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छांव : पति की इच्छाओं को पूरा करने में कैसे जुट गई विमला

रविशंकर के रिटायर होने की तारीख जैसेजैसे पास आ रही थी, वैसेवैसे विमला के मन की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. रविशंकर एक बड़े सरकारी ओहदे पर हैं, अब उन्हें हर महीने पैंशन की एक तयशुदा रकम मिलेगी. विमला की चिंता की वजह अपना मकान न होना था, क्योंकि रिटायर होते ही सरकारी मकान तो छोड़ना पड़ेगा.

रविशंकर अभी तक परिवार सहित सरकारी मकान में ही रहते आए हैं. एक बेटा और एक बेटी हैं. दोनों बच्चों को उन्होंने उच्चशिक्षा दिलाई है. शिक्षा पूरी करते ही बेटाबेटी अच्छी नौकरी की तलाश में विदेश चले गए. विदेश की आबोहवा दोनों को ऐसी लगी कि वे वहीं के स्थायी निवासी बन गए और दोनों अपनीअपनी गृहस्थी में खुश हैं.

सालों नौकरी करने के बावजूद रविशंकर अपना मकान नहीं खरीद पाए. गृहस्थी के तमाम झमेलों और सरकारी मकान के चलते वे घर खरीदने के विचार से लापरवाह रहे. अब विमला को एहसास हो रहा था कि वक्त रहते उन्होंने थोड़ी सी बचत कर के छोटा सा ही मकान खरीद लिया होता तो आज यह चिंता न होती. आज उन के पास इतनी जमापूंजी नहीं है कि वे कोई मकान खरीद सकें, क्योंकि दिल्ली में मकान की कीमतें अब आसमान छू रही हैं.

आज इतवार है, सुबह से ही विमला को चिड़चिड़ाहट हो रही है. ‘‘तुम चिंता क्यों करती हो, एक प्रौपर्टी डीलर से बात की है. मयूर विहार में एक जनता फ्लैट किराए के लिए उपलब्ध है, किराया भी कम है. आखिर, हम बूढ़ेबुढि़या को ही तो रहना है. हम दोनों के लिए जनता फ्लैट ही काफी है,’’ रविशंकर ने विमला को समझाते हुए कहा.

‘‘4 कमरों का फ्लैट छोड़ कर अब हम क्या एक कमरे के फ्लैट में जाएंगे? आप ने सोचा है कि इतना सामान छोटे से फ्लैट में कैसे आएगा, इतने सालों का जोड़ा हुआ सामान है.’’

‘‘हम दोनों की जरूरतें ही कितनी हैं? जरूरत का सामान ले चलेंगे, बाकी बेच देंगे. देखो विमला, घर का किराया निकालना, हमारीतुम्हारी दवाओं का खर्च, घर के दूसरे खर्चे सब हमें अब पैंशन से ही पूरे करने होंगे. ऐसे में किराए पर बड़ा फ्लैट लेना समझदारी नहीं है,’’ रविशंकर दोटूक शब्दों में पत्नी विमला से बोले.

‘‘बेटी से तो कुछ ले नहीं सकते, लेकिन बेटा तो विदेश में अच्छा कमाता है. आप उस से क्यों नहीं कुछ मदद के रूप में रुपए मांग लेते हैं जिस से हम बड़ा फ्लैट खरीद ही लें?’’ विमला धीरे से बोली.

‘‘भई, मैं किसी से कुछ नहीं मागूंगा. कभी उस ने यह पूछा है कि पापा, आप रिटायर हो जाओगे तो कहां रहोगे. आज तक उस ने अपनी कमाई का एक रुपया भी भेजा है,’’ रविशंकर पत्नी विमला पर बरस पड़े.

विमला खुद यह सचाई जानती थी. शादी के बाद बेटा जो विदेश गया तो उस ने कभी मुड़ कर भी उन की तरफ देखा नहीं. बस, कभीकभार त्योहार आदि पर सिर्फ फोन कर लेता है. विमला यह भी अच्छी तरह समझती थी कि उस के स्वाभिमानी पति कभी बेटी के आगे हाथ नहीं फैलाएंगे. विमला उन मातापिता को खुशहाल मानती है जो अपने बेटेबहू, नातीपोतों के साथ रह रहे हैं जबकि वे दोनों पतिपत्नी इस बुढ़ापे में बिलकुल अकेले हैं.

आखिर, वह दिन भी आ ही गया जब विमला को सरकारी मकान से अपनी गृहस्थी समेटनी पड़ी. रविशंकर ने सामान बंधवाने के लिए 2 मजदूर लगा लिए थे. कबाड़ी वाले को भी उन्होंने बुला लिया था जिस कोे गैरजरूरी सामान बेच सकें. केवल जरूरत का सामान ही बांधा जा रहा था.

विमला ने अपने हाथों से एकएक चीज इकट्ठा की थी, अपनी गृहस्थी को उस ने कितने जतन से संवारा था. कुछ सामान तो वास्तव में कबाड़ था पर काफी सामान सिर्फ इसलिए बेचा जा रहा था, क्योंकि नए घर में ज्यादा जगह नहीं थी. विमला साड़ी के पल्लू से बारबार अपनी गीली होती आंखों को पोंछे जा रही थी. उस के दिल का दर्द बाहर आना चाहता था पर किसी तरह वह इसे अपने अंदर समेटे हुए थी.

उस के कान पति रविशंकर की कमीज की जेब में रखे मोबाइल फोन की घंटी पर लगे थे. उसे बेटे के फोन का इंतजार था क्योंकि पिछले सप्ताह ही बेटे को रिटायर होने तथा घर बदलने की सूचना दे दी थी. आज कम से कम बेटा फोन तो करेगा ही, कुछ तो पूछेगा, ‘मां, छोटे घर में कैसे रहोगी? घर का साजोसामान कैसे वहां सैट होगा? मैं आप दोनों का यहां आने का प्रबंध करता हूं आदि.’ लेकिन मोबाइल फोन बिलकुल खामोश था. विमला के दिल में एक टीस उभर गई.

‘‘आप का फोन चार्ज तो है?’’ विमला ने धीरे से पूछा.

‘‘हां, फोन फुलचार्ज है,’’ रविशंकर ने जेब में से फोन निकाल कर देखा.

‘‘नैटवर्क तो आ रहा है?’’

‘‘हां भई, नैटवर्क भी आ रहा है. लेकिन यह सब क्यों पूछ रही हो?’’ रविशंकर झुंझलाते हुए बोले.

‘‘नहीं, कुछ नहीं,’’ कहते हुए विमला ने अपना मुंह फेर लिया और रसोईघर के अंदर चली गई. वह अपनी आंखों से बहते आंसुओं को रविशंकर को नहीं दिखाना चाहती थी.

सारा सामान ट्रक में लद चुका था. विमला की बूढ़ी गृहस्थी अब नए ठिकाने की ओर चल पड़ी. घर वाकई बहुत छोटा था. एक छोटा सा कमरा, उस से सटा रसोईघर. छोटी सी बालकनी, बालकनी से लगता बाथरूम जोकि टौयलेट से जुड़ा था. विमला का यह फ्लैट दूसरी मंजिल पर था.

विमला को इस नए मकान में आए एक हफ्ता हो गया है. घर उस ने सैट कर लिया है. आसपड़ोस में अभी खास जानपहचान नहीं हुई है. विमला के नीचे वाले फ्लैट में उसी की उम्र की एक बुजुर्ग महिला अपने बेटेबहू के साथ रहती है. विमला से अब उस की थोड़ीथोड़ी बातचीत होने लगी है. शाम को बाजार जाने के लिए विमला नीचे उतरी तो वही बुजुर्ग महिला मिल गई. उस का नाम रुक्मणी है. एकदूसरे को देख कर दोनों मुसकराईं.

‘‘कैसी हो विमला?’’ रुक्मणी ने विमला से पूछा.

‘‘ठीक हूं. घर में समय नहीं कटता. यहां कहीं घूमनेटहलने के लिए कोई अच्छी जगह नहीं है?’’ विमला ने रुक्मणी से कहा.

‘‘अरे, तुम शाम को मेरे साथ पार्क चला करो. वहां हमउम्र बहुत सी महिलाएं आती हैं. मैं तो रोज शाम को जाती हूं. शाम को 1-2 घंटे अच्छे से कट जाते हैं. पार्क यहीं नजदीक ही है,’’ रुक्मणी ने कहा.

अगले दिन शाम को विमला ने सूती चरक लगी साड़ी पहनी, बाल बनाए, गरदन पर पाउडर छिड़का. विमला को आज यों तैयार होते देख रविशंकर ने टोका, ‘‘आज कुछ खास बात है क्या? सजधज कर जा रही हो?’’

‘‘हां, आज मैं रुक्मणी के साथ पार्क जा रही हूं,’’ विमला खुश होती हुई बोली.

विमला को बहुत दिनों बाद यों चहकता देख रविशंकर को अच्छा लगा, क्योंकि विमला जब से यहां आई है, घर के अंदर ही अंदर घुट सी रही थी.

विमला और रुक्मणी दोनों पार्क की तरफ चल दीं. पार्क में कहीं बच्चे खेल रहे थे तो कहीं कुछ लोग पैदल घूम रहे थे ताकि स्वस्थ रहें. वहीं, एक तरफ बुजुर्ग महिलाओं का गु्रप था. विमला को ले कर रुक्मणी भी महिलाओं के ग्रुप में शामिल हो गई.

सभी बुजुर्ग महिलाओं की बातों में दर्द, चिंता भरी थी. कहने को तो सभी बेटेबहुओं व भरेपूरे परिवारों के साथ रहती थीं, लेकिन उन का मानसम्मान घर में ना के बराबर था. किसी को चाय समय पर नहीं मिलती तो किसी को खाना, कोई बीमारी में दवा, इलाज के लिए तरसती रहती. दो वक्त की रोटी खिलाना भी बेटेबहुओं को भारी पड़ रहा था.

इन महिलाओं की जिंदगी की शाम घोर उपेक्षा में कट रही थी. शाम के ये चंद लमहे वे आपस में बोलबतिया कर, अपने दिलों की कहानी सुना कर काट लेती थीं. अंधेरा घिरने लगा था. अब सभी घर जाने की तैयारी करने लगीं. विमला और रुक्मणी भी अपने घर की ओर बढ़ गईं.

घर पहुंच कर विमला कुरसी पर बैठ गई. पार्क में बुजुर्ग महिलाओं की बातें सुन कर उस का मन भर आया. वह सोचने लगी कि बुजुर्ग मातापिता तो उस बड़े पेड़ की तरह होते हैं जो अपना प्यार, घनी छावं अपने बच्चों को देना चाहते हैं लेकिन बच्चे तो इस छावं में बैठना ही नहीं चाहते. तभी रविशंकर रसोई से चाय बना कर ले आए.

‘‘लो भई, तुम्हारे लिए गरमागरम चाय बना दी है. बताओ, पार्क में कैसा लगा?’’

विमला पति को देख कर मुसकरा दी. जवाब में इतना ही बोली, ‘‘अच्छा लगा,’’ फिर चाय की चुस्की लेने के साथ मुसकराती हुई बोली, ‘‘सुनो, कल आप आलू की टिक्की खाने को कह रहे थे, आज रात के खाने में वही बनाऊंगी. और हां, आप कुछ छोटे गमले सीढ़ी तथा बालकनी में रखना चाहते थे, तो आप कल माली को कह दीजिए कि वह गमले दे जाए, हरीमिर्च, टमाटर के पौधे लगा लेंगे. थोड़ी बागबानी करते रहेंगे तो समय भी अच्छा कटेगा,’’ यह कहते हुए विमला खाली कप उठा कर रसोई में चली गई और सोचने लगी कि हम दोनों एकदूसरे को छावं दें और संतुष्ट रहें.

रविशंकर हैरान थे. कल तक वे विमला को कुछ खास पकवान बनाने को कहते थे तो विमला दुखी आवाज में एक ही बात कहती थी, ‘क्या करेंगे पकवान बना कर, परिवार तो है नहीं. बेटेबहू, नातीपोते साथ रहते, तो इन सब का अलग ही आनंद होता.’ गमलों के लिए भी वे कब से कह रहे थे पर विमला ने हामी नहीं भरी. विमला में यह बदलाव रविशंकर को सुखद लगा.

रसोईघर से कुकर की सीटी की आवाज आ रही थी. विमला ने टिक्की बनाने की तैयारी शुरू कर दी थी. घर में मसालों की खुशबू महकने लगी थी. रविशंकर कुरसी पर बैठेबैठे गीत गुनगुनाने लगे. आज उन्हें लग रहा था जैसे बहुत दिनों बाद उन की गृहस्थी की गाड़ी वापस पटरी पर लौट आई है.

Loksabha Election 2024 : यह आम चुनाव कम, रामकथा ज्यादा है

Loksabha Election 2024 : चुनावी माहौल का कुछ लोग जमकर लुत्फ भी उठा रहे हैं. उन्हें समझ आ गया है कि जब तुक की कोई बात होनी ही नहीं है तो क्यों न अपन भी बहती गंगा में हाथ धोते अपने उसूलों व लैवल की बेतुकी बातें करें. यह और बात है कि ऐसे लोगों को विधर्मी, नास्तिक, अर्बन नक्सली और वामपंथी करार दे कर धकिया जाता है. लेकिन इस के बाद भी वे पूरी मजबूती यानी बेशर्मी से मौजूद हैं तो उन की इच्छाशक्ति भी भगवान टाइप के लोगों और भक्तों से उन्नीस नहीं. इकलौता लोचा तादाद का है, तो ‘नाई नाई बाल कितने’ की तर्ज पर वह भी 4 जून को सामने आ ही जाना है.

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इधर गौर करने लायक एक और बात यह भी है कि ब्रैंडेड कथावाचक बागेश्वर बाबा, देवकीनंदन खत्री, मोरारी बापू और तो और कुमार विश्वास तक भी अघोषित और अनिश्चितकालीन अवकाश पर हैं. वे अपने एयरकंडीशंड आश्रमों में गरमी गुजार रहे हैं कि कब इन की कथा खत्म हो तो हम अपनी दुकान खोलें. वैसे भी, ये लोग सालभर प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष भाजपा के लिए ही वोट मांगते रहे हैं. अब जिस को वोट चाहिए वह राष्ट्रीय चौमासा कर रहा है. कहीं भी बड़ी धार्मिक रामकथा नहीं हो रही है क्योंकि जब सब से बड़ा कथावाचक हवाई जहाज से घूमघूम कर देशभर में राजनीतिक रामकथा बांच रहा हो तो इन छुटभइयों की जरूरत भी नहीं. इतना तो इन्होंने भी राम नाम की कृपा से जमा कर रखा है कि सात पुश्तें बिना हाथपांव हिलाए इत्मीनान से बैठ कर खा लें. फिर महीनेदोमहीने के घाटे को क्या रोना-झींकना.

नरेंद्र मोदी और भाजपा के लिए चुनाव, चुनाव कम राम नाम को भुनाने का कर्मकांड ज्यादा है. इस के गवाह उन के भाषण, एजेंडा और ट्वीट भी हैं. आइए कुछ का सेवन करते हैं. रामनवमी को तो उन्होंने ‘ट्वीट नवमी’ की तरह मनाते ट्वीट पर ट्वीट किए मसलन-

  •  एक तरफ इकबाल अंसारी हैं जिन्होंने अयोध्या के राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का निमंत्रण खुशीखुशी स्वीकार किया तो दूसरी तरफ कांग्रेस और इंडी गठबंधन है जिस ने वोटबैंक के चलते इसे ठुकरा दिया.
  • जीवनभर हिंदुओं के खिलाफ रहने वाले अंसारी परिवार तक ने श्रीराम प्राण प्रतिष्ठा का आमंत्रण स्वीकार किया लेकिन कांग्रेस ने ठुकरा दिया.
  • कांग्रेस ने वर्षों तक रामलला को टैंट में बैठा कर रखा, राम मंदिर के फैसले को लटका कर रखा.
  • 500 साल बाद हमारे राम लला ने अपना जन्मदिन भव्य मंदिर में मनाया.
  • कांग्रेस और इंडी गठबंधन वाले हमारी आस्था का अपमान करने में जुटे हैं.
  • ये लोग कहते हैं कि हमारा सनातन डेंगू-मलेरिया है.
  • अयोध्या में जो राम मंदिर बना है उस के भी ये घोरविरोधी हैं.
  • ये लोग भगवान श्री राम की पूजा को पाखंड बताते हैं.
  • इंडी गठबंधन वाले सनातन से घृणा करते हैं.
  • अभी मैं द्वारका गया और समुद्र में नीचे जा कर भगवान श्री कृष्ण की पूजा की.
  • लेकिन कांग्रेस के शहजादे कहते हैं कि समुद्र के नीचे पूजा करने योग्य कुछ है ही नहीं.
  • अनुपम दिन – राम नवमी.
  • अद्भुद प्रयोग – तकनीक और परंपरा का मेल.
  • अनूठी प्रस्तुति, दुर्लभ फोटो व चित्रों के साथ शीर्ष विभूतियों के लेख.
  • देश के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी को भेंट की गई # सब के राम काफी टेबल पुस्तक की प्रथम प्राप्ति.
  • ऐसी पुस्तक जिसे आप पढ़ सकते हैं और हिंदी अथवा अंगरेजी में सुन भी सकते हैं.
  • रामनवमी के पावन अवसर पर सूर्य की किरणें आज देश के नए प्रकाश का प्रतीक बनी हैं.
  • नलबाड़ी की सभा के बाद मुझे अयोध्या में रामलला के सूर्यतिलक के अदभुत और अप्रितम क्षण को देखने का सौभाग्य मिला. श्रीराम जन्मभूमि का यह बहुप्रतीक्षित क्षण हर किसी के लिए परमानंद का क्षण है. यह सूर्यतिलक विकसित भारत के हर संकल्प को अपनी दिव्य ऊर्जा से इसी तरह प्रकाशित करेगा.
  • न्याय के पर्याय प्रभु श्रीराम का मंदिर भी न्यायपूर्ण तरीके से बना जिस के लिए मैं भारत की न्यायपालिका का आभार प्रकट करता हूं.
  • मुझे पूर्ण विश्वास है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के जीवन और उन के आदर्श विकसित भारत के निर्माण का सशक्त आधार बनेंगे. उन का आशीर्वाद आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को नई ऊर्जा प्रदान करेगा. प्रभु श्रीराम के चरणों में कोटिकोटि नमन.इस के एक दिन पहले उन्होंने बिहार दौरे की भूमिका बांधते ट्वीट किया था-
  • बिहार के लोग जानते हैं कि यह चुनाव दल का नहीं, देश का चुनाव है. आज एक और देश की संस्कृति पर गर्व करने वाले हम लोग हैं तो दूसरी ओर हमारी आस्था को नीचा दिखाने वाले लोग हैं.
    मजाक और बेचारगी की हद ही इसे कहा जाएगा कि एक तरफ अपने ट्वीट्स में वे आस्था और संस्कृति का हवाला देते साफतौर पर कहते हैं कि यह देश का चुनाव है तो दूसरी तरफ 12 अप्रैल के अपने ट्वीट में लिखते हैं-
  • अयोध्या में राम मंदिर निर्माण कोई चुनावी मुद्दा नहीं बल्कि यह 500 वर्षों की तपस्या का सुखद परिणाम है. ऐसे में राम लला की प्राणप्रतिष्ठा का बहिष्कार करने वाली कांग्रेस और इंडी गठबंधन से मैं पूछना चाहता हूं-
  • प्रभु श्रीराम की प्राणप्रतिष्ठा का निमंत्रण ठुकराने वालों को उत्तराखंड सहित देश की जनता इन चुनावों में कड़ा सबक सिखाने जा रही है.
    अब भला वोट विकास के नाम पर मांगा जा रहा है, राम और मंदिर के नाम पर नहीं, यह कोई कैसे कह सकता है. दूसरे विपक्ष को वोट न देने का आधार उस के प्राणप्रतिष्ठा में न जाने के फैसले को ले कर होना चाहिए क्या? जाहिर है, नहीं, क्योंकि किसी भी मंदिर या कहीं जानानजाना निहायत ही व्यक्तिगत बात है. इसे संवैधानिक तो दूर की बात है, किसी भी बाध्यता के तौर पर नहीं थोपा जा सकता.
    अच्छा तो यह रहा कि विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार कर मंदिरों में लाने की बात वे नहीं कर रहे लेकिन भविष्य में कभी करने लगें तो बात हैरानी की नहीं होगी. अभी तो नरेंद्र मोदी खुलेआम यह कह रहे हैं कि मैं ने मंदिर बनवाया और मैं प्राणप्रतिष्ठा में गया इसलिए मुझे वोट दो और उन्होंने निमंत्रण ठुकराया इसलिए उन्हें वोट मत दो. अगर इसी बिना पर चुनाव होना है और प्रधानमंत्री चुना जाना है तो 22 जनवरी को प्राणप्रतिष्ठा के बाद सोशल मीडिया के इस हंसीमजाक को चुनाव आयोग को गंभीरता से लेते उस पर अमल भी कर डालना चाहिए कि चुनाव की जरूरत क्या है, मोदीजी को सीधे ही शपथ दिला दी जाए.10 अप्रैल के ट्वीट में नरेंद्र मोदी ने फिर पुराना राग दोहराया था कि-
  • प्रभु श्रीराम के चरणस्पर्श से धन्य हुए रामटेक के साथ ही देशभर के मेरे परिवारजनों को इंडी गठबंधन को इसलिए सजा देनी है.
    इस के पहले 8 अप्रैल को उन्होंने ट्वीट कर कहा था कि,
  • अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को ले कर प्रभु श्रीराम के ननिहाल छत्तीसगढ़ के साथ ही पूरा देश खुश है लेकिन कांग्रेस और इंडी गठबंधन को यह रास नहीं आ रहा.
    हकीकत नरेंद्र मोदी भी बेहतर जानते हैं कि राम का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्त्व अपनी जगह है लेकिन राम का आर्थिक और राजनीतिक महत्त्व ज्यादा अहम है. राम नाम की महिमा से पौराणिक साहित्य भरा पड़ा है. ये कथाएं सालों से सुनी और सुनाई जा रही हैं जिस से जाहिर है आम लोग इन्हें सच मानने लगे हैं. सच कुछ भी हो लेकिन इन का व्यावहारिकता और वास्तविकता से वाकई में कोई लेनादेना नहीं है. फिर क्यों लोग इन्हें सुनते हैं, इस का जवाब बेहद साफ है जो, बकौल कार्ल मार्क्स, अफीम का नशा है.
  • तो वे शहरशहर अफीम ले कर घूम रहे हैं जिस से लोग उनींदे, सुस्त, मद में चूर यह न सोचने लगें कि आखिरकार लोकतंत्र में सरकार चुनी क्यों जाती है. इस बारे में एक हास्य कवि संपत सरल ने एक जोरदार ताना उन पर कसा था कि, ‘विकास के एजेंडे के नाम पर सत्ता में आए थे तब से एजेंडे के विकास में लगे हैं.’पिछले 10 सालों में मंदिरों, राम नाम और पाखंडों का ही विकास हुआ है. एक एजेंडे के तहत राम नाम विकास का पर्याय बना दिया गया है. दरअसल, उपलब्धियों के नाम पर गिना कर वोट मांगने को उन के पास कुछ खास ऐसा है नहीं जिस से जनता उन्हें वोट देने को टूट पड़े. लिहाजा, सब से सस्ता और सुलभ रास्ता राम नाम ही है, जिस पर न उन्हें दिमाग पर ज्यादा जोर देना पड़ता है और न ही जनता को यह सोचने का मौका मिलता कि उसे सरकार से क्या चाहिए.अमरोहा की रैली में उन्होंने प्रमुखता से कहा कि, ‘हमारी हजारों वर्षों की आस्था को ये लोग (यानी विपक्षी, खासतौर से राहुल गांधी और अखिलेश यादव) सिर्फ वोटबैंक के लिए खारिज कर रहे हैं. बिहार और उत्तरप्रदेश में खुद को यदुवंशी कहने वाले नेताओं से मैं पूछना चाहता हूं कि आप भगवान श्रीकृष्ण और द्वारका का अपमान करने वालों के साथ कैसे समझौता कर सकते हो. आज जब पूरा देश राममय है तब समाजवादी पार्टी के लोग रामभक्ति करने वालों को पाखंडी कहते हैं. सपा और कांग्रेस दोनों ने प्राणप्रतिष्ठा का आमंत्रण ठुकरा दिया था. ये लोग आएदिन राम मंदिर और सनातन को गलियां दे रहे हैं. अभी रामनवमी पर प्रभु रामलला का भव्य सूर्यतिलक हुआ है.’अब भला इस बेहूदे और धूर्तताभरे सवाल और वक्तव्य का चुनाव से क्या लेनादेना और इस से देश की किस समस्या का क्या संबंध है, शायद ही कोई बता पाए. और जो कोई नहीं बता पाता, उसे ये बताते रहते हैं जो एक छलांग में अमरोहा से द्वारका वाया अयोध्या पहुंच जाते हैं. यह होती है असल रामकथा और संपूर्ण श्रीमदभागवत कथा, जिस की दक्षिणा में सनातन की रक्षा के नाम पर वोटों की भीख और सत्ता मांगी जाती है. पहले डर दिखाया जाता है कि देखो, धर्मविरोधी दल इकट्ठा हो गए हैं, अब ये देश को लूट खाएंगे जबकि यह हक तो हम सनातनियों का है, ये लोग तो पहले भी लूट-खा चुके हैं. अभी हमारा पेट नहीं भरा है, इसलिए तीसरा मौका और दे दो. रामजी तुम्हारा भला करेंगे. इतना सुनते ही सम्मोहित पूजापाठी पब्लिक अपनी जेबों से पैसा और वोट निकाल कर इन्हें दे देती है कि लो महाराज, जब लुटना ही हमारी नियति है तो आप ही लूट लो. क्योंकि आप राम-कृष्ण के नाम तो दिन रात लेते रहते हो. हो सकता है इसी से हमें मोक्ष और मुक्ति मिल जाए.यही प्रवचन अलगअलग शब्दों में वे मध्यप्रदेश में करते हैं, बिहार में भी और राजस्थान, गुजरात, हिमाचल वगैरह में भी लेकिन दक्षिण में आमतौर पर नहीं करते क्योंकि वहां उत्तर वाले राम-कृष्ण नहीं चलते और कम से कम चुनाव में तो बिलकुल नहीं चलते. दूसरे, उन्होंने भी अपनेअपने भगवान पहले से ही चुन रखे हैं जिन्हें बदलने का मूड उन का दिख भी नहीं रहा. सियासी पंडितों की भाषा में इसे कहते हैं कि दक्षिण में भाजपा कमजोर है और इंडिया गठबंधन मजबूत है, इसलिए इस बार टक्कर कांटे की है. हालांकि, आम चुनावों में टक्कर हमेशा कांटे की ही होती है, फूलों की तो मुद्दत से नहीं हुई. 400 पार का नारा लगा रहे भाजपाइयों को 225 ले जाने में भी पसीना छूट जाना है.ऐसा इसलिए कि कुछ लोग अब हकीकत समझने लगे हैं कि 10 वर्षों से यह रामायण सुने जा रहे हैं लेकिन होनेजाने के नाम पर कुछ हो नहीं रहा. रोजगार और महंगाई आस्था पर भारी पड़ने लगे हैं. कुछ लोग तो यह सोचने व पूछने की जुर्रत भी करने लगे हैं कि अखिलेश और राहुल पूजापाठ करें न करें, तो भी ढोंगी और सनातन के दुश्मन. पर जीतनराम मांझी जैसों का क्या जो खुलेआम राम और रामायण को कोसते रहे और आप उन्हीं के संग चुनाव लड़ रहे हैं. यह दोहरापन क्यों, इस में कुछ तो गड़बड़ है. यानी, वाशिंग मशीन वाला आरोप सच है. अब तो इस में आप ने ड्रायर भी लगा लिया. ईडी तक तो बात भौतिक और नश्वर संसार की थी पर अब यह धार्मिक और आध्यात्मिक कैसे हो गई, या तो जीतन राम मांझी जैसे अपनी जगह सही हैं या आप अपनी जगह गलत हैं.

    कहते हैं कलियुग में राम का नाम ही तार देता है. मांझी, अठावले और पासवान रामराम करें तो उन के सौ खून माफ लेकिन अरविंद केजरीवाल और हेमंत सोरेन जैसों को तो आप ने लगभग वैसी ही सजा दे दी जो बाली और शम्बूक को दी थी. नरेंद्र मोदी न्याय नहीं कर रहे, बल्कि सजा दे रहे हैं क्योंकि कई लोग उन की अधीनता स्वीकार नहीं कर रहे.

    जाहिर है, जो उन का नहीं वह राम का भी नहीं. लिहाजा, ऐसे दुष्टों, जो लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देते हैं, को उन की असल जगह जेल ही है लेकिन खतरा वे हैं जिन्हें जेल नहीं भेजा जा सक रहा. अब वही चुनौती बन गए हैं क्योंकि उन के पास 65 फीसदी के लगभग समर्थन है. इन के साथ, इस बार 35 कबाड़ने में दिक्कत जा रही है. सुकून देने वाली इकलौती बात यह है कि वह 65 इखराबिखरा है लेकिन सुकून छीनने वाली बात यह है कि उस में से 40 के लगभग इकट्ठा हो रहे हैं.

    ऐसे में राम ही काम आएंगे, सो, उन के सिवा कुछ न तो सूझ रहा और न ही सूट कर रहा. पहले चरण की 102 सीटों की वोटिंग का ट्रैंड डरा रहा है कि लोग राम को भूल रहे हैं. उन्हें खूब समझाया, बुझाया, बहलाया और फुसलाया भी था कि वोट सनातन की सलामती के नाम पर डालना वरना कहीं के नहीं रहोगे. लेकिन यह दांव उलटा पड़ने लगा है, लोग पूछने लगे हैं कि अभी हम कहां के रह गए. हम तो जहां 10 साल पहले खड़े थे वहां से भी 10 कोस पीछे खिसक गए. इस के बाद भी नरेंद्र मोदी हिम्मत नहीं हार रहे हैं तो यह उन की पौराणिक धारणा ही है कि रामजी पार लगाएंगे. पिछले 2 चुनाव इस के गवाह भी हैं. यह बात भी कम दिलचस्प नहीं कि जोर सिर्फ राम नाम पर दिया जा रहा है, वोट राम नाम पर मांगे जा रहे हैं हनुमान, शिव, कृष्ण, काली दुर्गा के नाम पर नहीं. मानो वे और उन के अनुयायी भी इंडी गठबंधन की तरह अछूत हों. आस्था की दुहाई देने वाले नरेंद्र मोदी आस्था का राजनीतिकरण कर उसे बहुत सीमित किए दे रहे हैं.

    अच्छा तो यह है कि अभी सभी लोग नहीं पूछ रहे कि रामराज यानी हिंदू राष्ट्र में अब बाकी क्या रह गया है. 370 हट ही गई, तीन तलाक भी खत्म हो गया और तो और मंदिर भी बन गया अब तो कुछ और बात करो. सहारा अब वे 12-15 करोड़ कट्टर वोटर हैं जिन के लिए यह खेल खेला गया था. बाकी 80 करोड़ में से कितने खाते में आए, यह 4 जून को पता चलेगा.

करीबी रिश्ते में खटास यानी बीमारियों को न्योता देना

जीवनसाथी के साथ हमारा रिश्ता बहुत गहरा होता है. उसे हमारे सारे राज पता होते हैं और उस के बिना हमारा काम भी नहीं चलता. जब तक इस रिश्ते में प्यार की मिठास घुली रहती है, सबकुछ अच्छा चलता है. दुनिया सुहानी लगती है और हम अंदर से भी बेहतर महसूस करते हैं. रिश्ता सफल है तो आप के शरीर में फील गुड हार्मोन पैदा होते हैं. ये हार्मोन सकारात्मक भावनाओं को बढ़ावा देने और सेहत को बेहतर करने में मदद करते हैं जैसे कि सेरोटोनिन, डोपामाइन, औक्सीटोसिन आदि.

यदि आप अपने पार्टनर को गले लगाते हैं या उस के साथ सुखद सैक्स प्रक्रिया से गुजरते हैं तो आप का स्ट्रैस लैवल और हाइपरटैंशन कम होता है. शोध बताते हैं कि जीवनसाथी के साथ मजबूत साझेदारी हमें बीमारी से बचने, स्वस्थ आदतों को अपनाने और यहां तक कि लंबे समय तक जीने में मदद कर सकती है.

मगर जब मिठास की जगह कड़वाहट लेने लगे तो समझिए आप बिन बुलाए बीमारियों को न्योता दे रहे हैं. दरअसल, आप का शारीरिक स्वास्थ्य आप के मानसिक स्वास्थ्य पर निर्भर करता है. यदि आप का मन खुश है तो निश्चित ही आप शारीरिक तौर पर भी स्वस्थ रहेंगे. लेकिन इस के विपरीत, यदि आप का मन ही खुश नहीं है तो इस का प्रभाव आप के चेहरे और शरीर पर दिखेगा. तनावपूर्ण रिश्ता तनाव और बीमारियां बढ़ाता है और खुशियां छीन लेता है. यह सेहत को बिगाड़ने का काम भी करता है. किसी रिश्ते में तनाव ज्यादा होने पर इंसान की इम्यूनिटी पर भी बुरा असर पड़ता है और उसे छोटीबड़ी कई तरह की परेशानियां घेरने लगती हैं.

वजन का बढ़ना

जब किसी इंसान का अपने पार्टनर से झगड़ा होता है तो 2 स्थितियां हो सकती हैं. वह या तो गुस्से में खाना छोड़ दे या फिर बाहर जा कर उलटासीधा तलाभुना खाने लगे. ज्यादातर लोग दूसरे फार्मूले को अपनाते हैं और जानेअनजाने ज्यादा तलीभुनी, कैलोरी वाली चीजें उन की डाइट का हिस्सा बन जाती हैं. वह घर के बजाय बाहर खाने लगते हैं और उन का वजन एकदम से बढ़ जाता है. वहीं, ज्यादा कैलोरी शरीर के मेटाबौलिज्म को बाधित करने का काम भी करती है.

स्ट्रैस

जिन कपल्स के बीच हर रोज लड़ाईझगड़े होते हैं उन के स्वास्थ्य पर इस का गहरा असर पड़ता है. स्ट्रैस की वजह से उन का शरीर बहुत कमजोर और थका हुआ महसूस करता है. उन का किसी काम में मन नहीं लगता और वे निराश से रहने लगते हैं. उन की सोशल लाइफ भी कम होने लगती है. साथी को देखते ही उन की भवें चढ़ जाती हैं और स्ट्रैस हावी हो जाता है.

ब्लडप्रैशर बढ़ना

अधिक स्ट्रैस और टैंशन आप का ब्लडप्रैशर बढ़ा सकता है. ऐसे में अगर कपल्स के बीच अकसर झगड़ा होता रहता है तो ब्लडप्रैशर बढ़ने के चांसेज अधिक रहते हैं. ब्लडप्रैशर का बढ़ना यानी हार्ट प्रौब्लम्स को आमंत्रित करना होता है.

अवसाद या डिप्रैशन

जब पार्टनर से झगड़े होने शुरू हो जाते हैं तो इंसान की रिश्ते के प्रति सहनशीलता खत्म होने लगती है. दोनों ही सिर्फ अपनेआप को सही ठहराने की होड़ में लग जाते हैं और अपने पार्टनर की बातों को नहीं समझते हैं. ऐसे में वह रिश्ता टूटने की कगार पर पहुंच जाता है और जीवन की खुशियां रूठने लगती हैं. इस स्थिति में अकसर लोग अवसाद के शिकार हो जाते हैं. यानी, यदि आप का रिश्ता असफल है तो आप को डिप्रैशन भी हो सकता है. आप को कुछ भी अच्छा नहीं लगता है और संभव है कि आप के दिमाग में आत्महत्या करने के विचार आएं. डिप्रैशन आप की सेहत के लिए किसी अभिशाप से कम नहीं है.

शराब की लत

कई बार रिश्तों में कड़वाहट के चलते लोग शराब को अपना साथी बना लेते हैं. उन्हें लगता है कि शराब का सेवन उन की समस्याओं को दूर कर देगा. हालांकि शराब सिर्फ कुछ समय के लिए ही इंसान के मस्तिष्क को सब भूलने में मदद करती है. लेकिन इस का यह मतलब नहीं होता है कि शराब पीने से आप की परेशानी खत्म हो जाएगी. कई बार लोग नाराजगी को दूर करने के लिए भी शराब पीते हैं. शराब पीने से हमारा स्वास्थ्य बिगड़ जाता है. शराब के सेवन से लिवर भी खराब होता है.

सोने में समस्या

यदि आप का रिश्ता अच्छा है तो अपने पार्टनर के साथ सोते समय रिलैक्स होता है. लेकिन जब झगड़े हावी होने लगते हैं तो आप की नींदें भी उड़ जाती हैं. हो सकता है आप को रातरातभर नींद न आए जो कि आप के स्वास्थ्य को खराब कर सकता है.

 

चिंता

 

यदि आप अपने पार्टनर को ले कर चिंतित हैं कि कहीं वह आप को छोड़ न दे या अन्य किसी बात को ले कर परेशान हैं तो यह चिंता बहुत भयंकर रूप ले सकती है. इस से आप की सेहत भी प्रभावित हो सकती है. चिंता बहुत सी बीमारियों की जननी है, जैसे कि डिप्रैशन, अवसाद, हाई ब्लडप्रैशर, शुगर आदि.

इसलिए बेहतर है कि आप अपने पार्टनर के साथ रिश्ते को अच्छा बनाने का प्रयास करें. जिन बातों पर झगड़े होते हैं उन्हें सुलझाने की कोशिश करें और नई शुरुआत करें. यह आप दोनों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए जरूरी है.

मुसलिम मतदाताओं की खामोशी से राजनीतिक दलों में बेचैनी

लोकसभा 2024 की चुनावी वैतरणी पार करने के लिए सभी दल एड़ीचोटी का जोर लगा रहे हैं, मगर जीत का सेहरा किस के सिर बंधेगा, यह बड़ेबड़े राजनीतिक पंडित भी नहीं भांप पा रहे. दलितों और मुसलमानों को साधने की कोशिश तो सब की है लेकिन उन के मुद्दे सिरे से गायब हैं. तीन तलाक को खत्म कर के भाजपा नीत मोदी सरकार मुसलिम औरतों की नजर में हीरो बनी थी, लेकिन अब चुनाव के वक्त तीन तलाक खारिज करने का गुणगान कर के वह मुसलिम पुरुषों को भी नाराज नहीं कर सकती. औरतें वोट डालने जाएं या न जाएं, अधिकांश मुसलिम परिवारों में यह बात पुरुष ही तय करते हैं. यही वजह है कि भाजपा की चुनावी रैलियों में तीन तलाक किसी नेता के भाषण का हिस्सा नहीं है.

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उधर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव मुसलमानों के दिल में जगह बनाने लिए पिछले दिनों दिवंगत हुए बाहुबली नेता मुख़्तार अंसारी के घर तक जा पहुंचे. उन की मौत का गम मनाया. उस के बाद मुसलिम वोट साधने के लिए लखनऊ के कई नवाबी खानदानों से भी मुलाकातें कीं, ईद की सेवइयां चखीं, लेकिन इन कवायदों का आम मुसलिम पर कितना असर होगा, वह जो बिरयानी का ठेला लगाता है, या साइकिल का पंचर जोड़ता है, या सब्जी बेचता है अथवा काश्तकारी करता है, इस का अंदाजा अखिलेश खुद नहीं लगा पाए.

असल माने में तो मत देने वाला यही तबका है. नवाबी खानदानों से तो एकाध कोई मतदान करने बूथ तक जाए तो जाए. अब कांग्रेस की बात करें तो वह अगर मुसलमानों के लिए कोई बात करती है तो भाजपाई नेता सीधे गांधी परिवार पर हमलावर हो उठते हैं और उसे मुसलमान बताने लगते हैं. इसलिए कांग्रेस भी मुसलमानों और उन के मुद्दों को ले कर मुखर नहीं है.

एक तरफ राजनीतिक दल पसोपेश में हैं कि मुसलमान किस के कितने करीब हैं, दूसरी तरफ मुसलमान अपने मत को ले कर खामोशी ओढ़े हुए हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुसलिम बहुल इलाकों में भी खामोशी पसरी हुई है. इस खामोशी में किस की जीत छिपी है, यह मतगणना के बाद ही पता चल सकेगा.

कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने मदरसा शिक्षा पर रोक लगाने की कोशिश की थी और राज्यभर के सभी 16,000 मदरसों के लाइसैंस रद्द कर दिए थे. मामला हाईकोर्ट होता हुआ सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने ‘यूपी बोर्ड औफ मदरसा एजुकेशन एक्ट 2004’ को असंवैधानिक करार देने वाले इलाहाबाद हाईकोर्ट के 22 मार्च के फैसले पर रोक लगा दी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले से 17 लाख मदरसा छात्रों पर असर पड़ेगा और छात्रों को दूसरे स्कूल में स्थानांतरित करने का निर्देश देना उचित नहीं है.

मदरसे बंद करने के योगी सरकार की कोशिश पर सरकार में मंत्री दानिश आजाद अंसारी ने सफाई पेश की. उन्होंने कहा कि सरकार चाहती थी कि मुसलिम बच्चों को भी उसी तरह सरकारी स्कूलों में हिंदी, इंग्लिश, साइंस, भूगोल, इतिहास, कंप्यूटर आदि की शिक्षा मिले जैसी हिंदू और अन्य धर्मों के बच्चों को मिलती है. बच्चों के अच्छे भविष्य के लिए मदरसा शिक्षा को हतोत्साहित किया जा रहा था. बेहतर शिक्षा मुसलिम नौजवानों को मिले, इस के लिए पीएम मोदी के नेतृत्व में योगी सरकार हमेशा सकारात्मक काम करती रही है. मगर सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का पालन करेगी.

सरकार की एकतरफा कार्यवाही

वहीं इस मामले में मुसलिम धर्मगुरुओं और नेताओं की कई प्रतिक्रियाएं आईं. मौलाना खालिद रशीद फरंगी महली ने कोर्ट के फैसले का स्वागत किया. मुसलमानों के कई बड़े रहनुमाओं ने सुप्रीम कोर्ट का धन्यवाद किया कि उस ने मदरसा शिक्षा को बरकरार रखा. केंद्रीय स्कूल के शिक्षक मोहम्मद अकील कहते हैं, “मदरसों में अति गरीब मुसलिम परिवारों के बच्चे पढ़ने जाते हैं. मुसलिम यतीमखानों के बच्चे भी वहां पढ़ते हैं. वहां उन को दोपहर का भोजन मिल जाता है. किताबें और कपड़े मिल जाते हैं. अधिकांश बच्चों के परिवार इतने पिछड़े, गरीब और अशिक्षित हैं कि वे अपने बच्चों को दीनी तालीम और एक वक्त की रोटी के नाम पर मसजिद-मदरसों में तो भेज देंगे मगर किसी सरकारी स्कूल में नहीं भेजेंगे. वे अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में भेजने को तैयार हों, इस के लिए पहले सरकार इन परिवारों की काउंसलिंग करे, इन के जीवनस्तर को सुधारे, उन में शिक्षा की आवश्यकता की समझ पैदा करे, फिर उन के बच्चों को मदरसा जाने से रोके और सरकारी स्कूल में दाखिला दे. ऐसे ही एक आदेश पर मदरसे बंद कर देने से आप इन बच्चों के मुंह से एक वक्त की रोटी भी छीने ले रहे हैं. सरकार का यह कदम बहुत ही अनुचित है. उस को पहले हिंदुओं के गुरुकुल बंद करने चाहिए, फिर मदरसों की ओर देखना चाहिए.”

भाजपा सरकार की मदरसा नीति पर भी मुसलिम तबका बंटा हुआ है. हो सकता है सरकार की मंशा मुसलिम बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की हो मगर अधिकांश इस कदम को मुसलमानों पर हमले के तौर पर ही देख रहे हैं. ऐसे में भाजपा से मुसलमान इस वजह से भी छिटक गया है.

बीते रमजान के आखिरी पखवाड़े में हिंदुओं का नवरात्र भी आरंभ हो गया था. उन के भी व्रत थे, लिहाजा सरकार ने मीटमछली की दुकानें बंद करवा दीं. यहां तक कि ठेलों पर बिरयानी बेचने वालों को भी घर बिठा दिया गया. ईद के दिन 90 फीसदी मीट की दुकानें बंद थीं. कई मुसलिम घरों में बिना नौनवेज के ईद मनी. मुसलमान ने कोई शिकायत नहीं की मगर कांग्रेस के समय को जरूर याद किया. ऐसा अनेकों बार हुआ होगा जब ईद और नवरात्र इकट्ठे पड़े लेकिन कांग्रेस के वक्त ईद के रोज मीट की दुकानें बंद नहीं हुईं.

पश्चिम बंगाल में सालोंसाल मछली बिकती है फिर चाहे नवरात्र हों या दीवाली क्योंकि वहां के हिंदुओं का मुख्य भोजन मछली है. आखिर जिस का जैसा खानपान है, वह तो वही खाएगा, उस पर रोकटोक करने वाली सरकार कौन होती है? मगर भाजपा सरकार मुसलमानों के खानपान पर पाबंदी लगाने में उस्ताद है. हलाल और झटके के मामले में भी उस ने मुसलमानों को परेशान किया. ऐसे में मुसलमान का मत भाजपा को कैसे मिल सकता है. यह मत एकजुट भी नहीं है, निसंदेह दूसरी कई पार्टियों के मध्य बंटा हुआ है.

कम होते मुसलिम प्रतिनिधि

पश्चिमी उत्तर प्रदेश जहां से सब से ज्यादा मुसलिम प्रतिनिधि संसद पहुंचते रहे हैं, उस मुसलिम बाहुल्य क्षेत्र में चरणों के मतदान के बाद भी खामोशी है. साल 2013 के सांप्रदायिक दंगों के बाद हुए ध्रुवीकरण के माहौल में 2014 के चुनाव में इस इलाके से एक भी मुसलिम प्रतिनिधि नहीं चुना गया.

साल 2019 में समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल ने मिल कर चुनाव लड़ा तो 5 मुसलमान सांसद पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सीटों से जीत कर संसद पहुंचे थे. सहारनपुर से हाजी फजलुर रहमान, अमरोहा से कुंवर दानिश अली, संभल से डा. शफीकुर्रहमान बर्क, मुरादाबाद से एस टी हसन और रामपुर से आजम खान ने जीत दर्ज की थी. लेकिन 2024 का चुनाव आतेआते राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं. समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ ‘इंडिया’ गठबंधन में है, राष्ट्रीय लोकदल अब भाजपा के साथ है और बहुजन समाज पार्टी अकेले चुनाव लड़ रही है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नए बदले समीकरणों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश से मुसलमान सांसद फिर से चुन कर संसद पहुंच पाएंगे? यह सवाल और गंभीर तब हो जाता है जब कई मुसलिम बहुल सीटों पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के मुसलिम उम्मीदवार आमनेसामने हैं. सहारनपुर में कांग्रेस के प्रत्याशी इमरान मसूद हैं तो बहुजन समाज पार्टी ने माजिद अली को टिकट दिया है. वहीं, अमरोहा में मौजूदा सांसद दानिश अली इस बार कांग्रेस के टिकट पर मैदान में हैं और बसपा ने मुजाहिद हुसैन को उम्मीदवार बनाया है.

संभल में दिवंगत सांसद डा. शफीकुर्रहमान बर्क के पोते जियाउर्रहमान को समाजवादी पार्टी ने टिकट दिया है तो बसपा ने यहां सौलत अली को उम्मीदवार बनाया है. मुरादाबाद से समाजवादी पार्टी ने मौजूदा सांसद एस टी हसन का टिकट काट कर रुचि वीरा को उम्मीदवार बनाया है जबकि यहां बसपा ने इरफान सैफी को टिकट दिया है. रामपुर में आजम खान जेल में हैं. समाजवादी पार्टी ने यहां मौलाना मोहिबुल्लाह नदवी को टिकट दिया है जबकि बसपा से जीशान ख़ां मैदान में हैं. कई सीटों पर मुसलमान उम्मीदवारों के आमनेसामने होने की वजह से यह सवाल उठा है कि क्या पश्चिमी उत्तर प्रदेश से एक बार फिर मुसलिम प्रतिनिधि चुन कर संसद पहुंच सकेंगे?

संसद में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व लगातार घटता जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ सालों में ऐसा माहौल बनाया गया है कि जहां कोई मुसलमान प्रत्याशी होता है वहां सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने की साजिश की जाती है. यह बड़ा सवाल है कि देश की एक बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व लगातार घट रहा है. भाजपा नारा देती है कि ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ लेकिन असल में इस का मतलब है- ‘विपक्ष मुक्त भारत’ और ‘मुसलिम मुक्त’ विधायिका. मुसलमान भाजपा की सोच से वाकिफ है. वह खामोश है मगर उस की ख़ामोशी का यह मतलब नहीं कि सरकार बनाने या बिगाड़ने में उस की भूमिका नहीं होगी.

सर्व फैमिली शांति यंत्र

आजकल राष्ट्रीय स्तर पर बात को तोड़मरोड़ कर पेश करने का आरोप लगाने का चलन कुछ ज्यादा ही हो गया है. जिसे देखो वही कहने के बाद कहता फिरता है कि उस की बात को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया है. उस के कहने का मतलब वह नहीं था जिसे जानबूझ कर पेश किया जा रहा है, उस की छवि खराब करने को. अब ऐसों से कौन पूछे कि जिस की छवि ही न हो, वह खराब कैसे होगी?

एक समय था जब घर घर में बात तोड़मरोड़ कर पेश की जाती थी, एकदूसरे के सामने एकदूसरे की छवि खराब करने को, एकदूसरे पर अपनी भड़ास निकालने को. और फिर घर में शुरू हो जाती थी पारिवारिक वार. और अंत में तब न चाहते हुए भी बहू को सास के सामने थकहार कर माफी मांगते कहना पड़ता था कि हे सासुमां, मेरे कहने का मतलब वह नहीं था जो मैं ने कहा था. देवरानी ने मेरे कहे को जानबूझ कर तोड़मरोड़ आप के सामने पेश किया है. इसलिए देवरानी की ओर से मैं माफी मांगती हूं.

अब ज्योंज्यों घर के हर सदस्य के हाथ को इंटरनैट से सुसज्जित नयापुराना मोबाइल इजीली अवेलेबल हो रहा है, त्योंत्यों घर का हर बालिग नाबालिग मेंबर अपनेअपने फोन पर व्यस्त रहने लगा है. कोई अपने पूरे होशोहवास खो इस कमरे में ट्विटरिया रहा है तो कोई उस कमरे में यूट्यूब पर यूट्यूबिया रहा है. कोई फेसबुक पर टकाटक फेसबुकिया रहा है, तो कोई मैसेंजर पर मैसेंजरिया रहा है. बिन काम के व्यस्त रहना आज फैशन हो गया है. बिन काम के भी व्यस्त रहना आज की कला है। जिधर देखो, जिस की भी बात करो, किसी के पास सिर खुरकने तक का वक्त नहीं.

ऐसे में अब घर में न किसी की छवि खराब होने का खतरा, न किसी की बात को तोड़मरोड़ कर पेश करने में समय की बरबादी. न किसी के पास किसी की चुगली करने की फुरसत. न ही किसी के पास किसी के चुगली सुनने का वक्त. न किसी के पास की गई चुगलियों का विश्लेषण करने का फालतू टाइम.

हर मोबाइल वाला हाथ अब न तो मोबाइल टच करने के सिवा कुछ और टच करना चाहता है, न किसी से कुछ कहना चाहता है और न किसी का कुछ सुनना चाहता है. बस, चुपचाप अपनेअपने मोबाइली काम में रमा हुआ फैमिली, फैमिली मेंबर्स ओर से पूरी तरह वैरागी हो.

अब तो बीसियों बार खुद मोबाइल पर जमे हुए एकदूसरे से रोटी खाने तक को निवेदन करता पड़ता है. पर किसी को न भूख, न प्यास. मोबाइल पर व्यस्तता में उस की बैटरी डेड हो गई तो मोबाइल को कोसते उसे चार्जिंग में लगा कर भी फोन पर व्यस्त हो गए. अपनी बैटरी डेड हो जाए तो हो जाए, पर मोबाइल की बैटरी हरगिज डेड नहीं होनी चाहिए भाई साहब. मोबाइल का डाटा खत्म हो गया तो तत्काल दूसरे से उधार ले लिया. यह कह कर कि कल जो उस का अचानक डाटा खत्म हो जाए तो वह चुका देगा ब्याज समेत.

गए वे दिन जब घर में सुलहशांति के लिए पूजापाठ करवाने का विधान था.  घर में शांति के लिए गणेश का पूजन होता था. अब घर में शांति घर में पूजापाठ करवाने से नहीं आती, घर के सदस्यों के हाथों में मोबाइल आने से आती है. ऐसे में किसी को जो अपने घर में शांति बनाए रखनी हो तो उन को मेरी विनम्र सलाह है कि वे अपने परिवार के हर सदस्य को रोटी, कपड़ा उपलब्ध करवाने के बदले जितनी जल्दी हो सके उन्हें मोबाइल उपलब्ध करवाएं. उन के लिए चाहे मोबाइल किस्तों पर ही क्यों न लेना पड़े. घर की शांति मोबाइल के लिए लोन की किस्तें चुकाने की परेशानी से कहीं बड़ी होती है. तय मानिए, तब उन के घर में शर्तिया शांति का वास होगा. कलहकलेश का नाश होगा.

अब विश्वशांति के लिए कोई वार्ता नहीं, डाटा, मोबाइल जरूरी है. आज भयंकर से भयंकर 8 प्रहर 25 घंटे नोकझोंक वाले घर में शांति बनाए रखने का जो सब से सशक्त माध्यम कोई है तो बस, मोबाइल है. इसलिए हैसियत न होने पर भी घर में हर सदस्य को मोबाइल दिलाइए और घर में स्वर्ग सी शांति पाइए, घर को घर में बैठेबैठे स्वर्ग बनाइए. शांति के सिवाय आज जिंदगी में और चाहिए भी क्या? लोग तो शांति के लिए क्याक्या नहीं करतेफिरते हैं, अज्ञानी कहीं के…’पाकेट चंगा तो मोबाइल में गंगा.’

ड्रग्स से कम नहीं है इंटरनैट का नशा

सीमा ने औफिस पहुंच कर अपना पर्स खोला और दराज की चाभी निकालने के लिए जैसे ही अंदर वाली पौकेट में हाथ डाला, उसे अंदर महीन लकड़ी के बुरादे जैसा कुछ होने का एहसास हुआ. उसने झटके से हाथ बाहर निकाला और पर्स उलटा, तो देखा कि तेजपत्ते के कुछ पत्ते किसी ने उसके पर्स में रख दिए थे.उन में से कुछ चूरा हो गए थे. सीमा ने ध्यान से देखा तो उन पत्तों पर लाल स्याही से कुछ नंबर लिखे हुए थे.

सीमा आशंकित हो उठी. ये पत्ते कब और किसने मेरे पर्स में रखे? इन नंबरों का क्या मतलब है? किसी ने कोई जादूटोना तो नहीं किया? ऐसे अनेक सवाल उसके जेहन में कौंधने लगे. सारा दिन चिंता में बीता. शाम को घर आई और घरवालों को बताया तो उसकी मां बोली,”अरे, वो तेजपत्ते मैंने रखे थे तेरे पर्स में. तूने फेंक तो नहीं दिए?”

“आपने? मगर क्यों? और उन पर नंबर क्यों लिखे थे?”सीमा ने एकसाथ कई सवाल अपनी मां पर दागे.

”अरे,वह मैं फेसबुक पर बाबाजी की रील देखती हूं न. बाबाजी ने बताया कि तेजपत्ते के 5 पत्तों पर वह चमत्कारी नंबर लिख कर अपने पर्स में उस स्थान पर रखो जहां पैसे रखते हैं तो आय में चमत्कारिक रूप से वृद्धि होती है. इसलिए मैंने तेरे पर्स में रखे थे. तूने फेंक दिए क्या?”

”क्या मां, तुम तो यह इंटरनैट देखदेख कर पागल हो गई हो. मेरा 3 हज़ार का पर्स तुम्हारे तेजपत्तों की महक और चूरे से भर गया था. मैं सारा दिन औफिस में परेशान रही, सो अलग. तुम यह इंटरनैट देखना बंद करो. और आगे मेरे पर्स को हाथ मत लगाना.”

सीमा मां पर गुस्सा करती अपने कमरे में चली गई.

बाद में उसके पापा भी बड़ी देर तक उसकी मां को समझाते रहे कि इंटरनैट पर यह बेवकूफी की चीजें मत देखा करो. इंटरनैट देखदेख कर तुमने पूरे घर को मंदिर बना दिया है. पहले एक कोने में तुम्हारे भगवान का मंदिर था, अब पूरे घर में हर दीवार पर तुमने अपने भगवान चिपका दिए हैं.

कहीं कैलेंडर तक लगाने की जगह नहीं छोड़ी. पहले तुम शनिवार कोउस मंगते को दोचार रुपए देती थीं, अब तो हर दिन कोई नकोई झोली फैलाए हमारे दरवाजे पर खड़ा रहता है. इतना दानपुण्य करने की जरूरत नहीं है. इससे कुछ नहीं होता. यह इंटरनैट पर बैठे बाबा सिर्फ दुनिया को बेवकूफ बनाते हैं. खुद पैसा कमाते हैं और अपने जैसे और निकम्मों के लिए पैसा बनाने का रास्ता तैयार करते हैं.”

सीमा की मां चुपचाप पति की बातें सुनती रही और थोड़ी देर बाद अपने पलंग पर बैठी, फिर अपने स्मार्टफोन के इंटरनैट में डूबी दिखाई दी. दरअसल, वे इंटरनेट एडिक्ट हो चुकी हैं. कोई कितना भी समझाए,फोन और इंटरनैट उनसे नहीं छूटता.

रात के तीनतीन बजे तक इंटरनैट सर्च करती रहती हैं. घरपरिवार की उन्नति के लिए, धन के आगमन के लिए, जेवर-कपड़े के लिए कोई भी उपाय, कोई भी टोटका कोई बताए, उन्हें वह करना ही होता है.

उनकी इस आदत ने पूरे घर को परेशान कर रखा है. इस एडिक्शन के चलते अब न तो वे सुबह वाक पर जाती हैं, न घर के किसी काम में हाथ बंटाती हैं. बस, नहाधो कर नाश्ता करके पलंग या कुरसी पर पैर फैला कर पड़ी रहती हैं और फोन में आंखें गड़ाए रखती हैं. फिर उन्हें दीनदुनिया का कोई होश नहीं रहता. दरवाजे पर घंटी बज रही है, तो बजती रहे. कोई आ रहा है, कोई जा रहा है, उनसे कोई मतलब नहीं. बस,वे और उनका फोन.

मेहताजी की पत्नी का देहांत हुए 8 साल हो गए. मेहताजी अपने बेटे आशीष के साथ रहते हैं. आशीष नौकरीपेशा है. मेहताजी रिटायर हो चुके हैं. पहले मेहताजी के पास साधारण मोबाइल फोन था जिसमें इंटरनैट नहीं था. कोई 3 साल पहले आशीष ने उनको एलजी का बढ़िया स्मार्टफोन खरीद कर दिया, जिसमें इंटरनैट, कैमरा, वौयस रिकौर्डर सब है.

आशीष ने जीमेल पर उनका अकाउंट खोल कर उनके फोन में व्हाट्सऐप, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम सब डाउनलोड कर दिए और चलाना भी सिखा दिया. अब तो मेहताजी को नया काम मिल गया जिसमें वे सुबह से शाम तक डूबे रहते.

बड़ी जल्दी उन्होंने अपने ढेरों फेसबुक फ्रैंड्स बना लिए. खूब मैसेज का आदानप्रदान होता और खूब फोटो शेयर होने लगे. यूट्यूब देखने का चस्का लगा, तो दुनियाभर के वायरल वीडियो देखदेख कर दोस्तों से शेयर करने लगे.

पत्नी की मृत्यु के बाद से मेहताजी अपना और बेटे का खाना खुद ही बनाते हैं. उनको कुकिंग का काफी शौक भी है. इंटरनैट हाथ में आया तो कभीकभी यूट्यूब पर वीडियो देख कर नईनईरैसिपी भी ट्राई कर लेते हैं. मगर सोशल मीडिया पर हर वक़्त ऐक्टिव रहने का असर अब उनके दिमाग पर पड़ने लगा है.वे बातें भूलने लगे हैं. कौन सी बात आज हुई, कौन सी कल हुई थी या एक हफ्ते पहले हुई थी, वे सब गड्डमड्ड कर जाते हैं.

फोन के इतने एडिक्ट हो चुके हैं कि कई बार आशीष के औफिस जाने के बाद घर का दरवाजा तक लौक करना भूल जाते हैं. कभी चूल्हे पर दाल या दूध चढ़ाया और आकर यूट्यूब देखने में व्यस्त हो गए तो दाल या दूध उबल कर गिर जाता है. चूल्हा बुझ जाता है मगर गैस चलती रहती है. ऐसा एकदो बार नहीं, कई बार हो चुका है. कई बार तो रात में जब आशीष घर पर होता है तब भी वे चूल्हे पर भोजन चढ़ा कर भूल जाते हैं.

आशीष कई बार टोक चुका है कि पापा, इतना फोन में मत खो जाओ कि आसपास क्या हो रहा है, कुछ सुध ही न रहे. मगर मेहताजी मानते नहीं.फोन उनकी जान है. किचन हो, बाथरूम हो, हर जगह उनके हाथ में होता है. इसके चक्कर में मेहताजी ने आसपास दोस्तोंयारों से मिलनामिलाना भी छोड़ दिया है.

पहले सब्जीभाजी लेने मार्केट चले जाते थे, अच्छी वाक हो जाती थी मगर अब इंटरनैट में ऐसे डूबे हैं कि कोई सब्जी वाला घर के नीचे आ जाए, तो खरीद लेते हैं वरना आशीष को फोन करके कह देते हैं कि लौटते समय लेता आए.

आशीष को इससे बहुत झुंझलाहट होती है. कई बार उसकी कार दिल्ली के जाम में फंसी होती है और पापा का फोन आता है कि भिंडी लेता आए तो वह मारे गुस्से के चीख पड़ता है. अब कार लेकर मैं सब्जीमंडी जाऊं? आपका दिमाग खराब है क्या? दिन में क्यों नहीं ले आए? वह अपने पापा पर चिल्लाता है.

इंटरनैट की हद से ज्यादा सर्चिंग ने बहुत सारे घरों की व्यवस्था बिगाड़ दी है. इंटरनैट हमारी सुविधा के लिए है, पर उसके अत्यधिक उपयोग से लोग इंटरनैट की लत के जाल में फंसते जा रहे हैं.

हालत यह हो गई है कि डाटा न मिलने पर इंटरनैट की लत में पड़ा व्यक्ति परेशान हो जाता है और गुस्सा प्रकट करता है. आजकल जिस तादाद में अस्पतालों में मानसिक रोगी आ रहे हैं उनमें से अधिकांश इंटरनैट के लती हैं और उसके कारण ही उनमें दिमागी असंतुलन पैदा हो रहा है.

डाक्टर कहते हैं कि शराब या ड्रग्स जैसे नशे के एडिक्शन से इंसानी दिमाग में जो बदलाव होते हैं, ठीक वैसे ही बदलाव इंटरनैट की लत ने करने शुरू कर दिए हैं. यह चौंकाने वाला तथ्य अस्पतालों में पहुंचने वाले इंटरनैट डिसऔर्डर से पीड़ित युवाओं की जांच में सामने आया है.

ऐसे युवाओं की फंक्शनल एमआरआई में पता चला है कि इंटरनैट एडिक्शन दिमाग के उसी हिस्से की कार्यशैली को प्रभावित करता है, जिस हिस्से की कार्यशैली ड्रग्स या एलकोहल के एडिक्शन से प्रभावित होती है.

लखनऊ केजीएमयू की इंटरनैट डिसऔर्डर क्लीनिक के डा. पवन गुप्ता ने एक अखबार को दिए अपने इंटरव्यू में कहा है कि फंक्शनल एमआरआई में ब्रेन के अलगअलग हिस्सों की फंक्शनिंग देखी जाती है. जो सामान्य एमआरआई में पता नहीं चलती.

इंटरनैट डिसऔर्डर के शिकार मरीजों की फंक्शनल एमआरआई में ब्रेन का स्ट्राइटल न्यूक्लियस डोपामिनर्जिक सिस्टम प्रभावित देखा गया. यह सिस्टम डोपामाइन हार्मोन रिलीज करता है जो इंसान का मूड नियंत्रित करता है.

इस सिस्टम के प्रभावित होने से एक ही काम बारबार करने का फितूर चढ़ जाता है. जिस तरह नशे का आदी नशे के बिना नहीं रह सकता, ठीक उसी तरह इंटरनैट एडिक्ट इंटरनैट के बिना नहीं रह पाता है. इससे पर्सनल लाइफ, वर्किंग लाइफ और पढ़ाई सभी प्रभावित होने लगते हैं.

जब कोई बच्चा या बड़ा इंटरनैट सर्फिंग का एडिक्ट हो जाता है तो शुरू में घरवाले इसको समझ नहीं पाते हैं. वे सिर्फ उन्हें डांटते हैं कि हर वक्तफोन या लैपटौप में खोए रहते हो, कभी दूसरे काम भी कर लिया करो. उन्हें पता ही नहीं चलता कि वह एक मानसिक बीमारी की चपेट में आ चुका है.

डाक्टर कहते हैं, जब परिवार का कोई सदस्य या आपका बच्चा दिनभर मोबाइल फोन में खोया रहे, पढ़ाई पर बिलकुल ध्यान न दे, डांटने के बावजूद छिपछिप पर मोबाइल फोन चलाए या बाथरूम में देर तक फोन लेकर बैठा रहे,मोबाइल फोन उससे अलग करें तो चिड़चिड़ा हो जाए, उग्रता दिखाए, गुस्सा करे या चीजें तोड़नेफोड़ने लगे तो समझ जाना चाहिए कि वह इंटरनैट एडिक्ट हो चुका है.

ऐसा एडिक्ट रातभर जाग कर फोन चलाता रहेगा, उसको खानेपीने की सुध नहीं रहेगी, पढ़ाई में मन नहीं लगेगा, दोस्तयार छूट जाएंगे, खेलने के लिए बाहर नहीं जाएगा, घर का कोई काम नहीं करना चाहेगा.

ऐसी स्थिति में दिमाग के डाक्टर के पास ले जाना ही बेहतर है वरना कंडीशन बिगड़ती चली जाएगी. कभी इंटरनैट कनैक्शन बंद हो जाए या डाटा खत्म हो जाए तो ऐसा लती व्यक्ति बहुत ज्यादा परेशान हो उठता है. जब व्यक्ति इंटरनैट के बिना असहज महसूस करे तथा डाटा न मिलने पर उसका मूड प्रभावित हो जाए, ऐसी स्थिति में यह कहा जा सकता है कि व्यक्ति को इंटरनैट की लत है.

इंटरनैट की लत व्यक्ति को वास्तविकता से दूर कहीं काल्पनिक दुनिया में ले जाती है. इंटरनैट का उपयोग आज हम व्यापक रूप में कर रहे हैं. हमारे सभी जरूरी कार्य, जैसे फौर्म भरना, विभिन्न तरह के रजिस्ट्रेशन, मनोरंजन सभी इंटरनैट के माध्यम से होते हैं. इस वजह से ज्यादातर लोग इंटरनैट की लत का शिकार होते चले जा रहे हैं.

इंटरनैट की लत ने तबाह किया जीवन

इंटरनैट हमारे जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. विश्व में सूचनाओं के आदानप्रदान को बढ़ावा देने के उद्देश्य से इंटरनैट की संरचना की गई. इंटरनैट पर सामग्री की भरमार है. इंटरनैट के आने से पूर्व तक हमें हमारा काम करने के लिए महीनों तक सरकारी दफ्तर के चक्कर लगाने पड़ते थे.

इंटरनैट की मदद से आज हम घर बैठे अनेक कार्य कर सकते हैं. इंटरनैट मनोरंजन का बहुत बड़ा माध्यम है.. इस वजह से 10 में से 6 लोगों को आज इंटरनैट की लत पड़ गई है. इंटरनैट पर धर्म का धंधा खूब चल रहा है. ज्योतिषाचार्य इंटरनैट पर आपका भविष्य बता रहा है. पंडितमौलवी दुनियाभर के कर्मकांड, भूतभविष्य और शगुनअपशगुन की बातें बता रहे हैं.

इंटरनैट पर पोर्न साइट देखने का चस्का शहर से लेकर गांव तक के लोगों को है. छोटेछोटे बच्चे तक आज मांबाप की नजर बचा कर अपने फोन पर पोर्न देख रहे हैं. कई नेता-विधायक तो सदन में बैठ कर सदन की कार्रवाई के दौरान पोर्न देखते पकड़े जा चुके हैं. होस्टल या घरों में अधिकांश युवा रातों को पोर्न साइट देखने के आदी हैं. इसमें लड़कियां भी पीछे नहीं हैं.

आज इंटरनैट पर अच्छी बातों का प्रसार कम, गलत बातों का ज्यादा हो रहा है. नेता धर्म के नाम पर जनता को लड़ाने के लिए इंटरनैट का इस्तेमाल कर रहे हैं. धार्मिक भावनाएं उकसानी हों, कहीं भीड़ इकट्ठी करनी हो, दंगा करवाना हो, जुलूस निकलवाना हो, धरना-प्रदर्शन-आंदोलन करवाना हो तो आज इंटरनैट सूचना फैलाने का सबसे सुगम माध्यम बन चुका है.

हर तरह के फ्रौड आजकल इंटरनैट पर हो रहे हैं. फेसबुक,व्हाट्सऐप पर युवाओं के बीच प्रेमलीलाएं चल रही हैं. लोग एकदूसरे को इमोशनल बेवकूफ बना रहे हैं, ठग रहे हैं, आर्थिक नुकसान पहुंचा रहे हैं.

इंटरनैट साइबर ठगों का अड्डा बन चुका है. एक क्लिक में आपका पूरा बैंक अकाउंट खाली हो सकता है.21वीं सदी के टैक्नोलौजी युग में आपका डेटा सुरक्षित नहीं है. पासवर्ड लगा होने के बाद भी आपके मोबाइल फोन से आपका डाटा उड़ा लिया जाता है. डिजिटल इंडिया ने लोगों की जिंदगी को कुछ सुगम बनाया है तो उससे अधिक असुरक्षित भी कर दिया है.

इंटरनैट आकर्षण का मूल कारण

इंटरनैट की लत का मुख्य कारण मनोरंजन है. हम इंटरनैट की सहायता से अनेक मूवी देख सकते हैं, गाने सुन सकते हैं तथा सबसे महत्त्वर्ण बात यह कि हम दुनियाभर के लोगों से जुड़ सकते हैं. इंटरनैट पर विभिन्न साइट्स के माध्यम से दोस्त बना पानाइंटरनैट आकर्षण का मुख्य कारण है और यह इंटरनैट की लत के लिए पूर्णरूप से ज़िम्मेदार है.

इंटरनैट की लत पड़ जाने पर हम उठने के साथ डाटा औन करके नोटिफिकेशन देखते हैं तथा सोने तक यही करते हैं. इस की वजह से हम नोमोफोबिया की गिरफ्त में आ सकते हैं.

इंटरनैट के जरूरत से ज्यादा उपयोग करने पर हमारा बहुमूल्य समय नष्ट होता है. यह एक दिन की बात नहीं है. हमारे जीवन के न जाने कितने दिन यों ही इंटरनैट की लत में बरबाद होते चले जाते हैं.

इसके साथ ही हर तरह के लोग इसका उपयोग करते हैं. उन में से कुछ ऐसे हैं जिनके लिए सहीगलत के कोई माने नहीं, पैसे के लिए वे कुछ भी कर सकते हैं.सो, औनलाइन इनका सामना आपसे होने पर ये किसी भी प्रकार से आपको नुकसान पहुंचा सकते हैं.

तलाक की मारी औरतें कहां जाएं

वर्ष 1955 के हिंदू मैरिज एक्ट में पहली बार कानूनी तौर पर विवाह में तलाक यानी संबंधविच्छेद का प्रावधान आया. वर्ष 1976 में इस में संशोधन हुआ और आपसी सहमति से तलाक का प्रावधान जुड़ गया. इस के बाद से ही अदालतों में तलाक के मामलों की संख्या तेजी से बढ़ने लगी.

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में तलाकशुदा लोगों की संख्या 13.6 लाख है. यह आंकड़ा बताता है कि तलाकशुदा लोगों में महिलाओं की संख्या ज्यादा हैं. इस का अर्थ यह है कि तलाकशुदा पतियों ने दूसरी शादी कर ली.

वर्ष 2011 के बाद जनगणना अभी नहीं हुई है. अनुमान है कि 2023 तक पहुंचतेपहुंचते तलाकशुदा लोगों की संख्या 23 लाख से अधिक हो चुकी है. आंकड़े बताते हैं कि तलाक के लिए मुकदमे दाखिल करने वालों में पुरुषों की संख्या 54 प्रतिशत और महिलाओं की संख्या 45 प्रतिशत के करीब है.

तलाक के ज्यादातर मामले पुरुषों की तरफ से आते हैं. तलाक के बाद पुरुष ही सब से ज्यादा शादी करते हैं. तलाक के बाद महिलाओं का घर बसाना मुश्किल होता है. इस की प्रमुख वजह यह भी होती है कि तलाक के बाद भी ज्यादातर मामलों में बच्चे अपनी मां के साथ रहते हैं.

दूसरी शादी में बच्चे सब से बड़ी बाधा होते हैं. पुरुष तलाकशुदा महिला के साथ तो शादी करने को तैयार रहता है पर यदि उस के बच्चे हों तो वह उस महिला के साथ दूसरी शादी करने से बचता है. इस कारण से तलाकशुदा महिलाओं के सामने शादी करने के अवसर कम हो जाते हैं.

इस का अर्थ यह है कि तलाक के बाद महिलाओं का जीवन केवल गुजारा भत्ता पर नहीं चलता. ऐसे में महिलाओं को यह नहीं सोचना चाहिए कि पतिपत्नी में से केवल एक को नौकरी करनी चाहिए और एक को घर का काम करना चाहिए.

अब महिलाओं के लिए भी जरूरी है कि वे घर के काम से पहले अपने को आत्मनिर्भर बनाएं. घर के काम के लिए नौकरानी रख लें. आजकल वैसे भी किचन और घर में काम करने की इतनी मशीनें आ गई हैं जिन से घर का काम सरल हो गया है. फूड सैक्टर में इतनी तरक्की हुई है कि खाना बनाना पहले कि तरह कठिन नहीं रह गया है.

ऐसे में महिलाओं को इस का लाभ उठाना चाहिए. वे खुद को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाएं. जिस से वक्त पड़ने पर वे अपने फैसले खुद कर सकें, उन को गुजारा भत्ता पर निर्भर न रहना पड़े.

जैसे हालात हैं उसे देखते लगता है कि समाज पुरुष प्रधानता की ओर वापस जा रहा है. महिलाओं से कहा जा रहा है कि वे पूजापाठ, व्रत और तप करे. घर, परिवार पति की सेवा करे. तलाक को समय की मार मान कर स्वीकार कर लें और गुजारा भत्ता पर बुढ़ापा काट दें. अब फैसला औरतों के हाथ है कि वे आत्मनिर्भर हो कर आत्मसम्मान के साथ जीना चाहती हैं या फिर गुजारा भत्ता पर जीना चाहती हैं. आत्मनिर्भर होने के लिए जरूरी है कि अपने हुनर को पहचानें और खुद को अपने पैरों पर खड़ा करें. तभी तलाक के बाद भी सम्मानपूर्ण जीवन जी सकती हैं.

मेरे पति मेरे साथ मारपीट व गालीगलौज करते हैं और दूसरी शादी की धमकी देते हैं, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं विवाहित महिला हूं. 4 साल का बेटा है. पति सरकारी नौकरी करते हैं. समस्या यह है कि ससुराल वालों के कहने पर मेरे पति मेरे साथ मारपीट व गालीगलौज करते हैं और बातबात पर दूसरी शादी करने व तलाक देने की धमकी देते हैं. घरेलू हिंसा से परेशान हो कर मैं अपने बेटे के साथ मायके रहने चली गई. कुछ समय पहले मेरे पिता का देहांत हो गया तो मैं ससुराल वापस आ गई. लेकिन पति व ससुराल वालों का मेरे प्रति रवैया अभी भी वैसा का वैसा ही है. ससुर अकसर धमकी देते हैं कि उन की पहुंच ऊपर तक है. दरअसल, मेरी ननद पुलिस में दारोगा है, इसी बात का वे मुझ पर रोब जमाते रहते हैं. मैं बहत परेशान हूं. उचित सलाह दें.

 

जवाब

पहले आप अपने पति से अकेले में प्यार से बात करें और समझाने की कोशिश करें. फिर भी बात न बने तो आप अदालत में जज के समक्ष अपनी सुरक्षा के लिए बचावकारी आदेश ले सकती हैं.

पति या ससुराल पक्ष द्वारा पत्नी का शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, मौखिक, मनोवैज्ञानिक या किसी भी प्रकार का यौन शोषण किया जाना घरेलू हिंसा के अंतर्गत आता है और कोई भी पीड़ित महिला या उस का पड़ोसी या परिवार का कोई भी सदस्य अपने क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट की कोर्ट में शिकायत दर्ज करा कर बचावकारी आदेश हासिल कर सकता है. इस कानून का उल्लंघन होने की स्थिति में पीड़ित करने वाले को जेल के साथसाथ जुर्माना भी हो सकता है.

आप भी अपने साथ हो रहे अन्याय व प्रताड़ना के खिलाफ घरेलू हिंसा कानून के अंतगर्त ससुराल वालों के खिलाफ केस दर्ज करा कर न केवल ससुराल में रहने का अधिकार पा सकती हैं, बल्कि मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना का मुआवजा की मांग भी कर सकती हैं.

आप की ससुराल वाले आप के अधिकारों की अनभिज्ञता के चलते आप के साथ ऐसा दुर्व्यवहार कर रहे हैं. जब आप उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी देंगी तो वे रास्ते पर आ जाएंगे.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem 

अप्रैल माह का दूसरा सप्ताह, कैसा रहा बौलीवुड का कारोबार

अप्रैल माह के दूसरे सप्ताह में बौलीवुड से जुड़े लोगों को पूरी उम्मीद थी कि इस बार बौक्स औफिस कमाल कर दिखाएगा क्योंकि इस सप्ताह दिग्गज कलाकारों के अभिनय से सजी बड़े बजट की दो फिल्में ‘मैदान’और ‘बड़े मियां छोटे मियां’ प्रदर्शित हुईं, पर कलाकारों का अहम दोनों फिल्मों को ऐसा ले डूबा कि पीवीआर आयनौक्स के शेअर के भाव 1800 से गिर कर 1200 पर पहुंच गए.

ईद के अवसर पर 11 अप्रैल को अजय देवगन के अभिनय से सजी फिल्म ‘मैदान’ प्रदर्शित हुई. बोनी कपूर निर्मित और अमित शर्मा निर्देशित फिल्म ‘मैदान’5 साल से प्रदर्शन का इंतजार कर रही थी. देश को फुटबौल के खेल में एशियन गेम्स में गोल्ड मैडल जीतने में अहम भूमिका निभाने वाले कोच सय्यद अब्दुल रहीम की यह बायोग्राफिकल स्पोर्ट्स फिल्म है. 3 घंटे से अधिक लंबी अवधि की इस फिल्म के लिए अजय देवगन ने स्वयं प्रमोशन नहीं किया.
लोग कह रहे हैं कि 5 साल में उन की आस्था बदल चुकी है. फिल्म के निर्माता बोनी कपूर अकेले ही सोशल मीडिया पर अपनी बात करते रहे. कथानक और मेकिंग के स्तर पर फिल्म अच्छी बनी है. मगर फुटबौल के खेल में जिन की रुचि नहीं, उन्होंने इस फिल्म से दूरी बनाए रखा. फिल्म के कलाकारों ने दर्शकों तक फिल्म को पहुंचाने का प्रयास नहीं किया.

परिणामत: 250 की लागत में बनी यह फिल्म बौक्स औफिस पर 8 दिन में 28 करोड़ रुपए ही एकत्र कर सकी. इस में से निर्माता के हाथ बामुश्किल 12 करोड़ ही आएंगे. जबकि इस सप्ताह ईद, शनिवार और रविवार की छुट्टी सहित 8 दिन मिले, क्योंकि फिल्म गुरुवार को रिलीज हुई थी.

11 अप्रैल गुरुवार को ही प्रदर्शित अक्षय कुमार व टाइगर टाइगर श्रोफ की फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ भी रिलीज हुई. 1998 में इसी नाम से अमिताभ गोविंदा की फिल्म आई थी. वह फिल्म हास्य फिल्म थी, जबकि वासु भगनानी और निर्देशक अली अब्बास जफर की यह फिल्म ऐक्शन प्रधान फिल्म है. अक्षय कुमार और टाइगर श्रोफ तो अहम के शिकार हैं. यह दोनों कलाकार पत्रकारों से मिलना अपनी तोहीन समझते हैं. सिर्फ सोशल मीडिया पर उनकी टीम ही फिल्म का प्रचार करती रही है. फिल्म के निर्माता को चिंता नहीं थी. क्योंकि उन्होंने इस फिल्म को जौर्डन सरकार से सब्सिडी ले कर जौर्डन में ही फिल्माया है.
फिल्म में बेवजह एक्शन दृश्य ठूंसे गए हैं. फिल्म में किसी भी कलाकार ने अच्छा अभिनय ‌‌नहीं किया जिस के चलते 350 करोड़ के बजट में बनी यह फिल्म 8 दिन में सिर्फ 48 करोड़ रुपए ही कमा सकी. इस में से निर्माता के हाथ में मुश्किल से 20 से 22 करोड़ ही आएंगे.

 

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