गई, मां ने आंचल से बच्चे का मुंह पोंछ कर उसे अपनी गोद में लिटा लिया था और पिता उस के पैर अपनी गोद में रख कर सहला रहा था.
गरिमा भी ऐसे ही करती थी. जब भी मुदित तकलीफ में होता था, अपनी गोद में उस का सिर रख कर वह सहलाती रहती. हां, उस वक्त डाक्टर सुमित इस बच्चे के पिता की तरह उस का पैर अपनी गोद में नहीं रख पाते थे, लेकिन अस्पताल से दस बार फोन करते और मुदित का हाल पूछते, दवाएं भिजवाते.
गरिमा उन्हें आश्वस्त करती, ‘परेशान मत हो, सुमित, मैं हूं न.’ आश्वासन देने वाली गरिमा अब नहीं थी, मुदित था लेकिन उन से बहुत दूर, एक ही छत के नीचे रहने के बावजूद मुदित को यह तक पता नहीं चला कि वे बिना नाश्ता किए अस्पताल आ रहे हैं. गरिमा होती तो ऐसा होता?
वह तो उन्हें बिना नाश्ता किए जाने ही नहीं देती थी, सुबह 7 बजे की शिफ्ट होती तो सैंडविच बना कर साथ रख देती और मुदित कहता, ‘सब खाना है, प्रौमिस?’ डाक्टर सुमित हंसते हुए कहते, ‘प्रौमिस’. वादा निभाने की पुष्टि करने के लिए कई बार उन्होंने सैंडविच खाते हुए अपना वीडियो भी बना कर भेजा.
लेकिन अब पूछना तो दूर, मुदित नाश्ते की टेबल पर ही नहीं आता, पता नहीं खुद नाश्ता करता है या नहीं, गरिमा होती तो उन्हें झट आश्वस्त कर देती, ‘मैं हूं न, तुम परेशान मत हो.’
गरिमा होती तो ऐसी नौबत ही नहीं आती, अपने केबिन में बैठते हुए डाक्टर सुमित ने सोचा, वह होती तो न गरिमा की सहेली रीमा का फोन आता जिसे सुन कर मुदित भड़क उठा था और न ही आंखों में आंसू भर कर उन से कहता, ‘आप किसी को प्यार नहीं करते पापा, न मम्मी को, न मुझे. आप को किसी के लिए कुछ नहीं करना है क्योंकि आप को लगता है, सब ठीक है,’ कहते हुए मुदित ने अपने कमरे में जा कर दरवाजा बंद कर लिया था. डाक्टर सुमित हतप्रभ से बंद दरवाजा देखते रहे.
अपनी समझ से तो उन्होंने ठीक ही किया था. रीमा ने संवेदना प्रकट करने के लिए फोन किया था, ‘हाय, यह भी कोई जाने की उम्र थी’ गरिमा की असमय मृत्यु पर शोक प्रकट करने के बाद वह उन्हीं घिसेपिटे सवालों को दोहरा रही थी जिन का जवाब ढूंढ़तेढूंढ़ते डाक्टर सुमित हार चुके थे, इसीलिए रीमा की संवेदना भी उन्हें सिर्फ औपचारिकता लग रही थी. वह लगातार बोल रही थी, ‘सोचती हूं तो आंसू नहीं थमते, घर तो वही संभालती थी, अब कौन खयाल रखेगा, मुदित को कौन देखेगा, आप कैसे मैनेज कर पाते होंगे, कितनी परेशानी होती होगी!’
पिछले 5 महीनों में गरिमा की कमी को हर कदम पर महसूस करते हुए बहुत मुश्किल से खुद को संभाला था. सहानुभूति की लहर कहीं उन्हें फिर असहाय न कर दे, इसलिए वे झट से बोल उठे, ‘परेशानी का क्या है, घर के काम के लिए मेड है, खाना तो मिल ही जाता है, मैं बिलकुल ठीक हूं और मुदित तो बहुत समझदार है, रीमाजी, वह भी सीख रहा है सब.’
उधर से गरिमा को याद करते हुए अपना खयाल रखने की हिदायत के साथ रीमा ने फोन बंद किया तब उन्होंने देखा सोफे पर मुदित बैठा था. वह झटके से बोला, ‘मुझे मम्मी के बिना कुछ अच्छा नहीं लगता, न खाना, न यह घर,’ डाक्टर सुमित ने ठंडी सांस भरी और उस की बगल में बैठ गए. लेकिन कंधे पर रखा उन का हाथ झटकते हुए मुदित उठ खड़ा हुआ, ‘और आप कहते हैं कि सब पहले जैसा हो रहा है? कुछ पहले जैसा नहीं है.’
डाक्टर सुमित ने उस का हाथ पकड़ कर बैठाने की कोशिश की, लेकिन मुदित ने अपना हाथ छुड़ाते हुए कहा, ‘बोलिए अपना फेवरेट डायलौग, हम कर ही क्या सकते हैं. मुझे पता है, आप कुछ नहीं कर सकते. मम्मी बीमार हुई, तब आप ने यही कहा. मम्मी जा रही थी, मैं रो रहा था और आप ने कह दिया, हम कर ही क्या सकते हैं, आज वो नहीं है तब भी आप यही बोलिए पापा, क्योंकि आप को किसी के लिए कुछ नहीं करना है.’
डाक्टर सुमित को झटका सा लगा. गरिमा का कैंसर अंतिम पड़ाव पर पहुंच गया, तब रोग का पता लगा था. उन्होंने अपनी तरफ से हर कोशिश की थी लेकिन वे हाथ मलते रह गए. गरिमा चली गई. डाक्टर हो कर भी उसे न बचा पाने का मलाल उन के मन में था. मुदित इसी बात पर उन से नाराज था.
उस रात वे सो नहीं पाए. इसी उधेड़बुन में रहे कि मुदित को कैसे समझाएं कि गरिमा के बिना वे कितने अकेले हो गए हैं. ऐसे में सहानुभूति जताने वाली बातें उन की हिम्मत कमजोर करने लगती हैं. ऐसे पलों में वे बड़ी कठिनाई से खुद को संभाल कर कहते हैं, ‘सब ठीक है.’
यह बात मुदित धीरेधीरे ही समझ पाएगा, यह सोच कर वे अगली सुबह नाश्ते की मेज पर उस का इंतजार करते रहे. वह जब नहीं आया तो एक कागज पर उन्होंने लिखा, ‘अस्पताल जा रहा हूं, तुम नाश्ता कर लेना और फोन जरूर करना.’ कागज उस के कमरे के दरवाजे के नीचे से खिसका कर वे अस्पताल आ गए थे.
पूरा दिन बीत गया, कोई फोन नहीं आया. रात को घर लौट कर उन्होंने देखा, झुमकी खाना बना कर चली गई थी लेकिन मुदित ने खाना नहीं खाया था. नहा कर वे सीधे मुदित के कमरे की ओर गए. दरवाजा बंद था. कई आवाजें देने पर भी जब मुदित ने कोई जवाब नहीं दिया तो उन्होंने फिर कागज पर लिखा, ‘आजकल लौटने में देर हो रही है. दो शिफ्ट्स चल रही हैं. कल भी सुबह ही निकल जाऊंगा. हो सकता है अब रात में भी अस्पताल में रुकना पड़े. तुम अपना ध्यान रखना. खाना खा लो. याद है न, मम्मी कहती थी, गुस्सा कभी खाने पर नहीं निकालना चाहिए,’ यह लिखते हुए उन्हें लगा कि आंखें नम हो गई हैं. कागज दरवाजे के नीचे खिसका कर वे अपने कमरे में लौट आए.
आज भी मुदित को बिना देखे ही वे अस्पताल आ गए थे. दूसरी शिफ्ट में भी एक मिनट की फुरसत नहीं मिली. अभी जिस मरीज को देखा है उस की हालत बहुत गंभीर है. उसे देखते हुए कई बार मोबाइल की आवाज आई है. शायद कोई कौल कर रहा है. नर्स को दवाओं और इंजैक्शन देने का निर्देश दे कर उन्होंने अभीअभी जेब से मोबाइल निकाला है, मुदित का मैसेज है, ‘खाना आप के साथ ही खाऊंगा. प्रौमिस कीजिए कि आप रात में घर लौट आएंगे.’ डाक्टर सुमित के थके चेहरे पर मुसकान उभर आई. उन्होंने प्रौमिस टाइप किया और अगले मरीज को देखने लगे.
Family Story In Hindi : बच्चों के साथ रहने के मामले में मनीषा व निरंजन के सुनेसुनाए अनुभव अच्छे नहीं थे. अपने दोस्तों व सगेसंबंधियों के कई अनुभवों से वे अवगत थे कि बच्चों के पास जा कर जिंदगी कितनी बेगानी हो जाती है, लेकिन अब मजबूरी थी कि उन्हें बच्चों के पास जाना ही था क्योंकि वे शारीरिक व मानसिक रूप से लाचार हो गए थे.
उम्र अधिक हो जाने से शरीर कमजोर हो गया था. निरंजन के लिए अब बाहर के छोटेछोटे काम निबटाना भी भारी पड़ रहा था. कार चलाने में दिक्कत होती थी. मनीषा वैसे तो घर का काम कर लेती थीं लेकिन अकेले ही पूरी जिम्मेदारी संभालना मुश्किल हो जाता था. नौकरचाकरों का कोई भरोसा नहीं, काम वाली थी, कभी आई कभी नहीं.
छुट्टियां न मिलने की वजह से बेटा अनुज भी कम ही आ पाता था. इसलिए उन्हें अब मानसिक अकेलापन भी खलने लगा था. अकेले रहने में अपनी बीमारियों से भी निरंजनजी डरते थे.
यही सब सोचतेविचारते अपने अनुभवों से डरतेडराते आखिर उन्होंने भी लड़के के साथ रहने का फैसला ले ही लिया.
इस बारे में उन्होंने पहले बेटे को चिट्ठी लिखना ठीक समझा ताकि बेटे और बहू के मूड का थोड़ाबहुत पहले से ही पता चल जाए.
हफ्ते भर के अंदर ही बेटे का फोन आ गया कि पापा, आज ही आप की चिट्ठी मिली है. आप मेरे पास आना चाह रहे हैं, यह हम सब के लिए बहुत खुशी की बात है. बच्चे और नीता तो इतने खुश हैं कि अभी से आप के आने का इंतजार करने लगे हैं. आप बताइए, कब आ रहे हैं? मैं लेने आ जाऊं या फिर आप खुद ही आ जाएंगे?
फोन पर बेटे की बातें सुन कर निरंजन की आंखें भर आईं. प्रत्युत्तर में बोले, ‘‘हम खुद ही आ जाएंगे, बेटे… परसों सुबह यहां से टैक्सी से चलेंगे और शाम 7 बजे के आसपास वहां पहुंच जाएंगे.’’
‘‘ठीक है, पापा,’’ कह कर बेटे ने फोन रख दिया.
‘‘अनुज हमारे आने की बात सुन कर बहुत खुश है,’’ निरंजन बोले.
‘‘अभी तो खुश है पर पता नहीं हमेशा साथ रहने में कैसा रुख हो,’’ मनीषा अपनी शंका जाहिर करती हुई बोलीं.
‘‘सब अच्छा होगा, मनीषा,’’ निरंजन दिलासा देते हुए बोले.
शाम के 7 बजे जब निरंजन और मनीषा बेटे के घर पर पहुंचे तो बेटेबहू और बच्चे उन के इंतजार में बैठे थे. दरवाजे पर टैक्सी रुकने की आवाज सुन कर चारों घर से बाहर निकल पड़े.
दादाजी…दादाजी कहते हुए दोनों बच्चे पैर छूते हुए उन से चिपक गए. बेटेबहू ने भी पैर छुए. सब ने एकएक सामान उठा लिया. यहां तक कि बच्चों ने भी छोटा सामान उठाया और सब एकसाथ अंदर आ गए.
मन में शंका थी कि थोड़े दिन रहने की बात अलग थी पर हमेशा के लिए रहना…न जाने कैसा हो.
नीता चायनाश्ता बना कर ले आई. सभी बैठ कर गपशप करने लगे.
‘‘मम्मीपापा, आप फ्रेश हो लीजिए,’’ बहू नीता बोली, ‘‘इस कमरे में आप का सामान रख दिया है. आज से यह कमरा आप का है.’’
‘‘यह हमारा कमरा…पर यह तो बच्चों का कमरा है…’’
‘‘बच्चे छोटे वाले कमरे में शिफ्ट हो गए हैं.’’
‘‘लेकिन तुम ने बच्चों का कमरा क्यों बदला, बहू…उन की पढ़ाईलिखाई डिस्टर्ब होगी. फिर उस छोटे से कमरे में दोनों कैसे रहेंगे?’’
‘‘कैसी बात कर रही हैं, मम्मीजी आप, घर के सब से बड़े क्या सब से छोटे कमरे में रहेंगे. बच्चों की पढ़ाई और सामान वगैरह के लिए अलग कमरा चाहिए…रात में तो दोनों आप के साथ ही घुस कर सोने वाले हैं,’’ नीता हंसते हुए बोली.
मनीषा को सुखद एहसास हुआ. बेटा तो अपना ही है लेकिन बहू के मुंह से ऐसे शब्द सुन कर जैसे दिल की शंकाओं का कठोर दरवाजा थोड़ा सा खुल गया.
सुबह बहुत देर से नींद खुली. निरंजन उठ कर बाथरूम हो आए. अंदर खटरपटर की आवाज सुन कर नीता ने चाय बना दी. उस दिन रविवार था. बच्चे व अनुज भी घर पर थे.
चाय की टे्र ले कर नीता दरवाजे पर खटखट कर बोली, ‘‘मम्मीजी, चाय.’’
‘‘आजा…आजा बेटी…अंदर आजा,’’ निरंजन बोले.
‘‘नींद ठीक से आई, पापा,’’ नीता चाय की ट्रे मेज पर रखती हुई बोली.
‘‘हां, बेटी, बहुत अच्छी नींद आई. बच्चे और अनुज कहां हैं?’’ मनीषा ने पूछा.
‘‘सब उठ गए हैं. बच्चों ने तो अभी तक दूध भी नहीं पिया है. कह रहे थे कि जब दादाजी उठ जाएंगे तो वे चाय पीएंगे और हम दूध.’’
‘‘तुम ने भी अभी तक चाय नहीं पी,’’ मनीषा ट्रे में चाय के 4 कप देख कर बोलीं.
‘‘मम्मीजी, हम एक बार की चाय तो पी चुके हैं, दूसरी बार की चाय आप के साथ बैठ कर पीएंगे.’’
तभी बच्चे व अनुज कमरे में घुस गए और दादादादी के बीच में बैठ गए.
‘‘दादाजी, पापा कहते हैं कि वह आप से बहुत डरते थे. आप जब आफिस से आते थे तो वह एकदम पढ़ने बैठ जाते थे, सच्ची…’’ पोता बोला.
‘‘पापा यह भी कहते हैं कि वह बचपन में बहुत शैतान थे और दादी को बहुत तंग करते थे. है न दादी?’’ पोती बोली थी.
दोनों बच्चों की बातें सुन कर निरंजन व मनीषा हंसने लगे.
‘‘सभी बच्चे बचपन में अपनी मम्मी को तंग करते हैं और अपने पापा से डरते हैं,’’ निरंजन बच्चों को प्यार करते हुए बोले.
‘‘हां, और मम्मी कहती हैं कि सभी मम्मीपापा अपने बच्चों को बहुत प्यार करते हैं…जैसे दादादादी मम्मीपापा को प्यार करते हैं और मम्मीपापा हमें.’’
पोती की बात सुन कर मनीषा व निरंजन की नजरें नीता के चेहरे पर उठ गईं. नीता का खुशनुमा चेहरा दिल में उतर गया. दोनों ने मन में सोचा, एक अच्छी मां ही बच्चों को अच्छे संस्कार दे सकती है.
दोपहर के खाने में नीता ने कमलककड़ी के कोफ्ते और कढ़ी बना रखी थी.
‘‘पापा, आप यह कोफ्ते खाइए. ये बताते हैं कि आप को कमलककड़ी के कोफ्ते बहुत पसंद हैं,’’ नीता कोफ्ते प्लेट में रखती हुई बोली.
‘‘और मम्मी को कढ़ी बहुत पसंद है. है न मम्मी?’’ अनुज बोला, ‘‘याद है मैं कढ़ी और कमलककड़ी के कोफ्ते बिलकुल भी पसंद नहीं करता था. और मेरे कारण आप अपनी पसंद का खाना कभी भी नहीं बनाती थीं. अब आप की पसंद का खाना ही बनेगा और हम भी खाएंगे.’’
बेटा बोला तो मनीषा को अपने भावों पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो गया. आंखों के कोर भीग गए.
‘‘नहीं बेटा, खाना तो बच्चों की पसंद का ही बनता है, जो बच्चों को पसंद हो वही बनाया करो.’’
रात को पोते व पोती में ‘बीच में कौन सोएगा’ इस को ले कर होड़ हो गई. आखिर दोनों बीच में सो गए.
थोड़ी देर बाद नीता आ गई.
‘‘चलो, बच्चो, अपने कमरे में चलो.’’
‘‘नहीं, हम यहीं सोएंगे,’’ दोनों चिल्लाए.
‘‘नहीं, दादादादी को आराम चाहिए, तुम अपने कमरे में सोओ.’’
‘‘रहने दे, बेटी,’’ निरंजन बोले, ‘‘2-4 दिन यहीं सोने दे. जब मन भर जाएगा तो खुद ही अपने कमरे में सोने लगेंगे.’’
दोनों बच्चे उस रात दादादादी से चिपक कर सो गए.
दिन बीतने लगे. नीता हर समय उन की छोटीछोटी बातों का खयाल रखती. बेटा भी आफिस से आ कर उन के पास जरूर बैठता.
एक दिन मनीषा शाम को कमरे से बाहर निकली तो नीता फोन पर कह रही थी, ‘‘मैं नहीं आ सकती… मम्मीपापा आए हुए हैं. यदि मैं आ गई तो वे दोनों अकेले रह जाएंगे. उन को खराब लगेगा,’’ कह कर उस ने बात खत्म कर दी.
‘‘कहां जाने की बात हो रही थी, बेटी?’’
‘‘कुछ नहीं, मम्मीजी, ऐसे ही, मेरी सहेली बुला रही थी कि बहुत दिनों से नहीं आई.’’
‘‘तो क्यों नहीं जा रही हो. हम अकेले कहां हैं, और फिर थोड़ी देर अकेले भी रहना पड़े तो क्या हो गया. देखो बेटी, तुम अगर नहीं जाओगी तो मैं बुरा मान जाऊंगी.’’
नीता कुछ न बोली और दुविधा में खड़ी रही.
मनीषा नीता के कंधे पर हाथ रख कर बोलीं, ‘‘बेटी, मम्मीपापा आ गए हैं इसलिए अगर तुम ने अपनी दिनचर्या में बंधन लगाए तो हम यहां कैसे रह पाएंगे. यह अब कोई 2-4 दिन की बात थोड़े न है, अब तो हम यहीं हैं.’’
‘‘कैसी बात कर रही हैं, मम्मीजी. आप का रहना हमारे सिरआंखों पर. मैं बंधन थोड़े न लगा रही हूं… और थोड़ाबहुत बंधन रहे भी तो क्या, बच्चों के कारण मांबाप बंधन में नहीं रहते हैं. फिर बच्चों को भी मांबाप के कारण बंधना पड़े तो कौन सी बड़ी बात है.’’
नीता की बात सुन कर मनीषा ने चाहा कि उस को गले लगा कर खूब प्यार करें.
मनीषा ने नीता को जबरन भेज दिया. धीरेधीरे मनीषा की कोशिश से नीता भी अपनी स्वाभाविक दिनचर्या में रहने लगी. उस ने 1-2 किटी भी डाली हुई थीं तो मनीषा ने उसे वहां भी जबरदस्ती भेजा.
उस की सहेलियां जब घर आतीं तो मनीषा चाय बना देतीं. नाश्ते की प्लेट सजा देतीं. नीता के मना करने पर प्यार से कहतीं, ‘‘तुम जो हमारे लिए इतना करती हो, थोड़ा सा मैं ने भी कर दिया तो कौन सी बड़ी बात कर दी.’’
अनुज व नीता को अब कई बातों की सुविधा हो गई थी. कहीं जाना होता तो दादादादी के होने से बच्चों की तरफ से दोनों ही निश्ंिचत रहते.
महीना खत्म हुआ. निरंजन को पेंशन मिली. उन्होंने अपना पैसा बहू को देने की पेशकश की तो अनुज व नीता दोनों नाराज हो गए.
‘‘पापा, आप कैसी बातें कर रहे हैं. पैसे दे कर ही रहना है तो आप कहीं भी रह सकते हैं. आप ने हमारे लिए जीवन भर इतना किया, पढ़ायालिखाया और मुझे इस लायक बनाया कि मैं आप की देखभाल कर सकूं,’’ अनुज बोला.
‘‘लेकिन बेटा, मेरे पास हैं इसलिए दे रहा हूं.’’
‘‘नहीं, पापा, पैसा दे कर तो आप मेरा दिल दुखा रहे हैं… जब दादीजी और दादाजी आप के पास रहने आए थे तो उन के पास देने के लिए कुछ भी नहीं था तो क्या आप ने उन की देखभाल नहीं की थी. जितना आप से बन सकता था आप ने उन के लिए किया और आप के पास पैसा है तो आप हम से हमारा सेवा करने का अधिकार क्यों छीनना चाहते हैं.’’
निरंजन निरुत्तर हो गए. मनीषा आश्चर्य से अपने उस लापरवाह बेटे को देख रही थीं जो आज इतना समझदार हो गया है.
अनुज ने जब पैसे लेने से साफ मना कर दिया तो निरंजन ने पोते और पोती के नाम से बैंक में खाता खोल दिया और जो भी पेंशन का पैसा मिलता उस में डालते रहते. बेटे ने उन का मान रखा था और वे बेटे का मान रख रहे थे.
एक दिन निरंजन सुबह उठे तो बदन टूट रहा था और कुछ हरारत सी महसूस कर रहे थे. मनीषा ने उन का उतरा चेहरा देखा तो पूछ बैठीं, ‘‘क्या हुआ…तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’
‘‘हां, कुछ बुखार सा लग रहा है.’’
‘‘बुखार है,’’ मनीषा घबरा कर माथा छूती हुई बोली, ‘‘अनुज कोे बुलाती हूं.’’
‘‘नहीं, मनीषा, उसे परेशान मत करो…शाम तक देख लेते हैं…शायद ठीक हो जाए.’’
मनीषा चुप हो गई.
लेकिन शाम होतेहोते बुखार बहुत तेज हो गया. दोपहर के बाद निरंजन लेटे तो उठे ही नहीं. शाम को आफिस से आ कर अनुज पापा के साथ ही चाय पीता था.
निरंजन जब बाहर नहीं आए तो नीता कमरे में चली गई. मनीषा निरंजन का सिर दबा रही थीं.
‘‘पापा को क्या हुआ, मम्मीजी?’’
‘‘तेरे पापा को बुखार है.’’
‘‘बुखार है…’’ कहती हुई नीता ने बहू की सारी औपचारिकताएं त्याग कर निरंजन के माथे पर हाथ रख दिया.
‘‘पापा को तो बहुत तेज बुखार है, तभी पापा आज सुबह से ही सुस्त लग रहे थे. आप ने बताया भी नहीं. मैं अनुज को बुलाती हूं,’’ इतना कह कर नीता अनुज को बुला लाई.
अनुज जल्दी ही आ गया और मम्मीपापा को तकलीफ न बताने के लिए एक प्यार भरी डांट लगाई, फिर डाक्टर को बुलाने चला गया. डाक्टर ने जांच कर के दवाइयां लिख दीं.
‘‘मौसमी बुखार है, 3-4 दिन में ठीक हो जाएंगे,’’ डाक्टर बोला.
बेटाबहू, पोता और पोती सब निरंजन को घेर कर बैठ गए. नीता ने जब पढ़ाई के लिए डांट लगाई तब बच्चे पढ़ने गए.
‘‘खाने में क्या बना दूं?’’ नीता ने पूछा.
निरंजन बोले,’’ तुम जो बना देती हो वही स्वादिष्ठ लगता है.’’
‘‘नहीं, पापा, बुखार में आप का जो खाने का मन है वही बनाऊंगी.’’
‘‘तो फिर थोड़ी सी खिचड़ी बना दो.’’
‘‘थोड़ा सा सूप भी बना देना नीता, पापा को सूप बहुत पसंद है,’’ अनुज बोला.
निरंजन को अटपटा लग रहा था कि अनुज उन के लिए इतना कुछ कर रहा है. उन की हिचकिचाहट देख कर अनुज बोला, ‘‘मैं कुछ नया नहीं कर रहा. आप दोनों ने दादा व दादी की जितनी सेवा की उतनी तो हम आप की कभी कर भी नहीं पाएंगे. पापा, मैं तब छोटा था. आज जो कुछ भी हम करेंगे हमारे बच्चे वही सीखेंगे. बड़ों का तिरस्कार कर हम अपने बच्चों से प्यार और आदर की उम्मीद कैसे कर सकते हैं. यह कोई एहसान नहीं है. अब आप आराम कीजिए.’’
‘‘हमारा बेटा औरों जैसा नहीं है न…’’ मनीषा भर्राई आवाज में बोलीं.
‘‘हां, मनीषा, वह बुरा कैसे हो सकता है. तुम ने सुना नहीं, उस ने क्या कहा.’’
‘‘हां, बच्चों में संस्कार उपदेश देने से नहीं आते, घर के वातावरण से आते हैं. जिस घर में बड़ों का महत्त्वपूर्ण स्थान होता है उस घर में बच्चे बड़ों को आदर देना सीखते हैं और जिस घर में बड़ों का तिरस्कार होता है उस घर के बच्चे भी तो वही सीखेंगे.’’
एक पल रुक कर मनीषा फिर बोली, ‘‘हम दोनों ने अपने मातापिता की सेवा व उचित देखभाल की. हमारी गृहस्थी में उन का स्थान हमेशा ही महत्त्वपूर्ण रहा, वही हमारे बच्चों ने सीखा. लेकिन अधिकतर लोग अपने बच्चों से तो सेवा व आदर की उम्मीद करते हैं, लेकिन वे अपने जीवन में अपने बड़ों की मौजूदगी को भुला चुके होते हैं.’’
मनीषा के मन से आज सारे संशय खत्म हो चुके थे.
उन के सगेसंबंधियों, दोस्तों ने उन्हें अपने अनुभव बता कर उन के मन में बेटेबहू के प्रति डर व नकारात्मक विचार पैदा किए, अब वे अपने अनुभव बता कर दूसरों के मन में बेटेबहू के प्रति प्यार व सकारात्मक विचार भरेंगे.
निरंजन ने संतोष से आंखें मूंद लीं और मनीषा कमरे की लाइट बंद कर बहू की सहायता करने के लिए रसोई में चली गईं. आखिर इनसान जो अपनी जिंदगी में बोएगा वही तो काटेगा. कांटे बो कर फूलों की उम्मीद करना तो मूर्खता है. Family Story In Hindi
Social Media : भारतीयों का सोशल मीडिया पर स्पैम टाइम काफी बढ़ गया है. इस का इलाज तो है कि डिजिटल डिटौक्स कर लिया जाए मगर इस से भी खतरनाक है इन्हीं युवाओं में धार्मिक यात्राओं का बढ़ता चलन. यह न सिर्फ समय व पैसा बरबाद कर रहा है बल्कि दिमाग को कुंद भी कर रहा है.
भारत में 491 मिलियन यानी 49 करोड़ से अधिक लोग सोशल मीडिया का उपयोग करते हैं. शहर ही नहीं, गांव के लोग भी इस में सक्रिय भूमिका अदा कर रहे हैं. सोशल मीडिया में सब से ज्यादा प्रयोग फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब का किया जाता है. राजनीतिक लोग ट्विटर, जो अब एक्स के नाम से जाना जाता है, का उपयोग करते हैं. 68 फीसदी पुरुष और 32 फीसदी महिलाएं इस का प्रयोग करती हैं.
हर भारतीय के हिसाब से देखा जाए तो वह प्रतिदिन 2 घंटा 26 मिनट सोशल मीडिया पर गुजारता है. युवा लड़केलड़कियां सब से ज्यादा इस का प्रयोग कर रहे हैं. सोशल मीडिया के बढ़ते प्रयोग को कम करने के लिए अलगअलग तरह के प्रयास भी तेज हो गए हैं.
आजकल एक नया ट्रैंड चला है कि सोशल मीडिया से दूरी कैसे बनाई जाए. इस के लिए डिजिटल डिटौक्स अपनाने पर जोर दिया जा रहा है. चर्चा इस बात की हो रही है कि सोशल मीडिया लोगों का समय खराब कर रहा है. इस वजह से देश का युवावर्ग और बाकी लोग देश की प्रगति में हिस्सेदारी नहीं निभा पा रहे. सोशल मीडिया पर कौन कितना समय बिता रहा है, इस बात की गणना करने के लिए मोबाइल ऐप्स आ गए हैं. ये मोबाइल में डाउनलोड किए जा सकते हैं. इस के बाद मोबाइल यह बता देगा कि हम स्क्रीन पर कितना समय बिता रहे हैं.
ऐप यह भी बताता है कि हमें मोबाइल पर कितना समय बिताना चाहिए. इस में सिक्योरिटी का भी फीचर होता है. अगर उस को मोबाइल पर ऐक्टिव कर दिया जाए तो दी गई समयसीमा के बाद ऐप मोबाइल पर सोशल मीडिया अकाउंट को बंद कर देता है. अब इस बात पर जोर दिया जा रहा है कि सप्ताह में कम से कम 48 घंटे सोशल मीडिया से दूर रहा जाए. इस को ही डिजिटल डिटौक्स कहा जाता है. मनोविज्ञानी सेहत के लिए इस को बेहद जरूरी बता रहे हैं.
डिजिटल डिटौक्स के लिए कई मोबाइलों में ऐप को डाउनलोड करने की भी जरूरत नहीं होती. उन में ये फीचर्स इनबिल्ट होते हैं. अगर मोबाइल यह बताता है कि स्क्रीन पर समय अधिक बिता रहे हैं तो वह यह सु?ाव देता है कि अधिक से अधिक कितना समय सोशल मीडिया पर या मोबाइल पर दे सकते हैं. मनोविज्ञानी भी कहते हैं कि सोशल मीडिया पर ज्यादा समय देने से कितना नुकसान होने लगा है.
क्या होता है डिजिटल डिटौक्स
डिजिटल डिटौक्स का मतलब कुछ समय के लिए स्मार्टफोन, कंप्यूटर और सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखना होता है जिस से कि आप अपनी स्क्रीन की लत से छुटकारा पा सकें और वास्तविक दुनिया से जुड़ सकें. इस के कई लाभ बताए जाते हैं. डिजिटल डिटौक्स से तनाव और चिंता कम हो सकती है. स्क्रीन से दूर रहने से अच्छी नींद आने लगती है. ब्लू स्क्रीन अच्छी नींद में बाधा डालती है.
डिजिटल डिटौक्स का एक लाभ यह भी बताया जाता है कि इस से ऐक्सरसाइज के लिए अधिक समय निकाल सकते हैं, जिस से शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर हो सकता है. डिजिटल डिटौक्स से रिलेशन को मजबूत करने के लिए आपस में बातचीत करने का समय निकाला जा सकता है. इस से आपस में बातचीत कर सकते हैं. किताबें पढ़ सकते हैं, जो समाज से जोड़ने का काम करती हैं व विचारों को मजबूत करती हैं, साथ ही, तर्कशक्ति का विस्तार करती हैं. बचे हुए समय में अपने अंदर स्किल का विकास कर सकते हैं.
जानकार लोग राय देते हैं कि सप्ताह में एक से दो दिन डिजिटल डिटौक्स करें. इस से लाभ होगा. यह बात सच है कि सोशल मीडिया में लोग अपना बहुत सारा समय गुजार रहे हैं. ऐसे में उस से दूरी बेहद जरूरी हो गई है.
सोशल मीडिया से भी अधिक घातक तीर्थयात्राएं हो गई हैं जिन में लाखों युवा अपना समय नष्ट कर रहे हैं. जैसे सोशल मीडिया से दूरी के लिए डिजिटल डिटौक्स जरूरी है वैसे ही तीर्थयात्राओं से युवाओं को दूर रखने की जरूरत है. तीर्थयात्राओं के चलते युवाओं में स्किल डैवलपमैंट नहीं हो पा रहा. वे केवल कांवड़ यात्राओं तक सीमित हुए जा रहे हैं. सरकार भी जनता के टैक्स का पैसा तीर्थयात्राओं की व्यवस्था पर खर्च कर रही है जोकि गलत है.
तीर्थयात्राओं से कैसे बचेंगे
डिजिटल डिटौक्स के जरिए सोशल मीडिया से तो बच जाएंगे लेकिन तीर्थयात्राओं में समय बरबाद करने से कैसे बचेंगे? लोग मानते हैं कि तीर्थयात्राएं करने से पुण्य मिलता है, जिस से भविष्य निखरता है. इस की सब से बड़ी वजह यह है कि पौराणिक कथाओं में यह सम?ाया जाता रहा है कि ‘अजगर करें न चाकरी, पंच्छी करे न काम, दास मलूका कह गए सब के दाता राम’. इस के कारण जब सोशल मीडिया का दौर नहीं था तब भी लोग खाली समय पास करने के लिए चौपालों पर हुक्का गुड़गुड़ाते समय पास करते रहते थे. इस के अलावा तीर्थयात्राएं करने चले जाते थे.
कईकई माह की तीर्थयात्राएं लोग करते थे. यह दौर आज भी चल रहा है. सोशल मीडिया पर अपना समय बरबाद न करने के लिए डिजिटल डिटौक्स तो हम करने की वकालत करने लगे हैं लेकिन जो समय तीर्थयात्राओं पर खर्च हो रहा है उस का क्या होगा? तीर्थयात्राओं पर केवल अपनी ही जेब का पैसा खर्च नहीं होता बल्कि देश और समाज का वह पैसा भी खर्च होता है जो टैक्स के रूप में सरकार को दिया जाता है. टैक्स लेते समय सरकार यह दावा करती है कि इस पैसे से वह देशप्रदेश और शहर का विकास करेगी. असल में सरकार इस पैसे से जनता को तीर्थयात्राएं भी कराती है. उस के लिए सड़कें और मंदिर बनवाती है. अगर कोई दुर्घटना हो जाए तो उस का मुआवजा भी देती है. इस के बदले वह जनता से वोट लेती है.
कितनी खर्चीली हैं यात्राएं
दिल्ली में बुजुर्गों को तीर्थयात्रा करवाने के लिए दिल्ली सरकार की मुख्यमंत्री तीर्थयात्रा योजना लागू है जिस का लाभ हर साल हजारों लोग ले रहे हैं. चारधाम, वैष्णो देवी, अयोध्या, प्रयागराज, अजमेर शरीफ जैसे कई तीर्थस्थलों की यात्रा कराई जाती हैं. मुख्यमंत्री तीर्थ यात्रा योजना का लाभ अब तक 87,000 से ज्यादा लोग उठा चुके हैं. 2019 से शुरू हुई इस योजना में अब तक 90 से ज्यादा यात्राएं कराई जा चुकी हैं. हर विधानसभा से साल में 1,100 लोग इस योजना का लाभ उठा सकते हैं. पूरी दिल्ली से हर साल 77,000 लोग सरकार के खर्च पर प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों पर जा सकते हैं.
उत्तराखंड में गढ़वाल मंडल विकास निगम (जीएमवीएन) की ओर से जारी टूर पैकेज के अनुसार चारधाम की यात्रा के लिए प्रति यात्री 22 से 55 हजार रुपए तक खर्च करने पड़ते हैं. इस टूर पैकेज में हरिद्वार, ऋषिकेश और देहरादून से चारधाम की यात्रा के लिए टिकट औनलाइन बुक कराए जाते हैं. जीएमवीएन की ओर से चारधाम यात्रा में यात्रियों के खानेपीने व रहने के भी इंतजाम किए जाते हैं. जीएमवीएन ने नौन एसी बस, टैंपो ट्रैवलर, एसी इनोवा और नौन एसी कैब से चारधाम के लिए 14 टूर पैकेज जारी किए हैं. इन पैकेज में चारधामों के अलावा केदारनाथ और बद्रीनाथ की अलग से भी यात्रा कर सकते हैं. 6 से 11 दिनों के भीतर यह यात्रा पूरी होती है.
नौन एसी बस से चारधाम यात्रा करने पर 22 से 38 हजार रुपए तक खर्च करने होंगे जबकि एसी इनोवा से यात्रा करने में 35 से 55 हजार रुपए तक यात्राखर्च बैठेगा. चारधाम के लिए यात्रा मई, जून, सितंबर और अक्तूबर तक होती है.
10 दिनों की यात्रा में प्रति वयस्क 35,040 रुपए, प्रति बच्चा 33,540 रुपए और प्रति वृद्ध 32,790 रुपए खर्च करने पड़ते हैं. एसी इनोवा से चारधाम यात्रा करने में 54 हजार रुपए से अधिक खर्च होगा. दूसरी यात्राओं पर भी इसी तरह से खर्च करना होता है.
इसी तरह से कैलाश मानसरोवर यात्रा में औसतन खर्च 1 लाख 75 हजार से ले कर 2 लाख 83 हजार रुपए तक होता है. कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए सरकार की ओर से सब्सिडी भी मिलती है.
50-50 के 5 जत्थे उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे की तरफ से और 50-50 के 10 जत्थे सिक्किम के नाथुला दर्रे से रवाना होते हैं. उत्तराखंड के रूट से जाने के लिए पहले 5,000 रुपए जमा कराने होते हैं. लिस्ट में नाम आते ही 51,000 रुपए जमा कराने होते हैं. मैडिकल खर्च के लिए 8,000 रुपए देने पड़ते हैं.
चाइनीज वीजा के लिए 2,400 रुपए अलग से चुकाने होते हैं. साथ ही, 4,000 रुपए अलग खर्चों के लिए होते हैं. तिब्बत प्रशासन को 1,200 डौलर देने होंगे. सिक्किम वाला रूट उत्तराखंड की तुलना में ज्यादा महंगा होता है. 5,000 रुपए एडवांस के अलावा आप को 35,000 रुपए और देने होते हैं. इस के बाद 20,000 रुपए की दिल्ली-बागडोगरा के बीच रिटर्न फ्लाइट के देने पड़ते हैं. यहां भी 8,000 रुपए मैडिकल, 2,400 रुपए चाइनीज वीजा के लिए खर्च होते हैं. 4,000 रुपए अन्य खर्चों के लिए लिए जाते हैं. तिब्बत प्रशासन को इस रूट के लिए 2,400 डौलर यानी 2 लाख रुपए से ज्यादा देने होते हैं.
मिलता है सरकारी प्रोत्साहन
कुछ राज्य सरकारें कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए सब्सिडी देती हैं. उत्तर प्रदेश सरकार एक लाख की सब्सिडी देती है. हरियाणा सरकार 50,000 रुपए की सब्सिडी देती है. इसी तरह से उत्तराखंड सरकार 30,000 रुपए की सब्सिडी देती है. यानी सरकारें जो पैसा विकास के लिए टैक्स के रूप जनता से लेती हैं उसे इस तरह से धार्मिक यात्राओं पर खर्च करती हैं जिस के लिए वे जनता से कोई अनुमति नहीं लेती हैं. इस तरह की धार्मिक यात्राओं में युवा अपना समय और पैसा दोनों बरबाद करते हैं.
इसी तरह की कावंड़ यात्रा भी है. इस के लिए उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की कुछ सड़कों को बंद कर दिया जाता है. इस से जनता को बेहद नुकसान होता है. दिल्ली सरकार ने कांवडि़यों के लिए 10 लाख रुपए देने का ऐलान किया है. दिल्ली की 200 से ज्यादा कांवड़ सेवा समितियों को 50 हजार से 10 लाख रुपए अनुदान दिया जाएगा. मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि वे चाहती हैं कि कांवडि़यों को दिल्ली में एक पत्थर तक न चुभे. दिल्ली में कांवड़ियों की 180 समितियां रजिस्टर्ड हैं. मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने कहा कि 50 फीसदी पैसा पहले और बाकी पैसा खर्चे का ब्योरा आ जाने के बाद दिया जाएगा.
उत्तर प्रदेश सरकार भी कांवड़ यात्रा के लिए अलग इंतजाम करती है. कांवडि़यों के ऊपर हैलिकौप्टर से फूल बरसाए जाते हैं. इस का खर्च करोड़ों में आता है. उत्तराखंड की सरकार कांवड़ यात्रा पर
10 करोड़ रुपए खर्च कर रही है. कांवड़ यात्रा में हजारों युवा हिस्सा ले कर अपना समय बरबाद करते हैं. सोशल मीडिया पर केवल लोग अपना पैसा बरबाद करते हैं लेकिन तीर्थयात्राओं पर अपना समय और पैसे के साथ ही साथ वे जनता का पैसा भी बरबाद करते हैं जो टैक्स के रूप में सरकार वसूल करती है.
सोशल मीडिया की लत को डिजिटल डिटौक्स के जरिए सुधारा जा सकता है लेकिन पौराणिक कथाओं में तीर्थयात्रा के महत्त्व को जिस तरह से बता कर जनता को गुमराह किया जाता है उस की लत को कैसे छुड़ाएंगे, यह सोचने वाली बात है.
जब तक इस में सुधार नहीं होगा, युवाओं की ताकत केवल जयकारा लगाने तक सीमित रह जाएगी. वे कोई रचनात्मक काम नहीं कर पाएंगे. युवा आज इजराइल जैसे देशों में नौकरी करने इसलिए जाते हैं क्योंकि अपने देश में उन को नौकरी नहीं मिलती है. पिछले दिनों अमेरिका ने जिस तरह से भारत के लोगों के हाथपैर बांध कर भेजा वह राष्ट्रीय शर्म जैसा था. इस की वजह यह है कि युवाओं में स्किल डैवलपमैंट नहीं हो रहा है.
Family : पहली शादी के फ्लौप होने पर या जीवनसाथी की मृत्यु के बाद व्यक्ति अकेला हो जाता है. इस अकेलेपन को दूर करने के लिए दूसरी शादी करना बेहतर विकल्प हो सकता है पर सवाल यह है कि पहली शादी से हुए बच्चों के रहते दूसरी शादी से बच्चे पैदा करना कितना सही है?
निशांत की बीवी कोरोना के दौरान मर गई. पहली बीवी से निशांत की 6 और 7 साल की 2 बेटियां थीं. पत्नी की मौत के वक्त तो निशांत ने तय किया था कि वह कभी दूसरी शादी नहीं करेगा लेकिन पत्नी की मौत के 5 साल गुजर जाने के बाद निशांत को जीवनसाथी की कमी खलने लगी. निशांत की साली कुसुम के भी 2 बच्चे थे और वह पिछले 3 साल से तलाकशुदा थी. निशांत और कुसुम एकदूसरे के करीब आए और 2024 में दोनों ने कोर्ट मैरिज कर ली.
निशांत और कुसुम के पहली शादी से दो-दो बच्चे थे. शादी के बाद दोनों के कुल मिला कर चार बच्चों की बड़ी फैमिली हो गई लेकिन चार बच्चों के इस परिवार में निशांत और कुसुम के अपने बच्चे की कमी खलने लगी. कुसुम के 2 बच्चों का बाप निशांत नहीं था तो निशांत के 2 बच्चों की मां कुसुम नहीं थी. दोनों का मन था कि दोनों का अपना भी एक बच्चा हो. लेकिन दोनों असमंजस की स्थिति में थे कि महंगाई के इस दौर में 5वें बच्चे को पैदा करना क्या सही फैसला होगा? क्या पहले के चारों बच्चों पर इस का बुरा असर नहीं पड़ेगा? क्या दोनों अपने सभी बच्चों के साथ न्याय कर पाएंगे?
निशांत और कुसुम के सवाल वाजिब हैं. पुराने दौर की बात अलग थी. परिवार बड़े हुआ करते थे जिस में पतिपत्नी के 8-9 बच्चे भी हों तो भी पल जाते थे. महंगाई के इस दौर में एक या दो बच्चे पालना भी मुश्किल है. आज के दौर में सभी लोग अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना चाहते हैं. पेरैंट्स के लिए अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलाना पहली प्राथमिकता हो गई है. खासकर मिडिल क्लास में तो बच्चों की परवरिश पर काफी खर्च किया जा रहा है. प्राइवेट स्कूल और कोचिंग के साथ बच्चों को कई तरह के एकैडमिक कोर्सेज भी करवाए जा रहे हैं.
भविष्य की चुनौतियां बेहद कठिन हैं, इसलिए लोग अपने बच्चों को ले कर काफी सजग हैं. यही कारण है कि लोग कम बच्चे पैदा कर रहे हैं ताकि कम संसाधनों में भी बच्चों को अच्छी एजुकेशन हासिल हो सके. निशांत और कुसुम के पास कुल मिला कर चार बच्चे पहले से हैं, ऐसे में दोनों के लिए पांचवां बच्चा पैदा करना समझदारी का काम तो कतई नहीं है.
2 साल पहले रुखसाना के शौहर ने उसे तलाक दे कर दूसरी शादी कर ली. तलाक के वक्त रुखसाना का बच्चा 3 साल का ही था, इसलिए उस वक्त रुखसाना के मन में दूसरी शादी का खयाल बिलकुल नहीं आया लेकिन तलाक के 2 साल बाद रुखसाना की जिंदगी में समीर ने दस्तक दी. समीर रुखसाना से शादी करना चाहता था और उस के 5 साल के बेटे को भी अपनाने की बात करता था. लेकिन रुखसाना को मर्दों पर भरोसा नहीं रह गया था, इसलिए रुखसाना काफी समय तक समीर को टालती रही. लेकिन जब उसे लगा कि समीर हाथ से निकल जाएगा तो उस ने समीर से कोर्ट मैरिज कर ली.
शादी के बाद रुखसाना ने समीर को दूसरा बच्चा नहीं करने के लिए मना लिया था और समीर भी रुखसाना के बच्चे को अपने सगे बेटे की तरह प्यार करने लगा था लेकिन फिर समीर बच्चे के लिए जिद करने लगा तो रुखसाना भी समीर को मना नहीं कर पाई और शादी के 3 साल बाद रुखसाना समीर से प्रैग्नेंट हो गई. उस ने फिर से बेटे को जन्म दिया. इस वक्त तक समीर का पहला बेटा 8 साल का हो चुका था. अब समीर के अंदर का असली पिता नजर आने लगा था जो सिर्फ अपने बेटे को ही अपनी औलाद मानता था और रुखसाना के बेटे को देखना भी पसंद नहीं करता था.
समीर के इस बदले मिजाज को देखते हुए रुखसाना ने अपने छोटे से बेटे को अपनी मां के पास भेज दिया लेकिन जल्द ही रुखसाना की मां की डैथ हो गई और मामा के बच्चों के बीच रुखसाना के बेटे की परवरिश मुश्किल हो गई. समीर उस बच्चे को घर में लाने को बिलकुल तैयार नहीं था. आखिरकार, रुखसाना को अपने बेटे को बोर्डिंग स्कूल भेजना पड़ा लेकिन तब तक वह बच्चा इतना बिगड़ चुका था कि कुछ ही दिनों में बोर्डिंग स्कूल वालों ने बच्चे को स्कूल से बाहर कर दिया.
होते हैं मनमुटाव
ज्यादातर मामलों में यही होता है. पहली शादी से पैदा हुए बच्चों के साथ सौतेला व्यवहार होना लाजिमी है. इस मामले में औरत और मर्द दोनों एकजैसे होते हैं. पार्टनर की पहली शादी से पैदा हुए बच्चों को कोई एक्सैप्ट नहीं करता. दूसरी शादी में यह एक बहुत बड़ा मसला है.
अगर औरत और मर्द दोनों के बच्चे हैं और फिर भी दोनों एकदूसरे से शादी करना चाहते हैं तो ऐसे मामलों में पेरैंटिंग इक्वल और बैलेंस रहती है क्योंकि दोनों की स्थिति एकजैसी होती है लेकिन अगर दोनों में से किसी एक के बच्चा है और दूसरे के कोई बच्चा नहीं है तो ऐसे मामले में बैलेंस होना मुश्किल होता है और ऐसी शादी में पहले वाले बच्चे के साथ भेदभाव होने की संभावना बढ़ जाती है.
दूसरी शादी के लिए मनचाहा पार्टनर इंतजार में हो और पहले पार्टनर के बच्चों को अपनाने के लिए भी तैयार हो तो ऐसे में दूसरी शादी करने में कोई हर्ज नहीं. दूसरी शादी के बाद यदि दोनों ओर कोई बच्चा नहीं है तो दोनों को बच्चा जरूर पैदा करना चाहिए लेकिन अगर दोनों में किसी एक के पहले से बच्चा है तो यह देखना जरूरी है कि बच्चा ज्यादा छोटा तो नहीं.
अगर पहली शादी से पैदा हुआ बच्चा 10 साल से ज्यादा बड़ा नहीं है तब थोड़ा समझदारी दिखाना और उफनते हुए जज्बातों पर लगाम लगाना जरूरी हो जाता है. इस से बच्चे के विकास पर गहरा असर पड़ता है. अगर पहली शादी वाला बच्चा 5 साल के आसपास का हो तब मैनेज करने में ज्यादा दिक्कत नहीं आती.
15 साल के बच्चे समझदार हो जाते हैं. किशोर बच्चों पर पेरैंट्स की दूसरी शादी या दूसरी शादी से पैदा हुए बच्चों से कोई फर्क नहीं पड़ता. अगर यह बच्चा लड़का हो तो वह इस उम्र तक इतना परिपक्व हो जाता है कि उस के साथ सौतेले व्यवहार की गुंजाइश कम हो जाती है लेकिन किशोरावस्था की लड़कियों के साथ सौतेले मां या बाप के बुरे बरताव की संभावना बनी रहती है. कई मामलों में देखा गया है कि सौतेले पिता ही घर की नाबालिग बच्चियों का यौनशोषण करते हैं.
घटती हैं आपराधिक घटनाएं
आरवी की 12 साल की बेटी थी. आरवी के पति की मौत हुए अरसा बीत चुका था. वह शादी के कुछ साल बाद ही विधवा हो गई थी. आरवी सुनील नाम के एक तलाकशुदा शख्स के साथ रिलेशन में थी और उस से शादी करना चाहती थी लेकिन 12 साल की बेटी सौम्या के कारण वह सुनील से शादी नहीं कर पा रही थी. आरवी की मां भी उसे दूसरी शादी करने से रोकती थी लेकिन बिना शादी के सुनील के साथ रिश्ता निभाना भी मुश्किल था. सुनील टैक्सी ड्राइवर था. आरवी ने सुनील से दूसरी शादी कर ली. आरवी जौब पर चली जाती और सुनील भी टैक्सी ले कर काम पर निकल जाता. शादी के 3 साल खुशी से गुजरे. इस बीच आरवी की बेटी सौम्या 15 साल की हो गई.
एक दिन आरवी अपने औफिस में थी कि उस के फोन पर सौम्या के स्कूल से फोन आया. उन्होंने बताया कि सौम्या की तबीयत अचानक खराब होने के कारण उसे मदन मोहन हौस्पिटल में भेजा गया है. आरवी दौड़ी हुई अस्पताल पहुंची तो सौम्या की हालत के बारे में जान कर उस के होश उड़ गए. सौम्या 5 महीने की प्रैग्नैंट थी और उस ने इस प्रैग्नैंसी से बचने के लिए किसी नीमहकीम की दवा खा ली थी जिस से उस की हालत बिगड़ गई और वह आईसीयू में पहुंच गई.
होश आने पर सौम्या ने पुलिस को जो बयान दिया उसे जान कर आरवी के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. आरवी की पीठ पीछे उस का दूसरा पति सुनील आरवी की नाबालिग बेटी सौम्या से पिछले 2 साल से बलात्कार कर रहा था और आरवी को इस बात की भनक तक नहीं लगी.
इस तरह के मामलों को देखते हुए दूसरी शादी में सावधानी जरूर बरतनी चाहिए. अगर पहले से बच्चे हों और दूसरी शादी करनी ही पड़ जाए तो कोशिश कीजिए कि नए पार्टनर के साथ बच्चे न हों. अगर बच्चा पैदा करने में दोनों की सहमति हो तो तब भी एक से ज्यादा बच्चा पैदा न करें.
जीवन एक बार ही मिलता है. जीवन में शादी का न चल पाना या पार्टनर की मौत हो जाना दुखद जरूर होता है लेकिन ऐसा होने पर जीवन खत्म नहीं होता. जीवन के ऐसे दुखद मोड़ पर यदि विवेक और समझदारी से काम लेंगे तो यह नई शुरुआत करने का अवसर भी हो सकता है. जीवन में प्रयोग चलते रहने चाहिए. पहली शादी से पैदा हुए बच्चों के होते हुए दूसरी शादी करने में हर्ज क्या है. पहली शादी से बच्चे हों तो भी दूसरी शादी करने में कोई बुराई नहीं है. अगर दूसरा पार्टनर भी बच्चे चाहता हो तो यह उस का हक है.
Child Theft Gang : दिल्ली समेत देशभर में ऐसे मामले दर्ज हो रहे हैं जिन में बच्चा चोर गिरोह नवजात बच्चों की चोरी कर उन्हें बेच डालता है. जानें कि कैसे सुनियोजित तरीके से यह घिनौना धंधा चल रहा है.
जुलाई की उमसभरी दोपहर. एनसीआर में कांवड़ यात्रा की गहमागहमी. इस बीच, फरीदाबाद टोल प्लाजा के पास अचानक एक लावारिस बच्चा दिखाई देता है. पुलिस पहुंचती है, बच्चा सकुशल होता है और कुछ ही दिनों बाद उस के मांबाप तक उसे पहुंचा दिया जाता है. सबकुछ सामान्य लगता है. लेकिन नहीं, यह कोई गुमशुदगी नहीं थी. 2 साल बाद दिल्ली पुलिस ने जो रहस्य खोला वह बेहद खौफनाक था.
दरअसल, यह एक सुनियोजित बाल तस्करी का मामला था, जिस में मासूम बच्चों को किडनैप कर उन्हें अवैध रूप से बेचने का नैटवर्क अपना घिनौना कृत्य कर रहा था. हैरानी और आश्चर्य यह कि इस नैटवर्क की कमान किसी डौन या गैंगस्टर के पास नहीं थी बल्कि 3 आम महिलाएं इसे चला रही थीं.
कौन थीं गिरोह की सरगनाएं
आरती उर्फ रजीना कोती : पश्चिम बंगाल से भाग कर फरीदाबाद में बसने वाली महिला, जिस ने अपनी पहचान और जिंदगी दोनों बदली.
कांता भुजेल : फरीदाबाद की नर्स, जो खुद को ‘डाक्टर प्रिया’ बताती थी और बच्चा न पाल सकने वाले जोड़ों की तलाश करती थी.
निर्मला नेम्मी : दिल्ली में वकीलों के लिए काम करने वाली अकाउंटैंट, जिस की जिम्मेदारी थी फर्जी दस्तावेज तैयार करना.
ये तीनों महिलाएं सुनियोजित तरीके से स्टेशन से बच्चों का अपहरण करतीं, उन्हें खरीदारों तक पहुंचातीं और नकली कानूनी दस्तावेजों के जरिए सबकुछ वैध दिखाने का प्रयास करतीं.
आरती की कहानी यहीं नहीं रुकी. साल 2023 में जब वह एक बार फिर गर्भवती हुई तो गरीबी ने उसे मजबूर कर दिया कि वह अपने होने वाले बच्चे को गोद दे दे. इसी दौरान उस की मुलाकात कांता भुजेल से हुई, जिस ने उसे एक ‘औफर’ दिया कि बच्चे को किसी बेऔलाद दंपती को बेच दो.
तभी तीसरी किरदार निर्मला नेम्मी सामने आई. उस ने कहा कि वह फर्जी दस्तावेजों की व्यवस्था कर सकती है. यहीं से शुरू हुआ वह अपराध का रास्ता जहां गर्भपात को छोड़ कर अब दूसरों के बच्चों को चुरा कर बेचना इन महिलाओं का ‘धंधा’ बन गया.
पहला केस : बच्चा चुराया और बेचने से पहले छोड़ दिया
31 जुलाई, 2023 : नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से आरती ने 3 साल के एक बच्चे को अगवा किया. 2 दिनों तक फरीदाबाद में उसे रखने के बाद जब कोई खरीदार न मिला तो घबरा कर बच्चे को टोल प्लाजा के पास छोड़ दिया. यही वह बच्चा था जिसे फरीदाबाद पुलिस ने गुमशुदा मान कर मातापिता को सौंप दिया था.
दूसरा केस : बच्चा बिका, बाइक खरीदी गई
17 अक्तूबर, 2024 : एक ढाई साल का बच्चा अपनी मां के पास सो रहा था, जिसे आरती ने उठाया और गाजियाबाद ले गई. यहां एक दंपती को यह बच्चा गोद में दे दिया गया और बदले में 1.2 लाख रुपए लिए गए. इन पैसों से बाइक खरीदी गई और कुछ जरूरी खर्चे निबटाए गए.
तीसरा केस : बच्ची को 30 हजार रुपए में बेचा
21 जनवरी, 2025 : 4 महीने की एक बच्ची अगवा की गई. कांता भुजेल ने पहाड़गंज में एक जोड़ा तलाशा, जिन्हें यह बच्ची यह कह कर बेची गई कि वह एक कुंआरी मां की संतान है. बदले में 30,000 रुपए मिले. रैकेट के पकड़े जाने के बाद बच्ची को भी रैस्क्यू कर लिया गया.
भारत में गोद लेने की पूरी प्रक्रिया सीएआरए (सैंट्रल एडौप्शन रिसोर्स अथौरिटी) के तहत संचालित होती है.
आंकड़े बताते हैं-
– 2022-23 में भारत में केवल 3,175 कानूनी घरेलू गोदनामे हुए.
– जबकि सालाना 80,000 से अधिक दंपती गोद लेने की प्रतीक्षा सूची में होते हैं.
यही असंतुलन एक गैरकानूनी बाजार को जन्म देता है जहां गरीब, बेसहारा या अपहरण किए गए बच्चों को खरीदनेबेचने की जमीन तैयार हो जाती है.
जब मासूम बने शिकार
हैदराबाद 2022 : मुसाफिरखाने के पास से 6 साल की बच्ची को एक महिला उठा ले गई. 2 दिनों बाद बच्ची एक अनजान घर में पाई गई. पूछताछ में पता चला कि महिला ने बच्ची को 50,000 रुपए में एक बेऔलाद परिवार को सौंपने का सौदा किया था.
भोपाल 2021 : भोपाल रेलवे स्टेशन से एक बच्चा अगवा कर लिया गया. बच्चा 2 दिनों तक एक झुग्गी बस्ती में छिपा कर रखा गया और बाद में बेचने की तैयारी थी. पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर समय रहते उसे बचा लिया.
नेपाल सीमा मामला
भारत व नेपाल सीमा से हर साल औसतन 400 से अधिक बच्चों की तस्करी की रिपोर्ट मिलती है. इन में से कई बच्चों को अनाथ दिखा कर अवैध रूप से गोद दिया जाता है.
सबकुछ जानती थीं ये अपराधिन
दिलचस्प यह है कि तीनों अपराधिन महिलाओं को कानून की पूरी जानकारी थी. उन्हें यह भी पता था कि किस उम्र के बच्चे ज्यादा डिमांड में होते हैं और किन्हें छोड़ देना चाहिए. उन्होंने सस्ते मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया, फर्जी नाम रखे और कोई सुबूत न छूटे, इस की पूरी तैयारी की.
अन्य आरोपी व पुलिस की जांच
पुलिस का कहना है कि इस मामले में 2 और बिचौलियों की पहचान हो चुकी है, जिन की तलाश जारी है. वहीं, जिन दंपतियों ने बच्चों को गोद लिया, वे खुद को इस पूरी साजिश से अनजान बता रहे हैं, लेकिन पुलिस उन के बयानों की भी गहराई से जांच कर रही है.
कानूनी कार्रवाई और आगे की राह
आरती, कांता और निर्मला के अलावा आरती का पति सूरज भी इस गिरोह में शामिल पाया गया. इन सभी पर भारतीय दंड संहिता की धारा 137(2), 143 और 61(2) के तहत केस दर्ज किया गया है. दोषी पाए जाने पर इन्हें 7 साल तक की सजा और जुर्माना हो सकता है.
कानून की पकड़ से दूर नहीं कोई
यह मामला न सिर्फ पुलिस की सजगता का उदाहरण है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे समाज में कुछ महिलाएं भी मासूम बच्चों की खरीदफरोख्त जैसे संगीन अपराधों में लिप्त हो सकती हैं. बच्चों को अगवा करना, फर्जी दस्तावेज तैयार कर उन्हें बेचना- यह अपराध जितना क्रूर है उतना ही संगठित भी. अब जबकि यह गिरोह टूट चुका है, आगे की कार्रवाई यह सुनिश्चित करेगी कि ऐसे नैटवर्क भविष्य में फिर पनप न सकें. दिल्ली में सामने आए बच्चों की तस्करी और फर्जी गोदनामों के गिरोह का परदाफाश इस सवाल को फिर से हमारे सामने खड़ा करता है. यह केवल अपराध नहीं, बल्कि पूरे समाज को लहूलुहान कर देने वाली घटना है.
समस्या की जड़ : गरीबी नहीं, व्यवस्था में छेद
दिल्ली में पकड़ा गया यह गिरोह न सिर्फ बच्चों का सौदा कर रहा था, बल्कि समाज की कई स्तरों पर विफलता को उजागर भी कर रहा था.
महिलाएं, जो खुद पीड़ित थीं, अपराधी बन गईं. फर्जी दस्तावेजों की व्यवस्था एक अकाउंटैंट कर रही थी, जिस से साबित होता है कि कानूनी प्रक्रिया की नकल भी हो रही है. और ऐसे खरीदार भी मौजूद हैं जो वैध प्रक्रिया को छोड़ कर आसान रास्ते से बच्चा गोद लेना चाहते हैं.
मन को झकझोरने वाले आंकड़े
नैशनल क्राइम रिकौर्ड्स ब्यूरो के अनुसार, 2021 में भारत में 7,102 बच्चों के अपहरण की रिपोर्टें दर्ज हुईं. यूनिसेफ के अनुसार, हर साल 12 लाख बच्चे वैश्विक तस्करी का शिकार होते हैं. हर घंटे भारत में 4 बच्चे लापता होते हैं.
अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भारत
भारत उन देशों में शामिल है जहां बाल तस्करी के केस तेजी से बढ़ रहे हैं. इंटरपोल की 2023 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशिया में बाल तस्करी का सब से बड़ा हौटस्पौट भारत, नेपाल और बंगलादेश की त्रिकोणीय सीमा है.
ममता बिकने लगे, तो हम सब दोषी हैं
यह केवल आरती, कांता और निर्मला की साजिश नहीं थी, यह समाज की उस चुप्पी का परिणाम है जो वर्षों से ऐसे अपराधों को अनदेखा करती रही. यह समय है जागने का, सोचने का और जिम्मेदारी उठाने का.
जब ममता बिकती है तो इंसानियत की कीमत सब से ज्यादा चुकानी पड़ती है. यह कोई एक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक नैतिकता की विफलता है. कानून से पहले समाज को बदलना होगा. वरनाअगला बच्चा किसीऔर की गोद से किसी और की तिजोरी में चला जाएगा और हम बस, रिपोर्ट पढ़ते रह जाएंगे.
Religion : आज भारतीय राजनीति में धर्म सियासत का सब से ताकतवर हथियार बन गया है. मंदिरमसजिद विवादों से ले कर धार्मिक जुलूसों तक हर मुद्दे को वोटों में बदलने की होड़ लगी है. जब धर्म राजनीति का मोहरा बन जाए तो क्या राष्ट्र एकता खो कर विभाजन की ओर नहीं बढ़ता?
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से राष्ट्र निर्माण का प्रमुख आधार रहा था ‘धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद’, जिस में धर्म को कुछ समय के लिए हाशिए पर डाल दिया गया था. लेकिन वर्तमान समय की रूपरेखा बड़ी तेजी से पीछे की ओर अर्थात प्रजातीय राष्ट्रवाद की तरफ जा रही है. ‘राष्ट्रवाद’ का यह रूप कभीकभी ‘धार्मिक अतिवाद’ में नजर आ रहा है जो समतावाद के विचारों को तोड़मरोड़ कर प्रजातांत्रिक सिद्धांतों के साथ बड़ी साजिश रचता महसूस किया जा रहा है, जिन की बुनियाद पर मजबूत व धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के सपने संजोए गए थे.
धर्म और राजनीति का जहरीला घालमेल जनता के सामने परोसा जा रहा है जो राजनीतिक व्यवस्था के साथ सामाजिक तानेबाने को भी अस्थिर कर सकता है. जनता विकासवाद बनाम धार्मिक विरासतवाद के बीच फंस गई है. मतलब, जनता की हालत, कविवर दुष्यंत कुमार के शब्दों में, ‘जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में, हम नहीं हैं आदमी, हम हैं झुनझुने’ जैसी हो गई है.
नागरिकों को शिक्षित करने और अनुशासित करने की जिम्मेदारी सरकार की होती है मगर वर्तमान सरकार तो पूरी जनता को धर्म व आस्था में डुबकी लगवाने को आतुर है.
धार्मिक आयोजनों में कई बार कई जानें जा चुकीं पर फिर भी बौराए लोग इसे मोक्षमार्ग मान दिनप्रतिदिन अपनी जानें जोखिम में डाले जा रहे हैं. सावन का महीना शुरू हो चुका है और लोग पाप धोने के लिए कांवड़ ले कर निकल पड़े हैं. धार्मिक आयोजनों या तीर्थस्थलों पर भगदड़ की कई बार घटनाएं घटित हुई हैं. उन में से कुछ इस प्रकार हैं:
3 मई, 2025: गोवा के लैराई देवी मंदिर में भगदड़ मचने से 6 लोगों की मौत और सैकड़ों घायल हो गए.
9 जनवरी, 2025:आंध्र प्रदेश के तिरुपति बालाजी मंदिर में बैकुंठ द्वार दर्शन टिकट काउंटर के पास भगदड़ से 6 लोगों की मौत और 40 लोग घायल हो गए.
29 जनवरी, 2025: महाकुंभ में मची भगदड़ में 30 तीर्थयात्री मारे गए और 60 से ज्यादा घायल हो गए.
2022:माउंट आबू, राजस्थान: गुरुपूर्णिमा के अवसर पर हुई भगदड़ में कई श्रद्धालु घायल हुए.
इलाहाबाद (प्रयागराज): 2013 में आयोजित कुंभ में भगदड़ के कारण 40 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी.
2013:रतनगढ़ मंदिर, मध्य प्रदेश: नवरात्र के दौरान मंदिर में भगदड़ मचने से 115 से अधिक लोगों की मौतें हुईं.
2011:सबरीमाला मंदिर, केरल: मकर संक्रांति पर तीर्थयात्रियों की भीड़ में भगदड़ मचने से 100 से अधिक लोग मारे गए.
हथेलियों पर जान ले कर भीड़ का हिस्सा होने को आतुर बौराय लोग अंधविश्वास और कुरीतियों को बढ़ावा दे रहे हैं, जो समाज के लिए हानिकारक है. किसी भी समाज की उन्नति इस बात पर निर्भर करती है कि वह किन मूल्यों, व्यक्तित्वों और सामाजिक परिवेश को आदर्श मानता है. यदि समाज तर्क, समावेशिता और नैतिकता को अपनाता है तो समृद्धि की ओर बढ़ता है और जब वह कट्टरता, मिथ्या महिमामंडन की ओर बढ़ता है तो उस का पतन निश्चित होता है.
वर्तमान समय में शिक्षा की चिंता, रोजगार की उपलब्धता फिलहाल सरकार के आराम मोड में है. विकास के नाम पर वह देशवासियों के पापपुण्य को धोने की कवायद कर रही है और उन्हें रूढ़ीवाद की जंजीर पहना रही है.
सरकार इस सवाल पर मौन है कि देश की तीनचौथाई आबादी केवल, किसी तरह जिंदा रह सके तक ही सीमित क्यों है?
बौद्धिक और सांस्कृतिक मोरचे, समाचारपत्र, इलैक्ट्रौनिक मीडिया, टैलीफोन और इंटरनैट भी अंधविश्वास फैलाने में लगे हैं. मानो, ‘अंधविश्वास का आधुनिकीकरण’ हो गया हो.
विवाद और विभाजन के कारक
भारतीय लोकतंत्र ‘खुल्ला खेल फर्रुखाबादी’ की तरह हो गया है. राजनीति और धर्म दोनों समाज के महत्त्वपूर्ण पहलू हैं लेकिन इन के घनिष्ठ संबंध अकसर विवाद और विभाजन के कारण बने हैं.
राजनीतिक घोषणाएं तो अधिकतर विचारों, कार्यों की प्रासंगिकता अपने अनुसार ही ढालती हैं अपने तंत्र को स्थापित करने के लिए. सो, कई बार तर्कशीलता की जगह भावनात्मक पूर्वाग्रह हावी हो जाता है.
मानो, राजनीति पर धर्म के अंकुश से चराचर जगत में शांति स्थापित हो जाएगी. जान लें कि राजनीतिक संरक्षण से कट्टरपंथी सोच और असहिष्णुता को बढ़ावा मिलता है.
अति धार्मिकता ने धर्म को तमाम फर्जी बाबाओं, रूढि़वाद और कर्मकांडों के हवाले किया तो वहीं सोशल मीडिया ने बाजारों में ला कर ‘धर्म को उपभोक्ता वाद’ के रूप में प्रचारित किया.
यह है एक होड़
‘सारा कुछ हमें ही मिल जाए’ इस सोच में सब गिरफ्त हैं. धर्म केवल विश्वास प्रणाली नहीं है, यह व्यक्ति की मानसिकता, भावनाओं और सामाजिक व्यवहार को गहराई से प्रभावित भी करता है.
विश्व में मानो धार्मिक पहचान और सभ्यता का मुद्दा मतदाताओं को लुभाने और उन्हें प्रभावित करने के लिए उछाला जा रहा है. यह धार्मिक पहचान धर्मग्रंथों पर आधारित धार्मिक आस्था और उस के अभ्यास से अलग है. यह केवल अपनी राष्ट्रीय अस्मिता को प्रमाणित करने के लिए उपकरण बन कर रह गई है. यूरोप में भी लगभग सभी लोकलुभावन नेता अपनी राजनीतिक रणनीति को राजनीति में धर्म के समावेश के संभावित नतीजों पर ही ध्यान दे कर तैयार कर रहे हैं.
उधर, रूस में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन रूढि़वादी चर्च के संरक्षक के रूप में उभरे हैं. यूनाइटेड किंगडम में यूरोसैप्टिक पार्टियां- ब्रिटिश नैशनल पार्टी और यूकेआईपी, जरमनी में आल्टरनैटिव फौर डच लैंड, इटली में लेगा नौर्ड, औस्ट्रिया में फ्रीडम पार्टी, स्विट्जरलैंड में स्विस पीपल्स पार्टी, नीदरलैंड में पार्टी फौर फ्रीडम, फ्रांस में नैशनल रैली जैसी तमाम पार्टियों का एजेंडा वैश्वीकरण के प्रभाव को रोकने और धर्मनिरपेक्ष उदारवादी सामाजिक व्यवस्था का विरोध करना है. भारत में भी इस का असर इन वाकयों से समझा जा सकता है.
‘‘वर्ष 2002 में एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे थे. प्रमोद महाजन उन के पोलिंग एजेंट बने थे.
प्रमोद महाजन ने एपीजे अब्दुल कलाम से पूछा, ‘सर, किस शुभ दिन पर नौमिनेशन फाइल किया जाए?’
एपीजे अब्दुल कलाम ने जवाब दिया, ‘जब तक पृथ्वी घूम रही है तब तक हर दिन शुभ है. जिस दिन पृथ्वी ने घूमना बंद कर दिया उस दिन से मानव प्रजाति का अशुभ दिन शुरू.’
यह सच है कि विश्व राजनीति में भगवान, धर्मकर्म की गहरी पैठ बनी हुई है. भविष्य और समय की रफ्तार ही बताएगी कि हम किस राह को चल निकले थे. इतिहास गवाह है कि हर दौर पेचीदा और शासकीय विरोधाभास लिए होता है. कहीं हमारे देश की ऊर्जा किसी खाने में गिरवी तो नहीं रखी जा रही है?
Women’s Property Rights : भारतीय कानून में महिलाओं को पैतृक संपत्ति पर पूरा अधिकार दिया गया है लेकिन जानकारी के अभाव, सामाजिक दबाव और पारिवारिक भय के चलते ज्यादातर महिलाएं अपने इस हक का इस्तेमाल नहीं कर पातीं. कई बार परिवार या समाज उन्हें नैतिकता का पाठ पढ़ाने लग जाता है.
भारतभूमि पर औरतों को यों तो कई रूपों में पूजने की परंपरा रही, कभी उसे धन की देवी बताया गया, कभी ज्ञान की देवी, तो कभी शक्ति की मगर वास्तविकता में भारत की महिलाओं को हमेशा धन, ज्ञान और शक्ति से दूर रखने की साजिश हुई. न तो उस को पिता या पति की चलअचल संपत्ति का मालिक बनने दिया जाता, न उस के अकेले के नाम पर कोई बैंक बैलेंस होता, न उस की शिक्षा के प्रति कोई गंभीरता होती और न ही उसे शस्त्रबल का कौशल हासिल होता.
उसे तो सदियों से बस दासी बना कर रखने की कोशिश रही. ऐसी दासी जो हर प्रकार से पुरुष पर आश्रित रहे. अपनी हर जरूरत के लिए किसी भिखारी की तरह पुरुष के आगे हाथ फैलाती रहे. मगर समय में कुछ बदलाव आया. धीरेधीरे औरत ने भी शिक्षा पाई, नौकरी पाई और अपने पैरों पर खड़ी हुई.
आज भारत की स्त्री ने हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति तो दर्ज करा दी है मगर यह प्रतिशत देश की कुल औरतों के मुकाबले में अभी बहुत ही कम है. पढ़लिख कर अच्छी नौकरियों में आने वाली महिलाएं मात्र 5 फीसदी ही होंगी, बाकी जो पढ़लिख रही हैं वे बस इसलिए कि उन्हें अच्छा घरवर मिल जाए. पढ़ाईलिखाई शादी के लिए नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से मजबूत होने के लिए की जाती है. जैसे, एक पुरुष की शिक्षा इसलिए नहीं होती है कि उसे अच्छा ससुराल और अच्छी पत्नी मिल जाए बल्कि इसलिए होती है ताकि वह अच्छी नौकरी में आ कर अच्छा धन कमा सके और आर्थिक रूप से सशक्त हो सके. इसी तरह स्त्रियों को भी यह बात समझनी बहुत जरूरी है कि उन की आर्थिक संपन्नता ही उन्हें दास संस्कृति से मुक्ति देगी.
जिस तरह एक या ज्यादा लड़कों को उन के पिता से पैतृक जमीन और धन हासिल होता है और संपत्ति उन में शक्ति और स्वाभिमान का भाव जागृत करती है, उस धन के आधार पर वे तरक्की करते जाते हैं, वैसे ही लड़की को भी पैतृक संपत्ति और ससुराल की संपत्ति पर अपने हक का एहसास रहना चाहिए. अपने हिस्से की धनसंपत्ति अपने पिता और पति से अवश्य ही प्राप्त करनी चाहिए.
आजादी के बाद बने भारत के कानूनों ने हिंदू महिलाओं को पैतृक संपत्ति पर अधिकार दिया है, मगर अफसोस कि औरतें भावुकतावश या इस डर से कि कहीं रिश्ते न बिगड़ जाएं, अपने हिस्से की संपत्ति पर हक नहीं जताती हैं. अधिकांश महिलाएं अपने भाइयों से अपना हिस्सा नहीं मांगतीं, ताकि उन के रिश्ते मधुर बने रहें. यह केवल उन परिस्थितियों में किया जाना चाहिए जब बहन की स्थिति विवाह के कारण बहुत अच्छी हो और भाई की बहुत खराब.
ससुराल में भी पति की चलअचल संपत्ति पर पत्नी का हक होता है मगर देखा गया है कि ज्यादातर औरतें पति की मृत्यु के बाद निरीह सा जीवन जीने लगती हैं और संपत्ति पर बेटे या पति के मांबाप, भाई काबिज हो जाते हैं. पत्नी उस संपत्ति को बेचने या रखने का फैसला नहीं कर पाती, जबकि उस को ऐसा करने का कानूनी हक है.
संपत्ति कैसीकैसी
बहुतेरी औरतों को इस बात का पता ही नहीं है कि कौनकौन सी संपत्ति उन की है? वे उन संपत्ति की देखभाल कैसे करें? किन दस्तावजों पर उन का नाम चढ़ना चाहिए? नाम कहां जा कर चढ़वाना है?
संपत्ति के मालिकाना हक और उस की सुरक्षा के बारे में देश की 80 फीसदी महिलाएं लापरवाह हैं. कुछ को इस विषय में जानकारी ही नहीं होती है. उन के पास संपत्ति होते हुए भी वे पिता, पति, बेटे, भाई के रहमोकरम पर पति के गुजर जाने के बाद पूरी उम्र काट देती हैं.
48 वर्षीया नजमा खातून बाराबंकी के एक गांव की रहने वाली है. वह लखनऊ में किराए के एक छोटे से कमरे में रह कर कई घरों में नौकरानी का काम करती है. नजमा के 4 बेटे हैं. उस के 3 बेटों की शादियां हो चुकी हैं. बड़े बेटे के 2 बच्चे और बाकी दोनों के पास एकएक बच्चा है.
नजमा का सब से छोटा बेटा 15 साल का है जो कई सालों से नजमा के साथ लखनऊ में ही रहता है. नजमा के पति का देहांत 8 साल पहले हुआ था. बाराबंकी में नजमा के पति के पास 15 बीघा खेती की जमीन थी. गांव में 5 कमरों का घर भी था. कानूनन नजमा खेत और घर की मालकिन है मगर उस के लड़कों ने खेती की जमीन का आपस में बंटवारा कर खसराखतौनी पर अपने नाम चढ़वा लिए हैं.
घर पर उन की पत्नियों और बच्चों का कब्जा है. पति के मरने के बाद नजमा कुछ साल वहां रही. उस के लड़कों ने कुछ कागजों पर उस का अंगूठा लगवाया. बहुओं ने कुछ समय तक तो उस के साथ ठीक बरताव किया, फिर नजमा को खाने के लिए भी बारबार मिन्नतें करनी पड़ती थीं.
56 वर्षीया किरण दीक्षित तो पढ़ीलिखी महिला हैं. कई साल नौकरी भी की. नोएडा में रहती हैं. उन के एक बेटी है जिस की शादी बेंगलुरु में हुई है. उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में किरण दीक्षित के नाम पर खेती की 20 बीघा जमीन है जो उन के पिता ने उन के नाम वसीयत की थी. मगर उस जमीन पर किरण के चचेरे भाई खेती करते हैं. कई सालों से वही उस जमीन की देखरेख कर रहे हैं.
किरण के मातापिता की मृत्यु हुए 12 साल हो चुके हैं मगर अभी तक खसराखतौनी पर किरण दीक्षित का नाम नहीं चढ़ा है. वे अपने पति के परिवार में इतनी व्यस्त हैं कि कभी बस्ती जाने का उन्हें मौका ही नहीं मिला. उन की जमीन पर कब व कौन सी फसल उगाई जाती है, कितनी फसल बिक रही है, कितना पैसा आ रहा है, उन को जानकारी नहीं है.
वे कभीकभी फोन पर अपने चचेरे भाई से जमीन का हाल जान लेती हैं. जो वह बताता है उस पर यकीन कर लेती हैं. भाई ने कभी फसल बिकने पर उन को पैसा नहीं भेजा. वे इस में ही खुश हैं कि चचेरा भाई उन की जमीन की देखरेख कर रहा है. आखिर ऐसी संपत्ति होने का क्या फायदा?
अनीता की शादी हुए अभी सिर्फ 4 साल ही हुए थे कि 2021 में उस के पति अक्षय की कोरोना महामारी की चपेट में आने से मौत हो गई. उस की ससुराल में देवर, ननद और सासससुर हैं. अक्षय की मृत्यु के बाद सास ने अनीता को समझना शुरू किया कि यहां उस का कोई भविष्य नहीं है. उस के पास कोई संतान भी नहीं है. पूरी जिंदगी अकेले कैसे काटेगी. इस से अच्छा वह अपने मायके लौट जाए और फिर से विवाह कर ले.
अनीता का मायका चमोली में है. वह पढ़ीलिखी है. वह दिल्ली में अपनी ससुराल में ही रह कर नौकरी करना चाहती थी. उस ने अपने पति के औफिस में बात कर ली थी. औफिस वाले उस को अक्षय की जगह रखने को तैयार थे मगर उस की सास इस के लिए राजी नहीं थी. वह बोली, ‘हमारे यहां बहुओं से नौकरी नहीं करवाई जाती. अपने मायके जा कर नौकरी करो.’
धीरेधीरे अनीता की ससुराल के लोग उस से बुरा बरताव करने लगे. वह दिनभर घर का काम करती और ससुरालियों के ताने सहती थी. आखिरकार वह परेशान हो कर मायके चमोली चली आई. मगर मायके में भी वैसी ही प्रताड़ना सहनी पड़ रही है. उस की भाभी से उस की पटरी नहीं खाती. भाभी के लिए तो वह बोझ बन कर आई हुई मेहमान है.
जबकि अनिता अपने पिता की संपत्ति में आधे की हकदार है और बहू होने के नाते अपनी ससुराल में रहने का भी उस को पूरा हक था. मगर हक होते हुए भी उस को खदेड़ कर बाहर कर दिया गया. उस को पुलिस के पास जा कर ससुरालियों के खिलाफ एफआईआर करवानी चाहिए थी. मगर उस ने नहीं करवाई. भाई से पिता की संपत्ति से आधा हिस्सा मांगना चाहिए. मगर वह खामोश है. वजह यह कि उस को संपत्ति के संबंध में जानकारी कम है.
अचल संपत्ति महिलाओं के लिए आर्थिक रूप से सुरक्षित और सशक्त होने का एक महत्त्वपूर्ण जरिया है. सो, उन्हें इस की जानकारी होनी चाहिए ताकि वे अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें और अपनी संपत्ति की रक्षा कर सकें.
भारत में हिंदू महिलाओं को अचल संपत्ति में समान अधिकार प्राप्त हैं. यह अधिकार देश के कानूनों ने उन्हें दिया है. अचल संपत्ति महिलाओं को आर्थिक रूप से सुरक्षित करने में मदद करती है. यह उन्हें आय का स्रोत प्रदान कर सकती है. वे इसे बेच कर या किराए पर दे कर अतिरिक्त आय प्राप्त कर सकती हैं.
महिलाओं को मिले कानूनी हक
1956 में महिलाओं को पति व पिता की मृत्यु के बाद कुछ कानूनी हक मिले थे. महिलाओं के लिए संपत्ति कानूनों में अब बहुत सारे बदलाव हो चुके हैं. 2005 के संशोधनों ने महिलाओं के अधिकारों को भाइयों के बराबर ला दिया है. हिंदू महिलाओं को पैतृक संपत्ति में भाई के बराबर हिस्सा मिलने का प्रावधान हो चुका है. वह अपने भाइयों की तरह पैतृक संपत्ति में सहउत्तराधिकारी है.
बिना संपत्ति मिले भी एक विवाहित बेटी, विधवा, तलाकशुदा या परित्यक्ता होने पर वह अपने मातापिता के घर में भरणपोषण या आश्रय की मांग कर सकती है. पिता द्वारा बेटी को उपहार में दी गई या वसीयत की गई किसी भी संपत्ति या परिसंपत्ति पर वयस्क होने के बाद उस का पूरा अधिकार होता है.
हिंदू उत्तराधिकार कानून 1956 के अनुसार, एक विवाहित महिला को अपनी निजी संपत्ति पर पूरा अधिकार होता है, जिसे वह अपनी इच्छानुसार बेच सकती है या किसी को उपहार के रूप में दे सकती है.
संयुक्त परिवार के मामले में हिंदू महिला अपने पति और उस के परिवार से आश्रय, सहायता और भरणपोषण पाने की अधिकारी है. अपने पति और अपने बच्चों के बीच संपत्ति के बंटवारे के मामले में उसे भी दूसरों के बराबर हिस्सा और अपने पति की मृत्यु के मामले में वह अपनेअपने बच्चों और अपनी सास के बीच विभाजित पति की संपत्ति के बराबर हिस्से की हकदार है.
एक हिंदू मां को अपने मृतक बेटे की संपत्ति में उस की पत्नी और बच्चों के बराबर हिस्सा मिलता है. यदि पिता की मृत्यु के बाद बच्चे पारिवारिक संपत्ति का बंटवारा करते हैं तो मां को अपने प्रत्येक बच्चे के बराबर संपत्ति का हिस्सा पाने का अधिकार है.
वह अपने पात्र बच्चों से आश्रय और भरणपोषण पाने की भी हकदार है. उसे अपनी संपत्तियों और परिसंपत्तियों पर पूरा अधिकार है और वह उन्हें अपनी इच्छानुसार निबटा सकती है. हालांकि, उस की मृत्यु के बाद उस की संपत्ति उस के सभी बच्चों को समान रूप से विरासत में मिलती है.
हिंदू बहू के अधिकार बहुत सीमित हैं. सासससुर की संपत्ति पर बहू का कोई अधिकार नहीं है चाहे वह पैतृक संपत्ति हो या उन के द्वारा स्वयं अर्जित की गई संपत्ति. वह ऐसी संपत्तियों पर केवल अपने पति की विरासत और हिस्से के माध्यम से अधिकार प्राप्त कर सकती है.
हिंदू तलाकशुदा महिला पति से भरणपोषण और गुजारा भत्ता मांग सकती है, लेकिन अपने पूर्व पति की संपत्ति पर कोई हिस्सेदारी नहीं रख सकती. अगर संपत्ति पति के नाम पर पंजीकृत है तो कानून उसे ही मालिक मानता है. अगर संपत्ति संयुक्त रूप से स्वामित्व वाली है तो पत्नी को खरीद में अपना योगदान साबित करना होगा. तब वह केवल उक्त संपत्ति में अपने योगदान तक ही हिस्से की हकदार होगी. औपचारिक तलाक के बिना अलग होने की स्थिति में पत्नी और बच्चे पुरुष की संपत्ति पर अपनी विरासत के हकदार हैं, चाहे उस ने दोबारा शादी की हो या नहीं.
यदि किसी महिला के पति की मृत्यु हो जाती है तो उस विधवा महिला को पति की संपत्ति से अपनी सास और अपने बच्चों के बराबर हिस्सा मिलता है.
यदि विधवा स्त्री ने दोबारा विवाह किया है तो हिंदू विवाह पुनर्विवाह अधिनियम 1856 के अनुसार, पूर्व पति की संपत्ति पर उसे अपना दावा छोड़ना होगा. लेकिन हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 24 के अनुसार, यदि संपत्ति के बंटवारे पर चर्चा के समय या बंटवारे के समय विधवा अविवाहित रहती है और बहुत बाद में विवाह करती है तो वह संपत्ति में अपने हिस्से की मालिक होती है.
अन्य धर्मों के अलग कानून
एक ईसाई महिला को भी अपने भाईबहनों के साथ अपने मातापिता दोनों की संपत्ति समान रूप से विरासत में मिलती है. शादी होने तक उसे अपने मातापिता से आश्रय और भरणपोषण मिलता है. उस के बाद वह अपने पति से भरणपोषण प्राप्त करने की अधिकारी है. वयस्क होने के बाद उसे अपनी निजी संपत्ति पर पूरा अधिकार होता है.
विवाहित ईसाई महिला का पति यदि उस का भरणपोषण न करे तो इस आधार पर वह तलाक की अर्जी दे सकती है. ईसाई धर्म की महिला उत्तराधिकार कानूनों के अनुसार अपने पति की संपत्ति के एकतिहाई हिस्से की हकदार है. जबकि, बाकी हिस्सा मृतक के बच्चों के बीच समान रूप से विभाजित किया जाता है. अगर कोई बच्चा नहीं है तो महिला को संपत्ति का आधा हिस्सा मिलता है.
ईसाई धर्म की महिलाओं के लिए संपत्ति कानून में मां को बच्चों का आश्रित नहीं माना जाता है. मां होने के नाते, महिला भरणपोषण पाने की पात्र नहीं है. लेकिन अगर उस के पुत्र की मृत्यु हो जाती है, वह अविवाहित था और उस के कोई बच्चे भी नहीं हैं तो मां को उस की संपत्ति से एकचौथाई हिस्सा पाने का हक है. तलाकशुदा, पुनर्विवाहित विधवा या दूसरी पत्नी होने पर ईसाई महिलाओं के लिए उत्तराधिकार कानून हिंदू कानूनों के समान ही हैं.
इसलामिक कानून के तहत मुसलिम महिला के लिए संपत्ति और उत्तराधिकार कानून थोड़े अलग हैं. एक मुसलिम महिला का हिस्सा एक पुरुष के हिस्से का आधा होता है. यहां महिलाओं के लिए उत्तराधिकार कानून के अनुसार बेटियों को बेटों के हिस्से का आधा हिस्सा मिलता है. लेकिन एक मुसलिम महिला को अपनी संपत्ति पर पूरा नियंत्रण होता है.
वह अपनी इच्छानुसार उस का निबटान या प्रबंधन, बिक्री, उपहार कर सकती है. बेटियों को विवाह तक और विधवा होने या तलाक होने के बाद भी पैतृक संपत्ति में रहने का अधिकार है. अगर उस के बच्चे हैं तो जब बच्चे उस की देखभाल करने लायक बड़े हो जाते हैं तब वह बच्चों की जिम्मेदारी बन जाती है.
मुसलिम महिला यदि ससुराल में रहती है और उस के पति की मृत्यु हो जाती है और उस के पास कोई संतान नहीं है तब उस महिला को पति की संपत्ति का एकचौथाई हिस्सा मिलेगा. यदि बच्चे हैं तो जायदाद का 8वां हिस्सा मिलेगा.
महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियां
सख्त कानूनों के बावजूद महिलाएं पैतृक संपत्ति पर दावा कर सकती हैं और अपना हक प्राप्त कर सकती हैं लेकिन जानकारी के अभाव में अधिकांश महिलाएं ऐसा नहीं कर पातीं और उपेक्षित जीवन जीने के लिए मजबूर होती हैं.
संपत्ति पर अपना हक प्राप्त करने की राह में महिलाओं के सामने सब से बड़ी चुनौती है जागरूकता की कमी. पूरे भारत में ज्यादातर महिलाओं को अपने कानूनी अधिकारों के बारे में जानकारी नहीं है. उन्हें नहीं पता कि वे संयुक्त संपत्ति या पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मांग सकती हैं.
एक कारक जो इसे कुछ जटिल बनाता है वह है कानूनी प्रावधानों की जटिलता. यदि कोई महिला पर्याप्त रूप से शिक्षित नहीं है तो कानूनी भाषा को समझना उस के लिए मुश्किल होता है. ऐसे में किसी अच्छे वकील की मदद ली जा सकती है.
विरासत का दावा करने में महिलाओं के सामने आने वाली दूसरी चुनौती है, परिवार का दबाव. महिलाओं पर अकसर उन के परिवार द्वारा अपनी विरासत को छोड़ने या उसे परिवार के किसी पुरुष सदस्य, जैसे भाई या पति को हस्तांतरित करने का दबाव डाला जाता है.
इस के अलावा जो तीसरी चुनौती है वह है समाज का दबाव. भारत एक पितृसत्तात्मक देश है. जिस के कारण यहां पुरुषों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है. लोग अपनी संपत्ति बेटियों के बजाय बेटों को देना पसंद करते हैं. यह इतना अधिक है कि महिलाओं को विरासत में मिली संपत्ति का मालिक होने से हतोत्साहित किया जाता है.
यह इस हद तक है कि अगर बेटी को संपत्ति विरासत में मिलती है तो समाज द्वारा उस की आलोचना की जाती है. लोग उस के घर आनाजाना और बातचीत करना छोड़ देते हैं. कभीकभी तो यह उपेक्षा इतनी बढ़ जाती है कि वह अपनी संपत्ति छोड़ने के लिए मजबूर हो जाती है.
मगर औरतों को यह समझना चाहिए कि अपना हक छोड़ना कोई समझदारी नहीं है. कोई कितनी भी आलोचना करे या दबाव बनाए, औरत को अपना हक पाने के लिए पुलिस और कानून का सहारा लेने से हिचकना नहीं चाहिए. कभीकभी तो उस के साहस दिखाने और पहला कदम उठाने मात्र से ही परिवार उस का वाजिब हक उसे दे देने में अपनी भलाई समझता है.
महिलाओं को यह बात भलीभांति समझ लेनी चाहिए कि उन के हाथ में आई संपत्ति ही उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में मदद करती है. इस से वे किसी की मुहताज नहीं रहतीं बल्कि अपने जीवन में निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र होती हैं.
अचल संपत्ति महिलाओं को समाज में सम्मानजनक स्थान देती है. इस से उन की सामाजिक स्थिति में सुधार होता है और उन्हें अधिक अधिकार मिलते हैं. वे अपने परिवार की आर्थिक रूप से सुरक्षा कर सकती हैं और बच्चों की अच्छी शिक्षा व स्वास्थ्य के लिए पैसा खर्च कर सकती हैं. सो, उन्हें जमीनजायदाद से संबंधित सभी प्रकार की जानकारी होनी चाहिए ताकि वे अपने अधिकारों का उपयोग कर सकें और अपनी संपत्ति की रक्षा कर सकें.
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 (हिंदू सक्सेशन एक्ट 1956) भारत में हिंदू परिवारों के बीच संपत्ति के उत्तराधिकार (इनहेरिटेंस), विरासत (सक्सेशन) और विभाजन (पार्टीशन) को नियंत्रित करने वाला एक महत्त्वपूर्ण कानून है. यह अधिनियम 17 जून, 1956 को लागू हुआ और इस में समयसमय पर संशोधन होते रहे हैं, विशेषकर 2005 में एक ऐतिहासिक संशोधन हुआ था.
इस का उद्देश्य हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख धर्म के अनुयायियों के लिए एकसमान उत्तराधिकार व्यवस्था प्रदान करना था. यह उन पर भी लागू होता है जो इन धर्मों से संबंधित हैं, लेकिन उन्हें विधिवत रूप से किसी और धर्म में परिवर्तित नहीं किया गया. यह अधिनियम मुसलिम, ईसाई, यहूदी या पारसी लोगों पर लागू नहीं होता. उन के लिए अलग पर्सनल लौ है.
प्रमुख उद्देश्य
– हिंदू परिवारों में पैतृक और स्वअर्जित संपत्ति के बंटवारे को कानूनी रूप देना.
– महिलाओं (बेटियों, विधवाओं) को संपत्ति में बराबरी का अधिकार देना.
– संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति (कोपार्सनरी प्रौपर्टी) के नियमों को स्पष्ट करना.
संपत्ति के प्रकार
– स्वअर्जित संपत्ति यानी व्यक्ति द्वारा खुद अर्जित की गई संपत्ति.
– पैतृक संपत्ति यानी चार पीढि़यों से चली आ रही संपत्ति, जिस में सभी सहधर्मी कोपार्सनर का अधिकार होता है.
दरअसल, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम किसी हिंदू व्यक्ति की बिना वसीयत के मृत्यु हो जाने पर संपत्ति के वितरण हेतु विधिक ढांचा है. इस अधिनियम के तहत मृतक के साथ व्यक्ति के संबंधों के आधार पर उत्तराधिकारियों, उन के अधिकारों एवं संपत्ति के विभाजन के निर्धारण के लिए नियम निर्धारित किए गए हैं.
हिंदू धर्म के अनुसार वीरशैव, लिंगायत, ब्रह्मोस, प्रार्थना समाज और आर्य समाज के अनुयायी शामिल हैं. यह अधिनियम बौद्ध, सिख और जैन धर्म पर भी लागू होता है. वे व्यक्ति जो मुसलिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं हैं, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि हिंदू कानून या रीतिरिवाज उन पर लागू नहीं होते हैं, तब तक यह अधिनियम लागू होगा.
यह अधिनियम संपूर्ण भारत में लागू होगा लेकिन संविधान के अनुच्छेद 366 के अनुसार यह अनुसूचित जनजातियों पर स्वत: लागू नहीं होता है, जब तक कि केंद्र सरकार द्वारा इसे अधिसूचित न कर दिया जाए.
हिंदू विधि की शाखाएं : इस से संपत्ति के उत्तराधिकार एवं अंतरण की एकसमान प्रणाली का निर्धारण होता है जो मिताक्षरा और दायभाग शाखाओं पर समान रूप से लागू होती है. मिताक्षरा विधि पश्चिम बंगाल और असम को छोड़ कर पूरे भारत में लागू होती है जबकि दायभाग विधि पश्चिम बंगाल और असम पर लागू होती है.
दायभाग विधि के तहत उत्तराधिकार का अधिकार पूर्वजों की मृत्यु के बाद ही प्राप्त होता है जबकि मिताक्षरा विधि में जन्म से ही संपत्ति का अधिकार प्रदान किया गया है.
दायभाग प्रणाली में पुरुष और महिला, परिवार के दोनों ही सदस्य सहदायिक हो सकते हैं जबकि मिताक्षरा प्रणाली में सहदायिक अधिकार केवल पुरुष सदस्यों तक ही सीमित है. सहदायिक वह व्यक्ति होता है जो जन्म से ही पैतृक संपत्ति पर अधिकार का दावा कर सकता है.
संपत्ति का वितरण
श्रेणी I के उत्तराधिकारी : विधवा को संपत्ति का एक हिस्सा मिलता है. पुत्र, पुत्री और मां सभी को बराबर हिस्सा मिलता है.
श्रेणी II के उत्तराधिकारी : यदि कोई श्रेणी ढ्ढ का उत्तराधिकारी मौजूद नहीं है तो संपत्ति को समान रूप से विभाजित किया जाता है.
सगोत्रीय और सजातीय : यदि कोई श्रेणी I या II का उत्तराधिकारी नहीं है तो संपत्ति पैतृक रिश्तेदारों (सगोत्रीय) और अन्य रिश्तेदारों (सगोत्रीय) को हस्तांतरित हो जाती है.
हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 : अधिनियम की धारा 6 में वर्ष 2005 में संशोधित किया गया था और महिलाओं को वर्ष 2005 से संपत्ति के विभाजन के लिए सहदायिक के रूप में मान्यता दी गई थी.
अन्य समुदायों में उत्तराधिकार कानून
मुसलिम : यह मुसलिम पर्सनल लौ (शरीयत) एप्लीकेशन एक्ट 1973 द्वारा शासित है.
ईसाई, पारसी और यहूदी : ईसाई, पारसी और यहूदियों के मामले में भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम 1925 लागू होता है.
उत्तराधिकार के प्रकार
पुत्रों के अधिकार : जन्म से ही पैतृक संपत्ति में हिस्सा होता है. पुत्र की मृत्यु होने पर उस के उत्तराधिकारी को उस का हिस्सा मिलता है.
बेटियों के अधिकार : पहले बेटियों को पैतृक संपत्ति में अधिकार नहीं था, लेकिन हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) अधिनियम 2005 के बाद बेटियों को भी जन्म से ही पैतृक संपत्ति में बराबर का अधिकार मिला. विवाहित और अविवाहित दोनों बेटियां अब पिता की संपत्ति में पुत्र के बराबर की हिस्सेदार होती हैं. अब बेटी भी संयुक्त परिवार की कोपार्सनर बन गई है.
संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति
पुराने नियम के अनुसार केवल पुरुष सदस्य ही कोपार्सनर होते थे. संशोधन 2005 के बाद बेटियां भी कोपार्सनर मानी गईं. वे भी अपने हिस्से की मांग कर सकती हैं. पिता की मृत्यु के बाद बेटी संपत्ति की उत्तराधिकारी बनती है.
वसीयत और उत्तराधिकार
व्यक्ति अपनी स्वअर्जित संपत्ति की वसीयत किसी को भी दे सकता है. यदि वसीयत नहीं है तो उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार संपत्ति का बंटवारा होता है.
कुछ विशेष बातें :
– महिला की संपत्ति पर उस का पूर्ण अधिकार होता है.
– सौतेली संतानों के अधिकार भी मान्य होते हैं यदि वे गोद लिए गए हों.
– बेटी चाहे विवाहित हो या अविवाहित, संपत्ति पर उस का अधिकार बना
रहता है.
– विवाह के बाद भी उस का अधिकार बना रहता है.
– वह संपत्ति में हिस्सेदारी कर सकती है, बेच सकती है, वसीयत बना सकती है.
क्यों ऐतिहासिक था 2005 का संशोधन
यह लैंगिक समानता की दिशा में एक बड़ा कदम था. पहले हिंदू पुत्रियां संयुक्त परिवार की सदस्य होते हुए भी संपत्ति की उत्तराधिकारी नहीं मानी जाती थीं, अब वे भी परिवार की संपत्ति में जन्म से अधिकार रखती हैं.
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 और उस के 2005 के संशोधन ने महिलाओं को संपत्ति में समान अधिकार दे कर एक बड़ी सामाजिक क्रांति की शुरुआत की. यह अधिनियम अब लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करता और संयुक्त परिवार की संपत्ति में सभी को समान हक देता है. इस वजह से यह अधिनियम आज के सामाजिक न्याय के मूल्यों के अधिक करीब हो गया है.
हक छोड़ना त्याग नहीं, अन्याय को स्वीकार करना है
किसी भी लड़की या महिला को पैतृक संपत्ति (मायके की संपत्ति) और ससुराल की संपत्ति दोनों पर अपने कानूनी और नैतिक अधिकार से पीछे नहीं हटना चाहिए. यह न केवल उस के आत्मसम्मान और सशक्तीकरण से जुड़ा है, बल्कि अगली पीढि़यों के लिए भी एक सशक्त मिसाल कायम करता है. एक जागरूक और सशक्त महिला को अपने सभी कानूनी अधिकारों का उपयोग करना चाहिए, चाहे वह मायके की संपत्ति हो या ससुराल की.
पैतृक संपत्ति पर हक : हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 में 2005 के संशोधन के बाद बेटियों को भी बेटों के समान अधिकार दिए गए हैं.
पिता की संपत्ति में बेटी को भी बराबर का हिस्सा मिलना चाहिए, चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित.
ससुराल की संपत्ति पर हक : शादी के बाद महिला को पति की संपत्ति, खासकर अगर वह संयुक्त संपत्ति है, पति की मृत्यु के बाद उस में हिस्सा पाने के लिए कानूनी अधिकार प्राप्त होते हैं.
मांबाप की तरह ससुराल के लोग भी महिला को उस की सम्मानजनक स्थिति में रखें, न कि सिर्फ ‘बाहरी’ समझें.
क्यों गलत है हक छोड़ना
कई बार समाज या परिवार का दबाव बहनों को ‘भाई की मदद’ के नाम पर संपत्ति से वंचित कर देता है, जोकि अन्याय है.
महिला हक छोड़ती है, तो वह आर्थिक रूप से कमजोर बनती है और निर्भरता की स्थिति में चली जाती है. हक न लेने से कानूनी मिसालें कमजोर होती हैं और फिर अन्य महिलाएं भी पीछे हटती हैं.
भारत में महिलाओं का संपत्ति पर अधिकार संविधान और कानून दोनों द्वारा सुनिश्चित किया गया है. लेकिन सामाजिक स्तर पर अब भी जागरूकता और स्वीकार्यता की बहुत ज्यादा कमी है. महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को न तो उन के मातापिता द्वारा खुल कर बताया जाता है और न ही ससुरालियों या उन के पतियों द्वारा संपत्ति पर उन के अधिकारों के बारे में कोई चर्चा की जाती है. कभीकभी तो महिला को पता ही नहीं होता कि उस के पति के पास कोई पैतृक संपत्ति है भी या नहीं. जमीनजायदाद के मामलों से स्त्री को ज्यादातर भारतीय परिवार दूर ही रखते हैं. लेकिन अब जबकि लड़कियां भी लड़कों के समान शिक्षा प्राप्त कर रही हैं तो उन को खुद इस मामले में जागरूक होना चाहिए.
‘सरिता’ हमेशा ही महिलाओं को उन के अधिकारों के प्रति जागरूक करती रही है.
पैतृक संपत्ति पर स्त्री का अधिकार हिंदू सक्सेशन एक्ट, 1956 संशोधित 2005) : वर्ष 2005 में हुए संशोधन के बाद पैतृक संपत्ति पर बेटियों को पुत्रों के समान अधिकार मिल गया है. अब बेटी चाहे विवाहित हो या अविवाहित, उसे अपने पिता की संपत्ति में बराबर का हिस्सा मिलता है. बेटी को कुलवारिस माना गया है, जिस के चलते वह पुश्तैनी संपत्ति में भी हिस्सा मांग सकती है.
विवाह के बाद महिला के अधिकार: विवाह के बाद महिला को अपने पति की संपत्ति में हिस्सा तभी मिलता है जब वह विधवा हो और पति की कोई वसीयत न हो. पति की मृत्यु के बाद पत्नी को पति की चलअचल संपत्ति में हिस्सा मिलता है. साथ ही, उसे पति की पैंशन/ग्रेच्युटी का अधिकार प्राप्त है. उसे बच्चों के साथ समान उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता मिल चुकी है.
सासससुर की संपत्ति पर अधिकार: यदि सासससुर ने वसीयत की है तो बहू को संपत्ति मिल सकती है. यदि वसीयत नहीं है और पति की मृत्यु हो चुकी है तो बहू को पति के हिस्से का अधिकार मिल सकता है.
मुसलिम महिलाओं के अधिकार : मुसलिम कानून में महिला को पिता की संपत्ति में हिस्सा मिलता है (हालांकि बेटियों का हिस्सा बेटों से कम होता है). पति की संपत्ति में भी उसे हिस्सा मिलता है जो आमतौर पर 1/8 या 1/4 होता है. मुसलिम महिला को मेहर का कानूनी हक है जो विवाह के समय तय होता है.
विधवा, तलाकशुदा और अविवाहित महिलाओं के अधिकार : विधवा महिला को पति की संपत्ति में बराबर हिस्सा मिलता है. तलाकशुदा महिला को तलाक के बाद पति की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं होता, लेकिन गुजारा भत्ता मिल सकता है. अविवाहित महिला को अपने मातापिता की संपत्ति में पूरा कानूनी अधिकार है.
महिलाओं को चाहिए कि-
– अपनी संपत्ति खुद के नाम करवाएं. इस को करने में वक्त न लगाएं.
– वसीयत बनाएं या अपने हिस्से का कानूनी दावा करें.
– जरूरत पड़ने पर कानूनी सलाह लेने में न हिचकें. परिवार या समाज के भय से झिझकें नहीं. समाज और परिवार आप को न तो भोजन देंगे और न सम्मान.
– अपने अधिकारों को ले कर सशक्त और जागरूक बनें और उन किताबों को बारबार पढ़ें जो आप को आप के अधिकारों के बारे में जागरूक करती हैं.
स्त्री को अपना सशक्तीकरण खुद करना होगा
भारत की मोदी सरकार नारी सशक्तीकरण का कितना ही ढोल पीटे मगर सत्यता यह है कि वह औरत को धर्म की बेडि़यों में जकड़ कर सदैव पुरुष का गुलाम बनाए रखने की मानसिकता रखती है. औरतें व्रत, पूजा, धार्मिक स्थलों की यात्राओं, बाबाओं के प्रवचनों में फंसी रहें, भाजपा की यही मंशा है. महिलाओं को सशक्त करने से जुड़े जितने भी कानून देश में बने, वे सब कांग्रेस के काल में बने. मगर उन कानूनों को जनमानस तक पहुंचाने और समाज में जागरूकता फैलाने का काम ठीक से नहीं हुआ.
नारी सशक्तीकरण का साफ मतलब है कि महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और शैक्षणिक रूप से सशक्त बनाया जाए ताकि वे अपने जीवन के फैसले खुद ले सकें और समाज में बराबरी से जी सकें. मगर लिंगभेद, दहेज प्रथा, बाल विवाह, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर असमानता जैसी समस्याओं से महिलाएं आज भी जूझ रही हैं. स्त्री को खुद यह तय करना होगा कि उसे क्या चाहिए, किस दिशा में बढ़ना है और क्या सही है.
जब तक वह अपने फैसले खुद नहीं लेगी, तब तक उस का सशक्तीकरण नहीं होगा. उसे क्या खाना है, क्या पहनना है, क्या पढ़ना है आदि सारे फैसले उस के खुद के होंगे तभी वह सही अर्थों में आजाद होगी. अगर स्त्री हमेशा किसी और (पुरुष, समाज या सरकार) से मदद या सहारे की अपेक्षा करेगी तो वह आत्मनिर्भर नहीं बन पाएगी. सशक्तीकरण की शुरुआत आत्मनिर्भर बनने से होती है.
ज्ञान, शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मविश्वास स्त्री को अपने अधिकारों के लिए खड़ा होने की ताकत देते हैं. ये सभी स्त्री खुद हासिल कर सकती है. परंपराएं, रूढि़यां, धर्म और समाज स्त्री को आगे बढ़ने से रोकते हैं. इन्हें चुनौती देना भी एक प्रकार का सशक्तीकरण है और यह संघर्ष स्त्री को खुद ही करना होगा. स्त्री सशक्तीकरण कोई उपहार नहीं है जो कोई और देगा, यह एक संघर्ष है जिसे स्त्री को खुद करना होगा ताकि उस का पूरी तरह से सशक्तीकरण हो सके.