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प्रायश्चित्त : शिशिर ने कैसे उतारा अपने मन का बोझ

शिखा की आंखों से नींद कोसों दूर थी. मन में तरहतरह की आशंकाएं घुमड़ रही थीं. उस की बेचैन निगाहें बारबार घड़ी की ओर जा टिकतीं. रात का 1 बज चुका था, कहां रह गए शिशिर?

दोपहर में इंदौर से आए फोन ने उसे लगभग चेतना शून्य ही कर दिया था. बड़ी भाभी ने रुंधे गले से बमुश्किल इतना बताया कि तुम्हारे भैया को हार्ट अटैक हुआ है… आईसीयू में भरती करा दिया है. डाक्टरों ने तुरंत बाईपास सर्जरी की आवश्यकता बताई है, जिस पर करीब 2 लाख रुपए खर्च आएगा.

भाभी इस बात को ले कर काफी व्यथित थीं कि इस समय इतने रुपए की व्यवस्था कहां से और कैसे हो सकेगी. शिखा ने भाभी को हौसला बनाए रखने की सलाह दी व शीघ्र इंदौर पहुंचने का आश्वासन दिया.

कुछ संयत हो कर शिखा ने सब से पहले शिशिर को फोन कर के घटना की जानकारी दी. शिशिर की व्यस्तता से वह भलीभांति परिचित थी इसलिए अकेले ही भैया के पास जाने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन शिशिर का अब तक घर न पहुंचना अनेक आशंकाओं को जन्म दे रहा था. एकएक मिनट घंटों के समान बीत रहा?था. इंतजार के इन पलों में उस के मानस पटल पर वह कभी न भूलने वाली घटना चलचित्र की भांति जीवंत हो उठी.

शिखा के विवाह से पहले की बात है. मां को ब्रेन हैमरेज हो गया था. काफी इलाज के बाद वह ठीक तो हुईं पर अकसर बीमार रहने लगीं. शिखा पर पढ़ाई के साथसाथ घरगृहस्थी की पूरी जिम्मेदारी भी आ पड़ी. कभी पीएच.डी. को अपना ध्येय बना चुकी शिखा ने पारिवारिक कर्तव्यों की पूर्ति के लिए अपने लक्ष्य को तिलांजलि दे दी और एक स्थानीय स्कूल में शिक्षिका की नौकरी कर ली.

भैया तो नौकरी के सिलसिले में पहले ही इंदौर शिफ्ट हो चुके थे. छोटे भाईबहन और मां की देखभाल की जिम्मेदारी बखूबी निबाहते हुए वह पूरी तरह परिवार को समर्पित हो गई.

समय पंख लगाए उड़ रहा था. मां को रहरह कर उस के विवाह की चिंता सताए जाती थी. शिखा के सद्गुणों व घरेलू कार्यों में निपुणता की प्रशंसा सुन कर कई प्रस्ताव आ रहे थे किंतु शिखा इस शहर से दूर शादी करने को कतई तैयार नहीं हुई. उस का अपना वजनदार तर्क था कि दूर की ससुराल से वह जरूरत पड़ने पर मां के पास जल्दी नहीं आ सकेगी.

आखिर उस की इच्छानुसार इसी शहर के एक प्रतिष्ठित परिवार में उस का विवाह हो गया. नए परिवार में नई जिम्मेदारियों ने शिखा का स्वागत किया. नौकरी व परिवार के बीच सामंजस्य बिठाती हुई शिखा की व्यस्तता दिनोंदिन बढ़ती गई.

पहले हफ्ते 10 दिन में मायके का चक्कर लग जाता था पर बिटिया के जन्म के बाद धीरेधीरे यह अवधि बढ़ने लगी. फिर?भी समय निकाल कर कभीकभी टेलीफोन पर मां का हालचाल पूछ लिया करती.

एक दिन शिखा स्कूल से घर लौटी ही थी कि छोटे भाई का फोन आ गया, ‘दीदी, मां की तबीयत बिगड़ गई है. डाक्टर ने चेकअप कर कुछ टेस्ट कराए हैं… रिपोर्ट देख कर पूरी दवा लिखेंगे.’

शिखा का मन मां से मिलने को व्याकुल हो उठा. शिशिर के आफिस में आडिट चल रहा था इसलिए वह रोज देर से घर लौट रहे थे. इधर गुडि़या को भी सुबह से बुखार था. उसे ले कर सर्दी के इस मौसम में कैसे घर से निकले, यह प्रश्न शिखा को दुविधा में डाल रहा था. रात को थकेमांदे लौटे शिशिर को उस ने मां की तबीयत खराब होने की बात बताई तो उन्होंने, ‘कल देखने चलेंगे,’ कह कर बात समाप्त कर दी.

अगला दिन भी नियमित दिनचर्या से कतई अलग नहीं था. फिर भी समय निकाल कर शिखा ने भाई से फोन पर मां के हालचाल पूछे और शाम को आने का वादा किया. शाम को शिशिर का फोन आ गया कि चीफ आडिटर आज ही काम समाप्त कर वापस जाना चाहते हैं अत: घर लौटने में देर हो जाएगी. शिखा मनमसोस कर रह गई लेकिन उसे यह जान कर तसल्ली हुई कि बड़े भैया आ गए हैं और मां को अस्पताल में भरती कराया जा रहा है.

सुबह आफिस के लिए निकलते हुए शिशिर ने कहा, ‘मैं आडिट रिपोर्ट डाक से भिजवा कर लंच तक वापस लौट आऊंगा… तुम तैयार रहना… मां को देखने अस्पताल चलेंगे.’ शिखा ने कोई जवाब नहीं दिया. पिछले 3 दिन से ये कोरे आश्वासन ही तो मिल रहे थे.

गुडि़या को सुबह की दवा दे कर शिखा उठी ही थी कि अचानक फोन की घंटी बजी. किसी अनहोनी की आशंका से उस का दिल धड़क उठा. आशंका निर्मूल नहीं थी. ‘मां नहीं रहीं…’ ये शब्द पिघले शीशे की तरह उस के कानों में उतरते चले गए.

मातृशोक ने उस के हृदय को छलनी कर दिया. जिस मां की सेवा में कभी उस ने रातदिन एक कर दिया था, आज एक ही शहर में रहते हुए उन्हें अंतिम बार जीवित भी न देख सकी.

खबर मिलते ही शिशिर भी तुरंत घर लौट आए और दोनों अस्पताल जा पहुंचे. सभी का रोरो कर बुरा हाल था. भैया ने बताया कि आखिरी वक्त तक मां की आंखें बस, शिखा को ही तलाश रही थीं. गमगीन माहौल में शिशिर एक कोने मेें स्तब्ध से खड़े थे. उन्हें आत्मग्लानि हो रही थी कि अपनी व्यस्तता के कारण वह एक महत्त्वपूर्ण पारिवारिक दायित्व को नहीं निभा सके.

वक्त हर जख्म का मरहम है. ‘मां’ अतीत हो गईं किंतु एक टीस, शिखा और शिशिर के मन में हमेशा के लिए छोड़ गईं.

शिखा की वैचारिक तंद्रा टूटी. आज पुन: वही मंजर सामने था. उस के भैया जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे… क्या इस बार भी वही कहानी दोहराई जाएगी… नियति उस की राह में रोड़े अटका रही है या शिशिर को काम के अलावा किसी की परवा नहीं… क्या इस संकट की घड़ी में वह भैयाभाभी का संबल बन सकेगी…

तभी दरवाजे की घंटी बजी… शिखा ने बेसब्री से दरवाजा खोला. सामने शिशिर खड़े थे, चेहरे पर दिनभर की भागदौड़ के स्पष्ट निशान लिए. शिखा ने सोचा कि अभी कोई व्यस्तता का नया बहाना सुनने को मिलेगा जिस के लिए वह मानसिक रूप से तैयार भी थी.

सोफे पर बैठते हुए शिशिर ने चुपचाप बैग खोला और 500 के नोटों की 4 गड्डियां उसे सौंपते हुए कहा, ‘‘सौरी शिखा… तुम्हारा फोन आने के बाद से ही आपरेशन के रुपए की व्यवस्था करने में जुट गया था. बैंक की एफडी तो दिन में तुड़वा ली थी, बाकी रुपयों की व्यवस्था दोस्तों से करने में इतनी रात हो गई… जल्दी तैयारी कर लो.. सुबह की ट्रेन से हम इंदौर जा रहे हैं.’’

शिखा हतप्रभ रह गई. उस के मन से संशय और अनिश्चय का कुहासा छंट गया. आज शिशिर ने वह कर दिखाया था जिस की उस ने उम्मीद भी नहीं की थी. वह कितना गलत समझ रही थी. उस की आंखों से अश्रुधार बहने लगी… इन आंसुओं ने वह फांस निकाल कर बाहर की, जो मां के निधन के वक्त से उस के हृदय में धंसी हुई थी.

शिशिर बेहद आत्मिक शांति का अनुभव कर रहे थे. शायद उन्होंने बरसों पहले हुई चूक का प्रायश्चित्त कर लिया था.

जीत गया भई जीत गया : अशोक ने कैसे लगाया अपने जीजा को चूना

‘‘आइए स्वामीजी, इधर आसन ग्रहण कीजिए,’’ अशोक ने गेरुए वस्त्रधारी तांत्रिक अवधूतानंद का स्वागतसत्कार करते हुए अपने जीजा की ओर देखा और बोला, ‘‘भाई साहब, यह स्वामीजी हैं और इन को प्रणाम कर आशीर्वाद लीजिए. आप की सभी समस्याओं का समाधान इन की मुट्ठी में कैद है.’’

‘‘प्रणाम, महाराज. अशोक के मुख से आप के चमत्कारों की महिमा सुन कर ही मैं आश्वस्त हो गया था कि आप ही चुनाव रूपी भवसागर में हिचकोले खाती मेरी नैया को पार लगा सकते हैं. आप की जयजयकार हो…आप…’’

‘‘ठीक है, ठीक है,’’ महाराज ने नशे में डूबी सुर्ख आंखों से नेताजी की ओर देखा और बोले, ‘‘बात आगे बढ़ाओ, हमारा समय बहुत कीमती है…’’

‘‘महाराज, कृपा कीजिए, किसी तरह चुनाव जीत जाऊं…मैं आप की झोली मोतियों से भर दूंगा.’’

‘‘देखो, चुनाव के बाद की बात बाद में, पहले अनुष्ठान की बात करो. अशोक ने तुम्हारी जन्मकुंडली हमें दिखाई थी… फिलहाल तुम्हारे सितारे गर्दिश में हैं. संभावना 50 प्रतिशत तक की है, लेकिन अगर तुम 5 लाख खर्च करने को तैयार हो तो हमारी तंत्र विद्या से 50 का आंकड़ा 100 में तबदील हो जाएगा. सारी विरोधी शक्तियां निष्क्रिय एवं शिथिल होती चली जाएंगी और हमारा डंडा और तुम्हारा झंडा आसमान की बुलंदियों को छूता चला जाएगा.’’

‘‘महाराज, मैं धन्य हो गया, लेकिन चुनाव में पहले ही बहुत खर्चा हो रहा है… अभी अगर आप ढाई लाख में कृपा करें तो…’

‘‘असंभव,’’ महाराज ने सुर्ख नेत्रों से अशोक को घूरा, ‘‘क्यों बच्चा, तुम तो कह रहे थे कि सारी बात तय हो चुकी है, फिर…’’

‘‘आप चिंता न करें महाराज, मेरे जीजाजी थोड़े कंजूस हैं. मुट्ठी खोलते हुए इन्हें घबराहट सी होने लगती है,’’ कहते हुए अशोक ने गुस्से से जीजा की ओर देखा, ‘‘यह तो महाराज की अपार कृपा है कि यहां तक आने को राजी हो गए, वरना कितने नेता, अभिनेता दिनरात इन के डेरे के इर्दगिर्द मंडराते रहते हैं. अब निकालिए 5 लाख की तुच्छ धनराशि…महाराज के चरणों में उसे अर्पित कर चैन की बांसुरी बजाइए…परसों समाधि से उठने के बाद महाराज ने कहा था कि आप सिर्फ चुनाव ही नहीं जीतेंगे, अपितु मंत्रीपद को भी सुशोभित करेेंगे लेकिन उस के लिए अलग से 5 लाख खर्च करने होंगे.’’

‘‘नहीं, अभी नहीं,’’ महाराज ने मंदमंद मुसकराते हुए कहा, ‘‘हम लोभीलालची नहीं, मस्तमौला फकीर हैं, अभी सिर्फ 5 लाख से ही अनुष्ठान आरंभ करेंगे… नेताजी, आप का शुभ नाम?’’

‘‘जी…सूरज प्रकाश.’’

‘‘वाह, खूब…बहुत खूब…पूरब दिशा की लालिमा आप के समूचे व्यक्तित्व की परिक्रमा करती प्रतीत हो रही है. इसी क्षण से चुनाव संपन्न होने तक आप को बस, पूरब दिशा की ओर ही देखते रहना है. प्रात: सूर्योदय के समय सूर्य नमस्कार कर जल अर्पित करें. याद रहे, जब भी घर से बाहर निकलें, सूर्य के दर्शन अवश्य करें…इस के बाद ही कदम आगे बढ़ाएं.’’

‘‘महाराज, सूर्य तो स्थिर नहीं रहते. सुबह सामने वाले दरवाजे की ओर होते हैं तो दोपहर को बगीचे की तरफ नजर आते हैं और शाम को पिछली तरफ चले जाते हैं…वह तो हमेशा घूमते ही रहते हैं, ऐसे में…’’

‘‘अरे, मूर्ख,’’ महाराज तनिक क्रोध में बोले, ‘‘सूर्य एक ही स्थान पर स्थिर हैं. घूम तो हमारी पृथ्वी रही है, इसी कारण लोगों को दिशाभ्रम हो जाता है. अब जैसा हम ने बताया है, बिलकुल वैसा ही कर.’’

फिर उन्होंने खिड़की के बाहर नजरें घुमाते हुए कहा, ‘‘तुम्हारे राजनीतिक भविष्य का सूर्योदय होने का समय क्षणप्रतिक्षण निकट आता जा रहा है. तुम 5 लाख अशोक के हवाले करो और हमारी तंत्र विद्या का चमत्कार देखने की प्रतीक्षा करो,’’ इतना कह कर अशोक को कुछ संकेत कर के महाराज उठ खड़े हुए.

नेताजी ने फौरन 5 लाख रुपए की गड्डियां ला कर अशोक के हवाले कर दीं. महाराज जातेजाते नेताजी की विशाल कोठी पर नजरें डालते हुए बोले, ‘‘वत्स, तुम्हारी विजयपताका दिनरात इस अट्टालिका पर लहराएगी. जाओ, अब तनमनधन से अपनी समस्त शक्ति चुनाव रूपी हवनकुंड में झोंक दो. तुम अपना काम करो, हम अपना अनुष्ठान करेंगे. जिस दिन मंत्रीपद की शपथ ग्रहण करने जाओगे, उस से पहले ही दूसरी किस्त के रूप में 5 लाख रुपए की धनराशि पहले हमें भेंट कर देना, वरना…’’

‘‘अरे, महाराज, बस, आप कृपा कीजिए…मैं बखूबी समझ गया…मंत्रीपद मिलने के बाद मैं 5 क्या 10-15 लाख आप के चरणों पर न्योछावर कर दूंगा.’’

अगले दिन से ही सूरज उर्फ सूरज प्रकाश उर्फ नेताजी की मानो दिनचर्या ही बदल गई. प्रात: उठते ही सूर्य नमस्कार कर जल अर्पित करते. फिर दिन में जितनी बार भी घर से बाहर निकलते, सूर्य के दर्शन कर के ही कदम आगे बढ़ाते. कभी सामने वाले दरवाजे से बाहर निकलते, कभी बगीचे के पेड़ों के बीचोंबीच ताकझांक करते दिखाई देते तो कभी पीछे वाली खिड़की से सूर्य को प्रणाम कर के वहीं से बाहर कूद जाते. इस तरह चुनावी भागदौड़ और व्यस्तता के बीच 15-20 दिन कैसे गुजर गए, पता ही न चला. शहर में डंडों, झंडों, झंडियों और लाउडस्पीकरों की चिल्लपौं का नजारा देखते ही बनता था.

हर रोज रात के समय अशोक नेताजी की मक्खनबाजी करने पहुंच जाता और 5-7 हजार और झटक लेता. एक दिन नेताजी शंकित मन से पूछ ही बैठे, ‘‘क्यों साले साहब, तुम्हें पूरी उम्मीद है न कि हम चुनाव जीत जाएंगे…कहीं ऐसा न हो…’’

‘‘जीजाजी, शुभशुभ बोलिए, महाराज आप की समस्त बाधाएं दूर करने के लिए दिनरात तंत्रमंत्र की समस्त दैवी शक्तियों का आह्वान कर रहे हैं. जब महाराज की सिद्ध शक्तियां अपना चमत्कार दिखाएंगी तो आप स्वयं यकीन नहीं कर पाएंगे कि आप ने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को इतने अधिक वोटों से कैसे पराजित किया. फिर आप की पार्टी तो राष्ट्रीय स्तर की है, तमाम छोटेबड़े नेता और कार्यकर्ता गलीगली कूचेकूचे में पूरे जोशोखरोश के साथ चुनावी दंगल की कमान संभाले हुए हैं.’’

जिस दिन चुनावी जंग का परिणाम घोषित होना था, सुबह से ही नेताजी का दिल धकधक कर रहा था. दोपहर को अशोक के कहने पर वह मतगणना स्थल पर गए और पार्टी के छोटेमोटे नेताओं का आश्वासन पा कर लौट आए कि जीत निश्चित है. इस के बाद नेताजी कोठी की ऊपरी मंजिल के अपने कमरे में आराम करने के लिए चले गए. लेटते ही उन की आंख लग गई.

शाम 5 बजे के लगभग ढोलढमाकों का कानफोड़ू शोरशराबा सुन कर नेताजी आंखें मलते हुए उठ बैठे. सहसा उन के कानों में स्वर गूंजे… ‘‘जीत गया भई जीत गया…सूरज वाला…’’

‘वाह, सूरज प्रकाश जीत गया… खूब…बहुत खूब…’ अपनी जीत की खुशी से आश्वस्त नेताजी ने दरवाजा खोल कर जैसे ही सामने सड़क से गुजरते जुलूस को देखा तो सिर चकराने लगा, दिल बैठने लगा. उन्होंने मुश्किल से खुद को संभाला और पास से गुजर रहे नौकर को पुकारा, ‘‘अरे जीतू, यह किस का जुलूस है, कौन जीता है?’’

‘‘बाबूजी, निर्दलीय चंद्र प्रकाश चुनाव जीत गया है, वह भी पूरे 8 हजार वोटों से. उगता सूरज उसी का तो चुनाव चिह्न है. बड़े अफसोस की बात है, आप चुनाव हार गए,’’ जीतू ने हमदर्दी जताई, ‘‘आप की हार के गम में सभी गमगीन हैं, नीचे देखिए, कोठी में मातम सा छाया हुआ है.’’

‘‘अरे, मूर्ख, इतना बड़ा हादसा हो गया और मुझे किसी ने कुछ बताया ही नहीं,’’ हैरानपरेशान नेताजी बुझीबुझी आंखों से जुलूस गुजरने के बाद की उड़ती धूल को सहन नहीं कर पा रहे थे, ऊंची आवाज में बोले, ‘‘अशोक कहां है?’’

तभी उन का मुनीम रामगोपाल बरामदे में आ पहुंचा और बोला, ‘‘सेठजी, वह तो तांत्रिक के संग किसी होटल में गुलछर्रे उड़ा रहा होगा…5 लाख में से बचीखुची रकम का बंटवारा भी तो अभी करना होगा.’’

‘‘ओह, तुम्हें तो सब मालूम है… इस कमीने अशोक पर भरोसा कर के चुनाव पर तो 25-30 लाख खर्च हुए ही, ऊपर से तांत्रिक के चक्कर में 5 लाख की और चपत लग गई.’’

‘‘सेठजी, आप को कितनी बार समझाया कि इस अशोक को ज्यादा मुंह मत लगाइए, लेकिन आप नहीं माने. कहते हैं न कि ‘सारी खुदाई एक तरफ जोरू का भाई एक तरफ’.’’

‘जीत गया भई जीत गया… सूरज वाला जीत गया, जीत गया भई…’ जुलूस अब पिछली सड़क से गुजर रहा था. नेताजी ने थकीहारी आवाज में रामगोपाल से पूछा, ‘‘एक बात समझ में नहीं आई, सूर्य की परिक्रमा हम करते रहे, परंतु जीत गया चंद्र प्रकाश और वह भी ‘सूरज’ चुनाव चिह्न के सहारे…क्या मतगणना अधिकारियों के इस अन्याय के खिलाफ किसी कोर्ट में गुहार लगाई जा सकती है?’’

‘‘किसी योग्य वकील से सलाहमशविरा कर लीजिए,’’ रामगोपाल बुदबुदाया, ‘लगता है, सदमा गहरा है, सेठजी की मति मारी गई है.’

जादू से कम नहीं है एक प्याली चाय

‘एक प्याली चाय’ यह सुनते ही शरीर की सारी थकान दूर हो जाती है. अपने देश का सबसे सस्ता, आसानी से हर जगह उपलब्ध और आम जन के प्रिय पेय पदार्थों में से एक है ‘चाय’.

मौका किसी भी तरह का हो, हर मौके पर एक प्याली चाय मौजूद रहती है. ऑफिस के ऊंघते माहौल में चाय स्फूर्ति जगाती है. यही नहीं कड़कड़ाती ठंड में शरीर व दिमाग को गरमाहट देती चाय, मरीज को भी राहत देती है.

चाय की चाह में इसके ज्यादा इस्तेमाल के बाद लोगों में भूख न लगने की या पेट में जलन की शिकायत रहती है. फिर डॉक्टर की सलाह कि चाय का सेवन कम करें, लेकिन इस के बावजूद आम लोगों में चाय जहां फायदे के रूप में मशहूर है वहीं डॉक्टर भी इसे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक मानते हैं, पर समस्या यह है कि पूरे देश में इसे जिस तरह बना कर पिया जाता है वह गलत है.

चाय के गुण

चाय में एंटी ऑक्सीडेंट के गुण पाए जाते हैं, जो दिल और कोलेस्ट्राल को सही रखते हैं, यही नहीं जवानी को बरकरार रखने में भी चाय सहायक होती है. यह शरीर में ताजगी, त्वचा में चमक और थकान दूर करने का काम भी करती है.

कैसे है नुकसानदायक चाय

इन तमाम गुणों के बावजूद चाय व्यक्ति के लिए कैसे नुकसानदेह बन जाती है. असल में भारत में चाय बनाने का तरीका गलत है. चाय को जब दूध और चीनी के साथ उबाला जाता है तो वह अपने औषधीय गुण खो देती है और शरीर को नुकसान पहुंचाती है. पश्चिम के विकसित देशों के लोग जानते हैं कि चाय को अगर बिना दूध के उबाल कर पीया जाए तो वह सेहत और त्वचा दोनों के लिए फायदेमंद होगी. भारतीय लोगों का मानना है कि बिना दूध की चाय का कोई स्वाद नहीं होता, जबकि सेहत और सीरत दोनों के हिसाब से नीबू की चाय सही मानी गई है.

आमतौर पर चाय 3 तरह की होती है. सफेद, हरी और काली. इन में सफेद चाय का सब से ज्यादा प्राकृतिक रूप है, जिसमें उसकी अपनी एक मिठास होती है और वह पीते ही मन में उमंग भर देती है. चिकित्सकों के अनुसार सफेद चाय में एंटी ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो कैंसर से बचाव करते हैं. अनुसंधान और सर्वे के अनुसार हरी चाय वायरस, बैक्टीरिया से होने वाले रोगों से बचाती है. यह हृदय रोग से संबंधित बीमारी को कम करने में भी मदद करती है. इसमें भी कैंसर को रोकने की क्षमता ज्यादा होती है.

काली चाय सेहत के लिहाज से सफेद और हरी चाय से कम फायदेमंद होती है.

महिलाओं के लिए लाभ

मेनोपाज के बाद महिलाओं में एस्ट्रोजन की मात्रा बढ़ाने में चाय मदद करती है. इस का लगातार इस्तेमाल स्ट्रोक जैसी बीमारी को भी दूर रखने में मदद करता है. महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन की मात्रा घटने से उनमें चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है. काली चाय में कैफीन मस्तिष्क को चार्ज करता है तथा नसों को सही तरीके से चलाने में मदद करता है.

हमें अपने मस्तिष्क की कोशिकाओं को बचाना जरूरी होता है, क्योंकि बढ़ती उम्र के साथ दिमाग में न्यूरान की मात्रा घटती जाती है. कई लोगों में इसी वजह से अल्जाइमर और पार्किंसन रोग पनपने लगते हैं. हरी और सफेद चाय दिमाग की कोशिकाओं को सक्रिय रखने में मदद करती है. चाय, जिसे हर रोज इस्तेमाल किया जाता है, हम अपनी नासमझी की वजह से उस के महत्त्वपूर्ण गुणों का लाभ नहीं उठा पाते हैं. सही तरीके से तैयार की गई चाय स्वाद के साथसाथ सेहत को भी सही रखती है.

मेरी एक्स गर्लफ्रैंड अपने शादीशुदा जिंदगी में खुश नहीं है, मैं क्या करूं?

सवाल

हम सब कालेज फ्रैंड्स का व्हाट्सऐप ग्रुप बना है. उस में हाल ही में मेरी एक्स गर्लफ्रैंड भी ऐड हो गई है. ग्रुप में सब बातें करते रहते हैं. मेरी एक्स गर्लफ्रैड की भी शादी हो गई है और मेरी भी. मैं तो उस से कोई बात नहीं करता लेकिन उस ने मेरे मोबाइल पर पर्सनल मैसेज भेजने शुरू कर दिए हैं. मैं उस से कोई रिश्ता नहीं रखना चाहता लेकिन उस की बातों से लग रहा है कि वह अपनी शादीशुदा जिंदगी में खुश नहीं है और फिर से मेरे करीब आना चाहती है. लेकिन मैं अब अपने विवाहित जीवन में बहुत खुश हूं, पत्नी मुझ पर जान छिड़कती है. मैं भी उस से हर तरह से संतुष्ट हूं. आप ही बताएं कि मैं क्या करूं?

जवाब

आप ने अपने प्रश्न का जवाब खुद ही दे दिया है. आप खुद कह रहे हैं कि आप खुशहाल शादीशुदा जिंदगी जी रहे हैं, फिर दोबारा से एक्स गर्लफ्रैंड से किसी भी तरह का कौंटैक्ट रखना मूर्खता होगी.

आप दोनों कालेज के दिनों में एकदूसरे से प्यार करते थे लेकिन शादी नहीं की. इस की कोई वजह तो रही होगी जो आप ने नहीं लिखी. खैर, कारण जो भी रहा होगा, लेकिन अब सब बदल गया है, आप दोनों शादीशुदा हैं.

वह आप के अनुसार अपने विवाहित जीवन से खुश नहीं लेकिन आप तो हैं. पुराने रिश्ते जब पीछे छूट जाते हैं तो उन्हें दोबारा जिंदा करने का कोई फायदा नहीं. आप के साथ अब आप की पत्नी की जिंदगी जुड़ी है. आप की प्राथमिकता पत्नी है. गर्लफ्रैंड के बारे में अब भी सोचना बेमानी होगा. उन का नंबर अपने मोबाइल में ब्लौक कर दें.

गर्लफ्रैंड की अब अपनी जिंदगी है और उसे जो देखना है वह खुद देखे. आप उस से दूर ही रहें. यही सब के लिए अच्छा है.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz

सब्जेक्ट में लिखें- सरिता व्यक्तिगत समस्याएं/ personal problem

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

Bollywood : 99 रूपए की टिकट दर पर भी दर्शक नहीं पहुंचे सिनेमाघर

इस वर्ष के 5 माह बीत गए. अब तक एक भी फिल्म बौक्स औफिस पर अपनी लागत वसूल नहीं कर पाई. बल्कि लगभग सभी फिल्में बुरी तरह से धराशाही हुईं. जिस के चलते अप्रैल माह से 80 प्रतिशत सिनेमाघर बंद चल रहे थे. ऐेसे माहौल में जब मई माह के पांचवे सप्ताह यानी कि 31 मई को एक साथ 3 फिल्में प्रदर्शित हुईं और 31 मई को ‘सिनेमा दिन’ घोषित कर टिकटों की दर 99 रूपए की गई तो कुछ बंद सिनेमाघर मालिकों ने सिनेमाघर खोलने, मल्टीप्लैक्स ने अपनी एकदो स्क्रीन ज्यादा शुरू करने की योजना बनाई.

ऐसे में उम्मीद जगी थी कि अब बौलीवुड में रौनक लौटने का सिलसिला शुरू होगा. मगर कुछ भी नहीं हुआ. 99 रूपए की टिकट दर के साथ ही एक टिकट पर एक टिकट मुफ्त का औफर भी दर्शकों को सिनेमाघरों तक नहीं खींच पाया. मई के पांचवे सप्ताह प्रदर्शित तीनों फिल्में बौक्स औफिस पर बुरी तरह से धराशाही हो गईं और इस की मूल वजह यह है कि किसी भी फिल्म में ऐेसा कुछ नहीं है कि दर्शक सिनेमाघर तक आते.

17 मई को ही राज कुमार राव की तुशार हीरानंदानी निर्देशित फिल्म ‘श्रीकांत’ प्रदर्शित हुई थी, जिस की बौक्स औफिस पर बड़ी दुर्गति हुई थी. इस के बावजूद 15 दिन बाद ही 31 मई को ही राज कुमार राव की दूसरी फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेस माही’ प्रदर्शित की गई. इसे निर्माताओं की मूर्खता ही कहा जा रहा है.

सभी को पता है कि 2018 से ले कर अब तक राज कुमार राव की जितनी भी फिल्में सिनेमाघर पहुंची, किसी को भी सफलता नहीं मिली. ऐेसे में 15 दिन के अंतराल में राज कुमार राव के अभिनय से सजी दूसरी फिल्म देखने दर्शक आएंगे, यह सोच ही गलत थी.

दूसरी बात इस फिल्म का प्रचार भी शून्य ही रहा. तीसरी बात अब तक एमएस धोनी वाली फिल्म के अपवाद को छोड़ दिया जाए तो क्रिकेट पर आधारित एक भी फिल्म बौक्स औफिस पर सफल नहीं हुई.

ऐसे मे 31 मई को सिनेमाघरों में पहुंची करण जोहर और जी स्टूडियो निर्मित तथा शरण शर्मा निर्देशित रोमांटिक व क्रिकेट पर आधारित फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेस माही’ ने पानी तक नहीं मांगा. राज कुमार राव, जान्हवी कपूर, संजय शर्मा, कुमुद मिश्रा, जरीना वहाब, पुर्णेंदु भट्टाचार्य, अर्जित तनेजा, यामिनी दास जैसे कलाकारों के अभिनय से सजी फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेस’ ने निर्माता के अनुसार 24 करोड़ रूपए कमा लिए, इस में से निर्माता के हाथ लगेंगे महज 11 करोड़ रूपए. जबकि इस की लागत 40 करोड़ रूपए बताई जा रही है.

इस फिल्म की सब से बड़ी कमजोरी इस की कहानी व पटकथा ही रही. इस के अलावा निर्देशक ने पुरानी फिल्मों के कुछ दृश्यों को ज्यों का त्यों इस में पिरो दिया. फिल्म देख कर ऐसा लगता है कि लेखक, निर्देशक व कलाकारों ने बेमन ही काम किया. वैसे भी निर्माता ने इसे राजस्थान सरकार से सब्सिडी ले कर बनाया है, इसलिए कुछ तो रकम जेब में जा चुकी है.

31 मई को ही मेघा चिलका व राजीव चिलका निर्मित तथा राजीव चिलका निर्देशित भारत की पहली लाइव एक्शन फिल्म ‘छोटा भीम एंड द कर्स औफ दमयान’ भी प्रदर्शित हुई थी, जिस में यज्ञ भसीन, आश्रिया मिश्रा, कबीर साजिद, दिव्यम डावर, दैविक डावर, अद्विक जायसवाल, मकरंद देशपांडे, नवनीत ढिल्लों, मुकेश छाबड़ा और अनुपम खेर के अहम किरदार हैं.

पूरे सप्ताह में 50 करोड़़ की लागत वाली यह फिल्म महज 2 करोड़ रूपए ही इकट्ठा कर सकी. जबकि यह फिल्म 16 वर्षों से लोकप्रिय कार्टून सीरीज ‘छोटा भीम’ पर आधारिक है. मगर कार्टून को लाइव ऐक्शन फिल्म में बनाते समय निर्देशक बुरी तरह से मात खा गए. बचीखुची कसर उन के पीआरओ ने पूरी कर दी.

फिल्म के निर्माता अपने सभी 10-12 बाल कलाकारों के साथ अपने पीआरओ की सलाह पर देश के कई शहरों में घूमते हुए कालेज, रिसोर्ट व मौल्स में बाल कलाकारों को नचवाते रहे. इस से फिल्म के बारे में किसी को कुछ पता नहीं चला क्योंकि भीषण गरमी के चलते इन दिनों बच्चे कम ही घर से निकल रहे हैं. जब टिकट की दर 99 रूपए हो गई और एक टिकट पर एक मुफ्त टिकट हो गई तो भी इस फिल्म ने पहले दिन सिर्फ 50 लाख रूपए ही कमाए थे. एक सप्ताह में कुल कलैक्शन 2 करोड़ यानी कि निर्माता के हाथ लगेंगें केवल 65 लाख रूपए.

तीसरी फिल्म मुकेश भट्ट और टीसीरीज निर्मित तथा अभिनय देव निर्देशित फिल्म ‘सावी’ प्रदर्शित हुई, जिस में अनिल कपूर, दिव्या खोसला कुमार, हर्षवर्धन राणे, मैराज कक्कड़, हिमांशी चौधरी, एम के रैना, रागेश्वरी लूंबा व अन्य के अहम किरदार हैं.

40 करोड़ की लागत वाली यह फिल्म बौक्स औफिस पर एक सप्ताह में केवल 9 करोड़ ही कमा सकी. इस में से निर्माता के हाथ में महज 4 करोड़ ही आएंगे पर फिल्म के निर्माताओं की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला क्योंकि इस फिल्म को इंग्लैंड से सब्सिडी मिली है. इस के अलावा फिल्म की हीरोईन दिव्या खोसला के पति भूषण कुमार ने ही मुकेश भट्ट के साथ मिल कर इस का निर्माण किया है.

दोस्त की ह्त्या में उम्रकैद की सजा पाने वाले 3 छात्र 44 साल बाद बेगुनाह साबित हुए

गुनाह के आरोप में पूरी जवानी जेल की सलाखों में खत्म हो गई. कालेज में एडमिशन हुआ था तो मांबाप ने कितने सपने देखे थे. सारे सपने मिट्टी में मिल गए. उस समय 18-19 साल की उम्र थी. आज 60 के ऊपर हैं. इतने सालों में मांबाप परिवार सब बर्बाद हो गया. 44 साल बाद दोस्त की हत्या के पाप से इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुक्त करते हुए बेगुनाह करार दिया, मगर सवाल यह कि अब बुढ़ापे में जेल से छूट कर कहां जाएं? क्या करें? हताशा में बोले ‘जहां सलाखों में पूरा जीवन काट दिया वहां से अर्थी भी उठती तो ठीक था.

यह मामला है मुजफ्फरपुर का है जहां दो कालेज के छात्र सहित एक नाबालिग छात्र को पुलिस ने एक अन्य छात्र की हत्या का आरोपी बना कर जेल भेज दिया था. हमारी देश की न्यायिक संरचना का मूलभूत आधार है कि 100 गुनाहगार भले ही छूट जाएं किंतु एक बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए, पर जब 3 निर्दोष 44 साल तक जेल में बंद रहें तो ऐसी न्याय व्यवस्था को शर्म से डूब मरना चाहिए. उस से बड़ा सवाल तो यह है कि जब ये 3 लोग हत्यारे नहीं हैं तो असली कातिल कौन था? जब तक उस का पता न चले, मरने वाले को न्याय कैसे मिलेगा?

2 जून 2024 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 44 साल पहले मुजफ्फरनगर डीएवी कालेज में बीए के छात्र की हत्या में दोषी 3 दोस्तों को बेगुनाह करार दिया है. कोर्ट ने उन्हें मिली आजीवन कारावास की सजा रद्द कर दी है. यह फैसला न्यायमूर्ति सिद्धार्थ वर्मा, न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की खंडपीठ ने राजेश, ओमवीर और एक नाबालिग आरोपी की ओर से सजा के खिलाफ 40 साल पहले दाखिल अपील का निस्तारण करते हुए सुनाया है.

मामला मुजफ्फरनगर थाना सिविल लाइन के केशवपुरी महल्ले का है. अभियोजन की कहानी के मुताबिक छात्र अजय 6 जनवरी को अपने ताऊ रघुनाथ के कहने पर अपने दोस्त राजेश के पास डीजल के पैसे वापस लेने गया था. लेकिन वह घर नहीं लौटा. रघुनाथ ने 8 जनवरी को भतीजे की गुमशुदगी पुलिस में दर्ज करवाई. राजेश की तलाश शुरू हुई. फिर उसे पुलिस ने मीनाक्षी सिनेमाघर के पास से गिरफ्तार किया. राजेश की निशानदेही पर अजय का शव केशवपुरी मोहल्ले के सुखवीर के किराए के घर में बरामद हुआ. इस कमरे में ओमवीर रहता था. पुलिस ने राजेश, ओमवीर और एक नाबालिग के खिलाफ कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल किया.

अभियोजन की ओर से अदालत में 13 गवाह पेश किए गए. इस के बाद मुजफ्फरनगर के अपर जिला व सत्र न्यायालय ने 30 जून 1982 को राजेश समेत तीनों अभियुक्तों को हत्या और सबूत मिटाने का दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई. सजा के खिलाफ तीनों ने 1982 में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. अपील करने वालों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता बृजेश सहाय और सुनील वशिष्ठ ने दलील पेश की. हाई कोर्ट ने कहा कि मामले में पेश अभियोजन के गवाहों की ओर से मृतक के अंतिम दृश्य के संबंध में दिए बयानों में विरोधाभास और शव की बरामदगी संदेहास्पद है.

मामले में 44 साल पहले फंसे राजेश और ओमवीर की उम्र अब 60 साल के पार है. जबकि सजा पाने के बाद नाबालिग घोषित आरोपी भी अब 59 के करीब है. करीब 4 दशक तक चली मुकदमेबाजी के बाद बेगुनाह साबित हुए तीनों आरोपियों की पूरी जवानी मुकदमा लड़ने में ख़ाक हो गई.

सवाल यह भी कि 3 निर्दोष जिंदगियों को रौंदने वालों पर क्या अब कोई कार्रवाई होगी? क्या उन पुलिस वालों को दोषी बनाया जाएगा जिन्होंने हत्या के केस में 3 निर्दोष लोगों को फंसाया? क्या कोर्ट उन गवाहों पर कोई कार्रवाई करेगा जिन्होंने धर्म की किताब पर हाथ रख कर निर्दोष लोगों को फंसाने के लिए अदालत में झूठी गवाही दी? अदालत को एक फैसला लेने में 44 साल क्यों लग गए क्या इस का जवाब न्यायपालिका देगी? क्या सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस की कुर्सी पर बैठे जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ न्याय प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए कोई दिशानिर्देश देंगे? क्या देश की सरकारें ध्यान देंगी कि उसकी जेलों में ऐसे कितने गरीब और अनपढ़ लोग सालों से बंद हैं, जिन के मामले कोर्ट की पटल पर भी नहीं पहुंच पाए हैं?

इन तमाम सवालों का जवाब न तो न्यायपालिका देगी और न सरकार. इस देश में न्यायपालिका की लचर व्यवस्था ने आम लोगों का जीवन नरक किया हुआ है. जबकि अमीर आदमी अपने मनमुताबिक फैसलों की खरीदफरोख्त कर सकता है. यहां संभ्रांत दोषियों की सुनवाई आधी रात और छुट्टियों के दिन भी हो जाती है मगर गरीब आदमी 44 साल तक इन्साफ का इंतजार करता है.

मानवाधिकार आयोग एक मरी हुई संस्था है और सरकार में मौजूद नेतागण अपनी तिजोरियां भरने और अपने परिवार को सेटल करने में व्यस्त हैं. उन्हें आम आदमी से कोई मतलब नहीं. आम आदमी झूठे केस में बंद हो, पुलिस के डंडे खा कर चौकी पर ही मर जाए या निर्दोष होते हुए भी पूरी जिंदगी जेल में बिता दे, उन्हें इन बातों से कोई लेनादेना नहीं है. पुलिस, जेल अधिकारी या न्यायपालिका स्वयं जेल में बंद कैदियों की कभी कोई समीक्षा नहीं करती. भारतीय जेलों में ऐसे कैदी हजारों की संख्या में हैं जिन्होंने अपनी सजा की अधिकतम अवधि बिना मुकदमा चलाए ही काट ली है, लेकिन सरकार की निष्क्रियता के कारण वे अभी भी जेलों में बंद हैं. इस सब का कारण लचर न्याय व्यवस्था ही है जिस में टाइम बाउंड निर्णय दिए जाने का कोई प्रावधान कभी नहीं किया गया.

2021 में एक डाटा जारी हुआ था जिस के अनुसार देश के कुल 1283 जेलों में लगभग 5,54,000 लोग बंद हैं. इन में 4,27,000 बंदी हैं जिन का अभी ट्रायल चल रहा है. बाकी 1,27,000 सजायाफ्ता अर्थात कैदी हैं. 3 सालों में यह आंकड़ा और बढ़ा होगा.

कोर्ट-कचहरी का चक्कर क्या होता है? कानूनी लड़ाइयों में कैसे पीढ़ियां खप जाती हैं? तारीख पर तारीख के चक्कर में घनचक्कर बने लोगों की कैसे पिस जाती है जिंदगी? ये समझना हो तो जयपुर की एक प्रौपर्टी से जुड़े केस पर नजर डालते हैं. एक शख्स प्राइम लोकेशन पर प्रौपर्टी खरीदता है. उस प्रौपर्टी पर पहले से काबिज किरायेदार अड़ जाता है कि वह प्रौपर्टी खाली नहीं करेगा. मामला अदालत में जाता है. अंतिम फैसला आने यानी शीर्ष अदालत से मामले के निपटारे में 38 साल लग जाते हैं. कल्पना कीजिए, आपने जवानी में प्रौपर्टी खरीदी और उस पर कब्जा मिलतेमिलते बुढ़ापा आ गया ! क्या करेंगे आप ऐसी प्रौपर्टी का? आप के जीवन भर की कमाई भी गई और जीवन का सुख चैन अदालतों के चक्कर काटने में लुट गया.

30 जनवरी 1985 को रवि खंडेलवाल नाम के शख्स ने जयपुर में प्राइम लोकेशन पर एक प्रौपर्टी खरीदी थी. प्रौपर्टी जयपुर मेटल इलैक्ट्रिक कंपनी से खरीदी गई थी. उस समय उस पर तुलिका स्टोर्स का बतौर किराएदार कब्जा था. प्रौपर्टी खरीदने के बाद खंडेलवाल ने तुलिका स्टोर्स से जगह खाली करने को कहा लेकिन उस ने इनकार कर दिया. दलील दी कि कानूनन किसी किरायेदार को 5 साल से पहले खाली नहीं कराया जा सकता अगर वह खुद की मर्जी से नहीं जा रहा है. तब राजस्थान के कानून में ये प्रावधान था. हालांकि, बाद में कानून में बदलाव हुआ और अनिवार्य टेनेंसी का प्रावधान खत्म कर दिया गया. खैर, मामला अदालत में पहुंचा.

निचली अदालत में 17 साल तक मुकदमा चला. ट्रायल कोर्ट ने इस आधार पर लैंड लौर्ड को कब्जा देने से इनकार कर दिया कि प्रौपर्टी 1982 में किराए पर दी गई थी और जब उन्हें खाली करने के लिए कहा गया तब 5 साल की अवधि पूरी नहीं हुई थी. इस के बाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट में केस गया. डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने खंडेलवाल के पक्ष में फैसला दिया और तुलिका स्टोर्स को प्रौपर्टी खाली करने का आदेश दिया. वर्ष 2004 में तुलिका स्टोर्स ने इस फैसले को राजस्थान हाई कोर्ट में चुनौती दी. हाई कोर्ट को इस पर फैसला सुनाने में 16 वर्ष लग गए. फैसला लैंडलौर्ड के खिलाफ आया. खंडेलवाल ने 2020 में हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी.

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संजय किशन कौल और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की बेंच ने लैंडलौर्ड के पक्ष में फैसला सुनाया. शीर्ष अदालत ने इस बात पर हैरानी भी जताई कि खरीदी हुई प्रौपर्टी पर कब्जे का ये विवाद 38 साल तक चला. जस्टिस कौल ने अपने फैसले में लिखा भी कि पहले ही इस मामले में इतना वक्त लग चुका है और अगर ये केस फिर अपील में जाता है तो ये इंसाफ का मजाक होगा. सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के आर्टिकल 142 के तहत मिले असाधारण अधिकार का इस्तेमाल करते हुए इस विवाद का पटाक्षेप किया.

भारतीय कानून व्यवस्था में फैसला सुनाने में लगने वाले लंबे समय को ले कर दुनियाभर में आलोचना होती है. सालोंसाल मुकदमा लड़ने के बाद जब कोई कोर्ट यह कहे कि अभियोजन पक्ष दोष सिद्ध नहीं कर सका और आरोपी बरी किया जाता है, तो पीड़ित की मनोदशा अपराध के वक्त उस की मनोदशा से भी अधिक कष्टकारी होती है. वहीं जब कोई निर्दोष पुलिस द्वारा आरोपी बना कर जेल भेजा जाता है और सालों वह जेल की सलाखों में बंद रहता है, खुद को निर्दोष साबित करने के लिए लाखों रूपए वकीलों पर खर्च करता है तो ऐसे व्यक्ति और उस के परिवार वालों की जिंदगी कितनी दुख भरी होती है इस की कल्पना भी नहीं की जा सकती है.

महाराष्ट्र के एक शख्स ऐसे हैं, जिन्होंने खुद को बेगुनाह साबित करने के लिए आधी से ज्यादा उम्र अदालतों के चक्कर काटने में बिता दी. उन के केस की 35 साल तक सुनवाई चली. बाद में बंबई हाई कोर्ट ने उन्हें निर्दोष करार दे दिया.

वकोली के वेस्टर्न कोल लिमिटेड के पूर्व मुख्य प्रबंध निदेशक और ठेकेदार कंपनी के मालिक रामधिराज राय पर 35 साल पहले भ्रष्टाचार के आरोप लगे थे. उस के बाद शुरू हुई कानूनी लड़ाई सालों तक चलती रही. दरअसल, 1987 में कामठी क्षेत्र में 25 बिस्तरों वाले अस्पताल के निर्माण के लिए वकोली द्वारा एक निविदा प्रक्रिया शुरू की गई थी. ठेका एक निजी कंपनी को मिला, लेकिन तभी अचानक ठेकेदार बदल गया तो ठेका इंडस इंजीनियरिंग कंपनी को दिया गया था.

भ्रष्टाचार के इस मामले में वकोली के तत्कालीन मुख्य वित्त एवं लेखा अधिकारी डी जनार्दन राव ने गवाही दी थी. तत्कालीन प्रबंध निदेशक रामधिराज राय का दावा था कि जनार्दन राव ने इंडस इंजीनियरिंग कंपनी पर दबाव डाला था, इसलिए उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे. 76 साल के रामधिराज राय की आधी उम्र कोर्ट में पेश होतेहोते समाप्त हो गई. हालांकि, अंत में दोष साबित नहीं होने पर कोर्ट ने 35 साल की अदालती कार्यवाही के बाद उन्हें बरी कर दिया.

बहरहाल, बौम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने भले ही 35 साल के बाद रामधिराज राय को बरी कर दिया, लेकिन रामधिराज के बीते हुए वर्षों की कोई भरपाई नहीं हुई. वैसे भी कानून की दुनिया से जुड़ा सब से आम कथन है कि जस्टिस डीलेड इज जस्टिस डिनायड, यानी देर से मिलने वाला इंसाफ नाइंसाफी के समान ही है. हर जज इस वाक्य को कभी न कभी बोलता ही है मगर देश में लाखों लोगों के साथ लगातार नाइंसाफी ही हो रही है. हमारे कोर्ट एक जजमेंट को लेने में इतना समय निकाल देते हैं कि पीड़ित हैं और पीड़ित के परिजन न्याय की आस छोड़ देते हैं. हजारों केसों में देखने को मिला है जहां पर पीड़ित और उस के परिजनों ने पता नहीं कितने साल सही फैसले का इंतजार किया है. कुछ घटनाएं जो मीडिया की निगाह में आ जाती हैं वे तो बड़ी बन जाती हैं और उन पर फैसला जल्दी आ जाता है, परंतु जो केस नीचे दबे रह जाते हैं उन पर निर्णय लेने में कई साल लग जाते हैं.

हिंसा प्रधान फिल्मों को क्यों नहीं मिल रहे दर्शक

भारत में जब से सिनेमा बनना शुरू हुआ तब से कहा जाता रहा है कि सिनेमा समाज का दर्पण होता है. समाज में जो कुछ घटित होता है उसे ही फिल्मकार अपने सिनेमा में पेश करता है. मगर धीरेधीरे सिनेमा समाज का प्रतिबिंब होने के बजाय कब समाज पर अपना प्रभाव डालने लगा, यह किसी की समझ में न आया.
इतिहास गवाह है कि 70 व 80 के दशकों में समाज में वही पोशाकें पहनी जाती थीं जो फिल्मों में हीरो पहनता था. यहां तक कि लोग हीरो की हेयरस्टाइल तक कौपी करने लगे थे.

70 के दशक में शुरू हुआ यह सिलसिला आज भी जारी है. यदि यह कहा जाए कि अब सिनेमा की गिरफ्त में पूरा समाज आ चुका है तो कुछ भी गलत न होगा. अब तो भारतीय सिनेमा, खासकर हिंदी सिनेमा, जिस तरह की हिंसा, जिस तरह के ऐक्शन दृश्य परोस रहा है उस के चलते कहा जा रहा है कि सिनेमा के ही चलते अब हमें अपने चारों तरफ हिंसात्मक समाज नजर आता है.

सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व में सिनेमा व समाज का संबंध लगभग एकजैसा बना हुआ है. हौलीवुड फिल्में हिंसा से सराबोर रहती हैं. भारतीय बच्चे भी हौलीवुड की सुपर हीरो व ऐक्शन प्रधान फिल्में देखने के लिए लालायित रहते हैं. हौलीवुड की इन ऐक्शन फिल्मों ने पूरे विश्व के समाज पर बहुत बुरा असर डाला है.

अमेरिका का लगभग हर बच्चा हौलीवुड की ऐक्शन प्रधान फिल्मों से प्रेरित हो कर हिंसक बनता जा रहा है. यही वजह है कि पिछले दिनों अमेरिका में 6 साल के लड़के ने अपनी टीचर की हत्या करने का प्रयास किया पर टीचर की हिम्मत नहीं हुई कि वह उस बालक की शिकायत स्कूल के प्रिंसिपल से कर सके. कुछ ही दिनों बाद वही लड़का स्कूल में गन ले कर पहुंच गया और 2 बच्चों पर गोलियां बरसा दीं. फिलहाल लड़का जेल पहुंच गया.

इसी तरह पिछले कुछ वर्षों में भारत के हर शहर व गांव में लोगों के बीच हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ी है. लेकिन भारत व अमेरिका के बीच सब से बड़ा अंतर यह है कि अमेरिका में बच्चा फिल्मों के साथ ही हर दिन कम से कम तीन से चार घंटे टीवी देखता है और टीवी पर भी वह 80 प्रतिशत हिंसा प्रधान दृश्य ही देखता है. इस कारण अमेरिकी बच्चों के अंदर हिंसात्मक प्रवृत्ति उपज रही है. पर, भारत में ऐसा नहीं है.

‘धूम’ और ‘एनिमल’ का असर

अखबारों की कतरनों पर यकीन करें तो ‘धूम’ और ‘एनिमल’ जैसी फिल्मों की सिनेमाई हिंसा ने वास्तविक जीवन में अपराधों को प्रेरित किया है. फिल्म ‘धूम’ ने वास्तविक बैंक डकैतियों को प्रेरित किया जबकि ‘कबीर सिंह’ व ‘एनिमल’ जैसी फिल्मों ने आक्रामक व्यवहार और विशाक्त मर्दानगी के प्रति युवकों के दृष्टिकोण को प्रभावित करने की दिशा में काम किया है. फिर भी यह कहना कि फिल्में देख कर इंसान हिंसक बन रहा है, सही नहीं है.

भारतीय सिनेमा में ‘शोले’, ‘डौन,’ ‘गजनी,’ ‘सत्या’ और ‘वास्तव’ जैसी फिल्मों में सब से अधिक हिंसा दिखाई गई थी लेकिन इन फिल्मों के चलते समाज में हिंसात्मक प्रवृत्ति की बढ़ोतरी नहीं हुई थी. शायद इस की एक वजह यह भी थी कि इन फिल्मों में विलेन साहसी और जिन के साथ हिंसा हो रही होती है वे कमजोर या कायर दिखाए गए हैं.
सिनेमा में बढ़ती हिंसा के लिए असली दोषी समाज व दर्शक हैं या कोई और? तथा क्या बढ़ती सिनेमाई हिंसा के चलते समाज में हिंसा बढ़ रही है? इस पर विचार करने के लिए हमें कई पक्षों पर गौर करना होगा. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर इंसान सपनों में जीना चाहता है. वह अपनी रोजमर्रा की जिंदगी के दुखदर्द, उपहास, अपमान को सिनेमा देख कर भुलाना चाहता है. वह निजी जिंदगी में जो कुछ नहीं कर पा रहा होता है उसे वह सिनेमा के परदे पर होते हुए देखना चाहता है.

 

बढ़ते ऐक्शन व हिंसा प्रधान दृश्य

यों तो भारतीय सिनेमा, खासकर हिंदी सिनेमा, लगभग हर 10 साल बाद बदलता रहा है. भारतीय सिनेमा में आने वाले इस बदलाव के पीछे हौलीवुड फिल्मों के असर के साथ ही सामाजिक व राजनीतिक परिवेश मूल वजहें रही हैं. 70 व 80 के दशकों में आपातकाल के बाद दमन, बेरोजगारी व भ्रष्टाचार के विरोधस्वरूप देश की युवा पीढ़ी के अंदर का एक गुस्सा फूटा और हिंदी सिनेमा में एंग्री यंगमैन के रूप में अमिताभ बच्चन जैसे नायक का उदय हुआ.

 

देश की युवा पीढ़ी ने सिनेमा के परदे पर अमिताभ बच्चन अभिनीत एंग्री यंगमैन के अंदर अपना प्रतिबिंब देखा लेकिन उस वक्त का फिल्मकार राजनीति से कुछ स्तर पर ही प्रभावित हो रहा था. वह समाज में जो कुछ घटित हो रहा था फिर चाहे वह गुंडागर्दी हो या स्मगलिंग हो, देशभक्ति हो, आतंकवाद हो, भ्रष्टाचार हो आदि सभी से प्रेरित हो कर फिल्में बना रहा था. उस वक्त हर फिल्म में एक पुख्ता खलनायक भी हुआ करता था.

यही वजह है कि 2001 आतेआते राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने राजनीतिक भ्रष्टाचार से ले कर ‘मिग 21’ की खरीद में भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ‘रंग दे बसंती’ जैसी फिल्म बनाई और फिल्म के अंदर युवावर्ग के हाथों देश के रक्षामंत्री तक को मरवा दिया. मगर इस फिल्म के बाद भी राजनीतिक व सामाजिक हालात इतने नहीं बदले कि देश का हर बच्चा हिंसात्मक प्रवृत्ति का हो गया हो. हर बच्चे व इंसान के अंदर इमोशन इतने हावी रहे कि उस ने गली या सड़क पर उतर कर मारधाड़ करना उचित नहीं समझा जबकि हिंसा प्रधान फिल्मों ने ही अमिताभ बच्चन को सदी का महानायक तक बनाया.

हौलीवुड की चाल पर बौलीवुड

इतना ही नहीं, जब अमेरिका के लौस एंजेंल्स शहर से हौलीवुड सिनेमा का प्रादुर्भाव हुआ तो हौलीवुड ने योजनाबद्ध तरीके से लगभग हर देश के सिनेमा का खात्मा करना शुरू किया. हौलीवुड के ही चलते पूरे यूरोप का सिनेमा खत्म हो गया और पूरे यूरोप में हौलीवुड की हिंसात्मक फिल्मों ने हर इंसान को हिंसात्मक प्रवृत्ति का बना दिया.
हौलीवुड फिल्मों में 80 प्रतिशत हिंसा परोसी जा रही है. चीन, रूस, ईरान व इराक की सरकारी नीतियों के चलते हौलीवुड सिनेमा वहां पर अपने पैर ज्यादा पसारने में असफल रहा. मगर अब परोक्ष या अपरोक्ष रूप से भारत में हौलीवुड सिनेमा ने पूरी तरह से पैर पसार दिए हैं.

2001 में एफडीआई के बाद हौलीवुड फिल्में इंग्लिश के साथ ही हिंदी, कन्नड़, मलयालम व तमिल भाषा में भी प्रदर्शित हो कर अच्छाखासा व्यापार करने लगीं लेकिन वे भारतीय सिनेमा की जड़ें नहीं हिला पाईं और न ही भारतीयों में हिंसात्मक प्रवृत्ति का बीजारोपण कर पाईं क्योंकि भारतीय सिनेमा का अहम पक्ष सदैव से भावनाएं व संवेदनाएं रहा है. जबकि, हौलीवुड फिल्मों में हिंसा, मारधाड़, खूनखराबा और तकनीक तो होती है, मगर भावनाओं व संवेदनाओं का घोर अभाव होता है. यही वजह है कि हर हौलीवुड फिल्म भारत में पैसा नहीं कमा पा रही थी.

2014 के बाद बदले हालात

2014 के बाद देश की सरकार बदली तो इसी के साथ सिनेमा में भी बदलाव का एक नया दौर शुरू हुआ. देश की कट्टरवादी सरकार के परोक्ष या अपरोक्ष रुख व इशारे के चलते समाज व सिनेमा दोनों जगह हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ गई. लोगों ने गौहत्या व बीफ की स्मगलिंग व धर्म की आड़ में सड़क पर झुंड बना कर मारकाट करनी शुरू कर दी. तो वहीं सिनेमा में कहानी, परिवार, विलेन नदारद होते गए.

हौलीवुड की फिल्मों की ही तरह भारतीय सिनेमा में भी नईनई तकनीक व हिंसा के दृश्य बढ़ते गए. हौलीवुड की हिंसा प्रधान फिल्में भी भारत में करोड़ों रुपए का व्यापार करने लगीं. भारतीय फिल्मकारों के बीच भी कई सौ करोड़ की अति महंगे बजट की फिल्में बनाने की होड़ मच गई. इस में स्टूडियो सिस्टम ने आग में घी डालने का काम किया. इस होड़ के चलते फिल्मों में ऐसे मारधाड़ के दृष्य बढ़ते गए कि दर्शक की भी समझ में नहीं आया कि आखिर यह हिंसा क्यों हो रही है. भारतीय दर्शक आज भी औचित्यपूर्ण हिंसा ही फिल्म में देखना चाहता है.

नेता और फिल्मकारों की कार्यशैली एकसमान

2019 के बाद तो भारतीय सिनेमा का एक तबका पूर्णरूपेण एक खास राजनीतिक दल की तरह काम करने लगा. सत्तापरस्त सिनेमा बनाने वाले फिल्मकार अपनी फिल्मों में जबरन हिंसा परोसने के साथ ही दर्शक व फिल्म इंडस्ट्री को बंद करवाने की धमकी तक देने लगे. फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ के फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री के इस फिल्म की रिलीज के बाद के बयान किसी भी सभ्य समाज के लिए उचित नहीं कहे जा सकते.

विवेक अग्निहोत्री ने अपनी इस फिल्म में सचाई परोसने के नाम पर जम कर इस तरह से हिंसा परोसी कि दर्शक के अंदर हिंसा की प्रवृत्ति पैदा हो. हालिया प्रदर्शित रणदीप हुडा की फिल्म ‘स्वातंत्र्य वीर सावरकर’ में उन्होंने कई जगह बहुत गलत तरीके से हिंसात्मक दृश्य चित्रित कर दर्शकों के मन में हिंसा की प्रवृत्ति को ही जगाने का काम किया.

मसलन, जब वीर सावरकर को काला पानी की सजा हुई तो वे राजनीतिक कैदी थे. मगर फिल्मकार ने अपनी फिल्म में जानबूझ कर सावरकर को एक मुसलिम सिपाही के हाथों जुल्म के फुटेज दिखाए, ताकि कम्युनल एंगल दिया जाए. मजेदार बात तो यह है कि सरकारपरस्त फिल्मकार व अभिनेता रणदीप हुडा खुद हिंसा की बात करते हैं.
अपनी फिल्म की रिलीज से पहले उन्होंने अपने हर इंटरव्यू में कहा, ‘‘मैं वीर सावरकर को ‘माफी वीर’ कहने वालों की कनपटी पर कंटाप लगाना चाहता हूं.’’ क्या रणदीप हुडा ने अपनी बातों से हर बच्चे के अंदर हिंसा की प्रवृत्ति को जगाने का काम नहीं किया.

‘गांधीगीरी’ और ‘काशी टू कश्मीर’ सहित अपनी हर फिल्म में हिंसा परोसते आ रहे फिल्म लेखक व निर्देशक सनोज मिश्रा इन दिनों अपनी नई सत्तापरस्त फिल्म ‘द डायरी औफ वेस्ट बंगाल’ को प्रमोट करते हुए खुलेआम लोगों को जूते से पीटने की धमकी दे रहे हैं. वे कहते हैं, ‘‘हमारी फिल्म को प्रोपगंडा फिल्म कहने वालों को जूते से मारना चाहिए. सच बोलने वाले को आप प्रोपगंडा कहेंगे. यदि ऐसा है तो मैं प्रपोगंडा फिल्मों का सब से बड़ा निर्देशक हूं. ‘द कश्मीर फाइल’ से पहले मैं ने कश्मीर पर ‘काशी टू कश्मीर’ बनाई थी. मैं ने ही राम जन्मभूमि मुद्दे पर फिल्म बनाई और अब मैं ने बंगाल के मुद्दे पर ‘द डायरी औफ पश्चिम बंगाल’ बनाई है. यह देश की सचाई है. यह सस्ती पब्लिसिटी नहीं है. सस्ती पब्लिसिटी तो तुम लोगों को चाहिए. तुम तो वामपंथियों के तलवे चाटते हो, इसी वजह से हमारी फिल्मों को प्रोपगंडा कह रहे हो. सचाई तुम्हारे अंदर नहीं उतर रही है.

“सच को जितनी जल्दी समझ लो, उतना ही तुम्हारे लिए बेहतर होगा. सच तो जनता की आवाज है. जिस दिन जनता उतारू हो जाएगी, तुम्हारी फिल्म इंडस्ट्री भी बंद हो जाएगी. जिस तरह की तुम फिल्में बनाते हो, उस तरह की फिल्में भी खत्म हो जाएंगी. यह हमारा स्पष्ट संदेश है उन लोगों के लिए जो सच बयां करने वाली फिल्मों को प्रोपगंडा फिल्मों की संज्ञा देते हैं, खासकर, मेरी फिल्म को तो प्रोपगंडा बोलना भी मत. यह मैं आप सभी को हिदायत दे रहा हूं.’’ क्या इस तरह फिल्म निर्देशक सनोज मिश्रा आम लोगों को हिंसा के लिए उकसाने वाला काम नहीं कर रहे हैं? और अगर उन्होंने पब्लिक के लिए फिल्म बनाई है तो पब्लिक से रिऐक्शंस तो आएंगे ही, उस के लिए उन्हें तैयार भी होना चाहिए.

एक तरफ बौलीवुड में धड़ल्ले से हिंसा प्रधान फिल्में बन रही हैं तो वहीं बौलीवुड में हिंसा परोसने के आरोप भी लग रहे हैं. मगर हर फिल्मकार एक ही बात कह रहा है कि ‘लोग जिस तरह का सिनेमा देखना चाहते हैं, हम वैसा ही सिनेमा बना रहे हैं. हम सभी फिल्म निर्माता फिल्म बना कर धन कमाना चाहते हैं. यदि दर्शक हमारी फिल्में देखना बंद कर दें तो हम इस तरह की फिल्में नहीं बनाएंगे. हम हिंसा प्रधान फिल्में जरूर बना रहे हैं मगर समाज में बढ़ती हिंसा व सैक्स अपराध के लिए फिल्मों को दोष देना गलत है क्योंकि फिल्मों का समाज पर कोई असर नहीं पड़ता.’

फिल्मकार सनोज मिश्रा भी दर्शकों पर ही दोष मढ़ते हुए कहते हैं, ‘‘मैं तो इस के लिए दर्शक को दोषी मानता हूं. यदि कोई निर्माता घटिया फिल्म बनाएगा, उस फिल्म को दर्शक नहीं देखेगा तो निर्माता दूसरी बार उस तरह की फिल्म बनाने से तोबा कर लेगा क्योंकि वह फिल्म बना कर लाभ कमाना चाहता है, नुकसान नहीं. मगर दर्शक ऐसी घटिया फिल्मों को ही देख कर हर फिल्म को सफल बना रहे हैं तो निर्माता उन की मांग को पूरा करता जा रहा है. निर्माता तो 10 रुपया कमाने के लिए सबकुछ करता है. दर्शक अच्छी फ़िल्में देखना शुरू करें तो घटिया फिल्में बननी बंद होंगी और तभी सिनेमा में बदलाव आएगा. दर्शक बदल जाए, फिल्मकार अपनेआप बदल जाएगा.’’
मगर कानपुर के सिंगल थिएटर ‘श्याम पैलेस’ के मालिक अजय गुप्ता दर्शकों के बजाय फिल्मकारों को दोषी मानते हैं. वे कहते हैं, ‘‘हर फिल्मकार तकनीक का गुलाम हो गया है. वह बेवजह का ऐक्शन व सैक्स अपनी फिल्मों में परोस रहा है जिसे आम दर्शक नहीं देखना चाहता, इसीलिए हिंदी फिल्में लगातार असफल हो रही हैं. हिंदी सिनेमा बनाने वालों को कम से कम दक्षिण के सिनेमा व दक्षिण के फिल्मकारों से सबक लेना चाहिए. दक्षिण की फिल्मों में हिंसा भी जमीन से जुड़ी हुई और कहानी का हिस्सा होती है. यदि बौलीवुड अभी भी नहीं सुधरेगा तो इस का खात्मा तय है.’’

सिनेमा मालिक अजय गुप्ता की बातों में काफी सचाई नजर आती है क्योंकि पिछले चारपांच सालों में जितनी भी ऐक्शन व हिंसा प्रधान फिल्में बनी हैं, उन्हें दर्शक सिरे से नकारता आया है.हालिया प्रदर्शित अक्षय कुमार व टाइगर श्रौफ की ‘बड़े मियां छोटे मियां’, ‘बंगाल 1947’, विद्युत जामवाल की ‘जीतेगा तो जिएगा’, टाइगर श्रौफ की ‘गणपत’, रितिक रोशन की ‘फाइटर’, सिद्धार्थ मल्होत्रा की ‘योद्धा’ जैसी ऐक्शन प्रधान फिल्मों को जबरदस्त नुकसान हुआ है.

जहां तक इन असफल फिल्मों को मिलने वाले 10 प्रतिशत दर्शकों का सवाल है तो यदि इस पर गौर किया जाए तो पता चलेगा कि ये सभी एक खास राजनीतिक दल के नेताओं की कार्यशैली से परिचित हैं, जो कि बातबात पर हिंसा को बढ़ावा देने की ही बात करते हैं. अन्यथा, कटु सत्य यह है कि भारत और अमेरिका में अभी भी जमीनआसमान का फर्क है?

तो फिर हिंसा प्रधान फिल्में बन क्यों रही हैं?

अब सवाल उठता है कि कोई भी निर्माता फिल्म धन कमाने के लिए बनाता है, नुकसान उठाने के लिए नहीं. यह सच है. इस के बावजूद फिल्मकार कई सौ करोड़ का नुकसान उठाने के बावजूद लगातार फिल्में बनाता जा रहा है और नुकसान उठाता जा रहा है. इस पर शोध करने की जरूरत है.

उदाहरण के तौर पर हम सिर्फ एक निर्माता यानी कि फिल्म निर्माता बसु भगनानी की चर्चा कर लेते हैं जिन्होंने ‘बड़े मियां छोटे मियां’ का निर्माण किया है, जिसे एक अनुमान के अनुसार बौक्सऔफिस पर 300 करोड़ का नुकसान हो चुका है. यह वही फिल्म निर्माता हैं जो अब तक एकदो नहीं, बल्कि लगातार 30 असफल फिल्में बना चुके हैं. पर इन के फिल्म निर्माण करने के पीछे कई वजहें हैं. सब से पहली बात तो इस फिल्म के नायक अक्षय कुमार हैं. दूसरी बात, फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ की शूटिंग जौर्डन में की गई है. जौर्डन की सरकार ने इस फिल्म को करोड़ों रुपए की सब्सिडी दी है. सब्सिडी के आंकड़े अभी सामने नहीं आए हैं.

फिल्म की शूटिंग के दौरान जौर्डन सरकार की स्पौंसरशिप पर 40 पत्रकार मुंबई से जौर्डन भी गए थे. इस के अलावा वासु भगनानी बिल्डर हैं. उन के दूसरे कई अन्य व्यवसाय हैं. वर्तमान सरकार से भी उन के अच्छे संबंध हैं. वहीं, उन का दामाद कांग्रेस पार्टी से महाराष्ट्र में विधायक है.

हिंसा प्रधान फिल्मों को नकारता दर्शक

हर इंसान अपनी जिंदगी के गमों और अपने आसपास घट रही घटनाओं को भुलाने व मनोरंजन पाने के लिए फिल्में देखने सिनेमाघर के अंदर जाता है. वह सिनेमाघर के अंधेरे में फिल्में देखते हुए सपनों की दुनिया में जीना चाहता है. वह फिल्म के परदे पर वह सब देखना पसंद करता है जिसे वह करना चाहता है, पर कर नहीं सकता. वह विलेन को हीरो के हाथों पिटते हुए देखना चाहता है.

2010 तक तो ऐसा उसे फिल्मों में मिल रहा था. अब फिल्मों में जिस तरह का ऐक्शन दिखाया जा रहा है, उस से आम इंसान खुद रिलेट नहीं कर पाता. दूसरी बात, दर्शक को हिंसा या ऐक्शन की वजह भी चाहिए होती है, जिस का घोर अभाव होता है. अब अमेरिका व लंदन से फिल्ममेकिंग सीख कर आ रहे फिल्मकार पूरी तरह से हौलीवुड से प्रभावित हैं. वे वीएफएक्स की मदद से परदे पर शानदार ऐक्शन उकेर रहे हैं. इन में से ज्यादातर ऐक्शन इंसान टीवी या मोबाइल पर वीडियो गेम में देख चुका होता है.
दूसरी बात, हौलीवुड फिल्मों में इमोशन के लिए कोई जगह नहीं है, उसी तरह अब भारतीय फिल्मकार की ऐक्शन प्रधान फिल्मों में भी इमोशन के लिए जगह नहीं रह गई है. जबकि ऐक्शन दृश्यों में भी इमोशन चाहिए. इस के अलावा ऐक्शन फिल्मों में कहानी नहीं नजर आती. हर फिल्म में दोहराव नजर आता है. इंसान अपनो सें नहीं लड़ना चाहता. मगर आप शाहरुख खान व जौन अब्राहम वाली फिल्म ‘पठान’ को ले लें या अक्षय कुमार व टाइगर श्रौफ की फिल्म ‘बड़े मियां छोटे मियां’ को ले लें. दोनों ही फिल्मों में विलेन कोई बाहरी नहीं है, बल्कि ये अपनों से ही लड़ रहे हैं.

फिल्म ‘पठान’ में जौन अब्राहम का किरदार पूर्व रौ औफिसर का है जिसे जबरन रिटायर कर दिया गया था और उसे सम्मान नहीं मिला था. इसलिए वह अब अपने ही देश के खिलाफ विलेन हो गया है. इसी तरह ‘बड़े मियां छोटे मियां’ में भी पृथ्वीराज सुकुमारन अपनी संस्था से नाराज हो कर अब अपने ही देश का दुश्मन बना हुआ है. इस तरह की दोहराव वाली कहानी के साथ दर्शक रिलेट नहीं करता. इन के ऐक्शन दृश्यों के साथ भी कोई रिलेट नहीं कर पाता. हर लड़ाई या ऐक्शन के पीछे औचित्य होना चाहिएजो कि बौलीवुड फिल्मों में नजर नहीं आता. जबकि, दक्षिण के फिल्मकार अपनी फिल्म में मारधाड़ के औचित्य को बताते हैं, इसलिए भी बौलीवुड ऐक्शन फिल्में असफल हो रही हैं.
‘केजीएफ 2’ के ऐक्शन निर्देशक आरिव कहते हैं, ‘‘पहले सारे ऐक्शन दृश्य हम ऐक्शन डायरैक्टर ही कंसीव व कोरियोग्राफ करते थे पर अब निर्देशक अपने सुझाव देता रहता है. उस के सारे सुझाव किसी न किसी हौलीवुड फिल्म से प्रभावित होते हैं. आजकल हर दर्शक किसी भी हौलीवुड फिल्म को टीवी या ओटीटी प्लेटफौर्म पर आसानी से देखता रहता है. इस कारण भी हमारी फिल्मों के ऐक्शन दृश्य चोरी के नजर आते हैं, जिस के चलते वह हमारी फिल्मों से दूर रहता है.

“हम यह नहीं कहते कि समाज में हिंसा कम है. समाज में हिंसा काफी बढ़ी हुई है पर उस के लिए राजनीतिक, सामाजिक व पारिवारिक वजहें होती हैं जिन्हें कोई भी फिल्मकार अपनी फिल्म का हिस्सा नहीं बनाता और हम भी ऐक्शन दृश्यों को यथार्थ के धरातल पर फिल्माने के बजाय वीएफएक्स के सहारे क्रिएट करने लगे हैं जो कि अपना प्रभाव नहीं छोड़ता है.’’

अभिनेता व अभिनयगुरु आनंद मिश्रा कहते हैं, ‘‘सच यह है कि सबकुछ नकली परोसा जा रहा है. मसलन, एक इंसान 10 दिन से या 2 माह से कोमा में था तो जब उसे होश आएगा तो वह अंदर से डरा हुआ रहेगा और बहुत घबराते हुए धीरेधीरे बात करने का प्रयास करेगा. मगर यहां तो कुछ भी दिखा रहे हैं. यही हाल हिंसा के दृष्यों का है. यही वजह है कि फिल्में असफल हो रही हैं.’’

जानिए क्यों बदलती जीवनशैली में फैशन का फिल्मों से संबंध पहले जैसा नहीं रहा

फैशन उद्योग, बौलीवुड फिल्मों से हमेशा काफी प्रभावित रहा है. हमारे देश के लोग अपने पसंदीदा अभिनेता व अभिनेत्रियों के प्रति आकर्षित होते हैं और चाहते हैं कि वे वही पहनें, जो उन के फैशन आइकन ने उस विशेष फिल्म में पहना है. इसे बनाने वाले कौस्ट्यूम डिजाइनर होते हैं जो चरित्र के अनुसार डिजाइन बनाते हैं जो देखने में सुंदर और आकर्षक लगता है.

बौलीवुड उद्योग की शुरुआत से ही फैशन ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा और दोनों उद्योग एकसाथ नई ऊंचाइयों पर पहुंचे. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ही ऐसी जगह है जो बदलते फैशन को स्वीकार करती है. भारतीय फिल्मों में भव्य और विदेशी वेशभूषा, सेट, रंग संयोजन, आभूषण आदि की भरमार होती है. इस भव्यता और स्टाइलिश तत्त्वों को देख कर दर्शक अनायास ही आकर्षित होते हैं.

फिल्मों का फैशन था पहली पसंद

80 का दशक फिल्म इंडस्ट्री के फैशन का सब से खराब दौर था. उस समय के फैशन ट्रैंड में पैडेड शोल्डर, मैटेलिक सबकुछ और चमकदार, बड़े एक्सैसरीज शामिल थे, जिसे धीरेधीरे बदला गया और 90 के दशक की भारतीय फिल्मों ने फैशन पर जोर दिया, जिस में एथनिक कपड़ों में लंबी आस्तीन, पारदर्शी दुपट्टे और छोटे ब्लाउज आदि का क्रेज था, जो बाद में क्रौप टौप, शौर्ट्स, औफशोल्डर, हौल्टर नेक और डैनिम ओवरऔल के रूप में फिल्मों में दिखने लगी, क्योंकि फैशन अधिक संयमित होने लगा. इस के बाद स्पोर्ट्सवियर एक नया फैशन था, जिसे फिल्म ‘कुछ कुछ होता है’ और ‘दिल तो पागल है’ फिल्मों ने लोकप्रिय बनाया और तब से इसे लोग पहनने लगे हैं.

फैशन और मार्केटिंग

फिल्म और उस की मार्केटिंग में भी फैशन का महत्त्व देखा गया है. यही वजह है कि कुछ फिल्मों का रीमेक बनाने का निर्णय भी निर्देशकों ने लिया. मसलन, देवदास का कई बार रीमेक समय के अनुसार और दर्शकों को नए फैशन से परिचय करवाने के लिए किया गया और आज भी कई पुरानी फिल्मों का रीमेक बनाया जा रहा है, जिस में आधुनिक पहनावे को महत्त्व देते हुए फिल्में बनाई जा रही हैं.

निर्मातानिर्देशक संजय लीला भंसाली इस में मुख्य भूमिका अदा करते हैं क्योंकि उन्होंने पुराने ‘देवदास’ को एक भव्य रूप दिया और दर्शकों ने उसे पसंद भी किया. उस फिल्म की साड़ी ड्रैसिंग को आज भी महिलाएं किसी खास अवसर पर पहनना पसंद करती हैं.

कोविड ने बदला फैशन

इस बारे में डिजाइनर श्रुति संचेती कहती हैं. “फैशन का हिंदी फिल्मों से बहुत पुराना नाता रहा है. कोविड 19 ने इस के रूप को पूरी तरह से बदल दिया है. अब फैशन थोड़ा साधारण हो गया है. पहले की तरह एक स्टेटमैंट वाला फैशन अब नहीं रहा क्योंकि उस समय लोग घर पर रह कर, एथलेजर, कार्सेटस, लूज कपड़े आदि पहनने लगे थे. ये कपड़े आरामदायक होने के साथसाथ स्टाइलिश भी हैं. टाइट फिटिंग का टाइम अब नहीं रहा.”

कोर्ड सेट बनी महिलाओं की पहली पसंद

डिजाइनर श्रुति संचेती आगे कहती हैं, “कोर्ड सेट को महिलाओं ने काफी पसंद किया. यह देखने में नाइट सूट लगता है, लेकिन यह स्टाइलिश और सब की पसंद बन चुका है. मेरे औफिस में कई महिलाएं कोर्ड सेट पहनती हैं क्योंकि ये आरामदायक हैं और कैरी करना भी आसान होता है. इस के अलावा आजकल रिजौर्ट वेयर भी बहुत पौपुलर हो गया है, जिस में कफ्तान, मैक्सी आदि महिलाएं पसंद कर रही हैं. फैशन में बदलाव की एक वजह ग्लोबल वार्मिंग और लोगों की जागरूकता भी है. आज लोग सूती और कैजुअल कपड़े पहनना पसंद कर रहे हैं जो वातावरण के लिए अच्छा हो, आर्टिफिशिल फैब्रिक की डिमांड पहले से काफी कम हो चुकी है.”

फैशन है एक्स्प्रैशन

श्रुति बताती हैं कि महिलाएं किसी भी फैशन को पुरुषों से जल्दी अडौप्ट करती हैं क्योंकि पुरुष जरूरत के अनुसार फैशन अडौप्ट करते हैं, जबकि महिलाएं खुद को एक्सप्रैस करने, सैल्फकेयर और खुद को यूनीक दिखाने के लिए फैशन को अडौप्ट करती हैं. यही वजह है कि उन्हें अलगअलग प्रकार के वस्त्र पहनना पसंद होता है, जिस की खरीदारी वे करती रहती हैं. उन्हें एक्स्प्लोर करना भी अच्छा लगता है, जबकि पुरुष अपने एक ही पहनावे पर चिपके रहते हैं. वे किसी नए फैशन को एक्स्प्लोर करने से परहेज करते हैं.

जमाना सस्टेनेबल फैशन का

यह सही है कि रेड कार्पेट पर लोग भव्य कपड़े पहनते है, लेकिन वे वहीं तक ही सीमित हो चुके हैं. इस के अलावा आज की महिला सस्टेनेबल फैशन को अधिक अडौप्ट करती है यानी किसी भी मौसम में बारबार पहने जाने वाले कपड़ों को वह खरादती है, जो 8 से 10 साल तक पहने जा सकें, इस में वह ट्रैंड को फौलो नहीं करती. आज की महिला माइंडफुल पर्चेज करती है, जिस से पर्यावरण, संस्कृति और ट्रैंड सभी में वह ठीक हो.

मौडेस्ट फैशन है अधिक पौपुलर

मौडेस्ट फैशन के चलते खुलेखुले रिवील करने वाली ड्रैस भी महिलाएं कम पहनती हैं क्योंकि इन में सिंथेटिक फैब्रिक या इलास्टिक अधिक होता है, जो आज की यूथ को सूट नहीं करता. इस के अलावा अधिक गरमी या अधिक सर्दी में ये स्किन के लिए सही नहीं होते, इसलिए वे कूलएंड स्टाइलिश कपड़े पहनती हैं, जो उन की खूबसूरती को बढ़ाते हैं.

फिल्मों का प्रभाव हुआ है कम

इतना ही नहीं, आज फिल्मों का प्रभाव आम जीवन पर कम हो गया है. ओटीटी से लोग अधिक प्रभावित हैं और इस का कंटैंट बहुत कैजुअल होता है, उस में रोजमर्रा की जिंदगी को अधिक दिखाया जाता है, जो साधारण माहौल में वास्तविक कहानी को कहने की होती है, जिसे दर्शक पसंद करते हैं.

इस के अलावा आजकल सोशल मीडिया से महिलाएं और यूथ काफी प्रभावित होते हैं क्योंकि उन का अधिकतर समय उसी पर बीतता है और वे किसी इंफ्लुएंसर द्वारा पहने गए किसी भी आउट्फिट को पहनना चाहते हैं. इस प्रकार फिल्मों से अधिक आजकल सोशल मीडिया और ओटीटी फैशन को कंट्रोल कर रहे हैं.

उड़ान : दीपा को बुढ़ापे मेें क्या याद आ रहा था?

देखते ही देखते दीपा की दुनिया बदल गई थी. रजत तो रजत, बच्चे भी मानो अजनबी, अनजान हो चले थे. सुना, पढ़ा था कि इंसान बुढ़ापे में अकेला हो जाता है, स्नेहसिक्त दो बोलों को तरस जाता है, पर यहां तो 40 बसंत, पतझड़ देखते न देखते वृद्धावस्था सी उदासी और एकांतता घिर आई. रजत कार्यालय के कार्यों में व्यस्त, तो बच्चे अपनेआप में मस्त. अकेली पड़ गई दीपा मन को बहलानेफुसलाने का यत्नप्रयत्न करती, ‘पदप्रतिष्ठा के दायित्वों  तले दबे रजत को घोर समयाभाव सही, पर अब भी वह उस से पहले जैसा ही स्नेह रखता है.

‘बच्चे नटखट सही, पर उद्दंड तो नहीं. सभ्य, सुसंस्कृत एवं बुद्धिमान. लेकिन वे अब मुझ से इतना कतराते क्यों हैं? हरदम मुझ से दूर क्यों भागते हैं?’

अकस्मात ही आया यह परिवर्तन दीपा के लिए विस्मयकारी था. उसे सहसा विश्वास ही न होता कि ये वही बच्चे हैं जो ‘मांमां’ करते हर पल उस के आगेपीछे डोलते रहते थे. स्कूल से लौटते ही अपनी नन्हीनन्ही बांहें पसार उस की ओर लपकते थे, कैसा अजब, सुहाना खेल खेलते थे वे, ‘जो पहले मां को छुएगा मां उस की.’ ‘मां मेरी है, मैं ने उसे पहले छुआ.’ ‘नहीं, मां मेरी है मैं ने उसे पहले छुआ.’ होड़ से हुलसते नेह के घेरों में बंधीबंधी दीपा अनुराग से ओतप्रोत हो जाती.

‘अरेअरे, लड़ते क्यों हो, मां तो मैं तुम दोनों की ही हूं न.’

‘नहीं, तुम पहले मेरी हो. मैं ने तुम्हें पहले छुआ था,’ सौरभ ठुनकता.

‘पहले छूने से क्या होता है पागल, मैं बड़ी हूं, मां पहले मेरी ही है,’ रुचि दादी मां की तरह विद्वत्ता जताती.

सौरभ फिर भी हार न मानता, ‘मां ज्यादा मेरी है. मैं ने अभी उसे जल्दी नहीं छुआ क्या?’ रुचि बड़प्पन का हक जताती, ‘नहीं, मां ज्यादा मेरी है. मैं…’

‘अरे, रे झगड़ो नहीं. मैं तुम दोनों की हूं, बिलकुल बराबरबराबर. अब जल्दी करो, बस्ते उतारो, कपड़े बदलो और हाथमुंह धोओ. बड़े जोर की भूख लगी है,’ विलक्षण वादविवाद पर विराम लगाने के लिए दीपा अमोघ अस्त्र चलाती. तीर निशाने पर बैठता. ‘मां को भूख लगी है. ‘मां अकेली खाना नहीं खाएगी.’ तेरीमेरी का हेरफेर भूल दोनों जल्दीजल्दी अपने नन्हेमुन्ने कार्यों में जुट जाते तो दीपा गर्वगरिमा से दीप्त हो उठती कि कितने छोटे हैं, फिर भी कितना ध्यान है मां का. उस के अंतस में फिर अनुराग हिलोरें ले उठता. दोनों ही दौड़ कर पटरों पर जम जाते. नन्ही सी रसोई में दीपा की प्यारी सी दुनिया सिमट आती.

खाने, परोसने, मानमनुहार के साथ बातें चलतीं तो चलती ही चली जातीं. अध्यापिका की बातें, मित्रों की बातें, खेल की, पढ़ाई की, इधरउधर की कहनेसुनाने में दोनों में हरदम होड़ मची रहती. दीपा के मन पर उत्सव सा उल्लास छाया रहता. खापी कर रसोई समेट कर दीपा दो घड़ी लेटने का उपक्रम करती तो फिर घेरी जाती, ‘मां, मां, कहानी सुनाओ न,’ दोनों उस के अगलबगल आ लेटते. ‘अरे, दिन में कहानी थोड़े ही सुनाई जाती है. मामा रास्ता भटक जाएंगे.’ वह अलसा कर बहाना बनाती तो बतकही को बहने का एक और कारण मिल जाता. मामा की बातें, मामी की बातें, मौसी की बातें, दूर बसे स्वजनों की स्नेहिल स्मृतियों को संजोतेसंजोते तीनों ही सपनों के संसार में खो जाते. पर अब, अब सबकुछ कितना बदलाबदला सा है. बच्चे बड़े क्या हुए, मां को ही बिसरा बैठे. और बड़ा होना भी क्या, कच्ची किशोरवयता कोई ऐसी बड़ी परिपक्वता तो नहीं कि अपनी दुनिया अलग ही बसा ली जाए.

‘हाय मां,’ कालेज से लौटी रुचि मुसकराहट उछालती. किताबें पटक कर यंत्रवत काम निबटाती. खाने की मेज पर पहुंचते ही वह किसी पत्रिका में मुंह दे कर बैठ जाती. खाना और पढ़ना साथसाथ चलता.

‘मां, तुम ने खाना खाया?’ अचानक ही याद आने पर पूछती. लेकिन उत्तर सुनने से पहले ही कथा, पात्रों के चरित्रों में गुम हो जाती.

सौरभ को खाने के साथ टीवी देखना भाता. ‘मां, तुम भी आओ न,’ कहते न कहते वह भी दूरदर्शनी चलचित्रों के साथ हंसनेमुसकराने लगता. न मान, न मनुहार. मां को बुलाना भी मात्र औपचारिकता हो मानो. पहले हरदम पल्लू पकड़ कर पीछे पड़ने वाले बच्चों को अब जरा भी मेरी जरूरत नहीं, दीपा खोईखोई सी रहती. हरदम रोंआसी और उदास. उस दिन रुचि की सहेलियां आई हुई थीं. बैठक में हंसी की फुलझडि़यां फूट रही थीं. बेमतलब के ठहाके बरस रहे थे. खूब हंगामा मचा हुआ था. किस को कौन सा फिल्मी हीरो भाता है, बस, इसी बात पर वादविवाद चल रहा था. सभी अपनेअपने प्रिय के गुणों का गुणगान करते हुए अन्य के चहेतों के अवगुणों की खोजपरख में लगी थीं.

दीपा शरबत, नाश्ता ले कर पहुंची तो अपनेपन से वहीं बैठ गई. बच्चों के साथ बच्चा बन जाना उस का सदा का स्वभाव था. पर यह क्या? कमरे में एकाएक ही स्तब्ध सन्नाटा घिर आया. निरंतर बजते कहकहे भी बंद हो गए. सरसता बनाए रखने के लिए दीपा ने सरलता से बातों के क्रम को आगे बढ़ाया, ‘हमारी पसंद भी तो पूछो न,’ उस के इतना कने पर मौन लड़कियां मुसकराईं. ‘भई, हमें तो आज भी अपना अमिताभ ही भाता है,’ पर लड़कियां फिर भी चुप, असहज ही बनी रहीं तो दीपा से बैठा न गया, वह रसोई में काम का बहाना बना, खाली ट्रे उठा, उठ खड़ी हुई. रुचि ने भी बैठने को नहीं कहा. उस के उठते ही कमरा फिर किलकारियों से भर गया. लड़कियां फिर से मुखर हो उठीं.

तो क्या एक वही थी अनचाही, अवांछित. क्या वह अब रुचि की केवल मां है. वह भी एक पीढ़ी की दूरी वाली मां. मित्रवित्र कुछ भी नहीं? पर उस ने तो ममता के साथसाथ, सखीसहेली सा सान्निध्य भी दिया है बेटी को. वह गुडि़या के ब्याह रचाना, वह अपना नन्हा सा ‘घर बसाना’, वह रस्सीकूद, लुकाछिपी का खेल, बीती सारी बातें भूल कैसे गई बेटी? दीपा का मन भर आया. बेटाबेटी, दोनों पर उस का स्नेह समान था. लेकिन अब दोनों ही उस से दूर निकलते जा रहे थे.

सौरभ भी पढ़ाई की पुस्तकों से समय पाता तो वाकमैन से गाने सुनने लगता. अब कोई भला उसे कैसे पुकारे? वाकमैन उतरा नहीं कि ‘वीडियो गेम’ के आंकड़ों से उलझने लगता.

अकेलेपन से उकता कर दीपा पास जा बैठती भी तो हर बात का उत्तर बस, ‘हां, हूं’ में मिलता.

‘अरे मां, करवा दी न तुम ने सारी गड़बड़. इधर तुम से बात करने लगा, उधर मेरा निशाना ही चूक गया. बस, 5 मिनट, मेरी अच्छी मां, बस, यह गेम खत्म होने दो, फिर मैं तुम्हें सबकुछ बताता हूं.’ पर कहां? 5 मिनट? 5 मिनट तो कभी खत्म होने को ही नहीं आते. कभी टीवी चल जाता, तो कभी दोस्त पहुंच जाते. दीपा यों ही रह जाती अकेली की अकेली. क्या करे अब दीपा? पासपड़ोस की गपगोष्ठियों में भाग ले?

अकारण भटकना, अनर्गल वार्त्तालाप, अनापशनाप खरीदफरोख्त, यह सब न उसे आता था न ही भाता था. उस के मन की खुशियां तो बस घर की सीमाओं में ही सीमित थीं. अपना परिवार ही उसे परमप्रिय था. क्या वह स्वार्थी और अदूरदर्शी है? ममता के असमंजस का अंत न था. गृहिणी की ऊहापोह भी अनंत थी. ऐसा भी न था कि घरपरिवार के अतिरिक्त दीपा की अपनी रुचियां ही न हों.

हिंदी साहित्य एवं सुगमशास्त्रीय संगीत से उसे गहरा लगाव था. संगीत की तो उस ने विधिवत शिक्षा भी ली थी. कभी सितार बजाना भी उसे खूब भाता था. नयानया ब्याह, रजत की छोटी सी नौकरी, आर्थिक असुविधाएं, संतान का आगमन, इन सब से तालमेल बैठातेबैठाते दीपा कब अपनी रुचियों से कट गई, उसे पता भी न चला था. फिर भी कभीकभी मन मचल ही उठता था सरगमी तारों पर हाथ फेरने को, प्रेमचंद और निराला की रचनाओं में डूबनेउतरने को. पर कहां? कभी समय का अभाव तो कभी सुविधा की कमी. फिर धीरेधीरे, पिया की प्रीत में, ममता के अनुराग में वह अपना सबकुछ भूलती चली गई थी.

किंतु अब, कालचक्र के चलते स्थितियां कैसे विपरीत हो गई थीं. अपार आर्थिक सुविधाएं, समय ही समय, सुस्ती से सरकने वाला समय. मन…मन फिर भी उदास और क्लांत.

रजत उसे चाह कर भी समय न दे पाता और बच्चे तो अब उसे समय देना ही नहीं चाहते थे. कहां कमी रह गई थी उस की स्नेहिल शुश्रूषा में? ठंडे ठहराव भरी मानसिकता में रजत के लखनऊ तबादले का समाचार सुन दीपा के मुख पर अकस्मात मधुर मुसकान बिखर गई कि नई जगह नए सिरे से रचनाबसना, कुछ दिनों के लिए ही सही, यह एकरसता अब तो टूटेगी.

‘‘हे नारी, सच ही तुम सृष्टि की सब से रहस्यमय कृति, मायामोहिनी, अबूझ पहेली हो.’’

जरा सी मुसकान की ऐसी प्रतिक्रिया कि दीपा और भी खिलखिला उठी. ‘‘कहां तो मैं सोच रहा था कि तबादले की सुन कर तुम खीजोगी, झल्लाओगी पर तुम तो मुसकरा और खिलखिला रही हो, आखिर इस का राज क्या है मेरी रहस्यमयी रमणी?’’

अब दीपा क्या कह कर अपनी बात समझाती. ऊहापोह और अंतर्द्वंद्व को शब्द देना उसे बड़ा कठिन कार्य लगता. यों एकदो बार उस ने अपनी समस्या रजत को सुनाई भी थी, पर स्वभावानुसार वह सब हंसी में टाल जाता, ‘सृष्टि सृजन का सुख उठाओ मैडम, संतान को संवारो, संभालो, बस. अपेक्षाओं को पास न पड़ने दो, कुंठा खुद ही तुम से दूर रहेगी.’ ‘संतान से स्नेह, साथ की आशा रखना भी जैसे कोई बड़ी भारी अपेक्षा हो, हुंह,’ दीपा को रजत की भाषणबाजी जरा न भाती.

दीपा की संभावना सही सिद्ध हुई. नई जगह के लिए दायित्व, नई व्यस्तताएं. नया स्कूल, नया कालेज. संगीसाथियों के अभाव में बच्चे भी आश्रित से आसपास, साथसाथ बने रहते. दीपा को पुराने दिनों की छायाएं लौटती प्रतीत होतीं. सबकुछ बड़ा भलाभला सा लगता. किंतु यह व्यवस्था, यह सुख भी अस्थायी ही निकला. व्यवस्थित होते ही बच्चे फिर अपनी पढ़ाई और नए पाए संगसाथ में मगन हो गए. रजत तो पहले से भी अधिक व्यस्त हो गया. दीपा के अकेलेपन का अंत न था. अवांछना, अस्थिरता एवं असुरक्षा के मकड़जाल फिर उस के मनमस्तिष्क को कसने लगे. दीवाली के बाद लखनऊ के मौसम ने रंग बदलना शुरू कर दिया. कहां मुंबई का सदाबहार मौसम, कहां यह कड़कती, सरसराती सर्दी. जल्दीजल्दी काम निबटा कर दीपा दिनभर बरामदे की धूप का पीछा किया करती. वहीं कुरसी डाल कर पुस्तक, पत्रिका ले कर बैठ जाती. बैठेबैठे थकती तो धूप से तपे फर्श पर चटाई डाल कर लेट जाती.

उस दिन, रविवार को उसे सुबह से ही कुछ हरारत सी हो रही थी. ‘छुट्टी वाले दिन भी रजत की अनुपस्थिति और व्यस्तता का अवसाद होगा,’ यह सोच कर वह सुस्ती को झटक ज्योंत्यों काम में जुटी रही. ‘इतनी बड़ी हो गई है रुचि, पर जरा खयाल नहीं कि छुट्टी वाले दिन ही मां की थोड़ी सी मदद कर दे. पढ़ाई… पढ़ाई…पढ़ाई. हरदम पढ़ाई का बहाना. हुंह.’

आज सर्दी कुछ ज्यादा ही कड़क है शायद. झुरझुरी जब ज्यादा सही न गई तो हाथ का काम आधे में ही छोड़ वह बाहर बरामदे की धूप सेंकने लगी. पर धूप भी कैसी, धुंधलाईधुंधलाई सी, एकदम प्रभावहीन और बेदम. बगिया के फूल भी कुम्हलाएकुम्हलाए से थे. सर्दी के प्रकोप से सब परेशान प्रतीत हो रहे थे. दीपा ने शौल को कस कर चारों ओर लपेट लिया और वहीं गुड़ीमुड़ी बन कर लेट गई. अंतस की थरथराहट थी कि थमने क ा नाम ही नहीं ले रही थी. सिर भारी और आंखें जलती सी लगीं. ‘रुचि को आवाज दूं? बुलाने से जैसे वह बड़ा आ ही जाएगी.’ कंपकंपाती, थरथराती वह यों ही लेटी रही, मौन, चुपचाप.

‘‘हाय मां, अंदर तो बड़ी सर्दी है और तुम यहां मजे से अकेलेअकेले धूप सेंक रही हो,’’ रुचि ने कहा. दीपा ने आंखें खोलने का यत्न किया, पर पलकों पर तो मानो मनभर का बोझा पड़ा हो.

‘‘मां, मां, देखो तो, धूप कैसी चटकचमकीली है.’’

‘‘चटकचमकीली?’’ दीपा ने आंखें खोलने का प्रयत्न किया, पर आंखें फिर भी नहीं खुलीं.

रुचि हैरान हो गई. बोली, ‘‘मां, तुम इस समय सो क्यों रही हो?’’ उस ने उस के हाथों को झकझोरा तो चौंक गई, ‘‘मां, तुम्हें तो बुखार है. इतना तेज बुखार. बताया क्यों नहीं? सौरभ, सौरभ, मां को तो देख.’’ 4-5 आवाजें यों ही अनसुनी करने वाला सौरभ आज बहन की पहली ही पुकार पर दौड़ा चला आया, ‘‘क्या हुआ, बुखार? बताया क्यों नहीं?’’

दोनों ने सहारा दे कर उसे अंदर बिस्तर पर लिटा कर मोटी रजाई ओढ़ा दी, पर कंपकंपी थी कि कम ही नहीं हो रही थी. ‘‘सौरभ, जा जल्दी से सामने वाली आंटी से उन के डाक्टर का फोन नंबर, नहींनहीं, फोन नहीं, पता ही ले ले और खुद जा कर डाक्टर को अपने साथ ले आ. मैं यहां मां के पास रहती हूं, जा, जा, जल्दी.’’

‘नई जगह, नए लोग, अकेला सौरभ भला कहां से…’ पर तंद्रा ऐसी भारी हो रही थी कि दीपा से कुछ बोलते भी न बना. सौरभ डाक्टर के पास दौड़ा तो रुचि भाग कर अदरक वाली चाय बना लाई. कमरे में हीटर लगा दिया. फिर हाथपैरों को जोरजोर से मलने लगी.

‘‘तुम भी मां कुछ बताती नहीं हो,’’ आतुर उत्तेजना में बारबार रुचि अपनी शिकायत दोहराती जा रही थी. देखते ही देखते डाक्टर भी पहुंच गया. आननफानन दवा भी आ गई. बच्चे, जिन्हें अब तक दीपा सुस्त ही समझती थी, बड़े ही चतुर, चौकस निकले. उन की तत्परता और तन्मयता भी देखते ही बनती थी. बच्चे, जिन्हें दीपा आत्मकेंद्रित ही समझती थी, आज साये की भांति उस के आगेपीछे डोल रहे थे. उन का यह स्नेह, यह सेवा देख कर दीपा के सारे भ्रम दूर हो गए थे. इस बीमारी ने उस की आंखें खोल दी थीं. रसोईघर से दूरदूर भागने वाली, भूलेभटके भी अंदर न झांकने वाली रुचि, चायनाश्ते के साथसाथ दालचावल भी बना रही थी तो दलिया, खिचड़ी भी पका रही थी. दीपा हैरान कि छिपेरुस्तम होते हैं आजकल के बच्चे. सौरभ को स्कूल भेज वह मुस्तैदी से मोरचे पर डटी रहती. दीपा के पथ्य को भी ध्यान रखती, घर की भी देखरेख करती. उस के कार्यों में अनुभवहीनता की छाप अवश्य थी, पर अकर्मण्यता की छवि कदापि नहीं.

चौथे दिन बुखार टूटा. दीपा को कुछकुछ अच्छा भी लग रहा था. दोपहर को रुचि ने बाहर धूप में बैठा दिया था. ‘‘तेरी पढ़ाई का तो बहुत नुकसान हो रहा है, रुचि.’’

‘‘कुछ नहीं होता मां, मैं सब संभाल लूंगी.’’

‘‘एकसाथ कितना सब जमा हो जाएगा, बड़ी मुश्किल होगी.’’

‘‘कोई मुश्किलवुश्किल नहीं होगी. वैसे भी कालेज कभीकभी गोल करना चाहिए.’’

‘‘अच्छा, तो यह बात है.’’

‘‘तुम तो बेकार ही चिंता करती हो, मां. कल पिताजी आ जाएंगे. कल से वे छुट्टी ले कर तुम्हारे साथ बैठेंगे, मैं कालेज चली जाऊंगी,’’ रुचि ने पीछे से गलबांही डाल कर सिर को हौले से उस के कंधे पर रख दिया. ‘कितनी बड़ीबड़ी बातें करने लगी है उस की नन्ही सी गुडि़या,’ मन ही मन सोच दीपा ने स्नेह से बेटी को अंक में भींच लिया. ‘‘मां, मां, तुम अच्छी हो गईं,’’ स्कूल से लौटा सौरभ गेट से ही चिल्लाया और दौड़ कर आ कर मां की गोद में सिर रख दिया.

‘‘अरे बेटा, क्या कर रहे हो, पीठ पर मनभर का बस्ता लादेलादे घुस गया मां की गोद में जैसे कोई नन्हा सा मुन्ना हो,’’ रुचि ने झिड़का. ‘‘मां, देखो न दीदी को, जब से तुम बीमार पड़ी हो, हर समय मुझे डांटती रहती है,’’ सिर गोद में छिपाएछिपाए ही सौरभ ने बहन की शिकायत की. प्रत्युत्तर के लिए रुचि ने मुंह खोला ही था कि दीपा ने उसे चुप रहने का संकेत किया. फिर स्वयं दोनों को सहलाती रही, चुपचाप. बच्चे बदले कहां थे? वे तो बस बड़े हो रहे थे. किशोरावस्था की ऊहापोह से जूझते अपने अस्तित्व को खोज रहे थे. ऊंची उड़ान को आतुर उन के नन्हेनन्हे पर आत्मशक्ति को टटोल रहे थे. मां के आंचल की ओट से उबरना, उम्र मां की भी थी तो समय की आवश्यकता भी. फिर जननी को यह असमंजस कैसा?

‘‘मां, मां, याद है बचपन में हम कैसा खेल खेलते थे,’’ रुचि भी बीते दिनों की बातों, यादों को दोहरा रही थी, ‘‘जो मां को पहले छुएगा, मां उस की. हाय मां, कितने बुद्धू हुआ करते थे हम दोनों.’’ ‘‘अब तो जैसे बड़ी समझदार हो गई हो. मां, पता है दीदी ने कल खिचड़ी में नमक ही नहीं डाला था और, और बताऊं, रोटी ऐसी बनाती है जैसे आस्ट्रेलिया का नक्शा हो,’’ गोद से सिर उठा कर सौरभ बहन को चिढ़ाने लगा था. ‘‘ठीक है बच्चू, आगे से तेरे को घी चुपड़ी गोल रोटी नहीं, मक्खन चुपड़ी चौकोर डबलरोटी मिलेगी. हुंह, बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद. पहले अंदर चल कर अपना बोरियाबिस्तर उतार और हाथमुंह धो.’’

बस्ता उतरवा, जूतेमोजे खुलवा रुचि ने सौरभ को बाथरूम में धकेल दिया और खुद रसोईघर में चली गई. ‘‘चलो मां, शुरू हो जाओ,’’ रुचि ने सब का खाना बाहर चटाई पर ही सजा दिया था. ‘‘मुझे तो बिलकुल भूख नहीं, बेटा.’’

‘‘अरे वाह, भूख कैसे नहीं है. जल्दीजल्दी खाना खा लो. फिर दवाई का भी समय हो रहा है,’’ रुचि ने आदेश दिया.‘‘आज तुम ने अभी तक जूस भी नहीं पिया?’’ खाने पर झपटते हुए सौरभ ने कहा.

सा रे ग म पा…

सा रे ग म पा…

एकाएक दीपा के अंतस में संगीत स्वरलहरी झनझना उठी, ‘हाय, कितने बरस हो गए सितार को हाथ तक नहीं लगाया.’ सूरज सोना बरसा रहा था. बगिया में बसंत बिखरा पड़ा था. अपार अंतराल के बाद, आकंठ आत्मसंतुष्टि में डूबा दीपा का मस्तिष्क गीत गुनगुना रहा था.

क्या इन्फैचुएशन प्यार नहीं है?

कुछ लोगों ने यह शब्द शायद पहली बार सुना होगा लेकिन सब की जिन्दगी में यह शब्द केवल एक शब्द न हो कर वास्तविकता रखता है. लव, प्यार, मोहब्बत, चाहत और दीवानापन जैसे शब्दों और इन के एकसमान अर्थ से तो हम सभी भली भांति परिचित हैं, पर जो आप नहीं जानते वह है ‘इन्फैचुएशन’. इन्फैचुएशन का अर्थ वैसे तो सम्मोह, मुग्धता और आसक्ति है, लेकिन इस का सही मतलब इसके शाब्दिक अर्थ से कहीं ज्यादा है.

उदाहरण के तौर पर मान लीजिए आप किसी लड़के से दो दिन पहले ही मिले हैं और आप को लगता है कि आप उस से पहली ही नजर में प्यार करने लगे हैं. उस लड़के के उठने बैठने, बोलचाल और खूबसूरती से आप इतना ज्यादा अट्रैक्ट हो जाते हैं कि उस के बिना जीना ही दुश्वार लगने लगता है. लेकिन उस लड़के से बात करने और उसे सही तरह से जानने के बाद जब यह लगने लगे कि ‘प्यार’ खत्म हो चुका है, तो इस का मतलब है कि आप को उस लड़के से कभी प्यार था ही नहीं. यह फीलिंग जो आप को प्यार जैसी लगती है पर असल में होती नही है, इसे इन्फैचुएशन कहा जाता है.

इन्फैचुएशन को ऐसे समझें

इसे और बेहतर तरीके से समझने के लिए ‘चोखरबाली’ का उदाहरण लेते हैं. यदि आपने रविन्द्रनाथ टैगोर की किताब चोखरबाली पढ़ी है या इसी नाम से बनी फिल्म देखी है तो आप यह समझ चुके होंगे कि मैं इस कहानी का उदहारण क्यों ले रही हूं. इस कहानी में चार किरदार हैं, आशालता, बिनोदिनी, महेंद्र और बिहारी. महेंद्र और बिहारी भाई जैसे दो दोस्त हैं. जब उन दोनों को शादी के लिए बिनोदिनी के घर से प्रस्ताव आता है तो वे खुद को शादी के लिए तैयार न बताते हुए, बिनोदिनी को बिना देखे ही रिश्ते के लिए मना कर देते हैं. कुछ साल बाद जब बिहारी के लिए वे आशा को देखने जाते हैं तो वहां महेंद्र को पहली नजर में ही आशा की खूबसूरती मोहित कर लेती है और वह आशा से शादी करने की इच्छा जताता है. आशा को जाने और समझे बगैर ही महेंद्र उस से शादी कर लेता है. आशा और महेंद्र घंटो साथ बिताते, बातें करते और अपने कमरे में ही रहते हैं. वहीं बिनोदिनी की जिस लड़के से शादी हुई थी वह शादी के कुछ दिनों में ही मर गया. महेंद्र की मां बिनोदिनी से प्रभावित थीं. जब वे बिनोदिनी को एक आश्रम में मिलती हैं तो उन की सेवा कर बिनोदिनी उन का दिल जीत लेती है और वे उसे अपने साथ ले आती हैं.

महेंद्र बिनोदिनी को जानने और समझने के बाद उसे चाहने लगता है. बिनोदिनी भी महेंद्र को पसंद करने लगती है. वे दोनों आशा के बारे में न सोचते हुए काफी करीब भी आ जाते हैं. कुछ दिन सब इसी तरह चलता है और फिर बिनोदिनी का प्यार महेन्द्र के लिए खत्म हो कर बिहारी पर शिफ्ट हो जाता है. अब महेंद्र पूरी तरह बिनोदिनी के प्यार में पागल अपना और आशा का रिश्ता तोड़ देने तक को तैयार रहता है. उधर, बिनोदिनी और बिहारी एकदूसरे के होना चाहते हैं.

इस कहानी में दो व्यक्तियों ने अपनी इन्फैचुएशन को प्यार समझने की गलती की. यदि, देखा जाए तो महेंद्र को आशा से पहली नजर में हुआ प्यार, प्यार न हो कर इन्फैचुएशन थी. यह इन्फैचुएशन ही थी जो महेंद्र को आशा से जोड़े हुए थी. दूसरी, बिनोदिनी थी जिसने महेंद्र के लिए अपनी इन्फैचुएशन को प्यार का नाम दिया और जाने अनजाने उसकी गृहस्थी तोड़ दी. बिनोदिनी की इन्फैचुएशन उसे मिलने वाले महेंद्र के हद से ज्यादा अटेंशन से खत्म हो गई.

इन्फैचुएशन और प्यार में अंतर

इन्फैचुएशन एक बहुत ही स्ट्रोंग फीलिंग है जिसमे व्यक्ति को लगता है कि वह प्यार में है जबकि ऐसा होता नहीं है. किसी के बारे में हर पल सोचते रहने, भूख प्यास मिटने, किसी का इंतजार करते रहने और बारबार उस से बातें करने के लिए मचलने को लोग प्यार समझ लेते हैं जबकि यह सब प्यार न हो कर इन्फैचुएशन है.

सेक्सुअल और मेंटल डिजायर्स

जहां एक तरफ इन्फैचुएशन में सेक्सुअल डिजायर अपने चरम पर होती है वहीं प्यार में सेक्सुअल डिजायर बाकि सभी फीलिंग्स के बीच का ही एक हिस्सा होती है. इन्फैचुएशन में व्यक्ति अपने पार्टनर या जिससे भी उसे इन्फैचुएशन है,  उसको शारीरिक रूप से पाने के लिए मचलता है, वह हमेशा उस के आसपास रहना चाहता है, उसे छूना चाहता है, बाहों में भरना चाहता है. जबकि, प्यार अलग अलग इमोशन्स और फीलिंग्स का समावेश होता है. जब व्यक्ति को किसी से प्यार होता है तो वह उस की फिजिकल से ज्यादा इमोशनल और मेंटल प्रजेंस चाहता है.

गलतियां और कमियां

इन्फैचुएशन में व्यक्ति जिस से इन्फैचुएटेड होता है उसे उस की बाहरी खूबसूरती और अपीयरेंस के लिए चाहता है. उसे लगता है कि मुझे इस से प्यार है जिस के कारण ही मुझे इस की गलतियां नहीं दिखतीं या इस व्यक्ति में कोई कमी है ही नहीं. प्यार में ऐसा नहीं होता. प्यार में व्यक्ति सामने वाले व्यक्ति की गलतियां, कमियां और कमजोरियां देखता है, उन्हें एक्सेप्ट करता है और फिर उस व्यक्ति को चाहता है. इसी चाहत को प्यार कहा जाता है जिस में व्यक्ति की आंखो में वो पट्टी नहीं बंधी होती जिस से उसे दूसरे व्यक्ति के अवगुण दिखाई ही न दें.

समय के साथ फीलिंग्स बदलना

अगर आप का पार्टनर आप को टाइम नहीं दे रहा है और आप से सुबह शाम नहीं मिल पा रहा है और इस कारण आप को लगने लगा है कि शायद आपका प्यार अब खत्म होने लगा है, तो यकीन मानिए आपको कभी उस व्यक्ति से प्यार था ही नहीं. प्यार इतनी जल्दी या कहें कुछ देर की दूरी से खत्म नहीं होता.

इन्फैचुएशन में अक्सर यही होता है कि व्यक्ति को अपने पार्टनर से थोड़ी सी देर की दूरी भी खलने लगती है जबकि प्यार होने पर दूरियां इस प्यार को मजबूत करती हैं. मजबूत ऐसे कि आप जिस से प्यार करते हैं उस से मिलने के लिए बैचैन होते हैं लेकिन आपको पता होता है व्यक्ति के लिए उस के काम करना भी इम्पोर्टेन्ट है और इस बात से आपका प्यार एफेक्ट नहीं होता. आप उस व्यक्ति को समझते हैं, आप का प्यार ऐसे खत्म या कम नहीं होता.

प्रोसेस को समझना

प्यार एक प्रोसेस है, यह अचानक से नहीं होता. आप एक व्यक्ति से आज मिले हैं, आपको वह हद से ज्यादा अच्छा लग जाता है लेकिन आप इसे प्यार का नाम नहीं दे देते. धीरे धीरे आपकी फीलिंग्स उस व्यक्ति के लिए बढ़ने लगती हैं, आप उस की बुराई भी जान जाते हैं और अच्छाई भी, उस की पसंद भी और नापसंद भी. आप की चाहत रुकने का नाम ही नहीं लेती और यह चाहत एक दिन या एक पल में नहीं हो जाती, यह एक प्रोसेस है जो आपके मन में काफी समय से चल रहा था. ये चाहत प्यार है.

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