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Hindi Satire Story : बैकबेंचर्स – अब इन स्टूडेंट्स का क्या होगा?

Hindi Satire Story : जब से केरल में सर्कुलर जारी हुआ है कि क्लास रूम में अब कोई बैकबेंचर नहीं होगा तब से बैकबेंचर्स की नींद उड़ गई है. कैसे लेंगे वे पीछे बैठ कर मस्ती करने का सुख?

जब से यह पता चला है कि केरल में अब कोई बैकबेंचर नहीं होगा, मैं चिंता में हूं. खुश होने वाले खुश भी हैं. जो खुश हैं, शायद उन्होंने बैकबेंचर होने का आनंद नहीं लिया है. उन से जीवन में बहुत कुछ छूट गया है.

न्यूज यह है कि केरल के कुछ विद्यालयों में अब क्लास रूम में फ्रंट बेंचर और बैकबेंचर के बीच का अंतर खत्म किया जा रहा है, यह पीछे की सीट का आनंद उठाने वाले स्टूडेंट्स के साथ अन्याय है. इस के लिए स्कूलों में सेमी सर्कुलर सीटिंग व्यवस्था शुरू कर दी गई है. यह आइडिया 2024 की मलयालम फिल्म ‘स्थानानार्थी  श्रीकुट्टन’ से लिया गया है.

फिल्म में एक बैकबेंचर स्टूडेंट श्रीकुट्टन स्कूल इलेक्शन में एक फ्रंट बेंचर को चुनौती देता है. वह साइंस फेयर में सेमी सर्कुलर सीटिंग का सुझाव देता है जिस से स्टूडेंट्स में भेदभाव न हो. फिल्म के अंत में स्कूल इस सु झाव को अपना लेता है. अब तक केरल के 8 स्कूलों और पंजाब के एक स्कूल ने अपनी क्लासरूम व्यवस्था बदल दी है. मतलब, खुशी खुशी पीछे बैठ कर मस्ती करने वाले काफी स्टूडेंट की मौज पर रोक लग चुकी है.

नई व्यवस्था से टीचर्स भी संतुष्ट हैं. वे कह रहे हैं कि इस से स्टूडेंट्स पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देंगे, उन का बैठने का तरीका सुधरा है और पढ़ाई का माहौल ज्यादा प्रभावी हो गया है. फिल्म के डायरेक्टर कहते हैं, ‘हमें नहीं लगा था कि फिल्म का ऐसा सामाजिक असर होगा. अब यह नेशनल स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है. हम बहुत खुश हैं.’ भाई, होंगे आप खुश, कोई बैकबेंचर्स से भी पूछ ले कि क्या वे इस व्यवस्था से खुश हैं? उन का कितना सुख, कितने अनुभव उन से छीन लिए जाएंगे. उन के माता पिता तो उन्हें अभी से चिढ़ाने लगे हैं. पापा लोग कह रहे हैं कि ‘भाई, स्कूल तो हम ने एंजॉय किया है. आहा, क्या दिन थे’ और मम्मी लोग तो पता नहीं क्या याद कर के शरमाए जा रही हैं. पापा लोगों के चेहरे पर बैकबेंचर सुनते ही एक रौनक आ जाती है.

मम्मी पापा के प्राचीन काल से चले आ रहे डायलौग ‘हमारे जमाने में तो’ वाले अखंड पाठ में एक और डायलॉग जुड़ गया है जिसे वे आगे जा कर गर्व से ऐसे कहेंगे, ‘हम तो बैकबेंचर्स हुआ करते थे, स्टूडेंट लाइफ तो हम ने एंजॉय की है. तुम क्या जानो, हम तो टीचर के मुड़ते ही ब्लैकबोर्ड पर चौक से ऐसा निशाना लगाते थे कि टीचर तो छोड़ो, अगल बगल के दोस्तों को छोड़ कर बाकी स्टूडेंट्स को भी पता नहीं लग पाता था कि क्लास में यह अर्जुन कौन है. जलनखोर स्टूडेंट चाह कर भी पता नहीं कर पाते थे कि उन पर कागज से हेलीकॉप्टर बना कर किस ने फेंका.’

पापा लोग दोस्तों के साथ बैठ कर अपने अपने दिन याद करेंगे कि उन के लव नोट्स आगे पास करने में पहले की सीटिंग व्यवस्था ने कितनी अहम भूमिका निभाई है. ओह. नई सीटिंग व्यवस्था तो प्यार की छोटी छोटी चिट्ठियां भी बंद करवा देगी. आज भले ही चिट्ठियों की  जगह मोबाइल ने ले ली हो, पर टीचर के सामने बैठ कर तो मोबाइल भी बंद हुआ ही सम झो. पर किशोर प्रेम के दिन, कुछ घंटों पर तो रोक लग ही जाएगी. मम्मी लोगों को पता नहीं कौन कौन याद आएगा कि पहले की सीटिंग व्यवस्था में फलाने ने कैसे पीछे से चिट्ठी दी थी, फलाना आता जाता कैसे देखता था, कितना अच्छा लगता था लेकिन था बैकबेंचर. किसी को क्या पता वह अपनी हाजिरी लगा कर उसे खिड़की के बाहर से देखने के लिए पीछे से निकल कर भाग जाने के लिए ही बैकबेंचर बना था. कोई कहेगा, भाई, हम तो टीचर के पढ़ाते पढ़ाते ही पीछे बैठ कर खा भी लेते थे. बैकबेंचर्स होने के फायदे अपने बड़ों के मुंह से सुनते हुए जेन जी को कितना बुरा लगेगा.

स्टूडेंट्स, जो जानबू झ कर पीछे बैठते थे, कम परेशान नहीं हैं, उन्हें यह चिंता हो रही है कि अच्छे भले क्लास में पीछे बैठ कर रील्स देख लिया करते थे, व्हाट्सएप चलता रहता था, अब क्या होगा? फ्रंट बेंचर्स बैकबेंचर्स को ऐसे देख रहे हैं कि अब बैठो हमारे साथ, अब मजा आएगा. अब तुम लोगों की मस्ती बंद होगी. बस, वही स्टूडेंट्स खुश दिख रहे हैं जिन्हें आगे बैठना होता था पर सीटिंग व्यवस्था के कारण मौज मस्ती करने वाले बैकबेंचर्स के साथ पीछे बैठना पड़ता था.

यह तो अच्छा है कि यह बदलाव आज के जमाने में हुआ, मम्मी पापा के जमाने में हुआ होता तो न जाने कितनी कहानियां, कितनी फिल्में, कितने गाने बिना बने ही रह जाते. कुछ भी कहो, किशोर प्रेम इसी उम्र में होता है. जब तक छिप छिप कर कोई कनखियों से देखे न, टीचर से बच कर एकदूसरे को इशारा न करे, तब तक स्टूडेंट लाइफ का मजा ही क्या. खैर, अब फ्रंट बेंचर्स जानें या बैकबेंचर्स, नियम तो स्टूडेंट्स की भलाई के लिए ही बनाए गए हैं, उन्हें भी पढ़ते पढ़ते आदत पड़ ही जाएगी. बस, उन के मम्मीपापा को अपने बच्चों के सामने अपनी शेखी बघारने के और किस्से मिल गए. Hindi Satire Story :

Bodily Autonomy : औरतों के जिस्म पर मर्दों की मर्जी क्यों ?

Bodily Autonomy : शादी के बाद पति को अपनी पत्नी के साथ कुछ भी करने का अधिकार मिल जाता है. भारतीय समाज में शादी का मतलब यही है. सवाल यह है कि क्या शादीशुदा होने के बाद पत्नी शारीरिक संबंध बनाने से इनकार कर सकती है? क्या पति को यह अधिकार है कि वह अपनी पत्नी की मरजी के बिना उस से सैक्स संबंध बना सके? क्या इसे बलात्कार नहीं माना जाएगा? क्या कहता है कानून, आइए जानते हैं.
मर्दों की बनाई सामाजिक व्यवस्था में औरतें सिर्फ ऑब्जेक्ट ही हुआ करती थीं. दहेज का भार लड़की के वजन से कम होने पर उसे छोड़ दिया जाता या जला दिया जाता था. पुराने जमाने में औरतें भोग की वस्तु से ज्यादा कुछ न थीं. भारतीय समाज में कन्या को दान में देने की मान्यताएं आज भी मौजूद हैं. आजादी के बाद बदलते दौर के हिसाब से कानून बदले और नारी की स्थिति में बदलाव आया. कॉन्स्टिट्यूशन ने औरतों को भी इंसान माना और बराबरी से जीने का अधिकार दिया लेकिन समाज आज भी औरतों को इंसान मानने को तैयार नहीं. कई बार ऐसे मामले सामने आते हैं जिन में औरतों को सिर्फ ऑब्जेक्ट ही समझा जाता है.
झांसी में एक औरत को उस के पति ने शारीरिक संबंध बनाने से मना करने पर तीसरी मंजिल से नीचे फेंक दिया. इस जोड़े ने 3 साल पहले मंदिर में सात फेरे ले कर एक दूजे का हाथ थामा था. 3 साल में ही दोनों के बीच का यह प्रेम संबंध एक डिजास्टर बन गया. पत्नी ने सैक्स के लिए मना किया तो पति ने उसे तीसरी मंजिल से नीचे फेंक दिया. फिलहाल गंभीर हालत में महिला को अस्पताल में भर्ती कराया गया है जहां उसका इलाज जारी है.
यह घटना मर्दवादी मानसिकता का एक उदाहरण है. शादीशुदा जोड़ों के बीच सैक्स संबंध जरूरी है लेकिन शादी का मतलब सिर्फ सैक्स की पूर्ति नहीं होता. सैक्स संबंध अगर दोनों पार्टनर की रजामंदी से बने तो यह दुनिया की सबसे खूबसूरत चीज होती है लेकिन अगर सैक्स के लिए कोई एक पार्टनर तैयार न हो तो यह बलात्कार जैसा ही होता है.
कई बार पत्नी की मरजी न होने पर भी वह पति की भावनाओं का खयाल कर सैक्स के लिए अनुमति दे देती है लेकिन ऐसा बार बार होने पर पत्नी का सैक्स के प्रति रुझान कम होने लगता है. औरतों की इस समस्या को मर्द नहीं समझते और वे जबरदस्ती पर उतर आते हैं. पत्नी से संभोग करना पति अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है, इसलिए भारत में मैरिटल रेप आम बात है.
कई मामलों में मनमुटाव या किसी अन्य कारण से भी पत्नियां शारीरिक संबंध से दूरी बना लेती हैं जिस से पति तनाव में जीने लगते हैं. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार अगर किसी शादीशुदा जोड़े के बीच बिना उचित कारण के लंबे वक्त तक शारीरिक संबंध नहीं है और इसे ले कर पति तनाव में जी रहा है तो इसे मानसिक क्रूरता (मैंटल क्रूएल्टी) की श्रेणी में माना जा सकता है जो तलाक के लिए एक आधार बन सकता है.
पत्नी से सैक्स की पूर्ति नहीं होने के कारण पति मानसिक तनाव में चले जाते हैं और कानून इसे मानसिक क्रूरता मान भी लेता है लेकिन कानून की नजर में बालिग पत्नी के साथ उस की मरजी के खिलाफ सैक्स करना कोई अपराध नहीं है. क्या यह कानून का विरोधाभासी चरित्र नहीं है?
विद्या विश्वनाथन बनाम कार्तिक बालकृष्णन मामला
विद्या विश्वनाथन और कार्तिक बालकृष्णन की शादी 6 अप्रैल, 2005 को चेन्नई में हिंदू रीति-रिवाजों से हुई थी. शादी के बाद दोनों लंदन चले गए. विद्या ने लंबे समय तक बिना कोई कारण बताए कार्तिक से शारीरिक संबंध नहीं बनाए. इस से कार्तिक मानसिक तनाव में जीने लगा. आखिरकार कार्तिक ने चेन्नई की फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर कर दी और पत्नी ने काउंटरक्लेम दायर कर शादी को बनाए रखने की मांग की. इस के अलावा विद्या ने कार्तिक के परिवार पर भी आरोप लगाए लेकिन अदालत में वह अपने आरोप सिद्ध नहीं कर पाई.
फर्स्ट एडिशनल फैमिली कोर्ट, चेन्नई ने 11 अगस्त, 2011 को पत्नी के काउंटरक्लेम को मान लिया. ट्रायल कोर्ट ने विद्या द्वारा कई वर्षों तक शारीरिक संबंध से इनकार करने को मानसिकता क्रूरता नहीं माना और पति की तलाक याचिका खारिज कर दी.
कार्तिक ने मद्रास हाईकोर्ट में अपील दायर की. हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला पलट दिया. हाईकोर्ट ने पत्नी का लंबे समय तक शारीरिक संबंध न बनाने को मानसिक क्रूरता मानते हुए कार्तिक के पक्ष में फैसला सुना दिया.
हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ विद्या सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई. 22 सितंबर, 2014 को जस्टिस के एस राधाकृष्णन और जस्टिस पी एस नरसिम्हा की बैंच ने हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा, ‘बिना पर्याप्त कारण के लंबे समय तक साथी को शारीरिक संबंध से वंचित रखना मानसिक क्रूरता है.’ यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट ने विद्या को 3 माह के भीतर परमानेंट एलिमनी के रूप में 40 लाख रुपए देने का आदेश दिया.
सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले से पहले क्रूरता को शारीरिक हिंसा से जोड़ा जाता था लेकिन इस केस के बाद शारीरिक संबंध से वंचित रखना भी तलाक का जायज आधार बन गया. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्रूरता का आकलन स्थापित नियमों के अनुसार नहीं बल्कि सिचुएशनल होता है.
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय पुरुषों के पक्ष में ही है. सवाल यह है कि पत्नी यदि 18 साल से ऊपर हो और किसी भी कारण से वह पति से शारीरिक संबंध बनाना न चाहती हो तो इसे मानसिक क्रूरता की श्रेणी में क्यों माना जाए? अगर यह मानसिक क्रूरता ही है तो बिना पत्नी की सहमति से सैक्स करना बलात्कार की श्रेणी में क्यों नहीं है?
शादी का मतलब बलात्कार का लाइसेंस?
अपनी पत्नी से जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाना कानूनी रूप से अपराध है लेकिन केवल तभी जब पत्नी की उम्र 18 वर्ष से कम हो. आईपीसी की धारा 375 कहती है कि यदि कोई पुरुष किसी महिला के साथ उसकी सहमति के बिना यौन संबंध बनाता है तो वह बलात्कार है लेकिन इस में 2 अपवाद हैं : एक, पुरुष अपनी पत्नी के साथ यौन संबंध बनाता है जिसकी उम्र 18 वर्ष से अधिक है तो वह बलात्कार नहीं माना जाएगा.
वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाने की मांग लंबे समय से चल रही है. दिल्ली हाईकोर्ट ने 2022 में इस पर फैसला सुरक्षित रखा था लेकिन केंद्र सरकार ने तर्क दिया कि इस से विवाह संस्था कमजोर और अस्थिर हो जाएगी. 2023 के आपराधिक कानून सुधार यानी बीएनएस की धारा 63 में भी यह अपवाद बरकरार है.
मैरिटल रेप के खिलाफ 2022 में दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दाखिल की गई जिस पर 2 जजों की बेंच को फैसला देना था लेकिन इस मामले में दोनों जजों के विचार बंट गए. एक जज ने बालिग पत्नी के साथ जबरदस्ती यौन संबंध को जायज माना दूसरे ने इसे बलात्कार माना.
2023 के एक मामले में कर्नाटक हाईकोर्ट ने कहा था, ‘पति का पत्नी पर यौन अधिकार नहीं है, सहमति जरूरी है लेकिन अगर सहमति के बिना भी संबंध बने तो यह संवैधानिक तौर पर अपराध नहीं है.’
इस का मतलब है कि विवाह के बाद पत्नी की उम्र 18 वर्ष या अधिक होने पर उस की मरजी के कोई मायने ही नहीं. उस के साथ जबरदस्ती की जा सकती है. 18 साल से ऊपर की पत्नी के साथ बलात्कार भी करो तो कोई अपराध नहीं. हैरानी की बात यह है कि यह प्रावधान 1860 से चला आ रहा है.
बालिग पत्नी के साथ उस की मरजी के खिलाफ सैक्स संबंध बनाना अपराध है या नहीं, अभी यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. सुप्रीम कोर्ट में मैरिटल रेप के खिलाफ कई याचिकाएं दायर हैं. यदि मैरिटल रेप पर सुप्रीम कोर्ट ने औरतों के पक्ष में फैसला दिया तो बालिग पत्नी के साथ भी जबरदस्ती संबंध बनाना बलात्कार माना जाएगा.
घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 की धारा 3 के तहत वैवाहिक बलात्कार को घरेलू हिंसा के रूप में मान्यता दी गई है. पत्नी इस आधार पर अदालत में सुरक्षा या मुआवजा मांग सकती है लेकिन इस कानून में भी पत्नी की सहमति के बिना शारीरिक संबंध बनाए जाने को बलात्कार की श्रेणी में नहीं रखा गया.
दो लोगों के बीच शादी और सहवास के लिए आपसी सहमति जरूरी है. यदि पत्नी की मरजी के खिलाफ पति उस के साथ सैक्स करे तो इसे बलात्कार ही माना जाना चाहिए लेकिन भारतीय समाज में आज भी औरतों की मरजी के कोई मायने नहीं. मर्दवादी समाज आज भी औरतों को अपनी प्रॉपर्टी ही समझता है. कॉन्स्टिट्यूशन के प्रिएंबल में ही व्यक्ति की गरिमा की बात कही गई है लेकिन मैरिटल रेप के नाम पर भारतीय समाज में आज भी औरतों की गरिमा को तार तार किया जाता है.
मैरिटल रेप के मामले में कानून भी मर्दवादी मानसिकता के साथ खड़ा नजर आता है. ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय से उम्मीद है कि वह इस मर्दवादी मानसिकता को ध्वस्त करते हुए कानून में बदलाव करे और औरतों की गरिमा को बरकरार रखते हुए उन की सहमति/असहमति के महत्व को समझें. Bodily Autonomy.

Story In Hindi: बदलते एहसास- भाभी के तानों से गोकुल के आत्मसम्मान को चोट

Story In Hindi: भाभी के ताने अब गोकुल के आत्मसम्मान को चोट पहुंचा रहे थे. इस से गोकुल ने अब घर छोड़ने का फैसला कर लिया और घर से दूर रह कर गोकुल की जिंदगी में कुछ ऐसा बदलाव आया, जिस की किसी ने कल्पना भी न की होगी.

उठो लाट साहब, चाय पी लो. 7 बजने वाले हैं. मुझे बच्चों को स्कूल भी भेजना है.’’
उनींदे से गोकुल के कानों पर यह कर्कश आवाज पहुंची थी.
तभी दूसरी आवाज आती है, ‘‘गोकुल, उठ जा. रोज सुबह सुबह घर में कलह कराना तुझे अच्छा लगता है क्या?’’
गोकुल की नींद खुल गई थी. भाभी और मां के प्रवचन रोज की तरह आज भी उस के कानों में घुल रहे थे पर वह बेफिक्र सा पड़ा था.
मां की बात तो एकबारगी बरदाश्त भी कर लेता पर भाभी का इस तरह से उलाहना देना उसे कतई मंजूर न था. उस का जी करता कि कानों में कोई सीसा पिघला कर भर दे. जहां तक चाय की बात थी, उस ने कभी गरम चाय की डिमांड नहीं की थी. जैसी मिलती वैसी पी लेता. फिर उस के बिस्तर से उठ जाने से कौन से घर के काम फटाफट होने लगेंगे बल्कि और कलह हो जाएगी.
भाभी को वह फूटी आँखों नहीं सुहाता था. वह नहीं समझ पाती थी कि टूर एंड ट्रैवल्स और ट्रेकिंग का काम थका देने वाला होता है. बड़ा भाई कुछ कहना भी चाहता तो पत्नी के सामने उसका मुंह न खुलता था. एक तरह से वह पत्नी की बातों का मूक समर्थन करता था.
मां जानती थी कि मेरा बेटा बिलकुल नालायक तो नहीं लेकिन ऐसे बेटे को लायक भी तो नहीं कहा जा सकता जिस की शादी की चिंता ने ही उस को इतना परेशान कर दिया हो. कितनी कोशिश नहीं की थी मां ने. जगह जगह रिश्तेदारों से कहा था. चिह्न भेजा था पर कोई लड़की मिली ही नहीं.
एक समय था जब लड़के वालों की तरफ से शादी का प्रस्ताव आना लड़की वाले अपना सौभाग्य समझते थे लेकिन आज गोकुल जैसे कई लड़के इस कस्बे में हैं जिन्हें सुंदरता और बुद्धिमत्ता की कसौटी पर कसी जाने वाली तो क्या, साधारण रंग रूप वाली, घर गृहस्थी का ध्यान रखने वाली लड़कियां भी नहीं मिल रहीं. ऐसे में किस का दोष कहा जाएगा. लड़के का ही कहेगा न? काबिल होता तो क्यों न मिलती लड़की?
बदलते सामाजिक ताने बाने को गहराई से मापने वाले कितने हैं? कभी कभी मां भी उसे दोष देती. भाभी तो हमेशा पीछे ही पड़ी रहती. कई बार कहती, ‘‘पढ़ाई के दिनों में थोड़ा मेहनत कर ली होती और कोई छोटी मोटी सरकारी नौकरी भी मिल जाती तो आज शादी के लिए लड़की भी मिल जाती पर नहीं, लाट साहब को तो मौज मस्ती से फुरसत ही नहीं मिलती होगी. तुम्हारे बड़े भाई ने नहीं की पढ़ाई? तभी आज सरकारी नौकर हैं. पूरी गृहस्थी चलाने का दम भरते हैं.’’
गोकुल का बड़ा भाई सरकारी नौकरी में था और एक मध्य औसत वर्ग के परिवार का सा रहन सहन उसका था. शादी के लगभग 8 साल हो चुके थे. 2 बच्चे थे. मां का सपना था कि अब घर में छोटी बहू भी आ जाए पर लड़की की तलाश एक मुश्किल काम जान कर गोकुल ने शादी का इरादा छोड़ दिया था. मां अक्सर कहती, ‘‘शादी के बगैर वंश आगे कैसे चलेगा?’’

गोकुल बेपरवाह सा कह देता, ‘‘तु झे वंश चलाने की परवा है तो भाभी के बच्चे चलाएंगे न तेरा वंश. मेरी परवाह न कर. मेरा परिवार बहुत बड़ा है.’’ मां न समझ पाती थी इस बात को. यकीनन परिवार तो हम पति, पत्नी और उनके बच्चों से बनी इकाई को कहते हैं. ज्यादा से ज्यादा इस में माता पिता को भी जोड़ लिया लेकिन समाज को परिवार समझने की भूल हम ने कभी की ही नहीं. अगर ऐसा होता तो क्या समाज में प्रेम ही प्रेम नहीं होता. मगर गोकुल की विचारधारा कुछ ऐसी ही थी. बचपन से ही वह प्रकृति प्रेमी रहा था. पहाड़ में जन्म हुआ. आंखें खोलते ही सामने हरे भरे खेत, बर्फ से ढके पहाड़ देखे तो उन्हीं से मोहब्बत कर बैठा और इस के बाद कभी किसी लड़की की मोहब्बत में गिरफ्तार होने का मौका ही नहीं आया.
वह सोच सोच कर परेशान था कि भाभी उसे निठल्ला क्यों कहती है. न वह भाई भाभी पर बोझ था, न माता पिता पर. जो कुछ भी कमाता था, उस का एक नियत हिस्सा घर खर्च चलाने के लिए मां के हाथ पर रखता. इस बार जब उस ने मां के हाथ में 15 हजार रुपए रखे तो मां ने कहा था, ‘‘मु झे नहीं. अपनी भाभी को दिया कर ये पैसे. घर तो वही चलाती है.’’ पर गोकुल की कोशिश भाभी से दूर रहने की ही होती. वह कहता, ‘‘तू ही दे देना भाभी को.’’

पहाड़ों से टक्कर लेने वाले गोकुल का दिल भाभी से डरता था क्योंकि पहाड़ उसे मुकाबला करने का हौसला देते जबकि भाभी अपने व्यंग्यबाणों से हमेशा उसे नीचा दिखाती और उस के हौसलों को पस्त करती थी. कल की ही तो बात है. जैसे ही वह ग्रुप को ट्रेकिंग करा कर 2 दिनों बाद थका हारा घर लौटा था तो भाभी ने ठंडा दालभात प्लेट में डाल कर डाइनिंग टेबल पर रख कर जोर से कहा था, ‘‘आ गए लाट साहब हिमालय की यात्रा से. पेट पूजा कर लो.’’
यह अपमान बहुत भारी था. मां को भी बुरा लगा था पर बहू ने उसे अपने मोहपाश  के जाल में ऐसा उलझाया था कि वह छोटे बेटे की सुध लेना ही भूल गई. दरअसल, मां अपने बेटे की शादी को ले कर बहुत परेशान थी. हर मां की तरह उस का भी अरमान था कि बेटे की शादी हो जाए और मां की जिम्मेदारी पूरी हो जाए पर बहुत हाथ पैर मारने पर भी छोटी बहू नहीं मिली.
छोटी बहू की तलाश अब गोकुल के आत्मसम्मान को चोट पहुंचा रही थी. यों तो वह हमेशा ही कम बोलता था लेकिन इधर कुछ दिनों से वह ज्यादा चुप था. उस की यह चुप्पी आने वाले तूफान की चेतावनी सी लगने लगी थी. यह सच है कि विरोधी पर हथियार का प्रयोग अगर सही समय पर न करो तो वह खुद पर ही वार करने लगता है. कितना अपमान सहा था गोकुल की चुप्पी ने? चुप तो वह आज भी रहेगा पर अपने ही तरीके से वार करेगा.
आखिर चार दिनों के बाद उस ने हाथ जोड़ कर मां से अपना मंतव्य बता दिया, ‘‘मैं ने शहर में पर्यटन कार्यालय के पास एक छोटे से कमरे में अपने रहने का इंतजाम कर लिया है. मेरी वजह से आप सब को जो तकलीफ होती रही, वह अब नहीं होगी.’’
मां तो मां थी. यह सुनते ही हताश हो गई. कई बातें उस के दिमाग में घूमने लगीं, गोकुल के खाने पीने का इंतजाम वगैरह.
पर आज गोकुल किसी की सुनने वाला नहीं था. उसका व्यवहार अपेक्षाकृत संयत था. मां के दोनों कंधों पर हाथ रखते हुए बोला, ‘‘मैं पास ही शहर में हूं. यहां से मात्र दो तीन किलोमीटर दूर. जब मेरी याद आए, मुझे फोन कर लेना. मैं मिलने चला आऊंगा या बुला लूंगा.’’
भाभी मन ही मन गोकुल के इस फैसले से खुश थी. बस, मन में थोड़ी सी कुचकुचाट थी कि महीने के बंधे हुए 15 हजार रुपए अब नहीं मिलेंगे और इस के अलावा भी समय समय पर गोकुल खाने पीने व घर का जरूरी सामान ले कर आ जाता था. वह सब भी बंद हो जाएगा. गोकुल महीने के 15-20 दिन तो पर्यटकों के साथ टूर पर रहता था. घर में उसके खाने पीने का खर्चा ही क्या रहा? कई बार उस के आने की खबर नहीं होती थी तो भाभी खाना बचा कर भी नहीं रखती थी.
पिंडारी ग्लेशियर, कफनी ग्लेशियर, सुन्दरढूंगा, मिलम ग्लेशियर, पंच केदार, मध्य महेश्वर, खलिया टॉप, औली और भी न जाने कहां कहां जाता था वह टीम को ले कर और टेंट लगा कर कई दिनों तक वहीं ठिकाना बना लेता. जब भी वह एडवेंचर की दुनिया की तरफ बढ़ता, दिनरात भूल जाता लेकिन संयुक्त परिवार में यह संभव नहीं था. एक 27-28 साल का युवा भाभी की डांट खाए, जरूर उस के मन को आघात पहुंचता था.
अगस्त का महीना था. वह अपने नए ठिकाने पर पड़ा हुआ था. अब जल्दी जागने की जरूरत नहीं थी. पिछले 2-3 दिन से वह महसूस कर रहा था कि आजादी का सुख कितना बड़ा होता है. तभी दो तीन विदेशी लोगों का ग्रुप उसे ढूंढते हुए वहां तक पहुंचा और बोला कि उन्हें पिंडारी ग्लेशियर जाना है. पहाड़ों में बहुत बरसात हो रही थी. गोकुल ने उन्हें समझाया कि बरसात का समय है और यों भी पहाड़ी क्षेत्रों में मौसम का कोई पता नहीं रहता. वे अपने इस एडवेंचर टूर को एक महीने के लिए स्थगित कर दें या कहीं और चलने को तैयार रहें लेकिन विदेशी ग्रुप पिंडारी जाने की जिद पर अड़ा रहा. एक बोला, ‘‘हम इतनी दूर से आए हैं. एक महीने का इंतजार कैसे कर लें? हमारे वीजे की भी एक समय सीमा है.’’
ऐसे में गोकुल को उनके साथ जाने का इंतजाम करना ही था. यही असली एडवेंचर था, आपदा विभाग ज्यादा सक्रिय नहीं था, मोबाइल सिग्नल पहाड़ों में नहीं मिलते थे. लोकल लोगों की मदद से पुल बना कर पर्यटक पिंडर नदी पार कर लेते थे.

हिमालय के लोगों और उन की संस्कृति को जानना इन विदेशी घुमक्कड़ों की चाहत होती थी. साथ ही, गोकुल भी बहुत कुछ सीखता था. पीठ पर सामान बांध कर सुबह सुबह ट्रेकिंग वाले स्थान पर पहुंच गए. 5 किलोमीटर ट्रेकिंग की और चाय पी. थोड़ी देर रुक कर प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लिया. फोटोग्राफी के शौकीन लोगों ने कुछ तस्वीरें लीं. तसवीरें शोध में भी अहम भूमिका निभाती हैं और फिर आगे चल कर बेस कैंप में खाना खाया. थके और भूखे होने पर यह साधारण सा खाना भी इतना स्वादिष्ठ लगता था, जैसा किसी बड़े बड़े होटल का खाना भी नहीं. विशेष तौर पर बनाया गया पहाड़ी खाना पर्यटकों के लिए आकर्षक होता था. यात्राओं से तन और मन अकसर दोनों प्रफुल्लित होते हैं और सेहत तो बढ़िया रहती ही है. पुनर्जागरण काल के बाद दुनिया में अनेक तरह की क्रांतियां आईं. यह एक नई क्रांति का दौर था, जहां रोजगार जैसी समस्याओं से जूझने वाले युवा शादी के बंधन से दूर रहना चाहते थे.
वहीं लड़कियों में भी पढ़ लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होने की होड़ मची थी. बड़ा न सही, छोटा मोटा कोई भी काम और रोजगार जरूर करना चाहती थीं ताकि आत्मनिर्भर रहें और उन की इस जिद ने उन के सपनों को भी विस्तृत आकाश दिया. ऐसे में जब आकांक्षाएं बड़ी हो जाएं तो जीवनसाथी का चुनाव काफी कठिन हो जाता है. दोनों ही तरफ से विवाह जैसी संस्था को चुनौती मिलनी शुरू हो गई थी. गोकुल के ट्रेकिंग ग्रुप में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ने लगी थी जिन्होंने ताउम्र अकेले रहने का फैसला कर लिया था और ये सब एक दूसरे के अच्छे दोस्त थे. इन की रुचि एक थी. इन की मंजिल भी एक थी.

पारिवारिक जिम्मेदारियों में फंसा आदमी ज्यादा दिनों तक घर से बाहर रहने की कहां सोच सकता है लेकिन इन लोगों की जिंदगी कई मानों में शानदार थी. सबसे ज्यादा समझने वाली बात यह कि ये केवल जिंदगी का आनंद ही नहीं ले रहे थे बल्कि प्रकृति को संरक्षण भी दे रहे थे. पर्यटक अपने एक या दो बच्चों के साथ पहाड़ घूमने आते और बच्चे कार के अंदर से चिप्स के रैपर, कोल्ड ड्रिंक की खाली बोतल सड़क से नीचे जंगल में फेंक देते.
बहुत कुपित होता था गोकुल यह देख कर कि ये लोग एक बच्चे तक को नहीं संभाल पाते, उसे शिष्टाचार नहीं सिखा पाते. उस की टीम जंगलों से कूड़ा करकट उठा कर उसे ठिकाने लगाती. जहां जहां ये लोग जाते, बांस, बुरांश अशोक, अतीस, खूबानी, काफल जैसे फलों के पेड़ लगाते. अपने साथ मिट्टी में लपेटे हुए बीज और गुठलियां ले जाते और इन्हें दूर दूर बिखेर देते. अगली यात्रा के दौरान जब नन्हे नन्हे पौधे मुस्कुराते हुए दिखाई देते तो गोकुल और इन सब की खुशी की सीमा न रहती. खुशियों का विस्तृत आकाश मिल जाता सब को इन जानदार नन्हे नन्हे पौधों को देख कर.
उस के साथियों में से एक था सागर. उम्र में गोकुल से काफी छोटा पर अपने नाम के अनुरूप ही विशाल दिलवाला और घूमने का अथाह शौकीन. उस ने बद्रीनाथ जाने की जिद पकड़ी थी पर गोकुल और कुछ लोगों का कहना था कि अभी यात्रा सीजन के आरंभ में भीड़ को देखते हुए जाने का विचार सही नहीं है. बरसात के बाद जाएंगे.
सागर मान गया और बरसात भी बीत गई. चारधाम में भीड़भाड़ अब कम होने लगी थी क्योंकि अधिकतर श्रद्धालु कपाट खुलने के चंद महीनों के दौरान ही तीर्थयात्रा के लिए उमड़ पड़े थे. गोकुल ने अपनी छोटी सी टीम, जिस में सागर भी शामिल था, के साथ बद्रीनाथ जाने का प्रोग्राम बनाया.
मन से वह आध्यात्मिक प्रवृत्ति का था पर उस का धर्म विचित्र था. मंदिरों में जा कर घंटों पूजापाठ करना या भीड़ लगाना उस का ध्येय नहीं था. उस के अपने कुछ आदर्श थे जिन का पालन कर वह अंतर्मन की शांति पाता. समूह के कई लोग बद्री धाम के दर्शन करना चाहते थे इसलिए एक सुबह ये लोग ट्रैवलर टैंपो से निकल गए. कुल मिलाकर 15 लोग थे. इन में रूपा भी थी. रूपा पिछले दो तीन सालों से गोकुल की टीम से जुड़ी थी. वह गोकुल की जिंदगी से भी जुड़ना चाहती थी. एक दो बार गोकुल को इस बात का एहसास दिलाने की कोशिश भी की थी उस ने. गोकुल ने अपने बंजारेपन का हवाला देते हुए हर बार उस के अरमानों पर पानी फेर दिया.

बद्रीनाथ दर्शन के बाद वे लोग माणा की तरफ बढ़े जो यहां से लगभग 2 किलोमीटर आगे था. चीन तिब्बत सीमा से लगा यह भारत का आखिरी गांव है जो अब पहला गांव कहलाने लगा है. माणा से वसुधारा और स्वर्गारोहिणी तक ट्रेकिंग की जाती है. कैंप के 15 लोगों में से 11 तो स्वर्गारोहिणी तक जाने का जिगर रखते थे लेकिन 4 लोग बेस कैंप वसुधारा तक ही जाने की हिम्मत कर पाए. शारीरिक परेशानी की वजह से रूपा भी वसुधारा तक ही जाना चाहती थी पर गोकुल के साथ की चाहत उस के पैरों को आगे धकेल रही थी. रास्ते में वह थक कर जानबूझ कर रुक जाती ताकि गोकुल की नजरें इनायत हों.

उसे बैठे हुए देख कर गोकुल पूछता, ‘‘रूपा, तबीयत ठीक नहीं क्या? अगर कोई परेशानी है तो बेस कैंप में ही रुक जाओ.’’
‘‘नहीं, मैं आप के साथ चलूंगी. मेरे मन की बात तो आप समझ नहीं पाए लेकिन साथ चलने की इजाजत तो दे सकते हैं.’’
‘‘सम झा करो, रूपा. मैं ने तुम्हें पहले भी सम झाया है कि जो मोहब्बत और चाहत हम दोनों के बीच में अभी है, उस की शादी के बाद उम्मीद मत करना. शादी के बाद जीवन बिलकुल बदल जाता है. किसी भी शादीशुदा जोड़े को ले कर सोच लो. क्या तुम रोज ट्रेकिंग में इस तरह मेरे साथ आ पाओगी. मेरा रोज रोज घर से बाहर रहना ही तुम्हें खलने लगेगा और फिर शुरू होगी चिकचिक बाजी. इसलिए, शादी जैसी बात को मन से निकाल दो.’’
वह अपनी कहानी रूपा को सुनाता कि उस की मां ने कितनी कोशिश की थी शादी की लेकिन लड़कियों के अजब नखरे थे. समय रहते अगर रूपा उसे मिल गई होती तो जरूर शादी कर लेता लेकिन अब तो स्वच्छंद रहने की सी आदत हो गई है. अपने भाई भाभी के  झगड़ों के बारे में रूपा को बताता. बताता कि कैसे घर में सिर्फ भाभी का ही राज चलता है, न माँ का, न बड़े भाई का.
अचानक रूपा का हाथ पकड़ कर वह कहता, ‘‘जरूरतें तुम्हारी भी हैं, मेरी भी. बिना किसी बंधन में बंधे हम उन्हें पूरा करेंगे. ये जो पेड़ पौधे हैं, ये पशु पक्षी हैं, ये सब हमारे बच्चे हैं. हम इन को पालेंगे. इन की देखभाल करेंगे. इस से बड़ा सुख और कहीं नहीं.
खैर, देर सवेर रूपा भी इस सचाई को समझ गई और अब वह बगैर शादी के ही खुश थी. लगभग 8 दिनों बाद वे लोग वापस घर लौटे. ज्यादा दौड़ भाग की वजह से एक दिन गोकुल बीमार पड़ गया. किसी ने बड़े भाई को फोन कर बताया. वह ऑफिस में था. घर पहुंच कर मां को साथ ले कर गोकुल के कमरे में पहुंचा. वहां जा कर देखा तो दंग रह गया. जिस गोकुल को घर में इतनी घुड़कियां मिलती थीं, बात बात पर अपनी भाभी की दस बातें सुननी पड़ती थीं, उस से मोहब्बत करने वाले सैकड़ों लोग वहां पर खड़े थे. यह देख कर मां की आंखें भीग गईं. उसे गोकुल के शब्द याद आ रहे थे, ‘मां, मेरा परिवार तो बहुत बड़ा है. देखेगी न तो आंखें फटी की फटी रह जाएंगी.’
सामने दीवार पर ‘ट्रेक विद गोकुल’ का शानदार चमचमाता बोर्ड लगा था जो शाम घिरने के साथ रोशनी की जगमगाहट में और ज्यादा चमकदार प्रतीत हो रहा था.
स्ट्रेस और गर्मी से होने वाली परेशानी थी जो कुछ ही दिनों में ठीक हो गई. गोकुल का काम अब बढ़िया चल गया था. कर्णप्रयाग से आगे चोपता में उस की टीम के साथी विशन की जमीन थी, उसी का आइडिया था कि वे लोग वहां पर पर्यटकों के लिए टेंट और होमस्टे की व्यवस्था करें तो रोजगार भी बढ़िया चलेगा और लोगों को सुविधा भी होगी.

गोकुल को भी आइडिया पसंद आया तो उस ने इस शहर को छोड़ कर उसे अपना ठिकाना बदलने की सोची. इतना बड़ा फैसला लेने से पहले एक बार वहां जा कर व्यवस्था देख लेने के इरादे से वह कुछ लोगों को ले कर चल दिया. विशन पहले ही वहां पहुंच चुका था. पांच छह कमरों का छोटा सा घर फिलहाल ले चुके थे. विशन ने खाना बनाने के लिए गैस, कुछ बर्तन और राशन का इंतजाम भी कर दिया था. टीम जब चोपता पहुंची तो सब की खुशी का ठिकाना न रहा.
रूपा उछल कर बोली, ‘‘अब यही होगा अपना परमानेंट ठिकाना.’’ तभी टीम का एक मेंबर उस से पूछने लगा, ‘‘क्या तुम्हारे पेरेंट्स तुम्हें अलाउ कर देंगे?’’
‘‘हां क्यों नहीं, जो लड़कियां जॉब करती हैं, क्या वे घर से अलग नहीं रहतीं? मैं ने घर में बता दिया है कि मुझे माउंटेनियरिंग पर प्रशिक्षण लेना है और मैं आगे चोपता में ही रहूंगी.’’
फिर सवाल आया खाना बनाने का. इतने सारे लोगों के लिए खाना बनाने की व्यवस्था. क्या किसी को किराए पर रखना होगा? गोकुल इस सवाल से जूझ ही रहा था कि टीम के उत्साही युवक युवतियों ने फटाफट आलू छीलने शुरू कर दिए. दबंग सी दिखने वाली मोना ‘बहुत भूख लगी है यार’ कहते हुए आटे का पैकेट फाड़ कर परात में आटा डाल कर उसे गूंदने लगी है. गोकुल ने सोचा भी नहीं था कि मोना इस तरह घर का काम भी करती होगी. एक घंटे के अंदर खाना तैयार था. समीर एक कोने पर बैठा हुआ सलाद के लिए प्याज, टमाटर और खीरा काट लिया.
हंसते हंसते सभी ने खाना खाया. कुछ लोगों को प्लेट मिलीं, कुछ लोगों को पत्तल लेकिन इस से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला था. गोकुल हंसते हुए बोलता है, ‘‘जो पत्तल में खा रहे हैं, वे इसे गाय के बर्तन में डाल देंगे और प्लेट में खाने वाले अपनी प्लेट खुद धोएंगे. हंसी का एक ठहाका गूंजा और चोपता की शांत वादी में देर तक विचरण करता रहा. इस से सुंदर परिवार का एहसास और क्या हो सकता है. शायद, इन सभी लोगों के मन में यह विचार एक साथ उठ रहा था.
3-4 दिन यहां रहते हुए हो गए थे. गोकुल टीम के कुछ लोगों के साथ आसपास की जगह भी एक्सप्लोर कर आया था. अब उसे इस बात का एहसास हो गया था कि यहां रहने में किसी भी प्रकार की कोई अड़चन नहीं आने वाली. रजिस्ट्रेशन और दूसरी औपचारिकताएं विशन पूरी कर रहा था. खाना खाने के बाद बर्तन धोने का काम भी ये युवा बहुत ही खुशी से कर लेते. जलवायु परिवर्तन का असर पहाड़ी क्षेत्रों में भी साफ दिखाई दे रहा था. अक्टूबर का मौसम अपेक्षाकृत गर्म था और नवंबर का सुहावना लग रहा था.

चारधाम यात्रा समाप्ति को आ गई थी. पर्यटकों की भीड़ भाड़ अपेक्षाकृत कम हो गई थी. अब आने वाले महीने में ओली में बर्फ पड़ने पर स्कीइंग की प्रबल संभावना बनी हुई थी. गोकुल का ध्यान इस ओर भी था. अपनी टीम को काम समझा कर 3-4 लोगों को साथ ले कर वह वापस शहर लौट आया. अब कुछ दिनों में इन लोगों को सभी का सामान ले कर चोपता जाना था. गोकुल के पास जरूरत भर का थोड़ा सा सामान था जो लगभग पैक हो चुका था. उस से जुड़े कई लोग उदास दिखाई दे रहे थे क्योंकि उन सभी का चोपता जाना संभव
नहीं था. उन्हें वहीं रह कर बिजनैस में सहयोग करना था और पर्यटकों को ले कर जाना था.
गोकुल ने महसूस किया कि जाने से पहले एक बार मां और भाई से मिलना तो जरूरी था. यही सोच कर उस के कदम पाइन हाउस की तरफ बढ़ गए. उस के सभी साथी उस के पीछे हो लिए. वहां पहुंच कर गोकुल ने घंटी बजाई तो भाभी ने दरवाजा खोला. लगभग 7 वर्षों बाद गोकुल को सामने खड़ा देख कर वे चौंक गईं और कुछ पलों के लिए जड़ हो गईं.
गोकुल का कमजोर दिखने वाला चेहरा आज हृष्ट पुष्ट था, उस में लालिमा थी. होश संभालने पर भाभी ने प्रश्नवाचक दृष्टि उस की ओर गड़ाई और औपचारिकता वश उसे गेट के अंदर आने को कहा. गोकुल ने पीछे मुड़ कर देखा तो एक हुजूम वहां पर आ खड़ा हुआ, जिस में उस के हमउम्र युवक युवतियां और कई छोटे बड़े बच्चे भी शामिल थे.
‘‘प्रणाम भाभी, मां कहां हैं?’’
‘‘पड़ोस में गई हैं समय काटने.’’
‘‘ठीक है. मैं मां के आने तक यहीं पर इंतजार करता हूं.’’
‘‘चाहो तो अंदर बैठ सकते हो.’’
‘‘मेरा इतना बड़ा परिवार समा जाएगा क्या आप के घर में?’’
गोकुल ने अपने साथियों को बाहर ही खड़े रहने का इशारा किया और मां के कमरे की तरफ बढ़ा.
‘‘बच्चे कहां हैं, दिख नहीं रहे?’’
‘‘दोनों की शादी हो गई. नितिन यहीं दो घर छोड़ कर रहता है और जतिन दानपुर महल्ले में,’’ यह कहते हुए भाभी थोड़ा शर्मिंदा थीं. उन के अपने बच्चे ही उन से दूर थे. उन्हें गोकुल का कद एक वटवृक्ष सा महसूस हो रहा था जो दूर दूर तक फैले अपने लंबे चौड़े परिवार के साथ खड़ा था. Story In Hindi.

Romantic Story: बंद आकाश, खुला आकाश

Romantic Story: लेखक – भुवनचंद्र जोशी – सरिता, बीस साल पहले, दिसंबर (प्रथम) 2005 – अपने शौक के चलते मैं ने एक तोते के बच्चे को खरीद कर पिंजरे में बंद कर दिया लेकिन कुछ समय बाद जब तोतों के  झुंड को देख उस तोते ने उड़ने की कोशिश की तो पिंजरे में उस की छटपटाहट व बेचारगी ने हम सब को विचलित कर दिया.
एक दिन मैं तोते का बच्चा खरीद कर घर ले आया. उस के खाने पीने के लिए 2 कटोरियां पिंजरे में रख दीं. नया नया कैदी था, इसलिए अकसर चुप ही रहता था. हां, कभी कभी  टें, टें की आवाज में चीखने लगता.
घर के लोग कभी कभी उस निर्दोष कैदी को छेड़ कर आनंद लेते लेकिन खाने के वक्त उसे भी खाना और पानी बड़े प्यार से देते थे. वह एक दो कौर कुट-कुटा कर, बाकी छोड़ देता और टें, टें शुरू कर देता. फिर चुपचाप सींखचों से बाहर देखता रहता.
उसे रोज इंसानी भाषा बोलने का अभ्यास कराया जाता. पहले तो वह ‘हं, हं’ कहता था जिस से उसकी समझ में न आने और आश्चर्य का भाव जाहिर होता पर धीरे धीरे वह आमाम, आमाम कहने लगा.
अब वह रोज समय पर खाना या पानी न मिलने पर कटोरी मुंह से गिरा कर संकेत भी करने लगा, फिर भी कभी कभी वह बड़ा उदास बैठा रहता और छेड़ने पर भी ऐसा प्रतिरोध करता जैसे चिंतन में बाधा पड़ने पर कोई मनीषी क्रोध जाहिर कर फिर चिंतन में लीन हो जाता है.
एक दिन तोतों का एक बड़ा झुंड हमारे आंगन के पेड़ों पर आ बैठा. उन की टें, टें से सारा आंगन गूंज उठा. मैं ने देखा कि उन की आवाज सुनते ही पिंजरे में मानो भूचाल आ गया. पंखों की निरंतर फड़फड़ाहट, टें, टें की चीखों और चोंच के क्रुद्ध आघातों से वह पिंजरे के सींखचों को जैसे उखाड़ फेंकना चाहता था. उस के पंखों के टुकड़े हवा में बिखर रहे थे. चोंच लहूलुहान हो गई थी. फिर भी वह उस कैद से किसी तरह मुक्त होना चाहता था.  झुंड के तोते भी उसे आवाज दे कर प्रोत्साहित करते जैसे लग रहे थे.
झुंड के जाने के बाद उस का उफान कुछ शांत जरूर हो गया था लेकिन क्षत विक्षत उस कैदी की आंखों में गुस्से की लाल धारियां बहुत देर तक दिखाई देती रहीं. उसकी इस बेचारगी ने घर के लोगों को भी विचलित कर दिया और वे उसे मुक्त करने की बात करने लगे, लेकिन बाद में बात आई गई हो गई.
कुछ दिनों बाद की बात है. एक दिन मैं ने इस अनुमान से उस का पिंजरा खोल दिया कि शायद वह उड़ना भूल गया होगा. द्वार खुला, वह धीरे धीरे पिंजरे से बाहर आया. एक क्षण रुक कर उस ने फुरकी ली और आंगन की मुंडेर पर जा बैठा. उस के पंखों और पैरों में लड़खड़ाहट थी.
फिर भी वह अपनी स्वाभाविक टें, टें के साथ एक डाल से दूसरी डाल पर फुदकता जा रहा था. उस के बाद वह पहाड़ी, सीढ़ीदार खेतों पर बैठता उड़ता हुआ घर से दूर होने लगा.
अपनी भूल पर पछताता मैं और गांव भर के बच्चे तोते के पीछे पीछे उसे पुचकार कर बुलाते जा रहे थे और वह हम से दूर होता जा रहा था. मैं ने गौर किया कि उस की उड़ान में और तोतों जैसी फुरती नहीं थी. उस की इस कमी को लक्ष्य कर मुझे शंका होने लगी कि अगर वह लौटा नहीं तो न तो अपने साथियों के साथ खुले आकाश में उड़ पाएगा और न ही अपना दाना जुटा पाएगा.
तोते को भी जैसे अपनी लड़खड़ाहट का एहसास हो चुका था. इसीलिए कुछ दूर जाने पर वह एक पेड़ की डाल पर बैठा ही रह गया और उसे पुचकारते हुए मैं उस के पास पहुंचा तो उस ने भी डरते झिझकते अपने आप को मेरे हवाले कर दिया.
काश, उस ने अपनी लड़खड़ाहट को अपनी कमजोरी न मान लिया होता तो वह उसी दिन नीलगगन का उन्मुक्त पंछी होता. मगर वह अपनी लड़खड़ाहट से घबरा कर हिम्मत हार बैठा और फिर से पिंजरे का पंछी हो कर रह गया.
करीब साल भर बाद, एक दिन फिर उस के उड़ने की जांच हुई. अब की बार खुले में पिंजरा खोलने का जोखिम नहीं लिया गया. घर की बैठक में 2 बड़ी जालीदार खिड़कियों को छोड़ कर बाकी रास्ते बंद कर दिए गए. पिंजरा खोला गया. कुछ दूर खड़े हो कर हम सब उसे ही देखने लगे. पहले वह खुले द्वार की ओर बढ़ा. फिर रुक कर गौर से उसे देखने लगा.
उस ने एक फुरकी ली लेकिन द्वार की ओर नहीं बढ़ा. हमें लगा कि हमारे डर से वह बाहर नहीं आ रहा है. हम सब ओट में हो कर उसे देखने लगे लेकिन वह दरवाजे की तरफ फिर भी नहीं बढ़ा. कुछ देर बाद वह दरवाजे की ओर बढ़ा जरूर लेकिन एक निगाह बाहर डाल कर फिर पिंजरे में मुड़ गया. फिर पिंजरे से निकल कर बाहर आया. हम सब उत्सुकता से उसे ही देख रहे थे. उस ने एक लंबी फुरकी ली, जैसे उड़ने से पहले पंखों को तोल रहा हो. वह पहली मुक्ति के समय की अपनी बेबसी को शायद भूल गया था.
उस ने दो तीन जगह अपने पंखों को चोंच से खुजलाया और  झटके से पंखों को फैलाया कि एक ही उड़ान में वहां से फुर्र हो जाए लेकिन पंख केवल फड़फड़ा कर रह गए. वह चकित था. उस ने एक उड़ान भर कर पास के एक टीले तक पहुंचना चाहा, लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही जमीन पर गिर पड़ा और फड़फड़ाने लगा. उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि उसे हो क्या गया है. वह बार बार उड़ने की कोशिश करता और हर बार मुंह की खाता.
अंत में, थका हारा पिंजरे की परिक्रमा करने के बाद वह द्वार पर आ रुका. उस ने एक निराश नजर अपने चारों ओर डाली और सिर  झुका कर धीरे धीरे पिंजरे के अंदर चला गया. मुड़ कर एक बार फिर ललचाई नजरों से उस ने पिंजरे के खुले द्वार को निहारा और हताशा से मुंह फेर लिया. पिंजरे में अपनी चोंच को पंखों के बीच छिपा कर आंख मूंद खामोश बैठ गया. अब चाह कर भी वह उस दिन पिंजरे को छोड़ कर नहीं जा सकता था.
वह शायद पछता रहा था कि मैं ने उस दिन उड़ जाने का मौका क्यों खो दिया. काश, उस दिन थोड़ी हिम्मत कर के मैं उड़ गया होता तो फिर चाहे मेरा जो होता, इस गुलामी से लाख गुना बेहतर होता, पर अब क्या करूं? उस ने मान लिया कि मुक्त उड़ान का, खुले आकाश का, बागों और खेतों की सैर का, प्रकृति की ममतामयी गोद का और नन्हे से अपने घोंसले का उस का सपना भी उसी की तरह इस पिंजरे में कैद हो कर रह जाएगा और एक दिन शायद उसी के साथ दफन भी हो जाएगा.
मुझे लगा जैसे आज उसका रोम रोम रो रहा है और वह पूरी मानव जाति को कोसते हुए कह रहा है- ‘यह आदमी नामक प्राणी कितना स्वार्थी है. खुद तो आजाद रहना चाहता है पर आजाद पंछियों को कैद कर के रखता है. ऊपर से हुक्म चलाता है, यह जताने के लिए कि कोई ऐसा भी है जो उस के इशारों पर नाचता है. मुझे कैद कर दिया पिंजरे में. ऊपर से हुक्म देता है, यह बोलो, वह बोलो. बोल दिया तो ‘शाबाश’ कहेगा, लाल फल खाने को देगा. न बोलो तो डांट पिलाएगा.
‘मुझे नहीं सीखनी इंसान की भाषा. खुद तो बोल बोल कर इंसानों ने इंसानियत का सत्यानाश कर रखा है और हमें उन के बोल बोलने की सीख देता है. कहां बोलना है, कैसे बोलना है और कितना बोलना है, यह इंसान अभी तक समझ नहीं पाया. इसे इंसान सम झ लेता तो बहुत से दंगे फसाद,  झगड़े और उपद्रव खत्म हो जाते.
‘चला है मुझे सिखाने, मेरी चुप्पी से ही कुछ सीख लेता कि दर्द अकेले ही सहना पड़ता है. फिर चीख पुकार क्यों? इतना भी इंसान की समझ में नहीं आता. बहुत श्रेष्ठ समझता है अपने आप को. शौक के नाम पर पशु पक्षियों को कैद कर के उन पर हुक्म चलाता है और कहता है, ‘पाल’ रखा है.
‘कुत्तेबिल्ली इसलिए पालता है कि उन पर धौंस जमा सके. दुनिया को दिखाना चाहता है कि देखो, ये कैसे मेरा हुक्म बजा लाते हैं. कैसे मेरे इशारों पर जीते मरते हैं. हुक्म चलाने की, शासन करने की, अपनी आदम इच्छा को आदमी न जाने कब काबू कर पाएगा? इसीलिए तो निरंकुश घूम रहा है सारी सृष्टि में.
‘इंसान मिलजुल कर क्या खाक रहेगा, जबकि इसे दूसरा कोई ऐसा चाहिए जिस पर यह हुक्म चलाए. जब तक लोग हैं तो लोगों पर राज करता है. लोग न मिलें तो हम पशु पक्षियों पर रोब गांठता है. जब लोगों ने हुक्म मानने से यह कहते हुए मना कर दिया कि जैसे तुम, वैसे हम. तो फिर तुम कौन होते हो हम पर राज
करने वाले? तब शामत हम सीधे साधे पशु पक्षियों पर आई. किसी ने मेरी बिरादरी को पिंजरे में डाला तो किसी ने प्यारी मैना को. किसी ने बंदर को धर पकड़ा तो किसी ने रीछ की नाक में नकेल डाल दी.
‘इंसान है कि हमें अपने इशारों पर नचाए जा रहा है. हमें नाचना है. हमारी मजबूरी है कि हम इंसान से कमजोर हैं. हमारे पास इंसान जैसा शरीर नहीं. हमारे पास आदमी जैसा फितरती दिमाग नहीं. आदमी जैसा सख्त दिल नहीं. हम आदमी जैसे मुंहजोर नहीं. इसीलिए हम बेबस हैं, लाचार हैं और इंसान हम पर अत्याचार करता चला आ रहा है.
काश, इंसान में यह चेतना आ जाए कि वह किसी को गुलाम बनाए ही क्यों? खुद भी आजाद रहे और दूसरे प्राणियों को भी आजाद रहने दे. जैसे जैसे ऐसा होता जाएगा वैसे वैसे यह दुनिया सुघड़ होती जाएगी, सुंदर होती जाएगी, सरस होती जाएगी. जब आदमी के ऊपर किसी का शासन होगा तब उसकी समझ में आएगा कि आजाद रहने और आजाद रहने देने का आनंद क्या है, बंद आकाश और खुले आकाश का अंतर क्या है? तब आदमी महसूस करेगा कि जब वह हम पशु पक्षियों को अपना गुलाम बनाता है तो हम पर और हमारे दिल पर क्या गुजरती है.’
तोते की टें…टें की आवाज ने मेरी तंद्रा भंग कर दी. मैं  झटके से उठा. खूंटी पर से तोते का पिंजरा उतारा और चल पड़ा  झुरमुट वाले खेतों की ओर.
खेत शुरू हो गए थे. पकी फसल की बालियां खाने के लिए हरे चिकने तोते  झुरमुट से खेतों तक उड़ान भरते और चोंच में अनाज की बाली लिए लौटते.  झुरमुट और खेत दोनों में उन के टें…टें के स्वर छाए थे. पिंजरे का तोता भी अब चहकने लगा था.
मैं रुक गया और पिंजरे को अपने चेहरे के सामने ले आया और ‘पट्टूपट्टू’ पुकारने लगा. वह पिंजरे में इधर से उधर व्याकुलता से घूमता जा रहा था. बीच बीच में पंख भी फड़फड़ाता जाता. उस में अप्रत्याशित चपलता आ गई थी. शायद यह दूसरे तोतों की आवाज का करिश्मा था जो वह मुक्ति के लिए आतुर हो रहा था.
मैंने ज्यादा देर करना ठीक नहीं सम झा. पिंजरे का द्वार  झुरमुटों की तरफ कर के खोला और प्यार से बोला, ‘‘जा, उड़ जा. जा, शाबाश, जा.’’
वह सतर्क सा द्वार तक आया. गर्दन बाहर निकाल कर जाने क्या सूंघा, पंख फड़फड़ाए और उड़ गया. एक छोटी सी उड़ान. वह सामने के पत्थर पर जा टिका. एक क्षण वहां रुक कर पंख फड़फड़ाए और फिर उड़ान ली. यह उड़ान, पहली उड़ान से कुछ लंबी थी.
अब वह एक  झाड़ी पर जा बैठा. उस के बाद उड़ा तो एक जवान पेड़ की लचकदार डाल पर जा बैठा. उस के बैठते ही डाल  झूलने लगी. उस ने एक दो  झूले खाए और फिर यह जा, वह जा, तोतों के  झुंड में शामिल हो गया. मैं ने संतोष की सांस ली.
लौटने लगा तो हाथ में खाली पिंजरे की तरफ ध्यान गया. एक पल पिंजरे को देखा और विचार कौंधा कि सारे खुराफात की जड़ तो यह पिंजरा ही है. यह रहेगा, तो न जाने कब किस पक्षी को कैद करने का लालच मन में आ जाए.
मैं ने घाटी की ओर एक सरसरी नजर डाली और पिंजरे को टांगने वाले हुक से पकड़ कर हाथ में तोलते हुए एक ही  झटके से उसे घाटी की तरफ उछाल दिया. पहाड़ी ढलान पर शोर से लुढ़कता पिंजरा जल्दी ही मेरी आंखों से ओझल हो गया.
घर लौटते समय मैं खुद को ऐसा हलका महसूस कर रहा था जैसे मेरे भी पंख उग आए हों.

इन्हें आजमाइए:
कपड़ों पर प्रैस की सिलवट तुरंत निकालनी है तो कपड़ा हैंगर पर टांग कर बाथरूम में रख दें जब गरम पानी से नहाएं. सारी सिलवटें अपने आप गायब हो जाएंगी.
बोतल में आखिर में बची टमाटर सौस नहीं निकल रही हो तो थोड़ा सिरका डाल कर झटकें, सारी सौस बाहर आ जाएगी.
पुराने तौलिए को मुलायम बनाना चाहते हैं तो धुलाई के दौरान उस पर सफेद सिरका डालें, तौलिया फूला और मुलायम हो जाएगा.
पेय की बोतल पर गीला टिश्यू पेपर या कपड़ा लपेट कर फ्रीजर में रखें. 10-12 मिनट में बर्फ जैसा ठंडा हो जाएगा.
एक स्प्रे बोतल में पानी, नींबू रस, थोड़ा वनीला एसेंस मिलाएं. कमरे में 2-3 घंटे के बाद स्प्रे करते रहें, घर महकेगा होटल जैसा.
मोबाइल पर जरूरत के समय ही लोकेशन ऑन करें. प्राइवेसी सुरक्षित रहती है.
नल या स्टील सिंक पर जंग या दाग हो तो नींबू और नमक से रगड़ें. चमक फिर से नई जैसी हो जाएगी.
केला जल्दी काला न पड़े, इस के लिए डंठल पर प्लास्टिक रैप या फॉइल लपेट दें, ज्यादा दिन पीले रहेंगे.
लहसुन की कलियां माइक्रोवेव में 10 सेकंड रखें, छिलका आसानी से उतर जाएगा. Romantic Story.

Hindi Kahani: आत्मसम्मान- आखिर लड़के क्यों शर्मसार हो रहे थे?

Hindi Kahani: क्या आत्मसम्मान सिर्फ लड़कियों का होता है, लड़कों का नहीं. उन तीनों लड़कों पर जो घिनौना आरोप लगाया जा रहा था, इस से वे शर्मसार हुए जा रहे थे. आखिर कौन उन्हें फंसा रहा था?
शहर का नामी स्कूल. विशाल भव्य इमारत. शहर के जानेमाने बिजनैसमैन, डाक्टर्स परिवार के बच्चों का स्कूल. सुबह 7 बजे का समय. कारों की कतारें. कई पेरैंट्स आए थे बच्चों को छोड़ने तो वहीं कई ड्राइवर्स भी. स्कूल असैंबली में पहुंचते ही सभी बच्चे अनुशासित कतारों में खड़े थे.
स्कूल प्रेयर व राष्ट्रगान समाप्त होते ही बच्चे अपनीअपनी क्लास में जाने की जल्दी करने लगे. तभी माइक पर टीचर की आवाज गूंजी, ‘‘अपनी क्लास में नहीं जाएं, रुकिए.’’ सभी बच्चे अपनीअपनी जगह खड़े हो गए. वे जानते थे कि कुछ नई घोषणाएं, नई सूचनाएं इसी समय दी जाती हैं, यह नई बात नहीं थी.
तभी प्रिंसिपल ने माइक से तेज आवाज में कहा, ‘‘मानस क्लास इलेवन, अमन व रणवीर क्लास टैंथ तीनों स्टेज पर आएं.’’ अपने नाम की घोषणा होते ही तीनों सम झ नहीं पाए, हुआ क्या है? वे घबराए. लेकिन जाना तो था ही स्टेज पर. तीनों गए.
स्टेज पर पहुंचते ही प्रिंसिपल की गुस्सेभरी आवाज, ‘‘तुम तीनों आजकल क्या कर रहे हो? पढ़ाई पर ध्यान देने के बजाय लड़कियों को अश्लील, न्यूड वीडियो और मैसेज करते हो? यही संस्कार दिए हैं घरवालों ने?’’ कहते हुए उन्होंने अमन को जोरदार थप्पड़ मारा.
‘‘नहीं सर, हम ने ऐसा कुछ नहीं किया,’’ मानस बोला, ‘‘आप से किसी ने झूठ बोला है, झूठी शिकायत की है.’’
वह घबरा गया था. रणवीर भी घबरा गया था, वह हाथ जोड़ कर, कान पकड़ कर बोला, ‘‘नहीं मैडम, हम ने ऐसा कुछ नहीं किया.’’
‘‘तुम्हारी शिकायत आई है. शिकायत क्यों झूठी होगी?’’ प्रिंसिपल चिल्लाते हुए बोलीं, ‘‘तुम तीनों को हफ्तेभर के लिए रैस्टिकेट किया जाता है. पेरैंट्स मीटिंग के बाद तुम तीनों स्कूल आ सकोगे. जाओ अब,’’ प्रिंसिपल ने कहा, ‘अपने मोबाइल यहीं रखो.’
तीनों बेहद अपमानित महसूस कर रहे थे खुद को. तीनों ही अच्छे परिवार से थे. मानस के पिता डाक्टर थे. अमन और रणबीर के पिता के बिजनैस में थे. तीनों स्कूल से निकल कर शहर के एक गार्डन में जा कर बैठ गए. लेकिन स्कूली यूनिफौर्म पहनी हुई थी, इसलिए मन में यह डर भी था कि कहीं लोग यह न सम झें कि स्कूल से बंक मार कर गार्डन में बैठे हैं. कहीं कोई जानपहचान वाला मिल गया तो? मानस के डैड के कई पेशेंट्स आतेजाते टकरा जाते थे. वे मानस को भी जानते थे. अमन, रणवीर सोच रहे थे घरवालों को क्या बताएंगे? आखिर तीनों ने तय किया कि घर जा कर सब सचसच बताएंगे.
अमन ने कहा, ‘‘इतनी इन्सल्ट होने के बाद जीवन को खत्म कर लेना चाहिए. पूरे स्कूल के सामने जलील किया गया. सुसाइड कर लेना चाहिए. सुसाइड नहीं कर सकते तो प्रिंसिपल की जम कर पिटाई करनी चाहिए.’’
‘‘नहींनहीं, ऐसा कुछ नहीं करेंगे. घर जा कर सोचते हैं. कल शाम को इसी गार्डन में मिलते हैं.’
तीनों अपनेअपने घर चले गए.
तीनों के पिता अपनेअपने काम में बिजी थे. सोचने का समय तीनों को मिल गया. मानस, रणवीर, अमन ने अपनीअपनी मां को डिटेल बता दी थी. ये सब सुन कर घरों का माहौल तनावपूर्ण तो हो गया था, डांट भी अच्छीखासी पड़ी थी तीनों को. इंतजार था तो डैड के घर आने का.

रात लगभग 10 बजे मानस के पिता डा. विशाल अपने घर पहुंचे तो देखा, घर में आज खामोशी कुछ ज्यादा है. उन्होंने सोचा, शायद वे ज्यादा लेट हैं तो मानस सो गया होगा. कभीकभी इमरजैंसी केसों में उल झ जाते हैं, डाक्टरी का पेशा ही ऐसा होता है. सो, उन्होंने ध्यान नहीं दिया. कपड़े चेंज कर डाइनिंग टेबल पर आ गए. मानस की मौम विनीता ने गरम चपाती ला कर रखी क्योंकि नौकर आदि सब शाम 7 बजे ही चले जाते हैं.
‘‘मानस क्या जल्दी सो गया था?’’ डा. विशाल ने दाल कटोरी में डालतेडालते पूछा.
‘‘जी, वह जल्दी सो गया था.’’ विनीता सम झदार महिला थी. वह पति को डिनर के बीच में डिस्टर्ब नहीं करना चाहती थी. वह जानती थी, बात सुनने के बाद वे डिनर छोड़ देंगे.
डिनर के बाद वे वाशबेसिन में हाथ धो कर जैसे ही वापस आए, विनीता ने उन को सारी बात बता दी.
डा. विशाल का चेहरा गुस्से से तमतमा उठा, वे बोले, ‘‘पहले क्यों नहीं बताया, मानस अब इस स्तर पर उतर आया है?’’ फिर वे जोर से चिल्लाए, ‘‘मानस, मानस.’’
विनीता ने तुरंत कहा, ‘‘वह सही है, उस ने ऐसा कुछ नहीं किया होगा. सोचो,
95 फीसदी नंबर लाने वाला बैडमिंटन का अच्छा खिलाड़ी है, उस के तो दोस्त गिनेचुने ही हैं. वह ऐसा क्यों करेगा, क्या आप की पोजीशन नहीं जानता वह?’’
‘‘अरे हां, यह तो सोचा ही नहीं मैं ने,’’ डा. विशाल बोले, ‘‘हर जगह अव्वल आने वाला मानस ऐसा क्यों करेगा? हम ने तो कभी उस पर कोई पाबंदी लगाई नहीं. उस की तो कई लड़कियां फ्रैंड्स हैं, वह ऐसा क्यों करेगा?’’ और तब तक डा. विशाल मानस के कमरे का दरवाजा खोल चुके थे.
पलंग पर मानस औंधा लेटा हुआ फूटफूट कर रो रहा था. डा. विशाल ने पहली बार अपने किशोर बेटे को रोते देखा था. वे तुरंत मानस के पास गए. उसे गले लगा लिया. मानस डैड का सहारा पा कर जोरजोर से रो पड़ा. तभी विनीता पानी का गिलास ले आई. उस ने पानी पिया, फिर सारी बातें बता दीं.
डा. विशाल सब सुनते रहे, फिर बोले, ‘‘वह लड़की कौन है कि जिस को तुम ने वीडियोज, मैसेज किए?’’
‘‘वह नहीं बताया प्रिंसिपल ने,’’ मानस बोला.
‘‘तुम्हारा मोबाइल?’’ डा. विशाल ने सवाल किया.
‘‘प्रिंसिपल ने उसे जब्त कर अपने पास रख लिया,’’ मानस बोला, ‘‘अमन, रणवीर के मोबाइल भी उन्होंने रख लिए थे.’’
‘‘अमन, रणवीर के डैड के मोबाइल नंबर याद हैं?’’
‘‘जी,’’ मानस बोला.

डा. विशाल ने रणवीर और अमन के डैड को कौल कर उसी समय घर पर बुलाया. कुछ ही देर में अमन, रणवीर अपनेअपने डैड के साथ मानस के घर पहुंच गए. दोनों के चेहरे उतरे हुए थे. तनाव चेहरों पर साफ झलक रहा था. लगता था, परिवार में बहुत डांटा गया है, शायद पिटाई भी की गई हो.
डा. विशाल ने सब को देखा, फिर कुछ सोचते हुए बोले, ‘‘पहले तो तुम तीनों यह सोच कर बताओ कि असल बात क्या है?’’
‘‘अंकलजी, हमें फंसाया जा रहा है,’’ अमन, रणवीर दोनों एकसाथ बोले.
रणवीर के पापा ने भी डा. विशाल से कहा, ‘‘रणवीर की तो मैं पिटाई भी कर चुका, लेकिन रणवीर बोल रहा है, झूठी रिपोर्ट की है किसी ने प्रिंसिपल से.’’
‘‘वह लड़की कौन है?’’ डा. विशाल ने पूछा.
‘‘यह प्रिंसिपल ने नहीं बताया.’’
‘‘अच्छा’’ कहते हुए डा. विशाल सोचने लगे, फिर कुछ देर बाद बोले, ‘‘सब से पहले तो तुम तीनों मजबूत रहो कि कोई भी गलत कदम नहीं उठाना है. सुसाइड जैसी बातें नहीं सोचनी हैं क्योंकि हो सकता है कल किसी पेपर में भी यह खबर आ जाए या सोशल मीडिया पर. सोशल मीडिया पर यह खबर फिलहाल नहीं आई है. प्रिंसिपल को स्कूल की रैपुटेशन की भी चिंता होगी, ठीक है?’’
‘‘आप सही बोल रहे हैं,’’ अमन के पापा बोले, ‘‘हम पेरैंट्स मीटिंग का इंतजार क्यों करें, कल ही सुबह, दोपहर या शाम, जब प्रिंसिपल समय देते हैं, मिल लेते हैं.’’
‘‘जी, बिलकुल सही है,’’ रणवीर के पापा बोले.
‘‘लड़कियों के नाम भी पूछ लेते हैं, लड़कियां कौन हैं?’’ डा. विशाल बोले, क्योंकि यह तीनों लड़कों के भविष्य का प्रश्न है. पढ़ाई खराब होगी हफ्तेभर.’’ और उन्होंने प्रिंसिपल को फोन लगा दिया.

डा. विशाल का फोन प्रिंसिपल ने तुरंत उठा लिया, ‘‘हम लोग कल आप से मिलना चाहते हैं मानस को रैस्टिकेट किए जाने वाले मामले के सिलसिले में,’’ डा. विशाल बोले.
‘‘क्यों नहीं, जरूर, कल दोपहर बाद. मु झे भी दुख है कि मानस इतनी गंदी हरकत कर सकता है,’’ प्रिंसिपल बोली.
‘‘मैडम, मु झे लगता है कि ऐसा नहीं हुआ है. मानस ऐसा नहीं कर सकता. मु झे अपने बेटे पर भरोसा है.’’
‘‘कल हम दोपहर बाद मिलते हैं,’’ प्रिंसिपल से बात खत्म करने के बाद डा. विशाल ने कहा, ‘‘प्रिंसिपल से हम सब कल दोपहर बाद मिलेंगे. उन्होंने समय दे दिया है.
कल मिलने के लिए सब तैयार हो गए थे. उन्होंने देखा, अमन का चेहरा उतरा हुआ था.
‘‘अमन, क्या हुआ? हम मिल रहे हैं प्रिंसिपल से, सारी बातें क्लियर हो जाएंगी.’’
‘‘वो, अंकलजी, मैं सोच रहा था,’’ अमन मुश्किल से बोला.
‘‘क्या सोच रहे हो, बोलो,’’ अब अमन के पापा ने सवाल किया.
‘‘वो, पूरी असैंबली के सामने जो इन्सल्ट हुई है वह वापस नहीं आएगी.’’
‘‘पापा, पापा,’’ अब मानस बोला.
‘‘बोलो,’’ डा. विशाल बोले.
‘‘पापा, अमन सुसाइड करने की बात बोल रहा था,’’ मानस ने बताया.
‘‘बेटा, ऐसी बात कभी सपने में भी मत सोचना. तुम अपने परिवार की शान हो. तुम तीनों बैंडमिंटन के अच्छे खिलाड़ी हो. तुम्हारे सुसाइड करने से यह बात साबित हो जाएगी कि आरोप सही है. हमें यह साबित करना है, तुम लोग सही हो, आरोप झूठा है.
‘‘हमें जीवन की मुसीबतों से घबराना नहीं है, डट कर उन का सामना करना है, सम झे,’’ कहते हुए डा. विशाल ने अमन का गाल प्यार से थपथपा दिया.
‘‘अब कभी नहीं सोचोगे सुसाइड का, ठीक है?’’ डा. विशाल आगे बोले.
‘‘ठीक है, हम कल दोपहर में लंच के बाद स्कूल में मिलते हैं,’’ डा. विशाल ने कहा.
सभी अपने घर चले गए. उस समय रात के लगभग एक बज रहे थे.
दूसरे दिन दोपहर में सब स्कूल में उपस्थित थे. मानस, रणवीर, अमन प्रिंसिपल के केबिन के बाहर थे. कुछ बच्चों का स्पौर्ट्स पीरियड था, वे आजा रहे थे. कुछ बच्चों की नजरें जैसे ही तीनों पर पड़ीं, मुसकरा दिए, कटाक्षभरी मुसकान. लेकिन उन तीनों ुके साथ उन के पिता थे तो उन को हिम्मत थी कि पापा साथ में हैं.
कुछ ही देर में प्रिंसिपल के केबिन से एकदो टीचर निकलते दिखीं. एक टीचर अमन के नजदीक आए.
अमन ने कहा, ‘‘गुड आफ्टरनून मैडम.’’
टीचर ने जवाब नहीं दिया, आगे बढ़ गई.

प्रिंसिपल के केबिन में मानस के पेरैंट्स और रणवीर व अमन के पेरैंट्स के अलावा शहर के फेमस ज्वैलरी शौप के मालिक मि. दुग्गल और उन की पत्नी भी थे.
डा. विशाल और अमन व रणवीर के पेरैंट्स उन्हें तुरंत पहचान गए क्योंकि सब गोल्ड, डायमंड के गहने उन्हीं के यहां से खरीदते थे.
सब ने एकदूसरे से नमस्ते की, मुसकराए, फिर प्रिंसिपल को देखने लगे.
मानस, रणवीर, अमन प्रिंसिपल के सामने गरदन झुकाए अपराधी के समान खड़े थे.
एक क्षण उन्होंने डा. विशाल को देखा, फिर रणवीर, मानस और अमन के मोबाइल सामने रख दिए.
बारीबारी से मोबाइल वाले वीडियो डा. विशाल को दिखाए, साथ ही, किसी शिवानी नाम की लड़की के साथ अश्लील सैक्सी मैसेज भी दिखाए.
इसी प्रकार की चैट और वीडियो अमन और रणवीर के मोबाइल से भी भेजी
गई थीं.
‘‘यह शिवानी कौन है?’’ डा. विशाल ने सवाल किया मानस से.
‘‘मेरी बेटी है,’’ मि. दुग्गल ने जवाब दिया.
‘‘अच्छा,’’ कह कर डा. विशाल चुप हो गए.
‘‘अब बताएं क्या कहेंगे आप?’’ प्रिंसिपल बोली.
कुछ सोचते हुए डा. विशाल ने कहा, ‘‘जब तीनों लड़कों को आप ने यहां अपने केबिन में खड़ा कर रखा है तो शिवानी को क्यों नहीं बुलाया? वह क्लास में होगी, उसे भी बुलाइए.’’
‘‘उस की क्या जरूरत है, उस का मोबाइल है मेरे पास,’’ प्रिंसिपल बोली.
‘‘इस की जरूरत है, मैडम. मेरा कहना है इन लड़कों ने वीडियो नहीं भेजे,’’ डा. विशाल बोले.
‘‘शिवानी झूठी है, झूठ बोल रही है वह,’’ अमन के पापा बोले.
‘‘मेरी लड़की झूठे आरोप क्यों लगाएगी?’’ मि. दुग्गल बोले.
‘‘यह तो वही बताएगी, बुलाएं उसे,’’ आखिर प्रिंसिपल ने शिवानी को बुलवाया.
शिवानी केबिन में आते ही रोने लगी.
‘‘देखो, मेरी लड़की के आंसू बोल रहे हैं, वह सही है.’’
प्रिंसिपल ने कहा, ‘‘शिवानी, रोना बंद करो, यह क्लियर करो कि ये वीडियोज इन लड़कों ने भेजे हैं?’’
‘‘जी मैडम, इन्होंने ही भेजे हैं. इन के मोबाइल से आए हैं,’’ शिवानी ने आंसू पोंछते हुए कहा.
‘‘तुम इतने विश्वास से कैसे बोल रही हो, इन के मोबाइल से किसी और ने भेजे हों तो?’’ अब रणवीर के पापा बोले.
‘‘देखो शिवानी, तुम सच बोलो, तुम झूठ बोल रही हो,’’ डा. विशाल बोले.
‘‘अंकलजी, मैं झूठ क्यों बोलूंगी,’’ शिवानी बोली.

‘‘मुझे भी विश्वास है, मानस ऐसा नहीं करेगा. ठीक है मैडम, आप ने समय
दिया, मैं पुलिस की मदद से अपने बेटे पर लगाए आरोप को झूठा सिद्ध
करूंगा. पुलिस की जांच में सच झूठ का पता चलेगा. दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा.’’ ऐसा कहते हुए डा. विशाल ने अमन व रणवीर के पापा से कहा, ‘‘आइए, बच्चों के साथ पुलिस स्टेशन चलते हैं.’’
तभी प्रिंसिपल ने देखा, शिवानी घबरा गई है. उस का चेहरा डर के मारे पीला पड़ गया.
‘‘शिवानी बेटा, क्या हुआ, क्यों घबरा रही हो?’’
शिवानी अपने पिता मि. दुग्गल से लिपट गई, रोतेरोते बोली, ‘‘पापा, सौरी, मैं ने झूठ बोला था.’’
दुग्गल को काटो तो खून नहीं. शर्म और गुस्से से उन का गोरा चेहरा लाल हो गया. उन्होंने एक थप्पड़ शिवानी को मारा. शिवानी का रोना तेज हो गया.
प्रिंसिपल को देख कर डा. विशाल मुसकरा दिए, बोले, ‘‘देख लिया, आरोप झूठे थे.’’
‘‘लेकिन क्यों किया तुम ने, किस प्रकार किया?’’ प्रिंसिपल गुस्से से बोली.
‘‘वो, मधुकर अंकल,’’ शिवानी बोली.
‘‘मधुकर अंकल, ये कौन हैं?’’ प्रिंसिपल बोली.
‘‘मैं बताता हूं मधुकर के बारे में,’’ मि. दुग्गल बोले, ‘‘मधुकर मेरा ड्राइवर है, जो रोज शिवानी को स्कूल छोड़ने आता है. लेकिन उस का इस सब से क्या मतलब?’’ दुग्गल को गुस्सा आने लगा था.
‘‘पूरी बात सचसच बताओ क्या माजरा है?’’ प्रिंसिपल बोली.
‘‘दरअसल, ये तीनों बैडमिंटन के अच्छे प्लेयर हैं, स्कूल की एक्टिविटीज में भी आगे रहते हैं. हमारे ग्रुप को हमेशा हार देखनी पड़ती है, इसलिए इन को परेशान करने के लिए मैं ने यह किया,’’ शिवानी ने बताया.
‘‘वीडियो इन के मोबाइल से कैसे गए, यह भी बताओ?’’
‘‘स्पौर्ट्स पीरियड में जब ये तीनों खेल रहे थे तब इन के मोबाइल औन थे, जिस से वीडियो भी बन रहे थे. मैं ने मधुकर अंकल को सब बता दिया था. गार्ड मधुकर अंकल को जानता था, इसलिए रोका नहीं.

‘‘मधुकर अंकल ने इन तीनों के मोबाइल से सैक्सी वीडियो और चैट मेरे मोबाइल पर पोस्ट कर दिए थे. ये खेलने में बिजी थे. इस तरह ऐसा हो पाया,’’ यह कह कर शिवानी ने सौरी बोला और फिर रोने लगी.
अब प्रिंसिपल की बारी थी सौरी बोलने की. लेकिन डा. विशाल ने कहा, ‘‘यहां नहीं असैंबली में सौरी बोलेगी शिवानी.
‘‘डा. साहब, लड़की है, बदनामी होगी,’’ प्रिंसिपल मैडम बोली.
‘‘बदनामी क्या लड़कों की नहीं होती?’’ मि. दुग्गल बोले.
‘‘ठीक है,’’ प्रिंसिपल बोली.
दूसरे दिन सुबह ही पूरी असैंबली, स्कूल स्टाफ और डा. विशाल और रणवीर व अमन के डैड उपस्थित थे. प्रिंसिपल ने माइक पर कहा, ‘‘उस दिन जो आरोप लगा था अमन, रणवीर, मानस पर उन आरोपों की जांच हुई, आरोप झूठे और निराधार थे. यह गलती शिवानी की थी. हफ्तेभर के लिए शिवानी को रैस्टिकेट किया जाता है.
शिवानी ने माइक पर रोतेरोते सौरी बोला.
तीनों लड़के खुश थे, गर्व से सिर ऊंचा था. उन का आत्मसम्मान
उन को वापस मिल गया था. Hindi Kahani.

Best Hindi Social Story: आदिवासी- गांव में भीमा की CBI से क्यों हुई भिड़ंत?

Best Hindi Social Story: भीमा तो बस गांव में आदिवासियों की जीवनशैली देखने गया था, लेकिन फिर क्यों सीबीआई उस के पीछे हाथ धो कर पड़ गई थी? जब भीमा पुलिस के हत्थे चढ़ा तो अंत अकल्पनीय रहा.

‘‘इस घटना में और कौन-कौन शामिल था?’’ सीबीआई अधिकारी ने पूछा.
बुजुर्ग बुद्धिजीवी ने कहा, ‘‘इस हिंसा से मेरा कोई लेनादेना नहीं. यह बात सही है कि नक्सली विचारधारा से प्रभावित हूं. इसी पर भाषण भी चल रहे थे. मैं ने भी मंच पर अपनी बात कही. हिंसा कैसे फैल गई, मु झे पता नहीं. हमें अपनी बात कहने का हक है. इसे नक्सलवाद से जोड़ना दूसरी विचारधारा के लोगों की साजिश है.’’
सीबीआई अधिकारी ने हंसते हुए कहा, ‘‘तुम खुद स्वीकार रहे हो कि तुम नक्सली विचारधारा से सहमत हो. जो विचारधारा ही हिंसक है. वहां हिंसा तो होनी ही थी. जानकारी मिली है कि एक नक्सलवादी भी वहां था.’’
‘‘मु झे इस की कोई जानकारी नहीं है. हमारे खिलाफ सुबूत हो तो हमें गिरफ्तार कर के जेल भेज दो.’’
‘‘वो भी करेंगे. तुम जैसे देशद्रोहियों को तो फांसी पर चढ़ा देना चाहिए. तुम्हारे उत्तेजक, हिंसक भाषणों से ही दंगाफसाद हुआ है. तुम और तुम्हारे साथियों की पूरी गतिविधियों का वीडियो हमारे पास है.’’
‘‘औफिसर, जो हम ने कहा, वह फिर दोहरा सकते हैं. कोर्ट में भी दोहरा देंगे. हम ने ऐसा कुछ नहीं किया कि हिंसक घटना घटित हो. हमें खुद आश्चर्य है कि भीड़ हिंसक कैसे हो गई. आप को इस बात की भी जांच करनी चाहिए. मु झे इस में किसी की साजिश लगती है. आप यह बताइए, हमें किस आधार पर गिरफ्तार करेंगे?’’
‘‘तुम खुद और अपने साथियों को गिरफ्तार ही सम झो. भड़काऊ भाषण देना हिंसा ही है.’’
‘‘फिर तो हर नेता को गिरफ्तार कर के देशद्रोह का मुकदमा दर्ज होना चाहिए.’’
‘‘उन के भाषणों से हिंसा नहीं होती. खैर, मु झे यह बताओ कि वह नक्सली कहां गया?’’
‘‘मैं ने कहा न, मु झे नहीं मालूम. जंगलों से छिप कर कोई व्यक्ति इस महानगर में भला क्यों आएगा?’’
‘‘हमारे पास पक्की जानकारी है.’’
‘‘तो आप पता कर लीजिए. कौन सा नक्सली हमारी सभा में कहां से आया. मैं किसी नक्सली को नहीं जानता.’’

चारों बुजुर्ग बुद्धिजीवियों से पूछताछ की गई. सख्ती भी बरती गई लेकिन बहुत खोजबीन के बाद भी कुछ पता नहीं चला. मामला तूल पकड़ रहा था. मीडिया और वामपंथी विचारधारा के लोग सरकार पर हमला कर रहे थे. एक विशेष विचारधारा के लोगों पर सरकार अत्याचार कर रही है. उन्हें देशद्रोही बता रही है. नक्सलवाद से जोड़ रही है. सरकार ने जल्द मामला सुल झाने के लिए कहा. सीबीआई ने हिंसा भड़काने के आरोप में चारों पर केस बना कर उन्हें कोर्ट में पेश किया. कोर्ट ने उन्हें जेल भेज दिया.
सीबीआई अधिकारी की सम झ में नहीं आ रहा था कि भीमा नाम के जिस नक्सली की उन्हें खबर मिली थी वह कहां गया. सख्त चैकिंग/नाकेबंदी के बावजूद वह अब तक पकड़ में क्यों नहीं आया. उसे जमीन खा गई या आसमान. भीमा गया तो कहां गया. सीबीआई की जांच जारी थी. अगर भीमा नाम का नक्सली मिल गया तो इस हिंसक कांड पर चारों के खिलाफ पक्का सुबूत मिल जाएगा. हो सकता है नक्सलियों के दल या उस व्यक्ति द्वारा हिंसा फैलाई गई हो. लाख कोशिश के बाद भी भीमा का कोई सुराग नहीं मिला. सीबीआई की एक टीम गुप्त रूप से नक्सल प्रभावित इलाकों में भीमा की खोज में लग गई.
वह नक्सल प्रभावित गांव से था. जहां एक ओर नक्सली आते थे उन्हें अपने दल में शामिल करने के लिए, उन से सहायता लेने के लिए, उन्हें अपने बनाए कानूनों पर चलने की हिदायत देने. वहीं दूसरी ओर पुलिस आती थी उन से नक्सलवादियों का पताठिकाना जानने के लिए. दोनों तरफ से वे जुल्म का शिकार होते. नक्सली कहते थे, वोट नहीं डालोगे. पुलिस गांव में नहीं आनी चाहिए. सरकार का बहिष्कार करो. हम तुम लोगों के लिए हैं. नक्सली तो आ कर चले जाते. पुलिस से मिले होने के आरोप में दोचार गांव के लोग जान से भी मार दिए गए. भीमा को पता नहीं था कि वे पुलिस से मिले थे या नहीं. भीमा को दोनों ही अच्छे नहीं लगते थे. नक्सली ज्यादातर पुलिस दल पर हमला करते थे.

जब कई पुलिस वाले मारे जाते थे तो पुलिस खिसिया कर गांव वालों को मारतीपीटती. उन्हें नक्सलवादी बना कर उन के झूठे एनकाउंटर करती, मुकदमे बना कर जेल में डालती, गांव खाली करने के लिए कहती.
भीमा ने सुना था कि दिमाग से सभी समस्याओं का हल हो सकता है. जब
उसे पता चला कि कुछ बुद्धिजीवी आदिवासियों के हित में बहुत कर रहे थे और उन का 3 दिनों बाद सम्मेलन है जहां वे आदिवासी समाज के हित में बहुतकुछ करने को कहने वाले हैं. भीमा को लगा कि उसे जाना चाहिए. अपने गांव की समस्या बतानी चाहिए. 3 दिन की यात्रा कर के वह उस स्थान पर पहुंचा. किसी से मिलना तो न हो पाया क्योंकि उस के पहुंचते ही भाषण शुरू हो चुका था.
लंबाचौड़ा, काला भीमा भीड़ में अलग नजर आ रहा था क्योंकि अपने क्षेत्र से वह इकलौता व्यक्ति था. उसे आश्चर्य भी हुआ कि उस के जैसा वहां कोई नहीं है. उस ने मन ही मन सोचा कि फिर इतनी सारी भीड़ किन लोगों की है. ये गोरेचिट्टे, दुबलेपतले, नाजुक से लोग क्या आदिवासी हैं? अगर
नहीं तो ये कौन लोग हैं? क्या ये सब आदिवासियों के शुभचिंतक हैं. थोड़ी देर में भीमा को सम झ में आ गया कि वह यहां गलत आ गया है. सारे भाषण किसी विशेष विचारधारा को ले कर हैं. जो किसी दूसरी विचारधारा के विरोध में हैं. उसे वे राजनीतिक दल भी नजर आए जो चुनाव के समय अकसर उस के गांव आते रहते हैं.

भीमा लघुशंका के लिए पंडाल से बाहर निकला. अचानक मारकाट शुरू हो गई. भीमा घबरा कर वापस रेलवे स्टेशन की तरफ चल दिया. भीमा 5वीं तक पढ़ा था गांव के स्कूल में. दुनियादारी की थोड़ीबहुत सम झ रखता था. जैसे ही वह रात में गांव पहुंचा, गांववालों ने कहा, ‘‘कहां गए थे. यहां पुलिस तुम्हारे बारे में पूछ रही थी. तुम ने कोई बड़ा कांड किया है. बचोगे नहीं. भाग जाओ यहां से.’’
वह सन्नाटे में था. बुद्धिजीवियों की सभा में जाने मात्र से पुलिस को परेशानी होने लगी. कहीं होने वाले दंगाफसाद में उस का नाम तो नहीं आ गया. रात वह गांव के बाहर खेत में सोया. सोते से किसी ने उसे जगाया. आंखें खुलीं तो देखा, उसे चारों तरफ नक्सली घेरे हुए हैं. नक्सली कमांडर सुतपा ने खुश होते हुए कहा, ‘‘बहुत बड़ा कांड कर दिया है तुम ने. शाबाश. अब पुलिस कुत्तों की तरह तलाश रही है. बचना है तो हमारे साथ चलो.’’ कोई रास्ता भी नहीं था उस के पास. पुलिस के हाथ में पड़ने का अंजाम वह जानता था. न चाहते हुए भी वह नक्सली दल में शामिल हो गया.

कमांडर ने कहा ‘‘अभी तुम लड़ाई के लायक नहीं हुए हो. धीरेधीरे सीख जाओगे. तब तक तुम खाना बनाओ अपने साथियों के लिए. बहुत नाम है सरकार में तुम्हारा. हम तुम्हें जल्द ही हथियार चलाना सिखा देंगे. एकदो बड़े कांड करो हमारे लिए भी. प्रमोशन पक्का है तुम्हारा.’’ वह खाना बनाना जानता था. कुछ और लोगों के साथ वह खाना बनाने लगा.
उसे अब तक सम झ नहीं आया कि उस ने ऐसा क्या किया है कि पुलिस से ले कर नक्सलियों में भी उस का इतना नाम हो गया है. डाइनामाइट के विस्फोट से पुलिस की गाडि़यां हवा में उछलने लगीं. चीजों से घाटी गूंजने लगी. आग, धुंआ और परखच्चे उड़ती गाडि़यां नजर आ रही थीं मुख्य सड़क पर. कमांडर के आदेश पर दल के सभी सदस्यों ने स्टेनगन का मुंह खोल दिया. तड़तड़ की आवाज के साथ घायल सिपाहियों को गोलियां छलनी करने लगीं. लाशें बिखरी पड़ी थीं क्षतविक्षत. कमांडर ने वापस चलने का आदेश दिया. नक्सली दल जंगलों में समा गया.
‘‘क्या यह ठीक था.?’’ भीमा ने पूछा.
‘‘हां, हम न मारते तो ये हम तक पहुंच जाते. फिर जो हाल उन का हुआ वो हमारा होता.’’ कमांडर ने कहा.

‘‘लेकिन इन्हें हमारे बारे में पता कैसे चला?’’ दल के दूसरे सदस्य ने पूछा. कमांडर ने कहा ‘‘रामा, लक्ष्मी याद हैं. हमारे दल में थे पहले. उन्हें प्यार हुआ. फिर शादी की बात ले कर हमारे पास आए. मैं ने कहा, ‘‘तुम लड़ने आए हो या गृहस्थी बसाने.’’ दोनों की खामोशी देख मैं ने उन्हें दल छोड़ कर घर बसाने की सलाह दी. दोनों दल छोड़ कर गांव चले गए.
‘‘पुलिस को पता चला, उस ने प्रलोभन दिया. पुलिस में भरती, सरकारी क्वार्टर और अच्छी तनख्वाह. दोनों लालच में आ गए. नहीं भी आते तब भी पुलिस उन्हें न छोड़ती. पुलिस ने उन से हमारे ठिकानों के बारे में जानकारी ली. उन्हें साथ लिया. जो इलाके उन के देखे हुए थे हमारे साथ रहते हुए उन में सब तरफ पुलिस का कब्जा हो गया. हमारे कई साथी मारे गए.
‘‘मु झे पता चला कि आज दोनों फिर पुलिस के साथ हमारे इस स्थान का पता बताने के लिए साथ आ रहे हैं, इसलिए मैं ने पुलिस के साथ उन दोनों को भी खत्म कर दिया. पुलिस उन का भरपूर इस्तेमाल कर के हमारे कई ठिकानों पर कब्जा कर चुकी थी. पहले ही कई लोग मारे जा चुके थे. हिसाब तो बराबर करना ही था. काश, रामा और लक्ष्मी को जाने ही न दिया होता. एक गलत उदाहरण चला गया आदिवासी और नक्सलियों में. सरैंडर करो. पुलिस की मदद करो और सरकारी नौकरी पाओ पुलिस की. इनाम अलग से.’’
‘‘खैर, अब पुलिस हमें पागल कुत्तों की तरह तलाशेगी. इसलिए इस क्षेत्र को छोड़ कर हमें दूसरे राज्य के जंगलों में प्रवेश करना होगा.’’
सब ने कमांडर सुतपा की बात पर सहमति जताई. भांयभांय करता जंगल. बड़ेबड़े सागौन के वृक्षों पर नक्सली ड्यूटी दे रहे थे. उन्हें दूर से आने वाला दिख जाता था.
कुछ लोग खाना बना रहे थे. भीमा भी उन के साथ था. कुछ पत्थरों पर आराम कर रहे थे. कमांडर ने भीमा को आवाज दे कर बुलाया.
‘‘जी कमांडर.’’
‘‘तुम से बड़ी उम्मीद है, भीमा. मु झे पता नहीं तुम ने क्या किया शहर में जा कर लेकिन पूरे कांड में तुम्हारा नाम लिया जा रहा है, जो हमारे लिए गर्व की बात है. खाना ही नहीं बनाते रहना है. हथियार चलाने का प्रशिक्षण आज से शुरू तुम्हारा. तुम्हें दूसरे दल का कमांडर बनना है. वैसे तुम ने कुछ किया भी या मुफ्त की वाहवाही पा रहे हो. कहीं पुलिस, सीबीआई तुम्हें किसी के लिए बलि का बकरा तो नहीं बना रही है.’’
भीमा ने पूरी बात सुनाई. ‘‘हां, इस का मतलब है.’’

कमांडर सुतपा ने बात को सम झते हुए कहा, ‘‘उन बुद्धिजीवियों के खिलाफ तुम्हें खड़ा कर के सरकार उन्हें लंबा लपेटने के चक्कर में है.’’
‘‘ऐसा ही लगता है, कमांडर.’’
‘‘ठीक है तो तुम वैसे ही बन कर दिखाओ, एक खतरनाक नक्सलवादी बन जाओ. आज तुम्हारा खाना बनाने का आखिरी दिन है.’’
‘‘एक बात पूछूं, कमांडर.’’ भीमा
ने कहा.
‘‘पूछो.’’
‘‘यह नरसंहार कर के हमें क्या मिला?’’
‘‘ये जो पुलिस और सरकार है न. ये हमारे जंगल छीन रहे हैं. हमें गांवों से खदेड़ते रहते हैं किसी बड़े उद्योगपति के कहने पर. हमें झूठे आरोपों में फंसा कर जेल भेजते हैं. हमारी बहूबेटियों की इज्जत लूटते हैं. हमें हमारे हक, अधिकारों से वंचित रखते हैं. यह लड़ाई अमीर और गरीब की है. हम गरीबों को उन का हक दिला कर पूंजीवाद को खत्म करना चाहते हैं और ये हम आदिवासियों से सबकुछ छीन कर अमीरों की झोली में डाल रहे हैं. सरकार इन की, पुलिस इन की. अपने वजूद को बचाए रखने के लिए यह लड़ाई जरूरी है, सम झे. अब जाओ खाना बनाने का आखिरी दिन
पूरा करो.’’
‘‘जी कमांडर,’’ यह कह कर भीमा खाना बनाने वालों के पास चला गया.
ऊंचे वृक्ष पर बैठे पहरा देने वाले नक्सली ने पक्षी की आवाज जोर से निकाली. कमांडर सुतपा ने फौरन आदेश दिया. ‘‘सभी अपने हथियार संभालो और जवाबी हमला करते हुए पीछे की तरफ हटते जाओ.’’ वृक्ष पर बैठे चारों नक्सलियों पर अचूक फायर हुए. चारों चीखते हुए वृक्ष से नीचे गिर गए. तत्काल उन की मौत हो गई.
तेजी से पुलिस बल ने गोलियां दागनी शुरू कर दीं. जवाब में नक्सलियों ने भी गोलियां चलानी शुरू कर दीं. दोनों तरफ से गोलियां चल रही थीं. नक्सली गोलियां चलाते हुए पीछे की तरफ भाग रहे थे. कुछ पुलिसकर्मी चीख कर गिर पड़े. कुछ नक्सली गोली लगते ही ढेर हो गए. भीमा के पैर में गोली लगी. वह कराह कर वहीं गिर पड़ा. शेष नक्सली जंगलों में गुम हो गए. पुलिस के हाथ लगा घायल भीमा.

पुलिस अफसर ने उसे कस कर पेड़
से बंधवा दिया. भीमा को हर तरह
की थर्ड डिग्री टौर्चर किया. उस से पताठिकाना पूछा गया नक्सलियों का. उस के पैर से खून बह रहा था. एक सिपाही गोली लगे स्थान पर अपनी बंदूक से प्रहार कर रहा था. भीमा की चीख जंगलों में गूंज रही थी.
‘‘मैं नया हूं. मु झे पताठिकाना नहीं मालूम.’’
‘‘क्या करते हो इन के साथ?’’
‘‘खाना बनाता हूं.’’
पुलिस अफसर ने हंस कर कहा, ‘‘रसोइया हो. कितने पुलिसवालों को मारा.’’
‘‘जी, एक भी नहीं. मु झे बंदूक चलानी नहीं आती. आज से प्रशिक्षण शुरू होने वाला था.’’
‘‘क्या नाम है तुम्हारा.’’
‘‘भीमा.’’
पुलिस औफिसर नाम सुन कर चौंक गया. ‘‘तुम्हारी तलाश तो सीबीआई को है. क्या किया था शहर में?’’
‘‘कुछ नहीं. मैं सिर्फ उन से मिल कर जानना चाहता था कि आदिवासी कैसे शांति से अपने जंगल में रह
सकते हैं?’’
पुलिस औफिसर कुछ सोचने लगा. इसे सीबीआई को सौंपे या इस का एनकाउंटर कर दे. सीबीआई को सौंपने से क्या मिलेगा? मुठभेड़ में मरेगा तो तरक्की, मैडल मिलेगा. भाड़ में गई सीबीआई.
‘‘नक्सलवादी क्यों बने?’’
‘‘पुलिस के डर से,’’ भीमा ने कराहते हुए कहा.
‘‘मैं तुम्हें हमेशा के लिए पुलिस के डर से मुक्त करता हूं,’’ पुलिस अधिकारी ने रिवौल्वर भीमा की ओर तानते हुए कहा.
‘‘साहब, मु झे छोड़ दीजिए.’’

‘‘तुम्हें छोड़ तो नहीं सकता.
सीबीआई के हवाले कर
दिया तो तुम पर केस चलेगा. मीडिया की सुर्खियां बन जाओगे तुम. रिहा हो गए कोर्ट से तो बुद्धिजीवी तुम्हें नेता घोषित कर देंगे. फिर तुम वामपंथी हो कर हमें, हमारे धर्म, हमारे ईश्वर को गाली दोगे. लोगों को हमारे खिलाफ भड़काओगे. पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे लगाओगे. हमारे धर्मग्रंथों का मजाक उड़ाओगे. सारे कट्टरपंथी तुम्हारे साथ हो जाएंगे और ऐसा मैं होने नहीं दूंगा.’’ पुलिस अधिकारी के चेहरे पर क्रोध और क्रूरता के भाव आ गए. उस ने गले में पहना हुआ लौकेट निकाला. उसे चूमा, प्रणाम किया और आसमान की ओर देख कर कहा, ‘‘हे ईश्वर, यह बलि आप के लिए, धर्म के लिए.’’ फिर उस ने गोली चला दी. Best Hindi Social Story.

Hindi Family Story: एबॉर्शन- बेटी पर बीती तो मां आगबबूला हो उठी

Hindi Family Story: लेखक- भगवती प्रसाद द्विवेदी- निशा आज उसी दोराहे पर खड़ी थी जिस पर कभी उस की मां खुद उद्विग्न सी छटपटा रही थी. मगर आज उचित मार्गदर्शन करने के बजाय वह निशा पर उबल पड़ी थी. आखिर क्यों?

सुरेश ने सुषमा की कलाई पकड़ ली. गुस्से से उस का दाहिना हाथ भी उठ गया.
इच्छा हुई कि वह पत्नी को दोतीन चपत लगा दे. मगर कुछ सोच कर उस ने
हाथ पीछे खींच लिया. निशा सिसकते हुए अपने कमरे में समा गई.
‘‘मारो, मारते क्यों नहीं?’’ सुषमा ने हाथ झटकते हुए कहा.
सुरेश ने कुछ भी जवाब देना उचित नहीं सम झा और अपने कमरे में वापस लौट, कुरसी खींच कर बैठ गया. फिर दाहिने हाथ की हथेली से माथा पकड़ लिया.
सुषमा भी पलक झपकते ही उसी कमरे में दाखिल हो गई.
‘‘और बहकाओ बेटी को, बदनामी तो तुम्हारी ही होगी न? मु झे क्या,’’ सुषमा ने नाकभौं सिकोड़ते हुए कहा.
काफी देर तक कोसने के बाद भी जब सुरेश ने कोई उत्तर नहीं दिया तो सुषमा पैर पटकते हुए चली गई. सुरेश ने थोड़ी देर के लिए राहत की सांस ली.
मगर तभी सुषमा के जलेकटे शब्द पिघले सीसे की मानिंद उस के कानों में उथलपुथल मचाने लगे. उसे सुषमा से सहानुभूति हो आई. हां, ठीक ही तो कह रही है वह. बदनामी तो अपनी ही होगी न?
एकाएक उस का मन उद्विग्न हो उठा. एक दफा जी में आया कि वह अभी जा कर निशा का गला दबा दे. न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी. तभी उस के अंतर्मन में बसा साहित्यकार उसे बारबार धिक्कारने लगा, छि:, कैसे दोमुंहे सांप सरीखे घटिया इंसान हो तुम. साहित्य में तो ऊंचीऊंची बातें करते नहीं अघाते, हरदम आदर्श बघारते हो. मगर परदे के पीछे ऐसे नीच विचार. कितने स्वार्थी हो तुम. क्या अपने वे दिन भूल गए, तुम दोनों ने भी ऐसे ही गुल खिलाए थे. किंतु तुम दोनों के अपराध की सजा भुगतनी पड़ी एक तीसरे मासूम को. शर्म नहीं आती ऐसी ओछी बातें सोचते हुए.
सुरेश का माथा एकबारगी झन झना उठा. आंखें मूंद कर उस ने ज्यों ही सिर झटकने की चेष्टा की, 25 साल पहले का वह दृश्य उस के मानसपटल पर एकाएक अंकित हो गया.
तब सुरेश और सुषमा डाक्टर के सम्मुख खड़े हो कर गिड़गिड़ा रहे थे और डाक्टर था कि उन्हें बारबार दुत्कार रहा था. मगर दूसरा कोई चारा भी तो नजर नहीं आ रहा था. आखिर बेचारे करते भी क्या, दोनों ने पिछले साल ही महाविद्यालय में दाखिला लिया था. मैरिट लिस्ट में दोनों का पहला और दूसरा स्थान था. दोनों की ही साहित्य में गहरी अभिरुचि थी और गत वर्ष जब महाविद्यालय में वादविवाद प्रतियोगिता का आयोजन हुआ तो सुरेश को विपक्ष में प्रथम स्थान मिला, जबकि सुषमा ने पक्ष में प्रथम स्थान हासिल किया.
फिर तो दोनों में आहिस्ताआहिस्ता आत्मीयता बढ़ी और अब पुस्तकालय के कोने में बैठे, दोनों गपशप करते हुए किसी भी विषय पर गहराई से लैक्चर झाड़ने लग जाते थे. सुषमा यदि कक्षा में पहले आ जाती तो वह मन ही मन सुरेश की बेताबी से प्रतीक्षा किया करती और किसी कारणवश अगर सुषमा कालेज न आ पाती तो सुरेश की बेचैनी चरम सीमा पर जा पहुंचती थी.
दो जिस्म एक जान सुरेश और सुषमा – दोनों एकदूसरे के पूरक जैसे लगने लगे थे. दोनों को ही ऐसा एहसास होने लगा था कि जिस जीवनसाथी की उन्हें तलाश थी वह जैसे अनायास ही हाथ लग गया हो. उन दोनों ने ही गहराई से महसूस किया था कि एक के बिना दूसरे का जीवन अधूरा है. कई बार वे दोनों रिश्ते की प्रगाढ़ता को जन्मजन्मांतर तक कायम रखने की सौगंध ले चुके थे.
कालेज से छूट कर दोनों आजाद पार्क के एक कोने में छिप, बैठ जाया करते थे और उन की अंतहीन बातों का सिलसिला घंटों चला करता था. बस, बातें और बातें. युवा मन की बातें. प्रणयभरी बातें. सपनीली व रोमानी बातें.
कुछ ही माह के बाद सुरेश और सुषमा का प्यार चरमोत्कर्ष पर पहुंच चुका था. दोनों शीघ्रातिशीघ्र एकसूत्र में बंधने के लिए बेताब थे. मगर उन के अभिभावक शादी के पक्ष में तब तक कतई नहीं थे जब तक कि उन की पढ़ाई समाप्त नहीं हो जाती.
तभी अचानक वह हादसा हो गया. उस रोज सुषमा कुछ अनमनी सी दिख रही थी.
पार्क में एकांत पाते ही सुरेश ने ज्यों ही उदासी का कारण पूछा था, वह सुरेश के कानों में पिघला सीसा उड़ेलते हुए बोल पड़ी थी, ‘सुरेश, मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं.’
‘एं, क्या कहा, तब तो बहुत बुरा हुआ,’ सुरेश ने हकलाते हुए कहा. उस की दशा भीगी बिल्ली सी हो गई थी.
खैर, दोनों ने सलाहमशविरा किया और तत्काल अस्पताल में दाखिल हुए.
‘डाक्टर, किसी भी शर्त पर एबौर्शन की व्यवस्था कर दीजिए, प्लीज,’ सुरेश के चेहरे से बेबसी झलक रही थी.
मगर डाक्टर ऐसा करने के लिए कतई तैयार न था.
आखिर सुषमा के धैर्य का बांध टूट पड़ा और वह सिसकते हुए डाक्टर के पैरों से लिपट गई थी, ‘अब हमारी इज्जत आप के हाथों में है, डाक्टर.’

सुषमा के अनुनयविनय ने पत्थर जैसे सख्त चिकित्सक को भी मोम सा पिघला
दिया था. उन दोनों के चेहरों पर परेशानी की रेखाएं गहराती देख डाक्टर ने वैसा
ही किया था. आखिर सबकुछ ठीकठाक हो गया और दोनों ने राहत की सांस ली थी.
शादी के वक्त सुरेश ने सुषमा के कान में आहिस्ता से कहा था, ‘आज हमारा बेटा पूरे 4 साल का हो गया होता. कितना अच्छा होता, अगर वह आज इस दुनिया में होता.’
शादी के एक वर्ष बाद सुषमा फिर मां बनने वाली थी. समाज ने तब उन्हें पतिपत्नी की मान्यता दे दी थी. मगर अचानक वक्त से पूर्व ही रक्तस्राव शुरू हो गया. परिवार के सभी लोग बेचैन हो उठे थे.
‘डाक्टर, किसी भी शर्त पर लड़का बच जाना चाहिए. शादी के बाद यह हम दोनों की पहली संतान है,’ सुरेश हकलाते हुए गिड़गिड़ा रहा था.
तभी डाक्टर की आंखों के सम्मुख वह दिन भी नाचने लगा था जब ऐसी ही परेशानी, ठीक ऐसी ही व्यग्रता थी. मगर तब अपने बच्चे की जान लेने के लिए और आज आने वाले शिशु की प्राणरक्षा के लिए.
डाक्टर के अथक परिश्रम से सबकुछ सामान्य हो गया था और कुछ माह बाद निशा ने जन्म लिया था.
मगर एकांत पाते ही डाक्टर ने अपने मन में उमड़तेघुमड़ते सवालों को सुरेश के सामने रख दिया था और वह भी अंदर ही अंदर तिलमिला कर रह गया था.
सच ही तो कहा था डाक्टर ने. कैसी है हमारी सामाजिक मान्यता, कभी अपनी ही संतान को मौत के घाट उतारने की विवशता और कभी प्राणरक्षा करने का दायित्वबोध.
तो क्या सुषमा आज वह दिन भुला बैठी है?
तभी वह निशा पर आगबबूला हो रही है.
आज निशा भी उसी दोराहे पर खड़ी थी जिस पर कभी सुषमा खुद उद्विग्न सी छटपटा रही थी. मगर आज उचित मार्गदर्शन करने के बजाय वह निशा पर इस कदर उबल पड़ी थी. आखिर क्यों? सुरेश कुछ सम झ नहीं पा रहा था.
सुरेश ने फिर सिगरेट सुलगाई और कश दर कश खींचने लगा. उसे एकाएक निशा की बातें स्मरण हो आईं-

कुछ ही घंटे पहले की तो बात है. सुरेश अपने कमरे में बैठा हुआ अधूरी कहानी को मुकम्मल करने में मशगूल था. सुषमा अधबुने स्वेटर को बुनने में तल्लीन थी. तभी आंगन में कै करती निशा पर उस की निगाहें अटक सी गई थीं. उस ने सुषमा को भेजा था, ‘‘देखो तो, क्या बात है, निशा की तबीयत खराब है क्या?’’
‘‘क्या हुआ निशा, क्या बात है? सुबह में भी तुम्हारा जी मिचला रहा था और अभी फिर. आखिर माजरा क्या है?’’ सुषमा की अनुभवी आंखें निशा में कुछ टटोलने सी लगी थीं.
‘‘मां, मैं और राजीव, उस का…’’
निशा की हकलाहट सुन कर सुरेश को तो जैसे सांप सूंघ गया था. वह अचरज से निशा की ओर खिड़की से देखने लगा था.
क्या इतिहास अपनेआप को दोहरा रहा है?
‘‘मैं ने कोई पाप नहीं किया, मां. हम दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं,’’ निशा ने खंखार कर कहा था.
‘‘बहुत देखा है हम ने भी प्यार का नाटक,’’ कहते हुए सुषमा ने ज्यों ही मारने के लिए हाथ उठाया था, सुरेश ने लपक कर उस की कलाई पकड़ ली थी.
सुषमा चाय का प्याला थमा कर बैठ गई. सुरेश चुपचाप समस्या और विचारों के बवंडर से जू झता रहा.
सुषमा ने सन्नाटा तोड़ा, ‘‘मैं तो आरंभ से ही कहती आ रही हूं कि राजीव का बारबार यहां आना मु झे अच्छा नहीं लगता. आखिर, लड़की के पांव फिसल ही गए. अब करो, जो करना हो. जाओ, एबौर्शन कराते फिरो.’’
‘‘नहीं, हरगिज नहीं,’’ अपलक सुषमा की ओर देखते हुए सुरेश ने कहा, ‘‘इन के अपराध की सजा कोई और क्यों भुगते? मैं इस आने वाले बच्चे
की मौत का कारण नहीं बन सकता. इस की सजा निशा और राजीव को
भुगतनी होगी.’’
‘‘सजा वे भुगतेंगे, लेकिन अपनी ही मिट्टी पलीद होगी न?’’ सुषमा ने हौले से कहा, ‘‘बुद्धिमता इसी में है कि सफाई करा दो.’’
सुरेश ने निशा को अपने पास बुलाया. फिर राजीव को खबर भिजवा कर बुला लिया. निशा को राजीव पसंद नहीं था क्योंकि पेरैंट्स बहुत बड़े घर में रहते थे. जाति तो उस ने पूछी नहीं थी पर उसे लगता था कि वह अपनी जाति का नहीं है क्योंकि वह ज्यादा गोरा था और बेहद स्मार्ट व सफल दिखता था.
‘‘निशा, राजीव, क्या वाकई तुम दोनों एकदूसरे से प्यार करते हो?’’ सुरेश ने बारीबारी से उन्हें घूरते हुए सवाल उछाला.
‘‘जी, हम दोनों एकदूसरे के बगैर जी नहीं सकते,’’ निशा और राजीव ने समवेत स्वर में कहा.
‘‘तुम दोनों ने अपराध किया है. उस अपराध की सजा तुम्हें भुगतनी ही होगी,’’ सुरेश ने आंखें नचा कर फिर कहा.
निशा और राजीव एकदूसरे को सहमीसहमी सी सूरत बनाए घूरते रहे.
तभी सुरेश ने डपटते हुए फैसला सुनाया, ‘‘बोलो, चुप क्यों हो? तुम दोनों को एकसूत्र में बंधना होगा.’’

निशा और राजीव के शंकाकुल नेत्रों में एकाएक चमक आ गई. राजीव ने असलियत जाहिर की, ‘‘जी, हम दोनों ने तो संविधान पर ही हाथ रख कर उसे साक्षी मान कर बहुत पहले ही यह फैसला कर लिया था पर आप लोगों के डर के मारे…’’
राजीव ने निशा की ओर नजरें घुमाईं. उस ने भी हामी भरी.
‘‘मगर राजीव बेटे,’’ सुरेश ने सिर खुजलाते हुए सम झाया, ‘‘तुम्हारा अपना फैसला ही अंतिम फैसला कैसे हो सकता है, जबकि तुम्हारे घर में मांबाप हैं, अभिभावक हैं?’’
‘‘मेरे मांबाप इस संबंध के पक्ष में इसलिए नहीं हैं कि ऐसी शादी में उन्हें दहेज के रूप में मोटी रकम नहीं मिल पाएगी और उन के बरसों से संजोए हुए सपने टूटबिखर जाएंगे. वे बेहद अंधविश्वासी हैं और कुंडली का चक्कर चलाए बिना नहीं मानेंगे,’’ बात खत्म करते हुए राजीव ने आखिरी निर्णय सुनाया, ‘‘मगर इस कोढ़ को समूल नष्ट करने में हमें ही तो पहल करनी होगी. हम दोनों ही अपने पैरों पर खड़े हैं, आत्मनिर्भर हैं, अच्छीखासी जौब में हैं. हम दोनों ने कोर्टमैरिज करने का फैसला कर लिया है, क्योंकि हम दोनों ही वयस्क हैं. पहले हम दोनों ही फूंकफूंक कर कदम रख रहे थे, जरूरी एहतियात बरत रहे थे. जब हम ने आत्मनिर्भर हो कर शादी करने का अंतिम निर्णय कर लिया और कोर्ट में अर्जी दे दी, तब से प्रिकौशन लेना बंद कर दिया था. हमें तो बस, आप का आशीर्वाद चाहिए.’’
सुरेश का मनमयूर नाच उठा. निशा और राजीव उन के पैरों की ओर झुक गए. सुषमा और सुरेश दोनों की ही आंखें हर्षातिरेक से भर आईं. Hindi Family Story.

Hindi Social Story: तभी तो कह रही हूं- दामिनी और अर्चना ज्यादा पैसे क्यों देती थीं?

Hindi Social Story: नीलिमा गर्ल्स होस्टल की  सख्त वार्डेन की तरह ही  अपने यहां रह रही  लड़कियों पर कड़ी  नजर रखतीं. लेकिन  जब उन की अपनी

ही बेटी उन का  कठोर अनुशासन तोड़ भटकने लगी तो क्या वह उस पर भी पाबंदियां लगा पाईं?

लड़कियों की मकान मालकिन कम वार्डेन नीलिमा ने रोज की तरह दरवाजे पर ताला लगा दिया और बोलीं, ‘‘लड़कियो, मैं बाहर की लाइट बंद कर रही हूं. अपने-अपने कमरे अंदर से ठीक से बंद कर लो.’’

एक नियमित दिनचर्या है यह. इस में जरा भी दाएं-बाएं नहीं होता. जैसे सूरज उगता और ढलता है ठीक उसी तरह रात 10 बजते ही दालान में नीलिमा की यह घोषणा गूंजा करती है.

उन का मकान छोटा-मोटा गर्ल्स होस्टल ही है. दिल्ली या उस जैसे महानगरों में कइयों ने अपने घरों को ही थोड़ी-बहुत रद्द-बदल कर छात्रावास में तब्दील कर दिया है. दूरदराज के गांवों, कस्बों और शहरों से लड़कियां कोई न कोई कोर्स करने महानगरों में आती रहती हैं और कोर्स पूरा होने के साथ ही होस्टल छोड़ देती हैं. इस में मकान कब्जाने का भी कोई अंदेशा नहीं रहता.

15 साल पहले नीलिमा ने अपने मकान का एक हिस्सा पढ़ने आई लड़कियों को किराए पर देना शुरू किया था. उस काम में आमदनी होने के साथ-साथ उन के मकान ने अब कुछकुछ गर्ल्स हॉस्टल का रूप ले लिया है. आय होने से नीलिमा का स्वास्थ्य और आत्मविश्वास तो अवश्य सुधरा लेकिन बाकी रहन-सहन में ठहराव ही रहा. हां, उन की बेटी के शौक जरूर बढ़ते गए. अब तो पैसा जैसे उस के सिर चढ़कर बोल रहा है. घर में ही हमउम्र लड़कियां हैंपर वह तो जैसे किसी को पहचानती ही नहीं.

सुरेखा और मीना एम.एससी.

गृह विज्ञान के फाइनल में हैं. पिछले साल जब वे रांची से आई थीं तो विचलित सी रहती थीं. जान-पहचान वालों ने उन्हें नीलिमा तक पहुंचाया.

‘‘1,500 रुपए एक कमरे का…एक कमरे को 2 लड़कियां शेयर करेंगी…’’ नीलिमा की व्यावसायिकता में क्या मजाल जो कोई उंगली उठा दे.

‘‘ठीक है,’’ सुरेखा और मीना के पिताजी ने राहत की सांस ली कि किसी अनजान लड़की से शेयर नहीं करना पड़ेगा.

‘‘खाने का इंतजाम अपना होगा. वैसे यहां टिफिन सिस्टम भी है. कोई दिक्कत नहीं है,’’ नीलिमा बताती जाती हैं.

सब कुछ ठीक-ठाक लगा. अब तो वे दोनों अभ्यस्त हो गई हैं. गर्ल्स होस्टल की जितनी हिदायतें और वर्जनाएं होती हैं, सब की वे आदी हो चुकी हैं.

‘‘नो बॉयफ्रेंड अलाउड,’’ यह नीलिमा की सब से अलार्मिंग चेतावनी है.

सुरेखा और मीना के बगल के कमरे में देहरादून से आई दामिनी और अर्चना हैं. दोनों ग्रेजुएशन कर रही हैं. इंगलिश आनर्स कहते उन के चेहरे पर ऐसे भाव आते हैं जैसे इंग्लैंड से सीधे आई हैं और सारा अंगरेजी साहित्य इन के पेट में हो.

दोनों कमरों के बीच में एक छोटा सा कमरा है जिस में एक गैस का चूल्हा, फिल्टर, फ्रिज और रसोई का छोटा-मोटा सामान रखा है. बस, यही वह स्थान है जहां देहरादूनी लड़कियां मात खा जाती हैं.

सुरेखा नंबर एक कुक है. जब-तब प्रस्ताव रख देती है, ‘‘चाइनीज सूप पीना हो तो 20-20 रुपए जमा करो.’’

दामिनी और अर्चना बिके हुए गुलामों की तरह रुपए थमा देतीं. निर्देशों पर नाचतीं. सुरेखा अब सुरेखा दीदी बन गई है. अच्छा-खासा रुतबा हो गया है. अकसर पूछ लिया करती है, ‘‘कहां रही इतनी देर तक. आंटी नाराज हो रही थीं.’’

‘‘आंटी का क्या, हर समय टोकाटाकी. अपनी बेटी तो जैसे दिखाई ही नहीं देती,’’ दामिनी भुनभुनाती.

ऊपर की मंजिल में भी कमरे हैं. वहां भी हर कमरे में 2-2 लड़कियां हैं. उन की अपनी दुनिया है पर आंटी की आवाज होस्टल के हर कोने में गूंजा करती है.

आज छुट्टी है. लड़कियां देर तक सोएंगी. जवानी की नींद जो है. नीलिमा एक बार झांक गई हैं.

‘‘ये लड़कियां क्या घोड़े बेच कर सो रही हैं,’’ बड़बड़ाती हुई नीलिमा सुरेखा के कमरे के पास से गुजरीं.

सुरेखा की नींद खुल गई. उसे उन की यह बेचैनी अच्छी लगी.

‘‘अपनी बेटी को उठा कर देखें ये… बस, यहीं घूमती रहती हैं,’’ सुरेखा ढीठ हो लेटी रही. जैसे ऐसा कर के ही वह नीलिमा को कुछ जवाब दे पा रही हो.

उधर होस्टल गुलजार होने लगा. गुसलखाने के लिए चिल्लपौं मची. फिर सब-कुछ ठहर गया. कुछ कार्यक्रम बने. मीना की चचेरी बहन लक्ष्मीनगर में रहती है. वहीं लंच का कार्यक्रम था इसलिए सुरेखा और मीना भी चली गईं.

एकाएक दामिनी ने चमक कर अर्चना से कहा, ‘‘चल, बाहर से फोन करते हैं. अरविंद को बुला लेंगे. फिल्म देखने जाएंगे.’’

‘‘अरविंद को बुलाने की क्या जरूरत.’’

‘‘लेकिन अब कौन सा शो देखा जाएगा. 6 से 9 के ही टिकट मिल सकते हैं,’’ अर्चना ने घड़ी देखते हुए कहा.

‘‘तो क्या हुआ?’’ दामिनी लापरवाही से बोली.

‘‘नहीं पागल, आंटी नाराज होंगी…. लौटने में समय लग जाएगा.’’

‘‘ये आंटी बस हम पर ही गुर्राती हैं. अपनी बेटी के लक्षण इन को नहीं दिखते. रोज एक गाड़ी आ कर दरवाजे पर रुकती है… आंटी ही कौन सा दूध की धुली हैं… बड़ी रंगीन जिंदगी रही है इन की.’’

अर्चना, दामिनी और अरविंद ‘दिल से’ फिल्म देखने हाल में जा बैठे. खूब बातें हुईं. अरविंद दामिनी की ओर झुकता जाता. सांसें टकरातीं. शो खत्म हुआ.

कालिज तक अरविंद दोनों को छोड़ने आया था. वहां से दोनों टहलती हुई होस्टल के गेट तक आ गईं. गेट खोलने को हलका धक्का दिया. चूं…चूं… की आवाज हुई.

‘‘तैयार हो जाओ डांट खाने के लिए,’’ अर्चना ने फुसफुसा कर कहा.

‘‘ऊंह, क्या फर्क पड़ता है.’’

गेट खुलते ही सामने नीलिमा घूमते हुए दिखीं. सकपका गईं दोनों लड़कियां.

‘‘आंटी, नमस्ते,’’ दोनों एक-साथ बोलीं.

‘‘कहां गई थीं?’’

‘‘बहुत मन कर रहा था, ‘दिल से’ देखने का,’’ अर्चना ने मिमियाती सी आवाज में कहा.

‘‘यही शो मिला था फिल्म देखने को?’’

‘‘आंटी, प्रोग्राम देर से बना,’’ दामिनी ने बात संभालने की कोशिश की.

‘‘मैं कुछ नहीं जानती. हॉस्टल का डिसीपिलीन बिगाड़ती हो. आज ही तुम्हारे घर पत्र डालती हूं,’’ नीलिमा यह कहती हुई अपने कमरे की ओर चली गईं.

दामिनी कमरे में आते ही धम से बिस्तर में धंस गई और अर्चना गुसलखाने में चली गई.

‘‘कुछ खाना-वाना भी है या अरविंद के सपनों में ही रहेगी,’’ अर्चना ने दामिनी को वैसे ही पड़ी देख कर पूछा.

दामिनी वैसे ही मेज पर आ गई. राजमा, भिंडी की सब्जी और चपातियां. दोनों ने कुछ कौर गले के नीचे उतारे. पानी पिया.

‘हेमलेट’ के नोट्स ले कर अर्चना दिन गंवाने का अपराधबोध कुछ कम करने का प्रयास करने लगी. उसे पढ़ता देख दामिनी भी रैक में कुछ टटोलने लगी. सभी के कमरों की लाइट जल रही है.

‘‘जाऊंगी, सौ बार कहती हूं मैं जाऊंगी,’’ आंटी के कमरे की ओर से आती आवाज सन्नाटे को चीरने लगी.

बीच-बीच में ऐसा कुछ होता रहता है. इस की भनक सभी लड़कियों को है. आज संवाद एकदम स्पष्ट है.

बेटी की आवाज ऊंची होते देख आंटी को जैसे सांप सूंघ गया. वह खामोश हो गईं. बेटी भी कुछ बड़-बड़ा कर चुप हो गई.

सुबह रात्रि के विषाद की छाया आंटी के चेहरे पर साफ झलक रही है. नियमत: वह होस्टल की तरफ आईं पर बिना कुछ कहे-सुने ही चली गईं.

फाइनल परीक्षा अब निकट ही है. सुरेखा और मीना प्रेक्टिकल के बोझ से दबी रहती हैं. देहरादूनी लड़कियों को उन्हें देख कर ही पता चला कि गृहविज्ञान कोई मामूली विषय नहीं है. उस पर इस विषय के कई अभ्यास देखे तो आंखें खुल गईं. विषय के साथसाथ सुरेखा और मीना भी महत्त्वपूर्ण हो गईं.

आजकल दामिनी भी सैर-सपाटा भूल गई है पर दिल के हाथों मजबूर दामिनी बीच-बीच में अरविंद के साथ प्रोग्राम बना लेती है. पिछले दिनों उस के बर्थ डे पर अरविंद एंड पार्टी ने उसे सरप्राइज पार्टी दी. बड़े स्टाइल से उन्हें बुलाया. वहां जा कर दोनों चकरा गईं. सुनहरी पन्नियों की बौछार, हैपी बर्थ डे…हैपी बर्थ डे की गुंजार.

रात के 11 बज रहे हैं. दामिनी और अर्चना ‘शेक्सपियर इज ए ड्रामाटिस्ट’ पर नोट्स तैयार कर रही हैं. दोनों के हाथ तेजी से चल रहे हैं. बगल के कमरे से छन कर आती रोशनी बता रही है कि सुरेखा और मीना भी पढ़ रही होंगी. यहां पढ़ने के लिए रात ही अधिक उपयुक्त है. एकदम सन्नाटा रहता है और एक-दूसरे के कमरे की दिखती लाइट एक प्रतिद्वंद्विता उत्पन्न करती है.

बाहर से कुछ बातचीत की आवाज आ रही है. आंटी की बेटी आई होगी. धीरे-धीरे सब की श्रवण शक्ति बाहर चली गई. पदचाप…खड़…एक असहज सन्नाटा.

‘‘…अब आ रही है?’’ आंटी तेज आवाज में बोलीं, ‘‘फिर उस के साथ गई थी. मैं ने तुझे लाख बार समझाया है पर क्या तेरा भेजा फिर गया है?’’

‘‘आप मेरी लाइफ स्टाइल में इंटरफेयर क्यों करती हैं? ये मेरी लाइफ़ है. मैं चाहे जिस तरह जिऊं.’’

‘‘तू जिसे अपना लाइफ स्टाइल कह रही है वह एक मृगतृष्णा है, जहां सिर्फ तुझे भटकाव ही मिलेगा. तू मेरी औलाद है और मैं ने दुनिया देखी है इसलिए तुझे समझा रही हूं. तू समझ नहीं रही है…’’

‘‘मैं कुछ नहीं समझना चाहती. और आप समझा रही हैं…मेरा मुंह आप मत खुलवाओ. पापा से आप की दूसरी शादी…. पता नहीं पहले वाली शादी थी भी या…’’

‘‘चुप, बेशर्म, खबरदार जो अब आगे एक शब्द भी बोला,’’ आज नीलिमा अप्रत्याशित रूप से बिफर गईं.

‘‘चुप रहने से क्या सचाई बदल जाएगी?’’

‘‘तू क्या सच्चाई जानती है? पिता का साया नहीं था. 6 भाई-बहनों के परिवार में मैं एकमात्र कमाने वाली थी. तब का जमाना भी बिलकुल अलग था. लड़कियां दिन में भी घर से बाहर नहीं निकलती थीं और मैं रात की शिफ्ट में काम करती थी. कुछ मजबूर थी, कुछ मैं नादान… यह दुनिया बड़ी खौफनाक है बेटी, तभी तो कह रही हूं…’’

नीलिमा रो रही हैं. वे हताश हो रही हैं. उन की व्यथा को सब लड़कियों ने जाना, समझा. सब ने फिर एक-दूसरे को देखा किंतु आज वे मुस्कुराईं नहीं. Hindi Social Story.

Hindi Social Story: शायद- सुवीरा को समर्पण के बदले मिला सिर्फ अपमान

Hindi Social Story: मायके के सुख-दुख में सहभागी बनी सुवीरा ने अपना पूरा जीवन उन को समर्पित कर दिया. लेकिन उन्होंने कदमकदम पर सुवीरा और उस के पति को न केवल अपमानित किया बल्कि उस से नाता भी तोड़ दिया. अपने अंतिम समय में अम्मां और भाई को एक नजर देखने की उसकी अभिलाषा क्या पूरी हो पाई?

पदचाप और दरवाजे के हर खटके पर सुवीरा की तेजहीन आंखों में चमक लौट आती थी. दूर तक भटकती निगाहें किसी को देखतीं और फिर पलकें बंद हो जातीं. सिरहाने बैठे गिरीशजी से उन की बहू सीमा ने एक बार फिर जिद करते हुए कहा था,  ‘‘पापा, आप समझने की कोशिश क्यों नहीं कर रहे? जब तक नानीजी और सोहन मामा यहां नहीं आएंगे, मां के प्राण यों ही अधर में लटके रहेंगे. इन की यह पीड़ा अब मुझ से देखी नहीं जाती,’’ कहते-कहते सीमा सिसक उठी थी.

बरसों पहले का वह दृश्य गिरीशजी की आंखों के सामने सजीव हो उठा जब मां और भाई के प्रति आत्मीयता दर्शाती पत्नी को हर बार बदले में अपमान और तिरस्कार के दंश सहते उन्होंने ऐसी कसम दिलवा दी थी जिस की सुवीरा ने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

‘‘आज के बाद अगर इन लोगों से कोई रिश्ता रखोगी तो तुम मेरा मरा मुंह देखोगी.’’

बरसों पुराना बीता हुआ वह लम्हा धुल-पुंछ कर उन के सामने आ गया था. अतीत के गर्भ में बसी उन यादों को भुला पाना इतना सहज नहीं था. वैसे भी उन रिश्तों को कैसे झुठलाया जा सकता था जो उन के जीवन से गहरे जुड़े थे.

आंखें बंद कीं तो मन न जाने कब आमेर क्लार्क होटल की लॉबी में जा पहुंचा और सामने आ कर खड़ी हो गई सुंदर, सुशील सुवीरा. एकदम अनजान जगह में किसी आत्मीय जन का होना मरुस्थल में झील के समान लगा था उन्हें. मंद-मंद हास्य से युक्त, उस प्रभावशाली व्यक्तित्व को बहुत देर तक निहारते रहे थे. फिर धीरे से बोले, ‘आप का प्रस्तुतिकरण सर्वश्रेष्ठ था.’

‘धन्यवाद,’ प्रत्युत्तर में सुवीरा बोली तो गिरीश अपलक उसे देखते ही रह गए थे. इस पहली भेंट में ही सुवीरा उन के हृदय की साम्राज्ञी बन गई थी. फिर तो उसी के दायरे में बंधे, उस के इर्द-गिर्द घूमते हुए हर पल उस की छोटी-छोटी गतिविधियों का अवलोकन करते हुए इतना तो वह समझ ही गए थे कि उन का यह आकर्षण एकतरफा नहीं था. सुवीरा भी उन्हें दिल की अतल गहराइयों से चाहने लगी थी, पर कह नहीं पा रही थी. अपने चारों तरफ सुवीरा ने कर्तव्यनिष्ठा की ऐसी सीमा बांध रखी थी जिसे तोड़ना तो दूर लांघना भी उस के लिए मुश्किल था.

लगभग 1 माह बाद दफ्तर के काम से गिरीश दिल्ली पहुंचे तो सीधे सुवीरा से मिलने उस के घर चले गए थे. बातों-बातों में उन्होंने अपने प्रेम प्रसंग की चर्चा सुवीरा की मां से की तो अलाव सी सुलग उठी थीं वह.

‘बड़ी सती-सावित्री बनी फिरती थी. यही गुल खिलाने थे?’ मां के शब्दों से सहमी-सकुची सुवीरा कभी उन का चेहरा देखती तो कभी गिरीश के चेहरे के भावों को पढ़ने का प्रयास करती पर अम्मां शांत नहीं हुई थीं.

अगले दिन कोर्ट मैरिज के बाद सुवीरा हठ कर के अम्मा बाबूजी के पास आशीर्वाद लेने पहुंची तो अपनी कुटिल दृष्टि बिखेरती अम्मां ने ऐसा गर्जन किया कि रोने-रोने को हो उठी थी सुवीरा.

‘अपनी बिरादरी में लड़कों की कोई कमी थी जो दूसरी जाति के लड़के से ब्याह कर के आ गई?’

‘फोन तो किया था तुम्हें, अम्मां… अभी भी तुम्हारा आशीर्वाद ही तो लेने आए हैं हम,’ सुवीरा के सधे हुए आग्रह को तिरस्कार की पैनी धार से काटती हुई अम्मां ने हुंकार लगाई.

‘तू क्या समझती है, तू चली जाएगी तो हम जी नहीं पाएंगे…भूखे मरेंगे? डंके की चोट पर जिएंगे…लेकिन याद रखना, जिस तरह तू ने इस कुल का अपमान किया है, हम आशीर्वाद तो क्या कोई रिश्ता भी नहीं रखना चाहते तुझ से.’

व्यावहारिकता के धरातल पर खड़े गिरीश, सास के इस अनर्गल प्रलाप का अर्थ भली प्रकार समझ गए थे. नौकरीपेशा लड़की देहरी लांघ गई तो रोटीपानी भी नसीब नहीं होगा इन्हें. झूठे दंभ की आड़ में जातीयता का रोना तो बेवजह अम्मां रोए जा रही थीं.

बिना कुछ कहे-सुने, कांपते कदमों से सुवीरा सीधे बाबूजी के कमरे में चली गई थी. वह बरसों से पक्षाघात से पीड़ित थे. ब्याहता बेटी देख कर उन की आँखों से आंसुओं की अविरल धारा फूट पड़ी थी. सुवीरा भी उन के सीने से लग कर बड़ी देर तक सिसकती रही थी. रुंधे स्वर से वह इतना ही कह पाई थी, ‘बाबूजी, अम्मा चाहे मुझ से कोई रिश्ता रखें या न रखें, पर मैं जब तक जिंदा रहूंगी, मायके के हर सुख-दुख में सहभागिता ही दिखाऊंगी, ये मेरा वादा है आप से.’

बेटी की संवेदनाओं का मतलब समझ रहे थे दीनदयाल जी. आशीर्वाद- स्वरूप सिर पर हाथ फेरा तो अम्मां बिफर उठी थीं, ‘हम किसी का एहसान नहीं लेंगे. जरूरत पड़ी तो किसी आश्रम में चाहे रह लें लेकिन तेरे आगे हाथ नहीं फैलाएंगे.’

अम्मा चाहे कितना चीखती- चिल्लाती रहीं, सुवीरा महीने की हर पहली तारीख को नोटों से भरा लिफाफा अम्मां के पास जरूर पहुंचा आती थी और बदले में बटोर लाती थी अपमान, तिरस्कार के कठोर, कड़वे अपदंश. गिरीश ने कभी अम्मां के व्यवहार का विश्लेषण करना भी चाहा तो बड़ी सहजता से टाल जाती सुवीरा, पर मन ही मन दुखी बहुत होती थी.

‘जो कुछ कहना था, मुझे कहतीं. दामाद के सामने अनाप-शनाप कहने की क्या जरूरत थी?’ ऐसे में अपंग पिता का प्यार और पति का सौहार्द ठंडे फाहे सा काम करता.

दौड़-भाग करते कब सुबह होती, कब शाम, पता ही नहीं चलता था. गिरीश ने कई बार रोकना चाहा तो सुवीरा हंस  कर कहती, ‘समझने की कोशिश करो, गिरीश. मेरे ऊपर अम्मां, बीमार पिता और सोहन का दायित्व है. जब तक सोहन अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता, मुझे नौकरी करनी ही पड़ेगी.’

‘सुवीरा, मैं ने अपने माता-पिता को कभी नहीं देखा. अनाथालय में पलाबढ़ा लेकिन इतना जानता हूं कि सात फेरे लेने के बाद पति-पत्नी का हर सुख-दुख साझा होता है. उसी अधिकार से पूछ रहा हूं, क्या तुम्हारे कुछ दायित्व मैं नहीं बांट सकता?’

गिरीश के प्रेम से सराबोर कोमल शब्द जब सुवीरा के ऊपर भीनी फुहार बन कर बरसते तो उस का मन करता कि पति के मादक प्रणयालिंगन से निकल कर, भाग कर सारे खिड़की-झरोखे खोल दे और कहे, देखो, गिरीश मुझे कितना प्यार करते हैं.

2 बरस बाद सुवीरा ने जुड़वां बेटों को जन्म दिया. गिरीश खुद ससुराल सूचना देने गए पर कोई नहीं आया था. बाबूजी तो वैसे ही बिस्तर पर थे पर मां और सोहन…इतने समय बाद संतान के सुख से तृप्त बेटी के सुखद संसार को देखने इस बार भी नहीं आए थे. मन ही मन कलपती रही थी सुवीरा.

गिरीश ने जरा सी आत्मीयता दर्शायी तो पानी से भरे पात्र की तरह छलक उठी थी सुवीरा, ‘क्या कसूर किया था मैं ने? उस घर को सजाया, संवारा अपने स्नेह से सींचा, पर मेरे अस्तित्व को ही नकार दिया. कम से कम इतना तो देखते कि बेटी कहां है, किस हाल में है. मात्र यही कुसूर है न मेरा कि मैं ने प्रेम विवाह किया है.’

इतना सुनते ही गिरीश के चेहरे पर दर्द का दरिया लरज उठा था. बोले, ‘इस समय तुम्हारा ज्यादा बोलना ठीक नहीं है. आराम करो.’

सुवीरा चुप नहीं हुई. प्याज के छिलकों की तरह परत दर परत बरसों से सहेजी संवेदनाएं सारी सीमाएं तोड़ कर बाहर निकलने लगीं.

‘मैं उस समय 5 साल की बच्ची ही तो थी जब अम्मां दुधमुंहे सोहन को मेरे हवाले छोड़ पड़ोस की औरतों के बीच गप मारने में मशगूल हो जाती थीं. लौट कर आतीं तो किसी थानेदार की तरह ढेरों प्रश्न कर डालतीं.

‘बेटे के लिए तो रचरच कर नाश्ता तैयार करतीं, लेकिन मैं अपनी पसंद का कुछ भी खाना चाहती तो बुरा सा मुंह बना लेतीं. उन की इस उपेक्षा और डांट-फटकार से बचपन से ही मेरे मन में एक भावना घर कर गई कि अगर इतनी ही अकर्मण्य हूं मैं तो इन सब को अपनी काहिली दिखा कर रहूंगी.

‘सच मानो गिरीश, मां की तल्ख तेजाबी बहस के बीच भी मैं सफलता के सोपान चढ़ती चली गई. बाबूजी ने कई बार लड़खड़ाती जुबान के इशारे से अम्मां को समझाया था कि थोड़ी जिम्मेदारी का एहसास सोहन को भी करवाएं, पर अम्मां बाबूजी की कही सुनते ही त्राहि-त्राहि मचा देतीं. घर का हर काम उन की ही मरजी से होता था, वरना वे घर की ईंट से ईंट बजा कर रख देती थीं.

‘एक रात बाबूजी फैक्टरी से लौटते समय सड़क दुर्घटना में बुरी तरह जख्मी हो गए थे. शरीर के आधे हिस्से को लकवा मार गया था. अच्छे-भले तंदरुस्त बाबूजी एक ही झटके में बिस्तर के हो कर रह गए. धीरे-धीरे व्यापार ठप पड़ने लगा. सोहन की परवरिश सही तरीके से की गई होती तो वह व्यापार संभाल भी लेता. खाना-पीना, मौज-मस्ती, यही उस की दिनचर्या थी. सीधा खड़ा होने के लिए भी उसे बैसाखी की जरूरत पड़ती थी तो वह कारोबार क्या संभालता?

‘व्यापार के सिलसिले में मेरा अनुभव शून्य से बढ़ कर कुछ भी नहीं था. जमीन पर मजबूती से खड़े रहने के लिए मुझे भी बाबूजी के पार्टनरों, भागीदारों का सहयोग चाहिए था, पर अम्मां को न जाने क्या सूझी कि वह फोन पर ही सब को बरगलाने लगीं. शायद उन्हें यह गलतफहमी हो गई थी कि उन की बेटी उन के पति का कारोबार चला कर पूरी धनसंपदा हथिया लेगी और उन्हें और उन के बेटे को दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर कर देगी.

‘धीरेधीरे बाबूजी के सभी पार्टनर हाथ खींचते गए. मेरी दिनरात की मेहनत भी व्यापार को आगे बढ़ाने में सफल नहीं हो सकी. हार कर व्यापार बंद करना पड़ा. बहुत रोए थे बाबूजी उस दिन. उन की आंखों के सामने ही उन की खून-पसीने से सजाई बगिया उजड़ गई थी. लेकिन अम्मां की आंखों में न विस्मय था न पश्चात्ताप बल्कि मन ही मन उन्होंने दूसरी योजना बना डाली थी. और एक दिन बेहोशी की हालत में पति से अंगूठा लगवा कर पूरा मकान और बैंक बैलेंस सोहन के नाम करवा कर ही उन्होंने चैन की सांस ली थी.

‘कालिज की पढ़ाई, ट्यूशन, बाबूजी की तीमारदारी में कंटीली बाढ़ की तरह जीवन उलझता चला गया. जितनी आमद होती, अम्मां और सोहन उस रकम पर यों टूटते जैसे कबूतरों के झुंड दानों पर टूटते हैं.’

कहते-कहते सिसक उठी थी सुवीरा. होंठों पर हाथ रख कर गिरीश ने उस के मुंह पर चुप्पी की मोहर लगा दी थी. 2 दिन तक प्रसव पीड़ा से छटपटाने के बाद ऑपरेशन से जुड़वां बेटों को जन्म देने में कितनी पीड़ा सुवीरा की शिथिल काया ने बर्दाश्त की थी, यह तो गिरीश ही जानते थे.

दिन बीतते गए. सोहन की आवारा- गर्दी देख सुवीरा का मन दुखी होता था. सोचती इस के साथ पूरा जीवन पड़ा है, कमाएगा नहीं तो अपनी गृहस्थी कैसे चलाएगा? कई धंधे खुलवा दिए थे सुवीरा और गिरीश ने पर सोहन महीने दो महीने में सब-कुछ उड़ा कर घर बैठ जाता. उस पर अम्मां उस की तारीफ करते नहीं अघातीं.

एक दिन अचानक खबर मिली कि सोहन का ब्याह तय हो गया. जिस धीरेंद्र की लड़की के साथ शादी तय हुई है वह गिरीश के अच्छे दोस्त थे. सुवीरा यह नहीं समझ पा रही है कि अम्मां ने कैसे उन्हें विश्वास में लिया कि वह अपनी बेटी सोहन के साथ ब्याहने को तैयार हो गए.

सगाई से एक दिन पहले ही सुवीरा अम्मा के पास चली गई थी. दोनों पक्षों से उस का रिश्ता था. गिरीश ने भी पूरा सहयोग दिया था. सुवीरा ने घर सजाने से ले कर सब के नाश्ते आदि का इंतजाम किया पर अम्मां ने बड़ी खूबसूरती से सारा श्रेय खुद ओढ़ लिया. उस का मन किया, ठहाका लगा कर हंसे. आत्मप्रशंसा में तो अम्मां का जवाब नहीं.

ब्याह के कार्ड बंटने शुरू हो गए. आस और उम्मीद की डोर से बंधी सुवीरा सोच रही थी कि शायद इस बार अम्मां खुद आ कर बेटी को न्योता देंगी लेकिन अम्मा को न आना था न वह आईं. हां, निमंत्रण डाक से जरूर आ गया था. गिरीश ने पत्नी के सामने भूमिका बांध कर रिश्तों के महत्व को समझाया था, ‘सोहन का ब्याह है, सुवीरा, चलना है.’

गुस्से से सुवीरा का चेहरा तमतमा गया था, ‘सगाई पर बिना निमंत्रण के चली गई तो क्या अब भी चली जाऊंगी?’

‘ये आया तो है निमंत्रण,’ गिरीश ने टेबल पर रखा गुलाबी लिफाफा पत्नी को पकड़ाया तो स्वर प्रकंपित हो उठा था सुवीरा का, ‘डाक से…’

‘छोटी-छोटी बातों को क्यों दिल से लगाती हो? रिश्ते कच्चे धागों से बंधे होते हैं. टूट जाएं तो जोड़ने मुश्किल हो जाते हैं.’

जोर से खिलखिला दी सुवीरा उस समय. भाई के विवाह में शामिल होने की इच्छा अब भी दिल के किसी कोने में दबी हुई थी. मन में ढेर सारी उमंगें लिए दोनों बेटों और पति के साथ जनवासे पहुंची तो मेहमानों की आवभगत में उलझी अम्मां को यह भी ध्यान नहीं रहा कि बेटी-दामाद आए हैं.

मित्रों, परिजनों की भीड़ में अपना मनोरंजन खुद ही करने लगे थे गिरीश और सुवीरा. पार्टी जोरशोर से चल रही थी. हंसी-ठट्ठे का माहौल था. अचानक तारिणी देवी की चिल्लाहट सुन कर दोनों का ध्यान उस ओर चला गया.

विक्रम को पकड़े मम्मी कह रही थीं, ‘भीम की तरह 40 पूरियां खा गया, ऊपर से कीमती गिलास भी तोड़ दिया.’

दौड़ती-भागती सुवीरा जब तक मूल कारण तक पहुंचती, अम्मां जोर से चीखने लगी थीं. सहमीसकुची सुवीरा इतना ही कह पाई थी, ‘गलती से गिर गया होगा अम्मां. जानबूझ कर नहीं किया होगा.’

अचानक गिरीश की आंखों से चिंगारियां बरसने लगीं. बिना कुछ खाए ही जनवासे से लौट आए थे और सास को सुना भी दिया था, ‘सोहन की ससुराल से आए सामान की तो आप को चिंता है लेकिन बेटी-दामाद और उन के बच्चों की आवभगत की जरा भी चिंता नहीं है.’

घर लौटने के बाद भी फोन घुमा कर चोट खाए घायल सिंह की तरह ऐसी पटखनी दी थी सास तारिणी देवी को कि तिलमिला कर रह गई थीं, ‘अम्मां, मेरे बेटे ने आप की 40 पूरियां खाई हैं या 50, आप चिंता मत करना…मुझ में इतना दम है कि आप के उस खर्च की भरपाई कर सकूं.’

वह रात सुवीरा ने जाग कर काटी. पीहर के हर सुख-दुख में सहभागिता दिखाते उन के पति का इस तरह अपमान क्यों किया अम्मा ने? आत्मविश्लेषण किया…उसे ही नहीं जाना चाहिए था भाई के ब्याह में. हो सकता है अम्मां बेटी-दामाद को बुलाना ही न चाहती हों. डाक के जरिए न्योता भेज कर महज औपचारिकता निभाई हो.

विक्रम और विनय अब जवानी की दहलीज पर कदम रख चुके थे. मान- अपमान की भाषा भी खूब समझने लगे थे. मां को धूर्तता का उपहार देने वाले लोगों से बच्चों को कतई हमदर्दी नहीं थी. कितनी बार मनोबल और संयम टूटे.  गिरीश की बाहों का सहारा न मिला होता तो सुवीरा कब की टूट चुकी होती.

एक दिन अचानक दीनदयाल के मरने का समाचार मिला. कांप कर रह गई सुवीरा उस दिन. अब तक दीनदयाल ही ऐसे थे जो संवेदनात्मक रूप से बेटी से जुड़े थे. मां की मांग का सिंदूर यों धुल-पुंछ जाएगा, सुवीरा ने कभी इस की कल्पना भी नहीं की थी. पति चाहे बूढ़ा, लाचार या बेसहारा ही क्यों न हो, उस की छत्रछाया में पत्नी खुद को सुरक्षित महसूस करती है.

अब क्या होगा, कैसे होगा, सोचते- विचारते सुवीरा मायके जाने की तैयारी करने लगी तो पहली बार अंगरक्षक के समान पति और दोनों बेटे भी साथ चलने के लिए तैयार हो उठे. एक मत से सभी ने यही कहा कि वहां जा कर फिर से अपमान की भागी बनोगी. पर सुवीरा खुद को रोक नहीं पाई थी. मोह, ममता, निष्ठा, अपनत्व के सामने सारे बंधन कमजोर पड़ते चले गए थे. ऐसे में सीमा ने ही साथ दिया था.

‘जाने दीजिए आप लोग मां को. ऐसे समय में तो लोग पुरानी दुश्मनी भूल कर भी एक हो जाते हैं. यह भी तो सोचिए, नानाजी मां को कितना चाहते थे. कोई बेटी खुद को रोक कैसे सकती है.’

मातमी माहौल में दुग्धधवल साड़ी में लिपटी अम्मा के बगल में बैठ गई थी सुवीरा. दिल से पुरजोर स्वर उभरा था. सोहन के पास तो इतना पैसा भी नहीं होगा कि बाबूजी की उठावनी का खर्चा भी संभाल सके. भाई से सलाह करने के लिए उठी तो लोगों की भीड़ की परवाह न करते हुए सोहन जोर-जोर से चीखने लगा, ‘चलो, जीतेजी न सही, बाप के मरने के बाद तो तुम्हें याद आया कि तुम्हारे रिश्तेदार इस धरती पर मौजूद हैं.’

चाहती तो सुवीरा भी पलट कर इसी तरह उसे अपमानित कर सकती थी. जी में आया भी था कि इन लोगों से पूछे कि चलो मैं न सही पर तुम लोगों ने ही मुझ से कितना रिश्ता निभाया है, पर कहा कुछ नहीं था. बस, खून का घूंट पी कर रह गई थी.

लोगों की भीड़ छंटी तो सोहन की पत्नी से पूछ लिया था सुवीरा ने, ‘बैंक में हड़ताल है और मुझ से इस घर की आर्थिक स्थिति छिपी नहीं है. ऐसे मौकों पर अच्छी-खासी रकम की जरूरत होती है. इसीलिए कुछ पैसे लाई थी, रख लो.’

‘क्यों लाई है पैसे?’ मां के मन में पहली बार परिस्थितिजन्य करुणा उभरी थी, पर सोहन का स्वर अब भी बुलंद था.

‘तुम मदद करने नहीं जायदाद बांटने आई हो. जाओ बहना, जाओ. अब तुम्हारा यहां कोई भी नहीं है.’

सोहन की पत्नी ने कई बार पति को शांत करने का असफल प्रयास किया था लेकिन गिरीश अच्छी तरह समझ गए थे कि सोहन ऐसा व्यवहार क्यों कर रहा है. दंभी इंसान हमेशा दूसरे को गलत खुद को सही मानता है.

‘इस बदजबान को हम सुधारेंगे,’ जवानी का खून कहीं अनर्थ न कर डाले, इसीलिए सुवीरा ने रोका था अपने बेटों को.

‘हम कौन होते हैं किसी को सुधारने वाले? स्वभाव तो संस्कारों की देन है.’

लेकिन गिरीश उद्विग्न हो उठे थे.

‘सुवीरा, कब तक आदर्शों की सलीब पर टंगी रहोगी? खुद भी झुकोगी मुझे भी झुकाओगी? जिन लोगों में इंसानियत नहीं उन से रिश्ता निभाना बेवकूफी है. यदि आज के बाद तुम ने इन लोगों से संबंध रखा तो मेरा मरा मुंह देखोगी.’

घर लौट कर गिरीश ने कई बार अपनी दी हुई शपथ का विश्लेषण किया था पर हर बार खुद को सही पाया था. जिन रिश्तों के निभाने से तर्क-वितर्क के पैने कंटीले झाड़ की सी चुभन महसूस हो, गहन पीड़ा की अनुभूति हो, उसे तोड़ देना क्या गलत था? कहते समय कब सोचा था उन्होंने कि सुवीरा का पड़ाव इतना निकट था?

बेहोशी की दशा में सन्नाटे को चीरते हुए सुवीरा के होंठों से जब सोहन और अम्मां का नाम छलक कर उन के कानों से टकराया तो उन्हें महसूस हुआ कि इतना सरल नहीं था सब. सिरहाने बैठे विक्रम की हथेलियों को हौले से थाम कर सुवीरा ने अपने शुष्क होंठों से सटाया, फिर चारों ओर देखा. उस की नजरें मुख्यद्वार पर अटक कर रह गईं.

‘‘सुवीरा, विगत को भूल जाओ. मांगो, जो चाहे मांगो. मैं अपनी तरफ से कोई कमी नहीं रखूंगा.’’

‘‘अंतिम समय… इस धरती से विदा लेते समय कांटों की गहरी चुभन झेलते हुए प्राण त्याग कर मुझे कौन सी शांति मिलेगी?’’

‘‘क्यों इतना दुख करती हो? संबंधजन्य दुख ही तो दुख का कारण होते हैं,’’ दीर्घ निश्वास भर कर गिरीश ने पत्नी को सांत्वना दी थी.

‘‘देखना, मेरे मरने के बाद ये लोग समझेंगे कि मेरा निश्छल प्रेम किसी से कोई अपेक्षा नहीं रखता था. मुझे तो सिर्फ प्यार के दो मीठे बोल और वैसी ही आत्मीयता चाहिए थी जैसी अम्मां सोहन को देती थीं.’’

घनघोर अंधेरे में सुवीरा की आवाज डूबती चली गई. शरीर शिथिल पड़ने लगा, आंखों की रंगत फीकी पड़ने लगी. धीरे-धीरे उन के चेहरे की तड़प शांत हो गई. स्थिर चिरनिद्रा में सो गई सुवीरा.

पत्नी की शांत निर्जीव देह को सफेद चादर से ढक उन की निर्जीव पलकों को हाथों के दोनों अंगूठों से हौले से बंद करते हुए गिरीश आत्मग्लानि से घिर गए. पश्चात्ताप से टप-टप उन की आंखों से बहते आंसू सुवीरा की पेशानी को न जाने कब तक भिगोते रहे.

‘‘अपनी अम्मां और भाई को एक नजर देखने की तुम्हारी अभिलाषा मेरे ही कारण अधूरी रह गई. दोषी हूं तुम्हारा. गुनहगार हूं. मुझे क्षमा कर दो.’’

जैसे ही सुवीरा के मरने का समाचार लोगों तक पहुंचा, भीड़ का रेला उमड़ पड़ा. गिरीश और दोनों बेटों की जान- पहचान, मित्रों और परिजनों का दायरा काफी बड़ा था.

तभी लोगों की भीड़ को चीरते हुए सोहन और तारिणी देवी आते दिखाई दिए. बहन की शांत देह को देख सोहन जोर-जोर से छाती पीटने लगा. उसे देख तारिणी देवी भी रोने लगीं.

‘‘अपने लिए तो कभी जी ही नहीं. हमेशा दूसरों के लिए ही जीती रही.’’

‘‘हमें अकेला छोड़ गई. कैसे जीएंगे सुवीरा के बिना हम लोग?’’

नानी का रुदन सुन दोनों जवान बेटों का खून भड़क उठा. मरने के बाद मां एकाएक उन के लिए इतनी महान कैसे हो गईं? दंभ और आडंबर की पराकाष्ठा थी यह. यह सब मां के सामने क्यों नहीं कहा? इन्हीं की चिंता में मां ने आयु के सुख के उन क्षणों को भी अखबारी कागज की तरह जला कर राख कर दिया जो उन्हें जीवन के नए मोड़ पर ला कर खड़ा कर सकते थे.

उधर शांत, निर्लिप्त गिरीश कुछ और सोच रहे थे. कमल और बरगद की जिंदगी एक ही तराजू में तौली जाती है. कमल 12 घंटे जीने के बावजूद अपने सौंदर्य का अनश्वर और अक्षय आभास छोड़ जाता है जबकि 300 वर्ष जीने के बाद जब बरगद उखड़ता है तब जड़ भी शेष नहीं रहती.

कई बार सुवीरा के मुंह से गिरीश ने यह कहते सुना था कि प्यार के बिना जीवन व्यर्थ है. लंबी जिंदगी कैदी के पैर में बंधी हुई वह बेड़ी है जिस का वजन शरीर से ज्यादा होता है. बंधनों के भार से शरीर की मुक्ति ज्यादा बड़ा वरदान है.

सुवीरा की देह को मुखाग्नि दी जा रही थी लेकिन गिरीश के सामने एक जीवंत प्रश्न विकराल रूप से आ कर खड़ा हो गया था. कई परिवार बेटे को बेटी से अधिक मान देते हैं. बेटा चाहे निकम्मा, नाकारा, आवारागर्द और ऐयाश क्यों न हो, उसे कुल का दीपक माना जाता है, जबकि बेटी मनप्राण से जुड़ी रहती है अपने जन्मदाताओं के साथ फिर भी उतने मान-सम्मान, प्यार और अपनत्व की अधिकारिणी क्यों नहीं बन पाती वह जितना बेटों को बनाया जाता है. यदि इन अवधारणाओं और भ्रांतियों का विश्लेषण किया जाए तो रिश्तों की मधुरता शायद कभी समाप्त नहीं होगी. Hindi Social Story.

Adoption Law: गोद कानून पेचीदा, खरीद आसान

Adoption Law: बच्चों की खरीदफरोख्त चरम पर पहुंच गई है जबकि देश में गोद लेने की प्रक्रिया काफी जटिल और कठिन कर दी गई है. इच्छुक मातापिता कानूनी रास्ता छोड़ अवैध तरीके अपनाने को मजबूर हैं. आज हर 8 मिनट में एक बच्चा लापता हो रहा है. एक ऐसी व्यवस्था बने जो न केवल बच्चों को सुरक्षित परिवार दे बल्कि उन को गलत हाथों में जाने से भी रोके. इस लेख में पढि़ए उन छिपे व अनसुलझे सवालों की पड़ताल जो हर निसंतान परिवार के जेहन में चलते रहते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने एक अखबार में प्रकाशित एक खबर पर खासी चिंता व्यक्त की, जिस के मुताबिक देश में हर 8 मिनट में एक बच्चा लापता हो रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे गोद लेने की प्रक्रिया से जोड़ा और कहा कि भारत में बच्चा गोद लेने की सरकारी प्रक्रिया इतनी उलझाऊ और कठोर है कि इस का उल्लंघन होना स्वाभाविक है. लोग जल्दी से जल्दी बच्चा पाने के लिए अवैध तरीके अपनाते हैं.

जस्टिस बी वी नागरत्ना और आर महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार से बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया को सरल और सुव्यवस्थित करने के लिए कहा है लेकिन सरकारी मशीनरी इस पर अमल करेगी, इस में संदेह है. कठिन प्रक्रिया से बहुतों को पैसा मिलता है जिसे वे हाथ से जाने नहीं देंगे.

एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में अनुमानतया हर वर्ष 96 हजार बच्चे लापता हो जाते हैं. दिल्ली पुलिस के रिकौर्ड के अनुसार बीते 10 सालों में सिर्फ दिल्ली से ही 1.8 लाख बच्चे गायब हो चुके हैं. इस के अलावा वर्तमान में भारत में लगभग 3 करोड़ बच्चे अनाथ हैं, जिन के मातापिता नहीं हैं. इन में से केवल 5 लाख बच्चे ही अनाथालयों जैसी संस्थागत सुविधाओं तक पहुंच सके हैं.

यह संख्या बहुत ही कम है. इन 5 लाख बच्चों में से भी केवल 4 हजार बच्चों को ही प्रतिवर्ष गोद लिया जा पा रहा है, जबकि बच्चा गोद लेने के इच्छुक लोगों की संख्या लाखों में है. हर निसंतान दंपती जल्द से जल्द बच्चा पाना चाहता है और कानूनी रास्ते से यदि बच्चा नहीं मिलता तो वे गैरकानूनी रास्ता अपनाने के लिए मजबूर हो जाते हैं.

इस से पहले 14 अक्तूबर, 2025 को एक गैरसरकारी संगठन गुरिया ने अदालत में याचिका दायर कर बच्चों के अपहरण और गुमशुदा होने के अनसुलझे मामलों के अलावा भारत सरकार द्वारा निगरानी किए जाने वाले खोया/पाया पोर्टल पर उपलब्ध सूचना के आधार पर की जाने वाली कार्रवाई का उल्लेख किया था. याचिका में पिछले साल उत्तर प्रदेश में दर्ज 5 मामलों के आधार पर अपनी दलील पेश की गई थी, जिन में नाबालिग लड़कों और लड़कियों का अपहरण कर उन्हें बिचौलियों के नैटवर्क के जरिए झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में तस्करी कर ले जाया गया था.

पीठ ने 14 अक्तूबर को ही केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को लापता बच्चों के मामलों को संभालने के लिए एक नोडल अधिकारी की नियुक्ति करने और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा संचालित मिशन वात्सल्य पोर्टल पर प्रकाशन के लिए उन के नाम और संपर्क विवरण उपलब्ध कराने का निर्देश दे.

कोर्ट ने निर्देश दिया था कि जब भी पोर्टल पर किसी गुमशुदा बच्चे के बारे में शिकायत प्राप्त हो तो सूचना को संबंधित नोडल अधिकारियों के साथ साझा किया जाए. कोर्ट ने कहा था कि पोर्टल में प्रत्येक राज्य से एक विशेष अधिकारी हो सकता है जो सूचना प्रसारित करने के अलावा गुमशुदा संबंधी शिकायतों का प्रभारी भी हो.

उल्लेखनीय है कि आज लाखों की संख्या में नन्हेनन्हे बच्चे अनाथाश्रमों में पड़े अपना बचपन काट रहे हैं. जिस नन्ही सी उम्र में उन्हें मांबाप का स्नेह और एक परिवार की सुरक्षा चाहिए, उस उम्र में वे अनाथाश्रमों के अंधेरे कमरों में रहते हुए वहां के कर्मचारियों की झाड़ और डांट सहते हैं. इस की वजह यह है कि भारत में गोद लेने की प्रक्रिया बहुत लंबी, उलझाऊ और बेहद कठिन है. इस में पैसा भी काफी लगता है.

बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया जटिल

3 दशक पहले तक लोग अपने परिवार में ही किसी से बच्चा आसानी से धार्मिक प्रक्रिया के बाद गोद ले लेते थे. अनाथाश्रमों से भी सीधे बच्चे गोद ले लिए जाते थे. कभीकभी कोई बच्चा कहीं फेंका हुआ पाया जाता था तो इच्छुक दंपती पुलिस थाने जा कर पाए बच्चे को ही अपना लेते थे. तब कोई ज्यादा कानूनी दावंपेंच न थे लेकिन अब गोद लेने की प्रक्रिया पूरी तरह ‘केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण’ (सैंट्रल एडौप्शन रिसोर्स अथौरिटी : कारा) के हाथ में है, जो एक लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद ही किसी इच्छुक दंपती को बच्चा गोद लेने की परमिशन देता है.

इस के लिए इच्छुक मातापिता को सब से पहले कारा के चाइल्ड एडौप्शन रिसोर्स इन्फौर्मेशन एंड गाइडैंस सिस्टम पोर्टल पर अपना रजिस्ट्रेशन कराना होता है. उस में उन की उम्र, व्यवसाय, नौकरी, आर्थिक स्थिति, चलअचल संपत्ति का ब्योरा और परिजनों के ब्योरे के अलावा भी अनेक डिटेल्स भरनी पड़ती हैं. इस के बाद विशेष गोद ग्रहण एजेंसी (एसएए) द्वारा मातापिता का घरेलू अध्ययन (होम स्टडी) किया जाता है, जिस में उन की शारीरिक, मानसिक व वित्तीय स्थिति का मूल्यांकन होता है.

5-6 साल के लंबे इंतजार के बाद जब आवेदक का नंबर आता है तो कानूनी रूप से गोद लेने योग्य घोषित एक बच्चे की प्रोफाइल इच्छुक दंपती को भेजी जाती है और 96 घंटों के भीतर उन्हें उस बच्चे को रिजर्व करना होता है. यानी, वे उस बच्चे को गोद ले रहे हैं या नहीं, यह उन्हें 96 घंटे के भीतर तय कर के दर्ज करना होता है. यदि किसी कारणवश यह समय निकल गया तो उन को फिर से पूरी प्रक्रिया दोहरानी पड़ती है, जिस में फिर सालों का समय लगता है.

जब दंपती बच्चे के भेजे गए प्रोफाइल को स्वीकार कर रिजर्व कर लेते हैं तो कुछ दिनों के बाद उन को किसी सरकारी अनाथाश्रम में बुला कर बच्चा प्रिएडौप्शन फोस्टर केयर में सौंपा जाता है, यानी, मातापिता बच्चे को गोद लेने से पहले अस्थायी देखभाल के लिए ले सकते हैं. इस वक्त दंपती को वहां 50 हजार रुपए जमा करने पड़ते हैं.

इस के बाद एसएए द्वारा जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) के समक्ष एक याचिका दायर की जाती है जो गोद लेने का आदेश जारी करता है. जिस दिन आदेश मिलना होता है उस दिन मातापिता को बच्चे के साथ जिला मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होना पड़ता है. जिला मजिस्ट्रेट द्वारा जारी आदेश 10 दिनों के भीतर ईमेल के माध्यम से दंपती को उपलब्ध होता है.

इस के बाद शहर का नगरनिगम लंबे इंतजार के बाद बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र बनाता है, जिस के लिए दंपती को नगरनिगम के भी कई चक्कर काटने पड़ते हैं और वहां ‘चढ़ावा’ चढ़ाना पड़ता है. इतना होने के बाद भी जान नहीं छूटती. हर तीनचार महीने पर संस्था की ओर से कोई कर्मचारी यह देखने के लिए आता है कि बच्चे की परवरिश ठीक तरीके से हो रही है या नहीं. यह सिलसिला करीब डेढ़दो साल तक चलता है और हर विजिट पर उस की फीस करीब 2 हजार रुपए होती है. इस के अलावा वह अपनी रिपोर्ट दाखिल करने के लिए कुछ न कुछ ‘अतिरिक्त चढ़ावे’ की उम्मीद भी रखता है.

गोद लिया बच्चा वापस नहीं

हिंदू दत्तक और भरणपोषण कानून 1956 की धारा 15 के अनुसार एक बार गोद लिया गया बच्चा वापस नहीं किया जा सकता. गोद लिए बच्चे के कानूनी अधिकार वही होते हैं जो प्राकृतिक ढंग से पैदा हुए बच्चे के होते हैं, चाहे इसे गोद लेते समय कोई बच्चा (दूसरे लिंग का) पहले से हो या बाद में हो. अगर गोद लेने की प्रक्रिया में कोई बड़ी कानूनी त्रुटि हो जैसे उसी लिंग का पहले ही एक बच्चा हो या लेने वाले और बच्चे की उम्र में अंतर 21 वर्ष से कम हो तो गोद लेना रद्द किया जा सकता है. यह अब नाममात्र के मामलों में होता है. 1956 के कानून से पहले ऐसे मामले 20-25 साल बाद संपत्ति के बंटवारे के समय खड़े किए जाते थे.

अवैध तरीके अपनाने को मजबूर दंपती

लंबी, कठिन, थकाऊ और खर्चीली प्रक्रिया के कारण ही अनेक दंपती अवैध तरीकों से बच्चा गोद लेने के लिए मजबूर होते हैं, जो बच्चा चोर गिरोहों के लिए बहुत फायदे का सौदा बन गया है. गिरोह के लोग देशभर में अस्पतालों, नर्सिंगहोम्स, डाक्टर्स के क्लीनिक्स से सीधे जुड़े हुए हैं. इन में बड़ी संख्या में औरतें सक्रिय हैं जो जच्चाबच्चा वार्ड में काम करने वाली नर्सों, दाइयों के संपर्क में रहती हैं. उन की मदद से ये बच्चा चोर औरतें अस्पतालों से नवजात बच्चों को चुरा लेती हैं.

इस के अलावा ये औरतें उन महिलाओं व लड़कियों पर भी नजर रखती हैं जो अनचाहे गर्भ ले कर अस्पतालों में आती हैं और अपना गर्भ गिराना चाहती हैं. नर्स, दाई या चोर गिरोह की सदस्य द्वारा उन लड़कियों को यह समझाया जाता है कि वे बच्चे को पैदा होने दें. बच्चा होने के बाद वे बच्चे के बदले में उसे खासे रुपए देंगी और बच्चा चुपचाप किसी ऐसे को दे दिया जाएगा जो उस की अच्छी परवरिश कर सके.

इस में अस्पताल के डाक्टर भी मिले होते हैं. दूसरी तरफ इन लोगों के पास उन दंपतियों के कौन्टैक्ट नंबर होते हैं जो किसी न किसी तरह कोई नवजात बच्चा पाना चाहते हैं. इन दंपतियों को ऐसे बच्चे 5 लाख से ले कर 8 या 10 लाख रुपए तक में दिए जाते हैं.

सौदा पक्का हो जाने के बाद बच्चे के जन्म प्रमाणपत्र पर मां के नाम की जगह उसे खरीदने वाली मां का नाम दर्ज कर दिया जाता है. पैसे की बंदरबांट डाक्टर, नर्स, दाई और बच्चा चोर गिरोह की महिला के बीच होती है. कई बार अवांछित बच्चे को मांएं पैदा कर अस्पताल में ही छोड़ जाती हैं. कई बार बच्चा चोर गिरोह की औरतें छोटे जिलोंकसबों के अस्पतालों से बच्चे चुरा कर दूसरे शहरों में बेचती हैं.

जरूरी नहीं है कि जो बच्चे चुरा कर बेचे जा रहे हैं वे सभी उन दंपतियों की गोद में जा रहे हों जो सचमुच कोई बच्चा गोद लेना चाहते हैं और उन की अच्छी परवरिश करना चाहते हों. अधिकांश बच्चे, जो 2 से 10 वर्ष की आयुवर्ग के हैं, घर के बाहर खेलते हुए, स्कूल से लौटते हुए या अन्य जगहों से भी गायब किए जा रहे हैं. इन बच्चों को राजस्थान, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों में अनेक तरह के कामधंधों में लगाया जाता है. खेती के क्षेत्र, कार्पेट बुनाई, कांच उद्योग आदि में ऐसे बच्चों को खूब लगाया जाता है. भिखारी गिरोह भी ऐसे बच्चों को मारपीट कर भीख मांगने के काम में लगाते हैं.

लड़कियों को देह के धंधे में उतारने के लिए तैयार किया जाता है. यह पूरा काला संसार रंगीन दुनिया की तहों में छिपा हुआ धड़ल्ले से चल रहा है.

नवजात बच्चों की खरीदफरोख्त इस समय चरम पर है क्योंकि अब लोगों की शादियां देर से हो रही हैं, जिस के कारण लाखों दंपती संतानसुख से वंचित हैं. कारा के जरिए यदि वे बच्चा गोद लेते हैं तो उन्हें नवजात बच्चे नहीं मिलते हैं. 40-45 वर्ष की आयुवर्ग के दंपती को 4 से 6 साल तक के बच्चे गोद दिए जाते हैं जो अपनी परिस्थिति को भलीभांति समझाने लगते हैं और पुरानी बातें भी उन्हें बहुत हद तक याद होती हैं. चूंकि उन्हें पता होता है कि वे जिन के घर जा रहे हैं वे उन के असली मातापिता नहीं हैं इसलिए वे उन्हें आसानी से अपना मांबाप स्वीकार भी नहीं कर पाते हैं.

अधिकांश दंपती यही चाहते हैं कि उन्हें नवजात शिशु ही मिले या ज्यादा से ज्यादा 2 साल तक का बच्चा मिले, ताकि वह उन्हें ही अपना असली मांबाप समझे. यही वजह है कि नवजात बच्चों की खरीदफरोख्त आजकल चरम पर है.

बहुतेरे लोग शादी नहीं करते, फिर भी वे चाहते हैं कि वे बच्चों के मातापिता बनें. फिल्म इंडस्ट्री में तो ऐसे तमाम लोग हैं जिन्होंने अविवाहित, शादी से पहले या शादी के बाद बच्चों को गोद लिया. इन में सब से आगे हैं सुष्मिता सेन, रवीना टंडन, मिथुन चक्रवर्ती, सलीम खान, सनी लियोनी आदि. हालांकि, ऐसे लोग कानूनी रास्ते पर चल कर ही बच्चा गोद लेते हैं.

आज के दौर में लड़कियों का फोकस पढ़ाई और नौकरी पर ज्यादा है. यह अच्छी बात है मगर इस की वजह से शादी और बच्चा पैदा करने की प्राकृतिक उम्र (20 से 28 वर्ष) निकल जाती है. आज ज्यादातर शादियां 30 से 35 साल के बीच हो रही हैं. इस के बाद 2-3 साल तक युगल शादी को ही एंजौय करना चाहता है. उम्र ज्यादा होने पर महिलाओं को गर्भ नहीं ठहरता या बारबार मिसकैरेज होने लगता है.

बहुत सारे कपल आईवीएफ सैंटर्स के चक्कर भी लगाते हैं. मगर वह प्रोसैस बहुत खर्चीला और थकाने वाला होता है. आईवीएफ तकनीक औरतों के शरीर पर बुरा असर डालती है और अधिकांश महिलाओं को टीबी की बीमारी अपनी चपेट में ले लेती है. आईवीएफ तकनीक में सिर्फ 30 फीसदी चांस होता है कि औरत प्रैग्नैंट हो जाएगी. अधिकतर केसेस में तीसरी या चौथी बार आईवीएफ कराने पर ही संतान की प्राप्ति होती है. एक बार के आईवीएफ में कम से कम 6 से 10 लाख रुपए लगते हैं. ऐसे में दंपती नवजात बच्चा खरीदने में ज्यादा कंफर्टेबल होता है.

दोतीन दशकों पहले तक लोग संयुक्त परिवार में रहते थे. अगर 2 भाइयों के बच्चे हैं और एक भाई के पास बच्चा नहीं हैं तो भी भाई के बच्चे उस कमी को पूरी कर देते थे. जीवन में खालीपन महसूस नहीं होता था. कभीकभी एक भाई अपनी कोई संतान उस भाई को गोद भी दे देता था. मगर अब जबकि लोग एकल परिवार में रहते हैं और मर्द के काम पर चले जाने के बाद औरत घर पर अकेली रह जाती है तो बच्चे की कमी बेवजह महसूस होती है. अड़ोसीपड़ोसी भी गाहेबगाहे पूछने लगते हैं, ‘आप के बच्चे नहीं हैं?’ ऐसे में बच्चा गोद लेने की इच्छा जागती है.

कई बार बच्चे न होने पर कपल सोचते हैं कि कोई बात नहीं. एकदूसरे के साथ पूरा जीवन कट जाएगा. मगर 40-45 साल की उम्र में जब दोस्तोंसहयोगियों के बच्चों की शादियां होते देखते हैं तो मन में हूक उठती है कि अपना बच्चा भी हो. कभीकभी यह भय भी पैदा हो जाता है कि दोनों में से कोई जल्दी मर गया तो फिर अकेले जीवन कैसे काटेंगे? ऐसे में इस उम्र के लोग भी बच्चा गोद लेने की इच्छा में कानूनीगैरकानूनी रास्ता इख्तियार करते हैं.

गोद लेने के बाद संभावित परेशानियां

गोद लेना कोई समस्या नहीं है. यह प्यार से भरा निर्णय है. परेशानियां तब होती हैं जब समझा, धैर्य और तैयारी की कमी हो. सही ढंग से योजना बना कर और भावनात्मक संवेदनशीलता से इन चुनौतियों को आसानी से संभाला जा सकता है. याद रहे कि गोद लेना एक बेहद संवेदनशील, भावनात्मक और जिम्मेदारीभरा निर्णय है. गोद लिए बच्चे को अपना पूरा प्यार, सुरक्षा और सम्मान देना आवश्यक है. फिर भी वास्तविक जीवन में कुछ चुनौतियां सामने आ सकती हैं जिन्हें समझाना और उन के लिए पहले से तैयार रहना बेहद जरूरी है. ये परेशानियां हर किसी के साथ नहीं होतीं, पर कई परिवारों ने इन्हें अनुभव किया है.

त्यागे जाने का डर

कुछ बच्चे महसूस कर सकते हैं कि उन्हें पहले छोड़ दिया गया था. ऐसे में वे असुरक्षित महसूस कर सकते हैं. नए पेरैंट्स की जरा सी डांटफटकार भी उन के भीतर नकारात्मक सोच पैदा कर देती है. बच्चा जब अपनी किशोरावस्था में पहुंचता है तो कुछ और चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं. इस उम्र में बच्चे की जिज्ञासा चरम पर होती है, इस से विद्रोह या भावनात्मक टूटन की संभावना बन सकती है. बायलौजिकल पेरैंट्स की तलाश की इच्छा उठ सकती है.

रिश्तेदारों व समाज की अनचाही टिप्पणियां

कुछ लोग असंवेदनशील सवाल पूछ सकते हैं, जैसे तुम्हारे असली मातापिता कौन हैं? या तुम यहां आने से पहले कहां रहते थे? ऐसे रिश्तेदारों और दोस्तों को डपट देना ही सब से सटीक तरीका है चाहे रिश्ता या दोस्ती हमेशा के लिए खत्म ही क्यों न हो जाए.

भेदभाव

कभीकभी परिवार या समाज में तुलना या अलग नजर से देखना समस्या बन सकता है. कई बार बच्चा गोद लेने के बाद दंपती को अपना बच्चा भी हो जाता है. ऐसे में गोद लिए बच्चे के प्रति उन का प्यार कम हो जाता है और बच्चा भेदभाव का शिकार बनता है. जब यह भेदभाव ज्यादा हो जाए तो बड़ा होने पर उसे मांबाप की संपत्ति से भी बेदखल होने का खौफ होता है. इस के साथ ही कुछ पारिवारिक चुनौतियां भी होती हैं. नए भाईबहनों के साथ एडजस्टमैंट कुछ कठिन होता है. मातापिता का मानसिक दबाव- ‘क्या हम सही तरीके से पाल पा रहे हैं’ जैसी चिंता लगी रहती है. शुरू में अटैचमैंट बनाने में समय लगता है.

स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे

कई केसेस में बच्चे की मैडिकल हिस्ट्री की पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं होती है. उसे कोई वैक्सीन लगी है या नहीं, इस की जानकारी भी नहीं मिलती. किसी आनुवंशिक रोग के बारे में भी बाद में पता चलता है.?

प्रक्रिया का सरल होना जरूरी

गोद लेने की कानूनी प्रक्रिया असल में सरल, पारदर्शी, व्यावहारिकता और तेज होनी ही चाहिए. यह उन हजारोंलाखों बच्चों के हित में भी है जो अनाथालयों में एक परिवार की प्रतीक्षा करते हैं, लेकिन लंबी कानूनी प्रक्रिया के कारण वे वहीं रह जाते हैं. हमारे देश के अनाथालय जेलों से भी बदतर हैं क्योंकि थोड़े दिनों में स्टाफ की सेवा की भावना खत्म हो जाती है और जिद्दी, उद्दंड, बीमार बच्चे आफत लगने लगते हैं.

कानूनी प्रक्रिया सरल और तेज होगी तो उन दंपतियों को सहूलियत होगी

जो जटिल प्रक्रियाओं, दस्तावेजी औपचारिकताओं और वर्षों की प्रतीक्षा से थक कर पीछे हट जाते हैं. प्रक्रिया जितनी खुली और औनलाइन होगी, उतनी पारदर्शिता बढ़ेगी और गलत तरीकों की गुंजाइश कम होगी. इस से भ्रष्टाचार और बिचौलियों की रोकथाम भी होगी. आसान प्रक्रिया गोद लेने की संख्या बढ़ाएगी और समाज में इस की स्वीकृति भी मजबूत होगी.

अस्पताल में प्रसव तो जन्म पंजीकरण जरूरी

भारत में अस्पतालों में पैदा होने वाले बच्चों की तादाद बढ़ गई है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 की रिपोर्ट के अनुसार भारत में अस्पतालों में पैदा होने वाले बच्चों की संख्या 79 फीसदी से बढ़ कर 89 फीसदी हो गई है. ग्रामीण क्षेत्रों में यह संख्या 87 फीसदी है. शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 94 फीसदी तक पहुंच जाता है. इस के पीछे सब से बड़ी वजह राज्य सरकारों द्वारा नियुक्त सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता ‘आशा बहू’ हैं. वे गांवगांव से महिलाओं को प्रसव के लिए सरकारी अस्पताल ले कर जाती हैं. इस के बदले उन्हें 3 से 6 हजार रुपए प्रतिमाह का मानदेय मिलता है. हर प्रसव पर अलग से भी पैसा मिलता है.

आशा बहू योजना की शुरुआत केंद्र सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत की गई. इस का उद्देश्य मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य परिणामों में सुधार करना था. मुख्य रूप से यह योजना महिलाओं और बच्चों के बीच काम करती है. आशा बहू का चयन पंचायत स्तर पर होता है. आशा बहू कार्यकर्ताओं का काम होता है कि वे गांव में गर्भवती महिलाओं की जानकारी रखें. उन को सरकारी अस्पताल में प्रसव के लिए रजिस्टर्ड कराएं.

प्रसव से पहले के टैस्ट और जरूरी जांचें कराने में वे मदद करें. वे गांव से सरकारी अस्पताल तक ले जाने के लिए सरकारी एंबुलैंस का प्रयोग करती हैं. हर प्रसव के हिसाब से उन को 600 से 900 रुपए तक का मानदेय मिलता है जो उन के वेतन से अलग होता है.

यह योजना पूरे देश में काम कर रही है. उत्तर प्रदेश में लगभग 1,50,000 आशा बहू कार्यकर्ता हैं जो राज्य की 28 करोड़ की विशाल आबादी की सेवा करती हैं. भारत सरकार के मानदंडों के अनुसार, प्रति एक हजार की जनसंख्या पर एक आशा कार्यकर्ता तैनात है. आशा बहू की गतिविधियों पर सौफ्टवेयर एप्लिकेशन के माध्यम से नजर रखी जाती है. लगभग 1.5 लाख आशा बहुओं को सितंबर 2018 से मार्च 2022 तक कुल 2,887 करोड़ रुपए वितरित किए गए. इस बीच आशा बहुओं को लगभग 193 लाख एसएमएस भेजे गए हैं.

जब कोई भी महिला गर्भ के समय सरकारी अस्पताल जाती है तो एक परचा बनता है. उस की औनलाइन डिटेल दर्ज की जाती है. अगर परचा हाथ से बना है तो भी एक बारकोड उस पर चिपकाया जाता है जिस में उस महिला का पूरा विवरण दर्ज होता है. उस में उस की दवा और जांच का हिसाब होता है.

जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम के तहत गर्भ के दौरान सरकारी और निजी दोनों अस्पतालों के लिए जरूरी होता है कि वे एक्सरे, सिटीस्कैन का पूरा हिसाब रखें. जब बच्चा पैदा होता है तो उसी अस्पताल से एक जन्म प्रमाणपत्र मिलता है. यही जन्म प्रमाणपत्र नगरनिगम में दिखाने पर वहां से अलग जन्मप्रमाण पत्र मिलता है जिस का प्रयोग स्कूल में बच्चे को दाखिल कराने के समय किया जाता है.

अगर कोई बच्चा अस्पताल में पैदा नहीं हुआ है तो गांव में प्रधान और शहरों में पार्षद एक जन्म प्रमाणपत्र देते हैं. इसी आधार पर नगरनिगम या तहसील से इस के बाद जन्म प्रमाणपत्र बनवाना होता है. इस के लिए औनलाइन फौर्म भरना होता है, तभी प्रमाणपत्र बनता है.

सरकार के पास हर बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र होता है. अगर कोई चाहे कि वह बिना सरकारी जन्म प्रमाणपत्र के स्कूल में दाखिला ले ले या किसी सरकारी योजना का लाभ ले तो नहीं ले सकता. निजी अस्पतालों के लिए यह जरूरी है कि वे अपने अस्पताल में पैदा होने वाले हर बच्चे का विवरण पोर्टल के माध्यम से अपने क्षेत्र के रजिस्ट्रार को दें.

कांग्रेस सरकार के दौरान बना जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम 1969 भारत में जन्म और मृत्यु के पंजीकरण को अनिवार्य करने वाला कानून है. इस अधिनियम के तहत जन्म या मृत्यु की घटना के स्थान पर पंजीकरण कराना अनिवार्य है. यह काम राज्य सरकारों द्वारा नियुक्त अधिकारियों द्वारा किया जाता है.

2023 में इस अधिनियम में बदलाव कर के पंजीकरण प्रक्रिया को डिजिटल बनाने और विभिन्न डेटाबेस को जोड़ने के लिए औनलाइन कर दिया गया है. इन तमाम कानूनों के मद्देनजर अब बच्चों की जानकारी छिपाना संभव नहीं है. – शैलेंद्र सिंह

पहचान का संकट

जैसेजैसे बच्चा बड़ा होता है, उसे अपनी असली पहचान और जन्मदाता मातापिता के बारे में जिज्ञासा हो सकती है. जब बच्चा गोद लिए जाने के वक्त 4 साल से अधिक उम्र का होता है तो वह इस बात को समझाता है कि जिन के साथ वह रहने जा रहा है वे उस के असली मांबाप नहीं हैं. कई बार बच्चे को अपने असली मांबाप की याद रहती है.

ऐसे में जब वह किशोर अवस्था में पहुंचता है तो उन्हें ढूंढ़ने और पाने की इच्छा बलवती होने लगती है. कई बार बच्चा गोद लिए जाने के वक्त बहुत छोटा होता है और उस को पिछला कुछ भी याद नहीं होता मगर बड़े होने के दौरान घरपरिवार के अन्य सदस्यों द्वारा अगर यह राज उस के सामने खुल जाए कि उसे गोद लिया गया है तो वह अपने असली मांबाप के बारे में जानने को व्याकुल हो उठता है.

जिन्होंने बच्चे को गोद लिया हो उन्हें बच्चे को असली मांबाप ढूंढ़ने का मौका अवश्य देना चाहिए, हालांकि आमतौर पर असली मां की छोटे बच्चों से मिलने में खास रुचि नहीं होती है. Adoption Law.

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