Download App

Hindi Social Story : माधवी – उसकी छोटी सी दुनिया में क्यों आग लग गई थी ?

Hindi Social Story : दिन भर स्कूल की झांय झांय से थक कर माधवी उसी भवन की ऊपरी मंजिल पर बने अपने कमरे में पहुंची. काम वाली को चाय बनाने को कह कर सोफे पर पसर गई. चाय पी कर वह थकान मिटाना चाहती थी. चूंकि इस समय उस का मन किसी से बात करने का बिल्कुल नहीं था इसीलिए ऊपर आते समय मेन गेट में वह ताला लगा आई थी.

अभी मुश्किल से 2-3 मिनट ही हुए होंगे कि टेलीफोन की घंटी बज उठी. घंटी को सुन कर उसे यह तो लग गया कि ट्रंक काल है फिर भी रिसीवर उठाने का मन न हुआ. उस ने सोचा कि काम वाली से कह कर फोन पर मना करवा दे कि घर पर कोई नही, तभी घंटी बंद हो गई. एक बार रुक कर फिर बजी. वह खीज कर उठी और टेलीफोन का चोंगा उठा कर कान से लगाया. फोन जबलपुर से उस की ननद का था. माधवी ने जैसे ही ‘हैलो’ कहा उस की ननद बोली, ‘‘भाभी, तुम जल्दी आ जाओ. मां बहुत याद कर रही हैं.’’

‘‘मांजी को क्या हुआ?’’ माधवी ने हड़बड़ा कर पूछा.

‘‘लगता है अंतिम समय है,’’ ननद जल्दी में बोली, ‘‘तुम्हें देखना चाहती हैं.’’

‘‘अच्छा,’’ कह कर माधवी ने फोन रख दिया.

घड़ी में देखा, 4 बज रहे थे. जबलपुर के लिए ट्रेन रात को 10 बजे थी. माधवी ने टे्रवल एजेंट को फोन कर 2 बर्थ बुक करने को कहा.

माधवी की आंखों में रह रह कर सास का चेहरा घूमने लगा. उस ने अपनी सास के दोनों रूप देखे हैं. पहले हंस कर दिल से प्यार करने वाली मां का और फिर बिस्तर पर पड़ी एक असहाय बूढ़ी औरत का.

वह पहले माधवी के साथ ही रहा करती थीं. माधवी के पति राघव 3 भाइयों में दूसरे नंबर के थे. बड़े बेटे की नौकरी तबादले वाली थी. तीसरा बेटा बंटी अभी बहुत छोटा था. राघव की भोपाल में बी.एच.ई.एल. में स्थायी नौकरी थी. मां अपने छोटे बेटे को ले कर राघव के साथ भोपाल में ही सेटल हो गई थीं लेकिन यह साथ ज्यादा दिन न चला. 3 साल बाद ही एक सड़क दुर्घटना ने राघव का जीवन छीन लिया.

माधवी को बी.एच.ई.एल. से कुछ पैसा जरूर मिला पर अनुकंपा नियुक्ति नहीं मिली. सास ने परिस्थिति को भांपा और बंटी को ले कर बड़े बेटे के पास चली गईं. माधवी ने पति के मिले पैसे से एक मकान खरीदा. कुछ लोन ले कर दूसरी मंजिल बनवाई. खुद ऊपर रहने लगीं और नीचे एक स्कूल शुरू कर दिया. पति की मौत के बाद माधवी की सारी दुनिया अपनी बेटी और स्कूल में सिमट गई.

पहले तो सास से माधवी की थोड़ी बहुत बात हो जाया करती थी पर धीरे धीरे काम की व्यस्तता से यह अंतर बढ़ने लगा. माधवी की ससुराल मानो छूट गई थी. जेठ और देवर ने फोन पर हालचाल पूछने के अलावा और कोई सुध नहीं ली. मकान, जमीन जायदाद या दूसरी पारिवारिक संपत्तियों में हिस्सेदारी तो दूर, किसी ने यह तक नहीं पूछा कि कैसे गुजारा कर रही है या स्कूल कैसा चल रहा है.

इस उपेक्षा के बाद भी माधवी को कहीं न कहीं अपनों से एक स्नेहिल स्पर्श की उम्मीद होती.

सहानुभूति और विश्वास से भरे दो शब्दों की चाहत होती. अपने काम और उपलब्धियों पर शाबाशी की अपेक्षा तो हर व्यक्ति करता है किंतु माधवी की जिंदगी में यह सब कुछ नहीं था. उसे खुद रोना था और खुद चुप हो जाना था.

माधवी ने अपनी छोटी सी दुनिया बहुत मेहनत से बनाई थी. एक दिन भी इस से बाहर रहना उस के लिए मुश्किल था. उस ने कई बार बाहर जा कर घूमने का मन बनाया पर न जा सकी. आज जाना जरूरी था क्योंकि सास की हालत चिंताजनक थी और उन्होंने उसे मिलने के लिए बुलाया भी था.

ट्रेन ने सुबह 6 बजे जबलपुर उतारा. वह बेटी को ले कर प्लेटफार्म पर बने लेडीज वेटिंग रूम में गई. वहीं तैयार हुई. बेटी को भी तैयार किया और जेठ जी के घर फोन मिलाया. फोन जेठानी ने उठाया. बातचीत में ही जेठानी ने अस्पताल का नाम पता बताते हुए कहा, ‘‘हम सब भी घर से रवाना हो रहे हैं.’’

माधवी को जेठानी के मन की बात समझते देर न लगी. इसीलिए वह स्टेशन के बाहर से ऑटो पकड़ कर सीधे अस्पताल पहुंची. उस समय डॉक्टर राउंड पर थे अत: कुछ देर उसे बाहर ही रुकना पड़ा. डॉक्टर के जाने के बाद माधवी भीतर पहुंची.

सास को ड्रिप लगी थी. ऑक्सीजन की नली से श्वास चल रही थी. गले के कैंसर ने भोजन पानी की नली को रोक कर रख दिया था. उन की जबान भी उल्ट गई थी. वह केवल देख सकती थीं और इशारे से ही बातें कर रही थीं. पिछले 4 दिन से यही हालत थी. लगता था अब गईं, तब गईं.

माधवी ने पास जा कर उन का हाथ छुआ. पसीने और चिपचिपाहट से उसे अजीब सा लगा. उस की नजर बालों पर गई तो लगा महीनों से कंघी ही नहीं हुई है. होती भी कैसे. वह पिछले 6 माह से बिस्तर पर जो थीं.

माधवी ने आवाज दी. उन्होंने आंखें खोलीं तो देख कर लगा कि पहचानने की कोशिश कर रही हैं.

‘‘मैं हूं, मांजी माधवी, आप की पोती को ले कर आई हूं.’’

सुन कर उन्हें संतोष हुआ फिर हाथ उठाया और इशारे से कुछ कहा तो माधवी को लगा कि शायद पानी मांग रही हैं.

माधवी ने पूछा, ‘‘पानी चाहिए?’’

उन्होंने  हां में सिर हिलाया. माधवी ने पानी का गिलास उठाया ही था कि वहां मौजूद परिजनों ने उसे रोक दिया. कहा, ‘‘डाक्टर ने ऊपर से कुछ भी देने के लिए मना किया है.’’

माधवी का हाथ रुक गया. उस ने विवशता से सास की ओर देखा.

सास ने माधवी की बेबसी समझ ली थी और समझतीं भी क्यों नहीं, पिछले 4 दिन से यही तो वह समझ रही थीं. हर आगंतुक से वह पानी मांगतीं. आगंतुक पानी देने की कोशिश भी करता किंतु वहां मौजूद डॉक्टर और नर्स रोक देते थे और मांजी को निराश हो कर अपनी आंखें मूंद लेनी पड़तीं. सास की इस बेबसी पर माधवी का मन भर आया.

तभी ननद ने कहा, ‘‘छोटी भाभी, आप घर जा कर कुछ आराम कर लें, रात भर का सफर कर के आई हैं, थकी होंगी.’’

पहले माधवी ने भी यही सोचा था किंतु सास की हालत देख कर उस का मन जाने का न हुआ. वह बोली, ‘‘नहीं, ठीक हूं.’’

माधवी वहीं रुक गई. वह स्टूल खींच कर मांजी के पैरों के पास बैठ गई. मन हुआ कि उन के पैर दबाए. माधवी ने जैसे ही कंबल हटाए दुर्गंध उस की नाक को छू गई. उस ने थोड़ा और कंबल सरका कर देखा तो बिस्तर में काफी गंदगी थी. मां जी के प्रति यह उस का दूसरा अनुभव था. इस से पहले माधवी हाथ में चिपचिपाहट और बालों में बेतरतीब लटें देख चुकी थी.

माधवी को अब समझने में कोई कठिनाई नहीं हुई कि सास का बचना मुश्किल है. तमाम रिश्तेदार भी इस हकीकत को जान गए थे. इसीलिए सारे लोग खबर लगते ही पहुंच चुके थे.

गले के कैंसर में ऑपरेशन जोखिम से भरा होता है, उस में भी यदि श्वास नली को जकड़ लेने वाला ट्यूमर हो तो जोखिम सौ फीसदी तक हो जाता है.

माधवी का मन मांजी के प्रति करुणा से भर गया. उसे ग्लानि इस बात की थी कि यदि मां जी को मरना है तो क्यों उन की इच्छाओं को मार कर और उन्हें गंदगी में पटक कर मौत की प्रतीक्षा की जा रही है. क्या हम उन्हें एक स्वस्थ और अच्छा माहौल नहीं दे सकते? वह जानती थी कि एक उम्र के बाद बड़े बूढ़ों की बीमारी में केवल बेटा बेटी या

बहुएं ही कुछ कर सकती हैं. उन के अलावा कोई और कुछ नहीं कर सकता. नौकरों के काम तो केवल औपचारिक होते हैं.

यहां स्वजनों के पास समय नहीं था. यदि था भी तो इच्छाशक्ति का अभाव और अहंकार आड़े आता था. लोग आते, हालचाल पूछते, डॉक्टरों और नर्सों से बात करते, बैठ कर अपनी दिनचर्या की व्यस्तता गिनाते और चले जाते.

माधवी का मन हुआ कि फौरन डिटॉल के पानी से मां जी को नहला दे. पर कमरे में जेठ, ननदोई और दूसरे पुरुषों की मौजूदगी देख कर वह चुप रह गई.

दोपहर को देखभाल करने वाले तमाम पुरुष चले गए. जेठानी भी मेहमानों के खाने का इंतजाम करने के लिए घर जा चुकी थीं. कमरे में माधवी, ननद और देवर बंटी के अलावा कोई न बचा.

माधवी ने मन ही मन कुछ निर्णय किया और वार्ड बॉय को आवाज दे कर गुनगुना पानी, डिटॉल और स्पंज लाने को कहा. वह खुद नर्स के पास जा कर एक कैंची मांग लाई और सब से पहले माधवी ने कैंची से मां जी के सारे बाल काट कर छोटे छोटे कर दिए. साबुन के स्पंज से सिर साफ किया और कपूर का तेल लगाया. फिर शरीर पर स्पंज किया. सूखे, साफ तौलिया से बदन पोंछा और हलके हाथ से हाथ पांव में तेल की मालिश कर दी. साफ और धुले कपड़े पहना दिए. बिस्तर की चादर और रबड़ बदली. पाउडर छिड़का. कमरे का फर्श धुलवाया. अब मां जी में ताजगी झलक उठी थी. माधवी शाम तक वहीं रही.

यद्यपि मां जी के बाल काटना किसी को पसंद नहीं आया पर माधवी ने जिस लगन के साथ साफ सफाई की थी यह बात सारे रिश्तेदारों को पसंद आई. वे माधवी की सराहना किए बिना न रह सके. हां, बाल काटने पर जेठ के तीखे शब्द जरूर सुनने पड़े. माधवी ने उन की बातों का कोई जवाब नहीं दिया और ननद के साथ घर आ गई.

अगले दिन सुबह 9 बजे माधवी अस्पताल पहुंची और थोड़ी देर बाद ही फिर सफाई में जुट गई. दोपहर को मां जी ने पानी मांगा. माधवी ने डॉक्टर की हिदायत का हवाला दे कर कहा, ‘‘आप ठीक हो जाइए, फिर खूब पानी पी लीजिएगा.’’ पर इस बार मां जी नहीं मानीं. उन्होंने इशारे से ही हाथ जोड़े और ऐसा संकेत किया मानो पांव पड़ रही हैं.

माधवी से रहा न गया. उस के आंसू बह निकले. उस ने बिना किसी की परवा किए कप भर कर पानी मांजी को दे दिया. ननद और जेठानी दोनों को यह जान कर आश्चर्य हुआ कि सारा पानी गले से नीचे उतर गया, जबकि कैंसर से गला पूरी तरह अवरुद्ध था. पानी भीतर जाते ही मांजी को मानो नई जान आई. उन में कुछ चेतना सी दिखी और चेहरे पर हंसी भी. जेठानी और ननद दोनों ने कुछ कुछ बातें भी कीं. ‘‘अब आप जल्दी ही अच्छी होने वाली हो. देखिए, गला खुल गया.’’

तभी मांजी ने इशारा कर के फिर कुछ मांगा. माधवी ने पानी और दूसरी चीजों के नाम बताए तो उन्होंने सभी वस्तुओं को इनकार कर किया. माधवी ने पूछा, ‘‘दूध,’’ उन्होंने हां में सिर हिलाया. माधवी ने तुरंत दूध मंगाया.

इस बार जेठानी ने सख्ती से मना किया और कहा, ‘‘पानी तो ठीक है, पर दूध बिना डॉक्टर से पूछे न दो.’’ पर माधवी को जाने कौन सा जुनून सवार था कि उस ने बिना किसी की परवाह किए मां जी को उसी कप में दूध भी दे दिया. दूध भी गले से नीचे चला गया. मां जी के चेहरे पर एक अजीब संतोष उभरा. उन्होंने इशारे से बेटे बेटियों को बुलाया. बाकी तो वहां थे, जेठ और बंटी नहीं थे. उन्हें भी टेलीफोन कर के घर से बुला लिया गया.

मां जी ने पहले जेठ का हाथ ननद के सिर पर रखवाया फिर माधवी को बुलाया और फिर बंटी को. उन्होंने माधवी का हाथ पकड़ा और बंटी का हाथ माधवी के हाथ में दे कर उस की ओर कातर निगाहों से देखने लगीं. मानो कह रही हों, ‘‘अब मेरे बेटे का तुम ही ध्यान रखना.’’

माधवी का मन भर आया. आंखों में नमी छलक आई…उस ने कहा, ‘‘आप चिंता न करें, बंटी मेरे बेटे की तरह है.’’ फिर उस ने निगाह बंटी की ओर फेरी, तो उसे अपनी ओर देखता पाया. भीतर से माधवी का मातृत्व उमड़ पड़ा. तभी मां जी के हाथ से माधवी का हाथ छूट गया. माधवी चौकी. उस ने मां जी की गर्दन को एक ओर ढुलकते हुए देखा. कमरे में सभी चीख पड़े, ‘‘मां जी.’’ जेठ माधवी की ओर देख कर दहाड़े, ‘‘तू ने मार डाला मां को. आखिर क्यों पिलाया पानी और क्यों दिया दूध?’’

माधवी को कुछ न सूझा. वह सहमी सी बुत की तरह खड़ी रही. रह रह कर उसे मां जी के संकेत याद आते रहे. उस ने सोचा कि उस ने कोई गलत काम नहीं किया. यदि मां जी की मौत करीब थी तो उन्हें क्यों भूखा प्यासा मरने दिया जाए. लोग तो घर से बाहर किसी को भूखा प्यासा नहीं जाने देते, तब जिंदगी के इस महाप्रयाण पर वह कैसे मांजी को भूखा प्यासा जाने देती?

वहां मौजूद महिलाएं रोने लगीं. जेठ जी का बड़बड़ाना जारी था. माधवी से सुना न गया. वह बाहर की ओर चल दी. अभी वह दरवाजे के करीब ही आई थी कि उस के दोनों हाथों को किसी ने छुआ. उस ने देखा कि उस के दाएं हाथ की उंगली देवर बंटी ने और बाएं हाथ की उंगली बेटी नीलम ने पकड़ रखी थी. Hindi Social Story :

Emotional Hindi Kahani : मां जैसी आंटी

Emotional Hindi Kahani : गरीब राघव के प्रति मीना के मन में पता नहीं क्यों ममता उमड़ आई थी. उस ने राघव को हर तरह से मदद दे कर पढ़ाई पूरी करने का पूरा मौका दिया. क्या राघव मीना के इस उपकार को कभी उतार सका?

बहुत दिनों बाद अचानक माधुरी का आना मीना को सुखद लगा था. दोचार दिन तो यों ही गपशप में निकल गए थे. माधुरी दीदी यहां अपने किसी संबंधी के यहां विवाह समारोह में शामिल होने आई थीं. जिद कर के वे मीना और उस के पति दीपक को भी अपने साथ ले गईं. फिर शादी के बाद मीना ने जिद कर उन्हें 2 दिन और रोक लिया था. दीपक किसी काम से बाहर चले गए तो माधुरी रुक गई थीं.

‘‘और सुना, सब ठीकठाक तो चल रहा है न,’’ माधुरी ने कहा, ‘‘अब तो दोनों बेटियों का ब्याह कर के तुम लोग भी फ्री हो गए हो. खूब घूमोफिरो. अब क्यों घर में बंधे हुए हो?’’

‘‘दीदी, अब आप से क्या छिपाना,’’ मीना कुछ गंभीर हो कर कहने लगी, ‘‘आप तो जानती ही हैं कि दोनों बेटियों की शादी में काफी खर्च हुआ है. अब दीपक रिटायर भी हो गए हैं. सीमित पैंशन मिलती है. किसी तरह खर्च चल रहा है, बस. कोई आकस्मिक खर्चा आ जाता है तो उस के लिए भी सोचना पड़ता है.’’

माधुरी बीच में ही टोक कर बोलीं, ‘‘देख मीना, तू अपनेआप को थोड़ा बदल, बेटियों के कमरे खाली पड़े हैं, उन्हें किराए पर दे. इस शहर में बच्चों की कोचिंग का अच्छा माहौल है. तुम्हारे घर के बिलकुल पास कोचिंग क्लासें चल रही हैं. बच्चे फौरन किराए पर कमरा ले लेंगे. उन से अच्छा किराया तो मिलेगा ही, घर की सुरक्षा भी बनी रहेगी.’’

माधुरी की बात मीना को भी ठीक लगने लगी थी. उसे खुद आश्चर्य हुआ कि अब तक इस तरह उस ने सोचा क्यों नहीं. ठीक है, दीपक घर को किराए पर देने के पक्ष में नहीं हैं पर 2 कमरे बच्चों को देने में क्या हर्ज है. बाथरूम तो अलग

है ही. माधुरी दीदी के जाते ही पति से बात कर के मीना ने अखबार में विज्ञापन दे दिया.

‘‘देखो मीना, मैं तुम्हारे कार्यक्षेत्र में दखल नहीं दूंगा,’’ दीपक बोले, ‘‘पर निर्णय तुम्हारा ही है सो सोचसम झ कर लेना. क्या किराया होगा, किसे देना है, सारा सिरदर्द तुम्हारा ही होगा, सम झीं.’’

‘‘हां बाबा, सब सम झ गई हूं, किराए पर भी मेरा ही अधिकार होगा, जैसा चाहूं खर्च करूंगी.’’

दीपक तब हंस कर रह गए थे.

विज्ञापन छपने के कुछ ही दिनों बाद  दोनों कमरे किराए पर उठ गए थे. निखिल और सुबोध दोनों बच्चे मीना को संभ्रांत परिवार के लगे थे. किराया भी ठीकठाक मिल गया था.

मीना खुश थी. किराएदार के रूप में बच्चों के आने से उस का अकेलापन थोड़ा कम हो गया था. दीपक ने तो अपना मन लगाने के लिए एक संस्था जौइन कर ली थी. पर वह घर में अकेली बोर हो जाती थी. दोनों बेटियों के जाने के बाद तो अकेलापन वैसे भी अधिक खलने लगा था.

शीना का उस दिन फोन आया तो कह रही थी, ‘‘मां, आप ने ठीक किया जो कमरे किराए पर दे दिए. अब आप और पापा कुछ दिनों के लिए चेन्नई घूमने आ जाएं, काफी सालों से आप लोग कहीं घूमने भी नहीं गए.’’

‘‘हां, अब घूमने का प्रोग्राम बनाएंगे उधर का. रीना भी जिद कर रही है बेंगलुरु आने की,’’ मीना का स्वर उत्साह से भरा था.

फोन सुनने के बाद मीना बाहर लौन में आ कर गमले ठीक करते हुए सोचने लगी कि दीपक से बात करेगी कि बेटियां इतनी जिद कर रही हैं तो चलो, उन के पास घूम आएं.

तभी बाहर का फाटक खोल कर एक दुबलापतला, कुछ ठिगने कद का लड़का अंदर आया था.

‘‘कहो, क्या काम है? किस से मिलना है?’’

‘‘जी, आंटी, मैं राघव हूं. यहां जगदीश कोचिंग में एडमिशन लिया है. मु झे कमरा चाहिए था.’’

‘‘देखो बेटे, यहां तो कोई कमरा खाली नहीं है. 2 कमरे थे जो अब किराए पर चढ़ चुके हैं,’’ मीना ने गमलों में पानी डालते हुए वहीं से जवाब दे दिया.

वह लड़का थोड़ी देर खड़ा रहा था पर मीना अंदर चली गईं. दूसरे दिन दीपक के बाजार जाने के बाद यों ही मीना अखबार ले कर बाहर लौन में आई तो फिर वही लड़का दिखा था.

‘‘हां, कहो? अब क्या बात है?’’

‘‘आंटी, मैं इतने बड़े मकान में कहीं भी रह लूंगा. अभी तो मेरा सामान भी रेलवे स्टेशन पर ही पड़ा है,’’ उस के स्वर में अनुनय का भाव था.

‘‘कहा न, कोई कमरा खाली नहीं है.’’

‘‘पर यह,’’ कह कर उस ने छोटे से गैराज की तरफ इशारा किया था.

मीना का ध्यान भी अब उधर गया. मकान में यह हिस्सा कार के लिए रखा था. कार तो आ नहीं पाई. हां, पर शीना की शादी के समय इस में एक मामूली सा दरवाजा लगा कर कमरे का रूप दे दिया था. हलवाई और नौकरों के लिए पीछे एक कामचलाऊ टौयलेट भी बना था. अब यह हिस्सा घर के फालतू सामान के लिए था.

‘‘इस में रह लोगे, पढ़ाई हो जाएगी?’’ मीना ने आश्चर्य से पूछा था.

‘‘हां, क्यों नहीं, लाइट तो होगी न.’’

वह लड़का अब अंदर आ गया था. गैराज देख कर वह उत्साहित था, कहने लगा, ‘‘यह मेज और कुरसी तो मेरे काम आ जाएगी और यह तख्त भी.’’

मीना सम झ नहीं पा रही थी कि क्या कहे.

लड़के ने जेब से कुछ नोट निकाले और कहने लगा, ‘‘आंटी, ये 500 रुपए तो आप रख लीजिए. मैं 800 रुपए से ज्यादा किराया आप को नहीं दे पाऊंगा. बाकी 300 रुपए मैं एकदो दिनों में दे दूंगा. अब सामान ले आऊं?’’

500 रुपए हाथ में ले कर मीना अचंभित थी. चलो, एक किराएदार और सही. बाद में इस हिस्से को भी ठीक करा देगी तो इस का भी अच्छा किराया मिल जाएगा.

घंटेभर बाद ही वह एक रिकशे पर अपना सामान ले आया था. मीना ने देखा, एक टिन का बक्सा, एक बड़ा सा पुराना बैग और एक पुरानी चादर की गठरी में कुछ सामान बंधा हुआ दिख रहा था.

‘‘ठीक है, सामान रख दो. अभी नौकरानी आती होगी तो मैं सफाई करवा दूंगी.’’

‘‘आंटी, मुझे  झाड़ू दे दीजिए. मैं खुद

ही साफ कर लूंगा.’’

खैर, नौकरानी के आने के बाद थोड़ा फालतू सामान मीना ने बाहर निकलवा लिया और ढंग की मेजकुरसी उसे पढ़ाई के लिए दे दी. राघव ने भी अपना सामान जमा लिया था.

शाम को जब मीना ने दीपक से जिक्र किया तो उन्होंने हंस कर कहा था, ‘‘देखो, अधिक लालच मत करना. वैसे यह तुम्हारा क्षेत्र है तो मैं कुछ नहीं बोलूंगा.’’

मीना को यह लड़का निखिल और सुबोध से काफी अलग लगा था. रहता भी दोनों से अलगथलग ही था जबकि तीनों एक ही क्लास में पढ़ते थे.

उस दिन शाम को बिजली चली गई तो मीना बाहर बरामदे में आ गई थी. निखिल और सुबोध बैडमिंटन खेल रहे थे. अंधेरे की वजह से राघव भी बाहर आ गया था पर दोनों ने उसे अनदेखा कर दिया. वह दूर कोने में चुपचाप खड़ा था. फिर मीना ने ही आवाज दे कर उसे पास बुलाया.

‘‘तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है? मन तो लग गया न?’’

‘‘मन तो आंटी लगाना ही है. मां ने इतनी जिद कर के पढ़ने भेजा है, खर्चा किया है.’’

‘‘अच्छा, और कौनकौन हैं घर में?’’

‘‘बस, मां ही हैं. पिताजी तो बचपन में ही नहीं रहे. मां ने ही सिलाईबुनाई कर के पढ़ाया. मैं तो चाह रहा था कि वहीं आगे की पढ़ाई कर लूं पर मां को पता नहीं किस ने इस शहर की आईआईटी क्लास की जानकारी दे दी थी और कह दिया कि तुम्हारा बेटा पढ़ने में होशियार है, उसे भेज दो. बस, मां को जिद सवार हो गई,’’ मां की याद में उस का स्वर भर्रा गया था.

‘‘अच्छा, चलो, अब मां का सपना पूरा करो,’’ मीना के मुंह से भी निकल ही गया था. सुबोध और निखिल भी थोड़े अचंभित थे कि वह राघव से क्या बात कर रही है.

एक दिन नौकरानी ने आ कर कहा, ‘‘दीदी, देखो न गैराज से धुआं सा निकल रहा है.’’

‘‘धुआं,’’ मीना घबरा गई और रसोई में गैस बंद कर के वह बाहर आई. हां, धुआं तो है पर राघव क्या अंदर नहीं है.

मीना ने जा कर देखा तो वह एक स्टोव पर कुछ बना रहा था. कैरोसिन का बत्ती वाला स्टोव धुआं कर रहा था.

‘‘यह क्या कर रहे हो?’’

चौंक कर मीना को देखते हुए राघव बोला, ‘‘आंटी, खाना बना रहा हूं.’’

‘‘यहां तो सभी बच्चे टिफिन मंगाते हैं. तुम खाना बना रहे हो तो फिर पढ़ाई कब करोगे.’’

‘‘आंटी, अभी मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं. टिफिन महंगा पड़ता है तो सोचा कि एक समय खाना बना लूंगा. शाम को भी वही खा लूंगा. यह स्टोव भी अभी ले कर आया हूं,’’ राघव धीमे स्वर में बोला. राघव की यह मजबूरी मीना को  झक झोर गई.

‘‘देखो, तुम्हारी मां जब रुपए भेज दे तब किराया दे देना. अभी ये रुपए रखो और कल से टिफिन सिस्टम शुरू कर दो, सम झे.’’

मीना ने राघव के रुपए ला कर उसे वापस कर दिए.

राघव डबडबाई आंखों से मीना को देखता रह गया.

बाद में मीना ने सोचा कि पता नहीं क्यों मांबाप पढ़ाई की होड़ में बच्चों को इतनी दूर भेज देते हैं. इस शहर में इतने बच्चे आईआईटी की पढ़ाई के लिए आ कर रह रहे हैं. गरीब मातापिता भी अपना पेट काट कर उन्हें पैसा भेजते हैं. अब राघव पता नहीं पढ़ने में कैसा हो पर गरीब मां खर्च तो कर ही रही है.

महीनेभर बाद मीना की मुलाकात गीता से हो गई. गीता उस की बड़ी बेटी शीना की सहेली थी और आजकल जगदीश कोचिंग में पढ़ा रही थी. कभीकभार शीना का हालचाल जानने घर आ जाती थी.

‘‘तेरी क्लास में राघव नाम का भी कोई लड़का है क्या? कैसा है पढ़ाई में? टैस्ट में क्या रैंक आ रही है?’’ मीना ने पूछ ही लिया.

‘‘कौन, राघव प्रकाश, वह जो बिहार से आया है. हां, आंटी, पढ़ाई में तो तेज लगता है. वैसे तो केमिस्ट्री की कक्षा ले रही हूं पर जगदीशजी उस की तारीफ कर रहे थे कि अंकगणित में बहुत तेज है. गरीब सा बच्चा है.’’

मीना चुप हो गई थी. ठीक है, पढ़ने में अच्छा ही होगा.

कुछ दिनों बाद राघव किराए के रुपए ले कर आया तो मीना ने पूछा, ‘‘तुम्हारे टिफिन का इंतजाम तो है न?’’

‘‘हां, आंटी, पास वाले ढाबे से मंगा लेता हूं.’’

‘‘चलो, सस्ता ही सही. खाना तो ठीक मिल जाता होगा?’’ फिर मीना ने निखिल और सुबोध को बुला कर कहा था, ‘‘यह राघव भी यहां पढ़ने आया है. तुम लोग इस से भी दोस्ती करो. पढ़ाई में भी अच्छा है. शाम को खेलो तो इसे भी अपनी कंपनी दो.’’

‘‘ठीक है, आंटी,’’ सुबोध ने कुछ अनमने मन से कहा था.

इस के 2 दिन बाद ही निखिल हंसता हुआ आया और कहने लगा, ‘‘आंटी, आप तो रघु की तारीफ कर रही थीं, पता है इस बार उस के टैस्ट में बहुत कम नंबर आए हैं. जगदीश सर ने उसे सब के सामने डांटा है.’’

‘‘अच्छा,’’ कह कर मीना खामोश हो गई तो निखिल चला गया. उस के बाद वह उठ कर राघव के कमरे की ओर चल दी. जा कर देखा तो राघव की आंखें लाल थीं. वह काफी देर से रो रहा था.

‘‘क्या हुआ, क्या बात हुई?’’

‘‘आंटी, मैं अब पढ़ नहीं पाऊंगा. मैं ने गलती की जो यहां आ गया. आज सर ने मु झे बुरी तरह से डांटा है.’’

‘‘पर तुम्हारे तो नंबर अच्छे आ रहे थे?’

‘‘आंटी, पहले मैं आगे बैठता था तो सब सम झ में आ जाता था. अब कुछ लड़कों ने शिकायत कर दी तो सर ने मु झे पीछे बिठा दिया. वहां से मु झे कुछ दिखता ही नहीं है, न कुछ सम झ में आ पाता है. मैं क्या करूं?’’

‘‘दिखता नहीं है, क्या आंखें कमजोर हैं?’’

‘‘पता नहीं, आंटी.’’

‘‘पता नहीं है तो डाक्टर को दिखाओ.’’

‘‘आंटी, पैसे कहां हैं. मां जो पैसे भेजती हैं उन से मुश्किल से खाने व पढ़ाई का काम चल पाता है. मैं तो अब लौट जाऊंगा,’’ कह कर वह फिर रो पड़ा था.

‘‘चलो, मेरे साथ,’’ मीना उठ खड़ी हुई थी. रिकशे में उसे ले कर पास के आंखों के एक डाक्टर के यहां पहुंच गई और आंखें चैक करवाईं तो पता चला कि उसे तो मायोपिया है.

‘‘चश्मा तो इसे बहुत पहले ही लेना था. इतना नंबर न बढ़ता.’’

‘‘ठीक है डाक्टर साहब, अब आप इस का चश्मा बनवा दें.’’

घर आ कर मीना ने राघव से कहा था, ‘‘कल ही जा कर अपना चश्मा ले आना, सम झे. और ये रुपए रखो. दूसरी बात यह कि इतना दबदब कर मत रहो कि दूसरे बच्चे तुम्हारी  झूठी शिकायत करें, सम झे.’’

राघव कुछ बोल नहीं पा रहा था.  झुक कर उस ने मीना के पैर छूने चाहे तो वह पीछे हट गई थी.

‘‘जाओ, मन लगा कर पढ़ो. अब नंबर कम नहीं आने चाहिए.’’

अब कोचिंग क्लासेस भी खत्म होने को थीं. बच्चे अपनेअपने शहर जा कर परीक्षा देंगे. यही तय था. राघव भी अब अपने घर जाने की तैयारी में था. निखिल और सुबोध से भी उस की दोस्ती हो गई थी.

सुबोध ने ही आ कर कहा कि  आंटी, राघव की तबीयत खराब हो रही है.

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘पता नहीं, हम ने 2-2 रजाइयां ओढ़ा दीं, फिर भी थरथर कांप रहा है.’’

मीना ने आ कर देखा.

‘‘अरे, लगता है तुम्हें मलेरिया हो गया है. दवाई ली थी?’’

‘‘जी, आंटी, डिस्पैंसरी से लाया तो था और कल तक तो तबीयत ठीक हो गई थी, पर अचानक फिर खराब हो गई. पता नहीं घर भी जा पाऊंगा या नहीं. परीक्षा भी अगले हफ्ते है. दे भी पाऊंगा या नहीं.’’

कंपकंपाते स्वर में राघव बड़बड़ा रहा था. मीना ने फोन कर के डाक्टर को वहीं बुला लिया फिर निखिल को भेज कर बाजार से दवा मंगवाई.

दूध और खिचड़ी देने के बाद दवा दी और बोली, ‘‘तुम अब आराम करो. बिलकुल ठीक हो जाओगे. परीक्षा भी दोगे, सम झे.’’

काफी देर राघव के पास बैठ कर वह उसे सम झाती रही थी. मीना खुद सम झ नहीं पाई थी कि इस लड़के के साथ ऐसी ममता सी क्यों हो गई है उसे.

दूसरे दिन राघव का बुखार उतर गया था. 2 दिन मीना ने उसे और रोक लिया था कि कमजोरी दूर हो जाए.

जाते समय जब राघव पैर छूने आया तब भी मीना ने यही कहा था कि खूब मन लगा कर पढ़ना.

बच्चों के जाने के बाद कमरे सूने तो हो गए थे पर मीना अब संतुष्ट थी कि 2 महीने बाद फिर दूसरे बच्चे आ जाएंगे. घर फिर आबाद हो जाएगा. गैराज वाले कमरे को भी अब और ठीक करवा लेगी.

आईआईटी का परिणाम आया तो पता चला कि राघव की रैंकिंग अच्छी आई है. निखिल और सुबोध रह गए थे.

राघव का पत्र भी आया था. उसे कानपुर आईआईटी में प्रवेश मिल गया था. स्कौलरशिप भी मिल गई थी.

‘ऐसे ही मन लगा कर पढ़ते रहना,’ मीना ने भी दो लाइन का उत्तर भेज दिया था. दीवाली पर कभीकभार राघव के कार्ड आ जाते. अब तो दूसरे बच्चे कमरों में आ गए थे. मीना भी पुरानी बातों को भूल सी गई थी. बस, गैराज को देख कर कभीकभार उन्हें राघव की याद आ जाती. समय गुजरता रहा था.

दरवाजे पर उस दिन सुबहसुबह ही घंटी बजी थी.

‘‘आंटी, मैं हूं राघव. पहचाना नहीं आप ने?’’

‘‘राघव,’’ आश्चर्यभरे स्वर के साथ मीना ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा था. दुबलापतला शरीर थोड़ा भर गया था. आंखों पर चश्मा तो था पर चेहरे पर दमक बढ़ गई थी.

‘‘आओ, बेटा, कैसे हो, आज कैसे अचानक याद आ गई हम लोगों की?’’

‘‘आंटी, आप की याद तो हरदम आती रहती है. आप नहीं होतीं तो शायद मैं यहां तक पहुंच ही नहीं पाता. मेरा कोर्स पूरा हो गया है और आप ने कहा कि मन लगा कर पढ़ना तो फाइनल में भी सबकुछ ठीक रहा. कैंपस इंटरव्यू में चयन हो कर नौकरी भी मिल गई है.’’

‘‘अच्छा, इतनी सारी खुशखबरी एकसाथ,’’ कह कर मीना हंसी थी.

‘‘हां, आंटी, पर मेरी एक इच्छा है कि जब मु झे डिगरी मिले तो आप और अंकल भी वहां हों, आप लोगों से यही प्रार्थना करने के लिए मैं यहां खुद आया हूं.’’

‘‘पर, बेटा…’’ मीना इतना ही बोलतेबोलते अचकचा गई थी.

‘‘नहीं आंटी, न मत कहिए. मैं तो आप के लिए टिकट भी बुक करा रहा हूं. आज आपलोगों की वजह से ही तो इस लायक हो पाया हूं. मैं जानता हूं कि जबजब मैं लड़खड़ाया, आप ने मु झे संभाला. एक मां थीं जिन्होंने जिद कर के मु झे इस शहर में भेजा और फिर आप हैं. मां तो आज यह दिन देखने को रही नहीं पर आप तो हैं, आप मेरी मां समान हैं.’’

राघव का भावुक स्वर सुन कर मीना भी पिघल गई थी. शब्द भी कंठ में आ कर फंस गए थे.शायद ‘मां’ शब्द की सार्थकता का बोध यह बेटा उन्हें करा रहा था. Emotional Hindi Kahani :

Family Story In Hindi : फांस – कामरान और सुल्तान अपने अब्बू से क्यों मिलना चाह रहे थे?

Family Story In Hindi : जनवरी के दिन थे. कड़ाके की सर्दी पड़ रही थी. दीवार घड़ी ने थोड़ी देर पहले ही रात के 12 बजने की घोषणा की थी. कामरान और सुल्तान अभी अभी सोए थे. कामरान इस वर्ष 12वीं में था और सुल्तान 10वीं में. दोनों की बोर्ड की परीक्षाएं थीं. मैं ने आरंभ से ही उन में प्रतिदिन 1 घंटा अभ्यास करने की आदत डाल रखी थी.

केवल शनिवार को उन की छुट्टी होती थी. 1 घंटा अभ्यास करने के बाद वे हम लोगों के साथ मिल कर ताश या कैरम खेलते या कॉमिक्स पढ़ते थे. दोनों ही अपनी अपनी कक्षा में प्रथम आते थे और अपनी परीक्षाओं में वे दोनों विशेष योग्यता सूची में आएंगे, इस का हमें पूरा विश्वास था.

मैं पढ़ाई में हमेशा से कच्ची रही थी. हमारा जमाना और था. तब लड़कियों पर बहुत पाबंदियां थीं. घर से स्कूल, स्कूल से घर. न अध्यापकों से अधिक बात करो, न साथी लड़कों से मेलजोल बढ़ाओ. न कोई घर में पढ़ाने वाला था, न मार्गदर्शन करने वाला. अब्बू खेती बाड़ी के कामों में व्यस्त रहते थे और दोनों भाई शहर के विद्यालयों में छात्रावास में रह कर पढ़ते थे.

10वीं पास किया ही था कि सलमान  से विवाह हो गया. बच्चे भी जल्दी जल्दी हो गए. सलमान अपने कारोबार के कारण अधिकतर दौरे पर रहते. मुझे मां और पिता दोनों का ही दायित्व निभाना पड़ता. मेरे बच्चे परीक्षा में अच्छे अंक लाएं, खूब पढ़ेंलिखें, इस के लिए मैं ने उन पर कभी जबरदस्ती नहीं की, बल्कि कुछ ऐसी आदतें उन में डाल दीं, जिस से वे स्वयं धीरे धीरे अपने जीवन का उद्देश्य निर्धारित करते गए.

इतना अवश्य था कि अभ्यास के समय मुझे साथ जागना पड़ता. जब तक वे पढ़ाई करते तब तक मैं सवेरे के लिए सब्जी काट कर फ्रिज में रख देती या पुस्तकें पढ़ती रहती. मार्च में परीक्षा थी. अब वे दोनों रात को 11 बजे तक पढ़ते. मैं ने आधा घंटा पहले ही दोनों को गरम दूध पीने को दिया था. उन के लेटते ही मैं भी लेट गई थी, पर नींद आंखों से कोसों दूर थी.

2 दिन से सलमान ने फोन नहीं किया था. वह जहां कहीं भी होते, वहां से प्रतिदिन फोन पर बात करना उन का नियम था. इधर अब्बू की भी कोई खबर नहीं मिली थी. न जाने क्यों मन अब्बू को बहुत याद कर रहा था. मैं थोड़ी ही देर सोई होऊंगी कि घंटी की आवाज के साथ ही चौकीदार का स्वर कानों में पड़ा, ‘‘बीबीजी, तार ले लीजिए.’’

मैं ने उठ कर द्वार खोला और तार लिया. बब्बन चचा का तार था. अब्बू की हालत खराब बता कर फौरन आने के लिए लिखा था. मैं ने घड़ी पर नजर डाली. रात के 2 बज रहे थे. मैं ने तुरंत निर्णय ले लिया कि सवेरे 5 बजे वाली गाड़ी से निकल पड़ूंगी. चौकीदार से मैं ने बाबू और उस की पत्नी को बुलाने के लिए कहा. वह नौकरों के लिए बने मकानों की ओर गया और मैं ने कामरान को धीरे से जगाया. वह उठा और पूछने लगा, ‘‘क्या बात है, अम्मी? आप इतनी परेशान क्यों हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘बेटे, तुम्हारे नानाजान की तबीयत खराब है. मैं सवेरे की गाड़ी से चली जाऊं?’’

‘‘जरूर जाइए, अम्मी, नानाजान अकेले हैं,’’ वह बोला.

‘‘पर, बेटे, तुम लोगों की पढ़ाई?’’

‘‘अम्मी, हम दोनों बराबर पढ़ाई करेंगे, आप हमारी बिलकुल चिंता न करें.’’

कामरान को सुल्तान की देखभाल करने को कह कर मैं ने बाबू और उस की पत्नी को घर सौंपा और थोड़ा सा सामान ले कर स्टेशन की राह ली. स्टेशन 3 किलोमीटर दूर था और सवारी मिलने की कोई संभावना नहीं थी. बाबू ने मेरा बक्सा संभाला और हम लोग निकल पड़े.

2 किलोमीटर चलने के बाद शहर दिखाई देने लगा. होटलों के चूल्हों में आग सुलगनी शुरू हो गई थी. एक रिक्शा दिखाई दिया. रिकशा वाला बैठा बैठा ऊंघ रहा था. दोनों पांव लंबे कर के सीट पर फैला रखे थे. बाबू ने उसे बहुत आवाजें दीं, तब कहीं वह जागा. पर स्टेशन चलने से उस ने इनकार कर दिया, ‘‘बहुत सर्दी है,’’ कह कर वह फिर सो गया.

थोड़ी दूरी पर एक दूसरा रिकशा वाला मिला, जो होटल की भट्ठी के सामने खड़ा आग ताप रहा था. बाबू के बोलने पर उस ने चाय पिए बिना वहां से हटने से इनकार कर दिया, जबकि चाय कब बनेगी इस का कोई पता न था. गाड़ी का समय करीब था. मैं और बाबू तेजी से कदम बढ़ाने लगे. तभी एक तख्ती पर मेरी दृष्टि जा पड़ी.

ठंडी राख के ढेर के एक तरफ एक कुत्ता बेखबर सो रहा था और दूसरी तरफ रिकशा वाला एक पतली सी चादर ओढ़े सो रहा था. करीब ही रिक्शा खड़ा था, जिस पर गत्ते की एक तख्ती लटक रही थी. कुछ कुछ रोशनी में मैं ने पढ़ा, ‘‘आप को रिक्शा की जरूरत है और मुझे पैसों की, मुझे सोता देख कर उठाने में हिचकिचाइए मत.’’

बाबू ने उसे आवाज दी. वह एक आवाज में उठ बैठा और चादर लपेट कर रखता हुआ बोला, ‘‘बैठिए, बहनजी, कहां चलना है? भाव ताव न करें, जो मुनासिब समझें दे दें.’’

मैं बाबू को वापस लौटने को कह कर रिक्शे में बैठ गई. रास्ते में मैं ने उस से पूछा, ‘‘तुम ने यह तख्ती क्यों लगा रखी है?’’

वह बोला, ‘‘कभीकभी मैं इतनी गहरी नींद में होता हूं कि सवारी के उठाने पर भी नहीं जागता. इस से बड़ी मुश्किल का सामना करना पड़ता है.’’

उस की बातचीत से वह किसी अच्छे घराने का लड़का लग रहा था. मुझे उस के बारे में जानने की सहज ही उत्सुकता हुई. जो कुछ उस ने बताया वह बहुत ही आश्चर्यजनक था. वह एक साधारण गरीब परिवार से था और एक विद्यालय में चपरासी था. जो वेतन मिलता था उस में पत्नी व बच्चों का पेट बड़ी मुश्किल से भर पाता था. पिछले दिनों उस की बहन को उस के पति ने तलाक दे कर वापस मायके भेज दिया था, उसे कोई बीमारी थी, जिस के लिए रोज 15 रुपए की दवाई लानी पड़ती थी.

‘‘मेरी बहन केवल 18 वर्ष की है, बहनजी, उस ने अभी जिंदगी में देखा ही क्या है? मैं उसे मरने नहीं देना चाहता. इसलिए रात को अपने दोस्त का यह रिक्शा चलाता हूं. 15 रुपए हाथ आते ही घर लौट जाता हूं, इतने रुपए न मिलें तो रिक्शे पर यह तख्ती लगा कर सो जाता हूं ताकि कोई सवारी हाथ से न चली जाए.’’

मेरा मन श्रद्धा से झुक गया. मैं ने मुक्तकंठ से उस की प्रशंसा की. मन में सोचा कि लौटने पर सलमान से कह कर उसे किसी जगह चौकीदार लगवा दूंगी. उस से विदा ली तो मन में कहीं एक फांस गड़ी सी रह गई. कोई बात दिल में खटक रही थी. पर क्या, पकड़ में ही नहीं आ रही थी. गाड़ी में बैठी तो अब्बू की याद रहरह कर आने लगी.

मेरे दोनों बड़े भाई कनाडा और इंडोनेशिया में सिले सिलाए कपड़ों का कारोबार करते थे. अब्बू को हर महीने नियमित रूप से पैसे भेजते और साल दो साल में आ कर मिल भी जाते. अम्मा तो बहुत चाहती थीं कि दोनों भाभियों में से कोई उन के  पास रहे, पर किसी ने भी यहां रहना पसंद न किया. बेटों से जुदाई अम्मां के लिए जानलेवा सिद्ध हुई.

अम्मां के जाते ही अब्बू नितांत अकेले रह गए. मैं उन्हें अपने पास रखना चाहती थी, पर उन्होंने बेटी के घर रहना पसंद नहीं किया. मैं और सलमान महीने दो महीने में जा कर उन से मिल आते. मैं ने हमेशा यह बात महसूस की कि जितना मेरे मिलने पर वह खुश होते, उस से कहीं ज्यादा मेरे बिछड़ने पर वह रोते. पर मैं करती भी क्या? अपने घर, अपने पति और बच्चों के लिए मुझे लौटना ही पड़ता.

घर पहुंची तो बाहरी द्वार खुला हुआ मिला. मैं अब्बू के कमरे की ओर बढ़ी ही थी कि बब्बन चचा की आवाज ने मेरे कदम जड़ कर दिए, ‘‘तुम तो सठिया गए हो. दवाइयां जो लाभ पहुंचाएंगी वह क्या बच्चों की याद कर सकेगी?’’

‘‘मैं कहां याद करता हूं, बब्बन?’’ अब्बू की आवाज बहुत धीमी थी.

‘‘क्या मैं सुनता नहीं? नींद में बेटों से, पोते पोतियों से बातें करते रहते हो. क्या तुम्हारे याद करने से वे लोग तुम्हारे पास लौट आएंगे?’’

बब्बन चचा की बात में वजन था. इसीलिए अब्बू ने शायद अपनी कमजोरी स्वीकार करते हुए कहा, ‘‘बब्बन, दोनों बच्चे जब छोटे थे तब उन्हें उंगली पकड़ कर चलना सिखाता था और सोचता था कि जब मैं बूढ़ा हो जाऊंगा तो ये दोनों बच्चे दोनों तरफ से थाम कर मुझे चलाएंगे. वे कपड़े गीले कर देते थे तो सोचता था कि मेरी बीमारी में ये ही हाथ कभी मेरे कपड़े बदलेंगे. अपने हाथों से छोटेछोटे कौर बना कर उन के मुंह में देता था और सोचता था ये ही बच्चे बड़े हो कर मुझे दवा पिलाएंगे…’’

‘‘बस करो, मेरे दोस्त,’’ बब्बन चचा की आवाज भर्रा गई, ‘‘इनसान को पेड़ लगा कर स्वयं फल खाने की इच्छा नहीं करनी चाहिए. आज का जमाना ऐसा है कि बच्चों को पाल पोस कर बड़ा करना, मां बाप को कर्तव्य समझ कर करना चाहिए. बच्चों से उन के कर्तव्य की बात करना ही गलत है. दोस्त, मेरा ख्याल है इस प्रकार एकांत में पड़े रहने से कहीं अच्छा है कि तुम अपनी बेटी के पास चले जाओ.’’

अब्बू बहुत देर तक कुछ नहीं बोले. उन का उत्तर सुनने के लिए मैं बेताब हो गई. बहुत देर बाद वह बोले, ‘‘बिटिया ने तो मुझ से कई बार कहा पर मुझे अच्छा नहीं लगता दामाद के घर रहना, इसीलिए इनकार करता रहा. अब मैं स्वयं उस से कैसे कहूं? बब्बन, बिटिया के बच्चे मुझे चाहते भी बहुत हैं. मैं यहां नहीं रहना चाहता पर अब बेटी से कह भी तो नहीं सकता.’’

‘‘मैं बात करूंगा बिटिया से,’’ बब्बन चचा बोले तो अब्बू ने तड़प कर उन्हें रोक दिया, ‘‘नहीं, ऐसा न करना, बब्बन, बेटी जब ससुराल जाती है तो मां बाप से संबंध रखने में उसे बड़ा चौकस रहना पड़ता है. उसे मायके की इज्जत रखने के साथ ससुराल की इज्जत भी निभानी पड़ती है. बात रुपए पैसे की नहीं. बेटे मुझे कितना रुपया भेजते हैं, पर मैं बैंक से निकालता हूं कभी? पड़े रहें, उन्हीं के काम आएंगे. मैं बेटों से अपनी व्यथा नहीं कहता. बेटी तो ससुराल की इज्जत है, उस से क्या कहूं?’’

मौन के वे क्षण न जाने कितने लंबे हो गए. मैं कोई आहट किए बिना खड़ी थी और भीतर अब्बू और बब्बन चचा मौन भाषा में बात कर रहे थे. कोई 40 मिनट के बाद मैं अपने हवास में लौटी और कमरे में दाखिल हो गई.

‘‘अरे, बिटिया, आ गई,’’ बब्बन चचा के स्वर से अब्बू की आंख खुल गई. मैं उन के पास बैठ कर रोने लगी, वे सभी बातें याद कर जो अभी पिछले 40 मिनट से सुन रही थी. जब बहुत देर तक मेरा रोना नहीं रुका तो अब्बू भी घबरा गए, ‘‘क्या बात है, बिटिया? क्यों इतना रोए जा रही है?’’

‘‘अब्बू, आप के दामाद और बच्चों ने मुझे घर से निकाल दिया है,’’ मैं ठीक ऐसे ही बोली जैसे कोई मंझी हुई अभिनेत्री किसी फिल्म में कहा करती है.

‘‘क्या कह रही है, बेटी?’’ अब्बू एकदम घबरा गए.

मुझे डर लगा कि कहीं सदमा न लग जाए उन्हें, तुरंत बनावटी रुलाई रोते हुए बोली, ‘‘हां, अब्बू, उन लोगों ने कहा है, तुम्हारे अब्बू वहां अकेले बीमार पड़े रहते हैं और मैं ठाट से रहती हूं. इस के लिए मुझे शर्म आनी चाहिए.’’

‘‘अरे वाह, यह भी कोई बात हुई,’’ अब्बू सचमुच हैरान थे.

‘‘मुझ से कहा है अपने अब्बू को ले कर आओगी तो घर में घुसने देंगे, नहीं तो नहीं.’’ मैं ने बच्चों की तरह ठुनकते हुए कहा, ‘‘अब्बू, आप को कितनी बार कहा है, मेरे साथ चल कर रहिए. पर आप सुनते ही नहीं. क्या आप मुझ से मेरा घर छुड़वा देंगे? यहां सब लोग ताने देते हैं. मेरी सास कहती है, ‘जो अपने बाप की नहीं हुई वह सास ससुर की क्या होगी? जो बाप की सेवा नहीं करती वह बेटी क्या हुई?’’’

अब्बू किसी सोच में पड़ गए, ‘‘बिटिया, सच बता, कामरान और सुल्तान मेरी याद करते हैं?’’

‘‘अरे अब्बू, उन्हीं दोनों ने तो अपने अब्बा को बहकाया है. एक दिन बोले, ‘हम दोनों भी बड़े हो कर आप लोगों को अकेला छोड़ देंगे.’ यह सुन कर आप के दामाद डर गए और मुझे यहां भेज दिया. तो फिर आप क्या कहते हैं, अब्बू?’’ मैं ने अब्बू का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा.

‘‘बेटी, बेटों के होते हुए मैं बेटी के घर रहूं यह अच्छा नहीं लगता.’’ अब्बू का मन नहीं मान रहा था.

मेरा मन पुन: भर आया, ‘‘ठीक है, अब्बू, हमेशा के लिए न सही, पर उस समय तक मेरे घर चल कर रहिए जब तक बड़े भैया आप को लेने नहीं आ जाते.’’

‘‘क्या? बब्बू आ रहा है यहां? कब?’’ अब्बू भावविह्ल हो कर बोले.

‘‘मैं ने बड़े भैया, छोटे भैया दोनों को पत्र लिखा था. बड़े भैया अगले महीने आ कर आप को अपने साथ ले जाएंगे. फिर पता नहीं कब आप की सेवा का अवसर मिले, इसलिए तब तक मेरे घर चल कर रहिए. 20-22 दिन की ही तो बात है.’’

अब्बू बब्बन चचा का सहारा ले कर उठ बैठे. बब्बन चचा मेरी ओर यों देख रहे थे जैसे वह मेरे मन पर टंगी उस तख्ती को स्पष्ट देख रहे हों जिस पर लिखा है- ‘‘मुझे पितृ छाया की जरूरत है.’’

रिक्शे वाले से मिलने के बाद से जो फांस मन में गड़ कर पीड़ा पहुंचा रही थी वह अब निकल चुकी थी. Family Story In Hindi :

Pollution 2025 : नियत साफ हो तो कुछ भी असंभव नहीं, बीजिंग और दिल्ली में कितना फर्क ?

Pollution 2025 : 2013 की सर्दियों में बीजिंग और दिल्ली दोनों शहरों में AQI 500–600 पर था लेकिन 2024–25 में बीजिंग ने अपना AQI लगभग 50-60 कर दिया जबकि दिल्ली आज भी 500–600 के बीच अटकी है.

बीजिंग में 2013 के बाद सरकार ने इसे गंभीरता से लिया और भारी कोयला आधारित पावर प्लांट शहर से बाहर कर दिए, प्रदूषण करने वाले उद्योगों पर कड़ी कार्यवाही की, निर्माण स्थलों पर सख्त धूल नियंत्रण लागू किया, और इलेक्ट्रिक वाहनों (EV) को सभी तरह के टैक्स से मुक्त कर इसे आम जनता तक पहुंचा दिया. यही कारण था की 2013 से 2024 के बीच बीजिंग का PM2.5 स्तर लगभग 60% तक घट गया.

बीजिंग में 2013 के बाद चीन ने पावर प्लांट शहर से बाहर धकेल दिए, कोयले को “राष्ट्रीय खलनायक” घोषित कर दिया, गैसीफिकेशन लागू किया, भारी उद्योग शहर से दूर कर दिए गए. यह सारी कवायदें की चमत्कार से कम नहीं थी. सरकार ने सिर्फ बयानबाजी नहीं की बल्कि जिम्मेदारी तय की और शहर को प्रदूषण मुक्त कर दिया.

अब दिल्ली की ओर देखिए. यहां हवा सफाई सरकारी हवाबाजी से चलती है. 2013 में AQI 500–600 था, और 2025 में भी वही है. हर साल धुआं दिल्ली के आसमान को घेर लेता है, लेकिन समाधान? सरकार हर साल नई घोषणाएं करती है, समितियां बनती हैं, ऐप लॉन्च होते हैं पर जमीनी स्तर नतीजा जीरो होता है.

सरकारों के लिए पराली जलाने की समस्या पर ठीकरा फोड़कर किसानों को जिम्मेदार ठहराना सब से आसान होता है जबकि आंकड़ों के अनुसार इस का योगदान औसतन 10–12% तक ही रहता है. बाकी प्रदूषण वाहनों, फैक्ट्रियों, पटाखों और निर्माण कार्यों से उठने वाले धूल धक्कड़ का है.

दिल्ली केवल खेतों के धुएं से नहीं घिरती. NCR देश का सबसे बड़ा निर्माण क्षेत्र है, ऊपर से 1 करोड़ से अधिक वाहन, जिसमें Electric Vehicle (EV) की हिस्सेदारी आज भी बेहद कम है.

दिल्ली का प्रदूषण कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि पूरी तरह से सरकारी विफलताओं, मुनाफा प्रधान नीतियों और जनता की प्राथमिकता की कमी का परिणाम है. यही कारण है की 2013 में जो शहर बीजिंग के बराबर खड़ा था, वही 2025 में उस से 10 गुना ज्यादा प्रदूषित है. Pollution 2025 :

World’s Oldest Company : किस ने शुरू की थी दुनिया की सबसे पुरानी कंपनी ?

World’s Oldest Company : पूंजीवाद के इस दौर में आज इस दुनिया को कंपनियां चला रही हैं. सरकारें भी या तो बड़ी कंपनियों कि तरह ही काम कर रही हैं या बड़ी कंपनियों के लिए काम कर रही हैं. भारत में ही अंबानी और अडानी जैसी कंपनियों के पास इतना कंट्रोल है कि मीडिया हाउस और सरकार इन की मुट्ठी में हैं. एक समय ईस्ट इंडिया जैसी ब्रिटिश कंपनी ने भारत पर राज किया था. ऐसी दुनिया में लाखों करोड़ों कंपनियां हैं. पर क्या आप जानते हैं कि दुनिया की सबसे पुरानी कंपनी कौन सी है, जो आज भी चल रही है?

दुनिया की सबसे पुरानी कंपनी जापान की कोंगो गुमी (Kongō Gumi) है, जो सन् 578 में शुरू हुई. यानी ये अब 1447 साल पुरानी कंपनी बन गई हैं. यह कंपनी जापान में जब शुरू हुई थी तब इस का काम बौद्ध मंदिरों को बनाने और उन्हें ठीक करने का था. यानि यह छठी सदी की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी थी और आज इक्कीसवीं सदी में भी यानी 1,400 से ज्यादा सालों से लगातार चल रही है.

सन् 578 में शिगेमित्सु कोंगो ने कोंगो गुमी कंपनी की शुरुआत की थी. वे एक कोरियाई इमिग्रेंट थे और उन्हें ओसाका में जापान का पहला बौद्ध मंदिर, शितेनो-जी बनाने का काम सौंपा गया था. मंदिरों के अलावा बाद में ये कंपनी महल जैसे दूसरे कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट्स में भी काम करने लगी. कई सदियों तक कोंगो के वंशजों ने इस कंपनी को चलाया.

सन् 2006 में इस कंपनी के लिए ऐतिहासिक साल रहा जब कोंगो गुमी दिवालिया हो गई और इसे ताकामात्सु कंस्ट्रक्शन ग्रुप ने खरीद लिया था. 2006 में बिकने से पहले कोंगो गुमी में सिर्फ 100 कर्मचारी थे. साल 2005 में इस का सालाना रेवेन्यू 4.33 अरब रुपए था और ये बौद्ध मंदिरों के निर्माण में माहिर थी. मगर तब इस पर 2.31 अरब रुपए का कर्ज भी था. इस के आखिरी प्रेसिडेंट मासाकाजु कोंगो थे, जो फर्म को लीड करने वाले 40वें कोंगो थे.

अब कोंगो गुमी ताकामात्सु कंस्ट्रक्शन ग्रुप की पूरी तरह से मालिकाना हक वाली सब्सिडियरी के तौर पर काम करना जारी रखे हुए हैं. आज भी कंपनी में कोंगो परिवार का प्रतिनिधित्व है, और इस कंपनी की 41वीं प्रमुख, मासाकाज़ु कोंगो की बेटी, अपनी भूमिका जारी रखे हुए हैं. World’s Oldest Company :

Pakistan Political Crisis 2025 : पाकिस्तान में संविधान को कमजोर करने की साजिश

Pakistan Political Crisis 2025 : पाकिस्तान एक इस्लामिक राष्ट्र है लेकिन पाकिस्तान की व्यवस्था कांस्टिट्यूशन से चलती है यानी यह एक इस्लामिक मुल्क होने के साथ एक लोकतांत्रिक राष्ट्र भी है लेकिन यह भी सत्य है की धर्म और लोकतंत्र ज्यादा समय तक एक साथ नहीं चल सकते. पाकिस्तान में डेमोक्रेसी को लगातार कमजोर करने की परंपरा रही है. जियाउल हक हो या नवाज शरीफ सभी ने लोकतंत्र का गला घोंटा है और लोकतंत्र को कमजोर करने का सिलसिला इस वक्त शहबाज शरीफ की सरकार भी कर रही है.

पाकिस्तान सरकार ने संविधान संशोधन विधेयक को विपक्ष के कड़े विरोध के बीच दो तिहाई बहुमत से पारित करवा दिया. यह विधेयक सीनेट से भी पास हो चुका है. नए कानून में सेना के अधिकार बढ़ाए जाने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के अधिकार कम कर दिए गए हैं. सुप्रीम कोर्ट अब केवल माल और फौजदारी के मामलों की सुनवाई ही कर पाएगा.

संविधान से जुड़े मामलों की निगरानी और उन की सुनवाई के लिए अलग से कांस्टिट्यूशन कोर्ट गठित की जाएगी. सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस मंसूर अली शाह और जस्टिस अतहर मिनाल्लाह ने राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी द्वारा संसद से पारित 27 वें संविधान संशोधन विधेयक को स्वीकृति देने के कुछ घंटे बाद ही पद से इस्तीफा दे दिया.

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस मंसूर अली शाह ने कहा “नया कानून संविधान की भावना के खिलाफ है और यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को खत्म कर देगा. जस्टिस शाह ने अपने त्यागपत्र में लिखा है कि यह संशोधन पाकिस्तान के संविधान पर बड़ा हमला है. इस विधेयक से सुप्रीम कोर्ट का न्यायपालिका पर से नियंत्रण खत्म हो जाएगा और इस से देश के लोकतंत्र का बड़ा नुकसान होगा. नई व्यवस्था में कार्य करने में खुद को अक्षम पा रहा हूं, इसलिए पद छोड़ रहा हूं”

जस्टिस मिनाल्लाह ने कहा है कि उन्होंने संविधान की रक्षा की शपथ ली थी लेकिन जब उसे ही नुकसान पहुंचाया जा रहा है तो वह पद पर नहीं रह सकते. यह संसद द्वारा संविधान को पहुंचाया गया अब तक का सबसे बड़ा नुकसान है. Pakistan Political Crisis 2025 :

Religious Traditions : धर्म – दान के धन पर सिर्फ ब्राह्मणों का हक ?

Religious Traditions : मंदिरों में दान आम लोग देते हैं, यदि उस का कुछ हिस्सा सरकार उन के ही विकास कार्यों में खर्च करती है तो गलत क्या है? हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट का इस मामले में निर्देश ब्राह्मणों पर दान के पैसों पर पूरा अधिकार देने जैसा है. 

ब्राह्मण सर्व लभते सर्व तस्य हि सर्वदा

दानम् च विपुलं दत्वा स्वर्गलोके महीयते

अर्थात

ब्राह्मण सभी प्रकार के दान प्राप्त करने का अधिकारी है क्योंकि वह सदा सर्वस्व का हकदार है. उसे विपुल दान देने से दाता स्वर्गलोक में सम्मानित होता है.

                          (महाभारत अनुशासन पर्व, अध्याय 61, श्लोक 11)

यह बात, जो सदियों पहले महाभारत में वेद व्यास ने दोटूक कही थी, को हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जलेबी की तरह गोलमोल घुमाफिरा कर कानूनी भाषा में बीती 10 अक्तूबर को दिए एक फैसले में कही जो 14 अक्तूबर को सार्वजनिक हुआ. इस पर किसी को कोई हैरानी नहीं हुई. जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर व जस्टिस राकेश कैंथला की बैंच ने इस मामले (सिविल रिट पिटीशन 1834/2018) की बाबत अपने फैसले में जो कहा उस का निचोड़ है-

भक्त मंदिरों में दान देते हैं यह विश्वास करते हुए कि वे देवताओं की देखभाल, मंदिर के रखरखाव और सनातन धर्म के प्रचार के लिए उपयोग होगा. यदि सरकार इन पवित्र दानों को अपने खजाने में मिला लेती है तो यह भक्तों के विश्वास का अपमान है.

ट्रस्टी इस दान के संरक्षक हैं, मालिक नहीं. इन का दुरुपयोग आपराधिक विश्वासघात माना जाएगा.

मंदिर के फंड को राज्य की सामान्य आय की तरह नहीं देखा जा सकता. यह सरकारी योजनाओं, विज्ञापनों या अन्य गैरधार्मिक गतिविधियों के लिए नहीं दिया जा सकता.

राज्यों को मंदिरों के प्रबंधन में निष्पक्षता स्पष्ट करनी होगी लेकिन धार्मिक कार्यों के प्रचार के लिए फंड का उपयोग सही दिशा में हो. संविधान में सैक्युलर का अर्थ नास्तिकता नहीं, बल्कि सर्वधर्म समभाव है.

ऐसी और भी कई बातें अदालत ने कहीं जो गैरजरूरी और असंबद्ध थीं लेकिन शायद कोर्ट को कोई गिल्टी फील हो रही थी जो उस ने अपने फैसले को सही साबित करने या उसे वजनदार बनाने के लिए उसे भानुमती का कुनबा जोड़ना पड़ा.

यह है मामला :

हिमाचल प्रदेश के शिमला में रहने वाले जाति से कश्मीरी ब्राह्मण कश्मीर चंद शादयाल, जो पेशे से समाजसेवी हैं लेकिन धार्मिक आयोजनों में काफी सक्रिय रहते हैं, ने साल 2018 में एक जनहित याचिका कोर्ट में दाखिल की थी. उस में उन्होंने आरोप लगाए थे कि हिमाचल प्रदेश के मंदिरों, जैसे नैना देवी, ज्वालामुखी आदि में आया दान सरकारी योजनाओं, जैसे सड़क निर्माण विज्ञापन आदि में गलत तरीके से इस्तेमाल हो रहा है जो भक्तों के विश्वास का अपमान है. कश्मीर चंद ने अदालत से मांग की कि इस में पारदर्शिता बरती जाए और दान के पैसे का इस्तेमाल केवल धार्मिक कार्यों में किया जाए.

यह समाजसेवी पूरी दस्तावेजी तैयारी के साथ कोर्ट पहुंचा था. उस ने नैना देवी, ज्वालामुखी और चामुंडा आदि मंदिरों के फंड्स के उपयोग पर आरटीआई दाखिल कर जानकारी हासिल कर ली थी कि इन में आए दान के पैसों में से काफी पैसे सरकारी योजनाओं पर खर्च किए गए थे. सरकारी विभागों ने इस की पुष्टि की थी. इन में हिंदू रिलीजियस इंस्टिट्यूशन डिपार्टमैंट (हिंदू धार्मिक संस्थान विभाग) प्रमुख है. अदालत में पेश दस्तावेजों से उजागर हुआ कि 2018 से पहले ही दान के करोड़ों रुपयों का इस्तेमाल गैरधार्मिक कार्यों में हुआ है.

7 अगस्त, 2018 को प्रारंभिक सुनवाई करते अदालत ने सभी डिप्टी कमिश्नरों को निर्देश दिया कि वे पिछले 5 सालों के फंड उपयोग का ब्योरा बजरिए हलफनामा पेश करें. इस से पहले एफिडेविट कश्मीर चंद ने भी पेश किया था जिस में व्यक्तिगत शिकायतों, भक्तों के बयान और फंड्स के बेजा इस्तेमाल की जानकारी थी. उस में उन्होंने हिमाचल प्रदेश हिंदू पब्लिक रिलीजियस इंस्टिट्यूशंस एक्ट 1984 की धाराओं 13, 19, 20 और 48 का उल्लंघन किया जाना बताया था. खासतौर से धारा 48 का उल्लंघन जो यह कहती है कि फंड का पैसा केवल धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल किया जाए. धारा 20, जो लेखाजोखा से संबंधित है, का भी पालन नहीं होना पाया गया.

डिप्टी कमिश्नरों ने फंड्स का जो ब्योरा पेश किया उस में अदालत ने पारदर्शिता की कमी पाई और अपना फैसला आवेदक के पक्ष में सुनाया. हिमाचल प्रदेश हिंदू पब्लिक रिलीजियस इंस्टिट्यूशंस एक्ट 1984 की धारा 13 कहती है कि ट्रस्टी केवल संरक्षक हैं, मालिक नहीं लेकिन ट्रस्टी और पुजारी दान का व्यक्तिगत उपयोग कर रहे थे या फिर बेजा और गैरजरूरी खर्च कर रहे थे. साबित यह भी हुआ कि सरकार मंदिर फंड्स का इस्तेमाल सामान्य राजस्व की तरह कर रही थी जो संविधान के धार्मिक स्वतंत्रता और धर्मनिरपेक्षता वाले  अनुच्छेद 25-26 का उल्लंघन है

बेतहाशा आमदनी :

मुकदमे के दौरान यह भी उजागर हुआ कि नैनादेवी और ज्वालामुखी मंदिरों की साल 2024 में आय 200 करोड़ रुपयों से भी ज्यादा है और मंदिरों के पास 2 क्विंटल सोना और 45 किलो चांदी भी संपत्ति की शक्ल में हैं. यानी, ‘दुकान’ खासी चलती हुई है जिस के पैसों को ले कर खींचतान मची हुई थी. यह खींचतान खत्म नहीं हो गई है बल्कि हुआ यह है कि अब दान, दक्षिणा, चढ़ावे के पैसे का इस्तेमाल सिर्फ धार्मिक कार्यों और धर्मार्थ में होगा.

धार्मिक काम यानी पूजापाठ, यज्ञ, हवन, प्रसाद, मूर्ति, अनुष्ठान वगैरह में पैसे खर्च किए जाएंगे, इस के अलावा मंदिर को और भव्यता भी दान के पैसे से दी जाएगी. कुछ सुविधाएं भी दी जाएंगी, मसलन मंदिर में धर्मशाला आदि बनवाना जिस से भक्त मंदिर में व सस्ते में रुकें और ज्यादा से ज्यादा दान दें. इस तरह कुछ सालों में ही मंदिर की आमदनी दोगुनीचौगुनी हो जाएगी और ज्यादा भक्त आकर्षित होंगे जिस से पैसा और ज्यादा आएगा. अब यह किसी ने नहीं सोचा कि जब बहुत ज्यादा पैसा हो जाएगा तब उस का क्या होगा. क्या मुगलों की तरह लुटेरों के लिए यह इकट्ठा किया जाता है या अंगरेजों के लिए जिन्होंने मंदिरों का पैसा भी लूटा और हमें गुलाम बना कर भी रखा.

अब यह बिजनैस नहीं तो और क्या है. देशभर के भक्त नैना देवी, ज्वालामुखी और चामुंडा जैसे मंदिरों में आ कर अपनी मेहनत की कमाई दान में देते हैं. एवज में उन्हें क्या मिलता है, मोक्ष का  झूठा आश्वासन, दुखदर्द दूर हो जाने का  झांसा जिस का उद्भव धर्मग्रंथों में वर्णित किस्सेकहानियां होते हैं.

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने सीधेसीधे इस ठगी के धंधे को नजरअंदाज करते दान का पैसा पंडेपुजारियों के हाथों में बने रहने देने का फैसला सुना दिया है जिस से सिवा ब्राह्मणों के किसी और का भला नहीं होने वाला. किसी भी मंदिर ट्रस्ट का मुखिया अभी भी कमिश्नर, डिप्टी कमिश्नर या एसडीएम ही होगा लेकिन उस का काम मंदिर की प्रशासनिक व्यवस्था संभालना भर होगा. पैसों का हिसाबकिताब सारे ट्रस्टी मिल कर तय करेंगे कि कहां कितना खर्च किया जाए कि जिस से आय और बढ़े.

मंदिरों के ट्रस्टों के अधिकतर सदस्य ब्राह्मण पंडेपुजारी ही होते हैं. एकाध सत्तारूढ़ दल का विधायक, सांसद या धाकड़ नेता होता है जिस का शीश इन पंडों के आगे  झुका ही रहता है. यानी, पैसा अब पूरी तरह पंडों के कब्जे में रहेगा जिस का मनमाना खर्च वे करेंगे और ट्रस्ट के मुखिया की हैसियत से सरकारी अधिकारी की जिम्मेदारी केवल ट्रांसपेरैंसी की रहेगी.

वैसे भी, उस के पास ढेरों सरकारी काम होते हैं, इसलिए मंदिरों के फंड और  झं झटों से उसे कोई सरोकार नहीं होता. उसे तो, बस, बैलेंसशीट पर दस्तखत भर करना होता है. अब पंडेपुजारी जो चाहें सो करें उन की मरजी. अगर कोई अफसर ज्यादा दखल देगा तो या तो उसे भी अपने साथ मिला लिया जाएगा या फिर न मानने पर उस की बदली करा दी जाएगी.

खूब होते हैं घपले-घोटाले :

कश्मीर चंद बनाम हिमाचल प्रदेश स्टेट मुकदमे में इस बात का जिक्र किया भी गया है कि सरकारी अधिकारी और ट्रस्टी मिल कर घालमेल कर रहे थे. अब नहीं करेंगे, इस की कोई गारंटी नहीं. हां, इतना जरूर होगा कि दान का पैसा सरकारी खजाने में अब नहीं जाएगा. अभी तक भी थोड़ा ही आता था जिसे कल्याणकारी या जनहित योजनाओं में सरकार लगा लेती थी तो कोई गुनाह नहीं कर देती थी. सड़क अगर उस ने बनवाई तो वह सभी के लिए फायदे की बात थी जिस से अवागमन सुलभ होता है. यही बात दूसरे उन कामों पर लागू होती है जो सार्वजनिक हित के होते हैं.

उदाहरण नैना देवी मंदिर का लें तो वह म झोले किस्म का मंदिर है जिस के पास साल 2022 तक 11.47 करोड़ रुपए नकद थे, 58.97 करोड़ रुपए की फिक्स्ड डिपौजिट थी. इस के अलावा 180 किलो सोना (कीमत 140 करोड़ रुपए से भी ज्यादा) और 7,292 किलो चांदी (कीमत 1,240 करोड़ रुपए से भी ज्यादा) थी. नैना देवी मंदिर में सोने के मुकाबले चांदी ज्यादा होने की दास्तां भी कम दिलचस्प नहीं.

माना जाता है कि जब शंकरजी सती को ले कर भाग रहे थे तब सती माता की आंखें इस जगह गिरी थीं. इसलिए, इस मंदिर में जो चांदी की आंखें दान करता है उस की आंखों की बीमारियां ठीक होती हैं. मंदिर के बाहर इफरात से चांदी की आंखें दुकानों पर बिकती हैं जिन की कीमत 500 से ले कर 5 हजार रुपए तक होती है. ये आंखें मंदिर के गर्भगृह में चढ़ाई जाती हैं. पैसे वाले भक्त तो सोने की आंखें दान करते हैं.

अब कोर्ट को इस अंधविश्वास से कोई सरोकार नहीं कि यह दान आस्था या विश्वास के चलते कम बल्कि डर और अंधविश्वास की वजह से ज्यादा आता है. अगर ‘सिल्वर आई’ दान करने से आंखों के रोग ठीक होते तो देश में नेत्र रोग विशेषज्ञों की जरूरत ही नहीं रह जाती. कम से कम हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर और शिमला में तो आई स्पैशलिस्ट न होता लेकिन वहां भी इफरात से हैं तो इस का सीधा सा मतलब है कि यह खालिस ठगी है.

वर्ष 2025 आतेआते दानदक्षिणा का आंकड़ा कितना बड़ा, इस के आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं किए गए हैं लेकिन जनवरी 2026 तक हो जाएंगे क्योंकि हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सख्त लहजे में यह भी कहा है कि सरकार उस के आदेशों का पालन 3 महीने के अंदर करे वरना इसे अदालत की अवमानना मान कार्रवाई की जाएगी. नैना देवी मंदिर में सालभर में औसतन कोई 20 लाख श्रद्धालु जाते हैं. दोनों नवरात्र के दिनों में तो वहां पैर रखने को भी जगह नहीं मिलती.

दूसरे मंदिरों की तरह इस मंदिर में भी जगहजगह दानपेटियां रखी हैं जिन के तालों की चाबियां पंडेपुजारियों के पास होती हैं. दूसरे मंदिरों की ही तरह यहां भी पंडे अपना आसन जमाए बैठे रहते हैं जो मंत्र बुदबुदाने से ले कर माथे पर तिलक लगाने तक की फीस लेते हैं. मंदिरों के बारे में किसी ने गलत नहीं कहा कि इन से दानपेटियां हटा दी जाएं तो यहां से पुजारी खुदबखुद गायब हो जाएंगे.

नैना देवी मंदिर श्री नैना देवी श्राइन बोर्ड से संचालित होता है. मंदिर के मुख्य पुजारी को लगभग एक लाख रुपए सैलरी मिलने का अंदाजा है जबकि जूनियर पुजारियों को 20 से 50 हजार रुपए महीना पगार मिलती है. इन्हें दान के पैसे से ही आवास, चिकित्सा और यात्रा जैसे भत्ते भी मिलते हैं. इस के बाद भी पुजारी पैसों के लिए रोते झींकते रहते हैं. अब इन की आमदनी सैलरी, भत्ते वगैरह हाईकोर्ट के आदेश के मुताबिक मंदिर की वैबसाइट पर डाले जाएंगे तब पता चलेगा कि दान के पैसों का कितना बड़ा हिस्सा उन पंडेपुजारियों को पालनेपोसने पर खर्च होता है जो करतेधरते कुछ नहीं. घोषित रूप से नैना देवी मंदिर में गीतम प्रजाति के ब्राह्मण पूजापाठ कराते हैं. ब्राह्मणों को ही दान देने के निर्देशों में से एक निर्देश मनुस्मृति का यह भी है-

ब्राह्मणाय प्रयच्छेत सर्व धर्माय कल्पितम

अर्थात जो भी वस्तु धर्म के लिए दी जाती है वह ब्राह्मण को दे देनी चाहिए.

(अध्याय 3 श्लोक 116-118)

और

शूद्राय तु न दद्यात ब्राह्मणाय दद्यात

अर्थात शूद्र को दान नहीं देना चाहिए, ब्राह्मण को देना चाहिए.

(अध्याय 4, श्लोक 226-232)

सदुपयोग क्यों नहीं ?

दूसरे ब्रैंडेड मंदिरों के मुकाबले नैना देवी मंदिर का पैसा और सोनाचांदी, जमीनजायदाद भले ही कम हो लेकिन बहुत कम भी नहीं है. इस पैसे से क्याक्या नहीं किया जा सकता जो पड़ापड़ा सड़ रहा है. इस पैसे को किसी ने मेहनत से नहीं कमाया है और न ही यह किसी दैवीय चमत्कार की देन है बल्कि यह भक्तों की मेहनत का पैसा है जिसे निष्क्रिय रखना क्या उन का अपमान और दुरुपयोग नहीं. इस से स्कूल, कालेज, अस्पताल वगैरह खोले जाएं तो कईयों का भला होगा और सभी को कुछ न कुछ मिलेगा लेकिन चूंकि मामला धर्म और भगवान का है इसलिए अच्छेअच्छे तर्कवादियों के मुंह सिल जाते हैं. दौर हिंदूवादियों का है जिस में मंदिर तबीयत से फलफूल रहे हैं जिन से रोजगार ब्राह्मणों को मिल रहा है जो पंडेपुजारी की हैसियत से देश की तरह मंदिरों को भी अपने हिसाब से हांक रहे हैं.

कश्मीर चंद शादयाल अगर वाकई सच्चे समाजसेवी होते तो दान के पैसों से बनी सड़क पर उन्हें खुशी और फख्र होना चाहिए था न कि कोर्ट जाने की हद तक किलपना चाहिए था. उन्हें तो यह मांग करनी चाहिए थी कि मंदिरों में फालतू पड़े पैसे से प्रदेश में सड़कों का जाल बिछा देना चाहिए या गरीबपिछड़ी बस्तियों में बच्चों के स्कूल खुलवा देना चाहिए, गरीबों की सेहत के मद्देनजर अस्पताल बनवा देना चाहिए.

लेकिन नहीं, धर्म से इतर कोई कश्मीर चंद नहीं सोचना चाहता जिन की देश में इन दिनों भरमार है. ये लोग चाहते हैं कि पैसा सिर्फ ब्राह्मण के पास रहे क्योंकि वह धर्मसंस्कृति वगैरह का जानकार व रक्षक है. वह दान के पैसे का स्वाभाविक उत्तराधिकारी है फिर भले ही चंद मंत्रों और पूजापाठ के अलावा उसे कुछ और न आता हो. कुल जमा, वह जन्मना श्रेष्ठ है, इसलिए मेहनत कर पेट भरना उस की शान के खिलाफ है. अब तो हाईकोर्ट ने भी उन से इत्तफाक रख दिया है. सो, कोई क्या कर लेगा.

तो फिर सरकार से लेते क्यों हैं ?

कश्मीर चंद बनाम हिमाचल प्रदेश स्टेट मुकदमे की दिलचस्प बहस में बचाव पक्ष के वकील महाधिवक्ता अनूप रत्तन ने जो दलीलें दीं उन से भले ही हाईकोर्ट ने इत्तफाक न रखा हो लेकिन उन की दलीलों में दम था कि हिंदू पब्लिक रिलीजियस इंस्टिट्यूशन एंड चैरिटेबल एंडोमैंट्स एक्ट 1984 की धाराओं 19 व 20 के तहत राज्य सरकार को मंदिरों के प्रशासनिक और वित्तीय प्रबंधन का अधिकार है. उन के मुताबिक दान में आया पैसा पब्लिक ट्रस्ट का हिस्सा है जिसे राज्य सार्वजनिक हित में उपयोग कर सकता है.

बकौल अनूप रत्तन, चिंतपूर्णी और नैना देवी मंदिरों की आय क्रमश: 100 करोड़ व 60 करोड़ रुपए का उपयोग केवल धार्मिक कार्यों तक सीमित नहीं रहना चाहिए. इसे सड़क निर्माण, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सामाजिक कल्याण योजनाओं में डायवर्ट करना उचित है.

ऐसे कई तर्कों से अदालत सहमत नहीं हुई. यह और बात है लेकिन इस सिलसिले में एक अहम बात यह भी है कि जब दान का पैसा सार्वजनिक भले की कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च नहीं किया जा सकता तो सरकारी पैसा भी क्यों धर्म, धार्मिक कार्यों और धर्मस्थलों पर खर्च किया जाए. इस बाबत न तो कोई वकील कुछ बोलता, न ही जज. ऐसे में पंडेपुजारियों के बारे में तो सोचना ही फुजूल है जिन की रोजीरोटी ही दान के पैसों से चलती है.

पिछले 11 सालों से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार मंदिरों और धरमकरम पर खुले हाथ और पूरी दरियादिली से खर्च कर रही है. इस पर किसी भक्त के पेट में मरोड़ नहीं उठती कि हम मंदिरों में भी चढ़ाएं और सरकार को टैक्स भी दें, यह कहां का इंसाफ है. हकीकत तो यह है कि भाजपा को वोट इसी शर्त पर मिलते हैं कि वह सतयुग और त्रेता युग की तरह ब्राह्मणों की परवरिश करती रहे.

राज्य सरकारें भी इस खेल में पीछे नहीं हैं. मिसाल हिमाचल प्रदेश की ही लें तो उस का इस साल का बजट कोई 52,965 करोड़ रुपए का है जिस में से लगभग 500 करोड़ रुपए धार्मिक कार्यों पर खर्च करने का प्रावधान है. इस पैसे से इफरात से धार्मिक मेले वहां आयोजित किए जा रहे हैं, धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा दिया जा रहा है और मंदिरों तक भक्तों की पहुंच आसान बनाई जा रही है. अकेले नैना देवी मंदिर के सौंदर्यीकरण और दूसरी सुविधाओं के लिए सौ करोड़ रुपए का प्रावधान रखा गया है. दीगर सरकारी खर्चों, जो आमतौर पर छिपे हुए और प्रशासनिक होते हैं, का तो कोई हिसाबकिताब ही नहीं.

अगर दान का पैसा धार्मिक कार्यों में ही खर्च होना है तो टैक्स का पैसा भी विकास कार्यों और जन कल्याणकारी योजनाओं में ही लगने की बाध्यता भी होनी चाहिए जिस से लाभ सभी धर्मों, वर्गों और जातियों के लोगों को हो. मंदिरों में दिए दान से तो सिर्फ ब्राह्मणों का ही भला व कल्याण होता है.

दान हि ब्राह्मणे श्रेष्ठम अन्येशान्म निष्फल स्मृतम

अर्थात ब्राह्मण को दिया गया दान श्रेष्ठ है, अन्य को दिया गया निष्फल.

(गरुड़ पुराण 2.95.35)

सनातनियों के संविधान मनुस्मृति के अलावा भी ब्राह्मणों द्वारा रचे गए तमाम धर्मग्रंथ इन निर्देशों से भरे पड़े हैं कि दान पर सिर्फ ब्राह्मणों का ही हक है, बाकियों को दिया गया दान निष्फल यानी बेकार टाइप का होता है. Religious Traditions :

Changing Shoe Fashion : बदल रही है जूतों की दुनिया

Changing Shoe Fashion : जूतों का बाजार बदल चुका है. कभी यह जरूरत और आराम के लिए पहने जाते थे अब यह फैशन ब्रांड के रूप में प्रयोग किए जा रहे हैं. पहले यह लेदर और कैनवास के बनते थे. लेदर में ब्लैक और ब्राउन दो कलर होते थे. कैनवास में सफेद कलर के होते थे. अब लेदर और कैनवास दोनों में तमाम तरह की वैरायटी आ गई हैं.

हमारे समाज में इंसान की परख उस के जूते से की जाती है. जूते बता देते हैं कि उस को पहनने वाला कैसा है. जो लोग इस को जानते हैं वह मौके के अनुसार ही जूते पहन कर जाते हैं. अगर पार्टी समारोह में जा रहे हैं तो लेदर या फोम लेदर के शूज पहन कर जाते हैं. अगर मॉर्निंग वॉक पर जा रहे हैं तो कैनवास शूज पहन सकते हैं. पैंट शर्ट पर एक किस्म के जूते पहन सकते हैं तो कुर्ता पजामा पर नागरा जूते पहने जाते हैं.

महिलाएं जींस पर कैनवास के जूते पहन सकती हैं पर साड़ी और सलवार सूट पर वह सैंडल पहनती हैं. यह अमीरी और गरीबी दोनों को दिखाते हैं. अगर जूते सही तरह से पॉलिश और साफ सुथरे पहने होते हैं तो यह अनुशासन को दिखाते हैं.

जूतों का बाजार बदल चुका है. कभी यह जरूरत और आराम के लिए पहने जाते थे अब यह फैशन ब्रांड के रूप में प्रयोग किए जा रहे हैं. पहले यह लेदर और कैनवास के बनते थे. लेदर में ब्लैक और ब्राउन दो कलर होते थे. कैनवास में सफेद कलर के होते थे. अब लेदर और कैनवास दोनों में तमाम तरह की वैरायटी आ गई हैं. अब ड्रेस से मैचिंग शूज पहने जाने लगे हैं. जिस वजह से एक आदमी कई तरह के शूज अपने पास रखता है. पुरूषों से अधिक कीमत महिलाओं के फुटवियर की होने लगी है.

जूतों की खोज पैरों को नुकीली और खुरदरी चीजों से बचाने के लिए लगभग 7,000-8,000 ईसा पूर्व में हुई थी. इस के लिए पैरों को पेड़ों की छाल, पत्तियों और जानवरों की खाल का प्रयोग किया जाता था. अमेरिका सहित दुनिया के कई हिस्सों में गुफाओं और पत्थरों में इन की पहचान पाई गई हैं.

समय के साथ जूते बनाने के लिए जानवरों की खाल का प्रयोग किया जाने लगा. इस में भैंस, भालू, हिरण जैसे तमाम जानवरों की खाल प्रमुख होती थी. प्राचीन भारत में लकड़ी के खड़ाऊ पहने जाते थे. अब भी कुछ लोग इस को पहनते हैं.

मौर्य और गुप्त काल में सैनिकों और राजाओं के लिए चमड़े के जूते बनने लगे थे. जूतों का प्रयोग फैशन और रुतबे के रूप में मुगल काल में शुरू हुआ. 1658-1659 में मुगल शहजादा सुलेमान शिकोह जब भारत आए तो अपने साथ आधुनिक जूते ले कर आए, जिन को ‘सलीमशाही जूते’ कहा जाता था.

17वीं सदी में जूता बनाने के लिए सिलाई तकनीक का विकास हुआ. जिस के बाद जूतों के निर्माण में क्रांति आ गई. 1856 में लाइमन ब्लैक ने जूता सिलाई मशीन का आविष्कार किया और 1864 तक इसे और बेहतर बनाया गया, जिस से जूतों का बड़े पैमाने पर उत्पादन संभव हो सका.

यूएस रबर कंपनी ने 1892 में रबर सोल वाले कैनवास के जूते तैयार किए. 1917 में ‘केड्स’ कैनवास स्नीकर्स तैयार किए गए. लेदर और कैनवास के जूते एक साथ चलन में आए. उस दौर में यह मंहगे थे और आम लोगों की पहुंच से दूर हो गए थे.

भारत में जूतों को बनाने का काम फैक्ट्री से ले कर आम करीगर तक फैल गया. जूतों को तैयार करने वाले कारीगर को मोची कहा जाने लगा. यह काम एक खास जाति और वर्ग के लोग करने लगे. नागरा जूतों भारत में बहुत पहना जाता था. इन को महिला और पुरुष दोनों पहनते थे. महिलाओं के जूतों को जूती कहा जाता था. इन का डिजाइन पुरुषों से अलग होता था.

आरामदायक और फैशनेबल की डिमांड :

भारत में तैयार लेदर के जूते विदेशों में खूब पसंद किए जाते हैं. अब लेदर की जगह पर कैनवास और फोम लेदर ने अपनी जगह बना ली है. फोम लेदर कंपनी में आर्टिफिशियल तरह से बनाया जाता है. इस की सबसे बड़ी वजह यह कि कैनवास और फोम लेदर से बने जूते किफायती और आरामदायक तो होते ही है. इस के अलग अलग तरह के डिजाइन भी बनाए जा सकते हैं.

महिलाओं की हील से ले कर पुरुषों के जूतों तक स्नीकर्स ने 70 प्रतिशत बाजार पर कब्जा जमा लिया है. भारत में कानपुर और आगरा के फुटवियर उत्पादन के सबसे बड़े केंद्र हैं. यूरोपीय देशों और अमेरिका में इन की जबरदस्त पकड़ बनाई है.

आगरा की 6000 से अधिक छोटीबड़ी इकाइयों से 70 से अधिक देशों में जूतों का 5,000 करोड़ रुपए का सालाना निर्यात होता है. यहां 65 प्रतिशत से अधिक देश के घरेलू बाजार में आपूर्ति और 18 हजार करोड़ रुपए का स्थानीय स्तर पर कारोबार है.

जूते अब ड्रेस सेंस व ड्रेस कोड के साथ प्रयोग हो रहे हैं. जूतों के रंग और डिजाइन बदल रहे हैं. लोगों को अब फैशन के साथ ही आराम चाहिए. कभी काले और ब्राउन रंग को पसंद किया जाता था. अब हल्के रंग सर्वाधिक पसंद किए जाते हैं. अब ग्राहकों की मांग के अनुसार शेड, डिजाइन तैयार कराए जा रहे हैं.

सामान्य रंग जैसे ब्लैक या ब्राउन फुटवियर के अलावा सर्दियों में प्राकृतिक रंगों के शेड ट्रेंड में रहते हैं, जबकि गर्मियों में पेस्टल कलर को खूब पसंद किए जाते हैं. यूरोपीय देशों में वहां के मौसम के अनुसार बूट की मांग रहती है, तो अन्य देशों में स्नीकर्स का प्रचलन बढ़ रहा है.

महिलाओं में पार्टी वियर स्नीकर्स की मांग बढ़ी है. इस को देखते हुए स्नीकर्स पर एंब्रॉयडरी और मेटल बटन का काम ज्यादा कराया जा रहा है. जितनी ज्यादा कलाकारी होगी, उसी अनुसार कीमत तय होती है. लखनऊ में चिकनकारी और चांदी के तारों से भी इन को तैयार किया जाता है. अब लोगों के काम करने के घंटे बढ़े हैं. जिस से वे भारी और बोझिल जूते या सैंडल पहनना पसंद नहीं करते, इसलिए स्पोर्ट्स शूज इंडस्ट्री की ग्रोथ भी तेजी से बढ़ी है.

आने वाले दिनों में स्मार्ट जूता तैयार हो रहा है. जो एआई से चलेगा. इस में कदमों की आहट से लोगों को पहचान लिया जाएगा. साथ ही स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने वालों को जूते यह भी अपडेट देंगे कि कितना कदम चले.

भारत में फुटवियर का बाजार तेजी से बढ़ रहा है, यहां सब से ज्यादा बिकने वाले जूते ऐसे होते हैं जो गुणवत्ता, आराम और कीमत में संतुलन प्रदान करते हैं. भारत में सबसे अधिक पसंद किए जाने वाले ब्रांड में बाटा, नाइकी, एडीडास, प्यूमा, रीबॉक सबसे प्रमुख है. हर वर्ग के लोगों के पास इन के जूते मिल जाते हैं.

डायबिटीज जैसे पेशेंट्स को डाक्टर लेदर के जूते पहनने से मना करते हैं. यह पैरों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इन लोगों को कैनवास या फिर फौम लेदर के शूज पहनने के लिए कहा जाता है. इस तरह से शूज का बाजार बदल चुका है. अब यह जरूरत के साथ ही साथ आराम और फैशन को दिखाने का जरिया बन गया है. साधारण तौर पर 500 से कैनवास और 800 में फोम लेदर के शूज मिलने शुरू हो जाते हैं. प्योर लेदर के शूज 3 हजार से ऊपर के मिलने लगे हैं. महंगे किस्म के कैनवास 8 से 10 हजार तब मिलते हैं. इन की कीमत ब्रांड के अनुसार भी होती है. भारत में 100 से अधिक ब्रांड के शूज मिलते हैं.

चाइनीज रबर सोल आने के बाद इन की लाइफ बढ़ गई है. अलग अलग खेलों में अलग किस्म के शूज पहने जाते हैं. इन की कीमत बहुत अधिक होती है. सेना और पुलिस के लिए भी अलग किस्म के जूते तैयार किए जाते हैं. यह देखने में हल्के पर मजबूत होते हैं. मौसम के अनुसार इन का प्रयोग होता है.

सेना में बर्फ पर रहने वालों के जूते अलग होते हैं. यह इस तरह से तैयार किए जाते हैं जो अंदर से पैर को गर्म रखते हैं. इन के सोल में भी खास ध्यान रखा जाता है जिस से यह फिसल न सके.

जंगल में जाते समय बूट किस्म वाले जूते पहने जाते हैं जिस से रेंगने वाले जानवर और कीड़े पैर को नुकसान न पहुंचा सके. जूते हिफाजत और फैशन दोनों को स्टेटस सिंबल बन चुके हैं. जिस की वजह से ही इस का बाजार तेजी से बढ़ता जा रहा है. आज बिना शूज के इंसान की कल्पना भी नहीं की जा सकती है. Changing Shoe Fashion :

Elderly Health Issues : युवाओं पर भारी पड़ते हैं घर के बुजुर्गों के रोग

Elderly Health Issues : छोटे परिवार होने के कारण परेशानियां बढ़ रही हैं. मां बाप की देखभाल में युवाओं का करियर प्रभावित हो जाता है. गांव और शहर दोनों ही जगहों पर इस तरह के मामले बढ़ रहे हैं.

‘बाबा अभी रात नहीं हुई है. घर की लाइट चली गई है. इसलिए आप को रात का आभास हो रहा है. अभी तो कनु कोचिंग से भी वापस नहीं आई है.’ दीपिका ने अपने ससुर को समझाते हुए कहा. जिन को लग रहा था कि रात हो गई है. 80 साल के प्रभाकर अपनी बहू और उस की दो बेटियों के साथ रहते थे. बेटे की मृत्यु के बाद उन की याददाश्त पर प्रभाव पड़ा. उन को भूलने की बीमारी हो गई. ससुर और बेटियों को संभालने के लिए दीपिका को अपनी अच्छी खासी नौकरी छोड़नी पड़ी.

प्रभाकर को भूलने के साथ ही साथ चिंता करने की भी आदत पड़ गई थी. छोटीछोटी बात को ले कर चिंता करते थे और फिर झगड़ने लगते थे.

35 साल की दीपिका अपने ससुर, पति और बच्चों के साथ रहती थी. दीपिका प्राइवेट जॉब करती थी. उस के पति रमेश की जनरल मर्चेंट की दुकान थी. ससुर को पेंशन मिलती थी. ऐसे में उन का परिवार चल रहा था. दीपिका की 2 बेटियां कनु और मनु थी. वह स्कूल में पढ़ती थी. इस बीच उन के पति को नशे की लत लग गई. जिस के बाद उन की दुकान कर्ज में डूबने लगी. घर में झगड़े होने लगे. ऐसे में एक दिन उन्होंने आत्महत्या कर ली.

रमेश की आत्महत्या ने पूरे परिवार को तितर बितर कर दिया. ससुर प्रभाकर बीमार रहने लगे. जिस के कारण दीपिका को अपनी जॉब छोड़नी पड़ी. अब घर केवल ससुर की पेंशन और घर के किराए से चल रहा था. दीपिका की दोनों बेटियां पढ़ रही थी. उन की जिम्मेदारियां बढ़ रही थी. दूसरी तरफ ससुर को भूलने की बीमारी ने परेशानी में डाल रखा था. दीपिका का पूरा करियर खत्म हो गया था. इस तरह की हालत केवल दीपिका की ही नहीं थी. कुछ इसी हालातों से कविता भी गुजर रही है.

हरदोई की रहने वाली कविता की शादी लखनऊ में हुई थी. उस के पति विवेक अपने पिता की अकेली संतान थे. कविता और उस के पति सॉफ्टवेयर कंपनी में काम करते थे. शादी के 2 साल के बाद उसकी सास की मृत्यु हो गई. इसके बाद ससुर के दिमाग पर असर हो गया. 65 साल की उम्र में वह बीमार रहने लगे. अब घर को संभालने का जिम्मा कविता पर आ गया. घर का कोई और ऐसा नहीं था जो बीमार ससुर की देखभाल कर सके. एक दिन वह घर से बाहर निकले तो फिर वापस ही नहीं आए. दो तीन दिन के बाद वह भिखारियों के बीच भीख मांग कर खाते पाए गए.

तब विवेक और कविता ने तय कि उन में से कोई एक अपनी नौकरी छोड़ कर घर रह कर पिता की देखभाल करेगा. क्योंकि उन के गायब होने और भीख मांगने की घटना ने समाज में उन लोगों को बदनाम कर दिया था. लोग कहने लगे कि बेटे बहू ने घर से निकाल दिया था. जबकि वह भटक कर गए थे. कविता ने सोचा वह ही अपनी नौकरी छोड़ देगी. अब वह ससुर की देखभाल करने के लिए घर पर रहती है. उसे इस बात का अफसोस भी है कि उस को अपनी अच्छी खासी जॉब छोड़नी पड़ी.

बुढ़ापे के रोग युवाओं के सपनों पर भारी पड़ते हैं. केवल एकल परिवार ही नहीं संयुक्त परिवार भी इस से प्रभावित होते हैं. रमेश चन्द्र का बड़ा परिवार है. उन की पत्नी की मृत्यु 4 साल पहले हो चुकी थी. वह अपने 4 बेटों बहुओं और नाती पोतों के साथ रहते थे. 70 साल की अवस्था में उन को पैरालिसिस यानी लकवा मार गया. उन को लखनऊ के पीजीआई ले जाया गया. वहां वह 25 दिन भर्ती रहे. वह जिंदा थे पर ठीक नहीं हुए. घरवालों का 15-20 लाख रुपया खर्च हो गया.

डॉक्टरों ने कहा कि अब आप इन को घर ले जाएं. ऐसे में घर के एक कमरे को 3 लाख खर्च कर के अस्पताल के कमरे जैसा बनाया गया. 10-10 हजार महीने पर दो पैरामेडिकल स्टाफ रखे जो घर में ही अस्पताल जैसी देखभाल कर सके. पूरा घर अस्पताल में बदल गया था. घर के लोग अपना कामधाम छोड़ कर पिता की देखभाल में लगे थे. नाते रिश्तेदारों का सिलसिला देखने के लिए लगा था. 3 माह करीब 90 दिन तक वह जीवित रहे. तब तक पूरा घर प्रभावित रहा.

बुजुर्गों में बढ़ रही मानसिक परेशानियां :

इस तरह की बहुत सी घटनाएं बढ़ रही हैं. छोटे परिवार होने के कारण परेशानियां बढ़ रही हैं. मां बाप की देखभाल में युवाओं का करियर प्रभावित हो रहा है. गांव और शहर दोनों ही जगहों पर इस तरह के मामले बढ़ रहे हैं. बुजुर्गों की मानसिक हालत बिगड़ रही है.

उत्तर प्रदेश में पीजीआई, लखनऊ मेडिकल कॉलेज और सैफई विश्वविद्यालय ने 350 बुजुर्गों पर एक अध्ययन किया. इस में बुजुर्गों की मानसिक हालत को जांचने के लिए मेंटल टेस्ट किया. जिस का स्कोर 23 या उस से कम पाया गया उसे मानसिक रूप से कमजोर माना गया.

इस रिपोर्ट से पता चला की आदमी और औरत दोनों ही इससे प्रभावित दिखे. इस शोध को इंडियन जर्नल ऑफ साइकेट्री के अक्टूबर 2025 अंक में प्रकाशित किया गया है.

इस अध्ययन में पता चलता है कि 24 फीसदी बुजुर्गों की मानसिक हालत कमजोर पाई गई थी. 87 फीसदी लोगों में इस की शुरुआत थी. महिलाओं में यह दर 33 फीसदी पाई गई जो पुरूषों अपेक्षा अधिक पाई गई. अधिक आयु, विधवा होना और दैनिक काम न कर पाने की हालत इस के मुख्य कारण पाए गए. इस अध्ययन करने वाली टीम में डॉक्टर प्रत्यक्षा पंडित, डाक्टर सुगंधी शर्मा, डॉक्टर रीमा कुमारी, डॉक्टर आदर्श त्रिपाठी और डॉक्टर प्रभाकर शर्मा शामिल थे.

डॉक्टर आदर्श त्रिपाठी कहते हैं ‘मानसिक समस्या धीरे धीरे बढ़ती है. अकसर इस को सामान्य बुढ़ापा मान कर नजरअंदाज कर दिया जाता है. अगर समय पर जांच, संतुलित भोजन, सामाजिक मेलजोल और देखभाल हो तो सुधार हो सकता है.’

बुजुर्गों में होने वाले मानसिक रोग :

अवसाद, चिंता, और डिमेंशिया बुजुर्गों में होने वाले प्रमुख मानसिक रोग हैं. डिमेंशिया का सब से आम अल्जाइमर है. डिमेंशिया याददाश्त, सोच और व्यवहार को प्रभावित करता है. जिस से दैनिक गतिविधियों को करना मुश्किल हो जाता है. अल्जाइमर में मस्तिष्क की कोशिकाओं को धीरे धीरे नष्ट कर देता है. जिस से मानसिक हालत और खराब होती जाती है.

अवसाद यानी डिप्रेशन में जीवन पर निराशा, उदासी बढ़ जाती है. जिस से कोई काम नहीं हो पाता है. चिंता में बेचैनी और घबराहट बढ़ जाती है. इस के कारण सामाजिक अलगाव, प्रियजनों की मृत्यु या रिटायरमेंट जैसे जीवन में बड़े बदलाव होते हैं.

मानसिक रोगों में डेलिरियम भी है. यह अचानक होने वाला भ्रम है जो स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, संक्रमण, या दवाओं के साइड इफेक्ट के चलते हो सकता है. जिन बुजुर्गों मे नशे की आदत होती है वह दूसरी मानसिक बीमारियों को भी बढ़ाने का काम करता है. इन की पहचान के तमाम कारण होते हैं. सोने या व्यवहार में बदलाव भी मानसिक बीमारियों का संकेत देते हैं. सोचने समझने की क्षमता में कमी भी इस के संकेत होते हैं. इन बीमारियों का इलाज नहीं है. ऐसे में इन से बचाव कर सकते हैं. जिस से इन का प्रभाव कम हो सकता है. यह बीमारियां जड़ से खत्म नहीं होती है.

बचाव ही इलाज है :

अल्जाइमर रोग में उम्र बढ़ने के साथ कई लोग भूलने की बीमारी बढ़ जाती है. भूलने की बीमारी का मतलब यह नहीं कि वह अल्जाइमर है. अल्जाइमर डिमेंशिया का एक आम रूप है. डिमेंशिया से पीड़ित लगभग 60-80 फीसदी लोगों में अल्जाइमर रोग पाया जाता है. अल्जाइमर में दिमाग की कोशिकाएं धीरे धीरे मर जाती हैं. जिस से मस्तिष्क के कुछ हिस्से आपस में संवाद नहीं कर पाते. इस वजह से जीवन प्रभावित होता है. अल्जाइमर ऐसा रोग है जो ठीक नहीं होता है. इलाज से इस के प्रभाव को कम किया जा सकता है.

इस बीमारी को शुरुआती चरणों में याददाश्त का कमजोर होना होता है. धीरे धीरे यह बढ़ता जाता है जिस से प्रभावित व्यक्ति अकेले जीने की हालत में नहीं रहता है. अल्जाइमर से पीड़ित सभी दैनिक गतिविधियों के लिए मदद की जरूरत पड़ती है. कई बार यह बीमारियां 20-20 साल तक साथ चलती रहती है. सामान्य तौर पर यह 4 से 8 साल तक बना रहता है. आंकड़े बताते हैं कि दुनिया में 65 या उस से अधिक आयु के लगभग 9 में से 1 व्यक्ति को यह रोग है. 85 या उससे अधिक आयु के 3 में से 1 व्यक्ति को भी यह रोग है.

जिन लोगों के माता पिता या भाई बहन को अल्जाइमर है या था, उन्हें इस का खतरा अधिक होता है. अगर एक से अधिक रिश्तेदार अल्जाइमर से पीड़ित हैं, तो यह खतरा और भी बढ़ जाता है.

महिलाओं में अल्जाइमर रोग होने की संभावना अधिक होती है. जिन के सिर में चोट लगी हो या जो भूलने की बीमारी के शिकार होते हैं उन में अल्जाइमर का खतरा अधिक होता है. अल्जाइमर रोग हृदय और रक्त वाहिकाओं के स्वास्थ्य से जुड़ा है. मस्तिष्क को रक्त की आपूर्ति करने वाली रक्त वाहिकाओं को होने वाली क्षति इस को बढ़ावा देने का काम करती है.

इस को कम करने के लिए धूम्रपान छोड़ दें. नियमित व्यायाम करें और भरपूर अच्छी नींद लें. खाने में भरपूर मात्रा में फल और सब्जियों वाला खाना खाएं. डिप्रेशन डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और हाई कोलेस्ट्रॉल वाले मरीजों को यह ज्यादा प्रभावित करता है. वजन को कंट्रोल में रखें. परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताने से लाभ होता है.

मानसिक बीमारियों से प्रभावित लोगों का सामाजिक सुरक्षा देने के लिए राजीव गांधी सरकार ने मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 बनाया था. यह कानून मानसिक बीमारी से पीड़ित लोगों के अधिकारों की रक्षा करते हैं. इस में सम्मान के साथ जीने का अधिकार, गोपनीयता का अधिकार, और समुदाय में उपचार का अधिकार प्रमुख है. आपराधिक मामलों में मानसिक बीमारी को एक बचाव के रूप में भी माना जा सकता है, जहां अदालतें अभियुक्त के मानसिक स्वास्थ्य के आधार पर निर्णय ले सकती हैं.

मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में किसी भी तरह के क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार से सुरक्षा का अधिकार इस कानून के तहत मिलता है. मानसिक रोग से ग्रस्त व्यक्ति से संबंधित कोई भी जानकारी मीडिया को उन की अनुमति के बिना जारी नहीं की जा सकती है. 2017 में इस कानून में संशोधन करके इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल माध्यम से गोपनीयता को भंग करना भी जोड़ दिया गया है. कानून ने अधिकार दिया है कि जहां तक जहां तक संभव हो मरीज का इलाज अकेले न किया जाए. Elderly Health Issues :

Society Issues : बड़ा मकान, कितना नफा नुकसान ?

Society Issues : बड़ा मकान हर किसी का सपना होता है जो अब, होम लोन के जरिए ही सही, साकार होने लगा है. इस की बड़ी कीमत भी लोग अदा कर रहे हैं लेकिन इन में से भी अधिकतर लोग एक वक्त के बाद बड़े मकान को ले कर पछताते नजर आते हैं. बड़ा मकान कुंठा है, स्मार्ट इन्वेस्टमेंट है या जरूरी सहूलियत, इस बात को सम झ पाना एकदम आसान भी नहीं है.

‘‘साढ़े 3 कमरे का मकान और उस में रहने वाले हम 8 लोग. आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि वह कितना तकलीफदेह था,’ अब से कोई चार दशक पहले को याद करते वे बताती हैं, ‘‘खासतौर से युवा होती हम तीनों बहनों के लिए तो जिंदगी बहुत कठिन थी जो अम्मा के साथ एक बेडरूम में सोती थीं. बाहर वाला कमरा जो महज थोड़ा बड़ा होने और लकड़ी का एक पुराना सोफा सेट युक्त होने के चलते ड्राइंग रूम के खिताब से नवाज दिया गया था वह पापा का स्थायी बेडरूम था और भाई लोग बाहर के कमरे में सोते थे.

‘‘जगह कम होने के चलते हमें कपड़े बदलने तक में बहुत एहतियात बरतनी पड़ती थी. पीरियड्स के दिनों में तो हम बहनों को जिंदगी दुश्वार लगने लगती थी कि कैसे सब से छिपा कर कपड़ों की पुटलिया बाहर जा कर फेंके और सुबह सुबह लेट बाथ के लिए पब्लिक टॉयलेट जैसी लाइन में लगे अपनी बारी आने का इंतजार करते रहें.

‘‘हिंदी की प्राध्यापिका होने के बाद भी मैं उन तकलीफों यानी छोटे मकान की जिंदगी को पूरी तरह बयां नहीं कर सकती.’’ पिछले दिनों ही भोपाल के एक सरकारी कॉलेज से रिटायर हुईं बिंदिया मिश्रा (बदला नाम) याद करते आगे बताती हैं, ‘‘बात एक तो करेला और ऊपर से नीम चढ़ा जैसी बात तब हो जाती थी जब घर में कोई मेहमान आ जाता था. उस दौर में अधिकतर मेहमान बिन बुलाए ही होते थे. किसी को इंटरव्यू देना होता था, कोई अपने बेटे या बेटी के रिश्ते की बात करने आया होता था और किसी को राजधानी होने के कारण किसी सरकारी दफ्तर में कोई काम होता था, या कोई यों ही हम से मिलने की आड़ ले कर भोपाल घूमने फिरने की गरज से आ जाता था.

‘‘हालांकि मेहमानों के आने को बहुत ज्यादा अन्यथा नहीं लिया जाता था लेकिन दिक्कत तो होती थी. उन्हें अलग बिस्तर देने के कारण हम भाईबहनों को बेड शेयर करना पड़ता था, तत्कालीन मेहमाननवाजी के तहत उन्हें पकवान भी खिलाने पड़ते थे और टॉयलेट वगैरह में भी प्राथमिकता देनी पड़ती थी.

‘‘पापा सरकारी विभाग में क्लर्क थे. कुछ खेती भी गांव में थी, इसलिए पैसों की किल्लत खास नहीं थी पर इस से छोटे घर में रहने की कोफ्त कम नहीं हो जाती थी. खैर, वक्त गुजरते सब सेटल होते गए. हम भाई बहनों की शादी हो गई, सभी अच्छी नौकरियों से लग गए. मैं एमपी पीएससी के जरिए कालेज में असिस्टैंट प्रोफेसर हो गई. पति भी सरकारी अधिकारी हैं, इसलिए यहीं भोपाल के एक पौश इलाके में बड़ा मकान एक करोड़ रुपए का खरीद लिया जिस की अपनी दिक्कतें और सहूलियते हैं. लेकिन गुजरी जिंदगी और वर्तमान हालात के मद्देनजर देखूं तो सहूलियतें ज्यादा हैं जिस ने सब से ज्यादा सुकून महिलाओं को दिया है.

‘‘सुकून यह कि, बिंदिया कहती हैं, ‘‘अब हमारे पास स्पेस ज्यादा है. 2 बेटियां हैं, उन के अपने अलग कमरे हैं. लिहाजा, प्राइवेसी की समस्या किसी के साथ नहीं. एक गैस्टरूम है लेकिन खाली पड़ा रहता है. कितनी अजीब बात है कि जब मेहमान खटकते थे तब भर भर कर आते थे, अब उन के लिए अलग इंतजाम हो गए हैं तो कभी कभार ही आते हैं. अब जो भोपाल आते भी हैं तो घर के बजाय होटल में ठहरते हैं.

‘‘सारी सुविधाएं मौजूद हैं, फिर भी कुछ कमियां हैं जो खटकती रहती हैं. कल को बेटियां शादी कर अपनी ससुराल चली जाएंगी तब इतना बड़ा मकान हमें अखरेगा. इसलिए हम दोनों अभी से प्लान कर रहे हैं कि किसी अच्छी सी सोसाइटी में एक एमआईजी फ्लैट खरीद कर उस में शिफ्ट हो जाएं. 2 बेडरूम, एक हौल का सैट हम पति पत्नी के लिए पर्याप्त रहेगा उम्र के हिसाब से भी और सुरक्षा के लिहाज से भी.’’

कुंठा नहीं जरूरत है

जाहिर है बिंदिया के मन में वही डर है कि बच्चे बाहर चले जाएंगे तब हम पति पत्नी दोनों अकेले बड़े मकान में कैसे रहेंगे. यह समस्या अकेले भोपाल की एक प्रोफेसर की नहीं बल्कि पूरे देश के लोगों की है कि जब बुढ़ापा अकेले और दूसरों के भरोसे ही काटना है तो बड़े मकान की तुक क्या. बड़े मकान का मेंटिनैंस आसान नहीं होता खासतौर से तब जब एक तिहाई खाली पड़ा हो. मकान दो मंजिला हो तो खाली पड़ी ऊपरी मंजिल की साफ सफाई महीनों नहीं होती.

तो फिर लोग क्यों बड़े मकान बड़ी तादाद में खरीद रहे हैं जबकि ये कई कई पहलुओं पर माफिक नहीं बैठते. मुमकिन है यह मध्यवर्गीय कुंठा हो क्योंकि पहले राजा महाराजा महलों में रहते थे, नगर सेठ और रईस किस्म के लोग बड़ी हवेलियों और कोठियों में रहते थे. इस नाते भी वे खास होते थे और मकान से भी अपनी अलग पहचान रखते थे. छोटे लेकिन पक्के मकानों में रहने वालों की हिम्मत नहीं पड़ती थी कि वे इन खास लोगों को मकान के मामले में टक्कर दें.

लेकिन 70 का दशक आतेआते माहौल बदला और शहरीकरण ने पांव पसारने शुरू किए तो लोगों का भ्रम टूटने लगा कि वे बड़े आलीशान मकानों में नहीं रह सकते. इसी दौरान संयुक्त  परिवारों के टूटने का भी श्रीगणेश हो चुका था. लोग शिक्षित हो कर नौकरियों में आ रहे थे, इसलिए उन का आत्मविश्वास और सामाजिक सम्मान बढ़ने लगा था. बापदादों के तंग गलियों में बने छोटे मकान, जिन में घर के मेंबर भेड़ बकरियों सरीखे ठुंसे रहते थे, से उन का लगाव खत्म होने लगा था. पैतृक संपत्ति बेचने को ले कर लोगों की  िझ झक और पूर्वाग्रह खत्म हो चुके थे.

एक विराम के बाद 90 के दशक में फिर एक अघोषित आवास क्रांति, जिस ने नरसिम्हा राव सरकार के आर्थिक उदारीकरण के बाद जन्म लिया, के तहत लोगों का स्टेटस मकान के साइज से तय होने लगा था. मकानों की श्रेणियां तीन हिस्सों में बंटने लगीं एलआईजी यानी लोअर इनकम ग्रुप, एमआईजी यानी मिडिल इनकम ग्रुप और एचआईजी यानी हाई इनकम ग्रुप.

यह वर्गीकरण आवास बनाने वाली सरकारी एजेंसियों जैसे हाउसिंग बोर्ड, नगर विकास प्राधिकरण वगैरह के दिमाग की उपज था जिसे बाद में रियल एस्टेट कारोबार ने गोद ले लिया. इस ने इस आर्थिक वर्गीकरण को और विस्तार देते उन में सीनियर और जूनियर जैसे विशेषण जोड़ दिए.

लेकिन अब सब कुछ उलट पुलट है. इनकम ग्रुप के माने बदल गए हैं. इस में अहम रोल बैंक होम लोन का है जो बहुत आसानी से मिल रहा है और लोग बिना किसी तनाव के ले भी रहे हैं क्योंकि अब हर किसी को बड़ा मकान चाहिए भले ही उस की जरूरत हो न हो. सोने से भी पहले बड़ा मकान एक स्मार्ट इन्वेस्टमेंट माना जाने लगा है जो एक हद तक हकीकत भी है. बकौल बिंदिया मिश्रा, हम तो रहेंगे नहीं लेकिन बच्चों के लिए 2-3 करोड़ के मकान का इंतजाम कर जा रहे हैं जिस से भविष्य में उन्हें कोई आर्थिक परेशानी पेश न आए.

होम लोन की ट्रिग्नोमेट्री

सीधे सीधे कहा जाए तो लोग अगली पीढ़ी के लिए होम लोन ले रहे हैं, बड़ा या छोटा मकान तो उस का जरिया या बहाना है. एनएचबी यानी नेशनल हाउसिंग बोर्ड की सालाना रिपोर्ट के आंकड़े एक दिलचस्प हकीकत बयान करते हैं. बीते 2 सालों में कर्ज ले कर मकान खरीदने वालों की तादाद साढ़े चार गुना तक बढ़ी है. 2022-23 में बैंकों और विभिन्न वित्तीय संस्थाओं ने कुल 37.77 लाख होम लोन दिए थे जो 2023-24 में बढ़ कर 1.75 करोड़ हो गए यानी महज एक साल के अंतर से 363 फीसदी होम लोन बढ़े.

इसे आसान तरीके से सम झें तो सालाना कोई 68 लाख मकान होम लोन के जरिए बिक रहे हैं जो आने वाले सालों में और बढ़ सकते हैं. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि लोगों के दिलो दिमाग से कोविड का खौफ खत्म हो चुका है और वे अब जिंदगी को नश्वर मानते हुए जी लेना चाहते हैं.

होमलोन कोई बहुत बड़ा जोखिम भी नहीं है क्योंकि लोग अपनी भविष्य की आमदनी आंक कर ही कर्ज लेते हैं. दूसरे, मकान की कीमतें लोकेशन के हिसाब से बढ़ती भी रहती हैं. इस त्रिकोणमिति का तीसरा एंगल यह है कि अब हर घर में

2 या उस से ज्यादा सदस्य कमा रहे हैं. जाहिर है इस से लोगों की पारिवारिक आय बढ़ी है. वहीं, यह भी ठीक है कि उस का बड़ा फायदा मिडिल क्लास के लोग ही मकान के मद्देनजर उठा पा रहे हैं.

जिन की सालाना आमदनी 3-4 लाख रुपए है उन की 10-20 फीसदी बढ़ भी जाए तो उस से मकान नहीं खरीदा जा सकता. आय का यह अतिरिक्त हिस्सा खाने पीने, कपड़ों, धरम करम और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स में खर्च हो रहा है लेकिन जिन की सालाना आमदनी 10 लाख रुपए से ऊपर है वे अपने खर्चों में और कटौती कर मकान ले पा रहे हैं.

यह इस लिहाज से भी ठीक है कि 50 लाख रुपए का होम लोन जो लेता है वह उस का मार्जिन मनी कम से कम 10 लाख रुपए पहले ही जमा या इकट्ठा कर लेता है. यानी, लोन लेने के लिए भी आप को बचत करना जरूरी हो चला है जो खुद की आर्थिक स्थिति और देश के वित्तीय स्वास्थ्य के लिहाज से शुभ संकेत है. लोन लेने के बाद भी लोगों की बचत और किफायत की आदत न केवल बरकरार रहती है बल्कि कई दफा तो और बढ़ जाती है क्योंकि ईएमआई भरने की चिंता उन्हें रहती है जो लोन लेने के साथ ही घर के मंथली बजट का हिस्सा हो जाती है.

लग्जरी मकान का बढ़ता क्रेज

इन 2 सालों में हैरत की बात है कि बैंकों के होम लोन का एक बड़ा हिस्सा बड़े मकानों के लिए लिया गया. 50 लाख रुपए से ऊपर वाले होमलोन कोई 302 फीसदी बढ़े हैं जो कुल होम लोन की राशि का 38.32 फीसदी हिस्सा होता है. 2022-23 में जहां इन लग्जरी मकानों की बिक्री 5.25 फीसदी हुई थी वह 2023-24 में बढ़ कर 18.15 फीसदी हो गई थी. कुल मकानों की हिस्सेदारी में बड़े मकानों की बिक्री 10.37 फीसदी हो गई है. यानी देश में बिकने वाला हर 10वां मकान बड़ा या लग्जरी है.

रिपोर्ट की मानें तो उलट इस के अफोर्डेबल मकानों की बिक्री घट रही है. सस्ते घरों के लिए कर्ज की मांग इस दौरान 66 फीसदी के लगभग घटी. 2024-25 में लोन की सब से बड़ी हिस्सेदारी 10 से 25 लाख की कीमत वाले घरों के लिए 65.86 फीसदी रही जो कि 2023-24 में महज 11.48 फीसदी थी.

यही आजकल का मध्यवर्ग है. होमलोन निम्न आय वर्ग वालों ने भी लिए लेकिन बहुत कम लिए. 2 लाख से ले कर 5 लाख रुपए तक की कीमत वाले घरों के लिए इस साल 11.07 फीसदी लोगों ने होम लोन लिए जबकि 5 से 10 लाख रुपए तक की कीमत वाले मकानों के लिए होम लोन का फीसद 28.29 रहा.

इस का यह मतलब नहीं कि लोगों की आमदनी बहुत ज्यादा बढ़ रही है बल्कि यह है कि अपना मकान हर किसी की प्राथमिकता में है. अब यह जरूरत अगर कर्ज से पूरी हो रही है तो लोग लोन लेने से हिचक नहीं रहे.

होमलोन लेने वाले अधिकतर लोग जानते हैं कि उन्हें मकान की कीमत से दोगुना पैसा चुकाना पड़ता है लेकिन यह सौदा उन्हें घाटे का नहीं लगता क्योंकि मकान की कीमत भी लोन चुकता होतेहोते डेढ़ से ले कर दोगुनी हो जाती है और इस दौरान अगर किराए के मकान में रहा जाए तो किराए का पैसा बेकार जाता है. इसलिए लोग बजाय किराए के मकान में रहने के, कर्ज वाला अपना घर चुन रहे हैं.

बड़े मकान के नफे नुकसान

बड़े मकान का भी यही फंडा है क्योंकि वे अधिकतर 2 या 3 मंजिला होते हैं और उन का किराया भी ज्यादा होता है. पौश रिहायशी इलाकों में दूसरी मंजिल पर अकसर किराएदार ही रहते मिलते हैं जिन से मिले किराए से मालिक मकान को मासिक किस्त चुकाने में सहूलियत मिल जाती है. यह राशि अकसर मासिक किस्त की आधे से थोड़ी कम होती है.

यदि किसी ने 60 लाख रुपए होम लोन 15 साल के लिए लिया है तो उस की ईएमआई 70 हजार रुपए के लगभग बनती है लेकिन इसी मकान का किराया 20-25 हजार रुपए महीना भी मिले तो बो झ कम तो हो जाता है.

भोपाल की पॉश रिहायशी कॉलोनी मीनाल में रहने वाली अर्चना श्रीवास्तव की मानें तो बिजली विभाग की नौकरी के दौरान उन्हें किस्तें चुक जाने का पता भी नहीं चला. अब रिटायरमेंट के बाद वे पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त हैं तो दूसरी मंजिल किराए पर देने की सोच रही हैं क्योंकि बेटी की शादी के बाद ऊपरी मंजिल खाली हो गई है. उन के पति को भी पेंशन मिलती है और बेटा भी कमाने लगा है.

ऐसे में अर्चना को बड़ा मकान घाटे का सौदा नहीं लगता. वे बताती हैं आज से 10 साल पहले जब यह बड़ा मकान लिया था तो हर कोई टोकता था कि यह फिजूल है. घर में कुल चार लोग हैं, तो इतना बड़ा मकान लेने का औचित्य क्या, इस मकान की कीमत तब 60 लाख रुपए थी जो अब एक करोड़ रुपए हो गई है.

यानी, यह एक अच्छा निवेश था जो अब मुनाफेदार साबित हो रहा है. इकलौता डर या चिंता बड़े मकानों की यह है, अर्चना बताती हैं. बच्चे इंट्रोवर्ट होते जा रहे हैं वे अपने कमरों में बंद रहते हैं जिस से, खासतौर से, टीनएजर्स की निगरानी नहीं हो पाती. छोटे मकानों में नजदीकियां रहती थीं लेकिन बड़े मकानों में नहीं रहतीं. कोई घर में आता भी है तो बच्चों को इस से सरोकार नहीं रहता. लिहाजा, वे मिलनसार नहीं रह जाते. यह एक ऐसी समस्या है जिस का हाल फिलहाल कोई समाधान नजर नहीं आता. लेकिन छिपे खर्च भी बढ़े तमाम सहूलियतों के बाद अकसर वे लोग जिन्होंने बड़ा मकान खरीदा है कई बार  झींकते भी नजर आते हैं क्योंकि शिफ्टिंग के एक साल बाद उन्हें सम झ आता है कि बड़ा मकान हाथी सरीखा होता है जिस का चारा खरीदने में पसीने छूट जाते हैं. ब्याज की मार के बाद जो पैसा बचता है वह इस हाथी की खुराक बन जाता है. मकान जितना बड़ा होता है उस का खर्च भी ज्यादा होता जाता है. मोटे तौर पर यह छोटे मकान से लगभग 10 गुना ज्यादा होता है. आइए देखें कैसे छिपे खर्च बड़े मकान मालिक को सकते में डालते हैं.

प्रॉपर्टी टैक्स : छोटे मकान से कोई चार गुना ज्यादा होता है. इस की दरें लोकेशन और सर्किल रेट के हिसाब से अलग अलग होती हैं. हाल ही में छोटा मकान छोड़ भोपाल के ही रचना टावर्स में रहने आई अंकिता प्रधान बताती हैं कि यहां 2,200 वर्ग फुट फ्लैट का प्रौपर्टी टैक्स उन्हें 4,400 रुपए सालाना देना पड़ रहा है जबकि छोटे मकान में वे सिर्फ 1,200 रुपए का भुगतान बतौर प्रॉपर्टी टैक्स अदा कर रही थीं.

सोसाइटी भी महंगी : बकौल अंकिता, यहां सोसाइटी के 2,600 रुपए देने पड़ रहे हैं जबकि छोटे मकान में महज 1,200 रुपए दे रही थी. यानी दोगुना ज्यादा जिस का सालाना अंतर 19,200 रुपए अतिरिक्त खर्च.

भोपाल के ही कीलनदेव अपार्टमेंट में रह रहे आनंद कहते हैं, पौश और महंगे रिहायशी इलाकों में काम वाले भी महंगे मिलते हैं. इस अपार्टमेंट में शिफ्ट होने से पहले वे कामवाली बाइयों पर महज 3,000 रुपए महीना खर्च कर रहे थे जो बढ़ कर अब 6,000 रुपए हो गया यानी दोगुना. सालाना यह अंतर 36,000 रुपए होता है.

भोपाल के ही नामी आर्किटेक्ट सुयश कुलश्रेष्ठ बताते हैं, बड़े मकान, चाहे वे स्वतंत्र हों या फ्लैट हों, का खर्च एकदम से 20 फीसदी तक बढ़ता है. इन घरों के हर कमरे में एसी लगा होता है और हर बाथरूम में गीजर. इस के अलावा किचन में 3 तरह के गैजेट्स होते हैं जो बिजली का खर्च कुल मिला कर तीन गुना कर देते हैं. गर्मी में तो यह आठ गुना तक चला जाता है. जो बिजली खर्च छोटे मकान में 1,500 रुपए होता है वह बड़े मकान में औसतन 6,000 रुपए तक हो जाता है. यह एक बड़ा खर्च है जिस का अनुभव शिफ्टिंग के बाद ही होता है.

पुताई सफाई भी महंगी : यह ठीक है कि अब घरों की पुताई पहले जैसी सालाना नहीं होती लेकिन 3 साल बाद हो या 5 साल बाद पड़ती बहुत महंगी है. कितनी ही किफायत से कर लें, ऑफ सीजन में कर लें, प्रति वर्ग फुट पुताई का औसत खर्च 30 रुपए बैठता है. अगर 2 हजार वर्ग फीट में रंग करवाएं तो यह 60,000 रुपए होता है लेकिन दीवारों की शान और सुरक्षा के लिए अकसर लोग प्रीमियम रॉयल या एपकोलाइट (वाशेबल, एंटी फंगल, एंटी स्टेन) जैसे महंगे रंगों का इस्तेमाल करवाते हैं जिन की लागत 80 रुपए वर्ग फीट तक आती है.

इन सब से भी महंगी पड़ती है सजावट. सुयश बताते हैं, ‘‘एक 12×12 फुट के कमरे में अगर अच्छी क्वालिटी का वालपेपर लगाया जाए जो हर किसी की पसंद होता है तो उस की कीमत 48 हजार रुपए तक होती है. ये वालपेपर 3 से 5 साल चलते हैं बशर्ते इन्हें पानी और नमी न लगे. लेकिन अगर लग जाए तो 2 साल में ही वे रहने वालों को काटने को दौड़ने लगते हैं. लिहाजा, फिर पहले जैसा ही खर्च करना पड़ जाता है.

बड़े मकान की दुश्वारियां यहीं खत्म नहीं होतीं. इन की सब से बड़ी दिक्कत पड़ोसीपन होती है. आमतौर पर लोग एकदूसरे से कोई खास मतलब नहीं रखते क्योंकि जितना बड़ा मकान उतना ही बड़ा अहंकार उन में रहने वालों का होता है. फ्लैट्स में तो ये दिक्कतें और बढ़ जाती हैं. ऊपर वाले फ्लोर की ठकठक से निबट पाना आसान काम नहीं होता. इस के अलावा फ्लैट्स में रहने वाले लोग कपड़े सुखाने के लिए भी तरस जाते हैं. बालकनी में कपड़े सुखाना बड़े मकान की शान से मेल नहीं खाता. अगर किसी नल से पानी रिस रहा है तो उस की मरम्मत में हजारों खर्च हो जाते हैं. ड्रेनेज लाइन कहां से निकल कर कहां जा रही है, यह बिल्डर भी नहीं बता पाता. बेशक बड़े मकान की अपनी अलग शान है लेकिन उस की कीमत भी भारी पड़ती है, इसलिए खरीदने के पहले बड़े मकान की परेशानियों और छिपे खर्चों का आकलन कर लेना चाहिए वरना बाद में पछताना भी पड़ सकता है. Society Issues :

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें