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बिहार टू मुंबई: छोटे परदे से बॉलीवुड तक, जानें कैसा रहा टीवी के ‘कर्ण’ का सफर

सिनेमा का आकर्षण हर युवक युवती को छोटे छोटे गांवों व कस्बों से खींचकर ले आता है. हर दिन सैकड़ों युवक युवतियां बौलीवुड में कुछ बड़ा करने का सपना लेकर पहुंचते रहते हैं. मुंबई पहुंचने के बाद उनके संघर्ष का एक अनवरत सिलसिला चल पड़ता है. यूं तो हिंदी भाषा की फिल्में बनाने वाले बौलीवुड में हर किसी को संघर्ष करना पड़ता है. मगर उत्तर भारत यानी कि उत्तर प्रदेश व बिहार के ग्रामीण इलाकों व छोटे कस्बों में हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूलों से शिक्षा ग्रहण कर बौलीवुड में कुछ बड़ा करने का सपना लेकर आने वालों का यह संघर्ष कुछ ज्यादा ही कठिन व लंबा हो जाता है. इसी कड़ी में हम अभिनेता अहम शर्मा की चर्चा कर सकते हैं.

बिहार के सालिमपुर गांव में जन्में व पले बढ़े अहम शर्मा स्पोर्ट्स मैन बनना चाहते थे. पर उनका यह सपना पूरा न हो पाया. उसके बाद दोस्तों की सलाह पर अभिनय जगत में नाम कमाने के लिए मुंबई की राह पकड़ी. मुंबई में लंबा संघर्ष करने के बाद उन्हें फिल्म ब्लू आरेंज मिली. पर कैरियर में प्रगति नहीं हुई कुछ दूसरे सीरियल मिले पर बात नहीं बनी. लेकिन जब उन्होंने सिद्धार्थ तिवारी निर्मित सीरियल महाभारत में कर्ण का किरदार निभाया तो उन्हें जबरदस्त शोहरत मिली फिर उन्हें अति संजीदा विषय पर चाउ पार्था बोर्गोहेन निर्देशित फिल्म 1962रू माई कंट्री लैंड में हीरो बनने का अवसर मिला.

फिल्म कॉन्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में दिखायी गयी. इन दिनों अहम शर्मा अपनी फिल्म धूप छांव को लेकर चर्चा में हैं. सचित जैन निर्मित व हेमंत सरन निर्देशित फिल्म धूप छांव में अहम शर्मा की जोड़ी समीक्षा भटनागर के संग हैं.

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प्रस्तुत है अहम शर्मा से हुई एक्सक्लूसिव बातचीत के खास अंश…

सवाल- आप अपनी पृष्ठभूमि पर रोशनी डालेंगें?

जवाब- मैं बिहार में पटना जिले के अंदर आने वाले छोटे से गांव सालिमपुर का रहने वाला हूं. मेरी शिक्षा मेरे गांव के ही ग्रामीण परिवेश वाले हिंदी माध्यम के सरकारी स्कूल में हुई. मैंने दसवीं तक ग्रामीण स्कूल में ही शिक्षा ग्रहण की और हमारा स्कूल दूसरे सरकारी ग्रामीण स्कूलों जैसा ही थाण्दसवीं के बाद आगे की पढ़ाई के लिए हमें पटना जाना पड़ा. दसवीं तक हम सामान्य ढंग से पढ़ते रहे. ऐसा कुछ उल्लेखनीय नहीं रहा जिसकी चर्चा की जाएगी. जब हम स्कूल में पढ़ रहे थे. तब हमारे गांव के स्कूल में खेलों को कुछ ज्यादा ही प्रोत्साहन दिया जाता था. पर अब तो वह भी कम हो गया है. बहुत ही आम व सामान्य सा माहौल स्कूल में था. गांव से पटना फिर इंदौर उसके बाद दिल्ली होते हुए मुंबई फिल्म नगरी में पहुंच गया.

सवाल- तो आप शुरू से ही अभिनेता बनना चाहते थे?

जवाब- जी नहीं जैसा कि हमने पहले बताया कि हमारे ग्रामीण स्कूल में पढ़ाई की बनिस्बत खेलों का माहौल ज्यादा था. गांव में परवरिश और ग्रामीण स्कूल में पढ़ाई के चलते खेलों में मेरी रूचि ज्यादा बढ़ी. मैं हर तरह के खेल खेलता था. फुटबाल बैडमिंटन खेलता था. मुझे लगता है कि स्पोर्ट्स मेरे अंदर नेचुरली था. इसलिए बहुत जल्द मैं हर खेल सीख लेता था. पहले खेल ही मेरा पैशन था. और मैं स्पोर्टस मैन बनकर कुछ बड़ा काम करने व शोहरत पाने का सपना देखने लगा था. मगर बहुत जल्द हमें अहसास हुआ कि खेल जगत में मेरे लिए आगे बढ़ने का कोई स्कोप नहीं है. जिसके चलते कुछ बड़ा करने का मेरा सपना अधूरा रह गया था. यूं तो हम आम नौकरी करते हुए एक अच्छी जिंदगी जीते हैं. एक सफल जिंदगी जीते हैं. जिसकी अहमियत काफी है. लेकिन जब आपका पैशन या सपना हो जाता है कि किसी क्षेत्र में नाम बनाना है. शोहरत पानी है तो मैं भी स्पोर्टसमैन के रूप में अपना नाम कमाना चाहता था. मगर यह हो नहीं पाया. तब मैंने पढ़ाई पर ध्यान दिया. स्नातक की पढ़ाई के दौरान लोगों ने कहना शुरू किया कि मुझे माडलिंग करनी चाहिए. कुछ दोस्तों ने कहा कि मुझे अभिनय करना चाहिए. तब मैने अभिनय की तैयारी की और मुंबई आ गया. मुंबई में जिस तरह से मौके मिलते रहे. मैं काम करता गया. हिंदी माध्यम में पढ़ाई करने की वजह से मुंबई आने पर कुछ समस्या आयी.

सच यह है कि गांव से बाहर निकलने के बाद काम की तलाश करना हो या कुछ नया सीखना हो तो समस्या आ रही थी. हर जगह अंग्रेजी का ही बोलबाला था फिल्म इंडस्ट्री में भी लोग अंग्रेजी में ही ज्यादा बातें करते हैं. इसलिए फिर हमने अंग्रेजी भाषा सीखनी शुरू किया.

सवाल- आप ग्लैमर व शोहरत के वशीभूत होकर ही बौलीवुड से जुड़ने के लिए मुंबई आए होंगे?

जवाब- यूं तो हर इंसान ग्लैमर के वशीभूत या आकर्षित होकर अभिनय को चुनता है. बतौर अभिनेता जो शोहरत नाम व पहचान मिलती है. उसी के वशीभूत होकर मैं भी अभिनेता बनने के लिए मुंबई आया. मगर मुंबई पहुंचने और अभिनय के लिए दौड़ भाग करने के बाद मैने अहसास किया कि अभिनय बहुत ही ज्यादा गंभीर मसला है अभिनय की विधा जो है वह महत्वपूर्ण है उसके बाद अभिनय यानी कि कला के प्रति मेरा रूझान काफी गंभीर होता गया. अब मुझे अहसास होता है कि नेम फेम पापुलैरिटी यह सब बायप्रोडक्ट हैं. असल में अभिनय एक ऐसी विधा है. जहां हमें काम को इंज्वॉय करना आना चाहिए. यह आप तभी कर सकते हैं. जब आप अपने काम को बखूबी जानते हो. लोगों की नजर में वह जो कुछ सिनेमा के परदे पर देखते हैं. वही अभिनय है मगर उसके पीछे की गहराई को समझना अत्यंत आवश्यक है. जिसे कई बार हम समझ नहीं पाते.

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सवाल- अभिनय के क्षेत्र में उतरने से पहले किस तरह की तैयारी की?

जवाब- मैंने अभिनय की ट्रेनिंग ली. लेकिन मगर मेरे पास उस हिसाब से धन वक्त व माहौल नहीं था. उस वक्त अभिनय करते हुए खुद को जल्द से जल्द अपने पैरों पर खड़ा करना जरुरी था. इसलिए मैं पुणे फिल्म संस्थान या नाट्य विद्यालय नहीं जा सका. मैं खुशकिस्मत रहा कि मुंबई पहुंचते ही मुझे 2009 में राजेश गांगुली निर्देशित फिल्म ब्लू आरेंजेस मिल गयी थी. इसमें मैंने लीड किरदार निभाया था. इस जासूसी कहानी वाली फिल्म में मैंने अभिनेत्री पूजा कंवल के पूर्व प्रेमी का किरदार निभाया था. इसके बाद मुझे गुल खान का सीरियल चांद के पार चलो मिल गया. उन दिनों छोटी फिल्मों का दौर ज्यादा नही था. अब तो हर तरह की फिल्मों के दर्शक हैं और लोग हर तरह की फिल्में देख भी रहे हैं. खैर ब्लू आरेंजेस काफी बेहतरीन फिल्म थी. पर लोगों तक यह फिल्म नहीं पहुंच सकी. फिर मैंने सिद्धार्थ तिवारी के सीरियल महाभारत में दानवीर कर्ण का किरदार निभाया. फिर मैंने फिल्म माई कंटी लैंड किया. जिसे कॉन्स इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में सराहा गया. मगर यह अभी तक सिनेमाघरों नहीं पहुंची.

सवाल- लेकिन उसके बाद आपने पुनः अभिनय सीखा?

जवाब- मुझे अहसास होने लगा कि मैं अभिनेता बनने आया हूं और अभी मुझे काफी कुछ सीखना है. उस वक्त तक जेब में कुछ पैसे आ गए थे. तब मैंने कुछ एक्टिंग वर्कशॉप किए. थिएटर तो पहले ही कर चुका था. अभिनय में परिपक्वता की जरुरत महसूस हो रही थी. अविजित दास हैं, जो कि लंदन से पढ़ाई करके आए हैं. उनसे मैंने छह माह का एक्टिंग वर्कशॉप किया. यह मेरे लिए आई ओपनिंग अनुभव रहा. फिर मैंने इंडो ब्रिटिश एक्टिंग कोच दलीप सोंधी से अभिनय सीखा. इन दिनों दलीप सोंधी आस्ट्रेलिया में एक्टिंग की कोचिंग चलाते हैं. उनके साथ समय बिताया. फिर कई किताबें पढ़ी. ऑनलाइन कई वीडियो देखे. यह सारी चीजें तभी मदद करती हैं. जब आपके अंदर ग्रहण करने की बेसिक क्षमता हो. हम अनुभवों से ही सीखते हैं. फिर धीरे धीरे कला की समझ बढ़ती जाती है. अब कला को और अधिक जानने व गहरे उतरने की जिज्ञासा बढ़ती ही जा रही है.

सवाल- सीरियल महाभारत में कर्ण का किरदार निभाने से मिली शोहरत का कोई असर नहीं हुआ?

जवाब- सीरियल महाभारत में मेरे द्वारा निभाए गए कर्ण के किरदार को काफी पसंद किया गया था. उसके बाद मुझे 1962 माई कंट्री लैंड मिली थी. कॉन्स इंटरनेशनल फेस्टिवल में इसे काफी सरहा गया. पर अभी तक यह सिनेमाघर नहीं पहुंची. यह फिल्म संजीदा मुद्दे पर थी. हो सकता है कि राजनीतिक स्तर पर इसे रोक दिया गया हो. रोचक कहानी है. युद्ध से उत्तर पूर्व का जो नेता बार्डर या मैकमोहन रेखा है. यह भारत चीन सीमा पर है. यह अभी भी डीमार्केटेड नहीं है. इसलिए लोग एक दूसरे की सीमा में अक्सर चले जाते हैं. यह फिल्म फैक्ट व फिक्शन पर आधारित थी. आर्मी में आसाम का एक लड़का है. उससे कहा जाता है कि वह मैप के अनुसार डीमार्केट करके लाए. लेकिन वह रास्ता भटककर ऐसी जगह पहुंच जाता है. जो कि नो मैन्स लैंड है. यह भारत या चीन दोनों देश की सीमा में नहीं आता वहां पर कुछ चीनी एजेंट होते हैं. जो कि लोगों को बरगला रहे होते हैं. उसे एक लड़की मिलती है. जिसके प्यार में वह पड़ जाता है. किस तरह वह उसकी चालों से बचता है. फिर चीन भारत युद्ध शुरू हो जाता है. यह युद्धबंदी हो जाता है. बहुत प्यारी कहानी है इस फिल्म की. मैं इस फिल्म को लेकर काफी उत्साहित था. मगर कॉन्स फिल्म फेस्टिवल के बाद इस फिल्म का क्या हुआ. कुछ पता ही नहीं चला. वैसे एक सीरियल की शूटिंग में व्यस्तता के चलते मैं खुद कॉन्स में नहीं जा पाया था.

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जब अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल में सराही जा चुकी फिल्म प्रदर्शित न हो सके तो कलाकार के कैरियर पर किस तरह का असर पड़ता है. हम एक फिल्म के निर्माण में समय देने के साथ ही मेंटली व फिजिकली जुड़ते हैं. पर वह फिल्म प्रदर्शित न हो सके तो तकलीफ होती है. हर कलाकार को उम्मीद होती है कि फिल्म लोगों तक पहुंचेगी और उसका काम भी लोगों तक पहुंचेगा. उसके आधार पर कैरियर आगे बढ़ेगा. जब फिल्म प्रदर्शित नहीं होती तो नाउम्मीदी होती है. नए सिरे से संघर्ष शुरू होता है पर जिंदगी का मकसद होना चाहिए कि अपनी तरफ से काम करते रहोण्हर काम को अपनी तरफ से अच्छा करते रहो पर कोशिश करते रहना चाहिए कि काम होता रहे. उसका अच्छा परिणाम आता रहे. बहरहाल मेरी मेहनत रंग ला रही है. अब मुझे हेमंत सरन निर्देशित फिल्म धूप छांव के प्रदर्शन का बेसब्री से इंतजार है.

सवाल- फिल्म धूप छांव करने की वजह क्या रही?

जवाब- सच तो यही है कि कोरोना महामारी के दौरान जब मुझे काम चाहिए था. तभी मेरे पास धूप छांव का आफर आया. फिलहाल मैं उस मुकाम पर नही हूं कि चूजी हो जाउं मगर मैं सब कुछ नही कर सकता. मैं अपनी तरफ से अच्छी फिल्में या सीरियल ही चुनने का प्रयास करता हूं. जब मेरे पास फिल्म धूप छांव का आफर आया. तो यह मुझे काफी अलग लगा. इसमें एक साधारण सी पारिवारिक कहानी व रिश्तों की जटिलता की बात है. इसके साथ सभी रिलेट कर सकेंगें. मेरा किरदार मेरे व्यक्तित्व से अलग साधारण है. मैं किसी भी किरदार को निभाने से पहले यह भी देखता हूं कि क्या इसमें मेरे अंदर का कोई दूसरा पहलू भी आ रहा है. तो धूप छांव में मैंने पाया कि मैंने इससे पहले इस तरह का किरदार नहीं निभाया है.

इस फिल्म में मैंने एक ऐसे लड़के का किरदार निभाया है जो कि बनावटीपना से परे है. यह एकदम रीयल ए भोला व सरल है. यह ऐसे पारिवारिक जॉनर की फिल्म है. जिस पर पिछले लंबे समय से कोई फिल्म नहीं बनी है. यह फिल्म पारिवारिक रिश्तों के बारे में है.

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सवाल- दर्शक के तौर पर आप धूप छांव क्यों देखना चाहेंगे?

जवाब- दर्शक एक साधारण फील गुड कहानी देखने के लिए धूप छांव देखना चाहेगा यह फिल्म हर दर्शक को रिश्तों की अहमियत का अहसास कराएगी. हर इंसान को समझ में आएगा कि जीवन में हर रिश्ते को तवज्जो देना कितना आवश्यक है.

सवाल- आप धूप छांव के अपने किरदार को किस तरह से परिभाषित करेंगें?

जवाब- मैंने इसमें अमन का किरदार निभाया है. जो कि परिवार के दो लड़कों में सबसे बड़ा है. अपनी जिंदगी में अमन कुछ हासिल नहीं कर पाया. लेकिन फिर भी वह जीवन में अपने उसूलों व आदर्शों से समझौता नहीं करता. वह अपने तरीके से जिंदगी जीना चाहता है. वह शॉर्ट कट रास्ते से कहीं भी नहीं पहुंचना चाहता. वह मेहनत करने में यकीन करता है. उसकी सोच के मुताबिक चीजे होती हैं. मगर उसके लिए उसे क्या खामियाजा भुगतना पड़ता है. यह सब इसमें नजर आएगा.

कभी आप स्पोर्टस के क्षेत्र में कुछ करना चाहते थे. पर अब आपकी बतौर अभिनेता एक पहचान बन गयी है तो क्या स्पोर्ट्स मैन न बन पाने का अफसोस है.

देखिए आप कब तक कितना अफसोस करते रहेंगे, जो चीज नहीं हो पायी उसके बारे में सोच के क्या फायदा दूसरी बात ऐसा भी नहीं है कि मैं स्पोर्ट्स के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ गया था और फिर पीछे लौटना पड़ा. हां! जब स्पोर्ट्स के क्षेत्र में कुछ नहीं कर पाया था उस वक्त दुःख हुआ था. मगर अब उस पड़ाव से काफी आगे निकल चुका हूं अब मैं उसके बारे में नहीं सोचता पर जब अहसास हुआ था कि कुछ भी कर लूं पर स्पोर्ट्स में अब आगे नहीं बढ़ पाउंगा तब बहुत दुःख हुआ था. जब आपको अहसास होता है कि जो आपका सपना था आपका पैशन था. वह आपसे छूट रहा है तो तकलीफदेह स्थिति होती है जब मुझे अहसास हुआ कि स्पोर्टस में अब मैं आगे नहीं बढ़ पाउंगा तो काफी तकलीफ हुई थी. कुछ माह तो मेरी हालत काफी खराब रही पर फिर खुद को संभाला और दोस्तों ने मुझे उकसा कर मेरे अंदर अभिनय का पैशन पैदा कर दिया लेकिन अब मैं स्पोर्ट्स के बारे में नहीं सोचता.

सवाल- अब तक के आपके कैरियर के टर्निंग प्वाइंट या उतार चढ़ाव क्या रहे?

जवाब- जिंदगी की ही तरह मेरे कैरियर में उतार चढ़ाव आते रहे हैं जो फिलोसिफी आपकी जिंदगी में होती है वही आपके काम में भी होती है पर दोनों को अलग करके नहीं देखता मेरी राय में नौकरी या काम आपकी जिंदगी का एक हिस्सा है जब मैं मुंबई आया तो मैं यहां किसी को नहीं जानता था पर कुछ काम किया तो लोग मुझे जानने लगे हैं धूप छांव सहित कुछ फिल्में प्रदर्शित होने वाली हैं ईश्वर की कृपा है काम अच्छा चल रहा है फिर भी मैं सीरियल महाभारत में कर्ण का किरदार निभाने के अवसर को टर्निंग प्वाइंट मानता हूं यह किरदार अपने आप में काफी अनूठा है. पूरे विश्व में इस सीरियल को देखा गया जर्मनी, ग्रीक, स्पेन और इंडोनेशिया सहित कई देशों से मुझे सोशल मीडिया पर बधाईयां व प्रशंसा मिली कर्ण का किरदार निभाने के बाद फिल्मकार मुझे अच्छा कलाकार मानने लगे. भारत में इसका प्रसारण दो तीन बार हो चुका है,

सवाल- क्या आप यह नहीं मानते कि कैरियर में आए उतार चढ़ाव के अनुसार जिंदगी में बदलाव आते हैं?

जवाब- यह भी सच है मेरे कहने का अर्थ यह था कि कैरियर के उतार चढ़ाव के आधार पर जिंदगी जिएंगे तो फिर जिंदगी में भी उथल पुथल ज्यादा होगी क्योंकि अभिनय के कैरियर में हमेशा अनिश्चितता बनी रहती है. हमारे अभिनय के कैरियर में बहुत तेजी से उथल पुथल होती है अब यदि आप इसी आधार पर जिंदगी में सब कुछ करने लग जाएंगे तो जिंदगी में भी उतनी ही उथलपुथल आएगी. दूसरी बात आप जिंदगी को बैलेंस नहीं रख पाएंगे मेरा मानना है कि अभिनय की गहराई में जितना अधिक उतरेंगे. उतना ही बेहतर है. अभिनय सिर्फ एक्शन और कट तक ही सीमित नही है अभिनय हमारी जिंदगी का विस्तारित हिस्सा ही है. आपके अंदर इंसानों को व चीजों को समझने की संजीदगी होनी चाहिए.

मेरी राय में कलाकार के तौर पर आप चीजों को जितना अधिक गहराई से देख समझ व उसका विष्लेषण कर पाएंगे उतना ही आपके अभिनय में निखार आएगा क्योंकि तभी आप स्पष्ट रूप से अपने किरदार को देख व समझकर अभिनय से संवार सकेंगें. लोगों को दिखा सकेंगे. आपको मेरी बातें फिलोसाफिकल लग रही होगी, मगर मेरी राय में इस तरह चलने से जिंदगी बैलेंस रह सकती है. काम को जिंदगी का हिस्सा बनाए. काम के आधार पर जिंदगी न बनाएं काम जिंदगी नही सिर्फ जिंदगी का हिस्सा है. मैं अभी जिंदगी जीने का नजरिया सीख रहा हूं.

आने वाली फिल्में

मैंने धूप छांव, बगावत और एक्टिंग का भूत जैसी फिल्में की हैं.

नरेंद्र दामोदरदास मोदी और संसद का आईना

प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी कांग्रेस की आलोचना से बाहर आ ही नहीं पा रहे हैं और मजेदार बात यह है कि उन्होंने लंबे भाषण में जो कुछ कहा जैसा कांग्रेस को निचोड़ने का प्रयास किया. दरअसल, नरेंद्र दामोदरदास मोदी का कहन  कांग्रेस पार्टी के बजाय भाजपा को ज्यादा लागू होता है.

आइए! आप भी देखिए पढ़िए समझिए कि आखिर नरेंद्र मोदी कांग्रेस की आलोचना से बाहर क्यों नहीं आ पा रहे हैं.

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कोरोना प्रबंधन पर सफेद झूठ

नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में हुंकार भरी-” हमने श्रमिकों को जाने के लिए मुफ्त टिकट दिया, लोगों को अपने ठिकाने जाने के लिए प्रेरित किया.”

अब यह सारा देश जानता है कि सोना लॉकडाउन में किस तरह लोग भूखे प्यासे तड़पते हुए अपने अपने ठिकानों तक पहुंचे थे और सिर्फ ₹500 किसी किसी खाते में डाल कर के आप ने अपना फर्ज निभा लिया था.

नरेंद्र दामोदरदास मोदी कहा कि आपने बड़ा पाप किया है.  कोरोना काल के बाद दुनिया एक नई व्यवस्था की तरफ बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है. भारत को इस अवसर को गंवाना नहीं चाहिए. आजादी के अमृत महोत्सव’ के बाद देश जब आजादी के 100 साल मनाएगा, तब तक हम सामर्थ्य से, पूरी शक्ति एवं पूरे संकल्प से देश को उच्चतम स्तर पर लेकर पहुंचेंगे.

प्रधानमंत्री ने कहा कि आज विभाजनकारी मानसिकता “कांग्रेस” के डीएनए में घुस गई है. और कांग्रेस की नीति ‘ बांटो और राज करो’ की बन गई है. उन्होंने कहा ‘अंग्रेज चले गए लेकिन बांटो और राज करो की नीति को कांग्रेस ने अपना चरित्र बना लिया है. इसलिए ही आज कांग्रेस टुकड़े टुकड़े गैंग की लीडर बन गई है.  कांग्रेस की सत्ता में आने की इच्छा खत्म हो चुकी है, उसे लगता है कि जब कुछ मिलने वाला नहीं है तो कम से कम बिगाड़ दो, कांग्रेस आज इसी दर्शन पर चल रही है.

इन सब बातों को अगर आप सिर्फ दो दफा पड़ेंगे तो आपको दूध का दूध और पानी का पानी दिखाई देगा. आप एक जागरूक पाठक की हैसियत से स्वयं चिंतन करें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के श्री मुख से यह सब कथन क्या  शोभा देता हैं.

प्रधानमंत्री ने इस सब बातों से आगे निकलकर यह भी कहा कि हम सब संस्कार से, व्यवहार से, लोकतंत्र के लिए प्रतिबद्ध हैं और आज से नहीं, सदियों से हैं. आलोचना जीवंत लोकतंत्र का आभूषण है, लेकिन अंध विरोध लोकतंत्र का अनादर है. विपक्ष पर निशाना साधते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि दुर्भाग्य यह है कि आपमें से बहुत से लोग ऐसे हैं जिनका कांटा 2014 में अटका हुआ है और उससे वो बाहर नहीं निकल पा रहे हैं.

हम हैं जानते हैं कि नरेंद्र दामोदरदास मोदी और उनकी टीम कांग्रेसी आलोचना करने पर जैसे निम्न स्तर स्तर पर उतर आती है कांग्रेस के नेता राहुल गांधी को पप्पू कहके मंद मंद मुस्काए और मजे लेते हैं क्या यह स्वस्थ परंपरा कही जा सकती है कांग्रेस हो या अन्य कोई विपक्ष उस के संदर्भ में ऐसे तर्क दिए जाते हैं कि देश की जनता के समक्ष वह मुंह दिखाने के काबिल ना रहे.यह एक सोची-समझी रणनीति के तहत भाजपा करती है, यह सब जानते हैं.

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संसद में नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने कहा कि देश की जनता आपको पहचान गई है, कुछ लोग पहले पहचान गए, कुछ लोग अब पहचान रहे हैं और कुछ लोग आने वाले समय में पहचानने वाले हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि यह अच्छा होता कि सबके प्रयास के तहत देश ने जो कुछ हासिल किया है, उसे खुले मन से स्वीकार किया गया होता.

नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में प्रधानमंत्री की बहैसियत यह भी कह डाला की कांग्रेस पार्टी को किस किस सन से बिहार, गोवा आदि राज्यों की जनता ने नकार दिया है.

मगर सच यह है कि  विगत गोवा चुनाव में जिस तरह सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के विधायकों को रातो रात भाजपा में लाया गया क्या देश की जनता भूल गई है.

मोदी का झूठा आदर्श और पवित्रता

नरेंद्र मोदी ऊंची ऊंची बातें करते हैं मगर वैसे तनिक भी करते  दिखाई नहीं देते.

उन्होंने बड़े गर्व के साथ कहा कि कुछ लोग आपको पहचान गए हैं कुछ लोग पहले पहचान गए थे कुछ आने वाले समय में पहचान जाएंगे. अरे भाई साहब…! आपके ऊपर भी तो यह लागू होता है आप यह कैसे भूल जाते हैं कि राष्ट्रीय स्वयं संघ और भाजपा के बारे में बहुत पहले लोगों ने क्या-क्या कहा है तो लोग तो आपको भी जानते हैं…!

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास जी की बातों को सुनकर उद्वेलित

कांग्रेस के सदस्यों ने प्रधानमंत्री की इन टिप्पणियों पर आपत्ति जताना शुरू की तो उन्होंने पुनः कहा कि देश का बड़ा दुर्भाग्य है कि सदन जैसी पवित्र जगह, जो देश के लिए काम आनी चाहिए, उसे दल के लिए काम में लेने का प्रयास हो रहा है. इसलिए हमें जवाब देना पड़ रहा है.

अब देश की जनता के लिए समझने की बात है कि जब विपक्ष कुछ कहता है तो संसद अपवित्र हो जाती है और यह कहते हैं तो मानो मुंह से गंगाजल छलकने लगता है और संसद पवित्र हो जाती है.

क्या नरेंद्र दामोदरदास मोदी को यह सब कहते हुए थोड़ा भी आभास नहीं होता की सारा देश उन्हें देख सुन रहा है, वह क्या सोचेगा!

नरेंद्र मोदी ने कहा कि बिहार की जनता ने आखिरी बार 1985 में करीब 37 साल पहले कांग्रेस को सत्ता में लाने के लिए वोट किया था, वहीं पश्चिम बंगाल के लोगों ने करीब 50 साल पहले 1972 में विपक्षी दल को पसंद किया था.

अब कांग्रेस और विपक्ष दोनों को एक दंता तवज्जो नहीं दे रही है और हम आगे की ओर बढ़ते जा रहे हैं हमारे सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं नरेंद्र दामोदरदास मोदी का कहने का तात्पर्य यही था.अब यह देश की आवाम को तय करना है श्रीमान मोदी की बातों में  कितना सार है.

74 साल की उम्र में ‘महाभारत’ के ‘भीम’ ने दुनिया को कहा अलविदा, पढ़ें खबर

टीवी का फेमस और पुराना सीरियल ‘महाभारत’ में ‘भीम’ का किरदार निभाने वाले प्रवीण कुमार सोबती (Praveen Kumar Sobti) का निधन हो गया है. 74 साल की उम्र में उन्होंने अंतिम सांस ली. प्रवीण कुमार सोबती को भीम के किरदार में खूब पसंद किया गया था. वह अपने किरदार दर्शकों के दिल पर राज करते थे.

‘महाभारत’ में भीम के किरदार से एक्टर को पॉपुलैरिटी मिली. प्रवीण ने बॉलीवुड की कई फिल्मों में भी काम किया था. खेल की दुनिया में भी प्रवीण सोबती ने सफलता हासिल की थी. एक्टिंग में आने से पहले प्रवीण एक हैमर और डिस्कस थ्रो एथलीट थे. उन्हें अर्जुन अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया था.

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उन्होंने एशियाई खेलों में 2 स्वर्ण, 1 रजत और 1 कांस्य जीत चुके थे. उन्होंने एशियन और कॉमनवेल्थ गेम्स में मेडल हासिल करके देश का नाम रोशन किया था.

 

लेकिन कुछ साल बाद प्रवीण कुमार सोबती ने एक्टिंग की दुनिया में एंट्री की. और फैंस ने उन्हें खूब पसंद किया. एक इंटरव्यू के अनुसार, प्रवीण कुमार ने बताया था कि कश्मीर में जिस वक्त वह टूर्नामेंट के लिए मौजूद थे, उस दौरान ही उन्हें पहली बॉलीवुड फिल्म साइन करने का मौका मिला था. भीम ने ‘करिश्मा कुदरत का’, ‘युद्ध’, ‘जबरदस्त’, ‘सिंहासन’, ‘खुदगर्ज’, ‘लोहा’ और भी कई फिल्मों में काम किया था.

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कुछ महिने पहले ही प्रवीण कुमार ने बताया था कि उनकी उनकी तबीयत ठीक नहीं रहती है जिसकी वजह से वह घर पर ही रहते हैं. हाल ही में प्रवीण कुमार सोबती सरकार से पेंशन की गुहार लगाने पर काफी चर्चा में आये थे.

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महत्त्वाकांक्षा: आखिर क्यों मीता ने अपनी बेटी की जिम्मेदारी आया को सौंपी?

– कुंवर प्रेमिल

आजमीता का औफिस में कतई मन नहीं लग रहा था. सिर भारी हो गया था, आंखें सूजी हुई थीं. रात में वह सो जो नहीं पाई थी. पति से काफी नोकझोंक हुई थी. उस की पूरी रात टैंशन में गुजरी थी.

‘‘तुम औफिस से छुट्टी क्यों नहीं ले लेतीं.’’

‘‘आप क्यों नहीं ले लेते? पिछली दफा मैं ने लंबी छुट्टी नहीं ली थी क्या?’’ पति के कहने पर मीता फट पड़ी.

‘‘उस के पहले मैं ने भी तो लंबी छुट्टी ली थी.’’

उस के बाद दोनों के बीच खूब झगड़ा हुआ और फिर दोनों बिना कुछ खाएपीए सो गए.

सुबह उठने पर दोनों के चेहरों पर कई सवालिया निशान थे. बिना एकदूसरे से बोले और कुछ खाएपीए दोनों औफिस चले गए.

‘पूरी जिम्मेदारी औरत के सिर ही क्यों थोप दी जाती है.’ रहरह कर यही सवाल उसे बुरी तरह मथे जा रहा था. हर बार औरत ही समझौता करे? पत्नी की प्रौब्लम से पति को सरोकार क्यों नहीं? क्यों पुरुष इतना खुदगरज, लालची और हठधर्मी बन जाता है?

‘‘अरे, क्या हुआ? यह मुंह क्यों लटका हुआ है?’’ मैडम सारिका ने पूछा.

‘‘क्या बताऊं मैडम, बेटी को ले कर हम दोनों में रोज झगड़ा होता है. वह बीमार है. मुझे दफ्तर की ओर से विदेश यात्रा पर जाना है. ऐसे में मैं कैसे छुट्टी ले सकती हूं. पति मेरी कोई मदद नहीं करते, उलटे गृहिणी बनने की सलाह दे कर मेरा और मूड खराब कर देते हैं.’’

‘‘बेटी को क्या हुआ है?’’

‘‘उस ने हंसनाखेलना छोड़ दिया है. हमेशा उनींदी सी रहती है. रहरह कर दांत किटकिटाती है. हर समय शून्य में निहारती रहती है.’’

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‘‘किसी चाइल्ड स्पैशलिस्ट को दिखाओ,’’ मैडम सारिका घबरा कर बोलीं.

‘‘मैं छुट्टी नहीं ले सकती… मेरी टेबल पर बहुत काम पड़ा है.’’

‘‘उस की तुम टैंशन मत लो… मैं सब संभाल लूंगी… तुम बेटी को किसी अच्छे डाक्टर को दिखाओ.’’

मीता को यह जान कर अच्छा लगा कि पति ने भी अगले दिन की छुट्टी ले ली है. अगली सुबह आया की राह देखी, उस के न आने पर पड़ोसिन को घर की चाबी दे कर डाक्टर के पास रवाना हो गए.

डिस्पैंसरी में बहुत भीड़ थी. प्राइवेट डिस्पैंसरी में भी सरकारी अस्पतालों जैसी भीड़ देख कर मीता दंग रह गई. उसे अपना नंबर आना नामुमकिन सा लगने लगा, क्योंकि शनिवार होने के कारण डिस्पैंसरी 1 बजे बंद हो जानी थी.

मीता को आज पता चला कि छुट्टी की कितनी अहमियत है. सरकारी और प्राइवेट औफिसों में कितना अंतर है. प्राइवेट औफिस सैलरी तो अच्छी देते हैं पर खून चूस लेते हैं. जरा भी आजादी नहीं… कितना मन मार कर काम करना पड़ता है… इंसान मशीन बन जाता है. अपनी आजादी पर ग्रहण लग जाता है.

इस बीच पड़ोसिन का फोन आया कि आया अभी तक नहीं आई है. पता नहीं क्या हो गया था उसे जो बिना बताए छुट्टी कर गई.

बड़ी देर बाद मीता का नंबर आया. बच्ची की हालत देख कर एक बार को डाक्टर भी चौंक गया. उस ने बच्ची की बीमारी से संबंधित बहुत सारे प्रश्न पूछे, जिन के मीता आधेअधूरे उत्तर ही दे पाई. जितना आया जानती थी उतना मीता कहां जानती थी… बच्ची का खानापीना, खेलनाखिलाना सब कुछ उसी के जिम्मे जो था. वह दिन भर आया के पास ही तो रहती थी.

बच्ची का मुआयना कर डाक्टर ने कुछ सावधानियां बरतने की सलाह दी और बच्ची को ज्यादा से ज्यादा अपने पास रखने की ताकीद भी की. साथ ही यह भी कहा कि आया पर पूरी नजर रखें. यह सुन मीता घबरा गई.

अब पतिपत्नी दोनों को एहसास हो रहा था कि उन से बच्ची की उपेक्षा हुई है. उन्होंने अपनी बेटी से ज्यादा नौकरी को अहमियत दी. यह उसी का दुष्परिणाम है, जो बच्ची की हालत बद से बदतर हो गई.

‘‘सुनो जी, मैं 1 सप्ताह की छुट्टी ले लेती हूं… सैलरी कटे तो कटे… बच्ची को इस समय मेरी सख्त जरूरत है,’’ मीता कहतेकहते रो पड़ी.

‘‘मैं भी छुट्टी ले लेता हूं मीता. मेरी भी बराबर की जिम्मेदारी है… कहीं का नहीं छोड़ा इस नौकरी ने हमें, महत्त्वाकांक्षी बन कर रह गए थे हम.’’

‘‘बच्ची को कुछ हो गया तो मैं कहीं की नहीं रहूंगी. विदेश जाने की धुन ने मुझे एक तरह से अंधा बना दिया था,’’ मीता अपने पति के कंधे पर सिर रख कर रोने लगी.

बच्ची की आंखें थोड़ी खुलतीं, फिर बंद हो जातीं. वह अपनी अधखुली आंखों से शून्य में निहारती. अपनी मां को अर्धबेहोशी में देखते रहने का वह पूरा प्रयत्न करती.

‘‘बेटी आंखें खोल… अपनी ममा से बातें कर… देख तो तेरी ममा कितनी दुखी हो रही है… अब तुझे कभी आया के पास नहीं छोड़ेगी तेरी ममा… जरा तो देख..’’ कहतेकहते मीता का कंठ पूरी तरह अवरुद्ध हो गया.

रोतेबिलखते कब उस की आंख लग गई, उसे पता ही नहीं चला. दरवाजे पर आहट से वह जागी. दरवाजा खोला तो सामने पति हाथ में लिफाफा लिए खड़े थे. पति के हाथों से लगभग उसे छीन कर बच्ची की ब्लड रिपोर्ट पढ़ने लगी.

‘‘ड्रग्स,’’ उस ने प्रश्नवाचक दृष्टि से पति की ओर ताका.

‘‘हां, ड्रग्स. बच्ची को धीमा जहर दिया जा रहा था. जरूर यह आया का काम है. तभी तो वह अब नहीं आ रही है.’’

‘‘बेबी के शरीर ने फंक्शन करना बंद कर दिया है,’’ मीता को डाक्टर का यह कहना याद आ गया और वह चक्कर खा कर बिस्तर पर जा गिरी.

कुछ समय बाद अचानक डाक्टर का फोन आया. बच्ची को ले कर क्लीनिक बुलाया. डाक्टर ने पुलिस को फोन कर आया को गिरफ्तार भी करा दिया था. पुलिस आया को ले कर क्लीनिक आ गई थी. उन के वहां पहुंचने पर आया उन से मुंह छिपाने का प्रयास करने लगी. तब पुलिस ने उन के सामने ही आया से पूछताछ शुरू की.

‘‘क्या आप की आया यही है?’’

‘‘जी, यही है,’’ दोनों ने एकसाथ जवाब दिया.

‘‘बच्ची पूरा दिन आया के पास ही रहती थी क्या?’’

‘‘जी हां, हम दोनों तो अपनेअपने औफिस चले जाते थे.’’

‘‘क्या आप ने इसे नौकरी पर रखते समय पुलिस थाने में जानकारी दी थी?’’

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‘‘नहीं.’’

‘‘यही आप से बहुत बड़ी गलती हुई है…’’ पुलिस इंस्पैक्टर ने दो टूक शब्दों में कहा और फिर आया की ओर मुखातिब हुए, ‘‘पतिपत्नी के औफिस जाने के बाद तुम बच्ची को कहां ले जाती थी?’’

‘‘जी, कहीं नहीं, मैं पूरा समय घर पर ही रहती थी.’’

‘‘झूठ… इन को जानती हो?’’ पुलिस ने पास के पार्क के माली की ओर इशारा कर के पूछा तो आया का चेहरा उतर गया. पार्क में बीमार बच्ची के नाम पर भीख मांगती थी. बच्ची बीमार सी लगे, इसलिए उसे भूखा रखती, ऊपर से धीमे जहर ने बच्ची पर और कहर ढा दिया था. पर समय रहते डाक्टर के रिपोर्ट करने पर पुलिस ने उसे रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया था.

अब आया जेल में थी और बच्ची अस्पताल में जीवनमृत्यु के बीच झूल रही थी. वह अपने मातापिता की महत्त्वाकांक्षा की बलि जो चढ़ गई थी.

सेहत के लिए बहुत जरूरी है केला, होते हैं ये फायदे

केला खाने से होने वाले स्वास्थय लाभ के बारे में सभी जानते हैं. हमारी सेहत के लिए केला कई मायनों में फायदेमंद है. जब आपको बहुत ज्यादा भूख लगी हो, 4-5 केले खा लेने से भूख मिट जाती है. जितना ये आपके स्वास्थय के लिए फायदेमंद है उतना ही स्वादिष्ट भी. इस खबर में हम आपको केले से होने वाले फायदे के बारे में बताएंगे.

कम होता है वजन

केले में फाइबर प्रचुर मात्रा में होता है, यही कारण है कि एक बार केला खा लेने से काफी देर तक भूख नहीं लगती. इसमें एक खास तरह का स्टार्च होता है जिससे आपकी भूख काबू में रहती है. इसके अलावा शरीर की इंसुलिन भी संतुलित रहती है.

ऐनीमिया का खतरा होता है कम

इस बीमारी में कमजोरी, सांस लेने में परेशानी जैसी कई परेशानियां होती हैं. इससे शरीर में हीमोग्लोबीन की मात्रा काफी कम हो जाती है. केले में आयरन की प्रचुरता होती है, जिसके कारण रेड ब्लड सेल्स(लाल रक्त कण) बनने की प्रक्रिया तेज होती है. इसके अलावा केले में विटामिन बी6 पाया जाता है, जिससे शरीर में ग्लूकोज नियंत्रित रहता है.

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तनाव करे कम

शोध में ये बात स्पष्ट हो चुकी है कि तनाव कम करने में केला महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. केला आपका मूड ठीक करने में काफी कारगर होता है. इसमें ट्रिप्टोफैन नाम का एक केमिकल होता है. यह सेरोटोनिन को रिसीव करने का काम करता है. सेरोटोनिन एक न्यूरोट्रांसमिटर होता है जो हमारे दिमाग को खुश रहने का सिग्नल भेजता है.

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पूरी होती है विटामिन की कमी 

केले में कई प्रकार के विटामिन होते हैं. जिसमें विटामिन बी6 और विटामिन सी सबसे अहम है. विटामिन बी6 से शरीर में इंसुलिन, हीमोग्लोबिन और अमीनो एसिड पैदा होता है, जिससे स्वस्थ सेल्स का निर्माण तेज हो जाता है. हमारे शरीर को रोजाना जितना विटामिन बी6 चाहिए होता है उसका 20% हमें केले से मिल सकता है. वहीं बात अगर विटामिन सी की करें तो हमारे शरीर को जितना विटामिन सी चाहिए होता है उसका 15 % हमें बड़े आराम से केले के द्वारा मिल जाता है.

Valentine’s Special: कहीं आपकी दोस्ती भी अट्रैक्शन तो नहीं

एक युवक ने एक युवती को नौकरी का झांसा दे कर काफी दिन तक अपने प्यार में उलझाए रखा, बाद में उसे पत्नी के तौर पर रखने लगा. जब भी युवती उस से नौकरी लगवाने को कहती तो वह कुछ न कुछ बहाना बना देता. एक दिन उस युवती को पता चला कि वह युवक तो पहले से ही शादीशुदा है और 2 बच्चों का पिता है. ऐसी घटनाएं आएदिन हर शहर या कसबे में घटती रहती हैं. इन घटनाओं के पीछे युवतियों की भावुक प्रवृत्ति अधिक जिम्मेदार है. हर युवती के मन में एक सुंदर, सजीले राजकुमार की चाहत होती है. वह चाहती है कि पति के रूप में उसे एक सुंदर व योग्य युवक मिले. वह अपने मन में ढेर सारे सपने संजोए रखती है. इसी चक्कर में कई बार युवतियां गलत युवकों के जाल में फंस जाती हैं, जिस कारण उन का भविष्य चौपट हो जाता है. आएदिन ऐसे तमाम किस्से सुनने को मिलते हैं, जब युवतियां भावुकतावश गलत प्रवृत्ति के युवकों के चक्कर में पड़ कर अपना जीवन बरबाद कर लेती हैं. अपनी दुर्दशा के लिए वे खुद जिम्मेदार होती हैं, पर स्थिति कभीकभी ऐसी बन जाती है कि वे आत्महत्या करने तक पर मजबूर हो जाती हैं.

आज धारावाहिकों और फिल्मों को देखदेख कर युवकयुवतियां भी बहुत जल्दी एकदूसरे के मोहपाश में बंध जाते हैं. वे प्यार के वास्तविक स्वरूप से परिचित भी नहीं होते कि देहसंबंध बनाने लगते हैं. वे प्यार को अपनी वासनात्मक दृष्टि से परखने व आंकने लगते हैं. एक खबरिया चैनल द्वारा दिखाई गई खबरों के अनुसार पिछले दिनों एक युवती और युवक एक होटल में रुके, वहां दोनों में शारीरिक संबंध बन गए. होटल में सीसीटीवी कैमरे लगे हुए थे जिन के जरिए उन की अश्लील फिल्म बना ली गई और बाद में उसे असामाजिक तत्त्वों ने इंटरनैट पर अपलोड कर दिया. किसी जानकार द्वारा जब उस युवती को इस की जानकारी मिली तो वह आत्महत्या के बारे में सोचने लगी.

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आप किसी युवक या युवती से प्यार करते हैं तो इस में कोई एतराज नहीं, लेकिन ध्यान रखें कि ऐसी कोई हरकत न करें जिस का नुकसान आप को ताउम्र भुगतना पड़े. मान लीजिए कोई युवक योग्य, बुद्धिमान व स्मार्ट है और वह स्कूल या कालेज में आप के साथ पढ़ता है तो आप उस की मित्र बन सकती हैं. उस के साथ मातापिता की सहमति से घूमफिर भी सकती हैं. पढ़ाईलिखाई में भी युवकयुवतियां आपस में भरपूर सहयोग करते हैं. फिर दोनों अच्छी जौब लगने के बाद विवाह करने का भी मन बना सकते हैं. पर ऐसी मित्रता के बीच आप घर वालों की मनशा और विचार जान लें अच्छा रहता है. कई बार युवक या युवती की जाति और धर्म भी वैवाहिक संबंधों में अवरोध बन जाते हैं. भले आज विजातीय विवाह भी खूब होते हैं और घर वालों की भी सहमति मिल जाती है.

लेकिन कुछ लोगों के सामने आज भी संकट की स्थिति है. कुछ लोग इतने कट्टर और पुरातनपंथी विचारधारा के हैं कि आधुनिक परिवेश वाली मान्यताओं से नहीं जुड़ते और विरोध के स्वर मुखरित कर देते हैं. ऐसे में अनेक घटनाएं सामने आती हैं, जिन में घर वालों ने प्रेम करने वाले युवकयुवती की हत्या कर डाली. वे दो प्यार करने वालों के प्रति इतनी घृणा और अमानवीयता दिखाते हैं कि गलत कार्य कर बैठते हैं जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता. युवकयुवती दोनों को चाहिए कि वे अपनी मित्रता को वैवाहिक बंधनों तक ले जाने के बारे में न सोचें. धीरेधीरे दोनों को एकदूसरे की परख करनी चाहिए कि वे एकदूसरे के लायक हैं भी या नहीं. इस बात का भी ध्यान रखें कि जब तक दोनों के परिवार वाले आपसी संबंधों के लिए अपनी सहमति नहीं देते, तब तक अपनी मित्रता को एक निश्चित सीमा तक ही सीमित रखें. विवाह से पूर्व आप की मित्रता के बीच ऐसे संबंध न बनें, जो उचित नहीं माने जाते.

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प्यार करिए, जरूर करिए, पर अपनी और अपने साथी की योग्यता और क्षमता पर भी विचार करिए, साथ ही अपने परिवार के बारे में भी सोचिए. प्यार के लिए ऐसे साथी का चयन करें जो आप के लायक हो. कई बार भावुकतावश युवक और युवती दोनों ही ऐसे साथियों का चयन कर बैठते हैं जो किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होते. जैसे कई बार युवतियां ऐसे युवकों से प्यार कर बैठती हैं जो पहले से ही शादीशुदा होते हैं या वे उन की पढ़ाईलिखाई और सुंदरता के समक्ष बौने साबित होते हैं. ऐसे साथियों को घर वालों से भला किस प्रकार सहमति या मान्यता मिल सकती है. जब आप लोग एकदूसरे के रूप व गुणों को आधार मान कर उचित चयन करेंगे तो यकीन मानिए घर वाले भी एक बार आप के संबंधों के लिए अपनी सहमति देने पर विचार कर सकते हैं. इसलिए आवश्यक है कि प्यार करने से पूर्व अपनी व अपने साथी की योग्यता, क्षमता और सामाजिक स्थिति पर थोड़ा गौर जरूर कर लें.

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कई बार भावुकतावश लिए गए निर्णय जीवनभर के लिए दुखदाई बन जाते हैं. इसलिए सोचसमझ कर ही निर्णय लें. आज बहुत जरूरी है कि सिर्फ रुपए, पैसा, गाड़ी व मकान देख कर ही दोस्ती के लिए हाथ न बढ़ाया जाए, क्योंकि बाद में यही दोस्ती आप का शारीरिक शोषण भी कर सकती है. इसलिए सोचसमझ कर निर्णय लें.

आशा भोसले ने लता मंगेशकर के साथ शेयर की बचपन की फोटो, लिखा ‘दीदी और मैं’

स्वर कोकिला लता मंगेशकर (Lata Mangeshkar)  का काल यानी 6 फरवरी को निधन हो गया. करीब एक महीने से मुंबई ब्रीच कैंडी अस्पताल में लता मंगेशकर का इलाज चल रहा था. इस खबर से देश में शोक की लहर छाई हुई है.

लता मंगेशकर की छोटी बहन और दिग्गज गायिका आशा भोसले (Asha Bhosle) ने उनको यादकर भावुक हो गई हैं. उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी बचपन की फोटो शेयर किया है. इस फोटो में आशा भोसले बैठी हुई है उनके साथ लता मंगेशकर खड़ी हुई नजर आ रही है.

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यह ब्लैक एंड वाइट फोटो है. दोनों बहनों के चेहरे पर मासूमियत झलक दिख रही है.आशा भोसले ने कैप्शन में लिखा है, बचपन के दिन भी क्या दिन थे, दीदी और मैं. इसके साथ उन्होंने हार्ट इमोजी भी बनाया है. आशा भोसले की इस तस्वीर फैंस और सेलेब्स खूब प्यार लूटा रहे हैं.

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लता मंगेशकर का रविवार शाम को मुंबई के शिवाजी पार्क में अंतिम संस्कार किया गया. उनके अंतिम संस्कार में देश की तमामा हस्तियां शामिल हुई थी. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, आमिर खान, श्रद्धा कपूर, सचिन तेंदुलकर,शाहरुख खान, रणबीर कपूर, विद्या बालन सहित कई हस्तियां शामिल हुई थीं.

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अनुपमा ने पति संग शेयर किया रोमांटिक फोटो, लिखा ‘तुम्हारे बिना कुछ भी नहीं’

‘अनुपमा’ फेम एक्ट्रेस रुपाली गांगुली (Rupali Ganguly) सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. वह शो से रिलेटेड और अपनी असल जिंदगी से जुड़े फोटोज और वीडियोज फैंस के साथ शेयर करती रहती हैं. फैंस को भी अनुपमा के पोस्ट का बेसब्री से इंतजार रहता है.

अनुपमा (रुपाली गांगुली) ने 6 फरवरी को शादी की सालगिरह मनाया. वह सोशल मीडिया पर  अपने पति अश्विन के वर्मा (Ashwin K Verma) के साथ रोमांटिक फोटो शेयर की है. रुपाली गांगुली ने यह तस्वीर शेयर कर पति को सालगिरह की बधाई दी हैं.

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इस फोटो में अनुपमा के रियल लाइफ के हिरो अश्विव के वर्मा उनके माथे पर किस करते नजर आ रहे हैं. रुपाली गांगुली ने तस्वीर के साथ एक प्यारा सा कैप्शन लिखा है, ‘मैं तुम्हारे बिना कुछ भी नहीं हूं… मेरे प्यार थू थू थू को शादी की सालगिरह मुबारक हो.’

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उनकी इस पोस्ट पर फैंस लगातार बधाई और शुभकामनाएं दे रहे हैं. उनके को-स्टार गौरव खन्ना और अनेरी वजानी ने भी बधाई दी है. रुपाली गांगुली ने 9 साल पहले अपने दोस्त अश्विन के वर्मा के साथ शादी की थी.

 

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शादी से पहले दोनों ने एक-दूसरे को पांच साल तक डेट किया था. अनुपमा के पति अश्विन के वर्मा एक इंश्योरेंस फर्म में वाइस प्रेसिडेंट के तौर पर काम किया है और यूएस में एक विज्ञापन फिल्मममेकर के तौर पर भी काम किया है. रुपाली गांगुली से शादी करने के बाद उन्होंने जॉब छोड़ दी और वह भारत आ गए. हाल ही में खबर आई थी कि रुपाली गांगुली सबसे ज्यादा फीस लेने वाली टीवी एक्ट्रेस बन गई हैं.

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मेरी भाभी चाहती हैं कि मैं उनका साथ दूं ताकि वे मां बन सकें, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं विवाहित पुरुष हूं. विवाह को 8 वर्ष हो गए हैं. 7 साल का एक बच्चा है. मैं बच्चे व पत्नी से बहुत प्यार करता हूं. मेरी समस्या मेरी दूर के रिश्ते की भाभी को लेकर है. उनके विवाह को 10 वर्ष हो गए हैं लेकिन वे अभी तक मां बनने का सुख हासिल नहीं कर पाई हैं. मैडिकल जांच में भाभी के पति में कमी पाई गई है. भाभी चाहती हैं कि मैं उन का साथ दूं ताकि वे मां बनने का सुख हासिल कर सकें. मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूं, सलाह दें?

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जवाब

आप अपने वैवाहिक जीवन में सुखी हैं तो फिर बैठे बिठाए अपने वैवाहिक जीवन को क्यों बरबाद करना चाहते हैं. आप की भाभी का मां बनने को ले कर आप से जो प्रस्ताव है वह पूरी तरह से गलत है. ऐसा करने से आप की हंसती खेलती गृहस्थी बरबाद हो जाएगी.

जहां तक भाभी के मां बनने का सवाल है उस के लिए मैडिकल औप्शन उपलब्ध है जैसे आईवीएफ. वे इस उपाय को अपना सकती हैं. इस से आप की खुशहाल गृहस्थी में भी कोई आंच नहीं आएगी और आप की भाभी मां बनने का सुख हासिल भी कर सकेंगी. आप भूल कर भी अपनी भाभी के प्रस्ताव को न स्वीकारें. इस से न केवल आप पति पत्नी के रिश्ते में दरार आएगी, बल्कि आप के अपने दूर के भाई से भी संबंध बिगड़ते देर नहीं लगेगी.

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

पौलीहाउस के अंदर टमाटर की खेती

 Writer- डा. अनंत कुमार

टमाटर अपने लाभदायक गुणों व तमाम उपयोगों के चलते सब से महत्त्वपूर्ण सब्जी वाली फसल है. यह एक बहुत अहम   सुरक्षित खाद्य पदार्थ है. इस की खेती सभी जगहों पर की जा सकती है. संसार में आलू व शकरकंद के बाद टमाटर ही सब से ज्यादा पैदा की जाने वाली सब्जी है.

टमाटर का इस्तेमाल टमाटर सूप, सलाद, अचार, टोमैटो कैचप, प्यूरी व चटनी वगैरह बनाने में किया जाता है. इस के अलावा तकरीबन हर सब्जी के साथ टमाटर का भी इस्तेमाल किया जाता है.

टमाटर गरम मौसम की फसल है. इस की फसल उन इलाकों में ज्यादा अच्छी होती है, जहां पाला नहीं पड़ता है. लेकिन ज्यादा गरमी और सूखे मौसम में अधिक वाष्पीकरण होने के कारण टमाटर के कच्चे व छोटे फल तेजी से गिरने लगते हैं.

टमाटर की फसल में 38 डिगरी सैंटीग्रेड से ज्यादा तापमान होने पर फल नहीं बनते और पहले से मौजूद फलों का आकार भी बिगड़ जाता है. इसी तरह बहुत कम तापमान (0 से 12 डिगरी सैंटीगे्रड) पर भी फल नहीं बनते. टमाटर में लाइकोपिन नामक वर्णक की मात्रा 20-25 डिगरी सैंटीग्रेड तापमान पर अधिक बनती है और 27 डिगरी सैंटीग्रेड पर इस वर्णक का उत्पादन तेजी से गिरने लगता है. तापमान

32 डिगरी सैंटीग्रेड के ऊपर पहुंचने पर लाइकोपिन बनना बंद हो जाता है.

तापमान व फसल में लगने वाले कीड़ों व बीमारियों को ध्यान में रखते हुए अगर टमाटर की खेती पौलीहाउस में की जाए तो कम और ज्यादा तापमान से भी फसल को बचाया जा सकता है. साथ ही, फसल को कीड़ों व बीमारियों से भी बचा कर ज्यादा उत्पादन लिया जा सकता है.

आजकल नैचुरल वैंटीलेटेड पौलीहाउस बनाए जाते हैं, जिन में अलग से पंखे लगाने की जरूरत नहीं होती.

मिट्टी व उस की तैयारी

पौलीहाउस के अंदर टमाटर की खेती के लिए चिकनी दोमट, दोमट या बलुई दोमट जीवांशयुक्त मिट्टी, जिस का पीएच मान6.5-7.0 हो, अच्छी रहती है. जमीन की 4-5 बार जुताई कर के उस में 1 मीटर चौड़ा और 8-9 इंच उठा हुआ बैड बना देना चाहिए.

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बीज की मात्रा : 1 हेक्टेयर खेत की रोपाई के लिए देशी किस्मों का 400 ग्राम बीज या संकर किस्मों का 200 ग्राम बीज जरूरी होता है.

डिटरमिनेट प्रजाति : पूसा अर्ली ड्वार्फ, आजाद टी 6, पूसा गौरव, डीवी आरती 1 व डीवी आरती 2. आमतौर पर अगेती प्रजातियां डिटरमिनेट किस्म की होती हैं. इन की बढ़वार सीमित होती है.

इनडिटरमिनेट प्रजाति : अर्का सौरभ, अर्का विकास, पूसा रूबी, पंत बहार, पंत टमाटर 3 व केएस 17. इन प्रजातियों की लंबाई लगातार बढ़ती रहती है.

संकर किस्में : पूसा हाईब्रिड 2, रूपाली, अविनाश 2, एमटीएच 15, नवीन, राजा, अपूर्वा, अजंता व रश्मि.

खाद व उर्वरक

टमाटर की फसल में उन्नतशील प्रजाति के लिए प्रति हेक्टेयर 200-250 क्विंटल गोबर की खाद, 120-150 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60-80 किलोग्राम फास्फोरस और 80-100 किलोग्राम पोटाश की जरूरत होती है.

गोबर की खाद एक महीने पहले खेत की तैयारी के समय खेत में मिला देनी चाहिए. नाइट्रोजन की आधी मात्रा, फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा रोपाई से पहले खेत में डाल

कर 1 मीटर चौड़ा व 8-9 इंच ऊंचा बैड बना देना चाहिए.

नर्सरी और रोपाई

1 हेक्टेयर खेत में रोपाई के लिए टमाटर की नर्सरी तैयार करने के लिए 8-9 इंच ऊंची, 1 मीटर चौड़ी व 3 मीटर लंबी क्यारियां लगभग 200 वर्गमीटर में तैयार की जाती हैं. क्यारियां (बैड) तैयार करते समय 10-15 किलोग्राम गोबर की सड़ी खाद व 15-20 ग्राम डीएपी प्रति वर्गमीटर की दर से मिलाएं और 3-4 बार खुदाई कर के बैड को समतल कर लें. फिर उठी हुई क्यारियों में तकरीबन 1 सैंटीमीटर की गहराई पर 2 सैंटीमीटर की दूरी पर बीजों की बोआई करें. लाइन से लाइन की दूरी 10 सैंटीमीटर रखें. बोआई के बाद हजारे द्वारा हलकी सिंचाई करें.

1 हेक्टेयर खेत की रोपाई के लिए सामान्य किस्म का 400 ग्राम व संकर किस्मों का 200 ग्राम बीज लगता है. बीज हमेशा कार्बंडाजिम या थायरम से उपचारित कर के ही बोआई करें. जब पौधे 5-6 पत्ती वाले या 25-30 दिनों के हो जाएं तो तैयार खेत में 3 इंच गहरे गड्ढे खोद कर पौधे से पौधे की दूरी 45 सैंटीमीटर और लाइन से लाइन की दूरी 60 सैंटीमीटर रखते हुए रोपाई कर देनी चाहिए.

मैदानों व पौलीहाउसों में टमाटर की फसल साल में 2 बार ली जा सकती है. पहली फसल के लिए जुलाईअगस्त में बोआई की जाती है और रोपाई का काम अगस्त के आखिर तक किया जाता है. दूसरी फसल नवंबरदिसंबर महीने में बोई जाती है और पौधों की रोपाई दिसंबरजनवरी में की जाती है.

टमाटर जल्दीजल्दी व उथली निराईगुड़ाई वाली फसल है. लिहाजा, हर सिंचाई के बाद ‘हैंड हो’ या खुरपी द्वारा खेत की ऊपरी सतह को भुरभुरी बनाना चाहिए. गहरी निराईगुड़ाई नहीं करनी चाहिए, इस से जड़ों को नुकसान हो सकता है.

कटाईछंटाई व स्टैकिंग

बाजार में टमाटर जल्दी उपलब्ध कराने के लिए पौधों की कटाई कर के एक तने के रूप में कर के तार द्वारा ऊपर चढ़ा देते हैं. इस से पौधे ज्यादा बढ़ते हैं. टमाटर बड़े आकार के होते हैं और ज्यादा पैदावार होती है.

सिंचाई : पौलीहाउस में टमाटर की फसल में सिंचाई ड्रिप (बूंदबूंद) या स्प्रिंकलर विधि द्वारा की जाती है. इस से लगभग 40-50 फीसदी पानी की बचत होती है. गरमियों में

4-5 दिनों के अंतर पर और सर्दियों में 8-10 दिनों के अंतर पर सिंचाई करते हैं.

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पौधों को सहारा देना

इनडिटरमिनेट व संकर प्रजातियों में पौधों को सहारा देने की जरूरत होती है. इस के लिए लोहे के तारों को पौलीहाउस के पोलों में बांध देते हैं. जरूरत के मुताबिक तार बांधने के लिए बांसों को जमीन में गाड़ देते हैं. लोहे के तारों से सुतली या प्लास्टिक की रस्सी नीचे लटका कर पौधों की जड़ों के पास बांध देते हैं. इस तरह पौधों को सहारा मिल जाता है और वे ठीक ढंग से बढ़ते हैं.

कटाई : टमाटर के फल पकने की अवस्था उसे उगाने के मकसद व एक जगह से भेजे जाने वाली दूसरी जगह की दूरी पर निर्भर करती है. इस के फलों की तुड़ाई इन अवस्थाओं में की जाती है :

हरी अवस्था : अधिक दूर के बाजारों में भेजने के लिए हरे, परंतु पूरी तरह से विकसित फलों की तुड़ाई करते हैं.

गुलाबी अवस्था : स्थानीय बाजारों के लिए गुलाबी टमाटरों की तुड़ाई करते हैं.

पकी हुई अवस्था : घर के पास लगे पौधों से तुरंत इस्तेमाल के लिए पके लाल टमाटर तोड़े जाते हैं.

पूरी तरह से पकी अवस्था : अचार व प्यूरी बनाने व डब्बों में बंद करने के लिए पूरी तरह पके टमाटर तोड़े जाते हैं.

उपज : पौलीहाउस में टमाटर की उपज 800-1,000 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक हासिल हो जाती है.

बीमारियां

आर्द्रगलन : बीज से पौधा बनते ही नर्सरी में पौधा मुरझा जाता है. ये लक्षण कुछ दिनों बाद दिखाई देते हैं. इस के उपचार के लिए क्यारियों को 1 भाग फार्मलीन में 7 भाग पानी मिला कर बोआई से 15-20 दिनों पहले से शोधित करें और पौलीथिन से ढक दें.

क्यारियों को मैंकोजेब (25 ग्राम दवा को 10 लिटर पानी में मिला कर) और कार्बंडाजिम (20 ग्राम दवा को 10 लिटर पानी में मिला कर) के घोल से लक्षण दिखाई देते ही सींचें.

मरोडिया (लीफ कर्ल) : यह विषाणु से होने वाली बीमारी है, जो सफेद मक्खी द्वारा फैलती है. इस में टमाटर की पत्तियां मुड़ जाती हैं, उन का आकार छोटा हो जाता है, उन

की सतह खुरदरी हो जाती है और बढ़वार रुक जाती है.

इस की रोकथाम के लिए रोग प्रतिरोधी किस्में जैसे एस 12 लगाएं. इस के अलावा इमिडाक्लोरोपिड 0.5 मिलीं  को 1 लिटर पानी में घोल कर स्प्रे करें. पौधशाला में मच्छरदानी का प्रयोग करें.

जड़ों की गांठ वाले सूत्रकृमि : ये सूक्ष्मदर्शी जीव मिट्टी में रहते हैं. इन के प्रकोप से जड़ों में गांठें बन जाती हैं और पौधे पीले पड़ कर मुरझा जाते हैं.

इस से बचाव के लिए सूत्रकृमिरहित पौधशाला से ही पौधे लें. रोगग्रस्त इलाकों में

2-3 सालों के लिए रोग प्रतिरोधी किस्म एस

12 लगाएं. हर साल पौधशाला की जगह बदलें और 5-10 ग्राम फ्यूरोडान 3जी की मात्रा प्रति वर्गमीटर की दर से क्यारियों में मिलाएं.

कीट

फल छेदक कीट : यह टमाटर का खास दुश्मन है. इस कीड़े की इल्लियां हरे फलों में घुस जाती हैं और फलों को सड़ा देती हैं.

जैसिड : ये हरे रंग के छोटे कीड़े होते हैं, जो पौधों की कोशिकाओं से रस चूस लेते हैं, जिस के कारण पौधों की पत्तियां सूख जाती हैं.

सफेद मक्खी : ये सफेद छोटे मच्छर जैसे कीड़े होते?हैं, जो पौधों से रस चूस लेते हैं. ये पत्तियां मुड़ने वाली बीमारी फैलाते हैं.

उपचार : फसल की शुरुआती अवस्था में सफेद मक्खी और जैसिड की रोकथाम के लिए 0.05 फीसदी मैटासिस्टाक्स या रोगोर का छिड़काव करना चाहिए.

फल छेदक कीट से प्रभावित फलों और कीड़ों के अंडों को जमा कर के नष्ट कर दें और 0.05 फीसदी मैलाथियान या 0.1 फीसदी कार्बारिल का छिड़काव करें. 10 दिनों के बाद दूसरा छिड़काव करें.

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