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बेवफाई- भाग 2: प्रेमलता ने क्यों की आशा की हत्या

‘‘नहीं, न ही सासससुर यहां हैं. ससुर हैं. वे अपने दूसरे बेटे के पास रहते हैं. उन का नंबर हमें मालूम नहीं है.’’

‘‘और क्या जानती हो मैडम के बारे में?’’

‘‘यही कि अखबार में काम करती थीं. साहब दुबई में काम करते हैं, महीने 2 महीने में आते थे… कभी मैडम भी चली जाती थीं. बड़े अच्छे…’’

‘‘प्रेमलता के बारे में जो भी जानती हो विस्तार से बताओ?’’

दया के चेहरे पर क्रोध और घृणा के भाव उभरे. बोली, ‘‘बस इतना ही जानते हैं

कि वे मैडम की बचपन की सहेली थीं. बावरी सी हो जाती थीं मैडम इन्हें देखते ही. जिस छुट्टी के रोज प्रेमलता अचानक दिन में आ जाती थीं, तब चाहे कितना भी काम पड़ा हो उन के आते ही मैडम हमें अपने कमरे में जाने को कह देती थीं यह कह कर कि जब तक न पुकारें आना मत.’’

‘‘प्रेमलता अकसर आती थीं?’’

‘‘हां, रात को भी यहीं रुकती थीं. मैडम भी जाती थीं उन के घर. औफिस से फोन कर के कह देती थीं कि आज प्रेम के घर जा रही हूं. सुबह आऊंगी. दोनों ही नौकरी करती थीं. सो दिन में तो फुरसत होती नहीं थी.’’

‘‘साहब की दोस्ती भी थी प्रेमलता से?’’

‘‘पता नहीं. उन के आने पर तो जब कोई दावत होती थी तभी आती थीं वह और दावत में तो साहब सब से ही हंस कर बात करते हैं.’’

‘‘साहब और मैडम में कभी झगड़ा हुआ प्रेमलता का नाम ले कर?’’

‘‘हमारे साहब व मैडम में कभी झगड़ा नहीं होता था साहब.’’

‘‘माफ करिएगा इंस्पैक्टर, आशा मैडम और दिलीप सर जैसे संभ्रांत दंपती नौकरों के सामने नहीं झगड़ते,’’ स्नेहा बोली, ‘‘और फिर उन के झगड़े का प्रेमलता की हत्या करने से क्या संबंध?’’

‘‘मेरे हर सवाल का संबंध हत्या के कारण से है. आप कहिए. आप को मिला कुछ?’’ देव ने पूछा.

‘‘प्रेमलता के बारे में कुछ नहीं, न ही ऐसा कुछ जिस के बारे में मुझे न मालूम हो.’’

‘‘इस में मैडम की व्यक्तिगत फाइलें भी तो हो सकती हैं?’’

‘‘अगर मैं कहूंगी कि लगता तो नहीं, तब भी आप अपनी शिनाख्त तो करेंगे ही सो कर लीजिए,’’ स्नेहा मुसकराई, ‘‘वैसे मैडम के लैपटौप से ज्यादा प्रेमलता का लैपटौप और ड्राइवर वगैरा इस तहकीकात में मदद कर सकते हैं आप की.’’

देव मुसकराया, ‘‘यहां आने से पहले ही मैं ने अपने सहायक वसंत को प्रेमलता के बंगले पर भेज दिया था और कमिश्नर साहब प्रेमलता के स्टाफ को बुलवा कर उस का औफिस खुलवाने की व्यवस्था करवा रहे हैं. आप ने भी सुना होगा, प्रेमलता ने जातेजाते अपने ड्राइवर को यहां रुकने और पुलिस से सहयोग करने को कहा था. अभी लेंगे उस का सहयोग.’’

तभी स्नेहा का मोबाइल बजा, ‘‘ओके सर… बौडी तो पोस्टमार्टम के लिए ले गए… पुलिस पूछताछ कर रही है. प्रेमलता फिलहाल तो सहयोग नहीं कर रही,’’ मोबाइल बंद कर के स्नेहा ने देव की ओर देखा, ‘‘दिलीप सर का फोन था. वे प्लेन में बैठ चुके हैं और 2 बजे तक पहुंच जाएंगे. मैं एअरपोर्ट जाऊंगी उन्हें लाने.’’

‘‘मेरा विभाग पासपोर्ट, कस्टम और सामान लाने की औपचारिकताएं संभाल लेगा. दिलीप को हम प्लेन से निकलते ही अपने साथ ले आएंगे,’’ देव ने कहा, ‘‘बेहतर होगा आप हमारे साथ चलें.’’

स्नेहा ने सीधे उस की आंखों में देखा, ‘‘आप को दिलीप सर पर शक है?’’

‘‘फिलहाल तो नहीं,’’ देव ने बगैर पलकें झुकाए कहा, ‘‘वैसे शक आप कर रही हैं मेरी सहृदयता पर… एक शोकाकुल व्यक्ति की सहायता कर रहा हूं मानवता के नाते.’’

‘‘ओह सो नाइस औफ यू… रास्ते में पूछताछ नहीं करेंगे?’’ स्वर में व्यंग्य था या जिज्ञासा, देव समझ नहीं सका.

‘‘पहले आप दोनों को बात करने दूंगा. फिर मौका देख कर सवाल करूंगा, क्योंकि बगैर सवाल किए तो इस हत्या की वजह पता चलने से रही और जिस के पास इस सवाल का जवाब है वह जवाब देने से रही. सो यहांवहां सवाल कर के ही अटकल लगानी होगी, मुझे भी और आप को भी,’’ देव ने कहा और फिर स्नेहा को भृकुटियां चढ़ाते देख कर जल्दी से बोला, ‘‘वजह की तलाश तो मेरे से ज्यादा आप को है, क्योंकि आशाजी आप की…’’

‘‘आशाजी मेरी बौस ही नहीं, मेरी बड़ी बहन की तरह भी थीं,’’ स्नेहा ने रुंधे स्वर में बात काटी, ‘‘बड़े प्यार से या यह कहिए बड़े मनोयोग से संवार रही थीं मेरा कैरियर. उन जैसी सहृदया, शालीन महिला की हत्या क्यों हुई और वह भी उन की प्रिय सखी के हाथों, यह जानने को मैं वाकई में बेचैन हूं.’’

‘‘मैं समझ सकता हूं. अच्छा, यह बताइए प्रेमलता आप के औफिस में भी आया करती थीं?’’

‘‘कभीकभार. या फिर उस सार्वजनिक छुट्टी को जब उन की तो छुट्टी रहती थी, लेकिन हमारा औफिस खुला रहता था. तब वे दोपहर को मैडम को लेने आती थीं. स्विमिंग या किसी रिजोर्ट वगैरा में ले जाने को, बिलकुल किसी स्नेहिल बहन या अभिन्न सहेली की तरह और आज उसी सहेली ने बेबात उन का खून कर दिया,’’ स्नेहा का स्वर फिर रुंध गया.

देव ने कुछ देर उसे संयत होने का समय दिया. फिर बोला, ‘‘वही बात तो हमें

तलाश करनी है. प्रेमलता कोई कमसिन किशोरी तो है नहीं जो किसी बात पर चिढ़ कर भावावेश में आ कर किसी का खून कर दे.’’

‘‘खून तो भावावेश में आ कर नहीं सोचसमझ कर किया है इंस्पैक्टर. तभी तो वह रिवौल्वर ले कर आई थी. आप के सहायक ने मैडम के कौल रिकौर्ड चैक कर के बताया तो है कि कल रात मैडम ने देर तक प्रेमलता से बात की थी. आप ने भी गौर किया होगा प्रेमलता की आंखें चढ़ी हुई थीं जैसे रात भर जागी हो. ऐसा क्या कहा होगा मैडम ने जिस के कारण न प्रेमलता रात भर सो सकी और न आशा मैडम को आज का दिन देखने दिया,’’ स्नेहा सिसक पड़ी.

‘‘वही तो हमें पता लगाना है स्नेहाजी. अगर आप ऐसे विह्वल होंगी तो कैसे चलेगा,’’ वासुदेव ने कहा और फिर स्नेहा का ध्यान बंटाने को जोड़ा, ‘‘वैसे अच्छा है कि आप ने खोजी पत्रकार बनना पसंद किया हमारे विभाग में आना नहीं, वरना हम जैसों की तो खटिया ही खड़ी कर देनी थी आप ने.’’

देव हंसा, ‘‘बखिया तो हमारे विभाग की अभी भी उधेड़ती रहती हैं. लेकिन इस बार प्रेमलता की असलियत उधेड़ने में मुझे वाकई में आप की मदद चाहिए. चलिए, आशाजी के बैडरूम को देखते हैं, शायद कुछ मिल जाए.’’

‘‘जब आप खुद ही शायद कह रहे हैं तो फिर दिलीप सर के आने तक रुक जाइए. ऐसे मैडम के बैडरूम में जाना और वह भी उन के न रहने के बाद अच्छा नहीं लग रहा. आप चाहें तो बैडरूम सील कर दें,’’ स्नेहा हिचकिचाई, ‘‘मैं प्रेमलता का घर देखना चाहूंगी.’’

‘‘चलिए. वासुदेव, तुम खयाल रखना कोई किसी चीज से छेड़छाड़ न करे. अगर कोई खास फोन हो तो मुझे बता देना,’’ कह देव उठ खड़ा हुआ, ‘‘बजाय इस के कि आप पुलिस की गाड़ी में चलें, मैं आप के साथ आप की गाड़ी में चलता हूं. फिर उसी में एअरपोर्ट चले जाएंगे.’’

प्रेमलता के सरकारी बंगले पर वसंत एक औफिसनुमा कमरे में बैठा कंप्यूटर चैक कर रहा था.

‘‘कुछ मिला क्या?’’ देव ने पूछा.

वसंत ने मायूसी से सिर हिलाया, ‘‘रूटीन औफिस फाइलें सर. ऐसा कुछ नहीं जिस पर उंगली उठाई जा सके. लेकिन आई पैड में कविताएं भरी पड़ी हैं, शायद रोज ही एक कविता लिखती थीं महापौर…’’

‘‘कहीं उन्हीं कविताओं को छपवाने को ले कर तो झगड़ा नहीं हुआ था दोनों में स्नेहाजी?’’ देव ने वसंत की बात काटी.

‘‘संडे सैनसेशन में कहानियां और कविताएं न छापना मैनेजमैंट की पौलिसी है, जिस में मैडम कोई बदलाव नहीं कर सकती थीं,’’ स्नेहा ने वसंत के कंधे पर झुक कर आई पैड स्क्रीन को देखा, ‘‘और फिर ये कविताएं तो हिंदी में हैं. संडे सैनसेशन में छापने का सवाल ही नहीं उठता? मैं इन्हें पढ़ सकती हूं?’’

‘‘जरूर,’’ वसंत ने आई पैड पकड़ाते हुए कहा, ‘‘प्राय: सभी कविताएं ‘मेरी उम्मीद’ या ‘मेरी उम्मीद की किरण’ को संबोधित हैं. बहुत अच्छी कवयित्री बन सकतीं थीं महापौर अगर उन्होंने उम्मीद को छोड़ कर कोई और विषय भी चुना होता.’’

‘‘लय और छंद का तालमेल बहुत बढि़या है, मेरी जिंदगी है उम्मीद मेरी बंदगी है उम्मीद…’’

‘‘हम यहां कविता पाठ करने नहीं, तहकीकात करने आए हैं,’’ देव ने टोका, ‘‘लगता है वसंत, तुम ने भी अभी तक कविताओं का रसास्वादन ही किया है?’’

‘‘आप ने ही आई पैड चैक करने को कहा था, तो उस में तो कविताएं ही हैं. टेबल टौप में पुरानी रूटीन फाइलें हैं और लैपटौप पर भी औफिस की कोई गोपनीय सूचना नहीं है. प्रेमलता का बैडरूम लौक्ड है. दूसरे कमरों में कुछ भी आपत्तिजनक नहीं है.’’

‘‘मास्टर की से बैडरूम खोल लो,’’ देव ने कहा, ‘‘स्नेहाजी, चलिए पहले बैडरूम देखते हैं.’’

बैडरूम में घुसते ही सब चौंक पड़े.

ज्योति: क्या सही था उसका भरोसा

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‘मरीजों की चिंता सबसे पहले होती है’- डा. नेहा सिंह

डॉक्टरी की पढ़ाई करने वाले अधिकतर लोग निजी क्षेत्र में चिकित्सा सेवा को प्रथमिकता देते है. मिर्जापुर की रहने वाली डॉ नेहा सिंह ने निजी क्षेत्र में काम करने की जगह पर सरकारी अस्पतालों में सेवा करने को प्रथमिकता दी. डॉ नेहा का मानना था कि सरकारी अस्पतालों के जरिये वो गरीब और कमजोर वर्ग से आने वाले लोगो की अधिक सेवा कर सकती है. डॉ नेहा सिंह ने प्रोविंशियल मेडिकल ऑफिसर के रूप में काम करने की चुनौती भी स्वीकार की. उनकी सोंच थी कि अच्छी चिकित्सा व्यवस्था के लिये अच्छे डाक्टर के साथ ही साथ अच्छे प्रोविंशियल मेडिकल ऑफिसर की भी जरूरत होती है. यही नहीं डॉ नेहा ने प्राइवेट सेक्टर में जाकर डाग्नोसिस सेंटर खोलने की जगह पर सरकारी अस्पतालों में प्रोविंशियल मेडिकल ऑफिसर के रूप में काम करने की चुनौती को स्वीकार किया. वह ऐसे लोगो के लिये प्रेरणा का काम करती है जो सरकारी अस्पतालो में काम करके खुशी का अनुभव नहीं कर रहे होते है. डॉ नेहा ने अपने काम से एक अलग छवि बनाई है. जिसकी वजह से मरीज उनकी हर बात मानते है और उनसे अपनी हर बात शेयर करते है.

प्रोविंशियल मेडिकल सर्विस को बनाया अपना कैरियर:

डॉ नेहा सिंह के पिता खुद डाक्टर है. ऐसे में 12 वीं के बाद नेहा ने भी डाक्टर बनने के लिये परीक्षा दी. रूहेलखंड विश्वविद्यालय बरेली में उनको एमबीबीएस करने के लिये प्रवेश मिल गया. वहां से अपनी पढाई पूरी करने के बाद नेहा ने प्रोविंशियल मेडिकल सर्विस में अपना कैरियर बनाने की सोची. पहली ही बार में ही परीक्षा में सफल हो गई. उत्तर प्रदेश के तमाम शहरों के सरकारी अस्पतालों में उन्हें सेवा करने का मौका मिला.

पूर्वी उत्तर प्रदेश के बस्ती और देवरिया में काम करने का उनका अनुभव कैसा रहा? पूछने पर नेहा बताती है, ‘टीबी और चेस्ट विभाग में काम करते वक्त हमने देखा कि ज्यादातर लोग इस बीमारी को शुरुआती दिनों में गंभीरता से नहीं लेते है. इससे बचने की कोशिश नहीं करते है. लोगों को जागरूक होना चाहिये. अपनी सफाई का ध्यान रखना चाहिये. नशे से बचना चाहिये. अच्छा भोजन करना चाहिये.

“अगर कोई दिक्कत हो तो इलाज कराना चाहिये. लापरवाही नही बरतनी चाहिये. टीबी अब पहले जैसा घातक नहीं है पर इससे सावधान रहने की जरूरत है.”

कोरोना संकट में जनता की सेवा:

2020 में जब कोरोना का प्रकोप पूरी दुनिया पर संकट बनकर छाया तो भारत के सामने सबसे बडी समस्या खडी हो गई. ऐसे समय में सरकारी अस्पताल और वहां का आधारभूत ढांचा ही ढाल बनकर कोरोना के सामने खडा हुआ. डॉ नेहा सिंह का अनुभव और साहस भी इसमें बडा सहारा बना. उनकी ड्यूटी बस्ती जिले के सरकारी अस्पताल में लगी थी. इस अस्पताल को एल-2 का दर्जा दिया गया था. जिसका मतलब था कि कोरोना के गंभीर मरीजों का इलाज यहां होता था. वहां काम करना सबसे खतरनाक माना जा रहा था.

यहां काम करना चुनौती से कम नहीं था. डॉ नेहा सिंह ने इस चुनौती को स्वीकार किया. बच्चों और घर परिवार की चिंता छोड दी. वहां 15 दिन ड्यूटी देने के बाद बाकी के 15 दिन क्वारंटीन रहना पडता था. ऐसे में लगातार दो माह तक बच्चों से दूर रही. यह उनके जीवन में पहला अवसर था जब बच्चों से इतने लंबे समय तक दूर रहना पडा.

डॉ नेहा सिंह बताती है ‘मुझे भी एक बार कोरोना हो गया था. उस समय थोडा सा डर लग रहा था. मेरी 8 साल की बेटी और 3 साल का बेटा है. उनकी चिंता हो रही थी. अच्छी बात यह थी कि हमारा परिवार साथ रहता है तो बच्चों की देखभाल हो रही थी. दो माह तक बच्चों से दूर रहना बहुत अलग लग रहा था. दूसरे लोगों की दिक्कतों को देखते हुये हमारी परेशानी कम थी. इस बात को सोंच कर अपना हौसला बनाती रही.’

सशक्त समाज के लिये जागरूक हो महिलाएं:

“साफसफाई के अभाव में महिलाएं तमाम तरह की बीमारियों की शिकार हो जाती है, जिससे उनकी सेहत पर बुरा असर पडता है. सरकारी अस्पताल में काम करते वक्त हमें गांव और छोटेबडे शहरों की महिलाओं से मिलने का मौका मिला. हम उन्हें समझाने का काम करते थे. बहुत सारी महिलाएं सरवाइकल कैंसर से ग्रस्त होने के बाद इलाज के लिये आती थी. सफाई और पीरियडस के दिनो में हाईजीन का ख्याल रखने से महिलाएं तमाम बीमरियों से बच सकती है.”

डॉ नेहा का मानना है कि महिलाओं को अपनी हेल्थ से जुडे विषयों पर जागरूक होना चाहिये. इसके लिये पत्र-पत्रिकाएं पढे. उन्हें केवल मनोरंजन की निगाह से न देखे. इनमें आजकल बहुत सामग्री छपने लगी है. उसे पढ़े और समझे ताकि किसी मुसीबत में न पडे. राजनीति और समाज के दूसरे विषयों को पढ़े और समझे ताकि यह पता चल सके कि समाज और राजनीति में क्या कुछ आपके लिये हो रहा और क्या नहीं हो रहा है.  महिलाएं जागरूक और आत्मनिर्भर रहेगी तो अपने फैसले खुद ले सकेगी और एक सशक्त समाज का निर्माण कर सकेगी.

परिवार है सफलता की धुरी:

डॉ नेहा मानती है कि किसी भी महिला की सफलता में उसके परिवार की भूमिका सबसे अधिक होती है. कोरोनाकाल में मेरा परिवार मेरे बच्चों की देखभाल करने के लिये उपलब्ध न होता तो मै अपने बच्चों को छोड़ कर अपना काम बेहतर तरह से नहीं कर पाती. कैरियर और सफलता के लिये परिवार को ले कर आगे चलना चाहिये. इससे ही मजबूत समाज बनता है.

मुद्दा: स्टंट है समान नागरिक संहिता

एक महा देश जिस में हजारों जातियांउपजातियां बसती हैं और जिन के कट्टरपंथी धार्मिक दुकानदारों की अपनी चलती हो वहां सब को हांक कर एक से कानून के दायरे में ला बांधना भगवा सरकार का केवल स्टंट है.

समान नागरिक संहिता यानी सब के लिए एकजैसा कानून, एकजैसे कायदे, एकजैसे नियम. सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है. समानता का बोध कराता है. मगर भारत जैसे महा देश में जहां अनेक धर्म और हजारों जातियांउपजातियां हैं, जिन के अपनेअपने नियम हैं, परंपराएं हैं, आस्थाएं हैं, रीतिरिवाज हैं. और इन सब से धर्म के दुकानदारों को मोटी आय हासिल होती है. ऐसे में क्या वे किसी एक कानून के दायरे में आने को तैयार होंगे? यह बड़ा सवाल है.

देश के बहुसंख्यक सनातनी क्या अपनी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का त्याग कर उस कानून को अपनाएंगे, जिस कानून के तहत मुसलिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, पारसी, दलित, आदिवासी सभी को उन के समकक्ष खड़ा कर दिया जाएगा? क्या भेदभाव, छुआछूत, आडंबर, अंधविश्वास, जातपांत और गोत्रसमस्या से ग्रस्त हिंदू समाज के पंडित व ब्राह्मण, जिन का पेट धार्मिक कर्मकांडों के ऊपर ही पलता है, यह स्वीकार्य करेंगे कि आम सनातनी धार्मिक कुचक्रों से आजाद हो जाए और अदालतों में जा कर शादी करने लगे?

अगर समान नागरिक संहिता बन गई और लागू हो गई तो संघ और भाजपा के लवजिहाद का क्या होगा? हिंदू युवा वाहिनी, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, हिंदू सेना आदि संगठनों से जुड़े लाखों कट्टरपंथियों के हाथों से तो सारे मुद्दे ही छिन जाएंगे. जब कानून के मुताबिक सब समान हो जाएंगे और विवाह 2 वयस्क नागरिकों की मरजी का विषय होगा तो हिंदूवादी संगठनों की क्या भूमिका बचेगी? फिर कोई ब्राह्मण कन्या दलित लड़के से कोर्ट मैरिज करे या मुसलमान लड़के से, यह उस का अधिकार होगा. इसलिए समान नागरिक संहिता का राग अलापने से पहले भाजपा अपने हिंदूवादी संगठनों से तो पूछ ले कि यह उन्हें स्वीकार्य है भी या नहीं और अगर वे कोई समान नागरिक संहिता मांग रहे हैं तो वह है क्या?

मोतीनगर, दिल्ली के एक छोटे से मंदिर में बैठने वाले पंडित शलभ मणि शर्मा की चिंता इस कारण बढ़ी हुई है कि समान नागरिक संहिता लागू होने से लोग दबाव में शादीब्याह के लिए कोर्ट का रास्ता अपनाने लगेंगे. इस से सनातनी रीतिरिवाजों पर बुरा असर पड़ेगा. लोग अपने धर्मसंस्कार ही भूल जाएंगे. रीतिरिवाज, व्रतकथा सब भूल जाएंगे. उन 7 वचनों का क्या होगा जो विवाह के वक्त दूल्हादुलहन को पंडित द्वारा दिलाए जाते हैं. फिर हमारे यहां तो शादी 7 जन्मों का संबंध है, यह बात दूल्हादुलहन को मजिस्ट्रेट तो बताएगा नहीं. वह तो एक कौन्ट्रैक्ट पर साइन भर करवाएगा और 7 जन्मों का बंधन एक कौन्ट्रैक्ट बन कर रह जाएगा जैसे संपत्ति के मामले में रजिस्टर्ड अनुबंध होता है.

संकट में पुरोहित

समान नागरिक संहिता को ले कर पंडेपंडितों में ही खलबली मची हुई है, अन्य धर्मों के ठेकेदारों की क्या बात करें. दरअसल हिंदू शादियां पंडित कराते आए हैं. संस्कारों और रीतिरिवाजों के नाम पर कईकई दिनों तक चलने वाली सनातनी शादी में एक मध्यवर्गीय परिवार के लाखों रुपए खर्च हो जाते हैं. हजारों रुपए तो शादी कराने वाले बिचौलिए को, फेरे कराने और मंत्र पढ़ने वाले पंडित को दिए जाते हैं, ऊपर से फल, मिठाई, कपड़े, उपहार अलग से मिलते हैं.

पंडितजी यज्ञ कुंड, समिधाएं, घी, हवन सामग्री, प्रसाद, फल, फूल, सुगंध आदि की लंबी लिस्ट जजमान को सौंपते हैं. यह समस्त सामग्री हजारों रुपए की होती है. जिस दुकान से आती है वहां से पंडितजी का कमीशन बंधा होता है. समान नागरिक संहिता तो इन के सारे धंधे चौपट कर देगी. सरकार को पहले पंडितों, पुरोहितों, ब्राह्मणों से इस विषय में विचारविमर्श करना चाहिए.

सनातन शादियों में तो पुरोहितों को बड़ा मान दिया जाता है. पुरोहित यज्ञ का ब्रह्मा कहलाता है. उस को दी जाने वाली दक्षिणा यज्ञ का मुख्य अंग होती है. पुरोहित का जीवन और उस का परिवार शादियों में मिलने वाली भारीभरकम दक्षिणा पर ही पलता है. यजमान की आर्थिक स्थिति का आकलन कर के पुरोहित अपनी दक्षिणा तय करते हैं. ली जाने वाली धनराशि हजारों से ले कर लाखों रुपयों तक होती है. अनेक स्थानों पर तो पुरोहित को कन्या या वर के पिता से दक्षिणा को ले कर लड़ते?ागड़ते भी देखा गया है.

पुरोहित का काम तो विवाह पूर्व ही शुरू हो जाता है. वर के धनी घर की कन्या ढूंढ़ने और कुंडली मिलान करने में ही वे हजारों रुपए यजमान से ऐंठ लेते हैं. फिर विवाह करवाने के बाद दक्षिणा अलग से मिलती है.

अब तो यह दक्षिणा भी सिर्फ रुपयों तक सीमित नहीं रही है, पंडितों को नकद दक्षिणा के साथसाथ महंगे उपहार भी दिए जा रहे हैं. इन उपहारों में फैंसी मोबाइल फोन, म्यूजिक सिस्टम, एलसीडी टीवी, एअरकंडीशनर और महंगे गैजेट से ले कर मोटरबाइक, कार या सब से बड़ा गिफ्ट, अपार्टमैंट तक शामिल हैं.

उपहारों की यह सूची यहीं खत्म नहीं होती. कुछ यजमान तो दहेज में मिलने वाली रकम का एक हिस्सा तक पंडितों को दे देते हैं और ऐसा वे अपनी मरजी से नहीं करते बल्कि पंडितों और यजमान के बीच तय एक डील के तहत उन्हें ऐसा करना होता है. यह डील होती है विवाह के लिए उचित वधू, जो साथ में ढेर सारा दहेज भी लाए, की तलाश करने की. यदि पंडित अपने यजमान के लिए धनी कन्या का रिश्ता ले आते हैं और विवाह तय हो जाता है तो यजमान तय डील के अनुसार दहेज का एक हिस्सा पंडितजी को देते हैं.

बैंडबाजा व बरात बंद

समान नागरिक संहिता जब सब को एक प्लेटफौर्म पर ले आएगी तो पंडितपुरोहितों के काम और सारे ढकोसले बंद हो जाएंगे. लोग कोर्ट मैरिज करेंगे तो मजिस्ट्रेट के सामने कागज पर दूल्हादुलहन और गवाहों के हस्ताक्षर होंगे और बस, चंद मिनटों में शादी हो जाएगी. न डोली न बरात, न हवन या आहुति, न डीजे न शामियाना, न धार्मिक कर्मकांड न वचनों का आदानप्रदान, न लोगों की भीड़, न दावत और न ही कोई ताम?ाम. अब जिस ने शादी ही कोर्ट के माध्यम से की होगी वह आगे के सभी संस्कारों, धार्मिक क्रियाकलापों से भी दूर हो जाएगा.

जिन धार्मिक कर्मकांडों में पंडितजी अग्रणीय भूमिका निभाते हैं जैसे, जन्मकुंडली बनाना, गोदभराई, बच्चे का नामकरण, छठी, अन्नप्राशन आदिआदि, समान नागरिक संहिता लागू होने से उन के तो पेट पर सीधे लात पड़ेगी तो सवाल यह कि बहुसंख्यक समुदाय और ब्राह्मण समाज क्या इस बदलाव के लिए तैयार होगा? समान नागरिक संहिता बनेगी तो उस में सिर्फ कोर्ट मैरिज ही मान्य हो सकती है क्योंकि हरेक धर्म के अथवा रीतिरिवाजों को समाप्त करना ही इन का उद्देश्य होगा. फिर न चर्च में शादी होगी, न मसजिद में न मंदिर में और न गुरुद्वारे में.

जिस देश की राजनीति आज सिर्फ धर्म, आस्था, परंपरा व रीतिरिवाज के ऊपर ही चल रही है, संघ और भाजपा, जो एक ओर धार्मिक आडंबरों और सांस्कृतिक परंपराओं व विरासतों को सहेजने व उन को पुनर्स्थापित करने में अपनी जान दिए दे रहे हैं, वहां समान नागरिक संहिता का ढिंढोरा पीटना घोर विरोधाभासी बात है. यह दोमुंहापन है. भारत के लोगों को धोखा देना है.

समान नागरिक संहिता से देश में क्या बदल जाएगा? कहा जा रहा है कि इस से शादी, तलाक, गोद लेना, संपत्ति का अधिकार जैसे मामलों में हर धर्म को एक ही प्लेटफौर्म पर लाया जाएगा. यानी सभी धर्मों के पर्सनल कानून समाप्त कर दिए जाएंगे और तमाम विवादित मामलों का फैसला देश की अदालतों में होगा.

यानी हिंदू आदमी अपनी पत्नी को तलाक देना चाहे या मुसलमान आदमी, दोनों की सुनवाई एक ही कानून के तहत होगी. यानी यूनिफौर्म सिविल कोड लागू होने से हर मजहब के लिए एकजैसा कानून आ जाएगा. जैसे हिंदुओं को

2 पत्नियां रखने की इजाजत नहीं वैसे मुसलिमों को भी 4 शादियों की इजाजत नहीं मिलेगी. जैसे हिंदू पतिपत्नी बिना अदालत से पूछे तलाक नहीं ले सकते वैसे ही मुसलिम पति भी 3 बार तलाक कह कर पत्नी से छुटकारा नहीं पा सकता. लेकिन क्या यह इतना आसान होगा? कैथोलिक ईसाई फिर तलाक दे सकेंगे, गर्भपात उन के लिए बंदिश नहीं होगी?

उदाहरण के लिए शाहबानो का केस देख लें. 36 साल बीतने के बाद भी क्या मुसलिम शादियों में तलाक के साथ मेहर वापसी और महिला को कोई गुजाराभत्ता न मिलने वाली स्थिति में तनिक भी परिवर्तन आया है? हालांकि देश में इस के लिए कानून है और मुसलिम महिला चाहे तो गुजारा भत्ता की याचिका के साथ कोर्ट जा सकती है, लेकिन क्या वह जाती है? नहीं. वह धर्म और धर्म के ठेकेदारों के दबाव में नहीं जाती. दूसरी तरफ ऐसे मामलों की संख्या भी नगण्य है जहां कोर्ट ने मुसलिम महिलाओं को गुजारा भत्ता दिलाया हो.

अब मान लें कि समान नागरिक संहिता लागू होने पर कोर्ट से मुसलिम औरत गुजारा भत्ता पाने की हकदार हो जाती है तो फिर सवाल मेहर पर उठेगा कि जब तलाक की हालत में गुजाराभत्ता देना पड़े तो मेहर का क्या औचित्य है? मेहर खत्म करने का मतलब है आप मुसलिम कानून से छेड़छाड़ करेंगे या उस को खत्म कर देंगे. मुसलिम औरत को मेहर के रूप में जो सुरक्षा मिलती है वह क्या हिंदू औरतों को भी मिलेगी?

शिगूफा छोड़ने में माहिर सरकार

सत्ता के नशे में चूर भाजपा की केंद्र सरकार यह भूल गई है कि मामला सिर्फ मुसलमान का नहीं है, समान नागरिक संहिता लागू होगी तो सिख, पारसी, जैन, बौद्ध, दलित, आदिवासी सब पर लागू होगी. सभी में धर्म के ठेकेदार बैठे हैं जो अपने नियमकानूनों में बदलाव के खिलाफ होंगे तो समान नागरिक संहिता का ढिंढोरा पीटने से पहले क्या इस की गहराई में जा कर यह देखने की कोशिश नहीं होनी चाहिए कि बदलाव किस हद तक स्वीकार्य होगा? होगा भी या नहीं?

हर धर्म के नेताओं से चर्चा करने, उन्हें मनाने, उन्हें समाधान देने, समाधान स्वीकार होने आदि में कितना लंबा वक्त लगेगा, इस का विचार किए बिना चुनावी माहौल में वोट पाने के लिए एक शिगूफा छोड़ देना सिर्फ स्टंट है.

मुसलमान के कंधे पर राजनीति की बंदूक रख कर चलाने वाली भाजपा को यह सम?ाना चाहिए कि बीते 2 दशकों में मुसलिम समाज में भी काफी बदलाव आ चुके हैं. 4 शादियां और 40 बच्चे जैसी अतिशयोक्तियों को चुनाव के समय उछालने वाले यह बताएं कि हिंदुस्तान में कुल कितने मुसलिम मर्दों ने 4 शादियां की हैं और 40 बच्चे पैदा किए हैं? ऐसा एक भी उदाहरण उन्हें ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेगा. पढ़ालिखा मुसलमान 2 बच्चों से आगे नहीं बढ़ता है.

हाल ही में जबलपुर में मुसलिम धर्मगुरुओं की बैठक में मुसलिम समाज से आह्वान किया गया है कि शरिया कानून के तहत मुसलिम समाज में शादीविवाह भी बेहद सादगी के साथ होने चाहिए, जिस में परिवार के सदस्य मौजूद रहें और दोनों पक्ष सहमति से परिजनों के साथ सहभोज कर विवाह संपन्न कराएं.

मुसलिम धर्मगुरुओं ने कहा कि मुसलिम समुदाय में शरिया कानून के तहत शादियों में बैंडबाजा और दूल्हादुलहन का नाचनागाना वर्जित है. यानी इसे शरिया के खिलाफ माना गया है. बावजूद इस के, लोग आधुनिकता और दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा के चक्कर में शादी, निकाह में फुजूलखर्ची कर रहे हैं.

बीते कई वर्षों में मुसलिम शादियों में सामूहिक भोज, बैंडबाजा, डीजे और अन्य चीजों का चलन शुरू हो गया है. इस में लाखों रुपए खर्च होते हैं. इन सब के बिना भी शादियां हो सकती हैं. ऐसे में फुजूलखर्च न कर के परिवार की संपत्ति को बचाया जा सकता है और नवविवाहित जोड़े के भविष्य के लिए उस पैसे का उपयोग किया जा सकता है.

मौलाना मुशाहिद रजा ने कहा कि कई बार दूसरे से प्रतिस्पर्धा के चक्कर में लोग कर्ज ले कर शादियां करते हैं. परिवार का मुखिया कर्ज के बो?ा के तले दब जाता है. बैठक में अनेक मुसलिम धर्मगुरुओं ने अपने सु?ाव दिए हैं.

जब समान नागरिक संहिता की बात आती है तो यह भी ध्यान देना होगा कि निचली जातियों, आदिवासियों, दलितों, मुसलिमों आदि में गोत्र आदि को मानने का चलन नहीं है, इस का चलन सिर्फ हिंदू सनातनी समाज में है. भारतीय कानून के मुताबिक भी कोई वयस्क एकाकी पुरुष किसी वयस्क एकाकी स्त्री से विवाह करने के लिए आजाद है तो पहले संघ और भाजपा को देश के बहुसंख्यक सनातनियों से यह बात पूछनी चाहिए कि क्या वे इस बात को स्वीकार करेंगे कि शादी की इच्छा रखने वाले अपने गोत्र में या दूसरी जाति अथवा धर्म में जा कर रजिस्टर्ड मैरिज कर लें? अभी तो धर्म का डर दिखा कर युवाओं को काफी हद तक कंट्रोल कर लिया जाता है.

कैसे आएंगे एक प्लेटफौर्म पर

दक्षिण भारत में हिंदू समाज के एक तबके में मामा और भांजी के बीच शादी की प्रथा है. अगर कोई हरियाणा में ऐसा करे तो दोनों की हत्या कर दी जाएगी. ऐसी सैकड़ों जातियां हैं जिन के शादी के तरीके और नियम अलगअलग हैं.

समान नागरिक संहिता लाने से पहले क्या भारत की हर जाति और धर्म की परंपराओं, आस्थाओं, रीतिरिवाजों, रहनसहन, आर्थिक स्थिति का गहराई से आकलन करने की जरूरत नहीं है? और क्या यह काम इस महादेश में कुछ महीने या साल में पूरा होना संभव है?

रौनक मैसी रोमन कैथलिक हैं. वे कहते हैं, ‘‘हमारे यहां तलाक की कोई गुंजाइश नहीं है. शादी हमारे यहां जन्मजन्मांतर का बंधन है. अगर यूनिफौर्म सिविल कोड लागू हुआ तो हमारे लोगों में धर्म की सीख खत्म हो जाएगी और तलाक लेने की प्रवृत्ति बढ़ेगी.’’

दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के सदस्य राणा परमजीत सिंह कहते हैं, ‘‘हमारी यह बहुत पुरानी मांग रही है कि हमें हिंदू सक्सेशन एक्ट के अधीन न लाया जाए. हमारे सब से पहले गुरु गुरुनानक देवजी ने कभी जनेऊ नहीं पहना था. हम इस संघर्ष में लगे हैं कि हमें अलग धर्म के रूप में मान्यता मिले, मगर हमारे मामलों का निबटारा हिंदुओं के लिए बनाए गए कानून के तहत किया जाता है. हमारा पूरा सिस्टम गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार चलता है और आगे भी चलेगा. हमारे यहां तलाक नाम की चीज नहीं है. हम चाहते हैं कि सरकार बातचीत करे, न कि कोई कानून बना कर किसी पर जबरदस्ती थोप दे.’’

अधिवक्ता रवि वर्मा कुमार कर्नाटक के स्कूलकालेज में हिजाब पर उठे बवाल पर कहते हैं, ‘‘अकेले हिजाब का ही जिक्र क्यों है जब दुपट्टा, चूडि़यां, पगड़ी, क्रौस और बिंदी जैसे सैकड़ों धार्मिक प्रतीक चिह्न लोगों द्वारा रोजाना पहने जाते हैं. बिंदी लगाने वाली लड़की को तो आप क्लास से बाहर नहीं भेज रहे, चूड़ी पहने लड़की को भी नहीं, सिंदूर लगाने वाली को भी नहीं, क्रौस पहनने वाली ईसाइयों को भी नहीं, केवल मुसलिम लड़कियों को ही क्यों? यह संविधान के आर्टिकल 15 का सरासर उल्लंघन है.’’

गौरतलब है कि ‘समान नागरिक संहिता’ जिस को ले कर भाजपा इतना शोर मचा रही है, कोई नया विषय नहीं है. ऐसा लग रहा है जैसे भाजपा देश के नागरिकों के बीच समानता लाने के लिए प्रयत्नशील है, जबकि इस मुददे पर संविधान निर्माताओं ने देश का संविधान लिखते समय खूब विमर्श किया था.

भारतीय संविधान की ड्राफ्ट कमेटी के अध्यक्ष डा. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा की बहसों में समान नागरिक संहिता के पक्ष में अपनी बात मजबूती से रखी थी. हमारे संविधान में समान नागरिक संहिता को लागू करना अनुच्छेद-44 के तहत राज्य की जिम्मेदारी के तौर पर दर्ज भी है. बावजूद इस के बीते 7 दशकों में इस पर कोई कार्य इसलिए नहीं हो पाया क्योंकि एक बहुलतावादी देश जहां अनेकानेक धर्मों, संप्रदायों, जाति, वर्ण और क्षेत्र मौजूद हैं, उन के बीच समानता के बिंदु खोजना एक दुष्कर कार्य है. इस पर जो होहल्ला चुनाव के दौरान भाजपा मचा रही है, बता दें कि उस के पास भी अभी तक इस का कोई प्रारूप या ड्राफ्ट नहीं है. यह हल्ला बिना ड्राफ्ट के ही मचाया जा रहा है.

बस चुनावी चोंचला

हाल ही में हुए 5 राज्यों में विधानसभा चुनावों में भी भाजपा ने ‘समान नागरिक संहिता’ लाने का खूब बढ़चढ़ कर प्रचार किया. भाजपा नेता हर चैनलअखबार में कह रहे थे, ‘‘इस से देश के हर नागरिक को समान अधिकार हासिल हो जाएगा, देश में समानता आ जाएगी.’’ हालांकि समानता का अधिकार तो देश के संविधान ने पहले ही सब को दिया हुआ है लेकिन भाजपा नेताओं के मुंह से सुन कर लग रहा था जैसे भाजपा ही देश में समानता लाएगी. गरीब, अनपढ़, अछूतों का सीना यह सुन कर फूल जाता है कि उन को भी एक ब्राह्मण के बराबर का दर्जा मिल जाएगा, पर क्या संघ और भाजपा की सचमुच ऐसा करने की मंशा है? क्या एक दलित को घोड़ी पर बैठ कर बैंडबाजे के साथ अपनी बरात निकालते वह देख सकेगी?

यह ढिंढोरा बस, चुनाव समाप्ति तक ही पीटा गया. इस के द्वारा सिर्फ यह दिखाने की कोशिश की गई कि इस से मुसलमान को 4 शादियों से रोका जा सकेगा. ऐसा संदेश दे कर उत्साहित हिंदुओं के वोटों से अपनी ?ाली भरने की भाजपा की एक चाल थी. दरअसल मोदी सरकार को नएनए शिगूफे छोड़ने की लत लगी हुई है.

10वीं में फेल होने के बाद से मेरे पेरैंट्स मुझे बेवजह तनाव में रखते हैं, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 15 वर्षीय किशोरी हूं. मेरी समस्या यह है कि मेरे माता पिता जब तब मुझ पर बिफरते रहते हैं. मां तो मेरी जासूसी करती लगती हैं. इसलिए मुझे उन के साथ बात करना अच्छा नहीं लगता. मैं ने 10वीं की परीक्षा दी थी, जिस में मैं फेल हो गई थी. मेरे पेरैंट्स मुझे बेवजह तनाव में रखते हैं. मैं क्या करूं?

जवाब

आप की समस्या से यह तो साफ जाहिर है कि आप के मन में अपने पेरैंट्स के लिए रिस्पैक्ट का अंशमात्र भी नहीं है. बढ़ती उम्र में अकसर पेरैंट्स बच्चों पर इसलिए भी निगरानी रखने लगते हैं कि कहीं वे बहक न जाएं, लेकिन इसे आप जासूसी कह कर अपनी मां का तिरस्कार कर रही हैं. आप सब से पहले अपना व्यवहार बदलिए, माता पिता को सम्मान का दर्जा दीजिए. उन की सुनिए, अगर वे कुछ कह रहे हैं तो एक बार मान कर देखिए, अगर उन की बात उचित नहीं लगती तो तरीके से समझा कर उन के सामने अपना मत रख सकती हैं. पेरैंट्स आप को तनाव में नहीं रख रहे आप का नकारात्मक दृष्टिकोण आप के दिमाग का संतुलन बिगाड़ रहा है, जिस से आप सहीगलत में भेद कर पाने में असमर्थ हैं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

घरेलू हिंसा: औरतों को राहत नहीं

अपराध व हिंसा की शिकार स्त्रियों के प्रतिशत में पिछले कुछ सालों में वृद्धि ही हुई है, कमी नहीं. यह समाज वैज्ञानिकों, समाज सुधारकों, शुभचिंतकों व अन्यों के लिए एक गहन चिंता का विषय बना हुआ है क्योंकि नारी को पुरुष द्वारा सुरक्षा के बदले शोषित, तिरस्कृत, अपमानित, उपेक्षित, उत्पीडि़त किया गया है. पुरुष पशुओं की भांति व्यवहार भी करता रहा है.

आज भी स्त्री के प्रति तमाम प्रकार के अपराध होते रहते हैं. जैसे दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, अपहरण, कन्याभ्रूण हत्या, लैंगिक दुर्व्यवहार, बलात्कार, शिशु हत्या आदि तमाम प्रकार के अपराधों की शिकार महिलाएं ही होती हैं.

शिक्षित रूसी सैनिक यूक्रेन में आक्रमण के दौरान जीभर कर वहां की औरतों का रेप कर रहे हैं और राष्ट्रपति पुतिन चुप बैठे हैं.

समाजशास्त्री राम आहूजा के अनुसार, हिंसा अपराध 3 प्रकार के होते हैं.

प्रथम, पुरुष द्वारा स्त्री के प्रति आपराधिक हिंसा की प्रवृत्ति के कारण किए जाने वाली हिंसा, जैसे बलात्कार, अपहरण एवं हत्या आदि हैं.

दूसरे, हिंसा का संबंध परिवार में महिला के साथ किए जाने वाले मानसिक, शारीरिक उत्पीड़न से है. जैसे दहेज हत्याएं, पत्नी को पीटना, विधवाओं पर अत्याचार करना आदि घरेलू हिंसा के अंतर्गत आती हैं.

तीसरे, सामाजिक हिंसा के अंतर्गत भ्रूण हत्या के लिए पत्नी, बहू को विवश करना तथा उन के साथ छेड़छाड़, विधवा युवती को सती होने के लिए विवश करना, बहुओं को अधिक दहेज लाने के लिए उत्पीडि़त करना एवं महिलाओं को संपत्ति में हिस्सा न देना आदि ये सभी हिंसक वारदातें तीसरी श्रेणी की हैं.

सामाजिक हिंसा के अंतर्गत यौन शोषण व यौन उत्पीड़न को शामिल किया जाता है. एक और श्रेणी है, एक जाति, धर्म द्वारा दूसरी जाति, धर्म की औरतों से बदला लेने के लिए रेप करना. यह सदियों से चला आ रहा है और सभी धर्म व शासन इसे अपने सैनिकों, भक्तों के लिए इनाम की तरह मानते रहे हैं.

घरेलू हिंसा का अर्थ

घरगृहस्थी के अंदर महिला के साथ किया जाने वाला शारीरिक, मानसिक उत्पीड़न या प्रताड़ना है. महिलाओं के प्रति अन्य आपराधिक हिंसाओं में पढ़ाईलिखाई के बावजूद वृद्धि हो रही है. साथ ही घरेलू हिंसाएं भी कम नहीं हो रही हैं.

हर महिला विवाह से पहले व विवाह के समय बहुत सुंदर सपने देखती है तथा उसे संजोती है कि अब प्रेम, शांति तथा आत्म उपलब्धि से पूरिपूर्ण जीवन की शुरुआत होगी परंतु इस के विपरित अनेक विवाहित स्त्रियों के सपने एक पल में ही चकनाचूर हो जाते हैं, क्योंकि पति की मारपीट और यातना का अंत न होने वाली लंबी अंधेरी गुफाओं में पत्नी अपनेआप को अकेली पाती है जहां उस का चीखनाचिल्लाना, गुहार सुनने वाला कोई नहीं होता.

भारतीय समाज व्यवस्था में तो ऐसी मारपीट का खुलासा करने में भी लज्जा आती है. यदि वे शिकायत की पहल करती हैं तो हमारे यहां पिछड़ी और दलित जातियों की बड़ीबूढ़ी औरतें उन्हें ही दोष देती हैं या फिर उन्हें चुपचाप सहन करने की सलाह दी जाती है.

सच यह है कि जोरू के मामले में अन्य लोग हस्तक्षेप नहीं करते क्योंकि यह मामला आदमीऔरत का निजी माना जाता है. यदि औरत थाने में रिपोर्ट दर्ज कराने जाती है तो वहां पहले से ही समाज के बड़े पुलिस अधिकारी व कर्मचारी उसी विचारधारा या सोच के होते हैं. महिला को कमजोर समझ कर उस का मजाक उड़ाते हैं तथा रिपोर्ट दर्ज करने में आनाकानी करते हैं और रिपोर्ट दर्ज भी नहीं करते.

धर्मसत्ता हावी

घरेलू हिंसा की शिकार या अन्य हिंसा की शिकार महिलाएं कितनी ही बार थाने में पुलिस अधिकारी की छेड़छाड़, यौन शोषण का शिकार हो जाती हैं. एक पीडि़ता होमगार्ड की बहू को पुलिस इंस्पैक्टर अकेले चैंबर में बुला कर 4 घंटे अर्धनग्न कर यह जांच करता रहा कि कहां खरोच आई है. इस तरह की तमाम घटनाएं घटती रहती हैं.

समाज में या थाने में लोग या कर्मचारी कहते हैं कि स्त्री इस के लायक होती है, इसलिए पत्नी को पुरुष की पिटाई का निरपेक्ष अधिकार है. ऐसी घटना केवल कम पढ़ेलिखे परिवारों में ही नहीं हो रहीं बल्कि बड़े घरों, सम्मानित परिस्थिति वाले परिवारों में जहां के लोग पढ़ेलिखे और आत्मनिर्भर हैं वहां भी मारपीट की घटनाएं आम बात हो गई हैं.

पिता द्वारा अपनी अविवाहित बेटियों तथा भाई द्वारा अपनी बहनों को मारनापीटना आज भी हक माना जाता है. औरतें अपने सगेसंबंधी, पड़ोसी, पुलिस, जज, वकील आदि से शिकायत भी करती हैं तो ऐसे में सारे लोग उन्हें समझौता करने की राय देते हैं और व इस के लिए दबाव भी बनाते हैं.

सच यह है कि पतिपत्नी को मांबाप भी सलाह देते हैं कि पत्नी अपने पति को सर्वस्व और परमेश्वर माने चाहे पति छोटीछोटी बातों में तानाशाही दिखाए. स्त्री पति को ईश्वर समझती है, बावजूद इस के पति (ईश्वर) के अत्याचार और उत्पीड़न सहती है. यहां तक कि परिवार में किसी भी प्रकार के नुकसान को पत्नी के सिर मढ़ कर पीटने की घटनाएं तो आम हैं.

पति की अकाल मृत्यु हो या पति की मां या बहन की, अगर पत्नी नई है तो उसे अपशकुनी कहने में देर नहीं लगती और उस से बहुत हिंसात्मक व्यवहार होते हैं, जिस के पीछे धर्म प्रचारक ही होते हैं. हिंसा, चोट, लात मारने से ले कर हड्डी तोड़ना, यातना देना, मार डालने की कोशिश और हत्या तक भी की जाती है. ऐसे में कितनी महिलाएं अपने पति व परिवार के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा पाएंगी या करा पाती होंगी जहां धर्मसत्ता पूरी तरह हावी है.

घरेलू हिंसा के स्वरूप

धर्म के प्रवचन सुनसुन कर बढ़ेपले भारतीय समाज में लड़केलड़कियों के पालनपोषण में पूर्णरूप से पितृसत्ता हावी है जिस के फलस्वरूप लड़कियों को कमजोर, लड़कों को ताकतवर बनाया जाता है. लड़कियों को घर का सारा काम सौंप दिया जाता है और लड़के काम में हाथ तक नहीं बंटाते हैं.

इस तरह से लड़कियों के स्वतंत्र व्यक्तित्व को प्रारंभ से ही कुचला जाता है. कानून की दृष्टि में महिला के प्रति घरेलू हिंसा अपराध माना गया है और पुलिस का दायित्व है कि ऐसे मामलों की जांच करे. घरेलू हिंसा के रूप में दहेज हत्याएं, बलात्कार, लैंगिक दुर्व्यवहार, हत्या तथा शिशुहत्या, अपहरण और अगवा करना आदि शामिल हैं.

दहेज हत्याएं : भारतीय समाज व्यवस्था में विवाह हेतु दहेज अनिवार्य है, जिस से दहेज की समस्या एक गंभीर समस्या बनती जा रही है. शायद ही कोई ऐसा दिन होगा जब दहेज उत्पीड़न, दहेज हत्या का मामला समाचारपत्रों, टीवी चैनलों पर न पढ़ा व देखा गया हो.

महिलाओं के पक्ष व दहेज हत्या के विरुद्ध कई कठोर कानून बनाए गए हैं. बावजूद इस के, दहेज हत्याएं सामने आती हैं जहां पीडि़ता पक्ष ने हिम्मत के साथ पुलिस थाने में जा कर रिपोर्ट दर्ज कराई. तमाम महिलाओं के तो ऐसे मामले दर्ज नहीं किए जाते अगर पति का पक्ष रसूखदार है या पुलिस को वह खरीद सका है.

कुछ समय पूर्व यह केवल उच्च एवं मध्यवर्ग तक ही सीमित था, लेकिन अब यह निम्नवर्ग में भी संक्रामक रोग की तरह फैलता गया है. दहेज प्रथा व उस के उत्पीड़न, दहेज हत्या रोकने हेतु कई कानून हैं. उन्हें समय व परिस्थितियों के अनुसार प्रभावी बनाने के लिए संशोधन भी किए जा रहे हैं.

लेकिन अब इस का जम कर दुरुपयोग भी हो रहा है और इसलिए पुलिस वाले व अदालतें विवाह बचाने के चक्कर में हिंसा के मामलों में भी बीचबचाव ही करने की कोशिश करते हैं. जब मृत्यु हो जाए तो मामला गंभीर होता है पर मृतका के पति को सजा देने से लाभ क्या है. यह न्याय उस औरत को नहीं मिल रहा जो हिंसा की शिकार हुई.

पुरुष वर्चस्व वाली संस्था परिवार में किसी भी अपराध से बचने के लिए कोई न कोई उपाय ढूंढ़ ही लेते हैं. असाधारण मृत्यु दहेज हत्या को साधारण मृत्यु बता कर पुरुष थाने व अन्य जगहों पर घूस दे कर सजा से मुक्त हो जाता है और समाज में स्वतंत्र जीता है. इस तरह वह औरों के साहस को बढ़ावा देने में प्रेरक सिद्ध होता है. इन कानूनों के अलावा भी समय व परिस्थितियों के अनुसार न्यायालयों द्वारा कानून प्रतिपादित किए गए हैं. इन में स्वयंसेवी संगठनों को भी एफआईआर दर्ज करने का अधिकार दिया गया है और इस में आत्महत्या करने वाली स्त्री द्वारा आत्महत्या पूर्व लिखा किसी भी पत्र को साक्ष्य के तौर पर मानने की अनुमति है.

तमाम कानूनों के बावजूद दहेजप्रथा का प्रसार बहुत तेजी से हो रहा है, क्योंकि कानून केवल कागजों तक ही सीमित हैं और इसे चलाने वाले पौराणिक विचारधारा के लोग हैं. वे आसानी से पुरुष को सजा पाते नहीं देखना चाहते हैं. वे महिला से अपनेआप को श्रेष्ठ समझते हैं.

हमारे शास्त्रों में महिला को बारबार शूद्र कहा गया है. तुलसीदास कहते हैं कि शूद्र, गंवार, ढोल, पशु, नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी. इस के अनुसार ही भारतीय पुरुषों की मानसिकता बनी हुई है. इस को बढ़ावा देने में पुलिस प्रशासन का विशेष योगदान है. घरेलू हिंसा का चाहे कोई भी रूप हो- दहेज उत्पीड़न, दहेज हत्या, यौन शोषण, लैंगिक दुर्व्यवहार या कन्याभ्रूण हत्या हो इन्हें रोकने के लिए ब्राह्मणवादी सोच व पितृसत्तात्मक सोच को बदल कर समाज में महिलाओं को पुरुषों के बराबर समझना व व्यवहार में लाना होगा, पर यहां तो आज उलट हो रहा है और पुराणों का गुणगान किया जा रहा है.

जिस समाज में कन्याभ्रूण हत्या आम हो और उस में औरत स्वयं और उस के मातापिता भी शामिल हों वहां औरतों के प्रति हिंसा तो आम है ही. दलित और पिछड़ी औरतों को ऊंची जातियों से

इतनी दुत्कार मिलती है कि वे घर की मारपीट को सहने की आदी हो जाती हैं. पढ़ीलिखी और कमाऊ दलित व पिछड़ी औरतों को धर्म पर भी भरोसा कुछ ज्यादा होता है कि उन्हें देवीदेवता बचाने आ जाएंगे, जो कभी नहीं आते.

खुद पर भरोसा जरूरी

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो 2015 के सर्वे में पाया गया कि 56 प्रतिशत औरतों को मानसिक या शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ा. जो औरतें अब पढ़ भी ली हैं, वे भी मारपीट से मुक्त नहीं हैं क्योंकि पति जानता है कि कमाऊ होने के बावजूद औरत के पास कोई और ठिकाना नहीं है.

हमारे यहां ऐसी पौराणिक कहानियां भरी हुई हैं जिन में पति के लिए हर बलिदान औरतों के लिए पुण्य का काम है और वे अकसर इसी भुलावे में पति की हिंसा को सहती हैं कि यह तो उन के जीवन में ही लिखा है.

ऊंचे घरों की इंग्लिश पढ़ीलिखी औरतें तो फिर भी अपने हकों को समझती हैं पर पहलीदूसरी पीढ़ी की पिछड़ी व दलित जातियों की औरतों का रहनसहन शिक्षा के बावजूद नहीं बदला है और वे जानकारी के अभाव में हिंसा का मुकाबला नहीं कर पातीं.

पिछड़े व दलित घरों की पढ़ीलिखी औरतों को स्कूली या कालेज की शिक्षा के बाद कुछ पढ़ने नहीं दिया जाता और उन्हें कमजोर बनाए रखने के हजार प्रपंच किए जाते हैं. जब तक औरतों में अपना भरोसा नहीं होगा कि वे हिंसक पुरुष को छोड़ सकती हैं, तब तक वे हिंसा का शिकार बनती रहेंगी.

कैसे ये दिल के रिश्ते- भाग 2: क्या वाकई तन्वी के मन में धवल के प्रति सच्चा प्रेम था?

निराश हो कर हम उन के घर से लौट आए. हम ने तो तन्वी को विवाह की स्वीकृति नहीं दी पर वह जिद करकर के धवल को राजी करने में सफल हो गई थी. धवल ने भावुक स्वर में कहा था, ‘मां, मैं तन्वी से विवाह करना चाहता हूं. उस का असीम प्यार देख कर मुझे नहीं लगता कि वह जीवन में किसी और पुरुष को स्वीकार कर पाएगी. हमें उस के प्यार की कद्र करनी चाहिए.’

हार कर फिर हम ने भी हथियार डाल दिए थे. सादे से समारोह में वे पतिपत्नी बन गए. ज्यादा भीड़ नहीं जुटाई थी हम ने. खास लोगों को ही बुलाया था. बड़े बेटे वत्सल को इस विवाह की सूचना नहीं दी. उस का स्वभाव उग्र है. हमें डर था कि वह आ कर हम से लड़ेगा और धवल को भी इस पागलपन के लिए डांटेगा.

धवल का मन रखने के लिए हम दुखी मन से उस के विवाह में शरीक हुए.

दुलहन बनी तन्वी बहुत सुंदर लग रही थी. हंसहंस कर वह परिचितों का स्वागत कर रही थी. उस के मातापिता हर आगंतुक के सामने बेटी के सच्चे प्यार और महान त्याग का बखान कर रहे थे. हर मेहमान नवदंपती के प्यार पर आश्चर्य प्रकट करता तन्वी की तारीफ कर रहा था.

मुझे यह सब बहुत अजीब लग रहा था. न जाने कैसे मातापिता थे वे, बेटी का संभावित वैधव्य उन के दिलों को क्यों नहीं दहला रहा था? मैं तो जितनी भी बार तन्वी को देखती, जी भर आता. इस का यह शृंगार कुछ ही दिनों का है, फिर इसे जीवन भर शृंगारविहीन रहना है, यह सोच कर कलेजा मुंह को आ रहा था. पकवानों से मेजें सजी थीं, पर मैं एक ग्रास भी गले से नहीं उतार पाई.

चढ़ावे में बेमन से चढ़ाया पन्ने का सैट तन्वी पर खूब फब रहा था. धवल और वत्सल दोनों ही बेटे मेरे लिए समान थे, मगर न जाने क्यों वत्सल की शादी में 5 सैट जेवर चढ़ावे में चढ़ाते समय मैं जरा भी नहीं हिचकिचाई थी, पर तन्वी को एक सैट जेवर देना भी मुझे अखर गया था. पति की यादों के सहारे किसी को जिंदगी गुजारते देखा न हो, ऐसी बात नहीं थी पर तन्वी को देख कर यह यकीन नहीं आता था कि वह धवल का नाम ले कर जी लेगी.

विदा के समय तन्वी मातापिता और रिश्तेदारों से गले मिल कर कुछ ज्यादा ही रोई थी और फिर दुलहन की तरह वह भी पिया के घर आ गई थी. शहरभर में इस विवाह की खूब चर्चा हुई. स्थानीय अखबार तन्वी की तारीफों से भरे थे. इस प्रेमी युगल की लैलामजनूं, सोहनीमहीवाल, हीररांझा, शीरींफरहाद आदि से तुलना की गई.

कई अखबारों ने तन्वी को पुरातन प्रेमिकाओं से भी ज्यादा महान बताया, क्योंकि उन के प्रेमी धवल की तरह चंद महीनों के मेहमान नहीं थे. तन्वी ने यह जानते हुए भी कि धवल का साथ कुछ ही समय का है, फिर भी उस से विवाह किया था. सारे शहर के साथसाथ हम भी चकित थे.

विवाह के बाद तन्वी ने धवल की प्राणपण से सेवा की. उसे पक्का विश्वास था कि वह पति को यमराज से छीन लेगी. धवल के प्रति उस की निष्ठा देख कर मैं द्रवित हो उठती और मन ही मन पछताती कि मैं ने तन्वी के बारे में बिना किसी प्रमाण के कितनी गलत धारणा बना ली थी. चेहरा दिल का आईना होता है, तन्वी ने इस बात को गलत साबित कर दिया था. बेचारी लड़की, रातदिन जुटी रहती थी पति की सेवा में.

इसी दौरान तन्वी ने बताया कि वह गर्भवती है. इस समाचार को सुन कर हम खुश नहीं हुए. उस अभागे शिशु ने जन्म से पहले ही पिता को खो देना था. हमें यह भी आशंका थी कि कहीं उसे पिता की बीमारी विरासत में न मिल जाए. तन्वी अलबत्ता खुश थी. वह धवल की उस निशानी को जीवनभर सहेज कर रखना चाहती थी.

बेटे का विद्रोह- भाग 2: क्या शिव ने मां को अपनी शादी के बारे में बताया?

वह मन ही मन लापरवाही से बोला, ‘जो होगा देखा जाएगा. एक दिन तो बताना ही था. आज ही मैं उन्हें बता दूंगा कि मैं ने रोजी के साथ शादी कर ली है, “शुभस्य शीघ्रम.‘’

उस ने मन ही मन अम्मां का सामना करने के लिए अपने को तैयार कर लिया था. रोजी भी घबराई हुई थी, जाने क्या हंगामा होने वाला है. वह मन ही मन डर रही थी. वह अपने कमरे में चली गई थी. वह समझ नहीं पा रही थी कि उसे क्या करना चाहिए.

“अम्मां आई हैं…” सुनते ही शिव भावुक हो कर लिफ्ट से तेजी से मां से मिलने को आतुर हो नीचे पहुंच गया था. उन के पैर छू कर वह उन से लिपट गया. मांबेटे दोनों की आंखों से आंसू बह निकले थे.

गगन उस की दूर की बूआ का बेटा था. वह भी उसी कंपनी में काम करता था. अम्मां को शायद उस ने ही बताया होगा…

“क्यों शिव, हमें किसी ने बताया है कि तुम ने ब्याह कर लिया है?”

‘धीरे बोलो अम्मां… घर के अंदर चलो. सब बताते हैं.‘

वे घर में घुसते ही सुंदर साजसज्जा को देखती ही  रह गईं, “मुझे लग रहा है कि यह बात सच है कि तुम ने   शादी कर ली है…”

“मेरी बात मत काटो. अब मैं  बिरादरी वालों के सामने क्या मुंह दिखाऊंगी शिव, तुम बहुत ही नालायक निकले… मेरी नाक कटा कर रख दी आदि कह कर रोतीबिसूरती रहीं.

“देखिए अम्मां, शादी तो हम ने कर ली है. अब जैसे बात बने वह करिए.*

“यह तो बताओ कि कौन जाति की है?”

शिव बात बदलते हुए बोले, “अम्मां, पापा कैसे हैं?”

“पापा का तो वही हाल है. पहले भांग का गोला खाते थे, अब तो दारू की बोतल के सिवा उन्हें कुछ नहीं चाहिए.’’

“तुम्हारे जीजा कुंवरपाल और पापा बैठ कर बोतल चढाते हैं… जिज्जी भी लालची हो गई हैं. धीमेधीमे मुझे तो किनारे कर दिया है और खुद ही मालकिन बन गई हैं,‘’ कहतेकहते वे आंसू बहाने लगी थीं.

“बेटा शिव, तुम से हाथ जोड़ कर कह रहे हैं… तुम घर चलो, नहीं तो सारी जायदाद पर तुम्हारे जीजा कब्जा कर लेंगे.‘’

वह अम्मां के साथ बातों में व्यस्त था. लेकिन रोजी को ले कर परेशान था कि तभी रोजी अपने हाथ में ट्रे में चायनाश्ता ले कर आई.

वह उसे देख कर दंग रह गया था, क्योंकि उस ने साड़ी पहन रखी थी. उस ने आते ही अम्मां के पैर छू कर उन का दिल जीत लिया था. उन्होंने प्यार से उसे आशीर्वाद दे कर अपने बगल में बिठा लिया.

‘शिव, बहू तो सुंदर भी है और सलीके वाली भी. किसी अच्छे घरपरिवार की दिखाई पड़ रही है,’ उन्होंने अपने हाथों से सोने के कंगन उतार कर उसे पहना दिए थे. वह मन ही मन डर रहा था कि रोजी अम्मां को यह न बता दे कि वह क्रिश्चियन है.

उस ने रोजी को इशारा कर के वहां से अंदर जाने को बोल दिया और बोला, ‘अम्मां, तुम नहाधो कर तैयार हो जाओ. फिर हम लोग नाश्ता करेंगे… तब तक मैं डाक्टर से बात करता हूं…”

’’लाओ, उन की रिपोर्ट हमें दे दो. तब तक हम देखें कि क्या गड़बड़ है…”

वह पापा की फाइल में रिपोर्ट को बड़े ही ध्यान से पढ़ने लगा था…

सुशीला घर की एकएक चीज को बड़ी बारीकी से देख रही थीं. बाथरूम में रखे शैंपू, फेसवाश, लोशन आदि की बोतलों को उठाउठा कर समझने की कोशिश कर रही थीं. उन्हें अपने घर का सीढ़ियों के नीचे बना हुआ ढाई फुट का अंधेरा सा गुसलखाना, जिस में जीरो पावर का टिमटिमाता बल्ब, जिस में बिजली के गुल होते ही घना अंधेरा छा जाता था. साथ ही, सीलन की अजीब सी बदबू से वहां भरी रहती थी…

यहां उजाले में नहाते हुए बड़े से शीशे में अपने को देख उन्हें सुखद एहसास हुआ था, जिस को उन के चेहरे की मुसकराहट बयान कर रही थी.

जब वे बाहर आईं, तो शिव ने उन के सामने आसन बिछा दिया था, क्योंकि वह जानता था कि अम्मां पहले पूजा करेंगी, तब नाश्ता करेंगी… उन्होंने अपने बैग से कुछ किताबें और माला निकाली… उन की उंगलियां तो माला के दाने सरकाती जा रही थीं, परंतु आंखें तो रोजी के इर्दगिर्द घूम रही थीं.

दोनों के फोन लगातार बज रहे थे, क्योंकि आज उन लोगों की एनिवर्सरी की पार्टी पहले से प्रायोजित थी. उन लोगों के फ्रेंड्स विश कर रहे थे.

“क्यों शिव, आज कुछ खास बात है क्या…? बहुत फोन आ रहे हैं.”

“हां अम्मां, आज पार्टी है… हम लोगों की शादी को पूरे एक साल हो गए हैं…

आप बड़े ही मौके से आई हैं… आप को सब दोस्तों से मिलवाएंगे…”

“नहीं शिव, हम होटल वगैरह में कभी गए नहीं हैं… मुझे नहीं अच्छा लगेगा…”

“वहां रोजी की मां भी आएंगी… आप उन से भी मिल लेना…”

“एक शर्त पर मैं चलूंगी कि तुम घर चलने का वादा करो…”

“ठीक है. रात में  प्रोग्राम सेट करता हूं… पहले डाक्टर से बात कर लूं…”

रोजी समझदार थी. आज  वह इंडियन स्टाइल में तैयार हुई थी. पिंक कलर की साड़ी, चूड़ियां और गजरे में वह बहुत सुंदर लग रही थी. वह इस तरह किसी त्योहार पर ही तैयार हुआ करती थी. शिव रोजी को देखता ही रह गया था.

सुशीलाजी बेटेबहू की सुंदर जोड़ी को देख कर अपने मन की सारी उलझन भूल  कर खुश हो कर बेटेबहू की नजर उतार कर बोलीं, ‘रामसीता सी जोड़ी है‘ और आशीर्वादों की झड़ी लगा दी थी.

मां को हंसतेमुसकराते देख  शिव को अम्मां का पहले वाला रोतासिसकता चेहरा याद आ गया था.

शाम को पार्टी में खूब मस्ती हुई. जब रोजी अम्मां का हाथ पकड़ कर डांस के लिए ले कर आई, सब ने  खूब तालियां बजाई थीं.

पल्लव, जो उस का खास दोस्त था, वह बोला, ‘शिव, तू ने सही फैसला ले कर रोजी से शादी कर ली. दोनों कमा रहे हो… गाड़ी ले ली, फ्लैट भी ले लिया, लाइफ को एंजौय कर रहे हो. आज आंटी भी कितनी खुश दिख रही हैं… मुझे देखो, अम्मांपापा की जिद के चक्कर में  35 का हो गया हूं… उन्हें दहेज के साथ ढेर सारा नकद चाहिए, तो मुझे  प्रोफेशनल लड़की चाहिए… बस इसी झमेले के झूले में साल दर साल उम्र बढ़ती जा रही है. मैं तो अपनी जिंदगी से तंग आ गया हूं. मन करता है कि पंखे से लटक जाऊं और जिंदगी से छुट्टी मिल जाए…‘

शिव अपनी उलझनों में उलझा था… अभी पापा का सामना करना है और सब से छिपाना है कि रोजी क्रिश्चियन है… वह स्वयं गहरी सोच में था… उस के चेहरे पर तनाव परिलक्षित हो रहा था…

‘पल्लव इस तरह से जिंदगी से हार नहीं मानते… उस ने उस के कंधे को थपथपा कर कहा, ‘दोस्त यह जिंदगी एक जंग है’ कह कर वहां से  हट कर दूसरे दोस्तों को अटेन करने लगा था…

शिव और अम्मां दोनों ही अपनीअपनी उधेड़बुन में लगे हुए थे…

आज वह अम्मां के बगल में लेटा हुआ लाड़ जता रहा था…

“पार्टी तो बहुत बढिया रही… लेकिन शिव, तुम ने अभी तक नहीं बताया कि तुम्हारी बहू कौन जात की है…

“गगन बता रहा था कि  वह किरिस्तानी है…”

“तो क्या अछूत हो गई… सुंदर है… अच्छे घरपरिवार की है… सब सही है… तो अब किरिस्तानी है…

इसीलिए तो मैं घर आया नहीं… न जीओगी, न ही जीने दोगी… इतना मूड अच्छा था… सब खराब कर के रख दिया…’ वह नाराज हो उठा.

“सब जायदाद कुंवरपाल अपने नाम करवा लेंगे. तुम्हें कुछ भी नहीं मिल पाएगा…” अम्मां ने दूसरा पासा फेंका था.

नाराज शिव बिफर कर बोला, “अम्मां, आज तुम्हें जमीनजायदाद की याद आ रही है. जब स्कूल में मैं फटा जूता पहन कर जाता था… और बच्चे मुझे चिढ़ाया करते थे, तब  तुम लोगों को दर्द नहीं हुआ था…”

“क्या करते शिव… तुम्हारे बाबू के सामने बोलते तो खुद ही पिट जाते…”

“आप भूल गईं होंगीं… जब हम पार्वती के साथ बगीचे में लुकाछिपी खेल रहे थे, तो पापा ने मुझे जाड़े में ठंडे पानी से नहला दिया था कि पार्वती दलित है, अछूत है… तुम ने उसे क्यों छुआ… मैं कांपता रहा, रोताबिलखता रहा… उन्हें जरा भी दया नहीं आई और आप उन की हां में हां मिलाती रही थीं…”

“क्या करते शिव? यदि हम कुछ बोलते, तो वह हमें भी पीटपीट कर अधमरा कर देते…”

इंटरनेशनल बाइकर की पत्नी का प्यार और पैसों का कॉकटेल

राजस्थान के रेतीले शहर जैसलमेर में हर साल मोटरसाइकिल रैली का आयोजन किया जाता है. इस मोटरसाइकिल रैली में बड़ी संख्या में बाइकर्स पहुंचते हैं. इंडिया बाजा ने अंतरराष्ट्रीय बाइकर्स रैली का आयोजन किया था. इस बाइकर्स रैली में देशविदेश के तमाम बाइकर्स भाग लेने के लिए पहुंचे थे.

बेंगलुरु का रहने वाला 34 वर्षीय इंटरनैशनल बाइकर असबाक मोन भी इस रैली में अपने दोस्तों के साथ भाग लेने आया था. यह बात साल 2018 के अगस्त माह की है.

18 अगस्त, 2018 को रैली आयोजित होनी थी. रैली से पहले 15 अगस्त को असबाक रैली का ट्रैक देखने व उस का जायजा लेने के लिए अपने दोस्तों के साथ वहां गया था. राइडिंग ट्रैक देखने के बाद दूसरे दिन 16 अगस्त गुरुवार को असबाक प्रैक्टिस के लिए भी दोस्तों के साथ गया था.

राइडिंग के दौरान असबाक अपने दोस्तों से बिछुड़ गया और रास्ता भटक गया. राइडिंग के बाद एकएक कर असबाक के साथी होटल में लौट आए. शाम तक असबाक लौट कर नहीं आया. जब दोस्तों ने उस के मोबाइल पर फोन किया तो मोबाइल लगातार आउट औफ रीच आ रहा था.

सुबह से शाम और रात हो चली थी. सभी दोस्त असबाक के वापस आने का इंतजार करते रहे, लेकिन असबाक वापस नहीं आया और न ही उस की कोई खबर ही मिली.

रैली शुरू होने से पहले ही एक इंटरनैशनल बाइकर के अचानक लापता होने की खबर दूसरे दिन पुलिस तक पहुंची. इस पर जैसलमेर क्षेत्र के थाना शाहगढ़ के थानाप्रभारी करन सिंह पुलिस टीम के साथ दोस्तों के होटल पहुंच गए. लापता असबाक के बारे में उस के दोस्तों से पूरी जानकारी ली.

दोस्तों ने बताया कि राइडिंग के दौरान रेतीले रास्ते में हम लोग एकदूसरे से बिछुड़ गए थे.

इस के बाद पुलिस दोस्तों के साथ रेगिस्तान के धोरों में असबाक की तलाश करने के लिए निकल गई. घंटों की तलाश व छानबीन के बाद भी असबाक का कोई सुराग नहीं मिला. दोस्त और पुलिस वापस आ गई.

तलाश के दौरान 3 दिन बाद यानी 18 अगस्त को उस की लाश एक रेतीले इलाके में जमीन पर पड़ी मिली. लाश के पास ही स्टैंड पर खड़ी उस की बाइक मिली, जिस के हैंडिल पर हेलमेट लटका था. उस की पानी की बोतल खाली थी.

इस के बाद पुलिस ने लापता असबाक के परिजनों को जानकारी दी. जानकारी मिलते ही बेंगलुरु से पत्नी सुमेरा परवेज व असबाक के ससुर जैसलमेर पहुंच गए.

पुलिस ने माना भूखप्यास से हुई मौत

जांच के दौरान पता चला कि रेतीले इलाके में असबाक रास्ता भटक गया था. उस का पीने का पानी भी खत्म हो गया था. गरमी, भूख और प्यास के चलते उस की मौत हो गई थी. उस का मोबाइल भी मिल गया, लेकिन असबाक ऐसे इलाके में पहुंच गया था, जहां नेटवर्क नहीं आ रहा था.

असबाक की लाश मिलने के बाद घर वालों ने भी किसी पर शक नहीं जताया. पत्नी सुमेरा ने पुलिस को जो तहरीर दी उस में कहा गया था, शायद रास्ता भूल जाने के बाद भूखप्यास से उस की मौत हुई होगी. उस की किसी से कोई दुश्मनी भी नहीं थी. इसलिए अपने पति की मौत पर उसे किसी पर कोई शक नहीं है.

इस के चलते पुलिस ने भी आगे की जांच में कोई रुचि नहीं दिखाई. पुलिस ने लाश का पोस्टमार्टम कराने के बाद शव परिजनों को सौंप दिया.

असबाक की मौत को हादसा मानते हुए पुलिस इस मामले को हमेशा के लिए बंद करना चाहती थी. कानूनी प्रक्रिया में लगभग 3 साल लग गए थे. इस बीच पुलिस टीम भी बदल चुकी थी.

3 साल पुराने इस केस को बंद करने के लिए साल 2021 में आए नए एसपी डा. अजय सिंह के सामने क्लोजर रिपोर्ट के लिए इस केस की फाइल को रखा गया. क्लोजर रिपोर्ट पर दस्तखत करने से पहले एसपी साहब एक बार इस केस फाइल को पढ़ना चाहते थे.

एसपी साहब ने क्लोजर रिपोर्ट पर दस्तखत करने से पहले इस रहस्यमयी मौत की फाइल व पोस्टमार्टम रिपोर्ट को गौर से पढ़ा, जिस में चौंकाने वाली बातें सामने आईं. जिसे पढ़ कर वह हैरान रह गए.

असबाक के रास्ता भटकने और भूख, प्यास से हुई मौत को उस समय जहां सामान्य माना गया था, लेकिन ऐसा था नहीं. अब इस मामले में नया मोड़ आ चुका था.

एसपी डा. अजय सिंह ने 3 साल बाद फिर से कराई केस की जांच

एसपी को फाइल में घटनास्थल का फोटो देखने के बाद संदेह हुआ. फोटो में असबाक जमीन पर गिरा पड़ा था. उस के पास ही उस की बाइक खड़ी दिखाई दे रही थी, जिस के हैंडिल पर हेलमेट टंगा था. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मामला इस के उलट दिखाई दिया.

रिपोर्ट में असबाक की मौत का कारण गरदन की हड्डी टूटी होना बताया गया था. ऐसी हालत में उस व्यक्ति की तत्काल मौत हो जाती है या पैरालिसिस हो जाता है. यदि पहले चोट लगी होगी तो कोई भी व्यक्ति खड़ा नहीं हो सकता है.

अब प्रश्न यह उठता है कि जब असबाक खड़ा ही नहीं हो सकता, तब उस की बाइक स्टैंड पर किस ने खड़ी की? साथ ही हेलमेट बाइक के हैंडिल पर किस ने टांगा? आशंका व्यक्त की गई कि असबाक के साथ कोई दूसरा व्यक्ति भी था.

दूसरी बात पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के पेट में आधा पचा भोजन था. चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार पेट में भोजन होने पर भूख से मौत नहीं हो सकती.

एसपी डा. अजय सिंह ने इसे सामान्य मौत नहीं मानते हुए एक सुनियोजित हत्या का मामला होने की आशंका व्यक्त की. इस संबंध में संबंधित थाना शाहगढ़ में मामला दर्ज किया गया. साथ ही डीएसपी भवानी सिंह को इस मामले की फिर से तफ्तीश करने का जिम्मा सौंपा.

डीएसपी भवानी सिंह ने गहन जांचपड़ताल शुरू की. सब से पहले उन्होंने मौकाएवारदात को फिर से देखने का निर्णय लिया. घटनास्थल राजस्थान के जैसलमेर जिले से 150 किलोमीटर दूर थाना शाहगढ़ के क्षेत्र में था. इस बीच उन की टीम भी जांच कार्य में सहयोग के लिए जुट गई.

घटनास्थल रेगिस्तान में था. जहां असबाक की लाश मिली थी, वहां रेत के टीलों के अलावा बाइक व जमीन पर ऐसी कोई चीज नहीं थी, जिस से दुर्घटना जैसी कोई बात नजर आ रही हो. असबाक के शरीर पर किसी प्रकार का कोई जख्म भी नहीं था.

जांच में यह बात भी सामने आई कि असबाक के लापता होने के बाद उस के तीनों दोस्तों ने उस की तलाश भी नहीं की थी. डीएसपी भवानी सिंह के अनुसार प्रैक्टिस के लिए असबाक के साथ उस के 5 दोस्त गए थे. इन में 2 विदेशी दोस्त आरोन और बैंजी के अलावा बेंगलुरु के संजय व विश्वास तथा केरल का साबिक शामिल था.

इस संबंध में पुलिस ने मृतक के परिजनों से संपर्क किया. मृतक के भाई अरशद व मां सुबेदा ने जो जानकारी दी, वह चौंकाने वाली थी. उन्होंने बताया, ‘‘पतिपत्नी के संबंध अच्छे नहीं थे. कुछ साल पहले असबाक की पत्नी सुमेरा ने किराए के गुंडों से असबाक की पिटाई भी कराई थी.’’

उन्होंने पत्नी पर असबाक की हत्या कराने का आरोप लगाया.

इस जानकारी के बाद पुलिस ने इस मामले में सुमेरा व असबाक के दोस्तों को अपने बयान दर्ज कराने के लिए नोटिस भेजा. नोटिस के बावजूद सुमेरा व पति के दोस्त जैसलमेर नहीं आए.

इस बीच पुलिस ने तीनों दोस्तों के साथ ही पत्नी सुमेरा के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. जांच में अनेक साक्ष्य मिले.

इस के बाद जैसलमेर पुलिस बेंगलुरु गई और असबाक के दोस्त विश्वास व संजय को हिरासत में ले कर जैसलमेर लौट आई.

पूछताछ के बाद दोनों ने अपना जुर्म कुबूल कर लिया. पुलिस ने भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत रिपोर्ट दर्ज कर दोनों आरोपियों को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

इस संबंध में जो दिलचस्प व हैरान कर देने वाली कहानी दोस्तों ने बताई, वह इस प्रकार निकली—

असबाक मूलरूप से केरल के कुन्नूर जिले का रहने वाला था. वह बेंगलुरु में एक निजी कंपनी में काम करता था. असबाक बेंगलुरु के आरटी नगर में रहता था. बेंगलुरु से पहले वह दुबई में काम करता था. वह एक अंतरराष्ट्रीय बाइक राइडर था. असबाक की अपनी पत्नी सुमेरा से नहीं बनती थी.

सुमेरा का नीरज नाम के एक युवक से अफेयर चल रहा था. उस की अपने प्रेमी से मोबाइल पर लंबी बातें होती थीं. सुमेरा अपने पति असबाक को पसंद नहीं करती थी.

उस की नजर करोड़पति बाइकर पति असबाक की दुबई और बेंगलुरु की प्रौपर्टी पर थी. वह चाहती तो पति को तलाक दे सकती थी, लेकिन ऐसा करने पर उस के हाथ से प्रौपर्टी निकल जाती. इसलिए शातिर पत्नी ने तलाक की जगह कत्ल को चुना.

असबाक के दोस्त संजय व विश्वास भी बाइकर थे, जबकि अब्दुल साबिक वीडियोग्राफर था. सुमेरा ने इन के साथ षडयंत्र रच कर असबाक की हत्या की योजना बनाई. इस के लिए उस ने तीनों दोस्तों को असबाक की हत्या की सुपारी दी.

2 हजार किलोमीटर दूर ले जा कर की हत्या

असबाक की हत्या को बेंगलुरु से 2 हजार किलोमीटर दूर राजस्थान के जैसलमेर के सुनसान रेगिस्तान में अंजाम देने को चुना गया.

योजनानुसार दोस्तों ने असबाक से जैसलमेर में आयोजित होने वाली इंडिया बाजा औफ रोड रैली में भाग लेने के लिए कहा. असबाक इस के लिए राजी हो गया.

जैसलमेर में असबाक को उस के 2 विदेशी दोस्त भी मिल गए, जो बाइक रैली में भाग लेने आए हुए थे. तीनों दोस्त असबाक को 16 अगस्त की सुबह साजिशन सुनसान रेगिस्तान इलाके में ले गए. पूर्व नियोजित षडयंत्र के तहत तीनों ने राइडिंग के लिए 2 रूट ए और बी निर्धारित किए.

योजनानुसार विदेशियों को ए रूट पर जाने को कहा गया. जबकि असबाक और उस के तीनों दोस्त बी रूट पर प्रैक्टिस के लिए निकले थे. ऐसा इसलिए किया गया था, ताकि वे असबाक की हत्या आसानी से कर सकें.

विदेशी दोस्तों को अलग रूट पर भेज कर वे असबाक के साथ दूसरे रूट पर निकल गए. दूर सुनसान रेगिस्तान के टीलों के बीच पहुंच कर तीनों ने असबाक को दबोच लिया और उस की गरदन मरोड़ कर हत्या कर दी.

हत्या के राज को छिपाने और दुर्घटना का रूप देने के लिए उस की बाइक को स्टैंड पर खड़ा कर असबाक का हेलमेट हैंडिल पर टांग दिया.

इस के साथ ही उस की पानी की बोतल को खाली कर दिया. ताकि ऐसा लगे कि रास्ता भटक जाने के बाद गरमी, भूख व प्यास के चलते उस की मौत हो गई.

तीनों दोस्त हत्या के बाद होटल लौट आए और असबाक के लापता होने का नाटक करने लगे. संजय ने लौटने के बाद दोपहर एक बजे अपने मोबाइल पर स्टेटस लगाया कि मैं होटल आ चुका हूं. जबकि उस के दोनों दोस्तों के मोबाइल शाम 6 बजे छतरैल टावर की रेंज में औन हुए.

डीएसपी भवानी सिंह ने स्वीकार किया कि यदि तत्कालीन जांच अधिकारी असबाक के दोस्तों के मोबाइल नंबरों की काल डिटेल्स व लोकेशन चैक कर लेते तो हत्या का राज 3 साल पहले ही खुल जाता. यहां पुलिस से चूक हो गई थी.

पत्नी और दोस्त भगोड़ा घोषित

पति की हत्या की मास्टरमाइंड सुमेरा ने हत्या की साजिश को पूरी तरह फूलप्रूफ रचा था. असबाक की हत्या के बाद उस की बाइक को स्टैंड पर खड़ा करना ही हत्यारों की सब से बड़ी गलती साबित हुई.

3 साल बाद नए एसपी डा. अजय सिंह की नजरों से से यह गलती छिपी नहीं रह सकी और हत्या का राज उजागर हो ही गया.

इस हाईप्रोफाइल मर्डर में फरार चल रही पत्नी सुमेरा व केरल निवासी दोस्त साबिक की तलाश में पुलिस टीम बेंगलुरु और केरल भी गई. लेकिन अभी तक दोनों का पता नहीं चल पाया है. दोनों के मोबाइल स्विच्ड औफ मिले तथा घर पर ताला लगा मिला.

दरअसल, पुलिस को यह जानकारी मिली कि साबिक ने केरल हाईकोर्ट में जमानत याचिका दायर की थी.

इस पर पुलिस ने न्यायिक प्रक्रिया के तहत लगभग 25 पेज की फैक्चुअल रिपोर्ट (तथ्यात्मक रिपोर्ट) हाईकोर्ट में पेश की और साबिक को जमानत देने का विरोध किया.

इस पर कोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट का मूल्यांकन करते हुए साबिक की जमानत याचिका खारिज कर दी. इस के बाद जैसलमेर न्यायालय से दोनों की गिरफ्तारी का वारंट भी जारी करा दिए. दोनों जांच में पुलिस का सहयोग नहीं कर रहे थे तथा जांच के लिए पुलिस के सामने भी उपस्थित नहीं हो रहे थे.

ऐसे में पुलिस ने इसी साल जनवरी 2022 में न्यायिक कानूनी प्रक्रिया के तहत उन्हें भगोड़ा घोषित कर नोटिस दोनों के घरों पर चस्पा करा दिए.

अब पुलिस को दोनों की किसी भी कोर्ट से जमानत मिलने की उम्मीद कम ही है. जैसलमेर पुलिस पहले ही लुक आउट नोटिस जारी कर चुकी है, ऐसे में इन के विदेश भागने की आशंका नहीं के बराबर है.

3 साल पहले पुलिस ने जिस केस को हादसा समझा था, वह एक हाईप्रोफाइल हत्या थी. प्रेमी के प्यार में अंधी हो चुकी बेवफा पत्नी ने प्रौपर्टी हड़पने के लिए गद्दार दोस्तों के जरिए एक प्रतिभाशाली अंतरराष्ट्रीय बाइकर की निर्मम हत्या करा कर दोस्ती व रिश्तों को कंलकित कर दिया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बीसी सखियों को वर्दी के रूप में मिलेगी निफ्ट की डिजाइन की साड़ियां

महिलाओं को सशक्त बनाने और राज्य में हथकरघा बुनकरों के लिए रोजगार के व्यापक अवसर पैदा करने के दोहरे उद्देश्य को पूरा करते हुए, योगी सरकार बीसी-सखियों को निफ्ट रायबरेली द्वारा डिजाइन की गई एक लाख से अधिक साड़ियां देगी.

हथकरघा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए यूपी सरकार बीसी सखी योजना के तहत काम करने वाली महिलाओं को वर्दी के रूप में दो हैंडलूम साड़ियां उपलब्ध कराएगी. इसके लिए सरकार हैंडलूम बुनकरों द्वारा बनाई गई साड़ियों को खरीदेगी.

काम में शामिल बुनकरों को डीबीटी के जरिए 750 रुपये प्रति साड़ी मजदूरी दी जाएगी.

यूपी हैंडलूम के एमडी केपी वर्मा ने बताया कि बीसी-सखी के रूप में काम करने वाली 58,000 महिलाओं में से प्रत्येक को सरकार द्वारा दो साड़ियां दी जाएंगी.

निफ्ट द्वारा भेजे गए डिजाइनों को मुख्यमंत्री ने पहले ही मंजूरी दे दी है और साड़ियों की बुनाई का काम प्रगति पर है. प्रत्येक साड़ी की कीमत 1934.15 रुपये और विभाग को 1.16 लाख साड़ी और ड्रेस सामग्री के लिए 22,43,61,400 रुपये की राशि जारी की गई है.

यूपी हथकरघा विभाग ने इस संबंध में पांच उत्पादक कंपनियों को साड़ियां बनाने का काम सौंपा है जिनमें से 3 वाराणसी जिले से और एक-एक मऊ और आजमगढ़ से हैं.

यूपी हथकरघा पहले ही लगभग 537 बुनकरों को 1.20 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुका है और 12,837 से अधिक साड़ियां तैयार हैं.

केपी वर्मा के अनुसार “कोविड-19 के कारण प्रतिकूल आर्थिक परिस्थितियों के कारण बुनकरों के लिए रोजगार का संकट उत्पन्न हो गया था. इस योजना के माध्यम से बुनकर को रोजगार प्रदान किया गया है. साथ ही इस योजना ने बिचौलियों की भूमिका को समाप्त कर दिया है और पैसा सीधे उनके बैंक खाते में स्थानांतरित किया जा रहा है. योजना के अंतर्गत आने वाले बुनकरों को अधिक से अधिक लाभ मिल रहा है और इसके परिणामस्वरूप अन्य हथकरघा बुनकर भी इस योजना की ओर आकर्षित हो रहे हैं और उत्पादक कंपनियों में अपना नामांकन करा रहे हैं.

उत्तर प्रदेश सरकार ने प्रत्येक मौजूदा ग्राम पंचायत के लिए 21 मई 2020 को 58,000 बीसी सखियों को शामिल करने की घोषणा की थी. बीसी सखियों गांव में लोगों की बैंकिंग जरूरतों को पूरा करने के लिए वन-स्टॉप समाधान उपलब्ध कराती हैं, वह भी घर पर.

महिला स्वयं सहायता समूह की सदस्यों को बीसी सखियों के रूप में शामिल करने से वित्तीय समावेशन, समय पर पूंजीकरण, एसएचजी लेनदेन के डिजिटलीकरण और समुदाय के समग्र विकास को सुनिश्चित करने में मदद मिलती है. यह महिलाओं की उद्यमशीलता क्षमताओं के निर्माण के उद्देश्य को और मजबूत करता है.

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