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मैट्रो और मोबाइल

इस में कोई शक नहीं कि मैट्रो ट्रेन हम सभी की जिंदगी को आसान बनाने में अतुलनीय योगदान दे रही है.  छात्रों का स्कूलकालेज आनाजाना, नौकरीपेशा लोगों का अपनेअपने दफ्तरों में आनाजाना बहुत ही आसान हो गया है. अकसर स्कूलकालेज व दफ्तरों में जाने वाले यात्रियों को समय से पहुंचने की जल्दी में बहुत भीड़ हो जाती है. भीड़ तो ठीक है मगर आजकल मोबाइल का चलतेचलते उपयोग करने का फैशन सा हो गया है. हरकोई मोबाइल में इतना व्यस्त रहता है कि उसे आसपास की गतिविधियों से कोई मतलब ही नहीं रहता, फिर चाहे कोई धक्का दे कर ही क्यों न निकल जाए.
मैट्रो के अंदर सीढ़ियों पर चढ़तेउतरते हर वक्त मोबाइल पर ही नजरें गड़ी रहती हैं जैसे इन्होंने मोबाइल बंद किया तो भूचाल आ जाएगा, धरती फट जाएगी, आसमान गिर जाएगा.  मैं भी एक दिन मैट्रो में सफर करने के इरादे से टोकन ले कर, सुरक्षा जांच कराते हुए प्लेटफौर्म पर जा पहुंचा. प्लेटफौर्म पर यात्रियों का झुंड देख कर एक बार तो मैं बुरी तरह घबरा उठा. लंबीलंबी पंक्तियों में खड़े हो कर मैट्रो आने का इंतजार करती भीड़ में मैं भी शामिल हो गया. कुछ ही देर में मैट्रो प्लेटफौर्म पर आ गई. लोगों को अंदर घुस कर सीट पाने की ऐसी  विकट लालसा मैं ने पहली बार देखी. मैट्रो से उतरने वाले यात्रियों को भी धकियाते हुए भीड़ अंदर वापस ले गई. कुछ लोग बड़बड़ाने लगे कि कैसे जाहिल लोग हैं, मैट्रो में भी सफर करना नहीं आता. पहले लोगों को उतरने देना चाहिए.
जैसेतैसे मैं भी पंक्ति में शामिल होने में सफल रहा. भीड़ स्टेशन दर स्टेशन बढ़ती ही जा रही थी.  लोग उतरते कम और चढ़ते ज्यादा रहे. मैट्रो में पैर तक रखने की जगह नहीं बची थी और यात्रियों की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी.
एक स्टेशन पर मैट्रो रुकी तो भीड़ का ऐसा रैला आया जैसे सुनामी में अथाह पानी सबकुछ तहसनहस कर के आगे बढ़ता जाता है. मैट्रो के गेट तक बंद नहीं हो पा रहे थे. बारबार उद्घोषणा हो रही थी कि कृपया गेट खाली कर दें व मैट्रो को चलने दें, मगर एक बार जो मैट्रो में आ जाए वह एक कदम बाहर नहीं रखना चाह रहा था बल्कि अपने कदमों को अंदर की ओर ले जाने की कोशिश में न जाने कितने लोगों के जूतों को रौंदते हुए अंदर बढ़ने की नाकाम कोशिश कर रहा था. खैर, मैट्रो की सुरक्षा सेवा के कर्मचारियों ने कुछ लोगों को बाहर निकाल कर मैट्रो को चलवाया. मगर मैं उन लोगों को सैल्यूट करना चाहता हूं जो इतनी भीड़ में भी कंधों पर बोरे जैसा भारी बैग लिए और हाथों में मोबाइल को पकड़ कर अपना मनपसंद संगीत या फिल्म देखने की हिम्मत रखे हुए खुद को गिरने से संभाले हुए लेकिन दूसरे यात्रियों पर गिरतेपड़ते खड़े थे.
यात्रियों में आपस में गरमागरमी, कहासुनी का सिलसिला बढ़ता ही जा रहा था. पंक्तियों में खड़े लोग कभी बैठे हुए यात्रियों के ऊपर गिरते तो कभी वापस पीछे खड़े लोगों पर. इतनी भीड़ में एक शख्स पिट्ठू बैग कमर पर टिकाए हुए मोबाइल में गेम खेलने में मस्त भीड़ से बेखबर खड़ा था. जाहिर है, जब मोबाइल पर कुछ देखते हैं तो आंखों व मोबाइल के बीच में कुछ दूरी बनानी होती है जिस से आसानी से मोबाइल की स्क्रीन पर कुछ देखा जा सके, तो वह शख्स भी यही कर रहा था. किसी ने थोड़ा उसे धकियाया तो वह बैठे हुए यात्रियों के ऊपर झुक गया और गिरने से पहले ही उस के सामने बैठे यात्री ने वापस धक्का उसे दिया तो वह पीछे खड़े यात्री पर जा गिरा। वह चिल्लाया कि अरे भाई, जरा पीछे देख कर गिरो. तभी दूसरे यात्री ने कहा कि भाई, अपना मोबाइल बंद कर लो और खुद भी ठीक से खड़ा हो कर दूसरों को भी खड़ा रहने दो.
मगर वह ढीठ चिल्लाया कि आप को क्या प्रौब्लम है? मैं आप के ऊपर तो गिरा नहीं हूं न… उस की इस बात पर और कई यात्रियों को गुस्सा आया और कहा कि भाई, इतनी भीड़ है और तुम एक तो बैग कंधों पर टिकाए हुए हो जिस से पहले ही दूसरे लोगों को परेशानी हो रही है और उस पर मोबाइल पर गेम खेल कर अपने सहयात्रियों को तंग किए जा रहे हो और हम समझा रहे हैं तो उलटा लोगों को धमका रहे हो.
अपने खिलाफ काफी लोगों को बोलते देख कर वह थोड़ा सा सहमा मगर मोबाइल बंद नहीं किय. तभी किसी ने शरारत की और भीड़ को धक्का दे कर हंगामा बढ़ा दिया. खुद को संभालतेसंभालते लोगों ने अपने गुस्से को चरम सीमा तक बढ़ा दिया और एकदूसरे को असभ्य तरीके से बोलतेबोलते खुद को संभालने लगे. तभी उस यात्री को, जिस की वजह से यह सब हंगामा हुआ था नीचे झुक कर कुछ ढूंढ़ते हुए देखने लगा. वह बड़ी बेचैनी से घबराया हुआ सा बोले जा रहा था कि मेरा मोबाइल नीचे गिर गया है. तभी किसी ने चुटकी ली कि जब समझा रहे थे तो अकड़ दिखा रहा था अब मिल गया न मजा. इस पर वह बौखला कर बदतमीजी पर उतर आया.
अन्य यात्रियों ने कहा कि अरे, इस की इतनी बदतमीजियां क्यों सुन रहे हो. इसे उतारो अगले स्टेशन पर और सबक सिखाओ. इस बार भीड़ के भयंकर गुस्से व परिणाम को भांपते हुए वह थोड़ा नरम पड़ा और चुप हो कर अपने मोबाइल को ढूंढ़ने का प्रयास करने लगा. लेकिन भीड़ अपना मन उस की मालिश करने का बना चुकी थी. मगर उस की किस्मत अच्छी थी कि अगला स्टेशन आ गया. स्टेशन आते ही वह फिर से अपने मोबाइल ढूंढ़ने की कोशिश करने का बहाना बनाते हुए राकेट की गति से ट्रेन से बाहर निकल कर पलक झपकते ही आंखों से ओझल हो गया. इस तरह से एक अंतहीन, दुखद एवं कष्टकारी जैसे दिखने वाली यात्रा का सुखद अंत होने पर सभी यात्रियों ने चैन की सुखद सांस ली. मैट्रो का पहली यात्रा मेरे लिए एक यादगार बन गई और एक सबक दे गई कि चलते हुए या सफर करते हुए मोबाइल का उपयोग कभी भी कहीं भी दुर्घटना का शिकार बना सकता है.

क्या प्रैग्नैंसी में मौर्निंग सिकनैस चिंता का विषय है?

सवाल

मुझे प्रैग्नैंट हुए एक महीना हुआ है. हम ने घरवालों की मरजी के खिलाफ जा कर शादी की थीइसलिए अब मेरी देखभाल को कोई नहीं है. मेरे पति बहुत खुश हैं कि अब हमारी भी एक फैमिली होगी. पति की अच्छी जगह जौब लग गई है लेकिन फुलटाइम मेड रखना अभी हमारी पौकेट अलाऊ नहीं करती. मुझे खुद ही अपना ध्यान रखना होगा.

प्रैग्नैंसी में मौर्निंग सिकनैस के बारे में सोच कर ही मुझे डर लग रहा है. अभी तक तो मुझे कुछ ऐसा फील नहीं हुआ है.अगर होने लग जाएगा तो मैं क्या करूंगी. पति तो औफिस चले जाएंगेमैं घर में अकेली. मुझे कुछ हो गया तो सोचसोच कर घबरा जाती हूं. पति बहुत समझाते हैं कि जब भी कुछ फील हो तो उन्हें तुरंत कौल कर दूं. वे फौरन घर आ जाएंगेलेकिन मैं ही बहुत चिंता कर रही हूं. आप मेरी समस्या का समाधान करें.

जवाब

प्रैग्नैंसी में मौर्निंग सिकनैस बौडी टू बौडी डिपैंड करती है. कुछ को 6ठे सप्ताह से शुरू होती है, कुछ को 2 या 3 सप्ताह के बाद तो कुछ महिलाओं को प्रैग्नैंसीकी शुरुआत में ही मितली का अनुभव करना शुरू हो जाता है.

मितली आने का मतलब यह नहीं कि आप पूरे दिन ही ऐसा महसूस करेंगी. यह भी जरूरी नहीं है कि आप को सुबह के वक्त ही आएयह दूसरे समय भी आ सकती है. मौर्निंग सिकनैस एक संकेत है कि महिला के शरीर में गर्भावस्था के हार्मोन का स्तर काफी अधिक हो गया है.

मौर्निंग सिकनैस से बचने के लिए आप को हर आधे या एक घंटे के अंतराल पर थोड़ाथोड़ा पानी पीते रहना चाहिए ताकि आप खुद के शरीर को हमेशा हाइड्रेट रख सकें. साथ ही, दिन में 3 के बजाय थोड़ीथोड़ी मात्रा में 5 से 6 बार खाना खाने से भी मौर्निंग सिकईस में राहत मिलती है. इसीलिए यह आवश्यक है कि आप इस दौरान अपने खानपान पर खास ध्यान दें. अपनी डाइट में पोषक तत्त्वों को शामिल करें. भारी और चिकने भोजन से बचें. अदरक की चायनीबू पानी या पेपरमिंट की चाय पिएं.

प्रैग्नैंसी के 12-15 सप्ताह के बीच मौर्निंग सिकनैस की समस्या अपनेआप ही खत्म हो जाती है. मौर्निंग सिकनैस होना स्वस्थ प्रैग्नैंसी का एक समान्य हिस्सा है जिस से आप को जरा भी डरने या घबराने की आवश्यकता नहीं है. बस, नियमित रूप से अपनी गाइनी डाक्टर से चैकअप करवाते रहें और सलाह लेते रहें.

 

घर पर ऐसे बनाएं गुजराती स्टाइल की कढ़ी

कढ़ी आएं दिन हम अपने घर मं बनाते रहते हैं कुछ लोगों को कढ़ी खाना बहुत ज्यादा पसंद आता है. ऐसे में आज हम आपको गुजराती कढ़ी बनाने की विधि को बता रहे हैं. आइए जानते हैं घर पर आशान तरीके से गुजराती कढ़ी को कैसे बनाएं.

समाग्री

  • बेसन
  • खट्टा दही
  • गुड़
  • शक्कर
  • जीरा
  • राई
  • हींग
  • खड़ी लाल मिर्च
  • लौंग
  • अदरक
  • पानी
  • तेल
  • घी
  • धनिया

विधि

  • गुजराती कढ़ी बनाने के लिए सबसे पहले दही को अच्छे से  पानी में डालकर फेंटे, एक कटोरे में बेसन को डालकर अच्छे से मिलाए उसमें नमक, शक्कर और गुड़ को डाल लें. अब बेसन में फेटा हुआ खट्टा दही मिलाएं.
  • अब एक कड़ाही को गर्म करके उसमें जीरा औऱ हींग और राई को डालें, उसके बाद इसमें कुछ अपने पसंद के मसाले भी मिला दें. अब इसमं अदरक और हरी मिर्च का पेस्ट बनाकर डालें.
  • अब बेसन में दही को डालकर तड़के में चलाते रहें जब तक कड़ाही मं उबाल न आ जाए. उबाल आने में कम से कम 5 मिनट का समय लगता है.
  • पहले उबाल आने के बाद कढ़ा को कुछ दर तक पकने दें, उसके बाद धीमी आंच करके कढ़ी को पकाते रहें. अब इसमें कढ़ी को डालकर थोड़ी देर तक और चलाते रहें. कढ़ी को बीच- बीच में चलाते रहें. अब उसे अच्छा लुक देने के लिए कढ़ी को हरी धनिया की पत्ती से सजाए.
  • अब आप चाहे तो इस कढ़ी को रोटी या फिर चावल के साथ सर्व कर सकते हैं. इससे आपको स्वाद भी अच्छा मिलेगा.

चुटकी भर सिंदूर-भाग 3 : सुचेता को मायके में क्या दिक्कत हुई ?

सुचेता का विवाह हो गया. वह पिताजी को अकेला छोड़ आई. सुचेता अधीर हो रही थी, पर पिताजी की शिक्षाओं ने ही उसे धैर्य रखना सिखाया था.

सुचेता के पति अचल एक प्राइवेट कंपनी में मैनेजर थे और अच्छी सैलरी के चलते अच्छा लाइफस्टाइल था उन का.

प्रकृति स्त्रियों को सहज ही हर माहौल को स्वीकारने और उस में ढलने का स्वभाव देती है.

शादी के 2 साल बीत गए थे, पर इन 2 सालों में सुचेता एकलव्य को भूल नहीं पाई थी. भला धड़कन को ह्रदय से निकाल देने पर तो जो भी बचेगा, वह तो मृत ही होगा न. सुचेता भी धीरेधीरे ससुराल में खुश रहने का प्रयास कर रही थी. अचल भी सुचेता की हर बात का ध्यान रखते और समय मिलने पर ढेरों बातें करते और अचल की खुशी अपने चरम पर पहुंच गई थी, जब उसे ये पता चला कि सुचेता गर्भवती है.

“मै पढ़ाईलिखाई कर के भी सरकारी नौकरी नहीं पा सका, पर अपने होने वाले बच्चे को इस काबिल बनाऊंगा कि वह एक सरकारी नौकरी जरूर कर सके.”

सुचेता ने एक बेटी को जन्म दिया. अचल और उस के मातापिता ने नन्ही बिटिया का खुले मन से स्वागत किया और परिवार में ढेरों खुशियां छा गईं.

जीवन का कोई फिक्स्ड पैटर्न नहीं होता. वह तो चलता है समुद्र की लहरों की तरह, कभी ऊपर तो कभी नीचे, कभी शांत हो कर तो कभी शोर मचाता हुआ और एक ऐसा ही भयानक शोर सुचेता के जीवन में तब आया, जब अचल की रोड दुर्घटना में मौत हो गई.

सुचेता के लिए इस से अधिक दुख की बात क्या हो सकती थी. उस के सामने अभी पूरा जीवन पड़ा हुआ था और 6 साल की नन्ही बेटी की सारी जिम्मेदारी थी.

अचल की तेरहवीं होते ही सुचेता के सासससुर का रंग ही बदल गया. वे सासससुर, जो अचल के जीवित रहते कितना ध्यान रखते थे सुचेता का, वे उस के जाते ही कठोर और निर्मम व्यवहार करने लगे और अचल की मौत का जिम्मेदार सुचेता और उस की बेटी को बताने लगे.

सुचेता ने जलीकटी बातों को सुना और सहा भी, पर अब सासससुर का जुल्म और बढ़ चला था, क्योंकि ताने सिर्फ सुचेता को ही नहीं, बल्कि उस की बेटी को भी दिए जा रहे थे और बेटी पर कोई भी आरोप सहन नहीं हुआ सुचेता को. उस ने अपने पापा से बात की और अपना सामान ले कर मायके चली आई.

पिताजे रिटायर हो चले थे. अतः सुचेता को 3 लोगों का खर्च उठाने के लिए सोचना था, इसलिए उस ने कलम उठाई और लिखना शुरू किया, आर्टिकल्स, कहानियां प्रकाशित भी हुए, पर जितना पेमेंट मिला, उतना इस महंगाई के दौर में बहुत कम साबित हुआ और फिर बेटी के पालनपोषण का बोझ, अतः सुचेता एक कोचिंग सेंटर में जा कर पढ़ाने लगी. जब वहां से समय मिलता, तो घर जाजा कर ट्यूशन भी देती.

बेटी अमाया का स्कूल में दाखिले का समय आ गया था. उस का अच्छे स्कूल में दाखिला और उसबीके पालनपोषण की जिम्मेदारी बखूबी निभाए जा रही थी सुचेता.

अब सुचेता के जीवन में भयानक लहरें तो न थीं, पर उन में एक खामोशी थी. पर एक अज्ञात भय हमेशा बना ही रहता था और इस भय के साथ ही तो अब सुचेता को जीना था. वह भय एक दिन जीवंत रूप में फिर से सुचेता के सामने आ खड़ा होगा, यह उस ने नहीं सोचा था, वह कोई और नहीं, बल्कि एकलव्य ही था, जो सुचेता की सूनी मांग देख कर चकित रह गया था
बहुतकुछ कहना चाहा, पर कह न सका.

सुचेता का मन भी एकलव्य को देख कर पूरी तरह भीग गया था. मौल में कितनी गहमागहमी थी, पर वे दोनों भीड़ में भी एकदूसरे से मौन संवाद कर रहे थे और एकलव्य कब, कैसे, क्यों?
जैसे सवाल अपनेआप से ही किए जा रहा था.

“वे एक रोड एक्सीडेंट में,” गला रुंध गया था सुचेता का. एकलव्य ने बेटी को पुचकारा. कुछ समझ न आता देख सुचेता मौल से बाहर जाने लगी, पर नन्ही अमाया अभी और घूमना चाहती थी. शायद एकलव्य भी यही चाह रहा था कि सुचेता से कुछ और बातें कर सके, पर सुचेता बाहर की ओर निकल गई.

एक विधवा के मन में किसी दूसरे पुरुष का ध्यान भी नहीं आना चाहिए. समाज की बनाई हुई इसी मान्यता के नाते अपनेआप को दोषी मान रही थी सुचेता, पर उस के मन ने तो एकलव्य को कभी अलग नहीं माना था, तो फिर उस का खयाल आने में भला क्या दोष?

मौल में हुई मुलाकात के ठीक 10 दिन बाद एकलव्य सुचेता के घर आ पहुंचा. अमाया के लिए कुछ गिफ्ट्स और चाकलेट ले कर आया था वह, और सुचेता और उस के पिता के सामने ही सीधे तरीके से उस ने अपनी बात रख दी.

“मैं ने भी अभी तक विवाह नहीं किया है. अगर तुम चाहो, तो मैं तुम्हारे साथ बाकी का जीवन जीने को तैयार हूं,” एकलव्य ने इतना कह कर लंबी सांस ली थी मानो कोई बोझ उतार दिया हो उस ने.

एक विधवा लड़की के पिता के लिए यह प्रस्ताव काफी सुकून देने वाला था, पर सुचेता ने किसी भी प्रकार के रिश्ते को अपनाने से इनकार कर दिया. उस के मुताबिक वह इतना आराम से कमा लेती है कि अपनी बेटी को पढ़ालिखा सके और अपने पिता का ध्यान रख सके.

एकलव्य ने सोचा था कि एक बच्चे वाली विधवा उस से शादी के लिए सहर्ष राजी हो जाएगी पर ऐसा नहीं हुआ.

एकलव्य इस बात से आहत नहीं हुआ, बल्कि सुचेता के लिए उस के मन में प्यार और गहरा हो गया.

“कम से कम मेरी पुरानी दोस्ती को ध्यान में रखते हुए अपना मोबाइल नंबर ही दे दो, कभीकभी बात कर लूंगा,” सकुचाते हुए सुचेता से नंबर मांग लिया था एकलव्य ने.

4 दिन बाद ही सुचेता के मोबाइल पर एकलव्य का फोन आया. एकलव्य ने कहा कि उस का एक दोस्त, जो थिएटर में नाटकों का मंचन करते हैं, उन्हें हमेशा ही नई स्क्रिप्ट्स की आवश्यकता होती है. अगर सुचेता कुछ अच्छी कहानियां लिख दिया करे, तो उस के बदले में उसे अच्छे पैसे मिल जाया करेंगे.

एकलव्य का उस के जीवन में इस तरह से बहुत ज्यादा दखल सुचेता को थोड़ा असहज जरूर कर रहा था, पर स्क्रिप्ट लिखने में उसे कुछ बुराई नजर नहीं आई, इसलिए उस ने हां कर दी और नए ढंग की कहानियां लिखने पर काम शुरू कर दिया.

धीरेधीरे आर्थिक हालात अब अच्छे हो चले थे. इस बीच एकलव्य अप्रत्यक्ष रूप से हर संभव मदद करने की कोशिश करता. मसलन, सुचेता के मकान के निचले तल को किराए पर देने में उस का योगदान रहा था और अमाया की पढ़ाई संबंधी हर सहायता करता.
अमाया भी एकलव्य से खूब लगाव रखती थी.

अमाया अब इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर चुकी थी और यूपीएससी की तैयारी करने के लिए कोचिंग करना चाहती थी. एकलव्य ने अपने पैसों से ही अमाया का दाखिला सबवीसे अच्छे कोचिंग इंस्टिट्यूट में करा दिया और जब सुचेता ने फीस लेने से मना किया, तो एकलव्य ने झूठ बोल दिया कि फीस की कोई बात नहीं, अपने एक दोस्त का ही कोचिंग इंस्टीट्यूट है.

एकलव्य का एक विधवा के घर आनाजाना महल्ले वालों को अखर तो रहा था, कानाफूसी भी जारी थी, पर अब सुचेता और एकलव्य को इन लोगों से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, क्योंकि वे जानते थे कि उन दोनों के बीच युवावस्था का प्रेम अब और भी प्रौढ़ हो चुका है, जिस में शारीरिक आकर्षण से ज्यादा मन की सुंदरता को महत्व दिया जाता है.

अतीत को सोचतेसोचते सुचेता कब सो गई, वह जान नहीं सकी. अगले दिन थोड़ी देर से जागी तो अमाया घर में नहीं थी.

“शायद, पापा के साथ घूमने गई होगी,” बुदबुदाई थी सुचेता.

“मम्मा, राजश्री के घर आई हूं. कुछ ही समय में घर पहुंचती हूं,” फोन कर दिया था अमाया ने.

घर के कामकाज में व्यस्त हो गई थी सुचेता. ठीक 9 बजे कालबेल बजी, तो सुचेता ने दरवाजा खोला, देखा तो सामने उस के पापा, एकलव्य और अमाया खड़े थे.

दोनों के चेहरे पर मुसकान थी. वे तीनों अंदर आबीकर सोफे पर बैठ गए.

एकलव्य के हाथ में एक मूर्ति थी. एकलव्य ने उस पर ओढ़ाया हुआ कपड़ा हटाया, तो सुचेता ने देखा कि वह एक स्त्री की मूर्ति थी.

“लो सुचेता, इस मूर्ति में पैर भी है, मुंह भी और चेहरे में नाक, कान, आंखें भी हैं.”

सुचेता के चेहरे से मिलताजुलता चेहरा था उस मूर्ति का. सुचेता को समझते देर नहीं लगी कि यह उसी की मूर्ति है.

“सुंदर तो लगी होगी यह? पर, अभी इस मूर्ति में एक कमी है,” एकलव्य ने यह कहते हुए डब्बी से एक चुटकी सिंदूर निकाल कर मूर्ति के बालों के बीच की सूनी मांग में भर दिया. सुचेता ने पलकें झुका लीं. उस के चेहरे पर गुलाबी आभा थी.

अमाया खुशी से तालियां बजा रही थी. सुचेता के पापा के हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में उठ गए थे.

भाजपा का संकल्प पत्र बनाम कांग्रेस का न्याय पत्र : आम जनता का दर्द किस ने जाना

Loksabha Election 2024: लोकसभा चुनाव में जनता का मत पाने के लिए सभी पार्टियों ने लंबेचौड़े वादों की फेहरिस्त जारी की है. किसी ने अपने लुभावने पत्र को संकल्प पत्र का नाम दिया है तो किसी ने न्याय पत्र का. इन घोषणा पत्रों में आमजन के जीवनस्तर में बदलाव लाने के बड़ेबड़े वादे किए गए हैं. अब इन वादों में कितने पूरे होंगे यह तो भविष्य के गर्भ में है. जिस पार्टी की सरकार केंद्र में बनी उस के घोषणा पत्र की बातें जमीन पर उतरती हैं या नहीं, यह अगले 5 साल जनता परखेगी.

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भारतीय जनता पार्टी ने अपने संकल्प पत्र में गरीब, युवा, किसान और महिलाओं पर ख़ास जोर दिया है. उन के लिए नई योजनाएं बनाने की बात की है. हालांकि यह वक्त था अपनी उपलब्धियां जनता के सामने रखने का. यह वक्त था यह बताने का कि जिन वादों के आधार पर सत्ता में आए थे उन में से कितने पूरे किए. मगर पार्टी के संकल्प पत्र में वही वादे दोबारा नज़र आ रहे हैं जो पिछले लोकसभा चुनावों के दौरान किए गए थे. यानी, अपने शासन के दौरान भाजपा उन लक्ष्यों को नहीं पा सकी, इसीलिए कुछ फेरबदल के साथ दोबारा उन का झुनझुना बजा रही है.

पीएम गरीब कल्याण मुफ्त अन्न योजना के जरिए गरीबों को जो मुफ्त अनाज बांटा जा रहा है, उस की अवधि 5 साल और बढ़ा दी गई है. यानी, गरीब को रोजगार देने की जगह उन्हें भीख देने और निठल्ला बनाए रखने की एक और पंचवर्षीय योजना ले कर भाजपा जनता के सामने वोट के लिए झोली फैलाए खड़ी है.

गौरतलब है कि भाजपा की मुफ्त राशन वाली यह योजना 2020 से चल रही है और दावा है कि हर महीने 80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन बांटा जा रहा है. भारत की जनसंख्या 140 से कुछ ज़्यादा है. इस हिसाब से तो भाजपा आधे से ज़्यादा आबादी को मुफ्त राशन बांट रही है. यानी, देश की आधी से ज़्यादा आबादी गरीबीरेखा से नीचे है. आधी से ज़्यादा आबादी अपने दो वक्त की रोटी नहीं कमा सकती. सरकार द्वारा बांटी जा रही भीख पर उस का गुजारा हो रहा है. जब देश में 80 करोड़ लोग अपना खाना तक अपनी कमाई से खरीद कर नहीं खा सकते तो वे अपने बच्चों को शिक्षा कहां से दे पाएंगे?

एक दशक से भाजपा सत्ता में है. एक दशक से भारत को विश्वगुरु बनाने के ढोल पीटे जा रहे हैं. कहा जा रहा है कि जल्दी ही हम दुनिया की सब से बड़ी अर्थव्यवस्था बनने वाले हैं. जिस देश की 80 करोड़ जनता दो वक्त के खाने के लिए सरकार के आगे हाथ फैलाए बैठी हो, जिस देश की 80 करोड़ जनता को अगले 5 साल भी पेट भरने के लिए मुफ्त राशन की जरूरत पड़े, वह देश क्या विश्वगुरु बनेगा? सब से बड़ी अर्थव्यवस्था क्या ही बनेगा? मोदी सरकार जनता को क्यों फरेब में रखना चाहती है?

भाजपा के विपरीत कांग्रेस के न्याय पत्र से कुछ आशा जगती है. कांग्रेस ने युवाओं के रोजगार, बच्चों की शिक्षा और मजदूरों की मजदूरी पर ज़्यादा जोर दिया है. कांग्रेस ने अपने मैनिफैस्टो में वादा किया है कि वह 30 लाख युवाओं को सरकारी नौकरी देगी. वादा है कि ग्रेजुएशन के बाद पहली नौकरी सरकार देगी. मुफ्त भोजन से यह नौकरी देने का वादा निश्चित ही बहुत सकारात्मक कदम है. युवाओं में शिक्षा के प्रति जोश जगाने वाला है. हालांकि इतनी बड़ी जनसंख्या वाले देश में हर ग्रेजुएट को सरकारी नौकरी मिलना संभव नहीं है, मगर सरकारी नौकरी का आश्वासन उन्हें कम से कम ग्रेजुएट होने और नौकरी का इंटरव्यू देने के लिए तैयार तो करेगा. वह मुफ्त का राशन खाने के बजाय नौकरी पाने की कोशिश तो करेगा, फिर चाहे सरकारी की जगह प्राइवेट नौकरी ही क्यों न मिले, उस की अपनी मेहनत से कमाए पैसे की रोटी उस में आत्मविश्वास तो पैदा करेगी ही.

भाजपा के संकल्प पत्र में 70 साल से अधिक आयु के लोगों के लिए आयुष्मान कार्ड बनाने और 5 लाख रुपए तक फ्री चिकित्सा देने की बात की गई है. यह योजना भी काफी पुरानी है. हैरानी की बात है कि 10 साल (एक दशक) से सत्ता में बैठी भाजपा अब तक बुजुर्गों के लिए आयुष्मान कार्ड नहीं बना पाई? उसे इस योजना को नए रंगरोगन के साथ फिर पेश करने की जरूरत पड़ गई.

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार में स्वास्थ्य सेवा के एक उदाहरण से सरकार की स्वास्थ्य योजनाओं की जमीनी हकीकत सामने आ जाती है. लखनऊ के सिविल अस्पताल में मरीज को एक रुपए का परचा बनवाना होता है. यह दशकों से एक रुपए में ही बनता आ रहा है. काउंटर पर लाइन लगा कर बूढ़े, बच्चे, महिला, पुरुष अपना नाम और मर्ज बता कर आराम से अपना परचा बनवाते थे और संबंधित कमरे में जा कर डाक्टर को दिखा लेते थे. दवा के काउंटर पर उन को दवाएं भी मुफ्त मिल जाती थीं. यही सिस्टम लगभग शहर के हर सरकारी अस्पताल में था. सिविल अस्पताल में 40-45 साल से यह सिस्टम चल रहा था. दूरदराज के जिलों से लोग अपने मरीज ले कर यहां आते हैं. मगर अब योगी सरकार में इस सिस्टम को इतना पेचीदा बना दिया गया है कि आधे से ज़्यादा मरीज बिना इलाज के लौट जाते हैं और प्राइवेट डाक्टरों के हाथों लूटे जाते हैं.

दरअसल अब यहां परचा बनवाने के लिए मरीज के पास स्मार्टफ़ोन होना जरूरी है. इस के साथ उस के पास उस का आधारकार्ड होना चाहिए. उस के स्मार्टफ़ोन के जरिए क्यूआर कोड स्कैन करने के बाद उस को एक टोकन नंबर दिया जाता है. फिर वह उस टोकन नंबर को ले कर परचा बनवाने की लाइन में लगेगा. जहां उस का आधारकार्ड नंबर ले कर उस का परचा बनेगा. फिर वह डाक्टर के कमरे के आगे लाइन में लगेगा. उस के बाद दवा की लाइन भी लगानी होगी. कोई टैस्ट वगैरह होने हुए तो हर जगह उस को अपना स्मार्टफ़ोन नंबर और टोकन नंबर लिखवाना होगा. सोचिए, सिविल अस्पताल में एक रुपए का परचा बनवा कर इलाज करवाने के लिए जो गरीब जनता आती है, उस में से कितनों की इतनी औकात कि वह स्मार्टफ़ोन रख सके? अधिकांश ग्रामीण और अनपढ़ महिलाएं जो अपने घर का पता तक ठीक से नहीं बता पातीं, भला स्मार्टफ़ोन कैसे चलाएंगी? और बिना फ़ोन के उन का परचा नहीं बनेगा. इसलिए अब इन सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या कम हो गई है. लोग मजबूर हो कर प्राइवेट डाक्टर की शरण में जा रहे हैं और कर्ज ले कर इलाज करवा रहे हैं. सुगम चीजों को कठिन और पेचीदा कर के भाजपा सरकार सिर्फ गरीबों को परेशान कर रही है. यही हाल उस के गरीबों के आयुष्मान कार्ड बनाने और 5 लाख रुपए तक मुफ्त इलाज के लौलीपौप का है.

भाजपा के संकल्प पत्र में कहा गया है कि गरीबों को पक्का घर देने की उस की योजना जारी रहेगी. 3 करोड़ और घर बनाए जाएंगे. बीते 5 साल में कितने मकान बना कर गरीबों को दिए गए, इस का कोई उल्लेख नहीं है. देशभर की स्लम बस्तियां आज भी उसी तरह आबाद हैं जैसी एक दशक पहले थीं. किन गरीबों के लिए सरकार ने घर बनाए और किन गरीबों को दिए? यही नहीं, घरघर पाइपलाइन से सस्ती रसोईगैस पहुंचाने की गारंटी भी भाजपा के मैनिफैस्टो में दी है. इस के बजाय यदि रसोईगैस के दाम कम करने की बात कही होती तो शायद जनता ज्यादा ऐप्रिशिएट करती.

पीएम मोदी ने बीजेपी के घोषणा पत्र में यूसीसी और ‘वन नैशन वन इलैक्शन’ को ले कर बड़ी गारंटी दी है. भाजपा ने देश की जनता से वादा किया है कि पीएम मोदी की सरकार को अगर तीसरा कार्यकाल मिलता है तो वह ‘एक देश, एक चुनाव’ पहल को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ेगी. साथ ही, भाजपा ने देशहित में ‘समान नागरिक संहिता’ लागू करने की संभावनाएं तलाशने की भी बात कही है. भला इन बड़ीबड़ी बातों से आम जनता, खासकर एक आम गृहणी, को क्या लेनादेना? आप देश में एक बार इलैक्शन करवाओ या दस बार, अगर महंगाई कम नहीं हो रही, जवान लड़के को रोजगार नहीं मिल रहा, पति की आय नहीं बढ़ रही, बच्चों को शिक्षा नहीं दिलाईजा पा रही, सरकारी अस्पताल में मामूली दवाएं नहीं मिल रहीं तो सरकार के ऐसे दावों और वादों का एक आम गृहिणी क्या अचार डालेगी? देश की 90 फ़ीसदी औरतों और 60 फ़ीसदी से ज़्यादा पुरुषों को ‘समान नागरिक संहिता’ का मतलब नहीं मालूम.

पीएम मोदी ने भाजपा के घोषणा पत्र में गारंटी दी है कि पूरे देश में ‘वंदे भारत’ ट्रेनों का विस्तार किया जाएगा. वंदे भारत ट्रेनों के 3 मौडल देश में संचालित होंगे, जिन में वंदे भारत स्लीपर, वंदे भारत चेयरकार और वंदे भारत मेट्रो शामिल होंगी. इस के अलावा अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन कौरिडोर के अलावा, देश के उत्तरी, दक्षिणी और पूर्वी हिस्से में भी एकएक हाई स्पीड रेल कौरिडोर बनाए जाएंगे. बता दें कि अहमदाबाद-मुंबई बुलेट ट्रेन कौरिडोर पर तेजी से काम चल रहा है. इस वादे से भी आम जनता का दूरदूर तक कोई फायदा नहीं है. आप की वंदे भारत ट्रेनों में ग्रामीण आदमी तो सफर करेगा नहीं. ये ट्रेनें तो मोदी अपने अमीर उद्योगपतियों-व्यापारियों के लिए चलाएंगे ताकि उन को व्यापार संबंधी यात्राओं में आसानी हो, सुविधा हो. इस से आम आदमी को क्या फायदा जिस की हैसियत जनरल बोगी का टिकट खरीदने तक की नहीं है. हां, अगर मोदी सरकार देश में पैसेंजर ट्रेनें बढ़ाने और टिकट की दरें कम करने की बात कहती तो वह जरूर आम आदमी के फायदे की बात होती. ट्रेनों में जनरल डब्बों की संख्या बढ़ा देती तो गरीब आदमी एक टांग पर खड़ाखड़ा मीलों का सफर करने से थोड़ी राहत पाता. मगर मोदी सरकार को उस गरीब की फ़िक्र कहां जिस के वोट पर वे सत्ता की चाशनी चाट रहे हैं.

भाजपा का घोषणा पत्र कहता है कि देश के किसानों को गारंटी दी जाती है कि कीटनाशकों के प्रयोग, सिंचाई, मिट्टी की गुणवत्ता, मौसम पूर्वानुमान जैसी कृषि संबंधी गतिविधियों के लिए एक स्वदेशी भारत कृषि सैटेलाइट लौंच किया जाएगा. अब मौसम का पूर्वानुमान तो किसान खुद लगा लेता है, उस को सैटेलाइट की जरूरत नहीं है. उस को तो सरकार सस्ती बिजली दे दे जिस से वह अपने ट्यूबवेल चला कर खेतों की सिंचाई कर सके. उस को सरकार सस्ते बीज और सस्ती खाद उपलब्ध करा दे, उस के अनाज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय कर दे, बाढ़ में फसल तबाह हो जाए तो उस को कुछ मुआवजा देने की गारंटी दे दे, उस को कर्जमाफी दे दे,यही बहुत है. मगर इन चीजों का तो भाजपा के मैनिफैस्टो में कोई जिक्र ही नहीं है.
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इस के विपरीत कांग्रेस का घोषणा पत्र आमजन की ज़रूरतों के ज्यादा करीब नज़र आता है. कांग्रेस ने अपने मैनिफैस्टो में वादा किया है कि वह केंद्र सरकार में विभिन्न स्तरों पर स्वीकृत लगभग 30 लाख रिक्त पदों को भरेगी. साथ ही, उस ने राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन रुपए 400 प्रतिदिन करने की गारंटी दी है. इस वादे में दम है. इस से मजदूर वर्ग को फायदा मिलेगा. इसी के साथ कांग्रेस के न्याय पत्र में गारंटी दी गई है कि उस की सरकार आने पर वह लोगों को उन के स्वास्थ्य की देखभाल के लिए 25 लाख रुपए तक के कैशलेस बीमा का राजस्थान मौडल पूरे देश में लागू करेगी. किसानों के लिए स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी गारंटी देगी.

भाजपा ने जिस तरह देश में बीते 10 सालों में आपसी भाईचारे और सौहार्द को सांप्रदायिकता की आग में भस्म करने की कोशिश की है, जिस प्रकार अल्पसंख्यकों के खानेपीने, पहनावे और धार्मिक आस्था पर चोट की है, उस पर कांग्रेस का घोषणा पत्र मरहम लगाने का काम करता है. कांग्रेस ने अपने मैनिफैस्टो में वादा किया है कि पार्टी यह सुनिश्चित करेगी कि प्रत्येक नागरिक की तरह, अल्पसंख्यकों को भी पहनावे, खानपान, भाषा और व्यक्तिगत कानूनों की पसंद की स्वतंत्रता हो. पार्टी ने अपने घोषणापत्र में कहा है, ‘हम व्यक्तिगत कानूनों में सुधार को प्रोत्साहित करेंगे. और हम ऐसा कोई भी सुधार संबंधित समुदायों की भागीदारी और सहमति से करने की कोशिश करेंगे.’

कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में सरकारी परीक्षाओं और सरकारी पदों के लिए आवेदन शुल्क समाप्त करने का भी वादा किया है. इस से युवाओं को बड़ी राहत महसूस हो रही है. अनगिनत युवा, जिन की जेब में फौर्म खरीदने तक के पैसे नहीं होते हैं, एकाध कंपीटिशन देने के बाद आर्थिक तंगी के चलते हार मान बैठते हैं, उन के लिए यह बहुत बड़ी राहत होगी. साथ ही, पार्टी ने कहा है कि वह 15 मार्च, 2024 तक के सभी एजुकेशन लोन माफ कर देगी और बैंकों को हुई क्षति की पूर्ति सरकार मुआवजा दे कर करेगी. कांग्रेस ने 2025 से महिलाओं के लिए केंद्र सरकार की आधी (50 प्रतिशत) नौकरियां आरक्षित करने का वादा अपने न्याय पत्र में किया है. इस से युवाओं में उत्साह है. कांग्रेस का घोषणा पत्र निसंदेह आम जनता की तकलीफों को कम करता दिखाई देता है. भले 2024 में कांग्रेस या इंडिया गठबंधन की सरकार सत्ता में न आए मगर जनता के प्रति ऐसी सोच रखने वाली राजनीतिक पार्टियां ही जनता के दिलों पर राज करती हैं और एक न एक दिन जनता उन का राज्याभिषेक भी जरूर करती है.

 

हार्मोनल समस्या से लड़की के चेहरे पर आ सकते हैं बाल

हाल ही में यूपी शिक्षा बोर्ड की 10वीं परीक्षा 2024 के रिजल्ट घोषित किए गए. सीतापुर की प्राची निगम ने प्रदेश में टौप किया. वह शहर के सीता बाल विद्या मंदिर इंटर कालेज की स्टूडैंट हैं. प्राची ने 98.50 फीसदी के शानदार स्कोर के साथ 600 में से 591 अंक प्राप्त किए हैं. वह बला की तेज दिमाग और इंटैलिजैंट है. गणित में उस की पकड़ इतनी मजबूत है कि उसे 100 में से 100 नंबर मिले हैं. हिंदी, इंग्लिश जैसी भाषाओं में प्राची ने 100 में से 97 नंबर हासिल किए हैं.

यूपी बोर्ड का रिजल्ट आते ही सोशल मीडिया पर तेजी से टौपर्स की तसवीरें और इंटरव्यूज के वीडियो वायरल होने लगे. इस बीच प्राची के चेहरे पर नजर आ रहे अनचाहे बालों को देख कर ट्रौलर गैंग ने उसे अपने निशाने पर लिया. विकृत मानसिकता वालों ने प्राची के चेहरे पर दिख रहे प्राकृतिक सौंदर्य पर सवाल खड़े कर दिए.

‘अरे, इस की तो इतनी बड़ीबड़ी मूंछें हैं,’ ‘यह लड़की कैसे हो सकती है, दिखने में तो बिलकुल लड़कों जैसी है.’ ‘टौपर है तो क्या हुआ, शक्ल तो लड़कों जैसी है.’ ‘यह प्राची कम लग रही प्राचा ज्यादा लग रहा है.’ ‘यह मर्द है या औरत.’ ऐसे न जाने कितने ही बेहूदे कमैंट्स की बरसात हो गई. इस तरह उस की उपलब्धि और कड़ी मेहनत की सराहना की जगह उस के चेहरे के बालों पर बातें होने लगीं. सोशल मीडिया पर उस के मीम्स बनाए गए, उस को ट्रौल किया गया. जाहिर है, हमारे समाज में ज्यादातर लोगों को सिर्फ दिखावा और खूबसूरती से मतलब है. किसी के टैलेंट और अचीवमैंट की सराहना करने के बजाय हम मजाक बनाने में ज्यादा मजे लेते हैं.

हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी लड़की को उस के रूप, रंग, आकार के कारण शर्मिंदा होना पड़ा है. जरनल औफ फैमिनिज्म एंड जैंडर स्टडीज की एक स्टडी कहती है कि मिडिल स्कूल और हाईस्कूल की टीनएज लड़कियां सब से ज्यादा बौडी शेमिंग का शिकार होती हैं, जिस का गहरा असर उन के मानिसक स्वास्थ्य पर पड़ता है. मैंटल हैल्थ फाउंडेशन, यूके का एक सर्वे कहता है कि बौडी इमेज, अपीयरेंस और बौडी वेट को ले कर शर्मिंदगी का भाव लड़कों के मुकाबले लड़कियों में ज्यादा होता है. सर्वे में शामिल लड़कियों का यह भी मानना था कि लड़कियों को खूबसूरत होने का फायदा मिलता है. अगर कोई लड़का हैंडसम हो तो उसे बाकियों के मुकाबले ज्यादा महत्त्व और फायदा मिलता है.

सैकड़ों सालों से लोगों की मानसिकता ऐसे ही गढ़ी गई है कि एक लड़की के लिए उस का सब से कीमती गहना उस का रूपरंग है. तभी तो कौस्मैटिक्स का बाजार इतना फलफूल रहा है. 30 पार करते ही महिलाओं के लिए एंटी एजिंग क्रीम की बाढ़ आ जाती है. 35 पार के लिए रिंकल्स क्रीम, 40 पार के लिए कुछ और क्रीम और 50 पार औरतों के लिए कुछ और बुढ़ापे का डर, कुरूपता का डर, मोटापे का डर, सुंदर और आकर्षक न दिखने का डर सब से ज्यादा औरतों को ही दिखाया जाता है. उन्हीं की बौडी शेमिंग की जाती है. उन्हें ही शर्मिंदा किया जाता है.

महिलाओं के चेहरे पर बालों की वजह

चेहरे पर बाल की 2 वजहें हो सकती हैं. चेहरे पर बाल आनुवंशिक (जेनेटिक) कारणों से हो सकते हैं या फिर हार्मोन्स में आई गड़बड़ी के चलते. चेहरे पर बहुत अधिक बाल होने की स्थिति को हाइपरट्राइकोसिस कहते हैं. अगर आनुवंशिक वजहों के चलते चेहरे पर बाल हैं तो इसे जेनेटिक हाइपरट्राइकोसिस कहते हैं और अगर ये परेशानी हार्मोन्स के असंतुलन के चलते है तो इसे हर्सुटिज्म कहते हैं.

हार्मोनल विकार

कुशिंग्स सिंड्रोम : यह एक तरह की मैडिकल कंडीशन है. कुशिंग्स सिंड्रोम होने की वजह से महिलाओं के एड्रिनल ग्लैंड में प्रौब्लम होने लगती है, जिस वजह से शरीर में कोर्टिसोल नाम का हार्मोन सामान्य से अधिक बनने लगता है. जब कोर्टिसोल ग्लैंड में समस्या होने लगती है, तो महिलाओं के चेहरे पर बाल उगने लगते हैं.

कई मामलों में यह भी देखा गया है कि महिलाओं के चेहरे, गरदन और जांघों पर बहुत ज्यादा बाल उग आते हैं. कुशिंग्स सिंड्रोम होने पर महिलाओं के चेहरे पर बाल उगने के अलावा वेट गेन करना, बीपी बढ़ना, पीरियड्स से जुड़ी समस्याएं भी हो सकती हैं.

पीसीओएस : पीसीओएस यानी पौलिसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम. आमतौर पर महिलाओं के चेहरे पर इसी बीमारी के कारण बाल उगते हैं. पीसीओएस के लिए सब से ज्यादा हमारी लाइफस्टाइल जिम्मेदार होती है. हमारा खानपान, बौडी बिल्डिंग के लिए स्टेरौएड का इस्तेमाल, घंटों एक ही मुद्रा में बैठे रहना, तनाव लेना आदि वे मुख्य वजहें हैं जो पीसीओएस को बढ़ावा देने का काम करती हैं.

पीसीओएस होने पर महिलाओं की ओवरी में सूजन हो जाती है. ओवरी में सूजन के कारण महिलाओं के अंदर वूमेंस हार्मोन का संतुलन गड़बड़ाने लगता है और पुरुष हार्मोन जैसे एंड्रोजेन और टेस्टोस्टेरौन बढ़ने लगते हैं. जो महिलाएं पीसीओएस से ग्रसित होती हैं उन्हें कई तरह की अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है, जैसे एकाएक वजन का बढ़ना, बाल झड़ना और अनियमित महावारी का होना.

मेल हार्मोन का बढ़ना

कई महिलाओं के शरीर में मेल सैक्स हार्मोन टेस्टोस्टेरौन का ज्यादा स्राव होने की वजह से भी महिलाओं के चेहरे और शरीर के अन्य अंगों पर बाल ज्यादा उगने लगते हैं. मेल हौर्मोन की वजह से महिलाओं की आवाज भी भारी हो जाती है.

दवाइयों के साइड इफैक्ट्स

जो महिलाएं हार्मोनल थेरैपी लेती हैं उन में भी फेशियल हेयर की प्रौब्लम होने लगती है. थेरैपी के दौरान इस्तेमाल होने वाली दवाइयों के साइड इफैक्ट की वजह से ऐसा हो सकता है.

जेनेटिक कारण

चेहरे पर अनचाहे बालों के पीछे एक वजह आनुवंशिकता भी हो सकती है. अगर परिवार में दादी, नानी और मां आदि में से किसी के अनचाहे बाल हैं तो यह समस्या अगली पीढ़ी की लड़कियों को भी हो सकती है.

चेहरे के बालों को कैसे करें कम

• वैक्सिंग, थ्रेडिंग और शेविंग जैसी तकनीक बालों को अस्थायी रूप से हटाने में सहायक हो सकती है. इसे सैलून में करवाया जा सकता है.
• इलैक्ट्रोलिसिस एक और तरीका है जिस से बालों को हटाने में मदद मिल सकती है. इस के बारबार प्रयोग करने से 15 से 50 प्रतिशत तक बाल स्थायी रूप से कम हो सकते हैं.
• बालों को हटाने का एक और इफैक्टिव तरीका है लेजर तकनीक. लेजर विधि बालों के रोम को नष्ट करने और बालों के विकास को कम करने में मदद करती है.
• जेल या लोशन से भी बालों को रिमूव किया जा सकता है. ये बालों को हटाने का सुरक्षित और आसान तरीका है.

दाढ़ी वाली महिला जिस का नाम वर्ल्ड रिकौर्ड में दर्ज है

ब्रिटेन में रहने वाली हरनाम कौर का नाम पूरी दाढ़ी वाली सब से कम उम्र की महिला के तौर पर गिनीज बुक औफ वर्ल्ड रिकौर्ड में दर्ज है. जब हरनाम 16 साल की थीं तब पता चला की उन्हें पौलीसिस्टिक सिंड्रोम है जिस की वजह से उन के चेहरे और शरीर पर बाल बढ़ने लगे. शरीर और चेहरे पर अतिरिक्त बालों की वजह से उन्हें अपने स्कूल में दुर्व्यवहार उठाना पड़ा और कई बार तो स्थिति इतनी खराब हो गई कि उन्होंने सुसाइड करने को भी सोचा. लेकिन अब उन्होंने ख़ुद को इसी रूप में स्वीकार कर लिया है.

पिछले कई सालों से उन्होंने अपने चेहरे के बाद नहीं हटवाए. वे कहती हैं कि वैक्सिंग से त्वचा कटती है, खिंचती है. त्वचा कई बार जल जाती है. घाव भी हो सकते हैं. ऐसे में दाढ़ी बढ़ाना बहुत राहतभरा फैसला था. हरनाम को अपनी दाढ़ी से बहुत प्यार है क्योंकि वह किसी पुरुष की नहीं, एक महिला की दाढ़ी है.

यह बात अलग है, कुछ लड़कियां अपनी खूबसूरती को महत्त्व देते हुए पार्लर का चक्कर लगाती हैं या समयसमय पर चेहरे के लिए ब्यूटी टिप्स फौलो करती हैं. कुछ लड़कियां अपनी पढ़ाई और अचीवमैंट को ही अपनी खूबसूरती मानती हैं. इसी तरह टौपर प्राची भी हैं जो अपना ज्यादा से ज्यादा समय अपनी पढ़ाई को देती हैं. पर इस का मतलब यह नहीं कि समाज उन्हें इस हद तक परेशान करे. इस बोर्ड एग्जाम्स में लड़कियों ने बाजी मारी है. आगे भी हर परीक्षा में वे बाजी मारेंगी चाहे बाजी बोर्ड की हो या फिर जिंदगी की.

गतिअवरोधक : भाग 3- सूफी ने अपने भविष्य का क्या फैसला किया

अकील की मां ने बहुत खुशी के साथ रिश्ता करने की बात कही. ‘‘सलमा ने घर आ कर तारीफों के पुल बांध दिए पर अम्मा का चेहरा उतरा हुआ था. सलमा के मुंह से इन लोगों की तारीफें सुन कर वे गरज उठीं, ‘मु झे नहीं ब्याहना उस घर में अपनी लड़की को. वह घर है या इंसानों का जंगल. कुल मिला कर  14-15 आदमी होंगे घर में. जेठानियां हैं, जेठ हैं, ननदें हैं, देवर हैं, सासससुर हैं. मेरी लड़की भला किसकिस के नाजनखरे उठाएगी. इतने लोगों के बीच रह कर सुख का जीवन कैसे जी सकती है? फिर जब लड़के के मांबाप, बड़े भाईबहन मौजूद हैं तब उस की सारी आमदनी तो इन्हीं लोगों के हाथों में पहुंचती होगी.

ऐसा लड़का आजादी के साथ पत्नी के शौक कैसे पूरे कर सकता है? मैं नहीं दे सकती ऐसे घर में अपनी लड़की को.’’ यों कह कर अम्मा ने खालू के प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया.  मैं सोचने लगा कि वाकई चाची का स्वभाव ऐसा ही है. वे चाहती हैं कि उन की लड़की किसी ऐसे घर में ब्याह कर जाए जहां कोई उस पर हुकूमत करने वाला न हो. घर में पूरी तरह से उसी का एकाधिकार रहे. इसलिए वे सदैव ऐसे वर की तलाश में रहती हैं जो अपने मांबाप का इकलौता हो. यदि घर में सासननद हों तो लड़का शादी के बाद अपनी पत्नी को ले कर अलग घर बसा कर रहने का इच्छुक हो.

इस के अतिरिक्त इस बात पर भी उन की नजर रहती है कि लड़के की आमदनी में हिस्सा बंटाने वाले तो घर में नहीं हैं अथवा लड़के पर किसी प्रकार का कोई पारिवारिक उत्तरदायित्व तो नहीं है. यदि घर में पढ़ने वाले छोटे भाईबहन हैं या शादी के लायक बहनें हैं तो घर में आय के क्याक्या साधन हैं. साथ ही, वे इस बात का भी ध्यान रखती हैं कि लड़के के सगेसंबंधियों से कभी उन का कोई  झगड़ा तो नहीं रहा है.  मु झे याद है कि एक बार उन के ही  पड़ोस के डा. रिजवी की बेगम ने  अपने देवर का पैगाम भेजा था. लड़का शिक्षा विभाग में व्याख्याता पद पर नियुक्त हुआ था और प्रादेशिक शिक्षक संघ का महामंत्री था. साजिद चाचा को यह रिश्ता एकदम पसंद था. वाजिद को भी यह रिश्ता पसंद था क्योंकि लड़के के भाई, बाप, चाचा आदि सभी राजपत्रित अधिकारी थे.

परंतु चाची ने साफ इनकार कर दिया था क्योंकि खाना बनाने की कुछ विधियों को ले कर कभी डा. रिजवी की पत्नी से उन का  झगड़ा हो गया था और उन का विचार था कि उस  झगड़े को ले कर वे कभी भी उन की लड़की को परेशान कर सकती हैं. एक और अच्छे घर को चाची केवल इसलिए रद्द कर चुकी थीं कि लड़के की बड़ी भाभी के मामूजाद भाई ने चाची की फूफीजाद बहन को तलाक दे दिया था. ‘‘इस प्रकार कभी अब्बा और अम्मा सहमत हो जाते हैं तो भाईजान की राय अलग हो जाती है. कभी अम्मा और भाईजान एक मत होते हैं तो अब्बा राजी नहीं होते. अब्बा और भाईजान के राजी होने पर अम्मा का विचार अलग हो जाता है. ‘‘इन परिस्थितियों में समय बीतता जा रहा है. बीतते हुए समय के साथ सलमा और अजरा भी इस काबिल हो गई हैं कि उन के हाथ भी पीले कर दिए जाएं. इन के मुर झाए हुए चेहरे देख कर मु झे रोना आता है.

‘‘लेकिन अजमल भाई, आंसू बहाते रहने और खुद को पूर्णरूप से दूसरों पर निर्भर कर देने से तो समस्या का समाधान नहीं होगा. मैं ने अच्छी तरह सम झ लिया है कि अपनेअपने आदर्शों के खोल में लिपटे हुए अब्बा, अम्मा और भाईजान तीनों कभी एकमत नहीं हो सकते. ये सदा रास्ते के गतिअवरोधक बने रहेंगे. इसलिए अपने जीवन का फैसला इन लोगों पर छोड़ देने के बजाय खुद मैं ने यह फैसला करने का इरादा कर लिया है.  ‘‘प्रोफैसर उसमानी मेरी एक सहेली के भाई हैं. इस सहेली के घर में ही उन से मेरा परिचय हुआ था. बाद में यह परिचय आत्मीय संबंधों में बदल गया और अब हम लोग शीघ्र ही कोर्ट मैरिज करने जा रहे हैं. प्रोफैसर उसमानी को राजनीति से कोई सरोकार नहीं है. उन का संबंध एक बहुत ही साधारण परिवार से रहा है.

अपने परिश्रम से ही पढ़ाई कर के उन्होंने विश्वविद्यालय में यह पद प्राप्त किया है. उन के घर में मांबाप के अतिरिक्त 3-4 छोटे भाईबहन हैं और इन सब की देखरेख का उत्तरदायित्व इन्हीं पर है. इसलिए मैं जानती हूं कि अब्बा, अम्मा और भाईजान तीनों को यह चयन पसंद नहीं आएगा. सो, इन की सहमति का प्रश्न ही नहीं उठता. फिर मेरे इस फैसले को ले कर पूरा खानदान मु झे कलंकनी कहेगा. न जाने क्याक्या बातें बनेंगी पर मु झे किसी की चिंता नहीं है. ‘‘मु झे अपनेआप पर विश्वास है कि मैं जो कुछ करने जा रही हूं, वह उचित है.’’ मु झे भी उस का यह निर्णय उचित ही लगा. जिस लड़की के मांबाप और भाईबहन 8-10 वर्ष में भी उस के लिए कोई वर न ढूंढ़ पाए, वह लड़की यदि स्वयं अपने भविष्य का फैसला करने उठ खड़ी हो तो उस में बुरा क्या है? सूफी के निर्णय से मु झे प्रसन्नता हुई.

मन को संतोष हुआ कि जो आशंका पत्र पढ़ते ही मन में उभरी थी वह निर्मूल सिद्ध हुई. अंदर ही अंदर सूफी के साहस की प्रशंसा करते हुए आगे पत्र पढ़ा : ‘‘आशा है आप मु झे गलत नहीं सम झेंगे. मैं जो कुछ करने जा रही हूं वह न केवल मेरे हित में है, बल्कि इस से अब्बा, अम्मा और भाईजान को अपने रवैए की गलती का एहसास होगा और मेरी छोटी बहनें भी इस से प्रेरणा ले कर अपने भविष्य का निर्माण स्वयं करने में सक्षम होंगी. ‘‘शेष कुशल है. ‘‘आप की छोटी बहन, सूफी.’’

अंधविश्वास: भू समाधि का विज्ञान अभ्यास या दैवीय चमत्कार

विभिन्न करतबों को अकसर लोग भ्रम मान लेते हैं और अंधविश्वास के जाल में फंस जाते हैं. ऐसे ही भू समाधि के करतब से कई भक्त लोग भ्रमित होते हैं. इस के पीछे का विज्ञान किसी को पता नहीं रहता.

समाचार अगस्त 2019 का है. सुलतानपुर के एक योगी ने अयोध्या में सीताकुंड घाट पर भू समाधि ली. पहले 10 बाई 10 फुट का गड्ढा खोदा गया. 15 फुट लंबी सुरंग बनाई गई. ऊपर से बल्ली, पटरा, गिट्टी आदि से ढका गया. त्रिशूलों से चारों ओर फेरा बनाया गया और सुरंग से वे समाधि में प्रवेश कर गए और फिर 15 अगस्त को निकले. दैनिक जागरण में प्रकाशित समाचार में वे कितने दिन समाधि में रहे, नहीं बताया गया पर यह जरूर कहा गया कि श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगने लगा जो 24 घंटे आतेजाते रहे.

दिसंबर 2021 में लाइव भारत न्यूज के अनुसार जागरण मलपुरा थाने के क्षेत्र में नाले के निर्माण को ले कर 85 वर्ष की वृद्धा और एक किसान ने गड्डा खोदा और उस में बैठ गए और ऊपर से पटरा डाल दिया गया. तहसीलदार के पहुंचने के बाद सम  झानेबु  झाने पर वे बाहर निकले.

बिहार के मधेपुरा जिले के चौखा थाना क्षेत्र के नाथ बाबा मंदिर के पास प्रमोद बाबा ने 15 दिन की समाधि 6 वर्ष पहले ली थी.

इस प्रकार के समाचार अकसर प्रकाशित होते रहते हैं और हर समाचार में चमत्कार कहा जाता है. आसपास के गांवों से लोग जमा होते हैं. खूब गानाबजाना होता है.

कई साल पहले मध्य प्रदेश के गुना में एक महिला द्वारा 72 घंटों के लिए ली गई भू समाधि चर्चा में रही. कुछ वर्षों पहले रायपुर तथा नागपुर में भी भू समाधि के प्रदर्शन किए गए थे. भू समाधि के इन प्रदर्शनों में एक ही बात बारबार दोहराई जाती रही है कि समाधि की प्रक्रिया में साधक परमात्मा से साक्षात्कार करेगा, साथ ही यह समाधि विश्वशांति, जनकल्याण के लिए समर्पित है. विभिन्न धार्मिक मेलों में, उत्सवों में आप को ऐसे दृश्य देखने को मिल जाएंगे जिन में कोई व्यक्ति नदी के किनारे गरदन तक रेत में धंसा हुआ है तो कोई शीर्षासन, तो कोई एक पैर में तो एक कोई एक हाथ उठाए खड़ा है.

अकसर ऐसे प्रदर्शनों को चमत्कार के रूप में प्रदर्शित किया जाता है. वहीं आम लोगों की धार्मिक आस्था का लाभ उठा कर लोगों का शोषण करने वालों की भी कमी नहीं है. समाधि प्रदर्शन के व्यापक प्रचारप्रसार से जनता की भीड़ लग जाती है व मेले जैसा माहौल बन जाता है. इस से हजारों रुपयों का चढ़ावा आने लगता है. लोग अपनी मन्नतें पूरी करने आने लगते हैं. दुकानें सज जाती हैं लेकिन ताम  झाम व प्रदर्शन के पीछे कुछ प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं कि क्या समाधि ग्रहण करना वास्तव में दैवीय चमत्कार से जुड़ा है, क्या इस से विश्व शांति, जन कल्याण, हो सकता है,  आम लोगों के दुखदर्द दूर करने का क्या यही एकमात्र रास्ता है या यह एक सामान्य से अभ्यास का सार्वजनिक प्रदर्शन है?

भू समाधि के संबंध में वैज्ञानिकों की स्पष्ट राय है कि कमरेनुमा स्थान बना कर उस में बैठना किसी भी व्यक्ति के लिए संभव है. वहीं देश के सुप्रसिद्ध विचारक एवं युग निर्माण योजना के संस्थापक आचार्य श्रीराम शर्मा समाधि लेने के प्रदर्शन को अभ्यास से संभव मानते हैं. भू समाधि लेने की प्रक्रिया रायपुर में इस लेखक ने स्वयं देखी है. समाधि के लिए करीब 10 फुट लंबा, 10 फुट चौड़ा तथा 10 फुट गहरा गड्ढा खोदा जाता है. गड्ढों को अच्छी तरह साफ कर, पानी सींचने के बाद कमरे की दीवारों की चूने से पुताई कर दी जाती है, ताकि कीड़ेमकोड़े उस स्थान से हट जाएं.

इस स्थान पर दीए को जला कर देख लिया जाता है कि वहां औक्सीजन की पर्याप्त मात्रा है या नहीं. इस कमरे में दुर्गंधनाशक अगरबत्तियां जलाई जाती हैं. व इत्र छिड़के जाते हैं. पूरी तैयारी के बाद जनहित, विश्वशांति, समृद्धि, लोक कल्याण के लुभावने ताबड़तोड़ प्रचार के साथ समाधि लेने वाले व्यक्ति को इस कमरेनुमा गड्ढे में एक आसन पर बैठा दिया जाता है. गड्ढों की छत को बांसबल्लियों, टीन से ढक दिया जाता है तथा ऊपर से बारदाना रख कर उसे मिट्टी व गोबर से लीप दिया जाता है. इस से दर्शकों को यह विश्वास हो जाता है वह कमरानुमा गड्ढा पूरी तरह से बंद है

तथा यह एक दृष्टि में पूर्णतया वायुरोधी लगता है.

कुछ घंटों बाद मिट्टी सूखने लगती है व उस में दरारें पड़ जाती हैं और हवा आनीजानी शुरू हो जाती है. समाधि स्थल के पास ही मंच बनाया जाता है जहां से लगातार ध्वनि विस्तार के यंत्रों से समयसमय पर विभिन्न घोषणाएं, नारेबाजी की जाती है. बीचबीच में यह भी बताया जाता है कि कितने घंटे बीत चुके हैं व कितना समय बाकी है.

इन घोषणाओं, नारों, जयजयकार से अंदर उपस्थित साधक को मनोवैज्ञानिक आधार मिल जाता है जिस से अकेलेपन, मानसिक तनाव से वह परेशान नहीं होता. निर्धारित अवधि के बाद कमरे की छत खोल दी जाती है तथा समाधिकर्ता को बाहर निकाल लिया जाता है. हजारों लोगों की उपस्थिति के बीच उसे एक नए अलौकिक व्यक्तित्व में पेश किया जाता है.

भू समाधि का अभ्यास

एक वैज्ञानिक आकलन के अनुसार 10 फुट लंबे, 10 फुट चौड़े, 10 फुट गहरे गड्ढे का आयतन एक हजार घन फुट होता है जिस में एक हजार घन फुट हवा रहती है. एक व्यक्ति को एक घंटा जीवित रहने के लिए 5 घन फुट हवा की आवश्यकता होती है. एक हजार घन फुट हवा में व्यक्ति 200 घंटे अर्थात 8 दिनों तक जीवित रह सकता है.

इस के अतिरिक्त विश्राम की अवस्था में शांत बैठे रहने पर चयापचय की क्रिया भी मंद हो जाती है तथा श्वसन में भी कम वायु इस्तेमाल होती है. जबकि खेलने, दौड़ने, भागने, कठोर शारीरिक श्रम करने में, व्यायाम में अधिक वायु की आवश्यकता होती है.

कमरेनुमा गड्ढे में मिट्टी भुरभुरी रहती है जिस में असंख्य छोटेछोटे छिद्र रहते हैं. उन में सूक्ष्म मात्रा में हवा का आवागमन बना रहता है. यदि किसी गड्ढे में उपस्थित वायु में औक्सीजन व कार्बन डाईऔक्साइड का अनुपात नापा जाए तथा समाधि के बाद कमरे में पुन: औक्सीजन व कार्बन डाईऔक्साइड का अनुपात लिया जाए तो यह पता चल जाएगा कि कमरे की कितनी औक्सीजन उपयोग की गई.

भूमिगत समाधि के प्रदर्शन में धड़कन बंद करना, शरीर का निश्चेष्ट होना व गहन तंद्राग्रस्त होना आवश्यक नहीं है. जिस कमरेनुमा गड्ढे में समाधि लगाई जाती है उस में इतनी खाली जगह रहती है कि उस में सांस लेते रहने पर निर्धारित अवधि तक जीवित रहा जा सकता है. फिर जमीन भी सर्वथा ठोस नहीं रहती, पोलेपन में औक्सीजन के आनेजाने का क्रम किसी न किसी रूप में बना रहता है.

यदि ऐसा न हो तो छोटेछोटे बिलों में दर्जनों चूहे किस प्रकार घुसे रहते हैं, सांप कैसे जीवित रहते हैं. इंसान की छोड़ी हुई सांस में इतनी आक्सीजन रहती है जिस से बारबार सांस ली जा सकती है. ठंड के मौसम में रूई की रजाई ओढ़ कर उसे चारों ओर से लपेट कर उस के भीतर रातभर सांस लेते हुए परिवारों का सोना इस का प्रत्यक्ष उदाहरण है.

प्रश्न हवा की उपलब्धता का है. कड़ाके की ठंड में चारों तरफ बंद कमरे में कईकई लोग परिवार के साथ रातभर रह जाते हैं. शीत ऋतु में बिना पानी पिए कई घंटों तक रहा जा सकता है. कुछ प्राणी, जैसे अजगर, भालू आदि शीत ऋतु में गहरी निंद्रा में चले जाते हैं तथा जब मौसम अनुकूल हो जाता है तब वे शीत निष्क्रियता से बाहर निकलते हैं. इन दिनों उन की जैविक क्रियाएं मंद गति से संचालित होती रहती हैं. इस अवधि में वे कुछ खातेपीते नहीं, बल्कि शीत निष्क्रियता की अवधि में संचित चरबी के सहारे काट लेते हैं. ऊंट एक बार में इतना चारापानी पेट में जमा कर लेता है कि वह हफ्तों बिना पानी पिए रह सके.

मानसिक संतुलन जरूरी

भूमिगत समाधि में सब से बड़ी बात मानसिक संतुलन बनाए रखने की है जो अभ्यास से ही संभव है. एक स्थान पर भू समाधि में बैठे व्यक्ति की अंतरिक्ष यात्रियों, टैंक में बैठे सैनिकों, पनडुब्बियों में सवार नौ सैनिकों से तुलना की जा सकती है. अंतरिक्ष यात्रा के लिए चयन किए यात्रियों को अंतरिक्ष यात्रा के पहले निश्चित प्रशिक्षण से गुजरना होता है. वे जिस कैप्सूल में बंद रहते हैं उस में सिर निकालने की भी गुंजाइश नहीं होती. यात्री पूरी तरह से विभिन्न यंत्रों, उपकरणों, गैस सिलैंडरों से जकड़ा रहता है. मलमूत्र विसर्जन भी उसे उन्हीं आवरण में करना पड़ता है. सोने का काम भी उन्हीं कपड़ों में होता है.

यह काम वैसे कठिन लगता है लेकिन अभ्यास से संभव है. पनडुब्बियों में नौ सैनिक, पानी के अंदर भारी दबाव में महीनों गुजार देते हैं. युद्धस्थल में सैनिक टैंकों के भीतर बंद रहते हैं. बहादुर सूरमा बर्फ की चोटियों, गहरी खाई, दर्रे, नदीनाले पार करते हैं तथा गोलियों व तोपों की बाढ़ के बीच जोखिम सहते हुए अपने निर्दिष्ट लक्ष्य को प्राप्त करते हैं. जबकि भूमिगत समाधि का प्रदर्शन करने वालों को न तो क्षण प्रतिक्षण चौकन्ना व सतर्क रहना पड़ता है न उन के लिए परिस्थितियां इतनी कठिन रहती हैं.

अंतरिक्ष में रौकेट की परत गरम हो जाती है, टैंकों का तापमान बढ़ने लगता है, पनडुब्बियों व लड़ाकू विमान के चालकों का खतरा हर क्षण बना रहता है जबकि समाधि में न केवल वातावरण अनुकूल रहता है बल्कि व्यक्ति मानसिक दबाव में भी नहीं रहता.

विज्ञान पत्रिका साइंस टूडे में गांधी मैडिकल कालेज, हैदराबाद के डा. शंकर राव का लेख प्रकाशित हुआ था जिस में मुंबई के आर जे वकील द्वारा की गईर् खोजों का उल्लेख है. उक्त वकील ने रामदास नामक समाधिकर्ता के प्रदर्शन का परीक्षणात्मक विवरण छापा था जिस में यह निष्कर्ष निकला था कि समाधि की अवस्था में निश्चित अवधि के लिए जितनी हवा की आवश्यकता थी, उतनी इस गड्ढे में मौजूद थी.

मुंबई में लोनावला स्थित योगाश्रम में डा. पी करमवेलकर ने यह सिद्ध कर दिया था कि समाधि प्रदर्शन एक सामान्य सा कौतुक है. उन्होंने इस के लिए

2 सामान्य कार्यकर्ता तैयार किए, जिन का योगाभ्यास तथा किसी विशिष्ट दैवीय शक्तियुक्त प्रचार से भी कोई संबंध नहीं था. वे सिखाए जाने पर धीरेधीरे समाधि में बैठने की कला में पारंगत हो गए. जब उन्हें एक कमरेनुमा गड्ढे में समाधि हेतु बैठाया गया तो वे घंटों गड्ढे में रहे तथा नियत अवधि के बाद हंसते हुए बाहर निकल आए.

ऐसे प्रदर्शनों में अभ्यास कौशल ही प्रमुख है, दैवीय शक्ति जैसी बात नहीं. आजकल अंधविश्वास निर्मूलन एवं विज्ञान लोकप्रियकरण अभियान से जुड़े कार्यकर्ता भी समाधि पर बैठने का अभ्यास कर रहे हैं तथा कुछ कार्यकर्ता समाधि प्रदर्शन भी करने लगे हैं.

यदि आश्चर्यजनक प्रदर्शनों की ही बात की जाए तो देखा होगा कि सर्कस के कलाकार हवाई   झूलों, ऊंचाई व तार में चलने, मोटरसाइकिल, कारों को कुएं में चलाने जैसे हैरतअंगेज प्रदर्शन अपने अभ्यास से ही करते हैं. मीना बाजार में कुएं में आग लगा कर कूदने, जादूगर द्वारा आदमी को गायब करने, आरी से लड़की के टुकड़ेटुकड़े करने, फिर जोड़ने, टोपी से खरगोश निकालने, आंख में पट्टी बांध कर मोटरसाइकिल चलाने, हथकडि़यों व बेडि़यों में बंद होने के बाद तालाबंद बक्से की चाबी न होते हुए भी समुद्र से प्रकट होने, रेलगाड़ी गायब करने, ताजमहल गायब कर देने के प्रदर्शन को भी वे अभ्यास कौशल, भ्रम पैदा करने की बात बताते हैं. वे इसे दैवीय चमत्कार की बात नहीं मानते.

विभिन्न करतबों को चमत्कार सम  झने वाले कई नागरिक अकसर भ्रम में आ जाते हैं जिस के लिए पर्याप्त लोक शिक्षण, विज्ञान शिक्षा की वृहद स्तर पर आवश्यकता है. अन्यथा भोलेभाले लोगों को चमत्कारिक लगने वाले करतब दिखा कर, स्वयं को अलौकिक व दैवीय शक्तियुक्त घोषित करने वाले स्वार्थीतत्त्व अपना उल्लू सीधा करते रहेंगे.

चालान : लहना सिंह ने आखिर क्यों कर ली चालान से तौबा

‘‘आजकल काम मंदा है. 2-4 दिन ठहर कर आना,’’ लहना सिंह ने सादा वरदी में महीना लेने आए ट्रैफिक पुलिस के एक सिपाही से कहा.

‘‘यह नहीं हो सकता. इंचार्ज साहब ने बोला है कि पैसे ले कर ही आना. आज बड़े साहब के यहां पार्टी है. वहां शराब की एक पूरी पेटी पहुंचानी है,’’ सिपाही ने कोल्डड्रिंक की बोतल खाली कर उसे थमाते हुए कहा.

‘‘अरे भाई, 4 दिन से गाड़ी खाली खड़ी है. एक पैसा नहीं कमाया. जेब बिलकुल खाली है,’’ लहना सिंह ने मजबूरी जताई. हकीकत में उस की जेब खाली थी.

‘‘जब इंचार्ज साहब यहां आएं, तब उन से यह सब कहना. कैसे भी हो, मुझे तो 3 सौ रुपए थमाओ. मुझे औरों से महीना भी इकट्ठा करना है,’’ सिपाही पुलिसिया रोब के साथ बोला.

लहना सिंह ने जेब में हाथ डाला. महज 60-70 रुपए थे. अब वह बाकी रकम कहां से पूरी करे? वह उठा और अड्डे पर मौजूद दूसरे भाड़े की गाडि़यां चलाने वाले साथियों से खुसुरफुसुर की.

किसी ने 20 रुपए किसी ने 50 रुपए, तो किसी ने सौ रुपए थमा दिए. लहना सिंह सिपाही के पास पहुंचा और गिन कर उसे ‘महीने’ के 3 सौ रुपए थमा दिए.

सिपाही रुपए ले कर चलता बना. लहना सिंह भाड़े का छोटा ट्रक चलाता था. पहले वह एक ट्रक मालिक के यहां ड्राइवर था, जिस के कई ट्रक थे. फिर उस ने अपने मालिक से ही यह छोटा ट्रक कबाड़ी के दाम पर खरीद लिया था.

लहना सिंह ने कुछ हजार रुपए ऊपर खर्च कर ट्रक को काम देने लायक बना लिया था.

ट्रक काफी पुराना था. उस के सारे कागजात पुराने थे. कई साल से उस का रोड टैक्स नहीं भरा गया था. उस का अब कोई बीमा नहीं हो सकता था.

ऐसे ट्रक को लहना सिंह को बेचने वाला मालिक काफी तेजतर्रार था. उस ने पुलिस से ‘महीना’ बांधा हुआ था. अब यही ‘महीना’ लहना सिंह को देना पड़ता था.

पिछले कई दिनों से लगातार बारिश हो रही थी. जहांतहां कीचड़ और पानी भरा था. धंधा काफी मंदा था. उसे कभी काम मिल जाता था, कभी कई तक दिन खाली बैठना पड़ता था. पहले लहना सिंह खुद अपना ट्रक चलाता रहा था, लेकिन अब मालिक बन कर अड्डे के तख्त पर दूसरे ट्रक मालिकों के साथ वह ताश खेलता था.

आज घर राशन ले जाना था. बीमार मां और पत्नी को भी अस्पताल दवा लेने जाना था. खर्च बहुत थे, मगर कमाई नहीं हुई थी.

तभी लाला मिट्ठल लाल अड्डे पर आ गया.

‘‘आओ लालाजी,’’ लहना सिंह ने कहा.

‘‘अरे लहना सिंह, किस की गाड़ी का नंबर है?’’

‘‘अपना है जी. कहां जाना है?’’

‘‘जमालपुर.’’

‘‘चलेंगे जी. क्या माल है?’’

‘‘अनाज की बोरियां हैं. 20 क्विंटल माल है.’’

‘‘कोई बात नहीं जी. ले जाएंगे.’’

‘‘गाड़ी ठीक है न?’’

‘‘अरे लालाजी, आप ने कई बार बरत रखी है. क्या कभी आप का काम रुका है?’’

‘‘वह तो ठीक है. तुम्हारी गाड़ी पुरानी है. क्या पता चलता है?’’

‘‘लालाजी, पुराना सौ दिन, नया नौ दिन.’’

‘‘कितना भाड़ा लोगे?’’

‘‘जो जायज हो दे देना जी. आप मालिक हो.’’

‘‘फिर भी? पहले बता दोगे, तो अच्छा रहेगा.’’

‘‘2 हजार रुपए.’’

‘‘बहुत ज्यादा है.’’

‘‘नहीं लालाजी, आज के महंगाई के जमाने में ज्यादा नहीं है.’’

‘‘5 सौ रुपए.’’

‘‘नहीं जी, आप 2 सौ रुपए कम कर लो.’’

‘‘चलो, 17 सौ दे देंगे.’’

‘‘ठीक है जी. आप मालिक हो. कब गाड़ी लगाऊं?’’

‘‘अभी ले चलो. मेरा गोदाम तो देखा हुआ है तुम ने.’’

‘‘लालाजी 5 सौ रुपए पेशगी दे दो. डीजल डलवाना है.’’ लालाजी ने 5 सौ रुपए पेशगी दे दिए.

लालाजी, लहना सिंह, ड्राइवर और क्लीनर चारों ट्रक में सवार हो गए.

पैट्रोल पंप रास्ते में ही था. 4 सौ रुपए का डीजल डलवा कर सौ रुपए ड्राइवर को रास्ते के खर्च के लिए थमा कर लहना सिंह अड्डे पर लौट आया.

लालाजी ने गोदाम में ट्रक पहुंचते ही 50-50 किलो वाले 40 कट्टे ट्रक में रखा दिए. ट्रक जमालपुर की तरफ चल पड़ा.

जमालपुर जाने के लिए 2 रास्ते थे. पहला रास्ता थोड़ा लंबा था, मगर कच्चा था. लेकिन इस रास्ते पर चैकिंग न के बराबर होती थी. नंबर दो का काम करने वालों के लिए और लहना सिंह जैसे गाड़ी वालों के लिए, जिन के कागजात पूरे नहीं थे, यह महफूज रास्ता था.

दूसरा रास्ता पक्का था. साफसपाट, सीधा था. मगर इस रास्ते पर ट्रैफिक पुलिस, टैक्स वालों और दूसरे महकमों की चैकिंग बहुत होती रहती थी. ऊपर से यह रास्ता रेलवे लाइन के साथसाथ चलता रेलवे स्टेशन को पार करता आगे बढ़ता था. यहां पर रेलवे पुलिस का अधिकार क्षेत्र था. किसी भी लिहाज से यह नंबर दो वालों के लिए और बिना पूरे कागजात वाली गाड़ी वालों के लिए महफूज नहीं था.

लालाजी लंबे और महफूज रास्ते से जा रहे थे. ट्रक बढ़ रहा था कि तभी ड्राइवर ने ब्रेक लगा दिया.

‘‘क्या हुआ?’’ झपकी ले रहे लालाजी ने आंखें खोल कर पूछा.

‘‘आगे सड़क टूटी हुई है जी.’’

लालाजी ने उचक कर देखा. सड़क का एक लंबा हिस्सा टूट कर बिखर गया था. घुटनों तक पानी था. अब क्या करें?

ड्राइवर ने लहना सिंह को मोबाइल से फोन किया और सारी बात बताई.

‘‘लालाजी से पूछ ले कि क्या करना है?’’ लहना सिंह ने कहा.

लालाजी सोच में डूबे थे. उन के पास नंबर दो का माल था. दूसरा रास्ता चैकिंग करने वालों से भरा रहता था. माल पकड़ा जा सकता था.

अभी तक लालाजी को यह पता नहीं था कि लहना सिंह के ट्रक के कागजात पूरे नहीं थे. क्या गाड़ी वापस ले चलें? मगर माल आज ही पहुंचाना था. पार्टी सारा पैसा पेशगी दे गई थी.

‘‘दूसरे रास्ते से चलो.’’

‘‘ठीक है जी,’’ ड्राइवर ने गाड़ी मोड़ ली.

रेलवे स्टेशन से थोड़ा पहले ट्रक रोक कर उस ने क्लीनर को ‘जरा नजर डाल आ’ का इशारा किया. क्लीनर स्टेशन के पास पहुंचा. चौक सुनसान था. रेलवे स्टेशन खाली था. रेलवे लाइन के साथ लगती सड़क भी खाली थी.

क्लीनर के इशारा करते ही ड्राइवर ने ट्रक स्टार्ट कर आगे बढ़ा दिया.

रेलवे पुलिस की चौकी का इंचार्ज कमीज उतारे पंखे की हवा के नीचे सो रहा था. एकाएक बिजली चली गई. बारिश का मौसम था. हवा बंद थी.

गरमी महसूस होते ही चौकी इंचार्ज की नींद खुल गई. वह उठ कर बाहर चला आया. उसी वक्त ड्राइवर ट्रक को चलाता चौक पर पहुंचा. ट्रक को देखते ही चौकी इंचार्ज ने उसे रुकने का इशारा किया. लालाजी और ड्राइवर दोनों के चेहरे का रंग उड़ गया. ट्रक रुक गया. पुलिस वाला पास आया.

‘‘ट्रक कहां जा रहा है?’’

‘‘जमालपुर.’’

‘‘इधर से क्यों जा रहे हो?’’

‘‘उधर का रास्ता खराब है जी.’’

‘‘गाड़ी में क्या है?’’

‘‘अनाज है जी.’’

‘‘माल का बिल है?’’

‘‘माल मेरा अपना है जी. अपने घर ही ले जा रहा हूं. किसी को बेचा नहीं है, इसलिए बिल किस बात का?’’ लालाजी ने दिलेरी दिखाते हुए कहा.

‘‘गाड़ी के कागजात दिखाओ.’’

इस पर ड्राइवर सकपका गया. धीरे से उस ने डैशबोर्ड का एक खाना खोल एक कटीफटी कौपी निकाल कर थमा दी.

‘‘यह क्या है?’’

‘‘आरसी है जी.’’

‘‘यह आरसी है? अबे, यह तो बाबा आदम के जमाने की कौपी है,’’ पुलिस वाले ने कौपी के पन्ने पलटते हुए कहा.

‘‘और कोई कागजात है?’’

‘‘नहीं जी.’’

‘‘रोड टैक्स की रसीद, बीमा की रसीद या प्रदूषण की रसीद… कुछ है?’’

‘‘नहीं जी.’’

‘‘नीचे उतर.’’

ड्राइवर के साथसाथ लालाजी भी उतर आए. ‘‘साहबजी, मुझे नहीं पता था कि इस गाड़ी के कागजात पूरे नहीं हैं, वरना मैं माल लोड नहीं करता,’’ लालाजी ने हाथ जोड़ते हुए कहा.

‘‘हमें माल से कोई मतलब नहीं है. आप अपना माल उतरवा लें. गाड़ी के कागजात नहीं हैं और ये रेलवे पुलिस के इलाके में आ गई है. इसे बंद करना पड़ेगा.’’

ड्राइवर का चेहरा फीका पड़ गया. क्या गाड़ी के साथ वह भी थाने में बंद होगा?

‘‘साहब, गाड़ी तो मेरे मालिक की है. मेरा क्या कुसूर है?’’ ड्राइवर ने हाथ जोड़ते हुए कहा.

‘‘अबे, तुझ से कुछ नहीं कह रहा. मैं तेरा नहीं, गाड़ी का चालान कर रहा हूं. थाने में गाड़ी बंद होगी, तू नहीं.’’

इस पर ड्राइवर की जान में जान आई. उस ने मोबाइल निकाल कर लहना सिंह को फोन कर दिया.

‘‘हौसला रख. मैं आ रहा हूं,’’ लहना सिंह ने कहा.

लालाजी इधरउधर किसी दूसरे ट्रक को तलाशने लगे. 4-5 आटोरिकशा एक तरफ खड़े थे.

‘‘ले चलेंगे जी. 20 रुपए कट्टा लगेगा,’’ एक आटोरिकशे वाले ने कहा.

मरता क्या न करता. 40 कट्टों के 8 सौ रुपए किराए के आटोरिकशे वालों को और 5 सौ रुपए एडवांस में लहना सिंह को दिए थे. कुल जमा 13 सौ रुपए की चोट खा ली. मगर उन का चालान नहीं हुआ था.

गाड़ी थाने में बंद हो गई. लहना सिंह की मिन्नतों का कोई असर न हुआ. चालान पर ड्राइवर के बाएं हाथ के अंगूठे की छाप लगवा कर चौकी इंचार्ज ने मुख्य कौपी उसे थमा दी.

‘‘इस चालान का फैसला कौन करेगा साहब?’’ लहना सिंह ने पूछा.

‘‘जिला अदालत में चले जाना. वहां पर मैजिस्ट्रेट इस के लिए नियुक्त है, वह जुर्माना लगा कर गाड़ी छोड़ देगा.’’

लहना सिंह जिला अदालत पहुंचा. पता चला कि इन दिनों अदालतें बंद थीं. ड्यूटी मजिस्टे्रट को जुर्माना लगाने का अधिकार नहीं था. गाड़ी कानूनी तौर पर लहना सिंह के नाम नहीं थी, इसलिए सुपुर्दगी के आधार पर भी ट्रक नहीं छूट सकता था. अब लहना सिंह के पास 3 हफ्ते तक इंतजार करने के सि और कोई चारा न था. ड्राइवर और क्लीनर अपनेअपने गांव चले गए.

3 हफ्ते बाद अदालतें खुलीं. भुक्तभोगि ने लहना सिंह को बता दिया था कि उस को ज्यादा से ज्यादा 5 हजार रुपए तक जुर्माना भरना पड़ सकता है.

जेब में 6 हजार रुपए रख लहना सिंह ड्राइवर के साथ अदालत पहुंचा. चालान ड्राइवर के नाम काटा गया था. मजिस्ट्रेट अभी चैंबर में ही बैठे थे. लहना सिंह धीमे कदमों से रीडर के पास पहुंचा. सौ रुपए का एक नोट उस की मुट्ठी में दबा कर फुसफुसाया, ‘‘ठीक है.’’

‘‘मैं 12 बजे आवाज दिलवाऊंगा और साहब को सिफारिश लगा दूंगा,’’ रीडर भी फुसफुसाया.

12 बजे आवाज पड़ी. ड्राइवर के साथ लहना सिंह अंदर पहुंचा. साहब ने उस की तरफ फिर ड्राइवर की तरफ गौर से देखा.

‘‘गाड़ी का मालिक कौन है?’’

‘‘मैं हूं जी,’’ लहना सिंह आगे आया.

‘‘गाड़ी के कागजात कहां हैं?’’

लहना सिंह ने कटीफटी कौपी सामने रख दी. साहब ने काफी उलटीपलटी. सारे पन्ने देखे, फिर चालान नियमों पर नजर डाली.

‘ऐसी गाड़ी को जब्त कर ‘डिसपोज औफ’ करनी चाहिए, मगर ऐसा अधिकार प्रशासन को था, उन्हें नहीं.

साहब ने मोटर व्हीकल ऐक्ट की किताब उलटीपलटी. फिर बगल में बैठे मुलाजिम को बुला कर कहा, ‘‘इस में देखो कि इस मामले में क्या हो सकता है?’’

किताब ले कर वह मुलाजिम अपनी सीट पर बैठ कर किताब के पन्ने पलटने लगा. लहना सिंह और ड्राइवर फिर बाहर बैठ गए. 3 घंटे बीत गए. उस मुलाजिम ने सूचित किया, ‘इस में अदालत सिर्फ जुर्माना ही लगा सकती है, वह भी 5 हजार रुपए तक.’

चेंबर में बैठे साहब ने ढाई हजार का जुर्माना लगाने का आदेश दे कर फाइल रीडर को थमा दी. रसीद कटवा में जरूरी बातें दर्ज कर लहना सिंह को रसीद वापस थमा दी. साहब ने ‘गाड़ी तुरंत छोड़ दो’ लिख कर रसीद लौटा दी.

सौ रुपए अहलभद को, सौ रुपए रीडर को, सौ रुपए चौकी के हवलदार को ‘पूज’ कर कुल 28 सौ रुपए और 3 हफ्ते तक बेरोजगारी झेल कर लहना सिंह ने गाड़ी छुड़ा ली.

ड्राइवर के साथ उस ने कसम खाई कि रेलवे स्टेशन और किसी भी उस इलाके में जहां ‘महीना’ नहीं बंधा, गाड़ी नहीं ले जाना है.

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