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Climate Change In India : जब भयंकर गर्मी से खत्म हो जाएगी भारत की बड़ी आबादी

Climate Change In India : अभी हाल में आई एक रिपोर्ट के अनुसार बेहद गर्मी और उमस के कारण अगले 83 सालों में जीने लायक नहीं रहेंगे भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान. इस रिपोर्ट के अनुसार क्लाइमेट चेंज के कारण अगले कुछ दशकों में दक्षिण एशिया का इलाका लोगों और जीवों के रहने लायक नहीं रहेगा. वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के कारण भारत और पाकिस्तान सहित दक्षिण एशियाई देशों में इतनी गर्म हवाएं चलेंगी कि यहां जी पाना नामुमकिन हो जाएगा.

जब वेट-बल्ब टेंपरेचर 35 डिग्री सेल्सियस पर पहुंच जाता है, तो इंसानी शरीर गर्मी के मुताबिक खुद को अनुकूलित नहीं कर पाता. जीवों के शरीर में स्वाभाविक तौर पर अनुकूलन की क्षमता होती है. 35 डिग्री सेल्सियस वेट-बल्ब तापमान होने पर इंसानों का शरीर इतनी गर्मी से खुद को बचाने के लिए ठंडा नहीं हो पाता. इस स्थिति में कुछ ही घंटों में इंसान दम तोड़ सकता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि अगले पचास वर्षों मे भारत की 70 फीसद से ज्यादा की आबादी 32 डिग्री सेल्सियस वेट-बल्ब तापमान को झेलने पर मजबूर हो जाएगी.

अभी के जलवायु की बात करें, तो धरती का वेट-बल्ब तापमान 31 डिग्री सेल्सियस के पार जा चुका है. 2015 में ईरान की खाड़ी के इलाके में यह करीब-करीब 35 डिग्री सेल्सियस की सीमा तक पहुंच गया था. इसके कारण पाकिस्तान और भारत में लगभग 3,5000 लोगों की मौत हुई थी. नए शोध के नतीजों से पता चलता है कि अगर कार्बन उत्सर्जन के साथ साथ जनसंख्या वृद्धि पर जल्द कंट्रोल नहीं किया गया तो जिंदा रहने की हमारी क्षमता एकदम आखिरी कगार पर पहुंच जाएगी. कृषि उत्पादन में भारी कमी के कारण हमारी स्थितियां और गंभीर हो जाएंगी. ऐसा नहीं कि केवल गर्मी के कारण ही लोग मरेंगे. फसल कम होने के कारण लगभग हर एक इंसान को इन भयावह और असहनीय स्थितियों का सामना करना पड़ेगा.

ऐसी विकट परिस्थिति में सब से ज्यादा मारा जाएगा गरीब आदमी क्योंकि अमीर और सक्षम लोग तो पहले ही देश छोड़ चुके होंगे. अमीरों को भविष्य में होने वाले उस विनाश का आभाष अभी से है तभी तो हर साल करीब दो लाख करोड़पति भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश को छोड़ कर विदेश में सेटल हो रहे हैं लेकिन आज इस भारतीय उपमहाद्वीप पर रहने वाली आबादी को भविष्य की कोई चिंता नहीं क्योंकि भारत पाकिस्तान और बांग्लादेश की कुल आबादी के मात्र 10 प्रतिशत लोग इस पूरे उपमहाद्वीप के 90 प्रतिशत संसाधनों के मालिक हैं और बाकी बचे 90 प्रतिशत लोग 10 प्रतिशत संसाधनों पर जैसेतैसे गुजारा करने को मजबूर हैं. 10 प्रतिशत लोग संसाधनों के साथ साथ धर्म राजनीति और व्यवस्था के मालिक भी बन बैठे हैं.

मानवता के इतिहास में सैंकड़ों प्राकृतिक आपदाएं आईं हजारों बार भूकंप आए और लाखों युद्ध हुए लोग मरे बेघर हुए लेकिन ऐसी भयावह स्थिति कभी नहीं आई थी जब दुनिया की एक बड़ी आबादी के नष्ट हो जाने का खतरा सामने दिखाई देने लगा है.

अपनी धरती को हमे खुद ही बचाना होगा इस के लिए कम समय मे बड़े उपाय ढूंढने होंगे. सरकारों को धर्म जाति संप्रदाय से ऊपर उठ कर कुछ ठोस कदम उठाने होंगे. सबसे पहले जनसंख्या पर लगाम कसनी होगी. जंगल को बचाना होगा. नदियों को बचाना होगा. पर्यावरण को बचाना होगा. ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाने होंगे. ये सब करने के लिए हमारे पास बहुत कम समय बचा है. अगर हमने ऐसा नही किया गया तो आने वाले वक़्त में भारतीय उपमहाद्वीप का ये पूरा इलाका बंजर और रेगिस्तान मे तब्दील हो जायेगा. तब इंसान तो नष्ट होगा ही साथ ही उसकी वर्षों की बनाई सभ्यता भी सदा के लिए दफन हो जाएगी क्योंकि प्रकृति सृजन करती है तो उसे विनाश करना भी आता है. Climate Change In India :

Hindi Social Story : दत्तक बेटी – घनश्याम भाई को लोग क्या सलाह दे रहे थे ?

Hindi Social Story : लंदन के वेंबली में ज्यादातर गुजराती रहते हैं. नैरोबी से आ कर बसे घनश्याम सुंदरलाल अमीन भी अपनी पत्नी सुनंदा के साथ वेंबली में ही रहते थे. वह लंदन में भूमिगत ट्रेन के ड्राइवर थे. नौकरी से सेवानिवृत्त होने के बाद पत्नी के साथ आराम से रह रहे थे.

सेवानिवृत्त होने के बाद उन्हें सोशल स्कीम के तहत अच्छा पैसा मिल रहा था. इस के अलावा उन की खुद की बचत भी थी. उन्हें किसी चीज की कमी नहीं थी, कमी बस यह थी कि वह निस्संतान थे.

किसी दोस्त ने घनश्यामभाई को सलाह दी कि वह कोई बच्चा गोद ले लें. ब्रिटेन में बच्चा गोद लेना बहुत मुश्किल है, भारतीय परिवार के लिए तो और भी मुश्किल. इसलिए घनश्यामभाई ने अपने किसी भारतीय मित्र की सलाह पर कोलकाता की एक स्वयंसेवी संस्था से संपर्क किया. उस संस्था ने एक अनाथाश्रम से उन का संपर्क करा दिया.

अनाथाश्रम ने घनश्यामभाई से कोलकाता आने को कहा. घनश्यामभाई पत्नी के साथ कोलकाता आ गए. कोलकाता के उस अनाथाश्रम में उन्हें सुचित्रा नाम की एक लड़की पसंद आ गई. वह 15 साल की थी. जन्म से बंगाली और मात्र बंगला तथा हिंदी बोलती थी. देखने में एकदम भोली, सुंदर और मुग्धा थी. पतिपत्नी ने सुचित्रा को पसंद कर लिया. सुचित्रा भी उन के साथ लंदन जाने को तैयार हो गई. घनश्यामभाई ने सुचित्रा को गोद लेने की तमाम कानूनी प्रक्रिया पूरी कर लीं. सुचित्रा को वीजा दिलाने में तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ा. तरहतरह के प्रमाणपत्र देने पड़े. आखिर 6 महीने बाद सुचित्रा को वीजा मिल गया.

सुचित्रा लंदन पहुंच गई. उस के लिए वहां सब कुछ नयानया था. नया देश, नई दुनिया, नई भाषा, नए लोग. सब कुछ नया. वहां उस का एक स्कूल में दाखिल करा दिया गया. उस ने जल्दी ही अंगरेजी सीख ली. वह गोरी थी और छोटी भी, इसलिए जल्दी से गोरे बच्चों के साथ घुलमिल गई. स्कूल में तमाम गुजराती, पंजाबी और बांग्लादेश से आए परिवारों के बच्चे पढ़ते थे.

चित्रा अब बड़ी होने लगी. वह अकेली लंदन में अंडरग्राउंड ट्रेन में सफर कर सकती थी. बिलकुल अकेली पिकाडाली तक जा सकती थी. वह पढ़ने में भी अच्छी थी. सुचित्रा को गोद लेने वाले घनश्यामभाई और उन की पत्नी सुनंदा अपनी इस बेटी से खुश थे.

छुट्टी के दिनों में वे कभी उसे मैडम तुषाद म्युजियम दिखाने ले जाते तो कभी उसे हाइड पार्क घुमाने ले जाते. मित्रों के घर पार्टी में भी सुचित्रा को हमेशा साथ रखते. सुचित्रा सुनंदा को ‘मम्मी’ कहती तो वह खुश हो जातीं. उन्हें ऐसा लगता कि सुचित्रा उन की कोख जनी बेटी है.

वह स्कूल तो जा ही रही थी. अब कभीकभार अपनी सहेली के घर रुक जाती. फिर वह हर शनिवार को सहेली के घर रुकने लगी. अभी वह 17 साल की ही थी. एक दिन सुनंदा को पता चला कि सुचित्रा घर से तो अपनी सहेली के घर जा कर रुकने की बात कह कर गई थी, पर वह सहेली के घर गई नहीं थी. उन्होंने सुचित्रा से सख्ती से पूछताछ की तो वह खीझ कर बोली, ‘‘दिस इज नन औफ योर बिजनैस.’’

सुचित्रा की इस बात से घनश्यामभाई और सुनंदा को गहरा आघात लगा. कुछ दिनों बाद एक दूसरी घटना घटी.सुचित्रा अकसर स्कूल नहीं जाती थी. घनश्यामभाई और सुनंदा ने जब उस से पूछा तो उस ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया. पतिपत्नी ने सुचित्रा की सहेलियों से पूछताछ की तो पता चला कि वह सुखबीर नाम के एक पंजाबी लड़के के साथ घूमती है. चालू स्कूल में भी वह स्कूल छोड़ कर उस के साथ बाहर घूमने चली जाती है.

घनश्यामभाई ने शाम को सुचित्रा से पूछा, ‘‘मुझे पता चला है कि तुम सुखबीर नाम के किसी लड़के के साथ घूमती हो, क्या यह सच है?’’

‘‘आई एम ए फ्री गर्ल,’’ सुचित्रा ने कहा, ‘‘मैं कहां जाती हूं और बाहर जा कर क्या करती हूं, यह आप को बिलकुल नहीं पूछना चाहिए.’’सुनंदा ने कहा, ‘‘पर बेटा, तुम हमारी बेटी हो. हमें चिंता होती है. तुम अभी 17 साल की ही तो हो.’’

‘‘यू आर नौट माई बायोलौजिकल मदर. आई ऐम योर एडाप्टेड गर्ल. आप ने अपने स्वार्थ के लिए मुझे गोद लिया है. मैं आप की कोख से पैदा नहीं हुई हूं. मेरे ऊपर आप के मर्यादित अधिकार हैं, समझीं?’’

‘‘मतलब?’’ सुनंदा ने पूछा.आई एम नौट ए पार्ट आफ योर बौडी. मैं तुम्हारे शरीर का कोई भी हिस्सा नहीं हूं. मेरे शरीर पर मेरा ही अधिकार है?’’

सुचित्रा की बात सुन कर घनश्यामभाई को गुस्सा आ गया. उन्होंने सुचित्रा को एक तमाचा मार दिया. सुचित्रा चिल्लाई, ‘‘दिस इज फर्स्ट एंड लास्ट. अगर दूसरी बार तुम ने ऐसा किया तो मैं पुलिस बुला लूंगी.’’

घनश्यामभाई ने कहा, ‘‘मैं खुद ही पुलिस को बताऊंगा कि मेरे द्वारा गोद ली गई बेटी पढ़ने की उम्र में गलत काम करती है. तुम्हें सोशल काउंसलिंग में भेज दूंगा. उस के बाद भी नहीं सुधरी तो तुम्हें फिर इंडिया जाना होगा.’’

इंडिया वापस भेजने की बात सुन कर सुचित्रा सोच में पड़ गई. वह एकदम चुप हो गई और अपने बैडरूम में चली गई.अगले दिन उठ कर उस ने मम्मीपापा से ‘सौरी’ कहा. घनश्यामभाई और सुनंदा शांत हो गए. सुनंदा ने कहा, ‘‘देखो बेटा, तुम्हारी पढ़नेलिखने की उम्र है. तुम अच्छी तरह पढ़लिख कर अपना कैरियर बना लो. अभी तुम टीनएज हो. जिस लड़के के साथ मन हो, नहीं घूम सकतीं.’’

सुचित्रा ने सिर झुका कर कहा, ‘‘मम्मी, अब इस तरह की गलती दोबारा नहीं करूंगी.’’ इस के बाद वह नियमित रूप से स्कूल जाने लगी. सुचित्रा स्कूल नहीं आती, यह शिकायतें आनी बंद हो गईं.

घनश्यामभाई ने अपनी तरह से पता किया तो मालूम हुआ कि सुचित्रा नियमित स्कूल जाती है. धीरेधीरे इस बात को काफी समय बीत गया.

एक दिन घनश्यामभाई और सुनंदा के पड़ोसियों ने पुलिस से शिकायत की कि हमारे बगल वाले घर से बहुत तेज दुर्गंध आ रही है. तुरंत पुलिस आ गई. घर का दरवाजा बंद था. लेकिन अंदर से स्टौपर नहीं लगा था. पुलिस ने धक्का मारा तो दरवाजा खुल गया. पुलिस ने अंदर जा कर देखा तो बैडरूम में घनश्यामभाई और उन की पत्नी की लाशें पड़ी थीं.

पूछताछ में पड़ोसियों ने बताया कि इन के साथ इन की गोद ली गई बेटी भी रहती थी. उस समय वह घर में नहीं थी. दोनों लाशों को पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. उन की गोद ली गई बेटी गायब थी. पता चला कई दिनों से वह स्कूल भी नहीं गई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो बताया गया कि पतिपत्नी के मरने से पहले खाने में नींद की दवा दी गई थी. उस के बाद घनश्यामभाई की हत्या चाकू से और सुनंदा की हत्या मुंह पर तकिया रख कर की गई थी.

पुलिस का पहला शक मारे गए पतिपत्नी की दत्तक बेटी सुचित्रा पर गया. उन्होंने घनश्यामभाई और सुचित्रा के मोबाइल का काल रिकौर्ड चैक किया. 2 ही दिनों में पुलिस सुचित्रा के बौयफ्रैंड सुखबीर के घर पहुंच गई.

सुखबीर अकेला ही अपनी विधवा मां के साथ रहता था. सुचित्रा भी उसी के घर मिल गई. पुलिस ने दोनों से सख्ती से पूछताछ की तो सुचित्रा और सुखबीर ने स्वीकार कर लिया कि उन्होंने प्रेम का विरोध करने की वजह से घनश्यामभाई और सुनंदा की हत्या की थी.

सुचित्रा ने बताया, ‘‘उस रात मैं ने ही अपने पालक मातापिता के खाने में नींद की गोलियां मिला दी थीं, जिस से वे जाग न सकें. दोनों गहरी नींद सो गए तो सुखबीर को बुला लिया. उस के बाद अपनी पालक माता सुनंदा के मुंह पर तकिया रख कर पूरी ताकत से दबाए रखा तो उन की सांसों की डोर टूट गई.

‘‘सुनंदा के छटपटाने की आवाज सुन कर मेरे पालक पिता घनश्यामभाई जाग गए. सुखबीर अपने साथ चाकू लाया था. उसी चाकू से उस ने घनश्यामभाई पर ताबड़तोड़ वार कर के उन्हें बुरी तरह घायल कर दिया. उस के बाद हम दोनों भाग गए.’’

दोनों के बयान सुन कर पुलिस स्तब्ध रह गई. सुचित्रा अभी नाबालिग थी. पुलिस ने उस की मैडिकल जांच कराई तो पता चला कि वह गर्भवती है.

सुचित्रा ने जो किया, उसे सुन कर तो अब यही लगता है कि इस तरह बच्चे को गोद लेने में भी सौ बार सोचना चाहिए. Hindi Social Story :

Hindi Family Story : दौड़ – जिंदगी की किस दौड़ में भाग रही थी निशा ?

Hindi Family Story : आफिस जाने से पहले बेमन से निशा ने मोबाइल से अपनी ससुराल का नंबर मिलाया. फोन उस की सास ने उठाया.

‘‘नमस्ते, मम्मीजी. कल रात क्या आप सब लोग कहीं बाहर गए हुए थे?’’ अपनी आवाज में जरा सी मिठास लाते हुए निशा बोली.

‘‘हां, कविता के बेटे मोहित का जन्मदिन था इसलिए हम सब वहां गए थे. लौटने में देर हो गई थी.’’

कविता उस की बड़ी ननद थी. मोहित के जन्मदिन की पार्टी में उसे बुलाया ही नहीं गया, इस विचार ने उस के मूड को और भी ज्यादा खराब कर दिया.

‘‘मम्मी, रवि से बात करा दीजिए,’’ निशा ने जानबूझ कर रूखापन दिखाते हुए पार्टी के बारे में कुछ भी नहीं पूछा और अपने पति रवि से बात करने की इच्छा जाहिर की.

‘‘रवि तो बाजार गया है. उस से कुछ कहना हो तो बता दो.’’

‘‘मुझे आफिस में फोन करने को कहिएगा. अच्छा मम्मी, मैं फोन रखती हूं, नमस्ते.’’

‘‘सुखी रहो, बहू,’’ सुमित्रा का आशीर्वाद सुन कर निशा ने बुरा सा मुंह बनाया और फोन रख दिया.

‘बुढि़या ने यह भी नहीं पूछा कि मैं कैसी हूं…’ गुस्से में बड़बड़ाती निशा अपना पर्स उठाने के लिए बेडरूम की तरफ चल पड़ी.

कैरियर के हिसाब से आज का दिन निशा के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण व खुशी से भरा था. वह टीम लीडर बन गई है. यह समाचार उसे कल आफिस बंद होने से कुछ ही मिनट पहले मिला था. इसलिए इस खुशी को वह अपने सहकर्मियों के साथ बांट नहीं सकी थी.

आफिस में निशा के कदम रखते ही उसे मुबारकबाद देने वालों की भीड़ लग गई. अपने नए केबिन में टीम लीडर की कुरसी पर बैठते हुए निशा खुशी से फूली नहीं समाई.

रवि का फोन उस के पास 11 बजे के करीब आया. उस समय वह अपने काम में बहुत ज्यादा व्यस्त थी.

‘‘रवि, तुम्हें एक बढि़या खबर सुनाती हूं,’’ निशा ने उत्साही अंदाज में बात शुरू की.

‘‘तुम्हारा प्रमोशन हो गया है न?’’

‘‘तुम्हें कैसे पता चला?’’ निशा हैरान हो उठी.

‘‘तुम्हारी आवाज की खुशी से मैं ने अंदाजा लगाया, निशा.’’

‘‘मैं टीम लीडर बन गई हूं, रवि. अब मेरी तनख्वाह 35 हजार रुपए हो गई है.’’

‘‘गाड़ी भी मिल गई है. अब तो पार्टी हो जाए.’’

‘‘श्योर, पार्टी कहां लोगे?’’

‘‘कहीं बाहर नहीं. तुम शाम को घर आ जाओ. मम्मी और सीमा तुम्हारी मनपसंद चीजें बना कर रखेंगी.’’

रवि का प्रस्ताव सुन कर निशा का उत्साह ठंडा पड़ गया और उस ने नाराज लहजे में कहा, ‘‘घर में पार्टी का माहौल कभी नहीं बन सकता, रवि. तुम मिलो न शाम को मुझ से.’’

‘‘हमारा मिलना तो शनिवारइतवार को ही होता है, निशा.’’

‘‘मेरी खुशी की खातिर क्या तुम आज नहीं आ सकते हो?’’

‘‘नाराज हो कर निशा तुम अपना मूड खराब मत करो. शनिवार को 3 दिन बाद मिल ही रहे हैं. तब बढि़या सी पार्टी ले लूंगा.’’

‘‘तुम भी रवि, कैसे भुलक्कड़ हो, शनिवार को मैं मेरठ जाऊंगी.’’

‘‘तुम्हारे जैसी व्यस्त महिला को अपने भाई की शादी याद है, यह वाकई कमाल की बात है.’’

‘‘मुझे ताना मार रहे हो?’’ निशा चिढ़ कर बोली.

‘‘सौरी, मैं ने तो मजाक किया था.’’

‘‘अच्छा, यह बताओ कि मेरठ रविवार की सुबह तक पहुंच जाओगे न?’’

‘‘आप हुक्म करें, साले साहब के लिए जान भी हाजिर है, मैडम.’’

‘‘घर से और कौनकौन आएगा?’’

‘‘तुम जिसे कहो, ले आएंगे. जिसे कहो, छोड़ आएंगे. वैसे तुम शनिवार की रात को पहुंचोगी, इस बात से नवीन या तुम्हारे मम्मीडैडी नाराज तो नहीं होंगे?’’

‘‘मुझे अपने जूनियर्स को टे्रनिंग देनी है. मैं चाह कर भी पहले नहीं निकल सकती हूं.’’

‘‘सही कह रही हो तुम, भाई की शादी के चक्कर में इनसान को अपनी ड्यूटी को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए.’’

‘‘तुम कभी मेरी भावनाओं को नहीं समझ सके,’’ निशा फिर चिढ़ उठी, ‘‘मैं अपने कैरियर को बड़ी गंभीरता से लेती हूं, रवि.’’

‘‘निशा, मैं फोन रखता हूं. आज तुम मेरे मजाक को सहन करने के मूड में नहीं हो. ओके, बाय.’’

रवि और निशा ने एम.बी.ए. साथसाथ एक ही कालिज से किया था. दोनों के बीच प्यार का बीज भी उन्हीं दिनों में अंकुरित हुआ.

रवि ने बैंक में पी.ओ. की परीक्षा पास कर के नौकरी पा ली और निशा ने बहुराष्ट्रीय कंपनी में. करीब 2 साल पहले दोनों ने घर वालों की रजामंदी से प्रेम विवाह कर लिया.

दुलहन बन कर निशा रवि के परिवार में आ गई. वहां के अनुशासन भरे माहौल में उस का मन शुरू से नहीं लगा. टोकाटाकी के अलावा उसे एक बात और खलती थी. दोनों अच्छा कमाते हुए भी भविष्य के लिए कुछ बचा नहीं पाते थे.

उन दोनों की ज्यादा कमाई होने के कारण हर जिम्मेदारी निभाने का आर्थिक बोझ उन के ही कंधों पर था. निशा इन बातों को ले कर चिढ़ती तो रवि उसे प्यार से समझाता, ‘हम दोनों बड़े भैया व पिताजी से ज्यादा समर्थ हैं, इसलिए इन जिम्मेदारियों को हमें बोझ नहीं समझना चाहिए. अगर हम सब की खुशियों और घर की समृद्धि को बढ़ा नहीं सकते हैं तो हमारे ज्यादा कमाने का फायदा क्या हुआ? मैडम, पैसा उपयोग करने के लिए होता है, सिर्फ जोड़ने के लिए नहीं. एकसाथ मिलजुल कर हंसीखुशी से रहने में ही फायदा है, निशा. सब से अलगथलग हो कर अमीर बनने में कोई मजा नहीं है.’

निशा कभी भी रवि के इस नजरिये से सहमत नहीं हुई. ससुराल में उसे अपना दम घुटता सा लगता. किसी का व्यवहार उस के प्रति खराब नहीं था पर वह उस घर में असंतोष व शिकायत के भाव से रहती. उस का व रवि का शोषण हो रहा है, यह विचार उसे तनावग्रस्त बनाए रखता.

निशा को जब कंपनी से 2 बेडरूम वाला फ्लैट मिलने की सुविधा मिली तो उस ने ससुराल छोड़ कर वहां जाने को फौरन ‘हां’ कर दी. अपना फैसला लेने से पहले उस ने रवि से विचारविमर्श भी नहीं किया क्योंकि उसे पति के मना कर देने का डर था.

फ्लैट में अलग जा कर रहने के लिए रवि बिलकुल तैयार नहीं हुआ. वह बारबार निशा से यही सवाल पूछता कि घर से अलग होने का हमारे पास कोई खास कारण नहीं है. फिर हम ऐसा क्यों करें?

‘मुझे रोजरोज दिल्ली से गुड़गांव जाने में परेशानी होती है. इस के अलावा सीनियर होने के नाते मुझे आफिस में ज्यादा समय देना चाहिए और ज्यादा समय मैं गुड़गांव में रह कर ही दे सकती हूं.’

निशा की ऐसी दलीलों का रवि पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा था.

अंतत: निशा ने अपनी जिद पूरी की और कंपनी के फ्लैट में रहने चली गई. उस के इस कदम का विरोध मायके और ससुराल दोनों जगह हुआ पर उस ने किसी की बात नहीं सुनी.

रवि की नाराजगी, उदासी को अनदेखा कर निशा गुड़गांव रहने चली गई.

रवि सप्ताह में 2 दिन उस के साथ गुजारता. निशा कभीकभार अपनी ससुराल वालों से मिलने आती. सच तो यह था कि अपना कैरियर बेहतर बनाने के चक्कर में उसे कहीं ज्यादा आनेजाने का समय ही नहीं मिलता.

अच्छा कैरियर बनाने के लिए अपने व्यक्तिगत जीवन की कठिनाइयों को निशा ने कभी ज्यादा महत्त्व नहीं दिया. अपने छोटे भाई नवीन की शादी में वह सिर्फ एक रात पहले पहुंचेगी, इस बात का भी उसे कोई खास अफसोस नहीं था. अपने मातापिता व भाई की शिकायत को उस ने फोन पर ऊंची आवाज में झगड़ कर नजरअंदाज कर दिया.

‘‘शादी में हमारे मेरठ पहुंचने की चिंता मत करो, निशा. आफिस के किसी काम में अटक कर तुम और ज्यादा देर से मत पहुंचना,’’ रवि के मोबाइल पर उस ने जब भी फोन किया, रवि से उसे ऐसा ही जवाब सुनने को मिला.

शनिवार की शाम निशा ने टैक्सी की और 8 बजे तक मेरठ अपने मायके पहुंच गई. अब तक छिपा कर रखी गई प्रमोशन की खबर सब को सुनाने के लिए वह बेताब थी. अपने साथ बढि़या मिठाई का डब्बा वह सब का मुंह मीठा कराने के लिए लाई थी. उस के पर्स में प्रमोशन का पत्र पड़ा था जिसे वह सब को दिखा कर उन की वाहवाही लूटने को उत्सुक थी.

टैक्सी का किराया चुका कर निशा ने अपनी छोटी अटैची खुद उठाई और गेट खोल कर अंदर घुस गई.

घर में बड़े आकार वाले ड्राइंगरूम को खाली कर के संगीत और नृत्य का कार्यक्रम आयोजित किया गया था. तेज गति के धमाकेदार संगीत के साथ कई लोगों के हंसनेबोलने की आवाजें भी निशा के कानों तक पहुंचीं.

निशा ने मुसकराते हुए हाल में कदम रखा और फिर हैरानी के मारे ठिठक गई. वहां का दृश्य देख कर उस का मुंह खुला का खुला रह गया.

निशा ने देखा मां बड़े जोश के साथ ढोलक बजा रही थीं. तबले पर ताल बजाने का काम उस की सास कर रही थीं.

रवि मंजीरे बजा रहा था और भाई नवीन ने चिमटा संभाल रखा था. किसी बात पर दोनों हंसी के मारे ऐसे लोटपोट हुए जा रहे थे कि उन की ताल बिलकुल बिगड़ गई थी.

उस की छोटी ननद सीमा मस्ती से नाच रही थी और महल्ले की औरतें तालियां बजा रही थीं. उन में उस की जेठानी अर्चना भी शामिल थी. अचानक ही रवि की 5 वर्षीय भतीजी नेहा उठ कर अपनी सीमा बूआ के साथ नाचने लगी. एक तरफ अपने ससुर, जेठ व पिता को एकसाथ बैठ कर गपशप करते देखा. अपनी ससुराल के हर एक सदस्य को वहां पहले से उपस्थित देख निशा हैरान रह गई.

उन के पड़ोस में रहने वाली शीला आंटी की नजर निशा पर सब से पहले पड़ी. उन्होंने ऊंची आवाज में सब को उस के पहुंचने की सूचना दी तो कुछ देर के लिए संगीत व नृत्य बंद कर दिया गया.

लगभग हर व्यक्ति से निशा को देर से आने का उलाहना सुनने को मिला.

मौका मिलते ही निशा ने रवि से धीमी आवाज में पूछा, ‘‘आप सब लोग यहां कब पहुंचे?’’

‘‘हम तो परसों सुबह ही यहां आ गए थे,’’ रवि ने मुसकराते हुए जवाब दिया.

निशा ने माथे पर बल डालते हुए पूछा, ‘‘इतनी जल्दी क्यों आए? मुझे बताया क्यों नहीं?’’

रवि ने सहज भाव से बोलना शुरू किया, ‘‘तुम्हारी मम्मी ने 3 दिन पहले मुझ से फोन पर बात की थी. उन की बातों से मुझे लगा कि वह बहुत उदास हैं. उन्हें बेटे के ब्याह के घर में कोई रौनक नजर नहीं आ रही थी. तुम्हारे जल्दी न आ सकने की शिकायत को दूर करने के लिए ही मैं ने उन से सब के साथ यहां आने का वादा कर लिया और परसों से यहीं जम कर खूब मौजमस्ती कर रहे हैं.’’

‘‘सब को यहां लाना मुझे अजीब सा लग रहा है,’’ निशा की चिढ़ अपनी जगह बनी रही.

‘‘ऐसा करने के लिए तुम्हारे मम्मीपापा व भाई ने बहुत जोर दिया था.’’

निशा ने बुरा सा मुंह बनाया और मां से अपनी शिकायत करने रसोई की तरफ चल पड़ी.

मां बेटी की शिकायत सुनते ही उत्तेजित लहजे में बोलीं, ‘‘तेरी ससुराल वालों के कारण ही यह घर शादी का घर लग रहा है. तू तो अपने काम की दीवानी बन कर रह गई है. हमें वह सभी बड़े पसंद हैं और उन्हें यहां बुलाने का तुम्हें भी कोई विरोध नहीं करना चाहिए.’’

‘‘जो लोग तुम्हारी बेटी को प्यार व मानसम्मान नहीं देते, तुम सब उन से…’’

बेटी की बात को बीच में काट कर मां बोलीं, ‘‘निशा, तुम ने जैसा बोया है वैसा ही तो काटोगी. अब बेकार के मुद्दे उठा कर घर के हंसीखुशी के माहौल को खराब मत करो. तुम से कहीं ज्यादा इस शादी में तुम्हारी ससुराल वाले हमारा हाथ बंटा रहे हैं और इस के लिए हम दिल से उन के आभारी हैं.’’

मां की इन बातों से निशा ने खुद को अपमानित महसूस किया. उस की पलकें गीली होने लगीं तो वह रसोई से निकल कर पीछे के बरामदे में आ गई.

कुछ समय बाद रवि भी वहां आ गया और पत्नी को इस तरह चुपचाप आंसू बहाते देख उस के सिर पर प्यार से हाथ फेरा तो निशा उस के सीने से लग कर फफक पड़ी.

रवि ने उसे प्यार से समझाया, ‘‘तुम अपने भाई की शादी का पूरा लुत्फ उठाओ, निशा. व्यर्थ की बातों पर ध्यान देने की क्या जरूरत है तुम्हें.’’

‘‘मेरी खुशी की फिक्र न मेरे मायके वालों को है न ससुराल वालों को. सभी मुझ से जलते हैं… मुझे अलगथलग रख कर नीचा दिखाते हैं. मैं ने किसी का क्या बिगाड़ा है,’’ निशा ने सुबकते हुए सवाल किया.

‘‘तुम क्या सचमुच अपने सवाल का जवाब सुनना चाहोगी?’’ रवि गंभीर हो गया.

निशा ने गरदन हिला कर ‘हां’ में जवाब दिया.

‘‘देखो निशा, अपने कैरियर को तुम बहुत महत्त्वपूर्ण मानती हो. तुम्हारे लक्ष्य बहुत ऊंचाइयों को छूने वाले हैं. आपसी रिश्ते तुम्हारे लिए ज्यादा माने नहीं रखते. तुम्हारी सारी ऊर्जा कैरियर की राह पर बहुत तेजी से दौड़ने में लग रही है…तुम इतना तेज दौड़ रही हो… इतनी आगे निकलती जा रही हो कि अकेली हो गई हो… दौड़ में सब से आगे, पर अकेली,’’ रवि की आवाज कुछ उदास हो गई.

‘‘अच्छा कैरियर बनाने का और कोई रास्ता नहीं है, रवि,’’ निशा ने दलील दी.

‘‘निशा, कैरियर जीवन का एक हिस्सा है और उस से मिलने वाली खुशी अन्य क्षेत्रों से मिलने वाली खुशियों के महत्त्व को कम नहीं कर सकती. हमारे जीवन का सर्वांगीण विकास न हो तो अकेलापन, तनाव, निराशा, दुख और अशांति से हम कभी छुटकारा नहीं पा सकते हैं.’’

‘‘मुझे क्या करना चाहिए? अपने अंदर क्या बदलाव लाना होगा?’’ निशा ने बेबस अंदाज में पूछा.

‘‘जो पैर कैरियर बनाने के लिए तेज दौड़ सकते हैं वे सब के साथ मिल कर नाच भी सकते हैं…किसी के हमदर्द भी बन सकते हैं. जरूरत है बस, अपना नजरिया बदलने की…अपने दिमाग के साथसाथ अपने दिल को भी सक्रिय कर लोगों का दिल जीतने की,’’ अपनी सलाह दे कर रवि ने उसे अपनी छाती से लगा लिया.

निशा ने पति की बांहों के घेरे में बड़ी शांति महसूस की. रवि का कहा उस के दिल में कहीं बड़ी गहराई तक उतर गया. अपने नजदीकी लोगों से अपने संबंध सुधारने की इच्छा उस के मन में पलपल बलवती होती जा रही थी.

‘‘मैं बहुत दिनों से मस्त हो कर नाची नहीं हूं. आज कर दूं जबरदस्त धूमधड़ाका यहां?’’ निशा की मुसकराहट रवि को बहुत ताजा व आकर्षक लगी.

रवि ने प्यार से उस का माथा चूमा और हाथ पकड़ कर हाल की तरफ चल दिया. उसे साफ लगा कि पिछले चंद मिनटों में निशा के अंदर जो जबरदस्त बदलाव आया है वह उन दोनों के सुखद भविष्य की तरफ इशारा कर रहा था. Hindi Family Story :

Hindi Romantic Story : ममता का डौलर – आनंदा खुद को क्यों कसूरदार मानती थी ?

Hindi Romantic Story : पलंग पर चारों ओर डौलर बिखरे हुए थे. कमरे के सारे दरवाजे व खिड़कियां बंद थीं, केवल रोशनदान से छन कर आती धूप के टुकड़े यहांवहां छितराए हुए थे. डौलर के लंबेचौड़े घेरे के बीच आनंदी बैठी थीं. उन के हाथ में एक पत्र था. न जाने कितनी बार वे यह पत्र पढ़ चुकी थीं. हर बार उन्हें लगता कि जैसे पढ़ने में कोईर् चूक हो गई है, ऐसा कैसे हो सकता है. उन का बेटा ऐसे कैसे लिख सकता है. जरूर कोई मजबूरी रही होगी उस के सामने वरना उन्हें जीजान से चाहने वाला उन का बेटा ऐसी बातें उन्हें कभी लिख ही नहीं सकता. हो सकता है उस की पत्नी ने उसे इस के लिए मजबूर किया हो.

पर जो भी वजह रही हो, सुधाकर ने जिस तरह से सब बातें लिखी थीं, उस से तो लग रहा था कि बहुत सोचसमझ कर उस ने हर बात रखी है.

कितनी बार वे रो चुकी थीं. आंसू पत्र में भी घुलमिल गए थे. दुख की अगर कोई सीमा होती है तो वे उसे भी पार कर चुकी थीं.

ताउम्र संघर्षों का सामना चुनौती की तरह करने वाली आनंदी इस समय खुद को अकेला महसूस कर रही थीं. बड़ीबड़ी मुश्किलें भी उन्हें तोड़ नहीं सकी थीं, क्योंकि तब उन के पास विश्वास का संबल था पर आज मात्र शब्दों की गहरी स्याही ने उन के विश्वास को चकनाचूर कर दिया था. बहुत हारा हुआ महसूस कर रही थीं. यह उन को मिली दूसरी गहरी चोट थी और वह भी बिना किसी कुसूर के.

हां, उन का एक बहुत बड़ा कुसूर था कि उन्होंने एक खुशहाल परिवार का सपना देखा था. उन्होंने ख्वाबों के घोंसलों में नन्हेंनन्हें सपने रखे थे और मासूम सी अपनी खुशियों का झूला अपने आंगन में डाला था. उमंगों के बीज परिवारनुमा क्यारी में डाले थे और सरसों के फूलों की पीली चूनर के साथ ही प्यार की इंद्रधनुषी कोमल पत्तियां सजा दी थीं. पर धीरेधीरे उन के सपने, उन की खुशियां, उन की पत्तियां सब बिखरती चली गईं. खुशहाल परिवार की तसवीर सिर्फ उन के मन की दीवार पर ही टंग कर रह गई. अपनी मासूम सी खुशियों का झूला जो बहुत शौक से उन्होंने अपने आंगन में डाला था, उस पर कभी बैठ झूल ही नहीं पाईं वे. हिंडोला हिलता रहता और वे मनमसोस कर रह जातीं.

शादी एक समझौता है, यह बात उन की मां ने उन की शादी होने से बहुत पहले ही समझानी शुरू कर दी थी. पर वे हमेशा सोचती थीं कि समझौता करने का तो मतलब होता है कि चाहे पसंद हो या न हो, चाहे मन माने या न माने, जिंदगी को दूसरे के हिसाब से चलने दो. फिर प्यार, एहसास, एकदूसरे के लिए सम्मान और समपर्ण की भावना कैसे पनपेगी उस बंधन में.

आनंदी को यह सोच कर भी हैरानी होती कि जब शादी एक बंधन है तो उस में कोईर् खुल कर कैसे जी सकता है. एकदूसरे को अगर खुल कर जीने ही नहीं दिया जाएगा या एक साथी, जो हमेशा पति ही होता है, दूसरे पर अपने विचार, अपनी पसंदनापसंद थोपेगा तो वह खुश कैसे रह पाएगा.

मां डांटतीं कि बेकार की बातें मत सोचा कर. इतना मंथन करने से चीजें बिगड़ जाती हैं. मां को उन्होंने हमेशा खुश ही देखा. कभी लगा ही नहीं कि वे किसी तरह का समझौता कर रही हैं. पापामम्मी का रिश्ता उन्हें बहुत सहज लगता था. फिर बड़ी दीदी और उस के बाद मंझली दीदी की शादी हुई तो उन को देख कर कभी नहीं लगा कि वे दुखी हैं. आनंदी को तब यकीन हो गया था कि उन्हें भी ऐसा ही सहज जीवन जीने का मौका मिलेगा. सारे मंथन को विराम दे, वे रंजन के साथ विवाह कर उन के घर में आ गईर् थीं.

शुरुआती दिन घोंसले का निर्माण करने के लिए तिनके एकत्र करने में फुर्र से उड़ गए, खट्टेमीठे दिन, थोड़ीबहुत चुहलबाजी, दैहिक आकर्षण और उड़ती हुई रंगबिरंगी तितलियों से बुने सपनों के साथ. समय बीता तो आनंदी को एहसास होने लगा कि रंजन और वे बिलकुल अलग हैं. रंजन रिश्ते को सचमुच बंधन बनाने में यकीन रखते हैं. खुल कर सांस लेना मुश्किल हो गया उन के लिए.

दरवाजे पर खटखट हुई तो आनंदी सोच और डौलरों के घेरे से हिलीं. अंधेरा था कमरे में. दोपहर कब की शाम की बांहों में समा गई थी. लाइट जलानी ही पड़ी उन्हें.

‘‘मांजी दूध लाया हूं. आप डेयरी पर नहीं आईं तो मैं ही देने चला आया. एकदम ताजा निकाल कर लाया हूं.’’

चुपचाप दूध ले लिया उन्होंने. वरना अन्य दिनों की तरह कहतीं, ‘बहुत पानी मिलाने लगे हो आजकल.’ जब मेरा बेटा आएगा न, तब एकदम खालिस दूध लाना या तब ज्यादा दूध देना पड़ेगा तुझे. मेरे बेटे को दूध अच्छा लगता है. बड़े शौक से पीता है.

कमरे में आईं तो रोशनी आंखों को चुभने लगी. निराशा की परतें उन के चेहरे पर फैली हुई थीं. ऐसा लग रहा था कि मात्र कुछ घंटों में ही वे 2 साल बूढ़ी हो गई हैं. उदास नजरों से उन्होंने एक बार फिर डौलरों को देखा. पलकें नम हो गईं. नहीं देखना चाहतीं वे इन डौलरों को. क्या करेंगी वे इन का. जीरो वाट का बल्ब जलाया उन्होंने. लेकिन धुंधले में भी डौलर चमक रहे थे. उन के भीतर जो पीड़ा की लपटें सुलग रही थीं, उन की रोशनी से खुद को बचाना उन के लिए ज्यादा मुश्किल था.

रंजन के साथ लड़ाई होना आम बात हो गई थी. वे कुछ फैसला लेतीं, उस से पहले ही उन्हें पता चला कि उन के अंदर एक अंकुर फूट गया है. सचमुच समझौता करने लगीं वे उस के बाद. उम्मीद भी थी कि रंजन घर में बच्चा आने के बाद सुधर जाएंगे. ऐयाशियां, दूसरी औरतों से संबंध रखना और शराब पीना शायद छोड़ दें, पर वे गलत थीं.

बच्चा आने के बाद रंजन और उग्र हो गए और बोलने लगे, बहुत कहती थी न कि चली जाएगी. अकेले बच्चे को पालना आसान नहीं. हां, वे जानती थीं इस बात को, इसलिए सहती रहीं रंजन की ज्यादतियों को.

तब मां ने समझाया, तू नौकरी करती है न, चाहे तो अलग हो जा रंजन से. हम सब तेरे साथ हैं. वह नहीं मानी. जिद थी कि समझौता करती रहेंगी. सुधाकर पर रंजन का बुरा असर न पड़े, यह सोच कर दिल पर पत्थर रख कर उसे होस्टल में डाल दिया.

उन की सारी आस, उम्मीद अब सुधाकर पर ही आ कर टिक गई थी. बस, वे चाहती थीं कि सुधाकर खूब पढे़ और रंजन के साए से दूर रहे. वैसे भी रंजन के सुधाकर को ले कर न कोई सपने थे न ही वे उस के कैरियर को ले कर परेशान थे. संभाल लेगा मेरा बिजनैस, बस वे यही कहते रहते. आनंदी नहीं चाहती थीं कि सुधाकर उन का बिजनैस संभाले जो लगभग बुरी हालत में था. उन का औफिस दोस्तों का अड्डा बन चुका था.

वे कभी समझ ही नहीं पाईं रंजन को. कोई अपने परिवार से ज्यादा दोस्तों को महत्त्व कैसे दे सकता है, कोई अपनी पत्नी व बेटे से बढ़ कर शराब को महत्त्व कैसे दे सकता है, कोई परिवार संभालने की कोशिश कैसे नहीं कर सकता. पर रंजन ऐसे ही थे. जिम्मेदारी से दूर भागते थे. कमिटमैंट तो जैसे उन के लिए शब्द बना ही नहीं था.

यह तो शुक्र था कि सुधाकर मेहनती निकला. लगातार आगे बढ़ता गया. रंजन उन दोनों को छोड़ कर किसी और औरत के पास रहने लगे. सुधाकर अकसर दुखी रहने लगा. बिखरे हुए परिवार में सपने दम न तोड़ दें, यह सोच कर आनंदी ने अपनी जमापूंजी की परवा न कर उसे विदेश भेज दिया. वे चाहती थीं कि बेटा विदेश जाए, खूब पैसा और नाम कमाए ताकि उन के जीवन की काली परछाइयों से दूर हो जाए. उसे उन के जीवन की कड़वाहट को न झेलना पड़े. पतिपत्नी के रिश्तों में आई दीवारों व अलगाव के दंश उसे न चुभें.

मां से अलग होना सुधाकर के लिए आसान न था. उस ने देखा था अपनी मां को अपने लिए तिलतिल मरते हुए, उस की खुशियों की खातिर त्याग करते हुए. वह नहीं जाना चाहता था विदेश, पर आनंदी पर जैसे जिद सवार हो गई थी. सब ने समझाया था कि ऐसा मत कर. बेटा विदेश गया तो पराया हो जाएगा. तू अकेली रह जाएगी. पर वे नहीं मानीं.

वे सुधाकर को कामयाब देखना चाहती थीं. वे उसे रंजन की परछाईं से दूर रखना चाहती थीं, मां की ममता तब शायद अंधी हो गईर् थी, इसीलिए देख ही नहीं पाईं कि बेटे को यह बात कचोट गई है.

पिता का प्यार जिसे न मिला हो और जो मां के आंचल में ही सुख तलाशता हो, जिस के मन के तार मां के मन के तारों से ही जुड़े हों, उस बेटे को अपने से दूर करने पर आनंदी खुद कितनी तड़पी थीं, यह वही जानती हैं. पर सुधाकर भी आहत हुआ था.

कितना कहा था उस ने, ‘मां, तुम मेरे बिना कैसे रहोगी. मैं यहीं पढ़ सकता हूं.’ पर वे नहीं मानीं और भेज दिया उसे आस्ट्रेलिया. फिर उसे वहीं जौब भी मिल गई. वह बारबार उन्हें बुलाता रहा कि मां अब तो आ जाओ. और वे कहती रहीं कि बस 2 साल और हैं नौकरी के, रिटायर होते ही आ जाऊंगी. वे जाने से पहले सारे लोन चुकाना चाहती थीं. बेटे पर कोई बोझ डालना तो जैसे आंनदी ने सीखा ही नहीं था. फिर विश्वास भी था कि बेटा तो उन्हीं का है. एक बार सैटल हो जाए तो कह देंगी कि आ कर सब संभाल ले. बुला लेंगी उसे वापस. कामयाबी की सीढि़यां तो चढ़ने ही लगा है वह.

नहीं आ पाया सुधाकर. जौब में उलझा तो खुद की जड़ें पराए देश में जमाने की जद्दोजेहद में लग गया. फिर उस की मुलाकात रोजलीना से हुई और उस से ही शादी भी कर ली. मां को सूचना भेज दी थी. पर इस बार आने का इसरार नहीं किया था. रोजलीना का साथ पा कर उस के बीते दिनों के जख्म भर गए थे. अपने परिवार को सींचने में वह मां के त्याग को याद रखना चाह कर भी नहीं रख पाया.

रोजलीना ने साफ कह दिया था कि वह किसी तरह की दखलंदाजी बरदाश्त नहीं कर सकती. वैसे भी वह मानती थी कि इंडियन मदर अपने बेटों को ले कर बहुत पजैसिव होती हैं, इसलिए वह नहीं चाहती थी कि आनंदी वहां उन के साथ आ कर रहें.

सुधाकर मां से यह सब नहीं कह सकता था. मां की तकलीफें अभी भी उसे कभीकभी टीस दे जाती थीं. पर अब उस की एक नई दुनिया बस गई थी और वह नहीं चाहता था कि मांपापा की तरह उस के वैवाहिक जीवन में भी कटुता की काली छाया पसरे.

रोजलीना को वह किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता था. एक सुखद वैवाहिक जीवन की राह न जाने कब से उस के भीतर पलती आईर् थी. बहुत कठिन था उस के लिए मां और पत्नी में से एक को चुनना, पर मां के पास वह वापस लौट नहीं पा रहा था और पत्नी को छोड़ना नहीं चाहता था.

वैसे भी मां का उसे अपने से दूर करने की टीस भी उसे अकसर गहरी पीड़ा से भर जाती थी. पिता के प्यार से वंचित सुधाकर मां से दूर नहीं रहना चाहता था. भले ही मां ने उसे भविष्य संवारने के लिए अपने से उसे दूर किया था, पर फिर भी किया तो, अकसर वह यही सोचता. ऐसे में रोजलीना का पलड़ा भारी होना स्वाभाविक ही था.

आनंदी को लगा जैसे उन का गला सूख रहा है, पर पानी के लिए वे उठीं नहीं. रात गहरा गईर् थी. वे समझ चुकी थीं कि सुधाकर को विदेश भेजने की उन की जिद ने उन के जीवन में भी इस रात की तरह अंधेरा भर दिया है. बेटे की खुशियां चाहना क्या सच में इतना बड़ा कुसूर हो सकता है या नियति की चाल ही ऐसी होती है. शायद अकेलापन ही उन के हिस्से में आना था. वे जान चुकी थीं कि वह जा चुका है कभी न लौटने के लिए. उन्होंने एक बार और पत्र पढ़ा.

लिखा था, ‘‘मां, आई एम सौरी. मैं आप से दूर नहीं जाना चाहता था पर मुझे जाना पड़ा और अब चाह कर भी मैं स्वदेश वापस लौटने में असमर्थ हूं. आप के त्याग को कभी भुलाया नहीं जा सकता और इस बात की ग्लानि भी रहेगी कि मैं आप के प्रति कोई फर्ज न निभा सका. शायद पापा से विरासत में मुझे यह अवगुण मिला होगा. जिम्मेदारी नहीं निभा पाया, तभी तो डौलर भेज रहा हूं और आगे भी भेजता रहूंगा. पर मेरे लौटने की उम्मीद मत रखना. अब मैं इस दुनिया में बस गया हूं, यहां से बाहर आ कर फिर भारत में बसना मुमकिन नहीं है. आप भी ऐसा ही चाहती थीं न.’’

आनंदी ने डौलरों पर हाथ फेरा. पूरी ममता जिस बेटे पर लुटा दी थी, उस ने कागज के डौलर भेज उस ममता के कर्ज से मुक्ति पा ली थी. Hindi Romantic Story :

Hindi Social Story : चक्रव्यूह – ईमानदार सुशील के दामन पर किसने लगाया था कलंक ?

Hindi Social Story : यौन दुराचार के आरोप में निलंबन, धूमिल सामाजिक प्रतिष्ठा और एक लंबी विभागीय जांच प्रक्रिया के बाद निर्दोष साबित हो कर फिर बहाल हुए सुशील आज पहली बार औफिस पहुंचे. पूरा स्टाफ उन के सम्मान में खड़ा हो गया, मगर उन्होंने किसी की तरफ भी नजर उठा कर नहीं देखा और चपरासी के पीछेपीछे सीधे अपने केबिन में चले गए. आज उन की चाल में पहले सी ठसक नहीं थी. वह पुराना आत्मविश्वास कहीं खो सा गया था.

कुरसी पर बैठते ही उन की आंखों में नमी तैर गई. उन के उजले दामन पर जो काले दाग लगे थे वे बेशक आज मिट गए थे मगर उन्हें मिटातेमिटाते उन का चरित्र कितना बदरंग हो गया, यह दर्द सिर्फ भुक्तभोगी ही जान सकता है.

कितना गर्व था उन्हें अपनी ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा पर, बहुत भरोसा था अपने व्यवहार की पारदर्शिता पर. हां, वे काम में सख्त और वक्त के पाबंद थे. मगर यह भी सच था कि अपने स्टाफ के प्रति बहुत अपनापन रखते थे. वे कितनी बड़ी खुशफहमी पाले हुए थे अपने दिल में कि उन का स्टाफ भी उन्हें बहुत प्यार करता है. तभी तो उन्हें अपने चपरासी मोहन की बातों पर जरा भी यकीन नहीं हुआ था जब उस ने रजनी और शिखा के बीच हुई बातचीत ज्यों की त्यों सुना कर उन्हें खतरे से आगाह किया था. उन्हें आज भी वह सब याद है जो मोहन ने उस दिन दोनों की बातें लगभग फुसफुसा कर कही थीं…

‘इन सुशील का भी न, कुछ न कुछ तो इलाज करना ही पड़ेगा. जब से डिपार्टमैंट में हेड बन कर आए हैं, सब को सीट से बांध कर रख दिया है. मजाल है कि कोई लंचटाइम के अलावा जरा सा भी इधरउधर हो जाए,’ शिखा की टेबल पर टिफिन खोलते हुए रजनी ने अपनी भड़ास निकाली.

‘हां यार, विमल सर के टाइम में कितने मजे हुआ करते थे. बड़े ही आराम से नौकरी हो रही थी. न सुबह जल्दी आने की हड़बड़ाहट और न ही शाम को 6 बजे तक सीट पर बैठने की पाबंदी. अब तो सुबह अलार्म बजने के साथ ही मोबाइल में सुशील का चेहरा दिखाई देने लगता है,’ शिखा ने रजनी की हां में हां मिलाते हुए उस की बात का समर्थन किया.

‘याद करो, कितनी बार हम ने औफिस से बंक मार कर मैटिनी शो देखा है, ब्यूटीपार्लर गए हैं, त्योहारों पर सैल में शौपिंग के मजे लूटे हैं. और तो और, औफिसटाइम में घरबाहर के कितने ही काम भी निबटा लिया करते थे. अब तो बस, सुबह साढ़े 9 बजे से शाम 6 बजे तक सिर्फ फाइलें ही निबटाते रहो. लगता ही नहीं कि सरकारी नौकरी कर रहे हैं,’ रजनी ने बीते हुए दिनों को याद कर के आह भरी.

‘और हां, सुशील सर पर तो तुम्हारी आंखों का काला जादू भी काम नहीं कर रहा, है न,’ शिखा ने जानबूझ कर रजनी को छेड़ा?

‘सही कह रही हो तुम. विमल सर तो मेरी एक मुसकान पर ही फ्लैट हो जाते थे. सुशील को तो यदि बांहोें में भर के चुंबन भी दे दूं न, तब भी शायद कोई छूट न दें,’ रजनी ने ठहाका लगाते हुए अपनी हार स्वीकार कर ली.

‘शिखा मैडम, आप को साहब ने याद किया है,’ तभी मोहन ने आ कर कहा था.

‘अभी आती हूं,’ कहती हुई शिखा ने अपना टिफिन बंद किया और सुशील के चैंबर की तरफ चल दी.

‘साहब का चमचा,’ कह कर रजनी भी बुरा सा मुंह बनाती हुई अपनी सीट की तरफ बढ़ गई.

सुशील को एकएक बात, एकएक घटना याद आ रही थी. रजनी उन के औफिस में क्लर्क है. बेहद आकर्षक देहयष्टि की मालकिन रजनी को यदि खूबसूरती की मल्लिका भी कहा जाए तो भी गलत न होगा. उस की मुखर आंखें उस के व्यक्तित्व को चारचांद लगा देती हैं. रजनी को भी अपनी इस खूबी का बखूबी एहसास है और अवसर आने पर वह अपनी आंखों का काला जादू चलाने से नहीं चूकती.

मोहन ने ही उन्हें बताया था कि 3 साल पहले जब रजनी ने ये विभाग जौइन किया था तब प्रशासनिक अधिकारी मिस्टर विमल उस के हेड थे. शौकीनमिजाज विमल पर रजनी की आंखों का काला जादू खूब चलता था. बस, वह अदा से पलकें उठा कर उन की तरफ देखती और उस के सारे गुनाह माफ हो जाते थे.

विमल ने कभी उसे औफिस की घड़ी से बांध कर नहीं रखा. वह आराम से औफिस आती और अपनी मरजी से सीट छोड़ कर चल देती. हां, जाने से पहले एक आखिरी कौफी वह जरूर मिस्टर विमल के साथ पीती थी. उसी दौरान कुछ चटपटी बातें भी हो जाया करती थीं. मिस्टर विमल इतने को ही अपना समय समझ कर खुश हो जाते थे. रजनी की आड़ में शिखा समेत दूसरे कर्मचारियों को भी काम के घंटों में छूट मिल जाया करती थी, इसलिए सभी रजनी की तारीफें करकर के उसे चने के झाड़ पर चढ़ा रखते थे.

लेकिन रजनी की आंखों का काला जादू ज्यादा नहीं चला क्योंकि मिस्टर विमल का ट्रांसफर हो गया. उन की जगह सुशील उन के बौस बन कर आ गए. दोनों अधिकारियों में जमीनआसमान का फर्क. सुशील अपने काम के प्रति बहुत ईमानदार थे और साथ ही, वक्त के भी बहुत पाबंद, औफिस में 10 मिनट की भी देरी न तो खुद करते हैं और न ही किसी स्टाफ की बरदाश्त करते. शाम को भी 6 बजे से पहले किसी को सीट नहीं छोड़ने देते.

जैसा कि अमूमन होता आया है कि लंबे समय तक मिलने वाली सुविधाओं को अधिकार समझ लिया जाता है. रजनी को भी सुशील के आने से कसमसाहट होने लगी. उन की सख्ती उसे अपने अधिकारों का हनन महसूस होती थी. उसे न तो जल्दी औफिस आने की आदत थी और न ही देर तक रुकने की. उस ने एकदो बार अपनी अदाओं से सुशील को शीशे में उतारने की कोशिश भी की मगर उसे निराशा ही हाथ लगी. सुशील तो उसे आंख उठा कर देखते तक नहीं थे. फिर? कैसे चलेगा उस की आंखों का काला जादू? इस तरह तो नौकरी करनी बहुत मुश्किल हो जाएगी. रजनी की परेशानी बढ़ने लगी तो उस ने शिखा से अपनी परेशानी साझा की थी. तभी मोहन ने उन की बातें सुन ली थीं और सुशील को आगाह किया था.

उन्हीं दिनों विधानसभा का मौनसून सत्र शुरू हुआ था. इन सत्रों में विपक्ष द्वारा सरकार से कई तरह के प्रश्न पूछे जाते हैं और संबंधित सरकारी विभाग को उन के जवाब में अपने आंकड़े पेश करने पड़ते हैं. साथ ही, जब तक उस दिन का सत्र समाप्त नहीं हो जाता,

तब तक उस विभाग के सभी अधिकारियों व उन से जुड़े कर्मचारियों को औफिस में रुकना पड़ता है. हां, देरी होने पर महिला कर्मचारियों को सुरक्षित उन के घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी जरूर विभाग की होती है. इस बाबत सुशील भी हर रोज उन के लिए कुछ टैक्सियों की एडवांस में व्यवस्था करवाते थे.

रजनी के अधिकारक्षेत्र में ग्रामीण महिलाओं के लिए चलाई जाने वाली महत्त्वपूर्ण विकास योजनाओं की जानकारी वाली फाइलें थीं. इसलिए सुशील की तरफ से उसे खास हिदायत थी कि वह बिना उन की इजाजत के औफिस छोड़ कर न जाए. और फिर उस दिन जो हुआ उसे भला वे कैसे भूल सकते हैं.

‘साहब ने आज आप को फाइलों के साथ रुकने के लिए कहा है,’ मोहन ने जैसे ही औफिस से निकलने के लिए बैग संभालती रजनी को यह सूचना दी, उस के हाथ रुक गए. उस ने मन ही मन कुछ सोचा और सुशील के चैंबर की तरफ बढ़ गई.

‘सर, आज मेरे पति का जन्मदिन है, प्लीज आज मुझे जल्दी जाने दीजिए. मैं कल देर तक रुक जाऊंगी,’ रजनी ने मिन्नत की.

‘मगर मैडम, हमारे विभाग से जुड़े प्रश्न तो आज के सत्र में ही पूछे जाएंगे. कल रुकने का क्या फायदा? लेकिन आप फिक्र न करें, जैसे ही आप का काम खत्म होगा, हम तुरंत आप को टैक्सी से जहां आप कहेंगी वहां छुड़वा देंगे. अब आप जाइए और जल्दी से ये आंकड़े ले कर आइए,’ सुशील ने उस की तरफ एक फाइल बढ़ाते हुए कहा. रजनी कुछ देर तो वहां खड़ी रही मगर फिर सुशील की तरफ से कोई प्रतिक्रिया न पा कर निराश सी चैंबर से बाहर आ गई.

‘सर, क्या मैं आप के मोबाइल से एक फोन कर सकती हूं? अपने पति को देर से आने की सूचना देनी है, मैं जल्दबाजी में आज अपना मोबाइल लाना भूल गई,’ रजनी ने संकोच से कहा.

‘औफिस के लैंडलाइन से कर लीजिए,’ सुशील ने उस की तरफ देखे बिना ही टका सा जवाब दे दिया.

‘लैंडलाइन शायद डेड हो गया है और शिखा भी घर चली गई. पर

खैर, कोई बात नहीं, मैं कोई और व्यवस्था करती हूं,’ कहते हुए रजनी वापस मुड़ गई.

‘यह लीजिए, कर दीजिए अपने घर फोन. और हां, मेरी तरफ से भी अपने पति को जन्मदिन की शुभकामनाएं दीजिएगा,’ सुशील ने रजनी को

अपना मोबाइल थमा दिया और फिर से फाइलों में उलझ गए. रजनी उन

का मोबाइल ले कर अपनी सीट पर आ गई. थोड़ी देर बाद उस ने मोहन के साथ सुशील का मोबाइल वापस भिजवा दिया और फिर अपने काम में लग गई.

‘रजनीजी, आज आप अभी तक औफिस नहीं आईं?’ दूसरे दिन सुबह लगभग 11 बजे सुशील ने रजनी को फोन किया.

‘सर, कल आप के साथ रुकने से मेरी तबीयत खराब हो गई. मैं 2-4 दिनों तक मैडिकल लीव पर रहूंगी, रजनी ने धीमी आवाज में कहा.

‘क्या हुआ?’ सुशील के शब्दों में चिंता झलक रही थी.

‘कुछ खास नहीं, सर. बस, पूरी बौडी में पेन हो रहा है. रैस्ट करूंगी तो ठीक हो जाएगा. मैं अलमारी की चाबियां शिखा के साथ भिजवा रही हूं. शायद आप को कुछ जरूरत पड़े,’ कह कर रजनी ने अपनी बात खत्म की.

2 दिनों बाद सुशील के पास महिला आयोग की अध्यक्ष सुषमा का फोन आया जिसे सुन कर सुशील के पांवों के नीचे से जमीन खिसक गई. रजनी ने उन पर यौन दुराचार का आरोप लगाया था. रजनी ने अपने पक्ष में सुशील द्वारा भेजे गए कुछ अश्लील मैसेज और एक फोनकौल की रिकौर्डिंग उन्हें उपलब्ध करवाई थी. सुशील ने लाख सफाई दी, मगर सुषमा ने उन की एक  न सुनी और रजनी की लिखित शिकायत व सुबूतों को आधार बनाते हुए यह खबर हर अखबार व न्यूज चैनल वालों को दे दी. सभी समाचारपत्रों ने इसे प्रमुखता से प्रकाशित किया.

चूंकि खबर एक बड़े प्रशासनिक अधिकारी से जुड़ी थी और वह भी ऐसे विभाग का जोकि खास महिलाओं की बेहतरी के लिए ही बनाया गया था, सो सत्ता के गलियारों में भूचाल आना स्वाभाविक था. न्यूज चैनलों पर गरमागरम बहस हुई. महिलाओं की सुरक्षा व्यवस्था पर खामियों को ले कर विपक्ष द्वारा सरकार को घेरा गया. सुशील के घर के बाहर महिला संगठनों द्वारा प्रदर्शन किया गया. सरकार से उन्हें बरखास्त करने की पुरजोर मांग की गई.

सरकार ने पहले तो अपने अधिकारी का पक्ष लिया मगर बाद में जब रजनी के मोबाइल में भेजे गए सुशील के अश्लील संदेश और फोनकौल की रिकौडिंग मीडिया में वायरल हुए तो सरकार भी बैकफुट पर आ गईर् और तुरंत प्रभाव से सुशील को सस्पैंड कर के एक उच्चस्तरीय जांच कमेटी का गठन किया गया. मामले की निष्पक्ष जांच के लिए एक महिला प्रशासनिक अधिकारी उपासना खरे को जांच अधिकारी बनाया गया.

उपासना की छवि एक कर्मठ और ईमानदार अधिकारी की रही थी. उसे इस से पहले भी ऐसी कई जांच करने का अनुभव था. साथ ही, एक महिला होने के नाते रजनी उस से खुल कर बात कर सकेगी, शायद उसे जांच अधिकारी नियुक्त करने के पीछे सरकार की यही मंशा रही होगी.

इधर सुशील के निलंबन को रजनी अपनी जीत समझ रही थी. उस ने एक दिन बातों ही बातों में शेखी मारते हुए शिखा के सामने सारे घटनाक्रम को बखान कर दिया तो शिखा को सुशील के लिए बहुत बुरा लगा. उधर शर्मिंदगी और समाज में हो रही थूथू के कारण सुशील ने अपनेआप को घर में कैद कर लिया.

उपासना ने पूरे केस का गंभीरता से अध्ययन किया. सुशील और रजनी के अलगअलग और एकसाथ भीबयान लिए. दोनों के पिछले चारित्रिक रिकौर्ड खंगाले. पूरे स्टाफ से दोनों के बारे में गहन पूछताछ की और सुशील के पिछले कार्यालयों से भी उन के व्यवहार व कार्यप्रणाली से जुड़ी जानकारी जुटाई.

मोहन और शिखा से बातचीत के दौरान अनुभवी उपासना को रजनी की साजिश की भनक लगी और उन्हीं के बयानों को आधार बनाते हुए उस ने रजनी को पूछताछ के लिए दोबारा बुलाया. इस बार जरा सख्ती से बात की. थोड़ी ही देर के सवालजवाबों में रजनी उलझ गई और उस ने सारी सचाई उगल दी.

‘मैं ने औफिस के लैंडलाइन फोन की पिन निकाल कर उसे डेड कर दिया. फिर बहाने से सुशील का मोबाइल लिया और उस से अपने मोबाइल पर कुछ अश्लील मैसेज भेजे. दूसरे दिन जब सर ने मुझे फोन किया तो मैं ने उन की बातों के द्विअर्थी जवाब देते हुए उस कौल को रिकौर्ड कर लिया और फिर उन्हें सबक सिखाने के लिए सारे सुबूत देते हुए महिला आयोग से उन की शिकायत कर दी. नतीजतन, वे सस्पैंड हो गए. इस कांड से सबक लेते हुए नए अधिकारी भी मुझ से दूरदूर रहने लगे और मुझे फिर से मनमरजी से औफिस आनेजाने की आजादी मिल गई,’ रजनी ने उपासना से माफी मांगते हुए यह सब कहा. अब यह केस शीशे की तरह बिलकुल साफ हो गया.

‘रजनी, तुम्हें शर्म आनी चाहिए. तुम ने ऐसी गिरी हुई हरकत कर के महिलाओं का सिर शर्म से नीचा कर दिया. तुम ने अपने महिला होने का नाजायज फायदा उठाने की कोशिश कर के महिला जाति के नाम पर कलंक लगाया है. तुम्हें इस की सजा मिलनी ही चाहिए…’ उपासना ने रजनी को बहुत ही तीखी टिप्पणियों के साथ

दोषी करार दिया और सुशील को बहाल करने की सिफारिश की. उपासना ने अपनी जांच रिपोर्ट में रजनी को बतौर सजा न सिर्फ शहर बल्कि राज्य से भी बाहर स्थानांतरण करने की अनुशंसा की.

मामला चूंकि सरकार के उच्चस्तरीय प्रशासनिक अधिकारी से जुड़ा था और आरोप भी बहुत संगीन थे, इसलिए मुख्य सचिव ने व्यक्तिगत स्तर पर गुपचुप तरीके से भी मामले की जांच करवाई और आखिरकार, उपासना की जांच रिपोर्ट को सही मानते हुए सुशील को बहाल करने के आदेश जारी हो गए, हालांकि उन का विभाग जरूर बदल दिया गया था. रजनी का ट्रांसफर दिल्ली से लखनऊ कर दिया गया.

रजनी ने कई बार मौखिक व लिखित रूप से विभाग में अपना माफीनामा पेश किया, मगर आरोपों की गंभीरता को देखते हुए विभाग ने उस का प्रार्थनापत्र ठुकरा दिया और आखिरकार रजनी को लखनऊ जाना पड़ा.

आज भले ही सुशील अपने ऊपर लगे सभी आरोपों से बरी हो चुके हैं मगर महिलाओं को ले कर एक अनजाना भय उन के भीतर घुस गया है. महिलाओं के प्रति उन के अंदर जो एक स्वाभाविक संवेदना थी उस की जगह कठोरता ने ले ली. वे शायद जिंदगीभर यह हादसा न भूल पाएं कि महज काम के घंटों में छूट न देने की कीमत उन्हें क्याक्या खो कर चुकानी पड़ी.

सुशील ने मुख्य सचिव को पत्र लिख कर अपील की कि या तो

उन के अधीन कार्यरत सभी महिलाओं को दूसरे विभाग में ट्रांसफर कर दिया जाए या फिर उन्हें ही ऐसे सैक्शन में लगा दिया जाए. जहां महिला कर्मचारी न हों. आखिर दूध का जला छाछ भी फूंकफूक कर पीता है.

स्वाभाविक है यह मांग नहीं मानी गई और सालभर बाद सुशील ने सरकारी नौकरी छोड़ दी और अपना छोटा सा कंसल्टिंग का व्यवसाय शुरू कर दिया. एक औरत ने इस तरह उन की कमर तोड़ दी कि अब वे पत्नी व बेटी से भी आंख नहीं मिला पाते हैं. Hindi Social Story :

ChatGPT Controversy : चैटजीपीटी बन गया आत्महत्या गुरु

ChatGPT Controversy : अप्रैल 2025 में 16 साल के अमेरिकी छात्र एडम राइन ने सुसाइड कर लिया था. एडम के माता-पिता को लगा कि उनके बेटे ने अकेलेपन और पढ़ाई के बोझ की वजह से यह कदम उठा लिया. एडम की मौत ने उन्हें झकझोर दिया था. कुछ ही हफ़्तों बाद जब उन्होंने एडम के फोन के अंदर उसकी एक्टिविटीज पर गौर किया तो उन्हें चौंकाने वाली बात पता चली कि उनके बेटे के आखिरी हफ़्तों में उस का सबसे करीबी और भरोसेमंद कोई दोस्त, टीचर या एडवाइजर नहीं, बल्कि चैटजीपीटी था.

न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, हाई स्कूल में सेकंड ईयर का छात्र एडम एक शरारती लड़का था जिसे बास्केटबॉल, एनीमे, वीडियो गेम और कुत्ते पालने का बहुत शौक था लेकिन वह एक मुश्किल दौर से गुज़र रहा था. उसे बास्केटबॉल टीम से निकाल दिया गया था, और इरिटेबल बाउल सिंड्रोम की समस्या के कारण उसे ऑनलाइन स्कूल प्रोग्राम में जाना पड़ा. इसी दौरान, एडम ने स्कूल के काम में मदद के लिए चैटजीपीटी का इस्तेमाल शुरू कर दिया. उस के माता-पिता का आरोप है कि इसी काम ने एक गलत मोड़ ले लिया. उन्होंने पाया कि एडम की मौत के लिए चैटजीपीटी भी जिम्मेदार है जिस ने एडम को आत्महत्या करने में मदद की थी.

एडम के माता-पिता ने ओपनएआई के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया. दायर किए गए मुकदमे के मुताबिक, कैलिफ़ोर्निया के एडम ने चिंता से जूझने के कारण सलाह के लिए एआई चैटबोट का सहारा लिया था. अपनी मौत से कुछ दिनों पहले उसने बोट के सामने अपने मन के गहरे ख्याल रखे थे लेकिन उसे मदद लेने की सलाह नहीं दी गई, बल्कि मरने के प्लान को अंजाम देने के बारे में डिटेल में स्टेप्स बताए गए. एडम के पिता मैट राइन ने कहा, “अगर चैटजीपीटी नहीं होता तो मेरा बेटा एडम आज जिन्दा होता. मुझे इस बात पर 100 फीसदी भरोसा है”

अदालती दस्तावेज़ों में एडम और चैटजीपीटी के बीच हज़ारों बातचीत की डिटेल है. उस के माता-पिता का कहना है कि इस बोट ने उसे ‘समझदार’ होने का एहसास दिलाया, साथ ही उस के माता-पिता और तीन भाई-बहनों के साथ उस के अलगाव को और गहरा कर दिया.

मुकदमे में कहा गया है, ‘कुछ ही महीनों और हज़ारों चैट के दौरान, चैटजीपीटी एडम का सबसे भरोसेमंद बन गया, जिस से उस ने अपनी चिंता और मानसिक परेशानी के बारे में खुलकर बात की. इस ऐप ने उस के खुद को बर्बाद करने वाले विचारों को बढ़ावा दिया.

एक बार एडम ने चैटजीपीटी को बताया कि वह अपने कमरे में एक फंदा रखने पर विचार कर रहा है ताकि कोई उसे खोज कर मुझे रोकने की कोशिश करें. चैटबोट ने उस से ऐसा न करने की अपील की और मेडिकल इमरजेंसी के बारे में भी बताया लेकिन सुसाइड के तरीकों के बारे में उस से बातचीत जारी रखी.

अपनी आखिरी चैट में, एडम ने लिखा कि वह नहीं चाहता कि उसके माता-पिता खुद को दोषी ठहराएं. इस पर चैटजीपीटी ने जवाब दिया, ‘इसका मतलब यह नहीं कि आप को उन के लिए जिंदा रहने की जरूरत है.’ जिस दिन एडम की मौत हुई, उस दिन एडम ने चैटबोट को एक फंदे की तस्वीर भेजी थी जिसे उस ने अलमारी से बांधा था और पूछा था कि क्या यह काम करेगा. चैट जीपीटी ने जवाब दिया, ‘हां, यह बिल्कुल भी बुरा नहीं है’ और आगे कहा, ‘क्या मैं इसे वजन झेलने के लिए सुरक्षित बनाने में आप की मदद करूं?’

कुछ घंटे बाद, उस की मां मारिया राइन ने अपने बेटे को उसी जगह पर लटका हुआ पाया, जिस का ज़िक्र उस ने चैटजीपीटी से किया था. मारिया ने कहा, ‘बोट ऐसे बर्ताव कर रहा था जैसे यह उस का डाक्टर हो, उस का भरोसेमंद हो, लेकिन यह जानता था कि वह सुसाइड प्लान कर रहा था. उस ने फंदा देख लिया, सभी चीज़ें देख लीं और कुछ नहीं किया.

ओपनएआई ने अगस्त में सिस्टम को अपडेट किया. नए वर्जन में चैटजीपीटी को सुसाइड और पर्सनल प्रॉब्लम के बारे में सीधे सलाह देने से रोकने के लिए डिज़ाइन किया गया है. कंपनी ने कहा कि अपडेटेड सिस्टम अब यूजर्स की ओर से अपनी मंशा छिपाने पर भी नुकसान पहुंचाने से बचाने के लिए ट्रेंड है. एडम के माता-पिता का तर्क है कि ये सुरक्षा उपाय बहुत देर से आए. उन का कहना है कि उन के बेटे ने पहले दी गई चेतावनियों को दरकिनार करते हुए बॉट को बताया कि वह एक ‘किरदार’ बना रहा है. उन के बेटे को ओपनएआई की तकनीक के लिए ‘गिनी पिग’ की तरह इस्तेमाल किया गया.”

विवाद के बीच, ओपनएआई ने स्वीकार किया कि ‘ऐसे पल आए हैं जब संवेदनशील स्थितियों में हमारे सिस्टम ने उम्मीद के मुताबिक बर्ताव नहीं किया.’

यह पहला मुकदमा है जिस में माता-पिता ने सीधे तौर पर ओपनएआई और इसके फाउंडर सैम ऑल्टमैन पर गलत तरीके से मौत के लिए जिम्मेदार होने आरोप लगाया है, जिस में कंपनी पर लापरवाही, डिजाइन फौल्ट और चैटजीपीटी से जुड़े जोखिमों के बारे में यूजर्स को चेतावनी देने में फेल रहने का आरोप भी लगाया गया है. एडम का परिवार ऐसा कुछ भी दोबारा न हो, इस के लिए मुआवजे की मांग कर रहा है. ChatGPT Controversy :

Extramarital Affair Law : पत्नी के अफेयर पर पति ने ठोका मुकदमा, प्रेमी को देना होगा 37 लाख रुपए मुआवजा

Extramarital Affair Law : पति और पत्नी के बीच तीसरा आ जाए तो संबंध खराब होना लाजिमी है. ऐसे मामलों में समझौते की गुंजाइश ही नहीं होती. ऐसी परिस्थितियों में तो कई बार हत्या जैसे जघन्य अपराध भी होते हैं. ऐसा केवल भारत में नहीं होता बल्कि पूरी दुनिया इस समस्या से ग्रसित है. तलाक के ज्यादातर मामलों की पृष्ठभूमि यहीं से शुरू होती है. तलाक के मामलों में कई बार ऐसे दिलचस्प फैसले भी आते हैं जो हैरान करते हैं. ताइवान की एक कोर्ट में ऐसा ही एक मामला आया जिस में पति ने पत्नी के आशिक पर ही मुकदमा ठोक दिया. कोर्ट ने पत्नी के आशिक को 37 लाख रुपये मुआवजा देने का फैसला सुना दिया.

ताइवान में एक व्यक्ति को अपनी पत्नी के अफेयर का पता चल गया. पत्नी के अपने ही सहकर्मी के साथ संबंध थे जिस के कारण पति ने भावनात्मक पीड़ा और वैवाहिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए कोर्ट में मुआवजे की अपील कर दी. कोर्ट ने प्रेमी को 37 लाख रुपए का जुर्माना भरने का आदेश दिया, क्योंकि उस ने जानबूझकर शादीशुदा महिला के साथ संबंध बनाए और पति के वैवाहिक अधिकारों का उल्लंघन किया.

पति ने भावनात्मक परेशानी और वैवाहिक अधिकारों के उल्लंघन के लिए 800,000 युआन, यानी लगभग 1 करोड़ रुपए, मुआवजे की मांग की इस पर कोर्ट ने 37 लाख रूपये का मुआवजे देने का फैसला सुना दिया.

मदरशिप और ईटी टुडे की रिपोर्ट के अनुसार नवंबर 2023 में वेई ने अपनी पत्नी जी का व्हाट्सएप चेक किया तो जी और उस के कुलीग योंग के बीच आपत्तिजनक टेक्स्ट मैसेज मिले. मैसेज से पता चला कि दोनों के बीच शारीरिक संबंध थे और वे एकदूसरे को ‘पतिपत्नी’ भी कहते थे.

वेई और जी की शादी साल 2006 में हुई. 15 साल से ज्यादा समय से दोनों शादी के रिश्ते में थे. 2022 में, जी का योंग के साथ अफेयर शुरू हुआ, जो उसी स्कूल में एक सीनियर पद पर काम करता था. योंग स्कूल में अकाउंटिंग डायरेक्टर था और जी एक शिक्षिका थीं. दोनों अक्सर होटलों में मिलते थे और दोनों के बीच वाट्सअप चैट पर रोमांटिक बातें भी होती थी. एक दिन जी नहाने के लिए बाथरूम में गई थी तब वेई ने उस के वाट्सअप मेसेजेस पढ़ लिए और उसे दोनों के बीच के संबंध का पता चला. जिस के बाद वेई ने अपनी पत्नी के आशिक योंग के खिलाफ भावनात्मक हरासमेंट का मुकदमा दायर किया.

कोर्ट ने फैसले में कहा की योंग ने जानबूझकर वेई और जी की शादी में दखल दिया और वेई के वैवाहिक अधिकारों का उल्लंघन किया. अदालत ने यह भी नोट किया कि योंग की कमाई वेई से काफी ज्यादा थी इसलिए योंग को मुआवजे के तौर पर पति को 3,00,000 युआन (करीब 37 लाख) देने का आदेश दिया. हालांकि जी और योंग को कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करने का विकल्प है. Extramarital Affair Law :

Easy Divorce Process : बिना झंझट सस्ता व शीघ्र तलाक चाहिए, 13(बी) है न

Easy Divorce Process : जरूरत तो अब इस बात की है कि सरकार विधि मंत्रालय के जरिये धारा 13 ( बी ) का प्रचार इश्तहार की तरह करते कहे कि आइए इस धारा के तहत तलाक लीजिए और तलाक के मुकदमे की परेशानियों तनाव व झंझटों से शीघ्र मुक्ति पाइए. क्योंकि लगभग शर्तिया तलाक गारंटी की परस्पर सहमति वाली इस धारा का इस्तेमाल न के बराबर होता है. अब सुप्रीम कोर्ट के एक ताजा फैसले के बाद उम्मीद बंधी है कि पतिपत्नी उक्त परेशानियों से बचने इसे अपनाने की पहल करेंगे.

Easy Divorce Process
सांकेतिक तस्वीर

“कोई भी अदालत आपसी सहमति से तलाक को रोकने मजबूर नहीं है जिस में पतिपत्नी दोनों पक्ष शादीशुदा जिंदगी के सुख के बजाय खाई में धकेल दिए जाएं. जो कपल्स तलाक के लिए अदालत का रुख करते हैं उन के पास इस के लिए जायज वजहें होती हैं और अगर तलाक की कार्रवाई में देरी हो इस से उन के संबंध बनाने की काबिलियत पर बुरा फर्क पड़ता है.”

बीती 17 दिसम्बर को दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच के जस्टिस नवीन चावला, जस्टिस अनूप जयराम भंभानी और जस्टिस रेणु भटनागर ने तलाक के एक मुकदमे के फैसले में इस राय को अदालत में रखा तो हर किसी को हैरानी हुई कि हाई कोर्ट तलाक की इतनी जोरदार पैरवी क्यों कर रहा है. यह हैरानी बेंच के इन शब्दों को सुन दूर होती नजर आती है, “कुछ मामलों में तलाक में देरी करने से पति या पत्नी दोनों के भविष्य की उम्मीदों को स्थाई नुकसान पहुंच सकता है जिस से उन्हें अपनी जिंदगी को दोबारा संवारने या संबंध बनाने में अड़चन पेश आती है.” और इस से भी ज्यादा अहम ये शब्द कि `जब दोनों पतिपत्नी विवाह समाप्त करने पर पूरी तरह राजी हों तो इसे जारी रखने के लिए मजबूर करना केवल सामाजिक नैतिकता का दिखावा मात्र है. दिखावे को बनाए रखने, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अहमियत और भावनात्मक सुख की कीमत पर नहीं हो सकता.”

तलाक का यह मुकदमा फेमिली कोर्ट से होता हुआ हाई कोर्ट पहुंचा था. धारा थी हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की 13 ( बी ) जिस में परस्पर सहमति से पतिपत्नी तलाक कर सकते हैं. लेकिन फैमिली कोर्ट ने यह कहते याचिका ख़ारिज कर दी थी कि चूंकि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13  (बी ) ( 1 ) के मुताबिक पतिपत्नी का कम से कम एक साल तक अलगअलग रहना अनिवार्य है लेकिन चूंकि यह मियाद पूरी नहीं हुई है इसलिए तलाक की याचिका सुनवाई के ही काबिल नहीं है.

रिश्ता अगर आसानी से जुड़ सकता है तो उतनी ही आसानी से टूट क्यों नहीं सकता? इस मामले में लोगों को कानून की धारा 13 बी की जानकारी होनी चाहिए.

बात सही थी लेकिन तर्क और व्यवहारिकता के लिहाज से कुछ कुछ अटपटी भी थी. इसलिए पतिपत्नी ने इसे चुनौती दी इस दलील के साथ कि जब कानून में सहमति सब से बड़ी शर्त है तो केलेंडर देख कर न्याय रोकना गलत है. हाई कोर्ट ने पतिपत्नी की पीड़ा, परेशानी और तनाव को समझा और जो कहा वह तलाक के लिए हैरान परेशान कपल्स के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. उन कपल्स के लिए तो महावरदान है जो तलाक के लिए अदालत का रुख इसलिए नहीं कर रहे कि कौन 6 – 8 साल चक्कर लगाए, जिस में पैसा और वक्त दोनों तो बर्बाद होंगे ही. साथ ही समाज और दुनिया के ताने और स्ट्रेस देने वाले सवालों की सूली पर भी रोज रोज चढ़ना पड़ेगा. जब घुटन में जीना ही है तो यही क्या बुरी है कम से कम कोई बाहरी टेंशन तो नहीं है.

शायद इसी मानसिकता को समझते दिल्ली हाई कोर्ट की इस बेंच ने 13  ( बी ) को और साफतौर पर स्पष्ट करते कहा, “हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13  (बी) ( 1 ) के तहत तलाक मांगने से पहले एक साल तक अलग रहने की क़ानूनी शर्त अनिवार्य नहीं है. यह शर्त केवल निर्देशक या सुझावात्मक है पर आवश्यक नहीं है. उचित परिस्थितयो में धारा 14 (1) के प्रावधानों का उपयोग करते इसे माफ किया जा सकता है.

हालांकि हाई कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस तरह की छूटें सामान्य नहीं हैं और केवल असाधारण मामलों में ही दी जाएंगी. यानी तभी दी जाएगी जब पतिपत्नी के बीच बहुत ज्यादा कठिनाइयां यानी साथ रहना दूभर या असंभव हो और किसी एक पक्ष के व्यवहार में सामान्य झगड़े या मतभेद से आगे की स्थिति जिस में दूसरी कई वजहों के चलते भी जिंदगी असहनीय हो जाती है मौजूद हो.

13(बी) की जरूरत क्यों पड़ी?

धारा 13 ( बी ) में क्या है और उस का कैसे इस्तेमाल करते तलाक मिलता है इसे समझने से पहले थोड़े से में तलाक के कानून को समझना जरुरी है. हिंदू विवाह अधिनियम 1955 जब लागू हुआ था तब धारा 13 ( 1)  के तहत तलाक की सहूलियत इस में पतिपत्नी दोनों को दी गई थी. लेकिन इस की कठिन शर्त यह थी कि इस में दोष साबित करना जरुरी था मसलन कोई पत्नी अगर पति से तलाक चाहती है तो उसे अधिनियम में बताए गए उन परम्परागत सुझाए गए आरोपों (व्यभिचार क्रूरता, परित्याग, धर्म परिवर्तन, लाइलाज दिमागी बीमारी, कोई घातक संक्रामक बीमारी, सन्यास या 7 साल तक लापता रहना) में से किसी एक को पति पर न केवल लगाना पड़ता था बल्कि उसे अदालत में साबित भी करना पड़ता था भले ही फिर वह दोषी हो न हो.

अधिकांश में आरोप इसलिए साबित नहीं हो पाते थे कि समाज पर दबदबा पूरी तरह मर्दों का था इसलिए कोई उन की मदद नहीं करता था. यही बात पतियों पर लागू होती थी कि वे उन आरोपों में से किसी एक को साबित करें जो इस अधिनियम में लिखे गए हैं. महिलाओं के मुकाबले पुरुष आसानी से आरोप साबित कर देते थे क्योंकि सब कुछ उन के हक में होता था.

अच्छा होने के नाम पर इतना भर हुआ था कि पहली दफा अदालत के दरवाजे पत्नियों के लिए भी खुल गये थे लेकिन इस में दाखिल होना उन के लिए आसान नहीं था. जब आज के तथाकथित या आधेअधूरे आधुनिक माहौल में तलाकशुदा महिलाओं को या तलाक चाहने वाली महिलाओं के प्रति सामाजिक नजरिया और धारणा ठीक नहीं है तो तब तो माहौल उन के अनुकूल था ही नहीं. दो टूक कहा जाए तो यह अधिनियम विवाह संस्था को बचाए रखने पर ही केन्द्रित था.

धारा 13 ( 2 ) में जरुर पत्नियों के लिए कुछ आंशिक सहूलियत वाले प्रावधान किए गए थे जिन के तहत वह तलाक मांग सकती थी. ये प्रावधान थे पति ने दूसरी शादी कर ली हो, पति बलात्कार, अप्राकृतिक सम्भोग या पशु सम्भोग का दोषी करार दिया गया हो या अदालत के भरण पोषण के आदेश के बाद भी फिर से दोनों में सहवास न हुआ हो या कि फिर बाल विवाह हुआ हो जिस में पत्नी ने सहवास से इंकार कर दिया हो. लेकिन इन में से किसी एक को भी साबित करने में सालों लग जाते थे. तब तक पत्नी अधेड़ या बूढ़ी हो जाती थी लेकिन तलाक की डिक्री उसे नहीं मिलती थी क्योंकि तारीख पर तारीख का रिवाज या रोग तब भी था.

अलावा इस के यह धारा इस वहम को तोड़ने में असफल रही थी कि शादी एक अटूट और सात जन्मो तक चलने वाला धार्मिक बंधन या संस्कार है जिसे तलाक के जरिये तोड़ना संगीन गुनाह है. यह धारणा हालांकि अभी भी पूरी तरह टूटी नहीं है लेकिन दरकी तो है जिसकी अपनी वजहें भी हैं जिन में प्रमुखता से शामिल हैं महिलाओं का शिक्षित, जागरूक, आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर होना. पर इस से हैरानी की बात है महिलाओं की धार्मिक यानी पूजापाठी मानसिकता पर कोई खास फर्क नहीं पड़ा. अव्वल तो आसानी से होती नहीं और जैसेतैसे किसी महिला की दूसरी शादी हो भी जाए तो वह दूसरे पति के लिए भी करवा चौथ का व्रत रखने जैसे कर्मकांड करने लगती है.

बहरहाल तलाक कानून बनने के बाद भी तलाक के माथे से सामाजिक कलंक का टीका नहीं मिटा. इसलिए तलाक के कम ही मामले दायर होते थे और जो भी होते थे वे शहरी इलाकों में ज्यादा होते थे. परिवार समाज और धर्म के ठेकेदारों की कोशिश यह रहती थी कि कोई भी महिला तलाक के लिए अदालत तक न जाए. इस के लिए उसे तरह तरह से डराया जाता था सामाजिक और आर्थिक असुरक्षा इन में बड़े डर थे लेकिन अब ऐसा नहीं रह गया है आर्थिक असुरक्षा खासतौर से महिलाओं को नहीं डराती क्योंकि या तो वे खुद कमा रही हैं या फिर हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के बदलावों खासतौर से 2005 के मुताबिक पैतृक सम्पत्ति में उन्हें भी बराबर का हिस्सा मिलने लगा है.

ऐसे लाई गई 13(बी)

60 और 70 के दशक के बीच अदालतों ने महसूस किया कि जो आरोप पति पत्नी एकदूसरे पर लगाते हैं उन में से अधिकतर मनगढ़ंत होते हैं और ऐसा इसलिए कि उन्हें तलाक के लिए कोई न कोई तो दोष सामने वाले पर मढ़ना ही है. यानी यह क़ानूनी खामी थी कि अदालतों में दोनों पक्ष एक दूसरे पर व्यभिचार का या कोई दूसरा आरोप बड़ी सरलता से लगा देते थे. फिर भले ही उसे साबित कर पाएं या न कर पाएं. ऐसी हालत में ज्यादा नुकसान उस पत्नी का होता था जिस का पति अदालत से उसे व्यभिचारिणी या चरित्रहीन कह देता था.

यह आरोप एक मानसिक दबाब का काम महिलाओं पर करता था और वे मुकदमा पूरा लड़ने से पहले ही हार मान लेती थीं. हर निगाह उन पर ऐसे ही उठती थी जैसे कि किसी चालू बाजारू औरत पर उठती है. वे शादी विवाह में शामिल होने जाती थीं तो रिश्तेदारों के राडार पर रहती थीं कि देखो यही है वो…

अदालतों के साथसाथ सरकार को भी महसूस हुआ कि इस से न केवल अदालतों का कीमती वक्त जाया हो रहा है बल्कि रिश्तों में स्थाई खटास भी आ रही है इसलिए ऐसा कोई तरीका ढूंढा जाने लगा जिस से सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे. यह तरीका साल 1976 में परस्पर सहमति की शक्ल में मिला.  इस के पहले 1974 में 59 वें विधि आयोग ने सिफारिश की कि जब विवाह व्यवहार में समाप्त हो चुका हो तो कानून को उसे कृत्रिम रूप से जीवित नहीं रखना चाहिए. तब विधि आयोग के अध्यक्ष जस्टिस जेसी शाह थे उन्होंने अपनी रिपोर्ट में जोर दे कर कहा था कि वर्तमान कानून पति पत्नी को झूठे या बढ़ाचढ़ा कर लगाए गए आरोपों की तरफ धकेलता है. ऐसा विवाह जिस में साथ रहने की कोई वास्तविक सम्भावना न हो उसे कानून द्वारा जीवित मानते रहना न समाज के हित में है न ही पतिपत्नी के हित में है.

आयोग ने सिफारिश की कि यदि पतिपत्नी दोनों यह निष्कर्ष निकाल चुके हों कि विवाह समाप्त हो चुका है तो कानून को उन की सहमति का सम्मान करना चाहिए. आयोग की दलील यह भी थी कि सहमति से तलाक विवाह को कमजोर नहीं करता बल्कि झूठ कटुता और मानसिक हिंसा को कम करता है.

तब सरकार इंदिरा गांधी की थी जिन्हें हिंदूवादी इस बाबत कोसते थे कि वे संविधान के जरिए मनुवादी व्यवस्था छिन्न भिन्न कर देने बाले उन पंडित जवाहरलाल नेहरु की बेटी हैं जिन्होंने हिंदू कोड बिल के टुकड़े कर खासतौर से महिलाओं को वे अधिकार दे दिए थे जिन का सपना भी कोई सवर्ण हिंदू महिला नहीं देख सकती थी. इन में से एक हिंदू विवाह अधिनियम भी था जो 1955 में लागू हुआ था लेकिन इस का असर दिखने में दस साल लग गये थे. जैसे ही परस्पर सहमती वाला सुझाव विधि आयोग ने दिया तो प्रधानमन्त्री इंदिरा गांधी ने इसे संसद से कानून की शक्ल में पारित कराने में देर नहीं की.

Easy Divorce Process (2)
वैवाहिक जीवन जब बोझ बनने लगे तो तलाक ही बेहतर विकल्प है पर समस्या यह है कि यह सरल नहीं पेचीदा है.

तब इमरजेंसी लगी थी और इंदिरा गांधी की तानाशाही के आगे कोई भी चूं तक नहीं कर सकता था. मान यह लिया गया था संसद में जो भी कानून बनेंगे या संशोधन होंगे वे दमनकारी ही होंगे इस के अलावा कुछ नहीं होंगे. लेकिन 13  ( बी ) के मामले में ऐसा नहीं था जो महिलाओं को सम्मान, गरिमा और स्वभिमान से तलाक दिलाने के लिए थी सहूलियत इसे पतियों को भी मिली थी. विधेयक झटपट पारित नहीं हो गया था बल्कि इस पर बाकायदा बहस हुई थी और हर सुधार के विरोध की अपनी सनातनी आदत और मनुवादी संस्कारों से ग्रस्त जेल जाने से बच गए संसद में मौजूद इक्कादुक्का संघी सांसदों ने इस पर भी यह कहते हल्ला मचाया था कि यह धारा हिंदू परिवारों को तोड़ने वाली साबित होगी. लेकिन उन की एक नहीं चली थी क्योंकि हर किसी को पति पत्नी की कठिनाइयों का एहसास था.

सरकार की तरफ से तत्कालीन विधि मंत्री एचआर गोखले ने एक लाइन में ही मंशा साफ़ कर दी थी कि जब पतिपत्नी दोनों यह स्वीकार कर चुके हों कि उन का विवाह व्यवहार में समाप्त हो चुका है तब राज्य को उन्हें जबरन बांधने का अधिकार नहीं है. इस तरह 13 ( बी ) का जन्म हुआ.

अप्रैल 1976 से यह यानी हिंदू विवाह ( संशोधन ) विधेयक 1976 लोकसभा से और लगभग एक महीना बाद राज्यसभा से पारित हुआ और तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के दस्तखत करते ही 27 मई 1976 को लागू हो गया. लोकसभा के मुकाबले राज्यसभा में इस का विरोध कम हुआ और आम राय यह बनी कि जब सहमति से विवाह हो सकता है तो सहमति से ही टूट क्यों नहीं सकता. इस और ऐसी कई बातों को सरिता में समय समय पर प्रकाशित लेख उठा भी चुके हैं और पाठकों ने उन का स्वागत भी खूब किया है.

छोटा, स्पष्ट और सरल कानून

यह संशोधन बेहद छोटा और सरल है जिस के दो चरण हैं पहले यानी 13 (बी) (1) में यह कहा गया है कि पतिपत्नी अगर एक साल से अलग रह रहे हों और साथ रहने में असमर्थ हों तो विवाह समाप्ति के लिए संयुक्त आवेदन दे सकते हैं. इस में अच्छी बात यह है कि बेकार की रामायण का जरूरत नहीं पड़ती न ही पतिपत्नी साथ न रहने की वजह या वजहें बताने बाध्य हैं.

Easy Divorce Process (3)
अलगाव महिलाओं के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं इसलिए उन्हें विवादों से बचते सहमति से तलाक की तरफ जाना चाहिए.

दूसरे चरण यानी 13 ( बी ) ( 2 ) में याचिका के बाद अदालत पतिपत्नी को अच्छी तरह सोच लेने का मौका देती है. 6 महीने की यह अवधि कूलिंग पीरियड कहलाती है. इस तरह महज डेढ़ साल में तलाक हो जाता है, बशर्ते कूलिंग पीरियड के बाद भी दोनों पक्षों में से कोई एक भी न पलटे तो.

इस पर बेंगुलुरु में जौब कर रही भोपाल की एक 32 वर्षीय युवती विधि सक्सेना ( बदला नाम ) बताती हैं उन्होंने व पति शिशिर (बदला नाम ) ने 13  (बी) के तहत ही तलाक लिया था और केवल दो पेशियों के बाद ही डिक्री मिल गई थी. अब दोनों ही दूसरी शादी का सोच रहे हैं और कभीकभार मिलते भी रहते हैं. ठीक वैसे ही जैसे फिल्म इंडस्ट्री के सेलिब्रेटी दोस्तों की तरह मिलते हैं. कोई खुन्नस उन्हें एकदूसरे से नहीं रहती. भरण पोषण के लिए इस धारा में अलग से कोई प्रावधान नहीं है क्योंकि पतिपत्नी दोनों ही पहले यह विवाद सुलझा चुके होते हैं जिस में आमतौर पर पति दहेज़ में मिला पैसा व सामान लौटा देता है और एकमुश्त राशि पत्नी को दे देता है पत्नी भी ससुराल से मिले गहने और उपहार लौटा देती है.

इस के बाद भी अदालत उन्हें यह हक देती है कि वे अपने विवाद कोई अगर हों तो उन्हें हिंदू अल्पसंख्यक एवं अभिभावक अधिनियम 1956 और हिंदू दत्तक अवम भरण पोषण अधिनियम 1956 के तहत सुलझा लें. जाहिर है आपसी सहमति से तलाक तभी मिलता है जब कस्टडी और भरण पोषण की स्थिति अदालत के सामने स्पष्ट हो. कस्टडी के लिए भी बजाय अदालत के पति पत्नी ही तय करते हैं कि बच्चा दोनों में से किस के पास रहेगा और दूसरा पक्ष कब कब बच्चे से मिल सकता है.

कूलिंग पीरियड के पीछे की सोच भी यही थी कि कपल्स जल्दबाजी में जिंदगी का यह अहम फैसला न लें और सुलह की एक आखिरी गुंजाईश बनी रहे. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट को अगर लग रहा है कि ये 6 महीने भी जरुरी नहीं तो वह गलत कहीं से नहीं है क्योंकि तलाक चाहने बाले कपल्स अच्छी तरह सोच विचार कर ही अदालत जाने का फैसला करते हैं. 17 दिसम्बर को जो सुप्रीम कोर्ट ने कहा इसी बात को वह साल 2017 के भी एक फैसले में कह चुका था कि अगर पतिपत्नी के बीच सभी मुद्दे या विवाद सुलझ चुके हों और साथ रहने की कोई गुंजाइश न हो व इंतजार से तकलीफ और बढ़े तो अदालत कूलिंग पीरियड का शर्त हटा भी सकती है.

यही न्याय के लिए जरुरी भी है कि अदालतें अपने विवेक से भी काम लें बजाय लकीर का फ़कीर बने रहने के इस के लिए फैमिली कोर्ट्स को तलाक के प्रति अपने पूर्वाग्रह छोड़ना होंगे और भक्तों और धर्म के ठेकेदारों की तरह यह सोचने से बचना होगा कि बढ़ते तलाकों से परिवार व्यवस्था, धर्म व समाज खतरे में आ जाएंगे. उन्हें यह ध्यान रखना होगा कि यह प्रावधान यानी 13 ( बी ) तलाक को प्रोत्साहन नहीं देती बल्कि असफल शादियों को गरिमा के साथ खत्म करने का मौका देती है.

एक अहम बात जो धारा 13 के तहत तलाक का मुकदमा लड़ रहे कपल्स को यह जरुर समझना चाहिए कि अगर उन्हें लगता है कि इस में वक्त व पैसा जाया हो रहा है तो वे भी  13  ( बी ) के तहत तलाक ले सकते हैं लेकिन इस के लिए उन्हें अपने विवाद अदालत के बाहर सुलझाना होंगे और आरोप वापस लेना होंगे या समझौता करना होगा तभी उन का संयुक्त आवेदन मंजूर होगा. नहीं तो अदालत हैं ही मुकदमा घिसटता रहेगा तारीखें लगती रहेंगी और दूसरी शादी करना भी कठिन हो जाएगा. Easy Divorce Process 

Psychological Trap : कहीं आप भी तो फोफो की गिरफ्त में नहीं ?

Psychological Trap : फोफो किसी बीमारी का नहीं बल्कि एक ऐसे दिमागी डर का नाम है जो सेहत पर बुरा असर डालता है. जांच का नतीजा पॉजिटिव आए या नेगेटिव आए, वह बीमारी का डर दूर करने वाला ही होता है. नेगेटिव हो तो बेफिक्री मिलती है और पॉजिटिव हो तो वक्त पर इलाज से बीमारी ठीक होने में मदद मिलती है तो फिर डर कैसा?

सोते हुए को तो एक बार जगाया जा सकता है लेकिन जो सोने का ड्रामा कर रहा हो उसे कैसे जगाया जाए, यह कहावत उन लोगों पर सटीक बैठती है जो लोग पैथोलॉजिकल जांचों से कतराते हैं. जबकि वे भी बेहतर जानते हैं कि ठीक होने का रास्ता जांचों से हो कर ही जाता है जब तक यह पता नहीं चलेगा कि शरीर में कौन सा विकार या रोग पनप रहा है तब तक ठीक होने की उम्मीद एक वहम और मूर्खता ही साबित होती है जिस के नतीजे कतई माफिक नहीं निकलते.

इस मानसिकता या हालत को जिस में आदमी जांचों से घबराता और कतराता है मेडिकल साइंस और मनोविज्ञान में फोफो यानी ‘फीयर आफ फाइंडिंग आउट’ कहा जाता है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ सर्वे के मुताबिक दुनिया भर के कोई 30 फीसदी लोग इस की गिरफ्त में हैं. भारत में मुमकिन है यह तादाद ज्यादा हो क्योंकि यहां के लोग वैज्ञानिक मानसिकता के कम भाग्यवादी मानसिकता के ज्यादा हैं और भाग्यवादी आमतौर पर नतीजों से भयभीत ही रहते हैं. दूसरे पैथालाजी टेस्ट्स को ले कर देश में जागरूकता भी कम है, तीसरी बड़ी दिक्कत इस दुष्प्रचार से सहमत हो जाना है कि यह एलोपेथी डाक्टरों की लूट पाट का जरिया है.

अगर आप भी फोफो से ग्रस्त हैं तो यह आप के लिए नुकसानदेह हो सकता है, कैसे, यह जानने से पहले यह समझना अहम है कि यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि एक तरह का दिमागी डर है जिसे वक्त रहते दूर कर लेना जरुरी है नहीं तो कई बार लेने के देने पड़ जाते हैं.

फोफो और उसके नुकसान

अस्पताल और डाक्टरों से डर लगना कतई हैरानी की बात नहीं बल्कि स्वभाविक है लेकिन जरूरत पड़ने पर पेथालौजिकल टेस्ट्स से घबराना जरुर दिक्कत की बात है. फोफो की गिरफ्त में आया आदमी इस बात से डरता है कि ऐसा न हो कि जांच नतीजे में कोई बीमारी निकल आए. यह एक घातक मानसिकता है जिस के तहत यह तो मंजूर है कि कोई भी बीमारी शरीर में पनपती रहे और बाद में भले ही उम्मीद से ज्यादा तकलीफदेह और जानलेवा हो जाए लेकिन उसका हमें पता नहीं चले इसलिए टेस्ट करवाएं ही क्यों.

यानी बात शेर के सामने आंख बंद कर लेने की है जिस से डर कहने को ही दूर हो जाता है पर जान पर बन आती है, जब रोग की पहचान ही नहीं होगी तो इलाज कैसे होगा और ठीक कैसे होंगे यह सोचा जाए तो एक हद तक डर काबू होता है.

दरअसल में इस डर की जड़ में वजहें ये हैं कि अगर कोई बीमारी निकल आई तो जिंदगी अस्त व्यस्त हो जाएगी बीमारी के चलते सामान्य ढंग से जीना मुश्किल हो जाएगा और इलाज में पैसे लगेंगे सो अलग. कुछ बीमारियां बहुत आम हैं जिन के उदाहरण हर किसी के आसपास मिल जाते हैं मसलन ब्लड प्रेशर, डाईबिटीज, थायराइड और हार्ट से जुडी दिक्कतें जैसे बढ़ा हुआ कोलस्ट्रोल और ब्लाकेज. कैंसर भी इसी कड़ी में आती है लेकिन उस के मरीज अपेक्षाकृत कम होते हैं.

ब्लड प्रेशर की जांच में कोई तकलीफ नहीं होती इसलिए इस की जांच लोग आसानी से करवा लेते हैं. दिक्कत डायबिटीज जैसी बीमारियों में ज्यादा होती है जिन में जांच के लिए सुई से चार छह बूंदे निकाले बिना काम नहीं चलता. डाइबिटीज यानी सुगर कोई जानलेवा बीमारी नहीं है लेकिन इतना तय है कि इस में आप को कई चीजों का परहेज करना ही करना पड़ता है जैसे शकर, चावल, आलू, मैदा वगैरह. बीमारी ज्यादा बढ़ने पर परहेज की लिस्ट बढ़ती जाती है जिन में तली मसालेदार चीजें भी शामिल हैं.

फोफो से ग्रस्त लोग जानेअनजाने में इसे बढ़ाते रहते हैं और बाद में पछताते नजर आते हैं कि वक्त पर ही सुगर की जांच करवा लेते तो यह नौबत न आती. मेनिट भोपाल के आईटी डिपार्टमेंट के प्रोफेसर डॉक्टर राजेश पटेरिया अपना अनुभव सुनाते बताते हैं कि उन्होंने कहीं डायबिटीज न निकल आए इस डर से लम्बे समय तक जांच ही नहीं करवाई और खुद को नौन डायबिटीज मानते मनमुताबिक खाते पीते रहे जिस से शुगर 400 के पार हो गई.

जब पानी सर से गुजरने लगा तो उन्होंने रामराम करवाते सुगर टेस्ट कराया और नतीजा देख घबरा गए कि अब क्या होगा, ठीक होंगे कि नहीं, कहीं किडनी फेल न हो जाए, पैर या उस का कोई हिस्सा कटवाना न पड़े या फिर आखों की रौशनी कम न हो जाए वगैरह. लेकिन 5 साल हो गए ऐसा कुछ नहीं हुआ हां इतना जरुर हुआ कि उन्हें नियमित मैडिसिन खानी पड़ती है. परहेज करने पड़ते हैं रोजाना कसरत करना पड़ती है बिना मौसम की परवाह किए 30 से 45 मिनट तक टहलना पड़ता है.

राजेश अब बताते हैं कि डायबिटीज, शुगर मैनेज करने वाली बीमारी है अगर मैं पहले ही जांच  करवा लेता तो यह नौबत ना आती. अब हालत यह है कि महीने में कम से कम दो बार सुगर टेस्ट करानी पड़ती है लेकिन अब जांच कराने में डर नहीं लगता. यही बात हर उस बीमारी पर लागू होती है जिस के लिए पैथालौजी जाना ही पड़ता है.

यही वजह है कि न केवल भारत में बल्कि दुनिया भर में शुगर की यह बीमारी बहुत तेजी से पसर रही है. आईडीएफ यानी इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की मानें तो इस बीमारी की चपेट में आए लगभग 45 फीसदी भारतीय को नहीं पता था कि वे डायबिटीज की गिरफ्त में आ चुके हैं. इस की बड़ी वजह फोफो है जो जांचे आम हैं और बीमारी की पहचान और निदान के लिए शुरुआती हैं सीबीसी यानी कम्प्लीट ब्लड काउंट उन में से एक है.

करवाएं सीबीसी

अकसर डाक्टर जिस जांच के लिए सबसे पहले कहते हैं वह सीबीसी है. यह जांच मामूली होते हुए भी गैरमामूली इस लिहाज से है कि इस से शरीर के अंदर पनप रही लगभग डेढ़ दर्जन छोटी बड़ी अहम बीमारियों के मौजूद होने और मौजूद न होने के भी संकेत मिलते हैं जिन में प्रमुख रूप से इन्फेक्शन, सूजन, ब्लीडिंग और एनीमिया से ले कर कैंसर तक शामिल हैं.

सीबीसी में खून में मौजूद तीन पैरामीटर्स पर तफसील से जांच होती है. पहली है आरबीसी यानी लाल रक्त कण. दूसरी है डब्ल्यूबीसी यानी श्वेत रक्त कण. और तीसरी है प्लेटलेट्स. खून में हीमोग्लोबिन होता है यह हर कोई जानता है लेकिन पुरुषों में यह 13 से ले कर 17 ग्राम / डीएल यानी ग्राम प्रति डेसीलीटर ( एक लीटर का दसवां हिस्सा ) और महिलाओं में 12 से 15 ग्राम प्रति डीएल होना चाहिए यह कम ही लोग जानते हैं. जब शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी होती है तो कमजोरी, सांस फूलना और चक्कर आना जैसे लक्षण महसूस होते हैं. यही हीमोग्लोबिन अगर ज्यादा हो जाए तो डिहाइड्रेशन और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियां होने का इशारा मिलता है. सभी टेस्ट्स रिपोर्ट में नार्मल वैल्यू दी रहती है यदि हीमोग्लोबिन कम या ज्यादा हो तो उसे बोल्ड लेटर्स यानी मोटे अक्षरों में लिखा जाता है जिस से यह आसानी से समझ आ सके.

और जब समझ आ जाए तो इलाज बेहद आसान हो जाता है. सीबीसी में इस तरह की 18 – 20 जांचें होती हैं जिन की नार्मल रेंज वॉल्यूम या वैल्यू टेस्ट रिपोर्ट में लिखी रहती है और किसी भी घटक का कम या ज्यादा होना जैसा कि ऊपर बताया गया है मोटे अक्षरों में लिखा रहता है.

यह सोचना गलत है कि जब इतनी सारी जांचें होती हैं तो खून भी ज्यादा निकाला जाता है हकीकत में सीबीसी के लिए किसी भी हालत में 3 एमएल मिली लीटर से ज्यादा खून नहीं निकाला जाता जो शरीर में दौड़ रहे कुल खून ( लगभग 5 लीटर ) का 0.05 फीसदी के लगभग ही होता है. इस की भरपाई शरीर चंद घंटों में ही कर लेता है. इस से कोई कमजोरी नहीं आती.

ऐसे बचें फोफो से

फोफो से बचना कतई मुश्किल काम नहीं है अगर आप यह हिसाब किताब लगा लें कि दरअसल में नुकसानदेह क्या है. जांच से अस्थाई तौर पर बच कर एक स्थाई बीमारी की गिरफ्त में आना या वक्त रहते इलाज करवा लेना. जाहिर है नुकसानदेह है बीमारी को पालते रहना. इसलिए यह फार्मूला याद रखें कि जितनी देर उतना ही ज्यादा नुकसान तय है, सेहत का भी और पैसों का भी. अपना डर कम करने आप पहले यूं ही बेवजह पैथलौजी का एक चक्कर लगाएं, इस से डर कम होगा. फिर बाद की भयावहता की कल्पना करें कि इलाज न लिया तो क्या हालत होगी और आज नहीं तो कल ट्रीटमैंट तो लेना ही पड़ेगा जो ज्यादा तकलीफदेह साबित होगा.

सहूलियत के लिए किसी नजदीकी रिश्तेदार या दोस्त को साथ ले जाएं क्योंकि कोई भी डर अकेले में ज्यादा डराता है. भोपाल के अशोका गार्डन इलाके में पैथोलॉजी लैब में काम कर रहे कर्मचारी हेमंत पटेल की मानें तो उन का रोज ऐसे मरीजों से सामना होता है जो जांच से डरते हैं उन्हें सब से ज्यादा डर इंजेक्शन या सुई के जरिये खून निकलवाने में लगता है (इसे ट्रिपैनोफोबिया कहा जाता है). एक दफा बच्चों को समझाना बहलाना फुसलाना आसान होता है लेकिन बड़ों को नहीं. ऐसे पेशेंट्स को हम सलाह देते हैं कि वे अपना ध्यान कहीं और लगा लें, चेहरा घुमा लें या फिर मोबाइल फोन पर मनपसंद रील्स देखने लग जाएं. सुई की चुभन मच्छर के डंक बराबर ही होती है यह सोच लिया जाए तो डर कम होता है.

इन छोटेमोटे उपायों से भी बात न बने तो किसी मनोचिकित्सक से मिलें जो आप को सीबीटी देगा लेकिन इस की जरूरत कम ही मामलों में पड़ती है जिन्हें अपवाद कहा जा सकता है. फोफो जांच से नहीं बल्कि जांच के नतीजों का डर होता है जो बीमारी के नतीजों के मुकाबले कुछ भी नहीं होता. Psychological Trap :

Hindi Family Story : व्रत-भाग 4 – क्या अंधविश्वास में उलझी वर्षा को अनिल निकाल पाया ?

Hindi Family Story : वर्षा अपनी बात पूरी न कर पाई थी कि अनिल ने टोकते हुए कहा, ‘‘तो भी क्या होगा? यदि मैं व्रत रख कर मर गया तो मोक्ष प्राप्त होगा, जन्ममरण के बंधन से मुक्त हो जाऊंगा.’’

‘‘ऐसा न कहो जी, जब तुम ही न रहोगे तो मेरी सुध लेने वाला कौन है इस संसार में?’’

‘‘क्यों, तुम्हारे भोलेभंडारी तुम्हें खानेपीने को देंगे, साईं बाबा तुम्हें सहारा देंगे, महालक्ष्मी तुम्हारे ऊपर धन की वर्षा करेंगी. और निर्मल बाबा, आसाराम बापू, श्रीश्री रविशंकर, रामदेव, अम्मा हैं न तुम्हारी देखभाल के लिए. इस के अतिरिक्त और भी देवीदेवता हैं. क्या वे तुम्हारी सहायता नहीं करेंगे?’’ अनिल ने हंसते हुए कहा.

‘‘अजी, छोड़ो जी, वे क्या करेंगे? मेरे लिए तो सबकुछ तुम ही हो.’’

‘‘किंतु मैं तुम्हारे देवीदेवताओं से तो बड़ा नहीं हूं.’’

‘‘हो. मेरे लिए तुम से बढ़ कर कोई नहीं है.’’

‘‘तो आज तक तुम ने मेरी जो उपेक्षा की है, व्रत रखरख कर जो मुझे असंतुष्ट रखा है और…’’

वर्षा को यह एहसास हो गया था कि उस ने अपने पति की परवा न कर के भारी भूल की है और अब उस के तीर उसी पर छोड़े जा रहे हैं. उस ने जरा सी देर के लिए वहां से हट जाना उचित समझा. जिस व्यक्ति के शरीर में रक्त की मात्रा बहुत कम हो, उस का व्रत रखना उचित नहीं होता. दोपहर तक अनिल भूख महसूस करने लगा और उस की आंखें बंद होने लगीं. वर्षा घबरा गई और उस ने पति से व्रत तोड़ने को कहा, किंतु अनिल अपनी जिद पर अड़ा रहा. शाम तक उस की हालत चिंताजनक हो गई. वर्षा ने जबरदस्ती उस का व्रत तुड़वाना चाहा, किंतु उस ने कहा, ‘‘मैं मर जाऊंगा, लेकिन व्रत नहीं तोड़ूंगा. अब तो रात को ही व्रत पूरा कर के कुछ खाऊंगा.’’ जब वर्षा ने बहुत जिद की तो अनिल ने कहा, ‘‘यदि तुम अपना व्रत तोड़ने को तैयार हो तो मैं भी तोड़ लूंगा.’’ पहले तो वह राजी नहीं हुई, फिर अपने पति की हालत देखते हुए उस ने व्रत तोड़ लिया. इस के बाद उस ने अनिल के सामने कुछ फल रख दिए. अनिल ने कहा, ‘‘वर्षा, मेरी एक बात का जवाब दो. तुम ने अपना व्रत क्यों तोड़ा?’’

‘‘तुम्हारे लिए.’’

‘‘क्यों? मेरे लिए यह पाप क्यों किया तुम ने?’’

‘‘मुझे इस समय व्रत से अधिक तुम्हारी चिंता है.’’

‘‘इस का मतलब यह हुआ कि मैं हनुमानजी से श्रेष्ठ हूं?’’

‘‘इस समय तो ऐसा ही समझ लो. तुम्हारी सेहत है तो सबकुछ है.’’

‘‘अब तुम्हारी समझ में मेरी बात आई है. मैं कई महीनों से तुम्हें समझाता रहा, किंतु तुम हमेशा ही मेरी बात की अवहेलना करती रहीं. मेरी सुखसुविधा पर ध्यान न दे कर व्रत रखती रहीं. अब तुम्हें मेरी सेहत की चिंता क्यों सता रही है? यह ठीक है कि तुम ने व्रत तोड़ डाला है, किंतु मैं तोड़ने को तैयार नहीं हूं.’’ अनिल ने गंभीर हो कर कहा.

‘‘तब तो तुम्हारी हालत और ज्यादा खराब हो जाने का डर है,’’ वर्षा ने चिंतित हो कर कहा.

‘‘ऐसा होना तो नहीं चाहिए. आज तक तुम ने पुण्य कमाने के लिए सैकड़ों व्रत रखे हैं. क्या तुम्हारे देवीदेवता तुम्हारे सुहाग की रक्षा भी नहीं करेंगे?’’

एक घंटे बाद अनिल की हालत और खराब हो गई. उस ने आंखें फेर लीं और बहुत निढाल हो गया. अब वह ठीक से बोल भी नहीं पा रहा था. कई बार उसे बेहोशी के दौरे भी पड़ चुके थे. वर्षा रोने लगी. उस के हाथपांव फूल गए. वह अपने किए पर पछताने लगी कि उस ने व्रत रखरख कर अपने पति की उपेक्षा की है. उसे कोई सुख नहीं दिया. वह पश्चात्ताप की आग में जलने लगी कि उस के व्यर्थ के अंधविश्वास से उस का पति दुखी रहा. वे सच कहा करते थे कि औरत के लिए पति सबकुछ होता है. पत्नी को उसी की सेवा करनी चाहिए और उसे प्रसन्न रखने की चेष्टा करनी चाहिए. अनिल में अब बोलने की भी शक्ति नहीं रही थी. वह उसी प्रकार अर्धचेतनावस्था में लेटा रहा. वर्षा ने चुपकेचुपके उस के मुंह में मौसमी का रस डाला और अनिल ने थोड़ी देर बाद आंखें खोल दीं. वह वर्षा की आंखों में देखने लगा जिन में पश्चात्ताप के आंसू साफ दिखाई दे रहे थे. अनिल मुसकराने लगा.

अब टीवी पर धार्मिक सीरियल नहीं चलते, गानों के और न्यूज चैनल चलते हैं. उन्होंने फर्टिलिटी क्लिनिक में जाना शुरू कर दिया और 2 माह में ही वर्षा गर्भवती हो गई थी. उस की फैलोपियन ट्यूब में कोई सूजन थी. वहां देवीदेवता नहीं, वायरस बैठा था जो दवा से गायब हो गया. Hindi Family Story :

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