नरेंद्र गिरि आत्महत्या मामला कोई नया मामला नहीं है. मंदिर, मठ और आश्रम के झगड़े काफी पहले से चलते आ रहे हैं. बदलाव यह आया है कि पहले ये झगड़े पद श्रेष्ठता के चलते होते थे, अब इन मठों में दानस्वरूप अथाह संपत्ति और धनवर्षा होने से इन का रूप दानपात्र पर नियंत्रण पाने का हो गया है. पौराणिक काल से ही मठ, मंदिरों और आश्रमों में झगड़े होते रहे हैं. पहले जमीनजायदाद बहुत मूल्यवान नहीं होती थी तो ये झगड़े प्रतिष्ठा, सम्मान और श्रेष्ठता के लिए होते थे. प्रतिष्ठा, सम्मान और श्रेष्ठता के टकराव में अलगअलग धर्म और संप्रदाय बनते गए. इन के अलगअलग देवता और मंदिर, आश्रम बनते गए. रामायाण काल की बात करें तो विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच टकराव श्रेष्ठता को ले कर ही था. विश्वामित्र ने ऋषि, महर्षि और राजर्षि तक की उपाधि पा ली थी लेकिन कोई उन को ब्रह्मर्षि मानने को तैयार नहीं था. ब्रह्मर्षि की उपाधि वशिष्ठ को मिली थी.

विश्वामित्र ने वशिष्ठ से वैमनस्य रखना शुरू कर दिया. ऐसे संतों की संख्या कम नहीं है. अपनी श्रेष्ठता को बनाए रखने के कारण ही 33 करोड़ देवता और तमाम धर्मसंप्रदाय बनते गए. जैसेजैसे मठ, आश्रमों और मंदिरों में धन संपदा बढ़ने लगी, इन के रूप बदलने लगे. मंदिरों में कब्जे और दानपात्र पर नियंत्रण किया जाने लगा. मंदिरों की कमेटियों में झगड़े शुरू हो गए. मंदिर में ही रखे दानपात्र में एक से अधिक ताले लगने लगे. जिस की वजह यह थी कि जब दानपात्र खुले तो हर वह आदमी वहां मौजूद रहे जिस के पास उस की चाबी होती है. ज्यादातर मठ, मंदिर और आश्रम गुरु-शिष्य परंपरा के होते हैं जहां गुरु ही अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करता है. मठ, मंदिर और आश्रमों पर कब्जा करने के लिए गुरु यानी मंदिर के महंत को अपने पक्ष में करने के लिए शिष्य साम, दाम, दंड, भेद का प्रयोग करने लगे. अगर इस से बात न बने तो बात महंत यानी गुरु की हत्या तक पहुंच जाती है.

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