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मेरी लव मैरिज हुई है, इन दिनों शादीशुदा जिंदगी में परेशानी चल रही है क्या करूं?

सवाल 

हमारी लव मैरिज हुई थी लेकिन शादी हुए एक साल भी नहीं हुआ है कि हमारे बीच ?ागड़े शुरू हो गए हैं. समया नहीं पा रहा कि ऐसा क्या हो गया. कितना प्यार करते थे हम दोनों एकदूसरे से, फिर शादी के बाद पता नहीं क्यों रोज कोई न कोई वजह निकल आती है लड़ाई की. मैं अपनी शादी बचा कर रखना चाहता हूं. मैं अभी भी अपनी पत्नी से पहले जैसा ही प्यार करता हूं. आप ही बताइए हम से कहां गलती हो रही है? क्यों ?ागड़े हो रहे हैं कि रिश्ता खत्म हो रहा है?

जवाब

बहुत ही अफसोस की बात है कि घरवालों से लड़?ागड़ कर आप दोनों ने लव मैरिज की और आज दोनों आपस में लड़?ागड़ कर उसी मैरिज को खत्म करने पर तुले हो.

माना कि आप अपनी शादी बचाना चाहते हैं लेकिन क्या आप की पत्नी भी ऐसा कुछ सोच रही है. क्या वह भी अपना रिश्ता बचाना चाहती है. आप दोनों ने लव मैरिज की है. एकदूसरे की रुचियों, अच्छाइयों से अच्छी तरह वाकिफ होंगे, तब भी सम?ादारी से काम नहीं ले रहे.

आप दोनों के बीच अंडरस्टैंडिंग कमजोर है. आप दोनों को चाहिए कि शांति से बैठ कर एकदूसरे की बात सम?ाने की कोशिश करें. ?ागड़ा होता भी हो तो भी एकदूसरे से बात करना बंद न करें. यह बहुत ही सामान्य गलती है जिसे अकसर कपल्स करते हैं. इस कंडीशन में रिश्ते में गलतफहमियां और बढ़ती हैं.

अपने पार्टनर को जताएं कि आप दुनिया में सब से ज्यादा उन पर भरोसा करते हैं, प्यार करते हैं, तभी तो सब से लड़?ागड़ कर आप से शादी की है.

कुछ बातों का बोलना जरूरी होता है. दोनों एकदूसरे के लिए वक्त निकालें, साथ बैठें, घूमें, बाते करें, पुराने हसीन पलों को याद करें. जब शादी नहीं हुई थी तब के सपनों को याद करें. अब तो आप दोनों साथ हैं, वे सपने पूरे करने का वक्त आ गया है. उसे लड़?ागड़ कर बरबाद मत कीजिए.

पुरानी बातें, पुराना ?ागड़ा दूर कर नई शुरुआत कीजिए. अपने प्यार का मजाक मत बनाइए बल्कि अच्छा उदाहरण प्रस्तुत कीजिए. लड़ाई?ागड़े में कुछ नहीं रखा. जिंदगी ने आप दोनों को एक किया है तो उस का शुक्रिया अदा कीजिए. खुशीखुशी जिंदगी बिताइए.

अनुगामिनी : सरिता को 15 साल पहले की कौन सी बात याद आ गई

जिलाधीश राहुल की कार झांसी शहर की गलियों को पार करते हुए शहर के बाहर एक पुराने मंदिर के पास जा कर रुक गई. जिलाधीश की मां कार से उतर कर मंदिर की सीढि़यां चढ़ने लगीं.

‘‘मां, तेरा सुहाग बना रहे,’’ पहली सीढ़ी पर बैठे हुए भिखारी ने कहा.

सरिता की आंखों में आंसू आ गए. उस ने 1 रुपए का सिक्का उस के कटोरे में डाला और सोचने लगी, कहां होगा सदाशिव?

सरिता को 15 साल पहले की अपनी जिंदगी का वह सब से कलुषित दिन याद आ गया जब दोनों बच्चे राशि व राहुल 8वीं9वीं में पढ़ते थे और वह खुद एक निजी स्कूल में पढ़ाती थी. पति सदाशिव एक फैक्टरी में भंडार प्रभारी थे. सबकुछ ठीकठाक चल रहा था. एक दिन वह स्कूल से घर आई तो बच्चे उदास बैठे थे.

‘क्या हुआ बेटा?’

‘मां, पिताजी अभी तक नहीं आए.’

सरिता ने बच्चों को ढाढ़स बंधाया कि पिताजी किसी जरूरी काम की वजह से रुक गए होंगे. जब एकडेढ़ घंटा गुजर गया और सदाशिव नहीं आए तो उस ने राशि को घनश्याम अंकल के घर पता करने भेजा. घनश्याम सदाशिव की फैक्टरी में ही काम करते थे.

कुछ समय बाद राशि वापस आई तो उस का चेहरा उतरा हुआ था. उस ने आते ही कहा, ‘मां, पिताजी को आज चोरी के अपराध में फैक्टरी से निकाल दिया गया है.’

‘यह सच नहीं हो सकता. तुम्हारे पिता को फंसाया गया है.’

‘घनश्याम चाचा भी यही कह रहे थे. परंतु पिताजी घर क्यों नहीं आए?’ राशि ने कहा.

रात भर पूरा परिवार जागता रहा. दूसरे दिन बच्चों को स्कूल भेजने के बाद सरिता सदाशिव की फैक्टरी पहुंची तो उसे हर जगह अपमान का घूंट ही पीना पड़ा. वहां जा कर सिर्फ इतना पता चल सका कि भंडार से काफी सामान गायब पाया गया है. भंडार प्रभारी होने के नाते सदाशिव को दोषी करार दिया गया और उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया.

सरिता घर आ कर सदाशिव का इंतजार करने लगी. दिन भर इंतजार के बाद उस ने शाम को पुलिस में रिपोर्र्ट लिखवा दी.

अगले दिन पुलिस तफतीश के लिए घर आई तो पूरे महल्ले में खबर फैल गई कि सदाशिव फैक्टरी से चोरी कर के भाग गया है और पुलिस उसे ढूंढ़ रही है. इस खबर के बाद तो पूरा परिवार आतेजाते लोगों के हास्य का पात्र बन कर रह गया.

सरिता ने सारे रिश्तेदारों को पत्र भेजा कि सदाशिव के बारे में कोई जानकारी हो तो तुरंत सूचित करें. अखबार में फोटो के साथ विज्ञापन भी निकलवा दिया.

इस मुसीबत ने राहुल और राशि को समय से पहले ही वयस्क बना दिया था. वह अब आपस में बिलकुल नहीं लड़ते थे. दोनों ने स्कूल के प्राचार्य से अपनी परिस्थितियों के बारे में बात की तो उन्होंने उन की फीस माफ कर दी.

राशि ने शाम को बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया. राहुल ने स्कूल जाने से पहले अखबार बांटने शुरू कर दिए. सरिता की तनख्वाह और बच्चों की इस छोटी सी कमाई से घर का खर्च किसी तरह से चलने लगा.

इनसान के मन में जब किसी वस्तु या व्यक्ति विशेष को पाने की आकांक्षा बहुत बढ़ जाती है तब उस का मन कमजोर हो जाता है और इसी कमजोरी का लाभ दूसरे लोग उठा लेते हैं.

सरिता इसी कमजोरी में तांत्रिकों के चक्कर में पड़ गई थी. उन की बताई हुई पूजा के लिए कुछ गहने भी बेच डाले. अंत में एक दिन राशि ने मां को समझाया तब सरिता ने तांत्रिकों से मिलना बंद किया.

कुछ माह के बाद ही सरिता अचानक बीमार पड़ गई. अस्पताल जाने पर पता चला कि उसे टायफाइड हुआ है. बताया डाक्टरों ने कि इलाज लंबा चलेगा. यह राशि और राहुल की परीक्षा की घड़ी थी.

ट्यूशन पढ़ाने के साथसाथ राशि लिफाफा बनाने का काम भी करने लगी. उधर राहुल ने अखबार बांटने के अलावा बरात में सिर पर ट्यूबलाइट ले कर चलने वाले लड़कों के साथ भी मजदूरी की. सिनेमा की टिकटें भी ब्लैक में बेचीं. दोनों के कमाए ये सारे पैसे मां की दवाई के काम आए.

‘तुम्हें यह सब करते हुए गलत नहीं लगा?’ सरिता ने ठीक होने पर दोनों बच्चों से पूछा.

‘नहीं मां, बल्कि मुझे जिंदगी का एक नया नजरिया मिला,’ राहुल बोला, ‘मैं ने देखा कि मेरे जैसे कई लोग आंखों में भविष्य का सपना लिए परिस्थितियों से संघर्ष कर रहे हैं.’

दोनों बच्चों को वार्षिक परीक्षा में स्कूल में प्रथम आने पर अगले साल से छात्रवृत्ति मिलने लगी थी. घर थोड़ा सुचारु रूप से चलने लगा था.

सरिता को विश्वास था कि एक दिन सदाशिव जरूर आएगा. हर शाम वह अपने पति के इंतजार में खिड़की के पास बैठ कर आनेजाने वालों को देखा करती और अंधेरा होने पर एक ठंडी सांस छोड़ कर खाना बनाना शुरू करती.

इस तरह साल दर साल गुजरते चले गए. राशि और राहुल अपनी मेहनत से अच्छी नौकरी पर लग गए. राशि मुंबई में नौकरी करने लगी है. उस की शादी को 3 साल गुजर गए. राहुल भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में उत्तीर्ण हो कर झांसी में जिलाधीश बन गया. 1 साल पहले उस ने भी अपने दफ्तर की एक अधिकारी सीमा से शादी कर ली.

सरिता की तंद्रा भंग हुई. वह वर्तमान में वापस आ गई. उस ने देखा कि बाहर काफी अंधेरा हो गया है. हमेशा की तरह उस ने सदाशिव के लिए प्रार्थना की और घर के लिए रवाना हो गई.

‘‘मां, बहुत देर कर दी,’’ राहुल ने कहा.

सरिता ने राहुल और सीमा को देखा और उन का आशय समझ कर चुपचाप खाना खाने लगी.

‘‘बेटा, यहां से कुछ लोग जयपुर जा रहे हैं. एक पूरी बस कर ली है. सोचती हूं कि मैं भी उन के साथ हो आऊं.’’

‘‘मां, अब आप एक जिलाधीश की भी मां हो. क्या आप का उन के साथ इस तरह जाना ठीक रहेगा?’’ सीमा ने कहा.

सरिता ने सीमा से बहस करने के बजाय, प्रश्न भरी नजरों से राहुल की ओर देखा.

‘‘मां, सीमा ठीक कहती है. अगले माह हम सब कार से अजमेर और फिर जयपुर जाएंगे. रास्ते में मथुरा पड़ता है, वहां भी घूम लेंगे.’’

अगले महीने वे लोग भ्रमण के लिए निकल पड़े. राहुल की कार ने मथुरा में प्रवेश किया. मथुरा के जिलाधीश ने उन के ठहरने का पूरा इंतजाम कर के रखा था. खाना खाने के बाद सब लोग दिल्ली के लिए रवाना हो गए. थोड़ी दूर चलने पर कार को रोकना पड़ा क्योंकि सामने से एक जुलूस आ रहा था.

‘‘इस देश में लोगों के पास बहुत समय है. किसी भी छोटी सी बात पर आंदोलन शुरू हो जाता है या फिर जुलूस निकल जाता है,’’ सीमा ने कहा.

राहुल हंस दिया.

सरिता खिड़की के बाहर आतेजाते लोगों को देखने लगी. उस की नजर सड़क के किनारे चाय पीते हुए एक आदमी पर पड़ गई. उसे लगा जैसे उस की सांस रुक गई हो.

वही तो है. सरिता ने अपने मन से खुद ही सवाल किया. वही टेढ़ी गरदन कर के चाय पीना…वही जोर से चुस्की लेना…सरिता ने कई बार सदाशिव को इस बात पर डांटा भी था कि सभ्य इनसानों की तरह चाय पिया करो.

चाय पीतेपीते उस व्यक्ति की निगाह भी कार की खिड़की पर पड़ी. शायद उसे एहसास हुआ कि कार में बैठी महिला उसे घूर रही है. सरिता को देख कर उस के हाथ से प्याली छूट गई. वह उठा और भीड़ में गायब हो गया.

उसी समय जुलूस आगे बढ़ गया और कार पूरी रफ्तार से दिल्ली की ओर दौड़ पड़ी. सरिता अचानक सदाशिव की इस हरकत से हतप्रभ सी रह गई और कुछ बोल भी नहीं पाई.

दिल्ली में वे लोग राहुल के एक मित्र के घर पर रुके.

रात को सरिता ने राहुल से कहा, ‘‘बेटा, मैं जयपुर नहीं जाना चाहती.’’

‘‘क्यों, मां?’’ राहुल ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘क्या मेरा जयपुर जाना बहुत जरूरी है?’’

‘‘हम आप के लिए ही आए हैं. आप की इच्छा जयपुर जाने की थी. अब क्या हुआ? आप क्या झांसी वापस जाना चाहती हैं.’’

‘‘झांसी नहीं, मैं मथुरा जाना चाहती हूं.’’

‘‘मथुरा क्यों?’’

‘‘मुझे लगता है कि जुलूस वाले स्थान पर मैं ने तेरे पिताजी को देखा है.’’

‘‘क्या कर रहे थे वह वहां पर?’’ राहुल ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘मैं ने उन्हें सड़क के किनारे बैठे देखा था. मुझे देख कर वह भीड़ में गायब हो गए,’’ सरिता ने कहा.

‘‘मां, यह आप की आंखों का धोखा है. यदि यह सच भी है तो भी मुझे उन से नफरत है. उन के कारण ही मेरा बचपन बरबाद हो गया.’’

‘‘मैं जयपुर नहीं मथुरा जाना चाहती हूं. मैं तुम्हारे पिताजी से मिलना चाहती हूं.’’

‘‘मां, मैं आप के मन को दुखाना नहीं चाहता पर आप उस आदमी को मेरा पिता मत कहो. रही मथुरा जाने की बात तो हम जयपुर का मन बना कर निकले हैं. लौटते समय आप मथुरा रुक जाना.’’

सरिता कुछ नहीं बोली.

सदाशिव अपनी कोठरी में लेटे हुए पुराने दिनों को याद कर रहा था.

3 दिन पहले कार में सरिता थी या कोई और? यह प्रश्न उस के मन में बारबार आता था. और दूसरे लोग कौन थे?

आखिर उस की क्या गलती थी जो उसे अपनी पत्नी और बच्चों को छोड़ कर एक गुमनाम जिंदगी जीने पर मजबूर होना पड़ा. बस, इतना ही न कि वह इस सच को साबित नहीं कर सका कि चोरी उस ने नहीं की थी. वह मन से एक कमजोर इनसान है, तभी तो बीवी व बच्चों को उन के हाल पर छोड़ कर भाग खड़ा हुआ था. अब क्या रखा है इस जिंदगी में?

खट् खट् खट्, किसी के दरवाजा खटखटाने की आवाज आई.

सदाशिव ने उठ कर दरवाजा खोला. सामने सरिता खड़ी थी. कुछ देर दोनों एक दूसरे को चुपचाप देखते रहे.

‘‘अंदर आने को नहीं कहोगे? बड़ी मुश्किलों से ढूंढ़ते हुए यहां तक पहुंच सकी हूं,’’ सरिता ने कहा.

‘‘आओ,’’ सरिता को अंदर कर के सदाशिव ने दरवाजा बंद कर दिया.

सरिता ने देखा कि कोठरी में एक चारपाई पर बिस्तर बिछा है. चादर फट चुकी है और गंदी है. एक रस्सी पर तौलिया, पाजामा और कमीज टंगी है. एक कोने में पानी का घड़ा और बालटी है. दूसरे कोने में एक स्टोव और कुछ खाने के बरतन रखे हैं.

सरिता चारपाई पर बैठ गई.

‘‘कैसे हो?’’ धीरे से पूछा.

‘‘कैसा लगता हूं तुम्हें?’’ उदास स्वर में सदाशिव ने कहा.

सरिता कुछ न बोली.

‘‘क्या करते हो?’’ थोड़ी देर के बाद सरिता ने पूछा.

‘‘इस शरीर को जिंदा रखने के लिए दो रोटियां चाहिए. वह कुछ भी करने से मिल जाती हैं. वैसे नुक्कड़ पर एक चाय की दुकान है. मुझे तो कुछ नहीं चाहिए. हां, 4 बच्चों की पढ़ाई का खर्च निकल आता है.’’

‘‘बच्चे?’’ सरिता के स्वर में आश्चर्य था.

‘‘हां, अनाथ बच्चे हैं,’’ उन की पढ़ाई की जिम्मेदारी मैं ने ले रखी है. सोचता हूं कि अपने बच्चों की पढ़ाई में कोई योगदान नहीं कर पाया तो इन अनाथ बच्चों की मदद कर दूं.’’

‘‘घर से निकल कर सीधे…’’ सरिता पूछतेपूछते रुक गई.

‘‘नहीं, मैं कई जगह घूमा. कई बार घर आने का फैसला भी किया पर जो दाग मैं दे कर आया था उस की याद ने हर बार कदम रोक लिए. रोज तुम्हें और बच्चों को याद करता रहा. शायद इस से ज्यादा कुछ कर भी नहीं सकता था. पिछले 5 सालों से मथुरा में हूं.’’

‘‘अब तो घर चल सकते हो. राशि अब मुंबई में है. नौकरी करती है. वहीं शादी कर ली है. राहुल झांसी में जिलाधीश है. मुझे सिर्फ तुम्हारी कमी है. क्या तुम मेरे साथ चल कर मेरी जिंदगी की कमी पूरी करोगे?’’ कहतेकहते सरिता की आंखों में आंसू आ गए.

सदाशिव ने सरिता को उठा कर गले से लगा लिया और बोला, ‘‘मैं ने तुम्हें बहुत दुख दिया है. यदि तुम्हारे साथ जा कर मेरे रहने से तुम खुश रह सकती हो तो मैं तैयार हूं. पर क्या इतने दिनों बाद राहुल मुझे पिता के रूप में स्वीकार करेगा? मेरे जाने से उस के सुखी जीवन में कलह तो पैदा नहीं होगी? क्या मैं अपना स्वाभिमान बचा सकूंगा?’’

‘‘तुम क्या चाहते हो कि मैं तुम से दूर रहूं,’’ सरिता ने रो कर कहा और सदाशिव के सीने में सिर छिपा लिया.

‘‘नहीं, मैं चाहता हूं कि तुम झांसी जाओ और वहां ठंडे दिल से सोच कर फैसला करो. तुम्हारा निर्णय मुझे स्वीकार्य होगा. मैं तुम्हारा यहीं इंतजार करूंगा.’’

सरिता उसी दिन झांसी वापस आ गई. शाम को जब राहुल और सीमा साथ बैठे थे तो उन्हें सारी बात बताते हुए बोली, ‘‘मैं अब अपने पति के साथ रहना चाहती हूं. तुम लोग क्या चाहते हो?’’

‘‘एक चाय वाला और जिलाधीश साहब का पिता? लोग क्या कहेंगे?’’ सीमा के स्वर में व्यंग्य था.

‘‘बहू, किसी आदमी को उस की दौलत या ओहदे से मत नापो. यह सब आनीजानी है.’’

‘‘मां, वह कमजोर आदमी मेरा…’’

‘‘बस, बहुत हो गया, राहुल,’’ सरिता बेटे की बात बीच में ही काटते हुए उत्तेजित स्वर में बोली.

राहुल चुप हो गया.

‘‘मैं अपने पति के बारे में कुछ भी गलत सुनना नहीं चाहती. क्या तुम लोगों से अलग हो कर वह सुख से रहे? उन के प्यार और त्याग को तुम कभी नहीं समझ सकोगे.’’

‘‘मां, हम आप की खुशी के लिए उन्हें स्वीकार सकते हैं. आप जा कर उन्हें ले आइए,’’ राहुल ने कहा.

‘‘नहीं, बेटा, मैं अपने पति की अनुगामिनी हूं. मैं ऐसी जगह न तो खुद रहूंगी और न अपने पति को रहने दूंगी जहां उन को अपना स्वाभिमान खोना पड़े.’’

सरिता रात को सोतेसोते उठ गई. पैर के पास गीलागीला क्या है? देखा तो सीमा उस का पैर पकड़ कर रो रही थी.

‘‘मां, मुझे माफ कर दीजिए. मैं ने आप का कई बार दिल दुखाया है. आज आप ने मेरी आंखें खोल दीं. मुझे आशीर्वाद दीजिए कि मैं भी आप के समान अपने पति के स्वाभिमान की रक्षा कर सकूं.’’

सरिता ने भीगी आंखों से सीमा का माथा चूमा और उस के सिर पर हाथ फेरा.

‘‘मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा.’’

भोर की पहली किरण फूट पड़ी. जिलाधीश के बंगले में सन्नाटा था. सरिता एक झोले में दो जोड़े कपड़े ले कर रिकशे पर बैठ कर स्टेशन की ओर चल दी. उसे मथुरा के लिए पहली ट्रेन पकड़नी थी.

नरेंद्र मोदी के भाषण पर बवाल: सवाल यह कि लूटने और बांटने लायक पैसा है कहां

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 21 अप्रैल को राजस्थान के बांसवाडा में थे. जनसभा में ठीकठाक भीड़ थी जो कुछ नया सुनने की चाहत में उमड़ी और उमड़ाई गई थी. चुनावी दिनों में नेताओं के पास नया कुछ कहने को है नहीं क्योंकि चुनाव 7 चरणों में हो रहे हैं. इसलिए प्रचार भी लंबा खिंच रहा है. एक ही बात को घुमाफिरा कर दोहराते रहना नेताओं की भी मजबूरी हो जाती है. अब रोजरोज नई बातें वे लाएं भी तो कहां से लाएं, खासतौर से, सत्ता पक्ष को मुद्दों का टोटा पड़ा रहता है कि कितनी बार अपने किए चंद कामों को गिनाया जाए. उलट इस के, विपक्ष के पास बोलने की रेंज ज्यादा होती है. उस के पास वक्ता भी ज्यादा होते हैं और उन्हें बोलने की आजादी भी रहती है.

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कुछ दिनों से नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण सनातन और राम पर फोकस किए हुए थे कि देखो, इंडी गठबंधन वाले और कांग्रेस सनातन और राम विरोधी हैं. इन्होंने प्राणप्रतिष्ठा का भी आमंत्रण ठुकरा दिया था, इन्हें मेरा समुद्र के अंदर जा कर पूजा पाठ करना भी पाखंड लगता है वगैरहवगैरह. सो, बांसवाडा में उन्होंने एकाएक ही एक नई बात अपने हिसाब से कही जबकि पब्लिक सालों से इसे तरहतरह से सुनती आ रही थी. चूंकि बहुत दिनों बाद कही थी और यथासंभव मसाला घोल कर कही थी इसलिए विवाद भी शुरू हो गया जोकि उन का असल मकसद था. नहीं तो वह बात और भाषण भी क्या जिस पर लोग जम्हाइयां लेते ऊंघने लगें और मीटिंग खत्म होने का इंतजार करने लगें.

इंतजार की घड़ियां समाप्त हुईं जब उन्होंने कहा कि ये अर्बन नक्सल वाली सोच… मेरी माताओं, बहनों, ये आप का मंगलसूत्र भी नहीं बचने देंगे, इस हद तक चले जाएंगे. यह कांग्रेस का घोषणापत्र कह रहा है कि वे माताओं, बहनों के सोने का हिसाब करेंगे. उस की जानकारी लेंगे और फिर उस संपत्ति को बांट देंगे. और उन को बांटेंगे जिन के बारे में मनमोहन सिंह की सरकार ने कहा था कि संपत्ति पर पहला हक मुसलमानों का है. इस का मतलब ये संपत्ति इकट्ठी कर के किस को बांटेंगे. जिन के ज्यादा बच्चे हैं उन को बांटेंगे , घुसपैठियों को बांटेंगे. आप की मेहनत की कमाई का पैसा घुसपैठियों को दिया जाएगा. क्या आप को यह मंजूर है. चूंकि बांसवाडा में आदिवासी भी बहुतायत से रहते हैं इसलिए उन्होंने यह भी जोड़ दिया कि उन की चांदी का भी हिसाब लगाया जाएगा.

अब तक सभा में मौजूद शादीशुदा महिलाओं के हाथ अपनेआप ही अपने गले तक पहुंच चुके थे जिसे टटोल कर उन्होंने चैन की सांस ली कि मंगलसूत्र अभी लुटा नहीं है. लेकिन अगर भाजपा को वोट नहीं दिया तो जरूर लुट जाएगा. फ्लश के खेल के ब्लफ की तरह का यह वक्तव्य जल्द ही देशभर में फ़ैल गया और उस की समीक्षाएं होने लगीं. लोगों ने कांग्रेस का घोषणापत्र देखा जिस में कहीं भी प्रौपर्टी के हिसाब और सोने, चांदी व मंगलसूत्र का जिक्र नहीं था. अब मोदी जी कहां से यह सूई ढूंढ लाए, इस का खुलासा एक वीडियो के जरिए किया गया जो वायरल किए जाने की मंशा से सुबह से ही अपलोड किया जा चुका था. इस वीडियो में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इंग्लिश में दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के हित की बात कहते हुए नजर आ रहे हैं.

कांग्रेस तो ऐसे ही किसी मौके की तलाश में बैठी ही थी कि इन दिनों कई वजहों से झुंझलाए नरेंद्र मोदी का कोई झूठ जनता के सामने मय सबूतों के पेश किया जाए. सो, उस ने तुरंत ही इस झूठ का परदाफाश कर दिया. कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि झूठ के जरिए फिर से हिंदूमुसलमान को बांटने की कोशिश की जा रही है. कांग्रेस के घोषणापत्र में कोई मुसलिमहिंदू संदर्भ नहीं है. हम प्रधानमंत्री को चुनौती देते हैं कि वे हमें दिखाएं कि हमारे घोषणापत्र में कहीं भी हिंदूमुसलिम लिखा है.

उम्मीद के मुताबिक नरेंद्र मोदी ने यह चुनौती नहीं ली लेकिन खिसियाए हुए भाजपाइयों ने मनमोहन सिंह का 9 दिसंबर, 2006 वाला वीडियो वायरल कर दिया. लेकिन उस से भी बात बनी नहीं क्योंकि 15 साल बाद यह मुद्दा बनता नहीं और 2009 में भाजपा ने जाने क्यों बनाया नहीं. दूसरे, उस में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंग्लिश में जो कह रहे हैं उस का हिंदी अनुवाद यह निकलता है- हमें यह सुनिश्चित करने के लिए नवीन योजनाएं बनानी होंगी कि अल्पसंख्यकों विशेष रूप से मुसलिम अल्पसंख्यकों को विकास के लाभों को समानरूप से साझा करने का अधिकार है. संसाधनों पर उन का पहला दावा होना चाहिए. इस पूरे भाषण का निचोड़ देते हुए पवन खेड़ा ने कहा, “इस तरह का हलकापन आप की मानसिकता और आप के राजनीतिक मूल्यों में है हम ने युवाओं, आदिवासियों, महिलाओं, किसानों, मध्यवर्ग और श्रमिकों के लिए न्याय की बात कही है. क्या इस पर भी आप को एतराज है? अगर आप ऐसे ही झूठ बोलते रहे तो आप का नाम कूड़ेदान में चला जाएगा.”

पैसा है कहां

बात घूमफिर पैसे पर आ कर टिक गई है जिस के कहीं अतेपते नहीं. महंगाई के चलते लक्ष्मी, नाम और स्वभाव के मुताबिक, चंचला हो गई है. वह गरीबों के पास से तो देररात तक ही विदा हो कर अगले दिन फिर कुआं खोदने का मैसेज दे कर चली जाती है. वेतनभोगियों के पास से 20 तारीख आतेआते बायबाय करने लग जाती है. जिन के पास स्थाई रूप से मेहरबान है उन की गिनती उंगलियों पर की जा सकती है.
देश की आबादी 140 करोड़ है जिस में से 80 करोड़ तो घोषित तौर पर गरीब हैं जिन्हें सरकार राशन दे रही है. इन के पास लुटने को इन की गरीबी के सिवा कुछ है नहीं जिसे लूटने को कई तैयार नहीं. अब बचे 60 करोड़ में से 20 करोड़ मुसलमान निकाल दें तो बचते हैं 40 करोड़. इन में से भी कोई 8 करोड़ ईसाई, जैनी और बौद्ध, सिख हैं तो लुटने से डरने वाले कुल 32 करोड़ बचते हैं. इन में से भी 25 करोड़ मध्यवर्गीय लोग हैं जो महीने के आखिर तक इतने लुटपिट जाते हैं कि लुटेरों को ही उन पर दया आ जाए. इन के पास जो थोड़ामोड़ा बचता है उसे वे अयोध्या, काशी और उज्जैन जैसे दर्जनभर मंदिरों में चढ़ा आते हैं जिस से हिंदुत्व और पंडेपुजारी फलतेफूलते रहें. ऐसी करोड़ों बूंदों से मंदिरों में जरूर खरबों रुपए इकट्ठा हो रहे हैं जिस की लूटखसोट एक वर्ग विशेष के लोग ही करते हैं.

अब बचे 7 करोड़ जो आयकरदाता इस लिहाज से हैं कि वे इनकम टैक्स रिटर्न फाइल करते हैं लेकिन उन में से टैक्स 1 करोड़ 50 लाख ही भरते हैं. इन्हें लूटना कोई आसान काम नहीं है क्योंकि ये आर्थिक सुरक्षा की पुख्ता खोल में रहते हैं. ये बचत का पैसा नकद नहीं रखते बल्कि निवेश कर रखते हैं जिस से वह और बढ़ता जाता है. इनकम टैक्स विभाग के आंकड़ों पर यकीन करें तो टैक्स रिटर्न भरने वालों की संख्या में रिकौर्ड 1,579 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. लेकिन लुटने लायक यानी 50 लाख रुपए से ले कर 1 करोड़ रुपए तक की आमदनी वालों की संख्या महज 616 है जो साल 2022 से पूरे साल में 23 बढ़ गई जबकि आम आदमी और गरीब हुआ. एक करोड़ से ज्यादा आमदनी वालों की तादाद सिर्फ 739 है. अब सोना तो इन्हीं का लूटा जा सकता है और ये इतने शक्तिशाली हैं कि कांग्रेस सरकार भी इन्हें छू नहीं सकती. हां, ये भक्त भी हैं और हिंदूमुसलिम सब से ज्यादा यही करते रहते हैं शायद यह सोच कर कि इसी से इन के पाप धुल जाएंगे, क्या ये भी भाजपा से छिटक रहे हैं जो मोदी को इन्हें डराना पड़ा.

ऐसा लगता नहीं कि इन एक हजार के लगभग लोगों को लूट कर इतना पैसा निकल पाएगा कि 20 करोड़ मुसलमानों की दरिद्रता दूर कर सके. वैसे, लूटने वाला अपनी पर आ जाए तो भिखारियों को भी नहीं बख्शता. लेकिन यहां और बांसवाडा में जिस लूट की बात हुई उस का हाल उस गिट्टी जैसा है जिस का छोर या सिरा थूक पर थूक लगाने के बाद भी नहीं मिल रहा. नकद लूट की बात व्यावहारिक नहीं लगी, सो, बात प्रौपर्टी और मंगलसूत्र की कही गई जिसे सुहागिनें उतना ही प्यार करती हैं जितना बाबा भारती अपने घोड़े सुलतान से करते थे. हिंदू औरतें सबकुछ लुटा सकती हैं लेकिन अपना मंगलसूत्र नहीं, इसलिए उन्हें उस के नाम पर ही डराया गया.

क्यों कहा

यह बयान बेमानी था और बेतुका भी जिसे खिसियाहट में भगवा गैंग अभी भी दोहराए जा रहा है जिस का मकसद सिर्फ हिंदूमुसलिम करना है. हालांकि दलित, आदिवासी, पिछड़े भी उस के निशाने पर हैं क्योंकि बच्चे पैदा करने के मामले में वे मुसलमानों से उन्नीस नहीं हैं. चिंता की बात प्रधानमंत्री का इतने निचले स्तर पर आ कर बात करना है जिस की वजह पहले चरण की वोटिंग का पैटर्न है जो सियासी पंडितों की नजर में भाजपा के हक में नहीं गया. मुसलमान तो एकजुट ख़ामोशी के साथ इंडिया गठबंधन को वोट कर ही रहा है लेकिन दलित, पिछड़ा और आदिवासी भी इंडिया गठबंधन को ठीकठाक तादाद में वोट कर रहा है जिस से 400 पार का हसीन ख्वाव टूटने लगा है. हकीकत में भाजपा अब 250 की लड़ाई लड़ रही है. उस के लिए वह कुछ भी करने और कहने को तैयार है तो कोई क्या कर लेगा.

यूथ में डिप्रैशन, अमीरों की देन

नकुल सामान्य परिवार का युवक था. उस के मातापिता ने बड़ी मेहनत और आर्थिक तंगी में उसे अच्छे कालेज में पढ़ाया था. पैसों के इंतजाम में उस के परिवार के ऊपर कर्ज भी हो गया था. नकुल के मातापिता सोचते थे कि बेटे की जौब लग जाएगी. उस की अच्छी सैलरी होगी तो एकदो साल में सब ठीक हो जाएगा. नकुल मातापिता की जरूरतों को समझता था. उस के मन में था कि जो सैलरी मिलेगी उस से मातापिता की मदद करेगा, उन को खुश रखेगा. अच्छी यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद उसे एक कंपनी में नौकरी मिल गई. सैलरी जैसी सोची थी वैसी तो नहीं थी पर सामान्य से बेहतर थी.

जैसी कंपनी थी वैसा ही रहनसहन वहां रखना था. कार, अच्छा फ्लैट, मोबाइल, कपड़े, परफ्यूम आदि वहां की जरूरत के मुताबिक करना था. महंगा शहर था. ऐसे में उस की सैलरी का एक बड़ा हिस्सा इसी में खर्च हो रहा था. उस के पास बचत नहीं हो पाती थी. दूसरी तरफ, उस के मातापिता सोचते थे कि अब नकुल घर पैसे भेजे. वे कहने में संकोच करते थे. नकुल बीचबीच में थोड़ेबहुत पैसे भेज भी देता था पर उस से कुछ होता नहीं था.
नकुल के साथ काम करने वाले अमीर घरों के थे. वे पूरी सैलरी खर्च कर देते थे. उन को घर भेजना नहीं था. ऐसे में समान वेतन पाने के बाद भी नकुल गरीब सा लगता था. दूसरे अमीर से दिखते थे. जिस माह नकुल घर पैसे भेज देता उस पूरे माह कोई फुजूलखर्ची नहीं करता था. अपने साथियों को खर्च करते देख कर वह डिप्रैशन का शिकार होता था. धीरेधीरे वह अपने दोस्तों से दूर रहने लगा. उस पर अकेलापन हावी होने लगा. अच्छा वेतन पाने के बाद भी वह दूसरों की अमीरी देख कर परेशान था.

सोशल मीडिया का प्रभाव

आज के दौर में सोशल मीडिया का प्रयोग हर कोई कर रहा है. नकुल भी देखता था कि उस के दोस्त अपने मातापिता को कितना खुश रखते थे. उन को उपहार दिलाते थे, उन की पोस्ट सोशल मीडिया पर डालते थे. नकुल ऐसा कुछ नहीं कर पा रहा था. उस के मातापिता गांव के थे. उन का रहनसहन अलग था. सोशल मीडिया की तरह से हाईफाई नहीं थे. वह बहुत परेशान रहता था. एक बार वह छुट्टी ले कर गांव गया तो उस ने पिता से ये बातें कहीं.
वे बोले, ‘बेटा, हमें कुछ नहीं चाहिए. तुम्हारे साथी अमीर हैं, संपन्न घरों के हैं. ऐसे में उन से तुलना न करो. हमेशा अपने से नीचे वाले को देखो, उस के संघर्ष को देखोगे तो तुम खुश रहोगे. जितना अमीर लोगों को देख कर उन से मुकाबला करोगे, दुखी और परेशान रहोगे. संपन्नता से ही खुशी नहीं मिलती. खुशी आपसी प्यार, सहयोग और एकदूसरे के सुखदुख में शामिल होने से मिलती है.’

जल्द अमीर होने की चाहत

इंटरनैशनल इमेज कल्संटेंट की प्रमुख निधि शर्मा कहती हैं, “जल्द से जल्द सबकुछ पा लेने की चाहत डिप्रैशन में डाल देती है, खासकर, जब हम अपनी तुलना अमीर या सफल आदमी से करने लगते हैं. सफल आदमी के जीवन और संघर्ष को देखें तो पता चलेगा कि उस ने भी बहुत स्ट्रगल किया है. अब स्कूल के दिनों से ही बच्चों के सोचने का तरीका बदल गया है. क्लास में पढ़ने वाले हर बच्चे के नंबर एकजैसे नहीं होते. किसी के कम, किसी के ज्यादा होते हैं. एकदूसरे से तुलना यहीं से होने लगती है, जो बाद में अमीरी तक पहुंच जाती है. अमीरी को सफलता से जोड़ दिया जाता है.”
भारत तेजी से उन देशों में शामिल हो रहा है जहां युवाओं में डिप्रैशन की बीमारी बढ़ती जा रही है. इस की बहुत सी वजहें हैं. इन में प्रमुख वजह खुद को दूसरों के मुकाबले कमतर समझना है. कभी मातापिता की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरने से कुछ लोग डिप्रैशन में चले जाते हैं तो कभी पढ़ाई और नौकरी के बढ़ते दबाव से. अस्पतालों और मनोविज्ञानियों से बात करने पर पता चला कि हर 4 में से 1 किशोर डिप्रैशन का शिकार हो रहा है. पहले जहां 25 से 30 साल के बीच डिप्रैशन आता था वहां अब 16-17 साल की उम्र से ही शुरू हो जा रहा है.
कभी पढ़ाई और नौकरी के बढ़ते दबाव से डिप्रैशन हो रहा है तो कुछ लोगों का परिवार तो कुछ के टूटे रिश्ते इस की वजह बनते हैं. वहीं कुछ युवाओं के लिए उन का लुक या अकेलापन डिप्रैशन का कारण बन जाता है. आंकड़ों के अनुसार 13 से 15 साल के बीच का हर 4 में से 1 किशोर डिप्रैशन का शिकार होता है. डिप्रैशन के शिकार किशोर खुद को हमेशा अकेला पाते हैं. उन्हें लगता है जैसे पूरी भीड़ उन्हें ही देख रही है और उन पर हंस रही है.

खुद की कीमत को पहचानें

भारत में ऐसे आंकड़े बढ़ते जा रहे हैं. जैसेजैसे लोग इस बीमारी के चपेट में आने लगते हैं उन में जीने के इच्छा खत्म होने लगती है. दिमाग पर बढ़ते दबाव से पूरे समय शरीर बेचैन रहता है. कम उम्र में ही इन किशोरों में जिंदगी खत्म करने जैसी फीलिंग आने लगती है. डिप्रैशन में हमेशा नकरात्मक विचार ही आते हैं और धीरेधीरे ये भयानक रूप ले लेते हैं. डिप्रैशन में किसी भी एक चीज पर ध्यान लगाना मुश्किल हो जाता है और हमेशा थकान सी रहती है. जहां कुछ टीनएज इस बीमारी से पूरी तरह टूट जाते हैं वहीं कुछ पूरी हिम्मत के साथ इस का मुकाबला करते हैं, सफल होते हैं.

निधि शर्मा कहती हैं, “युवा लाइफस्टाइल में कुछ बदलाव कर के अपनी मैंटल हैल्थ को सुधार सकते हैं. गैजेट्स और सोशल मीडिया से दूरी बनाएं. सोशल मीडिया का लंबे समय तक इस्तेमाल आप में उदासी, अकेलापन, ईष्या, चिंता और असंतोष जैसी भावनाएं पैदा कर सकता है. इस से बचने के लिए आप ‘सोशल मीडिया डिटौक्स’ कर सकते हैं. हमें परिवार और दोस्तों के साथ समय बिताते वक्त भी अपने फोन से दूरी रखनी चाहिए, जैसा कि आप किसी कौर्पोरेट मीटिंग के समय करते हैं. रात में सोते समय फोन से दूरी आप की नींद की क्वालिटी को बढ़ाती है और सुबह फ्रैश उठते भी हैं.”

आप को ऐसा लग सकता है कि औफिस और घर में होना वाला स्ट्रैस आप के कंट्रोल में नहीं है, लेकिन अपने स्ट्रैस को कम करने के लिए आप कभी भी स्थिति को अपने हाथ में ले सकते हैं. इफैक्टिव स्ट्रैस मैनेजमैंट आप को जीवन में तनाव कम करने में मदद करता है. अगर आप जान जाएं कि जिंदगी का हर दिन एक गिफ्ट है तो आप अपनी जिंदगी को गंभीरता से जिएंगे. हम कभीकभी यह भूल जाते हैं कि जीवन कितना क्षणभंगुर है और हम कितने कीमती हैं. केवल आप को पता है कि आप ने कितनी कठिनाइयों का सामना किया है. आप का दिल जानता है कि आप ने कितनी बहादुरी दिखाई है. चिंता और अवसाद को रोकने के लिए आप को यह भी जानना चाहिए कि आप कितने अनमोल हैं.
हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में राजधानी एक्सप्रैस की स्पीड से भाग रहे हैं और हर किसी पर किसी न किसी से आगे निकलने का बहुत दबाव है. प्रतिस्पर्धा अच्छी है, लेकिन कभीकभी खुद को धीमा करने से खुद का मैंटल हैल्थ ठीक होता है तो आराम कर लें. इस से मैंटल हैल्थ ठीक होगी, डिप्रैशन दूर हो सकेगा.

खराब हो रही भारत की विदेश नीति

किसी भी देश के विकास में उस की नीतियों की भूमिका अहम होती है. पड़ोसी देशों के साथ उन की नीतियां भी देश के विकास में सहायक होती हैं. भारत की घरेलू राजनीति का प्रभाव विदेश नीति पर भी पड़ रहा है. पड़ोसी देशों के साथ उस के संबंध खराब हो रहे हैं. ऐसे में दुश्मन ताकतवर हो रहा है. जैसे मालदीव के साथ भारत के रिश्ते खराब हुए तो वहां चीन ने अपना प्रभाव बढ़ा लिया, जो भारत के लिहाज से ठीक नहीं है. मालदीव में इंडिया आउट कैंपेन चलाने वाले राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू की पार्टी संसदीय चुनाव में अपना दबदबा कायम रखने में सफल हो गई है. 21 अप्रैल तक के चुनावी नतीजों में 93 सीटों पर हुए चुनाव में 86 सीटों के नतीजों में 66 सीटों पर मुइज्जू की पीपल्स नैशनल कांग्रेस जीती है. किसी भी पार्टी को बहुमत के लिए 47 से ज्यादा सीटों की जरूरत थी. मुइज्जू की जीत भारत के लिए बड़ा झटका है.

भारत और चीन की इस चुनाव पर निगाहें थीं. दोनों रणनीतिक रूप से अहम मालदीव में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहते हैं. मुइज्जू की पार्टी की जीत के बाद अब मालदीव में आने वाले 5 साल तक चीन समर्थक सरकार रहेगी. इसे भारत की नजर से सही नहीं माना जा रहा है. मोहम्मद मुइज्जू की पार्टी को पिछले संसदीय चुनाव में मात्र 8 सीटें हासिल थीं. इस के चलते राष्ट्रपति होने के बावजूद मुइज्जू न तो अपनी पौलिसीज के मुताबिक बिल पास करा पा रहे थे और न ही बजट पास करा पाए. अब 66 सीटें जीतने के बाद विपक्षी पार्टी उन के रास्ते में कोई रुकावट पैदा नहीं कर सकेगी. भारत समर्थक मानी जाने वाली मालदीव डैमोक्रेटिक पार्टी की करारी हार हुई है. मुइज्जू भारतीय सैनिकों को देश से निकालने के वादे पर जीते हैं. मुइज्जू ने राष्ट्रपति चुनाव की तरह संसदीय चुनाव में भी भारतीय सैनिकों को मालदीव से निकालने के मुद्दे का सहारा लिया था.

राष्ट्रपति बनने से पहले मोहम्मद मुइज्जू मालदीव की राजधानी माले के मेयर थे. 2018 में जब मालदीव के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्दुल्लाह यामीन को सत्ता छोड़नी पड़ी तब मुइज्जू देश के कंस्ट्रकशन मिनिस्टर थे. यामीन के जेल जाने पर मोहम्मद मुइज्जू को उन की पार्टी को लीड करने का मौका मिला. यामीन की तरह ही मुइज्जू भी चीन के हिमायती बने रहे. 15 नवंबर, 2023 को मालदीव के नए राष्ट्रपति और चीन समर्थक कहे जाने वाले मोहम्मद मुइज्जू ने शपथ ली थी. इस के बाद से भारत और मालदीव के रिश्तों में खटास आई.

मोहम्मद मुइज्जू ने अपने चुनावी कैंपेन में इंडिया आउट का नारा दिया. मालदीव के मंत्रियों ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की. मुइज्जु ने सत्ता में आने के बाद मालदीव में मौजूद भारत के सैनिकों को निकाल देने के आदेश दिए. मोहम्मद मुइज्जू ने भारत के साथ हाइड्रोग्राफिक सर्वे एग्रीमैंट खत्म करने की घोषणा की. इस तरह से मोहम्मद मुइज्जू के दोबारा सत्ता में आने से उन का भारत विरोध बढ़ेगा. यह भारत की खराब विदेश नीति का उदाहरण है जहां हमारे खराब होते संबंधों का लाभ चीन ने उठा लिया है.

चीन के साथ सीमा विवाद

विदेश नीति में भारत के सामने सब से बड़ी समस्या चीन के साथ सीमा विवाद है. इस विवाद के कारण ही चीन पड़ोस में भारत का विरोध करने वाले पाकिस्तान और मालदीव जैसे देशों को उकसा रहा है. 2020 में ही पूर्वी लद्दाख के गलवान में चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हिंसक झड़प हुई और भारत के 20 सैनिकों की मौत हो गई थी. अब भी एलएसी पर कई जगह दोनों देशों के सैनिक आमनेसामने खड़े हैं. इस का कोई हल नहीं खोजा जा सका है.
भारत की विदेश नीति बदलती जा रही है. इस के कई खराब परिणाम भी देखने को मिलेंगे. यूक्रेन पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के हमले ने शीत युद्ध के बाद रूस और अमेरिका के बीच सुलह की संभावनाओं को खत्म कर दिया. चीन और अमेरिका के बीच भी प्रतिद्वंद्विता बढ़ गई है. दूसरी तरफ चीन ने ताइवान पर सैन्य दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है. अमेरिका ने भी चीन में तकनीक के निर्यात को ले कर नियम कड़े कर दिए हैं. महाशक्तियों के बीच टकराव का दौर वापस आ गया है. ऐसे में भारत के लिए संतुलन बनाए रखना मुश्किल काम है.

भारत ने विदेश नीति में मध्य मार्ग अपनाया है. रूस से सस्ता तेल खरीदने के कारण पश्चिम के कई देश भारत से असहज हुए. भारत को लगता है कि चीन को रोकने में रूस एक अहम देश है. यूक्रेन-रूस जंग में भारत के लिए किसी पक्ष को चुनना बहुत मुश्किल रहा. एक तरफ पश्चिम और यूरोप से भारत की रणनीतिक साझेदारी है तो दूसरी ओर रूस से पारंपरिक संबंध. यूक्रेन संकट के दौरान भारत ने खुद को गुटनिरपेक्ष नीति के तहत किसी खेमे में नहीं जाने दिया.
गुटनिरपेक्षता भारत की विदेशी नीति की बुनियाद है. इस की शुरुआत भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने की थी. तब दुनिया दो ध्रुवीय थी. एक महाशक्ति अमेरिका था और दूसरी सोवियत यूनियन. इस बार भी जब यूक्रेन पर रूस ने हमला किया, तो भारत पर दबाव था. यूक्रेन पर हमले के बाद दुनिया ध्रुवीकृत हुई. एक गुट अमेरिका का बना और दूसरा रूस और चीन का. यहां भारत नौन अलाइनमैंट यानी गुटनिरपेक्ष के बदले अब मल्टी अलाइनमैंट बहुपक्ष की नीति पर चला. भारत चीन और रूस की अगुआई वाले ब्रिक्स, एससीओ और आरआईसी में भी है और अमेरिका, आस्ट्रेलिया, जापान के गुट क्वाड में भी शामिल है. भारत को ले कर कहा जा रहा है कि ‘जो हर गुट में होता है, वह किसी भी गुट में नहीं होता’.

इस से साफ हो रहा है कि भारत नौन अलाइनमैंट यानी गुटनिरपेक्ष नीति छोड़ कर मल्टी अलाइनमैंट की तरफ बढ़ गया है. भारत समेत कोई भी देश दूसरे देशों से सहयोग के बिना आगे नहीं बढ़ सकता. भारत भी ज्यादा वैश्विक हुआ है. इस से उस की छवि प्रभावित हुई है. भारत के लिए भी यह काफी निराशाजनक रहा. मोदी सरकार के लिए पूरा साल विदेश नीति के लिहाज के काफी मुश्किल भरा रहा. भारत एक तरफ खड़ा नजर नहीं आया.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूसी राष्ट्रपति पुतिन के मुंह पर कैमरे के सामने कहा कि यह युद्ध का दौर नहीं है. दूसरी तरफ भारत ने रूस के खिलाफ पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का समर्थन नहीं किया और खुद को इस से अलग रखा. जबकि भारत का रूस से तेल आयात और सैन्य सहयोग बढ़ता गया. दोनों देशों ने अपनीअपनी मुद्रा में द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने पर सहमति जताई.

1990 के दशक से भारत की करीबी अमेरिका से बढ़ रही है. अमेरिका से भारत की बढ़ती करीबी को चीन से काउंटर के रूप में देखा जाता है. अमेरिका से बढ़ती करीबी को इस रूप में भी देखा जाता है कि भारत ने गुटनिरपेक्षता की नीति को अब छोड़ दिया है.

भारत का झुकाव अमेरिका की ओर

भारत ने 2013 में आधिकारिक रूप से नए सिद्धांत स्ट्रैटिजिक स्वायत्तता की नीति को स्वीकार किया था. लेकिन इस में यह नहीं बताया गया था कि क्या बदलने वाला है. 1979 के बाद 2016 में नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री थे, जो 120 देशों के गुटनिरपेक्ष आंदोलन की वार्षिक बैठक में शामिल नहीं हुए थे. गुटनिरपेक्ष आंदोलन की स्थापना में नेहरू की अहम भूमिका थी. मोदी सरकार के दौर में अमेरिका से करीबी और बढ़ी.
भारत ने अमेरिका से रक्षा सहयोग को विस्तार दिया. मोदी ने अमेरिका को स्वाभाविक सहयोगी बताया था जो गुटनिरपेक्षता की परंपरा के उलट था. भारत की अमेरिका से बढ़ती करीबी अवसरवादी है और इस पर बहुत भरोसा नहीं किया जा सकता जबकि सोवियत यूनियन के साथ भारत के रिश्ते अलग किस्म के थे.

2019 में भारत के विदेश सचिव विजय गोखले ने कहा था कि भारत और अमेरिका सहयोगी हैं लेकिन मुद्दा आधारित सहयोग है. दोनों देशों का सहयोग वैचारिक नहीं है. यह चीन से अमेरिकी बादशाहत को मिल रही चुनौती के कारण हो रहा है. इसलिए वह भारत के साथ सहानुभूति रखता है. भारत चीन के साथ लगी सरहद पर अब भी कोई समाधान नहीं निकाल पाया है. पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर तनाव के बीच अरुणाचल के तवांग में भारत और चीन के सैनिक आपस में भिड़े हैं. मालदीव में भारत विरोधी सरकार आने से चीन की रणनीति सफल हुई है. इस में भारत की भूमिका अहम रही है. उस ने मालदीव सरकार से अपने संबंध सही नहीं रखे.

दलित शादियां लड़कियों की चुनौतियां

शहरों में रहने वाली दलित लड़कियां भी अब पढ़लिख कर आगे बढ़ने लगी हैं. वे भी चाहती हैं कि उनकी शादी रीतिरिवाज और धूमधाम से हो. उन की शादी में भी दानदहेज, चढ़ावा, दिखावा सबकुछ हो. इससे उनको समाज में बराबरी का एहसास होता है. लड़कियों को लगता है कि शादी के रीतिरिवाज, धूमधाम और बैंडबाजाबरात के दिखावे में दलितों के साथ भेदभाव वाले विचार खत्म हो जाएंगे. लेकिन दलितों में होने वाली महंगी शादियों से भेदभाव और दलितों के खिलाफ वाली सोच खत्म नहीं हो रही. जबकि, दलित लड़कियों की महंगी शादियों से उनके घरपरिवार पर आर्थिक बोझ बढ़ने लगा है.

सामाजिक दबाव में जिनके पास पैसा नहीं होता वे कर्ज लेकर या जमीन बेचकर खर्च करने लगे हैं. दहेज जैसी कुरीतियां अब यहां भी घर करने लगी हैं. शादी के रीतिरिवाजों के साथ दलित शादियों में भी पूजापाठ बढ़ने लगा है. इसी पूजापाठ के विरोध में दलितों ने कभी बौद्ध धर्म स्वीकार किया था. समय के साथ साथ बौद्ध धर्म में भी ऐसे ही कर्मकांड होने लगे हैं. रीतिरिवाजों से धार्मिक कुरीतियों और रूढ़िवादिता बढ़ने लगी है जो दलित समाज के लिए अच्छा नहीं है. शादी जीवन को चलाने का एक अरेंजमैंट है. इसको इतना ही महत्त्व देने की जरूरत है. रीतिरिवाजों, कर्मकांड और पाखंड व्यवस्था को जटिल बनाकर चढ़ावा चढ़ाने के लिए मजबूर करते हैं.

26 मार्च,2023 को बहुजन समाज पार्टी के राष्ट्रीय कोऔर्डिनेटर और बसपा प्रमुख मायावती के भजीते आकाश आनंद की शादी के लिए गुरुग्राम के एंबिएंस डौट रिजौर्ट को भव्य रुप दिया गया था. आकाश आनंद मायावती के सबसे छोटे भाई आनंद कुमार के बेटे हैं. बापबेटे दोनों ही बसपा में प्रमुख पदाधिकारी हैं. रिजौर्ट की सजावट,विशेषतौर पर, फूलों से की गई थी. इन फूलों को देश के विभिन्न हिस्सों से मंगाया गया था.

इनमें से कई फूल ऐसे थे जो खासतौर से विदेशों से मंगाए गए थे. दूल्हादुलहन को बैठने के लिए विशेष सजावट के साथ स्टेज बनाया गया था. इसके 2 दिनों बाद 28 मार्च को नोएडा में रिसैप्शन दिया गया. यहां रिजौर्ट को दुलहन की तरह सजाया गया था. गुरुग्राम के रिजौर्ट में हाथी का स्टेचू भी बनाया गया था. उसको भी सजाया गया था. हाथी बसपा का चुनाव चिन्ह है.

एंबिएंस डौट रिजौर्ट में सबसे पहले शाम 7 बजे इंगेजमैंट के रस्म हुई. इसके बाद रात 10 बजे वैवाहिक कार्यक्रम संपन्न कराया गया. शादी कराने के लिए सरनाथ, कुशीनगर और लखनऊ से बौद्ध भिक्षु (भंते) बुलाए गए. बुद्ध वंदना, त्रिशरण, पंचशील और परित्राण पाठ के बाद शादी के प्रमुख संस्कार कराए गए. जयमाल की रस्म भी कराई गई. देररात तक शादी की रस्में चलती रहीं.

आकाश की शादी डाक्टर प्रज्ञा सिद्धार्थ के साथ हुई. वह पूर्व राज्यसभा सदस्य डाक्टर अशोक सिद्धार्थ की बेटी है. अशोक सिद्धार्थ का बसपा से पुराना रिश्ता है. वे दलित अंदोलन से जुड़े रहे हैं. आकाश ने लंदन से एमबीए की डिग्री हासिल की है. वे बहुजन समाज पार्टी के नैशनल कोऔर्डिनेटर हैं.

2019 के लोकसभा चुनाव में वे बसपा के स्टार प्रचारक रहे. मायावती के साथ लगभग हर मंच पर दिखते थे. शादी के बाद रिसैप्शन की जो फोटो सोशल मीडिया के जरिएलोगों तक पहुंचीं, उनमें आकाश सफेद शेरवानी और उनकी पत्नी डाक्टर प्रज्ञा सिद्वार्थ रेड और व्हाइट लंहगे में थीं. रिसैप्शन पार्टी में हिस्सा लेने पहुंचीं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री और बसपा प्रमुख मायावती ने पिंक सूट पहना था. आमतौर पर वे क्रीम कलर का सूट पहनती हैं.

आकाश और प्रज्ञा की मुलाकात लंदन में पढ़ाई के दौरान हुई थी. वे वहां पढ़ाई कर रहेथे. इसके बाद दोनों में बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ. प्रज्ञा एमडी की पढ़ाई करने वहां गई थी. उस के पिता डाक्टर अशोक सिद्धार्थ भी पेशे से डाक्टर हैं. 2008 में सरकारी नौकरी छोड़ कर उन्होंने बसपा की राजनीति में कदम रखा था. साल 2009 में वे एमएलसी बने. 2016 से 2022 तक वे राज्यसभा के सदस्य रहे. वे मायावती के बेहद करीबी माने जाते हैं. मायावती के कहने पर ही यह शादी हुई है. गेस्ट लिस्ट मायावती के हिसाब से बनी थी. शादी के कार्ड पर महात्मा बुद्ध की फोटो को प्रमुखता दी गई थी.

शादी समारोह से विपक्षी नेताओं को दूर रखा गया था. बेहद करीबी लोगों को ही बुलाया गया था. शादी के फोटो बाहर न जाएं, इसका पूरा खयाल रखा गया. चुने हुए कुछ फोटो ही सोशल मीडिया के जरिए दिखे. शिरोमणि अकाली दल नेता सुखबीर सिंह बादल ही पत्नी हरसिमरत कौर बादल के साथ शादी में शामिल होने के लिए आए थे. बसपा के प्रमुख नेताओं के अलावा किसी को बुलाया नहीं गया था. रिसैप्शन में करीब 7 हजार लोगों की व्यवस्था की गई थी. आकाश और प्रज्ञा की शादी उनकी हैसियत के हिसाब से बेहद सादगी जैसी रही.

दलित लड़कियों की शादियां अब बदल रही हैं. बदलाव केवल महंगाई के स्तर पर ही नहीं है. आम शहरी दलितों की सोच में भी बदलाव आ रहा है. बदलाव केवल आर्थिक स्तर पर ही नहीं है. रीतिरिवाजों में भी बदलाव होने लगा है. घोड़ा, बग्घी और हैलिकौप्टर तक से बरात लाने का दिखावा बढ़ता जा रहा है. जो रिवाज ऊंची जातियों के थे वे अब बराबरी के नाम पर दलित भी अपनाने लगे हैं.

सरकारी नौकरी, बिजनैस और राजनीति में आने के बाद जो परिवार आर्थिक रूप से मजबूत हो गएहैंवे अपने समाज को आगे बढ़ाने की जगह पर अपना पैसा दिखावे में खर्च कर रहे हैं. आज के दौर में दलितों में शादियों 2 तरह से होती हैं. एक सामान्य हिंदू विवाह की तरह और दूसरी जिन दलितों ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया है वेबौद्ध रीतिरिवाजों से शादी करते हैं. शादी के बाद दिखावे का पूरा प्रबंध अब होने लगा है. भले ही कुंडली बनवाने वाले लोगों की संख्या कम हो पर लड़की का बायोडाटा बनने लगा है, जिसमें यह लिखा होता है कि लड़की मंगली है या नहीं.

 

अलग थी डाक्टर अंबेडकर की सोच

डाक्टर अंबेडकर ने महिलाओं को अधिकार देने के लिए ‘हिंदू कोड बिल’ तैयार कर 5 फरवरी, 1951 को लोकसभा में प्रस्तुत किया था. इस बिल का बड़ा विरोध हुआ. अंबेडकर विरोधी लोगों ने इस बिल को हिंदू संस्कारों पर कुठाराघात के रूप में देखा. तो कुछ ने इसको पितृसत्ता की जड़ों को कमजोर करने वाला बताया. इस बिल का विरोध सदन के अंदर से लेकर बाहर तक विभिन्न नेताओं और संगठनों द्वारा किया गया था. जिसके बाद यह कानून नहीं बन सका.

डाक्टर अंबेडकर मानते थे कि विवाह को पितृसत्ता से दूर किया जाए. उनका मानना था कि महिलाओं के जीवन में विधवा और तलाकशुदा होने की जो त्रासदी है उससे स्त्री को मुक्त किया जाए. अंबेडकर बड़ी निर्भीकता के साथ स्त्री मुक्ति की लड़ाई लड़ते रहे. वे विवाह संस्कार को शादी से बाहर रखना चाहते थे. उन के बौद्ध धर्म अपनाने के पीछे प्रमुख वजह यह भी थी.

डाक्टर अंबेडकर का मनाना था कि शादी में प्रमुख भूमिका लड़कालड़की की होती है. उनकी पंसद का खयाल रखना चाहिए. मातापिता का रोल गैरजरूरी होता है. शादी के बाद का जीवन लड़कालड़की को खुद चलाना होता है. ऐसे में वे अपने फैसले खुद करेंगे तो उनकी ही जवाबदेही होगी.

इसके लिए गैरबिरदारी में शादी के लिए के लिएस्पैशल मैरिज एक्ट बनाया गया. इस एक्ट में भी अलगअलग धर्मों को उनके अनुसार शादी करने का विकल्प छोड़ दिया गया. स्पैशल मैरिज एक्ट में हिंदू विवाह पद्धति यानी विवाह संस्कार के हिसाब से कर सकते हैं. इसके बाद विवाह का रजिस्ट्रेशन स्पैशल मैरिज एक्ट के तहत करवा सकते हैं. स्पैशल मैरिज एक्ट एक तरह से शादी के रजिस्ट्रेशन तक सीमित होकर रह गया. इसका भी बहुत प्रचारप्रसार नहीं किया गया क्योंकि इसमें बिना रीतिरिवाज के भी शादी करके रजिस्टर्ड करवाई जा सकती है.

 

बौद्ध धर्म में भी होते हैं कर्मकांड

बौध धर्म में हिंदू विवाह की कमियों को दूर करने का प्रयास किया गया. समय के साथसाथ वहां भी रीतिरिवाज और परंपरा शुरू हो गई. बहुत से दलित ऐसे हैंजिन्होंनेहिंदू धर्म को छोड़ कर बौद्ध धर्म अपनाया,वे अपने विवाह संस्कार का पालन करते हैं. इनकी संख्या बहुत कम है. बौद्ध धर्म के अनुसार शादी करने वाले भी अपने रीतिरिवाज करते ही हैं. बौद्ध धर्म में भी सबसे पहले विवाहस्थल पर एक पूजा स्थान तैयार किया जाता है.

सुंदर सी पूजा वेदिका पर भगवान बुद्ध की मूर्ति या चित्र रखा जाता है. उससे थोड़ा सा नीचे अपने कुल पूर्वजों और अपने पूजनीय बोधिसत्वों के चित्र रखे जाते हैं. कई लोग बाबा साहब का फोटो भी रखते हैं. उसके सम्मुख मिट्टी या धातु का एक कलश रखकर कटोरी में दीप जलाते हैं. कलश या मटके में सफेद धागे का एक सिरा डुबो देते हैं. उसका एक हिस्सा निकाल कर भगवान बुद्ध के हाथ में लपेटते हुए उसी सिरे को वर पक्ष, वधू पक्ष के संबंधियों के हाथ में थमाते हुए वरवधू के हाथ में देते हैं और दूसरे सिरे को कलश में ही लपेट देते हैं. यह कराने वाला आचार्य होता है.

बुद्ध पूजा से विवाह संस्कार की विधिवत शुरुआत करते हैं, जिसमें पहले बुद्ध वंदना, फिर धम्म वंदना और अंत में संघ वंदना का पाठ करते हैं. इसके बाद पूजा का बाकी काम आचार्यजी द्वारा पूरा किया जाता है. दोनों पक्षों द्वारा घोषणाएं होने के बाद उपस्थित लोग साधु, साधु, साधु बोलते हैं.वरवधु दोनों एकदूसरे को स्वीकार करने की सार्वजनिक घोषणा करते हैं.

जलार्पण विधि से पाणिग्रहण संस्कार होता है. इस में वधु के दाएं हाथ की हथेली वर की हथेली के ऊपर रखी जाती हैं. उनके ऊपर दोनों के पिता अपना हाथ लगाते हैं तथा दोनों के हाथों के नीचे एक थालीरखी जाती है. वधु का भाई लोटे से पानी हाथ पर डालता हैऔर आचार्य गाथाओं का पाठ करता है. वरवधु के हाथों में आचार्य रक्षासूत्र बांधता है. बौद्ध वरवधु जयमाला पहनाते हैं. इसके बाद बौद्ध विवाह संस्कार पूरा हो जाता है. इस तरह से देखें तो बौद्ध धर्म में भी अपने कर्मकांड होते ही हैं.

 

रीतिरिवाजों के जरिएबढ़ रहा धर्म का प्रभाव

दलित लड़कियों में शिक्षा बढ़ रही है. शिक्षा के साथ ही साथ दिखावा भी बढ़ रहा है. उनको लगता है कि रीतिरिवाजों के अपनाने से समाज में बराबरी हासिल हो जाएगी. इस वजह से शादी में बदलाव दिख रहा है. दलितों में पैठी पुरानी सोच से लड़कियों की पढ़ाई और शादी दोनों का टकराव होने लगा है. ज्यादा गरीबी होने के कारण लड़कियां शिक्षा में पिछड़ जाती हैं. अधिकतर दलित परिवार अपनी रोजमर्रा की बुनियादी जरूरतें पूरी करने में ही परेशान रहते हैं. जिसका सीधा दवाब लड़कियों पर पड़ता है. जहां जितनी आर्थिक समस्या होती है वहां स्थिति और खराब होती है. शहरी लड़कियों के पास बाहर जाकर पढ़ाई के अवसर अधिक होते हैं.

शहरों में अब बढ़ी संख्या में दलित लड़कियां स्कूलकालेज जाने लगी हैं. वे नौकरी भी करने लगी हैं. वे मेहनती होती हैं, इस कारण उनको काम अधिक मिल जाता है. वे अपनी शादीविवाह के फैसले खुद लेने लगी हैं. शादी में चमकदमक वाले रीतिरिवाज, कर्मकांडों से उनके मातापिता को परेशानी नहीं होती है. इस चकाचैंध में समाज में बराबरी का बुनियादी सवाल खो गया है, जिसके कारण बौद्ध धर्म का उदय हुआ था.

आज दलित समाज को यह लगने लगा है कि अगर वह अगड़ी जातियों की तरह धूमधाम, खर्च और रीतिरिवाजों से शादी करेंगे तो समाज में उनको बराबरी का दरजा हासिल हो जाएगा. इसके लिएवे हर काम कर रहे हैं. भले ही इसकी वजह से उनको बड़ा आर्थिक नुकसान ही क्यों न हो जाए.

 

ब्राहमणवाद के शिकजें में दलित

उत्तर प्रदेश के संभल जिले के थाना जुनावई के गांव लोहामई में रहने वाले वाल्मीकि समाज के राजू चैहान अपनी बेटी रवीना की शादी धूमधाम से करना चाहते थे. बरात सुरक्षित तरह से पहुंच जाए, इसके लिएएसपी संभल से बेटी की शादी में बरात चढ़त के दौरान पुलिस सुरक्षा की मांग की.

पुलिस को लगा कि कहीं कोई घटना न घट जाए, इसके लिए उत्तर प्रदेश की पुलिस ने  शादी की सुरक्षा में 60 पुलिसकर्मियों को लगा दिया. थाना प्रभारी ने शादी में 11 हजार रुपए उपहार में दिया. गांव में दलित समाज के लोगों को सम्मानपूर्वक बैंडबाजे के साथ बरात निकालने नहीं दिया जाता था. इसी के चलते राजू ने एसपी को शिकायती पत्र देकर पुलिस सुरक्षा की मांग की थी, जिस पर संभल पुलिस अधीक्षक चक्रेश मिश्रा ने बरात चढ़त के दौरान पूरे समय पुलिस फोर्स तैनात कर दी थी. पुलिस की मौजूदगी में केवल बरात ही नहीं आई,शादी में बैंडबाजा भी बजा.

दरअसल जिन रीतिरिवाजों को दलित बराबरी का हक समझ रहे हैं असल में वे ब्राहमणवाद का ऐसा शिकंजा है जिसके विरोध में कभी दलित आंदोनलशुरू हुआ था. पहले दलितों में सामान्य तरह से विवाह होता था. कोई बड़ाआडंबर नहीं होता था. जिस सामान्य तरह से विवाह होता था उसी तरह से अलगाव भी हो जाता था.

आज दलित लड़कियों की शादी आडंबर का शिकार हो गई हैं. अब केवल बरात आने तक मसला सीमित नहीं रह गया. बरात घोड़े पर चढ़ कर आने लगी हैक्योंकिघोड़े पर चढ़ना राजसी ठाठ माना जाता है. कई परिवारों ने तो हैलिकौप्टर तक का प्रयोग दुलहन लाने में किया.

मीडिया भी इसमें बड़ा रोल अदाकर रहा है. वह इस तरह की रीतिरिवाज वाली खबरों को इस तरह से पेश करता है जैसे इससे ही दलित समाज का बदलाव होगा. उत्तर प्रदेश के कासगंज के निजामपुर गांव में रहने वाली शीतल को ब्याहने सिकंदराबाद के गांव बसई के दलित संजय जाटव घोड़ाबग्गी पर अपनी बरात लेकर पहुंचे. यह बताया गया कि देश की आजादी के बाद यह पहला मौका था. इस गांव को बसे करीब 80 साल हो गए हैं. यहां कभी दलित दूल्हा घोड़ाचढ़ कर नहीं आया. गांव के ठाकुरों का विरोध था. पुलिस ने शादी को धूमधाम से कराने के लिएदोनोंवर्गों के बीच सुलह कराई और सुरक्षा में 300 से ज्यादा पुलिसकर्मी तैनात कर दिए. बरात चढ़ाने के लिए प्रशासन ने रूट तैयार किया. बरात गुजरने वाले रास्ते पर घरों की छतों पर पुलिसबल तैनात किए गएथे.

बरात के संग 10 इंस्पैक्टर, 22 सब इंस्पैक्टर, 35 हैड कांस्टेबल, 100 कांस्टेबल व पीएसी की एक प्लाटून भी चल रही थी. यह नजारा यों लग रहा था मानो किसी वीवीआईपी की शादी हो रही हो. दुलहन की मां मधुबाला ने बताया कि इससे पहले उनकी 3 ननदों की शादी के दौरान ठाकुरों ने बरात का रास्ता रोककर हंगामा किया था. तब बिना गाजेबाजे के ही दरवाजे तक बरात पहुंच सकी थी.

आज दलित इस बात से खुश है कि वह भी रीतिरिवाज और आडंबरों को अपना कर अगड़ी जातियों की बराबरी कर ले रहा है. इस तरह की घटनाएं अनेक हैं. पूरे देश में हैं. सोचने वाली बात यह है कि क्या इस तरह के रूढ़िवादी रीतिरिवाजों के अपनाने से दलित वर्ग को बराबरी का हक मिल जा रहा है. अगर इस तरह के रीतिरिवाजों से बदलाव आता तो आज के दौर में भेदभाव और अत्याचार की घटनाएं खत्म हो जातीं.

 

बाजारवाद का बढ़ता प्रभाव

दलित समाज को रीतिरिवाज की चकाचौंध में फंसा कर बुरी तरह से आगे बढ़ने से रोका जा रहा है. आजादी के बाद जिस तरह से दलितों में शिक्षा और जागरूकता बढ़ाने का काम किया गया उससे एक वर्ग तरक्की कर गया. यही वर्ग रीतिरिवाजों के नाम पर पैसे खर्च कर रहा है. अपनी ही जाति और समाज के कुछ लोगों को इस तरह से आगे बढ़ता देख गरीब दलित भी सोचने लगा है कि वह भी रीतिरिवाज और मंदिरों में जाकर दानपुण्य करके अगड़ी जातियों की बराबरी कर सकता है. शादी समारोह भी इसी तरह से हो गएहैं. शादी में जितने पैसे खर्च होते हैंवे दलितों से निकल कर अगड़ी और पिछड़ी जातियों के पास जा रहा है. इस दिखावे में दलित और अधिक गरीब होता जा रहा है.

आज शहरी या कसबाई दलित लड़कियों की शादी बिना टेंटहाउस या गेस्टहाउस के नहीं होती है. गेस्टहाउस या टेंट का प्रबंध करने वाला अगड़ी जाति का होता है. खाना बनाने के लिए कैटर या हलवाई अगड़ी जाति का होता है. यहां तक की बरात के लिएघोड़ा गाड़ी, कार, और बस का प्रबंध करने वाला भी अगड़ीपिछड़ी जाति का होता है. लाइट, डीजे और शादी के दूसरे प्रबंध करने में पैसा दलित के पास से निकल कर अगड़ीपिछड़ी जातियों की जेब में जाता है. रीतिरिवाज इसका माध्यम बनते हैं. रीतिरिवाज और दिखावे के चक्कर में दलित गरीब होता जा रहा है.

 

पढ़ाई से अधिक शादी पर खर्च

दलित समाज के लिए जरूरी था कि वह आगे बढ़ने के लिएशिक्षा और रहनसहन सुधारने में पैसा खर्च करे. इसकी जगह पर खर्च शादियों के महंगे आयोजनों में होने लगा है. एक शादी में कम से कम 400 से 500 से कम लोग खाना खाने नहीं आते हैं. एक आदमी का औसतन खर्च 500रुपए से 800रुपए के बीच आता है. ऐसे में केवल खानेखाने का खर्च ढाई से 4 लाख के बीच का पड़ता है. इस तरह से दूसरे खर्च भी हैं. दहेज और लेनेदेन भी खूब होने लगा है. इस तरह की शादी का खर्च 15 से 20 लाख का हो जाता है.

दलितों में ऐसे लोगों की संख्या कम है जो बड़े अफसर होते हैं, जिनका वेतन अधिक होता है. बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो सामान्य और नीचे की श्रेणी के नौकर हैं. ये जो अपने जीवनकाल के लिए बचाकर रखते हैं वह शादी के दिखावे में खर्च हो जाता है.

शिक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि पहली से 12वीं कक्षा तक के नामाकंन में दलित लड़कियों की संख्या अधिक होती है. उच्च शिक्षा में वे पीछे हो जाती हैं. उच्च शिक्षा हासिल करने वालों का राष्ट्रीय औसत 24.3 प्रतिशत है जबकि यह दलितों में 19.1 प्रतिशत है.

साल 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में शिक्षा के क्षेत्र में पुरुषों की साक्षरता दर 83.5 फीसदी है और महिलाओं की 68.2 फीसद. लेकिन अनुसूचित जाति में महिलाओं की साक्षरता दर केवल 56.5 फीसदी ही है. वहीं, अनुसूचित जनजाति में महिलाओं की साक्षरता दर 49.4 फीसदी.

पढ़ाई के ये आकंडे बताते हैं कि दलितों में शिक्षा के प्रति सोच क्या है और क्या हालत है? घरपरिवार के लोग लड़की की पढ़ाई में खर्च नहीं करना चाहते. वे लोग शादी के नाम पर लाखों खर्च कर देते हैं. अगर यही पैसा लड़कियों की शिक्षा पर खर्च हो तो दलित समुदाय की हालत बदल जाए. पहले कम खर्च में साधारण तरह से दलितों में शादी हो जाती थी, जिससे घरपरिवार पर बोझ नहीं पड़ता था. दलित बिरादरी में भी पैसेवाले और गैरपैसेवाले2 तरह के वर्ग पैदा हो गएहैं. पैसे वाला वर्ग अपने लोगों की मदद नहीं करता. कम पैसे वाला अपनी हैसियत बढ़ाने के लिए कर्ज लेकर शादी करने लगा है.

 

ब्राहमणों को पूजा से परहेज नहीं

जब दलित भी रीतिरिवाज और पाखंड में पैसा खर्च करने लगा है तो कर्मकांड कराने वाले ब्राहमणों को उससे परहेज नहीं रह गया है. इसकी वजह यह है कि अधिकतर शादियां अब गेस्ट हाउस और मैरिज हाल में होती हैं. वहां जाने में ब्राहमण को कोई परहेज नहीं होता. शादी कराने पर उनको चढ़ावा मिलता है. यह एक ऐसा काम हो गया है जिस में ब्राहमणों की भी एक नई जमात पैदा हो गई है जिनको कर्मकांड का उतना पता है जितने में काम हो जाए.

उनको इस बात से मतलब अधिक होता है कि चढ़ावा कितना मिल रहा है. किसके घर जा कर कराना पड़ रहा है, इससे मतलब नहीं. अपने बचाव में वे कहते हैं, हम हिंदू के घर जा रहे हैं, हमें इतना ही पता है. शादी के रीतिरिवाज, कर्मकांडों के बाद बराबरी का यह भाव नहीं रहता. फिर लोग अपनीअपनी जाति के हिसाब से अलगअलग सोचने लगते हैं.

कई परिवार ऐसे हैं जो शादी के कर्मकांड अलगअलग तरह से करते हैं. इसके बाद सार्वजनिक रूप से दावत देते हैं जिसमें वे अपने से ऊंची जातियों के लोगों को जरूर बुलाते हैं, जिससे वे अपनी बिरादरी से अलग दिख सकें. वे अपनी बिरादरी को दिखा सकें कि समाज में उनका इतना प्रभाव है कि बड़े लोगों को भी आने में कोई दिक्कत नहीं होती. लोग रीतिरिवाजों के जरिए अपना प्रभाव भी दिखाना चाहते हैं. शादीविवाह के आयोजन दिखावे का एक जरिया हो गएहैं. इससे समाज में वे बराबरी का भाव खोज रहे होते हैं. असल में दावत और रीतिरिवाजों से यह भाव पैदा नहीं होता है.

 

लड़कियों की अधकचरी सोच

दलित समाज की शहरी लड़कियों की सोच अधकचरी हो गई है. वे भी टीवी, फिल्म, सोशल मीडिया को देख रही हैं. उनके जीवन से किताबों का स्थान खत्म होता जा रहा है. वे स्कूली किताबों के अलावा कुछ नहीं पढ़तीं. 15-20 साल पहले समाज में पढ़नेलिखने के लिए किताबेंथीं. तमाम दलित संगठन थे जो शिक्षा पर जोर देते थे. उस समय दलित लड़कियां भी गंभीर लेख पढ़ती थी. उनमें से तमाम कहानियां लिखती थीं. यही वजह थी कि लेखन में दलित साहित्य का प्रभाव बढ़ गया था. धीरेधीरे वे ब्राहमणवाद का शिकार हो गईं. वे वही साहित्य पढ़ने लगीं जिन में ब्राहमणवाद का बखान होता था. रीतिरिवाजों को अच्छा बताया जाता था.करवा चौथ जैसे त्योहारों का महिमामंडन होता था.

इस सब के जरिएउन्हें यह समझाया जाता था कि धर्म जो कह रहा है वही सबसे अच्छा होता है. दलित मंदिरों में जाने की जिद करने लगे. मंदिरों में जाना बराबरी का हक माने जाने लगा. दलितों ने मंदिर में जाकर उस पूजापाठ को अपनाया जो उनके खिलाफ समाज को बढ़ावा देता है. दलितों के घरों में रामायण का पाठ होने लगा और वे ताली बजाकर ‘ढोल, गंवार, शुद्र पशु नारी’ जैसी चैपाइयों को ताली बजाबजाकर गाने लगा. असल में देखें तो दलितों की सोच में आए इस बदलाव ने ही पूरे दलित आंदोलन को खत्म करने का काम किया.

 

रीतिरिवाजों से नहीं मिला बराबरी का हक

आज दलित राजनीतिक रूप से ब्राहमणवाद का शिकार होकर हाशिए पर चला गया है. अब दलित राजनीति का अपना वजूद खत्म हो गया है. वह अगड़ीपिछड़ी जातियों के पीछे चलने का मजबूर है. जैसेजैसे उसके जीवन में रीतिरिवाज और आडंबर बढ़ेंगे वह पीछे जातारहेगा.

कल तक जिस ब्राहमण के पैर छूने से दलित को परहेज होता था, आज उनके पैर छू कर आशीर्वाद लेने वालों में वह भी कतार में खड़ा है. सोचने वाली बात यह है कि क्या इससे बराबरी का हक मिला है. इसका जवाब नहीं में है. अगर रीतिरिवाजों से बराबरी का हक मिल गया होता तो भेदभाव खत्म हो गया होता. आज भी समाज में जातिप्रथा कायम है.

दलित मंदिर में चढ़ावा चढ़ाने जाता है. उसने मंदिर में घुसने का अधिकार पा लिया क्योंकि वह चढ़ावा चढ़ाने की हैसियत में आ गया है लेकिन उसको मंदिर में पुजारी बनने का हक नहीं है. यह बताता है कि बराबरी की बातें बेमानी हैं. आज भी दलित लड़कियों से सवर्णो की शादी नहीं हो सकती. शहरों में भी अगर मजबूरी न हो तो अगलबगल घर दलित का लोग पंसद नहीं करते. सबसे पहले वे अपनी बिरादरी के साथ रहने को अच्छा समझते हैं.

दलित लड़केलड़कियों को आज भी अच्छी नौकरी नहीं मिलती. दलितों की सोच में रीतिरिवाजों को लेकर कितने भी बदलाव आ जाएं, भेदभाव खत्म होता नहीं दिख रहा. रीतिरिवाजों का यह प्रभाव हो रहा है कि दलित वर्ग अपने हित की बातें भूलता जा रहा है. वह अगड़ी जातियों की बराबरी के चक्कर में रूढ़िवादी और पाखंडी होता जा रहा है. वह शिक्षा की जगह पांखड को अपनाता जा रहा है. इनसे होने वाले खर्च को पूरा करने के लिए वह शिक्षा, स्वास्थ्य और अच्छे रहनसहन का प्रबंध नहीं कर पा रहा है.

आज जब गरीबों की बात होती है तो सबसे बड़ा वर्ग दलितों का सामने दिखता है. शिक्षा और सरकारी सुविधाओं को लेकर एक छोटा वर्ग संपन्न दिखने लगा है पर बहुत बड़ा वर्ग गरीबी में जी रहा है. पाखंड और रीतिरिवाज उसको आगे नहीं बढ़ने दे रहे. आजादी के बाद से करीबकरीब 1990 तक दलित आंदोलन मजबूती से चलता था. उस समय जो लोग पाखंड का विरोध करके आगे बढ़ेवे आज रीतिरिवाज को मानने लगे हैं. अपने से संपन्न और बुद्धिमान लोगों को ऐसा करता देख पूरा समाज इसे ही जीवन का लक्ष्य मान कर चलने लगा है.

दलित लड़कियां सरकारी एग्जाम की तैयारी करने लगी हैं. कुछ शहरों में जाकर कोचिंग भी करने लगी हैं. कई दूसरे बढ़ेशहरी स्कूलों में पढ़ने भी लगी हैं. जिन परिवारों को आरक्षण के तहत सरकारी नौकरी या राजनीति में आकर संपन्न्ता मिली है उनके परिवार की लड़कियों को सामान्य लोगों जैसे अवसर मिलने लगे हैं. इनकी लड़कियां शहरों में पढ़ने जाती हैं. इनसे अगर सवाल कीजिए कि पहले पाखंड और रूढ़िवादिता का विरोध क्यों होता था? तो इनको इसकी जानकारी नहीं है. इनको केवल आरक्षण से मतलब होता है. इनको लगता है कि आरक्षण खत्म होगा तो इनको नौकरी नहीं मिलेगी.

पूरा दलित आंदोलन आरक्षण की सोच तक सीमित रह गया है. पांखड और रूढ़िवादिता जैसी बातें आम दलित के लिए कोई मुददा नहीं रह गईहैं. वह इसको बराबरी से जोड़ कर देख रहा है. यही वजह है कि यह वर्ग अब अपने ही मुददों से भटक गया है. ब्राहमणवाद के इस प्रभाव ने दलित आंदोलन और उसकी विचारधारा को खत्म कर दिया है. इसका आने वाला प्रभाव राजनीति पर पड़ेगा और देरसवेर जिस आरक्षण को लेकर दलित परेशान हैं उस पर भी हमला हो जाएगा.

पढ़ीलिखी और योग्य होने के बाद भी दलित लड़कियों के लिए समाज के बाहर दूसरी जाति के लड़कों से शादी करना सरल नहीं है. अंतरजातीय विवाह की बात करें तो अगड़े और पिछडों के उदाहरण ज्यादा मिल जाते हैं. दलितों के साथ शादी के मसले बेहद कम होते हैं. जिन की शादियां हो भी जाती हैंवे जल्दी टूट जाती हैं. या दलित लड़की अपनी पहचान छिपा लेती हैं यानी जिस जाति का पति होता है वह भी उसी की हो जाती है.

कई बार ये विवाह चलते हैं, कई बार टूट भी जाते हैं. पिछले दिनों आईएएस परीक्षा में टौप करने वाली टीना डाबी का नाम सुर्ख़ियों में था. पहली वजह यह थी कि उसने आईएएस परीक्षा में टौप किया. दूसरे उसने गैरधर्म में शादी की. इसके कुछ ही समय में यह शादी टूट गई. लखनऊ में रहने वाली एक दलित लड़की गरिमा की शादी उसके मातापिता ने अपनी ही बिरादरी में कर दी. शादी 2 साल में टूट गई. कुछ समय बाद गरिमा ने गैरधर्म में विवाह किया. वहां भी दिक्कत होने लगी तो वह अलग रहने लगी. अब वह दोबारा विवाह नहीं करना चाहती है.

 

बढ़ रही घरेलू हिंसा

दलित लड़कियों की शादी में ही रीतिरिवाज में बदलाव से शादी के बाद के हालात नहीं बदले. शादी के बाद हिंसक बरताव, यौन हिंसा, जातिगत हिंसा और अलगअलग तरह के शोषण का सामना भी इनको करना पड़ता है. पहले इस तरह के विवाद घर और बिरादरी के लोग मिलबैठ कर सुलझा देते थे. अब इन विवादों को हल करने के लिए कचहरी और थानों तक लोग जाने लगे हैं जहां पैसा खर्च होता है. यहां भी सालोंसाल तलाक का इंतजार करते रहते हैं. खर्च से बचने के लिए आमतौर पर महिलाओं को डराधमकाकर चुप करा दिया जाता है. कई बार दलित लड़कियां गैरबिरादरी में प्रेम करके जब शादी के लिए दबाव बनाती हैं तो सरलता से लोग मानते नहीं. ऐसे में पुलिस को दखल देना पड़ता है.

उत्तर प्रदेश के इटावा के सिविल लाइंस थाना के विजयपुरा गांव की रहने वाली डिपंल का उन्नाव जिले में रहने वाले सवर्ण जाति के दिवाकर शुक्ला से प्रेम हो गया. दिवाकर ब्राहमण जाति का था. ऐसे में दलित जाति की डिंपल से उसका प्रेम घर वालों को पंसद नहीं था. इसके बाद भी जब दोनों ने शादी कर ली तो दिवाकर शुक्ला के घर वालों ने बेटे और बहू दोनों को ही घर से निकाल दिया.

घर में सम्मान न मिलने पर दंपती ने पुलिस की मदद ली. महिला थानाध्यक्ष सुभद्रा वर्मा ने इन दोनों के परिजनों को बुलाया और समझाया. थानाध्यक्ष की बात दोनों के परिजनों ने मान ली और फिर महिला थाने के अंदर इन दोनों की हिंदू रीतिरिवाज के साथ शादी करवा दी गई. शादी के बाद दोनों परिवार वालों के साथ घर गए.

दूसरा उदाहरण तमिलनाडु प्रदेश के मदुरई जिले का है. यहां के मुनियांडीपुरम निवासी सेल्वम की 22 साल की बेटी रम्या ने जनवरी 2023में सवर्ण जाति के 32 साल के सतीश कुमार से शादी कर ली. वेदोनों साथसाथ रह रहे थे. इसके बाद रम्या गर्भवती हो गई. उसका पति बच्चा गिराने के लिए दबाव बनाने लगा. गर्भपात के लिए उसने दवाई खिलाने की कोशिश की. रम्या ने ऐसा करने से मना कर दिया. इस बात को लेकर दोनों में लड़ाई हुआ करती थी. 6 अप्रैल,2023 को भी लड़ाई हो रही थी.

बात बढ़ गई. सतीश और उसके परिवार ने उसे लाठीडंडे से पीटना शुरू कर दिया. रम्या की मौके पर ही मौत हो गई. शव को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी राजाजी अस्पताल भेज दिया गया.पुलिस ने सतीश कुमार के मातापिता एस सेल्वम और एसपंचवर्णम को आईपीसी की धारा 302 और एससीएसटी अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया. पुलिस ने बताया कि सतीश कुमार मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं था और हत्या वैवाहिक विवाद के कारण हुई थी. विवाद का कारण सवर्ण जाति और दलित की शादी का था.

इस तरह की घटनाएं बताती हैं कि अगड़ी जातियों के कितने भी रीतिरिवाज अपना लिए जाएं, भेदभाव कायम है. दलित जाति की लड़कियों से शादी करने के मामले बढ़ें, इसके लिए सरकार अपने स्तर पर योजना भी चला रही है पर इसका परिणाम बहुत अच्छा नहीं है. अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा योजना चलाई जाती है.

सरकारी योजना के तहत नए शादीशुदा जोड़े को सरकार द्वारा आर्थिक मदद दी जाती है. इससे उनकी आर्थिक स्थिति में बदलाव के साथसाथ सामाजिक सोच बदलने में भी मदद मिलती है. डा.अंबेडकर फाउंडेशन की इस योजना के तहत जो लोग अंतरजातीय विवाह करते हैं, उन्हें आर्थिक मदद दी जाती है. इस योजना को डाक्टर भीमराव अंबेडकर के नाम पर रखा गया है.

डा. अंबेडकर फाउंडेशन योजना का लाभ लेने के लिए जरूरी है कि लड़की की उम्र कम से कम 18 साल और लड़के की उम्र कम से 21 साल होनी चाहिए. इसके साथ ही, इनमें से कोई एक दलित समुदाय से हो और दूसरे का दलित समुदाय से बाहर का होना चाहिए. इसके साथ लड़कालड़की ने अपनी शादी कानूनी रूप से रजिस्टर्ड कराया हो. अगर दोनों दलित समुदाय के हैं या दोनों ही दलित समुदाय के नहीं हैं तो उन्हें लाभ नहीं मिल सकता.

इस योजना का लाभ केवल वे दंपती उठा सकते हैं जिन्होंने पहली शादी की है. पत्नी या पति में से किसी की भी दूसरी शादी होने पर आप इस योजना का लाभ नहीं उठा सकते हैं. अपनी शादी रजिस्टर करवा कर नव दंपती को मैरिज सर्टिफिकेट सबमिट करना होगा. इसके बाद कपल डाक्टर अंबेडकर फाउंडेशन के लिए आवेदन करें. इस योजना का लाभ शादी के एक साल के भीतर ही लिया जा सकता है. एक साल बाद आप इस योजना का लाभ नहीं उठा सकते हैं.

बाजार और पैसे के प्रभाव से शादी के आयोजन भले ही भव्य होने लगे हों पर ऊंची जातियों के साथ बराबरी के लिए यह होड़ लगी है जहां बराबरी का भाव नहीं मिलता है. बहुत सारे ऊपरी बदलाव के बाद भी समाज में जातीय भेदभाव अभी भी कायम है. दलित लड़कियां भले ही शादियों में रीतिरिवाज और रस्मों को अपना रही हों,पर इससे बराबरी का भाव नहीं आएगा. इन रीतिरिवाजों के चलते शादियां महंगी हो रही हैं. चढ़ावा और दहेज जैसी कुरीतियां इनमें बढ़ती जा रही हैं.

दलित लड़कियों से लोग शादी करने से इस कारण भी बचते हैं कि अगर शादी के बाद कोई हालात बदले तो दलित एक्ट के साथ मुकदमा कायम हो जाएगा जिससे बचना मुश्किलहोता है. ऐसे में रीतिरिवाज और महंगी शादियों से मूलभूत समस्या का समाधान नहीं होगा. परेशानी का अंत तभी होगा जब पांखड और कुरीतियों से बच कर शिक्षा के जरिए तरक्की की राह पकड़ी जाएगी.

 

शादी से पहले मैं एक लड़की से प्यार करता था लेकिन अब वो मुझे परेशान कर रही है, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं एक विवाहित पुरुष हूं. विवाह को 3 वर्ष हो गए हैं और मैं अपने वैवाहिक जीवन से पूरी तरह से संतुष्ट हूं लेकिन एक समस्या है जिस का समाधान मैं आप से चाहता हूं. दरअसल, विवाह से पूर्व मैं एक लड़की से प्यार करता था और अब वह मुझे परेशान कर रही है. मैं ने उस को समझाया कि अब मैं विवाहित हूं और अपनी जिंदगी में बहुत खुश हूं लेकिन फिर भी वह बारबार मुझ से संपर्क करती रहती है. मुझे डर है कि उस की वजह से मेरे वैवाहिक जीवन में कोई तूफान न आ जाए. मुझे सलाह दें, मैं क्या करूं?

जवाब

आप उस से साफ साफ बात करें और पूछें कि वह आप से संबंध क्यों रखना चाहती है. उसे समझाएं कि आप से संबंध रख कर उसे कुछ हासिल नहीं होगा. उस के पास आप को ब्लैकमेल करने का कोई जरिया तो नहीं जिस की वजह से वह आप को परेशान कर रही हो.

इस के अलावा आप एक काम और कर सकते हैं, अगर आप पतिपत्नी के बीच पूर्ण विश्वास है तो आप अपनी पत्नी को विश्वास में ले कर उन से अपनी परेशानी शेयर कर सकते हैं क्योंकि विवाह पूर्व प्रेम प्रसंग होना आज की तारीख में आम बात है. ऐसा करने के बाद आप को अपनी पूर्व प्रेमिका से डरने की कोई जरूरत नहीं होगी और आप की प्रेमिका आप को ब्लैकमेल नहीं कर पाएगी. लेकिन ऐसा कोई भी कदम उठाने से पहले अच्छी तरह सोच लें क्योंकि अगर आप की पत्नी को आप की बात पर विश्वास नहीं हुआ तो आप की बसीबसाई जिंदगी में तूफान आ सकता है.

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

पिता को मां की याद कैसे न आने दें

नोएडा के 22 साल के हर्षित चावला ने 2 साल पहले अपनी मां को खो दिया.मां के जाने के बाद घर में वह और उस की बड़ी बहन ही पिता के पास रह गए थे.जल्द ही बड़ी बहन की शादी हो गई और वह अपने परिवार में व्यस्त हो गई. घरमें बचे हर्षित और उस के पिता ने अकेले जो समय गुजारा वह बहुत कठिन था.

हर्षित सुबह उठने से लेकर रात तक कई बार महसूस करता था कि उस के पिता मांको कितना मिस कर रहे हैं. यहां तक कि वे कभी भी रात को अचानक उठ जाते औरअपनी पत्नी को पुकारने लगते. कभी उन की फोटो घंटों निहारते रहते.

इस बीच हर्षित की नौकरी दूसरे शहर बेंगलुरु में लग गई. वह जानता था किपापा अपनी नौकरी छोड़ कर उस के साथ नहीं आ सकते. तब हर्षित ने पिता कीदूसरी शादी कराने का फैसला किया. इस के लिए उस ने मैट्रिमोनियल साइट पर एकअकाउंट खोला. कई से बातचीत की और अंत में एक महिला पिता की जीवनसंगिनीके रूप में पसंद आ गई. वह महिला उसे काफी समझदार और केयरिंग लगी.

इस के बाद जब उस ने पिता से इस बाबत बात की तो उन्होंने पहले तो बिलकुल इनकार कर दिया. तब हर्षित ने अपने पिता को समझाया कि किसी भी व्यक्ति केजाने के बाद जिंदगी नहीं रुकती. उन की याद में लगातार खोए रह कर खुद कोकष्ट देना सही नहीं है.

जीवन अकेले नहीं बिताया जा सकता, इसलिए लोगों कीपरवा किए बिना जिंदगी को एक मौका फिर से देना चाहिए. तभी इंसान बीते समयसे निकल कर एक नया जीवन जी सकता है. काफी समझाने पर वे राजी हुए. शादी केबाद उन की मुसकराहट वापस लौट आई और हर्षित भी निश्चिंत हो कर नौकरी केलिए बेंगलुरु चला गया.

सच है कि जिंदगी में कभीकभी ऐसा कुछ घट जाता है जिस की हम कल्पना भीनहीं करते.  ऐसा ही एक कठिन समय है एक पति का अपनी पत्नी को खो बैठना.कभी कोई हादसा या बीमारी की वजह से पत्नी हमेशा के लिए दूर जा सकती है याफिर तलाक भी उन्हें दूर कर सकता है.

ऐसे में अपने पिता के प्रति बच्चोंका दायित्व बढ़ जाता है. अपने पिता को उस गम को भूलने और मां कीयादों से आजाद कराने में बच्चे काफी सहयोग दे सकते हैं. बच्चे छोटे हैं तबवे बिना कुछ कहे या किए भी पिता के नजदीक रह कर उन के दिल को दिलासा देसकते हैं. बड़े और समझदार बच्चे और भी कई तरीकों से और बहुत सी बातों का खयाल रख कर पिता को मां की कमी का एहसास होने से रोक सकते हैं.

अगर मां की मौत हो जाए तो बच्चे क्या करें

बच्चे अपना ख़याल रख कर और खानानाश्ता आदि बनाने में मदद कर पिता कीमुश्किलें आसान कर सकते हैं. आप के पिता आ कर कभी नहीं कहेंगे कि उन्हेंआप के साथ या सहयोग की जरूरत है. मां की कमी दूर करने और उन को मां कीयाद न आए, इस के लिए आप को पहल करनी होगी. पति को पत्नी की याद सब सेज्यादा बच्चों को तैयार करते समय और किचन में खाना बनाते समय आती है.

ऐसेमें अगर बच्चे पिता का सहयोग करें, शांति और प्यार से पिता ने जो बनायाहै वह खा लें और ज्यादा नखरे न करें तो वे पत्नी को उतना मिस नहीं करेंगे और उन का ध्यान बच्चों में ही रहेगा.

उन्हें व्यस्त रखें

सिर्फ चंद दिनों के लिए दोस्त और रिश्तेदार मौजूद रहते हैं. इस के बादइंसान को अपने रोजमर्रा के कामों में व्यस्त होना होता है. आप इस बात काध्यान रखें कि वे हर दिन शाम के वक्त औफिस से आ कर कहीं न कहीं व्यस्तरहें ताकि उन्हें ज्यादा देर तक घर पर अकेले न रहना पड़े.

मां के जानेके बाद अपने पिता को घर में काम करने की आदत डालने दें. आप उन की बेटीहैं, तो भी उन्हें रोकते हुए खुद काम करने की कोशिश न करें. उलटा, अगर वे कुछ काम करते हैं तो उन्हें प्रोत्साहित करते हुए कहें कि पापा, आप नेखाना तो बहुत अच्छा बनाया या फिर क्लीनिंग वर्क अच्छे से किया है. इस सेआप के पिता घर के कामों में व्यस्त रहेंगे और उन्हें पत्नी की याद कमआएगी.

आप उन्हें किसी हौबी को आगे बढ़ाने, किसी तरह के क्लासेज अटेंड करने याकिसी क्लब का सदस्य बनने की सलाह भी दे सकते हैं. इस से उन्हें अपनाखालीपन भरने में मदद मिलेगी. जब किसी करीबी की मौत हो जाती है तो कईसालों तक उस की सालगिरह की, एनिवर्सरी या मौत के दिन उन्हें भारी दुख होसकता है. इसलिए अपने कैलेंडर पर ऐसी तारीखों को नोट कर लीजिए ताकि जैसेजैसे ये दिन करीब आएं, आप उन्हें व्यस्त रहने मदद कर सकते हैं या अगरजरूरत पड़े तो उन्हें तसल्ली दे सकते हैं.

दिल्ली के बीटैक स्टूडेंट अमन सिंह कहते हैं, “मेरी मां के जाने के बादपापा बिलकुल अकेले रह गए थे. किसी काम में उन का मन नहीं लगता था. तबमैंने एक दिन उन की पुरानी डायरी देखी जिस में उन्होंने बहुत अच्छीकविताएं और गजलें लिख रखी थीं. शादी के बाद उन्हें अपनी इस हौबी के लिएसमय निकालना कठिन हो गया था. तब मैंने उन्हें फिर से इस हौबी को जिंदाकरने को प्रोत्साहित किया.

“उन की लिखी रचनाओं को ध्यान से सुनता और तारीफकरता. उन्हें कई कवि और लेखकों के ग्रुप से भी जोड़ दिया. फिर क्या था, उनकी जिंदगी ही बदल गई. मां की यादों में गुमसुम रहने के बदले वे कविसम्मेलनों में नजर आने लगे. आज उन्हें खुश देख कर मुझे सुकून मिलता है.”

साथ समय बिताएं

जिंदगी में जब किसी का कोई अजीज हमेशा के लिए दूर चला जाता है तो ऐसेमौकों पर शुरुआत में तो दोस्त और रिश्तेदार बहुत प्यार व हमदर्दी जतातेहैं लेकिन कुछ ही समय बाद वे अपनेअपने काम में लग जाते हैं और भूल जातेहैं और तब इंसान अपने उस अजीज को और भी ज्यादा मिस करने लगता है. इसलिएसब के जाने के बाद बच्चों का फर्ज बनता है कि अपने पिता को हिम्मत दें.उन से बातचीत कर अपने साथ पिता का भी मन हलका करें.

सोचिए आप के पिता नेअपने जीवनसाथी को खो दिया जिन के साथ इतने साल गुजारे थे. ऐसे में उन्हेंअपना समय दे कर आप उन्हें पत्नी की कमी महसूस होने से बचा सकते हैं. आपअपने पिता से मां के बारे में बात कर सकते हैं. उन के कुछ अच्छे गुणोंके बारे में या उनके साथ बिताए खुशी के कुछ पलों के बारे में अपने अनुभवशेयर करें. इस तरह की बातें करने से पिता के चेहरे पर मुसकान आ सकती है.मगर ऐसा कभीकभार कुछ खास मौकों पर ही करें. हर समय मां की ही बात करनेसे वे कभी इस गम से उबर नहीं पाएंगे.

बेहतर है कि आप पिता के साथ कभीकभी कहीं बाहर घूमने का प्रोग्राम बनाएं, जैसे कभी पिकनिक पर, कभी सिनेमा देखने और कभी किसी खूबसूरत ऐतिहासिक जगहघूमने जाएं.  कभीकभी बाहर जा कर लंच या डिनर करें या बाहर से खाना और्डरकरें और मिल कर खाएं.

पिता की बातें सुनें

पिता का दर्द बांटने का एक बहुत ही बढ़िया तरीका है उन की बात ध्यान सेसुनना. वे जिन भावनाओं से गुजर रहे हैं उन के बारे में बात करना चाहतेहैं. इसलिए उन से पूछिए कि क्या आप इस बारे में बात करना चाहेंगे? उन्हेंफैसला करने दीजिए कि वे बात करना चाहेंगे या नहीं. शुरुआत में वे जो कुछकहना चाहते हैं उसे बस कहने दीजिए ताकि उन्हें महसूस हो कि पत्नी के जानेके बाद भी कोई उनकी बात सुनने वाला मौजूद है.

इस के अलावा पिता का ध्यान दूसरी बातों में लगाने के लिए उनके साथ कभीकभी जबरन राजनीतिक, सामाजिक मुद्दों पर बहस करें. उन को सामाजिक मुद्दोंपर बोलने को प्रोत्साहित करें. उन के साथ राजनीतिक गतिविधियों पर चर्चाकरें. उन के दोस्तों से भी कहें कि समय मिलने पर फोन पर उन से लंबीबातें करें. इस तरह उन का दिमाग डायवर्ट होगा.

मां की यादें दूर करें

समय के साथ घर में बदलाव लाएं. घर के हर कमरे का लेआउट बदलें. बिस्तर परसे चादर बदल दें और परदे भी नए लगाएं. लमारी से मां के कपड़े निकाल करकिसी को दे दें. जिन चीजों को देख कर आप के पिता को मां की याद आने कीसंभावना है उन्हें दूर कर दें. आप की मां जिस तरह पिता के घर आने पर चायनाश्ता देती थीं वैसा आप करें. पिता को उनके दोस्तों से मिलने या उन्हेंघर बुलाने को प्रोत्साहित करें ताकि उनका मन बदले. उन के दोस्तों कीमेहमाननवाजी वैसे ही करें जैसे आप की मां करती थीं.

खत लिखें

पिता को सांत्वना देने और उन्हें तनहा महसूस करने से रोकने में आप का एकप्यारा सा खत या कार्ड बहुत काम कर सकता है. आप उन्हें बहुत ही प्यारा साखत लिखें और फिर देखें कि इस से उन्हें कितनी हिम्मत मिलती है क्योंकि वेउसे बारबार पढ़ सकते हैं. इस तरह हौसला दिलाने के लिए आप जो खत या कार्डभेजते हैं उसमें चंद शब्द लिखना काफी हैं. मगर ये शब्द आप के दिल से होनेचाहिए.

यह हमेशा ध्यान रखें कि पिता को व्हाट्सऐप पर मैसेज करने के बजाय उन्हेंखत कागज पर लिख कर भेजें क्योंकि यह खत हमेशा उन के पास रहेगा. वे जबचाहें खोल कर उन्हें पढ़ सकते हैं जबकि मैसेज ऊपर चले जाते हैं और फिरखोज कर उन को पढ़ना मुश्किल हो जाता है. इसी तरह अगर आप दूर रहते हैं औरअपने बच्चों की तसवीरें उन्हें व्हाट्सऐप करते हैं तो भी उस से बेहतर हैकि आप उन को तसवीरें प्रिंट कर के भेजें इस से वे उन्हें हमेशा अपनेसामने रख सकेंगे. आप का खत या कार्ड यह सुबूत देगा कि आप उन की कितनीपरवा करते हैं.

दूसरी शादी – यदि पिता दूसरी शादी करना चाहते हैं तो बच्चों को चाहिए कि वे औब्जेक्शन न करें. आप को पिता की पसंद से प्रौब्लम हो या उन की नईपत्नी पसंद नहीं आ रही हो, आप इस पर ज्यादा न सोचें. जिंदगी आप केपिता की है. वे अगर किसी महिला के साथ नई जिंदगी शुरू करना चाह रहे हैंतो उसे सहर्ष स्वीकार कर लें क्योंकि उन के जीवन की कमी को दूर करने कायह एक बेहतर तरीका है. सही जीवनसाथी मिलने पर व्यक्ति के लिए जीवन मेंआगे बढ़ना और गुजरे हुए पलों को भूलना आसान हो जाता है. अपने पिता कोसमझाएं कि वे इस के लिए गंभीरता से सोचें.

बहुत से जानेमाने लोगों ने भी दूसरी शादियां की हैं. कांग्रेसी नेतादिग्विजय सिंह ने भी 2 बार शादी की है. पहली पत्नी आशा के निधन के बाददिग्विजय सिंह ने पत्रकार रहीं अमृता राय से शादी की. कांग्रेस के नेताशशि थरूर ने 3 बार शादी की. पहली पत्नी का नाम तिलोत्तमा मुखर्जी,दूसरी का नाम क्रिस्टा गिल और तीसरी पत्नी का नाम सुनंदा पुष्कर था.

फिल्मस्टार बोनी कपूर ने भी 2 शादियां कीं. दरअसल दूसरी शादी करना कोईअजीब बात नहीं. इंसान के लिए खुश और संतुष्ट रहना जरूरी है और यदि वहदूसरी शादी का फैसला लेता है तो कोई आफत नहीं आ जाती.

संपति का बंटवारा – आप यह न सोचें कि पिता कहीं सारी संपत्ति आप की नईमां या उन के बच्चों को न दे दें. यदि वे ऐसा करते हैं तो कहीं न कहींगलती आप की है. तभी वे ऐसा फैसला ले रहे हैं. वैसे भी पैसा आप के पिताका है. वे इसे किसी को भी दे सकते हैं. ऐसे में संपत्ति की चिंता छोड़कर आप को पिता की खुशी का खयाल करना चाहिए.

फ्लर्टिंग – यदि आप के पिता फ्लर्टिंग करते हैं तो आप उन्हें समाज का डरन दिखाएं. उन्हें ऐसा करने दें. आप उन की पत्नी बन कर उन्हें रोकनेटोकने का प्रयास न करें बल्कि पसंदीदा महिलाओं से बातें करने या हंसीमजाक करने को प्रोत्साहित करें. इस से वे एक नौर्मल जीवन की शुरुआत करसकते हैं. यह समझने की कोशिश करें कि यदि वे इस तरह के काम करने वालीमहिला के पास जाएंगे या उसे घर में बुलाते हैं तो उन का काफी पैसा बरबादहोगा. मन खुश करने के लिए यदि वे किसी से फ्लर्टिंग कर लेते हैं तोइसमें बुरा क्या है?

क्या नहीं करना चाहिए

– अपने पिता से इसलिए दूर मत रहिए क्योंकि आप नहीं जानते कि उन से क्याकहना है या उनके लिए क्या करना है. आप को लग सकता है कि कभीकभी वे मांकी यादों के साथ अकेले रहना चाहते हैं. आप इस डर से भी खुद को उन से दूररख रहे हैं कि कहीं आप की बातों या व्यवहार में कोई गलती न हो जाए. लेकिनयाद रखें अगर एक दुखी व्यक्ति के दोस्त, रिश्तेदार या बच्चे उससे दूर रहेंगे तो वह और भी अकेला महसूस करेगा. इस से उस का दुख और भीबढ़ जाएगा. इसलिए उन्हें अकेला मत छोड़िए.

– उन पर यह दबाव मत डालिए कि वे मां को याद करना छोड़ दें. एकदो बार खुलकर उन्हें रो भी लेने दें. खुद भी एकदो बार जीभर कर रो लीजिए. लेकिनसमय के साथ आप धीरेधीरे उन्हें वापस जिंदगी की तरफ मोड़िए.

– जब तक कि वे खुद से तैयार नहीं होते तब तक उन्हें यह सलाह मत दीजिए किवे आप की मां के कपड़े और उन की निजी चीजें अपने पास से निकाल दें. आपको शायद लगे कि अगर वे मां की याद दिलाने वाली चीजें अपने पास से दूर करदें तो बेहतर होगा वरना उन्हें मां को भूलने में देर लगेगी. लेकिन यादरखें अपनी पत्नी की याद भुलाने में एक व्यक्ति को समय लग सकता है. होसकता है उन की चीजें जबरन हटाए जाने पर वे और भी ज्यादा पत्नी को यादकरने लगें.

– मां का जिक्र करने से खुद को मत रोकिए. जब मां का ज़िक्र होता है तोआप बात मत बदलिए. इस के बजाय पिता से पूछिए कि क्या वे मां के बारे मेंकुछ बात करना चाहेंगे. जब आप बताएंगे कि मां के कौन से खास गुण आप कोबेहद पसंद थे तो यह सुन कर उन्हें अच्छा लगेगा.

– पिता को तसल्ली देने के लिए यह मत कहिए कि आप की मां को अभी कोई तकलीफनहीं या वे अब शांति में होंगी. ऐसी बातें करने का मतलब पिता से यह कहनाहै कि आप को अफसोस नहीं करना चाहिए या आप का कुछ खास नुकसान नहीं हुआ है.लेकिन सच तो यह है कि आप के पिता मन ही मन बहुत दुखी होंगे क्योंकि वेअपनी पत्नी की बहुत कमी महसूस करते हैं. बस, बेहतर होगा कि आप उन्हेंअकेला न छोड़ें. उनका साथ दें और उन्हें समझें.

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