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रोडरेज सूने होते परिवार

5 अप्रैल की रात करीब 11.30 बजे दिल्ली के स्क्रैप व्यापारी शाहनवाज अपने दोनों बेटों के साथ घर लौट रहे थे. इस बात से बेपरवाह कि यह उन का आखिरी सफर साबित होगा. तुर्कमान गेट की भीड़ भरी संकरी सड़क पर उन की बाइक से एक कार में मामूली खरोंच आ गई. छोटी सी बात का बतंगड़ कुछ यों बना कि कार सवारों ने अपनी दबंगई और हैवानियत में शाहनवाज को पीटपीट कर मौत के घाट उतारने के बाद ही दम लिया. शाहनवाज ने अपने दोनों बेटों के सामने दम तोड़ा और वजह भी क्या, रोडरेज. राह चलते गाड़ी में हलकीफुलकी खरोंच, टेकओवर या साइड न मिलने के बहाने शुरू हुई कहासुनी जब जानलेवा रुख अख्तियार कर लेती है तो इस तरह की वारदात रोडरेज श्रेणी में आती है. इस रोडरेज की बला ने दिल्ली के शाहनवाज के परिवार को तबाह कर दिया. यह कोई पहली घटना नहीं है. आएदिन गांवकूचों से ले कर शहर तक की सड़कें रोडरेज की खूनी कहानियां बयां करती हैं. कुछ और बानगी देखिए :

5 मार्च, 2015 को हरियाणा में हिसार के सिंघवा राघो निवासी कुलदीप गोस्वामी अपनी पत्नी संतोष के साथ मेले से लौट रहे थे. उन के ट्रैक्टर के पीछे आ रहे कार सवार युवक ने साइड न मिलने पर अपनी कार ट्रैक्टर के आगे अड़ा कर उन दोनों को गोली मार दी. कुलदीप की तो मौके पर ही मौत हो गई जबकि संतोष के पैर में गोली लगने से वह गंभीर रूप से घायल हो गई. इस रोडरेज की वारदात ने एक हंसतेखेलते परिवार में मातम का जहर भर दिया.

27 फरवरी, 2015 को दिल्ली के सुल्तानपुर डबास में 2 भाइयों की गोली मार कर हत्या कर दी गई. इस वारदात के पीछे रोडरेज कारण बना. हत्या का अरोपी वहां का स्थानीय बदमाश काले था जो एक दिन पहले ही तिहाड़ जेल से छूटा था. उस की गाड़ी दोनों भाइयों की गाड़ी से टकरातेटकराते बची लेकिन काले ने ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी. विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लूएचओ के आंकड़े दर्शाते हैं कि 2020 तक भारत में होने वाली मौतों में सड़क दुर्घटना बड़ा कारण होगी. भारत में हर साल सड़क दुर्घटना में 3 फीसदी इजाफा हो रहा है. प्रतिवर्ष करीब 1 लाख 10 हजार लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं जबकि 6 लाख लोग गंभीर रूप से घायल होते हैं. इन दुर्घटनाओं में ज्यादातर मामले रोडरेज के होते हैं.

रोडरेज के मुख्य कारण

रोडरेज का कोई एक कारण नहीं होता. इस के कई कारण होते हैं. मसलन, तेज गति से वाहन दौड़ाना, भीड़ वाले इलाकों में ओवरटेक करना, कभी दाएं तो कभी बाएं से ओवरटेक करना, बारबार हौर्न बजाना, लाइट फ्लैश करना, गाली या अपशब्दों का प्रयोग करना, हाथ या चेहरे की भावभंगिमा द्वारा बदतमीजी करना, पीछे से या साइड से दूसरे वाहन से टकराते हुए ओवरटेक करना या किसी व्यक्ति से ही टकरा जाना आदि कारणों से यह समस्या दिनोंदिन गंभीर होती जा रही है. लाड़लाड़ में मातापिता उन्हें उपहार के तौर पर या फिर उन की जिद करने पर बाइक, कार खरीद कर दे देते हैं. नाबालिग बच्चे जब बाइक पर सवार होते हैं तो उन्हें दुनिया अपने पैरों तले नजर आती है. अकसर हवा से बातें करते ऐसे बाइक सवार जान हथेली पर रख कर सवारी करते हैं. ऐसे में किसी दूसरे वाहन से भिड़ंत हो जाने पर ये जोशीले नौजवान हाथापाई पर उतर आते हैं. नतीजा कोर्टकचहरी, पुलिस थाना और कई बार खूनखराबे तक की नौबत आ जाती है. सो, मातापिता को चाहिए कि बच्चों की नाजायज जिद न मानें और जब तक कि वे बालिग न हो जाएं, उन्हें बाइक या कार चलाने की अनुमति न दें.

कैसे हो नियंत्रित

किसी के कहे हुए शब्दों पर पलटवार न करें और स्वयं को शांत रखें. अगर आप को महसूस हो कि आप से गलती हो गई है तो तत्काल क्षमा मांग लें. साथ ही नुकसान की भरपाई कर दें. इस के अलावा अकसर सड़कों पर देखने को मिलता है कि अपनीअपनी गाडि़यों से लोग बाहर निकल कर लड़ने लग जाते हैं और बात बढ़ जाती है. इसलिए जब ऐसी नौबत आए तो लड़ने के लिए कभी अपनी गाड़ी से बाहर न निकलें. टर्निंग सिग्नल अवश्य दें पर अनावश्यक हौर्न न बजाएं. ड्राइविंग करते वक्त अपने आगे वाले वाहन से हमेशा दूरी बना कर चलें. ड्राइविंग के समय कंपीटिशन न करें. अगर आप को कहीं पर जाने की जल्दी हो तो कोशिश करें कि घर से थोड़ा जल्दी निकलें. हमेशा नियत स्पीड से ही गाड़ी चलाएं. कोई ओवरटेक करने की जिद कर रहा हो तो उसे साइड दे दें ताकि क्रोध या तनाव का कारण ही न बने. वाहन चलाते समय अगर आप को कहीं खतरा महसूस हो रहा हो तो आप शांत हो कर चलते रहें और जहां भी पुलिस नजर आए, गाड़ी को साइड लगा कर उसे इस की जानकारी दें. स्वयं को सड़क का योद्धा बनने से रोकें. इस के लिए आप स्वयं से शांत रहने का वादा करें और उस पर अमल करें.

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार बढ़ती हिंसात्मक प्रवृत्ति छोटीछोटी बातों को तूल देना, झगड़ाफसाद व हत्या का कारण बन जाता है जो समाज के लिए घातक सिद्ध हो रहा है. अमेरिकन थैरेपिस्ट ने 1997 में रोडरेज का कारण, मैडिकल डिसऔर्डर बताया लेकिन लोगों ने इस बात को हवा नहीं दी क्योंकि अपराधी तत्त्व अपना बचाव इस मैडिकल टर्म के तहत करने लगेंगे.

मनोवैज्ञानिक डा. अचल भगत के अनुसार, गाड़ी पावर का प्रतीक है और जब कोई एक चालक दूसरे चालक से बड़ा बनने की कोशिश करता है तब झगड़े की स्थिति बन जाती है.

दूसरी ओर मनोवैज्ञानिक डा. जितेंद्र नागपाल का मानना है कि आजकल घर और दफ्तर का तनाव हमेशा दिमाग में रहता है और जरा सा उकसाने पर ही क्षणिक पागलपन का दौरा आ जाता है. सही माने में सड़कें, ड्राइविंग करते समय भड़ास निकालने का स्थान बन रही हैं. तभी तो ड्राइवरों द्वारा अपशब्द सुननासुनाना आम बात हो रही है. स्वयं को शांत रखना बहुत जरूरी है. ऐसा करने से किसी की छोटी सी क्रिया पर क्रोध नहीं आता, साथ ही नकारात्मक व्यवहार में न उलझने की आत्मशक्ति बनती है. रोडरेज हर देश में एक बड़ी समस्या के रूप में उभर रहा है. काफी देश इस समस्या का हल ढूंढ़ने में लगे हैं. आवश्यकता है कि इस दिशा में स्पष्ट कानून बनें और उन में कठोर सजा का प्रावधान हो, साथ ही, उन कानूनों का पूरी मुस्तैदी के साथ पालन भी किया जाए व कराया जाए. जितनी रोडरेज बढ़ रही है उतनी ही मौडर्न सोसाइटी की सिविक सैंस घट रही है. यह चिंता का विषय है. सड़कों की खस्ता हालत, बेहिसाब बढ़ता ट्रैफिक, लोगों में बढ़ता तनाव आदि सब एकसाथ मिल कर रोडरेज को बढ़ावा दे रहे हैं. यों तो इंडियन पीनल कोड की धाराओं– 279, 337, 338 में लापरवाही से ड्राइविंग द्वारा जो नुकसान होता है उस की भरपाई के लिए कंपनसेशन का प्रावधान है परंतु इन धाराओं का इस्तेमाल कम ही हो पाता है.

जागरूकता जरूरी

रोडरेज को कम करने के लिए ड्राइविंग एजुकेशन पर जोर देना चाहिए. इस के लिए जगहजगह पोस्टर लगा कर इस के लिए प्रेरित करने की आवश्यकता है. रोडरेज के परिणामों के बारे में भी बताना चाहिए. ड्राइवरों को शिक्षा देनी चाहिए कि उन का व्यवहार कैसा हो और दूसरे चालकों से किस तरह पेश आया जाए आदि. हर वाहन चालक का यह कर्तव्य होना चाहिए कि वह ट्रैफिक कानून का पालन करे. इस के लिए रोड ट्रांसपोर्ट अथौरिटी, ट्रैफिक पुलिस, हाईवे अथौरिटी आदि को मिल कर अपनेअपने क्षेत्र में सक्रिय होना होगा, जैसे चौराहों पर वीडियो कैमरा लगाना, सादी ड्रैस में ट्रैफिक पुलिस का घूमना तथा हाईवे पर पैट्रोलिंग करना आदि.? कानून तोड़ने वालों पर ज्यादा से ज्यादा जुर्माना लगाया जाना चाहिए.

कुछ आँखों देखि कुछ कानो सुनी

एडवांस बुकिंग

जो मिल गया उसी को मुकद्दर समझते हुए भाजपा के पितृपुरुष लालकृष्ण आडवाणी ने पद्मविभूषण सम्मान ले तो लिया पर ऐसे सम्मान देने की प्रक्रिया पर एतराज जताने से खुद को रोक नहीं पाए और कुछ तीखी पर सलीके की बातें कह ही बैठे. बकौल आडवाणी, ऐसे सम्मान वक्त रहते चेतन अवस्था में दिए जाने चाहिए. बात पते की नहीं बल्कि पतों की है कि कम से कम सम्मानित विभूति को यह मालूम तो हो कि उसे खिताब से क्यों नवाजा जा रहा है. आडवाणी का स्पष्ट इशारा अपने साथी और भूतपूर्व राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी अटल बिहारी वाजपेयी की तरफ भी था जिन्हें भारतरत्न देने के लिए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को खुद उन के घर जाना पड़ा था. इस छोटी बात का एक बड़ा मतलब यह भी था कि अगर उन्हें भी भारतरत्न देने का मन उन की ही सरकार बना रही हो तो 2019 के पहले दे दे.

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मुल्ला नसीरुद्दीन

 

यह बात महज कहनेसुनने की यानी किताबी है कि सच्चे कलाकार का कोई धर्म नहीं होता क्योंकि वह तो कला को ही धर्म मान लेता है. ऐसा होता तो कलात्मक और व्यावसायिक अभिनेता नसीरुद्दीन शाह को आम मुसलमान की तरह यह नहीं कहना पड़ता कि उन के देश यानी भारत में पाकिस्तान के प्रति नफरत बढ़ रही है और इस बाबत लोगों की बाकायदा ब्रेनवाशिंग की जाती है. पाकिस्तान में इंटरव्यू देते वक्त कई बार अच्छेअच्छे, सधे, समझदार भी लड़खड़ा जाते हैं तो नसीर का क्या दोष. वे तो बगैर नाम लिए आरएसएस को कोस रहे थे. इस बयान पर ज्यादा बवाल नहीं मचा यानी वह वायरल नहीं हुआ तो यह लोगों की समझदारी और नसीर के अलोकप्रिय होने का संकेत है और साथ ही नसीहत भी है कि धर्म से ताल्लुक रखती बातों पर न बोलें तो भी काम चल ही जाता है.

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पंच परमेश्वर

उपन्यास सम्राट प्रेमचंद की सालों पहले लिखी कहानी ‘पंच परमेश्वर’ आज भी चाव से पढ़ी जाने के बाद बतौर मिसाल पेश की जाती है कि इंसाफ हो तो ऐसा जो कोई धर्म, जाति या रिश्तेदारी नहीं देखता. आखिरकार मुंसिफ की कुरसी ही ऐसी होती है. पर अब इन कुरसियों का स्वभाव बदल रहा है. बात इतनी सी है कि बीती 4 अप्रैल को माननीय न्यायाधीशों के सम्मान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रात्रिभोज का आयोजन किया जिस में ईसाई समुदाय के जस्टिस कुरियन जोसफ ने शामिल होने से साफ इनकार करते हुए वजह भी बता दी कि चूंकि यह कौन्फ्रैंस ईसाइयों के एक प्रमुख त्योहार के दिन रखी गई है इसलिए वे इस में शामिल नहीं होंगे. उन के लिए पाम संडे, गुड फ्राइडे और ईस्टर जैसे त्योहार अहम हैं. अब यह फैसला कौन करेगा कि यह धार्मिक पूर्वाग्रह और संकीर्णता किस की थी, नरेंद्र मोदी की या फिर जस्टिस कुरियन की या फिर दोनों की?

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अब तक 47

तबादला किसी भी सरकारी मुलाजिम की जिंदगी में बेहद तकलीफदेह घटना, जिसे हादसा कहना बेहतर होगा, होती है. आईएएस अधिकारी अशोक खेमका के साथ 22 साल की नौकरी में ऐसा 47 बार हुआ. वजह, उन की ईमानदारी है जो आजकल दुर्लभ हो चली है.सोनिया गांधी के दामाद रौबर्ट वाड्रा और डीएलएफ कंपनी के जमीन सौदे का खुलासा करने वाले तबादलावीर अफसर को बजाय इनाम के सजा क्यों दी गई, इस पर शक और शोध की खासी गुंजाइश है. खेमका के घावों पर मलहम लगाते हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री अनिल बिज ने ताजा तबादले पर मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर से बात करने की बात जरूर कही है लेकिन इस से खेमका की ईमानदारी, जो सिस्टम के लिए समस्या बनती जा रही है, कभी दूर होगी, लगता नहीं.      

बंगाल बना ‘रेपलैंड’?

पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के रानाघाट गांगनपुर में एक ईसाई मिशनरी के कौन्वैंट औफ जीसस ऐंड मैरी स्कूल में रात 2 बजे कुछ लोग घुस जाते हैं. सुरक्षाकर्मियों को मारपीट कर बांध देते हैं. स्कूल परिसर के अंदर जा कर स्कूल के एक पदाधिकारी को कमरे में बंद कर देते हैं. इस के बाद अकाउंट कक्ष की खिड़की की ग्रिल और कांच तोड़ कर 12 लाख रुपए लूटते हैं. इस बीच उठापटक की आवाज सुन कर 74 साल की बुजुर्ग नन मदर सुपीरियर की नींद खुल जाती है. भाग रहे असामाजिक तत्त्वों को वे रोकने की कोशिश करती हैं. असामाजिक तत्त्वों ने मदर को अन्य 4 लोगों के साथ एक कमरे में बंद कर दिया. इस के बाद एक के बाद एक ने उन के साथ दुष्कर्म किया और साढ़े 4 बजे सुबह स्कूल के मेन गेट पर बाहर से ताला लगा कर वे सब निकल भागे.

सीसीटीवी फुटेज में लगभग सभी अभियुक्त की तसवीर मिल जाने के बाद भी जांच आगे नहीं बढ़ती है तो ऐसे में पुलिस की जांच पर सवाल उठना लाजिमी है. रानाघाट कौन्वैंट स्कूल के मामले में एक बार फिर से कामदुनी और पार्क स्ट्रीट की परछाईं नजर आ रही है. गैंगरेप के तमाम मामलों में एक महिला मुख्यमंत्री का असंवेदनशील रवैया हर बार उभर कर सामने आया है. इस मामले को ले कर राज्य की राजनीति भी गरमा गई है. वैसे भारतीय राजनीति का दस्तूर है, हर घटना घटी नहीं कि राजनीतिक पार्टियां अपनीअपनी रोटी सेंकने में जुट जाती हैं. कोलकाता नगर निगम समेत विभिन्न नगरपालिकाओं के चुनावों के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियां सक्रिय हो गई हैं. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, कांगे्रस और भारतीय जनता पार्टी के नेता रानाघाट पहुंच गए.

केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद देशभर में ईसाई मिशनरियों पर हमले की खबरें लगातार आ रही हैं. ममता बनर्जी के मंत्रिमंडल के शहरी विकास मंत्री फिरहद हकीम ने इस घटना के लिए भाजपा पर निशाना साधा. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को इस घटना के पीछे ‘धर्मांधता की परछाईं’ नजर आ रही है.ममता बनर्जी का काफिला जब रानाघाट पहुंचा तब शांति मार्च कर रहे स्कूल की सिस्टर, पदाधिकारी, छात्रछात्राओं और अभिभावकों ने अभियुक्तों को कड़ी से कड़ी सजा देने की फरियाद के लिए मुख्यमंत्री का रास्ता रोका तो वे उखड़ गईं. सामने की पंक्ति में खड़े 9वीं के छात्र पर यह कहते हुए बरस पड़ीं, ‘एक चांटा मार कर तुम्हारा गाल फाड़ दूंगी. असभ्य कहीं के.’

इसी तरह पहले 2013 में हुई कामदुनी की घटना के बाद भी स्थानीय महिलाओं के विरोधप्रदर्शन को ममता बनर्जी ने माओवादी कार्यकलाप से जोड़ कर देखा था. पार्क स्ट्रीट गैंगरेप के बाद उत्तर 24 परगना में कामदुनी से 2013 में परीक्षा दे कर लौट रही लड़की के साथ कुछ लड़कों ने बलात्कार किया और फिर उस की हत्या कर दी. तब भी ममता गंभीर नहीं दिखीं.

गैरजिम्मेदाराना रवैया

बलात्कार के मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयान बंगाल की जनता को कभी रास नहीं आए हैं. बलात्कार की कई घटनाओं के बाद ममता ने एक के बाद एक जिस तरह के बयान दिए थे उन से उन की साख गिरी है. पार्क स्ट्रीट में चलती गाड़ी में महिला के साथ गैंगरेप की घटना को ममता ने साजानो घटना यानी काल्पनिक घटना कह कर उस की गंभीरता को कम कर दिया था. देर रात को महिला के नाइट क्लब जाने पर भी उन्होंने सवाल उठा दिया था. बात यहीं तक सीमित रहती तो गनीमत थी लेकिन नहीं, ममता तो ममता हैं. उन्होंने ‘रेट पर विवाद’ के कारण बलात्कार किए जाने की बात कह कर पीडि़त महिला का चरित्रहनन करने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ी. मामले की जांच कर रही कोलकाता पुलिस की अपराध शाखा की पहली महिला अधिकारी दमयंती सेन द्वारा मीडिया में बलात्कार की घटना

की पुष्टि करने के बाद उन का उत्तर बंगाल में स्थानांतरण कर दिया गया. एक महिला मुख्यमंत्री के रूप में ममता बनर्जी से जो उम्मीद की जा सकती है उस पर पानी ही फिरा है. राज्य का गृहविभाग मुख्यमंत्री के पास ही है. राज्य की पुलिस गृहमंत्रालय के अधीन ही है. राज्य में एक के बाद एक बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं और ममता बनर्जी की प्रतिक्रिया यह है कि एकाध घटना घट ही जाती है. राज्य मुख्य सचिव का रवैया भी छोटीमोटी घटना बताने जैसा ही रहा. साफ है ऐसे मामले में मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और प्रशासन का जो रवैया रहा है उस के कारण, जाहिर है, बलात्कारियों का मनोबल बढ़ा है.

पार्क स्ट्रीट की जांच में महिला पुलिस अधिकारी के स्थानांतरण से सीख ले कर राज्य पुलिस का एक गुट बलात्कार की घटना को दबाने में जुट जाता है एफआईआर ही दर्ज न हो, पहले इस की पूरी कोशिश की जाती है. पुलिस प्रशासन बलात्कार की घटना की शिकायत दर्ज करने में आनाकानी करता है. किसी तरह से अगर शिकायत दर्ज हो भी जाए तो वह जांच में घपला और लेटलतीफी कर देता है. हद तो यह है कि कुछ मामले में पुलिस पीडि़त महिला के परिजनों से उस के सद्चरित्र होने का प्रमाणपत्र तक मांगती है.

आंकड़ों की बाजीगरी

बगाल में पुलिस प्रशासन बलात्कार की घटनाओं का आंकड़ा कम कर के दिखाने की कोशिश करता है ताकि पुलिस प्रशासन की संवेदनशीलता पर सवाल न खड़े हों. सचिवालय के सूत्रों का यहां तक कहना है कि राज्य में बलात्कार की घटनाओं के तथ्य को दबाने के लिए भी तमाम जुगत बिठाए जाते हैं. दिल्ली में चलती बस में गैंगरेप की घटना के बाद बलात्कार के मामले में जहां पूरा देश प्रशासनिक नीति के तहत शिकायतकर्ता को सब से अधिक महत्त्व दे कर तुरंत मैडिकल टैस्ट करवाने, आरोपियों को गिरफ्तार करने और जल्द से जल्द चार्जशीट पेश कर कड़ी सजा दिलाने की वकालत करता है, वहीं बंगाल का प्रशासन उलटे रास्ते पर चलने की ठाने बैठा है. रिपोर्ट ही दर्ज नहीं होगी तो आंकड़े कैसे तैयार होंगे.

चर्चित गैंगरेप कांड मौजूदा स्थिति

ममता बनर्जी के सत्ता में आने के बाद राज्य में बलात्कार की जितनी भी घटनाएं घटीं उन में से एक भी मामला अंजाम तक नहीं पहुंच पाया है. कई मामलों में तो अभियुक्त पुलिस के हत्थे तक नहीं चढ़े हैं.

पार्क स्ट्रीट गैंगरेप कांड : 5 फरवरी, 2012 को पार्क स्ट्रीट में गैंगरेप की घटना के मूल अभियुक्त कादर खान की गिरफ्तारी अभी तक नहीं हुई है. मामले में गवाहों के बयान लिए जा चुके हैं. इस साल 23 मार्च को पीडि़त ईसाई महिला का देहांत हो गया.

कटुआ गैंगरेप कांड : 25 फरवरी, 2012 को बर्दवान के कटुआ गैंगरेप कांड में छठी कक्षा में पढ़ने वाली लड़की का 3 लड़कों ने सामूहिक बलात्कार किया. बलात्कारियों की धमकियों और अपमान से नजात पाने के लिए लड़की ने आग लगा कर आत्महत्या कर ली. एक अभियुक्त अभी भी फरार है. मामले में गवाही जारी है.

कामदुनी गैंगरेप कांड : 7 जून, 2013 कामदुनी गैंगरेप कांड के सभी दोषियों, जिन के तृणमूल कांगे्रस से जुड़े होने का आरोप है, की गिरफ्तारियां हो चुकी हैं. मामला कोलकाता हाईकोर्ट में विचाराधीन है. इस कांड के विरोध में कभी पूरा का पूरा गांव खड़ा हुआ था लेकिन लंबे समय से लगातार तृणमूल कांगे्रस के नेताओंकार्यकर्ताओं के दबाव में गांव वालों ने अपनेआप को अलग कर लिया है. पीडि़त का परिवार कामदुनी छोड़ कर जा चुका है.

मध्यमग्राम गैंगरेप कांड : 13 दिसंबर, 2013 मध्यमग्राम में पढ़ाई के लिए बिहार से यहां आ कर बसे परिवार की लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया. पुलिस में इस की शिकायत करने पर लगातार धमकाया जाता रहा. डर कर महल्ला बदल लेने के बाद भी लड़की को दोबारा अगवा कर फिर से सामूहिक बलात्कार किया और फिर जला कर मार डाला गया. यह मामला भी कोलकाता हाईकोर्ट में विचाराधीन है.

कांथी गैंगरेप कांड : 17 अगस्त, 2014 को पूर्व मेदिनीपुर में एक माकपा नेता की पत्नी के साथ हुए गैंगरेप के बाद हत्या के 12 अभियुक्तों को पुलिस अभी तक गिरफ्तार नहीं कर पाई है. आरोप है कि सभी अभियुक्त तृणमूल कांगे्रस के नेताकार्यकर्ता हैं. पुलिस ने इन सभी को फरार घोषित कर दिया है. हालांकि चार्जशीट दाखिल की जा चुकी हैं, पर चार्जशीट में गैंगरेप और हत्या के आरोपों को शामिल नहीं किया गया है.

धुपगुड़ी बलात्कार कांड : 2 सितंबर, 2014 को जलपाईगुड़ी के प्रखंड धुपगुड़ी में 10वीं कक्षा की लड़की का पहले अपहरण, फिर बलात्कार और उस के बाद उस की हत्या करने की घटना घटी. पावर टीलर का पैसा न चुकाने को ले कर तृणमूल की महिला पार्षद के नेतृत्व में खाप पंचायत बैठी, जिस में लड़की के पिता को पीटे जाने का फरमान जारी हुआ. लड़की ने इस का विरोध किया. वहीं घटनास्थल से लड़की को उठा लिया गया. अगली सुबह रेलवे ट्रैक पर लड़की की निर्वस्त्र लाश मिली. मामले में 13 अभियुक्तों की गिरफ्तारी हुई है लेकिन मामले की सुनवाई अभी तक नहीं हुई है.

भ्रामक विज्ञापनों की शिकायत के लिए पोर्टल

विज्ञापन आज विपणन का अहम हिस्सा बन गया है. बाजार की जरूरत के उत्पाद और फिर उन के लिए बाजार बनाने का काम अब विज्ञापनों के हवाले हो गया है. विज्ञापनों द्वारा उत्पादों का बाजार तैयार किया जा रहा है. बाजार की इस स्थिति को देखते हुए कंपनियों ने उत्पाद से ज्यादा ध्यान विज्ञापनों पर केंद्रित कर दिया है. कई बार लगता है कि उत्पाद में वह गुणवत्ता बिलकुल नहीं है जिस का गुणगान उस के विज्ञापन में किया गया है. उपभोक्ता विज्ञापन के आधार पर वस्तुएं खरीद रहा है, इसलिए उद्योगों के साथ ही विज्ञापन भी बड़े उद्योग के रूप में पनपा है. उन्हीं विज्ञापनों के सहारे हमें अखबार सस्ते मिल रहे हैं और कम पैसे में ज्यादा चैनल देखने को मिल रहे हैं.

इसी क्रम में जो अखबार ज्यादा बिकता है अथवा जो न्यूज चैनल ज्यादा देखा जाता है, उस के लिए विज्ञापन दर भी ज्यादा होती है. कंपनियां एक ही विज्ञापन के सहारे ज्यादा उपभोक्ताओं तक पहुंचना चाहती हैं. इस दौड़ में कई कंपनियां भ्रामक विज्ञापन भी बना रही हैं. अपने उत्पाद को विज्ञापन में ज्यादा गुणवत्ता के साथ पेश किया जा रहा है, जिस से उपभोक्ता लुटता है. उपभोक्ता के साथ धोखा नहीं हो, इस के लिए सरकार ने हाल ही में भ्रामक विज्ञापनों की शिकायत के लिए एक पोर्टल शुरू किया है. पोर्टल पर वित्तीय सेवाएं, आवास, कृषि उत्पाद आदि की शिकायत दर्ज की जा सकती है. उत्पादों की पैकेजिंग पर भी यदि गलत सूचना दी गई है तो इस की भी शिकायत दर्ज की जा सकती है. इस में भ्रामक विज्ञापनों पर नजर रखने वाली संस्था एडवर्टाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल औफ इंडिया को भी भागीदार बनाया गया है. सरकार पहल तो अच्छी करती है लेकिन उस की पहल ज्यादा दिन तक प्रभावी नहीं रहती है. यह पोर्टल किस दिन दम तोड़ दे, इस का पता किसी को नहीं है. उम्मीद की जानी चाहिए कि यह पोर्टल जनसेवा के लिए उपयोगी साबित होगा.

 

काश्तकारों को रुलाती अधिगृहीत भूमि

भूमि अधिग्रहण विधेयक को ले कर राजनीति गरम है. राजनीतिक दलों में अपनेअपने विधेयक को किसान के हित में बताने के तर्कवितर्क हो रहे हैं. कांगे्रस कहती है कि उस ने भूमि अधिग्रहण पर 2013 में सत्ता में रहते हुए जो कानून बनाया था वह किसानों के हित में है जबकि भाजपा कहती है कि इस कानून से किसानों का समग्र हित नहीं साधा जा रहा है, इसलिए वह संशोधन विधेयक ले कर आई है. अपने तर्क श्रेष्ठ साबित करने के लिए दोनों दलों के बीच जोरआजमाइश हो रही है. भाजपा सत्ता में है और उसे लगता है कि वह विधेयक पारित करा लेगी जबकि कांगे्रस कहती है कि राज्यसभा में उस का बहुमत है, विधेयक पारित नहीं होने दिया जाएगा. सचाई यह है कि दोनों के तर्क किसान के हित में नहीं हैं. विकास के नाम पर पुश्तैनी जमीन बेचने से वह आहत ही होगा लेकिन यदि अधिगृहीत की गई जमीन का इस्तेमाल विकास के लिए तत्काल होता है तो उस के जख्मों को कुछ राहत मिलेगी लेकिन अधिग्रहण के बाद जमीन बेकार पड़ी रही तो उसे पीड़ा होगी. सरकार ऐसी पीड़ा किसान को लगातार दे रही है.

वाणिज्य तथा उद्योग मंत्रालय के अनुसार, विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी सेज के विकास के लिए 47,782.64 हैक्टेअर भूमि 15 फरवरी तक अधिसूचित हो चुकी है और इस में अब तक सिर्फ 19,629.63 हैक्टेअर भूमि का ही सेज के लिए प्रयोग हो रहा है. अधिसूचित शेष भूमि बेकार पड़ी है. इस में से 18,023 हैक्टेअर भूमि वर्षों पहले अधिगृहीत की जा चुकी है लेकिन अब भी बेकार पड़ी है. मौजूदा कानून के अनुसार, जिस भूमि का 5 साल तक इस्तेमाल नहीं होता है उसे किसान को लौटा दिया जाना चाहिए लेकिन इस जमीन को लौटाने की सरकार की हिम्मत नहीं हो रही है.

टाटा प्रमुख से सबक ले सरकार

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संपन्न या सक्षम लोगों से रसोई गैस पर मिलने वाली सब्सिडी को छोड़ने के आग्रह के मद्देनजर मार्च तक करीब 3 लाख उपभोक्ता सब्सिडी छोड़ चुके हैं जिस से राजकोष को 100 करोड़ रुपए से अधिक का फायदा हुआ है. मोदी की यह अपील लोगों को पसंद आ रही है. उन के खास मित्र और उद्योगपति रतन टाटा ने अपने कर्मचारियों से गैस सब्सिडी छोड़ने का आह्वान किया है. उन्होंने देशविदेश में काम कर रहे टाटा समूह के करीब 6 लाख कर्मचारियों से यह अपील की है. कंपनी के देश में ही 4 लाख से अधिक कर्मचारी हैं. टाटा समूह का नमक से ले कर सौफ्टवेयर तक का कारोबार है. टाटा की यह अपील यदि कर्मचारी मान लेते हैं तो इस से देश के राजस्व में बड़ा इजाफा होगा. रतन टाटा का कहना है कि टाटा समूह ने राष्ट्र के उत्थान में हमेशा महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है और आज जब देश आर्थिक शक्ति बनने की राह पर है तो समूह को इस में फिर अपना योगदान देना चाहिए.

यह भावुक अपील टाटा समूह के कर्मचारी आसानी से मान भी जाएंगे लेकिन सवाल यह है कि हमारा सरकारी भ्रष्ट तंत्र इस अपील का मान रखेगा? तेल और गैस कंपनियों के आलीशान जीवनयापन करने वाले कर्मचारी इस अपील से कुछ सबक लेंगे? सरकारी तेल कंपनियों के कार्यालय और उन के कर्मचारियों को जो सुविधा मिल रही है, रतन टाटा की अपील का पैसा तो उन कर्मचारियों की सुखसुविधा पर आने वाले खर्च के लिए भी कम पड़ेगा. तेल कंपनियों की समाज में वर्गभेद करने वाली नीति पर पहले अंकुश लगे. महंगाई के कारण सरकारी कर्मचारी पहले ही मोटी तनख्वाह ले कर अब फिर वेतन आयोग के गठन की मांग कर रहे हैं. सरकारी कर्मचारियों के लिए अनिवार्य सब्सिडी नियम लागू क्यों नहीं किया जाता है? सरकार भी रतन टाटा से सबक ले.

धमाके के साथ नए वित्त वर्ष का स्वागत

शेयर बाजार ने नए वित्त वर्ष 2015-16 का धमाके के साथ स्वागत किया है. वित्त वर्ष के पहले ही दिन बाजार ने 3 सप्ताह में पहली बार सर्वाधिक साप्ताहिक छलांग लगाने का रिकौर्ड बनाया और बौंबे स्टौक एक्सचेंज का सूचकांक 302.65 अंक उछल गया. सूचकांक की नई छलांग लगाने की पृष्ठभूमि पहले ही दिन बन गई थी जब रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने संकेत दिए कि रिटर्न की स्थिति में बैंक ऋण की दर को कम किया जा सकता है. इसी तरह वित्तमंत्री अरुण जेटली ने भी ब्याज दरों में कटौती के संकेत दिए थे. उसी दौरान विश्व मुद्रा कोष यानी आईएमएफ ने कहा कि 2015-16 में भारत में विकास दर 7.25 प्रतिशत तक पहुंच सकती है. रिजर्व बैंक ने बैंकों की बैलेंस शीट में सुधार के वास्ते बैड लोन यानी बाजार में फंसे ऋण की वसूली के लिए ऋण नियमावली में ढील देने की बात की. समाप्त हुए वित्त वर्ष के आखिरी दिन रिपोर्ट आई कि बाजार ने 2014-15 में 5 साल का रिकौर्ड तोड़ा है. इस अवधि में बाजार ने 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है. इन सब का शेयर बाजार पर सकारात्मक असर रहा जिस के कारण समाप्त वित्त वर्ष के आखिरी सत्र से पहले बाजार 517 अंक की उछाल लगा कर 2 माह के शीर्ष स्तर पर पहुंचा. हालांकि उस से पहले के कारोबारी सप्ताह के आखिरी दिन सूचकांक वैश्विक स्तर पर नकारात्मक माहौल की वजह से 654 अंक टूट कर 10 सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गया था.

टीचर से आशिकी ठीक नहीं

प्राइवेट शिक्षा ने स्कूलों की पूरी व्यवस्था को बदल कर रख दिया है. अब स्कूल पहले जैसे नहीं रह गए हैं. स्कूल में आए एक बदलाव ने किशोरावस्था में पढ़ाई कर रहे छात्र और उस की टीचर के बीच उम्र के अंतर को भी घटा दिया है. उम्र के इस घटे हुए अंतर के चलते किशोर उम्र के युवाओं का आकर्षण अपनी टीचर के प्रति बढ़ने लगा है. फिल्ममेकर रामगोपाल वर्मा की तेलुगू फिल्म ‘सावित्री’ इसी मुद्दे को ध्यान में रख कर तैयार की गई है. एक तबका इस का विरोध भी कर रहा है. किशोर उम्र के बच्चों में युवा उम्र की टीचर के प्रति आकर्षण कोई अपराध नहीं है. यह एक मनोवैज्ञानिक परेशानी है. इस का हल इसी नजर से तलाश करने की जरूरत है.

कक्षा 11 और 12 में पढ़ने वाले बच्चे आपस में अपनी नईनई आई गणित की टीचर के बारे में बात कर रहे थे. एक लड़का बोला, ‘मुझे गणित से बहुत डर लगता है पर जब से नई टीचर आई है, मैं गणित की क्लास में जाने लगा हूं. उस के आने से गणित की बोरियत भरी क्लास में ताजगी का एहसास होता है.’ दूसरा बच्चा बोला, ‘सही कह रहा है यार. वह मुझे वैसी ही लगती है जैसे शाहरुख खान की फिल्म ‘मैं हूं न’ में सुष्मिता सेन लगती थी.’ 2 बच्चों की बहस में शामिल होते हुए तीसरे बच्चे ने कहा, ‘यार, वह बोलती कितने प्यार से है. हर सवाल को प्यार से समझाती है. पहले वाले सर तो सवाल पूछने पर ऐसे मुंह बनाते थे जैसे किसी ने उन के मुंह में कुनैन डाल दी हो.’ पहले वाले बच्चों को लगा कि उस के साथी ज्यादा बात कर रहे हैं. वह बहस को अपने हाथ में लेता हुआ बोला, ‘यार, पढ़ाईलिखाई की बातें जाने दो, मुझे तो उस का फैशन स्टाइल बहुत अच्छा लगता है. वह तो मुझे किसी हीरोइन जैसी लगती है.’

‘किसी ऐसीवैसी हीरोइन जैसी नहीं, वह दीपिका पादुकोण लगती है. क्या स्लिमफिगर है. उस की आवाज कितनी मीठी है.’ ‘दीपिका नहीं यार, मुझे तो वह प्रियंका चोपड़ा जैसी लगती है. आज से हम उस को पीसी कहेंगे. किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा.’ ‘हां हां, यह ठीक है.’ सभी बच्चे एकमत हो गए. उस दिन के बाद से गणित की टीचर उन बच्चों के बीच पीसी के नाम से पहचानी जाने लगी. धीरेधीरे यह बात पूरे स्कूल को पता चल गई. पर पीसी का पूरा नाम उन बच्चों को ही पता था जो अपनी गणित टीचर को प्रियंका चोपड़ा जैसी देख रहे थे. कक्षा 10 से 12 के बीच पढ़ने वाले बच्चों से बात करने पर यही पता चलता है कि करीबकरीब हर स्कूल में कोई न कोई टीचर उन के आकर्षण का केंद्र होती है.

फिल्में समाज का आईना

फिल्मों को समाज का आईना कहा जाता है. फिल्म ‘सावित्री’ के जरिए किशोर उम्र के छात्रों में अपनी टीचर के प्रति बढ़ते आकर्षण को दिखाने और समझाने की कोशिश की है. फिल्म ‘सावित्री’ के प्रचार के लिए जिस तरह के पोस्टर का प्रयोग रामगोपाल वर्मा ने किया है उस को ले कर अलगअलग संगठनों ने विरोध किया. रामगोपाल वर्मा ने पूरे मसले पर अपना पक्ष रखते हुए कहा, ‘‘राजकपूर ने बहुत समय पहले फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में जो दिखाया, मैं ने वैसा ही दिखाया है. मेरी फिल्म के पोस्टर को अश्लील कह कर उस का विरोध करना सही नहीं है. मैं इस से हरगिज सहमत नहीं हूं. मेरी फिल्म किशोर मन पर आधारित है जिस में एक किशोर अपने से बड़ी उम्र की महिला की ओर आकर्षित होता है.’

ऐसे विषय पर पहले भी फिल्में बन चुकी हैं. फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में एक किशोर छात्र का मन अपनी जवां, खूबसूरत मैडम पर डोल जाता है. वह उस से प्यार करने लगता है. उस फिल्म में राजकूपर ने काफी बोल्ड सीन के जरिए उस को दिखाने का काम किया था. केवल हिंदी फिल्मों में ही नहीं, अंतर्राष्ट्रीय फिल्मों में भी ऐसे विषयों पर फिल्में बनती रही हैं. इन सभी को दर्शकों के द्वारा खूब सराहा भी गया है. इटली की फिल्म ‘मलेना’, औस्कर विजेता फ्रेंच फिल्म ‘पाराडिसों’, अमेरिकी फिल्म ‘समर औफ 42’ और ‘थुरूपु पदामारा’ आदि इसी विषय पर बन चुकी हैं. फिल्म ‘सावित्री’ में एक किशोर लड़के का मन दिखाया गया है जो अपनी उम्र से बड़ी महिला पर आसक्त हो गया है. वह उसे जवां और खूबसूरत लगती है. वह उसे उसी तरह से देखता है. रामगोपाल वर्मा कहते हैं, ‘‘यह बहुत स्वाभाविक है. मुझे नहीं लगता कि कुछ गलत दिखाया गया है. बचपन में मैं भी अपनी एक टीचर के प्रति आकर्षित हुआ था. उस का नाम सरस्वती था. कुछ समय पहले मैं ने उन को यह बात बताई तो वे मुसकराईं. टीचर होने के नाते वे इस बात को समझती हैं कि किशोरावस्था में इस तरह का आकर्षण बहुत स्वाभाविक होता है.’’

कुछ संगठनों को फिल्म के नाम ‘सावित्री’ पर आपत्ति है. धार्मिक होने के कारण वह इस नाम की पवित्रता का सहारा ले कर सवाल उठा रहे हैं. उन को जवाब देते रामगोपाल वर्मा कहते हैं, ‘‘ऐसे लोग क्या कहना चाहते हैं कि दूसरे नामों की महिलाएं पवित्र नहीं होती हैं.’’ रामगोपाल वर्मा के पोस्टर को ले कर हैदराबाद के बाल अधिकार संगठन ने उन को एक नोटिस भेजा है.

हिट का फार्मूला विवाद

फिल्म के बाजार में आने से पहले उस का नाम विवादों से जोड़ा जाता है. फिल्मी कारोबार से जुडे़ लोग मानते हैं कि विवाद होने से फिल्मों को मुफ्त का प्रचार मिल जाता है. इस संबंध में रामगोपाल वर्मा का कहना है, ‘‘मैं अपनी फिल्म के प्रचार के लिए ऐसे सस्ते हथकंडे नहीं अपनाता हूं. इस के अलावा न ही गंदे व सस्ते विषयों को लेता हूं.’’ रामगोपाल वर्मा की बात अपनी जगह पर सही हो सकती है. इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि विवादों के चलते फिल्में प्रचार पाती हैं. फिल्म उद्योग से जुडे़ तमाम लोग फिल्मी विवादों को भड़का कर प्रचार पाते हैं. फिल्म ‘सावित्री’ अपनी रिलीज से पहले ही प्रचार पा चुकी है. कई जगहों पर विरोध के बाद इस का नाम ‘श्रीदेवी’ भी प्रचारित किया जा रहा है.  कानूनी पचडे़ से बचने के लिए रामगोपाल वर्मा साफतौर पर कहते हैं, ‘‘मेरी इस फिल्म में न तो किसी महिला टीचर की कहानी है और न पोस्टर में दिखाई गई महिला टीचर है. मेरी फिल्म में आज के दौर की जीवनशैली दिखाई गई है. पोस्टर को देख कर उसे मुद्दा बनाना ठीक नहीं है. असली कहानी परदे पर दिखेगी. यह फिल्म युवा मनोविज्ञान पर आधारित है.’’ मनोविज्ञानियों का भी मानना है कि किशोरावस्था में इस तरह के आकर्षण स्वाभाविक हैं. इस को ले कर किशोर उम्र के बच्चों की काउंसलिंग करने की जरूरत है. किसी तरह की समस्या के समाधान के लिए बच्चों के मनोभावों को समझ कर फैसला करना चाहिए.

आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में बहुत सारे बदलाव हुए हैं. शिक्षा एक तरह से बाजारवाद में बदल चुकी है. स्कूलों में इंटीरियर से ले कर पढ़ाई तक में सबकुछ बदल चुका है. किताबें, बच्चों की ड्रैस, लंचबौक्स, पढ़ाई का तरीका सभी आधुनिकता की दौड़ में बदलता जा रहा है. साथ ही टीचर की सोच, पहनावा और रहनसहन भी बदल गया है. इस का असर सब से अधिक किशोर उम्र वाली कक्षाओं यानी 9वीं से 12वीं में तेजी से पड़ा है. किशोर उम्र में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण होता है. कई बार इसी का शिकार हो कर बच्चे अपनी ही टीचर के प्रति आकर्षित हो जाते हैं. ऐसे में वह सब से पहले उस टीचर की हर बात को मानना शुरू कर देता है. उस का खयाल रखता है. किसी न किसी बहाने उस टीचर के आसपास रहने की कोशिश करता है. कई किशोरों में यह आकर्षण दिल में बना रहता है तो कई कुछ कदम आगे भी बढ़ जाते हैं. ऐसे में कई बार उन को डांट भी खानी पड़ जाती है. ज्यादातर मसलों में यह बात पढ़ाई खत्म होने के साथ उन के स्कूल से बाहर चले जाने के बाद खत्म हो जाती है. आज के समय में कई टीचर और छात्र अपने फेसबुक अकाउंट रखते हैं. छात्र अपनी पसंदीदा टीचर के फेसबुक अकाउंट के साथ भी जुड़ना चाहता है. कई बार टीचर उसे ऐसा करने की छूट भी दे देती है. मनोविज्ञानी डा. दिशा पांडेय कहती हैं, ‘‘ऐसे मसले आने पर टीचर की जिम्मेदारी बढ़ जाती है. उसे बहुत ही शांत मन से काम लेना चाहिए. बच्चों की शिकायत करने के बजाय उसे समझाना चाहिए. यह उम्र में आ रहे बदलावों के चलते स्वाभाविक बात होती है.’’

डा. दिशा कहती हैं, ‘‘यह परेशानी नई नहीं है. स्कूलों में इन बातों को बहुत ही सहज और सरल ढंग से हल कर लिया जाता है. टीचर को खुद अपने आचारव्यवहार से ऐसा करना चाहिए जिस से बच्चे में ऐसे भाव न पनपने पाएं. टीचर को ऐसे बच्चों पर निगाह रखनी चाहिए और उस को ऐसे समझाना चाहिए जिस से बात बिगड़ने से पहले बन जाए और टीचर या बच्चे दोनों के लिए घटना दुखद न बन जाए. किशोरों के अपनी टीचर के प्रति ऐसे आकर्षण कोई अजूबी बात नहीं है. इन को पूरी संवेदनशीलता के साथ ही देखा जाना चाहिए. सब से अधिक परेशानी कक्षा 11 और 12 में पढ़ने वाले बच्चों के सामने आती है. ऐसे बच्चे को पहचान कर उस की काउंसलिंग कर के परेशानी को हल किया जा सकता है.’’ कई बार बच्चे इस आकर्षण को खुद ही नहीं समझ पाते. उन को केवल यह लगता है कि टीचर उन को अच्छी लगती है. ऐसे कुछ बच्चे बातचीत में स्वीकार करते हैं कि उन की टीचर उन को पसंद आती है. इस का कारण बताते वे कहते हैं, ‘‘मुझे वह बहुत सुंदर लगती है.’’

टीचर की सुंदरता की तारीफ बच्चों में उस के प्रति आकर्षण के भाव को बढ़ाता है. कुछ बच्चे स्वीकार करते हैं कि वे सोचते हैं कि जब उन की शादी हो तो लड़की इन्हीं टीचर जैसी हो. स्वाभाविक आकर्षण को उम्र के असर के रूप में ही देखा जाना चाहिए. इस से अधिक इस को देखने की जरूरत नहीं है. पहले बच्चों और टीचर की उम्र के बीच का फासला ज्यादा होता था तो ऐसे आकर्षण की संभावना कम होती थी. अब टीचर और छात्र के बीच का फासला कम हो गया है. 14-15 साल का छात्र और 22-25 साल की टीचर के प्रति ऐसे आकर्षण की संभावना ज्यादा बलवती हो जाती है. कई टीचरों में सुंदर और स्मार्ट दिखने की चाहत उन की उम्र को और भी कम कर देती है. ऐसे में आकर्षण बढ़ने की संभावना ज्यादा ही होती है. एक पिं्रसिपल का कहना है, ‘‘ऐसे आकर्षण उन टीचरों के साथ ज्यादा होते हैं जिन की पढ़ाई में हंसीमजाक  की संभावना ज्यादा होती है. कई बार बच्चे हंसीमजाक को टीचर की स्वीकृति समझ लेते हैं. फलस्वरूप वे आकर्षण के सपने को अलग रूप में देखने लगते हैं.’’

भटकाव की उम्र

टीचर और किशोर के प्रति आकर्षण की घटना को बहुत गंभीर रूप में देखने की जरूरत नहीं है. यह आकर्षण तक ही सीमित रहे, इस बात का पूरा खयाल रखना होगा. इस में सब से बड़ी भूमिका स्कूल और टीचर की होती है. किशोर उम्र का बच्चा मानसिक बदलाव की उम्र में होता है. उस में ऐसी बातें आनी स्वाभाविक होती हैं. ऐसी घटनाओं का पता चलने पर बच्चे को सही तरीके से समझाना चाहिए. बदलती दुनिया के तौरतरीकों और फैशन को सीमा के अंदर रखने की जरूरत है. कई बार देखा गया है कि टीचर की तारीफ की शुरुआत बच्चा घर से ही करता है. ऐसे में पेरैंट्स द्वारा बच्चे को यह समझाने की जरूरत है कि यह उम्र उस की पढ़ाई की है. इस उम्र में वह इस काम को ही करे. इधरउधर भटकने से उस का कैरियर प्रभावित होगा जिस का प्रभाव उस के आने वाले जीवन पर पड़ेगा.

पोंगापंथ के खिलाफ मुहिम

‘कौन कहता है आसमान में सूराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो…’ एक कविता की इन पंक्तियों को बिहार में सदियों से जमी पोंगापंथ की गंदगी को साफ करने में लगे कुछ लोग सच साबित कर रहे हैं. अंधविश्वास और पाखंडी बाबाओं के किले को ढहाने के लिए शुरू की गई छोटीछोटी कोशिशें, धीरेधीरे ही सही, रंग लाने लगी हैं. ऐसे लोगों पर पाखंड के धंधेबाजों ने कई दफे हमले भी किए पर उन्होंने हार नहीं मानी और अपने मकसद में लगे रहे. फिल्म ‘पीके’ ने न सिर्फ देश के सामाजिक और रूढि़वादी तानेबाने पर सीधा प्रहार कर पोंगापंथ के खिलाफ उठ रही आवाजों को मजबूती दी बल्कि मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारा और चर्च के नाम पर सियासी रोटियां सेंकने वालों व पाखंड की दुकान चलाने वालों के चेहरे से नकाब हटाने की पुरजोर कोशिश की.

देशभर में 8 साल से ‘अंधविश्वास भगाओ, देश बचाओ’ मुहिम चलाने वाले बुद्ध प्रकाश भंते कहते हैं कि उन की जिंदगी का मकसद भाग्य, भगवान, मूर्तिपूजा, पंडित, मुल्ला और पाखंडियों की पोल खोलना बन गया है.  भंते कहते हैं कि पंडेपुजारियों ने अपना धंधा चलाने के लिए प्रचारित किया है कि कणकण में भगवान है, पर असलियत यह है कि कणकण में विज्ञान है. आदमी, समाज, देश और दुनिया की तरक्की विज्ञान और तकनीक की बदौलत हो रही है न कि इस के पीछे भगवान नाम की चीज का हाथ है.

बुद्ध प्रकाश भंते तर्कों और विज्ञान के कमालों के सहारे लोगों के जेहन में गहरे बैठे पोंगापंथ को भगाने की मुहिम में लगे हुए हैं. हरियाणा के तहसील सोसाइटी से उन्होंने हाथ की सफाई की विधिवत ट्रेनिंग ली है. वे बिहार अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य रह चुके हैं.  वे स्कूलों, कालेजों, जेलों, पुलिस कार्यालयों, पंचायतों और गांवों में जा कर लोगों को बाबाओं व ओझाओं की करतूतों की पोलपट्टी वैज्ञानिक तरीके से खोलते हैं. वे बताते हैं कि सदियों से हमारा समाज डायन, बलि, टोटका, झाड़फूंक, जादूटोना, तंत्रमंत्र के चक्कर में इस तरह फंसा हुआ है कि उस से छुटकारा मिलने में काफी समय लगेगा. धीरेधीरे ही सही, पर लोग इन ठगों की असलियत को समझने लगे हैं. सांप के काटने से भारत में हर साल डेढ़ लाख लोगों की जान जाती है. इन में 80 फीसदी लोगों की जान झाड़फूंक के चक्कर में फंस कर समय बरबाद करने की वजह से जाती है. जिस आदमी को सांप ने काटा हो, अगर तुरंत उसे अस्पताल ले जा कर सही इलाज कराया जाए तो मरीज की मौत नहीं होगी.

बाबाओं से नजात जरूरी

पब्लिक अवेयरनैस फौर हैल्थफुल अप्रोच फौर लिविंग (पहल) के मैडिकल डायरैक्टर डा. दिवाकर तेजस्वी 14 सालों से स्वास्थ्य के क्षेत्र में फैले अंधविश्वास के खिलाफ मुहिम चला रहे हैं. एड्स जैसी जानलेवा बीमारी के बारे में समाज में फैले अंधविश्वास को दूर करने के लिए उन्होंने एड्स पीडि़त महिला का जूठा बिस्कुट उस के ही हाथों से खाया और यह साबित करने की कोशिश की कि एड्स छुआछूत की बीमारी नहीं है और किसी मरीज के छूने या उस के साथ खाने से यह नहीं फैलता है. उस वाकये को याद करते हुए दिवाकर कहते हैं कि सेफ सैक्स नहीं करने की वजह से ही मुख्तार और उस की बीवी रामपति एड्स की चपेट में आए. अगर सही समय पर उन का सही इलाज शुरू कर दिया जाता तो उन की जिंदगी तबाह होने से बच सकती थी.

हैल्थ के क्षेत्र में काफी ज्यादा अंधविश्वास फैला हुआ है. पहले हैजा, प्लेग, चेचक आदि को भगवान का प्रकोप माना जाता था. आज कुष्ठ, कैंसर, चेचक आदि को दैवीय प्रकोप मान कर लोग पहले बाबाओं और तांत्रिकों के चक्कर में फंसते हैं. बाबाओं के चक्कर में फंस कर लोग जान और माल दोनों का नुकसान कर डालते हैं और नतीजा सिफर ही रहता है. वे बताते हैं कि आजकल डिप्रैशन यानी अवसाद की बीमारी लोगों में तेजी से फैल रही है, जिसे लोग सिर पर भूत, प्रेत, डायन या बुरी आत्मा का सवार होना मानते हैं. जब कोई इंसान हताशा, निराशा, नाकामी, धोखा आदि मिलने के बाद दिमागी तौर पर परेशान हो कर उलटीसीधी हरकतें या बातें करने लगता है तो उस के घर वाले बीमार आदमी को झाड़फूंक के लिए तांत्रिकों के पास ले जाते हैं. जबकि मानसिक रोगी के न्यूरो मीटर को इलाज के जरिए कंट्रोल या पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है.

अकसर यह दलील दी जाती है कि अनपढ़ लोग ही अंधविश्वास व बाबाओं के चक्कर में फंसते हैं, जबकि उस से ज्यादा खतरनाक पढ़ेलिखे तबके में फैला अंधविश्वास है.इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके डा. अजय कुमार बाबाओं की ठग विद्या के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं. खासकर रामदेव के योग और दवाओं से हर तरह की बीमारियों को ठीक करने के दावों के खिलाफ वे मुहिम चलाते रहे हैं. वे कहते हैं कि एड्स, डायबिटीज, ब्लडप्रैशर, गठिया, अंधापन, हार्ट, किडनी, लिवर आदि की बीमारियों को योग से ठीक करने का प्रचार कर कई धूर्त बाबा अपना गोरखधंधा चला रहे हैं. कुछ की अपनी कंपनी के सीईओ और अब राजनेता बनने की उन की कोशिश यही साबित करती है कि आम आदमी को ठग कर पैसा कमाने की उन की भूख लगातार तेजी से बढ़ती जा रही है. अगर जड़ीबूटी और झाड़फूंक आदि से लाइलाज बीमारियों का इलाज हो सकता तो आज एलोपैथ और पूरी मैडिकल साइंस का भट्ठा बैठ चुका होता. योग के जरिए काफी हद तक बीमारियों को कंट्रोल में रखा जा सकता है, लेकिन बीमारी का इलाज नहीं किया जा सकता. ऐसा दावा करने वाले बीमारों को मौत के मुंह में धकेल रहे हैं.

गंगा मैली क्यों

सफेद बाल और दाढ़ी के साथ सफेद लिबास में उन की शख्सीयत को देख कर ही अंदाजा लग जाता है कि वे कुछ अलग किस्म के इंसान हैं और उन का काम भी औरों से अलग है. नाम तो उन का विकास चंद्र है लेकिन वे गुड्डू बाबा के नाम से मशहूर हैं. वे पूजापाठ के लिए बनी मूर्तियों समेत लावारिस लाशों को गंगा में बहाने के विरोध में पिछले 17 सालों से लड़ाई लड़ रहे हैं. ‘गंगा बचाओ अभियान’ संस्था बना कर वे साल 1998 से गंगा को पाखंड और आडंबरों से बचाने की मुहिम चला रहे हैं. वे बताते हैं कि 31 मई, 1999 का दिन था और वे गंगा में नाव से घूम रहे थे. अचानक ही पटना मैडिकल कालेज ऐंड हौस्पिटल के पिछवाड़े में कुत्तों के भौंकने की आवाजें सुनाई पड़ीं. वहां पहुंच कर देखा तो हौस्पिटल के पोस्टमार्टमरूम के पीछे कटीफटी लावारिस लाशें रखी हुई हैं और कुछ लोग उन लाशों को उठा कर गंगा नदी में फेंक रहे हैं. उसी दिन से उन्होंने गंगा को बचाने की लड़ाई शुरू करने की ठान ली. उन की मुहिम की वजह से ही पटना हाईकोर्ट ने उन्हें ‘पब्लिक स्प्रिटेड सिटीजन’ और ‘ह्विसिल ब्लोअर’ का खिताब दिया है. रिलायंस इंडस्ट्रीज उन्हें ‘रीयल हीरो’ की उपाधि दे कर सम्मानित कर चुकी है.

उन्होंने बताया कि गंगा में गंदगी की सब से बड़ी वजह पाखंड और पोंगापंथ हैं. इंसानों की लावारिस लाशें और मरे हुए जानवरों को गंगा में बहाने पर तो लंबी लड़ाई के बाद अदालत ने रोक लगा दी है लेकिन मूर्तियों और पूजापाठ के सामानों को गंगा में फेंकने पर रोक लगाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ने की दरकार है. पोंगापंथ के धंधेबाजों ने गंगा को डस्टबिन बना कर रख दिया है. गंगा के किनारे विकास चंद्र के साथ घूमने पर गंगा को साफ रखने की उन की दीवानगी से रूबरू हुआ जा सकता है. रोज नदी के किनारे पड़ी लावारिस लाशों को जमा कर वे जला देते हैं और जहांतहां बिखरे पूजापाठ के सामानों को उठा कर एक जगह जमा करते हैं और मिट्टी में दबा देते हैं. वे कहते हैं कि गंगा की आरती पर हजारोंलाखों रुपया और समय बरबाद किया जाता है पर आरती करने वालों को गंगा की गंदगी नहीं दिखाई देती है. 

कुष्ठ रोग संबंधी भ्रांति

कुष्ठ रोग के बारे में समाज में यह धारणा है कि यह बीमारी गलत काम करने की वजह से होती है या यह पिछले जन्मों के पाप का नतीजा है, यह गलत है. इसे ले कर समाज में पोंगापंथियों ने जम कर भ्रम फैला रखा है. बाबाओं ने यह प्रचार कर रखा है कि गलत काम करने, गलत संबंध बनाने, खून गंदा होने या सूखी मछली खाने से कुष्ठ रोग होता है. जबकि ऐसा कुछ नहीं है, पोंगापंथियों ने अपना धंधा चलाने के लिए इस बीमारी को ले कर भ्रम का जाल फैला रखा है. डा. दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि जिस किसी को कुष्ठ रोग हो जाता है उस मरीज को ज्यादा देखभाल और सहानुभूति की जरूरत होती है, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है.  डा. विमल कारक कहते हैं कि यह रोग माइक्रोबैक्टीरियम लेप्री की वजह से होता है. इस बीमारी का सही तरीके से इलाज किया जाए तो मरीज पूरी तरह ठीक हो जाता है. बिहार के आरा रेलवे स्टेशन के पास छोटा सा इलाका है – अनाइठ. इस इलाके में गांधी कुष्ठ आश्रम नाम की संस्था है. उस में कुष्ठ रोगियों के 68 परिवार रहते हैं जिन की आबादी 152 है. उस में रहने वाले सभी लोग अपनी बीमारी से तो तड़प ही रहे हैं पर उन का दर्द बीमारी से कहीं ज्यादा यह है कि उन के घर वालों ने देवता का प्रकोप मान कर उन्हें घर से निकाल दिया और तिलतिल मरने के लिए छोड़ दिया.

भारत में करीब 15 लाख से ज्यादा कुष्ठ रोगी हैं. उन में से 24 फीसदी बिहार में हैं. सूबे में कुष्ठ रोगियों की 40 बस्तियां हैं, जिन की हालत बद से बदतर है. बिहार में प्रति 10 हजार की आबादी पर 1.12 कुष्ठ रोगी हैं. बिहार के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में सब से ज्यादा कुष्ठ रोग के मरीज हैं. बिहार अनुसूचित एवं पिछड़ी जाति संघर्ष मोरचा के संयोजक किशोरी दास कहते हैं कि गरीब और पिछड़ों के दर्द को सुनने और उसे दूर करने वाला कोई नहीं है. उन के नाम पर पटना से ले कर दिल्ली तक सत्ता की रोटियां सेंकी जाती रही हैं पर उन के हालात में बदलाव आजादी के बाद से अब तक नहीं हो सका है.

वर्चस्व के लिए जब नंबर २ बनना चाहे नंबर १

भारतीय राजनीति इन दिनों वर्चस्व की लड़ाई में मशगूल है. फिर वह तृणमूल कांग्रेस हो या मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी हो या नईनवेली आम आदमी पार्टी. जहां तक कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी का सवाल है, इन दोनों पार्टियों में नेतृत्व को ले कर समयसमय पर विरोध और उठापटक के साथ वर्चस्व के लिए सत्ता संघर्ष का अपना इतिहास रहा है. आम आदमी पार्टी को इस में अपवाद माना जा रहा था लेकिन पिछले कुछ दिनों में पार्टी में जो ड्रामा हुआ उस से साफ जाहिर है कि वर्चस्व की लड़ाई में यह पार्टी भी अब अछूती नहीं रही. जबजब पार्टी के दूसरी कतार के नेताओं ने शीर्ष पर आने की कवायद शुरू की है तो ऐसे नेताओं को उन की औकात बताने में पार्टी ने कतई देरी नहीं की.

आजादी से पहले जवाहरलाल नेहरू बनाम सुभाष चंद्र बोस और बाद में नेहरू बनाम सरदार वल्लभभाई पटेल का सत्ता संघर्ष जगजाहिर है. कहा जाता है महात्मा गांधी की मृत्यु के बाद सी राजगोपालाचारी, सुचेता कृपलानी जैसे कई दिग्गज नेताओं को दरकिनार कर नेहरू ने पार्टी में अपना वर्चस्व कायम किया. नेहरू के बाद इंदिरा गांधी बनाम मोराजी देसाई ऐंड कंपनी के बीच वर्चस्व की लड़ाई इतिहास के पन्नों में दर्ज है. इंदिरा गांधी की इस बात के लिए बड़ी आलोचना भी हुई कि उन्होंने कांग्रेसी नेताओं की एक पूरी पीढ़ी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया. इस के अलावा अर्जुन सिंह या शरद पवार बनाम नरसिम्हाराव, प्रकाश करात बनाम सीताराम येचुरी, उद्धव बनाम राज ठाकरे के बीच वर्चस्व की लड़ाई की मिसालें भारतीय राजनीति में हैं.

‘आप’ में तूतू मैंमैं

अब जहां तक आम आदमी पार्टी का सवाल है तो यह पार्टी शुरू से ही व्यक्ति केंद्रित पार्टी रही है. दिल्ली विधानसभा में इतनी बड़ी जीत मिलने से पहले यही कहा जा रहा था कि आम आदमी पार्टी अरविंद केजरीवाल को केंद्र में रख कर अचानक पैदा हुए बहुत सारे नेताओं की असंगठित भीड़ है, जिस का न कोई सिद्धांत है और न कोई विचारधारा. आप के जन्मकाल से जुड़े रहे लोहियावादी योगेंद्र यादव और कानूनी दांवपेच में माहिर प्रशांत भूषण जैसे नेताओं का मानना है कि पार्टी भ्रष्टाचार मुक्त भारत का लक्ष्य ले कर चली थी, तो अब केवल दिल्ली ही भ्रष्टाचार मुक्त क्यों? जबकि पूरे देश की जनता भष्टाचार से मुक्ति की आस लगाए बैठी है.

चूंकि दिल्ली की जनता ने वोट अरविंद केजरीवाल को ही दिया है, इस आधार पर केजरीवाल और उन के समर्थक, योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की हैसियत को तूल देने को तैयार नहीं हैं. अरविंद दिल्ली पर निष्कंटक राज करना चाहते हैं, इसीलिए योगेंद्र और प्रशांत की चिकचिक उन्हें बरदाश्त नहीं. अरविंद समर्थक ‘आप’ नेताओं को लगने लगा कि पार्टी से इन की छुट्टी कर देने से अरविंद केजरीवाल का रास्ता सुगम हो जाएगा और इसीलिए इन दोनों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. 

‘आप’ की तुलना असम गण परिषद से भी की जा सकती है, जो छात्र आंदोलन से पैदा हुई पार्टी है. इस में प्रफुल्ल कुमार महंत और भृगु फुकन एक ही कतार के नेता हुआ करते थे. लेकिन जब प्रफुल्ल कुमार महंत मुख्यमंत्री बने और भृगु फुकन राज्य के गृहमंत्री बने तो दोनों के बीच पहले और दूसरे नंबर के बीच अहं का टकराव शुरू हुआ. नतीजतन, पार्टी और पार्टी के नेता तितरबितर हो गए. नूतन असम गण परिषद और असम गण परिषद (प्रोग्रैसिव) के नाम पर असम गण परिषद बिखर कर रह गया. आज स्थिति यह है कि इन का कोई खास नामलेवा भी नहीं रहा.

‘आप’ के केंद्र में भले ही अरविंद केजरीवाल हों लेकिन भारतीय राजनीति में इसे स्थान दिलाने में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के दौरान जुड़े सिविल सोसाइटी का अवदान कुछ कम नहीं रहा है. ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ नामक संगठन से खड़ी हुई ‘आप’ में योगेंद्र्र यादव और प्रशांत भूषण सिविल सोसाइटी के नुमाइंदे जैसे अन्य कई नेता भी अरविंद केजरीवाल के समानांतर कतार में थे. मनभेदमतभेद के बावजूद पार्टी ने चुनाव लड़ा और भाजपा के रणनीतिकारों को जबरदस्त पटखनी दी.

ममतामुकुल के बीच तनातनी

तृणमूल कांग्रेस पार्टी में वर्चस्व के मुद्दे पर ममता बनर्जी व मुकुल राय एकदूसरे के आमनेसामने हैं. लोकसभा चुनाव के बाद मुकुल पार्टी में नंबर 2 की हैसियत से आगे बढ़ कर अपनेआप को पार्टी का रणनीतिकार मान कर सर्वेसर्वा बनने के लिए जोड़तोड़ में लगे हुए थे. मुगालता यह हो चला था कि उन के बिना पार्टी एक कदम नहीं चल सकेगी. मुकुल राय, कबीर सुमन प्रकरण भूल गए और पार्टी गठन करने का श्रेय लेते हुए यहां तक कह डाला कि पार्टी के असली संस्थापक वे खुद हैं. ममता ने बहुत बाद में पार्टी की सदस्यता ली. ममता पर भला यह धौंस कैसे चलती. ममता बनर्जी ने पार्टी से मुकुल राय का पत्ता ही साफ कर दिया और दूसरे नंबर के नेता के रूप में अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी का अभिषेक कर दिया. सब से पहले ममता ने अभिषेक बनर्जी को पार्टी में शामिल किया. फिर लोकसभा चुनाव में डायमंड हार्बर से पार्टी का टिकट दिया. अभिषेक को जीत दिलाने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं का बड़ा हिस्सा पूरी तरह से मैदान में उतारा गया. अभिषेक की जीत से मुकुल राय समेत उन के समर्थकों, तृणमूल के अन्य नेताओं में खलबली मच गई थी.

मुकुल सहित पार्टी के और कुछ नेताओं, जो खुद को अलगअलग स्तर पर दूसरी कतार के नेता मान कर चल रहे थे, को अभिषेक बनर्जी से खतरा नजर आने लगा. बगावत का कीड़ा हिलोरे मारने लगा. ममता बनर्जी पर परिवारतंत्र चलाने का आरोप लगाया जाने लगा. इस बीच, सारदा मामले में सीबीआई में मुकुल की पेशी ने ममता और मुकुल के बीच अविश्वास को और अधिक हवा दी. मुकुल की मंशा भांप कर ममता ने इशारे ही इशारे में धमकाते हुए संदेश भी दिया कि बाघ का नाखून कैसे उखाड़ा जाता है, वे बखूबी जानती हैं पर मुकुल बाज नहीं आए. जाहिर है ममता ने जैसा कहा वैसा कर के दिखाया. पार्टी के तमाम पदों से उन्हें हटा दिया गया और तमाम पद उन्हें दे दिए गए हैं, जो तब तक मुकुल के मातहत थे. फिलहाल मुकुल राज्यसभा से पार्टी के सांसद हैं.

इस से पहले माओवादी समर्थक के रूप में जाने जाने वाले गायकपत्रकार कबीर सुमन न केवल लोकसभा में पार्टी के सांसद थे बल्कि  लोकसभा चुनाव में रिकौर्ड वोटों से उन्होंने जीत दर्ज की थी. लेकिन विधानसभा चुनाव के बाद ममता द्वारा माओवादियों पर की गई कार्यवाही से, खासतौर पर माओवादी कमांडर किशनजी की धोखे से हत्या के बाद कबीर सुमन के बागी तेवर अपनाने पर पार्टी ने उन से इसी तरह किनारा कर लिया था. लेकिन मुकुल प्रकरण से सिंगूर भूमि अधिग्रहण आंदोलन से उभरे नेता शुभेंदु अधिकारी, जो खुद भी बागी तेवर दिखा रहे थे, मुकुल की दुर्गति देख कर फिलहाल अपने खोल में सिमट गए हैं.

बहरहाल, मुकुल राय को मौका मिल ही गया. पार्टी फंड को ले कर प्रवर्तन निदेशालय तृणमूल से बारबार ब्योरा मांग रही है. पार्टी फंड में जोड़तोड़ का काम अब तक मुकुल राय ही करते रहे हैं. गौरतलब है कि ऐसी कुछ कंपनियों से चंदे का ब्योरा दिया गया है, जिस की सालाना आय महज 5 हजार रुपए है. लेकिन अब चूंकि पार्टी की हर जिम्मेदारी से फारिग हैं मुकुल, इसीलिए प्रवर्तन निदेशालय से निबटने से भी उन्होंने अपना पल्ला झाड़ लिया है. फिलहाल पार्टी का चंदा तृणमूल के गले की फांस बना हुआ है. चर्चा थी कि मुकुल पार्टी से अगर निष्कासित नहीं किए गए तो वे खुद तृणमूल कांग्रेस छोड़ कर भाजपा या अन्य किसी पार्टी में शामिल हो जाएंगे. लेकिन हाल ही में भाजपा के बंगाल प्रभारी सिद्धार्थनाथ सिंह ने ऐसी चर्चा पर विराम लगाते हुए साफ कर दिया कि जिन पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं उन को पार्टी में शामिल करने का सवाल ही नहीं उठता. लेकिन इस पर भी, ममता की इस समय सब से बड़ी चिंता यह है कि मुकुल राय तृणमूल कांग्रेस व ममता बनर्जी को किस तरह और कितना बड़ा झटका दे सकते हैं.

भाजपा में हाशिए पर बुजुर्ग नेता

2014 में लोकसभा चुनाव से बहुत पहले भाजपा में खासी उठापठक चली. भाजपा लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ चेहरे को दरकिनार कर के पार्टी नई पीढ़ी के नरेंद्र्र मोदी, अमित शाह, राजनाथ सिंह की तिकड़ी के साथ आई. लोकसभा चुनाव में बड़ी जीत हासिल करने के बाद बेंगलुरु में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में साफ कर दिया गया कि अगले 2 दशकों तक भाजपा में नरेंद्र मोदी और अमित शाह का वर्चस्व रहने वाला है. वैसे बेंगलुरु में नई पीढ़ी के बीच भी वर्चस्व की लड़ाई एक बार फिर सामने आई. अरुण जेटली का दो फ्रंट पर संघर्ष चल रहा था. एक तरफ सुषमा स्वराज थीं तो दूसरी तरफ राजनाथ सिंह. लोकसभा चुनाव के बाद सुषमा स्वराज को विदेश और अरुण जेटली को वित्त मंत्रालय दे कर दोनों का अहं शांत कर दिया गया. उधर, 2009 से ही अध्यक्ष राजनाथ सिंह और महासचिव अरुण जेटली के बीच पार्टी में अपनीअपनी साख को ले कर तनातनी शुरू हो चुकी थी. लेकिन अब पार्टी में तीसरे नंबर के लिए संघर्ष चल रहा था. राजनाथ और सुषमा स्वराज को पीछे पछाड़ कर अरुण जेटली आगे निकल गए. बेंगलुरु कार्यकारिणी की बैठक में मंच पर अरुण जेटली को स्थान दे कर पार्टी ने इस चर्चा पर विराम लगा दिया. जहां तक पार्टी में तीसरे नंबर का सवाल है तो एक समय ऐसा था जब पार्टी में केवल 2 चेहरे थे. अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी. बाद में मुरली मनोहर जोशी को पार्टी का अध्यक्ष बना कर उन्हें तीसरे नंबर का स्थान दिया गया पर अब वे हाशिए पर धकेल दिए गए हैं. वैसे 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी और गोविंदाचार्य के बीच भी रस्साकशी तब खुल कर सामने आई जब गोविंदाचार्य ने बयान दे डाला कि वाजपेयी तो पार्टी का मुखौटा मात्र हैं. हालांकि इस बयान की कीमत गोविंदाचार्य को चुकानी पड़ी और उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता नापना पड़ा.

भाजपा में सत्ता संघर्ष की और भी मिसालें हैं. गुजरात में 2001 में आए भुज भूकंप के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल और नरेंद्र मोदी की तनातनी जगजाहिर है. इस में केशुभाई पटेल को नरेंद्र मोदी के हाथों मात खानी पड़ी. शंकर सिंह वाघेला भी भाजपा में एक ऐसा ही नाम है, जिन्हें पार्टी में नरेंद्र मोदी का बढ़ता कद रास नहीं आ रहा था. तब भाजपा से अलग हो कर उन्होंने राष्ट्रीय जनता पार्टी का गठन किया. बाद में कांग्रेस में जा शामिल हुए. अब वापस भाजपा में लौटने का जुगाड़ बैठा रहे हैं.भाजपा की साध्वी नेत्री उमा भारती को रामजन्म भूमि आंदोलन के दौरान फायर ब्रैंड की पदवी क्या मिल गई, पार्टी में उन्हें अपने वर्चस्व का मुगालता हो गया. 2004 में भाजपा की उच्चाधिकार समिति की बैठक में खुलेआम लालकृष्ण आडवा णी को खूब खरीखोटी सुनाईं और दनदनाती हुई भरी सभा से बाहर निकल गई थीं. ऐसे में भला आडवाणी बरदाश्त क्यों करते. जल्द ही पार्टी ने उमा को बाहर का रास्ता दिखा दिया. वर्षों बाहर रहने के बाद उमा फिर भाजपा में आईं. 

कांग्रेस में जोरआजमाइश

कांग्रेस की बात करें तो समयसमय पर कई नेताओं ने जोर आजमाइश की. राजीव गांधी की हत्या के बाद शरद पवार और अर्जुन सिंह को पटखनी दे कर नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने. सत्ता संघर्ष को तब जा कर विराम लगा जब शरद पवार को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बना दिया गया और रूठे अर्जुन सिंह ने खुद ही पार्टी छोड़ दी. पर नरसिम्हा राव को कुरसी की ऐसी लत लग गई कि वे अपनेआप को सर्वेसर्वा समझने लगे. तब नेहरू परिवार के एकनिष्ठ नेताओं के बीच सोनिया गांधी को लाने की सुगबुगाहट शुरू हो गई. नतीजतन, धीरेधीरे नरसिम्हा राव में असुरक्षा की भावना घर करती गई. पार्टी में अपनी साख बनाए रखने के लिए नरसिम्हा राव ने हवाला और झारखंड मुक्ति मोरचे के सांसदों को खरीदने का तिकड़म शुरू किया. इसी बीच, बाबरी मसजिद कांड, सैंट किड्स कांड, लक्खूभाई पाठक कांड ने उन की छवि एक ऐसे नेता की बना दी जो अपनी कुरसी बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है.

उधर, 1994 में नरसिम्हा राव से मतभेद के कारण अर्जुन सिंह, माधवराव सिंधिया, नारायण दत्त तिवारी, शरद पवार, पी ए संगमा, नटवर सिंह, पी चिदंबरम जैसे नेता भी पार्टी से अलग हो गए. इस दौरान राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, कांग्रेस तिवारी, मध्य प्रदेश विकास कांग्रेस, इंदिरा कांग्रेस नाम से कई अलग पार्टियां भी बनीं. 1996 का चुनाव कांग्रेस हार गई. अब कमान संभालने आए सीताराम केसरी. सीताराम केसरी पार्टी में अपना वर्चस्व बनाने में लग गए. उन की महत्त्वाकांक्षा जोर मारने लगी. तब सोनिया गांधी ने कमान संभाली.

पिछले दिनों ‘आप’ में जो योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के साथ हुआ, कुछ ऐसा ही कांग्रेस में सीताराम केसरी के साथ हुआ था. केसरी पर लगातार इस्तीफा देने का दबाव बनाया जा रहा था. वैसे तो केसरी चुने हुए अध्यक्ष थे, लेकिन दबाव के कारण उन्होंने इस्तीफा देने का मन बना ही लिया. पर इस्तीफा वे कांग्रेस के अधिवेशन में ही देने को अड़ गए. चूंकि इस में इस्तीफा नामंजूर होने का अंदेशा था, इसीलिए एक दिन अचानक केसरी की ओर से इस्तीफे की पेशकश की खबर अखबारों में प्रकाशित हो गई. माना जाता है ऐसा सोचीसमझी रणनीति के तहत किया गया था और बगैर अध्यक्ष की अनुमति के कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुला ली गई. बैठक में पार्टी के संविधान की धारा 19 (जे) के तहत प्रणब मुखर्जी ने पार्टी में केसरी की सेवा के लिए उन का आभार प्रकट करना शुरू किया. केसरी ने इस का विरोध किया, तब उन्हें डपट कर बिठा दिया गया. इस तरह बेइज्जत कर के सीताराम केसरी को पार्टी के अध्यक्ष पद से हटाया गया.

दक्षिण की राजनीति में टकराव

जहां तक अहंकार के टकराव का सवाल है तो इस की मिसाल दक्षिण में भी कुछ कम नहीं है. दक्षिण भारत की राजनीति के शिखर पुरुष एन टी रामाराव और एम जी रामचंद्रन के बाद इन की पार्टी में भी वर्चस्व की लड़ाई का अपना इतिहास रहा है. अरविंद केजरीवाल की तरह एन टी रामाराव और रामचंद्रन गैरराजनीतिक व्यक्तित्व थे. इसीलिए राजनीति में आए तो अपने साथ साफसुथरी छवि वाले लोगों को ले कर आए. आंध्र प्रदेश में एन टी रामाराव की बीमारी का लाभ उठा कर उन के विरोधी भास्कर राव ने और फिर उन के दामाद ने रामाराव का तख्ता पलट दिया.

गौरतलब है कि रामाराव पर शोध करने वाली छात्रा लक्ष्मी पार्वती बाद में उन की पत्नी बनी. यह बात पहले ही बेटे और दामाद को नागवार लगी थी. रामाराव के बाद लक्ष्मी पार्वती और चंद्र्रबाबू नायडू के बीच तेलुगूदेशम पार्टी की विरासत को ले कर टकराव तेज हुआ. आखिरकार, रामाराव की विरासत पर चंद्र्रबाबू का कब्जा हो गया और पार्वती को किनारे कर दिया गया. वहीं, तमिलनाडु में अन्ना मुनेत्र कषगम के एम जी रामचंद्र्रन के बाद उन की पत्नी जानकी रामचंद्रन और जे जयललिता के बीच भी सत्ता को ले कर टकराव शुरू हुआ. कहते हैं गांधीजी से प्रभावित हो कर रामचंद्रन कांग्रेस से जुड़े थे. लेकिन बाद में करुणानिधि के द्र्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) में चले गए. लेकिन जब करुणानिधि अपने बेटे एम के मुथु को आगे लाने की जोड़तोड़ करने लगे तो रामचंद्र्रन अपने को पार्टी में उपेक्षित महसूस करने लगे. तब उन्होंने पार्टी पर भ्रष्टाचार का बोलबाला होने का आरोप लगा कर पार्टी के दिग्गज नेताओं व मंत्रियों को अपनी संपत्ति का खुलासा करने को कहा. इसे पार्टी विरोधी गतिविधि मान कर रामचंद्र्रन को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.

कामराज के शिक्षा सुधार और अन्नादुरई द्वारा उठाई गई सामाजिक विसंगतियों, गरीबी, भाषाई आंदोलन से प्रभावित रामचद्र्रन ने तमिल अस्मिता का मुद्दा ले कर 1972 में औल इंडिया अन्ना द्र्रविड़ मुनेत्र कषगम पार्टी का गठन किया. लेकिन रामचंद्रन के बाद उन की पत्नी जानकी रामचंद्रन और जे जयललिता के बीच उन के उत्तराधिकारी को ले कर जंग छिड़ गई. आखिरकार जानकी गुमनाम हो गईं और पार्टी की विरासत जयललिता के पास रह गई. 

उद्धव ने राज के काटे पर

सत्ता संघर्ष का ऐसा ही वाकेया उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे का है. शिवसेना में रहते हुए राज ठाकरे चाचा बालासाहेब ठाकरे के सामने उन के बेटे उद्धव ठाकरे की नेतृत्व क्षमता को ले कर सवाल उठाते रहे. लेकिन बावजूद इस के, बालासाहेब ठाकरे ने उद्धव को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. जबकि उद्धव, राज ठाकरे की तुलना में राजनीति में नए थे. वहीं, शिवसैनिकों का बड़ा हिस्सा राज ठाकरे में बालासाहेब की परछाईं देखा करता था. इसीलिए राज ठाकरे अपनेआप को बालासाहेब के उत्तराधिकारी के रूप में देख रहे थे. पर बालासाहेब ने राज ठाकरे को झटका दिया और उद्धव को अपनी राजनीतिक विरासत सौंप दी. तब राज ठाकरे ने बालासाहेब पर अपनी अनदेखी करने और पक्षपात करने का आरोप लगाया. बालासाहेब ठाकरे ने इसे पार्टी में बगावत के रूप में लिया. इस के बाद 2004 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उद्धव ने राज ठाकरे को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया. आखिरकार, 2006 में राज ठाकरे शिवसेना से अलग हो गए और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना का गठन किया.

किस्से और भी हैं

बिहार में जीतनराम मांझी बनाम नीतीश कुमार प्रकरण वर्चस्व के लिए उठापटक की एक और ताजा मिसाल है. लोकसभा चुनाव में जनता दल यूनाइटेड के खराब नतीजे की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे कर जीतनराम मांझी को मुख्यमंत्री बनाया. लेकिन नीतीश कुमार का आरोप रहा कि पार्टी में रहते हुए मांझी का झुकाव भाजपा और आरएसएस की ओर है. वहीं, मांझी ने नीतीश पर रिमोट कंट्रोल से सरकार चलाने का आरोप लगाया. दोनों के बीच जोरआजमाइश बढ़ती रही. इस प्रकरण में आखिरकार जीतनराम मांझी को किनारा करना पड़ा. ये वही नीतीश कुमार हैं, जिन्होंने कभी पार्टी के बुजुर्ग नेता व संस्थापक जौर्ज फर्नांडीस का कद छोटा किया था. माकपा के महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत के बाद पार्टी के कई दिग्गज नेताओं को किनारे कर के प्रकाश करात महासचिव बने. लेकिन आज पार्टी के घटते जनाधार को ले कर पोलित ब्यूरो नेता सीताराम येचुरी और प्रकाश करात के बीच चल रहे वैचारिक मतभेद आम हैं.

इन तमाम मिसालों से साफ है कि शीर्ष नेतृत्व या पार्टी का चेहरा बने रहने के लिए जोड़तोड़ करने वाले नेता भूल जाते हैं कि व्यक्ति से बड़ी पार्टी हुआ करती है और समय से बड़ा बलवान कोई नहीं. समय के झोंके में अच्छेअच्छे बह जाते हैं. दरअसल, दुनिया में किसी भी राजनीतिक पार्टी का अस्तित्व नहीं है जो व्यक्तिकेंद्र्रित हो कर रह जाए. तमाम राजनीतिक पार्टियों में हमेशा से अंदरूनी कलह, टूटफूट, टूटनेजुड़ने का सिलसिला चलता रहता है. बावजूद इस के, मंच (पार्टी) वही रहता है और किरदार बदलते रहते हैं. वह राजनीतिक किरदार कितना सशक्त है, यह एक हद तक पार्टी के अंदर कार्यकर्ताओं और पार्टी से बाहर जनसमर्थन पर निर्भर करता है.

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