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बंगले वाली- भाग 6: नेहा को क्यों शर्मिंदगी झेलनी पड़ी?

नेहा ने इतनी गरम चाय एक घूंट में ही पी ली और उठ खड़ी हुई.

‘‘अरे, बैठ ना…”

‘‘नहीं, मैं तो भूल गई, मुझे प्रेस वाले के यहां से साडियां भी उठानी हैं, मैं फिर आऊंगी.’’

कांची के कुछ कहने से पहले ही उस ने ऐसी दौड़ लगाई, जैसे पीछे भूत पड़े हों, घर में घुस कर ही सांस ली.

धम्म से कुरसी पर बैठ गई, जब सांस में सांस आई तो एहसास हुआ कि ये क्या किया?

हाय, मैं ने चोरी की, वो भी कांची के यहां से.

ये चोरी थोड़े ही है, 2-3 दिन की ही तो बात है. शादी से लौट कर, उस से मिलने जाऊंगी, और धीरे से रख दूंगी. मन के दूसरे कोने से आवाज आई.

पर्स से नेकलेस निकाल कर आईने के सामने गले पर लगाते ही नेहा की सारी ग्लानि बह गई.

वाह… क्या लग रही हूं मैं, सब देखते ही रह जाएंगे. उस ने जल्दी से नेकलेस को सूटकेस में रख लिया.

बच्चे पढ़ाई कर रहे थे, पतिदेव के आने में अभी वक्त था. कई दिन बाद उस ने बालकनी का दरवाजा खोल कर ताजी हवा को महसूस किया. तभी बंगले से कांची निकलती हुई दिखी.

अरे, ये तो इधर  ही आ रही है. हाय, लगता है कि उसे पता चल गया कि मैं ने ही उस का नेकलेस चुराया है. अब क्या करूं? क्या सोचेगी वह मेरे बारे में? मेरी भी मति मारी गई थी, जो मैं ने ऐसा नीच काम किया, क्या करूं?

जल्दी से बालकनी का दरवाजा बंद कर, बच्चों को हिदायत दी कि कोई आ कर पूछे तो कहना कि मम्मी बाहर गई हैं, देर से आएंगी.

नेहा सांस रोके अंदर जा कर बैठ गई.

घंटी बजते ही बेटे ने दरवाजा खोल दिया.

‘‘क्या यह नेहा का घर है?’’

‘‘जी आंटी, पर मम्मी घर पर नहीं हैं.’’

‘‘अच्छा, कोई बात नहीं. मै बाद में आऊंगी,” कांची ने जाते हुए कहा. उस के जाते ही नेहा की जान में जान आई.

उफ, शुक्र है, बच गई, बस कल ट्रेन पकड़ लूं.

सारी रात चिंता के मारे नेहा सो न सकी. सुबह पति और बच्चों के जाने के बाद वह जल्दीजल्दी जाने की तैयारी करने लगी.

ट्रेन तो 11 बजे की है, लगभग 10 बजे घर से निकल जाऊंगी. अरे, सूखे कपड़े तो बालकनी में ही रह गए, अगर नहीं उठाए तो 3 दिन तक वहीं पड़े रहेंगे, मजाल है कि कोई उठा कर अंदर रख दे. बड़बड़ाते हुए नेहा ने जैसे ही बालकनी का दरवाजा खोला, सामने से आती हुई कांची को देख कर उस के हाथपैर फूल गए. कुछ समझ न आया तो बाहर से ताला बंद कर के, ऊपर सीढ़ियों में जा कर छिप गई.

हाय, अगर ऊपर से कोई आ गया तो क्या कहूंगी? क्यों बैठी हू सीढ़ियों में… ये किस मुसीबत में फंस गई, पर अब करे क्या? दम साधे बैठी रही.

कुछ देर बाद सीढ़ियों पर किसी के उतरने की आवाज आई, शायद ताला देख कर कांची चली गई थी. 5 मिनट रुक कर वह नीचे आई और ताला खोला. मायके में अपनी झूठी शान दिखाने के लिए क्याक्या करना पड़ रहा है, बस एक बार ट्रेन में बैठ जाऊं.

10 बजने ही वाले थे. सूटकेस उठा कर, ताला लगाया, चाबी पड़ोस में दे कर सीढ़ियां उतरने लगी, उस की सांस धौंकनी की तरह चल रही थी, ज्यादा गरमी न होने के बाद भी पसीना पीठ से बह कर एड़ियों तक पहुंच रहा था.

भगवान का लाखलाख शुक्र है कि आटो सामने ही दिख गया, बिना मोलभाव (जो उस की आदत नहीं थी) के वह जल्दी से आटो में बैठ कर स्टेशन के लिए निकल पड़ी.

क्या कांची पीछे से आवाज दे रही थी…, नहींनहीं, मेरा भ्रम होगा…

जैसेतैसे स्टेशन पहुंच कर अंदर घुसी ही थी कि सचमुच पीछे से कांची के पुकारने की आवाज सुन कर उस के होश ही उड़ गए…

अब तो ऊपर वाला भी मेरी इज्जत की धज्जियां उड़ने से नहीं बचा सकता. झूठी शान के चक्कर में मेरी मति मारी गई थी जो मैं ने ऐसा नीच काम किया. अब कांची से आंखें मिलाऊंगी… हे भगवान, काश, ये धरती फट जाए तो मैं उसी में समा जाऊं… क्या करूं? कहां जाऊं…. भागूं…..पर, पैर  जड़ हो गए…

तभी हांफती हुई कांची आई, ‘‘कब से आवाज दे रही हूं? सुन ही नहीं रही है, कल तेरे घर आई, तो भी नहीं मिली. सुबह आई, तो ताला लगा था, मुझे लगा कि गई ये तो… पर, अभी आटो में बैठती हुई दिखी, तब भी आवाज लगाई, पर शायद तू सुन नहीं पाई. नेहा को काटो तो खून नहीं.

‘‘अरे, उस दिन तू मेरे घर आई थी न शायद जल्दबाजी में तेरी झुमकी वहीं गिर गई थी, उसे ही लौटाने आई थी. मैं सोचसोच कर परेशान हो रही थी. अगर न दे पाई तो तू वहां क्या पहनेगी. चल, अब मैं निकलती हूं, पहले ही बैंक के लिए देर हो गई है, तू वहां से आ जा, फिर मिलते हैं.’’

नेहा ठगी सी खड़ी रह गई, डायमंड की चमक पूरी तरह से फीकी पड़ चुकी थी.

गर्लफ्रेंड के साथ करण जौहर की पार्टी में पहुंचे ऋतिक रोशन, देखें Photos

बीती रात करण जौहर ने अपना 50वां जन्मदिन मनाया है. इस खास मौके पर एक शानदार पार्टी का आयोजन किया गया था. पार्टी में बॉलीवुड की कई मशहूर हस्ती नजर आई. इस पार्टी में बॉलीवुड के कई कपल्स धमाल मचाने पहुंचे थे. इस लिस्ट में ऋतिक रोशन और सबा आजाद का भी नाम शामिल है.

पार्टी में ऋतिक रोशन अपनी गर्लफ्रेंड पर जमकर प्यार लुटाते नजर आए. जी हां सबा और ऋतिक की केमिस्ट्री शानदार नजर आई. दोनों बातचीत करते हुए दिखाई दिए.

 

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फैंस का मानना है कि ऋतिक रोशन की गर्लफ्रेंड उनकी पहली पत्नी से भी ज्यादा खूबसूरत हैं. सबा आजाद की तस्वीरों को  फैंस काफी पसंद कर रहे हैं.

 

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पार्टी के दौरान पोज देते समय ऋतिक रोशन अपनी गर्लफ्रेंड को जमकर निहारते दिखे. सबा आजाद ब्लैक कलर की शानदार ड्रेस पहनकर पहुंची तो वहीं ऋतिक रोशन भी सबा के साथ ट्विनिंग करते दिखे. सोशल मीडिया पर ऋतिक रोशन और सबा आजाद की तस्वीरें तेजी से वायरल हो रही हैं.

 

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हमने फिल्म ‘देहाती डिस्को’ में अभिशाप व अंधविश्वास को तोड़ा है: मनोज शर्मा

कोरोना काल के बाद से बौलीवुड बहुत बुरे दौर से गुजर रहा है.इसके लिए कोई और नहीं बल्कि बौलीवुड के फिल्मकार व कलाकार खुद ही दोषी हैं. पिछले तीन चार माह के अंतराल में जितनी भी फिल्में प्रदर्शित हुई हैं,वह सभी घिसे पिटे विषयों पर बहुत ही बकवास ढंग से बनायी गयी नीरस फिल्में ही हैं. मगर ऐसी ही फिल्मों के बीच एक आध फिल्म सर्जक कुछ अच्छा काम कर रहे है. मसलन-लेखक,एडीटर व निर्देशक मनोज शर्मा, जिनकी फिल्म ‘‘देहाती डिस्को’ 27 मई को प्रदर्षित होने जा रही है. नाम के अनुरूप मनोज शर्मा की यह फिल्म भी कुछ वर्ष पहले आयी डांस फिल्म ‘एबीसीडी’ की तर्ज पर बनी डांस फिल्म होनी चाहिए.मगर खुद मनोज शर्मा का दावा है कि यह ‘एबीसीडी’ की तर्ज पर बनी डांस फिल्म नही है. बल्कि इस फिल्म की कहानी में डांस है. इस फिल्म का मूल मकसद लोगों के हर तरह के पाखंड, अंधविश्वास, अभिषाप व वहम को तोड़ना है.

प्रस्तुत है मनोज शर्मा से हुई बातचीत के मुख्य अंश:

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बॉलीवुड में सहायक निर्देशक से कैरियर शुरू करने वाला वहीं तक सीमित होकर रह जाता है? मगर आपने इसे तोड़कर …

-आपने एकदम सही कहा.पर मैने पहले सहायक एडीटर व फिर एडीटर के रूप में काम किया.एडीटर होने की वजह से मुझे काफी फायदा मिला.मैं 2004 में वीनस संगीत कंपनी के साथ जुड़ा और उनके लिए म्यूजिक वीडियो निर्देशित करने लगा.मैने ‘तुम तो ठहरे परदेसी’,‘यारों मैंने पंगा ले लिया’, ‘आवारा हवाओं का झोका हूं’ सहित कई सफलतम म्यूजिक वीडियो निर्देशित किए.

उन्हीं के लिए फिल्म ‘माई का बेटवा ’ भी निर्देशित किया.उसके बाद पीछे मुड़कर देखने नहीं पड़ी. फिल्म ‘माई का बेटवा’ के बाद लोगों को पता चल चुका था कि मनोज शर्मा केवल वीडियो निर्देशक नहीं है.वह तो फिल्म एडीटर व फिल्म निर्देशक है. फिर मैंने आशाराम बापू पर विवादास्पद फिल्म ‘स्वाहा’ निर्देशित की.उसके बाद ‘बिन फेरे फ्री में तेरे’,‘यह है लॉलीपॉप’, ‘प्रकाश इलेक्ट्रॉनिक्स,‘चल गुरू हो जा शुरू’,‘शर्मा जी की लग गयी’ सहित दस वर्ष के अंदर सत्रह फिल्में निर्देशित की.

आप अपने कैरियर का टर्निंग प्वाइंट किसे मानते हैं?

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-हकीकत में बतौर निर्देशक मुझे लाइम लाइट इस फिल्म ‘‘देहाती डिस्को’’ से मिल रहा है.इससे पहले मेरी कुछ फिल्में चली,कुछ नहीं चली. मगर मैंने जिनके साथ भी काम किया,वह सभी मेरे टैलेंट व मेरे व्यवहार को जानते हैं. मेरे काम करने के तरीके से भी लोग परिचित हैं.‘शर्मा जी की लग गयी’ से भी मुझे अच्छी पहचान मिली थी. इसमें कृष्णा अभिषेक व मुग्धा गोड़से थी. फिल्म को अच्छी सफलता मिली थी.लेकिन ‘देहाती डिस्को ’ से पहले की फिल्मों का उनके निर्माताओं ने बड़े स्तर पर प्रमॉशन नहीं किया था. फिल्म का प्रमोशन बहुत मायने रखता है. ‘देहाती डिस्को’ में सभी बड़े तकनीशियन हैं.

निर्माता इसे अच्छे से प्रमोट कर रहे हैं. गणेश आचार्य जी लीजेंड है, इसलिए पूरी फिल्म इंडस्ट्री उनको सपोर्ट कर रही है.तो अपरोक्ष रूप से मुझे सपोर्ट मिल रहा है.इसलिए ‘देहाती डिस्को’ से मुझे बतौर निर्देशक पहचान मिल रही है.

आप लेखक,एडीटर व निर्देशक हैं.यह कितना सुविधाजनक हो जाता है?

-देखिए,मैं खुले विचारों और सकारात्मक सोच वाला इंसान हूं.यदि निर्माता कहता है कि उसके पास कहानी है,तो मैं वह सुनता हूं. उस कहानी में दम होता है, तो मुझे उस पर भी काम करने से कोई परहेज नहीं होता.

हमारा मकसद तो दर्शकों तक अच्छी कहानी को लेकर जाना ही है.कइ बार मेरा सहायक भी बहुत बेहतरीन आउट लाइन सुना देता है. जब कोई निर्माता कहता है कि मनोज जी हमें आपकी स्टाइल की कॉमेडी फिल्म बनानी है, तब मैं अपनी कहानी उन्हे सुनाता हूं. उन्हें अच्छी लगती है, तब हम उस पर काम करते हैं. यदि मेरी कहानी उन्हे पसंद नहीं आती, तो मैं कहता हूं कि आप किसी अच्छे लेखक से मुझे कहानी सुनवाइए. मेरे लेखक,एडीटर व निर्देशक होने का सबसे बड़ा फायदा मुझे नहीं,बल्कि निर्माता को होता है.कलाकार को होता है.हम कलाकार से बारह दिन की तारीख लेकर शूटिंग शुरू करते हैं,पर जब बारह दिन में शूटिंग पूरी होने की बजाय तीस या चालिस दिन लग जाते हैं, तो कलाकार भी चिढ़ जाता है.इससे निर्माता को भी आर्थिक नुकसान होता है. जब एडीटर खुद लिखता व निर्देशित करता है, तो उसे पता होता है कि कितना लंबा किस तरह का दृष्य चाहिए.ऐसे में ज्यादा रीटेक या ज्यादा शूटिंग करने की जरुरत नहीं पड़ती.मुझे एडीटिंग आती है, इसलिए सेट पर आठ कलाकारों की जरुरत होने पर भी मैं सभी का इंतजार नहीं करता.जो कलाकार आ जाता है,उसके सोलो दृश्य फिल्म लेता हूं,क्योंकि सोलो दृष्य भी चाहिए होते हैं.

‘‘देहाती डिस्को’’ तो पूरी तरह से डांस प्रधान फिल्म ही है?

-जी नहीं..यह नृत्य प्रधान फिल्म नही है.बल्कि यह बाप बेटे की भावना प्रधा कहानी है.कहानी में डांस है.यह एक ऐसे गांव की कहानी है,जहां डांस करना अभिशाप माना जाता है.डांस के ही कारण बाप बेटे को गांव से निकाल दिया जाता है.उसी गांव में जब एक मंत्री का बेटा उसी मंदिर प्रांगण में वेस्टर्न डांस का स्कूल खोलना चाहता है.तब जिन्हे गांव से बाहर किया गया था, वही अपने देश के डांस के बल पर वेस्टर्न वाले को बाहर का रास्ता दिखाते हैं और भारतीय संस्कृति की रक्षा करते हैं.

अभिशाप के मसले को फिल्म में किस तरह से दिखाया है?

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-देखिए,समाज में जो कुछ पाखंड चल रहा है,उसका चित्रण करते हुए हमने इस बात को रेखांकित करने का प्रयास किया है कि अभिशाप वगैरह कुछ नहीं होता.

मैं तो उत्तर प्रदेश के बुलंदषहर जिले के एक छोटे शहर खुर्जा का रहने वाला हूं. खुर्जा के आस पास चालिस गांव हैं.हर गांव में कुछ न कुछ अभिशाप वगैरह की किवंदंतिया हैं. कुछ अंधविष्वास फैले हुए हैं.मैने अपनी इस फिल्म ‘‘देहाती डिस्को’’ में उस अंधविश्वास को तोड़ा है.मैंने अपने किरदारों के माध्यम से उस अभिषाप को तोड़ा है.कोई आपदा आ जाए,तो उसे आप ‘डांस का अभिषाप’ नाम कैसे दे सकते हैं?मैंने सवाल उठाया है कि जिस अभिषाप की बात को या जिस अंधविश्वास को आप कई दशकों से ढोते चले आ रहे हैं,उसका कोई प्रामाणिक सबूत है?मैंने इस फिल्म में कहा है कि डांस या कला तो भगवान का रूप है,वह अभिषाप कदापि नहीं हो सकता.जिस कार्य को करने से मन को सकून मिलता है, मन को शांति मिलती है,वह अभिशाप नहीं हो सकता है. मैंने इस बात को बहुत ही तार्किक तरीके से फिल्म में रखा है. हम अपनी फिल्म के माध्यम से लोगों को अंधविष्वास के खिलाफ जागरूक करने का काम कर रहे हैं.

क्या आपकी फिल्म इस बारे में बात करती है कि मंदिरों के महंत खुद को सुरक्षित रखने के लिए अभिशाप की बातें फैलाते हैं?

देखिए ,हमारे देश में इंसान के हर रूप मौजूद है.हमने उन सभी को अपनी फिल्म का हिससा बनाया है.फिल्म देखकर आपकों अहसास होगा कि हमने सच को उजागर किया है.कुछ लोग सकारात्मक बातें करते हैं, तो कुछ लोग अपने हित के लिए लोगों में भ्रम पैदा करते हैं.डर फैलाते हैं. हमने उसी वहम को तोड़ने का काम किया है.

फिल्म का नाम देहाती डिस्कोक्यों?

-देहाती यानी कि देह यानी कि आत्मा.यानी कि देष की आत्मा. यानी कि शुद्ध देसी नृत्य.इसमें हमने जान बूझ कर वेस्टर्न षब्द ‘डिस्को’ जोड़ा है.

इंसान के लिए नृत्य कितना आवश्यक मानते हैं?

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मेरी राय में नृत्य तो जीवन का अभिन्न अंग है. खुशी का मौका हो या गम का हर मौके पर नृत्य किया जाता है.बच्चे के जन्म से लेकर मृत्यू तक हर संस्कार के समय,हर अवसर पर डांस किया जाता है.नृत्य के माध्यम से इंसान अपनी भावनाओं को बड़ी सहजता से पेश कर सकता है.खुद को चुस्त दुरूस्त रखने के लिए भी डांस किया जाता है. डांस करने से इंसान के शरीर में एक लचक,एक रिदम के साथ ही एक ‘ग्रेस’

आता है. भारतीय संस्कृति का एक हिस्सा होते हुए भी नृत्य इंसान को दिमागी रूप से सकून प्रदान करता है. हमने उसी डांस की संस्कृति का बढ़ावा दिया है.हम किसी भी प्रकार के डांस के खिलाफ नहीं हैं.हमारी फिल्म की टैग लाइन है- ‘आप जो सीखकर आए हैं, हम उसका सम्मान करते हैं,लेकिन हमें अपनी कला पर गर्व है.

’’ हम हिप हॉप डांस का अपमान नहीं कर रहे हैं. हिप हाप डांस भी कला है. हर तरह के डांस को करने के लिए टैलेंट तो चाहिए ही.

गणेश आचार्य नृत्य निर्देशक होने के साथ साथ फिल्म भी निर्देशित कर चुके हैं. तो आपको इस बात का शक नहीं था कि वह आपके काम मेंव सेट पर उंगली करेंगें?

मैं तो इसे अच्छा मानता हूं. देखिए,सेट पर एक सहायक या कैमरामैन भी हमें सलाह दे सकता है और निर्देषक होने के नाते उसकी बात को सुनना और उस पर गौर करना भी चाहिए.क्योंकि सेट पर हर कलाकार व तकनीशियन फिल्म की बेहतरी की ही बात सोचता है. गणेश मास्टर जी यदि कुछ गलत कहेंगे, तो मैं क्यों मानने लगा.पर उनकी सही बात पर गौर करता हॅूं. कई बार सेट पर हमारा कैमरामैन कहता है कि यदि हम ट्रॉली को लेफ्ट में राइट से चलाएं.तो मैं कहता हूं कि चला कर दिखा. बात समझ में नहीं आती तो कहता हूं कि नही तू लेफ्ट से ही चला. देखिए,अब काम करना आसान हो गया है.अब हम उसी वक्त मॉनीटर पर देख लेते हैं और जरुरत हो दो बार शूट कर लेते हैं.गणेष मास्टर जी बहुत बड़े तकनीशियन हैं.वह कई बड़े बड़े गाने फिल्मा चुके हैं. फिल्म निर्देषित कर चुके हैं.सेट पर एक बार उन्होने कहा कि,‘मनोज इस दृष्य को ट्रॉली के उपर से देख कैसा लगेगा? उन्होने यह नहीं कहा कि तुझे इसी तरह से लेना पड़ेगा? गणेष मास्टर जी इतने वर्षों से इंडस्ट्री में है. समझदार हैं.उन्होने प्रोटोकाल नहीं तोड़ा. हमेशा एक भाई की ही तरह व्यवहार किया.

ट्रेलर का रिस्पांस किस तरह का आ रहा है?

लोग कह रहे हैं कि फिल्म में कंटेंट तो है.एक्शन व डांस भी है,जिससे लोगों के अंदर एक उत्सुकता पैदा हो रही है. देखिए हमारी फिल्म में कुछ कमियां है,तो उन्हें हम स्वीकार करने को तैयार हैं.देखिए,रचनात्मकता में तो अंतिम समय तक सुधार की जरुरत रहती ही है.

इसके अलावा क्या कर रहे हैं?

मेरी एक दूसरी फिल्म ‘‘खली बली’ प्रदर्षन के लिए तैयार है.इस फिल्म में लंबे समय बाद धर्मेंद्र जी नजर आने वाले हैं.इस फिल्म स मधु की वापसी हो रही है.

इसके अलावा इसमें रजनीश दुग्गल,विजय राज,राजपाल यादव जैसे कलाकार है.यह पूरी तरह से हॉरर कॉमेडी कमर्शियल फिल्म है.इसके अलावा दो फिल्मों की शूटिंग शुरू करने वाला हूं. इनमें से एक फिल्म ‘‘कालिंग शिवा’’ है, जो कि कश्मीर की वर्तमान परिस्थितियों पर है. इसे हम कश्मीर में ही फिल्माएंगे. यह कश्मिरी पंडित की इमोशनल फिल्म है.

क्या फिल्म कालिंग शिवामें जम्मू एंड कष्मीर में 370 हटने के बाद के हालात की बात होगी?

-जी हां! मैं आज 2022 की कहानी कहने जा रहा हूं. मैं गड़े मुर्दे नहीं उखाड़ता. हम तो लोगों को आगे बढ़ना सिखाने में यकीन करते हैं.370 हटने के बाद पंडित वापस कष्मीर जा रहा है. उसके बेटे कहते है कि, ‘पापा अब क्यों जा रहे हैं.हमने दिल्ली में अच्छा मकान बना लिया है, हमारी बहुत बड़ी फैक्टरी है.पर वह नही मानता.वह कश्मीर जाकर अपने बंद पड़े पुश्तैनी मकान में गार्मेंट फैक्टरी उन कश्मिरी लड़को के लिए खुलवाकर वापस दिल्ली आ जाता है,जिन्हे रोजगार की जरुरत है.तो हम अपनी फिल्म में सकारात्मक बातें कर रहे हैं.हम समस्या का चित्रण नही बल्कि समस्या का हल दे रहे हैं.जो लोग यथार्थपरक सिनेमा के नाम पर अपनी फिल्मों में महज समस्याओं का चित्रण कर रहे हैं, उनके पक्ष में नही है.मेरा मानना है कि आप समस्या का चित्रण तभी करें,जब उसका हल आपके पास हो.फिल्म में समस्या के हल की बात तो होनी ही चाहिए.

आखिर क्या है देशद्रोह

जब से भारतीय जनता पार्टी की सरकार देश में आई है देशद्रोह गंभीर हो गया है. जहां 2014 में 30 मामलों में 73 लोगों को 2016 में देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया और सीखचों के पीछे डाल दिया गया. 2019 तक यह संख्या बढ़ कर 93 मामले और 98 गिरफ्तारियां हो गई. 2020 व 2021 में कोविड के कारण सरकार वैसे व्यस्त रही पर गिरफ्तार आमतौर पर बिना जमानत के जेलों में रहे.

देशद्रोह का मतलब होता है देश के प्रति कुछ ऐसा करना जिस से देश के आस्तित्व को आंच आए और उस के टुकड़े होने की आशंका हो. पर असल में देशद्रोह नई परिभाषा के अनुसार हर वह हो गया है जो पौराणिक ङ्क्षहदू मान्यताओं के आगे सिर न झुकाए और भेदियों के साथ राजाओं के आगे सिर झुका कर न चलें.

देश की जनता को पाठ पढ़ा दिया गया है कि देश के शासक, उस का ज्ञान, इस का इतिहास, उस की गरिमा इतनी महान है कि उन के बारे किसी तरह का तर्क, तथ्य या प्रश्न सीधा धर्म और देश के विरुद्ध विद्रोह है और प्रश्न करने वालों को जेल में डाल देना ही सही है चाहे उन की संख्या कैसी भी हो देश की जनता के एक हिस्से का विश्वास है कि देश की 80′ जनता देशद्रोही है, जी हां 2 तिहाई से ज्यादा, और वे ही देश भक्त है जो ‘जय यह जय वह के बारे सुबह, दोपहर, शाम, रात को लगाते हों. सरकार ने तो यह नीति बनाई पर जनता के प्रभावशाली वर्ग को यह इतनी भाई कि उस ने तुरंत इसे लपक लिया और वे पैसा मिलने पर या न मिलने पर भी इसे दुष्प्रचार को फैलाने में लग गए.

देश भर में समाचारपत्र, टीवी चैनल, ट्विटर, फेसबुक, व्हाट्सएप गु्रप देशद्रोहियों के पचार से भर गए हैं. इस का परिणाम यह हुआ है कि देश में सामाजिक सुधार बंद ही नहीं हुए, उल्टे पुरातन विचार फिर कैक्टसों की तरह पनपने लगे हैं. देश जातियों बंटने लगा है. हर जाति अपना झंडा ले कर खड़ी हो गई है. हरेक ने अपने देवीदेवता ढूंढ लिए हैं विवाह प्रेम अपनी ही जाति में होंगे क्योंकि हर जाति अपने त्यौहार अपने प्राचीन तरीकों से करेगी.

देशद्रोह यह सब था और है. जिन्होंने अलग जातियों, संप्रदायों, देवीदेवताओं, जातियों, उपजातियों, नामों के आगे जाति लगाई वे देशद्रोही हैं. जो एक की मूॢत पूजा कर दूसरे को अपना विरोधी मानते हैं, वे देशद्रोही हैं पर देशद्रोह का आरोप उन पर लगा है जो यह बता रहे हैं कि कैसे सत्ता व प्रभाव में बने के लिए लगातार देशद्रोह के कानून, भारतीय दंडसहिता की धारा 124 ए, के साथ दूसरी धाराओं व दूसरे कानूनों की धाराओं के साथ मिला इस्तेमाल कर सुधारकों का मुंह बंद किया जा रहा है.

अभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है पर जब जनता का 2 तिहाई हिस्सा गद्दार माना जाए तो क्या कहेंगे, क्या करेंगे आप.

औब्सेसिव कम्पलसिव डिसऔर्डर: उलझनभरी समस्या

कविता और उस के पति निर्मेष अब अकेले रहते हैं क्योंकि बेटे को उन्होंने होस्टल में पढ़ने भेज दिया है. दोनों की नौकरियां अच्छी हैं पर कविता को हर समय डर लगता है कि वह घर बंद करना या कोई खिड़की बंद करना भूल न गई हो. कई बार वह काम पर जाते हुए 2-4 किलोमीटर जा कर लौटती कि सब दरवाजे चैक कर लें. जब निर्मेष टूर पर होते तो उसे हर समय डर लगता कि कोई घर में घुस जाएगा, वह बारबार सारे कमरों में  झांक कर खिड़कियां चैक करती.

यह एक मानसिक रोग है, जिसे औब्सेसिव कम्पलसिव डिसऔर्डर या आम भाषा में  झक एवं सनक भी कहते हैं. यह एक आम समस्या है एवं बहुत लोगों में आमतौर पर देखने को मिलती है. यह रोग समाज में जितना माना जाता है, उस से कहीं अधिक पाया जाता है. ऐसा इस वजह से होता है क्योंकि व्यक्ति अपने इस रोग को दूसरे लोगों से सामाजिक भय की वजह से छिपाता है कि कहीं उस पर पागलपन का ठप्पा न लग जाए.

जब तक यह रोग नियंत्रित रहता है या कम मात्रा में होता है तब तक इसे मनोवैज्ञानिक समस्या मान लिया जाता है. जब यह एक सीमा से अधिक बढ़ जाता है, तब ऐसी स्थिति में यह व्यक्ति के लिए बड़ा ही कष्टकारी होता है एवं उस के लिए काम करना व जीवन जीना दूभर हो जाता है. ऐसे में यह बीमारी का रूप ले लेता है, जिसे मानसिक रोग कहते हैं. ऐसी स्थिति में तुरंत उपचार की आवश्यकता होती है.

इस रोग से पीडि़त बहुत सारे लोग आमतौर पर बड़ी उपलब्धियां प्राप्त करने वाले होते हैं. दुनिया की बहुत सारी विख्यात हस्तियां इस रोग से पीडि़त बताई जाती हैं, जैसे चार्ल्स डार्विन (लेखक एवं प्रकृतिविद), होवार्ड हग्स (अमेरिकन टैलीविजन की विख्यात हस्ती), लियोनार्डो डिकेप्रियो (अमेरिकी अभिनेता), माइकल जैक्सन (अमेरिकी संगीतकार एवं मनोरंजनकर्ता), एल्बर्ट आइंस्टीन (अपनी शताब्दी के महान विद्वान), विंस्टन चर्चिल (प्रख्यात ब्रिटिश राजनेता) आदि बहुत सारे विश्वविख्यात व्यक्तित्व इस रोग से पीडि़त बताए जाते हैं.

औब्सेसिव कम्पलसिव डिसऔर्डर एक तनावयुक्त समस्या है. इस में व्यक्ति के दिमाग में बारबार ऐसे विचार आते रहते हैं जिन का व्यक्ति को पता भी होता है कि यह अनावश्यक विचार है लेकिन व्यक्ति उन से तनाव में रहता है एवं उस तनाव को दूर करने के

लिए अनावश्यक विचार से संबंधित, अनावश्यक कार्य बारबार करता रहता है. जबकि वह जानता है कि यह कार्य जो वह बारबार कर रहा है, गलत है लेकिन फिर भी वह इन विचारों के सामने मजबूर होता है. अगर वह ऐसा नहीं करता तो उस का तनाव बढ़ता जाता है एवं बारबार एक ही अनावश्यक कार्य करना उस की मजबूरी हो जाती है.

इस रोग में बिना मतलब का तनाव होता है जो किसी विशेष स्थिति से होता है. उस विशेष स्थिति के सामने आते ही व्यक्ति को सनक हो जाती है एवं जब तक वह बारबार उस कार्य विशेष को नहीं करता, उस का तनाव दूर नहीं होता है, जैसे वह अपनी अलार्म घड़ी को बारबार चैक करता है कि उस में उस ने सही टाइम का अलार्म लगा दिया है या नहीं. जबकि वह अच्छी तरह से जानता है कि उस ने अलार्म ठीक से लगाया है.

औब्सेसिव कम्पलसिव डिसऔर्डर कार्य में थोड़ाबहुत परेशानी करने से ले कर व्यक्ति को इस स्थिति तक पहुंचा देता है, जिस में व्यक्ति काम करने में अपनेआप को असहाय महसूस करने लगता है. ऐसा अकसर तब होता है जब इस रोग से ग्रसित व्यक्ति अपने व्यवहार को नियंत्रित नहीं कर पाता है एवं अपना अधिकतर समय एवं शक्ति इस रोग को नियंत्रित करने में लगा देता है.

इस बीमारी से पीडि़त अधिकतर व्यक्तियों में शुरुआत में एक ही विचार बारबार दिमाग में आने लगता है एवं जब तक वह उस विचार से संबंधित कार्य को कर नहीं लेता है, वह तनावग्रस्त रहता है. ऐसा अकसर युवावस्था में होता है. कुछ परिवार, अपने परिवारजन की इस स्थिति को शुरू में ही पहचान लेते हैं.

इस रोग का कहीं न कहीं शराब एवं ड्रग्स के सेवन से भी संबंध देखने को मिलता है. शराब एवं ड्रग्स इस बीमारी के लक्षण को बढ़ा देते हैं एवं इस रोग से पीडि़त व्यक्ति भी  झक एवं सनक के तहत अगर इन चीजों का इस्तेमाल करते हैं तब जरूरत से ज्यादा इन चीजों का सेवन करने लगते हैं.

औब्सेसिव कम्पलसिव डिसऔर्डर नामक रोग में सब से ज्यादा  झक एवं सनक साफ देखने को मिलती है. इस में व्यक्ति बारबार हाथ धोता रहता है, हाथों को रगड़ता रहता है एवं ऐसी वस्तुओं का हाथ पर जरूरत से कहीं ज्यादा इस्तेमाल करता है जिन से उसे लगता है कि वे उस का संक्रमण से बचाव कर सकती हैं. कोविड 19 के बाद यह रोग बहुतों का और बढ़ गया क्योंकि चारों ओर इस का खूब प्रचार हुआ.

इस समस्या से पीडि़त व्यक्ति बारबार हाथ धोता रहा. ऐसा व्यक्ति अपनेआप को संक्रमण से बचाने के लिए करता है. एक गृहिणी अपना अधिकतर समय अपने हाथ धोने में लगाती है, इस डर से कि कहीं उस के हाथ में संक्रमण न हो. इस कारण से वह अपने घर के कार्य करने में असमर्थ रहती है.

दूसरे नंबर की  झक एवं सनक किसी बात को बारबार कहना एवं किसी चीज को बारबार चैक करना, जैसे घर पर या कमरे में ताला लगाने पर उसे बारबार चैक करना, कई बार वापस आ कर भी चैक करना कि ताला ठीक से लगा है या नहीं.

इस रोग से पीडि़त व्यक्ति अपनी मेज पर रखी फाइल को एकदम सीधे बारबार रखता रहता है. फाइल जरा सी भी तिरछी या इधरउधर निकली हो तो वह परेशान रहता है. अपने तौलियों को एकदम इस तरह से मोड़ कर रखता है कि जरा भी मुड़ा हुआ तौलिया इधरउधर से जरा भी न निकला हुआ हो.

हिंसात्मक या धार्मिक विचार जरूरत से ज्यादा एवं बारबार आना, व्यक्तिगत संबंधों से संबंधित  झक एवं सनक, बारबार किसी नंबर को गिनना, कमरे में घुसते या निकलते समय दरवाजे को बारबार किसी विशेष नंबर या अपनी  झक एवं सनक के तहत कि इतनी बार (नियत) खोलना एवं बंद करना आदि लक्षण व्यक्ति का काफी समय बरबाद करते हैं एवं व्यक्ति के लिए काफी पीड़ादायक एवं तनावयुक्त होते हैं.

ऐसे व्यक्ति के मन में खतरनाक बीमारियों, जैसे एड्स एवं कैंसर का डर भी बैठ जाता है. जबरदस्ती की खरीदारी करने की  झक एवं सनक भी देखने को मिलती है. ऐसा अकसर महिलाओं में देखने को मिलता है. ऐसी महिलाएं कपड़े, गहने एवं सौंदर्य प्रसाधन की वस्तुएं खरीद कर इकट्ठा करती रहती हैं.

ऐसे व्यक्ति अपने सिर एवं आंख की पलकों एवं भौंह के बाल उखाड़ते रहते हैं. शरीर की त्वचा को हाथ से पकड़ कर बारबार ऊपर उठाना, मुंह से नाखून चबाना, दुख पर हंसना, किसी जगह पहुंचने के लिए कितने पैरों के कदम (स्टैप्स) रखे उसे गिनना एवं किसी जगह पहुंचने के लिए किसी विशेष जगह से ही बारबार निकलना, घर के दरवाजे को हमेशा बंद रखना, किसी वस्तु को बारबार विशेष नंबर के हिसाब से छूना, रंगीन टाइल्स पर चलते समय एक विशेष रंग की टाइल पर ही पैर रख कर चलना, किसी खाने की वस्तु का जोड़े में खाना यानी अगर वह खाने की वस्तु 2 होंगी तभी खाना (अगर 3 होंगी तो ऐसी स्थिति में 2 खा कर एक छोड़ देना या एक और मांग कर उस के 2 जोड़े बनाना तब खाना), बारबार मुड़ कर पीछे देखना आदि लक्षण भी इस रोग के होने के संकेत हैं.

ऐसे व्यक्ति आमतौर पर बुद्धिमान होते हैं. ऐसे व्यक्ति खतरा मोल लेने से बचते हैं, सावधानीपूर्वक कार्ययोजना बनाते हैं, जरूरत से ज्यादा जिम्मेदारी महसूस करते हैं एवं निर्णय लेने में समय लगाते हैं. इस रोग में विचार बारबार आते हैं एवं व्यक्ति के बारबार इन विचारों को दिमाग से निकालने एवं इन से मुकाबला करने के बाद भी आते रहते हैं.

इस रोग से पीडि़त व्यक्ति  झक एवं सनक से संबंधित तनाव को दूर करने के लिए दूसरे लोगों से बात करते हैं या उस कार्य को बारबार करते हैं. इस तरह के रोगियों में आत्महत्या आमतौर पर देखने को नहीं मिलती हैं, जब तक कि रोगी इस बीमारी के साथसाथ अवसाद या अन्य किसी मानसिक रोग से पीडि़त न हो. यह रोग आनुवंशिक भी देखने को मिलता है.

रोग का उपचार

इस रोग के उपचार में साइकोथेरैपी एवं दवा का महत्त्वपूर्ण योगदान है. इस में बिहेवियर थेरैपी भी काफी कारगर है. दवा एवं साइकोथेरैपी द्वारा यह रोग काफी नियंत्रण में रहता है एवं व्यक्ति काफी हद तक अपनी सामान्य जिंदगी जीने लायक हो जाता है तथा अपने समस्त कार्य सुचारु रूप से करने लगता है.

इस बीमारी के लिए दवाओं का उपयोग हो रहा है जो ब्रेन को ओसीडी के बारे में सही सिग्नल देती हैं. इस के इलाज में असर 3-4 माह में ही दिखता है, कुछ साइड इफैक्ट भी होते हैं. सो, अच्छे डाक्टर के पास जाना अति आवश्यक है.

भवन निर्माण के टिप्स

आजकल लोग प्लौटेड जमीन पर कम ही मकान बना पाते हैं. उन्हें मल्टीस्टोरीड सैकड़ों फ्लैटों वाले मकानों को अपना कहने से ही संतोष करना पड़ता है, जिस में पूरा नक्शा बिल्डर का होता है. इस में ‘जैसा है वैसा लें’ के आधार पर काम होता है. फिर भी शहरों के बाहरी इलाकों में 100, 200, 300 मीटर के प्लौट भी मिलते हैं जिन पर मनचाहा मकान बनवाना बेहद सुखदायक व संतोष देने वाला होता है.

इस तरह ‘एक सुंदर बंगला हो’ के सपने को साकार रूप देने का जब समय आता है तो इंसान की कोशिश होती है कि घर खूबसूरत, सुविधा संपन्न व दोषरहित बने. यों तो सब की जरूरतें बजट और पसंद एकदूसरे से भिन्न होती हैं और इसीलिए निर्माण कार्य में भी भिन्नता होती है. लेकिन जैसे हर चीज का एक स्टैंडर्ड मानक होता है, उसी तरह से गृह निर्माण के क्षेत्र में भी कुछ मानक निर्धारित हैं जिन्हें ध्यान में रख कर निर्माण के समय की भागदौड़ व परेशानियों से बच सकते हैं.

मकान की प्लिंथ की ऊंचाई सड़क से कम से कम 3 फुट होनी चाहिए. यह ध्यान रखें कि सड़कों की ऊंचाई समय के अनुसार बढ़ती रहेगी.

यदि मकान स्टिल्ट पर बनाया जा रहा है तो नियम स्थानीय निकाय के मानने होंगे ताकि कार सड़क से पार्किंग तक आ सके.

रसोईघर के स्लैब की ऊंचाई औसतन 30 से 34 इंच रखना सुविधाजनक होता है.

आमतौर पर रसोई में एल आकार के स्लैब की चौड़ाई सवा 2 फुट, सिंक व पानी रखने का स्लैब 2 फुट तथा अन्य उपयोगी सामानों को रखने

वाले स्लैब की चौढ़ाई पौने 2 फुट रखना हर तरह से सुविधाजनक व आरामदायक होता है. अगर जगह हो तो किचन के बीच में आईलैंड बनाएं ताकि काम करते समय आसानी रहे.

आमतौर पर सिंक की लंबाई 2 फुट, चौड़ाई पौने 2 फुट व गहराई 9 से

12 इंच रखी जानी चाहिए. स्टील सिंक अब साइलैंट साइज की भी आती है जो शोर नहीं मचाती.

खिड़की के ऊपर बनने वाली मुंडेर आरसीसी से बनवाएं जो खिड़की से कुछ बड़ी हो. मुंडेर की लंबाई डेढ़ से 2 फुट होने से तेज बरसात के पानी से कमरा सुरक्षित रहता है.

मकान में बिजली का काम कराते समय अच्छी क्वालिटी के प्रोडक्ट होने चाहिए. वायर व पावर कनैक्शन के लिए स्टैंडर्ड का वायर डलवाना चाहिए. यह लंबे समय तक चलता है.

कंसील्ड वायरिंग के लिए पौन इंच का पीवीसी पाइप इस्तेमाल करें. इस से ताप आसानी से खींचा जा सकेगा व वक्त पड़ने पर खराब तार बदला भी जा सकेगा.

घर में बिजली का कनैक्शन लेने के लिए केबल का ही उपयोग करें.

कनैक्शन केबल एल्युमिनियम वायर का फोर कोर लेना चाहिए, जिस से केबल में खराबी आने पर अतिरिक्त तारों का उपयोग किया जा सके.

खिड़कियों की ग्रिल 4 एमएम तक लेने पर मकान की सुरक्षा के साथसाथ आप पर आर्थिक भार भी कम पड़ेगा.

शौच व स्नानघर में रोशनदान इस तरह के लगाने चाहिए जिस से कि रोशनी के साथ ताजी हवा भी अंदर आती रहे व घुटन न हो.

टैलीफोन व टैलीविजन के तार डालते समय एक अतिरिक्त तार या डबल कोर तार डालनी चाहिए, ताकि खराबी आने पर दूसरे तार को उपयोग में लाया जा सके. अभी से हर कमरे में डाटा केबल डलवाएं. हर थोड़ी दूर पर भी कम चार्जर की जगह हो.

नाली की पाइपलाइन में थोड़ीथोड़ी दूर पर जालीयुक्त चैंबर बनाए जाने चाहिए. इस से 2 लाभ होते हैं, एक तो नाली कहां से रुक रही है पता चल जाता है, दूसरे, बगैर पाइपलाइन को तोड़े ही साफसफाई का काम सहज ढंग से पूरा हो जाता है. सीलन न आए, यह सब से बड़ा चैलेंज है.

पानी की तथा मल निकासी के लिए पीवीसी पाइप के स्थान पर सीमेंट का पाइप लगाने से लागत कम आती है.

मुख्य दरवाजे के बराबर ही बाहर की तरफ 2 इंच की पतली नाली बनवानी चाहिए. इस से बरसाती की सफाई के समय वहां गंदा पानी सड़क पर न जा कर नाली में जाएगा.

मलमूत्र तथा गंदे पानी की निकासी के लिए 4 इंच की पाइपलाइन का उपयोग करने से नाली रुकने की संभावना कम हो जाती है.

बाथरूम व वाशबेसिन में नहानी ट्रेप का उपयोग करें, जिस से नालियों से बदबू नहीं आएगी व चूहों से बचाव भी होगा.

भवन निर्माण शुरू करने से पहले बजट बना लेना चाहिए. इस के साथ ही ऐसी कोशिश करनी चाहिए कि बीच में मकान निर्माण में किसी प्रकार की रुकावट न आए.

अपने इंजीनियर व ठेकेदार के साथ बराबर बैठक करते रहें. इस से आप के मनमुताबिक काम होगा तथा उन की भी समस्याओं का समाधान होगा.

चाहे मकान बनाते समय आप युवा हों, यह खयाल रखें कि मकान एजफ्रैंडली हो यानी ऐसा हो कि बीमारी में या बुढ़ापे में तंग न करे.

मकान को किराए पर देना पड़ सकता है, इसलिए इस ढंग से बनवाएं कि ज्यादा कमरे आसानी से बिना लंबीचौडी मेहनत के बनाए जा सकें.

मकानों में वैंटिलेशन के लिए अब खिड़कियों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता क्योंकि बाहर का पौल्यूशन घर में आ सकता है, इसलिए फिल्टर की हुई हवा का इंतजाम रखें.

एसी की पर्याप्त व्यवस्था रखें. बाहर से एसी आप के मकान की सुंदरता को खराब न करे.

अपना मकान बनाना एक टेढ़ा कार्य है. इस पर पूरा ध्यान देना जरूरी है. इसलिए बाजार भाव देखते रहें.     द्य

मैं एक लड़की से शादी करना चाहता हूं पर उसकी उम्र 18 साल भी नहीं हुई है, क्या करूं?

सवाल

मैं एक लड़की से बहुत प्यार करता हूं. वह मेरे दिलोदिमाग पर छाई रहती है. हम दोनों शादी भी करना चाहते हैं, पर अभी उस की उम्र 18 साल भी नहीं हुई है जबकि मैं 21 साल का हो चुका हूं. मुझे डर है कि उस के मांबाप उस की शादी कहीं ओर न तय कर दें. सही सलाह दें?

जवाब

अभी आप दोनों की ही उम्र शादी की नहीं है. आप का डर अपनी जगह ठीक है लेकिन मुनासिब वक्त का इंतजार तो आप को करना ही पड़ेगा. हमेशा अपनी गर्लफ्रेंड के खयालों में डूबे रहने के बजाय कैरियर और पढ़ाई पर ध्यान दें. आप कुछ बन कर दिखाएंगे तो लड़की के मांबाप उस का हाथ आप को देने में हिचकिचाएंगे नहीं.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

योगी सरकार 2.0 ने अपने पहले बजट में महिलाओं और बेटियों को दी प्राथमिकता

योगी आदित्‍यनाथ सरकार 2.0 का बजट विधानसभा में गुरूवार को पेश किया गया. वित्‍त मंत्री सुरेश खन्‍ना ने अब तक का सबसे बड़ा और पेपरलेस बजट पेश किया. यह बजट प्रदेश की महिलाओं, बेटियों और बच्‍चों के लिए बेहद खास है. प्रदेश की महिलाओं और बेटियों के उत्‍थान के लिए योगी सरकार ने साल 2017 से ही जमीनी स्‍तर पर योजनाओं को लागू कर सीधे तौर पर उनको लाभ पहुंचाने का काम किया. ऐसे में एक बार फिर से सरकार बनने के बाद योगी सरकार ने अपने पहले बजट में महिलाओं और बेटियों को प्राथमिकता दी है. बजट में इस बार महिलाओं व बेटियों की सुरक्षा, रोजगार, शिक्षा, स्‍वावलंबन पर जोर दिया है. जिसके तहत लखनऊ, गोरखपुर और बदायूं में 03 महिला पीएसी बटालियन का गठन किया जा रहा है. बजट में महिला सामर्थ्य योजना के लिए 72 करोड़ 50 लाख रूपये की धनराशि प्रस्तावित की गई है. इस योजना के तहत राज्य की महिलाओं को रोजगार के लिए प्रेरित किया जाएगा. इससे महिलाओ में उत्साह बढ़ेगा और वह सशक्त और आत्मनिर्भर रहेंगी.

बजट में बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ

कार्यक्रम के तहत यूपीएसईई-2018 की 100 टॉपर छात्राओं को लैपटॉप और 100 टॉपर एससी व एसटी छात्राओं को लैपटॉप का वितरण किया जाएगा. प्रदेश में चल रहे वृहद मिशन शक्ति अभियान के लिए 20 करोड़ रूपये की धनराशि प्रस्तावित की गई है. इसके साथ ही मुख्यमंत्री कन्या सुमंगला योजना के तहत पात्र बालिकाओं को 06 विभिन्न श्रेणियों में 15000 रूपये की सहायता पीएफएमएस के जरिए से प्रदान की जा रही है. इस वित्तीय वर्ष 2022-2023 के बजट में योजना हेतु 1200 करोड़ रूपये की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है. पुष्टाहार कार्यक्रम के तहत समन्वित बाल विकास योजना के तहत राज्य सरकार द्वारा दिए जाने वाले पोषाहार के लिए 1675 करोड़ 29 लाख रूपये की व्यवस्था प्रस्तावित की गई है.

योगी सरकार का बच्चों के मुद्दों पर विशेष ध्यान

उत्तर प्रदेश सरकार ने बच्चों के मुद्दों पर विशेष ध्यान दिया है. इसके ही परिणाम है कि पिछले कुछ वर्षों में एक ओर शिशु मृत्यु दर में तेजी से गिरावट आई है वहीं दूसरी ओर दस्तक कार्यक्रम के परिणामस्वरूप एईएस व जेई से प्रभावित सभी क्षेत्रों में बच्चों की मृत्यु में बड़ी कमी दर्ज की गई है. योगी सरकार के इस पहले बजट में बाल कल्याण पर विशेष ध्‍यान दिया गया है. जिसके तहत कुपोषण पुनर्वास केन्द्रों को जिलों से ब्लॉक तक ले जाने के लिए बजटीय प्रावधान किया गया है. उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना के तहत पात्र बच्चों को 4000 रूपए प्रतिमाह की आर्थिक सहायता दी जाएगी. उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री बाल सेवा योजना (सामान्य) के तहत पात्र लाभार्थियों को 2500 रूपये प्रतिमाह की आर्थिक सहायता स्‍वीकृत है. इसके साथ ही ऑपरेशन विद्यालय कायाकल्प कार्यक्रम के तहत सरकारी स्कूलों में बच्चों के नामांकन में वृद्धि की जाएगी.

करण मेहरा के आरोपों के बीच निशा रावल ने तोड़ी चुप्पी, कही ये बात

टीवी की मशहूर एक्ट्रेस निशा रावल (Nisha Rawal) अपने पर्सनल लाइफ को लेकर सुर्खियों में छायी हुई हैं. करण मेहरा ( K ने कुछ दिन पहले ही निशा रावल पर एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर का आरोप लगाया था. इस आरोप के बाद कुछ लोगों ने निशा का सपोर्ट किया तो वहीं कुछ लोगों ने उन्हें दोषी ठहराया. अब एक्ट्रेस ने इस मामले पर चुप्पी तोड़ी है.

एक इंटरव्यू के दौरान निशा रावल ने पति से अलग होने के बाद बेटे के परवरिश को लेकर बात की. रिपोर्ट के मुताबिक एक्ट्रेस ने कहा, “अब मैं सिंगल पैरेंट हूं. मैं हमेशा कहती हूं कि एक बेबी के लिए दो लोगों की जरूरत होती है और उसे पालने के लिए भी दो लोगों का होना जरूरी है.

निशा रावल ने आगे कहा कि कई बार आप जिंदगी के ऐसे स्टेज पर पहुंच जाते हैं, जहां आपको चुनौतियों का सामना पड़ता है. आप सिंगल पैरेंट बनते हैं. मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं है, क्योंकि मैं अपने बच्चे की अकेले परवरिश पर खुद को बहुत अलग मानती हूं.

निशा रावल ने ये भी बताया कि उन्हें इस बात पर भी दुख होता है कि उन्हें बेटे को छोड़कर काम पर जाना पड़ता है. एक्ट्रेस ने ये भी कहा कि मैंने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ सीखा है. हमें अपनी जिंदगी में सकारात्मक रहना और इस चीज को स्वीकार करना सीखना चाहिए कि हमारे पास कोई और ऑप्शन नहीं है.

वर्कफ्रंट की बात करे तो निशा रावल कंगना रनौत के शो ‘लॉकअप’ में नजर आई थीं. इसके अलावा एक्ट्रेस ‘शादी मुबारक’, ‘मैं लक्ष्मी तेरे अंगने की’ और ‘केसर’ में भी नजर आ चुकी हैं.

पंजाब: मंत्री की बर्खास्तगी, मान का मानक

पंजाब में मुख्यमंत्री भगवंत मान दे अपने ही मंत्री डॉ विजय सिंगला को सिर्फ 1% रिश्वतखोरी मामले में बर्खास्त कर दिया और अब डॉक्टर विजय सिंगला जेल में है. यह मामला संभवतः पंजाब प्रदेश का पहला ऐसा मामला है जिसमें सीधे एक मंत्री की बर्खास्तगी हो गई है और देश भर में चर्चा का विषय बन गया है. लोगों को यह विश्वास नहीं हो रहा है कि कोई मुख्यमंत्री अपने ही केबिनेट मंत्री को भ्रष्टाचार रिश्वत मांगने के जुर्म में बर्खास्त कर देगा वह भी सिर्फ एक ऑडियो क्लिप के आधार पर.

जी हां! मगर ऐसा पंजाब में हो गया है जहां अरविंद केजरीवाल की आप पार्टी की सरकार है और जिसकी प्रमुख स्वयं अरविंद केजरीवाल हैं उन्होंने भी सन 2015 में ऐसे ही एक मामले में बर्खास्तगी की थी और चर्चा का विषय बन गए थे.

दरअसल,स्वास्थ्य मंत्री डॉ विजय सिंगला के भ्रष्टाचार में लिप्त होने की जानकारी स्वयं मुख्यमंत्री भगवंत मान ने वीडियो जारी कर देश को  दी. मुख्यमंत्री ने कहा कि मेरी सरकार घूसखोरी बर्दाश्त नहीं करेगी. चाहे वह कोई भी हो, कितना भी रसूखदार क्यों न हो, उसे ऐसी अनियमितताओं की इजाजत नहीं दी जा सकती. मुख्यमंत्री मान ने स्पष्ट किया कि उन्होंने डॉ. सिंगला को अपनी कैबिनेट से बर्खास्त कर दिया है और पुलिस ने केस दर्ज उन्हें गिरफ्तार कर लिया है.

उन्होंने कहा कि यह मामला सिर्फ उनके ही ध्यान में था और वह इसे आसानी से दबा या टाल सकते थे उन्होंने पंजाब को भ्रष्टाचार मुक्त करने का प्रण लिया है और इस दिशा में यह ऐतिहासिक कदम है. मुख्यमंत्री ने कहा कि लोगों ने उन्हें पारदर्शी और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था के लिए चुना है और हमारा फर्ज बनता है कि हर एक पंजाबी भाई की इच्छाओं पर खरा उतरें.

कथनी और करनी में  अंतर

वस्तुतः सच यह है कि हमारे देश में नेता खादी पहनकर और महात्मा गांधी की ओर देखते हुए सच्चाई ईमानदारी और देश प्रेम की कसमें खाते हैं. मगर भ्रष्टाचार के मामले में नित्य नये रिकॉर्ड बना रहे हैं.

भ्रष्टाचार की इंतिहा हो चुकी है और मंत्री अधिकारी 20 से 30% तक रिश्वतखोरी कर रहे हैं जो कि देश भर में चर्चा का विषय है मगर सैंया भए कोतवाल की तर्ज पर देशभर में भ्रष्टाचार जारी है. इसे रोकने के लिए कोई प्रयास करता हुआ दिखाई नहीं देता, ऐसे में पंजाब में मुख्यमंत्री भगवंत मान द्वारा अपने ही मंत्री पर बर्खास्तगी की तलवार चलाने का यह मामला यह बताता है कि आज देश में ईमानदारी सच्चाई कीआज और भी  ज्यादा दरकार है.

चुनाव और संपूर्ण व्यवस्था भ्रष्टतम हो चुके हैं मंत्री और मुख्यमंत्री करोड़ों अरबों रुपए की काली कमाई कर रहे हैं और उसे चुनाव जीतने और अपनी निजी संपत्ति बनाने में लगे रहते हैं ऐसे में देश का भविष्य क्या होगा यह भविष्य के गर्भ में है .

ऐसे हुआ मंत्री का स्टिंग ऑपरेशन

पंजाब में बर्खास्त किए गए स्वास्थ्य मंत्री विजय सिंगला का ‘स्टिंग आपरेशन’ एक अधीक्षण अभियंता राजिंदर सिंह ने किया जो ‘पंजाब हैल्थ सिस्टम कार्पोरेशन’ में नियुक्ति  हैं. भगवंत मान के भ्रष्टाचार विरोधी संदेश के बाद उन्होंने साहस करके पुलिस में  शिकायत दी , एक महीना पहले वह अपने कार्यालय में थे जब सिंगला के विशेष कार्य अधिकारी प्रदीप कुमार ने उन्हें पंजाब भवन  में बुलाया . वहां मंत्री डा. सिंगला ने सिंह से कहा – कि जो भी ओएसडी कह रहे हैं, उसे ध्यान से सुनो और समझो कि यह सब मंत्री कह रहे हैं. उसके बाद अधीक्षण अभियंता को बताया गया कि उन्होंने कई करोड़ के निर्माण ठेके आबंटित किए हैं. फिर उनसे  साफ साफ कमीशन की मांग की गई.

मंत्री सिंगला पर दर्ज प्राथमिकी रपट के मुताबिक, ‘मैंने उन्हें कहा कि मैं ऐसा कर पाने में असमर्थ हूं, वह मुझे मेरे गृह विभाग में वापिस भेज सकते हैं. उसके बाद 8, 10, 12, 13 और 23 मई को लगातार वे मेरे वाट्सऐप नंबर पर फोन करते रहे. वे रकम मांगते रहे और रकम नहीं देने की सूरत में मेरा करियर बर्बाद कर देने की धमकी देते रहे. मैंने उनसे निवेदन किया मैं 30 नवंबर को रिटायर होने वाला हूं.उसके बाद 20 मई को उन्होंने मुझे कहा कि मैं उन्हें एकमुश्त 10 लाख रुपए दे दूं और उसके बाद मुझे उन लोगों को सभी कामों के बदले एक फीसद कमीशन देना होगा. मैने उन्हें बताया कि मेरे बैंक खाते में केवल 2.5 लाख रुपए पड़े हैं और 3 लाख रुपए और हैं. इस तरह मैं उन्हें 5 लाख रुपए देकर उनसे पिंड छुड़ा लेना चाहता था.फिर 23 मई को मेरे पास प्रदीप कुमार का फोन आया जिसमें उन्होंने मुझे सिविल सचिवालय आने को कहा। मैं वहां गया और उन्हें 5 लाख रुपए की पेशकश की और पूछा कि मैं यह रकम उन्हें कहां दू.’ और सिंह ने मुख्यमंत्री  के भ्रष्टाचार विरोधी संदेश को याद कर कुछ कार्रवाई की अपेक्षा में यह बातचीत रिकार्ड कर ली थी.

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अगर पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान और आप पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल ने यह कदम साफ स्वच्छ मन से राजनीति को स्वच्छ बनाने के लिए उठाया है तो सराहनीय है इसके साथ ही उन्होंने भाजपा और कांग्रेस को एक तरह से चुनौती दे दी है जो भ्रष्टाचार के मामले में आमतौर पर मौन रहते हैं.

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