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Hindi Family Story : आभास – सुधा दीदी को शारदा के कौन से पुराने दिन याद आ रहे थे ?

Hindi Family Story :

लेखक- राज भटनागर ‘देवयानी’

‘‘ओ  ह मम्मी, भावुक मत बनो, समझने की कोशिश करो,’’ दूसरी तरफ की आवाज सुनते ही शारदा के हाथ से टेलीफोन का चोंगा छूट कर अधर में झूल गया. कानों में जैसे पिघलता सीसा पड़ गया. दिल दहला देने वाली एक दारुण चीख दीवारों और खिड़कियों को पार करती हुई पड़ोसियों के घरों से जा टकराई. सब चौंक पड़े और चीख की दिशा की ओर दौड़ पड़े.

‘‘क्या हुआ, बहनजी?’’ किसी पड़ोसी ने पूछा तो शारदा ने कुरसी की ओर इशारा किया.

‘‘अरे…कैसे हुआ यह सब?’’

‘‘कब हुआ?’’ सभी चकित से रह गए.

‘‘अभीअभी आए थे,’’ शारदा ने रोतेरोते कहा, ‘‘अखबार ले कर बैठे थे. मैं चाय का प्याला रख कर गई. थोड़ी देर में चाय का प्याला उठाने आई तो देखा चाय वैसी ही पड़ी है, ‘अखबार हाथ में है. सो रहे हो क्या?’ मैं ने पूछा, पर कोई जवाब नहीं, ‘चाय तो पी लो’, मैं ने फिर कहा मगर बोले ही नहीं. मैं ने कंधा पकड़ कर झिंझोड़ा तो गरदन एक तरफ ढुलक गई. मैं घबरा गई.’’

‘‘डाक्टर को दिखाया?’’

‘‘डाक्टर को ही तो दिखा कर आए थे,’’ शारदा ने रोते हुए बताया, ‘‘1-2 दिन से कह रहे थे कि तबीयत कुछ ठीक नहीं है, कुछ अजीब सा महसूस हो रहा है. डाक्टर के पास गए तो उस ने ईसीजी वगैरह किया और कहा कि सीढि़यां नहीं चढ़ना, आप को हार्ट प्रौब्लम है.

‘‘घर आ कर मुझ से बोले, ‘ये डाक्टर लोग तो ऐसे ही डरा देते हैं, कहता है, हार्ट प्रौब्लम है. सीढि़यां नहीं चढ़ना, भला सीढि़यां चढ़ कर नहीं आऊंगा तो क्या उड़ कर आऊंगा घर. हुआ क्या है मुझे? भलाचंगा तो हूं. लाओ, चाय लाओ. अखबार भी नहीं देखा आज तो.’

‘‘अखबार ले कर बैठे ही थे, बस, मैं चाय का प्याला रख कर गई, इतनी ही देर में सबकुछ खत्म…’’ शारदा बिलख पड़ीं.

‘‘बेटे को फोन किया?’’ पड़ोसी महेशजी ने झूलता हुआ चोंगा क्रेडल पर रखते हुए पूछा.

‘‘हां, किया था.’’

‘‘कब तक पहुंच रहा है?’’

‘‘वह नहीं आ रहा,’’ शारदा फिर बिलख पड़ीं, ‘‘कह रहा था आना बहुत मुश्किल है, यहां इतनी आसानी से छुट्टी नहीं मिलती. दूसरे, उस की पत्नी डैनी वहां अकेली नहीं रह सकती. यहां वह आना नहीं चाहती क्योंकि यहां दंगे बहुत हो रहे हैं. मुसलमान, ईसाई कोई भी सुरक्षित नहीं यहां. कोई मार दे तो मुसीबत. बिजलीघर में कर दो सब, वहां किसी की जरूरत नहीं, सबकुछ अपनेआप ही हो जाएगा.’’

‘‘और कोई रिश्तेदार है यहां?’’

‘‘हां, एक बहन है,’’ शारदा ने बताया.

‘‘अरे, हां, याद आया. परसों ही तो मिल कर आए थे सुहासजी उन से. कह रहे थे कि यहां मेरी दीदी है, उन से ही मिल कर आ रहा हूं. आप उन का पता बता दें तो हम उन्हें खबर कर दें,’’ शर्मा जी ने कहा.

वहां फौरन एक आदमी दौड़ाया गया. सब ने मिल कर सुहास के पार्थिव शरीर को जमीन पर लिटा दिया. आसपास की और महिलाएं भी आ गईं जो शारदा को सांत्वना देने लगीं.

तभी रोतीबिलखती सुधा दीदी आ पहुंचीं.

‘‘हाय रे, भाई रे…क्या हुआ तुझे, परसों ही तो मेरे पास आया था. भलाचंगा था. यह क्या हो गया तुझे एक ही दिन में. जाना तो मुझे था, चला तू गया, मेरे से पहले ही सबकुछ छोड़छाड़ कर…हाय रे, यह क्या हो गया तुझे…’’

बहुत ही मुश्किल से सब ने उन्हें संभाला. उन्होंने अपनी तीनों बहनों, सरोज, ऊषा, मंजूषा व अन्य सब रिश्तेदारों के पते बता दिए. फौरन सब को सूचना दे दी गई. थोड़ी ही देर में सब आ पहुंचे.

काफी देर तक कुहराम मचा रहा, फिर सब शांत हो गए पर शारदा रोए ही जा रही थीं.

सुधा दीदी कितनी ही देर तक शारदा के चेहरे की ओर एकटक देखती रहीं. शारदा के चेहरे पर 22 वर्ष पुराना मां का चेहरा उभर आया, जब बाबूजी गुजरे थे और उन्होंने बंगलौर फोन किया था, ‘बाबूजी नहीें रहे, फौरन आ जाओ.’

‘पर ये तो दौरे पर गए हुए हैं, कैसे आ सकते हैं एकदम सब?’ शारदा ने बेरुखी से कहा था.

‘तुम उस के दफ्तर फोन करो, वह बुला देंगे.’

‘किया था पर उन्हें कुछ मालूम नहीं कि वह कहां हैं.’

‘ऐसा कैसे है, दफ्तर वालों को तो सब पता रहता है कि कौन कहां है.’

‘वहां रहता होगा पता, यहां नहीं,’ शारदा ने तीखे स्वर में कहा था.

‘मुझे दफ्तर का फोन नंबर दो, मैं वहां कांटेक्ट कर लूंगी.’

‘मेरे पास नहीं है नंबर…’ कह कर शारदा ने रिसीवर पटक दिया था.

ऐसे समय में भी शारदा ऐसा व्यवहार करेगी, कोई सपने में भी नहीं सोच सकता था. आखिरकार चाचाजी ने ही सब क्रियाकर्म किए. इस ने जैसा किया वैसा ही अब इस के आगे आया.

यह तो शुरू से ही परिवार से कटीकटी रही थी. हम 4 बहनें थीं, भाई एक ही था, बस. कितना चाव था इस का सब को कि बहू आएगी घर में, रौनक होगी. सब के साथ मिलजुल कर बैठेगी.

अम्मां तो इसे जमीन पर पैर ही ना रखने दें, हर समय ऊषा, मंजूषा से कहती रहतीं, ‘जा, अपनी भाभी के लिए हलवा बना कर ले जा…हलवाई के यहां से गरमगरम पूरियां ले आओ नाश्ते के लिए… भाभी से पूछ ले, ठंडा लेगी या गरम…भाभी के नहाने की तैयारी कर दे… गुसलखाना अच्छी तरह साफ कर देना…’

शाम को कभी गरमगरम इमरती मंगातीं तो कभी समोसे मंगातीं, ‘जा अपनी भाभी के लिए ले जा,’ पर भाभी की तो भौं तनी ही रहतीं हरदम.

एक दिन बिफर ही पड़ीं दोनों, ‘हम नहीं जाएंगी भाभी के पास. झिड़क पड़ती हैं, कहती हैं ‘कुछ नहीं चाहिए मुझे, ले जाओ यह सब…’

सरोज ने मां से 1-2 बार कहा भी, ‘क्या जरूरत है इतना सिर चढ़ाने की, रहने दो स्वाभाविक तरीके से. अपनेआप खाएपीएगी जब भूख लगेगी, तुम क्यों चिंता करती हो बेकार…’

‘अरे, कौन सी 5-7 बहुएं आएंगी. एक ही तो है, उसी पर अपना लाड़चाव पूरा कर लूं.’

पर इस ने तो उन के लाड़चाव की कभी कद्र ही न जानी, न ही ननदें कभी सुहाईं. आते ही यह तो अलग रहना चाहती थी. इत्तिफाकन सुहास की बदली हो गई और बंगलौर चली गई, सब से दूर…

ऊषा, मंजूषा की शादियों में आई थी बिलकुल मेहमान की तरह.

न किसी से बोलनाचालना, न किसी कामधंधे से ही मतलब. कमरे में ही बैठी रही थी अलगथलग सब से, गुमसुम बिलकुल…और अभी भी ऐसी बैठी है जैसे पहचानती ही न हो. चलो, नहीं तो न सही, हमें क्या, हम तो अपने भाई की आखिरी सूरत देखने आए थे…देख ली…अब हम काहे को आएंगे यहां…

‘‘राम नाम सत्य है…राम नाम सत्य है…’’ की आवाज से दीदी की तंद्रा टूटी. अर्थी उठ गई. हाहाकार मच गया. सब अरथी के पीछेपीछे चल पड़े. आज मां के घर का यह संपर्क भी खत्म हो गया.

औरत कितनी भी बड़ी उम्र की हो जाए, मां के घर का मोह कभी नहीं टूटता, नियति ने आज वह भी तुड़वा दिया. कैसा इंतजार रहता था राखीटीके का, सुबह ही आ जाता था और सारा दिन हंसाहंसा कर पेट दुखा देता था. ये तीनों भी यहां आ जाती थीं मेरे पास ही.

अरथी के पीछेपीछे चलते हुए वह फिर फूट पड़ीं, ‘‘अब कहां आनाजाना होगा यहां…जिस के लिए आते थे, वही नहीं रहा…अब रखा ही क्या है यहां…’’

अचानक उन की नजर शारदा पर पड़ी, जो अरथी के पीछेपीछे जा रही थी. उस के चेहरे पर मेकअप की जगह अवसाद छाया हुआ था, आंखों का आईलाइनर आंसुओं से धुल चुका था. होंठों पर लिपस्टिक की जगह पपड़ी जमी थी. ‘सैट’ किए बाल बुरी तरह बिखर कर रह गए थे, मुड़ीतुड़ी सफेद साड़ी, बिना बिंदी के सूना माथा, सूनी मांग…रूखे केश और उजड़े वेश में उस का इस तरह वैधव्य रूप देख कर दीदी का दिल बुरी तरह दहल उठा. रंगत ही बदल गई इस की तो जरा सी देर में. कैसी सजीसजाई दुलहन के वेश में आई थी 35 साल पहले, कितना सजाती थी खुद को और आज…आज सुहास के बिना कैसी हो गई. आज रहा ही कौन इस का दुनिया में.

मांबाप तो बाबूजी से पहले चल बसे थे, एक बहन थी वह शादी के दोढाई साल बाद अपने साल भर के बेटे को ले कर ऐसी बाजार गई, सो आज तक नहीं लौटी. एक भाई है, वह किसी माफिया गिरोह से जुड़ा है. कभी जेल में, कभी बाहर. एक ही एक बेटा है, वह भी इस दुख की घड़ी में मुंह फेर कर बैठ गया. उन्हें उस पर बहुत तरस आया, ‘बेचारी, कैसी खड़ी की खड़ी रह गई.’

अरथी को गाड़ी में रख दिया गया. गाड़ी धीरेधीरे चलने लगी और कुछ ही देर में आंखों से ओझल हो गई.

गाड़ी के जाने के बाद शारदा का मन बेहद अवसादग्रस्त हो गया.

जब हम दुख में होते हैं तो अपनों का सान्निध्य सब से अधिक चाहते हैं, पर ऐसे दुखद समय में भी अपनों का सान्निध्य न मिले तो मन बुरी तरह टूट जाता है. अकेलापन, बेबसी बुरी तरह मन को सालने लगती है.

यही हाल उस समय शारदा का हो रहा था. बारबार उसे अपने बेटे की याद आ रही थी कि काश, इस घड़ी में वह उस के पास होता. उसे गले लगा कर रो लेती. कुछ शांति मिलती, कितनी अकेली है आज वह, न मांबाप, न भाईर्बहन. कोई भी तो नहीं आज उस का जो आ कर उस के दुख में खड़ा हो. नीचे धरती, ऊपर आसमान, कोई सहारा देने वाला नहीं.

बेटे के शब्द बारबार कानों से टकरा कर उस के दिल को बुरी तरह कचोट रहे थे, जिसे जिंदगी भर अपने से ज्यादा चाहा, जिस के कारण उम्र भर किसी की परवा नहीं की, उसी ने आज ऐसे दुर्दिनों में किनारा कर लिया, मां के लिए जरा सा भी दर्द नहीं. बाप के जाने का जरा भी गम नहीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो.

कैसी पत्थर दिल औलाद है. जब अपनी पेटजाई औलाद ही अपनी न बनी तो और कौन बनेगा अपना. सासननदें तो भला कब हुईं किसी की, वे तो उम्र भर उस के और सुहास के बीच दीवार ही बनी रहीं. सुहास तो सदा अपनी मांबहनों में ही रमा रहा. उस की तो कभी परवा ही नहीं की. इस कारण सदैव सुहास और उस के बीच दूरी ही बनी रही.

अब भी तो देखो, एक शब्द भी नहीं कहा किसी ने…सुहास के सामने ही कभी अपनी न बनी, तो अब क्या होगी भला. कैसे रहेगी वह अकेली जीवन भर?  न जाने कितनी पहाड़ सी उम्र पड़ी है, कैसे कटेगी? किस के सहारे कटेगी? उसे अपने पर काबू नहीं हो पा रहा था.

दूसरी ओर बेटे की बेरुखी साल रही थी. उसे लगा जैसे वह एक गहरे मझधार में फंसी बारबार डूबउतरा रही है. कोई उसे सहारा देने वाला नहीं कि किनारे आ जाए. क्या करे, कैसे करे?

उस ने तो कभी सोचा भी न था कि ऐसा बुरा समय भी देखना पड़ेगा. वह वहीें सीढि़यों की दीवार का सहारा ले कर बिलख पड़ी जोरजोर से.

सामने से उसे सुधा दीदी, सरोज, ऊषा, मंजूषा आती दिखाई दीं. उन्होंने उसे चारों ओर से घेर लिया और सांत्वना देने लगीं, ‘‘चुप कर शारदा, बहुत रो चुकी. वह तो सारी उम्र का रोना दे गया. कब तक रोएगी…’’ कहतेकहते सुधा दीदी स्वयं रो पड़ीं और तीनों बहनें भी शारदा के गले लग फफक पड़ीं, सब का दुख समान था. अत: जीवन भर का सारा वैमनस्य पल भर में ही आंसुओं में धुल गया.

‘‘हाय, क्या हाल हो गया भाभी का,’’ ऊषा, मंजूषा ने उस के गले लगते हुए कहा.

‘‘मैं क्या करूं, दीदी? कैसे करूं? कहां जाऊं?’’ शारदा ने बिलखते हुए कहा.

‘‘तू धीरज रख, शारदा, जाने वाला तो चला गया, अब लौट कर तो आएगा नहीं,’’ सुधा दीदी ने उसे प्यार से सीने से लगाते हुए कहा.

‘‘पर मैं अकेली कैसे रहूंगी, सारी उम्र पड़ी है. वह तो मुझे धोखा दे गए बीच में ही.’’

‘‘कौन कहता है तू अकेली है, वह नहीं रहा तो क्या, हम 4 तो हैं तेरे साथ. तुझे ऐसे अकेले थोड़े ही छोडे़ंगे. चलो, घर में चलो.’’

वे चारों शारदा को घर में ले आईं, ऊषा, मंजूषा ने सारा घर धो डाला. सरोज ने उस के नहाने की तैयारी कर दी. तब तक सुधा दीदी उस के पास बैठी उस के आंसू पोंछती रहीं.

थोड़ी ही देर में सब नहा लिए, ऊषा, मंजूषा चाय बना लाईं. नहा कर, चाय पी कर शारदा का मन कुछ शांत हुआ. उस वक्त शारदा को वे चारों अपने किसी घनिष्ठ से कम नहीं लग रही थीं, जिन्होंने उसे ऐसे दुख में संभाला.

उसे लगा, जिन्हें उस ने सदा अपने और सुहास के बीच दीवार समझा, असल में वह दीवार नहीं थी, वह तो उस के मन का वहम था. उस के मन के शीशे पर जमी ईर्ष्या की गर्द थी. आज वह वहम की दीवार गहन दुख ने तोड़ दी. मन के शीशे पर जमी ईर्ष्या की गर्द आंसुओं में धुल गई.

बेटा नहीं आया तो क्या, उस की 4-4 ननदें तो हैं, उस के दुख को बांटने वाली. वे चारों उसे अपनी सगी बहन से भी ज्यादा लग रही थीं, आज दुख की घड़ी में वे ही चारों अपनी लग रही थीं. आज पहली बार उस के मन में उन चारों ननदों के प्रति अपनत्व का आभास हुआ. Hindi Family Story.

Family Story In Hindi : विरासत – पाकिस्तान से दादी को किसने फोन किया?

Family Story In Hindi : ‘‘दादाजी, आप का पाकिस्तान से फोन है,’’ आश्चर्य भरे स्वर में आकर्षण ने अपने दादा नंद शर्मा से कहा.

‘‘पाकिस्तान से, पर अब तो हमारा वहां कोई नहीं है. फिर अचानक…फोन,’’ नंद शर्मा ने तुरंत फोन पकड़ा.

दूसरी ओर से आवाज आई, ‘‘अस्सलामअलैकुम, मैं पाकिस्तान, जडांवाला से जहीर अहमद बोल रहा हूं. मैं ने आप का साक्षात्कार यहां के अखबार में पढ़ा था. मुझे यह जान कर बहुत खुशी हुई कि मेरे शहर जड़ांवाला के रहने वाले एक नागरिक ने हिंदुस्तान में खूब तरक्की पाई है. मैं ने यह भी पढ़ा है कि आप के मन में अपनी जन्मभूमि को देखने की बड़ी तमन्ना है. मैं आप के लिए कुछ उपहार भेज रहा हूं जो चंद दिनों में आप को मिल जाएगा, शेष बातें मैं ने पत्र में लिख दी हैं जो मेरे उपहार के साथ आप को मिल जाएगा.’’

फोन पर जहीर की बातें सुन कर नंद शर्मा भावुक हो उठे. फिर बोले, ‘‘भाई, आज बरसों बाद मैं ने अपने जन्मस्थान से किसी की आवाज सुनी है. आज आप से बात कर के 55 साल पहले का बीता समय आंखों के आगे घूम रहा है. मैं क्या कहूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है. बस, आप की समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूं.’’

इतना कहतेकहते नंद शर्मा की आंखें डबडबा गईं. वह आगे कुछ न कह सके और फोन रख दिया.

14 साल का आकर्षण अपने दादाजी के पास ही खड़ा था. उस ने दादाजी को इतना भावुक होते कभी नहीं देखा था.

आकर्षण कुछ देर वहां बैठा और उन के सामान्य होने का इंतजार करता रहा. फिर बोला, ‘‘दादाजी, आप को अपने पुराने घर की याद आ रही है?’’

‘‘हां बेटा, बंटवारे के समय मैं 17 साल का था. आज भी मुझे वह दिन याद है जब जड़ांवाला में कत्लेआम शुरू हुआ और दंगाइयों ने चुनचुन कर हिंदुओं को गाजरमूली की तरह काटा था. हमारे पड़ोसी मुसलमान परिवार ने हमें शरण दी और फिर मौका पा कर एकएक कर के मेरे परिवार के लोगों को सेना के पास पहुंचा दिया था. मेरे परिवार में केवल मैं ही पाकिस्तान में बचा था. मैं भी मौका देख कर निकलने की ताक में था कि किसी ने दंगाइयों को खबर कर दी कि नंद शर्मा को उस के पड़ोसियों ने पनाह दे रखी है.

‘‘खबर पा कर दंगाई पागलों की तरह उस घर की ओर झपटे. इस से पहले कि वे मेरी ओर पहुंच पाते मुझे छत के रास्ते से उन्होंने भगा दिया.

‘‘मैं एक छत से दूसरी छत को फांदता हुआ जैसे ही सड़क पर पहुंचा कि तभी सेना का ट्रक आ गया और सेना को देख कर दंगाई भाग खड़े हुए. फिर उसी ट्रक से सेना ने मुझे अमृतसर के लिए रवाना कर दिया.

‘‘उस वक्त तक मैं यही समझता था कि यह अशांति कुछ समय की है… धीरधीरे सब ठीक हो जाएगा, मैं फिर अपने परिवार के साथ वापस जड़ांवाला जा पाऊंगा पर यह मेरा भ्रम था. पिछले 55 सालों में कभी ऐसा मौका नहीं आया. मेरा शहर, मेरी जन्मभूमि, मेरी विरासत हमेशा के लिए मुझ से छीन ली गई.’’

इतना कह कर नंद शर्मा खामोश हो गए. आकर्षण का मन अभी और भी बहुत कुछ जानने को इच्छुक था पर उस समय दादा को परेशान करना उचित नहीं समझा.

नंद शर्मा हरियाणा के अंबाला शहर में एक प्रतिष्ठित पत्रकार थे. उन की गिनती वहां के वरिष्ठ पत्रकारों में होती थी. कुछ समय पहले हरियाणा के मुख्यमंत्री ने एक पत्रकार सम्मेलन में उन्हें सम्मानित किया था. उस सम्मेलन में पाकिस्तान से भी पत्रकारों का प्रतिनिधिमंडल आया हुआ था. उस समारोह में नंद शर्मा ने इस बात का जिक्र किया था कि वह विभाजन के बाद जड़ांवाला से भारत कैसे आए थे और साथ ही वहां से जुड़ी यादों को भी ताजा किया.

समारोह समाप्त होने के बाद एक पाकिस्तानी पत्रकार ने उन का साक्षात्कार लिया और पाकिस्तान आ कर अपने अखबार में उसे छाप भी दिया. वह साक्षात्कार जड़ांवाला के वकील जहीर अहमद ने पढ़ा तो उन्हें यह जान कर बहुत दुख हुआ कि कोई व्यक्ति इस कदर अपनी जन्मभूमि को देखने के लिए तड़प रहा है.

जहीर एक नेकदिल इनसान था. उस ने नंद शर्मा के लिए फौरन कुछ करने का फैसला लिया और समाचारपत्र में प्रकाशित नंबर पर उन से संपर्क किया.

नंद शर्मा एक भरेपूरे परिवार के मुखिया थे. उन के 4 बेटे और 1 बेटी थी. सभी विवाहित और बालबच्चों वाले थे. आज के इस भौतिकवादी युग में भी सभी मिलजुल कर एक ही छत के नीचे रहते थे.

आकर्षण ने जब सब को पाकिस्तान से आए फोन के  बारे में बताया तो सब विस्मित रह गए. फिर नंद शर्मा के बड़े बेटे मोहन शर्मा ने पिता के पास जा कर कहा, ‘‘बाबूजी, यदि आप कहें तो हम सब जड़ांवाला जा सकते हैं और अब तो बस सेवा भी शुरू हो चुकी है. इसी बहाने हम भी अपने पुरखों की जमीन को देख आएंगे.’’

‘‘मन तो मेरा भी करता है कि एक बार जड़ांवाला देख आऊं पर देखो कब जाना होता है,’’ इतना कह कर नंद शर्मा खामोश हो गए.

एक दिन नंद शर्मा के नाम एक पार्सल आया. वह पार्सल देखते ही आकर्षण जोर से चिल्लाया, ‘‘दादाजी, आप के लिए पाकिस्तान से पार्सल आया है,’’ और इसी के साथ परिवार के सारे सदस्य उसे देखने के लिए जमा हो गए.

नंद शर्मा आंगन में कुरसी डाल कर बैठ गए. आकर्षण ने उस पैकेट को खोला. उस में 100 से भी अधिक तसवीरें थीं. हर तसवीर के पीछे उर्दू में उस का पूरा विवरण लिखा हुआ था.

नंद शर्मा के चेहरे पर उमड़ते खुशी के भावों को आसानी से पढ़ा जा सकता था. उन्होंने ही नहीं, उन का पूरा परिवार उन तसवीरों को देख कर भावविभोर हो उठा.

एक तसवीर उठाते हुए नंद शर्मा ने कहा, ‘‘यह देखो, हमारा घर, हमारी पुश्तैनी हवेली और यहां अब बैंक आफ पाकिस्तान बन गया है.’’

नंद शर्मा के पोतेपोतियां बहुत हैरान हो उन तसवीरों को देख रहे थे. उन के छोटे पोते मानू और शानू बोले, ‘‘दादाजी, क्या इन में आप का स्कूल भी है?’’

‘‘हां बेटा, अभी दिखाता हूं,’’ कह कर उन्होंने तसवीरों को उलटापलटा तो उन्हें स्कूल की तसवीर नजर आई. अपने स्कूल की तसवीर देख कर उन का चेहरा खिल उठा और वह खुशी से चिल्ला उठे, ‘‘यह देखो बच्चों, मेरा स्कूल और यह रही मेरी कक्षा. यहां मैं टाट पर बैठ कर बच्चों के साथ पढ़ता था.’’

धीरेधीरे जड़ांवाला के बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, खेल के मैदान, सिनेमाघर, वहां की गलियां, पड़ोसियों के घर, गोलगप्पे, चाट वालों की दुकान और वहां की छोटी से छोटी जानकारी भी तसवीरों के माध्यम से सामने आने लगी. अंत में एक छोटी सी कपड़े की थैली को खोला गया. उस में कुछ मिट्टी थी और साथ में एक छोटा सा पत्र था. पत्र जहीर अहमद का था जिस में उस ने लिखा था :

‘नमस्ते, आज यह तसवीरें आप के पास पहुंचाते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही है. आप भी सोचते होंगे कि मुझे क्या जरूरत पड़ी थी यह सब करने की. भाईजान, मेरे वालिद बंटवारे से पहले पंजाब के बटाला शहर में रहते थे. अपने जीतेजी वह कभी अपने शहर वापस न आ सके. उन के मन में यह आरजू ही रह गई कि वह अपनी जन्मभूमि को एक बार देख सकें. इसलिए जब मैं ने आप के बारे में पढ़ा तो फैसला किया कि आप की खुशी के लिए जो बन पड़ेगा, जरूर करूंगा.

‘भाईजान, इस पोटली में आप के पुश्तैनी मकान की मिट्टी है जो मेरे खयाल से आप के लिए बहुत कीमती होगी. इस के साथ ही मैं अपने परिवार की ओर से भी आप को पाकिस्तान आने की दावत देता हूं. आप जब चाहें यहां तशरीफ ला सकते हैं. आप अपने बच्चों, पोतेपोतियों के साथ यहां आएं. हम आप की खातिरदारी में कोई कमी नहीं रखेंगे.

‘आप का, जहीर अहमद.’

पत्र पढ़तेपढ़ते नंद शर्मा भावुक हो उठे. उन्होंने फौरन घर की पुश्तैनी मिट्टी को अपने माथे से लगाया और अपने पोते आकर्षण को बुला कर उस मिट्टी से सब के माथे पर तिलक करने को कहा.

‘‘दादाजी, पाकिस्तानी तो बहुत अच्छे हैं,’’ आकर्षण बोला, ‘‘फिर क्यों हम उस देश को नफरत की दृष्टि से देखते हैं. आज जहीर अहमद के कारण ही घरबैठे आप को अपनी विरासत के दर्शन हुए हैं.’’

‘‘ठीक कहते हो बेटा,’’ नंद शर्मा बोले, ‘‘घृणा और नफरत की दीवार तो चंद नेताओं और संकीर्ण विचारधारा वाले तथाकथित लोगों ने बनाई है. आम हिंदुस्तानी और पाकिस्तानी के दिलों में कोई मैल नहीं है. आज अगर मैं तुम्हारे सामने जिंदा हूं तो अपने उस मुसलिम पड़ोसी परिवार के कारण जिन्होंने समय रहते मुझे व मेरे परिवार को वहां से बाहर निकाला.’’

नंद शर्मा अगले कुछ दिनों तक घर आनेजाने वालों को जड़ांवाला की तसवीरें दिखाते रहे. एक दिन शाम को जब वह पत्रकार सम्मेलन से वापस आए तो ‘हैप्पी बर्थ डे टू दादाजी’ की ध्वनि से वातावरण गूंज उठा. उस दिन उन के जन्मदिन पर बच्चों ने उन्हें पार्टी देने का मन बनाया था.

नंद शर्मा को उन के पोतेपोतियों ने घेर लिया और फिर उन्हें उस कमरे की ओर ले गए जहां केक रखा था. वहां जा कर उन्होंने केक काटा और फिर सब ने खूब मस्ती की. फोटोग्राफर को बुलवा कर तसवीरें भी खिंचवाई गईं. बाद में उन में से एक तसवीर जो पूरे परिवार के साथ थी, वह जड़ांवाला भेज दी गई.

वक्त गुजरता रहा. धीरधीरे पत्राचार और फोन के माध्यम से दोनों परिवारों की नजदीकियां बढ़ने लगीं. देखते ही देखते 1 साल बीत गया. एक दिन जहीर अहमद का फोन आया, ‘‘भाईजान, ठीक 1 माह बाद मेरे बड़े बेटे की शादी है. आप सपरिवार आमंत्रित हैं. और हां, कोई बहाना बनाने की जरूरत नहीं है. मैं ने सारा इंतजाम कर दिया है. आप के पुरखों की विरासत आप का इंतजार कर रही है.’’

नंद शर्मा तो मानो इसी पल का इंतजार कर रहे थे. उन्होंने तुरंत कहा, ‘‘ऐसा कभी हो सकता है कि मेरे भतीजे की शादी हो और मैं न आऊं. आप इंतजार कीजिए, मैं सपरिवार आ रहा हूं.’’

रात के खाने पर जब सारा परिवार जमा हुआ तो नंद शर्मा ने रहस्योद्घाटन किया, ‘‘ध्यान से सुनो, हम सब लोग अगले माह जड़ांवाला जहीर के बेटे की शादी में जा रहे हैं. अपनीअपनी तैयारियां कर लो.’’

‘‘हुर्रे,’’ सब बच्चे खुशी से नाच उठे.

‘‘सच है, अपनी जमीन, अपनी मिट्टी और अपनी विरासत, इन की खुशबू ही कुछ और है,’’ कह कर नंद शर्मा आंखें बंद कर मानो किसी अलौकिक सुख में खो गए. Family Story In Hindi.

Family Story In Hindi : दोस्ती – एक आधार : अलका की दोस्ती प्यार में कैसे बदली?

Family Story In Hindi :

लेखक : नवीन कुमार लारोयिआ

घर में हर तरफ चहलपहल थी. सब लोग तैयार हो रहे थे मेरी शादी जो थी. पिताजी ने जिस लड़के को मेरे लिए चुना था, मैं ने चुपचाप उस से शादी करने के लिए हां कर दी थी. मेरे पास और विकल्प नहीं था. पिताजी ने काफी साल पहले यह स्पष्ट कर दिया था की वे मुझे केवल इसलिए पढ़ा रहे थे ताकि मुझे अच्छा वर मिल सके. लड़कियों के नौकरी करने के वे सख्त खिलाफ थे. मेरे लिए परिवार भी उन्होंने ऐसा ढूंढा था जिसे घरगृहस्थी संभालने वाली बहू चाहिए थी, ज़्यादा पढ़ीलिखी लड़की में उस परिवार वालों की कोई दिलचस्पी नहीं थी.

जब भावी ससुराल वाले मुझे देखने आए तो मैं ने अपने होने वाले पति को देखा था. मुझे उन का व्यक्तित्व साधरण सा लगा. कुछ ज्यादा बात नहीं हुई. एक सरकारी कंपनी में इंजीनियर थे. उम्र 25 साल थी. 3 वर्षों से कार्यरत थे वहां. उन की पोस्टिंग एक छोटे से शहर के पास बसी उन की कंपनी की एक कालोनी में थी. अच्छा वेतन था और एक छोटा सा फ्लैट उन्हें अलौट हो चुका था. इसलिए उन के मातापिता चाहते थे कि अब उन की शादी हो जाए और उन का घर बस जाए. एक स्त्री के रूप में घर बसाने का दायित्व अब मुझे निभाना था और उस के लिए उन लोगों ने मुझे उपयुक्त पाया. लड़के के बारे में मुझ से कोई राय नहीं मांगी गई. घर वालों ने देख लिया था, बस, इतना काफी था.

ऐसा नहीं था कि मेरे पिताजी मुझे पढ़ा नहीं सकते थे. वे काफी समृद्ध थे और अगर चाहते तो मैं आगे पढ़ सकती थी. मेरी इच्छा थी कि मैं ग्रेजुएट होने के बाद मास्टर्स करूं और फिर पीएचडी कर के किसी अच्छी यूनिवर्सिटी या कालेज में प्रोफैसर बनूं. पिताजी ने जो एक अच्छा काम किया था वह था मुझे कौन्वेंट स्कूल में पढ़ाना. बचपन से ही मुझे इंग्लिश बहुत पसंद थी और में इंग्लिश लिटरेचर में ही में मास्टर्स और पीएचडी करना चाहती थी पर अब वे सारे सपने गृहस्थी के बोझ तले दबने वाले थे.

पार्लर से आई 2 लड़कियां मुझे तैयार कर रही थीं. मैं चुपचाप उन के सामने बैठी श्रृंगार करवा रही थी. अगर वे मुझ से कुछ पूछती भी थीं तो मेरा यही जवाब होता था, ‘ठीक है.’ और कहती भी क्या. तैयार तो मैं होने वाले पति और ससुराल के लिए हो रही थी, अपने लिए नहीं. पार्लर का चुनाव मेरी सास ने किया था. शादी के कपड़े भी उन्होंने भिजवाए थे और पार्लर वालों को निर्देश भी उन्होंने ही दिया था. लड़कियां भी खुश थीं कि ज़्यादा नानुकुर करने वाली दुलहन नहीं मिली.

तभी कमरे का दरवाज़ा खुला और मेरी सहेली अलका अंदर आई. अलका का विवाह 2 महीने

पहले ही हुआ था और वह मेरी शादी में शामिल होने आई थी. उस के पति एक व्यापारी परिवार से थे और वे लोग पास के शहर में ही रहते थे.

‘कैसी हो, मेरी लाडो प्रेमिला?’ उस ने पूछा, ‘तो तुम्हारा नंबर भी लग ही गया?’

‘मैं ठीक हूं. जीजाजी नहीं आए?’ मैं ने पूछा.

‘आ जाएंगे. उन्हें छोड़ो और अपने बारे में बताओ. ठीक हो तुम?’ यह कह कर उस ने मेरी ओर देखा, ‘आज तुम्हारा दिन है, उन का नहीं.’

उस का इस तरह से उत्तर देना मुझे थोड़ा अजीब लगा. मेरे विपरीत वह तो शादी के लिए बहुत

उत्सुक थी. पढ़नेलिखने में उस की रुचि साधारण थी. जब उस की शादी पक्की हो गई तो उस के पांव धरती पर नहीं पड़ते थे. अब ऐसी बेरुखी क्यों? शादी को तो अभी सिर्फ 2 ही महीने हुए थे. मैं कुछ कहने ही जा रही थी कि मेरी नज़र उस की बांहों पर पड़ी. मुझे लगा वहां पर चोट के दाग थे.

‘यह क्या है?’ मैं ने उस की बांहों की तरफ इशारा करते हुए पूछा.

‘कुछ नहीं,’ उस ने जल्दी से कहा और मुंह दूसरी तरफ फेर लिया. मुझे लगा उस की आंखें गीली हो गईं हैं.

मैं ने पार्लर वाली लड़कियों को दो मिनट के लिए बाहर जाने को बोला और अलका को अपनी

तरफ खींचा.

‘बता न, क्या हुआ है, उदास क्यों लग रही है?’ मैं ने थोड़ा ज़ोर से पूछा.

‘और क्या होना है, बस, शादी हुई है,’ यह कहते हुए वह फफक पड़ी.

फिर उस ने बताया कि कैसे उस के पति को उस में नहीं, बस, उस के साथ संबंध बनाने में ही दिलचस्पी है. शादी की पहली रात वह रजस्वला थी पर उस के पति ने फिर भी जबरदस्ती संबंध बनाए. अब भी अगर वह उस की इच्छा पूरी न करे तो वह हाथ उठाने में भी नहीं चूकता. अमीर आदमी है, धमकी देता है कि वह किसी के भी साथ संबंध बना सकता है. शादी तो उस ने परिवार को एक बहू देने के लिए और अपनी मौजमस्ती के लिए की है. एक इंसान के रूप में उसे अपनी पत्नी में कोई दिलचस्पी नहीं है.

अलका की बातें सुन कर मेरा दिल कांप गया. क्या मेरी भी यही नियति होने वाली है? क्या मैं भी एक भोग की वस्तु बन कर रह जाऊंगी?

शादी विधिवत संपन्न हो गई.

सारा समय मेरा ध्यान अलका की बातों में ही अटका रहा. यंत्रवत मैं सारी रस्में करती गई. एकदो बार मैं ने अपने पति की तरफ देखा और अंदाजा लगाने की कोशिश करने लगी कि क्या इस साधारण से दिखने वाले व्यक्ति को मुझ में एक इंसान नज़र आएगा या उस का उद्देश्य केवल मेरा शरीर पाना ही है. पर वह एकदम तटस्थ से बैठे रहे. रस्मों के बाद फोटो खिंचवाने वालों का तांता लग गया और फिर विदाई की बेला आ गई. मुझे बिलकुल रोना नहीं आया. पिता के लिए तो मैं एक बोझ थी जो आज उतर गया था.

दोतीन आंसू छलका के मैं अपने ससुराल पहुंच गई. अब आगे की जिंदगी के लिए मुझे तैयार होना था.

मेरे ससुराल वाले ठीकठाक लोग थे. अच्छा, बड़ा घर था उन का. वहां पर भी कुछ रस्में हुईं और

फिर मेरी ननद मुझे मेरे कमरे में ले गई.

‘लो भाभी, अब आराम करो. भैया अभी आते होंगे,’ यह कह कर वह हंसती हुई चली गई.

कमरा अच्छा था और फूलों से सजाया हुआ था. फर्नीचर पुराना था पर उस पर अच्छे रखरखाव

की झलक दिख रही थी. खैर, अब तो पिताजी का दिया हुआ फर्नीचर आने वाला था. यह सब सोचते हुए मैं दर्पण के सामने जा कर खड़ी हो गई. अपने वजूद को दुलहन के लिबास में निहारा. फिर अपने गहने उतारने लगी. गहनों के भारीपन से सिर दुखने लगा था. इतने में दरवाज़ा खुला और मेरे पति अंदर आ गए.

‘आप ठीक हैं? खुश तो हैं?’ उन्होंने पूछा.

मैं चुप रही पर ‘आप’ शब्द सुन कर थोड़ा अच्छा लगा. पर तभी, अलका का सारा वृत्तांत आंखों के सामने आ गया. अब जबरदस्ती का रिश्ता शुरू होगा क्या?

शादी इतनी जल्दी हो गई कि हमें एकदूसरे को जानने का मौका ही नहीं मिला. वे फिर

बोले, ‘पतिपत्नी तो हम बन गए पर मैं चाहता हूं कि अपने रिश्ते को आगे ले जाने से पहले हम दोस्त बनें. आप क्या सोचती हैं?’

मैं ने सिर उठा कर उन को देखा. उन का चेहरा अब कुछ अलग दिख रहा था. सारी उम्र मेरे पिता ने कभी मेरी मरजी नहीं पूछी और अब यह आदमी मेरी मरजी पूछ रहा है, वह भी उस घडी में जब मर्दों को अपनी मनमरजी करने की जल्दी होती है.

‘जैसा आप कहें,’ मैं ने किसी तरह अपना मुंह खोला.

 

‘नहींनहीं. अब हम पतिपत्नी हैं. एकदूसरे पर अधिकार ज़माने के लिए अपनी मनमरजी नहीं कर

सकते. आगे जो भी होगा, दोनों की रज़ामंदी से होगा,’ वे फिर बोले, ‘दोस्ती हमारे रिश्ते का आधार होगी – जबरदस्ती नहीं.’

‘वह मेरी सहेली, अलका. उस ने कहा था…’ और मैं ने अलका का सारा किस्सा उन्हें सुना दिया. वे चुपचाप सुनते रहे.

फिर वे मेरी तरफ आए और मेरा हाथ पकड़ कर बोले, ‘मैं कोई बलात्कारी नहीं हूं. आप का पति

हूं, ऐसा कुछ नहीं करूंगा जिस से आप को तकलीफ पहुंचे. पहले हम डेटिंग करेंगे, घूमेंगेफिरेंगे, सचमुच में प्यार करेंगे और फिर उस प्यार को उस की पराकाष्ठा तक ले कर जाएंगे. यह मेरा आप से वादा है.’

जिसे मैं ने साधारण समझा था, वह तो असाधारण निकला. उस रात हम एक ही पलंग पर सोए. पर बीच में उन्होंने खुद ही तकियों की एक दीवार बना ली.

‘आप सो जाइए, मैं भी सोना चाहता हूं. बाकी बातें कल करेंगे.’

उन की इस बात से मेरे अंदर चल रही खलबली शांत हो गई.

अगले दिन मेरी ननद ने शरारती अंदाज़ में पूछा, ‘रात कैसे गुज़री, भाभी?’

‘दोस्ती में,’ मैं ने कहा. वह शायद समझी नहीं.

उन्होंने अपना वादा निभाया. ससुराल में एकदो दिन रुक कर हम उन के क्वार्टर पर उन की

पोस्टिंग वाली जगह पर चले गए. प्यार होने में अधिक समय नहीं लगा. हमारी शादी को आज 5 वर्ष हो गए हैं. हम 2 वर्ष के एक बेटे के मांबाप भी बन गए हैं. पर हमारी दोस्ती आज भी कायम है. कोई जबरदस्ती नहीं है. और हां, मेरे ‘दोस्त’ ने मेरी इच्छा पूरी की है. मैं ने अपना मास्टर्स पूरा कर लिया है और अब इन की कालोनी के स्कूल में मैं ने इंग्लिश पढ़ाना शुरू कर दिया है. Family Story In Hindi.

Family Story In Hindi: उम्मीदें- तसलीमा ने थामा उम्मीद का दामन

Family Story In Hindi:

लेखक: शुक्ला चौधरी

अपने अम्मीअब्बू का इकलौता सहारा तसलीमा अपनी ससुराल पाकिस्तान वापस जा रही थी लेकिन अपनों से बिछुड़ने का दुख था कि उस से बरदाश्त ही नहीं हो रहा था.

भारत से पाकिस्तान जाने वाली अंतिम समझौता एक्सप्रेस टे्रन जैसे ही प्लेटफार्म पर आ कर लगी, तसलीमा को लगा कि उस का दिल बैठता जा रहा है.

उस ने अपने दोनों हाथों से उन 3 औरतों को और भी कस कर पकड़ लिया जिन के जीने की एकमात्र उम्मीद तसलीमा थी और अब न चाहते हुए भी उन औरतों को इन के हाल पर छोड़ कर उसे जाना पड़ रहा था, दूर, बहुत दूर, सरहद के पार, अपनी ससुराल.

तसलीमा का शौहर अनवर हर 3 महीने बाद ढेर सारे रुपयों और सामान के साथ उसे पाकिस्तान से भारत भेज देता ताकि वह मायके में अपने बड़े होने का फर्ज निभा सके. बीमार अब्बू के इलाज के साथ ही अम्मी की गृहस्थी, दोनों बहनों की पढ़ाई, और भी जाने क्याक्या जिम्मेदारियां तसलीमा ने अपने पति के सहयोग से उठा रखी हैं पर अब इस परिवार का क्या होगा?

तसलीमा के दोनों भाई तारिक और तुगलक जब से एक आतंकवादी गिरोह के सदस्य बने हैं तब से अब्बू भी बीमार रहने लगे. उन का सारा कारोबार ही ठप पड़ गया. ऊपर से थाने के बारबार बुलावे ने तो जैसे उन्हें तोड़ ही दिया. बुरे समय में रिश्तेदारों ने भी मुंह फेर लिया. अकेले अब्बू क्याक्या संभालें, एक दिन ऐसा आ गया कि घर में रोटी के लाले पड़ गए.

ऐसे में बड़ी बेटी होने के नाते तसलीमा को ही घर की बागडोर संभालनी थी. वह तो उसे अनवर जैसा शौहर मिला वरना कैसे कर पाती वह अपने मायके के लिए इतना कुछ.

तसलीमा सोचने लगी कि अब जो वह गई तो जाने फिर कब आना हो पाए. कई दिनों की दौड़धूप के बाद तो किसी तरह उस के अब्बू सरहद पार जाने वाली इस आखिरी ट्रेन में उस के लिए एक टिकट जुटा पाए थे.

कमसिन कपोलों पर चिंता की रेखाएं लिए तसलीमा दाएं हाथ से अम्मी को सहला रही थी और उस का बायां हाथ अपनी दोनों छोटी बहनों पर था.

तसलीमा ने छिपी नजरों से अब्बू को देखा जो बारबार अपनी आंखें पोंछ रहे थे और साथ ही नन्हे असलम को गोद में खिला रहे थे. उन्हें देख कर उस के मन में एक हूक सी उठी. बेचारे अब्बू की अभी उम्र ही क्या है. समय की मार ने तो जैसे उन्हें समय से पहले ही बूढ़ा बना दिया है.

नन्हे असलम के साथ बिलकुल बच्चा बन जाते हैं. तभी तो वह जब भी अपने नाना के घर हिंदुस्तान आता है, उन से ही चिपका रहता है.

लगता है, जैसे नाती को गले लगा कर वह अपने 2-2 जवान बेटों का गम भूलने की कोशिश करते हैं पर हाय रे औलाद का गम, आज तक कोई भूला है जो वह भूल पाते?

तसलीमा ने अपने ही मन से पूछा, ‘क्या खुद वह भूल पाई है अपने दो जवान भाइयों को खोने का गम?’

ससुराल में इतनी खुशहाली और मोहब्बत के बीच भी कभीकभी उस का दिल अपने दोनों छोटे भाइयों के लिए क्या रो नहीं पड़ता? अनवर की मजबूत बांहों में समा कर भी क्या उस की आंखें अपने भाइयों के लिए भीग नहीं जातीं? अगर वह अपने भाइयों को भूल सकी होती तो अनवर के छोटे भाइयों में तारिक और तुगलक को ढूंढ़ती ही क्यों?

‘‘दीदी, देखो, अम्मी को क्या हो गया?’’

तबस्सुम की चीख से तसलीमा चौंक उठी.

खयालों में खोई तसलीमा को पता ही नहीं चला कि कब उस की अम्मी उस की बांहों से फिसल कर वहीं पर लुढ़क गईं.

‘‘यह क्या हो गया, जीजी. अम्मी का दिल तो इतना कमजोर नहीं है,’’ सब से छोटी तरन्नुम अम्मी को सहारा देने के बजाय खुद जोर से सिसकते हुए बोली.

अब तक तसलीमा के अब्बू भी असलम को गोद में लिए ही ‘क्या हुआ, क्या हुआ’ कहते हुए उन के पास आ गए.

तसलीमा ने देखा कि तीनों की जिज्ञासा भरी नजरें उसी पर टिकी हैं जैसे इन लोगों के सभी सवालों का जवाब, सारी मुश्किलों का हल उसी के पास है. उस के मन में आ रहा था कि वह  खूब चिल्लाचिल्ला कर रोए ताकि उस की आवाज दूर तक पहुंचे… बहुत दूर, नेताओं के कानों तक.

पर तसलीमा जानती है कि वह ऐसा नहीं कर सकती क्योंकि अगर वह जरा सा भी रोई तो उस के अब्बू का परिवार जो पहले से ही टूटा हुआ है और टूट जाएगा. आखिर वही तो है इन सब के उम्मीद की धुरी. अब जबकि कुछ ही मिनटों में वह इन्हें छोड़ कर दूसरे मुल्क के लिए रवाना होने वाली है, उन्हें किसी भी तरह की तकलीफ नहीं देना चाहती थी.

समझौता एक्सप्रेस जब भी प्लेटफार्म छोड़ती है, दूसरी ट्रेन की अपेक्षा लोगों को कुछ ज्यादा ही रुला जाती है. यही इस गाड़ी की विशेषता है. आखिर सरहद पार जाने वाले अपनों का गम कुछ ज्यादा ही होता है, पर आज तो यहां मातम जैसा माहौल है.

कहीं कोई सिसकियों में अपने गम का इजहार कर रहा है तो कोई दिल के दर्द को मुसकान में छिपा कर सामने वाले को दिलासा दे रहा है. आज यहां कोसने वालों की भी कमी नहीं दिखती. कोई नेताओं को कोस रहा है तो कोई आतंकवादियों को, जो सारी फसाद की जड़ हैं.

तसलीमा किसे कोसे? उसे तो किसी को कोसने की आदत ही नहीं है. सहसा उसे लगा कि काश, वह औरत के बजाय पुरुष होती तो अपने परिवार को इस तरह मझधार में छोड़ कर तो न जाती.

मन जितना अशांत हो रहा था स्वर को उतना ही शांत बनाते हुए तसलीमा बोली, ‘‘अम्मी को कुछ नहीं हुआ है, वह अभी ठीक हो जाएंगी. तरन्नुम, रोना बंद कर और जा कर अम्मी के लिए जरा ठंडा पानी ले आ और अब्बू, आप मेरा टिकट कैंसल करवा दो. मैं आप लोगों को इस हालात में छोड़ कर पाकिस्तान हरगिज नहीं जाऊंगी.’’

टिकट कैंसल करने की बात सुनते ही अम्मी को जैसे करंट छू गया हो, वह धीरे से बोलीं, ‘‘कुछ नहीं हुआ मुझे. बस, जरा चक्कर आ गया था. तू फिक्र न कर लीमो, अब मैं बिलकुल ठीक हूं.’’

इतने में तरन्नुम ठंडा पानी ले आई. एक घूंट गले से उतार कर अम्मी फिर बोलीं, ‘‘कलेजे पर पत्थर रख कर तेरा रिश्ता तय किया था मैं ने. लेदे कर एक ही तो सुख रह गया है जिंदगी में कि बेटी ससुराल में खुशहाल है, वह तो मत छीन. अरे, ओ लीमो के अब्बू, मेरी लीमो को ले जा कर गाड़ी में बैठा दीजिए. आ बेटा, तुझे सीने से लगा कर कलेजा ठंडा कर लूं,’’ इतना कह कर अम्मी अब्बू की गोद से नन्हे असलम को ले कर पागलों की तरह चूमने लगीं.

शायद नन्हे असलम को भी इतनी देर में विदाई की घंटी सुनाई पड़ने लगी. वह रोंआसा हो कर इन चुंबनों का अर्थ समझने की कोशिश करने लगा.

इतने में तीनों बहनें एकदूसरे से विदा लेने लगीं.

तबस्सुम धीरे से तसलीमा के कान में बोली, ‘‘दीदी, आप बिलकुल फिक्र न करो, आज से घर की सारी जिम्मेदारी मेरी है, मैं अम्मी और तरन्नुम को यहां संभाल लेती हूं, आप निश्चिंत हो कर जाओ.’’

तसलीमा ने डबडबाई आंखों से तबस्सुम को देखा. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि उस की चुलबुली बहन आज कितनी बड़ी हो गई है. सच, जिम्मेदारी उठाने के लिए उम्र नहीं, शायद परिस्थितियां ही जिम्मेदार होती हैं.

असलम को गोद में ले कर तसलीमा चुपचाप अब्बू और कुली के पीछे चल दी. वह जानती थी कि अब अगर आगे उस ने कुछ कहने की कोशिश की या पीछे मुड़ कर देखा तो बस, सारी कयामत यहीं बरपा हो जाएगी.

जब तक गाड़ी प्लेटफार्म पर खड़ी रही, अब्बू ने अपनेआप को सामान सजाने में व्यस्त रखा और तसलीमा ने अपने आंसुओं को रोकने में. पर गाड़ी की सीटी बजते ही उसे लगा कि अब बस, कयामत ही आ जाएगी.

जैसेजैसे अब्बू पीछे छूटने लगे, वह प्लेटफार्म भी पीछे छूटने लगा जहां की एक बेंच पर उस की अम्मी बहनों को साथ लिए बैठी हैं, वह शहर पीछे छूटने लगा जहां वह नाजों पली, वह वतन पीछे छूटने लगा जिसे तसलीमा परदेस जा कर और ज्यादा चाहने लगी थी.

तसलीमा को लगा कि गाड़ी की बढ़ती रफ्तार के साथ उस के आंसुओं की रफ्तार भी बढ़ रही है. अपने आंसुओं की बहती धारा में उसे ध्यान ही नहीं रहा कि कब नन्हा असलम सुबकने लगा. भला अपनी मां को इस तरह रोता देख कौन बच्चा चुप रहेगा?

‘‘बच्चे को इधर दे दो, बहन. जरा घुमा लाऊं तो इस का मन बहल जाएगा. आ मुन्ना, आ जा,’’ कह कर किसी ने असलम को उस की गोद से उठा लिया. वह थी कि बस, दुपट्टे में चेहरा छिपा कर रोए जा रही थी. उस ने यह भी नहीं देखा कि उस के बच्चे को कौन ले जा रहा है.

आखिर जब शरीर में न तो रोने की शक्ति बची और न आंखों में कोई आंसू बचा तो तसलीमा ने धीरे से चेहरा उठा कर चारों तरफ देखा. उस डब्बे में हर उम्र की महिलाएं मौजूद थीं. पर किसी की गोद में उस का असलम नहीं था और न ही आसपास कहीं दिखाई दे रहा था. मां का दिल तड़प उठा. अब वह क्या करे? कहां ढूंढ़े अपने जिगर के टुकड़े को?

इतने में एक नीले बुरके वाली युवती अपनी गोद में असलम को लिए उसी के पास आ कर बैठ गई. तसलीमा ने लपक कर अपने बच्चे को गोद में ले लिया और बोली, ‘‘आप को इस तरह मेरा बच्चा नहीं ले कर जाना चाहिए था. घबराहट के मारे मेरी तो जान ही निकल गई थी.’’

‘‘बहन, क्या करती, बच्चा इतनी बुरी तरह से रो रहा था और आप को कोई होश ही नहीं था. ऐसे में मुझे जो ठीक लगा मैं ने किया. थोड़ा घुमाते ही बच्चा सो गया. गुस्ताखी माफ करें,’’ युवती ने मीठी आवाज में कहा.

शायद यह उस के मधुर व्यवहार का ही अंजाम था कि तसलीमा को सहसा ही अपने गलत व्यवहार का एहसास हुआ. वाकई असलम नींद में भी हिचकियां ले रहा था.

‘‘बहन, माफी तो मुझे मांगनी चाहिए कि तुम ने मेरा उपकार किया और मैं एहसान मानने के बदले नाराजगी जता रही हूं,’’ थोड़ा रुक कर तसलीमा फिर बोली, ‘‘दरअसल, इन हालात में मायका छोड़ कर मुझे जाना पड़ेगा, यह सोचा नहीं था.’’

‘‘ससुराल तो जाना ही पड़ता है बहन, यही तो औरत की जिंदगी है कि जाओ तो मुश्किल, न जाओ तो मुश्किल,’’ नीले बुरके वाली युवती बोली, साथ ही उस का मुसकराता चेहरा कुछ फीका पड़ गया.

‘‘हां, यह तो है,’’ तसलीमा बोली, ‘‘पहले जब भी ससुराल जाती थी तो मायके वालों से दोबारा मिलने की उम्मीद तो रहती थी, मगर इस बार…’’ इतना कहतेकहते तसलीमा को लगा कि उस का गला फिर से रुंध रहा है.

फिर उस ने बात बदलने के लिए पूछा, ‘‘आप अकेली हैं?’’

‘‘हां, अकेली ही समझो. जिस का दामन पकड़ कर यहां परदेस चली आई थी, वह तो अपना हुआ नहीं, तब किस के सहारे यहां रहती. इसलिए अब वापस पाकिस्तान लौट रही हूं. वहां रावलपिंडी के पास गांव है, वैसे मेरा नाम नजमा है और तुम्हारा?’’

‘‘तसलीमा.’’

तसलीमा सोचने लगी कि इनसान भी क्या चीज है. हालात के हाथों बिलकुल खिलौना. किसी और जगह मुलाकात होती तो हम दो अजनबी महिलाओं की तरह दुआसलाम कर के अलग हो जाते पर यहां…यहां दोनों ही बेताब हैं एकदूसरे से अपनेअपने दर्द को कहने और सुनने के लिए, जबकि दोनों ही जानती हैं कि कोई किसी का गम कम नहीं कर सकता पर कहनेसुनने से शायद तकलीफ थोड़ा कम हो और फिर समय भी तो गुजारना है. इसी अंदाज से तसलीमा बोली, ‘‘क्या आप के शौहर ने आप को छोड़ दिया है?’’

‘‘नहीं, मैं ने ही उसे छोड़ दिया,’’ नजमा ने एक गहरी सांस खींचते हुए कहा, ‘‘सच्ची मुसलमान हूं, कैसे रहती उस काफिर के साथ जो अपने लालची इरादों को मजहब की चादर में ढकने की नापाक कोशिश कर रहा था.’’

तसलीमा गौर से नजमा को देख रही थी, शायद उस के दर्द को समझने की कोशिश कर रही थी.

इतने में नजमा फिर बोली, ‘‘जब पाकिस्तान से हम चले थे तो उस ने मुझ से कहा था कि हिंदुस्तान में उसे बहुत अच्छा काम मिला है और वहां हम अपनी मुहब्बत की दुनिया बसाएंगे, पर यहां आ कर पता चला कि वह किसी नापाक इरादे से भारत भेजा गया है जिस के बदले उसे इतने पैसे दिए जाएंगे कि ऐशोआराम की जिंदगी उस के कदमों पर होगी.

‘‘मुझ से मुहब्बत सिर्फ नाटक था ताकि यहां किसी को उस के नापाक इरादों पर शक न हो. मजहब और मुहब्बत के नाम पर इतना बड़ा धोखा. फिर भी मैं ने उसे दलदल से बाहर निकालने की कोशिश की थी. कभी मुहब्बत का वास्ता दे कर तो कभी आने वाली औलाद का वास्ता दे कर, पर आज तक कोई दलदल से बाहर निकला है जो वह निकलता. हार कर खुद ही निकल आई मैं उस की जिंदगी से. आखिर मुझे अपनी औलाद को एक नेकदिल इनसान जो बनाना है.’’

तसलीमा ने देखा कि अपने दर्द का बयान करते हुए भी नजमा के होंठों पर आत्मविश्वास की मुसकान है, आंखों में उम्मीदें हैं. उस ने दर्द का यह रूप पहले कभी नहीं देखा था.

क्या नजमा का दर्द उस के दर्द से कम है? नहीं तो? फिर भी वह मुसकरा रही है, अपना ही नहीं दूसरों का भी गम बांट रही है, अंधेरी राहों में उम्मीदों का चिराग जला रही है. वह ऐसा क्यों नहीं कर सकती? फिर उस के पास तो अनवर जैसा शौहर भी है जो उस के एक इशारे पर सारी दुनिया उस के कदमों पर रख दे. क्या सोचेंगे उस के ससुराल वाले जब उस की सूजी आंखों को देखेंगे. कितना दुखी होगा अनवर उसे दुखी देख कर.

नहीं, अब वह नहीं रोएगी. उस ने खिड़की से बाहर देखा. जिन खेत-खलिहानों को पीछे छूटते देख कर उस की आंखें बारबार भीग रही थीं, अब उन्हीं को वह मुग्ध आंखों से निहार रही थी. कौन कहता है कि इन रास्तों से दोबारा नहीं लौटना है? कौन कहता है सरहद पार जाने वाली ये आखिरी गाड़ी है? वह लौटेगी, जरूर लौटेगी, इन्हीं रास्तों से लौटेगी, इसी गाड़ी में लौटेगी, जब दुनिया नहीं रुकती है तो उस पर चलने वाले कैसे रुक सकते हैं?

तसलीमा ने असलम को सीने से लगा लिया और नजमा की तरफ देख कर प्यार से मुसकरा दी. अब दोनों की ही आंखें चमक रही थीं, दर्द के आंसू से नहीं बल्कि उम्मीद की किरण से. Family Story In Hindi.

Social Story In Hindi: संपेरन- क्या था विधवा शासिका यशोवती का वार?

Social Story In Hindi:

लेखक- डॉ. प्रभात त्यागी

सरिता, बीस साल पहले, जनवरी (प्रथम) 1985

‘‘तुम्हारी सूचना विश्वसनीय तो है?’’ शंकराचार्य मंदिर के मुख्यद्वार पर पुरोहित के पांव सहसा रुक गए.

‘‘स्वामी जयेंद्र ने आज तक आप को अविश्वसनीय सूचना नहीं दी है.

1-2 बार नहीं, जितनी बार भी आप पूछेंगे, मेरी सूचना अपरिवर्तित रहेगी कि विधवा यशोवती कश्यपपुर (कश्मीर) की शासिका मनोनीत की गई हैं.’’

‘‘तो क्या राज्य के पंडितों, ज्ञानीध्यानी व्यक्तियों और शिक्षाविदों को एक विधवा की अधीनता स्वीकार करनी होगी? यह बात क्या नीति, वेद, उपनिषद, धार्मिक शिक्षाओं व शालीनता के विपरीत नहीं होगी? प्रात: जीवनचर्या प्रारंभ करने से पूर्व राज्य निवासियों द्वारा ईश्वर के साथ ऐसी स्त्री का  नाम उच्चारित करना क्या पापाचार नहीं होगा?’’ कपिल का स्वर आक्रोशपूर्ण हो गया.

‘‘विप्रश्रेष्ठ, इस से तो भारत व अन्य पड़ोसी  राज्यों में भी हमारी हेठी होगी. सब लोग हमारी बुद्धि व मानसिक संतुलन पर तरस खाएंगे,’’ पुरोहित के साथ चलती भीड़ में से कोई बोल उठा.

‘‘निश्चय ही राज्य की सधवाएं इस प्रस्ताव का घोर विरोध करेंगी,’’ मुख में तांबूल दबाए, चंचल नयनों में काजल व होंठों पर लाल मिस्सी सज्जित युवती का स्वर सुन कर कपिल मन ही मन हर्षित हो उठा.

‘‘एक तो नारी,

ऊपर से विधवा? शिव…शिव…ऐसी शासिका के राज्य में रहने की अपेक्षा आत्महत्या कर लेना या राज्य से कहीं अन्यत्र पलायन कर लेना ही हमारे लिए उचित रहेगा,’’ एक अन्य पुरुष स्वर ने भी कपिल का समर्थन किया.

‘‘यदि आप सब लोगों की सहमति है तो मैं रानी यशोवती के सिंहासनारोहण के विरुद्ध अपने आत्मदाह की घोषणा करता हूं.’’

पुरोहित कपिल की घोषणा का भीड़ ने तुमुल हर्ष व तालियों से स्वागत किया.

‘‘जयेंद्र, तुम कश्यपपुर के प्रत्येक स्त्रीपुरुष तक मेरा यह  प्रण पहुंचा दो कि यदि विधवा यशोवती को राज्य की गद्दी पर बैठाया गया तो राज्यारोहण के दिन ही कोंसरनाग से उत्पन्न वितस्ता (झेलम) की लहरों में डूब कर मैं

अपने प्राण दे दूंगा.’’

‘‘महाज्ञानी, अपने प्रण के साथ हमारे इस निर्णय को भी जोड़ लें कि आप के बाद भी कश्यपपुर का पुरुष समुदाय प्रतिदिन इसी प्रकार अपने प्राण देता रहेगा, जब तक वह दुष्टा राज्य की गद्दी से स्वयं विमुख नहीं हो जाती अथवा उसे सिंहासन से हटा नहीं दिया जाता.’’

शंकराचार्य मंदिर में एक निश्चित समय पर संध्या काल में कपिल द्वारा प्रतिदिन 1-2 घंटे तक पारलौकिक ज्ञान व दर्शन जैसे विषयों पर प्रवचन दिया जाता था. उस के शब्दों में चमत्कार था. उस की वाणी ओजस्वी थी. देवा-लय के निकट

के स्त्रीपुरुष बड़ी संख्या में इन प्रवचनों को सुनने के लिए एकत्रित होते थे.

धर्म व दर्शन के साथसाथ कपिल नीति व कूटनीति का भी पंडित था. अपने गहन अध्ययन के बल पर उस ने चाणक्यनीति का एकएक शब्द कंठस्थ कर लिया था. इन्हीं सब बातों के आधार पर राज्य की नीतियों में उस का अत्यधिक हस्तक्षेप था.

कश्यपपुर के शासकों का पुरोहित कपिल के बढ़ते प्रभाव पर चिंतित होना स्वाभाविक था, पर साथ ही यह भी एक तथ्य था कि उस के सहयोग से शासकों को सफलता भी प्राप्त हो जाती थी. अत: ब्राह्मणवाद के बढ़ते प्रभाव के साथ शासकों की सफलता निश्चित होती जाती थी.

संक्षेप में, शासकों व पुरोहित दोनों ने ही एकदूसरे के अस्तित्व को स्वाभाविक रूप में स्वीकार कर लिया था, पर यशोवती के शासिका बन जाने से कपिल को अपना प्रभाव समाप्त होता दिखाई दिया. वह पुरुषोचित अहं व दंभ के कारण एक नारी का आधिपत्य कैसे सहन कर सकता था.

कपिल के साथ कश्यपपुर की जनता ने यशोवती के राज्यारोहण को अस्वीकार कर दिया था. पुरोहित के मस्तिष्क में इस के लिए कुछ कुतर्क थे, पर भीड़ ने तो केवल अंधानुभक्ति के वशीभूत हो कर ही यह निर्णय लिया था. परिणामस्वरूप यशोवती के विरुद्ध गालियों व कटु वचनों का प्रयोग किया गया. उस की हंसी उड़ाई गई. उस के संबंध में निम्नस्तरीय बातें कही गईं.

शंकराचार्य मंदिर में जमा भीड़ में नारियों की भी अच्छीखासी संख्या थी, पर उन में से अधिकतर का उद्देश्य केवल कपिल के प्रवचनों को सुनना तथा घर के उबाऊ वातावरण से थोड़ी देर के लिए मुक्ति प्राप्त करना था. अत: कपिल बिना किसी औपचारिकता के उन के रूखेसूखे जीवन का एक मनोरम व अविभाज्य अंग बन चुका था. प्रत्येक मूल्य पर वे आनंद के इस साधन को अक्षुण्ण बनाए रखना चाहती थीं. इसीलिए पुरुषों के साथ स्वर मिला कर नारियों ने भी यशोवती को वारांगना सिद्ध कर दिया.

देवालय की भीड़ में एक युवती बिलकुल मौन थी. कपिल उस की सहमति प्राप्त करने के लिए, यशोवती के विरुद्ध विषवमन करते हुए बारबार उस की ओर निहार रहा था. उसे मौन देख कर वह दूसरी ओर दृष्टि मोड़ लेता था. अपनी चालढाल व वेशभूषा से वह कुलीनवर्गीय लग रही थी.

अपने लंबे चोगे के साथ उस ने अपने मुख, नाक तथा होंठों को एक पारदर्शक रेशमी घूंघट से ढक रखा था. घूंघट के बीच टुकुरटुकुर ताकती उस की आंखों में एक अनोखा आकर्षण था. उन में सागर की गहराई थी. कई सुरापात्रों की लालिमा जैसे उन में सिकुड़सिमट गई थी. अपने निकट खड़ी परिचारिका के कानों में वह कुछ फुसफुसाई.

‘‘महोदय,’’ कपिल को संबोधित करते हुए परिचारिका बोली, ‘‘आप में से किसी ने कभी रानी यशोवती से भेंट भी की है?’’

‘‘नहीं तो,’’ सकुचा कर कपिल ने प्रत्युत्तर दिया.

‘‘क्यों न अपना अभियान प्रारंभ करने से पूर्व आप एक बार उन से भेंट कर लें.’’

‘‘महादेवी, रथ स्वयं कभी संचालित नहीं होता, बैल या घोड़े उसे चलाते हैं. अत: रथ तो अपने स्थान पर मौन खड़ा रहता है. वह पुकारपुकार कर अपने संचालनकर्ता को नहीं बुलाएगा. यशोवती व मुझ में आप को कौन क्या प्रतीत होता है, यह मैं आप पर ही छोड़ता हूं. मेरा निश्चय अटल है. वितस्ता की जलराशि जल्दी ही मेरा समाधिस्थल बनेगी.’’

घूंघट ओढ़े युवती फिर भी मौन खड़ी रही.

पुरोहितवाद का विषैला जादू शीघ्र कश्यपपुर की जनता के सिर चढ़ कर बोला. रानी यशोवती के विरुद्ध अचानक ही नगर के चतुर्मार्गों व राजपथों पर जनता का आक्रोश फूट पड़ा, प्रतिदिन नए जुलूसों, भाषणों व गोष्ठियों द्वारा यशोवती को शासिका बनाए जाने के विरुद्ध तीव्र लोकमत प्रकट किया गया.

आंदोलनकर्ता मुख्य रूप से ‘विधवा रानी नाक कटानी, ‘एक ध्येय, उद्देश्य बनाओ, यशोवती से देश बचाओ’ अथवा ‘जब तक है सांसों में सांस, नहीं चलेगा विधवा राज’ जैसे नारों से कश्यपपुर को गुंजाते रहे. आंदोलनकर्ताओं पर जब कुछ अत्याचार किए गए तो आंदोलन और भी अधिक भड़क उठा. लगता था कि कपिल की सफलता असंदिग्ध है.

एक रात्रि को दूसरे प्रहर में कपिल शंकराचार्य मंदिर में निद्रा में लीन था. दिन भर यशोवती विरोधी अभियान के कारण वह थक गया था. उस के अन्य साथी भी निद्रा में मग्न थे. अचानक किसी ने उसे झिंझोड़ कर जगा दिया. पूरी तरह नींद खुलने पर उस ने दीपक के प्रकाश में 4 राज्य सैनिकों को अस्त्रशस्त्रों से सुसज्जित देखा.

‘‘कहिए, क्या बात है?’’

‘‘तुम्हें इसी पल हमारे साथ चलना है.’’

‘‘पर कहां व क्यों?’’

‘‘जनसाधारण के प्रश्नों के उत्तर देना शासनाधिकारियों के लिए आवश्यक नहीं है. हमें केवल इतना ज्ञात है कि आनाकानी करने पर हम तुम्हें जबरदस्ती ले जाएंगे. ऐसा ही हमें आदेश है. आदेशकर्ता का नाम भी हम नहीं बताएंगे.’’

‘‘उस का नाम तो मैं ज्ञात कर लूंगा, पर क्या तुम मेरे प्राणों की सुरक्षा का वचन देते हो?’’

‘‘वचन? शासन के वचन का क्या तुम कोई मूल्य समझते हो? हम तो प्रतिपल वचन दे कर उसी क्षण उसे तोड़ भी डालते हैं. फिर भी हम तुम्हें आश्वस्त कर सकते हैं कि अभी तुम्हारे प्राण लेने की कोई योजना नहीं है. वैसे भी तुम ने राजनीतिक आंदोलन प्रारंभ करने से पूर्व क्या शासन को कोई सूचना दी थी या उस की अनुमति मांगी थी? यदि नहीं तो तुम्हें अपने प्राणों की आशा तो उसी पल छोड़ देनी चाहिए थी. चलो, उठ कर खड़े हो जाओ.’’

‘‘मैं एक बार अपने विश्वस्त मित्रों व साथियों से तो बात कर लूं.’’

‘‘मित्र व साथी?’’ एक सैनिक अट्टहास कर उठा, ‘‘इन्हीं के बल पर क्या तुम ने राज्य क्रांति का बीड़ा उठाया है? तुम्हारे ‘साथी व मित्र’ हमारे आगमन का समाचार सुनते ही नौ दो ग्यारह हो गए हैं. विश्वास न हो तो चारों ओर दृष्टि डाल कर देख लो. वास्तव में एक क्षुद्र भुनगा होते हुए, कश्यपपुर साम्राज्य रूपी पर्वतमाला को चूरचूर करने का निर्णय ले कर तुम ने अपनेआप को सब की हंसी का पात्र बना लिया है. चलो, शीघ्रता करो.’’

‘‘पर यदि मेरे प्राण ले लिए जाएं तो यह तथ्य मेरे सगेसंबंधियों तक तो पहुंचा दिया जाए.’’

‘‘प्राणों की चिंता में घुलने वाले कापुरुष, तुम्हें अपने प्राण इतने ही प्यारे थे तो जनता का नेतृत्व क्यों संभाला था? क्यों उसे भ्रमित किया? मैं विश्वास दिलाता हूं कि तुम्हारे प्राण लिए जाएंगे तो कश्यपपुर की जनता ही नहीं, पड़ोसी देशों तक इस की सूचना पहुंचेगी. अभी तुम इतने महान नहीं बने हो कि तुम से भयभीत हो कर शासन तुम्हें गुप्त रूप से प्राणदंड दे दे. सैनिको, इसे उठा कर बाहर पालकी में ले जा कर डाल दो.’’

आज्ञा का तुरंत पालन हुआ. बंद खिड़कियों वाली अंधेरी पालकी में पड़ा हुआ कपिल अपनी भयंकर भूल पर पश्चात्ताप करने लगा. सारे संसार को कूटनीति का पाठ पढ़ाने वाला स्वयं अपनी मूर्खता को कोसने लगा. उसे शासन की ओर से किसी ऐसे कदम की आशा प्रारंभ में तो थी, पर जनआक्रोश की तीव्र लहर के कारण उस ने अपनेआप को अपराजेय मान लिया था.

केवल नारी होने के कारण उसे यशोवती की ओर से असावधान नहीं होना चाहिए था. जब उस के मित्रों ने ही उस का साथ छोड़ दिया तो जनता तो निश्चित रूप से मैदान छोड़ भागेगी.

अपने अनुयायियों पर उसे भयंकर क्षोभ उत्पन्न हुआ. वे लोग वास्तव में यशोवती के विरोधी न थे, प्रत्युत अंधानु- भक्ति के कारण वे कपिल का साथ दे रहे थे. सचमुच उस ने यशोवती का विरोध कर मृत्यु को आमंत्रित कर लिया था.

अब उसे अपने प्राणों के बचने की कोई आशा नहीं रही थी. अब उसे स्पष्ट हो गया था कि साधारण हाड़मांस की पुतली, भोली और कमजोर प्रतीत होने वाली नारी भी आवश्यकता पड़ने पर साक्षात काल बन सकती है. स्पष्टतया बाजी उस के हाथों से निकल कर यशोवती के हाथों में पहुंच चुकी थी.

सहसा अपने विश्वस्त साथी द्वारा यशोवती के संबंध में एकत्र की गई सूचना उस के मस्तिष्क में कौंध उठी. उस दिन का वार्त्तालाप उस की स्मृति में ताजा हो उठा.

‘यह समस्या अचानक कश्यपपुर में क्योंकर उत्पन्न हो गई. यशोवती के पति सम्राट दामोदर ने बैठेबिठाए मथुरा के यादवों से वैर क्यों मोल ले लिया?’ उस के इस प्रश्न पर उस के साथी ने एक लंबी सांस ले कर प्रत्युत्तर दिया था.

‘पुरोहितजी, मेरी सूचनाओं के अनुसार हमारे कश्यपपुर के सम्राट गोनंद प्रथम के काल में ही इस समस्या के कंटीले बीज इस धरती में डाल दिए गए थे. राजगृह के राजा जरासंध की सहायता के लिए गोनंद प्रथम कश्मीर से बड़ी सेना सहित बिहार में जा पहुंचे थे. जैसी आशा थी, मथुरा के यादवों ने जरासंध पर आक्रमण कर दिया. यादव बलराम के हाथों गोनंद प्रथम का प्राणांत हुआ.

‘समस्या यहीं नहीं समाप्त हो सकती थी,’ उस  ने बात आगे चलाई, ‘हारनाजीतना तो युद्ध में होता ही रहता है. गौरवपूर्ण बात यह थी कि कश्यपपुर का राजा भारत के एक संकटग्रस्त शासक की सहायता करते हुए शहीद हो गया. कटोचवंशीय गोनंद प्रथम का यह अमर बलिदान हमें हमेशा प्रेरणा प्रदान करता रहेगा. यह गौरवगाथा भारत से हमारे घनिष्ठ व अटूट संबंधों की भी साक्षी है.’

‘रानी यशोवती फिर कश्यपपुर की शासिका बनने कैसे आ पहुंची?’ कपिल ने प्रश्न किया.

‘श्रीमन, गोनंद प्रथम का पुत्र राजा दामोदर जिस पल से कश्यपपुर के सिंहासन पर आरूढ़ हुआ, अपने पिता की असमय मृत्यु उस के हृदय को दग्ध करती रही. उन के प्राणहंता से प्रतिशोध लेना उस के जीवन का मूलमंत्र बन गया. आठों पहर उस के मनोमस्तिष्क पर केवल एक नाम ‘बलराम’ अंकित रहने लगा. प्रतिशोध लिए बिना उसे अपने पिता की पीड़ायुक्त अंतिम आकृति कल्पना में और भी अधिक करुणाजनक प्रतीत होती थी. वह स्पप्न में भी अपने पितृहंता का मुख देखतेदेखते असंतुलित हो उठता.

‘सहसा राजा दामोदर की मनोवांछित इच्छा लगभग पूर्ण हुई. गांधार शासक की पुत्री का स्वयंवर उन्हीं दिनों आयोजित हुआ और देशविदेश के राजाओं सहित मथुरा के बलराम यादव को भी आमंत्रित किया गया. कश्यपपुर के राजा दामोदर ने स्वयंवर के बहाने अपने शत्रु बलराम पर तुरंत चढ़ाई कर दी. उस का यह कार्य कूटनीति के साथसाथ शालीनता के भी विरुद्ध था.

‘पर दामोदर का मस्तिष्क इस समय  पूर्णतया असंतुलित था. बलराम ने दामोदर को परास्त ही नहीं किया, अपितु उस के प्राण भी ले लिए. अब सुना है कि दामोदर के पुत्र गोनंद द्वितीय के वयस्क होने तक उस की मां यशोवती को कश्यपपुर की शासिका घोषित किया गया है.’

‘ओह, तो यों कहो कि यह सब स्थिति बलराम यादव के कारण पैदा हुई है,’ कपिल बोला.

‘और क्या, बलराम यादव ने दामोदर के प्राण ले कर कश्यपपुर के माथे पर यशोवती रूपी घिनौना, काला तिलक अंकित कर दिया है.’

‘तुम चिंता मत करो,’ उस ने कहा था, ‘मैं अपने प्राण रहते तक विधवा यशोवती को कश्यपपुर की गद्दी पर नहीं बैठने दूंगा. किसी विधवा स्त्री को गद्दी पर बैठाने की अपेक्षा कश्यपपुर की गद्दी का खाली रहना ही उचित है.’

वह इन्हीं विचारों में लीन था कि अचानक पालकी रुक गई और 2 व्यक्तियों ने उसे पालकी से बाहर निकलने का आदेश दिया. उस ने आंखें टिमटिमा कर देखा, बाहर भयावह अंधेरा था. हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था. यशोवती को ढेर सारी गालियां देते हुए वह कल्पना के सहारे राजधानी पुरानाधिष्ठान के राजमहल के सम्मुख पालकी से उतर कर आगे बढ़ा.

मुख्यद्वार व कई सीढि़यों को पार करने के पश्चात सहसा ही उसे एक रत्नमंडित दीवारों व स्तंभों वाले कक्ष में तीव्र चौंधियाते प्रकाश में खड़ा कर दिया गया. तीव्र प्रकाश के कारण स्तंभों व दीवारों के रत्नों से इंद्रधनुषी आभा फूट रही थी. उसे लगा जैसे वह कई इंद्रधनुषों के बीच खड़ा हो.

‘‘पुरोहित कपिल का विधवा यशोवती के कक्ष में स्वागत है.’’

कपिल कुछ पल स्तब्ध खड़ा रह गया. उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ. प्रकाश की सहस्रों किरणों के बीच जो युवती उस के सम्मुख बैठी हुई थी, वह उसे परिचिता प्रतीत हो रही थी. अपने मस्तिष्क पर जोर डालने पर भी वह युवती का परिचय ज्ञात नहीं कर सका.

उस के चेहरे पर बड़ेबड़े 2 नेत्र सागर के समान गहरे और सम्मोहनयुक्त लगे. इन नयनों की गंभीरता उस के हृदय में सीधी पैठ रही थी. विधवा यशोवती इतनी आकर्षक, सुकुमार और कोमलांगी होगी इस की तो उस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. धीरेधीरे उस के प्रति उस का सारा रोष, आक्रोश और विरोध न जाने क्यों हवा होता प्रतीत हुआ.

‘‘आइए,  पुरोहितजी, इस आसन पर विराजिए.’’

‘‘नहीं…नहीं, महिषी, मैं आप के समकक्ष कैसे बैठ सकता हूं.’’

स्वयं कपिल को अपने शब्दों पर आश्चर्य हो रहा था कि वह क्या बोल रहा है. सचमुच यशोवती ने उसे सम्मोहित कर लिया था. कुतर्क, हठधर्मिता व धार्मिक श्रेष्ठता का गर्व धीरेधीरे उस का साथ छोड़ते प्रतीत हो रहे थे.

‘‘देखिए पुरोहितजी, प्रकृति ने हमें रूप, समृद्धि व सम्मान सभी कुछ प्रदान किया, पर आप के ढोंगी समाज ने, जानते हैं, मुझे क्या भेंट दी? यह देखिए…’’ उस ने अपनी सूनी कलाइयां तथा पैर की नंगी उंगलियां प्रदर्शित कर दीं, ‘‘और देखिए…’’ उस ने अपने सूने ललाट व लंबे, धरती को छूते बालों को हटा कर, सीधीसपाट सूनीसूनी मांग की ओर इंगित किया.

‘‘यह इस बात का दंड है कि मैं अपने पति को जीवित नहीं रख सकी. दूसरे शब्दों में, मैं अपने पति को खा गई. सर्वविदित है कि गांधार में उन का प्राणांत हुआ. मैं आप से पूछना चाहती हूं कि क्या यह मेरी इच्छा थी कि मैं विधवा हो जाऊं? पुरुष अपनी पत्नी के देहांत के पश्चात कुछ भी नहीं खोता, तो फिर नारी ही विधवा बनने के लिए बाध्य क्यों है?’’ यशोवती की मुखमुद्रा क्रोध व आक्रोश से भरी हुई थी.

कपिल क्या प्रत्युत्तर देता? आज तक कुतर्कों से वह अपने विरोधियों को जीतता रहा था, पर यशोवती को कुतर्कों से बहलाना सरल नहीं था. अपने सामाजिक नियमों का खोखलापन उसे स्पष्ट महसूस हुआ.

‘‘मैं ने आप को यहां आने का कष्ट इसलिए दिया जिस से अपने विधवापन का दंड मैं आप के मुख से ही सुन लूं. अपराधी आप के सम्मुख बैठा है न्यायाधीश महोदय, उस का दंड उसे सुना दीजिए.’’

‘‘राजमहिषी, मुझे लज्जित मत कीजिए. मैं आप से क्षमा चाहता हूं कि आप से एक बार भी भेंट किए बिना केवल सामाजिक व धार्मिक आधार पर मैं ने आप के विरुद्ध विषवमन किया.’’

‘‘पुरोहितजी, मैं तो आप के मुख से वही सब कुछ सुनना चाहती हूं जो अप्रत्यक्ष रूप से आप मुझे सुनाते आ रहे हैं. वही गालियां, अपशब्द, कटुवचन आदि.’’

कहतेकहते यशोवती ने पास में पड़ा घूंघट अपने मुख पर लपेट कर केवल अपने नेत्र खुले रहने दिए.

‘‘ओह,’’ चौंक कर कपिल बोला, ‘‘तो आप प्रतिदिन मेरे  प्रवचनों में देवालय में उपस्थित होती रही हैं? धिक्कार है मुझे कि मैं आप को पहचान भी नहीं पाया.’’

‘‘सचमुच आप का ज्ञान अपरिमित है. आप की कूटनीतिक बातों में गांभीर्य है. आप की नीतिज्ञता की मैं पुजारिन हूं. इसीलिए तो मैं आप से विवाह रचाना चाहती हूं.’’

‘‘जी…?’’ कपिल को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ.

‘‘जी, हां…आप को मेरे वैधव्य और नारी होने से ही तो चिढ़ है? आप ही मेरे वैधव्य को मिटा सकते हैं. और मेरे पति के रूप में कश्यपपुर की गद्दी पर भी बैठ सकते हैं. मेरे इन हाथों, पैरों, माथे व मांग का सूनापन केवल आप ही दूर कर सकते हैं. कहिए, आप को मेरा प्रस्ताव स्वीकार है?’’

कपिल को अपनी कूटनीतिज्ञता व राजनीतिक उपदेशों की होली जलती प्रतीत हुई. यशोवती ने सचमुच उस के गले में स्वादिष्ठ कबाब के साथ हड्डी अटका दी थी. न उसे निगलते बन रहा था, न उगलते.

‘‘आप मौन क्यों हैं? क्या आप मुझे अपने योग्य नहीं समझते हैं?’’ यशोवती ने मानो नहले पर दहला जड़ दिया.

‘‘नहीं, महादेवी, आप से विवाह रचाने वाला तो अपने जीवन को सफल ही मानेगा…पर मैं सोच रहा था कि…’’

‘‘विधवा से कैसे विवाह रचाया जाए, यही न?’’ यशोवती उसे बिना संभलने का अवसर दिए लगातार वार पर वार कर रही थी, ‘‘विधवा विवाह तो हमारे कश्मीरी समाज में पहले से होते रहे हैं. स्वयं आप को अपने धर्मग्रंथों में सहस्रों उदाहरण मिल जाएंगे.’’

‘‘मैं तो सोच रहा हूं कि आप से विवाह रचा कर क्या मेरी कूटनीतिक पराजय नहीं हो जाएगी?’’ कपिल का स्वर पश्चात्तापपूर्ण था.

‘‘ओह, तो आप को यह चिंता है कि लोग क्या कहेंगे? तो ठीक है आप यहीं राजमहलों में रहिए. मैं घोषणा करा देती हूं कि आप कश्यपपुर छोड़ कर कहीं चले गए हैं.’’

‘‘महादेवी, तब तो मेरी स्थिति उस कुत्ते जैसी हो जाएगी जो न घर का रहा, न घाट का. आप मुझे कुछ सोचने का अवसर दीजिए.’’

‘‘जैसी आप की इच्छा. आज से ठीक चौथे दिन अर्थात विधिवत राज्यारोहण से एक दिन पूर्व तक मैं आप के निर्णय की प्रतीक्षा करूंगी.’’

‘‘जी,’’ मन ही मन मुक्ति की संभावना से वह प्रसन्न हो उठा, ‘मूर्खा कहीं की, मुझ से टक्कर लेने चली है? यहां से बाहर निकल कर इसे ऐसा बदनाम कर डालूंगा कि जिंदगी भर नहीं भूलेगी.’

‘‘एक बात और. यदि विवाह कर आप मुझे कहीं अन्यत्र ले जाना चाहें तो मैं उस के लिए भी सहर्ष तैयार हूं. मेरा लक्ष्य राज्य सिंहासन प्राप्त करना नहीं, केवल आप के प्रेम में पगे रहना है. आप की बौद्धिक श्रेष्ठता ने मुझे अत्यधिक प्रभावित कर दिया है, इसलिए यह राज्य, इस से प्राप्त सम्मान, सब गौण हैं. आप को प्राप्त करने के लिए मैं सब को लात मार सकती हूं.’’

‘‘ओह, राजमहिषी, आप को प्राप्त कर मैं वास्तव में गौरव का अनुभव करूंगा,’’ कहतेकहते वह सहसा मौन हो गया. उस ने एक भरपूर दृष्टि यशोवती पर डाली. वैधव्य का सूनापन उस के मुख पर अंकित होते हुए भी यशोवती में एक अनोखी तेजस्विता, एक गर्वीला मान था. उस के सांचे में ढले मुख पर ओस में भीगे गुलाब की पंखडि़यों जैसी ताजगी थी.

उस की काली भौंहों, लंबी, काली व भारी केशराशि के अतिरिक्त उस के अधरों व गालों पर किसी चित्रकार की तूलिका से निर्मित स्वाभाविक लालिमा थी. अपने उन्नत यौवन व दूधिया तन के कारण वह बैठी हुई कोई जीवित प्रतिमा प्रतीत हो रही थी.

कपिल को विश्वास ही नहीं हुआ कि कोई युवती इतनी सुंदर भी हो सकती है, जबकि कश्मीर में एक से एक सुंदर युवतियां उस के संपर्क में आ चुकी थीं. उसे अपना निर्णय परिवर्तित करना पड़ा. उस का मन कह उठा, ‘नहीं…नहीं, वह इस सरल व भोली युवती को कभी धोखा नहीं दे सकता.’

‘‘अद्भुत, अवर्णनीय.’’

‘‘ऐं, क्या बोल रहे हैं आप?’’ मधुर स्मिति बिखेरते हुए यशोवती ने प्रश्न किया.

‘‘महादेवी, आप सचमुच किसी कवि की कविता जैसी निर्मल व पवित्र हैं. वास्तव में मुझे आप का प्रस्ताव स्वीकार है. यदि पहले ही मैं आप के संपर्क में आ जाता तो यह आंदोलन कभी  प्रारंभ न करता.’’

‘‘सोच लीजिए, अपने निर्णय पर कहीं आप को पश्चात्ताप न करना पड़े.’’

‘‘जी, नहीं. मैं ने यह अभियान प्रारंभ किया था अपने अस्तित्व को बचाने व अपने प्रभाव को अक्षुण्ण रखने के लिए. अब आप देखिएगा कि राजनीति का यह पंडित किस प्रकार आप को जनसहयोग दिलाता है.’’

‘‘क्षमा कीजिए, पुरोहितजी, पुरुषों पर मुझे तनिक भी विश्वास नहीं रह गया है. इस क्षण एक निर्णय ले कर दूसरे ही क्षण वे दूसरी विरोधी बात स्वीकार कर सकते हैं. आप तो मुझे लिख दीजिए कि आप मुझ से विवाह के लिए सहमत हैं तथा मेरे विरुद्ध प्रारंभ अभियान को आप वापस लेने को तैयार हैं. आप जानते ही हैं, यह मेरे जीवन का प्रश्न है. मैं सचमुच आप की दासी बन कर आप की सेवा करूंगी,’’ मुग्धा नायिका की भांति यशोवती ने ताड़ का पत्ता व सरिए की कलम आगे रख दी. उस ने एक तीखी चितवन कपिल पर डाली.

‘‘यशोवती, मेरी हृदयेश्वरी, तुम्हें, अभी तक मुझ पर विश्वास नहीं हुआ? लो, तुम जो चाहो लिख लो, मैं ने अपने हस्ताक्षर कर दिए हैं.’’

‘‘दिव्या, तनिक अंगूर का रस लाना. मैं पुरोहितजी को अपने हाथों से पिलाऊंगी. आप ने ही तो अपने प्रवचन में कश्यपपुर की विशेषताओं में से एक अंगूर भी

बताई थी.’’

‘‘हां, मैं तो भूल ही गया था कि तुम मेरी शिष्या भी हो, पर अभीअभी मैं यहां की एक विशेषता और ढूंढ़ चुका हूं और वह है रानी यशोवती, मेरी हृदयेश्वरी, मेरी प्रियतमा…’’ कहतेकहते भावनाओं में बहते हुए कपिल ने यशोवती के गोरेगोरे श्वेत कबूतरों जैसे पैरों को चूम लिया.

उसी पल यशोवती के कक्ष का दरवाजा खुला. एकएक कर शंकराचार्य देवालय में यशोवती के विरुद्ध बढ़चढ़ कर बोलने वाले कपिल के भक्त आ खड़े हुए. उन्हें देख कर यशोवती अपने स्थान से उठ खड़ी हुई. उस ने अपने पैर के दोनों पंजे पीछे हटाने चाहे, पर कपिल उन से और चिपट गया.

‘‘थू है तुम पर, पुरोहित, हमें तुम से ऐसी आशा न थी. जिस के विरुद्ध तुम ने कश्यपपुर की जनता को भड़काया उसी के पैरों में पड़ कर तुम उस से प्रेम जता रहे हो? धिक्कार है तुम्हें,’’ जयेंद्र क्रोध से बोला.

‘‘कश्यपपुर के निवासियो, अपने पुरोहित की एक और करतूत देखिए. इस दुष्ट ने यशोवती से विवाह रचाने और अपना आंदोलन वापस लेने का भी वचन दिया है, देखिए,’’ यशोवती की परिचारिका दिव्या ने कपिल की हस्ताक्षरयुक्त घोषणा सामने रख दी.

‘‘ओह, यह नराधम इतनी नीचता पर उतर आया. आप इसे हमें सौंप दीजिए. हम इस की बोटीबोटी अलग कर देंगे. महादेवी, हम आप को कश्यपपुर की शासिका स्वीकार करते हैं.’’

सब के चले जाने पर यशोवती मुसकराई. वह बोली, ‘‘पुरोहित, तुम इतने मूढ़ होगे, मुझे आशा न थी. शत्रु के घर में पदार्पण से पूर्व कुछ सावधानी तो तुम्हें रखनी चाहिए थी. अपने गर्व, दर्प व ज्ञानी बन जाने के झूठे विश्वास ने तुम्हें कहीं का नहीं छोड़ा.

‘‘मेरे विवाह प्रस्ताव पर तेरी बाछें खिल गईं. मूर्ख, पूरे कश्यपपुर में क्या तू ही बचा था जिस से मैं पुनर्विवाह रचाती? अपने एक साधारण जन से विवाह कर क्या मुझे अपने पद व गौरव की हंसी उड़वानी थी?

‘‘तुम्हारे पतन पर मुझे खेद है, पर मैं ने तुम से ही सीखा राजनीति का अस्त्र प्रयुक्त किया है. तुम ने ही तो एक बार कहा था, ‘शत्रु को शत्रु के हथियार से ही मारना चाहिए.’ ले जाओ इस सांप को और बाहर छोड़ आओ. मैं ने इस के विषैले दांत तोड़ डाले हैं.’’

वास्तव में कपिल उसी रात्रि को कश्यपपुर से गायब हो गया. विधवा यशोवती पूरे 15 वर्ष तक कश्यपपुर पर एकछत्र राज्य करती रही. Social Story In Hindi.

Bihar Election Result 2025: देश की जरूरत है पार्टी में ‘नम्बर – 2’ का मजबूत नेता

Bihar Election Result 2025: राजनीतिक दलों में पार्टी उपाध्यक्ष के पद पर कमजोर नेता रखे जाते हैं. उस से मजबूत नेता महासचिव के पद पर होते हैं. पार्टी का संविधान पार्टी उपाध्यक्ष को ही सब से प्रमुख मानता है क्योंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष के बाद वह ही सब से प्रमुख होता है. उस की जिम्मेदारी अधिक होती है. ऐसे में पार्टी के संगठन और नंबर दो के नेता का मजबूत होना जरूरी होता है.

 

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों का काम देश का प्रबंध संभालना होता है. ऐसे में अगर किसी सत्ताधारी दल में उत्तराधिकार का संकट आता है तो उस का प्रभाव देश की जनता पर पड़ता है. हमारे समाज में एक सामान्य नियम सा है कि पूरा परिवार एक साथ सफर नहीं करता. उस के पीछे का मकसद यह होता है कि अगर कोई दुर्घटना हो तो परिवार को चलाने वाला कोई न कोई व्यक्ति बचा रहे. देश को चलाने का काम राजनीतिक दलों का है. ऐसे में उन के लिए यह नियम बनना चाहिए जिस से पार्टी में कोई संकट न आ सके जिस का प्रभाव देश पर पड़े.

कांग्रेस नेता और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की जब हत्या हुई तो पार्टी को संभालने के लिए राजीव गांधी को सामने लाया गया. राजीव गांधी की हत्या के बाद जब सोनिया गांधी ने पार्टी की कमान नहीं संभाली तो पीवी नरसिम्हाराव को सामने लाया गया. भारतीय जनता पार्टी में वर्तमान अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल एक साल पहले खत्म हो गया है. इस के बाद भी वह पार्टी अध्यक्ष बने हुए हैं. अटल, आडवाणी और जोशी के दौर में अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोषी के रूप में उत्तराधिकारी मौजूद थे.

अटल बिहारी वाजपेयी जब पीएम थे तो लालकृशण आडवाणी डिप्टी पीएम थे. आज की भाजपा में यह नहीं है. दुनिया की सब से बड़ी ताकत वाला देश भी इस तरह की व्यवस्था कर के चलता है. इस की वजह यह है कि देश को चलाने का काम सरकार करती है. सरकार को बनाने का काम राजनीतिक दल करते हैं. इन दलों के सामने देश की जनता का प्रबंधन करना होता है. किसी भी सूरत में जनता को अनाथ नहीं छोड़ा जा सकता है. ऐसे में उपाय कर के चलना ही समझदारी होती है. अमेरिका जैसे ताकतवर देश भी इस तरह की व्यवस्था कर के चलते हैं.

 

अमेरिका में क्या होता है ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’

अमेरिका में ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ नाम से एक नेता का चुनाव लंबे समय से होता आ रहा है. वैसे अमेरिका का व्हाइट हाउस कभी भी ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ शब्द का इस्तेमाल नहीं करता. वो उन्हें ‘उपस्थित न होने वाला कैबिनेट सदस्य’ कहता है. इस व्यक्ति को एक सुरक्षित और गुप्त स्थान पर रखा जाता है, जहां से वह आपातकालीन स्थिति में काम कर सके.

डोनाल्ड ट्रंप ने जब 20 जनवरी को संयुक्त राज्य अमेरिका के 47वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली तो उन के नए प्रशासन के सभी लोग वहां मौजूद नहीं थे. शपथ ग्रहण समारोह और स्टेट औफ द यूनियन एड्रेस (सालाना भाषण) जैसे आयोजनों के लिए एक ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ चुना जाता है. यह व्यक्ति, आमतौर पर राष्ट्रपति के मंत्रिमंडल का कोई व्यक्ति होता है, जिसे कार्यक्रम में शामिल न होने के लिए चुना जाता है.

जिस से किसी इमरजैंसी में राष्ट्रपति पद का उत्तराधिकार बरकरार रखा जा सके. यह इसलिए किया जाता है कि राष्ट्रपति की मृत्यु या अक्षम होने की स्थिति में उन का उत्तराधिकारी कौन होगा ? वैसे तो उपराष्ट्रपति और सदन के अध्यक्ष सहित लगभग 20 अधिकारियों की सूची है जो राष्ट्रपति पद के उत्तराधिकारी हो सकते हैं. इस के बाद भी ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ उस स्थिति में राष्ट्रपति के पद पर आ सकता है जब वे सभी लोग किसी भयावह घटना में मारे गए हों.

ऐसे बहुत कम मौके होते हैं जब अमेरिका के शीर्ष नेता एक ही कमरे में इकट्ठा होते हैं. आम तौर पर राष्ट्रपति के स्टेट औफ द यूनियन एड्रेस यानी सालाना भाषण में न केवल राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और कांग्रेस के दोनों सदन बल्कि सुप्रीम कोर्ट के सभी 9 न्यायाधीश और राष्ट्रपति के मंत्रिमंडल के सदस्य भी शामिल होते हैं. यह कल्पना करना जितना भयानक है इस तरह के आयोजन के दौरान कैपिटल बिल्डिंग पर टारगेटेड परमाणु हमला या आतंकवादी हमला एक झटके में अमेरिकी संघीय सरकार के लगभग पूरे नेतृत्व को मिटा सकता है.

 

कैसे चुना जाता है डेजिग्नेटेड सर्वाइवर

डेजिग्नेटेड सर्वाइवर का चयन राष्ट्रपति और उन के सलाहकारों द्वारा किया जाता है. इस के लिए आमतौर पर कैबिनेट के किसी सदस्य को चुना जाता है, जो संवैधानिक रूप से राष्ट्रपति पद के लिए पात्र हो. डेजिग्नेटेड सर्वाइवर की पहचान आमतौर पर सार्वजनिक नहीं की जाती है, ताकि उन की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. कुछ मामलों में मीडिया या जनता को इस की जानकारी मिल जाती है.

शपथ ग्रहण समारोह और स्टेट औफ द यूनियन एड्रेस आयोजन के लिए ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ का नाम गुमनाम रखा जाता है. आम तौर पर शपथ ग्रहण के लिए निवर्तमान प्रशासन डेजिग्नेटेड सर्वाइवर को चुनता है. 2021 में जो बाइडन के शपथ ग्रहण समारोह के लिए चुने गए ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ के नाम का कभी खुलासा नहीं किया गया. 2017 में डोनाल्ड ट्रंप के पिछले शपथ ग्रहण समारोह के लिए, दो ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ थे. एक थे रक्षा सचिव जेह जौनसन जिन्हें निवर्तमान राष्ट्रपति बराक ओबामा ने चुना था. दूसरे थे सीनेटर ओरिन हैच जिन्हें ट्रंप ने चुना था.

‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ की परंपरा शीत युद्ध के दौरान शुरू हुई थी, जब परमाणु हमले का खतरा अधिक था. इस का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अगर किसी आपदा या हमले में सरकार के सभी उच्च पदाधिकारी मारे जाएं, तो भी देश का नेतृत्व करने के लिए कोई व्यक्ति मौजूद हो. क्योंकि शीत युद्ध के समय सोवियत संघ के साथ तनाव चरम पर था. उस दौर में यह अकल्पनीय नहीं था कि सोवियत संघ परमाणु हथियार से कैपिटल पर निशाना नहीं साधेगा. माना जाता है कि यह परंपरा कम से कम 1960 के दशक से चली आ रही है.

कांग्रेस ने 1792 में मूल राष्ट्रपति उत्तराधिकार अधिनियम पारित किया, जिस में उपराष्ट्रपति के बाद सीनेट के अस्थायी अध्यक्ष को नोमिनेट किया गया. उस के बाद प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष को नोमिनेट किया गया. इस अधिनियम में 1886 और 1947 में दो बार संशोधन किया गया जब यह उत्तराधिकार के वर्तमान क्रम पर पहुंचा. उपराष्ट्रपति, सदन के अध्यक्ष, सीनेट के अस्थायी अध्यक्ष, उस के बाद राष्ट्रपति के मंत्रिमंडल के सदस्य उसी क्रम में आते हैं जिस क्रम में उन के मंत्रिमंडल के पद बनाए गए थे. जो राज्य सचिव से शुरू हो कर रक्षा सचिव के साथ समाप्त होता है.

2023 में, राष्ट्रपति जो बाइडन के स्टेट औफ द यूनियन एड्रेस के दौरान वाणिज्य सचिव गीना रायमोंडो को ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ चुना गया था. 2016 में, तत्कालीन गृह मंत्री जेह जॉनसन को ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ चुना गया था. यह परंपरा अमेरिकी सरकार की सुरक्षा और उत्तराधिकार सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण उपाय है. व्हाइट हाउस द्वारा स्वीकार किए गए पहले नोमिनेटेड ‘डेजिग्नेटेड सर्वाइवर’ शिक्षा सचिव टेरेल बेल थे, जो राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के 1981 में कांग्रेस के संयुक्त सत्र में दिए गए संबोधन में अनुपस्थित थे, लेकिन काफी समय बाद तक बेल की पहचान नहीं हो पाई थी.

 

मराठा राज रहा प्रभावी:

भारत के इतिहास को देखें तो यह बात आसानी से समझी जा सकती है. जहां सही उत्तराधिकारी नहीं थे वह राज खत्म हो गया. भले ही राजा कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो ? सही उत्तराधिकारी न होने के कारण राज्य खत्म होते देखे गए हैं. इस कारण राजा हमेशा जब बूढ़ा हो जाता था तो अपना उत्तराधिकारी चुन लेता था. जहां सही उत्तराधिकारी नहीं बने वह राज्य खत्म हो गया. मराठा साम्राज्य भी इस का एक उदाहरण है. 17वीं शताब्दी में दक्षिण एशिया के एक बड़े भाग पर मराठों का प्रभाव था. छत्रपति शिवाजी के राज्याभिषेक के बाद अस्तित्व में आया यह राज्य 1761 में पानीपत का तृतीय युद्ध के साथ खत्म होता गया.

17 वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी के नेतृत्व में मराठे प्रमुख हो गए थे. जिन्होंने आदिल शाही वंश के खिलाफ विद्रोह किया और अपनी राजधानी के रूप में रायगढ के साथ एक हिंदवी स्वराज्य का निर्माण किया. शिवाजी के पिता महाबली शहाजी राजे ने उस से पहले तंजावुर पर विजय प्राप्त की थी. जो छत्रपती शिवाजी के सौतेले भाई वेंकोजीराव उर्फ एकोजीराजे को विरासत में मिला था. उस राज्य को तंजावुर मराठा राज्य के रूप में जाना जाता था. बैंगलोर जो 1537 में विजयनगर साम्राज्य के एक जागीरदार, केम्पे गौड़ा द्वारा स्थापित किया गया था, जिस ने विजयनगर साम्राज्य से स्वतंत्रता की घोषणा की थी उसे 1638 में उन के उपसेनापति, शाहजीराजे भोंसले के साथ, रानादुल्ला खान, के नेतृत्व में एक बड़ी आदिल शाही बीजापुर सेना द्वारा कब्जा कर लिया गया था.

मुगल-मराठा युद्धों के दौरान मराठे अपने क्षेत्र को मजबूत करने में सक्षम थे और बाद में मराठा साम्राज्य पूरे भारत में फैल गया. पेशवाओं को मराठा साम्राज्य के प्रधान मंत्री के रूप में काम करने का जब मौका मिला तब मराठा शासन का विस्तार अटक से कटक तक ओर गुजरात से बंगाल दक्षिण से उत्तर से पाकिस्तान पेशावर ध्लाहौर तक फैला हुआ था. छत्रपती ने मुगल सिंहासन को समाप्त करने के लिए सदाशिव राव भाव को दिल्ली भेजा था. 1761 में मराठा सेना ने अफगान दुर्रानी साम्राज्य के अहमद शाह अब्दाली के खिलाफ पानीपत का तीसरा युद्ध हार गए, जिस से उन का अफगानिस्तान में साम्राज्य विस्तार नहीं हो पाया.

ईस्ट इंडिया कंपनी ने पुणे में पेशवा पद के उत्तराधिकार संघर्ष में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया, जिसके कारण, पहला एंग्लो मराठा युद्ध हुआ. जिसमें मराठे विजयी हुए. दूसरा और तीसरा एंग्लो-मराठा युद्ध (1805 से 1818 तक) में उन की पराजय होने तक, मराठे भारत में शक्ति केन्द्र बने रहे. अंगरेजों के सामाने सही उत्तराधिकारी न होने से मराठों का संघर्ष टिक नहीं पाया. मुगल से ले कर मराठों तक कई ऐसे उदाहरण है जहां सही उत्तराधिकारी न होने से पूरा राज्य खत्म हो गया. दूसरों ने उस पर कब्जा कर लिया.

 

राजनीतिक दलों में बढ़ती जिम्मेदारी

देश के आजाद होने के बाद लोकतंत्र में राजषाही खत्म हो गई तो यह जिम्मा राजनीतिक दलों के उपर आ गया. वह देश की जनता की हिफाजत करें. इस में सब से प्रमुख वह दल होता है जो सत्ता में होता है. उस दल में नम्बर दो की हैसियत हमेशा उस पार्टी के प्रमुख यानि राष्ट्रीय अध्यक्ष की होती है. आज केन्द्र में भाजपा की सरकार है. उस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पर सब की निगाह रहती है. भारतीय जनता पार्टी के संविधान के अनुसार प्रत्येक सदस्य को 9 साल के बाद अपनी सदस्यता का नवीनीकरण कराना होता है. इस के तहत प्रधानमंत्री और पार्टी अध्यक्ष को भी अपनी सदस्यता का नवीनीकरण कराना होता है.

राष्ट्रीय अध्यक्ष का कार्यकाल 3 साल का होता है. एक व्यक्ति लगातार 2 बार से ज्यादा इस पद पर रह नहीं सकता है. पार्टी के संविधान की धारा 20 के अनुसार राष्ट्रीय अध्यक्ष को 120 सदस्यों वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन का अधिकार होता है. पार्टी की रणनीति बनाना, चुनावी उम्मीदवारों को चयन करना और संगठन को मजबूत बनाने के लिए काम करने की जिम्मेदारी उस के ही कंधों पर होती है. ऐसे में वह कई बार प्रधानमंत्री के भी ऊपर होता है. जब प्रधानमंत्री उस की पार्टी का हो.

भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष जेपी नड्डा का कार्यकाल 2022 में खत्म हुआ तो उस को 2024 लोकसभा चुनाव तक बढ़ा दिया गया. लोकसभा चुनाव के बाद जब नरेन्द्र मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने तो जेपी नड्डा केन्द्रीय मंत्रिमंडल में शामिल हो गए. भाजपा का पार्टी संविधान कहता है कि एक व्यक्ति एक ही पद पर रह सकता है. जेपी नड्डा 2024 जून माह से लगातार दो पदों पर बने हैं. वह केन्द्रीय मंत्री भी हैं और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाल रहे हैं. ऐसा लग रहा है जैसे भाजपा में राष्ट्रीय अध्यक्ष के लिए दूसरा कोई बेहतर नेता ही नहीं है. इस की वजह यह है कि मोदीशाह की जोड़ी ऐसा राष्ट्रीय अध्यक्ष चाहती है जो उन के अनुसार काम कर सके.

हर पार्टी में प्रमुख नेता अपने आसपास कमजोर नेताओं को रखना चाहते हैं. वैसे यह बात ठीक नहीं होती है. पार्टी में नम्बर दो की हैसियत वाला नेता मजबूत होना चाहिए. जिस से वह इमरजैंसी में देश और पार्टी दोनों को संभाल सके. भारत में पार्टी और सरकार दोनों में ही नम्बर एक पर रहने वाला नेता नम्बर दो पर कमजोर नेता को ही रखना चाहते हैं. इसलिए पार्टी टूटती है. समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश में टूट गई इस की वजह यह थी कि मुलायम सिंह यादव ने अपने समय नम्बर दो रहने वाले नेता शिवपाल यादव की जगह पर अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बना दिया.

अपना दल में विभाजन इस लिए हुआ क्योंकि उस की नेता अनुप्रिया पटेल ने अपनी मां या बहन की जगह पर अपने पति को जिम्मेदारियां सौंप दी. इस के बाद अपना दल एस और अपना दल कमेरावादी में बंट गया. जवाहरलाल नेहरू के बाद जब कांग्रेस में इंदिरा गांधी को उत्तराधिकारी बनाया गया तो कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने पार्टी छोड़ दी. राजनीतिक दल छोटे हो या बड़े उन को अपना पार्टी तंत्र इस तरह से बनाना चाहिए कि नम्बर दो का नेता किसी भी इमरजैंसी को संभालने की हालत में तैयार रहे.

राजनीतिक दलों में पार्टी उपाध्यक्ष के पद पर कमजोर नेता रखे जाते हैं. उस से मजबूत नेता महासचिव के पद पर होते हैं. पार्टी का संविधान पार्टी उपाध्यक्ष को ही सब से प्रमुख मानता है क्योंकि राष्ट्रीय अध्यक्ष के बाद वह ही सब से प्रमुख होता है. उस की जिम्मेदारी अधिक होती है. ऐसे में पार्टी के संगठन और नंबर दो के नेता का मजबूत होना जरूरी होता है. आज के दौर में कोर्ट का दखल हर जगह बढ़ गया है. किसी विवाद का फैसला वहां होता है. ऐसे में एक चूक भारी पड़ती है, जैसे शिवसेना में उत्तराधिकार का विवाद को कोर्ट गया तो पार्टी के चुनाव चिन्ह पर अधिकार एकनाथ शिंदे को मिला. उद्धव ठाकरे हाथ मलते रह गए. ऐसे में राजनीतिक दलों  को अपने संगठन के चुनाव और पदाधिकारियों को ठीक से रखना चाहिए. नहीं तो परेशानी खड़ी होते देर नहीं लगेगी. Bihar Election Result 2025.

SC News: सुप्रीम कोर्ट का एक ऐतिहासिक मामला, जो अदालतों के लिए लैंडमार्क केस बन गया

SC News: अदालतों के इतिहास में कई बार ऐसे मामले सामने आते हैँ जिनमें अदालतों के फैसले अलग अलग होते हैँ. ऐसे कुछ मामलों में जब हाईकोर्ट भी कन्फ्यूज़्ड नजर आता है तब सुप्रीम कोर्ट अदालतों को न्याय का रास्ता दिखाता है. ऐसा ही एक मामला समर घोष और जया घोष का है जिसमें समर घोष ने अपनी पत्नी पर मानसिकता क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक की याचिका दायर की थी. निचली अदालत और हाई कोर्ट इस मामले पर कन्फ्यूज़्ड थे मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मानसिकता क्रूरता की ऐसी व्याख्या की जो आज भी अदालतों के लिए एक लैंडमार्क है.

क्या है पूरा मामला?

समर घोष एक सरकारी अधिकारी थे और जया घोष एक डॉक्टर थीं. दोनों की शादी 1984 में हुई थी, लेकिन वैवाहिक जीवन में कलह बढ़ती गई. समर घोष ने पत्नी पर मानसिक क्रूरता का आरोप लगाते हुए तलाक की मांग की. ट्रायल कोर्ट ने समर घोष की तलाक याचिका खारिज कर दी. समर घोष हाईकोर्ट गये जहाँ उनकी तलाक याचिका स्वीकार कर ली गई और हाईकोर्ट ने समर घोष के पक्ष में फैसला सुना दिया. हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ जया घोष सुप्रीम कोर्ट गईं. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को पलट दिया और समर घोष की तलाक की याचिका ख़ारिज कर दी.

जस्टिस बी.एन. अग्रवाल और पी.पी. नाओते की बेंच ने पाया कि पत्नी के व्यवहार में क्रूरता के सबूत नहीं थे. इस मामले में पत्नी का पति के परिवार से दूरी बनाना या कभी-कभी तीखे शब्द कहना क्रूरता नहीं माना गया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानसिक क्रूरता की अवधारणा समय, संस्कृति और सामाजिक परिवर्तनों के साथ बदलती रहती है. इसे स्थाई रूप से परिभाषित नहीं किया जा सकता.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इरिट्रीवेबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज को तलाक का स्वतंत्र आधार मानने से इनकार किया क्योंकि हिंदू विवाह अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है.

इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने मानसिक क्रूरता को समझाने के लिए 16 उदाहरण दिए.

  1. वैवाहिक दायित्वों से लगातार इनकार (Persistent denial of marital obligations)
  2. लंबे समय तक शारीरिक संबंध से इनकार बिना उचित कारण (Unilateral refusal of physical intimacy without consent)
  3. एकतरफा फैसला लेकर दूसरे को सूचित न करना (Unilateral decision affecting matrimonial home without consent)
  4. झूठे या परेशान करने वाले आरोप लगाना (False and vexatious allegations)
  5. पति/पत्नी को सामाजिक रूप से अपमानित करना (Social humiliation)
  6. लंबे समय का अलगाव (Long periods of separation without reason)
  7. घरेलू हिंसा या धमकी (Threats of violence)
  8. मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने वाले व्यवहार (Conduct causing mental agony)
  9. धार्मिक या सांस्कृतिक विश्वासों का अपमान (Insult to religious beliefs)
  10. आर्थिक शोषण या संपत्ति पर अनुचित दावा (Unreasonable material demands)
  11. बच्चों का उपयोग हथियार के रूप में (Using children as pawns)
  12. नौकरी या करियर में बाधा डालना (Interference in career)
  13. बार-बार तलाक की धमकी (Repeated threats of divorce)
  14. परिवार के सदस्यों के साथ दुर्व्यवहार (Ill-treatment of family members)
  15. सामाजिक बहिष्कार (Social ostracism)
  16. अन्य कोई व्यवहार जो विवाह को असहनीय बना दे (Any conduct making cohabitation impossible)

मानसिक क्रूरता को परिभाषित करने में सुप्रीम कोर्ट के ये उदाहरण अदालतों को मार्गदर्शन देते हैं. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार मानसिक क्रूरता परिस्थितियों पर निर्भर करती है. यह केस मानसिक क्रूरता को शारीरिक क्रूरता के समान महत्वपूर्ण मानता है.

समर घोष बनाम जया घोष का यह मामला भारतीय कानून में एक महत्वपूर्ण लैंडमार्क केस बन गया है, जो हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13(1)(ia) के तहत मानसिक क्रूरता (Mental Cruelty) की व्याख्या करता है. इस केस ने Divorce के मामलों में मानसिक क्रूरता को परिभाषित किया. तलाक के कई मामलों में इस केस को उदाहरण के तौर पर लिया जाता है. SC News.

Hindi Vyangya: व्यंग्य- फर्जी हुई तो क्या हुआ

Hindi Vyangya: हमारे महल्ले के वरिष्ठ नागरिकों के पास एकदूसरे की टांग खींचने के सिवा कोई काम नहीं. दूसरे काम वे कर भी नहीं सकते. सुबह चाय ली और लग गए आज जिस की टांग खींचनी है, उस प्रोजैक्ट पर काम करने. चाय के बाद बैठे तो प्रभु पूजन को परलोक सुधारने के लिए, लेकिन दिमाग में प्रोजैक्ट वही. बैठे हैं प्रभु भजन को, सोचन रहे टांग. वैसे, गीता में कहा भी है कि कर्म ही पूजा है. यहां कुकर्म/सुकर्म कुछ नहीं. सब व्यक्ति सापेक्ष है. जो बलवान है उस के कुकर्म सुकर्मों से भी आगे का फल देते हैं.

फिर लंच किया और दो घड़ी सुस्तातेसुस्ताते भी लगे रहे किसी की टांग खींचने के प्लान को अमली जामा पहनाने, भले ही खुद उस वक्त पाजामा पहना हो या न. रात को डिनर किया और डिनर के बाद बिस्तर पर पड़ेपड़े करते रहे मंथन कि आज जिस की टांग खींची थी, उस में कहां, कैसे, क्या तकनीकी कमी रह गई थी जो टांग खींचने के बदले उस की टांग मरोड़ने के बाद भी मजा नहीं आया ताकि कल जो किसी की टांग खींची जाए तो वह कमी न रहे.

इसी क्रम के उपक्रम में हर रोज आठ पहर चौबीस घंटे अपने महल्ले के कुछ खास वरिष्ठ टाइप के वरिष्ठ चैलेंज देते हुए दूसरों की टांग खींचने का परमानंद लेते हैं तो कुछ दब्बू टाइप के टांगखेंचू या सरेआम जिन में टांग खींचने का दुस्साहस नहीं होता वे परोक्ष में किसी दूसरे की टांग पर अपनी टांग रख दूसरों की टांग खींचने का जौहर दिखाते हैं.

निर्लिप्त भाव के टांग खेंचुओं की सब से बड़ी तमन्ना, बस, यही होती है कि उन्हें बातबेबात किसी की भी टांग खींचने का नियमित जौब मिलता रहे तो वे स्वर्ग (अगर कहीं है तो) में. जबजब उन की यह इच्छा पूरी हो जाए तो वे तब तक उस की टांग खींचने से नहीं छोड़ते जब तक उन्हें कोई अगली टांग खींचने को नहीं मिल जाती. जो ऐसा न हो तो वे गुस्से में अपने समय को कोसते हुए अपनी ही टांग खींच लेते हैं, अपने समय को सौसौ जूते मारते हुए.

तो जनाब! किसी की भी, कभी भी, कहीं भी टांग खींचने के मामले में मेरे और उन के बीच एमओयू साइन हुआ है. इसलिए मैं और वे एकदूसरे के टांगखींची दोस्त हैं. हम दोनों पूरी ईमानदारी व निष्ठा से दूसरों की टांग मिल कर खींचते हैं. जो आज के दौर में मिल कर कोई भी काम करें, उन की जीत पक्की नहीं, बिलकुल पक्की होती है. संघे शक्ति ठगेयुगे! वैसे, चोरीचोरी हम एकदूसरे की टांग भी कभीकभार खींच लेते हैं. ऐसा करने से टांग खींचने की मौक रिहर्सल हो जाती है. कल वे चाय पीने के बहाने मुझे गुप्त सूचना देने आए. आते ही बोले, ‘यार, महल्ले के सीनियरों से सीनियरों का एक धड़ा तुम्हारी डिग्री की टांग खींचने की तैयारी में है. वे कह रहे हैं, ‘तेरी डिग्री फर्जी है.’

‘कहने दो, मैं तो उसी डिग्री के सहारे 30 साल तक सीना तान कर प्रोफैसरी कर के ससम्मान रिटायर भी हो चुका हूं. अब रिटायरमैंट के बाद क्या असली, क्या नकली. कुत्तों को भूंकने से और विपक्ष को हमजैसों पर कीचड़ उछालने से कौन रोक सकता है भला,’ मैं ने अपनी पीठ खुद ही ठोकते हुए कहा.

‘मतलब?’

‘ मतलब यह कि असली यहां आज है ही कौन? यहां न संस्कार असली हैं न चमत्कार असली. ऐसे में पता नहीं इन्हें किसी की डिग्री को चैंलेज करने से मिलता क्या है? अरे, हर डिग्री एक कागज का टुकड़ा ही तो है. चाहे असली हो या नकली. डिग्री फर्जी भी होगी तो मेरी ही है न! उन की तो नहीं है न! जब मैं ही किसी की असली डिग्री को चैलेंज नहीं कर रहा तो वे मेरी डिग्री की असलियत या उस के फर्जीपने को ललकारने का कोई नैतिक अधिकार नहीं रखते. जिन की असली डिग्रियां हों वे संभाले रहें अपनी असली डिग्रियां, अपनी छाती से लगाएचिपकाए अपने पास और खाते रहें औफिसऔफिस धक्के. देते रहें इस को उस को जस्टिफिकेशन कि साहब, मेरी डिग्री सोलह आने टंच हैं. पर जो सब के पास असली डिग्रियां होने लगें तो देश में असली डिग्रियों वाले कागज की कमी पड़ जाए. असली डिग्रियां छापने को स्याही विदेश से मंगवानी पड़े. विश्वविद्यालयों में उन का रिकौर्ड मेनटेन करने को रजिस्टर कम पड़ जाएं. अच्छा तो एक बात बताओ, यहां असली डिग्रियों से आज तक कौन बड़ा हुआ? असली डिग्री वाले भी कुछ न कुछ सपोर्टिंग अपने पास फर्जी रख ही लेते हैं वक्त पर काम आने के लिए. आदमी डिग्रियों से बड़ा नहीं होता, आदमी बड़ा होता है तो पढ़ेलिखों को उल्लू बनाने से. और वह मैं मजे से बनाता रहा हूं, बनाता रहूंगा. तुम ने मदारी का खेल देखा है क्या?’

‘हां,बचपन में देखा था.’

‘उस के खेल को देख अधिकतर कौन तालियां बजाते हैं?’

‘पढ़ेलिखे ही ज्यादा, पर इस का मतलब…?’

‘मतलब यह कि यहां दुनियादारी की बाजीगरी सिर चढ़ कर बोलती है, असली डिग्री नहीं. सर्वोच्च राजनीतिक पद पर बैठे व्यक्ति के पास असली डिग्री है क्या! इसलिए फर्जी हुई तो क्या हुआ, खाए मोतीचूर. असली को भी छाया दे, फर्जी पर मुझे गरूर,’ मैं ने उपदेशक हो कहा तो उन्होंने मुझ से बड़े होने के बाद भी सादर मेरे पावं छुए और बिन चाय पिए ही वहां से नौ दो बारह हो लिए.

एड़ियां ऊंची करने से कोई ऊंचा थोड़े ही हो जाया करता है, मित्रो! इस के लिए कीचड़ से नींव होना जरूरी होता है. Hindi Vyangya.

Funny Hindi Story: व्यंग्य- चोरी की प्रजातियां और भारतरत्न

Funny Hindi Story: उस प्रदर्शनी में हर देश ने अपनीअपनी कारीगरी दिखाई थी. अमेरिका, जापान आदि तमाम देशों ने अपनेअपने उत्पाद सजाए हुए थे. एक जापानी खिलौने पर सारी दुनिया के लोगों की नजरें थीं जो इलैक्ट्रौनिक तकनीक से बनाया गया था. जापानी अपनी इस सफलता पर गौरवान्वित हो रहे थे कि तभी एक भारतीय ने उस स्टौल पर खड़े 2 जापानियों की नजर बचाते हुए उस पर एक टैग लगा दिया : ‘मेड इन इंडिया’.

लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा और वे जापानी हैरत में पड़ गए कि यह सब एक पल में कैसे हो गया.खैर, उन्होंने भारतीयों के दर्शन पर अध्ययन शुरू किया तो पाया कि जब यहां पहली बार मानव उत्पाद लौंच किया गया था, हमारे ग्रेट ग्रैंड अंकलों ने तभी से यह टैगिंग शुरू कर दी थी. नतीजा यह हुआ कि बहुत कम समय में यहां ढेरों जातियां बनीं जो आज फलफूल कर हजारोंलाखों में पहुंच चुकी हैं.

हद तो यह है कि उन की देखादेखी चोरी और गबन जैसे अपराधों तक की भी तमाम जातियां, प्रजातियां उग आई हैं. चोरी एक अपराध होते हुए भी ऊंची, नीची और सामान्य, तमाम जातियों में विभक्त हो चुकी है. कद्दू, लुटिया, भैंस की चोरियां गंवई मानी जाती हैं. जबकि बाइक, कार, चेन की चोरियां शहरी. मंदिर से प्रसाद की चोरी धार्मिक, अष्टधातु मूर्तियों की चोरी कलात्मक, मरघट पर अर्थियों के शेष बांसों की चोरी आध्यात्मिक मानी जाती है. कफनचोरी बुनकर जाति और पूरे ताबूत की चोरी एक वीआईपी जाति की मानी जाती है. जब कोई गारमैंट चोर कोई गारमैंट मय धारक के चुरा लाता है तो वह संवेदनशील चोरी होती है, जिसे कुछ लोग अपहरण कह कर पुकारते हैं. करचोरी अमीर जाति की मानी जाती है.

नजरें चुराना बगला चोरी कहलाती है, रूपचोरी अत्यंत लोकप्रिय होती है. गुर्दाचोरी डाक्टर जाति की होती है. दिलचोरी हंस जाति की, पर मय दिलदार की चोरी श्रेष्ठतम मानी गई है. वह प्यार और शादी के कीर्तिमान तक स्थापित कर सकती है.कामचोरी की जाति दरिद्र मानी गई है. इस के वाहक परजीवी (पैरासाइट्स) कहलाते हैं. यह सरकारी विभागों में वास करती है, पर इस की कमी दूसरी कर्मठ चोरियां पूरी करती रहती हैं. लिहाजा, सरकारें 60-65 दिनों की हड़तालों के बावजूद सुचारु रूप से चला करती हैं, इस के बावजूद तमाम काम जिस चोरी से चला करते हैं वह डिटैक्टिव चोरी कहलाती है. हाल में एक रिश्वत को चोरी का जामा पहनाने की भी कोशिश की गई है. यह चोरी किस प्रजाति की है, तय नहीं हो पाया है.

शब्दों, विचारों आदि की चोरी सर्वोच्च जाति की मानी गई है. कवि, शायर, लेखक और व्यंग्यकार इसी श्रेणी में आते हैं. चोरी में मिलावटखोरी तो सोने में सुहागे का काम करती है. मजे की बात तो यह है कि रचना की मौलिकता का शपथपत्र लिए वे लाखों लोग लाइन में लगे मिलते हैं जो माल एक, ब्रांड सौ, रैपर हजार और पैकिंग लाख वाली मसल में विश्वास करते हैं, पर इस के बावजूद कुछ लोग विशुद्ध चोरी के उपासक होते हैं. एक बड़े अंगरेजी अंतर्राष्ट्रीय दैनिक के सहसंपादक ने एक दशक पहले इंगलैंड के एक टैब्लौयड का एक आर्टिकल चोरी कर के बिना किसी मिलावट के हूबहू अपने पत्र में छपवा डाला था.

अत: उन को वांछित प्रशस्तिपत्र के साथ जो ससम्मान विदाई दी गई थी, मैं आज तक नहीं भुला सका हूं. ऐसी चोरियां गुरूघंटालों के दिल में वास करती हैं. वैसे आजकल मिलावटी वाली ज्यादा प्रचलन में हैं जिन के पकड़े जाने की संभावनाएं न के बराबर होती हैं. उन पर तमाम इनामों की व्यवस्था अलग से हुआ करती है.मु झे इस धंधे में पड़े लगभग 48 साल हो चुके हैं, पर कभी पकड़ा नहीं गया इसलिए अभी भी शाह ही कहलाता आ रहा हूं. हां, जब कभी इनाम की लालसा की तो दोस्त रूपी दुश्मनों ने और समझाया, हताश किया, ‘उस के लिए दारू, पैलगी, खुशामद और सैटिंग जैसी तमाम औपचारिकताएं तुम्हारे वश की बात    नहीं है.’

हां, कुछ दोस्तों ने यह दिलासा अवश्य दिलाया, ‘संभव है कि पिछले दिनों भारतरत्न पर मची छीछालेदर से आहत कुछ लोग संसद में एक ऐसा प्रस्ताव ले आएं कि हर वरिष्ठ नागरिक की उम्र को ही एक योग्यता मान कर एक भारतरत्न बांटा जाए तो उस दशा में तुम्हारा नंबर  जरूर लग सकता है.’ Funny Hindi Story.

Hindi Satire: व्यंग्य- साधु बने स्वादु

Hindi Satire: फीता कटा, फ्लैशगनें चमकीं, तालियां बजीं. मेजबान ने स्वामीजी के चरण छुए और आशीर्वाद प्राप्त किया. बाद में उन्हें ले कर आभूषणों का अपना आलीशान शोरूम दिखाने लगा.आजकल यह दृश्य आम हो गया है.

अब दुकानों, शोरूमों का उद्घाटन करने के लिए झक सफेद कपड़ों वाले नेता जी या मंत्री जी की जरूरत नहीं रह गई है बल्कि यह काम गेरुए वस्त्रों में लिपटा साधु करता है. दुनिया भर को मोह-माया से दूर रहने के कड़वे उपदेश पिलाने वाले बाबा इन दिनों दुकानों, पार्लरों के फीते काट रहे हैं. हंस-हंस कर फोटो खिंचवा रहे हैं. धनिकों को साधु रखने का शौक होता है.

जैसे चौकीदार रखा, रसोइया रखा, माली रखा उसी तर्ज पर एक स्वामी भी रख लिया. बस, उसे डांटते नहीं हैं, उस पर हुक्म नहीं चलाते. उधर दुनियादारी को त्याग चुका साधु भी इन दुनियादारों के यहां पड़ा रहता है. उन के खर्चे से सैर-सपाटे करता रहता है. आखिर अनमोल प्रवचनों का पारिश्रमिक तो उसे वसूलना ही है. साधु कभी भी गरीबों के यहां निवास नहीं करते. इस की वजह वे बताते हैं कि गरीबों पर आर्थिक बोझ न पड़े इसलिए. पर वे तो साधारण आर्थिक स्थिति वालों के यहां भी नहीं रुकते.

दरअसल, साधारण आदमी उन की फाइव स्टार सेवा नहीं कर सकता. साधुओं का यह माया प्रेम नहीं तो और क्या है?‘‘भक्त का अनुरोध मानना ही पड़ता है,’’ साधुओं का जवाब होता है, ‘‘वह दिन-रात हमारी सेवा करता है, हमारी सुखसुविधा का ख्याल रखता है. क्या हम उस के लिए एक फीता नहीं काट सकते? हमारा काम ही आशीर्वाद देना है.’’‘‘पर आप तो जनता से मोह-माया से मुक्त होने का आह्वान करते हैं.’’‘‘करते हैं ना. तब भी करते हैं जब किसी शोरूम का उद्घाटन करने जाते हैं.’’‘

‘जो भक्त माया इकट्ठी करने में लगा हो उसे आप अपरिग्रह का उपदेश क्यों नहीं देते?’’‘‘देते हैं. जब उस के पास उस की आवश्यकताओं से अधिक धन हो जाए तभी वह अपरिग्रह की ओर मुड़ेगा. हर एक की तृप्ति का स्तर अलग-अलग होता है. जब उस की इच्छाएं तृप्त हो जाएंगी तो वह अपनी सारी दौलत रास्ते में लुटा देगा.’’‘‘और आप की तरह दीक्षा ले लेगा. पर संन्यास लेने से पहले इस तरह का वैभव प्रदर्शन करने के बजाय क्या वह इस धन से कोई स्कूल या अस्पताल नहीं बनवा सकता?’’

साधु के पास इस का जवाब कभी नहीं होता है. जो लोग भूखे को रोटी देने के बजाय कुत्ते को देते हैं वे संन्यास लेने से पहले लोगों को अपने लुटाए हुए हीरे-जवाहरातों पर कुत्तों की तरह टूटते देखकर फूले नहीं समाते. यह मानवता का अपमान नहीं तो क्या है?जब चातुर्मास का मौसम आता है तो मोह-माया से मुक्त ये साधु बैंड-बाजे सहित मोह-माया की दुनिया में आते हैं और तड़क-भड़क भरे हॉल में अपने भक्तों से सांसारिक बंधनों से मुक्त होने का आह्वान करते हैं.

क्या इन बैरागियों को इतना भी नहीं मालूम कि जिन भक्तों को उनके प्रवचनों से लाभ उठाना होगा, वे खुद चल कर उन के आश्रम में आएंगे? हां, इन्हें इतना तो मालूम है कि न तो इन के उपदेशों में ताकत है और न ही इन के भक्त इतने बेवकूफ हैं कि अपनी मोटी कमाई छोड़ कर इन के नीरस प्रवचन सुनें, इसलिए कुआं खुद ही सांसारिक सुखों से तर गले वालों के पास चला आता है. भक्त लोग भी इन के भाषण सिनेमा या नाटक देखने की तर्ज पर सुनने चले आते हैं.  ऐसे ही मोह-माया के संसार में घुसने को छटपटा रहे एक साधु से मैं ने बातचीत की. मैं ने उसे सिर्फ नमस्कार किया, चरण नहीं छुए.

मैं ने देखा कि उस के चेहरे पर नाराजगी के भाव थे. उस के चेले-चपाटे भी खुश नहीं दिखे बातचीत के दौरान मैं ने उस से पूछ ही लिया, ‘‘आप मेरे अभिवादन के तरीके से खुश नजर नहीं आए?’’‘‘हां, बड़े-बड़े उद्योगपति, राजनेता मेरे पैर छूते हैं और तुम ने ऐसे नमस्कार किया जैसे किसी दोस्त को हैलो-हाय कर रहे हो. यह तो भारतीय परंपरा नहीं है किसी आदरणीय व्यक्ति का अभिवादन करने की.’’‘‘आप तो संन्यासी हैं. आप ने सांसारिक विकृतियों पर विजय पाई है.

आप को क्रोध क्यों आया?’’ मैं ने तड़ाक से सवाल किया जिसे सुन कर उन के चेलों ने मुझे बदतमीज, पापी कहा.‘‘आप जब अपने शिष्यों को क्रोध पर विजय प्राप्त करना नहीं सिखा सके तो दुनिया को क्या सिखा पाएंगे?’’‘‘बदतमीज, इतने बड़े स्वामी जी से बोलने का यह कोई तरीका है? जानता नहीं, बड़े-बड़े लोग इन के पैर छूते हैं?’’ एक शिष्य भड़का.‘‘यानी इन्हें घमंड है कि बड़े-बड़े लोग इन के पैर छूते हैं. इसे ही शायद मद कहते हैं.’’

‘‘पापी, जानता नहीं कि ये सांसारिक मोहमाया से परे हैं? हजारों लोग इन के चरणों में चांदी, सोना, हीरे चढ़ाते हैं, देखा नहीं? चलो हटो, दूसरों को आने दो,’’ और भक्तों ने मुझे चढ़ावे में आया धन बताया.‘‘नहीं, आप के ये स्वामीजी मद, लोभ और क्रोध से मुक्त नहीं हुए हैं. बार-बार ये समाज में लौटते हैं. इस का मतलब यह है कि ये मोह से मुक्त नहीं हुए हैं. क्या जरूरत है इन्हें समाज में आने की, जिसे इन्होंने त्याग दिया है?’’

‘‘आप यहां से चले जाइए वरना किसी ने कुछ कर दिया तो हम जिम्मेदार नहीं होंगे,’’ मुझे चेतावनी दी गई.मैं कहना चाहता था कि जब आप क्रोध, लोभ, मद और मोह से मुक्त नहीं हैं तो काम से भी मुक्त नहीं होंगे. फिर यह साधु का मेकअप क्यों? पर मुझे धक्के मार कर निकाल दिया गया. मेरा विश्वास है कि सब से ज्यादा सांसारिक सुखों में लीन ये साधु स्वामी ही हैं. बिना कुछ किए, सिर्फ गैर व्यावहारिक भाषण झड़ कर ये ऐशो-आराम से रहते हैं. इन के आश्रम सभी सुख सुविधाओं से युक्त रहते हैं.

भोग और संभोग की पूरी व्यवस्था रहती है. इसीलिए तो जिन-जिन आश्रमों पर पुलिस के छापे पड़े हैं, आपत्तिजनक सामग्री बरामद हुई है. एक साधु के आश्रम में शराब, ब्लू फिल्में और लड़कियां मिलने का क्या मतलब है? ये पाखंडी लोग दुनिया की कठिनाइयों से नहीं लड़ सकते और समाज से पलायन कर जाते हैं. पर एकांत में सांसारिक सुख और भी याद आते हैं इसलिए किसी न किसी बहाने ये समाज में लौटते हैं. कभी चातुर्मास के बहाने या किसी दुकान का उद्घाटन करने या किसी भक्त के विवाह में आशीर्वाद देने के बहाने. इन के आश्रम अपराधियों के क्लब होते हैं.

राजनेता, तस्कर, मिलावट- बाज, काला बाजारिए, सट्टेबाज इन के यहां आपस में मिलते हैं और अपने भावी कार्यक्रम तय करते हैं. क्या जरूरत है किसी मंत्री को इन के आश्रम में जाने की और इन का आशीर्वाद पाने की? आम आदमी को तो ये साधु कभी आश्रम में बुला कर आशीर्वाद नहीं देते. इन के आश्रम सिर्फ पूंजीपतियों, राजनेताओं के लिए ही खुले होते हैं.

आम आदमी को ये सिर्फ दर्शन देते हैं. इन के आश्रम में सिर्फ पूंजीपतियों की एयरकंडीशंड कारें तैनात रहती हैं. ये पाखंडी स्वामी यों तो समाज सुधार का ढिंढोरा पीटते रहते हैं पर आज तक कोई साधु किसी समस्याग्रस्त झोपड़पट्टी में नहीं गया है, बाढ़ पीड़ित क्षेत्र में नहीं गया है, महामारी प्रभावित क्षेत्र में कदम तक नहीं रखा है. और तो और इन्होंने कभी किसी मलिन बस्ती में अपना प्रवचन भी नहीं दिया है क्योंकि वहां ग्लैमर नहीं है, प्रसिद्धि नहीं है, माल नहीं है, माया नहीं है जिस के लिए ये मरे जाते हैं. Hindi Satire.

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