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कोरोना काल में पुरुष मांज रहे बर्तन

Writer- डा. श्याम किशोर पांडेय

कोरोना महामारी ने भले ही चीजें अस्तव्यस्त की हों, पर इस से उभरे अच्छे बदलावों में एक यह है कि अब पुरुष भी घरों में काम करने लगे हैं, जिन में बरतन साफ करना सब से ज्यादा सहजता से स्वीकारा जा रहा है. बरतन मांजना एक कला है, इसलिए जरूरी है कि पुरुष इस की अहमियत को सम?ों और जानें कि इस में लगने वाले श्रम और समय की भी एक कीमत है.

भारतीय समाज में ज्यादातर पुरुष घर के बाहर का कामकाज करते हैं और महिलाएं घर के कार्यों में लगी रहती हैं, जिस में भोजन बनाने से ले कर ?ाड़ूपोंछा, बरतन धोना, कपड़ा धोनासुखाना, प्रैस करना आदि तमाम शामिल हैं.

घर के इन कार्यों को कोई अहिमयत समाज का पुरुष वर्ग नहीं देता है. महिलाओं के इस अतुलनीय योगदान या यों कहें कि पूरी जिंदगी खपा देने वाले कार्य का देश की अर्थव्यवस्था के विकास में कहीं कोई योगदान नहीं माना जाता और न ही देश की जीडीपी में इसे किसी भी रूप में उल्लेखित करने की कोई व्यवस्था है.

सदियों से नारी की जिंदगी इन घरेलू कार्यों को करते हुए तिलतिल कर के मरखप जाती है. इन कार्यों से मुक्ति के लिए न तो कोई छुट्टी है और न ही कोई नाम. यश, मौद्रिक रूप में भुगतान का तो सवाल ही नहीं उठता. उलटे, जिस दिन पुरुष वर्ग की छुट्टी होती है, उस दिन महिलाओं के कार्यों की संख्या और मात्रा दोनों में बढ़ोतरी जरूर हो जाती है.

कुछ दिनों पहले मेरे एक स्थापित कम्युनिस्ट मित्र ने फोन पर कहा कि वे अब बीजेपी में शामिल हो गए हैं. हमेशा लेनिन मार्क्स की बात करने वाले इस मित्र की बात पर मु?ो सहसा विश्वास नहीं हुआ और मेरे मुंह से एकाएक निकल गया, ‘क्या…?’

क्या शब्द सुनते ही उन्होंने धीरे से कहा कि, ‘भाई, अन्यथा मत लेना, बीजेपी से मेरा मतलब बरतन, ?ाड़ू, पोंछा करने से है. यह बात केवल मेरे इस मित्र की ही नहीं है बल्कि हर उस व्यक्ति की है जो इस कोरोनाकाल में अपनीअपनी सामर्थ्य के अनुसार घर का आंतरिक कामकाज कर रहा है और घर की महिलाओं को सहयोग देने में यथासंभव अपनी भूमिका भी निभा रहा है.

हमारे देश में तकरीबन हर जगह और हर समाज में बरतन मांजने के काम को कोई विशेष महत्त्व नहीं दिया जाता है. सदियों से घरों में मां, बहन, पत्नी आदि महिलाएं ही बरतन मांजती चली आ रही हैं. पुरुष तो केवल साफसुथरे बरतनों में भोजन करने का आदी है.

हां, आज से एक पीढ़ी पहले तक भारत में बरतन मांजने में जितनी मेहनत व समस्याएं होती थीं, उतनी आज नहीं हैं. तब भारीभरकम पीतल व लोहे की कड़ाहियां, पतीले, थालियां, गिलास, लोटे, जग आदि हुआ करते थे. आज उन की जगह स्टील के बरतनों ने ले ली है.

पहले उपले, लकड़ी, सूखे पौधों के तने (जैसे, ?ांगअरहर के सूखे तने, कपास के सूखे तने आदि), लकड़ी, पत्थर के कोयले, मिट्टी के तेल वाले स्टोवों आदि पर भोजन पकाना पड़ता था जिस से बरतनों की पेंदियां, अंदरूनी हिस्से आदि काफी जल जाया करते थे और उन्हें मांजने में बड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी. तब भगोने, कड़ाही, बटलोई आदि जैसे भोजन पकाने के पात्रों की पेंदी में गीली मिट्टी या राख की एक परत चढ़ा दी जाती थी, ताकि पेंदी कम जले और मांजने में अधिक मशक्कत न करनी पड़े.

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आज गैस के चूल्हों पर भोजन पकने के कारण बरतनों की पेंदी के जलने में तुलनात्मक दृष्टि से काफी कमी आई है. दूसरी समस्या, बरतनों को धोने के मामले में पानी की उपलब्धता की भी है. पहले, आज की तरह नलों से चौबीसों घंटे पानी नहीं आता था और तब संचित किए गए पानी से ही बरतन मांजने पड़ते थे और बरतन मांजने का स्थान भी रसोईघर से हट कर होता था.

साथ ही, आज बरतन मांजने के लिए भांतिभांति के जो डिटर्जेंट, लिक्विड आदि उपलब्ध हैं, वे भी पहले नहीं थे, तब राख, बालू, मिट्टी आदि से ही बरतन मांजने व चमकाने पड़ते थे. वर्तमान में, हर खातेपीते घर में कामवाली बाई को मासिक मजदूरी के आधार पर बरतन मांजने, ?ाड़ूपोंछा आदि करने के लिए रखने का चलन आम हो गया है. शहरों के साथसाथ कसबोंगांवों में भी आज यह सुविधा उपलब्ध हो गई है.

पिछले लगभग 2 वर्षों से कोविड 19 की महामारी ने हमारी जीवनचर्या को पूरी तरह से बदल दिया है. लौकडाउन के समय जहां बाहर जाने पर सरकारी प्रतिबंध था, वहीं अनलौक की स्थिति में कोरोना के बढ़ते मामलों ने अंदरूनी डर पैदा कर दिया है. इस से लोग बाहर निकलने से पहले कई बार सोचविचार कर रहे हैं. 60 वर्ष से ऊपर वाले बुजुर्ग कोरोना के कारण और भी डर रहे हैं. दवाई आने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि ‘दवाई भी और कड़ाई भी’ इस का अनुसरण करते हुए मास्क और 2 गज की दूरी से अभी मुक्ति नहीं मिली है.

कोरोना के प्रकोप को देखते हुए लोगों ने काम करने वाली बाइयों को काम से हटा दिया है. कई जगहों पर इन बाइयों ने अपनी और अपने परिवार की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए खुद ही घरों में काम करना छोड़ दिया है.

इन कामवाली बाइयों के न आने से तथा हमेशा पुरुष सदस्यों के घर में ही रहने से भोजन बनाने, ?ाड़ूपोंछा और बरतन धोने आदि जैसे कार्यों में भी वृद्धि हुई है. वैसे, रोज कपड़े धोने, सूखने के लिए फैलाने, उतारने, तहाने और उन्हें प्रैस करने का काम भी एक बड़ा काम है.

बारिश के मौसम में कपड़े सुखाना भारी सिरदर्द है और इसे भी घर की महिलाएं ही ?ोलती हैं. अधिकांश घरों में कोरोनाकाल के दौरान इन 4 कार्यों (भोजन बनाना, बरतन मांजना, ?ाड़ू लगाना और पोंछा लगाना) में से बरतन मांजने की जिम्मेदारी घर के पुरुष सदस्यों ने ले ली है. इस का मुख्य कारण यह है कि अधिकांश पुरुषों के लिए भोजन बनाने की कला में पारंगत होना तो बहुत दूर की बात है, बड़ी संख्या में ऐसे पुरुष हैं जिन के पास बढि़या चाय बनाने तक का हुनर नहीं है.

वैसे, कई पुरुषों को ?ाड़ूपोंछे का कार्य करने में शर्म आती है, सो उन्हें बरतन मांजने का काम ठीक लगता है. सामान्यतया खातेपीते मध्यवर्गीय व उच्चवर्गीय भारतीय परिवारों में बालक से किशोर और फिर युवा होते लड़कों को कभी भी बरतन मांजने नहीं दिए जाते हैं.

अपवादस्वरूप, यदि कहीं कोई लड़का अपनी जूठी प्लेट, गिलास आदि मांजने की कोशिश भी करता है तो परिवार की महिलाएं उसे ऐसा करने से मना कर देती हैं. माताओं का लड़कों के प्रति अतिरिक्त दुलार ही इस में एक प्रमुख कारण है.

कई घरों में तो घर के पुरुष सदस्य खुद गिलास में पानी ले कर भी नहीं पीते. पत्नी का नाम ले कर ‘जरा एक गिलास पानी देना’ कहना आम बात है. कोविड 19 के कालखंड में घर में रहने के कारण पुरुषों को यह पता चला है कि महिलाएं रातदिन घर के इन्हीं कार्यों में जुटी रहती हैं. ये कार्य देखने में भले ही बड़े न लगते हों, बराबर से लगते हों, पर उन्हें संभालना, एक ही कार्य को बारबार करते रहना, एकएक चीज को सहेज कर निर्धारित स्थान पर रखना आदि अपनेआप में बहुत बड़ा कार्य है. साथ ही, कुछ हद तक एकरस और उबाऊ भी है. इन कार्यों को करने में समय भी काफी लगता है और सब से बड़ी बात, इन्हें करने के लिए धीरज और लगन का होना बहुत जरूरी है.

वैसे तो घर के हर कार्य महत्त्वपूर्ण होते हैं पर बरतन मांजना उन में से बड़ा कार्य है. बरतन मांजने का काम सुनने में जितना आसान लगता है, उतना वास्तव में है नहीं. प्रतिदिन 4-5 व्यक्तियों के परिवार में 3 बार के भोजन, नाश्ता, चायपानी आदि को मिला दें तो मांजने के लिए रोज कम से कम 200 बरतन तो हो ही जाते हैं.

सिंक में देखने पर लगता है कि बरतन उगते ही चले जा रहे हैं. यदि परिवार में कुछ लोग मांसाहारी तथा कुछ विशुद्ध शाकाहारी हुए तो बरतनों की संख्या में भी तदनुसार वृद्धि हो जाती है. घर में रिश्तेदार तथा खास मित्रों के आने पर तथा छुट्टी और त्योहार के दिनों में विशिष्ट व्यंजन आदि बनने के कारण बरतनों की संख्या में और भी वृद्धि हो जाती है. मोटे तौर पर, घरों में मांजने के लिए जो बरतन होते हैं उन्हें मांजने की दृष्टि से 5 श्रेणियों में बांटा जा सकता है :

१.     भोजन पकाने, चाय बनाने, दूध उबालने आदि कार्यों से जुड़े बरतन :  इस के अंतर्गत कुकर, भगोना, कड़ाही, चकलाबेलन, पैन, केतली, मिक्सर, तवा आदि आते हैं.

२.     भोजन करने, चायपानी पीने वाले बरतन : इस के अंतर्गत थाली, प्लेट, कटोरी, चम्मच कांटे, गिलास, लोटा, जग, कपप्लेट आदि आते हैं.

३.     भोजन पकाने में सहायक बरतन : इस के अंतर्गत कलछुल, सड़सी, छनौटा, पलटा, चिमटा आदि आते हैं.

४.     विशेष त्योहार वाले बरतन : परिवार में मनाए जाने वाले त्योहारों के अनुरूप अलगअलग प्रकार के बरतन होते हैं, जिन में से कुछ को नित्य मांजना होता है तो कुछ केवल विशेष अवसरों/पर्वों पर धोए जाते हैं.

५.     स्टील के अतिरिक्त, चादी, तांबा, पीतल, कांसा, कांच, चीनीमिट्टी आदि के बरतन भी होते हैं.

बरतन मांजना भी अन्य कार्यों की तरह ही दक्षता की मांग करता है. साथ ही यदि मांजे हुए बरतनों के पर्यवेक्षण की जिम्मेदारी अनुभवी पत्नी के हाथों में हो तो और अधिक सावधानी बरतनी आवश्यक है.

भोजन करने वाले बरतनों, जैसे थाली, कटोरी गिलास, चम्मच आदि को विम साबुन, पाउडर, लिक्विड आदि डाल कर प्लास्टिक के जूने से रगड़ कर आसानी से साफ किया जा सकता है पर भोजन पकाने वाले बरतनों, जैसे कड़ाही, भगोना, कुकर, मिक्सर आदि को पहले पानी में भिगोने के बाद ही मांजना चाहिए.

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यदि भगोने में देर तक दूध उबाला है, खीर, खिचड़ी, बिरियानी आदि बनाई है तो स्टोव पर बरतनों को देर तक रखने के कारण संबंधित पात्र बाहर से तो जलते ही हैं, अंदर भोजन सामग्री के भी कुछ जले हुए अंश भी काफी मजबूती से चिपक जाते हैं. इन बरतनों को देर तक पानी में भिगोने के बाद ही मांजना चाहिए, तभी ये अच्छी तरह से धुल पाएंगे.

जिन पुरुषों को कोरोनाकाल में पहली बार बरतन धोने पड़ रहे हैं, उन्हें कुकर, भगोना, कड़ाही आदि जैसे भोजन पकाने वाले बरतनों को बीच में और किनारे वाले हिस्सों को जोर लगा कर जूने से रगड़ना चाहिए, तभी घी, दूध, दाल, मसाले आदि के चिपके अंश साफ हो पाएंगे. यदि विम लिक्विड आदि का उपयोग कर रहे हैं तो उस में हिसाब से पानी डाल कर उसे पतला कर लें, क्योंकि गाढ़े लिक्विड से बरतन ठीक से साफ नहीं होते और धोने में काफी पानी भी खर्च होता है. साथ ही, धोने के बाद भी बरतनों में दागधब्बे दिखाई पड़ते हैं.

कुकर, कड़ाही, भगोना आदि जैसे बरतनों, जिन के अंदरूनी हिस्से या बाहरी हिस्से जल गए हों या जले हुए भोज्य पदार्थ मजबूती से चिपक गए हों, को मांजने के लिए लोहे के तार वाले जूने का भी प्रयोग कर सकते हैं, पर इस संबंध में यह भी ध्यान में रखना जरूरी है कि इस जूने का प्रयोग तभी किया जाए जब बहुत जरूरी हो, क्योंकि इन लोहे के जूनों का अनवरत प्रयोग करते रहने पर बरतनों में धारियां जैसे निशान पड़ जाते हैं.

कुकर में यदि दाल, खिचड़ी या बिरयानी बनाई गई है तो कुकर की सीटी के अगलबगल में दाल मसाले के अंश चिपके रह जाते हैं, इन्हें सावधानी से रगड़ कर छुड़ाना चाहिए. कुकर के गास्केट, सीटी को भी ध्यान से साफ करना चाहिए क्योंकि मसाले, दाल आदि के अंश इन में भी चिपके रह सकते हैं.

इसी तरह से मिक्सर को साफ करते समय पहले उस के ब्लेड को अलग कर लेना चाहिए, क्योंकि मिक्सी में लगे हुए ब्लेड से एक तो ढंग से सफाई नहीं हो पाती, दूसरे उंगलियों के कटने का खतरा भी बना रहता है.

लेखक ने बनारस में सुबहसुबह पहलवानों को दूध, रबड़ी, मलाई पकाने वाले बड़ेबड़े कड़ाहों को देर तक रगड़रगड़ कर साफ करते हुए देखा है. इन बरतनों को मांजने में इतनी मशक्कत होती थी कि जनवरीफरवरी की कड़ाके की ठंड में भी पहलवानों के मजबूत शरीर से भी पसीने की बूंदें छलछला आती थीं. बढि़या से चमकाए गए कड़ाहों को देख कर बहुत ही खुशी होती थी.

सावधानी बरतें

आजकल नौनस्टिक वाले बरतनों, जैसे कड़ाही, तवा, भगोना आदि का प्रचलन ख़ूब हो गया है. ऐसे बरतनों को मांजते समय इन पर की गई टेफ्लान की कोटिंग को भी ध्यान में रखना जरूरी है क्योंकि जोर से रगड़ने पर कोटिंग के छूटने का डर बना रहता है. कांच, चीनीमिट्टी के बरतनों को मांजते समय विशेष सावधानी बरतने की जरूरत होती है क्योंकि विम लिक्विड, साबुन आदि लगने के बाद ये बरतन काफी चिकने हो जाते हैं और जरा सा ध्यान हटते ही ये गिर कर टूट सकते हैं.

टूटने पर तकलीफ होने के साथसाथ किचन के सिंक में से कांच के टुकड़ों को चुनचुन कर निकालना भी एक बड़ी समस्या होती है और जरा सी असावधानी से शीशे का कहीं कोई छोटामोटा कण यदि हथेली में चुभ गया तो लेने के देने पड़ सकते हैं.

इस के अतिरिक्त, गिलास, चीनीमिट्टी की एक कटोरी, कप, बाउल के टूट जाने पर पूरा का पूरा सेट भी बिगड़ सकता है. पिछले दिनों की बात है, लेखक बगल वाले कमरे में चल रहे टीवी पर एक रोचक कार्यक्रम देख रहा था और साथ में सिंक में चीनीमिट्टी के सुंदर बाउल को भी धो रहा था, पता नहीं कैसे ध्यान भटक गया और बाउल हाथ से फिसल कर सिंक में टूट गया. महंगे बाउल के टूटने का जो अफसोस हुआ वह तो हुआ ही, सेट के बिगड़ जाने का मलाल अब सदा के लिए हो गया.

पिछले कुछ वर्षों से लोग तांबे के जग में पानी रख कर तांबे के गिलास से पानी पीने लगे हैं. तांबे के बरतनों की यह खासीयत होती है कि इन्हें यदि ठीक से साफ न किया जाए तो ये काले पड़ने लगते हैं और इन में रखे हुए पानी का स्वाद कड़वा लगने लगता है.

तांबे के बरतनों को साफ करने के लिए ‘पीतांबरी’ नामक पाउडर आता है. इस पाउडर से साफ करने पर तांबे के पुराने बरतनों में स्वाभाविक चमक आ जाती है. तांबे के बरतनों को साफ करने के लिए नमक और नीबू के साथ पीतांबरी पाउडर को मिला कर सफाई की जाए तो उन में चमकदमक आ जाती है.

आजकल के किचन में सिंक के पास खड़े हो कर बरतन मांजने की सुविधा होती है. ऐसी स्थिति में जिस व्यक्ति की कमर में, गरदन में या घुटने आदि में दर्द हो या स्पाइनल कौर्ड की कोई तकलीफ हो तो उन्हें देर तक खड़े हो कर बरतन मांजने से परहेज करना चाहिए.

एक ही बार में यदि सिंक में 50 या उस से ज्यादा बरतन हों, जिन में कड़ाही, भगोने, कुकर आदि भी हों, तो उन्हें मांजने में कम से कम एक या सवा घंटे का वक्त तो लग ही जाता है. इतनी देर तक निरंतर खड़े रहना उम्रदराज व्यक्ति के लिए न तो संभव है और न ही स्वास्थ्य की दृष्टि से उपयुक्त है. सो, एक ही बार में सारे बरतनों को मांजने के बजाय उन्हें 3 बार में मांजा जाए तो ज्यादा तनाव भी नहीं होगा और रीढ़ की हड्डी पर अधिक जोर भी नहीं पड़ेगा. अधिक बरतन मांजने से हथेलियां खुश्क और खुरदरी हो सकती हैं, नाखून घिस सकते हैं या उन की लालिमा पर भी असर पड़ सकता है. इसलिए जरूरी है कि ग्लब्स पहन कर बरतन मांजे जाएं. यदि किसी कारणवश ग्लव्स नहीं पहन पाते हैं तो बरतन धोने के बाद हथेलियों को सुखा कर कोई बढि़या सी क्रीम जरूर लगानी चाहिए और इसे उंगिलयों की पोरों व नाखूनों पर भी अच्छी तरह से लगानी चाहिए.

साथ ही बरतन मांजने के संबंध में घर की महिलाओं द्वारा दी गई हर सलाह को उसी तरह से मानना चाहिए जैसे हम कार्यालय के बौस की राय या आदेश को मानते हैं. कार्यालय में मेहनत से बनाए गए नोट को काट कर जब बौस रिड्राफ्ट करने को कहता है तो ?ां?ालाहट भी होती है और बौस को भलाबुरा कहने का मन भी करता है, पर कहते कुछ नहीं हैं, बस, चुपचाप निर्देशानुसार एक दूसरा संशोधित ड्राफ्ट तैयार कर देते हैं.

वैसे ही मांजे हुए बरतन में यदि कोई जूठा निकाल दे, कमी बता दे या मांजने का कोई तरीका सु?ा दे तो भुनभुनाए बिना उसे स्वीकारने की आदत डाल लेनी चाहिए. मांजे हुए बरतनों को एक बार सूखे साफ कपड़े से पोंछ भी लेना चाहिए. इस के 2 लाभ हैं, एक तो बरतनों में स्वाभाविक चमक आ जाती है और दूसरे, यदि कहीं कोई जूठा अंश छूट गया है तो उस का भी पता लग जाता है और उसे दोबारा धो कर साफ किया जा सकता है.

इस का एक और बड़ा लाभ यह होगा कि भोजन करने वाले द्वारा पात्र में जूठा दिखाने की नौबत नहीं आएगी. भोजन परोसे हुए पात्र में यदि कोई जूठा निकल जाए और खाने वाला उसे इंगित कर दे तो उस समय बरतन मांजने वाले को बड़ी शर्मिंदगी ?ोलनी पड़ती है.

बरतन मांजना ऐसा महत्त्वपूर्ण कार्य है जो उत्साह, धीरज और एकाग्रता की मांग करता है. 4-5 लोगों के घर वाले परिवार में दो बार, तीन बार बरतन मांजने में हर बार कम से कम एक घंटे का समय लग जाता है.

इस समय का उपयोग मन को शांत रखने तथा मन में उमड़तेघुमड़ते फालतू विचारों को रोकने के लिए भी किया जा सकता है. कोरोनाकाल से पहले पुरुषों को बरतन मांजना बहुत ही आसान काम लगता था पर आज जब कोरोनाकाल में उन्हें खुद ही बरतन मांजने पड़ रहे हैं

तो उन्हें उस की अहिमयत सम?ा में आ गई है.

साथ ही उन्हें बात का भी गहराई से अनुभव हो रहा है कि घर की महिलाएं घर के ऐसे ही अनेक छोटेबड़े कितने महत्त्वपूर्ण एवं मेहनत से जुड़े कार्यों को हंसतेहंसते, बोलतेबतियाते अनवरत किया करती हैं और अपनी पूरी की पूरी जिंदगी पुरुषों तथा परिवार की खुशहाली के लिए न्योछावर कर देती हैं.

चुनावी सपने में कृष्ण

देवीदेवता चूंकि निरे काल्पनिक होते हैं इसलिए सपने में ही आते हैं. ठीक वैसे ही जैसे सपा प्रमुख अखिलेश यादव के सपने में कृष्ण आ कर रोज कहते हैं कि इस बार उत्तर प्रदेश में सपा की ही सरकार बनेगी और वही रामराज्य लाएगी. बात नई सी है लेकिन भाजपा के (क्षत्रिय) राम के मुकाबले सपा के (यादव) कृष्ण भारी पड़ सकते हैं क्योंकि वे युद्ध ताकत या इच्छाशक्ति से नहीं बल्कि चालाकी व छल से जीतने के लिए गीता का उपदेश दे कर नरसंहार करवा देते हैं.

इस स्वप्न प्रकरण पर छोटेमोटे भाजपाई तो आदतन हल्ला मचा कर रह गए लेकिन योगी आदित्यनाथ फंस गए हैं, जो बेचारे यह भी नहीं कह सकते कि ‘नहीं, चुनाव जिताने का जिम्मा तो श्रीराम का है.’

मायावती चाहें तो अपने सपने में हनुमान के आने की बात कह सकती हैं क्योंकि योगी की नजर में हनुमान शूद्र थे. कांग्रेस को भी वक्त रहते अपने चुनावी सपनों का देवता घोषित कर देना चाहिए.

मराठी राबड़ी देवी

महिलाओं का मजाक बनाने के सनातनी भाजपाई संस्कार कश्मीर से कन्याकुमारी तक समान हैं. इसी कड़ी में महाराष्ट्र भाजपा के तृतीय श्रेणी के एक नेता जितेन गजरिया ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की पत्नी रश्मि ठाकरे की तुलना राबड़ी देवी से महज इस बिना पर कर दी कि उन के अपने पति की जगह संभालने की अटकलें लग रही हैं.

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इस अनुमान को तथ्य में बदलने के लिए उद्धव की तथाकथित बीमारी को खूब प्रचारित किया जा रहा है. पेशे से पत्रकार रश्मि उन पत्नियों में से एक हैं जिन्होंने पति की इमेज गढ़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी और कभी भी चर्चाओं और सुर्खियों में नहीं रहतीं.

उद्धव का कुसूर इतना भर है कि वे राजनीति में एक नई प्रमेय गढ़ दी है कि भाजपा को धता बता कर कांग्रेस और एनसीपी के साथ सरकार सफलतापूर्वक चला रहे हैं.

मुंबई की मेयर किशोरी पेडणेकर ने इस नेता को टर्नकोट कहा तो उसे गिरफ्तार कर लिया गया. कुछ दिनों पहले देवेंद्र फडनवीस की पत्नी अमृता ने भी आदित्य ठाकरे को कीड़ा कहा था. इसी से सम?ा जा सकता है कि भगवा गैंग के जख्म रिसना बंद नहीं हुए हैं.

अनदेखी का लुत्फ

बंगाल की हार अभी तक कसक रही है. तिस पर नगरीय चुनावों ने तो वहां से भाजपा को 9 फीसदी वोटों पर समेटते खत्म कर दिया है. भाड़े पर जो टट्टू भगवा गैंग ने पश्चिम बंगाल में रिक्रूट किए थे, मुमकिन है उन का ट्रांसफर यूपी कर दिया गया हो. कुछ भी हो लेकिन अपने आसमान में ममता बनर्जी नरेंद्र मोदी को ऊंचा न देखने देने का कोई मौका नहीं छोड़तीं.

हुआ सिर्फ इतना था कि कोलकाता स्थित चितरंजन राष्ट्रीय कैंसर अस्पताल का वर्चुअल उद्घाटन नरेंद्र मोदी ने किया, जिस के हो जाने के बाद ममता ने उपहास सा उड़ाया कि इस अस्पताल का उद्घाटन तो वे पहले ही कर चुकी हैं.

बचेखुचे गिनती के भाजपाई चेंचेंपेंपें करते रहे और ममता प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान अपने मोबाइल से खेलते यह जताती रहीं कि वे सरासर अनदेखी कर रही हैं और इसे सब देख लें तो बेहतर है.

बिना लक्षणों के विलक्षण

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की जिंदगी पर आधारित एक किताब ‘विलक्षण जननायक’ का विमोचन एक हिंदूवादी अखबार ने भोपाल में किया. इन दिनों मोदी और योगी की तरह मूर्तियों, नदियों और गायों की राजनीति कर रहे शिवराज ने इस मौके पर किस्सा भी दलितसवर्ण बैर का सुनाया, जिस से ये बातें सिद्ध हुईं-

1- शिवराज सिंह अपने गांव जेत में 24 घंटे रामायण पढ़ते थे. 2- तब दलितों को रामायण में भागीदारी नहीं करने दी जाती थी. 3- शिवराज ने एक हरिजन दादा मलुआ से चंदा लिया था जिस का उन के रिश्तेदारों व गांव वालों ने विरोध किया था.

निष्कर्ष- विमोचन समारोह में थोक में छोटेबड़े धर्मगुरु उन पर आशीर्वचन बरसा रहे थे लेकिन दादा मलुआ के कहीं अतेपते न थे.

डिजिटलकरण का बजट

सरकार का वाॢषक बजट आमतौर पर जनता के लिए नहीं सरकार के लिए होता है जिस में सरकार  तय करती है कि और उसे कितना कहां खर्च करना है और उस खर्च के लिए जनता का गला कहांकहां दबाना है. 5 राज्यों के चुनाव नजदीक हैं तो भी मोदी सरकार ने फरवरी के बजट में ऐसे कुछ नहीं किया कि लगे कि सरकार देश और देश की आम जनता के लिए चल रही है. यह साफ रहा है कि सरकार शासकों की शासकों के लिए है और लाभ मिलेगा तो शासकों के चाटुकारों को.

39.45 लाख करोड़ रुपए का बजट वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने पेश किया तो यह सिर्फ सरकार आम जनता पर किस तरह भारी बोझ बनी कैसे है, दर्शाता है. इन 39.45 लाख करोड़ रुपए से जनता के केवल …. संपनी लोगों को लाभ मिलेगा जो सरकार की चाटुकारिता और बढ़ाएंगे और सरकार ने छिपे उद्देश्य मंदिरों, मठों को और ज्यादा चढ़ावा चढ़ाएंगे.

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निर्मला सीतारमन एन पंडितों की तरह अब अमृत काल की बात करनी शुरू कर दी है और सुख और अच्छे दिन अब अमृत काल के बाद आएंगे जो 2047 में समाप्त होगा जब तक न वह रहेंगी न आज का व्यस्क देश का बोझ हो रहा वोटर. पंडित लोग भी इसी तरह का पंचांग सा लेकर भक्तों को मरमाते हैं कि 5-20, 15-20 साल बाद उन्हें सुख ही सुख मिलेगा. भारतीय जनता पार्टी अपनी ही धाॢमक शिक्षा में इस कदर डूबी है कि बजट  तक उस के शब्द पसरे पड़े हैं. देश में 80-85′ लोग न ब्राह्मïणों के पास फटक सकते हैं न उन से जिरह कर सकते हैं, बस अपने जन्म के पापों का फलों की कहानियां सुन कर खुद को ही दोषी मान सकते है, न भगवान को, न देवीदेवता को, न राजा को. मोदी का दोष नहीं, भाजपा का देश नहीं वे पिछड़ी या दलित जाति में पैदा हुए तो बजट हो या पुलिस का डंडा, मार उन्होंने ही खानी है. निर्मला सीतारमन ने डंडों का पूरा इंतजाम किया और पुलिस सेवाओं का बजट बढ़ा दिया. पिछड़े और दलित अब नए पंडों, आईटी संरक्षकों को भरपूर पैसा देने के लिए हर विभाग का डिजिटलकरण का बजट बढ़ा दिया.

करदाता को कोई राहत नहीं, छोटे उद्योगपतियों को कोई राहत नहीं, मजदूरों को कोई सुविधाएं नहीं, किसानों को कोई राहत नहीं, छोटे व्यापारियों को कोई राहत नहीं. बड़ीबड़ी बातें सिर्फ और सिर्फ अमीर भारत को और सुविधाएं देने के लिए बनाया गया. विशेष ऊंचीजातियों वालों के तैयार बजट है. जिस बजट के निर्माता अगर निर्माता सीतारमन, टीवी सोमनाशन, तरुण बजाज, अजय सेठ, देवाशीष पांडा और तुहिन कांत पांडेय पांडेय जैसे लोग हों, उन से किसानों, मजदूरों, शिल्पकारों, टैक्सी बस ट्रक चालकों, सेवाओं देने वालों को हित की बातों की उम्मीद भी वैसे की जा सकती है. वे लोग खुद एक दूसरी दुनिया मेंं  रहते हैं, अधिकांश विदेशों में पढ़े हैं. विदेशों में वर्षों रहे हैं और विदेशों में उन के बच्चे पढ़ रहे है या काम कर रहे हैं. उन्हें गंदे, बदबूदार, गरीब भारत के न दर्शाने होते हैं न उस की ङ्क्षचता है. फोटो शूट कराने के लिए वे गंदी बस्ती को इंसैक्टीसाइड से साफ करा कर चाहे पहुंच जाएं.

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सरसों की फसल में माहू कीट के प्रकोप को ऐसे करें काबू

श्रीकेश पुरी गोस्वामी, कृषि पर्यवेक्षक

अगर सरसों की फसल में माहू कीट का प्रकोप हो जाता है, तो ऐसी स्थिति में सरसों के उत्पादन में तकरीबन 25 से 30 फीसदी तक की कमी हो सकती है.

जानिए, माहू कीट क्या है, यह कीट किस तरह से फसल को नुकसान पहुंचाता है और इस कीट का रासायनिक और जैविक विधि से नियंत्रण कैसे करें.

माहू कीट की पहचान : यह कीट छोटे आकार के सलेटी या जैतूनी हरे रंग के होते हैं. इस की लंबाई 1.5-2 मिलीमीटर तक होती है. इस कीट को एफिड, मोयला, चैंपा, रसचूसक कीट आदि अन्य नामों से भी जाना जाता है.

माहू कीट के प्रकोप की संभावना : इस कीट का प्रकोप देरी से बोई गई सरसों में ज्यादा होता है. आमतौर पर जब मौसम बदलने लगता है या सर्दी कम होने लगती है, उस समय फरवरीमार्च महीने में माहू कीट का प्रकोप तेजी से होने लगता है.

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माहू कीट द्वारा सरसों में नुकसान : यह कीट कोमल पत्तियों और फूलों का रस चूस लेते हैं. जो फली बन रही होती है, उन का भी रस चूस लेते हैं, जिस से फलियां गूदेदार नहीं हो पाती हैं. इस में फलियों में जो दाने बनने चाहिए, वे नहीं बन पाते हैं.

माहू कीट पौधों पर लिसलिसा या चिपचिपा पदार्थ भी छोड़ते हैं. इस वजह से प्रभावित जगह पर काले रंग की फफूंदी आ जाती है, जिस से फूलों की वृद्धि रुक जाती है और फलियों का विकास नहीं हो पाता है. इस के चलते उत्पादन में काफी कमी आ जाती है.

माहू कीट को ऐसे करें काबू : इस कीट के नियंत्रण के लिए मैलाथियान 50 ईसी या डाईमिथोएट 30 ईसी एक लिटर प्रति हेक्टेयर की दर से पानी में मिला कर छिड़काव करें. साथ में स्टीकर भी मिला लें, जिस से दवा पौधों पर चिपक सके.

जैविक नियंत्रण के लिए नीम की निंबोली के सत का 5 फीसदी पानी में घोल बना कर कीट दिखाई देने पर तुरंत छिड़काव करें.

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‘गुम है किसी के प्यार में’ की ‘सई’ का ऑडिशन वीडियो आया सामने, एक्टिंग देखकर फैंस हुए दीवाने

सीरियल ‘गुम है किसी के प्यार में’ (Ghum Hai Kisikey Pyaar Meiin) की सई यानि आयशा सिंह (Ayesha Singh) का ऑडिशन वीडियो  सामने आया है. इसे फैंस काफी पसंद कर रहे हैं. इस वीडियो में आयशा ने जबरदस्त एक्टिंग की है. वीडियो को देखकर आप समझ जाएंगे कि आयशा की एक्टिंग वाकई में कमाल की है.

शो में सई अपनी एक्टिंग के कारण घर-घर में मशहूर है. सई के चुलबुले अंदाज को दर्शक खूब पसंद करते हैं.  हर इमोशन को पर्गे पर शानदार तरीके से निभाती है. आपको बता दें कि यूट्यूब पर एक वीडियो सामने आया है,  इसमें आयशा सिंह किसी रोल के लिए ऑडिशन दे रही हैं.

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सई गुजराती ड्रेस में नजर आ रही है. वह गुजराती और हिंदी में डायलॉग बोलती नजर आ रही हैं. इस वीडियो में उनका चुलबुलापन, शरारत सब कुछ नजर आ रहा है. इस वीडियो को फैंस काफी पसंद कर रहे हैं.

 

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आयशा सिंह ने कई बड़े टीवी शोज में काम किया है. आयशा सिंह एक्ट्रेस होने के साथ ही पेशे से लॉयर भी हैं. एक रिपोर्ट के अनुसार आयशा सिंह ने बताया था कि  मैं लॉ में आगे बढ़ने के लिए जब मुंबई पहुंची तो वहां मैंने एक्टिंग वर्कशॉप करना शुरू कर दिया.

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आयशा सिंह की फैमिली नहीं चाहती थी कि वह एक्टिंग करे. उन्होंने आगे बताया कि फैमिली की सहमति लेने के लिए मुझे अपने अंदर के वकील का इस्‍तेमाल करना पड़ा, तब जाकर उन्होंने एक्टिंग की दुनिया में कदम रखी.

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Anupamaa: वनराज को सबक सिखाएगी मालविका? होगी नए शख्स की एंट्री!

टीवी सीरियल अनुपमा में लगातार ट्विस्ट देखने को मिल रहा है. जिससे दर्शकों का फुल एंटरटेनमेंट हो रहा है. शो के बिते एपिसोड में आपने देखा कि अनुज ने सारी प्रॉपर्टी अपनी बहन मालविका के नाम कर दिया है. लेकिन अनुपमा अनुज को हर तरह से समझाने की कोशिश करती है कि वह गलत कर रहा है. क्योंकि मालविका वनराज के साथ काम कर रही है, और सारी प्रॉपर्टी उसके हाथ लग सकती है. ऐसे में मालविका को अकेला नहीं छोड़ना चाहिए.

शो में ये भी दिखाया जा रहा है कि अनुपमा मालविका को भी समझाने की कोशिश कर रही है कि वह गलत आदमी के बातों में आकर अपने भाई को नजरअंदाज कर रही है. उसे अपने भाई पर भरोसा रखना होगा. अनुपमा मालविका से ये भी कहती है कि उसका भाई दुनिया का सबसे अच्छा इंसान है. मालविका कहती है कि अनुज सिर्फ अनुपमा से प्यार करता है, अपनी बहन से नहीं.. तभी तो उसने अपनी बहन को अकेला छोड़ दिया. अनुपमा के लाख समझाने के बावजूद भी मालविका नहीं समझती है.

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शो के अपकमिंग एपिसोड में आप देखेंगे कि अनुपमा में नए शख्स की एंट्री होगी. खबरों के अनुसार एक नया शख्स मालविका की मदद करेगा. वह मालविका को वनराज के खिलाफ जंग लड़ने में मदद करेगा. इस शख्स के आने से मालविका पूरी तरह बदल जाएगी.

 

बताया जा रहा है कि शो के अपकमिंग एपिसोड में मालविका का एक्स बॉयफ्रेंड अक्षय की एंट्री होगी. इस बार अनुज को यह अहसास हो जाएगा कि मालविका के लिए अक्षय सही इंसान है. मालविका अक्षय के साथ मिलकर वनराज को सबक सिखाएगी. खबरों के अनुसार, शो में मालविका और अक्षय की शादी भी दिखाई जाएगी.

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रक्षा बजट के बहाने हो रही है धांधली!

किसानों के नाम पर आर्गेनिक खेती की बातें की गई हैं सिर्फ जो अमीरों का नया चोंचला है जिसमें 4 गुना कम पर बेची जा रही ……रैप सब्जी लपकी जाती है क्योंकि प्रति एकड़ उस का उत्पादन बहुत कम हो जाता है. सारा देश अगर इस और्गेनिक खेती को करने के लिए नहीं तो अकाल पड़ जाएगा जैसा पिछले वर्ष श्रीलंका में हुआ जहां किसी खप्ती नेता ने खेती में पेस्टी साइड बैन कर दिए और खाने के लाले पड़ गए.

मेट्रो और रैपिड रेलों को 19,130 करोड़ दिए जाएंगे पर कोई भी देख ले, इन में फटेहाल लोग नहीं चलते. वे तो खटाराओं पर चलते है जिन में डीजल पंप के सहारे चलने चाहिए और फट्टों पर लगे होते है पुलिस का डंडा और मजबूत हो इस के लिए केवल दिल्ली में 10,355 करोड़ रुपए दिए जाएंगे. अमीरों को शानबान से अपना विलासिता का सामान बेचने की जगह मिले इस के लिए दिल्ली के प्रगति मैदान को 468 करोड़ इस साल फिर दिए जाएंगे.

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वैसे तो कहा जाता है कि घरघर शौचालय बन चुके हैं पर इस बजट में एक लाइन में 3.8 करोड़ और घरों को नल का पानी पहुंचाने का पैसा नियत कर के मान लिया गया कि अभी करोड़ों घरों में पीने का पानी नहीं पहुंच रहा, वहां शौचालय कैसे बनेगा क्योंकि वहां सीवर भी नहीं होगा. गरीब पिछड़ा व दलित अपना शौच अपने घर की जमीन में बनाए और उसी जमीन से पानी निकाल कर पीए. 7 सालों में सरकार हर घरको पानी तक न दे पाए, यह कैसे संभव है. हर घर को पाखंड का व्यापार करने का पंडा तो अवश्य दे दिया गया है.

सरकार ने 2500 किलोमीटर लंबे राजमार्गों के निर्माण का पैसा दिया पर खबरदार कि इस योजना के अंतर्गत बने राजमार्गों पर किसानों की बैलगाडिय़ों या टै्रक्टर चलें या एक वाहन में 21 लोगों को बैठा कर चलने वाला छकड़ा चले. इन पर केवल फर्राटेदार एयरकंडीशंड गाडिय़ां चलेंगी, खास भारत के लिए.

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रक्षा बजट बढ़ाया गया है पर इस बहाने कितनी धांधली होगी इस का कोई अंदाज भी नहीं आ सकता. पेगेसस जैसे जासूसी करने वाला सौफ्टवेयर इसी पैसे से खरीदा जाएगा. इस पैसे से खरीदे विदेशी सामान पर नींबू मिर्च लगेगी, पंडों को ले जा कर पूजा कराई जाएगी.

पूरा बजट असल में खास भारत के लिए वैसे भारत के और सुविधाजनक बनाया जाए, इस भावना से भरा है. आम लोगों के लिए कुछ नहीं है. पिछला बजट भी ऐसा ही था और अगला भी ऐसा ही होगा, यह भी पक्का है.

मेरे पति बहुत बिजी रहते हैं, मैं क्या करूं?

सवाल

हम पत्नीपत्नी की शादी हुए 2 साल हो गए हैं और अब में प्रैग्नैंट हूं. सासससुर थे नहीं और मेरी मम्मी भी पिछले साल नहीं रहीं. पति की जौब अच्छी है लेकिन बहुत बिजी रहते हैं. कोई ऐसा नहीं जो मेरे साथ रह सके. मेरी देखभाल करे. मुझे अपने स्वास्थ्य को लेकर चिंता होने लगी है. मुझे क्या करना चाहिए और क्या नहीं?

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जवाब

आप अकेली हैं. पति बिजी रहते हैं. इसलिए अपनी प्रैग्नैंसी का ध्यान आप को स्वयं रखना पड़ेगा. आप को अपने खानेपीने का विशेष ध्यान रखना है. कोई भी ऐसी गलती न करें जिस से आप को परेशानी हो और बच्चे को खतरा रहे. जैसे, तनाव और डिप्रैशन से बचें क्योंकि इस का सीधा असर बच्चे पर पड़ सकता है. तनाव दूर करने के लिए मैडिटेशन करें. डाक्टर से उचित सलाह लेती रहें. वे पोषक तत्त्वों से युक्त हैल्दी खाने का डाइट चार्ट आप को देंगे.

आप घर पर अकेली हैं, तो घर के काम भी करने हैं लेकिन जरा ध्यान से. ज्यादा सीढि़यां न उतरें, न चढ़ें. कम वजन उठाने वाले ही काम करें. अपने को खुश रखने की कोशिश करें. अच्छी पुस्तकें पढ़ें. नियमित रूप से डाक्टरी चैकअप करवाएं. कुछ भी कौम्प्लिकेशन हो, तो डाक्टर से तुरंत मिलें.

यदि आर्थिक रूप से संबल हैं तो फुलटाइम मेड रख सकती हैं.

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Crime Story: वकील साहब का दर्द

कुसुमा ने अपने दामाद एडवोकेट विपिन कुमार निगम से वादा किया था कि अगर बड़ी बेटी उन के बच्चे की मां नहीं बनी तो वह उस के साथ अपनी छोटी बेटी काजल का विवाह कर देगी. लेकिन 4 साल बाद कुसुमा अपने वादे से मुकर गई. इस के बाद परिवार में कलह इतनी बढ़ गई कि…

सिकंदरपुर कस्बे के सुभाष नगर मोहल्ले में सुबह सवेरे यह खबर फैल गई कि विचित्र लाल के
वकील बेटे विपिन कुमार निगम ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है, जिस ने भी यह खबर सुनी, स्तब्ध रह गया. कुछ ही देर में विचित्र लाल के घर के बाहर लोगों का मजमा लग गया. लोग आपस में कानाफूसी करने लगे. इसी बीच मृतक के छोटे भाई नितिन ने फोन पर भाई के आत्महत्या कर लेने की सूचना थाना छिबरामऊ पुलिस को दे दी. यह बात 22 मई, 2020 की सुबह की है.

मामला एक वकील की आत्महत्या का था. थानाप्रभारी शैलेंद्र कुमार मिश्र ने वारदात की सूचना वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी और चौकी इंचार्ज अजब सिंह व अन्य पुलिसकर्मियों को साथ ले कर सुभाष नगर स्थित विचित्र लाल निगम के घर पहुंच गए.

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थानाप्रभारी उस कमरे में पहुंचे, जिस में विपिन कुमार निगम की लाश कमरे की छत के कुंडे से लटकी हुई थी. उन्होंने सहयोगी पुलिसकर्मियों की मदद से शव को फांसी के फंदे से नीचे उतरवाया. मृतक की उम्र 30 वर्ष के आसपास थी. मृतक की जामातलाशी ली गई तो पैंट की दाहिनी जेब से एक पर्स तथा शर्ट की ऊपरी जेब से एक मोबाइल फोन मिला. पर्स तथा मोबाइल फोन पुलिस ने अपने पास रख लिया.थानाप्रभारी शैलेंद्र कुमार मिश्र अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी अमरेंद्र प्रसाद सिंह और एएसपी विनोद कुमार भी घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया, फोरैंसिक टीम ने भी जांच कर साक्ष्य जुटाए. टीम ने उस प्लास्टिक स्टूल की भी जांच की जिस पर चढ़ कर मृतक ने गले में रस्सी का फंदा डाला था और स्टूल को पैर से गिरा दिया था.

मृतक विपिन कुमार निगम शादीशुदा था, पर घटनास्थल पर न तो उस की पत्नी प्रियंका थी और न ही प्रियंका के मातापिता और भाई में से कोई आया था. यद्यपि उन्हें सूचना सब से पहले दी गई थी. मौका ए वारदात पर मृतक का पूरा परिवार मौजूद था. मृतक के कई अधिवक्ता मित्र भी वहां आ गए थे जो परिवार वालों को धैर्य बंधा रहे थे. मित्र के खोने का उन्हें भी गहरा दुख था.पुलिस अधिकारियों ने मौके पर मौजूद मृतक के छोटे भाई नितिन कुमार से पूछताछ की तो उस ने बताया कि भैया सुबह जल्दी उठ जाते थे और केसों से संबंधित उन फाइलों का निरीक्षण करने लगते थे, जिन की उसी दिन सुनवाई होती थी.

आज सुबह 8 बजे जब मैं उन के कमरे पर पहुंचा तो कमरा बंद था और कूलर चल रहा था. यह देख कर मुझे आश्चर्य हुआ. मैं ने दरवाजा थपथपाया और आवाज दी. पर न तो दरवाजा खुला और न ही अंदर से कोई प्रतिक्रिया हुई. मन में कुछ संदेह हुआ तो मैं ने मातापिता और अन्य भाइयों को बुला लिया. उन सब ने भी आवाज दी, दरवाजा थपथपाया पर कुछ नहीं हुआ.इस के बाद हम भाइयों ने मिल कर जोर का धक्का दिया तो दरवाजे की सिटकनी खिसक गई और दरवाजा खुल गया. कमरे के अंदर का दृश्य देख कर हम लोगों की रूह कांप उठी. भैया फांसी के फंदे पर झूल रहे थे.

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इस के बाद तो घर में कोहराम मच गया. खबर फैली तो मोहल्ले के लोग आने लगे. इसी बीच हम ने घटना की जानकारी भाभी प्रियंका, रिश्तेदारों, भैया के दोस्तों और पुलिस को दी.‘‘क्या तुम बता सकते हो कि तुम्हारे भाई ने आत्महत्या क्यों की?’’ एसपी अमरेंद्र प्रसाद सिंह ने नितिन से पूछा. ‘‘सर, भैया ने पारिवारिक कलह के चलते आत्महत्या की है. दरअसल प्रियंका भाभी और उन के मायकों वालों से नहीं पटती थी. 2 दिन पहले ही भाभी ने कलह मचाई तो भैया उन्हें मायके छोड़ आए थे. उसी के बाद से वह तनाव में थे. शायद इसी तनाव में उन्होंने आत्महत्या कर ली.’’ निखिल ने बताया.

इसी बीच एएसपी विनोद कुमार ने मृतक के अंदर वाले कमरे की तलाशी कराई तो उन्हें एक सुसाइड नोट फ्रिज कवर के नीचे से तथा दूसरा सुसाइड नोट टीवी कवर के नीचे से बरामद हुआ. एक अन्य सुसाइड नोट उन के पर्स से भी मिला. यह पर्स जामातलाशी के दौरान मिला था. पर्स में पेन कार्ड, आधार कार्ड और कुछ रुपए थे.

विपिन के सुसाइड नोट

फ्रिज कवर के नीचे से जो पत्र बरामद हुआ था, उस में विपिन कुमार ने अपनी सास कुसुमा देवी को संबोधित करते हुए लिखा था, ‘सासूजी, आप ने वादा किया था कि प्रियंका 3 साल तक बच्चे को जन्म नहीं दे पाई तो आप दूसरी बेटी काजल की शादी मेरे साथ कर देंगी. पर 3 साल बाद आप मुकर गईं. इस से मुझे गहरी ठेस लगी. प्रियंका के कटु शब्दों ने मेरे दिल को छलनी कर दिया है. उस के मायके जाने के बाद मैं 2 दिन बेहद परेशान रहा. रातरात भर नहीं सोया. आखिर परेशान हो कर मैं ने अपने आप को मिटाने का निर्णय ले लिया.’ विपिन निगम.

दूसरा पत्र जो टीवी कवर के नीचे से बरामद हुआ था. वह पत्र विपिन ने अपनी पत्नी प्रियंका को संबोधित करते हुए लिखा था, ‘प्रियंका, तुम मेरे जीवन में बवंडर बन कर आई, जिस ने आते ही सब कुछ तहसनहस कर दिया. शादी के कुछ महीने बाद ही तुम रूठ कर मायके चली गईं. मांबाप के कान भर कर, झूठे आरोप लगा कर तुम ने मेरे तथा मेरे मातापिता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा दी. ‘किसी तरह मामला रफादफा कर मैं तुम्हें मना कर घर ले आया. डिलीवरी के दौरान मैं ने अपना खून दे कर तुम्हारी जान बचाई. यह बात दीगर है कि बच्चे को नहीं बचा सका. इतना सब करने के बावजूद तुम मेरी वफादार न बन सकी.
‘तुम ने कहा था कि 3 साल तक बच्चा न दे पाऊं तो मेरी छोटी बहन काजल से शादी कर लेना. पर तुम मुकर गई. लड़झगड़ कर घर चली गई. तुम सब ने मिल कर मेरी जिंदगी तबाह कर दी. अब मैं ऐसी जिंदगी से ऊब गया हूं जिस में गम ही गम हैं. —विपिन निगम.

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तीसरा पत्र जो पर्स से मिला था, विपिन ने अपनी साली काजल को संबोधित करते हुए लिखा था, ‘आई लव यू काजल, तुम मेरी मौत पर आंसू न बहाना. तुम्हारा कोई कुसूर नहीं है. तुम तो मेरी आंखों का काजल बन चुकी थीं. मुझे यह भी पता है कि तुम मुझ से शादी करने को राजी थीं. पर तुम्हारी मां मंथरा बन गई.
‘उस ने नफरत भरने के लिए दोनों बहनों के कान भरे और फिर शादी के वादे से मुकर गई. मैं तुम दोनों बहनों को खुश रखना चाहता था, लेकिन ऐसा हो न सका. मैं निराश हूं. तन्हा जीवन से मौत भली. काजल, आई लव यू. मेरी मौत पर आंसू न बहाना. तुम्हारा विपिन.’
विपिन की शर्ट की जेब से उस का मोबाइल भी बरामद हुआ था. एएसपी विनोद कुमार ने जब फोन को खंगाला तो पता चला कि विपिन ने अपनी जीवनलीला खत्म करने से पहले अपने फेसबुक एकाउंट पर शायराना अंदाज में एक पोस्ट लिखी थी.

सुसाइड नोट्स से समझ आया माजरा

विपिन के सुसाइड नोट पढ़ने के बाद पुलिस अधिकारी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि युवा अधिवक्ता विपिन कुमार निगम ने पारिवारिक कलह के कारण आत्महत्या की है. वह अपनी पत्नी प्रियंका और सास कुसुमा देवी से पीडि़त था.साक्ष्य सुरक्षित करने के बाद पुलिस ने शव पोस्टमार्टम के लिए कन्नौज के जिला अस्पताल भिजवा दिया. पुलिस जांच और मृतक के परिवार वालों द्वारा दी गई जानकारी से आत्महत्या प्रकरण की जो कहानी सामने आई उस का विवरण इस प्रकार से है—

ग्रांट ट्रंक रोड (जीटीरोड) पर बसा कन्नौज शहर कई मायने में चर्चित है. कन्नौज सुगंध की नगरी के नाम से जाना जाता है. यहां का बना इत्र फुलेल पूरी दुनिया में मशहूर है. दूसरे यह ऐतिहासिक धरोहर भी है. चंदेल वंश के राजा जयचंद की राजधानी कन्नौज ही थी. उन का किला खंडहर के रूप में आज भी दर्शनीय है. गंगा के तट पर बसा कन्नौज तंबाकू और आलू के व्यापार के लिए भी मशहूर है. पहले कन्नौज, फर्रुखाबाद जिले का एक कस्बा था, जिसे बाद में जिला बनाया गया.

इसी कन्नौज जिले का एक कस्बा सिकंदरपुर है, जो छिबरामऊ थाने के अंतर्गत आता है. इसी कस्बे के सुभाष नगर मोहल्ले में विचित्र लाल निगम अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी सरिता निगम के अलावा 4 बेटे थे. जिस में विपिन कुमार निगम सब से बड़ा तथा नितिन कुमार सब से छोटा था. विचित्र लाल व्यापारी थे, आर्थिक स्थिति मजबूत थी. कायस्थ बिरादरी में उन की अच्छी पैठ थी.
विपिन कुमार निगम अपने अन्य भाइयों से कुछ ज्यादा ही तेजतर्रार था. वह वकील बनना चाहता था. उस ने छत्रपति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर से एलएलबी की पढ़ाई की.

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इस के बाद वह छिबरामऊ तहसील में वकालत करने लगा. विपिन कुमार निगम दीवानी और फौजदारी दोनों तरह के मुकदमे लड़ता था. कुछ दिनों बाद उस के पास अच्छेखासे केस आने लगे थे. उस ने तहसील में अपना चैंबर बनवा लिया और 2 सहयोगी कर्मियों को भी रख लिया.विपिन कुमार निगम अच्छा कमाने लगा तो उस के पिता विचित्र लाल ने 6 जनवरी, 2014 को औरैया जिले के उजैता गांव के रहने वाले राजू निगम की बेटी प्रियंका से शादी कर दी. राजू निगम किसान थे. उन के 2 बेटियां और एक बेटा था, जिन में प्रियंका सब से बड़ी थी.

खूबसूरत प्रियंका, विपिन की दुलहन बन कर ससुराल आई तो सभी खुश थे, पर प्रियंका खुश नहीं थी. उसे शोरगुल पसंद नहीं था. यद्यपि उसे पति से कोई शिकवा शिकायत न थी. प्रियंका ससुराल में 10 दिन रही. उस के बाद उस का भाई आकाश आया और उसे विदा करा ले गया.
प्रियंका ने दिखाए ससुराल में तेवर

लगभग 2 महीने बाद प्रियंका दोबारा ससुराल आई तो उस ने अपना असली रूप दिखाना शुरू कर दिया. वह सासससुर से कटु भाषा बोलने लगी, देवरों को झिड़कने लगी. सास सरिता बेस्वाद खाना बनाने को ले कर टोकती तो जवाब देती कि स्वादिष्ट खाना बनाने को नौकरानी रख लो. घर के काम के लिए कहती तो जवाब मिलता कि वह नौकरानी नहीं, घर की बहू है.

यही नहीं उस ने दहेज में मिला सामान पलंग, टीवी, फ्रिज, अलमारी पहली मंजिल पर बने 2 बड़े कमरों में सजा लिया और एक तरह से परिवार से अलग रहने लगी. इसी बीच उस
के पैर भारी हो गए. ससुराल वालों के लिए यह खबर खुशी की थी लेकिन उस के दुर्व्यवहार के कारण किसी ने खुशी जाहिर नहीं की.विपिन परिवार के प्रति पत्नी के दुर्व्यवहार से दुखी था. उस ने प्रियंका पर सख्ती कर लगाम कसने की कोशिश की तो वह त्रिया चरित्र दिखाने लगी. अपनी मां कुसुमा को रोरो कर बताती कि ससुराल वाले उसे प्रताडि़त करते हैं. मां ने भी बेटी की बातों पर सहज ही विश्वास कर लिया और उसे मायके बुला लिया.

इस के बाद मांबेटी ने सोचीसमझी रणनीति के तहत ससुराल वालों पर झूठे आरोप लगा कर थाना फफूंद में दहेज उत्पीड़न की रिपोर्ट दर्ज करा दी. जब विपिन को पत्नी द्वारा रिपोर्ट दर्ज कराने की जानकारी हुई तो वह सतर्क हो गया. वह ससुराल पहुंचा और किसी तरह पत्नी व सास का गुस्सा शांत किया, जिस से फिर मुकदमे में समझौता हो गया. इस के बाद कई शर्तों के साथ कुसुमा देवी ने प्रियंका को ससुराल भेज दिया. ससुराल आ कर प्रियंका स्वच्छंद हो कर रहने लगी. उस ने पति को भी अपनी मुट्ठी में कर लिया था.
फिर जब प्रसव का समय आया तो प्रियंका मायके आ गई. कुसुमा ने उसे प्रसव के लिए इटावा के एक निजी नर्सिंग होम में भरती कराया. डाक्टरों ने उस का चेकअप किया तो खून की कमी बताई. और यह भी साफ कर दिया कि बच्चा औपरेशन से होगा.

कुसुमा चालाक औरत थी. वह जानती थी कि नर्सिंग होम का खर्चा ज्यादा आएगा. अत: उस ने दामाद विपिन को पहले ही नर्सिंग होम बुलवा लिया था. 9 जनवरी, 2015 को विपिन ने अपना खून दे कर प्रियंका की जान तो बचा ली, लेकिन बच्चा नहीं बच सका. लगभग एक हफ्ते तक अस्पताल में भरती रहने के बाद प्रियंका मां के घर आ गई. डिस्चार्ज के दौरान डाक्टर ने एक और चौंकाने वाली जानकारी दी कि प्रियंका दोबारा मां नहीं बन पाएगी.

यह जानकारी जब विपिन व प्रियंका को हुई तो दोनों दुखी हुए. इस पर सास कुसुमा ने बेटी दामाद को समझाया और कहा, ‘‘कुदरत का खेल निराला होता है, फिर भी यदि 3 साल तक प्रियंका बच्चे को जन्म न दे पाई तो मैं वादा करती हूं कि अपनी छोटी बेटी काजल का विवाह तुम्हारे साथ कर दूंगी.’’
सासू मां की बात सुन कर विपिन मन ही मन खुश हुआ. प्रियंका व काजल ने भी अपनी सहमति जता दी. इस के बाद प्रियंका पति के साथ ससुराल में आ कर रहने लगी. विपिन कुमार भी अपने वकालत के काम में व्यस्त हो गया. प्रियंका कुछ माह ससुराल में रहती तो एकदो माह के लिए मायके चली जाती. इसी तरह समय बीतने लगा.

प्रियंका के रहते विपिन के मन में पहले कभी भी साली के प्रति आकर्षण नहीं रहा, किंतु जब से सासू मां ने शादी करने की बात कही तब से उस के मन में काजल का खयाल आने लगा था. 17वां बसंत पार कर चुकी काजल की काया कंचन सी खिल चुकी थी. उस की आंखें शरारत करने लगी थीं. काजल का खिला रूप विपिन की आंखों में बस गया. अब वह उस से खुल कर हंसीमजाक करने लगा था. काजल की सोच भी बदल गई थी. वह जीजा के हंसीमजाक का बुरा नहीं मानती थी. दरअसल वह मान बैठी थी कि दीदी यदि बच्चे को जन्म न दे पाई तो विपिन उस का जीजा नहीं भावी पति होगा.

पत्नी और ससुरालियों के बयान से  टूट गया विपिन

धीरेधीरे 3 साल बीत गए पर प्रियंका बच्चे को जन्म नहीं दे पाई. तब विपिन ने सासू मां से कहना शुरू किया कि वह वादे के अनुसार काजल की शादी उस से कर दे लेकिन कुसुमा देवी उसे किसी न किसी बहाने टाल देती. इस तरह एक साल और बीत गया. विपिन को अब दाल में कुछ काला नजर आने लगा. अत: एक रोज वह ससुराल पहुंचा और सासू मां पर शादी का दबाव डाला, इस पर वह बिफर पड़ी, ‘‘कान खोल कर सुन लो दामादजी, मैं अपनी फूल सी बेटी का ब्याह तुम से नहीं कर सकती.’’‘‘पर आप ने तो वादा किया था. इस में आप की दोनों बेटियां रजामंद थीं.’’ विपिन गिड़गिड़ाया.

‘‘रजामंदी तब थी, पर अब नहीं. प्रियंका भी नहीं चाहती कि काजल की शादी तुम से हो.’’ कुसुमा ने दोटूक जवाब दिया.इस के बाद विपिन वापस घर आ गया. उस ने इस बाबत प्रियंका से बात की तो उस ने मां की बात का समर्थन किया. इस के बाद काजल से शादी को ले कर विपिन का झगड़ा प्रियंका से होने लगा. 18 मई, 2020 को भी प्रियंका और विपिन में झगड़ा हुआ. उस के बाद वह प्रियंका को उस के मायके छोड़ आया.पत्नी मायके चली गई तो विपिन कुमार तन्हा हो गया. उसे सारा जहान सूनासूना सा लगने लगा. उस की रातों की नींद हराम हो गई. वह बात करने के लिए पत्नी को फोन मिलाता, पर वह बात नहीं करती.

विपिन जब बेहद परेशान हो उठा, तब उस ने आखिरी फैसला मौत का चुना. उस ने 3 पत्र कुसुमा देवी, प्रियंका तथा काजल के नाम लिखे. काजल को लिखा पत्र उस ने अपने पर्स में रख लिया और सास को लिखा पत्र फ्रिज कवर के नीचे व पत्नी को लिखा पत्र टीवी कवर के नीचे रख दिया.21 मई, 2020 की आधी रात के बाद अधिवक्ता विपिन कुमार निगम ने अपनी जीवन लीला खत्म करने से पहले अपने फेसबुक एकाउंट में एक पोस्ट डाली. फिर कमरे की छत के कुंडे में रस्सी बांध कर फंदा बनाया और फिर स्टूल पर चढ़ कर फांसी का फंदा गले में डाल कर झूल गया. इधर सुबह घटना की जानकारी तब हुई जब विपिन का छोटा भाई नितिन कमरे पर पहुंचा.

मृतक विपिन कुमार निगम ने अपने सुसाइड नोट मे अपनी मौत का जिम्मेदार अपनी सास कुसुम देवी और पत्नी प्रियंका को ठहराया था, लेकिन मृतक के घर वालों ने कोई तहरीर थाने में नहीं दी जिस से पुलिस ने मुकदमा ही दर्ज नहीं किया और इस प्रकरण को खत्म कर दिया.

Valentine’s Special: रिश्तों में सौदा नहीं

हाल ही में सुदीप की शादी हुई. सब को लड़की बहुत पसंद आई. अच्छे होटल में दावत… सबकुछ लड़के वालों के स्तर के अनुरूप ही था. पर ज्यादातर लोग दबी जबान से कह रहे थे, डाक्टर साहब (लड़के के पिता) ने रिश्ता बराबरी में नहीं किया. लड़की के पिता की फोटोग्राफी की दुकान थी और वे गूंगेबहरे भी थे. डाक्टर साहब ने कहा कि लड़की उन्हें पसंद आई और लड़की वालों ने हमारे स्तर के अनुरूप शादी कर दी, इस से ज्यादा हमें कुछ नहीं चाहिए. लोगों को जो कहना है, कहते रहें. उन्होंने घर वालों और कुछ समय बाद प्यार से बहू को भी यह बात समझा दी. बहू बहुत खुश हुई.

अंतर पता होता है

किन्हीं भी 2 परिवारों में अंतर होता है तो वह दिखता है. लेकिन कुछ लोग उसे कहे बिना चैन से रह नहीं पाते. कुछ कहते नहीं तो दबी जबान से बातें बनाते रहते हैं. किसी न किसी तरह जताने का मौका हाथ से गंवाना नहीं चाहते. कुछ हां में हां मिला कर ही ऐसे लोगों को उकसाते हैं. बहुत कम लोग ही प्रतिरोध करते हैं. सुमन को किसी ने कहा तो वह बोली कि यह विचार करना हमारा काम नहीं. आजकल लड़कालड़की अपनी पसंद से शादी करते हैं, उन्होंने विचार किया होगा. शैलजा ने बेटे की शादी के निर्णय पर कहा कि स्तर तो सोचने की बात है. हमारे घर आ कर वह लड़की हमारे ही स्तर की हो जाएगी. बहुत मुश्किल से बेटा माना पर आज खुश है.

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सुनीता कहती है, ‘‘मुझे इसलिए भी रोहन से ज्यादा प्यार हो गया क्योंकि वह बारबार अपने स्तर के कम होने की बात कहकह कर मुझे समझाता रहा. मैं ही उस के प्यार में पड़ी रही. खैर, उस ने बहुत मेहनत की और आज अच्छा जीवन स्तर बना लिया है. अब सब कहते हैं, हमारा प्यार सच्चा है.’’

अंतर तो हर जगह है

आमतौर पर जीवन स्तर का अंतर आर्थिक या ओहदे आदि का हो तो साफ दिखता है. 2 बराबर या मामूली कमज्यादा दिखने वाले परिवारों में भी अंतर होता है पर वह न ज्यादा दिखता है न चर्चा का विषय बनता है. शिक्षा के चलते मानसिक स्तर का अंतर भी होता है पर लोग उसे पैसे या ऐसे ही किसी अन्य कारण से बराबर समझ लेते हैं. इसी तरह की कई समायोजनशीलताएं रिश्तों में सफलता का आधार बन जाती हैं.

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सिरिल कहता है, ‘‘मेरे भाई का 2 बार तलाक हो गया. तीसरी शादी उस ने बहुत अंतर वाले परिवार में की. गरीब घर की लड़की निभा रही है. उस की अपनी वरीयताएं हैं. वह काम से काम रखती है. निरर्थक शकशुबहा उस में नहीं है. दूसरी बीवी हर समय इसी ताकझांक में रहती थी कि पहली बीवी के संपर्क में तो नहीं. उस के बच्चों पर तो तनख्वाह नहीं लुटा रहा.’’

रमा व पति में शिक्षा का अंतर था पर गाड़ी अच्छी निभी. पति व्यस्त रहते, ऐसे में एक व्यक्ति घर देखने लायक भी होना चाहिए. उन के दोस्तों की गृहस्थी चिटक गई. उन दोनों की हाईफाई नौकरी थी, ऐसे में कौन त्याग की पहल करे. रमा के पति कहते हैं मुझे रमा का स्वभाव पसंद आ गया. इस में जो अपनापन देखा वह मुझे अपनी शिक्षा से बेहतर लगा.

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अंतर पाटा जा सकता है

एक वैज्ञानिक महोदय के मांबाप ने उन की जबरन शादी कर दी. बहुत समय वे पत्नी से न मिले न बोले. एक दिन पत्नी दफ्तर पहुंच गई. उन से पूछा, ‘‘देखिए, मुझे साफ बताइए, आप मुझे रखना चाहते हैं या नहीं. वरना मैं आगे की सोचूं.’’

वैज्ञानिक महोदय कहते हैं, ‘‘मैं उस की बेबाकी और स्पष्टवादिता पर दंग था. मैं उसी क्षण उस पर मरमिटा. इतना पढ़लिख कर भी मैं अपने मांबाप से इतना स्पष्ट न कह सका. फिर भी मेरा ईगो आड़े आ गया. मैं ने कहा, ‘इसी बात पर हम में निर्वाह हो सकता है कि आप भी आगे पढ़ाई करें.’ वह मान गई. बीए तक पढ़ाई कर ली. आज हम खुश हैं. हम ने स्तर का सही मतलब ठीक से समझ लिया है.’’स्तर तो कभी भी घट सकता है और बढ़ सकता है. एक समय सरोज की ससुराल गांव में थी. उस के मांबाप को इसी बात का मलाल था. पर आज कोलकाता जैसे शहर में उन के 2 मकान हैं. गांव के कई गरीबों की वह मदद करती है.

स्तर का फंडा क्यों

शुरू से ही समाज में शादीब्याह, दोस्ती, संबंध समान लोगों में करने की बात कही गई है. इस से निर्वाह अच्छा होता है. यह बात काफी हद तक सही भी है. आजकल शादियां शक्ति प्रदर्शन होती जा रही हैं. ऐसे में सामने वाला भी वैसा न हो तो वह बरात का ही स्वागत नहीं कर पाएगा. इन्हीं बातों के फेर में बहुत सी बातें जो ज्यादा जरूरी होती हैं, छूट जाती हैं. श्रीमती शीला कहती हैं, ‘‘यह स्तर दिखावे में काम आता है कि लोग कह सकें हमें इतना अच्छा, हमारे जैसा या हम से सवाया परिवार मिला.’’

बराबरी सिर्फ पैसे की

कुमारी ने अपने से कम पढ़ेलिखे व पैसे वाले व्यक्ति से शादी का निर्णय लिया तो घर में प्रलय आ गई. उसे तरहतरह से समझाया गया. उस ने कहा, बराबरी डिगरी, ओहदों या पैसे से ही नहीं होती. लड़का गरीबी के कारण अच्छे अवसर न पा सका फिर भी यहां तक पहुंचा. मैं इस से चारगुना सुविधा पा कर भी वहां तक न पहुंच सकी. इस में खूब कर गुजरने की क्षमता है.

खैर, उस का निर्णय माना गया और आज वह परिवार इस शादी पर गर्व करता है. बड़े धनीमानी स्तरीय व्यक्ति भी शुरू से ही वैसे नहीं होते. बहुत मेहनत तथा संघर्ष से मुकाम पाते हैं जो विरासत में ये सब पाते हैं वे भी मेहनत न करें तो उस स्तर तथा मुकाम पर बने नहीं रह सकते.

बहुत बड़ा अंतर

दीप्ति की शादी बहुत अमीर घर में हो रही थी पर पति 20 वर्ष बड़ा था. उस ने मना कर दिया. उसे सब ने समझाया कि पूरे घर का स्तर बढ़ जाएगा, उबर जाएगा पर वह नहीं मानी. उसे हमउम्र पति चाहिए. बाकी कमियां वे पूरी कर लेंगे. बात खत्म हो गई. दोचार लोग अड़े रहे तो उस ने साफ कहा, ‘पूरे खानदान का स्तर उठाने का उस ने ठेका नहीं ले रखा है.’

आज वह सामान्य परिवार के युवक के साथ बहुत खुश है. आजकल एक जैसी पढ़ाई, स्तर, रंगरूप के बावजूद तलाक बढ़ते जा रहे हैं. हम लोग यह भूलते जा रहे हैं कि बाहरी स्तर के अलावा आंतरिक प्रकृति, गुण, स्वभाव, कर्म आदि का भी बहुत बड़ा योगदान होता है. एकदम भीतर से किसी को जानना संभव नहीं पर आज ज्यादातर लोग इस का प्रयास ही नहीं करते. साधन संपन्नता, अपटूडेसी से ही बराबरी का स्तर मान लिया जाता है. बहुत शादियों में इसीलिए धोखा भी होता है.

बेहतर यही है कि व्यक्तित्व का अनुकूलन, स्वीकार्यता सकारात्मकता शादी का आधार बने. ऐसा होगा तो शादी में स्थायित्व और आनंद बना रहेगा. बाहरी स्तर बनाना या मेंटेन करना भीतरी व्यक्तित्व की अपेक्षा ज्यादा आसान होता है, यदि कहीं जरूरत हो तो.

परंपरागत मान्यता

अकसर कहा जाता रहा है कि अपने से छोटे घर की लड़की लो और अपने से बड़े घर में दो. इस में भी स्तर का अंतर तो रहता ही है. इस संबंध में कई मैरिज ब्यूरो से बात हुई. इस बारे में योगेंद्र शुक्ल कहते हैं, ‘‘शादियों के लिए इन केंद्रों में आने वाले ज्यादातर लोग अपने से ऊंचे स्तर के रिश्ते की बात करते हैं. पहले की तरह गुणी, सुशील, खानदानी रिश्ते की जगह पढ़ाई, पैकेज और पैसा लेता जा रहा है.’’

मनोचिकित्सक नीलेश तिवारी कहते हैं कि बहुत ज्यादा स्टैंडर्ड कौन्शसनैस समाज में आती जा रही है, इस का मुख्य कारण भौतिकता है. जीवन से मूल्य लुप्त होते जा रहे हैं. इसी कारण समान स्तर तक की शादियां मनमरजी से होने के बावजूद नहीं निभ रही हैं. लोग सोचते हैं स्तरीय व्यक्ति से अपेक्षाएं पूरी होंगी पर वे भूल जाते हैं कि उस व्यक्ति की भी अपेक्षाएं हैं. स्तर के कारण अहम, दंभ भी हावी रहते हैं. आप को पता होना चाहिए कि आप क्या हैं और आप को क्या चाहिए. स्पष्टता, ईमानदारी और खूब सोचसमझ कर किया गया रिश्ता कमज्यादा स्तर दोनों में खूब निभता है, चलता है, अनुकरणीय दांपत्य वाला रहता है.

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