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मैं मायके चली जाऊंगी

लेखक: सुनील तोमर

उधर डोरबैल बजाने के बाद भी जब श्रीमतीजी ने दरवाजा नहीं खोला, तो हम ने गुस्से में आ कर दरवाजे को जोर से धकेल दिया. देखा तो वह खुला पड़ा था. सोचा कि श्रीमतीजी अंदर से बंद करना भूल गई होंगी. घर में घुसते ही हम ने इधरउधर नजर दौड़ाई. हमारी श्रीमतीजी हमें कहीं नजर नहीं आईं.

हम घबराए हुए सीधे बैडरूम में जा पहुंचे. वहां श्रीमतीजी अंधेरा किए बैड पर ऐसे फैली पड़ी थीं, जैसे किसी ने उन के कीमती जेवरों पर हाथ साफ कर दिए हों और अब उसी का गम मना रही हों.

हम ने जैसे ही कमरे की बत्ती जलाई, तो श्रीमतीजी ने गुस्से में मोटीमोटी लाललाल आंखें हमें दिखाईं, तो हम तुरंत समझ गए कि आज हमारी शामत आई है.

हम ने धीरे से श्रीमती से पूछा, ‘‘क्या तबीयत खराब है या मायके में कोई बीमार है?’’

वे गुस्से में फट पड़ीं, ‘‘खबरदार, जो मेरी या मेरे मायके वालों की तबीयत खराब होने की बात मुंह से निकाली.’’

श्रीमतीजी बालों को बांधते हुए बैडरूम से निकल कर ड्राइंगरूम में आ कर सोफे पर पसर गईं. हम भी अपने कपड़े बदल कर उन के पास आ कर बैठ गए. फिर उन के शब्दों के बाणों की बौछारें शुरू हो गईं, ‘‘शादी को अभी सालभर भी नहीं हुआ है और तुम ने मुझे इस फ्लैट की चारदीवारी में कैद कर दिया है. तुम न तो मुझे कभी फिल्म दिखाने ले जाते हो, न कहीं घुमाते हो और न ही किसी अच्छे से रैस्टोरैंट में खाना खिलाते हो.

‘‘आज तो तुम को मुझे कहीं न कहीं घुमाने ले जाना पड़ेगा और मेरे नाजनखरों को उठाना पड़ेगा, वरना मैं मायके चली जाऊंगी और फिर कभी वापस नहीं आऊंगी.’’

श्रीमतीजी के मायके जाने की धमकी ने हमारी आंखों को उन के पहलवान पिताजी कल्लू के साक्षात दर्शन करा दिए थे, जिन्होंने अपनी बेटी को विदा करते समय हमें चेतावनी दी थी कि अगर कभी हमारी बेटी यहां रोतीबिलखती आई, तो हम से बुरा कोई न होगा. बेटी राधिका को परेशान करने के एवज में तुम्हें हमारे बेटे भूरा से गांव के वार्षिक दंगल में लड़ना होगा.

भूरा की कदकाठी कुछ ऐसी ही थी कि हाथी भी सामने आ जाए, तो उस सांड़ को देख कर अपना रास्ता बदल ले.

हम ने तुरंत श्रीमतीजी के पैर पकड़ लिए और उन के नाजनखरों को उठाने को तैयार हो गए.

अगले दिन दफ्तर में श्रीमतीजी का फोन आया. वे बोलीं, ‘‘आज हमारा सलमान खान की फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ देखने का मन कर रहा है. उस के बाद डिनर भी हम बाहर ही करेंगे.’’

सो, इंटरनैट के जरीए हम ने ‘बजरंगी भाईजान’ के 2 टिकट बुक करा दिए. शाम को जब हम घर पहुंचे, तो श्रीमतीजी दरवाजे पर तैयार खड़ी गुस्से से कलाई घड़ी की तरफ देख रही थीं. उधर गरमी के मारे हमारी हालत बुरी थी.

सकपकाते हुए हम धीरे से घर के अंदर घुसे. फिर फ्रिज से हम ने ठंडा पानी निकाला और 2-4 घूंट पानी गले में डाला, जल्दी से कपड़े बदले और श्रीमतीजी के साथ स्कूटर पर निकल पड़े.

मगर रास्ते में ही स्कूटर ने धोखा दे दिया. उधर श्रीमतीजी का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. स्कूटर का पिछला पहिया पंक्चर हो गया.

हम ने श्रीमतीजी के तमतमाए चेहरे की तरफ देखा और फिर घड़ी में समय देखा, तो शाम के 7 बज चुके थे. एक घंटे का शो पहले ही निकल चुका था. जब तक हम पंक्चर लगवा कर सिनेमाघर तक पहुंचे, तब तक रात के 9 बज चुके थे. लोग सिनेमाघर से बाहर निकल रहे थे.

अब हमारा दिल डर के मारे बुरी तरह धड़क रहा था.

हम ने श्रीमतीजी को समझाया, ‘‘कल हम तुम्हें मौर्निंग शो में फिल्म ‘बजरंगी भाईजान’ दिखा लाएंगे. इस के एवज में हम कल ड्यूटी पर भी नहीं जाएंगे.’’

यह सुन कर श्रीमतीजी के चेहरे पर गुस्से की लकीरें थोड़ी कम होने लगी थीं. फिर वहीं पास ही के एक अच्छे से रैस्टोरैंट में श्रीमतीजी को ले गए. वहां हम दोनों ने लजीज खाने का लुत्फ उठाया. जब पैसे देने का समय आया, तो हमारी जेब से पर्स गायब था.

हम ने रैस्टोरैंट के मालिक को बहुत समझाया. आखिरकार हमें अपना स्कूटर उन के पास बतौर गिरवी छोड़ना पड़ा और पैदल ही घर जाना पड़ा.

अभी हमारी मुसीबत कम नहीं हुई थी, क्योंकि सुनसान सड़क पर चलती हुई हमारी श्रीमतीजी सोने के जेवरों से दमक रही थीं. जब हम ने उन्हें समझाया कि पल्लू से अपने गहनों को ढक लो, तो

वे अकड़ते हुए बोलीं, ‘‘मैं कल्लू पहलवान की बेटी हूं. चोरउचक्कों से डर तुम जैसे शहरियों को लगता होगा. मैं एक धोबीपछाड़ दांव में अच्छेअच्छों को पटक दूंगी और अपनी हिफाजत मैं खुद कर लूंगी.’’

श्रीमतीजी की बहादुरी से हमारे हौसले भी बढ़ चुके थे कि तभी वही हो गया, जिस का हमें डर था. 2 लुटेरों ने हमें धरदबोचा. चाकूपिस्तौल देख हमारी हालत पतली हुई जा रही थी, तभी एक लुटेरा हमारी श्रीमतीजी के गहनों पर झपट पड़ा. इस के बाद श्रीमतीजी ने उन दोनों की जो हालत बनाई, वह नजारा हम अपनी जिंदगी में कभी भूल नहीं सकते हैं.

कुछ ही देर में पुलिस की एक गाड़ी वहां आ पहुंची. उन दोनों इनामी बदमाशों को पकड़वाने के एवज में श्रीमतीजी को 50 हजार रुपए का चैक बतौर इनाम मिला.

हम ने उन रुपयों से एक सैकंडहैंड कार ले ली है. अब तो हम हर शाम श्रीमतीजी के साथ कार में घूमने जाते हैं. इस बात की उम्मीद करते हैं कि दोबारा किसी लुटेरे गैंग से हमारी श्रीमतीजी की भिड़ंत हो जाए और उसे पकड़वाने के एवज में इनाम के तौर पर फिर कोई चैक मिल जाए.

बच्चा होने के कितने महीने बाद सेक्स करना चाहिए ?

सवाल

बच्चा होने के कितने महीने बाद सेक्स करना चाहिए?

जवाब

इस का कोई तय नियम नहीं है. बच्चा होने के बाद जब बीवी जिस्मानी तौर पर पूरी तरह से सेहतमंद हो जाए, तभी सेक्स करना चाहिए.

शारीरिक व मानसिक थकान

बच्चे के जन्म के बाद मानसिक व शारीरिक तौर पर एक औरत का थकना स्वाभाविक है. चूंकि प्रैग्नैंसी के 9 महीनों के दौरान उसे कई तरह के उतारचढ़ावों से गुजरना पड़ता है. बच्चे को जन्म देने के बाद भी उस के अंदर अनेक सवाल पल रहे होते हैं. कमजोरी और शिशु जन्म के साथ बढ़ती जिम्मेदारियां, रात भर जागना और दिन का शिशु के साथ उस की जरूरतें पूरी करतेकरते गुजर जाना आम बात होती है. औरत के अंदर उस समय चिड़चिड़ापन भर जाता है. नई स्थिति का सामना न कर पाने के कारण अकसर वह तनाव या डिप्रैशन का शिकार भी हो जाती है. मां बनने के बाद औरत कई कारणों की वजह से सैक्स में अरुचि दिखाती है. सब से प्रमुख कारण होता है टांकों में सूजन होना. अगर ऐसा न भी हो तो भी गर्भाशय के आसपास सूजन या दर्द कुछ समय के लिए वह महसूस करती है. थकावट का दूसरा बड़ा कारण होता है 24 घंटे शिशु की देखभाल करना, जो शारीरिक व मानसिक तौर पर थकाने वाला होता है. इसलिए जब भी वह लेटती है, उस के मन में केवल नींद पूरी करने की ही इच्छा होती है. कई औरतों की तो सैक्स की इच्छा कुछ महीनों के लिए बिलकुल ही खत्म हो जाती है.

अपने शरीर के बदले हुए आकार को ले कर भी कुछ औरतों के मन में हीनता घिर जाती है, जिस से वे यौन संबंध बनाने से कतराने लगती हैं. उन्हें लगने लगता है कि वे पहले की तरह सैक्सी नहीं रही हैं. स्टे्रच मार्क्स या बढ़ा हुआ वजन उन्हें अपने ही शरीर से प्यार करने से रोकता है. बेहतर होगा कि इस तरह की बातों को मन में लाने के बजाय जैसी हैं, उसी रूप में अपने को स्वीकारें. अगर वजन बढ़ गया है, तो ऐक्सरसाइज रूटीन अवश्य बनाएं.

दर्द होने का डर

अकसर पूछा जाता है कि अगर डिलीवरी नौर्मल हुई है, तो यौन संबंध कब से बनाने आरंभ किए जाएं? इस के लिए कोई निर्धारित नियम या अवधि नहीं है, फिर भी डिलीवरी के 11/2 महीने बाद सामान्य सैक्स लाइफ में लौटा जा सकता है. बच्चे के जन्म के बाद कई औरतें सहवास के दौरान होने वाले दर्द से घबरा कर भी इस से कतराती हैं. औरत के अंदर दोबारा यौन संबंध कायम करने की इच्छा कब जाग्रत होगी, यह इस पर भी निर्भर करता है कि उस की डिलीवरी कैसे हुई है. जिन औरतों का प्रसव फोरसेप्स की सहायता से होता है, उन्हें सैक्स के दौरान निश्चिंत रहने में अकसर लंबा समय लगता है. ऐसा ही उन औरतों के साथ होता है, जिन के योनिमार्ग में चीरा लगता है. सीजेरियन केबाद टांके भरने में समय लगता है. उस समय किसी भी तरह का दबाव दर्द का कारण बन सकता है. फोर्टिस ला फेम की गायनाकोलौजिस्ट डा. त्रिपत चौधरी कहती हैं, ‘‘प्रसव के बाद 2 से 6 हफ्तों तक सैक्स संबंध नहीं बनाने चाहिए, क्योंकि बच्चे के जन्म के बाद औरत न सिर्फ अनगिनत शारीरिक परिवर्तनों से गुजरती है, वरन मानसिक व भावनात्मक बदलाव भी उस के अंदर समयसमय पर होते रहते हैं. चाहे डिलीवरी नौर्मल हुई हो या सीजेरियन से, दोनों ही स्थितियों में कुछ महीनों तक यौन संबंध बनाने से बचना चाहिए. ‘‘डिलीवरी के बाद के जिन महीनों को पोस्टपार्टम पीरियड कहा जाता है, उस दौरान औरत के अंदर सैक्स संबंध बनाने की बात तक नहीं आती. प्रसव के बाद कुछ हफ्तों तक हर औरत को ब्लीडिंग होती है. ब्लीडिंग केवल रक्त के रूप में ही नहीं होती है, बल्कि कुछ अंश निकलने व डिस्चार्ज की तरह भी हो सकती है. वास्तव में यह पोस्टपार्टम ब्लीडिंग औरत के शरीर से प्रैग्नैंसी के दौरान बचे रह गए अतिरिक्त रक्त, म्यूकस व प्लासेंटा के टशू को बाहर निकालने का तरीका होती है. यह कुछ हफ्तों से ले कर महीनों तक हो सकती है.

‘‘डिलीवरी चाहे नौर्मल हुई हो या सीजेरियन से औरत के योनिमार्ग में सूजन आ जाती है और टांकों को भरने में समय लगता है. अगर इस दौरान यौन संबंध बनाए जाएं तो इन्फैक्शन होने की अधिक संभावना रहती है. औरत किसी भी तरह के इन्फैक्शन का शिकार न हो जाए, इस के लिए कम से कम 6 महीनों बाद यौन संबंध बनाने की सलाह दी जाती है. योनिमार्ग या पेट में सूजन, घाव, टांकों की वजह से सहवास करने से उसे दर्द भी होता है.’’

क्या करें

अगर बच्चा सीजेरियन से होता है, तो कम से कम 6 हफ्तों बाद यौन संबंध बनाने चाहिए. लेकिन उस से पहले डाक्टर से जांच करवानी जरूरी होती है कि आप के टांके ठीक से भर रहे हैं कि नहीं और आप की औपरेशन के बाद होने वाली ब्लीडिंग रुकी कि नहीं. यह ब्लीडिंग यूट्रस के अंदर से होती है, जहां पर प्लासेंटा स्थित होता है. यह ब्लीडिंग हर गर्भवती महिला को होती है, चाहे उस की डिलीवरी नौर्मल हुई हो या सीजेरियन से. अगर डाक्टर सैक्स संबंध बनाने की इजाजत दे देते हैं, तो इस बात का ध्यान अवश्य रखें कि टांके अगर पूरी तरह भरे नहीं हैं तो किस पोजीशन में संबंध बनाना सही रहेगा. पति साइड पोजीशन रखते हुए संबंध बना सकता है, जिस से औरत के पेट पर दबाव नहीं पड़ेगा. अगर उस दौरान स्त्री को दर्द महसूस हो, तो उसे ल्यूब्रिकेंट का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि कई बार थकान या अनिच्छा की वजह से योनि में तरलता नहीं आ पाती. अगर औरत को दर्द का अनुभव होता हो तो पति पोजीशन बदल कर या ओरल सैक्स का सहारा ले सकता है. साथ ही, वैजाइनल ड्राईनैस से बचने के लिए ल्यूब्रिकेंट का इस्तेमाल करना अनिवार्य होता है. चूंकि प्रैग्नैंसी के बाद वैजाइना बहुत नाजुक हो जाती है और उस में एक स्वाभाविक ड्राईनैस आ जाती है, इसलिए नौर्मल डिलीवरी के बाद भी सैक्स के दौरान औरत दर्द महसूस करती है.

पोस्टपार्टम पीरियड बहुत ही ड्राई पीरियड होता है, इसलिए बेहतर होगा कि उस के खत्म होने के बाद ही यौन संबंध बनाए जाएं. प्रसव के 1-11/2 महीने बाद यौन संबंध बनाने के बहुत फायदे भी होते हैं. सैक्स के दौरान स्रावित होने वाले हारमोंस की वजह से संकुचन होता है, जिस से यूट्रस को सामान्य अवस्था में आने में मदद मिलती है और साथी के साथ दोबारा से शारीरिक व भावनात्मक निकटता कायम करने में यौन संबंध महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. प्रसव के बाद कुछ महीनों तक पीरियड्स अनियमित रहते हैं, जिस की वजह से सुरक्षित चक्र के बारे में जान पाना असंभव हो जाता है. इस दौरान गर्भनिरोध करने के लिए कौपर टी का इस्तेमाल करना या ओरल पिल्स लेना सब से अच्छा रहता है. अगर प्रसव के बाद कई महीनों तक औरत के अंदर यौन संबंध बनाने की इच्छा जाग्रत न हो तो ऐसे में पति को बहुत धैर्य व समझदारी से उस से बरताव करना चाहिए.

पति का सहयोग

जैसे ही औरत शारीरिक व भावनात्मक रूप से सुदृढ़ हो जाती है, संबंध बनाए जा सकते हैं. इस दौरान पति के लिए इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी होता है कि वह पत्नी पर किसी भी तरह का दबाव न डाले या जबरदस्ती सैक्स संबंध बनाने के लिए बाध्य न करे. हफ्ते में 1 बार अगर संबंध बनाए जाते हैं, तो दोनों ही इसे ऐंजौय कर पाते हैं और वह भी बिना किसी तनाव के. पति को चाहिए कि वह इस विषय में पत्नी से बात करे कि वह संबंध बनाने के लिए अभी तैयार है कि नहीं, क्योंकि प्रसव के बाद उस की कामेच्छा में भी कमी आ जाती है, जो कुछ समय बाद स्वत: सामान्य हो जाती है.

 

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इंटरनैट के फर्जी डौन रजत दलाल की चिंदी हरकतें

सोशल मीडिया चलाने वाला युवा भले घर के कोनों में लगे मकड़ी के जालों को न जान रहा हो पर वह रजत दलाल को जरूर जानता है, जो आजकल इंटरनैट का डौन या गैंगस्टर के नाम से जाना जा रहा है. वही रजत दलाल जो सोशल मीडिया पर फिटनैस टिप्स देने के नाम पर लफंगई किया करता है, लोगों को धमकाता है और जस्टिस के नाम पर कानून अपने हाथ में लेता है.

अहमदाबाद के रहने वाले रजत दलाल के इंस्टाग्राम पर 10 लाख से ज्यादा फौलोअर्स हैं. ये फौलोअर्स कैसे और क्यों इस से जुड़ गए, यह सोचने वाली बात है पर 6 जून को अहमदाबाद पुलिस ने रजत को गिरफ्तार किया तो इन 10 लाख में से कोई एक उस के बचाव में नहीं आया.

इंटरनैट पर रजत, एल्विश, मैक्सटर्न और न जाने कितने गुंडई दिखाने वाले ढेरों लफंगे उग आए हैं, जो गालीगलोज कर, एकदूसरे को धमकियां दे कर, फालतू के बवाल खड़े कर के व्यूज और फौलोअर्स बटोर रहे हैं. ये इंटरनैट पर विवाद खड़े कर रहे हैं, कभी धर्म की आइडैंटिटी ले कर तो कभी जाति की आइडैंटिटी ले कर. रजत दलाल उन्हीं में से एक है, जिसे इंटरनैट का डिजिटल गुंडा कहा जा सकता है.

हाल ही में रजत को गिरफ्तार किया गया, वजह यह थी कि उस पर आरोप है कि उस ने 18 साल के एक लड़के को अगवा कर उस के साथ मारपीट की और उस के मुंह पर पेशाब किया. बताया जा रहा है कि मामला तब शुरू हुआ जब लड़के ने रजत दलाल का एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, जिस के बाद रजत ने गुस्से में आ कर लड़के की पिटाई कर दी.

मामला क्या है

लड़का एक कालेज का स्टूडैंट है. कथित तौर पर उस से टौयलेट साफ कराया गया और उस के मुंह पर गोबर भी डाला गया. बात यहीं खत्म नहीं हुई, मारपिटाई के बाद लड़के को उस के घर के सामने छोड़ते हुए उस की मां को भी धमकाया गया कि हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता, हम ‘हरियाणा’ के जाट हैं.

इस मामले में लड़के और उस की मां ने पुलिस से शिकायत की, जिस के बाद पुलिस ने रजत दलाल और उस के साथियों को गिरफ्तार कर लिया. दरअसल, लड़के ने रजत के जिम के अंदर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया. उस ने उस में कैप्शन लिखा कि “रोज सुबह अपना मुंह (रजत) जिम में दिखा कर मेरा दिन खराब करता है.”

बताया जा रहा है कि रजत का जो वीडियो लड़के ने पोस्ट किया वह खूब वायरल हुआ, जिस के बाद रजत ने युवक को सोसायटी के बाहर बुलाया और अपने दोस्तों के साथ उसे अगवा कर लिया. रजत दलाल और उस के साथियों ने लड़के को गालियां दीं और पूछा कि ‘तेरी हिम्मत कैसे हुई मेरा वीडियो बनाने की. मैं तुझे टुकड़ेटुकड़े कर दूंगा, तुझे छोड़ने वाला नहीं हूं.’

इस के बाद रजत दलाल और उस के साथी उस युवक को जगतपुर स्थित ग्रीन गैल्स सोसायटी के एक फ्लैट में ले गए और उस को पीटते हुए फ्लैट का टौयलेट साफ कराया. लड़का जब पिटाई से बेहोश हुआ तो उस के चेहरे पर पेशाब कर दिया. जब लड़का होथ में आया, तो रजत ने घर छोड़ दिया.

कहा जा रहा है कि रजत दलाल ने उस की मां से कहा, ‘मैं इस लड़के को जान से भी मार सकता था, लेकिन यह बहुत छोटा है, सो इसे छोड़ रहा हूं. मैं हरियाणा का जाट हूं. यहां मेरे बड़े लोगों से कनैक्शन हैं. पुलिस मेरा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी, वह मेरी जेब में है.’

देखने वाले जिम्मेदार

अब आते हैं इस की मूल वजह पर कि यह घटना हुई क्यों और इस तरह के लफंगे इन्फ्लुएंसर्स को बढ़ावा कहां से मिलता है? दरअसल इस में जितनी गलती रजत दलाल जैसों की है उस से कहीं ज्यादा उस जैसों को देखने वाले युवाओं की है. वे रजत दलाल जैसे टौक्सिक इन्फ्लुएंसर्स से इन्फ्लुएंस हो बैठते हैं और फेमस होने के लिए वही हरकतें कर बैठते हैं जो सही नहीं हैं.

इस वीडियो में पिटने वाला युवा उस ट्रैंड का शिकार हो गया जिस में रजत की पिछली लड़ाई से पिटने वाले और पीटने वाले को फेम मिली थी. फौलोअर्स बढ़ाने के ये शौर्टकट पैतरे हर दूसरा लुक्खा इन्फ्लुएंसर अपनाने लगा है. वे जानबूझ कर कोई बवाल करते हैं ताकि उन की वीडियोज को हाइप मिले.

एल्विश और मैस्कटर्न की नौटंकी

मामला फरवरी-मार्च महीने का है जब यूट्यूबर्स एल्विश यादव और मैक्सटर्न के बीच लड़ाई हुई थी. मैक्सटर्न का आरोप था कि एल्विश ने उसे अपने साथियों के साथ मिल कर बुरी तरह पीटा. जान से मारने की धमकी भी दी. इसे ले कर मैक्सटर्न ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई थी.

पुलिस ने एल्विश को 12 मार्च तक मामले में पेश होने के लिए नोटिस भेजा था. लेकिन 10 मार्च की शाम को एल्विश यादव ने एक्स अकाउंट पर एक पोस्ट अपलोड की जिस के कैप्शन में लिखा, “भाईचारा औन टौप”. बताया गया कि दोनों के बीच रजत दलाल ने सुलह करवाई. लेकिन मामला यहीं नहीं रुका, इस के बाद रजत का झगड़ा किसी और गैंग से शुरू हो गया और इंटरनैट पर ही लफंगों की गैंगवार शुरू हो गई. खबर यह भी थी कि यह सब फेमस और पौपुलैरिटी लेने के लिए स्टंट था.

यह तो नहीं कहा जा सकता कि हाल की घटना भी पौपुलैरिटी पाने के लिए किया गया स्टंट था मगर पिछले ट्रैक उठा कर देखें तो इस पर संदेह तो किया ही जा सकता है. सारा माजरा जल्दी वायरल होने का रह गया है. लड़के ने भी रजत पर पोस्ट कर के फेमस होने की ही कोशिश की. हो भी सकता है, लड़का जल्दी फेमस होने की जुगत में रहा हो और अगर यह न भी हो तो भी बेमतलब के पोस्ट सोशल मीडिया पर होगी तो इस तरह की चीजें सामने आएंगी ही.

रजत दलाल का बुरा प्रभाव

रजत के फौलोअर्स उसे सिग्मा मेल मानते हैं सिर्फ इसलिए क्योंकि उस की बोलचाल में गालियां हैं. वह अपनी रील्स में या तो जिम में लिफ्टिंग कर रहा होता है या चलतेफिरते मोनोलोग करता है जिस में गालियां ही गालियां होती हैं. वह खुलेतौर पर जान से मारने की धमकियां देने और एंटरटेनमैंट के नाम पर ट्रैफिकरूल की धज्जियां उड़ाते दिखाई देता है.

कुछ समय पहले उस ने सड़क की रौंग साइड पर 100 किमी/घंटा की रफ्तार से गाड़ी चलाते हुए खुद की एक वीडियो रिकौर्ड की थी. इस में वह न केवल अपनी जिंदगी को खतरे में डाल रहा था बल्कि कितनों के लिए खतरे का कारण बना होगा. सड़कों पर ऐसी रैश ड्राइविंग करना कितना खतरनाक हो सकता है, यह पोर्शे कार क्रैश के उदाहरण से समझा जा सकता है. हैरानी तो यह कि इसे वह वीडियो कैप्चर करता है और सोशल मीडिया पर भी साझा करता है, लेकिन बावजूद इस के, पुलिस सच में उस पर कुछ ऐक्शन नहीं लेती.

उस की रील्स की छानबीन की जाए तो युवाओं को टौक्सिसिटी के अलावा कुछ भी देखने को नहीं मिलेगा. चार डंबल उठा लेने से और मुंह से गालियां देने से अगर फौलोअर्स बढ़ जाते हैं तो इस से बड़ी दुर्गति और क्या ही हो सकती है युवाओं के लिए.

रजत दलाल जैसे इन्फ्लुएंसर्स को गलत कारणों से फेम और पैसा मिला रहा है और चिंता इस बात की है कि युवा सोशल मीडिया पर उसे भी देख रहा है. उस की हरकतें युवाओं पर गलत इंपैक्ट डाल रही हैं. वह जस्टिस के नाम पर कानून अपने हाथों में लेता है, चाहे वह सही हो या गलत. ऐसा करने का अधिकार उसे किस ने दिया?

चिराग, राहुल और मोदी की दाढ़ी के पीछे का सीक्रेट आया सामने

TALL, DARK और HANDSOME को स्‍मार्ट पुरुष के स्‍केल के रूप में दिखाया गया है. पुरुषों को आकर्षक दिखाने के इस पैमाने में उनकी दाढ़ी का कहीं जिक्र नहीं है. इसके बावजूद आजकल पौलिटिशियन्‍स के बीच दाढ़ी का क्रेज नजर आ रहा है. नेशनल लाइब्रेरी औफ मेडिसिन में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार दाढ़ी पुरुषों को फिजिकली और मेंटली मैच्‍योर दिखाने का काम करती है.

दाढ़ी वाले पौलिटिशयन की निकल पड़ी

चिराग पासवान की तरह उनकी दाढ़ी भी आजकल चर्चा में है. चिराग पासवान के प‍हले राहुल गांधी की दाढ़ी ने भी खूब शोर मचाया. यहां तक कि असम के क्‍लीन शेव सीएम हिमंता बिस्‍वा सरमा पर आरोप भी लगा कि उन्‍होंने दाढ़ी की वजह से कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी की तुलना इराक के तानाशाह सद्दाम हुसैन से कर डाली. बाद में राहुल ने उस लंबी दाढ़ी को छोटा भी कर लिया लेकिन पूरी तरह से वह अभी भी दाढ़ी से बाहर नहीं निकल पाए हैं, इधर जब से लोक जनशक्ति पार्टी के सुप्रीमो ने 5 के 5 सीटों पर जीत हासिल की है, तबसे उनकी दाढ़ी भी लाइमलाइट में चल रही है. आज के युवा नेताओं में दाढ़ी का यह क्रेज थोड़ा अटपटा लगता है, राजीव गांधी हो या अटल बिहारी वाजपेई, नेहरू जी हो या सरदार पटेल यह सभी पुराने लीडर्स का दाढ़ी से दूर दूर तक कोई रिश्‍ता नहीं था, तो आज के यंग पौलिटिशियन्‍स के इस क्रेज का राज क्‍या है ?

घर बसाने के लिए दाढ़ी वाले लड़के ही पसंद 

क्‍वींसलैंड यूनविर्सिटी में एक बहुत ही एक रिसर्च किया गया, जिसके रिजल्‍ट बहुत ही रोचक मिले. इस रिसर्च में महिलाओं क्‍लीनशेव, हल्‍की दाढ़ी यानि स्‍टबल, बड़ी स्‍टबल और लंबी दाढ़ी वाले पुरुषों की फोटोज दिखाई गई. शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन पुरुषों की थोड़ी या ज्‍यादा बड़ी दाढ़ी थी, वो महिलाओं को हसबैंड के लिए परफेक्‍ट नजर आए. जबकि क्‍लीन शेव पुरुष या हल्‍की स्‍टबल रखने वाले लड़कों को महिलाओं ने एक रोमांटिक पार्टनर के रूप में सही माना. बात साफ है कि दाढ़ी वाले पुरुष को महिलाओं ने मैच्‍योर के तौर पर देखा. वहीं इस शोध में क्‍लीन शेव पुरुष हर मामले में कतार में सबसे पीछे दिखे.

विदेशी पौलिटिशियन्‍स भी रहे हैं दाढ़ी

अब्राहम लिंकन हो या बेंजामिन हैरिसन दोनों के बारे में सोचने भर से उनकी दाढ़ी वाली इमेज आंखों के सामने आ जाती है. लेकिन जौर्ज बुश, जौर्ज डब्‍लू बुश, बिल क्लिंटन, बराक ओबामा, डोनाल्‍ड ट्रंप और अब जिल बाइडेन सभी बिना दाढ़ी वाले हैं, जबकि इंडिया में अपनी दाढ़ी की वजह से मोदी को लेकर भी काफी हो हंगामा हुआ. एक बार शशि थरूर ने ट्वीटर पर एक मीम शेयर किया था, जिसमें एक फोटो थी, जिसमें यह दिखाया गया था कि जिस तरह से मोदी की दाढ़ी की लंबाई बढ़ती गई है, उसी तरह से जीडीपी का ग्राफ गिरता गया.

सिर्फ कंगना रनौत ही नहीं, ये सेलिब्रिटिज भी हुए हैं थप्पड़कांड के शिकार

आखिर कंगना को क्यों पड़ा थप्पड़

थप्पड़ मारने का कारण 4 साल पुराना ट्विट है. जी हां, यह ट्विट किसान आंदोलन के दौरान की है. कंगना रनौत ने एक ट्विट किया था, जिसमें उन्होंने कृषि कानूनों के खिलाफ हुए किसान आंदोलन से जुड़े 80 साल की बुजुर्ग महिला की गलत पहचान कर उन्हें बिलकिस बानो बताया था. कंगना ने इस बुजुर्ग महिला की तस्वीर ट्विट करते हुए लिखा था कि ” हा हा, ये वही दादी हैं, जिन्हें टाइम मैगजीन की 100 सबसे प्रभावशाली व्यक्तियों की लिस्ट में शामिल किया गया था और यह 100 रुपये में उपलब्ध हैं.”
उस बुजुर्ग महिला का नाम मोहिंदर कौर है, जो दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में CAA प्रोटेस्ट के दौरान सुर्खियां बटोरी थीं.

मंथरा ने भी खाया है जोरदार थप्पड़

सिर्फ कंगना ही नहीं और भी कई सेलिब्रिटिज थप्पड़ खा चुके हैं.आपको ललिता पवार तो याद ही होंगी, जिन्होंने रामायण में मंथरा का किरदार निभाया था. इसके अलावा कई फिल्मों में भी कठोर सास के रूप में भी दिखी हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं, इस एक्ट्रेस को भी थप्पड़ खाने पड़े थे.

एक फिल्म ‘जंग ए आजादी’ की शूटिंग के दौरान ललिता पवार को चाटा खाना था और जिस एक्टर को चाटा मारना था वो पहली बार एक्टिंग कर रहे थे, ऐसे में उन्हें समझ नहीं आया और उन्होंने जोर से ललिता पवार के मुंह पर थप्पड़ मार दिया. उनकी बाईं आंख की नस भी फट गई थी.

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी पड़े हैं थप्पड़

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को भी थप्पड़ खाने पड़े थे. साल 2019 में रोड शो के दौरान एक शख्स केजरीवाल के गाड़ी के सामने आया और उन्हें थप्पड़ मार कर चला गया. हालांकि अरविंद केजरीवाल के साथ को कई बार बदसलूकी का सामना करना पड़ा है. चुनाव रैली और प्रेस कांफ्रेस के दौरान केजरीवाल पर जूते, चप्पल भी फेंके गए हैं, यहां तक कि सीएम केजरीवाल पर स्याही से भी हमला हुआ है.

माला पहनने के बाद कन्हैया कुमार ने भी खाया है थप्पड़

दिल्ली लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कन्हैया कुमार ने भी थप्पड़ खाया है. एक रिपोर्ट के मुताबिक एक शख्स कन्हैया कुमार को माला पहनाने के बहाने आया और थप्पड़ मारना शुरू कर दिया. उसने कन्हैया पर स्याही भी फेंकी. हालांकि कन्हैया के समर्थकों ने उस शख्स को पकड़ लिया और पिटाई भी की.

शक: ऋतिका घर जाने से क्यों मना करती थी?

ऋतिका हंसमुंख और मिलनसार स्वभाव की तो थी ही, पुरुष सहकर्मियों के साथ भी बेहिचक बात करती थी. साथ काम करने वाली लड़कियों के साथ शौपिंग पर भी चली जाती थी और वहां खानेपीने का बिल भी दे देती थी. लेकिन जब कोई लड़की उसके  घर जाने को कहती थी तो वो मना कर देती थी.

‘‘लगता है इस के घर में जरूर कुछ गड़बड़ है तभी यह नहीं चाहती कि कोई इस के घर आए और यह किसी के घर जाए,’’ आरती बोली.

‘‘मुझे भी यही लगता है, क्योंकि फिल्म देखने या रेस्तरां चलने को कहो तो तुरंत मान जाती है और बिल भरने को भी तैयार रहती है,’’ मीता ने जोड़ा, तो सोनिया और चंचल ने भी सहमति में सिर हिलाया.

‘‘इतनी अटकलें लगाने की क्या जरूरत है?’’ पास बैठे राघव ने कहा, ‘‘ऋतिका बीमार है, इसलिए आप सब उसे देखने के बहाने उस का घर देख आओ.’’

‘‘उस के पापा टैलीफोन विभाग के आला अफसर हैं और शाहजहां रोड की सरकारी कोठी में रहते हैं, इतनी जानकारी तो जाने के लिए काफी नहीं है,’’ मीता ने लापरवाही से कहा.

बात वहीं खत्म हो गई. अगले सप्ताह ऋतिका औफिस आ गई. उस के पैर में मोच आ गई थी, इसलिए चलने में अभी भी दिक्कत हो रही थी. शाम को उसे छुट्टी के बाद भी काम करते देख कर राघव ने कहा, ‘‘मैं ने आप का कोई काम भी पैंडिंग नहीं रहने दिया था, फिर क्यों आप देर तक रुकी हैं?’’

‘‘धन्यवाद राघवजी, मैं काम नहीं नैट सर्फिंग कर रही हूं.’’

‘‘मगर क्यों?’’

‘‘मजबूरी है. चार्टर्ड बस तक चल कर नहीं जा सकती और पापा को लेने आने में अभी देर है.’’

‘‘तकलीफ तो लगता है आप को बैठने में भी हो रही है?’’

‘‘हो तो रही है, लेकिन पापा मीटिंग में व्यस्त हैं, इसलिए बैठना तो पड़ेगा ही.’’

‘‘अगर एतराज न हो तो मेरे साथ चलिए.’’

‘‘इस शर्त पर कि आप चाय पी कर जाएंगे.’’

‘‘ठीक है, अभी और्डर करता हूं.’’

‘‘ओह नो… मेरा मतलब है मेरे घर पर.’’

‘‘इस में शर्त काहे की… किसी के भी घर जाने पर चायनाश्ते के लिए रुकना पड़ता ही है.’’

ऋतिका ने पापा को मोबाइल पर आने को मना कर दिया. फिर राघव के साथ घर पहुंच गई. मां भी विनम्र थीं. कुछ देर बाद ऋतिका के पापा भी आ गए. वे भी राघव को ठीक ही लगे. कुल मिला कर घर या परिवार में कुछ ऐसा नहीं था जिसे ऋतिका किसी से छिपाना चाहे. बातोंबातों में पता चला कि वे लोग कई वर्षों से हैदराबाद में रह रहे थे और उन्हें वह शहर पसंद भी बहुत था.

‘‘इन की तो विभिन्न जिलों में बदली होती रहती थी, लेकिन मैं बच्चों के साथ हमेशा हैदराबाद में ही रही. बहुत अच्छे लोग हैं वहां के… अकेले रहने में कभी कोई परेशानी नहीं हुई,’’ ऋतिका की मां ने बताया.

‘‘यहां तो अभी आप की जानपहचान नहीं हुई होगी?’’ राघव ने कहा.

‘‘पासपड़ोस में हो गई है. वैसे रिश्तेदार बहुत हैं यहां, लेकिन अभी उन से मिले नहीं हैं. ऋतु पत्राचार से एमबीए की पढ़ाई कर रही है, इसलिए औफिस के बाद का सारा समय पढ़ाई में लगाना चाहती है और हम भी इसे डिस्टर्ब नहीं करना चाहते. मिलने के बाद तो आनेजाने का सिलसिला शुरू हो जाएगा न.’’

राघव को ऋतिका की सहेलियों से मेलजोल न बढ़ाने की बात तो समझ आ गई, लेकिन एमबीए करने की बात छिपाने की नहीं.

यह सुन कर कि राघव के मातापिता सऊदी अरब में और बहन अपने पति के साथ सिंगापुर में रहती है और वह यहां अकेला, ऋतिका की मां ने आग्रह किया, ‘‘कभी घर वालों की याद आए तो आ जाया करो बेटा, अच्छा लगेगा तुम्हारा आना.’’

‘‘जी जरूर,’’ कह राघव ऋतिका की ओर मुड़ा, ‘‘आप डिस्टर्ब तो नहीं होंगी न?’’

‘‘कभीकभार कुछ देर के लिए चलेगा,’’ ऋतिका शोखी से मुसकाराई, ‘‘मगर यह एमबीए वाली बात औफिस में किसी को मत बताइएगा प्लीज.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि चंद घंटों की पढ़ाई के बाद सफलता की कोई गारंटी तो होती नहीं तो

क्यों व्यर्थ में ढिंढोरा पीट कर अपना मजाक बनाया जाए. पास हो गई तो पार्टी कर के

बता दूंगी.’’

राघव ने औफिस में किसी को ऋतिका के घर जाने की बात भी नहीं बताई. कुछ दिनों के बाद ऋतिका ने उसे डिनर पर आने को कहा.

‘‘आज मेरे छोटे भाई ऋषभ का बर्थडे है. वह तो आस्ट्रेलिया में पढ़ रहा है, लेकिन मम्मी उस का जन्मदिन मनाना चाहती हैं पकवान बगैरा बना कर… अब उन्हें खाने वाले भी तो चाहिए… आप आ जाएं… पापा के औफिस और पड़ोस के कुछ लोग होंगे… मम्मी खुश हो जाएंगी,’’ ऋतिका ने आग्रह किया.

न जाने का तो सवाल ही नहीं था. ऋतिका ने अन्य मेहमानों से उस का परिचय अपने सहकर्मी के बजाय अपना मित्र कह कर कराया. उसे अच्छा लगा.

अगले सप्ताहांत चंचल ने सभी को बहुत आग्रह से अपने भाई की सगाई में बुलाया तो सब सहर्ष आने को तैयार हो गए.

‘‘माफ करना चंचल, मैं नहीं आ सकूंगी,’’ ऋतिका ने विनम्र परंतु इतने दृढ़ स्वर में कहा

कि चंचल ने तो दोबारा आग्रह नहीं किया,

लेकिन राघव ने मौका मिलते ही अकेले में

कहा, ‘‘अगर आप अकेले जाते हुए हिचक

रही हों तो मुझे आप ने मित्र कहा है, मित्र के साथ चलिए.’’

‘‘मित्र कहा है सो बता देती हूं कि मैं

इस तरह के पारिवारिक समारोहों में कभी

नहीं जाती.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि ऐसे समारोहों में ही सहेलियों की मामियां, चाचियां अपने चहेतों के लिए लड़कियां पसंद करती हैं. सहेलियों के भाई और उन के दोस्त तो ऐसी दावतों में जाते ही लड़कियों को लाइन मारने लगते हैं. वैसे सुरक्षित लड़के भी नहीं हैं, कुंआरी कन्याओं के अभिभावक भी गिद्ध दृष्टि से शिकार का अवलोकन करते हैं.’’

‘‘आप मुझे डरा

रही हैं?’’

‘‘कुछ भी समझ लीजिए… जो सच है वही कह रही हूं.’’

‘‘खैर, कह तो सच रही हैं, फिर भी मुझे तो जाना ही पड़ेगा, क्योंकि औफिस से आप के सिवा सभी जा रहे हैं.’’

कुछ रोज बाद राघव को एक दूसरी कंपनी में अच्छी नौकरी मिल गई. ऋतिका बहुत खुश हुई.

‘‘अब हम जब चाहें मिल सकते हैं… औफिस की अफवाहों का डर तो रहा नहीं.’’

राघव की बढि़या नौकरी मिलने की खुशी और भी बढ़ गई. मुलाकातों का

सिलसिला जल्दी दोस्ती से प्यार में बदल गया और फिर राघव ने प्यार का इजहार भी कर दिया.

ऋतिका ने स्वीकार तो कर लिया, लेकिन इस शर्त के साथ कि शादी सालभर बाद भाई के आस्ट्रोलिया से लौटने पर करेगी. राघव को मंजूर था क्योंकि उस के पिता को भी अनुबंध खत्म होने के बाद ही अगले वर्ष भारत लौटने पर शादी करने में आसानी रहती और वह भी नई नौकरी में एकाग्रता से मेहनत कर के पैर जमा सकता था.

भविष्य के सुखद सपने देखते हुए जिंदगी मजे में कट रही थी कि अचानक उसे टूर पर हैदराबाद जाना पड़ा. औफिस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने उसे वहां अपनी बहन को देने के लिए एक पार्सल दिया.

‘‘मेरी बहन और जीजाजी डाक्टर हैं, उन का अपना नर्सिंगहोम है, इसलिए वे तो कभी दिल्ली आते नहीं किसी आतेजाते के हाथ उन्हें यहां की सौगात सोहन हलवा, गज्जक बगैरा भेज देता हूं. तुम मेरी बहन को फोन कर देना. वे किसी को भेज कर सामान मंगवा लेंगी.’’

मगर राघव के फोन करने पर डा. माधुरी ने आग्रह किया कि वह डिनर उन के साथ करे. बहुत दिन हो गए किसी दिल्ली वाले से मिले हुए… वे उसे लेने के लिए गाड़ी भिजवा देंगी.

माधुरी और उस के पति दिनेश राघव से बहुत आत्मीयता से मिले और दिल्ली के बारे में दिलचस्पी से पूछते रहे कि कहां क्या नया बना है बगैरा. फिर उस के बाद उन्होंने अजनबियों के बीच बातचीत के सदाबहार विषय राजनीति और भ्रष्टाचार पर बात शुरू कर दी.

‘‘कितने भी अनशन और आंदोलन हो जाएं, कानून बन जाएं या सुधार हो जाएं सरकार या सत्ता से जुड़े लोग नहीं सुधरने वाले,’’ माधुरी ने कहा, ‘‘उन के पंख कितने भी कतर दिए जाएं, उन का फड़फड़ाना बंद नहीं होता.’’

‘‘प्रकाश का फड़फड़ाना फिर याद आ गया माधुरी?’’ दिनेश ने हंसते हुए पूछा.

राघव चौंक पड़ा. यह तो ऋतिका के पापा का नाम है. उस ने दिलचस्पी से माधुरी की ओर देखा, ‘‘मजेदार किस्सा लगता है दीदी, पूरी बात बताइए न?’’

माधुरी हिचकिचाई, ‘‘पेशैंट से बातचीत गोपनीय होती है, मगर वे मेरे पेशैंट नहीं थे,

2-3 साल पुरानी बात है और फिर आप तो इस शहर के हैं भी नहीं. एक साहब मेरे पास अबौर्शन का केस ले कर आए. पर मेरे यह कहने पर कि हमारे यहां यह नहीं होता उन्होंने कहा कि अब तो और कुछ भी नहीं हो सकेगा, क्योंकि वे टैलीफोन विभाग में चीफ इंजीनियर हैं. मैं ने बड़ी मुश्किल से हंसी रोक कर उन्हें बताया कि हमारे यहां तो प्राय सभी फोन, रिलायंस और टाटा इंडिकौम के हैं, सरकारी फोन अगर है भी तो खराब पड़ा होगा. उन की शक्ल देखने वाली थी. मगर फिर भी जातेजाते अन्य सरकारी विभागों में अपनी पहुंच की डुगडुगी बजा कर मुझे डराना नहीं भूले.’’

तभी नौकर खाने के लिए बुलाने आ गया. खाना बहुत बढि़या था और उस से भी ज्यादा बढि़या था स्नेह, जिस से मेजबान उसे खाना खिला रहे थे. लेकिन वह किसी तरह कौर निगल रहा था.

होटल के कमरे में जाते ही वह फूटफूट कर रो पड़ा कि क्यों हुआ ऐसा उस के साथ? क्यों भोलीभाली मगर संकीर्ण स्पष्टवादी ऋतिका ने उस से छिपाया अपना अतीत? वह संकीर्ण मानसिकता वाला नहीं है.

जवानी में सभी के कदम बहक जाते हैं. अगर ऋतिका उसे सब सच बता

देती तो वह उसे सहजता से सब भूलने को कह कर अपना लेता. ऋतिका के परिवार का रिश्तेदारों से न मिलनाजुलना, ऋतिका का सहेलियों के घर जाने से कतराना और उन के परिवार के लिए सटीक टिप्पणी करना, डा. माधुरी के कथन की पुष्टि करता था.

लौटने पर राघव अभी तय नहीं कर पाया था कि ऋतिका से कैसे संबंधविच्छेद करे. इसी बीच अकाउंट्स विभाग ने याद दिलाया कि अगर उस ने कल तक अपने पुराने औफिस का टीडीएस दाखिल नहीं करवाया तो उसे भारी इनकम टैक्स भरना पड़ेगा.

राघव ने तुरंत अपने पुराने औफिस से संपर्क किया. संबंधित अधिकारी से उस की अच्छी जानपहचान थी और उस ने छूटते ही कहा कि तुम्हारे कागजात तैयार हैं, आ कर ले जाओ. पुराने औफिस जाने का मतलब था ऋतिका से सामना होना जो राघव नहीं चाहता था.

‘‘औफिस के समय में कैसे आऊं नमनजी, आप किसी के हाथ भिजवा दो न प्लीज.’’

‘‘आज तो मुमकिन नहीं है और कल का भी वादा नहीं कर सकता. वैसे मैं तो आजकल 7 बजे तक औफिस में रहता हूं, अपने औफिस के बाद आ जाना.’’

राघव को यह उचित लगा, क्योंकि ऋतिका 5 बजे की चार्टर्ड बस से चली जाएगी. अत: उस के बाद वह इतमीनान से नमनजी के पास जा सकता है.

6 बजे के बाद नमनजी कागज ले कर जब वह लौट रहा था तो लिफ्ट का इंतजार करती ऋतिका मिल गई.

‘‘तुम अभी तक घर नहीं गईं?’’ वह पूछे बगैर नहीं रह सका.

‘‘एक प्रोजैक्ट रिपोर्ट पूरी करने के चक्कर में रुकना पड़ा. लेकिन तुम कहां गायब थे रविवार के बाद से?’’

‘‘सोम की शाम को अचानक टूर पर हैदराबाद जाना पड़ गया, आज ही लौटा हूं.’’

‘‘अच्छा किया जाने से पहले घर नहीं आए वरना मम्मी न जाने कितने पार्सल पकड़ा देतीं अपनी सखीसहेलियों के लिए.’’

‘‘पार्सल तो फिर भी ले कर गया था बड़े साहब की बहन डा. माधुरी के लिए,’’ राघव ने पैनी दृष्टि से ऋतिका को देखा, ‘‘तुम तो जानती होगी डा. माधुरी को?’’

ऋतिका के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया और वह लापरवाही से कंधे झटक कर बोली, ‘‘कभी नाम भी नहीं सुना. पापा को फोन कर दूं कि वे सीधे घर चले जाएं मैं तुम्हारे साथ आ रही हूं. पहले कहीं कौफी पिलाओ, फिर घर चलेंगे.’’

राघव मना नहीं कर सका और फिर घर पर डा. माधुरी का नाम बता कर प्रकाश और रमा की प्रतिक्रिया देखने की जिज्ञासा भी थी.

रमा के चेहरे पर तो डा. माधुरी का नाम सुन कर कोई भाव नहीं आया, मगर प्रकाश जरूर सकपका सा गए. रमा के आग्रह के बावजूद

राघव खाने के लिए नहीं रुका और यह पूछने

पर कि फिर कब आएगा उस ने कुछ नहीं कहा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि मांबेटी सफल अदाकारा की तरह डा. माधुरी को न

जानने का नाटक कर रही थीं या उन्हें बगैर कुछ बताए प्रकाश साहब अबौर्शन की व्यवस्था करने गए थे.

कुछ भी हो ऋतिका को निर्दोष तो नहीं कहा जा सकता. लेकिन चुपचाप सब

बरदाश्त भी तो नहीं हो सकता. यह भी अच्छा ही था कि अभी न तो सगाई हुई थी और न इस बारे में परिवार के अलावा किसी और को पता था, इसलिए धीरेधीरे अवहेलना कर के किनारा कर सकता है. रात इसी उधेड़बुन में कट गई.

सुबह वह अखबार ले कर बरामदे में बैठा ही था कि प्रकाश की गाड़ी घर के सामने रुकी. उन का आना अप्रत्याशित तो नहीं था, मगर इतनी जल्दी आने की संभावना भी नहीं थी.

‘‘रात तो खैर अपनी थी जैसेतैसे काट ली, लेकिन दिन को तो तुम्हें भी काम करना है और मुझे भी और उस के लिए मन का स्थिर होना जरूरी है, इसलिए औफिस जाने से पहले तुम से बात करने आया हूं,’’ प्रकाश ने बगैर किसी भूमिका के कहा, ‘‘यहीं बैठेंगे या अंदर चलें?’’

‘‘अंदर चलिए अंकल,’’ राघव विनम्रता से बोला और फिर नौकर को चाय लाने को कहा.

‘‘मैं नहीं जानता डा. माधुरी ने तुम से क्या कहा, मगर जो भी कहा होगा उसे सुन कर तुम्हारा विचलित होना स्वाभाविक है,’’ प्रकाश ने ड्राइंगरूम में बैठते हुए कहा, ‘‘और यह सोचना भी कि तुम से यह बात क्यों छिपाई गई. वह इसलिए कि किसी की जिंदगी के बंद परिच्छेद बिना वजह खोलना न मुझे पसंद है और न ऋतु को. मैं ने अपनी भतीजी रुचि को हैदराबाद में एक सौफ्टवेयर कंपनी में जौब दिलवाई थी. वह हमारे साथ ही रहती थी.

‘‘सौफ्टवेयर टैकीज के काम के घंटे तो असीमित होते हैं, इसलिए हम ने रुचि के देरसवेर आने पर कभी रोक नहीं लगाई और इस गलती का एहसास हमें तब हुआ जब रुचि ने बताया कि वह मां बनने वाली है, उस की सहेली का भाई उस से शादी करने को तैयार है, लेकिन कुछ समय यानी पैसा जोड़ने के बाद, क्योंकि उस की जाति में दहेज की प्रथा है और उस के मातापिता बगैर दहेज के विजातीय लड़की से उसे कभी शादी नहीं करने देंगे. पैसा जोड़ कर वह मांबाप को दहेज दे देगा.

‘‘फिलहाल रुचि को गर्भपात करवाना पड़ेगा. हम भी नहीं चाहते थे कि रुचि के मातापिता को इस बात का पता चले. अत: मैं ने गर्भपात करवाने की जिम्मेदारी ले ली. जिन अच्छे डाक्टरों से संपर्क किया उन्होंने साफ मना कर दिया और झोला छाप डाक्टरों से मैं यह काम करवाना नहीं चाहता था. बहुत परेशान थे हम लोग. तब हमें परेशानी से उबारा ऋतु और ऋषभ ने.

‘‘ऋतु को आईआईएम अहमदाबाद में एमबीए में दाखिला मिल गया था और ऋषभ भी अमेरिका जाने की तैयारी कर रहा था. दोनों ने कहा कि जो पैसा हम ने उन की पढ़ाई पर लगाना है, उसे हम रुचि को दहेज में दे कर उस की शादी तुरंत प्रशांत से कर दें. और कोई चारा भी नहीं था. मुझ में अपने भाईभाभी की नजरों में गिरने और लापरवाह कहलवाने की हिम्मत नहीं थी. अत: इस के लिए मैं ने अपने बच्चों का भविष्य दांव पर लगा दिया.

‘‘खैर, रुचि की शादी हो गई, बच्चा भी हो गया और उस के बाद दोनों को ही बैंगलुरु में बेहतर नौकरी भी मिल गई. ऋतु ने भी पत्राचार से एमबीए कर लिया और ऋषभ भी आस्ट्रेलिया चला गया. इस में रुचि और प्रशांत ने भी उस की सहायता करी.’’

‘‘मगर मेरा हैदराबाद में रहना मुश्किल हो गया. लगभग सभी नामीगिरामी डाक्टरों के पास मैं गया था और उन सभी से गाहेबगाहे क्लब या किसी समारोह में आमनासामना हो जाता था. वे मुझे जिन नजरों से देखते थे उन्हें मैं सहन नहीं कर पाता था. मैं ने कोशिश कर के दिल्ली बदली करवा ली. सोचा था वह प्रकरण खत्म हो गया. लेकिन वह तो लगता है मेरी बेटी की ही खुशियां छीन लेगा.

‘‘तुम्हें मेरी कहानी मनगढं़त लगी हो तो मैं रुचि को यहां बुला लेता हूं. उस के बच्चे की उम्र और डा. माधुरी की बताई तारीखों से सब बात स्पष्ट हो जाएगी.’’

‘‘इस सब की कोई जरूरत नहीं है पापा.’’

अभी तक अंकल कहने वाले राघव के ऋतिका की तरह पापा कहने से प्रकाश को लगा कि राघव के मन में अब कोई शक नहीं है.

मेरी दादीसास काफी बुजुर्ग हैं, उन्हें खाने में क्या दूं ?

सवाल

मैं और मेरे पति बेंगलुरु में रहते हैं. मेरे सासससुर दिल्ली में रहते हैं. उन्हीं के साथ मेरी दादीसास भी रहती हैं. बुजुर्ग दादीसास मेरे पति से बहुत स्नेह रखती हैं. मेरे पति भी अपनी दादी से बहुत प्यार करते हैं. बहुत दिन से जिद कर रहे हैं कि वे दादी को अपने पास कुछ महीनों के लिए लेकर आएंगे. उन की खुशी मेरे पति के लिए बहुत माने रखती है. मुझे कोई दिक्कत नहीं है, बल्कि मुझे भी खुशी होगी पर मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि मैं उन के खानेपीने का कैसा खयाल रखूं. कैसा हैल्दी फूड उन्हें दूं जो उन्हें खाने में अच्छा भी लगे और वे खुश रहें?

जवाब

यह अच्छी बात है कि आप अपनी दादीसास के बारे में इतना कुछ सोच रही हैं. आप यह सोचें कि जैसे घर में कोई बच्चा आता है तो हमें उस का ध्यान रखना पड़ता है, उसी प्रकार घर के बुजुर्गों का भी काफी खास ध्यान रखना पड़ता है.

बुजुर्गों को खाने में कुछ भी नहीं दे सकते. देखना पड़ता है कि उन्हें ऐसी चीजें दें जो वे आसानी से चबा सकें क्योंकि उन के दांत कमजोर हो चुके होते हैं या नकली लगे होते हैं या फिर नहीं भी होते.

फिलहाल आप की दादीसास की क्या स्थिति है, आप जानती होंगी. हम आप की इतनी मदद कर सकते हैं कि उन्हें खाने में क्याक्या दे सकती हैं जो स्वादिष्ठ भी हो और हैल्दी भी. दलिया एक ऐसी चीज है जो नाश्ते और खाने दोनों समय खा सकते हैं. दूध वाला दलिया या नमकीन सब्जियों वाला दलिया भी बना कर उन्हें दे सकती हैं.

सूप ऐसी चीज है जिसे चबाना नहीं पड़ता और इस से पेट भी भर जाता है. टमाटर या मिक्स वैजिटेबल सूप उन्हें बना कर दे सकती हैं. मूंग की दाल का चीला उन्हें चटनी के साथ दें, वे मन से खाएंगी. साउथ इंडियन फूड सभी पसंद करते हैं. उन्हें इडली, उपमा, उत्तपम बना कर दे सकती हैं. ढोकला, खांडवी मुलायम होते हैं. घर में आसानी से बन भी जाते हैं. मीठे में उन्हें कभीकभी सूजी का हलवा, स्मूथी, खीर, कस्टर्ड बना कर दे सकती हैं. उन का खानेपीने का ध्यान रखने के साथसाथ उन के साथ बैठिए, बातें कीजिए, उन की दवाई, सेहत के बारे में पूछते रहिए. बुजुर्ग यही सब चाहते हैं. इसी में वे खुश रहते हैं.

 

संयुक्त परिवार में रहने के ये हैं लाभ

संयुक्त परिवार में रहने के लाभ:

1. चीजें शेयर करने की आदत

सयुंक्त परिवार में रहना कई तरह से फायदेमंद साबित होता है. यहां आप चीजों को शेयर करना सीखते हो. चाहे खाना हो, रूम हो, खिलौने हो, कार हो या आलमारी, आप अपनी चीज़ें दूसरों के साथ बांट कर आनंद लेने का हुनर बचपन से ही सीख जाते हो. आप को इस का फायदा भी मिलता है. यदि कोई चीज़ जो जरुरी है और आप के पास नहीं वह घर के दुसरे सदस्य के जरिये आसानी से उपलब्ध हो जाती है. कभीकभी जीवन का ऐसा दौर भी आता है जब आर्थिक परेशानी आप का रास्ता रोकने को तैयार हो जाता है. ऐसे समय में भी सयुक्त परिवार की बदौलत आप परेशानियों से आसानी से उबर सकते हैं.

2. बरबादी कम होती है.

एक शोध की मानें तो जो लोग अकेले रहते हैं वे संसाधनों की बर्बादी 50 % तक ज्यादा करते हैं. एक साथ रहने का सब से अधिक फायदा यह है कि आप संसाधनों को बर्बाद नहीं करते। जो लोग अकेले रहते हैं वे बिजली, पानी, गैस जैसी चीज़ें भी अधिक खर्च करते हैं। उन्हें अधिक किराया देना पड़ता है और हर चीज़ अलग से खरीदनी पड़ती है. यदि घर में कई लोग होते हैं और आपस में खर्चे भी बांट लेते हैं जिस से ओसत रूप से कम पैसे खर्च होते हैं। जाहिर है मनी मैनेजमेंट संयुक्त परिवार में अधिक देखने को मिलता है.

3. कम तनाव

अकेले रहने वालों को जीवन में अधिक तनाव का सामना करना होता है, जबकि संयुक्त परिवार में लोग अधिक खुशहाल रहते हैं। ए‍क साथ रहने का यह भी फायदा है कि आप अधिक हेल्दी और हैप्पी रहते हैं। क्यों कि आप अपने दुःख दर्द दूसरों से बाँट पाते हैं. दुःख के समय किसी अपने का साथ और सर पर प्यार भरा हाथ बहुत मायने रखता है.

4. सेफ्टी वौल्व

सयुंक्त परिवारों में अगर पति बेवफाई की ओर बढ़ता है या फिर वह पत्नी से मारपीट करता है तो ऐसे में घर के बाकी सदस्य पति को उस की गलत हरकतो के लिए समझाता है। ऐसे में परिवार महिलाओं के लिए एक तरह से सेफ्टी वौल्व की तरह काम करता है।

5. बच्चों के पालनपोषण में मदगार

बच्चों के पालनपोषण के लिए संयुक्त परिवार का माहौल अच्छा माना जाता है.बच्चे कब दादादादी बुआ चाचा के हाथों पल जाते है पता ही नहीं चलता. बच्चे के मानसिक विकास क्व लिए भी भरा पूरा परिवार अच्छा साबित होता है.

कैसे निभाएं सयुंक्त परिवार में

1. परिवार में एकदूसरे के प्रति प्यार और लगाव बना रहे इस के लिए सब से जरुरी है कि हम अपने बच्चों को बड़ों की इज़्ज़त करना सिखाएं। यह बात केवल बच्चों पर ही लागू नहीं होती बल्कि घर के बड़ों को भी इस बात का ख़याल रखना चाहिए कि वे अपने से बड़ों को पूरा सम्मान दे ताकि परिवार की कड़ियाँ आपस में जुड़ी रहे.

2. बच्चों के सामने कभी भी किसी से भी बद्तमीज़ी से या चिल्लाचिल्ला कर बात न करें। बच्चे वैसा ही सीखते हैं जैसा उन्हें घर का माहौल मिलता है. अपने बच्चों को सदैव बुज़ुर्गों के प्रति विनम्र और छोटे बच्चों के प्रति संवेदनशील होना सिखाएंऔर खुद भी ऐसा ही व्यवहार करें.

3. एकल परिवार में बच्चों को जरुरत से ज्यादा लाड़प्यार मिलता है जिस से वे कई बार ज़िद्दी हो जाते हैं. जितना हो सके अपने बच्चों को ज़मीन से जुड़े रहना सिखाएं।

4. बच्चों को अपने बचपन की कहानियां सुनाते हुए यह अहसास दिलाने का प्रयास करें कि कैसे आप खाने से ले कर कपड़ों तक को भाईबहनों के साथ साझा किया करते थे. इस से आप के बच्चे भी अपने चचेरे भाईबहनों के साथ प्रेमपूर्वक रहना सीखेंगे.

अगर आप हैं घर की बहू

अगर आप एक संयुक्त परिवार की बहू हैं तो आप को कुछ बातों का ख़याल जरूर रखना चाहिए तभी आप पूरे घर को बाँध कर रख सकेंगी और सब का प्यार पा सकेंगी ;

यदि किचन में आप की सास, देवरानी या जेठानी खाना बना रही हैं तो आप को उन की मदद जरूर करनी चाहिए. भले ही आप ऑफिस से थक कर आई हों या कहीं और बाहर से आ रही हों. कम से कम सामान्य शिष्टाचार के नाते ही सहयोग देने की पेशकश जरूर करें. स्वाभाविक है कि ऐसे में वे मना ही करेंगी लेकिन ऐसा करने पर आप के प्रति उन का रवैया जरूर और भी सकारात्मक और प्रेमपूर्ण हो जाएगा. आप की यह छोटी सी कोशिश परिवार के प्रति आप को जिम्मेदार दिखायेगा.

यदि घर में किसी बच्चे का बर्थडे है या कोई अच्छा रिजल्ट ले कर आया है तो आप का दायित्व बनता है कि आप उसे इस अवसर पर बधाई दें और उस की हौसलाअफजाई करें. घर में हो रहे छोटेमोटे उत्सवों के मौके पर घरभर में अपने प्रयासों से ख़ुशी की लहर फैलाएं.

अगर आप को घर के काम नहीं आते है तो घर की महिलाओं से वक्त मिलने पर बात करें, उन से घर के काम सीखने का प्रयास करें. ऐसा करते समय अपने मन में किसी भी तरह की हिचकिचाहट न रखें.

घर में होने वाले कामों, फैसलों पर खुल कर अपनी राय दें. उन्हें साफ़ तौर पर बताएं कि आप क्या चाहती हैं न कि बाद में पति से शिकायतबाजी करें.

अपने सासससुर के स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहें। घर में कोई बीमार हो तो हर संभव उस की मदद करें. ऐसी बातें न सिर्फ आप के पति को आकर्षित करेंगी बल्कि घर का हर सदस्य आप का दीवाना हो जाएगा.

बस तुम्हारी हां की देर है

अपनीशादी की बात सुन कर दिव्या फट पड़ी. कहने लगी, ‘‘क्या एक बार मेरी जिंदगी बरबाद कर के आप सब को तसल्ली नहीं हुई जो फिर से… अरे छोड़ दो न मुझे मेरे हाल पर. जाओ, निकलो मेरे कमरे से,’’ कह कर उस ने अपने पास पड़े कुशन को दीवार पर दे मारा.

नूतन आंखों में आंसू लिए कुछ न बोल कर कमरे से बाहर आ गई. आखिर उस की इस हालत की जिम्मेदार भी तो वे ही थे. बिना जांचतड़ताल किए सिर्फ लड़के वालों की हैसियत देख कर उन्होंने अपनी इकलौती बेटी को उस हैवान के संग बांध दिया. यह भी न सोचा कि आखिर क्यों इतने पैसे वाले लोग एक साधारण परिवार की लड़की से अपने बेटे की शादी करना चाहते हैं? जरा सोचते कि कहीं दिव्या के दिल में कोई और तो नहीं बसा है… वैसे दबे मुंह ही, पर कितनी बार दिव्या ने बताना चाहा कि वह अक्षत से प्यार करती है, लेकिन शायद उस के मातापिता यह बात जानना ही नहीं चाहते थे.

अक्षत और दिव्या एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों अंतिम वर्ष के छात्र थे. जब कभी अक्षत दिव्या के संग दिख जाता, नूतन उसे ऐसे घूर कर देखती कि बेचारा सहम उठता. कभी उस की हिम्मत ही नहीं हुई यह बताने की कि वह दिव्या से प्यार करता है पर मन ही मन दिव्या की ही माला जपता रहता था और दिव्या भी उसी के सपने देखती रहती थी.

‘‘नीलेश अच्छा लड़का तो है ही, उस की हैसियत भी हम से ऊपर है. अरे, तुम्हें तो खुश होना चाहिए जो उन्होंने अपने बेटे के लिए तुम्हारा हाथ मांगा, वरना क्या उन के बेटे के लिए लड़कियों की कमी है इस दुनिया में?’’

दिव्या के पिता मनोहर ने उसे समझाते हुए कहा था, पर एक बार भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि दिव्या मन से इस शादी के लिए तैयार है भी या नहीं.

मांबाप की मरजी और समाज में उन की नाक ऊंची रहे, यह सोच कर भारी मन से ही सही पर दिव्या ने इस रिश्ते के लिए हामी भर दी. वह कभी नहीं चाहेगी कि उस के कारण उस के मातापिता दुखी हों. कहने को तो लड़के वाले बहुत पैसे वाले थे लेकिन फिर भी उन्होंने मुंहमांगा दहेज पाया.

‘अब हमारी एक ही तो बेटी है. हमारे बाद जो भी है सब उस का ही है. तो फिर क्या हरज है अभी दें या बाद में’ यह सोच कर मनोहर और नूतन उन की हर डिमांड पूरी करते रहे, पर उन में तो संतोष नाम की चीज ही नहीं थी. अपने नातेरिश्तेदार को वे यह कहते अघाते नहीं थे कि उन की बेटी इतने बड़े घर में ब्याह रही है. लोग भी सुन कर कहते कि भई मनोहर ने तो इतने बड़े घर में अपनी बेटी का ब्याह कर गंगा नहा ली. दिल पर पत्थर रख दिव्या भी अपने प्यार को भुला कर ससुराल चल पड़ी. विदाई के वक्त उस ने देखा एक कोने में खड़ा अक्षत अपने आंसू पोंछ रहा था.

ससुराल पहुंचने पर नववधू का बहुत स्वागत हुआ. छुईमुई सी घूंघट काढ़े हर दुलहन की तरह वह भी अपने पति का इंतजार कर रही थी. वह आया तो दिव्या का दिल धड़का और फिर संभला भी़  लेकिन सोचिए जरा, क्या बीती होगी उस लड़की पर जिस की सुहागरात पर उस का पति यह बोले कि वह उस के साथ सबंध बनाने में सक्षम नहीं है और वह इस बात के लिए उसे माफ कर दे.

सुन कर धक्क रह गया दिव्या का कलेजा. आखिर क्या बीती होगी उस के दिल पर जब उसे यह पता चला कि उस का पति नामर्द है और धोखे में रख कर उस ने उसे ब्याह लिया?

पर क्यों, क्यों जानबूझ कर उस के साथ ऐसा किया गया? क्यों उसे और उस के परिवार को धोखे में रखा गया? ये सवाल जब उस ने अपने पति से पूछे तो कोई जवाब न दे कर वह कमरे से बाहर चला गया. दिव्या की पूरी रात सिसकतेसिसकते ही बीती. उस की सुहागरात एक काली रात बन कर रह गई.

सुबह नहाधो कर उस ने अपने बड़ों को प्रमाण किया और जो भी बाकी बची रस्में थीं, उन्हें निभाया. उस ने सोचा कि रात वाली बात वह अपनी सास को बताए और पूछे कि क्यों उस के जीवन के साथ खिलवाड़ किया गया? लेकिन उस की जबान ही नहीं खुली यह कहने को. कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे कि करे तो करे क्या, क्योंकि रिसैप्शन पर भी सब लोगों के सामने नीलेश उस के साथ ऐसे बिहेव कर रहा था जैसे उन की सुहागरात बहुत मजेदार रही. हंसहंस कर वह अपने दोस्तों को कुछ बता रहा था और वे चटकारे लेले कर सुन रहे थे. दिव्या समझ गई कि शायद उस के घर वालों को नीलेश के बारे में कुछ पता न हो. उन सब को भी उस ने धोखे में रखा हुआ होगा.

पगफेर पर जब मनोहर उसे लिवाने आए और पूछने पर कि वह अपनी ससुराल में खुश है, दिव्या खून का घूंट पी कर रह गई. फिर उस ने वही जवाब दिया जिस से मनोहर और नूतन को तसल्ली हो.

एक अच्छे पति की तरह नीलेश उसे उस के मायके से लिवाने भी आ गया. पूरे सम्मान के साथ उस ने अपने साससुसर के पांव छूए और कहा कि वे दिव्या की बिलकुल चिंता न करें, क्योंकि अब वह उन की जिम्मेदारी है. धन्य हो गए थे मनोहर और नूतन संस्कारी दामाद पा कर. लेकिन उन्हें क्या पता कि सचाई क्या है? वह तो बस दिव्या ही जानती थी और अंदर ही अंदर जल रही थी.

दिव्या को अपनी ससुराल आए हफ्ते से ऊपर का समय हो चुका था पर इतने दिनों में एक बार भी नीलेश न तो उस के करीब आया और न ही प्यार के दो बोल बोले, हैरान थी वह कि आखिर उस के साथ हो क्या रहा है और वह चुप क्यों है. बता क्यों नहीं देती सब को कि नीलेश ने उस के साथ धोखा किया है? लेकिन किस से कहे और क्या कहे, सोच कर वह चुप हो जाती.

एक रात नींद में ही दिव्या को लगा कि कोई उस के पीछे सोया है. शायद नीलेश है, उसे लगा लेकिन जिस तरह से वह इंसान उस के शरीर पर अपना हाथ फिरा रहा था उसे शंका हुई. जब उस ने लाइट जला कर देखा तो स्तब्ध रह गई, क्योंकि वहां नीलेश नहीं बल्कि उस का पिता था जो आधे कपड़ों में उस के बैड पर पड़ा उसे गंदी नजरों से घूर रहा था.

‘‘आ…आप, आप यहां मेरे कमरे में… क… क्या, क्या कर रहे हैं पिताजी?’’ कह कर वह अपने कपड़े ठीक करने लगी. लेकिन जरा उस का ढीठपन तो देखो, उस ने तो दिव्या को खींच कर अपनी बांहों में भर लिया और उस के साथ जबरदस्ती करने की कोशिश करने लगा. दिव्या को अपनी ही आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि उस का ससुर ही उस के साथ…

‘‘मैं, मैं आप की बहू हूं. फिर कैसे आप मेरे साथ…’’ वह डर के मारे हकलाते हुए बोली.

‘‘ बहू,’’ ठहाके मार कर हंसते हुए वह बोला, ‘‘क्या तुम्हें पता नहीं है कि तुम्हें मुझ से ही वारिस पैदा करना है और इसीलिए ही तो हम तुम्हें इस घर में बहू बना कर लाए हैं.’’

सुन कर दिव्या को लगा जैसे किसी ने उस के कानों में पिघला शीशा डाल दिया हो. वह कहने लगी, ‘‘यह कैसी पागलों सी बातें कर रहे हैं आप? क्या शर्मोहया बेच खाई है?’’

पर वह कहां कुछ सुननेसमझने वाला था. फिर उस ने दिव्या के ऊपर झपट्टा मारा. लेकिन उस ने अपनेआप को उस दरिंदे से बचाने के लिए जैसे ही दरवाजा खोला, सामने ही नीलेश और उस की मां खड़े मिले. घबरा कर वह अपनी सास से लिपट गई और रोते हुए कहने लगी कि कैसे उस के ससुर उस के साथ जबरदस्ती करना चाह रहे हैं… उसे बचा ले.

‘‘बहुत हो चुका यह चूहेबिल्ली का खेल… कान खोल कर सुन लो तुम कि ये सब जो हो

रहा है न वह सब हमारी मरजी से ही हो रहा है और हम तुम्हें इसी वास्ते इस घर में बहू बना कर लाए हैं. ज्यादा फड़फड़ाओ मत और जो हो रहा है होने दो.’’

अपनी सास के मुंह से भी ऐसी बात सुन कर दिव्या का दिमाग घूम गया. उसे लगा वह बेहोश हो कर गिर पड़ेगी. फिर अपनेआप को संभालते हुए उस ने कहा, ‘‘तो क्या आप को भी पता है कि आप का बेटा…’’

‘‘हां और इसीलिए तो तुम जैसी साधारण लड़की को हम ने इस घर में स्थान दिया वरना लड़कियों की कमी थी क्या हमारे बेटे के लिए.’’

‘‘पर मैं ही क्यों… यह बात हमें बताई, क्यों नहीं गईं. ये सारी बातें शादी के पहले…

क्यों धोखे में रखा आप सब ने हमें? बताइए, बताइए न?’’ चीखते हुए दिव्या कहने लगी, ‘‘आप लोगों को क्या लगता है मैं यह सब चुपचाप सहती रहूंगी? नहीं, बताऊंगी सब को तुम सब की असलियत?’’

‘‘क्या कहा, असलियत बताएगी? किसे? अपने बाप को, जो दिल का मरीज है…सोच अगर तेरे बाप को कुछ हो गया तो फिर तेरी मां का क्या होगा? कहां जाएगी वह तुझे ले कर? दुनिया को तो हम बताएंगे कि कैसे आते ही तुम ने घर के मर्दों पर डोरे डलने शुरू कर दिए और जब चोरी पकड़ी गई तो उलटे हम पर ही दोष मढ़ रही है,’’ दिव्या के बाल खींचते हुए नीलेश कहने लगा, ‘‘तुम ने क्या सोचा कि तू मुझे पसंद आ गई थी, इसलिए हम ने तुम्हारे घर रिश्ता भिजवाया था? देख, करना तो तुम्हें वही पड़ेगा जो हम चाहेंगे, वरना…’’ बात अधूरी छोड़ कर उस ने उसे उस के कमरे से बाहर निकाल दिया.

पूरी रात दिव्या ने बालकनी में रोते हुए बिताई. सुबह फिर उस की सास कहने लगी, ‘‘देखो बहू, जो हो रहा है होने दो… क्या फर्क पड़ता है कि तुम किस से रिश्ता बना रही हो और किस से नहीं. आखिर हम तो तुम्हें वारिस जनने के लिए इस घर में बहू बना कर लाए हैं न.’’

इस घर और घर के लोगों से घृणा होने लगी थी दिव्या को और अब एक ही सहारा था उस के पास. उस के ननद और ननदोई. अब वे ही थे जो उसे इस नर्क से आजाद करा सकते थे. लेकिन जब उन के मुंह से भी उस ने वही बातें सुनीं तो उस के होश उड़ गए. वह समझ गई कि उस की शादी एक साजिश के तहत हुई है.

3 महीने हो चुके थे उस की शादी को. इन 3 महीनों में एक दिन भी ऐसा नहीं गया जब दिव्या ने आंसू न बहाए हों. उस का ससुर जिस तरह से उसे गिद्ध दृष्टि से देखता था वह सिहर उठती थी. किसी तरह अब तक वह अपनेआप को उस दरिंदे से बचाए थी. इस बीच जब भी मनोहर अपनी बेटी को लिवाने आते तो वे लोग यह कह कर उसे जाने से रोक देते कि अब उस के बिना यह घर नहीं चल सकता. उन के कहने का मतलब था कि वे लोग दिव्या को बहुत प्यार करते हैं. इसीलिए उसे कहीं जाने नहीं देना चाहते हैं.

मन ही मन खुशी से झूम उठते मनोहर यह सोच कर कि उन की बेटी का उस घर में कितना सम्मान हो रहा है. लेकिन असलियत से वे वाकिफ नहीं थे कि उन की बेटी के साथ इस घर में क्याक्या हो रहा है…दिव्या भी अपने पिता के स्वास्थ्य के साथ कोई समझौता नहीं करना चाहती थी, इसलिए चुप थी. लेकिन उस रात तो हद हो गई जब उसे उस के ससुर के साथ एक कमरे में बंद कर दिया गया. वह चिल्लाती रही पर किसी ने दरवाजा नहीं खोला. क्या करती बेचारी? उठा कर फूलदान उस दरिंदे के सिर पर दे मारा और जब उस के चिल्लाने की आवाजों से वे सब कमरे में आए तो वह सब की नजरें बचा कर घर से भाग निकली.

अपनी बेटी को यों अचानक अकेले और बदहवास अवस्था में देख कर मनोहर और नूतन हैरान रह गए, फिर जब उन्हें पूरी बात का पता चली तो जैसे उन के पैरों तले की जमीन ही खिसक गई. आननफानन में वे अपनी बेटी की ससुराल पहुंच गए और जब उन्होंने उन से अपनी बेटी के जुल्मों का हिसाब मांगा और कहा कि क्यों उन्होंने उन्हें धोखे में रखा तो वे उलटे कहने लगे कि ऐसी कोई बात नहीं. उन्होंने ही अपनी पागल बेटी को उन के बेटे के पल्ले बांध दिया. धोखा तो उन के साथ हुआ है.

‘‘अच्छा तो फिर ठीक है, आप अपने बेटे की जांच करवाएं कि वह नपुंसक है या नहीं और मैं भी अपनी बेटी की दिमागी जांच करवाता हूं. फिर तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा न? तुम लोग क्या समझे कि हम चुप बैठ जाएंगे? नहीं, इस भ्रम में मत रहना. तुम सब ने अब तक मेरी शालीनता देखी है पर अब मैं तुम्हें दिखाऊंगा कि मैं क्या कर सकता हूं. चाहे दुनिया की सब से बड़ी से बड़ी अदालत तक ही क्यों न जाना पड़े हमें, पर छोड़ूंगा नहीं…तुम सब को तो जेल होगी ही और तुम्हारा बाप, उसे तो फांसी न दिलवाई मैं ने तो मेरा भी नाम मनोहर नहीं,’’ बोलतेबोलते मनोहर का चेहरा क्रोध से लाल हो गया.

मनोहर की बातें सुन कर सब के होश उड़ गए, क्योंकि झूठे और गुनहगार तो वे लोग थे ही अत: दिन में ही तारे नजर आने लगे उन्हें.

‘‘क्या सोच रहे हो रोको उसे. अगर वह पुलिस में चला गया तो हम में से कोई नहीं बचेगा और मुझे फांसी पर नहीं झूलना.’’ अपना पसीना पोछते हुए नीलेश के पिता ने कहा.

उन लोगों को लगने लगा कि अगर यह बात पुलिस तक गई तो इज्जत तो जाएगी ही, उन का जीवन भी नहीं बचेगा. बहुत गिड़गिड़ाने पर कि वे जो चाहें उन से ले लें, जितने मरजी थप्पड़ मार लें, पर पुलिस में न जाएं.

‘कहीं पुलिसकानून के चक्कर में उन की बेटी का भविष्य और न बिगड़ जाए,’ यह सोच कर मनोहर को भी यही सही लगा, लेकिन उन्होंने उन के सामने यह शर्त रखी कि नीलेश दिव्या को जल्द से जल्द तलाक दे कर उसे आजाद कर दे.

मरता क्या न करता. बगैर किसी शर्त के नीलेश ने तलाक के पेपर साइन कर दिए, पहली सुनवाई में ही फैसला हो गया.

वहां से तो दिव्या आजाद हो गई, लेकिन एक अवसाद से घिर गई. जिंदगी पर से उस

का विश्वास उठ गया. पूरा दिन बस अंधेरे कमरे में पड़ी रहती. न ठीक से कुछ खाती न पीती और न ही किसी से मिलतीजुलती. ‘कहीं बेटी को कुछ हो न जाए, कहीं वह कुछ कर न ले,’ यह सोचसोच कर मनोहर और नूतन की जान सूखती रहती. बेटी की इस हालत का दोषी वे खुद को ही मानने लगे थे. कुछ समझ नहीं आ रहा था उन्हें कि क्या करें जो फिर से दिव्या पहले की तरह हंसनेखिलखिलाने लगे. अपनी जिंदगी से उसे प्यार हो जाए.

‘‘दिव्या बेटा, देखो तो कौन आया है,’’ उस की मां ने लाइट औन करते हुए कहा तो उस ने नजरें उठा कर देखा पर उस की आंखें चौंधिया गईं. हमेशा अंधेरे में रहने और एकाएक लाइट आंखों पर पड़ने के कारण उसे सही से कुछ नहीं दिख रहा था, पर जब उस ने गौर से देखा तो देखती रह गई, ‘‘अक्षत,’’ हौले से उस के मुंह से निकला.

नूतन और मनोहर जानते थे कि कभी दिव्या और अक्षत एकदूसरे से प्यार करते थे पर कह नहीं पाए. शायद उन्हें बोलने का मौका ही नहीं दिया और खुद ही वे उस की जिंदगी का फैसला कर बैठे. ‘लेकिन अब अक्षत ही उन की बेटी के होंठों पर मुसकान बिखेर सकता था. वही है जो जिंदगी भर दिव्या का साथ निभा सकता है,’ यह सोच कर उन्होंने अक्षत को उस के सामने ला कर खड़ा कर दिया.

बहुत सकुचाहट के बाद अक्षत ने पूछा, ‘‘कैसी हो दिव्या?’’ मगर उस ने कोई जवाब

नहीं दिया. ‘‘लगता है मुझे भूल गई? अरे मैं अक्षत हूं अक्षत…अब याद आया?’’ उस ने उसे हंसाने के इरादे से कहा पर फिर भी उस ने कोई जवाब नहीं दिया.

धीरेधीरे अक्षत उसे पुरानी बातें, कालेज के दिनों की याद दिलाने लगा. कहने लगा कि कैसे वे दोनों सब की नजरें बचा कर रोज मिलते थे. कैसे कैंटीन में बैठ कर कौफी पीते थे. अक्षत उसे उस के दुख भरे अतीत से बाहर लाने की कोशिश कर रहा था, पर दिव्या थी कि बस शून्य में ही देखे जा रही थी.

दिव्या की ऐसी हालत देख कर अक्षत की आंखों में भी आंसू आ गए. कहने लगा, ‘‘आखिर तुम्हारी क्या गलती है दिव्या जो तुम ने अपनेआप को इस कालकोठरी में बंद कर रखा है? ऐसा कर के क्यों तुम खुद को सजा दे रही हो? क्या अंधेरे में बैठने से तुम्हारी समस्या हल हो जाएगी या जिसने तुम्हारे साथ गलत किया उसे सजा मिल जाएगी, बोलो?’’

‘‘तो मैं क्या करूं अक्षत, क्या कंरू मैं? मैं ने तो वही किया न जो मेरे मम्मीपापा ने चाहा, फिर क्या मिला मुझे?’’ अपने आंसू पोंछते हुए दिव्या कहने लगी. उस की बातें सुन कर नूतन भी फफकफफक कर रोने लगीं.

दिव्या का हाथ अपनी दोनों हथेलियों में दबा कर अक्षत कहने लगा, ‘‘ठीक है, कभीकभी हम से गलतियां हो जाती हैं. लेकिन इस का

यह मतलब तो नहीं है कि हम उन्हीं गलतियों को ले कर अपने जीवन को नर्क बनाते रहें… जिंदगी हम से यही चाहती है कि हम अपने उजाले खुद तय करें और उन पर यकीन रखें. जस्ट बिलीव ऐंड विन. अवसाद और तनाव के अंधेरे को हटा कर जीवन को खुशियों के उजास से भरना कोई कठिन काम नहीं है, बशर्ते हम में बीती बातों को भूलने की क्षमता हो.

‘‘दिव्या, एक डर आ गया है तुम्हारे अंदर… उस डर को तुम्हें बाहर निकालना होगा. क्या तुम्हें अपने मातापिता की फिक्र नहीं है कि उन पर क्या बीतती होगी, तुम्हारी ऐसी हालत देख कर. अरे, उन्होंने तो तुम्हारा भला ही चाहा था न… अपने लिए, अपने मातापिता के लिए,

तुम्हें इस गंधाते अंधेरे से निकलना ही होगा दिव्या…’’

अक्षत की बातों का कुछकुछ असर होने लगा था दिव्या पर. कहने लगी, ‘‘हम अपनी खुशियां, अपनी पहचान, अपना सम्मान दूसरों से मांगने लगते हैं. ऐसा क्यों होता है अक्षत?’’

‘‘क्योंकि हमें अपनी शक्ति का एहसास नहीं होता. अपनी आंखें खोल कर देखो गौर से…तुम्हारे सामने तुम्हारी मंजिल है,’’ अक्षत की बातों ने उसे नजर उठा कर देखने पर मजबूर कर दिया. जैसे वह कह रहा हो कि दिव्या, आज भी मैं उसी राह पर खड़ा तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं, जहां तुम मुझे छोड़ कर चली गई थी. बस तुम्हारी हां की देर है दिव्या. फिर देखो कैसे मैं तुम्हारी जिंदगी खुशियों से भर दूंगा.

अक्षत के सीने से लग दिव्या बिलखबिलख कर रो पड़ी जैसे सालों का गुबार निकल रहा हो उस की आंखों से बह कर. अक्षत ने भी उसे रोने दिया ताकि उस के सारे दुखदर्द उन आंसुओं के सहारे बाहर निकल जाएं और वह अपने डरावने अतीत से बाहर निकल सके.

बाहर खड़े मनोहर और नूतन की आंखों से भी अविरल आंसू बहे जा रहे थे पर आज ये खुशी के आंसू थे.

युवाओं में बढ़ता फ्लेवर हुक्के का क्रेज, जानें क्या है नुकसान

पुराने समय में गांवों से हुक्का लोग बड़े शोक से पीते थे. आज शहरों में इस चलन ने नए रूप के साथ फिर से शुरूआत की है. आज शहरों में पार्टी या फिर किसी खास महफिल में हुक्का ना हो तो पार्टी पूरी ही नहीं होती. दिल्ली, मुबंई जैसे शहरों में हुक्का बार की भरमार है. और यहां आपको किसी भी हुक्का बार में लड़के-लड़कियां हुक्का के कश लगाते मिल जाएंगे. कुछ लोग इस गलत फहमी में भी हुक्का पीते हैं कि इससे किसी तरह का कोई नुकसान नही होता.

सिगरेट से ज्यादा खतरनाक हुक्का

युनिवर्सिटी औफ कैलिफोर्निया के रिपोर्ट के मुताबिक हुक्का सिगरेट से भी ज्यादा नुकसानदेह होता है. इसमें निकोटीन के साथ हशिश (एक तरह का ड्रग) का इस्तेमाल होती है. साथ ही इसमें फ्लेवर के लिए जिन फ्लेवर का इस्तेमाल किया जाता है वो भी सेहत के लिए नुकसानदेह होता है. कुछ लोगों को मानना है कि हर्बल हुक्का स्वास्थय के लिए हानिकारक नही होता. अगर आप भी कुछ ऐसा ही सोचते है तो यह बिल्कुल गलत है क्योंकि वो भी उतना ही नुकसान पहुंचाता है जितना बाकि हुक्का पीने से होता है.

सिगरेट के तंबाकू से ज्यादा खतरनाक हुक्का का तंबाकू

रिपोर्ट के मुताबिक हुक्का पीना इसलिए भी ज्यादा खतरनाक है क्योंकि जब भी कोई हुक्का पीता है तो वो लगभग 30 से 45 मिनट तक हुक्का पीता है. इतने समय तक लगातार कार्बन मोनोऔक्साइड शरीर के अंदर जाता है जो सिगरेट से ज्यादा खतरनाक होता है. रिपोर्टकर्ताओं के मुताबिक कार्बन मोनोऔक्साइड शरीर के लिए जहर जैसा काम करता है.

दिल के लिए खतरनाक है हुक्का

रिपोर्ट के मुताबिक फ्लेवर वाले तंबाकू से लेड और खतरनाक विषैले रसायन बनते है जो हार्ट के लिए खतरनाक साबित होते हैं. साथ ही हुक्का पीने वालों में दिल की बीमारियां होने के चांस बढ़ जाते है. हुक्का पीने वाले लोगों की धमनियां धीरे-धीरे सख्त हो जाती है. यह हार्ट टैक, स्ट्रोक और कार्डियो वैस्कुलर जैसी जानलेवा बीमारियों का कारण भी बनता है.

कैंसर का होता है खतरा

रिपोर्ट के अनुसार, जो लोग यह मानते है कि पानी से धुएं के गुजरने से प्रदूषक तत्व छन जाते हैं और फेफड़ों को नुकसान नहीं पहुंचता, वो गलत सोचते हैं. रिपोर्ट के मुताबिक हुक्का पीने से मुंह, फेफड़ा और ब्लड कैंसर के पूरे चांस होते है. इसके अलावा यह हृदय रोग और धमनियों में थक्के जमने की समस्या की भी वजह बन सकता है.

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